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39. द्ाि - ददव्ता की एक झलक

# **द्ाि - ददव्ता की एक झलक**

'दशणन' को रथानुकूल उस िण का ्णणन करने मं उपयोग ककया िाता हं िब हम ककसी िी्मूततण, संत या अतमा्ानी पुुष का अ्लोकन करते हं। ्ैददक परंपरा मं दशणन का अतत महत् है, ्यंकक ककसी ददवय अतमा्ानी पुुष के दशणन मा् से ही कई िनमं के कमण धुल िाते हं और िी्न मं गहरा ूपांतरण होता है। परंतु दशणन के ्ल देखने मा् से कई अधधक ब़कर है। दशणन को ददवयृजषट के ूप मं भी देखा िाता है, परंतु कई संसकृत श्दं की तरह ही दशणन को अनु्ाददत नहीं ककया िा सकता पर के ्ल महसूस ककया िा सकता है। तो ्िर िम ि्ान की वयाखया कै से कर सकते िं ? िैसे ककसी मंददर मं ददनचयाण के रारंभ होने से पू्ण िब रातः गभणगह के म ृ ुखय पट खुलते हं और िब हम दीयं की रौशनी से चमतकृत आभूवषत िी्मूती को देखते हं तो हमे कुछ िणं के मलए एक ऐसा अनुभ् होता है िो श्दं, व्चारं ए्ं मन के परे होता है। उसे हम दशणन कहते हं।