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12. र्ोसि और विशभन पिा

# र्ोसि और विशभन पिा

दहंदतव, अपिे रंगं से पररप ु ूणा सवा देवी व देवताओं के ्ित्टमंडल सदहत, इस सत् को आिंद से रद्सात करते हं की अव्कत निराकार उसी ूपाकार मं व्कत होतं है तजसमं भकत द्ाि की सवेछा रखते हं। रहमोतसव दीरााव्ि उतसव हं, जो इि दैववक अव्कत ्तकतओं के रत्ेक व्कत ूप का उतसव मिाते हं।

रहमोतसव मं सात रमुख पीठासीि जीवमूनता्ं के उतसव मािािे के अलावा, दो महतवपूणा पवा जो भगवाि श्व और आध्ाततमक गुु को सुपूतजत करते हं, ्ह भी नित्ािंद ध्ािपीठम मं मिा्े जाते हं। अन् पवा जो इस वैददक जीवि्ैली मं रंग भरते हं, वे हं कृ्ण जनमा्टमी (भगवि िी कृ्ण ज्ंती), पंगल (फसल उपज का पवा), वैददक िव वरा, होली (रंगं का त्ंहार) और दीपावली, रका् का पवा, आदद।

धचनततरै रहमोतसिम - अिैल ्

रहम ऊिाण ने मान् ूप धारण ककया और लगभग २००० ्षण पू्ण पथ्ी लोक पर दो ूपं म ृ ं अ्तररत हुए, एक पुुष ् दसरी स्ी। भग्ान मश् प ू थ्ी पर ृ अ्तररत हुए भग्ान सोमसुंदरेश्र के ूप मं, और दे्ी अ्तररत हुं मीनािी के ूप मं, द्िण भारत मं तममलनाडु राजय के मदरै, दे्सथान नगरी म ु ं।

का्ेरी सभयता के सांगा युग मं, दे्ी मीनािी, पंडया रािा मलयध्ि की तपसया के फलस्ूप उनकी तीन ्षीया पु्ी के ूप मं अजगन से रकट हुं। मीनािी हर िे् मं स्ण्ेषि होतं हुए बिी हुं। एक उ् योधा ् युधकला मं पारंगत, उनहंने आिं ददगपालकं को िीता, िो रतयेक आि ददशाओं के अंशदे्ता हं, और उनहंने भग्ान दे्ेनि, अंशदे्ं के रािा को भी िीत मलया।

अनततः मीनािी कै लाश प्णत की ओर अ्सर हुं, भग्ान मश् पर व्िय राजपत हेतु। कै लाश मं उनहंने नंदददे् से युध कर उनहं पराजित ककया, िो भग्ान मश् के ददवय ्ाहन हं। ततपशचात भग्ान मश् स्यं नीचे आये उनका सामना करने हेतु। जिस िण उनके ने् भग्ान मश् पर पिे, मीनािी को बोध हुआ कक ्ं उनके भव्षय पतत हं। ्ं मश् से रेम करने लगीं और उनसे सभी दे्ताओं की उपजसथतत मं व््ाह ककया। भग्ान व्षणु ने स्यं मीनािी ् सोमसुंदरेश्र का व््ाह संपनन ककया। मश् ने इस अ्तार मं सोमसुंदरेश्र नाम ्हण ककया।

हर ्षण, धचजततरै के तममल मॉस मं रहमाणड पुनः पुनः उतस् मनाता है, मीनािी और सुंदरेश्र के भवय ददवय व््ाह या ततुकलयाणम का। यह अ्धध धचजततरै रहमोतस् के ूप मं मनायी िाती है। हर ददन मीनािी और सुंदरेश्र मभनन ददवय ्ाहनं पर रकट होते हं तथा भग्ान मश् की ददवय लीलाएं ् अलंकार दशाणय िाते ह ं ं। इसे ही लीलाधयान कहते हं।

गणे् रहमोतसिम ् अगसत / मसतंबर

गणेश हाथी-मसतक ्ाले दे्ता हं िो भग्ान मश् और दे्ी पा्णती के पु् हं। ्े स्ण् सब दहंदओं ु द्ारा पूिे िाते हं। गणेश के िनम की ् उनके हाथी-मसतक स्ुप की कथा अतत असाधारण है। एकदा, िब दे्ी पा्णती नदी मं सनान ले रही थीं, उनहंने सनान मं उपयोग के ए चनदन के लेप को गूंधकर, उस लेप को एक मान् आकृतत देकर, उसमं राण फूक़े । उसी िण चनदन की मूती एक िी्ंत बालक बन गया। उनहंने सनान पूणण करने के समय तक इस बालक को अपना द्ाररिक बनाने का तनणणय मलया। िब मश् नदी पर आय, बाल- ं रिक ने उनहं भीतर िाने से ्जिणत ककया। रोधधत होकर, मश् ने इस बालक का मसतक काट ददया। िब पार्ती को ्ात हुआ कक उनका पु् तनषराण हो गया है, उनहंने उसे पुनःिीव्त करने हेतु मश्िी को ने्ेदन ककया। तनकट कहीं उपयु्त मान् ूप न ममलने के कारण, मश्िी ने एक श्ेत हाथी को मु्त कर, उस हाथी का सर काटा और बालक के शरीर से िोि ददया। मश्िी ने उसे 'गणेश' नाम ददया अथाणत गणं के ईश्र, 'गण' अथाणत मश्िी की भि गणं ् रेतं की सेना। यह शुभ-मंगल दद्स िो 'गणेश' के िनम का रतीक है, गणेश चतुथी नाम से मनाया िाता है। गणेश को व्नायक ् गणपतत भी कहते हं। गणेश संकट मोचक हं िो हमारी कलपनाओं से िनमी अंतर ् बाहरी िगत की बाधाय हरते ह ं ं। गणेश रहमोतस् एक १०-ददन का उतस् है, िो भग्ान गणेश के अ्तरण प्ण को मनाता है।

िंकटे् रहमोतसिम ्

्संत रहमोतस्म ददवय उतस् है, िो भग्ान ् ् ंकटेश्र के अ्तरण (समभा्न) का उतस् है, िो ्संत ऋतु मं मनाया िाता है। (्संत अथाणत ्संत ऋतु ए्ं रहमोतस्म ् अथाणत दैव्क रहमाणडीय उतस्)। रकृतत मनुषय की हर भा्ना के रतत रकरया वय्त करती है। ्संत का आगमन हमारे भीतर ् बाहर एक अनोखा परर्तणन आता है। कोमल ह्ाएं और रफुजललत पुषपं की सुगंध हर राणी को भाव्त करती हं। हर वयज्त को अपने भीतर रेम ् कोमलता को पुजषपत होने का आभास होता है। ्ह रेम्श अपने भीतर व्सतारण अनुभ् कर पाता है। यही ्ह िाद है िो रक ू ृतत हम सबके भीतर ्यं करती है।

्ी आनंद ्ंकटेश्र रहम रेम का रतीक ् रततूप हं।

्ं ्ैभ् और धन्नता के भी ईश्र हं। उनकी ऊिाण से समबध होने से िो आशी्ाणद और ्रदान हर वयज्त को रापत होते हं, ्ह भग्ान ्ंकटेश्र की उदारता का रमाण हं। उनकी पतनी ल्मीिी धन की दे्ी हं। इसी कारण भग्ान ्ंकटेश्र एक अतत लोक-वरय दैव्क ऊिाण हं।

सकनि षनषट - अ्टोबर / निंबर

सकनद, भग्न मश् के पु्, एक रचंड योधा ए्ं दे्ताओं की सेना के रधान सेनापतत िाने िाते है। सकनद ने मस ंहमुख, सुरपमा ् तारकासुर दान्ं के व्ुध युध छेिा िो छ: (षषट) ददनं तक चला तथा उनका दीपा्ली प्ण के अगले ददन संहार ककया और फलस्ूप पथ्ी लोक पर अपना ल्य ृ परीपूणण ककया। इस प्ण को सकनद षजषट दद्स कहा िाता है। दे्तओं की सहायता ् संरिण करने के पुरसकार स्ुप, दे्ं के रािा इनि ने अपनी पु्ी दे्सेना (दे्यानी) को सकनद को व््ाह मं ददया। सकनद ्ीरता, साहस ् सुरिा के रतीक है। उनके हसत मं '्ेल' अस्, िागूकता का रतीक है, जिससे भय का सामना ककया िाना चादहए। यह सकनद षजषट रहमोतस् बहुत धूमधाम ् आनंदोतस् के साथ हर साल छ: ददनं तक मनाया िाता है, जिसका समापन सात्े ददन सकनद ् दे्सेना के ददवय व््ाह से होता है। भ्त अपनी इचछापूततण हेतु ए्ं भग्ान सकनद की कृपा पाने हेतु सभी छ: ददनं तपसया करते हं।

ननतयानंिेशिर - रहमोतसिम ् निंबर / दिसंबर

्ी तनतयानानदेश्र और तनतयाननदेश्ारी दे्ी तनतयानंद धयांपीि के रमुख दे्ी दे्ता हं| यह मश् और पार्ती के स्ुप हं |्ैददक परंपरा मं, भग्ान मश् पुनःिागरण के महादे् ए्ं मंगलत् के मूततणस्ूप है। भग्ान मश् इस पथ्ी ग ृ ह के रथम आतम्ानी ग ृ ुु है। हज़ारं ्षं पू्ण, भग्ान मश् ने आतम्ान के गोपनीय सू्ं का सारे िगत कलयाण हेतु अभेदन ककया िो बाद मं 'व््ान भैर्' नामक शास् मं संगदहत ककये गए, जिसम ृ ं आतम्ान के ११२ सू् (तकनीक) हं। तनतयाननदेश्र ने दे्ी को उसी सथलबब ंद पर इन स ु ू्ं को रतयि ककया था िहाँ पर

तनतयाननदेश्र मंददर जसथत है, तनतयानंद धयानपीिम के बबिदी आ्म मं। ्यंकक दे्ी तनतयानंदेश्री ने हमारे कलयाण हेतु कुणापू्णक आतम्ान की तकनीकं को ्हण ककया और उनहंने तनतयानंदेश्र की शज्त का अपनी अंतरातमा मं संपूणणतः िागत ् संजसथत ककया, ृ इस अनंदोदय ्ततानत के प्ण को तनतयानंद धयानपीिम ृ मं तनतयानंदेश्र के रहमोतस् ूप मं मनाया िाता है।

निरा्र रहमोतसिम - सपतंबर / अ्टोबर ्

न्राब् रहमोतस् या दशहरा दे्ी का तयोहार है - िगत िननी, आददशज्त का। दे्ी पव्् स्ी पराशज्त की मुततणस्ूप हं। न्राब् का अथण है नौ रातं (रा्ी) का समूह। माकण णडेय पुराण व्सतत ूप से ्णणन करता ह ृ ं कक ककस रकार दे्ीमाता ने नकारातमताओं से पथ्ी लोक ृ का रिण ककया, िो नकारातमताऐ कई असुरं के ूप मं रकट हुई, व्शेषत: मदहशासुर नमक असुर मं। इन दषकु ृत नकारातमक शज्तओं से युध करने हेतु दगाण, सरस्ती ् ु ल्मी की शज्तयं ने एकव्लीन होकर एक ूप धारण ककया िो मदहशासुर मधधणतन या चंडी कहलाता है। सभी नौ राब्ओं मं दे्ी ने नकारातमकताओं से युध ककया और दस्े ददन उनहं ददगव्िय राजपत हुई। यह दस्ा ददन िो नकारातमकता के व्नाश और सकारातमक शज्त - पव्् नारी शज्त के व्िय का रतीक है, इसे व्िय दशमी प्ण के ूप मं मनाया िता है। व्िय दशमी कोई भी ्षण के दो अतत शुभ दद्सं मं से एक है, दसरा दद्स है अिय ब्तीय। ू