10. मदरै आदीनम के २९३िे गुु मि्सवनि्नम के ूप मं ु प््शभषेक
# मदरै आदीनम के २९३िे गुु मि्सवनि्नम के ूप मं ु प््शभषेक
२७ अरेल २०१२ को, परमपूजय परमहंस तनतयानंदिी मदरै ु आदीनम के २९३्े गुु महासजननधानम ूप मं प्ामभषेक हुआ, िो व्श् की सबसे राचीन िी्क दहनद धाममणक संसथा है। ू मदरै आदीनम के २९३्े ग ु ुु महासजननधानम के दातयत् उिातं हुए परमहंस तनतयानंदिी ने रतत्ा ली कक ्ं मदरै आदीनम ु और उसके चार मंददरं को महान यशकीततण रापत करायगे। ं
पौराणणक समय से रखयात मदरै आदीनम सनातन काल से ु अजसतत् मं िीता आ रहा है। परनतु, इसका पुनः िी्न लगभग १५०० ्षण पू्ण एक यु्क आतम्ानी अ्तार ततु ्ानसमबंदर द्ारा हुआ, िो द्िण भारत के शै् मसधांत दशणनशा् के चार दरृषटा संतं म ू ं से एक हं। आददनम का संसथापन मदरै म ु ं हुआ, िो भारत्षण के स्ण राचीन नगरं मं से एक है, जिसका इततहास ३व् शता्दी ई.पू. के तममल संगम के युग तक कालरेणखत ककया िाता है। मदरै की पीिामसत ु िी्मूततणयाँ हं भग्ान मश् और दे्ी, उनके स ् ुंदरेश्र और ममनािी के अ्तारं मं, िो व्श्-व्खयात मदरै मीनािी- ु सुनदरेश्र मंददर मं राणरधथजषित हं। मदरै आदीनम के ु आधयाजतमक रमुख को 'गुु महासजननधानम' की पद्ी से नामकरण ककया िाता है। और ्ं अपने उततराधधकार मं रापत करतं हं ततु ्ानसमबंदर के पव्् कायण की परमपरा को आगे बिाने का महान दातयत्। इस पद्ी की कोई कालसीमा नहीं है और यह एक िी्नकालीन संमान है।


आ्म, बं गलोर
तनतयानंद धयानपीिम का अनतराष्ीय ् मुखयालय बबिदी, बगलोर नगर के ं तनकट जसथत है, िो एमशया का सबसे तेज़ी से ब़ता रगततशील नगर है।
पव्् ्ट ्ि - एक कलप् ृ ि, ृ इचछापूततण करने ्ाला ्ि जिसन ृ ं आि तक करोिं राथनाओं को रतयि कर उनहं परीपूणण ककया है। बबिदी
्ट्ि की छ्छाया तले शज्तशाली ृ सकारातमक सपंदनो से शरीर ् मन को परम शांजनत, व््ाम और ताज़गी की अनुभूतत होती है।

इस दैव्क ्ट्ि ृ के तले धयान करने से हज़ारं को रोगं से चमतकारी उपचार के अनुभ् होतं है। भग्ान द्िणामूततण, िो भग्ान मश् के स्ुप हं और अददगुु (व्श् के रथम गुु) है, इस पव्् ्ट्ि ृ के तले पीिामसत हं और इस ददवय िे् को अनु्दहत करते हं, सभीपर अपने आशी्ाणद को ककरणणत करते हुए।

्ैदय सरो्र मं१००८ ििीबूदटयं सेतनव्णत २१ फूट का न्पाषण मश्मल ंग

