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15. अित्र र्ोसिम् और जयंती

# अित्र र्ोसिम् और जयंती

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यह मानयता है कक ईश्र पाँच कमण करते हं - ध्जषट (रचना), जसथतत (पालन), संहार (व्नाश-कायाकलप), ततरोभा् (माया के आ्रण से ढकना) ए्ं अनु्ह, आतम्ान द्ारा कृपा करना। पहले चार कायण करने हेतु उनहं हमारी अनुमतत की आ्शयकता नहीं होती, ककनतु आतम्ान का आशी्ाणद देते समय उनहं हमारे सहयोग की आ्शयकता होती है। इसी कारण, ्े मनुषय शरीर धारण करते हं और पथ्ी लोक पर अ्तररत होते ृ हं। स्यं के उदहारण से रेररत करते हुए कक मनुषय शरीर मं भी आतम्ान रापत करना समभ् है। ्े हमं रेरणा देते हं, िी्नमुज्त के मलए छलांग लगाने की। ्े एक अ्तार हं, 'िो ददवयता के सतर से मान्ी सतर पर अ्तररत हुए हं'। एक आतम्ानी गुु लोगं को भ्सागर के एक छोर से दसरे छोर पार ु करने हेतु ना् की भांतत कायण करते हं, अ्तार एक महान व्शाल सेतु हं जिसके द्ारा करोिं अपनी पीिा से आनंद की या्ा तय करते हं।

भग्न ्ी कृषण कहते हं, 'िब भी पथ्ी ृ लोक पर सकारातमक चेतना मं असंतुलन होता है, म प ं ुनः पुनः रकट होता हूँ -'संभ्ामम युगे युगे', सजिन की रिा हेतु और दषट के व्नाश हेत ु ु।' हमारे युग मं, ईश्र पुनः पथ्ी लोक पर अ्तररत ह ृ ुए हं, परमहंस तनतयानंदिी के ूप मं, मान् चेतना को अगले सतर पर ले िाने हेतु।

धनु मॉस के धच्ा नि् मं सूयण ्ैददक पंचांग के अनुसार रहम ऊिाण पथ्ी ृ लोक पर परमहंस तनतयानंदिी के ूप मं अ्तररत हुई। यह शुभमंगल ददन तनतयानंद धयानपीिम मं अ्तार रहमोतस् के ूप मं मनाया िाता है - िो दस ददन का प्ण है, जिसका समापन अ्तार दद्स पर होता है। इस उचच ऊिाणपूणण दद्स पर, भ्त राथणना करते हं और आधयाजतमक साधनाए करते हं, आतम्ान और िी्नमुज्त राजपत हेतु, अ्तार की असीम कृपा द्ारा।