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49. अदिैत के संिभा को समरझये -

# अदिैत के संिभा को समरझये -

यदि आप मेरे सभी कायं को अदिैत के संिभा से िेखंगे, तब आप "ननथयानंिोिम"- ्ाशित आनंि को मिसूस कर पाएंगे! नजस रण आप मेरे काया करने के संिभा को समझ जायगे उस िी पल यि आपका िो जाता िै| अदिैत के ं ननदित को समझं, जो मेरे अंिर नछपी िुई िै, यि अनंत िन िै जो मेरे भीतर िै|

संिभा िापत करना बिुत आसान िै। इस पर आलोचना ्ुू करने की जगि आप सपषटता के सा् इस सचचाई को ्िण करं की यि सतय िै| आप सूरज के पूरब से उगने के कारण को जानने के पीछे न भागे अवपतु इसके पीछे नछपे संिभा को िेखने की कोम्् करं| जो वयन्त मेरे कायं के संिभा को पाने की कोम्् करता िै िि एक भ्त िै| जो वयन्त मेरे कायं के संिभा को समझ जाये िि म सियं ि ं ूँ|"

-परमिंस ननतयानंि