4. मेरे वियजनं,
# मेरे वियजनं
जिनहं आप "दसरं" के ूप म ू ं देखते हं, ्े तो आपका ही व्सतार हं। गलत पररभाषा के कारण आप उनको "दसरं" के ूप म ू ं बुलाते हं। व्शेष ूप से िो लोग सीधे आपके िी्न से िुिे हं, आप जिनसे रततददन ममलते है, उनहं आप कभी भी 'अनय' की ्ेणी मं नहीं रख सकते, ऐसा करना एक तरह की दहंसा है। बजलक यदद आप ददन मं तीन बार से अधधक ककसी को भी याद करते हं, तो ्ह वयज्त "अनय" नहीं कहा िा सकता ; ्ह आप का ही एक अंग है। ्ह वयज्त कोई भी हो सकता है – आपका चौकीदार, आतमीय मम्, गुु या भग्ान। उनके साथ अधूरापन स्यं के साथ अधूरापन है।
हमने दतनया को नहीं बताया है, हमने द ु सरं को नहीं बताया है, हमने स्यं और द ू सरं को इस ू बहुत महत्पूणण सच से समध नहीं ककया है कक 'अनय' ्ासत् म ृ ं हमारे अपने ही आयाम हं!
मने क ं ुछ महान धाममणक लोग देखे हं िो बहुत ्षं से धयान, िप, पूिा और अनय साधना कर रहे हं, परनतु ्े अपने ही पतत या पतनी, बेटी या बेटे को संभाल नहीं सकते हं, ्यंकक उनहं यह नहीं बताया गया है कक जिनहं ्ह अनय समझते हं, ह् स्यं उनके ही आयाम हं, उनके अपने हं। हमने इस ददशा मं अपना धयान कंदित नहीं ककया। यह सबसे बिे अनधव्श्ासं मं से एक है जिससे कक दहंद पीडित ह ु ं। आपस मं समपूणणता सबसे महत्पूणण आधयाजतमक गुणं मं से एक है, जिसका तनरंतर अनुसरण और रचार करना चादहए।
यह दभाणगयप ु ूणण है कक हम एक साथ रहने के मलए तभी तैयार होते हं िब हमारे समि कोई अनय व्कलप नहीं होता है। हम ्यं नहीं स्णरथम अनय लोगं के साथ पूणणत् करने का व्चार कर सकते? सददयं से ्ान, मोि और तन्ाणण को महत् देने के कारण, हम अपने समीप ही देखना भूल गए, यह देखना भूल गए कक हम अपने आसपास के लोगं के साथ कै से संबंध रखते हं, उनके साथ कै सा वय्हार करते हं।
अपने आस पास के रतयेक पहलू, िैसे कक आपसी संबंध, धन, स्ासथय, लोग, रतयेक जसथतत, पालतू िान्र, पौधे और ्ह-नि्, इन सभी की तरफ आपका मनोभा् उसी एकत् और पूणणत् भा् से होना चादहए जिसे अद्ैत चेतना बोलते हं। उसके बाद ही आप यह महत्पूणण सतय समझ पायगे : ''िी्ो रहमै् न परः'' – जिसे आप वयज्तगत चेतना के ूप म ं ं अनुभ् करते हं, ्ह और कुछ नहीं, बजलक ्ही रहमांडीय चेतना है!
- परमहंस नित्ािंद
तनतयानंद ममशन के आधयाजतमक संसथापक
एक अवतार का संभावि
र्चनं का सीधा रसारण रततददन http://www.nithyananda. tv पर देखा िाता है, तथा व्मभनन अंतराष्ीय टेमलव्ज़न चैनलं पर ् ्ीडडयं कॉनफरंमस ंग द्ारा। परमहंस तनतयानंदिी एक शज्तशाली आधयाजतमक उपचारक भी हं तथा मसवधयं मं दि हं, जिनहंने सफ़लता से यौधगक व््ानं का रहसयाभेदन ककया िैसे कुणडमलनी िागरण, उततोलन, पदाधथणकरण, कायाकलप ए्ं आहार के परे िीना। ्ं मीडडया आतंक्ाद ए्ं भयादोहन करने ्ालं पीले प्कारं के उततरिी्ी हं।
परम पा्नातमा परमहंस तनतयानंदिी, आि अखणड सनातन दहनदधमण की एक सपषट, धमणसंगत ् अरािनीततक ्ाणी के ू ूप मं रखयात है । ्ं परमचैतनय के एक सिी् अ्तार के स्ुप, व्श्भर मं लाखं द्ारा पूजित है। ्ं महातन्ाणणी पीि, दहनदधमण की सबसे राचीन संसथा, के महामंडलेश्र (आधयाजतमक ू रमुख) हं। ्ं स्ाणधधक देखं िाने ्ाले आधयाजतमक गुु हं, यूटयूब पर १८० लाख़ बार देखे गए हं तथा ्े ३०० पुसतकं से अधधक २० भाषाओं आदद के रकाशनो के लेखक हं। उनके
"आपकी अमतस्ूप कथा ्लेश ् पीिा से तपते िी्न के ृ मलए िी्न-संिी्नी है। महातमाओं ् भ्तकव्यं द्ारा यशोगान होती हुई, यह सारे पापं को ममटातीं है। ््णमा् से परममंगल का दान करने ्ाली यह उनको परम आनंद का धन रदान करती है िो इन गाथाओं का गान करते है, ््ण करते हं ए्ं उनका समतत-धयान करते ह ृ ं।" ~ ्ीमद भाग्तम ्
त् कथामतं तपतिी्नं ृ कव्मभरीडडतं कलमषापहम।् ््णमंगलं ्ीमदाततं भु व् गणजनत से भ ृ ूररदा िनाः।।
उनके अ्तरण का रहसय
उनके अ्तरण का रहसय
परमहंस तनतयानंद िी का िनम एक धमणतनषि दहनदु माता-वपता को हुआ, द्िण भारत के दे्सथान नगर, ततु्ननामलई मं। ्ासत् मं, अुणाचलम ए्ं उनकी पतनी लोकनायकी एक तीथणया्ा मं थे, द्िण भारत के रमसध इचछापूततण मंददर ततुपतत मं, िब माँ लोकनायकी को यह बोध हुआ कक ्ं अपनी दव्तीय संतान से गभण्ती हं। उनहंने अपने दव्तीय-िनमे का नामकरण ककया - रािशेखरन, 'दे्ं के रािा' (भग्ान मश् का एक रमसध नाम)। उस समय उनहं स्यं के श्दं के सतय का अलप ही ्ान था!
एक बार, स्ामीिी ने स्यं जि्ासु ्ोताओं को इस दैव्क िनम के रसंग, इस लोक मं उनके अ्तरण के कथामत ृ का ्णणन:
'यह असंभ् है कक एक अनुभ् का श्दं मं ्णणन ककया िाय िो अंतररि ् काल से पूणणतःपरे है। पर मुझे रयतन करने दं। शरीर मं र्ेश करने के समय, म एक समप ं ूणण आतमिागुकता कक जसथतत मं था। पथ्ी धसी ह ृ ुई थी लहर पर लहर के गहन अनधकार मं। एक समपूणण मौन ्ायु-मंडल मं वयापत था। मेरे नीचे, पथ्ी लोक पर, म ृ ुझे अनुभूतत हुई एक िे् कक ुपरेखाओं की िो अब म द्िण ं भारत नाम से पहचानता हूँ। अकसमात, मने आकाश- ं मंडल मं देखा एक जयोततषमत उलका का सफुरण, तदपरांत ु जयोतत का एक व्सफ़ोट। उसी िण मं, मने शरीर म ं ं र्ेश ककया ए्ं िनम मलया। इसके तुरंत बाद का ृशय जिसकी अनुभूतत मुझे मेरे अंतरने् से हुई, ्ह अुणाचल था, ततु्ननामलई का पा्न धगरीप्णत, और मुझे ्ात हुआ कक मने शरीर धारण ककया है, प ं ुनः।

माता-वपता, लोकनायकी ् अुणाचलम

बालक तनतयानंद
पा्न अुणाचल धगररप्णत
एक िी्नकाल तपस को समवपणत

तनतयानंद ने अपना आनंदपूणण बालयपन एक व्शाल, समध ् दानधमी कारक परर्ार म ृ ं वयततत ककया। उनके घर मं साधूसंत ् परर्ािक मभिुक सदै् स्ागत ए्ं सुपूजित थे। उनके मातक वपतामह ृ एक धमणपरायण वयज्त थे िो मु्तभा् से व्मभनन मंददरं ् आधयाजतमक संसथानं को योगदान
देतं थे। ्ं तनतयानंद कं रथम मागणदशणक थे जिनहंने उनहं भारत की महान आधयाजतमक परंपराओं ् शास्ं से पररधचत कराया। तनतयानंद ने मेकै तनकल इंजितनयररंग मं डडपलोमा पूणण ककया ए्ं उसी ्षण, स्यं की िी्नकालीन उतकं िा को समपूणण करते हुये संनयास िी्न मं समा्ेशन ककया।

भग्ान रमण महवषण , आतम्ानी गुु ् रेरणा ्ोत , ककशोर

१० ्षण के तनतयानंद का धयाना्सथा आसन मं रथम धच्
आध्ाततमक रवततत्ां ृ


बालया्सथा मं तनतयानंद ने ्ीचर के ददवयदशणन से, उसे तांबे की पणणणका पर तराशा।

ऊपर बांय: पाद ं का, काि ु खिाऊ, मातािी कुपपममल द्ा रा ऊपर दायं: पराशज्त ं िी्मूततण ,
जिनहं तनतयाननद ने स्यं मसलखिी पाषाण से उतकीणणणत ककया, माँ के दशण न उपरांत। बाएं: कुछ िी्मरू यतत ् ाँ जि नके संग बालक तनतया नंद ने रीिा ् पूिाचणन की।
तनतयानंद का रथम रेम अुणाचल धगररप्णत था। अुणाचल, यह पव्् धगररप्णत व्श्भर से जि्ासुओं को चुमबक की भाँती आकवषणत करता हं। यह भग्ान रमण महवषण िैसे व्द्ान योगी, रहसयमय मसधपुुष ए्ं आतम्ानी मुतनगण की गहभृ ूमम है| इस पुरातन धगररप्णत ने बालक तनतयानंद को आतमबोध के राथममक रयोगं हेतु एक पूणण पररिण भूमम रदान की।
आरमभ से ही, तनतयानंद पूिा, योग ् धयान की ओर व्लिणतापू्णक आकवषणत थे। बालय ूप मं, ्ं अधधक समय अपने इषटदे्ता या वरय ईश्रमूततण की पूिा-आराधना मं वयततत करते थे। ईश्रमूततणयाँ उनके वरय रीिामम् थे, जिनके साथ ्े हसते ् रोते, खेलते ् लिते थे।

पथ पर मागणदशणन
व्दयालय मं मशिा के साथ-साथ, तनतयानंद ने योगीराि योगाननद पुरी (रघुपतत योगी) नामक एक पारांगत योग गुु ए्ं मसधा (ऊिाण मं दि) से भी रमशिण मलया। ्े उनका रेमपू्णक समरण करते हं कक रघुपतत योगीिी ने ही उनहं राचीन भारत की व्समत ग ृ ुपत योगव्दयाओं से पररधचत कराया - उततोलन, पाररकटन ् पदाधथणकरण, आदद। उनके अनुमशिण मं, तनतयानंद ने सफलतापू्णक योग ् धयान मशिा के उचच सतरं को समपनन ककया।
समानांतर मं, उनहंने व्मभनन आधयाजतमक मशिकं के मागणदशणन मं ्ैददक शास्ं, पुराणं ए्ं उपतनषदं का भी अधययन आरंभ करना ककया। ततु्ननामलई नगरी मं उनकी रतयिक भेट कई पुणय पुुषं ् ्ीओं से हुई जिनसे उनने अमूलय मशिाय ्हण की। उनम ं ं से व्मशषि थे अननमलई स्ामी (भग्ान रमण महवषण के उततरगामी मशषय), योगी रामसूरत कुमार ए्ं मातािी व्भूदाननद दे्ी (कुपपामल) जिनहंने उनहं ्ेदांत ए्ं ्ीव्दया पूिा से पररधचत कराया।

तनतयानंद िी माता कुपममल के साथ

अननामलई स्ामीगल ईसा्की स्ामीगल



ककशोर तनतया नंद योगी रामसूरतकुमार के साथ
बारह ्षण कक आयु मं आतम्ान
एक ददन, बारह ्षण कक आयु मं, िब 'के ्ल धयान के साथ रीिा करते' समय, ततु्ननामलई मं जसथत पा्न पा्ल कुणडू नामक शीला पर आसान मं बैिे, तनतयानंद को एक परमगहन आधयाजतमक अंतरधयान का अनुभ् हुआ। यह अनुभ् उनमे िागत कराने ्ाला ृ था चैतनय की अबतक कक अ्ात जसथततओं को, तथा सदा का िी्न ूपांतरण। उनहं ३६० डड्ी दशणन हुआ जिसमे उनहंने स्यं को देखा की ्े स्णस् के साथ एक हं। महान अुणाचल पा्नप्णत की ि्छाया मं घदटत इस रतयि अद्ैत अनुभ् के बाद, आधयाजतमक पथ को अपना संपूणण ल्य बनाने कक तनतयानंद की उतकं िा ने और भी भीषण ् ती् ूप धारण कर मलया।



परर्ाजक
- या्ा के ददन
Section 2
स्ामीिी की सतय खोिने की जि्ासा ने उनहं देश के आर-पार ले गयी। दहमालय मं तपो्न से लेकर द्िण िे् मं कनयाकुमारी तक ए्ं पजशचम िे् मं द्ारका से लेकर पूरब मं कलकतता तक। गुफाओं ् शमशानो मं शयन, मभिाटन पर िी्न तन्ाणह, उनहंने ्षं वयततत ककय पथ-पथ पर संकट से भरे अतनजशचत िी्न म ं ं। स्णदा देशव्चरण करते हुय, कदावप न एक समान सथल पर क ं ुछ महीनं से अधधक र्ास करना। पर यह महानया्ा थी िो भारत्षण की कई अततमनोरम राकृततक ृशयभूममयं और परमपा्न तीथणया्ा सथलं पर पादचार करने ्ाली। यहां रसतुत है परर्ाि के कुछ सबसे महत्पूणण सथल।

रथम धच् खींचा गया (ततु्ननामलई) अ्तारी ल्य के आतमबोध के बाद। 12