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9. महानिवााणी अखाड़ा

# **महानिवााणी अखाड़ा**

एक ््सवी परंपरा

नागा सािू - िमा के संर्क

सनातन धमण (िो आधुतनक काल मं दहंदत् नाम से ु व्खयात है) दसं सहस्ं ्षं के यशस्ी इततहास से गौर्ाजन्त है। दहंदत् अपनी धाममणक सहनशीलता और ु अखणडता के मसधांतं के मलए िाना िाता है। तथावप यह व्श् का स्णराचीन िी्ंत धमण, शज्तपूणणता से अपने मसधांतं का धमणरिण ए्ं अनय आरमणक धमं के धमणनषटण ् अधोगतत के रयतनं से स्यं का संरिण करने मं सिम माना िाता है। कई सददयं से, समय की लयं के साथ, अनय धमण दहंदत् का व्रोध ु करने उिं और उसके अजसतत् के मलए खतरा भी बने रहं। इन सभी समयं पर, दहनद साध ू ुओं की एक छोटी संरदाय ने ्धा्ान आधयाजतमक योधाओं के ूप मं तनरंतर कायणशील बने रहं, उनका धयेय के ्ल 'धमण रिा'।

यह साधू 'नागा साधू' के नाम से व्खयात थे ('नगन तत््ानी' या 'नंगे साधू')। हर सीममत करते सामाजिक बंधन से मु्त, ्स्ं समेत, यह रचंडतापूणण अखंड ् ्धा्ान समूह दहनद संरदायं कक आि तक ू की स्ाणधधक सममातनत संरदायं की ्ेणी मं है।

दस्ं शतक मं, भारत पर असभय, असंसकृत िनिाततयं के आरमण से, िो के ्ल तल्ार की भाषा िानती थीं, नागा साधुओं को मिबूरन अपने धमणरिण हेतु शस् उिाने पिे। अब ्े के ्ल शास् धारी (शास्ं से आयुध) ही नहीं थे परनतु शस्धारी (शस्ं से आयुध) भी थे।

नागा ्ंशा्ली को समझना

नागा साधू अपनी ्ंशा्ली को कवपल महामुतन, एक आतम्ानी संत जिनहंने ७००० ्षं से पू्ण शरीर धारण ककया, उनके ्ंश तक अनुरेणखत करते हं। कवपल महामुतन ्ह रथम पुुष थे, जिनहंने मान् 26

शरीर मं रहते हुए ददवय चेतना के पुषपण का अनुभ् ककया। नागा साधू व्श् की स्णराचीन मि परंपरा का अनुसरण करते हं और उनका व््रण ऋग्ेद मं भी है, एक शास् िो ५००० इ.पू की ततधथ पू्ण ददनांककत है। आदद शंकराचायण, एक आतम्ानी गुु कवपल महामुतन की ्ंशा्ली से हं, जिनहंने ईस्ी सन की पहली शता्दी मं दहंदत् का अ् ु त प ु ुनःिागरण समभ् ककया तथा दशनामी परंपरा (दस नामं ्ाली परंपरा) की सथापना करके नागा साधुओं को एक सामानय छ् के तले लाया। हर साधू ने एक नाम या उपाधध ्हण की अपने सथान या िी्नशैली के अनुसार।

मिाननिााणी अखाड़ा - एक १०००० िषा िाचीन परंपरा

स्णरथम अखािा िो सथावपत हुआ, ्ह महातन्ाणणी अखािा था। अखािे सनातन धमण का समपूणणतया रतततनधधत् करते हं, सब दहनद समरदायं का समन्य ू करके (शै्, ्ैषण्, रहमा, शा्त), मसख, िैन और बौध धमण। महातन्ाणणी अखािा की परंपरा दस हिार ्षण पुरानी है। इस संरदाय का व्धध्त नामकरण ७४८ ईस्ी सदी मं हुआ एक अतत शुभ घटना के बाद। ७४८ ईस्ी सदी मं, अटल अखािे के ७ साधुओं के एक समूह ने गंगासागर सथान पर तपसया की। उनहं स्यं कवपल महामुतन के ददवय दशणन की कृपा रापत हुई। उनके आशी्ाणद से उनहंने नागा परंपरा का पुनःिागरण ककया उसके व्धध्त नाम - महातन्ाणणी अखािा - से, हररद्ार मं नील धर के पास। आि भी महातन्ाणणी पीि के उपासयदे् (मुखय दे्ता) पौराणणक काल से रखयात, कवपल महामुतन दे् ही हं।

ुधच योगय यह है कक िब महातन्ाणणी अखािा

सथावपत हुआ, तब आ्ाहन ् अटल अखािे के अधधकतर साधुओं ने नए अखािे मं र्ेशन का चयन ककया, और ्ह सबसे रततजषित और रमसध बन गया। ्षण १२६० मं, २२००० महातन्ाणणी नागा साधुओं की एक टुकिी ने, महंत भा्ानंद धगरी के साहमसक नेतत् म ृ ं कनखल को मु्त कर्ाया

मिाननिााणी अखाड़ा आज - िमा का विसतारण करते ि ु ए

आि, भारत की स्तं्ता के साथ, सारे अखािे, महातन्ाणणी अखािा समेत, सनातन दहनद धमण का ू व्सतारण करने मं कायणरत हं, राचीन दहनद संसक ू ृतत, िी्नशैली ् मसधांतं का पुनःसथावपत और सरिण करते हुए। आि उनकी गततव्धधयां सामाजिक से्ा और दहनद धमण का व्सतार के ल्य से कायणरत ह ू ं। ऐततहामसक ृजषट से, रयाग (अलाहाबाद) महातन्ाणणी अखािे का मुखयालय ् कंि उसके तनमाणण काल से ही रहा है, और ्ारणसी पीि, रयाग पीि के रशासन के नीचे रहा है। तत पशचात, हररद्ार कनखल दसरा ू रशासन पीि बना और अब यह अतत महत्पूणण पीि बन गया हं, िहां अधधकांश वय्सथापक कायणजसथत है।

ओमकारेश्र और नामसक दो दसरे रशासन के पीि ह ू ं। महातन्ाणणी अखािा की शाखाएं, ओमकारेश्र, नामसक, हररद्ार, कुुिे्, उदैपुर, ज्ालामुखी, काशी ् भर (अकोला) अदद सथानं मं हं।

मिाननिााणी अखाड़ा के मंदिर

महातन्ाणणी अखािा के मंददर हर दहनदू संरदाय का रतततनधधत् करते हं: शै्, शा्त, ्ैषण् ए्ं रहमा और न््ह भी।

    • महाकाल मंददर, उजिैन, मधयरदेश (जयोततमलंग) * ्यंबके श्र मंददर, महाराष् (जयोततमलंग) * पुषकर रहमा मंददर, रािसथान

र्ा की म्ाल िारण करते ि ु ए

इस यशस्ी धरोहर के हाल ही के उततराधधकारी परम पा्नातमा परमहंस तनतयानंदिी हं, जिनका महातन्ाणणी अखािा के आधयाजतमक रमुख के ूप मं २०१३ मं प्ामभषेक हुआ है। माननीय परमहंस तनतयानंदिी के महामंडलेश्र का उततरदातयत् लेने के साथ, अखािे के बिं के आशी्ाणद सदहत, अखंड सनातन दहनद धमण और ू समसत व्श् का भव्षय उजि्ल ददखाई पि रहा है।

परमहंस तनतयानंदिी एक िी्नमु्त सभयता का ृजषटकलपन करतं हं िो वयज्तगत पूणणत् ए्ं ्ैजश्क उननतत की ओर अ्सर हो, और साथ ही िो आधयाजतमक सतयं की आधारमशला मं ृ़ता से सथावपत हं, जिन परम सतयं ने सनातन धमण को व्श् का स्णराचीन िी्ंत धमण तनममणत ककया है।

इनर अवेकननग ं

अपना भव्षय दबारा मलख ु ं

एक अदव्तीय २१ दद्सीय योग ए्ं धयान का आ्य सथल ,िी्न मुज्त रदान करने मं सिम गुु ्ी परमहंस तनतयानंद स्ामीिी के साथ

कलपना कीजिये :

  • अपने भागय के स्यं व्धाता बनं ।
  • अ्णी नेता बनं जिसके मलए आप के मलए बने हं ।
  • सफलता भरा िी्न रापत करं जिसके मलए आप बने हं ।
  • िी्न से पुनः पयार करं ।

कलपना करना छोिं ,अपनी हकीकत खुद बनायं

  • राचीन व््ानं और रहसय सीखं
  • क ु णडमलनी शज्त िा्त करं ।
  • अपने शरीर ,मजषतषक ,आतमा ए्ं संबंधं का उपचार करं ।
  • अपनी महतता के मलए अपनी तछपी ऊिाण िमता को सकरय करं |
  • सफल भव्षय बनाने के मलए, और … ........ िी्न-म ुज्त का स्ाद लेने के मलए

इनर अ्ेकतन ंग :

बबडदी : १९ फर्री से ११ माचण

इनर अ्ेकतन ंग ्ाराणसी : ७ माई से २७ माई

सादगी की व्लामसता यही है की ्ह ककसी भी बाहय ्ासतु की आ्शयकता के बबना हमं रेररत, उतसाही, सिी् ए्ं तेिस्ी रखती है| इसका तातपयण यह है की हम अपनी भीतरी छव्, बाहरी छव्, लोगं के बारे मं हमारी छव् और िी्न के बारे मं हमारी छव् इन चरं छव्यं से पूणणत् अनुभ् करते हं| सादगी गरीबी नहीं है; अवपतु यह तो बाहय ्सतं से व्मु्त होने की कला है, यह तो ्ह ज़मीन है िहाँ मश्ोहम का बीि अंकुररत होता है | -परमहंस तनतयानंद