16. अ् उसि
# अ् उसि
दीपा्ली ्ैददक परमपरा के अनुसार उस ददन के ूप मं मनाया िाता है िब हम अपनी अ्ानता को सचचे ्ान या आतम्ान के अंततनणदहत दीपक को िला कर नषट कर देते है। दीपा्ली तनतयानंद धयानपीिम मं आशी्ाणद दद्स भी है। यह उस ददन ्षण २००० मं था, िब तनतयानंदिी को उनके अ्ताररक ममशन का बोध हुआ था िब उनके पहले आशी्ाणद के अमत श्द, 'अनंदामागा इुं गल' अथाणत ृ 'आनंदमय रहो' उनके ्ी मुख से तनकले, नौ महीने की समाधध उपरानत, अपने शरीर ् मन से व्योजित होने के अनुभ् उपरानत, आतम्ान की रतयि अनुभूतत के बाद।
कृषणाषिमी भग्ान ्ी क ् ृषण का िनमदद्स है, िो इस पथ्ी लोक ृ पर संभाव्त सबसे महानतम अ्तारं मं से एक हं। होली रंगं का तयौहार है। होली मं रंग के गुलाल को एक दसरे पर लेपा िाता है, ु बहुत आनंद ए्ं उललास के बीच, िातत, ्गण, उर ए्ं मल ंग के अंतर को तोिते हुए। होली उतस् भग्ान क् ृषण को मनाता है, िो पथ्ी ग ृ ह ृ पर सदा से सबसे चंचल, लीलाधारी, रेममय ए्ं स्ाणधधक वरय अ्तार है।
काततणगई दीपम, भग्ान मश् का रहमा ए्ं व्षणु के अपूणणत् को पूणणत् रदान करने के मलए, एक 'जयोततसतंभ' - अनंत रकाश के सतंभ के 'मलङगोतभ्' ूप मं महा रकटन को धचजहनत करने हेतु मनाया िाता है। काततणगई दीपम मं एक दीप को दसरे की लौ से िलाकर हिारं घी के दीप िलाये िाते है, परम रहमांडीय सतय ु को दशाणतं हुए कक एक बन िाते है अनेक और अनेक बन िाते है एक।
काततणगई दीपम ्ह ददन भी है िब एक किोर तपसया के लमबे अनतराल बाद, िो दे्ी पा्णती ने उनके ददवय पतत भग्ान मश् के मलए पराभज्त के साथ ककया, भग्ान मश् ने उनहं उनका आधाशरीर रदान ककया जिससे ्े दोनं पूणणूप से संयोधगत होकर एकाकार हो िाये, रभु अधणनारेश्र (िी्मूती जिसका शरीर आधा नर ् आधा नारी) के िनम का अंकन करते हुए। शारीररक ूप से यह मश् ए्ं पा्णती के ददवय संयोग को दशाणता है। आधयाजतमक ूप से, यह अद्ैत के पुणण ममलाप को दशाणता है। दो नहीं पर एक। मश् ए्ं पा्णती दो नहीं, पर एक है।


तनतयानंद ्ैददक मंददरं मं 'महा सपतयागम', एक भवय सामूदहक अजगन अनुषिान का आयोिन ककया िाता है। व्श् शांतत हेतु यह अनुषिान, १०१ समिणणक होम कं डं म ु ं परंपरागत आहुततयं के साथ व्धध्त ककया िाता है। यह पारंपररक धमणकरया सनातन दहनद धमण के ७ म ू ुखय दे्ताओं को आहुतत देकर की िाती है, उनकी ऊिाणओं का अजगन मं आ्ाहन करके और ततपशचात ििीबूदटयं से अंततम आहुतत दी िाती है।
मनुषय रणाली मं सात मुखय ऊिाण कंि होते हं, जिनहं चर कहते हं। हर दे्ता एक चर के स्ामी होते हं। और हर चर एक भा्ना के साथ िुिा होता है, िो मन को आकुल करती है, जिसका रभा् शरीर पर भी पिता है। िब हम उस दे्ता की पूिा करते हं, ्ह हमं इन भा्नाओं की पकि के परे ले िाकर मुज्त रदान करते हं।
िब ्धा से करी िाये तो यह करया एक गहन धयान बन िाती है, िो सामूदहक नकारातमकता को स्चछ करती है और ओिोन सतर को भी शुध करती है। सारे मन्, अंतदणशणन ् आहुतत सकारातमकता की लहरं को ब़ाते हं और इस रकार रहमांडीय सकारातमकता और व्श् शांतत मं सहयोग देते हं।

तनतयानंद पविर कला विशिविदयालय
*8-*फीट ऊँ ची ्मन्षी की ्वतम्
म ूनतायाँ: अधयानतमक उजाा की िाूप
'आतम्ानी गुु, िब ्ं पथ्ी लोक छोिते है, िब ्े ृ अपना शरीर छोिते है, उनहं अनुभूतत होती है कक एक ऐसा िे् संजसथत हो िो तनरंतर लोगो को रेररत करे, िो तनरंतर आरोगयता रदान करे, िो रेरणा दे सके , िो उनहं आधयातम का अनुभ् दे सके , और िो उनहं पव्् भा्नाबोध दे सके । इसी कारण उनहंने तनमाणण ककया यह सथापतयं का - मंददर। मंददर उपगह रसारण क ृ ंि है िहाँ उचच ती् आधयाजतमक ऊिाण का सिन होता है ए्ं यह ृ समसत भूमंडल (पत्ी) म ृ ं संचाररत की िाती है, मनुषयं की सहायता हेतु जिससे ्े अपनी शारीररक, मानमसक, भा्नाजतमक तथा स्ोपरी आधयाजतमक ूप से स्यं का उपचार कर सके । धयान एक रमुख चाबी है इस ऊिाण से समबंधधत होने की, िो िी्मूती के स्ुप मं है'
- परमहंस ्ी तनतयानंद िी
भारतीय मंददर रचुर मूततणकला ए्ं भवय अनुपातं या बिे आकृततयं के मलए रमसध है। रमुख मशलपकारं ने संतुलन की उतकृषट भा्ना ए्ं मशलप कौशल से करीब हिारं ्षं से भवय मंददरं का पेचीदा मशलपकला से तनमाणण ककया है।भारतीय मंददर ् मशलप कला का इततहास ५००० इ. पू. तक के अनुरेणखत है। राचीन भारत की ्ैददक परंपरा के अनुसार, भारतीय मंददर कला (मशलपशास्) ने, हमं अनुभ् करने के मलए अजसतत् की अमभवय्त मुखाकृततयं को िीव्त ककया है। तनतयानंद पव्् कला राचीन मंददर कला का रचार ए्ं संरिण रदान करने हेतु सथावपत की गयी है; व्समयेपूणण रेरणारद मंददर कलाकृतत कक रचना करने के मलए। यह दैव्क मूततणयं, ्ाहनं (दे्ताओं के चालक), मंददर तनमाणण, ध्ि सतंभ, मंददर आभूषण, पूिा साम्ी आदद रदान करती है। समवपणत ए्ं रमश्ित मशलपकार अनुभ्ी सथपततयं के नेतत् म ृ ं मंददर ् मशलप कला मं नौ पीडियो तक कायणरत रहते हं। यह सभी आडणर संसाधन ए्ं नौ-परर्हन के साथ-साथ सीधे संसथान द्ारा तनयंब्त है। अतयधधक आकवषणत उतकृषटता से रततयोधगता-मुलक कीमतं से उतपाददत, यह उतपाद आधुतनक पुुष को राचीन ्ैददक धरोहर का ्ाता्रण रदान करते है। संपूणण कायण 'अगम शास्' पर आधाररत है - मंददरं ए्ं दैव्क मूततणयं का राचीन व््ान। कायणरणाली के संचालन मं मशलपकला के मलए रेखाधच् बनाना, पतथर उततखनन, पाषाण,

धातु, धातु की पततर ए्ं लकिी का काम, मंददर के आभूषण की रचना, मूती दे्ताओं के ्स् और आदद सजमममलत है।
पविर कला विशिविदयालय की वि्षटता
एक दशक से भी अधधक समय से, पव्् कला व्श्व्दयालय पारंपररक ्ैददक कलाओं और मशलप को रोतसाहन रदान कर रहा है और उनकी भवयता का रचार ए्ं रसार कर रहा है । •यहां बनायी गयी हर ्सतु को िीव्त अ्तार परमहंस तनतयानंद िी ने स्यं अपने आशी्ाणद और अपनी आतंररक ददवय शज्त से ऊिाणमान ककया है, िो कक आधुतनक समय मं बहुत ही दलणभ है । ु •परमहंस तनतयानंद िी सथापततयं के मशलप कौशल और उनकी संसकृतत को पुनिीव्त कर रहे हं । यह सथापतत व्श्कमाण ्ंश से हं और मंददर तनमाणण, ्ासतुकला ए्ं मशलप मं तनपुण हं। •सब कुछ राचीन पारमपररक शैली से ककया िाता है, चाहे माप लेना हो, मोम का सांचा बनाना, उसमे वपघली धातु को डालना, उसको सू्मता से सही आकार मं ढालना या तघस कर उसको चमकाना और मूततण को अंततम ूप मं रसतुत करना। • दै्ी रततमाओं मं लय और योधगक जसथरता का अ्त समा्ेश है, उनकी आक ु ृतत और अमभवयज्त मं मधुरता और संदयण का उतकृषट सजमम्ण है। • यहां की कायणशाला 13 ्ीं सदी से उपयोग की िा
रही राचीन पधततयं, व्धधयं और आसथाओं का अनुसरण करती हं िो कक समय बीतने से अछूती हं । • यहाँ तनममणत दे्ताओं की रततमाएं हमं 2,000 साल से भी पहले बनाई गं पहली मान्ूपी दै्ी छव्यं से िोिती हं। दे्ताओं की सभी छव्यं को, ्ैददक ्ंथ जिनको मशलपशास् कहते हं, मं ददए गए सपषट व््रण और तनदेशं के अनुसार बनाया गया है। इन तनदेशं के माधयम से हम दे्ता की छव् मं उधचत मुिाओं, भा्-भंधगमाओं, और अनय सू्म गुणं को धचब्त करने मं सिम हं। •मूततण के मापतोल के मलए पारंपररक मशलप शास्ं पर आधाररत िदटल तालमान रणाली का यहाँ पालन ककया िाता है। ताल का अथण है हथेली, और यह माप लेने की एक रणाली है।
अनय बनाई िाने ्ाली ्सतु हं
•रथ – इसका रयोग दे्ताओ की मूततण को सथावपत करने के मलए ककया िाता है, िैसे कक शोभाया्ा मं । •पंचलोह धातु की मूततण – पांच धातु पांच तत्ं का रतीक हं: ्ायु, िल, अजगन, पथ्ी और आकाश। यह ृ पंचलोह रततमाएं तांबा, पीतल, िसता, दटन और सोने (के ्ल ससथम के मलए) के मम्ण से तनममणत हं। •्ाहन (दे्ताओं के मलए ्ाहन) - गुि, मयूर, गि, मस ंह, ऋषभ, हंस (पौराणणक) ्ाहन और सुनहरी पालकी, यह सब पव्् कला व्श्व्दयालय 49
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मं व्शेष् कलाकारं द्ारा बनाये िाते हं। •रभा्ली या ततु्ाची- यह धातु ्तत संरचना, िो ृ रततमा के शीषण के ऊपर मंडलाकार मं होती है, एक अनूिे तरीके से छेनी और हथौिे से बनाई िाती है, । • क्चम - क्चम ् अथाणत "क्च", यह रततमा के शरीर ् के ऊपर एक व्शेष सिा्टी आ्रण के ूप मं रयु्त होता है। रतयेक क्च हाथं द्ारा पीतल, तांबे या चांदी और कभी कभी सोने की चादर से बनाया िाता है। •पूिा की ्सतु – इनका तनमाणण पीतल और तनककल से अनुभ्ी कलाकारं द्ारा ककया िाता है। •दे्ताओं के मलए व्शेष आभूषण कुशल िोहररयं द्ारा रधचत ककए िाते हं।
तनतयानंद पव्् कला व्श्व्दयालय दतनया भर के ु सभी तनतयानंद ्ैददक मंददरं की आपूततण करता है!
मंदिर जीवन की एक मू लभूत आवशयकता हं
"मंददर उप्ह रसार के निं की तरह हं, िहां अतत ती् आधयाजतमक ऊिाण उतपनन करके समपूणण व्श् मं रसाररत की िाती है िो कक मनुषयं को शारीररक, भा्नातमक, मानमसक और स्ोपरर आधयाजतमक ूप से सहायता करती है, उनका उधार करती है। धयान ्ह कं िी है िो कक म ु ूततण या दे्ता मं समादहत ऊिाण से िोिती है। "
- परमहंस तनतयानंद
मंददर राचीन दहंद िी्नशैली के क ू ंि रहे हं, िहाँ ्ैददक परंपराओं को संरिण रापत है, और आतमबोध की संभा्ना अभी भी िीव्त है । िनम से मतयृ ु तक, िी्न की हर महतत्पूणण घटना को मंददर मं अनुषिान करके मनाया िाता है। मं्, अनुषिान, धयान और पूिा की सू्म शज्त उस सथान की ऊिाण को पोवषत करती है।
मंददर का तनमाणण रहमाणडीय ऊिाण को भारी मा्ा मं धारण करने के मलए ककया िाता है, िीक एक बैटरी की तरह, िो कक रबुध स्ाममयं द्ारा उनमं सथावपत की िाती है । मंददरं का तनमाणण राचीन ऋवषयं ने आरमभ ककया, जिनको उनका महत् ्ात था, िो िानते कक मंददर एक भौततक संरचना से कहीं अधधक हं। मंददर के हर पि मं आगंतुक को ऐ्य, अद्ैत भा् और आतम्ान का अनुभ् कराने की िमता है।
Section 2
राचीन समय से,रहम्ानी स्ामी िो कॉजसमक ऊिाण के अ्तार हं और दे्ताओं मं ऊिाण का संचार ककया है और लगातार ददवय ऊिाण व्कीणण करने के मलए सथान और समय की बाधाओं को पार लगाने के मलये ककया है। जिनको राण रततषिा का ्ैददक व््ान पता है (एक


दे्ता मं िी्न सांस की सथापना), िहॉ मूततण एक दे्ता बन िाता है, िो स्तन्। के ्ल एक रहम्ानी स्ामी ही राण रततषिा की रहसयमय रकरया को पूरा करने के मलए योगय है। ्ह मूततण को एक दे्ता मे बदल देता है; ्ह सीधे ददवय ऊिाण के साथ यह रहता। अब, दे्ता को एक स्तं् बुवध के ूप मं अनुभ् ककया िा सकता है। राथणना का ि्ाब बूनस अनुदान और उपचार रदान कर सकते हं, िो शुध अद्ैततक अंतररि, एक स्तं् बुवध के ूप मं अनुभ् ककया िा सकता है।
दे्ता की पूिा भग्ान और वयज्त के बीच एक पुल का तनमाणण है। अद्ैत - स्ामी महान दया से मनुशय की सुपर चेतना और अदव्ता की सचचाई का अनुभ् करने के मलए ,परमातमा से कने्ट करने मं मदद करने के मलए, उनहं िीक करने के मलए, मनुषय रहमांड के साथ पूरा करने के ल्य को हामसल करने मं मदद करने के मलए पथ्ी ्ह पर िनम लेते है। ृ
सियमभु ननतयननिेशिरा सिणा मंदिर
दतनया के सबसे बिे मश् मंददर का तनमाणण बबदादी ु मं आ्म मं मौिूदा तनतयननदेश्रा मंददर ्षण २०१४ मं शुू हुआ, और यह आधुतनक युग मं मश् के मलए बनाया गया पहला स्णण मंददर हो िाएगा। एक दलणभ रहने ु ्ाले अ्तार, परमहंस तनतयानंदा की रतयि तनगरानी मं सुंदरता से बनाया गया एक भवय व्शाल मंददर होने िा रहा है।
"यह महादे्, मश् के मलए पहला स्णण मंददर है। तंिौर ददर (बहदेश्रा मंददर) एक स्णण मंददर था। द ृ भाणगय से, ु हमलं के दौरान, सोने से छीन मलया गया था। महादे् का स्णण मंददर पहले बहुत थे लेककन अब आधुतनक युग मं, महादे् का मलए पहला स्णण मंददर हो िाएगा।
मंददर के मुखय भागं को सोने से लेवपत ककया िाएगा - गभाण गह (म ृ ुखय दे्ता के भीतर गुहा), मुख मंडप (गभणगह के सामने खंबं का हॉल), अधण मंडप (वपछले दो ृ िे्ं को िोिने), महा मंडप (सबसे बिा मंडप ), ्संत मंडप (तयोहार हॉल)। यह पतथर और सोने मं लेवपत ककया िाएगा; यह मंददर की व्मशषटता हो िाएगा। गोलड सीधे लाह कोदटंग के साथ पतथर पर लेवपत है। "
- परमहंस तनतयानंद
स्णण मंददर को तनमनमलणखत मं शाममल ककया िाएगा:
• 5 राकरम (बाहरी परररमा गमलयारं) से अधधक 24 एकि िमीन को क्र ककया िाएगा कक (बाहरी परररमा

गमलयारं)। पहले 3 राकरम पतथर मं बनाया िाएगा और 13 गोपुरम (टा्रं) रािसी रािा गोपुरम लंबा 108 फुट खिा के साथ बनाया िाएगा।
• १००० साल पुराने पव्् बरगद के पेि की सजननधध (मंददरं), स्ाभाव्क ूप से गदित स्यमभु मल ंग, तनतयननदेश्रा- तनतयाननदेश्री, मीनािी, व्नायका, मुुगन, कालभैर्, ्ंकटेश्र और परमहंस तनतयानंदा के धाममणक सथल
• रतयेक पि पर 182 फीट का व्सतार होगा िो पव्् बरगद के पेि के चारं ओर, एक डबल मंजिल, पतथर मंडपम है िो ब्मालूगै प्ी मंडपम होगा। इस मंडपम कलपतु मंडपम कहलाया िाएगा।
• ्संत मंडपम,िो पूरी तरह से पतथर और घर परमहंस तनतयानंदा के सजननधध और मीनािी मंददर / सजननधधमं बनाया िाएगा। यह कलाकृततयां भी स्ामीिी के वयज्तगत दलणभ सं्ह शाममल हंगे। ु
• पाँच्ा राकरम सा्णितनक सुव्धाओं से भरा होगा - जिसमं एक व्श्व्दयालय टॉ्र और तनतयानंदा सभा (धयान हॉल) होगा।
• पांच मंजिला व्श्व्दयालय मं स्ागत कंि, रेसटोरंट, अनना मंददर (रसोई घर 10,000 लोगं को से्ारत), गैलेररया, ्ंथ समाधध (दतनया के सबसे बिे आधयाजतमक ु पुसतकालय के मलए एक लाख ककताबं हंगी), टी्ी सटूडडयो (24 घंटे दतनया भर म ु ं रसारण हंगा), तनतयानंदा ममशन सधच्ालय कायाणलयं और 300 रतततनधधयं के मलए एक भवय सममेलन हॉल हंगा।
• तनतयानंद सभा जिनमं से अधधक से अधधक १५,००० लोगं को समायोजित करने के मलएबनाया िाएगा, िबकक १०,००० रतयि दशणन रापत कर करने के मलए और शेष ५००० लोगं को बस के बाहर अखािा और गैलरी मं बबिाने के मलय बनाया िाएगा। ं
• मंददर की संरचना एक सुंदर 10 फुट चौिी ख़ंदक़ से तघरा, एक शांत, राकृततक ्ाता्रण के साथ िल प्ियं और कमल से यु्त ककया िाएगा।
