5. कावेरी िदी के तट पर
# **कावेरी िदी के तट पर**

अरेल २००१ - द्िण भारत मं पव्् का्ेरी नदी के तट पर, रामकृषण धयानपीि आ्म अ्जनतपालयम, ईरोि। यह है तनतयानंदिी द्ारा सथावपत स्ोरथम आ्म, िो उनहंने बबिदी, बगलोर के रचमलत आ्म से भी प ं ू्ण सथावपत ककया। िन्री २००३ मं सथावपत बबिदी आ्म, माना िाता है तनतयानंद ममशन का आधयाजतमक मुखयाल। ईरोि आ्म आि आदी तनतयानंदेश्र धयानपीिम (अदद अथाणत 'रथम') से नामांककत है। यह आ्म सािी है पू्ण ददनं के कुछ सबसे रगा़ उपचारी चमतकारं का।
अरेल २००१ - आ्म का उदघाटन दद्स। इस १४ धच् मं दमशणत है स्यं तनतयानंदिी की हसतमलवप, इस पा्न प्ण को धचजहनत करती हुई। (लेखन पिता है: १४ अरैल २००१, रभात, तममल मास धचततीरै, तममल न््षण दद्स, रामकृषण धयानपीिम का उदघाटन)

आ्म के परंपरागत उदघाटन के बाद, यहां दमशणत है ईरोि मं एक उदघाटन समारोह। इस धच् मं बाय से दाय ं की ओर (बैिे ) है - के .एस. ं रंगस्ामी गंडर, एक शै्िक संसथान के मामलक ् एरोि के एक व्मशषट वयज्त, स्ामीिी, ्ी ततु्ंबल देमसका ्ानरकाश स्ामीगल, गुु महा सजननधानम, थंडइमंडल आदीनम के रधान ए्ं ् ्ी कुमारसामी ततु्ाडुतुरई आदीनम के तंबबरन ् - दोनं ही द्िण भारत के राचीन दहनद मि, ु ए्ं पंधगयांन गंडर, आ्म भूमम के दानकताण।

आ्म मं सतसंग
यह व्चार योगय है कक जिस रकार पव्् गंगा नदी अपना ुख सही उततरी ददशा मं उततर भारत मं ्ाराणसी की ओर र्ादहत होती है, उसी रकार का्ेरी नदी भी सही उततरी ददशा की ओर र्ादहत होती है, िीक इसी बबनदसथल पर िहां आ्म ु अ्जसथत है।
यह उटघाटन ए्ं र्ेश के बाद था कक इस व्नर आ्म की छत तनममणत हुई, िो ्षाण से भी साधारण आ्य रदान करती थी।

मेु पूिा पव्् नदी का्ेरी के तट पर। मेु रहमा णड का शज्त शाली ् रहसयपूणण ब् -पररमाणण क रतत ूप है।


एक अ्तार का तनमाणण
महासंसथान का व्सतारण: तनतयानंद धयानपीिम की संसथापना ्


- तनतयानंदिी भारत्षण के अातम्ानी गुुओं ए्ं समध आधयाजतमक परंपरा के रतत सदै् क ृ ृत् रहते हं, जिनहंने इन अनंत आधयाजतमक सतयं के मशिण ् अधययन को उनके मलए समभ् ककया। इस आतम्ान बोध को दसरं से साथ ू बांटने ए्ं उनका िी्न मान्ता की से्ा मं समवपणत करने की स्ेचछा से, उनहंने यह ृ़ तनणणय मलया कक ्ं अपने परर्ाजय के एकाकी िी्न का समापन करंगे और सा्णितनक िी्न मं र्ेश करंगे। इसे यथातण करने, तनतयानंदिी ने उनकी सामाजिक ् आधयाजतमक महासंसथान, तनतयानंद धयानपीिम का िन्री २००३ म ् ं तनमाणण ककया, जिसका मुखयालय द्िण भारत मं बंगलू (पू्ण बगलोर) के समीप बबिदी म ं ं है। संसथा का तनमाणण इस दरृजषट के साथ ह ू ुआ: * - भारत की ्ासतव्क ्ैददक परंपरा का संरिण, पुनरिी्न और व्सतारण करना। * - सामानय मनुषय को योग ् धयान के अनेक लाभं से पररधचत कराना, ए्ं ्ेषटतर िी्न के रायोधगक समाधान रदान करना। * - भारत की सहसयपूणण यौधगक रणामलयं के व््ान को व्श् मं रकट करना। * - आ्शयकमंद ् अलपसुव्धा के लोगं को धचककतसा देखभाल, आहार-पुजषट, मशिा, यु्ा ् नारी सशज्तकरण और कई मान्ीय पहल द्ारा पहुंचना। * - एक संघषणमु्त, उतपादक ए्ं समरसतापूणण
्ैजश्क कुटुमभ के सिन हेत ृ ु सहायक बनना िो भाषा, संसकृतत ् िाती के अ्रोधं के परे होकर व्मु्त है।
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- मान्ता को परमचैतनय के आगामी आधयाजतमक उ््न की ओर नेतत् करना। ृ