13. मि् शशिर््ि - मि्न परम मं गलव की र््ि
# मि् शशिर््ि - मि्न परम मं गलव की र््ि
महा मश्राब् ्ह राब् है िब हमारे लोक मं अधधचैतनय ऊिाण का सफोटन होता है। ्ैददक रहमाणडव््ान इस सफोटन का सुरा़ बबग बेनग के साथ िोिता हं, ्ह िण िब हमारे रहमाणड का सिन ह ृ ुआ था। पव्् ्ैददक ्नथ अुणाचल पुराण मं, इस महान उततपजतत घटना को इस रकार दशाणया है - भग्ान मश्, िो आददरहम ऊिाण के रतीक ् पररहमन स्ुप हं, एक असीममत रकाश के सतंभ या जयोततसतंभ का ूप धारण करते हं, िो पथ्ी से आकाश तक ् अखंडमंडल ृ के परे मलङगोतभ् होकर वयावपत होते हं।
हर ्षण, रहम शज्तयं के एक भागययोग के पंज्तयोिन से, इसी महान मलङगोतभ्म के सफोटन का छोटा रततबबमब इस राब् को हमारे पत्ी लोक म ृ ं व्ककरण होता है। हर ्षण, उसी काल रहर मं, िब यह पौराणणक अददजयोतत का मलङगोतभ् सफोटन हुआ था, परमहंस तनतयानंदिी भ्तं को अततती् 'मश् कुणडमलनी धयान' मं दीिा देतं हं। हज़ारं लोग इस कुणडमलनी धयान मं व्श् भर से एन.टीव् ् टू-्े कां्ंस द्ारा भाग लेते हं। यह धयान सकारातमक ऊिाण की व्शाल लहरं का सिन करता है, जिसका ृ रभा् समपूणण व्श् मं अनुभ् होता है।
धयान पशचात, परमहंस तनतयानंदिी द्ारा महामश्राब् र्चन का सीधा रसारण होता है। परमहंस तनतयानंद महा ुिामभषेकम का भी अनुषिान करते हं िो स्ण रोगं का नाश और स्ासथय ् कलयाण की बाधाओं का हरण हेतु एक शज्तशाली ्ैददक रकरया है। महा ुिामभषेकम मं रततभागी होने हेतु भ्तं का स्ागत होता है। महामश्राब् उतस् पर 'कलपतु', एक पूरे-ददन का धयान कायणरम भी भेटा िाता है, जिसमे हमारी सचची इचछापूततण हेतु स्ामीिी द्ारा रहम ऊिाण का संचारण ककया िाता है - चाहे ्ह स्ासथय, संपजतत या मनोशांतत ् आतम्ान की इचछा हो। परमहंस तनतयानंदिी के सभी के मलए वयज्तगत दशणन, दीिा ् आशी्ाणद के साथ महामश्राब् कायणरम का समापन होता हं। 40


कृत्ता रकट करने के इस सरल कृतय से कई िनमं के आगामय कमण िलकर भसम हो िातं हं। जिस राकर सूयणककरणं एक आ्धणक कांच द्ारा अपने नीचे रखे कागज़ को िला देती है, उसी रकार हमारे कमण भी एक आतम्ानी गुु की समिता मं िल िातं हं। आतम्ानी गुु हमारे ए्ं रहम चेतना, जिनहं ईश्र कहतं है, के बीच एक सेतु हं। यह कहा गया है कक िो भी पुणय कायण हम ईश्र को अवपणत करते हं, हमारे मलए ्ह हिारगुणा बनकर ्ापस आता है। गुु को अपणण की गयीं इस रहुती को 'मभिा' कहतं है। ्ह कुछ भी हो सकती है, कोई से्ा, पैसे या कायण। मशषय िो भौततक भंट अवपणत करतं हं, ्ह उनके अहंकार (अहम) का रतीक है। के ्ल अहंकार ही एक ऐसी ्सतु है, जिसकी गुु मांग करते हं - मशषयं की सीममत पहचान, जिसे ततयागकर ्े असीम अनंत परमरहम मं उददत हो सकं। इस बाहरी कृतय से जिसमे स्यं के मलए िो महत्पूणण रतीत होता है, उसे ्ीगुु के चरणं मं अवपणत करना, भ्त स्यं की ही आतमा का एक अंश उचच ्ोत को अपणण करता है।
गुु एक वयज्त के िी्न मं भाव्त होती हुई एक न् संभा्ना हं। गुु तनरंतर वयज्त मं रेरणा को िागत ृ करते रहते हं, उसकी संभा्नाओं को पुनः िगाकर उनहं और भी सश्त बनाते हं। चाहे ्ह वयज्त स्यं पर व्श्र छोि दे, गुु उसपर से व्श्ास कभी नहीं छोितं।
यही ्ह ददन है, िब भ्तिन 'सदगुु' का समरण, पूिन ् आदर करतं हं और अपना अजसतत् गुु को पुनः समवपणत करते हं और कृत्ता रकट करते हं उस रहम ूपी गुु की समिता को िो उनके िी्न मं हं। गुु पूणणणमा का अथण है, 'गुु का पूणण चनि'। यह एक अनमोल अ्सर है स्यं की आतमा को पुनः गुु के मागणदशणन हेतु फुजललत करना। यही ्ह परम मंगल ददन है, िब भ्त्तसल ्ीगुु अपनी अनंत कुणा से अपने भ्तं को ्हण करते हं और अपनी अरततबध गुु कृपा से भ्तं के िनम-िनमांतरं के अतत भयानक कमं को भी ममटा देतं हं। इस ददन भ्त अपने भय, शंकाएं, पीिाएं या इचछाएं ्ीगुु के कमल चरणं मं अवपणत कर देते हं, और गुु रसाद स्ुप उनहं अभय (भय से मुज्त) और ्रद (गुु कृपा) के ्रदान की राजपत होती है।
