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40. दीषा

# **दीषा**

दीिा, गुु द्ारा मशषय तक सतय को रतयि ूप से संचाररत करने का सीधा माधयम है। दीिा द्ारा गुु अपने मशषय को लमबे काल तक सतय ्हण, धारण ए्ं रकामशत करने के मलए तैयार करते हं।

िी्ा पर परमिंस ननतयानंि जी का ि्तवय

िब एक आतम्ानी गुु आपको सपशण कर दी्ित करते हं, तब आपके शरीर मं भी आतम्ान शरीररणाली का सॉफट्ेर डाउनलोड हो िाता है, िो आपके शरीररणाली को भी परर्ततणत कर देता है। यदद आप

समपूणण ूप से ्हण करने हं तो आपमं आतम्ान की शरीररणाली का सॉफट्ेर डाउनलोड हो िाएगा। आपका शरीर यह िान िाएगा की ्ह एक उततम अ्सथा मं पहुँच सकता है। आपकी िै्-समतत को ृ यह ्ान हो िाता है की एक उततम िी्न की समभा्ना है। िब आपपर गुु कृपा होती है तब आपका हाडण्ेयर और सॉफट्ेर पूरी तरह परर्ततणत हो सकता है।

आपके चैतनय मन को सही उपदेशं द्ारा गलत धारणाओं को तनकाल कर और सही धारणाओं से पररपूणण कर पव्् ककया िा सकता है। आपके

अचेतन मन को धयान व्धधयं द्ारा पव्् ककया िा सकता है। परंतु सॉफट्ेर के बदला् को सथाई करने के मलए हाडण्ेयर को परर्ततणत करना होता है। आपके मजषतषक की रेखाओं को िी्नमुज्त के अनुभ् को ्हण करने ए्ं रकामशत करने के मलए बदलना होता है। यह के ्ल दीिा द्ारा ही संभ् है। दीिा के माधयम से आपके व्मभनन आयाम िागत हो ृ िायगे। ग ं ुु कृपा ए्ं दशणन मा् से आपका मजषतषक इस नए सॉफट्ेर के मलए तैयार हो िाएगा।

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परमहंस तनतयानंद िी, िो योग ए्ं करया मं मसध हं, मान् स्भा् ए्ं संभ्ताओं मं उनकी रबुध अंतृणजषट द्ारा एक सचचे रामाणणक यौधगक व््ान को पुनिीव्त कर रहे हं।

'योग का रथम पद है पूणणत् ' - परमहंस तनतयानंद

तनतय योग के अभयास मं, सबसे पहले स्यं को कंदित कर अपने अंदर यह तनणणय लेना होता है कक "म समप ं ूततण, ्धा, उपायनम ए्ं आपयायनम ् के साथ यह धोषणा करता ् हूँ की म संप ं ूणण हूँ।" िब आप चेतनापू्णक यह घोषणा करते हं की आप संपूणण है और अपने अंतमणन से सभी अपूणणताओं ए्ं उलझनं को ममटाते हं तब आप शरीर को ऐसे ूपढाल कर सकते हं की ्ह आपको सभी सतरं पर व्कामसत होने मदद करेगा - शारीररक, मानमसक ए्ं चैतनय। तनतय योग सिन (तनमाणण) का भी योग है। िब आप प ृ ूणणत् के साथ अपनी सांस और अपने शरीर को एक साथ संचामलत करते हं, और मन मं रबल इचछा रखते हं की आप अपने िी्न को उचचतम तरीके से जियगे, अपनी उचचतम ं संभा्नाओं को वय्त करंगे, तब आप परम आनंद, शांतत, और स्ासथय का अनुभ् करते हं - यही तनतय योग है। अपने िी्न का स्यं तनमाणण करना, यही सचची ्धा का रमाण है।

परमहंस तनतयानंद िी ने योधगक शरीर की पररभाषा दी है, कक यौधगक शरीर ्ह है जिसमे यह पांच गुण हं:

शज्त आंतररक बल लचीलापन शारीररक गिन ऊिाण

उनका कथन है कक 'िब आप शरीर के स्ामम होने का सचचा उततरदातयत् उिाते है और उसे योग ् राणायाम द्ारा ूपढाल देतं हुए, एक स्सथ ए्ं आनंदमय शरीर का तनमाणण करते हं, तब ्ह यौधगक शरीर है'।

ऑनलाइन तनतय योग हेतु संपकण : www.youtube.com/nithyanandayoga