Books / Guaranteed Solutions For Lust Fear Worry... Hindi merged

4. असंतोष से कृतज्ञता तक

# असंतोष से कृतज्ञता तक

अब हम आखिरी चक्र में प्रवेश करते हैं - 'सहस्रार चक्र' जो सिर के ऊपरी भाग में स्थित है।

संस्कृत भाषा में 'सहस्रार' का अर्थ होता है- 'हजार पंखूड़ियों वाला' - जब यह चक्र स्वस्थ और क्रियान्वित हो जाता है, तो रहस्यमयी अनुभव में पाया गया है कि हजार पंखुड़ियों वाला कमल सिर के मुकुट क्षेत्र में खिल उठता है।

यह चक्र बाधित होता है असंतोष से और जीवन पर अपना हक मान लेने से, इसे खिलाया जा सकता है, संतोष और असीमित कृतज्ञता से।

(ध्यान तकनीक : सहस्रार ध्यान - एक सूफी साधना तकनीक)

एक व्यक्ति ईश्वर से रोज प्रार्थना करता है, "हे ईश्वर, मेरे पास पर्याप्त धन नहीं है। कृपया एक बहुत बड़ी लॉटरी जो कम से कम एक करोड़ रूपये की हो, जीतने में मेरी मदद कीजिए। यदि मैं जीत गया तो मैं वचन देता हूँ, कि उसका 20 फीसदी आपके मंदिर में चढ़ा दुँगा। यदि आपको मेरे ऊपर विश्वास न हो, कृपया अपना 20 लाख पहले से काट लीजिए और बाकी का 80 लाख मुझे दे दीजिए।" हमारा हर व्यवहार एकदम इसी तरह है - मात्र एक व्यापार। हमारे जीवन में हो सकता है ऐसा न हो, लेकिन यदि तुम गहराई से विश्लेषण करो अपनी प्रार्थना के रवैये का, समझ जाओगे कि तूम हर समय सबसे एक व्यापारिक व्यवहार करते हो, ईश्वर के साथ भी।

एक छोटी कथा :

एक दिन एक निर्धन व्यक्ति बादशाह अकबर के महल में गया।

वह अकबर से अपने पूत्र की पढ़ायी के लिए कुछ धन के लिए अनुरोध करने गया था।

अकबर अपनी दया के लिए जाना जाता था, जो किसी को मदद से निराश नहीं करता था।

जब वह व्यक्ति महल पहुँचा, उस वक्त अकबर ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे। इसलिए और लोगों के साथ वह प्रार्थना कक्ष के बाहर प्रतीक्षा करने लगा।

जब अकबर बाहर आया, तो सब लोगों ने अपना-अपना अनुरोध सुनाया और उनसे मदद प्राप्त की।

केवल वह निर्धन व्यक्ति बिना कुछ माँगे हुए वापस लौटने लगा। लेकिन अकबर ने उसे देख लिया और वापस बूलाया।

उन्होंने उससे पूछा, "तूम बिना कूछ माँगे हुए वापस क्यों जा रहे हो? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, ''हे बादशाह, मैं तो आया था आप से मदद माँगने, लेकिन देखा कि आप स्वयं भिखारी हैं।''

यदि तुम हमारी प्रार्थनाओं को देखो, तो तुम यह महसूस करोगे कि हम सब वास्तव में भिखारी हैं। हम बस माँगते हैं, माँगते हैं। हमारी प्रार्थना और कुछ नहीं, अपितु एक भिक्षापात्र है। हम भौतिक वस्तुओं के लिए भिक्षा माँगते हैं, मधूर संबंधों की भिक्षा माँगते हैं, शक्ति की भिक्षा माँगते हैं, अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की भिक्षा माँगते हैं, शारीरिक खूबसूरती की भिक्षा माँगते हैं और क्या-क्या नहीं माँगते।

हम अपने मन में लगातार हर समय किसी न किसी चीज को माँगते ही रहते हैं। वास्तव में, माँगने से हमारा इतना बढ़िया तालमेल है कि वो एक सहज प्रक्रिया बन गया है, हमारे अन्दर और हो सकता है कि हम इसे स्वीकार भी न करें कि हम माँग रहे हैं। हम तर्क दे सकते हैं कि हम माँग नहीं रहे हैं, क्योंकि हम मानते ही नहीं। वह तो जीवन का स्वाभाविक तरीका बन गया है। हम उसमें इतना अधिक लिप्त हो जाते हैं कि हम उसे देख ही नहीं पाते और बिना पूर्वाग्रसन के तो एकदम देख नहीं पाते।

समझो : इस संसार में केवल दो प्रकार के ही धर्म हैं, एक धर्म - जो प्रार्थना पर आधारित है, और दूसरा धर्म - जो कृतज्ञता पर आधारित है।

प्रार्थना पर आधारित धर्म में हर समय ईश्वर से कुछ न कूछ माँगा जाता है। इसका अनुसरण करने वालों का बहुमत है, क्योंकि हम अपने माँगने के रवैये से बहुत अच्छा सामंजस्य बैठा चुके हैं। इस तरह के तारतम्य की दशा हमारे अन्दर तक बहत कम उम्र से ही प्रभावी हो गयी है। प्रार्थना में माँगना ही है, जो हमें बचपन से सिखाया गया है। यही सबसे स्वाभाविक तरीका लगता है ईश्वर के पास या अस्तित्व के पास जाने का।

दूसरी तरफ वह धर्म है जो कृतज्ञता पर आधारित है जिसका आधार, अपने अन्तःकरण से उस ईश्वर या अस्तित्व के प्रति, कृतज्ञता प्रकट करना है। यह एकदम विपरीत है, उससे जो हमें बचपन से ही सिखाया गया है। हमें हमेशा सिखाया गया है कि हम केवल उस चीज के लिए धन्यवाद दें. जो हमें प्राप्त हो. हमें सिखायी गयी है कृतज्ञता एक सामाजिक व्यवहार के रूप में, इससे अधिक कुछ नहीं।

तब हम हर समय कैसे क्रतज्ञ हो सकते है? ये बहत अधिक है। यही कारण है कि क्रतज्ञता पर आधारित धर्म का अनुसरण चुनिंदा लोग ही करते हैं।

केवल कुछ साधनागत धर्म, जैसे बौद्ध धर्म या सूफी धर्म, कृतज्ञता पर आधारित है। इन धर्मों के अनुयायी बहुत कम हैं। लेकिन अनुयायियों का स्तर बहुत ऊँचा है।

तुम देखो : प्रार्थना करने में कोई गलती नहीं है, लेकिन प्रार्थना करते समय माँगने में ही अटक जाना, ही है जहाँ परेशानी शुरू होती है। प्रार्थना को शुरुआती कदम के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए साधना में प्रवेश करने के लिए, एक ध्यान जहाँ कृतज्ञता प्रार्थना बन जाये और तुम्हारा स्वरूप परमानन्दित हो जाये।

तुम सोच सकते हो : कुतज्ञ होना केवल सामिजिक आदत हो सकती है, यह ध्यान कैसे हो सकती है? लेकिन तुम समझ जाओगे, मैं क्या कहना चाहता हूँ, जब तुम वास्तव में कृतज्ञ होना शुरू करोगे, जब तुम कृतज्ञता देना शुरू करोगे तब तुम अपने जीवन का मूल्य समझोगे।

मैं तुम्हें बताता हूँ : तुम केवल उन्हीं लोगो के बारे में जानते हो, जो प्रत्यक्ष रूप से तुम्हें चीजें उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार हैं और ख्याल रखते हैं। लेकिन आज तक मध्य और हजारों बार पहले जिसकी तुम्हें जानकारी भी नहीं हैं कि तुम्हारी कितनी बार मदद की गयी, तुम्हें सूरक्षित किया गया और कितनी बार तुम्हारा ख्याल रखा गया, अस्तित्व के द्वारा, ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के द्वारा। लेकिन तुम हमेशा ये सोचते हो कि जो कूछ भी तुम्हें दिया गया, वह या तो तम्हारी पात्रता थी या एक घटना मात्र थी। जब तम अस्तित्व के अदश्य हाथ देखना शुरू कर दोगे और महसूस करना शूरू कर दोगे उसका तुम्हारा ख्याल रखते हुए, केवल तब तम समझोगे कि अस्तित्व को तम्हारी आवश्यकता है यहाँ। केवल तब तुम यह समझोगे कि तुम्हारे ऊपर अस्तित्व की क्रपा की वर्षा निरंतर हो रही है।

यह तथ्य कि तुम जीवित हो पर्याप्त है यह दिखाने के लिए कि अस्तित्व चाहता है कि तुम रहो और तुम्हारा ख्याल रख रहा है। केवल तब जब तुम इस बात को नहीं समझ पाते, तूम सूस्त और अपने आप को हतोत्साहित करते हो और हमेशा कहते रहते हो कि तूम इस संसार के सबसे वंचित किए हुए व्यक्ति हो। यदि तुम अपने स्वरूप से वह सुनोगो जो यहाँ कहा जा रहा है, तब तुम अपने आप को तारतम्य में ला सकोगे तब संवेदनशील बन सकोगे अस्तित्व के देने के आश्चर्यजनक तरीकों से।

हममें से अधिकतर लोग ईश्वर की प्रार्थना भय के साथ करते है। तूमने देखा होगा माताओं को अपने बच्चों से कहते हुए कि यदि वे एक विशेष कार्य नहीं करेंगे, तो ईश्वर उनसे नाराज हो जाएँगे। यह कथन उस बच्चे के अन्दर बहुत कम उम्र से ही जड़ पकड़ लेता है, और उनके अन्दर ईश्वर के प्रति एक गलत धारणा स्थापित कर देता है। ये सब दशायें हैं जिसमें तुम अपने बच्चें को बहुत कम उम्र से ढाल देते हो। जब वे बड़े हो जाते हैं, वे इसके कारण गंभीर असमंजस का सामना करते हैं। बजाए इसके कि वे अस्तित्व का प्रेम और कृतज्ञता से आलिंगन करें, वे अलग खड़े हो जाते हैं, उससे दूर भय और सम्मान के साथ।

धर्म का अनुसरण यदि भय के कारण किया जायेगा तो वह तुम्हें कहीं नहीं पहुँचायेगा, वह तुम्हारे अन्दर होने वाले परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त नहीं करेगा। तूम भौतिक रूप से, अपनी आस्था के कारण जो तुम्हारी ऊर्जा हे, उन्नति कर सकते हो, लेकिन अपने स्वरूप के स्तर पर तुम वहीं रहोगे जहाँ तुम हो। भौतिक मार्ग पर जीवन में सच्ची परिपूर्णता कभी नहीं हो सकती है, वह केवल तुम्हारे स्वरूप के स्तर पर ही हो सकती है। जो लोग भौतिक स्तर पर सफल होते हैं, जिसे वे कहते हैं, सफलता का हतोत्साह वो अच्छी तरह से मेरी इस बात को समझ सकेंगे। सफलता के हतोत्साह के बारे में हम पूर्व के सत्र में बहुत चर्चा कर चुके हैं।

धर्म का अनुसरण, ईश्वर या अस्तित्व के प्रति गहरे प्रेम और कृतज्ञता के साथ किया जाना चाहिए। जब कि तुम्हें समाज यह दिखाता है कि ईश्वर की आराधना भय के नाम पर करो, मैं तुमसे बताता हूँ : ऐसा कभी मत करो। हमेशा प्रार्थना करो ईश्वर के प्रति प्रेम और कृतज्ञता के साथ।

एक छोटी कथा :

एक सुफी स्वामी जूनैद, ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रतिदिन 5 बार प्रकट करता था।

एक बार वह अपने अनुयायियों के साथ भ्रमण करते हुए किसी गाँव से गुजरा, जहाँ के लोग सूफी धर्म को स्वीकार नहीं करते थे।

सबसे पहले गाँव वालों ने उन लोगों को भीख माँगने के लिए कोसा और थोड़ी बहुत भिक्षा दे दी।

दूसरे दिन, लोगों ने कोई भी मदद करने से इनकार कर दिया।

तीसरे दिन, जिस गाँव से वे गुजरे वे लोग विरोध में उत्तेजित हो गये और उन लोगों ने डण्डों से और पत्थरों से उन्हें मारकर बाहर खदेड दिया।

उस रात भी हमेशा की तरह, जुनैद ने घुटने टेककर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट की।

उसके अनूयायी उसे यह करते हुए देख रहे थे। उनके लिए यह बहुत था, वे नहीं समझ पा रहे थे कि जुनैद ईश्वर को क्यों धन्यवाद दे रहे हैं। वे उग्र हो रहे थे।

वे चीख उठे, "स्वामी, हम लोगों ने 3 दिन से भोजन नहीं किया। आज हम लोग गाँव से कूत्तों की तरह बाहर निकाले गये। क्या इसलिए आप ईश्वर को धन्यवाद दे रहे हैं?"

जूनैद ने उनकी तरफ देखा और कहा, "तुम 3 दिन की भूख की बात कर रहे हो। क्या तुमने ईश्वर को 30 साल भोजन मिलने के लिए धन्यवाद दिया है? एक बात और : मेरी कृतज्ञता कोई चीज पाने या न पाने के लिए नहीं है। वह तो मात्र मेरे स्वरूप में गहरे प्रेम और आनन्द की अभिव्यक्ति है। वह एक विकल्पहीन प्रार्थनापूर्ण अभिव्यक्ति है, बस इतना।"

Section 2

जब तुम कृतज्ञता के साथ भरे हुए होकर के जीवन जियोगे, तूम समझ लो कि तम वह स्थान पा गये, जहाँ किसी अन्य चीज की आवश्यकता नहीं होती। इसका अर्थ होता है कि तम ध्यान की अवस्था पा चुके हो, उसके पश्चात तुम किसी चीज की चिंता नहीं करोगे। अब तम सही मार्ग पर हो। तुम्हारी उन्नति में तुम्हारा मन अब और अधिक व्यवधान नहीं करेगा। तम्हारा मन अदृश्य हो गया है। तुम्हारा मन पदार्पण नहीं कर पायेगा, क्योंकि तूम हृदय की भावनाओं से भरे हुए हो। तम्हारे मन के लिए कोई स्थान ही नहीं है। जब तम्हारे मन के लिए कोर्ड

mLeeve veneR nesiee, Demeblees<e DeeÙesiee keâneB mes? Demeblees<e ùoÙe mes Dee ner veneR mekeâlee~ Ùen Megæ ™he mes ceve keâer GheefmLeefle nw~

legcnejs Deewj DeefmlelJe kesâ ceOÙe ncesMee legcneje ceve KeÌ[e jnlee nw~ Jen legcnW megveves mes JebefÛele keâjlee nw, osKeves mes, cenmetme keâjves mes Deewj DeefmlelJe kesâ Øeefle YeeJegkeâ nesves mes~ Skeâ yeej legce ceve kesâ hejs peeDees Deewj DeefmlelJe keâer Ketyemetjleer keâes osKees, ke=âle%elee legcnejer ØeeLe&vee yeve peeÙesieer Deewj hejceevevo legcneje mJe™he yeve peeÙesiee~ leye legce cegefòeâ Deewj mLeeÙeer Deevevo keâer DevegYetefle keâj mekeâesies~

peye legce Deheves ceve kesâ meebmeeefjkeâ lekeâeX keâe heefjlÙeeie keâj osles nes, leye legce Skeâ veoer keâer lejn yenesies - efJekeâuhejefnle, ØeÙeemejefnle, Deevevo mes hetCe&, Oeeje kesâ meeLe~ leye legce Deheveer Yetefcekeâe efveYee mekeâesies Deewj Gmekesâ nj Skeâ #eCe keâe Deevevo ues mekeâesies~ leye legce Ùen mecePe mekeâesies efkeâ legce Skeâ Dee§eÙe&pevekeâ veeškeâ keâe Skeâ Yeeie nes, efpemeceW legce efpelevee DeefOekeâ mebJesoveMeerue mebÛeeuekeâ kesâ Øeefle nesies, Gleves ner ØeYeeJeMeeueer {bie mes legce Deheveer Yetefcekeâe efveYee heeDeesies Deewj Deheveer Yetefcekeâe keâe Deevevo ues mekeâesies~

peye legce Oeeje kesâ efJehejerle peeDeesies, legcnW ØeÙeeme keâjves keâer DeeJeMÙekeâlee nesieer Deewj efJekeâuheeW keâe DeYÙeeme keâjvee heÌ[siee~ Ùeefo legce Oeeje kesâ Devegketâue peeDeesies, legcnW keâesF& ØeÙeeme keâjves keâer DeeJeMÙekeâlee veneR nesieer, legce Lekeâeve DevegYeJe veneR keâjesies, legce kegbâef"le cenmetme veneR keâjesies, legce kesâJeue yenles ngS nukeâeheve Deewj Deevevo keâe DevegYeJe keâjesies~ leye legcnW nj Ûeerpe Ketyemetjle Øeleerle nesleer efoKesieer~ Skeâ Úesšer keâLee :

Skeâ JÙeefòeâ jsueieeÌ[er keâer uecyeer Ùee$ee hej Lee~

Jen Dehevee meeje meceÙe yeenj Deeles-peeles ÂMÙeeW keâes osKeves ceW efyeleelee Lee~

Skeâ JeÙemkeâ ceefnuee pees Gmekesâ yeieue ceW yew"er Leer, Gmeves Gmemes keâne efkeâ Ùee$ee keâe meyemes DeÛÚe Yeeie yeenj kesâ uegYeeJeves ÂMÙe keâes osKevee nw~ Gme ceefnuee ves Oeerjs mes efmej efnueeÙee, LeesÌ[er osj lekeâ yew"er jner efKeÌ[keâer kesâ yeenj osKeles ngS Deewj efheâj Ûeueer ieF&~

Gmekesâ LeesÌ[er osj yeeo, Jen ceefnuee Jeeheme DeeÙeer, LeesÌ[er osj yew"er efKeÌ[keâer kesâ yeenj osKeles ngS, leye G"er Deewj Ûeueer ieÙeer~

kegâÚ osj yeeo Jen hegve: DeeÙeer Deewj Fme yeej Jen Gmekesâ heerÚs yew"er~ kegâÚ efceveš kesâ yeeo, Gmekeâer heer" hej Gmeves LeheLeheeÙee Deewj hetÚe, ''cegPes #ecee keâjvee, uesefkeâve keäÙee legce keâesF& Ssmeer Ûeerpe osKeles nes, pees ceQ veneR osKe hee peye nce DeefmlelJe kesâ meeLe leejlecÙe yew"evee veneR peeveles, lees nce Gmekeâer Ketyemetjleer mes Ûetkeâ peeles nQ~ nce nj meceÙe KegMe nesves keâe keâejCe {tBÌ{les jnles nQ, GlmeJe ceveeves keâe keâejCe {tBÌ{les jnles nQ, KegMe nesves hej ØeMve keâe ØeMve keâjles jnles nQ, FlÙeeefo, FlÙeeefo~ Fmeer keâejCe mes nce DeefmlelJe mes Deheves mebyebOe keâes hetjer lejn Kees Ûegkesâ nQ~ yepeeS Fmekesâ efkeâ nce Deheves Deeme-heeme keâer ÛeerpeeW kesâ Øeefle ke=âle%e neW, nce ncesMee ceeBieles jnles nQ Deewj ØeMve keâjles jnles nQ~ nceW Jeeheme DeefmlelJe mes Fme mebyebOe keâes efheâj mes mLeeefhele keâjvee nw~ ke=âle%elee nceW Fme KeesÙes ngS mebyebOe keâes Jeeheme ueeves ceW ceoo keâj mekeâleer nw~ Jen Skeâ yeej efheâj legcnW Deheves cetue keâes Øeehle keâjves ceW ceoo keâj mekeâleer nw~ Jen Øeke=âefle mes legcneje mebheke&â yeveeves ceW ceoo keâj mekeâleer nw Deewj DeefmlelJe mes~

Skeâ Úesšer keâLee :

Skeâ JÙeefòeâ Skeâ cebefoj ceW efvejern neskeâj ØeeLe&vee keâj jne Lee, 'ns YeieJeeved! ke=âheÙee cegPes 1000 ®heÙes 15 efove kesâ efueS os oerefpeS, ceQ Gmes heeves kesâ efueS yengle yesÛewve ntB~ ceQ Deehekeâes Ùen ®heÙes Deepe mes 16JeW efove yeeo Jeeheme keâj otBiee, peye cegPes henueer leveKJeen efceuesieer~''

cebefoj keâe hegpeejer Gmekeâer ØeeLe&vee megve jne Lee~

Gmes yengle og:Ke ngDee Gme JÙeefòeâ keâes Fme efmLeefle ceW osKekeâj~

Gmekesâ heeme 500 ®heS Les~ Gmeves Gmes Skeâ efueheâehesâ ceW jKee Deewj Gme JÙeefòeâ keâes osles ngS Ùen keâne efkeâ F&Õej ves keâne nw Ùen hewmee Gmes osves kesâ efueS~

JÙeefòeâ yengle KegMe ngDee, Jen efueheâehesâ keâes ueskeâj Iej ieÙee Deewj JeneB Gmes Keesuee~ Gmeves hewmes keâes efievee Deewj osKee efkeâ Jees 1000 keâer peien kesâJeue 500 ®heÙes Les~

otmejs efove Jen efheâj cebefoj ieÙee Deewj Gmeves F&Õej mes ØeeLe&vee keâer, ''ns YeieJeeve! otmejer yeej ke=âheÙee hegpeejer kesâ neLe hewmee cele YesefpeÙesiee, Gmeves GmeceW mes DeeOee efvekeâeue efueÙee~''

nce nj Ûeerpe keâes ceevekeâj Ûeueles nQ, Ssmee nesvee ner nw, FmeefueS Demebleg° jnles nQ~ Ùeeo jKees : peerJeve Deheves Deehe ceW legcnejs efueS Skeâ Ghenej nw~ keäÙee legceves Gmes Øeehle keâjves kesâ efueS keâef"ve heefjßece efkeâÙee nw? keäÙee legceceW mes keâesF& Yeer Ùen keân mekeâlee nw efkeâ legceves yengle keâef"ve cesnvele keâer nw Fme peerJeve keâes Deefpe&le keâjves kesâ efueS?

नहीं, इसीलिए हम उसकी कीमत नहीं महसूस करते। हम बस चीजों को मानकर चलते हैं कि ऐसा ही था - हमारे शरीर, हमारा प्रतिदिन का भोजन, प्रक्रति की खूबसूरती - हर चीज तो होनी ही थी। हम ईश्वर से हीरे की अँगूठी माँगते हैं -लेकिन क्या हम उसे इस बात के लिए धन्यवाद देते हैं कि उसने हमें उंगलियाँ दे रखीं हैं, उसे पहनने के लिए? समय के साथ-साथ हीरे की अँगठी भी हमारे लिए अपनी कीमत खो देंगी।

एक छोटी कथा :

एक दिन, एक भूगोल की अध्यापिका ने अपने छात्रों से कहा कि वे विश्व के सातों आश्चर्यों का नाम लिखें।

हर बच्चे ने विश्व के आश्चर्यों की सुची बनायी जैसे चीन की दीवार, पिरामिड, आइफिल टावर इत्यादि।

एक लड़की जो लिख रही थी और लगातार लिखते जा रही थी, अपना सिर हिला रही थी और निरंतर लिख रही थी।

अध्यापिका उसके पास आयी और पूछा, "क्या हुआ, तुमने जो याद किया था उसे भूल गयी?"

उस छोटी लड़की ने कहा, "नहीं, मैं थोड़ा भ्रमित हूँ, सात से और भी बहुत अधिक ज्यादा है। "

अध्यापिका आश्चर्यचकित थी और उसकी कापी लेकर के पढ़ने लगी। उसने फिर पूरी कक्षा में जोर-जोर से उसने कहा कि सब सुन सकें, "विश्व के सातों आश्चर्यों के नाम निम्न हैं : मैं देख सकती हूँ, मैं छू सकती हूँ, मैं सूँध सकती हूँ, मैं सून सकती हूँ, मैं स्वाद ले सकती हूँ, मैं हँस सकती हूँ, मैं प्रेम कर सकती हूँ……"

अचानक पूरी कक्षा एक प्रवेश कर जाने वाली शांति से भर गयी।

ये छोटी चीजें भुला दी जाती हैं, क्योंकि हम सोचते हैं कि ये छोटी हैं। हर चीज जो हमें आसानी से उपलब्ध होती है वह हमारे लिए छोटी हो जाती है।

इस संसार में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो देख नहीं सकते, जो सून नहीं सकते, जो चल नहीं सकते, जो स्वाद नहीं ले सकते। हम इन सब चीजों के बारे में कभी सोचते नहीं। हम हमेशा सोचते रहते हैं कि क्या और मिले, क्या बेहतर मिले, इसके बाद क्या मिले हर समय, बस इतना।

एक छोटी कथा :

एक व्यक्ति राजमार्ग पर यात्रा करते हुए अपने गाँव जा रहा था।

ठीक एक घण्टे की यात्रा के बाद, उसकी कार झटका खाकर रुक गयी। वह एकदम से परेशान हो गया और देखा कि कार में ईंधन खत्म हो गया था।

वह कुछ किलोमीटर तक प्रार्थना करते हुए पैदल चला, ढेर सारा पसीना बहाते हुए, अपनी पैंट ठीक करते हुए और अंत में एक शहर में पहँचा।

उसने एक गैस पम्प को खोजा और वहाँ जाकर समझाया कि उसके पास एक भी पैसा नहीं है, लेकिन उसे ईंधन की सख्त आवश्यकता है, क्योंकि उसे अपने गाँव पहुँचना है। उन लोगों ने उसे भगा दिया।

तब उसने दूसरा गैस स्टेशन खोजा, जो सड़क के दूसरी तरफ था और वहाँ जाकर फिर उसने अपनी स्थिति के बारे में समझाया।

वहाँ के प्रबन्धिक को उसके ऊपर दया आयी और वह उसे कुछ लीटर ईंधन बिना पैसे के देने के लिए तैयार हो गया।

उस व्यक्ति ने कहा, "क्या आप मुझे ईंधन के बजाए पैसा दे सकते हैं? सड़के के उस पार वाला गैस पम्प ईंधन आपसे सस्ता बेचता है।"

Section 3

जब तक कोई चीज हमें मिल हहीं जाती, वह हमें बहुत कीमती प्रतीत होती है और हम प्रार्थना के भाव में ही बने रहते हैं, जिस क्षण वो हमें मिल जाती है, वह अपनी कीमत खो देती है और हम आगे बढ़ जाते हैं और दूसरी प्रार्थना करने लगते हैं।

हम हमेशा इसी रवैये के साथ जीते हैं कि 'इसके बाद क्या' : इसी कारण से हम क्रतज्ञता से संबंधित नहीं हो पाते।

उदाहरण के लिए, यदि हम किसी दुकान में जायें और एक नये प्रकार की एलार्म घड़ी देखें, जिसमें कुछ नयी चीजें हों, तुरन्त हम सोचते हैं कि उन नई चीजों के साथ हमारा जीवन बहुत बेहतर होगा। हम ये महसूस करेंगे कि हमारे जीवन का पुरा स्तर बदल जायेगा, यदि वो सब चीजें हमें उपलब्ध हो जायें। हम ये महसूस करेंगे कि हम अपने जीवन में उस घड़ी के साथ और अधिक दक्ष हो जायेंगे। हम उसे खरीदेंगे और अपने घर ले जायेंगे।

कुछ दिनों के बाद, क्या होता है? हमारे पास इतना भी समय नहीं होगा कि हम उसी कीमती घड़ी को पोछकर साफ कर सके। बेचारी घड़ी किसी कोने में पड़ी रहेगी, धूल से ढकी हुई और हो सकता है कि तूमको घर में डांटा भी जाये कि कहाँ से ये फालतू चीजें इकट्ठी करते रहते हो और तब तुम किसी अन्य चीज के बारे में सोचते हुए आगे बढोगे, किसी अन्य कामना से ग्रसित।

हम हमेशा महसुस करते हैं कि कोई चीज जो हमारे पास नहीं है, वह हमारे लिए एक पहाड़ की तरह है और हम उसके बगैर जी नहीं सकेंगे, लेकिन जब हम वास्तव में उसे पा जाते हैं, किसी तरह वह हमारे लिए बहुत छोटी हो जाती है। इसी तरह से हम अपने जीवन में कृतज्ञता के आश्चर्यजनक रवैये से चूक जाते हैं। हम लगातार भागते रहते हैं, इसके बाद 'क्या' के पीछे।

भगवान रमण ईश्वर से कहते हैं : "मैं कितना अधिक बुद्धिमान हूँ। मैंने जो कुछ भी मेरे पास था तुम्हें दिया, अपना सारा जीवन - पीड़ा से भरा हुआ। तुमने अपनी दया से बदले में मूझे अपनी उपस्थिति परमानन्द के रूप में दी।"

भगवान ईश्वर से कहते हैं कि वो ईश्वर से अधिक बुद्धिमान हैं, क्योंकि उन्होंने ये बुद्धिमानी वाला विनिमय किया। इतना पूज्यनीय कृतज्ञता का भाव अस्तित्व के प्रति था उनका। जब तुम इसे पढ़ते हो, तो यह बात बस छू जाती है।

श्री रामकृष्ण परमहंस के बारे में एक छोटी कथा :

ऐसा कहा जाता है, कि जब भी रामकृष्ण परमहंस ने किसी को चैतन्य महाप्रभु के स्थान से आया हुआ देखा, वे उसके पैरों पर गिर पड़ते थे, चाहे स्त्री हो या पुरुष। चैतन्य महाप्रभु भारत के महान पराचेतन स्वामी थे।

ऐसे ही एक अवसर पर, रामकृष्ण किसी के पैरों पर गिर गये, आस-पास के लोगों ने उनसे पूछा कि वे साधारण मनुष्य के पैरों पर क्यों गिरे ?

उन्होंने उत्तर दिया, "चाहे वह साधारण हों या असाधारण, इससे कोई फर्क नही पड़ता। वे बानी गाती से आये हैं - वह स्थान जहाँ चैतन्य ने महत्वपूर्ण संकीर्तन किया था। जिस क्षण मैं सूनता हूँ कि वे वहाँ से आये हैं, वो नाम मेरे अन्दर चैतन्य की स्मृतियों का निर्माण कर देता है, उतना पर्याप्त है। मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ, उनके प्रति उनके पैरों पर गिरकर के कि उन्होंने मेरे मंफ्तिष्क में चैतन्य को उत्पन्न किया। यदि मैं उनसे न मिला होता, इन क्षणों में तो मैं कूछ फालतू बातें सोच रहा होता। इसलिए वे लोग मेरे लिए यंत्र हैं, जिनके माध्यम से दैवीय स्मृतियाँ और विचार मेरे अन्दर प्रकाशित होते हैं।

यह था रामकृष्ण का उत्तर।

चैतन्य का भाव अपने अन्दर उत्पन्न कराने के कारण रामकृष्ण उनके पैरों पर गिर पड़ते थे। क्या आज तूम उनकी कल्पना कर सकते हो? यह है मेरे कहने का अर्थ जब मैं कहता हूँ, कि हर चीज और हर व्यक्ति चाहे वो जो भी कर रहे हों,

कुतज्ञता से देखे जाने चाहिए। वे सब अस्तित्व का ही भाग हैं और वे किसी न किसी सामंजस्य में ही घुम रहे हैं, अस्तित्व द्वारा संगीतबद्ध होकर। जब तुम ऐसा होने के प्रति संवेदनशील होगे, तब जिस तरह से चीजें हो रही है, उनके प्रति तुम क्रतज्ञता का अनुभव करोगे।

हमें महान स्वामियों के अन्दर कृतज्ञता के इस भाव को आत्मसात करने की आवश्यकता है। यह एक मात्र चीज है जो उनसे हमें आत्मसात की आवश्यकता है और शेष का ख्याल स्वतः ही रख लिया जायेगा, क्योंकि जब तुम इसे आत्मसात करोगे, तब संयोग की शक्ति तुम्हारे लिए चीजों को होने देगी और अस्तित्व बस तुम्हारे ऊपर क्रपा की वर्षा करेगी।

देखो समझो : कामना और कृतज्ञता दोनों साथ-साथ रह नहीं सकते। जब तुम एक के बाद एक कामना का अनुभव करोगे, इसका अर्थ है, तुम कृतज्ञता के साथ नहीं जी रहे हो। जब तुम कृतज्ञता के साथ जियोगे, तुम्हारे अन्दर कोई कामना हो ही नहीं सकती। जब तूम करनज़ता के साथ जियोगे, जो कुछ भी तुम्हें दिया जायेगा, वह बस उस उस क्षण तुम्हारी आवश्यकता की पूर्ति करेगी, बस इतना। इसके पूर्व कि तुम माँगो, तुम्हें दे दिया जायेगा, इसलिए माँगने का कोई प्रश्न ही नहीं होगा।

चीजें एकदम परिपूर्ण होंगी, जब तुम कृतज्ञता के साथ क्रियाशील होगे। अन्यथा, हर समय चीजों का अभाव होगा वे बदसूरत होंगी। मानव का लोभ ऐसा है कि चाहे उसे पृथ्वी का राजा क्यों न बना दिया जाये, वो सोचेगा : समुद्र मेरी आज्ञा का पालन नहीं करते, सूर्य और तारे मेरे निर्देशों का पालन नहीं करते।

शिवपूराण में आया है, भगवान शिव की और ब्रह्मकपाल की एक कथा গাঁটে

ब्रह्मकपाल एक खोपडी थी, जिसे भगवान शिव भिक्षापात्र के रूप में प्रयोग करते थे, जब वो एक साधू के वेष में भ्रमण कर रहे थे। ब्रह्मकपाल के बारे में एक विचित्र चीज थी, और वह यह थी कि जो भी भिक्षा उसमें डाली जाती थी, वह तुरन्त उसे निगल लेता था।

भगवान शिव चाहे जितना कठोर प्रयास उसे भरने की करते थे, वह पात्र हमेशा खाली बना रहता था।

यह ब्रह्मकपाल वास्तव में हमारे सबके अन्दर है। यह और कुछ नहीं, अपितु हमारा अपना अहंकार है, वह अहंकार जो सब कुछ निगल लेता है और कामना करता है और अधिक की। यह अहंकार है जो हमें वंचित करता है आनन्द लेने से, उसकी जिसकी वर्षा हमारे ऊपर हो रही है।

keäÙee legce Dehevee peerJeve ØeeLe&vee hej DeeOeeefjle keâjvee Ûeenles nes Ùee ke=âle%elee hej,Ùen hetCe&™hesCe legcnejs Thej nw~ ke=âle%elee efkeâmeer Øekeâej keâer Oeeefce&keâlee veneR nw, efpemekeâe DeejesheCe legcnejs Thej yeenj mes efkeâÙee pee mekesâ~ Ùen Skeâ jJewÙee nw efpemes legcnejs Devoj mes Øemhegâefšle nesvee nw, DeefmlelJe kesâ Deheves lejerkesâ kesâ Øeefle ienjer mecePe kesâ heâuemJe™he~ peye meÛÛeer ke=âle%elee nesieer, Ùen legcneje peerJeve kesâ Øeefle mebhetCe& yeesOe heefjJeefle&le keâj osieer Deewj legcnejs efueS ues DeeÙesieer ncesMee jnves Jeeueer Meebefle Deewj Deevevo~

Skeâ yeej Skeâ JÙeefòeâ jceCe cenef<e& kesâ heeme ieÙee Deewj keâne, ''YeieJeeve, cegPes Meebefle ÛeeefnS~''

jceCe ves Gòej efoÙee, ''legcnejs Deheves keâLeve ceW mes, yeme 'cegPes' Deewj 'ÛeeefnS' MeyoeW keâes nše oes - Deye keäÙee yeÛelee nw, kesâJeue Meebefle~

JeemleefJekeâ mes peerefJele mebyebOe jKeves keâe Skeâ cee$e lejerkeâe, DeefmlelJe kesâ meeLe, legcnejs Éeje Deheves ÛeejeW lejheâ efveefce&le oerJeej keâes leesÌ[keâj kesâ Deheves Denbkeâej keâe heefjlÙeeie keâjkesâ, leye legce Ùen osKe heeves ceW me#ece nesies efkeâ mebyebOe ncesMee Lee~ Gmekesâ efueS legcnW keâesF& efJeMes<e Ûeerpe keâjves keâer pe™jle veneR nw, legcns yeme heefjlÙeeie keâjvee nw Gmekeâe pees veneR nw, yeme Flevee~

peye legce Øesceer nesies, yenles ngS nesies, ke=âle%elee mes Yejs ngS nesies, legce ncesMee Fme heefjhetCe&lee kesâ YeeJe mes Yejs ngS nesies efkeâ legcnejs Devoj mes DeefmlelJe keâer ØeÛeC[ Tpee& efvejblej yen jner nw, efkeâmeer ueeYe kesâ keâejCe veneR, Deefheleg FmeefueS keäÙeeWefkeâ Jener legcneje mJe™he yeve ieÙee nw~ Ùen heefjhetCe&lee ner Debeflece heefjhetCe&lee nw efpemekeâer ceveg<Ùe Keespe keâjlee jnlee nw, neueebefkeâ Gmes Fmekeâer peevekeâejer veneR nw~ mecemle Yeeweflekeâ ÛeerpeeW ceW Jen Gmekeâer yeej-yeej Keespe keâjlee jnlee nw Deewj ueieeleej Ûetkeâlee jnlee nw~

Ûeens legce Fmes mJeerkeâej keâjes Ùee ve keâjes, DeefmlelJe KÙeeue jKe jne nw Deewj legcnW pees kegâÚ keâjves keâer DeeJeMÙekeâlee nw, Jen Ùen nw efkeâ legce GmeceW DeemLee jKees Deewj Dehevee keâle&JÙe ke=âle%elee mes efveYeeDees~ legcnejs Thej DeefmlelJe kesâ ke=âhee keâer Je<ee& nesieer~

uesefkeâve nceejs Devoj DeemLee veneR nw~

Skeâ Úesšer keâLee :

Skeâ JÙeefòeâ F&Õej kesâ Øeefle efyevee DeemLee kesâ jnlee Lee~

DeÛeevekeâ Skeâ efove, Jees Skeâ heneÌ[ keâer Ûeesšer mes efieje Deewj Gmeves osKee efkeâ Jees efkeâmeer lejn mes Skeâ hesÌ[ keâer peÌ[ hekeâÌ[keâj ueškeâe ngDee nw~

Jen YeÙe mes Yej ieÙee~ Gmes DeÛeevekeâ Ùeeo DeeÙee efkeâ ueesie nj meceÙe F&Õej keâer yeeleW keâjles nQ~ Gmeves Deheves ceve ceW meesÛee, 'keäÙeeW ve F&Õej mes ceoo ceeBieves keâer keâesefMeMe keâer peeÙes' Deewj Jen efÛeuuee G"e, ''ns YeieJeeve! cegPes legcnejs Thej keâYeer efJeÕeeme veneR Lee, keäÙee Deehe meÛecegÛe nes? keäÙee Deehe Fme Jeòeâ cegPes yeÛee mekeâles nes?''

F&Õej keâer DeeJeepe škeâjekeâj kesâ Jeeheme DeeÙeer, ''efveef§ele ™he mes heg$e, yeme Gme peÌ[ keâes pees legce hekeâÌ[s ngS nes, Gmes ÚesÌ[ oes Deewj ceQ legcnW veerÛes mes hekeâÌ[ uetBiee~''

Section 4

Jen JÙeefòeâ efheâj mes efÛeuuee G"e, ''keäÙee keâesF& Deewj nw ÙeneB pees cesjer ceoo keâj mekesâ~''

nce yeme DeefmlelJe hej efJeÕeeme keâjves kesâ efueS lewÙeej veneR nw~ Deheves mJe™he ceW DeefmlelJe kesâ Øeefle DeemLee cee$e keâe iegCe legcnW Fme he=LJeer hej F&Õej keâer lejn peerefJele jKesiee~ legce Fme Dee§eÙe&pevekeâ DeJemej keâes Kees jns nes, yeme Deheves Denbkeâej Deewj De%eevelee kesâ keâejCe~

Ùeefo nce yeÇÿeeC[erÙe Tpee& kesâ Øeefle efvejblej ke=âle%elee kesâ YeeJe keâes cenmetme keâjW mepeielee mes, lees nce Ùen DevegYeJe keâj mekeWâies efkeâ nceeje KÙeeue DeefmlelJe ueieeleej jKe jne nw~ nce Deheves Deehekeâes Gmeer lejn Fme Tpee& keâer ieeso ceW heeÙeWies pewmes efkeâ Skeâ ceeB Deheves yeÛÛes keâes ieeso ceW uesleer nw Deewj Ûeens legce Fmes mJeerkeâej keâjes Ùee ve keâjes Ùen Skeâ melÙe nw~

Skeâ Deeoceer ves mJehve osKee efkeâ Jen Deewj F&Õej peerJeve keâer Ùee$ee kesâ ceOÙe mecegõ kesâ efkeâveejs šnue jns Les~

Gmeves F&Õej mes yeleeÙee, ''ns F&Õej! ceQves mJehve osKee Lee efkeâ ceQ Deewj Deehe oesveeW mecegõ kesâ efkeâveejs keâer jsle hej hewoue šnue jns nQ~ peye ceQves heerÚs cegÌ[keâj osKee lees ceQves osKee, peye peerJeve DelÙevle hejer#eCe keâeue keâe Lee, peye ceQ ienjer mecemÙeeDeeW mes efIeje ngDee Lee, lees mecegõ keâer jsle hej kesâJeue Skeâ ner JÙeefòeâ kesâ Ûeueves kesâ efveMeeve Les, otmeje ieeÙeye Lee~ Gve heefjefmLeefleÙeeW ceW legce cegPemes otj kewâmes pee mekeâles Les?''

F&Õej ves Gòej efoÙee, ''heg$e! Gve heefjefmLeefleÙeeW ceW ceQves legcnW Deheveer ieeso ceW G"ekeâj kesâ {esÙee nw~''

ceQ legcnW yeleelee ntB, Deheves Kego kesâ DevegYeJe mes : cesjs YeüceCe kesâ efoveeW ceW, ceQves 30,000 efkeâueesceeršj mes DeefOekeâ keâer Ùee$ee keâer, efpemeceW 2000 efkeâueesceeršj mes DeefOekeâ keâer Ùee$ee ceQves hewoue Ûeuekeâj keâer~ ceQ Ùee$ee ceW kesâJeue oes peesÌ[er keâheÌ[s Deewj Yeespeve keâer efYe#ee kesâ efueS Skeâ yele&ve Yej Deheves meeLe jKelee Lee~ ceQves Skeâ Øeefle%ee keâer Leer efkeâ ceQ Oeve keâe mheMe& veneR keâ™Biee, Deewj otmejs meceÙe kesâ Yeespeve kesâ efueS Yeespeve veneR yeÛeeTBiee~

ueesie cegPemes hetÚles nQ efkeâ Ùen yeme kewâmes mebYeJe ngDee? ceQ legcnW Deye yeleelee ntB : ceQ yeme DeefmlelJe kesâ Thej efJeÕeeme jKelee Lee Deewj Dehevee ue#Ùe efkeâ ceQ hejeÛeslevee keâes Øeehle keâ™Biee hej Dehevee OÙeeve kesâefvõle jKelee Lee Deewj DeefmlelJe ves cesje KÙeeue jKee, Ssmes ngDee meye kegâÚ~

peye legce cegPes Ùen keânles ngS megveles nes efkeâ DeefmlelJe ceW efJeÕeeme jKees, legce meesÛe mekeâles nes efkeâ Ùen mebleeW kesâ yeerles ngS keâue keâer DeJeOeejCee nw~ keâleF& veneR~ ceQ Deheves DevegYeJe mes yeesue jne ntB, Gmemes yeesue jne ntB, pees cesjs meeLe ngDee Lee, ceQ pees efkeâ "erkeâ legcnejs meeceves Fme Jeòeâ yew"e ntB Deewj ceQ Ùes meesÛelee ntB efkeâ Fme YeerÌ[ ceW ceQ meyemes keâce Gceü keâe ntB~ FmeefueS ceQ Ssmeer yeele veneR keâj jne ntB, pees yengle henues keâer nes~ Fmes mecePees~

cee$e ke=âle%elee kesâ meeLe peerves keâe ØeÙeeme keâjes Deewj ÛecelkeâejeW keâes nesles ngS osKees~ DeefmlelJe oslee nw, Ùeefo legce efyevee ØeMve kesâ uesves kesâ efueS lewÙeej nes, ùoÙe keâer YeeJevee mes Yejhetj neskeâj~

Skeâ JÙeefòeâ ves mJehve osKee efkeâ Jen mJeie& Ûeuee ieÙee Deewj JeneB Skeâ osJeotle Gmes Ietceekeâj mJeie& efoKee jne Lee~

Jes yeieue-yeieue Ûeue jns Les~

henues, Jees Skeâ yeÌ[s keâeÙe&Meeuee ceW hengBÛes, efpemeceW yengle mes osJeotle Yejs ngS Les~

Jen keâceje efJeefYeVe ef›eâÙeeDeeW keâer ietBpe ceW Yeje ngDee Lee~

ceeie&-oMe&keâ otle ÙeneB ®keâe Deewj Gme JÙeefòeâ keâes Gmeves mecePeeÙee, ''Ùen mJeerkeâej keâjves Jeeuee efJeYeeie nw~ ÙeneB, meejer ÙeeefÛekeâeÙeW pees F&Õej kesâ heeme Yespeer peeleer nQ, ØeeLe&veeDeeW kesâ ceeOÙece mes, GvnW mJeerkeâej efkeâÙee peelee nw Deewj Deueie-Deueie efkeâÙee peelee nw~''

Gme JÙeefòeâ ves ÛeejeW lejheâ osKee Deewj heeÙee efkeâ Jees lees DelÙeefOekeâ JÙemle efJeYeeie nw,efpemeceW efkeâ yengle mes osJeotle ÙeeefÛekeâeDeeW keâes pees efJeefYeVe keâeiepeeW hej efueKeer ngF& LeeR, uecyes keâeiepe, Úesšs keâeiepe, jöer keâeiepe Deewj keäÙee veneR, keâes Deueie-Deueie keâj jns Les~ Ùes ÙeeefÛekeâeÙeW efJeÕe kesâ efJeefYeVe YeeieeW mes ÛeejeW lejheâ ueesieeW Éeje Yespeer ieÙeer LeeR, pees efJeefYeVe Yee<eeDeeW ceW LeeR~ leye Jes Deeies yeÌ{keâj otmejs efJeYeeie ceW ieÙes~

Ùen efJeYeeie Yeer yengle mes JÙemle osJeotleeW mes Yeje ngDee Lee Deewj yengle mes keâeiepe Deewj yeC[ue Yejs ngS Les~

ceeie&-oMe&keâ osJeotle ves mecePeeÙee, ''Ùen hewefkebâie keâjves Jeeuee Deewj ÛeerpeW hengBÛeeves Jeeuee efJeYeeie nw~ ÙeneB, pees ke=âhee, oÙee, DeeMeerJee&o ueesieeW ves ceeBiee Lee, Gvekeâes Øeef›eâÙeeyeæ keâjkesâ Fme efJeYeeie ceW efheâj he=LJeer hej Gve ueesieeW keâes hengBÛee efoÙee peelee nw~''

Jes Ûeueles jns Deewj uecyes yejeceos kesâ Skeâ efkeâveejs hej Jes ®keâ ieÙes, Skeâ Úesšs mes keâcejs kesâ ojJeepes kesâ mece#e~

Gme JÙeefòeâ keâes Dee§eÙe& ngDee, JeneB kesâJeue Skeâ osJeotle yew"e Lee, pees cespe hej Pegkeâe ngDee Lee~

JÙeefòeâ ves osJeotle mes hetÚe, Ùes kewâmes, Ùen efJeYeeie lees yengle Meeble nw? Ùes keâewve mee efJeYeeie nw?''

osJeotle efce$e ves Meebefle kesâ meeLe Gòej efoÙee, ''Ùen DeeMeerJee&oeW kesâ Øeehle nesves keâer hegef° keâe efJeYeeie nw~ efpeve ueesieeW keâes ÙeneB mes DeeMeerJee&o Yespee peelee nw, Jees Gmekeâer hegef° Yespeles nQ Deewj Gmes ÙeneB mJeerkeâej efkeâÙee peelee nw Deewj Øeef›eâÙeeyeæ efkeâÙee peelee nw~''

nce meye ceeBieles nQ Deewj ceeBieles nQ, uesefkeâve nceceW mes efkeâleves, pees nce heeles nQ, Gmekeâe OevÙeJeeo osles nQ? nceceW mes efkeâleves Deheveer ØeeLe&vee ceW ceeBieles meceÙe ke=âle%elee keâes Yeer meefcceefuele keâjles nQ?

peye legce Deheves Deehe ceW Skeâoce Dekesâues nes, Fme Úesšs mes DeYÙeeme keâes keâjves keâe ØeÙeeme keâjes :

oes IeCšeW kesâ efueS, Deheveer mecemle efÛebleeDeeW Deewj DeeJeMÙekeâleeDeeW keâes Skeâ efkeâveejs keâj oes Deewj Fme hej Dehevee OÙeeve kesâefvõle keâjes, pees DeefmlelJe ves legcnW henues mes os jKee nw~ legce legjvle Ùen meesÛesies efkeâ Ùeefo ceQ Deheveer DeeJeMÙekeâleeDeeW keâer efÛeblee ve keâ™B, lees ceQ Gvekeâes hetje kewâmes keâ™Biee? keâewve cesjs heefjJeej keâe KÙeeue jKesiee? cesjs JÙeJemeeÙe keâe keäÙee nesiee? ceevelee ntB, legcnW Fve meye ÛeerpeeW kesâ yeej ceW meesÛevee nw~ uesefkeâve yeme Deieues oes IeCšeW lekeâ, Deheves efmej mes meeje yeesPe nše oes Deewj Jen keâjes pees ceQ keân jne ntB~

Ûeens pees Yeer nes, keäÙee legce Ùes meesÛeles nes efkeâ legcneje heefjJeej Ùee legcneje JÙeJemeeÙe legcnejs keâejCe Ûeue jne nw? ceQ legcnW yeleelee ntB, ÛeerpeW efyevee JÙeJeOeeve kesâ Ûeue jner nQ, nceejs keâejCe mes veneR, yeefukeâ efyevee nceejs Ûeue jner nQ~ Ùeefo DeefmlelJe keâes nceejs heefjJeej Deewj nceejer mecheefle keâes yeÛeeves kesâ efueS nceejer yegefæceòee hej Deeefßele रहना पड़ता तो अब तक हम लोग असहाय होते और बहुत स्पष्ट रहो : केवल मात्र चिंता करने से, कूछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। मैं समझता हूँ, चिंता करने पर हम पहले पर्याप्त बातें कर चूके हैं।

इसलिए मात्र कुछ मिनट के लिए, अपने नेत्रों को बंद करो और अपना ध्यान केन्द्रित करो, उन सब चीजों पर जो तुम्हें पहले से प्राप्त हो चुकी हैं, जो तुम्हारे पास पहले से हैं। मानसिक रूप से हर चीज के बारे में चिंतन करो - जैसे तुम्हारा शरीर, तुम्हारी सम्पदा, वो लोग जो तुम्हारी मदद करते हैं, तुम्हें सहारा देते हैं, तुम्हारा घर, तुम्हारी सूख-सूविधायें, हमारी छुट्टियाँ हर चीज। एक आरामदायक स्थिति में और क्रतज्ञता के साथ इन बस चीजों का आनन्द लो। इसमें जितना समय संभव हो उतना समय इस्तेमाल करो।

तीव्रता से और जल्दबाजी में इन सब चीजों के बारे में मत सोचो। मात्र इन सब चीजों को जियो अपने मन में। इस भाव में स्थित रहो। एक क्षण के लिए परिपूर्णता की उस आश्चर्यजनक अनुभव में स्थित रहो। ऐसा महसूस करो कि तुम कृतज्ञता से भर गये हो और उससे भरपूर हो। जब तुम अपने नेत्र खोलेगे, तुम देखोगे कि जो कुछ भी तुम्हारे पास है वह पर्याप्त से अधिक है तुम्हारा जीवन चलाने के लिए और तुम्हें आश्चर्य होगा - कि तुम्हें और क्या चाहिए।

Section 5

तुम्हें मात्र कृतज्ञ बनना है। कृतज्ञ बनने का सबसे अच्छा तरीका, यह है कि बिना कारण के आनन्दित रहना सीख जाओ। आनन्द लो हर चीज का जो तुम देखो, हर चीज का जो तुम सुनो और हर चीज का जो तुम करो। इस बात का परम आत्मविश्वास के साथ कि अस्तित्व तुम्हारा ख्याल रख रहा है। जीवन तब बस तुम्हारी आँखों में परिवर्तित हो जायेगा और तुम हर समय भरपूर रहोगे, क्योंकि तुम हमेशा आनन्द लेते रहोगे।

एक छोटी कथा :

एक बार एक व्यक्ति आम के बाग के पास से जो रहा था, जो विभिज प्रकार के आमों से भरा हुआ था।

उसने बाग में प्रवेश किया, आस-पास देखा, उसका अध्ययन किया, कुछ आँकड़ों को लिखा और आधे घण्टे बाद चला गया। कुछ आँकड़ों और तथ्यों के साथ।

थोड़ी देर बाद, एक दूसरा आदमी उसी बाग के पास से गुजरा। उसने बाग में प्रवेश किया, कुछ आम तोड़े, उन्हें आनन्द लेते हुए खाया और चला गया।

अब, किसी आम के बाग के पास रुककर के आम तोड़कर मत खाना। तुम्हारा

स्वागत पत्थरों से हो सकता है। यह समझने की कोशिश करो कि मैं क्या कहने का प्रयास कर रहा हूँ। बिना प्रश्न किये बस आनन्द लेना सीखो। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि हर कार्य छोड़कर के तूम हर समय केवल आनन्द लो।

तुम्हें कार्य करने की आवश्यकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। यदि तुम केवल आनन्द लेते रहोगे, तो तुम्हें कोई भी सब कुछ नहीं देने जा रहा है। मैं केवल यह कह रहा हूँ कि आनन्द लेने के लिए कारण मत द्रूढ़ों, बस इतना। इसलिए बिना प्रश्‍न किये हुए बस हर चीज का आनन्द लो। आनन्द लेने को ही अपना स्वभाव बन जाने दो, तब कृतज्ञता ही तुम्हारा स्वरूप बन जायेगी।

तुम्हारा व्यवसाय कुछ भी हो सकता है, तुम्हारा सामाजिक स्तर कुछ भी हो सकता है, तुम्हारा आर्थिक स्तर कुछ भी हो सकता है, लेकिन आनन्द लेना एक ऐसी चीज है जो हर व्यक्ति बिना इन सब चीजों के भी कर सकता है।

समस्या यह है कि : तुम हमेशा यह महसूस करते हो कि हर चीज का कोई तथ्य या कारण होना चाहिए। आनन्द लेने के बारे में भी। तुमने अपने मन का अभ्यास इसी प्रकार के वैचारिक स्वरूपों से कराया हैं। यही कारण है कि तुम अक्सर यह महसूस करते हो कि दूसरे लोग जो चीजें पा गये हैं, वे उसकी पात्रता नहीं रखते थे, जबकि तुम्हें अपने प्रयासों के हिसाब से पर्याप्त नहीं दिया गया। तुम हमेशा सोचते हो कि आनन्द लेने के लिए तुम्हें कडी मेहनत करने की आवश्यकता है। नहीं, कडी मेहनत करना ठीक है, लेकिन इसका आनन्द लेने की क्षमता से कोई संबंध नहीं है। इस विचार का परित्याग करो। यह एक मात्र तरीका है, जिससे तुम शिकायत करना और असंतोष का अनुभव करना बंद कर दोगे।

अस्‍तित्‍व कुपा की वर्षा करता है। यदि तूम आनन्‍द लेने का निर्णय लो, तुम आनन्द लोगे ये शुद्ध रूप से तुम्हारा निर्णय है। तुम गलत निर्णय लेते हो और तब शिकायत करते हो या किसी और को दोष देते हो। याद रखो, तुम्हारे साथ होने वाली किसी भी चीज के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है। हर चीज तुम्हारा निर्णय है, जो तुम असजगता से ले लेते हो। तुम्हारे अन्दर सजगता की कमी के कारण, तुम असजग और एक ही प्रकार का फैसला ले लेते हो और अपने आप को जीवन के प्रति शिकायत करता हुआ पाते हो।

हमेशा याद रखो : स्वर्ग और नर्क वाह्य जगत में कोई भौगोलिक स्थान नहीं है। तुम अपने अन्दर ही उसका निर्माण करते हो। जिस क्षण तुम अस्तित्व पर विश्वास रखना खो देते हो, तुम अपने आप को उससे पुथक कर लेते हो और अपने साथ नर्क लेकर चलते हो, जहाँ भी तुम जाते हो। ऐसा मत सोचो कि नर्क कोई चीज है जो तुम्हारे बाहर है। वह बस तुम्हारे मस्तिष्क में है। यह तुम्हारा निर्णय है, तुम्हारा स्वभाव है जो फैसला करता है कि तुम स्वर्ग में हो या नर्क में।

एक अध्यापिका ने एक बार अपने छात्रों से पूछा, "क्या कोई मुझे बता सकता है कि उसकी समझ से नर्क कहाँ है?''

एक लम्बी शांति के बाद, एक लड़की खड़ी हई और उत्तर दिया, "मेरे पिताजी की पढ़ाई कक्ष में, मिस।"

अध्यापिका आश्चर्यचकित थी और उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यों कहा ?

लड़की ने उत्तर दिया, "हर बार जब मैं पिताजी की पढ़ाई के समय जाती हूँ, वे कहते हैं इस नर्क से बाहर निकल जाओ।'' (get hell out of here)

बच्चों को बहुत कम उम्र से ही अभ्यास कराया जाता है, यह सोचने का कि स्वर्ग और नर्क उनके बाहर की सत्ता है। उन्हें यह सोचने का अभ्यास कराया जाता है कि ईश्वर ऊपर बैठा है, एक बहुत बड़े सिंहासन पर और हमारी हर गतिविधियों को देख रहा है और हमारे पाप ओर पुण्य को लिखता जा रहा है।

इस तरीके से सोचने के कारण हम प्रारम्भ देते हैं, अपनी हर क्रिया के कारण और प्रभाव के चक्र को। हम संबंधित कर देते हैं, आपने अच्छे कर्म को स्वर्ग से और बुरे कर्म को नर्क से। हम ईश्वर और संपूर्ण अस्तित्व के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं, जैसे कि वो एक कार्य संपादन केन्द्र है। हममें से हर एक बन जाता है, एक व्यापारी अपने तरीके का, चाहे हमारा वास्तविक पेशा कुछ भी हो।

जब तुम किसी मंदिर में जाते हो तो क्या करते हो? तूम, फूल, फल, नारियल खरीदते हो और अन्दर मूर्ति के पास जाते हो और अपने परिवार के नाम पर चढ़ावा चढ़ा देते हो। तुम अपना नाम, अपने परिजनों का नाम, अपना गोत्र इत्यादि बताकर के अनुष्ठान करते हो।

बेचारा पूजारी अपने हाथ में एक पात्र लिए रहता है और तुम उसे एक लम्बी सूची नामों की सारी सूचना के साथ हर परिवार के सदस्यों की बता देते हो। तुम इतना डरे रहते हो कि ईश्वर अपनी कृपा गलत आदमी के पास न भेज दें, गलत घर में न भेज दें। तुम सही भौगोलिक स्थिति भी बताते हो इत्यादि और उसके सामने इस बात पर जोर देते हो कि ये तुम हो और कोई और नहीं जो यह चढ़ावा चढ़ाने आया है। केवल यह करने के बाद ही तुम मंदिर छोड़ते हो। क्या मैं सही हुँ?

जैसे कि ईश्वर तुम्हें जानता ही नहीं, यदि तुम उसे ये सब चीजें नहीं बताओंगे।

3 9 5

जैसे कि तम्हें अपने होने की ईश्वर को याद दिलानी है, जससे कि वो तम्हारे ऊपर कुपा की वर्षा करे। मैं तुम्हें बताता हूँ : जो सब तुम्हें करने की आवश्यकता है वो केवल यह है कि तूम उसके प्रति निरंतर कृतज्ञता का भाव रखो, बस इतना। वह हमेशा क्रूपा की वर्षा करता रहेगा।

ऐसा नहीं है कि जब वह तुम्हें समस्याओं में देखता है, तब तुम्हें उससे निकालने का निर्णय लेता है या तुम्हें ठीक-ठाक देखता है, इसलिए तुम्हारी तरफ ध्यान नहीं देता। ये सब हमारी अपनी मानसिक दशायें हैं जो हम ईश्वर पर आरोपित करते हैं और वही पढ़ने का प्रयास करते हैं। यही सब है जो समाज ने हमें बहत कम उम्र से सिखाया है।

कृतज्ञता की अवधारणा हम लोगों में कितना विक्रत हो गयी है। हम महसूस करते हैं कि कृतज्ञता कोई ऐसी चीज है, जो हमें दिखानी चाहिए, जब हम किसी गहरी समस्या से बाहर निकाले जायें या जब कोई व्यक्ति किसी विशेष प्रयास के द्वारा हमारी मदद करता है या हमारा ख्याल रखता है। यह सबसे विचित्र बात है जो हमें सिखायी गयी है।

मैं तुम्हें बताता हूँ : किसी भी मंदिर में बस कृतज्ञता के भाव से प्रवशे करो, गहरे धन्यवाद के भाव से थोड़ी देर तक मूर्ति के सामने खड़े रहो, और इसी मनःस्थिति में मंदिर से बाहर निकाले। इतना पर्याप्त है। शेष का ख्याल आप रख लिया जायेगा। यही अंतिम प्रार्थना है। कृतज्ञता ही अंतिम पूजा है या चढ़ावा है।

इन कुछ दिनों में तुम यहाँ रहने जा रहे हो, जो मैं कहा रहा हूँ, उसे प्रभावशाली ढंग से प्रयोग करो और अनुभव करो। इन सात दिनों में कृतज्ञता को जड़ पकड़ने दो, जब तुम वाह्य जगत से दूर हो। खुलो और अपने आप को प्रस्फूटित होने दो। यह तुम्हारे लिए एक दुर्लभ अवसर है। यह तुम्हारे लिए परिवर्तित होने का मौका है। इससे चूको मत। अपने अन्दर नये आंतरिक स्थान का निर्माण करो, जो तुम्हारे साथ जायेगा, जब तुम इस स्थान को छोड़ोगे।

तुम देखो : समस्या यह है, हम हमेशा ईश्वर को अपने मन के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। तुम कभी भी ईश्वर तक, अपने मन के माध्यम से नहीं पहुँच सकते। तुम्हें बस अपने मन का परित्याग करना होगा, तुम स्वतः ही अपने हृदय से क्रियाशील हो जाओगे और यह पाओगे कि तुम्हें उस तक पहुँचने की कोई आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि वह पहले से तुम्हारे अन्दर ही है।

अपने मन के माध्यम से, तुम हमेशा बाहर खोजोगे और ईश्वर को तुम बाहर कभी नहीं प्राप्त कर सकते। कृतज्ञ होने के लिए हमेशा अपने मस्तिष्क से तुम कारण द्रँढोगे। जब तुम अपने मस्तिष्क से हृदय की तरफ बढ़ोगे, तुम्हारे लिए एक

hetje veÙee mLeeve Keguesiee Deewj legce DevegYeJe keâjesies efkeâ legce henues mes peeveles Les Deewj Ùen legcneje ceefmle<keâ Lee pees meejer efokeäkeâleeW keâe keâejCe Lee Deewj legcnW Gmes DevegYeJe veneR keâjves os jne Lee~

peye legce Deheves ùoÙe mes ef›eâÙeeMeerue nesies, leye legce ncesMee ke=âle%e jnesies~ keäÙee nce keâYeer keânles nQ, 'ceefmle<keâ ke=âle%elee DevegYeJe keâjlee nw'? veneR, nce ncesMee keânles nQ, 'ùoÙe ke=âle%elee DevegYeJe keâjlee nw', keäÙee Ssmee veneR nw?

leye legce hetÚesies, ''nce Deheves ceefmle<keâ mes ùoÙe keâer lejheâ kewâmes yeÌ{les nQ mJeeceer peer''~ yeme Deheves ceefmle<keâ kesâ Øeefle mepeie jnes, Flevee heÙee&hle nw~ kesâJeue keäÙeeWefkeâ Deheves ceefmle<keâ kesâ Øeefle legce mepeie veneR jnles, legce Skeâ DeJÙeJeefmLele ™he ceW ef›eâÙeeMeerue jnles nes, Skeâ lekeâveerkeâer lejerkesâ mes~ Skeâ yeej legce Deheves ceefmle<keâ kesâ Øeefle mepeie nes peeDees, legce Gmekeâe heefjlÙeeie keâjves ceW meheâue nesies~

Section 6

ke=âle%elee keâesF& meoiegCe veneR nw~ Fmes yeme legcneje jJewÙee nesvee ÛeeefnS~ legcnW Deewj efkeâmeer Ûeerpe keâer DeeJeMÙekeâlee veneR nw, Fmemes DeefOekeâ efkeâ yeme legce DeefmlelJe kesâ meeLe meecebpemÙe keâe DevegYeJe keâjes~ peye legce kesâJeue ke=âle%elee keâe DevegYeJe keâjesies, legce Ketyemetjleer mes Dehevee leejlecÙe DeefmlelJe kesâ meeLe yew"e mekeâesies Deewj leye DeefmlelJe legcnejs meeceves Keesue osiee Deheves peeogF& JewYeJe~ Gmekesâ yeeo legcnW Deewj kegâÚ keâjves keâer DeeJeMÙekeâlee veneR nw, yeefukeâ yew"keâj kesâ Deevevo uesvee~

ceQ legcnW mecePeelee ntB, leejlecÙe mes cesje keäÙee DeLe& nw? nce meye peeveles nQ, jsef[Ùees kewâmes keâeÙe& keâjlee nw, keäÙee nce veneR peeveles?

"erkeâ nw, Jener jsef[Ùees, Gmekesâ mJe™he ceW efyevee efkeâmeer Yeeweflekeâ heefjJele&ve kesâ, Gmes efkeâmeer Yeer jsef[Ùees mšsMeve kesâ efJeefYeVe keâeÙe&›eâceeW mes peesÌ[e pee mekeâlee nw, keäÙee Ssmee veneR nw? peye lekeâ legce efkeâmeer Skeâ efJeMes<e mšsMeve keâes megveles jnles nes, peye keâesF& JÙeJeOeeve yeerÛe ceW Deelee nw, legce keäÙee keâjles nes? cegPes yeleeDees~

nce yeejerkeâer mes ueÙe yew"eles nQ, mJeeceer peer~

Skeâoce "erkeâ, efkeâmeer Yeer mšsMeve keâes Deewj mhe°lee mes megveves kesâ efueS, legcnW ueÙe yew"eves keâer DeeJeMÙekeâlee nw, yeme Flevee~ Deye, yeme Fmeer OeejCee keâes ueeiet keâjes DeefmlelJe mes Dehevee ueÙe yew"eves ceW~

nceejs Deeme-heeme npeejeW keâeÙe&›eâce nes jns nQ, efpemekesâ Øeefle Yeer nce Dehevee ueÙe yew"eÙeWies, Gmekeâes nce DevegYeJe keâjWies~ Deye efkeâme keâeÙe&›eâce mes nce Dehevee ueÙe yew"eles nQ, Ùen Megæ ™he mes nceeje efveCe&Ùe nw, keäÙee efkeâmeer keâe cele Fmemes efYeVe nw? veneR, legcnW Fme yeele keâer mJeleb$elee nw efkeâ legce keâeÙe&›eâce ÛeÙeefvele keâjes pees legce megvevee Ûeenles nes, keäÙee ceQ "erkeâ ntB?

Fmeer lejn mes, Ùeefo legce Ùen efveCe&Ùe uees efkeâ legce Deheves Deeme-heeme ceefmle<keâ Éeje hewoe keâer ieF& DeJÙeJemLee mes mebyebOe mLeeefhele keâjes, legce DeJÙeJeefmLele nes peeDeesies~ legce efÛeblee, Demeblees<e, efJejesOeeYeeme FlÙeeefo, FlÙeeefo ve Kelce nesves Jeeues YeBJej ceW heBâme peeDeesies~

Deewj Ùeefo legce efveCe&Ùe uees DeefmlelJe kesâ meeLe leejlecÙe yew"eves keâe, cegKÙe met$e kesâ meeLe pees hetjs keâeÙe&›eâce keâe efveÙeb$ekeâ nw, legce mecePe uees efkeâ legceves mener met$e hekeâÌ[ efueÙee, Gme hetjer DeJÙeJemLee kesâ ceOÙe pees legcnejs Deeme-heeme nw Deewj legce cegòeâ nesies, Fme lejn keâer mecemle YeeJeveeDeeW mes~ legce yeve peeDeesies Skeâ Ketyemetjle heg<he pees efKeue G"siee megievOe kesâ meeLe~

henues keâer YeeJeveeDeeW kesâ meeLe, legcneje peerJeve Demeblees<e keâer mLeeÙeer efmLeefle kesâ ™he ceW Øeleerle nesiee Deewj yeeo keâer YeeJeveeDeeW kesâ meeLe, peerJeve mebieerle yeve peeÙesiee - pees DeefmlelJe keâer Yee<ee ner nw Deewj legce Gmekeâe Deevevo ueesies nj meceÙe ke=âle%elee kesâ meeLe~

efpelevee DeefOekeâ yeejerkeâer mes legce DeefmlelJe kesâ meeLe leejlecÙe yew"eDeesies, Glevee ner DeefOekeâ DeevevooeÙekeâ legcneje peerJeve nesiee~ Demeblees<e legcnW veerÛes keâer lejheâ KeeRÛesiee, legcneje peerJeve yeesefPeue Deewj heerÌ[eoeÙekeâ yevee osiee Deewj otmejer lejheâ, ke=âle%elee nw Deewj heefjhetCe&lee nw, pees meeLe-meeLe DeeÙeWieer Deewj legcnejs peerJeve keâes Yeejnerve Deewj hejceeveefvole keâj oWieer~ peye legce ÛeerpeeW keâes Ssmee nesvee ner Lee kesâ ™he ceW ueesies, leye legce yengle meer ÛeerpeeW mes Ûetkeâ peeDeesies Deewj kegâÚ Yeer legcnW KegMe Deewj Deeveefvole veneR keâjsiee~ ceQ legcnW yeleelee ntB : Ùes lees nesvee ner Lee, keâYeer ÛeerpeeW keâes Fme ™he ceW cele uees~

Fme Úesšer keâLee keâes megvees :

Skeâ efYeKeejer ves Skeâ JÙeefòeâ keâes meÌ[keâ hej jeskeâe ieÙee Deewj hetÚe, ''oes Je<e& henues, legce cegPes 20 ®heÙes efoÙee keâjles Les, efheÚues hetjs meeue legceves cegPes 10 ®heÙes efoÙes Deewj efheÚues kegâÚ cenerveeW mes legce cegPes kesâJeue 2 ®heÙes os jns nes, keäÙeeW?''

JÙeefòeâ ves Gòej efoÙee, ''henues ceQ DeefJeJeeefnle Lee, leye ceQves Meeoer keâer Deewj Deye cesjs heeme Skeâ yeÛÛee Yeer nw, FmeefueS~''

efYeKeejer efÛeuueeÙee, ''keäÙee? legce cesje hewmee Fmlesceeue keâj jns nes, Deheves heefjJeej keâes Ûeueeves kesâ efueS?''

efYeKeejer keânlee nw, ''legce cesje hewmee Fmlesceeue keâj jns nes, Dehevee heefjJeej keâes Ûeueeves kesâ efueS~'' JeemleJe ceW, nceW mes yengle mes ueesie Dehevee pevceefmeæ DeefOekeâej

समझ लेते हैं कि दूसरे हमारी मदद करते ही रहें, हमारी आवश्यकताओं में और हम बस अधिकार स्वरूप माँगते ही रहते हैं।

हम इस बात को महसूस ही नहीं करते कि कितनी गहरी अनभिज्ञता में हम रहते हैं। जब हम इस तरह का रवैया अपनाते हैं, हम इस बात के प्रति सजग ही नहीं रहते कि किसी चीज की हमारे अन्दर पूर्णतः कमी है, जब हम इस तरह से कार्य करते हैं। इस संपूर्ण रवैये का आमूल-चूल परिवर्तन होना ही है। यहाँ तक कि तुम्हारे अपने माता या पिता या पत्नी भी, इन्हें तो होना ही था के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

एक और छोटी कथा :

एक व्यक्ति जब काम करके एक दिन घर वापस आया, तो उसने पाया कि उसकी पत्नी का मिजाज बहुत खराब था।

वह उसके ऊपर चीखी, "मैंने किसी तरीके से नौकरानी को अभ्यास कराया था, सब काम करने का घर में और वो अब चली गयी।"

व्यक्ति ने सहानुभूति पूछा, "क्या कारण था, प्रिय?"

उसने उत्तर दिया, "बस, तुम कारण हो। उसने कहा कि तुम फोन पर उसके साथ बहुत रुखायी से बोले इसलिए उसने महसूस किया कि उसे अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करने की आवश्यकता है और इसलिए चली गयी। ''

व्यक्ति परेशान हो गया और बड़बड़ाया, ''लेकिन मैं सोच रहा था मैं तुमसे बात कर रहा हूँ।"

हम हमेशा संबंधों को, ऐसे तो होने ही थे एक हक के रूप में लेते हैं, इसलिए और जटिलता में पड़ जाते हैं। हर एक व्यक्ति के प्रति इस तरीके का व्यवहार करना सीखो, जैसे वे संपूर्ण का भाग हैं और उसके प्रति कृतज्ञता का अनुभव करो, तब तुम किसी को इस रूप में नहीं लोगे। तब तम सबका सम्मान करोगे और उसकी पूजा करोगे अस्तित्व का भाग होने के कारण।

जब तुम चीजों को ये तो होनी ही थीं, के रूप में नहीं लोगे, तब तूम अपने ऊपर कुपा की गिनती करोगे। यदि तम बैठ जाओ और विश्लेषण करो, तो तुम महसूस करोगे कि हम हमेशा उन चीजों की गिनती करते हैं, जो हमें प्राप्त नहीं हैं। चाहे जितना हमारे ऊपर क्रुपा की वर्षा हो, हम खुश नहीं रहते, क्योंकि हम सोचते रहते हैं, उन चीजों के बारे में जो हम तक नहीं पहुँची।

कल्पना करो कि यदि तूम बैठकर के एक सूची उन चीजों की बनाओं, जो तूम

महसूस करते हो कि तुम्हें जीवन में क्रुपा के रूप में मिली हैं। तूम सूची की शूरुआत अपने नेत्रों से ही शुरू कर सकते हो। जैसा कि मैंने पहले कहा है, क्या तम जानते हो कि कितने लोग देखने की शक्ति से वंचित किये गये हैं? क्या तुम इसकी कल्पना भी कर सकते हो कि क्या होगा, जब तूम एक दिन उठो और महसूस करो कि तुम अंधे हो गये? तूम बिस्तर से भी उठ नहीं पाओगे और तम नित्यक्रिया के लिए भी नहीं जा पाओगे। हर कार्य जो तुम पहले किया करते थे वह सब कार्य अब बिना तुम्हारे कड़े प्रयास के नहीं होंगे।

ठीक है, यदि तूम उन चीजों की सूची को लिखना शुरू करो, जो तुम्हें जीवन में दी गई हैं, वह एक बहुत लम्बी सूची होगी। जब यह सूची समाप्त हो जाये, तब तुम उन चीजों की सूची बनाओ जो तूम सोचते हो, तुम्हें नहीं दी गई हैं। यह भी एक लम्बी सूची होगी, एक बहुत लम्बी सूची वास्तव में। यह सूची शायद बेन्ज कार से प्रारम्भ होगी और शायद लम्बी होने के कारण बेन्ज़ कार पर ही खत्म होगी। दोनों सूचियाँ अंतहीतन है। वास्तव में असीमित, यदि तुम सचमूच बिना किसी एक चीज को छोड़े हुए लिखो।

ठीक है, अब हमारे सामने दो सूचियाँ हैं। अब इसका निर्णय हमें लेना है कि उनमें से कौन सी सूची हम देखेंगे। क्या हम उन चीजों की सूची देखेंगे, जो हमें नहीं दी गई हैं और हमारे जीवन को सुस्त और मृत बनाती हैं, या हम उन चीजों की सूची देखेंगे, जो हमारे ऊपर कृपारूप में बरसाई गयी हैं और हम जिनका आनन्द ले रहे हैं और जो हमारे जवीन को खूबसूरत बना रही हैं। यह शुद्ध रूप से हमारा चयन होगा।

एक व्यक्ति जो हर चीज को, ये तो होना ही था के रूप में लेगा, वो दूसरी सूची को लोभ और असंतोष के साथ देखेगा। जब तुम लोभ से ग्रसित होते हो, तुम स्वतः ही केवल असंतुष्टि का अनुभव करते हो, क्योंकि तुम्हारे लोभ का कोई अंत नहीं है, इसलिए संतोष तुम्हें कभी हो ही नहीं सकता। किसी तरह से, यह व्यक्ति पूर्णतः जीवन के आनन्द से चूक जाता है जो पहली सूची में होता है।

जो कुछ भी उसे जीवन में प्राप्त होगा, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, उसे साधारण ही लगेगा और वह केवल अगली चीज के आने की प्रतीक्षा करता रहेगा और जब अगली चीज आयेगी, वह भी उसे साधारण लगेगी, क्योंकि वह पहले से ही अगली चीज के बारे में सोचता रहता है।

Section 7

जबकि, एक व्यक्ति जो हमेशा कृतज्ञता से भरा रहता है वो यह जानेगा भी नहीं कि कोई दूसरी सूची भी होती है। वह केवल कृतज्ञता की साँस हर क्षण लेना जानता है। जीवन एक शाश्वत उत्सव है उसके लिए। वह इतना भारहीन और आनन्द से पूर्ण होगा। वह एक देखने की चीज होगा। उसके अन्दर से ऐसी खूबसूरती निकलेगी, जो अपने आप में अनूठी होगी। वह यह जानता भी नहीं कि कोई दूसरी सूची भी है। वह उस भाषा को जानता ही नहीं। वह केवल हर चीज का आनन्द लेना जानता है, गहरे प्रेम और कृतज्ञता के साथ, बस इतना। मात्र हर समय कृतज्ञता से रहने से जीवन की हर तथाकथित सांसारिक चीज पवित्र कर आश्चर्यजनक बन सकती है। मैं तुम्हें बताता हूँ : तुम समझते हो कि जीवन सांसारिक हो गया है, केवल तुम्हारे चीजों को लेने के रवैये के कारण कि ये तो होना ही था। जीवन जिस तरह तुम सोचते हो सांसारिक नहीं है। हर छोटी चीज कितनी खूबसूरत है। तुम्हारा मन है जो सांसारिक है, तुम्हारा मन प्रवेश करके अस्तित्व के बहते हुए खूबसूरत तरीके को देखने नहीं देता।

तुम्हारा मन एक मृत स्वरूप बन गया है, जो निरंतर यही दोहराता रहता है, 'इसके बाद क्या'।

जब तुम चीजों को आश्चर्य से परिपूर्ण रवैये से, विस्मय से देखोगे, वह तुम्हें ऐसी परिपूर्णता और कृतज्ञता से भर देगा। क्योंकि तुम उस समय के बिन्दु पर कोई प्रश्‍न नहीं कर रहे होगे। तुम अपने मस्‍तिष्‍क को क्रियाशील नहीं होने दे रहे हो। तुम मात्र हृदय से सामंजस्य बैठा रहे हो। यह तब है, जब तुम एक बच्चे की तरह बन जाते हो, और जब तुम एक बच्चा बन जाते हो, कुछ भी सांसारिक नहीं होता, हर चीज आश्चर्यजनक होती है।

यही कारण है कि बच्चे देखने में इतने खूबसूरत लगते हैं। उनका मस्तिष्क मृत नहीं होता, उनका मस्तिष्क तरोताजा और बहता हुआ होता है। समाज ने अभी उनके मस्तिष्क पर दशाओं का और परिचित स्वरूपों का आरोपण नहीं किया होता।

हर चीज को कृतज्ञता और विस्मय से देखना सीखो। उदाहरण के लिए, अपना शरीर ही ले लो। अब इस छोटे से प्रयोग को करने का प्रयास करो। बैठ जाओ और अपने नेत्र बंद कर लो। बस यह देखने का प्रयास करो कि तुम्हारे दाहिने हाथ की छोटी उँगली छोटी सी दुर्घटना में कट गयी। कल्पना करो कि अब तुम्हारी छोटी उँगली अपने लम्बाई की तीन चौथाई ही बची है। तुम्हारे शरीर में और कोई कुरुपता नहीं है, जिसे तुम जानते हो। तुम्हारे पास एक परिपूर्ण शरीर है। अचानक, केवल तुम्हारी छोटी उँगली कट गयी।

त्म्हारी कैसी प्रतिक्रिया होगी? तुम्हारे लिए यह हजम करना बहुत कठिन होगा। हर छोटे कार्य के लिए, जब तुम अपना हाथ प्रयोग करते हो, उस छोटी उँगली का भी अपना इस्तेमाल होता है, क्या ऐसा नहीं है? क्या होगा तुम्हें? तुम हतोत्साहित भी हो सकते हो।

अब जरा सोचो, इस संसार में पता नहीं कितने लोग हैं, जाने कितनी शारीरिक कुरुपता लिए हुए हैं। कितने लोग ऐसे हैं, जिनकी पाँचों उँगलिया भी नहीं है। तुम्हारे सिर से, तुम्हारे अँगूठे तक, यदि एक भी कूरुपता होती, जीवन के कुछ पहलू का आनन्द लेने से तुम चूक जाते। मैं ठीक हूँ ना?

प्रतिदिन अपने कमरे में अकेले रहकर कुछ क्षण बिताने का प्रयास करो, जिसमें अपने शरीर के हर भाग को प्रेम से स्पर्श करो और उस भाग को धन्यवाद दो, जो तम्हें जीवन में विभिन्न चीजों का आनन्द लेने लायक बनाये हुए हैं।

क्या तुमने कभी इस रूप में अपने शरीर के बारे में सोचा है? कितना अधिक तुम अपने शरीर को भी हक रूप में लिए हुए हो कि इसे तो होना ही था? कितना अधिक तुम अपने शरीर का अपमान करते हो? हममें से कुछ तो अपने शरीर से घुणा करते हैं, क्योंकि वो पर्याप्त खूबसूरत नहीं है। मैं तुमसे बताता हूँ, यदि तुम इस अभ्यास को प्रतिदिन करो और उसके हर भाग के लिए गहरा प्रेम और क्रतज्ञता अनुभव करो, तूम ये देखोगे कि तुम्हारा संपूर्ण शरीर और चेहरा दमकेगा एकदम नये कांति से।

तुम्हारा शरीर, तुम्हारे मन के प्रति प्रतिक्रिया करता है। उसकी कभी अवहेलना न करो या उसे इस रूप में मत लो कि इसे तो होना ही था। आखिर में, यह केवल तुम्हारा शरीर है, जिससे कि तुम इतनी चीजों का आनन्द लेने लायक हो। तुम्हारे लिए भी आज यहाँ आकर के और मेरी बातों को बिना किसी प्रयास के सुनने के लिए, यह आवश्यक है कि तुम्हारे शरीर का हर भाग ठीक ढंग से कार्य करे, क्या ऐसा नहीं है?

एक छोटी कथा :

एक ईसाई परिवार में, एक लडकी खाने की मेज पर अपनी माँ के साथ बैठी थी।

मेज पर भोजन परोसा गया और उसने बिना प्रार्थना किये भोजन करना शुरू कर दिया।

उसकी माँ हतप्रभ थी और उससे पूछा कि वो कैसे कर सकती है।

लड़की ने जल्दी से जवाब दिया, "इस प्लेट में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए मैंने धन्यवाद अब से पहले एक बार भी न दिया हो।''

इसी तरह से लोग चीजों को, ये चीजें तो होनी ही थीं, के रूप में लेते हैं और यही मेरे कहने का अर्थ है, इस रवैये के बारे में। यह बात, छोटे बच्चों में किस तरह से जड़ पकड़ रही है, यह देखने में अत्यन्त दुखद है।

एक और छोटी कथा :

एक वयस्क लड़की ने अपनी माँ से पुछा, "माँ, क्रिसमस आने में अभी और कितने दिन बचे हैं?"

माँ ने पूछा, "तुम क्यों जानना चाहती हो?"

लड़की ने उत्तर दिया, "मैं बस ये सोच रही थी, क्या समय आ गया है, मेरे लिए अच्छी लड़की बनना शुरू करने का?"

यह है तरीका जिस तरह से हम बच्चों को व्यवहार करना और सोचना सिखाते हैं। हम उन्हें सिखाते हैं, किस तरीके से आदान-प्रदान करना चाहिए। हम उन्हें सिखाते हैं कि हर चीज और कुछ नहीं, बल्कि आदान-प्रदान है। हम उन्हें सहज होकर बहना नहीं सिखाते। हम उन्हें बिना लक्ष्य के जीना नहीं सिखाते। हम उनके लिए हर चीज लक्ष्य आधारित बना देते हैं। यह सारी चीजें पूरी तरह से एकदम मूर्खतापूर्ण हैं।

यह जो सारी चीजें जो उनके साथ पहले की जा चुकी हैं, तुम्हें पहले बहुत कडा परिश्रम करना पड़ेगा, इन चीजों के प्रभाव को हटाने के लिए। यह बात बहुत स्पष्टता से समझो : मैं ये सब जो कर रहा हूँ, यह वही प्रभाव है जिसको मैं हटा रहा हूँ, मैं निरंतर उसी प्रभाव को हटाने में लगा हूँ। कल्पना करो कि तुम्हारे साथ पहले का कितना अधिक प्रभाव है। पीढियों से, लोग अपने विचार पीढी दर पीढी देते चले आ रहे हैं और जो तुम्हारे में आरोपित हैं। मुझे सर्वप्रथम उनके प्रभाव को हटाना है और उसके पश्चात् तुम्हारे अन्दर उस स्थान का निर्माण करना है, जिससे तुम प्रफुल्लित हो सको।

जब मैं लोगों से बताता हूँ कि वो अपने अन्दर निरंतर कृतज्ञता का भाव रखें, वे आते हैं, और मुझसे बताते हैं, "स्वामी जी, आजकल मैं टैक्सी चालक को और अपने घर के नौकरों को भी धन्यवाद देता हूँ।" बहुत स्पष्ट रहो - जब कृतज्ञता तुम्हारा स्वरूप बन जायेगी, तब तुम्हें इन चीजों को बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मुझे एक बात बताओ, "जब तुम अपने किसी प्रियजन की मृत्यू पर दुःखी हो रहे होते हो, तो क्या तुम अपने दु:ख को दिखाने में परिवर्तित करते हो? क्या तुम उस दु:ख को परिवर्तित कर पाओगे? नहीं, वह इतनी गहरी भावना होती है कि वो तुम्हारे स्वरूप की स्थिति बन जाती है, क्या ऐसा नहीं है? तुम केवल उसे अनुभव कर सकते हो, उसे कभी बता नहीं सकते। क्या ऐसा नहीं हैं? हाँ या ना?

हाँ स्वामी जी.........

इसी तरह से, क्रतज्ञता भी जब तुम्हारा स्वरूप बन जाती है, तब बस वह तुम्हारा स्थिति बन जायेगी, तूम उसे कह भी नहीं सकते। निश्चित रूप से, धन्यवाद कहना ठीक है, सामाजिक कारणों से क्योंकि जब तक तुम उसको व्यक्त नहीं करोगे, तब तक वह दूसरे व्यक्ति के कानों तक पहुँचेगा नहीं।

लेकिन जो मैं तूम्हें बताने का प्रयास कर रहा हूँ यहाँ, वह यह है कि हमें मस्तिष्क की कृतज्ञता से स्वरूप की कृतज्ञता की तरफ बढना है। जिस कृतज्ञता की बात हम कर रहे हैं, तुम उसे कभी कह नहीं कर पाओगे, क्योंकि वो इतनी गहराई से प्रभावी रहती है।

लोग अक्सर मुझसे आकर कहते हैं, "स्वामी जी, हम लोग आपके प्रति इतना अधिक कृतज्ञत हैं, इसलिए क्योंकि हमारे जीवन में आपसे संबंधित होने के पश्चात् बहुत सी चीजें घटी हैं।"

मैं तुम्हें बताता हूँ : सामाजिक व्यवहार के कारण, तुम किसी को किसी चीज के लिए धन्यवाद दे सकते हो, क्रतज्ञता कोई ऐसी चीज नहीं है जो तूम किसी को दो। जब तम किसी के प्रति कोई चीज पाने के कारण कृतज्ञ होते हो, वह केवल मस्तिष्क कृतज्ञता होती है। यह कृतज्ञता की शैशव अवस्था होती है।

सच्ची कृतज़ता तुम्हारे अन्दर भरी हुई गहरी भावना होती है, जो किसी लाभ के कारण नहीं होती, बस अस्तित्व के विचार के कारण होती है, अस्तित्व की दयालू जीवन शक्ति के प्रति विचार के कारण करतज्ञता का भाव होता है, बस इतना। इस कृतज्ञता को किसी संबंध की आवश्यकता नहीं होती, यह किसी चीज या किसी व्यक्ति पर आश्रित नहीं होती, यह किसी भी रूप में किसी भावना से प्रभावित नहीं होती, जैसे तृष्णा, क्रोध, घुणा या प्रेम। वह मात्र होती है, बस इतना।

तुम अपने कृतज्ञता को शब्दों में व्यक्त करते हो, क्योंकि तुम अहंकारी हो और तुम यह चाहते कि लोग यह न सोचे कि तुम्हें व्यवहार करना नहीं आता। जिस क्षण तुम उसको व्यक्त करते हो, तुम उसे छोटा कर देते हो या झूठा कर देते हो। वास्तव में, तुम्हारे शरीर की भाषा ही तुम्हारे अन्दर की कृतज्ञता की स्थिति को प्रकट कर देगी। तुम्हारे नेत्र प्रकट कर सकते हैं, तुम्हारी मुस्कूराहट उसको प्रदर्शित कर सकती है, तुम्हारे अन्दर की गर्मजोशी उसको प्रकट कर सकती है, शब्दों की तुलना में बहुत बेहतर तरीके से। कृतज्ञता के आँसू उससे किसी भी अन्य चीज से बेहतर तरीके से व्यक्त करते हैं। जब तुम भाव से भरे हए होते हो आँसू अपने आप बह निकलते हैं।

मैं तुम्हें रोने के लिए नहीं कर रहा हूँ। मैं केवल तुमसे यह कह रहा हूँ कि जब

Section 8

तुम कृतज्ञता से भरे हुए रहते हो, तुम्हारा शरीर यह दिखा देगा, तूम उसे छुपा नहीं सकोगे और यही सच्चा संकेत है, तुम्हारे स्वरूप की स्थिति का। और याद रखो, यह आँसू किसी जाति, प्रजाति या धर्म के नहीं हैं। उन्हें श्रेणीबद्ध नहीं किया जा सकता कि ये हिन्दू के आँसू हैं, ये मुसलमान के आँसू हैं, ये आँसू

किसी धर्म के नहीं हैं। ये स्वरूप के आँसू हैं और स्वरूप इन सब चीजों से परे हैं। कृतज्ञता एक ऐसी चीज है, जो मनुष्य द्वारा निर्मित दशाओं और बाधाओं को खत्म कर सकती है। यही कारण है कि यह अंतिम प्रार्थना है।

कोई भी चीज जो बहुत गहराई तक व्याप्त है, उसे पूर्णरूपेण कहा नहीं जा सकता। कवि उसे व्यक्त करने के लिए कवितायें लिख सकते हैं, चित्रकार उसे व्यक्त करने के लिए चित्र बना सकते हैं, लेखक लेख लिखकर व्यक्त कर सकता है, लेकिन फिर भी एक भाग रह जायेगा, जो इनमें से किसी माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता। अस्तित्व को साधारण चीजों से व्यक्त नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि वह इतना रहस्यमयी और आकर्षक है। इसीलिए वह जब तुम्हारे साथ घटित होता है, इतना उत्तेजक होता है कि शब्द उसे व्यक्त नहीं कर पातें यही कारण है कि तुम केवल उसे अनुभव कर सकते हो, लेकिन व्यक्त नहीं कर सकते और इसीलिए तुम यहाँ मेरे पास बार-बार आते हो।

मेरे साथ तुम्हें अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि बिना तुम्हारे व्यक्त किये हुए भी मैं जान जाऊँगा। जब तुम्हारे अन्दर सच्ची कृतज्ञता व्याप्त होगी, मैं उसे तुमसे पहले जान जाऊँगा। मैं तुम्हारी हृदय गति को जानता हूँ। मैं तुम्हारी नेत्रों की दृष्टि की गहराई से उसे जानता हूँ। वास्तव में, जब तुम मेरे सामने व्यक्त करते हो तो हो सकता है अपने आप को छल रहे हो, क्योंकि ज्यादातर समय पर तुम सोचते और करते विरोधी तरीकों से हो। तुम अन्दर कुछ सोचते रहते हो, लेकिन बाहर कुछ और व्यक्त करते हो।

याद रखो : अस्‍तित्‍व जानता है कब एक व्‍यक्ति अन्‍दर से प्रस्‍फूटित हो रहा है। अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता को मात्र गहराई से अनुभव करो, इतना पर्याप्त है। तुम्हें उसे व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, बस वही हो जाओ, बस इतना। भारत में, स्वामियों के पाँव स्पर्श करने की प्रथा है। जब तुम स्वामी के प्रति कृतज्ञता से भरे हुए रहते हो, तुम्हारे पास व्यक्त करने का कोई मार्ग नहीं होता, तब तुम केवल उनके पाँव स्पर्श करते हो, उनसे एकीकरण अनुभव करते हो और अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हो।

बद्धत से लोग, बहुत सी जगहो से मेरे पास आते हैं। कुछ मेरे सामने आकर के खड़े हो जाते हैं और कुछ बोलते नहीं। बस उनके नेत्रों से अश्रु धारा बहती रहती है। वो कुछ कहने का दबाव नहीं अनुभव करते, क्योंकि जो उनके आँसू व्यक्त कर रहे हैं, वे उससे अधिक कूछ कह ही नहीं सकते। वे बस अपने स्वरूप से भाव व्यक्त कर रहे हैं।

जब तम स्वामी की उपस्थिति में होते हो, वहाँ रहो बस एक कृतज्ञता और प्रेम के गहरे भाव से, उनके निकट रहने मात्र के लिए कृतज्ञता के भाव के साथ। तुम ये पाओगे कि तुम्हारे सारे प्रश्न समाप्त हो गये और तूम बिना समय बीते एक विशेष आनन्द से भर जाते हो। जब तुम आसानी से भर जाओ, इसका अर्थ हुआ कि तुमने सही सूत्र पकड़ लिया। यदि तुम सरलता से नहीं भरते और वहाँ से असंतोष का भाव लेकर के निकलते हो, अनुत्तरित प्रश्नों के साथ, तूम चुक गए। स्वामी के साथ हमेशा गहरी सजगता के साथ रहो, तब तुम चुकोगे नहीं। जब तुम स्वामी के साथ कृतज्ञता के साथ रहोगे, स्वामी की ऊर्जा तुम्हारे स्वरूप में प्रवेश करेगी और तुम उनके अनुभव से भर जाओगे।

और जब तुम स्वामी के प्रति केवल कृतज्ञता का अनुभव करोगे, शारीरिक रूप से उसके निकट रहने की आवश्यकता धीरे-धीरे खत्म हो जायेगी। क्रतज्ञता, समय और दूरी को खत्म करने में तुम्हारी मदद करती है। यह तुम्हारा विस्तार करती है और सीमाओं को खत्म कर देती है। जब तुम्हारा विस्तार होगा, तो तुम हर चीज के साथ एकता महसूस करोगे। कुछ समय बाद, कृतज्ञता भी अव्यवस्था की तरह दिखेगी, मात्र शांति व्याप्त रहेगी।

मैं तुम्हें बताता हूँ : संबंधों में भी, यदि तुम यह महसूस करते हो कि कोई संबंध खत्म हो रहा है, बिना प्रेम खोये हुए, तुम बस इस दूसरे के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करो और अलग हो जाओ, बस इतना। अपने अन्दर मात्र कृतज्ञता का अनुभव करो कि उस व्यक्ति से जिससे तुम अलग हुए हो उससे बस इतने दिनों का ही संबंध था, और उतने समय तक तुमने आनन्द लिया और सीखा उससे अपने संबंध के कारण, उस विशेष काल में और अलग हो गये, तब यह भी खूबसूरत बन जाता है।

लोग मुझसे पूछते हैं, "स्वामी जी, अपने शत्रु के प्रति हम किस तरह से कृतज्ञता का अनुभव करें?''

मैं कहता हूँ, क्यों नहीं? तुम्हारा तथाकथित शत्रु ही तुम्हें मजबूत बनाने का जिम्मेदार है। वे तुम्हारे लिए चुनौती हैं, वे तुम्हें उन्नति कराते हैं। तुम्हें चोट देकर, वे तुम्हें जीवन का भिच्न पहलू दिखाते हैं, जिसका तुम्हें सामना करना पड़ता है। क्यों मैं उनके प्रति कृतज्ञता का अनुभव न करूँ?

आखिर में, तुम उन्नति ही करना चाहते हो, क्या ऐसा नहीं है? हर क्षण तुम

अधिक बुद्धिमान बनना चाहते हो, क्या ऐसा नहीं है? यदि इन लोगों ने तम्हारे लिए यह अवसर न पैदा किए होते, तो तम कहीं अपने मित्रों से घिरे हुए रह रहे होते, उससे तुम्हारी कोई मदद न होती। तुम्हें मजबूत बनने की आवश्यकता है। केवल तब तुम प्रस्फूटित होगे और केवल तब तुम्हारी ब्रृद्धिमत्ता खिल उठेगी। बीज को प्रस्फुटित होना ही है, वुक्ष को बढने के लिए। यदि बीज खुश है बीज के रूप में ही तो वह समय के साथ-साथ बस विघटित हो जायेगा और मृत हो

जायेगा, बस इतना। उसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा।

जब बात तथाकथित शत्रुता की आती है, एक साधारण आदमी उसे बदसूरत बना देगा। वह उसे ऐसे बिन्दु तक ले जायेगा, जहाँ हर चीज एक चकरघिची बन जाती है, जो घुणा से और घुणा की तरफ बढ़ती जती है। बहुत से परिवारों में, पारिवारिक झगड़े हैं। वह अत्यन्त बुरी स्थिति होती है, जिसका सामना करना अत्यन्त कठिन होता है। क्यों? यह तुम हो जिसने उसे इस रूप में बढ़ने दिया है। तुमने गहरी सजगता और बुद्धिमत्ता से क्रिया नहीं की। तुम परिपूर्णता के साथ क्रियाशील नहीं थे और तुमने उसे एक बदसूरत रूप में बढ़ने दिया।

यदि तुम परिपूर्णता के साथ क्रियाशील होते, तो तुम शत्रुता को बढ़ने देने के लिए कोई स्थान न बनने देते। क्या तुम समझ रहे हो, मैं क्या कह रहा हँ? जब तुम हर समय परिपूर्णता की स्थिति में होते हो, तुम इस तरह की चीजों के लिए कोई स्थान देख ही नहीं पाते। वह तुम्हारे लिए एक अज्ञात भाषा होती है। चाहे दूसरा व्यक्ति शत्रुता रखना ही चाहता है, तुम उसके प्रति कोई घूणा न महसूस करते। यदि वो संबंध खत्म करना चाहता है, तुम उसके प्रति कृतज्ञता के साथ संबंध खत्म कर लेते।

बहुत से परिवारों में, लोग एक-दुसरे को देखना भी पसन्द नहीं करते और वे वास्तव में सामाजिक स्थलों पर एक-दूसरे से कतराने की पीड़ा भी उठाते हैं। ये सब अनावश्यक चीजें क्यों? तुम अपनी ऊर्जा इस तरह की चीाजें में क्यों बर्बाद कर रहे हो? घुणा को अन्दर ही अन्दर आप को खत्म मत करने दो। उसे गहरी सजगता और बुद्धिमत्ता से देखो और घुणा ही समाप्त हो जायेगी। फिर उसके फलस्वरूप केवल प्रेम और कृतज्ञता बचेगी।

प्रश्‍न : स्वामी जी......आजकल मैं आपके प्रति केवल कृतज्ञता का अनुभव करता हूँ, और एक तरह से मैं आपसे कुछ चाहता भी नहीं। लेकिन विचित्र बात यह है कि मैं ये सोचता हूँ कि आप मेरा नाम याद रखें और जब तब मुझे मेरे नाम से बुलायें। क्या यह एक प्रकार का असंतोष है या कामना है मेरी तरफ से स्वामी जी ?

(स्वामी) जी हँसे!)

यह एक खूबसूरत चीज है, जिसको लेकर तुम आये हो। यह दर्शाती है कि तुमने अपने आप को बहुत गहराई तक विश्लेषित किया है। तुम देखो : जब तुम अपने मस्तिष्क के साथ ध्यान आकर्षण चाहोगे, ईर्ष्या और असंतोष के माध्यम से, वह अस्वस्थ बन जाता है। लेकिन जब तुम चाहते हो, उसे प्रेम और कृतज्ञता से, यह कामना नहीं होती, यह मात्र गहरा प्रेम है मेरे लिए, बस इतना।

जब तुम प्रार्थना करते हो कामना के साथ, वह बस कृतघ्नता होती है और तुम्हारे अहंकार का प्रभाव। लेकिन जब तुम माँगते हो गहरे प्रेम के साथ, वह प्रार्थना बन जाती है, समर्पण और कृतज्ञता से भरी हुई। दोनों में यह एक फर्क होता है।

तुम सजगता से हो, इसलिए इसे असंतोष नहीं कहा जायेगा या कामना करना नहीं कहा जायेगा। समय के साथ-साथ यह भी खत्म हो जायेगा और एक चीज : तुम्हारे अन्दर तो इतना साहस था कि तुमने यह प्रश्न किया। मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि बहुत से और इसी तरह से सोचते होंगे, लेकिन उन्होंने उसे कहा नहीं है। उन्होंने अपने आप को समझा दिया होगा, यह कहकर कि, "नाम में क्या रखा है", या वे आकर कहने में शर्म अनुभव करते होंगे। निश्चित रूप से, नाम में कुछ नहीं रखा है। लेकिन तुम्हें आवश्यकता है, उसके परे जाने की एक प्रायोगिक समझ के साथ, अपने आप को उससे अलग हटाकर नहीं। यह तथ्य कि तूम इस प्रश्न के साथ आये हो दर्शाता है कि तुम्हारे अन्दर वो साहस है, जिसके साथ तुम इसमें से गुजरना चाहते हो।

हाँ! क्या तुमने समझ लिया?

हाँ स्वामी जी...........

लोग मूझसे पूछते हैं, "स्वामी जी, हम बदले में आपके लिए क्या कर सकते हैं, आपके प्रति कृतज्ञता दिखाने के लिए?''

Section 9

मैं उनसे कहता हूँ, "जो सबसे अच्छी चीज बदले में तुम मेरे लिए कर सकते हो वह यह है कि तुम खिल उठो।" यही है जो सबसे अच्छा तुम मेरे लिए कर सकते हो और सबसे अच्छा जो मैं तुम्हारे लिए कर सकता हूँ, इस बात को समझो। जब तुम इन शब्दों को आत्मसात कर लोगे और कृतज्ञता को अपना स्वरूप बना लोगे तुमने बदले में मेरे लिए बहुत कुछ कर दिया।

लेकिन एक बात मैं तुम्हें बता सकता हूँ : यदि तुम महसूस करते हो कि बदले में तुम्हें कुछ करना ही है, तो समाज के लिए कोई कार्य करो, दूसरों की मदद करो। दसरों को जागने की मदद करो, जिससे वो उस चीज का आनन्द ले सके,

जिसको तुमने खोजा है। इसे अहंकार और श्रेष्ठता के कारण मत करना। इसे प्रेम बाँटने के लिए करना, बाँटने का आनन्द लेने के लिए करना। अपनी पूरी ऊर्जा इसे देना और उसको करने में आनन्द लेना। यह तम्हारे लिए एक आनन्ददायक साधना होगी और उनके लिए जाग्रति होगी।

हर बार जब तुम गहरी कृतज्ञता का अनुभव करोगे, तुम वास्तव में ध्यान में होगे। तो जरा कल्पना करो यदि तुम हमेशा कृतज्ञता में ही रहो। तब तुम हर समय ध्यान में ही होगे।

देखो ......एक बात : कृतज्ञता सिखायी नहीं जा सकती। निश्चित रूप से, कृतज्ञ होने का भाव बच्चों को बताया जा सकता है, जब वो बहुत छोटे होते हैं, जिससे कि वे उसके बारे में जान सकें। लेकिन और चीजों की तरह वह सामाजिक दशाये ही होती हैं, जिसे तुम्हें बड़ों का सम्मान करना सिखाया जाता है, जैसे तुम्हें स्कूल में अध्यापकों का सम्मान करना सिखाया जाता है और अन्य चीजें यह मात्र एक मानसिक तकनीक है, तुम्हारे अन्दर का वास्तविक भाव नहीं।

केवल तब जब तुम अस्तित्व से संबंध का अनुभव करना शुरू कर देते हो, सच्ची कृतज्ञता तुम्हारे अन्दर पैदा होगी। दूसरा कोई मार्ग नहीं है। जब कतज्ञता इस रूप में पैदा होती है, तो वह किसी विशेष चीज के प्रति नहीं होती, वह तो बस मात्र तुम्हारी खुश्बू होती है, बस इतना।

जब ऐसा होता है, तब तुम स्वतः ही जान जाते हो कि कुतज्ञता ही तुम्हारी प्रार्थना है। यह प्रार्थना ही केवल तुम्हें ऊपर उठायेगी। यह तुम्हें प्रेम और परिपूर्णता में उन्नति देती है। तुम अस्तित्व से तारतम्य स्थापित करने के रहस्य जान जाते हो। तुम हर समय गहराई से जुड़े हुए महसूस करना जान जाते हो। तुम बिना कारण के आनन्द लेना जान जाते हो। तुम यह जान जाते हो कि किस तरह से चीजों को जोड़ा जाता है, बजाए इसके कि उनको काटकर अलग किया जाये और विश्लेषण करके असंतुष्ट हुआ जाये।

और सर्वोपरि, तुम स्वामी से संबंध रखना जान जाओगे। सच्चा संबंध एक स्वामी से प्रारम्भ ही तब हो सकता है, केवल जब कृतज्ञता तुम्हारी प्रार्थना बन जाये। तब तक तुम केवल माँगते रहते हो, और जब तुम माँगते हो तुम चूक जाते हो। इस समय भी, बहुत स्पष्ट रहो : मैं तुम्हें कृतज्ञ होना नहीं सिखा रहा हूँ। मैं केवल तुम्हारे अन्दर एक स्थान निर्मित करने का प्रयास कर रहा हूँ, जहाँ तुम महसूस कर सको जो मैं कहा रहा हूँ, जहाँ ये तुम्हारा अपना अनुभव बन जायेगा। मेरे शब्दों के पीछे जो ऊर्जा है, वह तुम्हारे अन्दर उस स्थान का निर्माण कर सकती है, बस इतना।

जब भी तम्हें स्वतंत्रता दी जाती है, तम एक बेहतर व्यक्ति बनते हो और अपने विस्तार के लिए तैयार होते हो। जब तुम मनोवैज्ञानिक गुलामी के प्रभाव में रहते हो, तब तम्हें अन्वेषण करके अपने आंतरिक स्थान को खोज पाना कठिन हो जाता है।

मैं हमेशा तुम लोगों से कहता हूँ : मैं मुक्ति प्रदान करने वाला गूरु हूँ। मैं लोगों पर कार्य करते हुए उन्हें बहुत अधिक स्वतंत्रता देता हूँ। केवल तब उनके लिए अन्वेषण करके उभरना सरल होता है।

निश्चित रूप से, मैं अभिभावकों से यह नहीं कर रहा हूँ कि वो अपने बच्चों को पूरी स्वतंत्रता दे दें और बिना किसी प्रकार की दखलअंदाजी के उन्हें देखते रहे। मैं केवल यह कह रहा हूँ कि मनोवैज्ञानिक गुलामी से बचा जाये। बस उन सारी परिस्थितियों को पैदा किया जाये, जिससे वो उन्नति कर सकें। बचाव के आवश्यक कदम उठाये जायें, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन उन्हें खुद सत्य का अनुभव करने दिया जाये, बजाए इसके कि जबरदस्ती उनके गले के नीचे धकेला जाये। उन्हें उन्नति करने के लिए पर्याप्त स्थान दिया जाये और अपने आंतरिक आनन्द का अनुभव लेने लिया जाये।

कभी-कभी लोग मुझसे पूछते हैं, "स्वामी जी, ये कैसे हैं कि आप हर समय इतने आनन्दित दिखते हैं? "

क्योंकि स्वामी हर समय अस्तित्व के साथ तारतम्य में रहते हैं, जिसके कारण उनके अन्दर निरंतर गहरी कृतज्ञता बहती रहती है और इसीलिए वो हर समय उल्लसित स्थिति में दिखते हैं।

जब तुम मेरे प्रति कृतज्ञता का अनुभव करो पर किसी अन्य के प्रति नहीं, तब तुम पूरी चीज से चूक जाते हो। कृतज्ञता कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे तूम नियंत्रित तरीके से जब जिसकी तरफ चाहे घूमा दो। वह एक सुगन्ध है। जब तुम उसे धारण करोगे, वह अपने आप बस फैलेगी। यह कारण है कि एक स्वामी क्यों हमेशा आनन्दित दिखता है? एक स्वामी एक सुगन्ध की तरह होता है, जिसका तुम अनुभव और आनन्द उठा सकते हो। यही कारण है कि तूम बार-बार यहाँ खिंचे चले आते हो।

देखो, एक बात समझो : हर क्षण खूबसूरत है, यदि तुम उसे स्वीकार करने के लिए और देखने के लिए तैयार हो। ऐसा नहीं है कि केवल तब जब हम कोई उत्सव मनाते रहते हैं या कोई आयोजन अपनी सफलता पर या कोई उपलब्धि जो हमने हासिल की है हर एक क्षण खूबसूरत है।

क्योंकि अस्‍तित्‍व स्‍वच्‍छंदता के साथ और आनन्‍द के साथ बस बह रहा है और

meejer IešveeÙeW Gmekesâ leejlecÙe ceW nj #eCe Ieš jner nQ~ peye legce Ùen mecePe peeDeesies, legcnW keâesF& Ûeerpe keâYeer ieuele veneR ueiesieer~ leye legcnW Dee§eÙe& nesiee efkeâ ueesie nj meceÙe efkeâme yeele keâer efMekeâeÙele keâjles jnles nQ~

peye legce DeefmlelJe kesâ Øeefle ke=âle%elee keâe DevegYeJe keâjles nes, mebhetCe& DeefmlelJe ner legcnejs efueS Skeâ cebefoj yeve peelee nw~ leye legce Skeâ ØeeLe&veeceÙe meeOevee keâer ceve:efmLeefle ceW jnles nes, Ûeens peneB legce jnes~ legcnW efkeâmeer cebefoj ceW peekeâj kesâ ØeeLe&vee keâjves keâer Deewj DeefOekeâ DeeJeMÙekeâlee veneR jnleer, legce yeme mebhetCe& ceW meceeefnle nes peeles nes Deewj nj meceÙe hejceeveefvole jnles nes~

peye mebhetCe& DeefmlelJe legcnejs efueS Skeâ cebefoj yeve peelee nw, lees Ùes Je=#e, Ùes DeekeâeMe, Ùes he=LJeer nj Ûeerpe legcnejs efueS Skeâ yeve peeleer nQ~ peye legce Gmekesâ meeceves Pegkeâles nes, leye legce efkeâme Ûeerpe keâer keâecevee keâj mekeâles nes? yeme legce kesâJeue ke=âle%elee kesâ meeLe velecemlekeâ nesies Fme ienve DeefmlelJe keâe Yeeie nesves kesâ keâejCe, yeme Flevee~ peye Ùen nesiee, legce Je=#eeW mes mebyebefOele nesies, DeekeâeMe mes mebyebefOele nesies, he=LJeer mes mebyebefOele nesies Deewj nj DevÙe Ûeerpe mes mebyebefOele nesies~ leye legce yeÌ{esies mebÛeej mes, pees ceefmle<keâ keâer Yee<ee nw menYeeefielee keâer lejheâ, pees ùoÙe keâer Yee<ee nw~ leye legce Dehevee kesâvõ ceefmle<keâ mes nšekeâj ùoÙe ceW keâj oesies~

legceceW mes pees Fme yeej hej efJeÕeeme keâjles nQ efkeâ F&Õej legcnejer ØeeLe&veeDeeW keâe Gòej veneR oslee nw, Gvemes ceQ Skeâ yeele yeleelee ntB : efkeâ F&Õej Flevee ke=âheeueg nw efkeâ Jen legcnejer ØeeLe&veeDeeW keâes Devegòeefjle keâYeer veneR ÚesÌ[lee~

Ùen kegâÚ Fme lejn nw : peye Skeâ yeÛÛee, pees meoea Deewj pegkeâece mes heerefÌ[le jnlee nw Deewj Jen DeeFme›eâerce keâer efpeo keâjlee nw, lees keäÙee legce Gmes DeeFme›eâerce osles nes? veneR, legce Gmes veneR osles~

Deye Jen yeÛÛee legcnejs Øeefle ke=âleIvelee keâe DevegYeJe keâjlee nw, uesefkeâve legce peeveles nes efkeâ legce yeÛÛes kesâ efueS pees meyemes DeÛÚe nw, Jener keâj jns nes~ keäÙeeWefkeâ Jees veneR peevelee efkeâ efpeme Ûeerpe keâer Fme Jeòeâ Jees keâecevee keâj jne nw, Jen Gmekesâ efueS Gme Jeòeâ mener Ûeerpe veneR nw~

Fmeer lejn mes, Deheveer ienjer DeveefYe%elee kesâ keâejCe, legce veneR peeveles, legcnejs efueS meyemes DeÛÚe keäÙee nw Deewj F&Õej mes efJeefYeVe ÛeerpeeW keâer keâecevee keâjles jnles nes~ uesefkeâve Megæ oÙee kesâ heâuemJe™he, legcnejer ØeeLe&vee keâes Jen Oeerjs mes Skeâ efkeâveejs keâj oslee nw Deewj legcnW Jen Ûeerpe Øeoeve keâjlee nw, efpemekeâer JeemleJe ceW legcnW Gme Jeòeâ DeeJeMÙekeâlee nw Deewj legcnW yesnlej yegefæceòee keâer lejheâ "suelee nw, pees Gmekeâe legcnejs Øeefle Skeâ cee$e keâle&JÙe nw~ Ùeeo jKees : efpeleveer DeefOekeâ legcnejer Deebleefjkeâ yegefæceòee yeÌ{sieer, Gleveer keâce legce ØeeLe&vee keâjesies Deewj Gleveer ner keâce legce keâecevee keâjesies~ legce F&Õej mes keäÙee ceeBie mekeâles nes? efpeme #eCe legce ceeBieles nes, Fmekeâe DeLe& ngDee efkeâ legce Ùen meesÛeles nes efkeâ kegâÚ ÛeerpeW nQ, efpevnW F&Õej veneR peevelee~ Fmekeâe DeLe& ngDee efkeâ legce cenmetme keâjles nes efkeâ peye lekeâ legce yeleeDeesies veneR, F&Õej peeve veneR heeÙesiee~ Ùen megveves ceW efJeefÛe$e veneR ueielee, keäÙee Ssmee veneR nw? keäÙee Ssmeer keâesF& Ûeerpe nes mekeâleer nw, efpemes F&Õej ve peevelee nes?

Section 10

mecePees : F&Õej legcnW Jen oslee nw, efpemekeâer legcnW DeeJeMÙekeâlee nw, Jen veneR efpemekeâer legce keâecevee keâjles nes~ Ùeefo Jen legcnW Jen osvee Meg™ keâj os, efpemekeâer legce keâecevee keâjles nes, legce heerÌ[e mes Deewj DeefOekeâ heerÌ[e keâer lejheâ yeÌ{ peeDeesies~ peye legcnW F&Õej Jen oslee nw, efpemekeâer legcnW DeeJeMÙekeâlee nw, legce yegefæceòee mes Deewj DeefOekeâ yegefæceòee keâer lejheâ yeÌ{esies Deewj keâneR ve keâneR, Ùen keâecevee keâjvee meceehle nes peeÙesieer Deewj ke=âle%elee keâe GoÙe nesiee~

F&Õej legcnW Meefòeâ Deewj meenme oslee nw, efpemekeâer DeeJeMÙekeâlee legcnW mecemÙeeDeeW hej efJepeÙe Øeehle keâjves ceW nQ~

Jen legcnW Deheveer leLeekeâefLele mecemÙeeDeeW keâes meguePeeves kesâ efueS efJeJeskeâ oslee nw~ Jen legcnW leer#Ce yegefæceòee keâe yengcetuÙe ßeesle oslee nw, pees legcnW mece=efæ Øeoeve keâjleer nw~

Jen legcnW DevJes<eCe keâjves kesâ DeJemej Øeoeve keâjlee nw~

Jen legcnW Deheves Øesce Deewj Deheves efJeÛeej keâjves keâer #ecelee keâe DevJes<eCe keâjves kesâ DeJemej Øeoeve keâjlee nw~

Jen legcnW nj Ûeerpe oslee nw, efpemekeâer legcnW DeeJeMÙekeâlee nw, Ùen mecePeves keâer efkeâ pees kegâÚ Yeer legcnejs heeme nw, legcnW yeme Gmeer keâer DeeJeMÙekeâlee nw~

Jen legcnW nj Ûeerpe oslee nw, efpemekeâer legcnW DeeJeMÙekeâlee heefjhekeäJe nesves ceW nw Deewj efKeuekeâj kesâ megievOe hewâueeves ceW nw~

nceejs meyekesâ meeLe Skeâ cetue mecemÙee nw efkeâ nce Ùen lees efJeÕeeme keâjves kesâ efueS lewÙeej nQ efkeâ F&Õej kesâ heeme nceW kegâÚ Yeer osves keâer Meefòeâ nw, uesefkeâve nce Ùen efJeÕeeme keâjves kesâ efueS lewÙeej veneR nQ efkeâ Gmekesâ heeme Jen yegefæ Yeer nw, efpememes Jen Ùen efveCe&Ùe ues mekesâ efkeâ nceejs efueS DeÛÚe nw efkeâ veneR~ FmeefueS nce Ùen efJeÕeeme keâjles nQ efkeâ F&Õej kesâ heeme kesâJeue Meefòeâ nw, FmeefueS nce yejeyej ceeBieles jnles nQ~

nce ncesMee Ùen cenmetme keâjles nQ efkeâ kesâJeue nce peeveles nQ efkeâ nceejs efueS meyemes DeÛÚe keäÙee nw Deewj Gmeer kesâ efueS nce ØeeLe&vee keâjles nQ~ nce Deheveer yegefæceòee Deewj

ईश्वर की शक्ति का प्रयोग करना चाहते हैं, अपनी कामना की पूर्ति करने के लिए। हम उसे स्पष्ट रूप से बताते हैं : यह है जो मैं चाहता हूँ, चीजों को इस तरीके से होना है, अब आप कुपा करके मेरे लिए अपनी ताकत से इसको ऐसा कर दीजिये। हम अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर अपनी कामनायें बता देते हैं, अपनी प्रार्थना के रूप में।

हमारा यह रवैया है जो हमें जटिलता में डाल देता है। तुम्हें यह समझना होगा कि ईश्वर के पास केवल शक्ति ही नहीं है, अपितु वह बुद्धिमत्ता भी है, यह निर्णय लेने की कि तुम्हारे लिए अच्छा क्या है? जब तुम यह समझ जाओगे, तूम माँगना बंद कर दोगे।

तुम यह समझते हो कि सारा संसार तुम्हारी बुद्धिमत्ता के कारण चल रहा है। बहुत स्पष्ट रहो : संपूर्ण संसार तुम्हारी बुद्धिमत्ता के बगैर चल रहा है।

तुम आदान-प्रदान की अवधारणा के इतना अभ्यस्त हो चुके हो कि तुम्हारे लिए यह समझना अत्यन्त कठिन हो गया है कि ऐसा भी कोई हो सकता है, जो तुम्हारा सगा-संबंधी नहीं है और तुम्हारा ख्याल रख सकता है, बिना किसी कारण के, बदले में बिना किसी अपेक्षा के, तुम्हारे लिए यह विश्वास करना अत्यन्त कठिन हो जाता है।

मैं तुम्हें बताता हूँ : अस्तित्व तुम्हारा ख्याल उस तरह रखता है, जिस तरह कोई और नहीं। यह सत्य मैं तुम्हें बता सकता हूँ, लेकिन यह तुममें से हर एक के ऊपर है कि वह इस बात को अन्दर से महसूस करे, अपने अनुभव से। केवल तब यह उसका अपना स्वयं का ज्ञान होगा।

मैं हमेशा लोगों से बताता हूँ, ''मैं तुम्हें आध्यात्मिकता नहीं पढ़ा सकता, लेकिन तुम सीख सकते हो।'' मैं तुम्हें महान सत्य बता सकता हूँ, जिससे कि तुम कम से कम जानो, तो वो बातें जिन्हें तुम नहीं जानते। लेकिन उस सत्य को तुम अपनी समझ बनाओं यह तुम्हारे ऊपर है। मैं तुम्हें जितनी बार तुम चाहो सत्य सुनाने के लिए तैयार हूँ।

एक छोटी कथा :

एक बार जब शंकर परिव्राजक यात्रा पर थे - एक पैदल की तीर्थ यात्रा, अपने अनुयायियों के साथ, एक स्थान पर उन्हें तीव्र प्यास लगी। उन्होंने चारो तरफ देखा, लेकिन प्यास बुझाने के लिए उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया।

वहाँ केवल एक ताड़ का बाग था, जिसमें वो लोग देशी शराब बना रहे थे।

शंकर ने बाग में प्रवेश किया और वहाँ पर कार्यकर्ताओं से कहा कि प्यास ब्रझाने के लिए कुछ है। उन लोगों ने कहा कि उनके पास देशी शराब के अलावा कुछ नहीं है। शंकर ने देशी शराब ली और उसे पी लिया। अनयायियों ने देखा शंकर को पीते हुए। तुरन्त, वो सब भी देशी शराब माँगी और उसको पिया। देशी शराब ने शंकर के ऊपर कोई प्रभाव नहीं डाला, क्योंकि वो एक पराचेतन स्वरूप थे, जिनके पास असीमित जागरूकता थी। वह दृढ़ता से चलते रहे, लेकिन उनके अनुयायी उनके पीछे लड़खड़ा कर चल रहे थे। कुछ दिनों के पश्चात्, एक बार फिर जब वो प्यासे हुए, इस बार वो लोग एक रेगिस्तान के क्षेत्र में थे। उन्हें प्यास लगी और इस बार उन्होंने लोहा पिघलाने वाली एक भठ्ठी देखी। और कुछ उपलब्ध नहीं था। शंकर ने वहाँ कार्यकर्ताओं से पूछा कि पीने के लिए कुछ है। कार्यकर्ताओं ने कहा कि पीने के कुछ नहीं है। लेकिन शंकर ने पिघला हुआ लोहा देखा ओर उसी को माँगकर पी लिया। पिघले हुए लोहे को पीने के बाद शंकर अपने अनुयायियों के पास आये और उसे उनको भी पीने के लिए कहा।

अनूयायी बस हत्प्रभ थे।

शंकर ने बस यह समझाना चाहते थे कि वह वो करें, जो वह कहते थे न कि वह जो वे करते थे। देशी शराब ने उनके ऊपर कोई प्रभाव नहीं डाला, क्योंकि वह असीमित जागरूकता में स्थित थे। जब तक तुम इसका अनुभव नहीं कर लोगे, तूम नहीं जानोगे। इसलिए बाहर से तुम इसका प्रदर्शन नहीं कर सकते। इसे तुम्हारे हर एक के अन्दर से होना है, तब तुम जानोगे।

कितना अधिक निष्ठावान और जुड़े हुए, तुम इस सत्य से महसूस करना चाहते हो, यह तुम्हारा निर्णय है। मैं केवल उनकी मदद कर सकता हूँ, जो अपनी मदद करते हैं। मैं अपने हाथ बढ़ाकर के तुम्हें ऊपर उठा सकता हूँ, केवल यदि तुम अपना हाथ बढ़ाकर के मेरा हाथ पकड़ने के इच्छुक हो। यदि तुम सचमुच उठाये

Section 11

उसने राजा से यह अनुरोध किया कि उसे राजमहल में एक दिन रुकने जाने की इच्छा रखते हो, तूम कम से कम अपना हाथ बढ़ाकर मेरे हाथ में दोगे। अन्यथा मैं तुम्हें जहाँ हो वहीं रहने की स्वतंत्रता दुँगा, बस इतना। इसीलिए लोग की अनुमति दें। कहते हैं, "ईश्वर तुम्हें बंधन में रहने की स्वतंत्रता देता है।" राजा ने सहमति दी और वह बालक राजमहल में रुका। हममें से बहुत लोग सोचते हैं कि हमारी मदद उस तरीके से नहीं होती, जिस दूसरे दिन प्रातःकाल, बालक राजा के पास आया और न खत्म होने तरीके से ईश्वर द्वारा हमारी मदद की जानी चाहिए। मैं तुम्हें बताता हूँ, ईश्वर वाली शिकायतें करने लगा कि जो सुविधायें उसे दी गई थीं, उनमें तुम्हें बेहतर तरीके से जानता है अपेक्षाकृत कि तुम अपने आप को जितना कितनी कमियाँ थीं। जानते हो। तुम्हें यह समझना ही है, बस इतना। मात्र संदेह का परित्याग करो राजा ने उस लड़के को बाहर निकालने का आदेश दिया। यह कहते हुए और कुछ आस्था रखो, इतना पर्याप्त है। बाकी का ख्याल स्वतः ही रखा कि उसकी तरह के व्यक्ति के लिए राजमहल में एक दिन का रुकना जायेगा। बहुत था। एक छोटी कथा : बालक बहुत दु:खी हुआ और एक सूफी संत के पास जाकर उसने इस दो स्वर्ण मछलियाँ (Gold-fish) एक छोटे जलाशय में थीं। घटना को सुनाया। एक ने दूसरी से पूछा, "क्या तुम सचमूच ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास संत ने कुछ नहीं कहा। उसने बालक को बस अपना अनुयायी बनने के रखती हो?'' लिए कहा। द्रसरे ने उत्तर दिया "और कौन, तुम सोचती हो प्रतिदिन हमारा पानी कुछ महीनों के पश्चात्, संत ने बालक से बताया कि वह राजा से मिलने जा रहा है और वह भी उसके साथ चले। बदलता है?'' यदि तुम विश्वास करते हो कि तुम्हारी हर आवश्यकताओं का अस्तित्व ख्याल वे लोग राजा के पास गये और राजमहल में कुछ दिन रुकने की रखता है, तो तुम किसी भी तरह की चिंता से मूक्त होगे। लेकिन याद रखो, अनुमति माँगी। जैसो कि मैंने तुम्हें बताया है, तुम्हारी आवश्यकतायें भिज्ञ हैं, तुम्हारी कामनाओं राजा मान गया। से। तम्हारी आवश्यकतायें कम हैं, लेकिन तुम्हारी कामनायें बहुत हैं। तुम्हारी दूसरे दिन प्रातःकाल, राजा ने आकर के संत से पूछा कि उन्हें जो आवश्यकतायें स्वतः ही अस्तित्व द्वारा पूरी की जाती हैं। जब तुम्हारी कामनायें व्यवस्था की गई थी, उसमें वो आराम से थे? बढ़ती हैं, तुम अस्तित्व के प्रति अपनी आस्था खो देते हो, क्योंकि तुम उन्हें पूर्ण संत ने हृदय से राजा के प्रति कृतज्ञता प्रकट की, उस सुख-सुविधा के होता नहीं देखते। लिए जो राजा ने उन्हें दी थी। तुम देखो, साधारण रूप से मानना मात्र विश्वास करना है, बस इतना। दूसरी राजा बहुत खुश हुआ और उसने तुरन्त अपने लोगों को आदेश दिया तरफ आस्था का अर्थ विश्वास के साथ-साथ ऊर्जा के साथ क्रिया करना है। तूम कि संत की व्यवस्था पर और अधिक ध्यान दिया जाये। विश्वास के साथ शुरू कर सकते हो, लेकिन अंत तम्हें आस्था में करना है। संत ने बालक से बताया, "क्या तुम देख रहे हो, अब? यह है जीवन विश्वास में संदेह हो सकता है, लेकिन आस्था में कोई संदेह नहीं है, क्योंकि तूम का रहस्य। तुम कृतज्ञता का अनुभव करो और तुम्हारे ऊपर वर्षा इसका अनुभव कर चूके होगे। जब तुमने अपने लिए स्वयं कृतज्ञता के आश्चर्या होगी। '' को अनूभव किया है, तब तूम अधिक से अधिक सौभाग्य को अपने प्रति यह होता है, जब तुम अस्तित्व के प्रति कृतज्ञ होते हो, बजाए इसके उसमें आकर्षित करोगे। मैं इसकी घोषणा अपने अनुभव के आधार पर कर रहा हूँ। खामियाँ निकालने के, जो कुछ तम्हें दिया गया है। क्रतज्ञता का अनुभव करके, एक छोटी कथा : तुम एक सकारात्मक तरंगों का प्रसार करते हो, जो स्वतः ही तुम्हें वापस जितना एक बालक एक दिन एक राजा के महल में गया। तुम कल्पना करते हो उससे अधिक देती है।

इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम होंठों से लोगों की कूटिलतापूर्वक बड़ाई करो और अधिक पाने के लिए और उन्हें छलो। नहीं, जब तुम धन्यवाद की स्थिति में होते हो हर समय वाह्य जगत की चीजों से प्रभावित हुए बगैर, तुम्हारी कृतज्ञता तुममें से प्रसारित होगी। तब चीजें तुम्हारे लिए बस होना प्रारम्भ कर देंगी।

लोग मूझसे पुछते हैं, "स्वामी जी, हम लोगों के आस-पास इतनी अधिक पीडा है। ऐसा क्यों है?" मैं तुममें बताता हूँ, ये सब मूर्खतापूर्ण हैं। सर्वप्रथम, जैसा तुम समझ रहे हो, उस तरह की इतनी अधिक पीड़ा नहीं है। पीड़ा है ये ठीक है, लेकिन तुम्हारे मन द्वारा बढ़ा दी गयी है। यदि तुम ठीक तरीके से देखो, तम समझ जाओगे कि इन चीजों में तुम्हारा मन किस तरह से क्रियाशील होता है। यह एक तरह की सामान्य सामाजिक वार्तालाप हो गयी है कि सब चीजों को कितना बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाये। दूसरी, पीड़ा का कारण यह है, क्योंकि हमारे अन्दर से आस्था अदृश्य हो गयी है, बस इतना। हम अपने परोक्ष तरीकों से प्रभावित होकर के लोभी हो गये हैं।

देखो समझो : अस्तित्व इस संसार में घटनाओं को मात्र एक तारतम्य में व्यवस्थित करता है। सारी घटनायें इतने व्यवस्थित ढंग से संचालित हैं कि जितना अधिक तुम सजग रहोगे, उतना ही अधिक तुम इस बात को समझ पाओगे कि हर चीज कितनी व्यवस्थित है, जिसे तुम अव्यवस्थित रूप में देख रहे हो। तुम्हें इसे सजगता से देखने की आवश्यकता है और उसी के अनुरूप अपनी भूमिका निभानी है, जीवन तब बस एक संगीत की तरह बहेगा।

जब तुम इस व्यवस्था के प्रति संवेदनशील होगे, छोटी घटनाओं से लेकर बड़ी घटनाओं तक, तुम ये महसूस करोगे कि किस तरह से चीजों को पुनर्व्यवस्थित किया गया है और तुम्हारे साथ घटने दिया गया है और तुम उस पूरी प्रक्रिया में एक यंत्र मात्र हो। संयोग की शक्ति अपनी पूरी भव्यता के साथ अपने आप को तुम्हारे सामने खोलेगी। तब तुम्हें उसी संगीत के लय में बहनें की आवश्यकता है और उसका आनन्द लेना। ये तो केवल तब होता है, जब तुम उस बहाव का विरोध करते हो और उससे लडते हो, जब तूम प्रयास करके उसके विपरीत जाते हो, तब समस्या शुरू होती है।

एक छोटी कथा :

एक दिन, लोग दौड़ते हुए एक व्यक्ति के पास आये और उससे कहा कि उसकी पत्नी नदी में गिरकर बह गई।

व्यक्ति ने तुरन्त नदी की तरफ भागा, अपने कपड़े उतारे और नदी में कूद पड़ा और विपरीत धारा में तैरने लगा।

लोग चीखे, "तुम विपरीत धारा में क्यों तैर रहे हो? वो तो निश्चित रूप से धारा के साथ ही बही होगी।"

व्यक्ति चीखकर बोला, "केवल मैं अपनी पत्नी को जानता हूँ ......नदी में भी, वो धारा के विपरीत ही गयी होगी, उसके साथ नहीं।"

जब हम बहाव से लड़ते हैं, तब समस्या शुरू हो जाती है, क्योंकि उसका अर्थ होता है कि हमने अपने आप में अहंकार को पदार्पण करने दिया है, हमारे और अस्‍तित्‍व के बीच में और दूसरी तरफ, यदि हम अस्‍तित्‍व के बहाव को समझ जायें और उसके साथ चलें, हम कितना सहज होंगे, हमारे जीवन में जो कुछ भी हमारे मार्ग में आयेगा, हम उस हर चीज का सामना कर सकेंगे और हमारा विस्तार कृतज्ञता के साथ होगा।

जब तुम सहज होते हो, इसका अर्थ होता है कि तुम कोई भी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हो। मैं लोगों से हमेशा बताता हूँ : जिम्मेदारी, वो क्षमता है, जिससे सहजता से प्रतिक्रिया की जाती है। स्वामी संपूर्ण संसार के लिए जिम्मेदारी लेते हैं। कैसे? क्योंकि वो हर समय सहजता के साथ अस्तित्व के बहाव के साथ चलते हैं। वे जानते हैं कि यदि वो अस्तित्व के साथ बहेंगे, तो अस्तित्व उनके लिए चीजों को प्राकृतिक रूप में होने देगा।

यदि तुम हमारे आश्रम में आश्रमवासियों से बात करो, वे लोग तूमसे बतायेंगे मेरे साथ के अपने अनुभव को। उनके लिए यह बहुत कठिन होता है कि वो पहले से ये जान सकें कि क्या करना है और कैसे स्वामी जी के साथ चलना है, क्योंकि मैं हर समय अस्तित्व के साथ बहता रहता हूँ। समय के साथ-साथ सबसे पहले वह इस बात का त्याग करना सीखते हैं कि किस तरह से क्रियाशील होने के लिए पहले से पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है, धीरे-धीरे यह बात सीख लेते हैं कि हम हर समय तैयार रहें, किसी चीज के लिए, किसी भी समय। यह है तरीका जिस तरीके से चीजें आश्रम में होती हैं। चीजें किसी भी क्षण होती ग्री |

कोई भी बाहरी आश्चर्यचकित होगा यह सब देखकर कि किस तरह से व्यवस्थित ढंग से अफरा-तफरी आश्रम में मची रहती है। चाहे वह पूजा हो, चाहे कोई आयोजन, मैं उन लोगों से मात्र कुछ घण्टे पूर्व चीजों के बारे में बताता हूँ और चीजें पूरी हो जाती हैं। मैं उन्हें केवल कुछ घण्टे पूर्व ही बताता हूँ, क्योंकि मैं निरंतर अस्तित्व के साथ बहता रहता हूँ और किसी योजना या प्रारूप के साथ नहीं।

यदि हम अस्‍तित्‍व के साथ बहना सीख जायें, तब हम बिना किसी चिंता के जी

mekeâles nQ~ uesefkeâve efkeâmeer lejn mes, nce meye ves DeefmlelJe mes ueÌ[ves keâer keâuee ceW efvehegCelee neefmeue keâj ueer nw, FmeerefueS nce heerÌ[e heeles nQ~ Ùeefo legce DeefmlelJe kesâ meeLe yenves ceW Dehevee ueÙe mLeeefhele keâj uees Deehe Ùes heeÙeWies efkeâ Deehe nj #eCe osKes pee jns neW Deewj pees Yeer DeeJeMÙekeâlee Deehekeâes efpeme #eCe heÌ[leer nw Jees Deehekeâes oer pee jner nQ~

peye Deehe ueÙe mLeeefhele keâj uesles nse, leye Deehe Deheves meeLe DeefmlelJe keâer Tpee& Deewj Øemeej ueskeâj Ûeueles nes~ Deehe Ùen osKeves ceW me#ece neWies efkeâ ÛeerpeW efkeâme lejn mes hegveJÙe&JeefmLele nes jner nQ~ pees henues DeJÙeJeefmLele Deewj Gušs-meerOes lejerkesâ mes LeeR, Deehe Ùen osKeves ceW me#ece nesies efkeâ Deehekeâe mJeeiele ueesie Depeerye menpelee Deewj Glmeen mes keâjWies, Ûeens peneB Deehe peeÙeWies~

Section 12

ueesie Deehekeâes Deueie lejerkesâ mes osKeWies~ Jes DeeheceW Skeâ ve JÙeòeâ keâj heeves Jeeuee efKebÛeeJe DevegYeJe keâjWies~ Deehekeâe peerJeve Skeâ mebieerle yeve peeÙesiee, efpemes DeÂMÙe mebieerlekeâej yepee jns neWies, efpeme hej Deehe yeme ve=lÙe keâjesies~ peerJeve cee$e mebieerle Deewj ve=lÙe yeve peelee nw~ Jen Skeâ GlmeJe yeve peelee nw~

uesefkeâve yepeeS Fmekesâ efkeâ nce GlmeJe ceveeÙeW, nce nj meceÙe Keespeles jnles nQ, kegâÚ Deewj kesâ efueS, ÛecelkeâejeW keâes Keespeles ngS~ nce nj meceÙe osKeles jnles nQ efkeâ Ûecelkeâej nesles jnW Deewj DevegYeJe Ùen keâjvee Ûeenles nQ efkeâ Jes veneR nes jns nQ~

ceQ Deehemes yeleelee ntB : Ûecelkeâej keâYeer efkeâÙes veneR peeles, Jees yeme nesles jnles nQ, ueieeleej Deehekesâ Deeme-heeme nesles jnles nQ~ Ùes Deehekeâer henÛeeveves keâer #ecelee nw pees GvnW Ûecelkeâej yevee osleer nw~ DeefmlelJe kesâ meeLe Dehevee leejlecÙe yeveeves kesâ efueS legce ke=âle%elee keâe ØeÙeesie keâjes Deewj Deehe osKeWies, Fve ÛecelkeâejeW keâes pees nesles nQ~ ke=âle%elee Deehekeâe leejlecÙe ÛecelkeâejeW mes yew"e osieer~ Deehe Ùee lees Gvemes Deevevo ueWies Ùee Deehe Ûetkeâ peeÙeWies~ Ùen Deehekeâe ÛeÙeve nesiee~

peye Deehe Gvemes ÛetkeWâies, Deehe Demebleg° ner jn peeDeesies~ Ùen kegâÚ Ssmes nQ : Éej Keguee ngDee nw, uesefkeâve Deehe efvejblej KešKešeÙes pee jns nes~ ceQ Deehemes yeleelee ntB efkeâ pees meye kegâÚ keâer DeeJeMÙekeâlee Deehekeâes nw Jees henues mes ner nw, Deehekeâes kesâJeue Gmes mJeerkeâej keâjvee nw, uesefkeâve Deehe efJeÕeeme keâjves kesâ efueS ner lewÙeej veneR nw~ Deehe Deheves Deeme-heeme ÛeejeW lejheâ Iešves Jeeues ÛecelkeâejeW keâes veneR osKeles Deewj Gmekeâer Dehes#ee GvnW Keespeles efheâjles nes~

mecePees : heeveer keâes Mejeye yevee osvee Ûecelkeâej veneR nw~ ceveg<Ùe keâes F&Õej yevee osvee meÛÛee Ûecelkeâej nw~ ceneve peeotiej heer.meer. mejkeâej henues Jeeuee keâece keâj mekeâles nQ~ uesefkeâve yeeo Jeeuee keâece keâjves kesâ efueS yengle ienjer mecePe keâer DeeJeMÙekeâlee nw~

Skeâ Úesšer keâLee, pees jeceke=â<Ce Dekeämej megveeÙee keâjles Les :

oes YeeF& Skeâ meeLe jne keâjles Les~

yeÌ[s Jeeues YeeF& ves JÙeeheej keâjves keâe efveCe&Ùe efueÙee, peyeefkeâ Úesšs Jeeues YeeF& ves meeOeg yeveves keâe efveCe&Ùe efueÙee

kegâÚ Je<eeX yeeo, oesveeW Skeâ-otmejs mes efceueW~

GvneWves Deeheme ceW Skeâ-otmejs mes hetÚe efkeâ yeerles ngS Je<eeX ceW Gvekeâer keäÙee GheueefyOe jner?

yeÌ[s YeeF& ves Jee¢e peiele keâer pees JemlegÙeW, pees Gmeves Øeehle keâer LeeR Gmekeâer metÛeer os oer~ Gmeves Deheves JÙeJemeeÙe kesâ yeejs ceW Deewj pees Oeve mecheoe Skeâef$ele keâer Leer, Gmekesâ yeejs ceW yeleeÙee~ Gmekesâ yeeo Gmeves Deheves Úesšs YeeF& mes hetÚe efkeâ Gmeves keäÙee Deefpe&le efkeâÙee?

Úesše YeeF& yeme Gmekeâes Skeâ veoer kesâ efkeâveejs ues ieÙee Deewj Gmes hewoue ner Gme veoer keâes DeyeeefOele ieefle mes heej keâj ieÙee, efheâj ieewjJe kesâ meeLe Iees<eCee keâer efkeâ, ''Ùen nw pees ceQves Deefpe&le efkeâÙee~''

yeÌ[s YeeF& ves Skeâ veeJe efkeâjeÙes hej keâer Deewj Gmeer veeJe mes veoer keâer otmejer lejheâ Ûeuee ieÙee Deewj keâne, ''keäÙee? Ùener Deefpe&le efkeâÙee, efpemekeâer keâercele oes hewmes nQ, Ùener nw pees Deeheves Fleves Je<eeX ceW Deefpe&le efkeâÙee~''

ueesie meesÛeles nQ, Ùeefo Jees Jee¢e peiele ceW Ûecelkeâej keâj mekeWâ, lees Jes DeeOÙeeeflcekeâ yeve peeÙeWies Deewj MeefòeâMeeueer yeve peeÙeWies~ veneR, mecePees : DeeOÙeeeflcekeâlee Jee¢e peiele keâe keâesF& ÛecelkeâejeW keâe Kesue veneR nw~ Ùen Skeâ Devlej peiele keâe Kesue nw - efpemeceW Deehekesâ JÙeefòeâlJe keâes Deehekesâ mJe™he ceW heefjJeefle&le efkeâÙee peelee nw - pees meyemes ceneve Ûecelkeâej nw~ JÙeefòeâlJe keâes mJe™he ceW heefjJeefle&le keâjvee meyemes ceneve Ûecelkeâej nw~

ueesie meceÙe-meceÙe hej cegPemes Ûecelkeâej keâjves kesâ efueS keânles nQ~ ceQ Gvemes yeleelee ntB efkeâ leLeekeâefLele Ûecelkeâej cesjer efmLeefle keâe cetuÙeebkeâve keâjves keâe ceehe veneR nw~ uesefkeâve Jees cegPes megvevee veneR Ûeenles Deewj Ùeefo ceQ ØeoMe&ve kesâ efueS meeOeejCe lekeâveerkeâ pewmes Yeeweflekeâ ÛeerpeeW keâes heefjJeefle&le keâjvee FlÙeeefo keâ™B, pewmes efkeâ Skeâ-oes ÛeerpeW ceQ keâjlee ntB, lees ueesie cesjs heeme Fme Ûecelkeâej keâes osKeves kesâ efueS DeeÙeWies, ve efkeâ heefjJele&ve kesâ efueS~ cesjer efÛeblee Ùen nw~

Skeâ efove, cesjs kegâÚ YeòeâeW kesâ oyeeJehetCe& Dee«en kesâ keâejCe ceQves ceeB ue#ceer keâer cetefle& DeÂMÙe ™he mes ceBieeÙeer Deewj Gve ueesieeW keâes os efoÙee~ ceQves GvnW mecePeeÙee efkeâ Ùen Ûecelkeâej veneR nw~ yeme keäÙeeWefkeâ Deehe Fmekesâ keâejCe Deewj ØeYeeJe kesâ mebyebOe keâes, pees आप देख और समझ नहीं पाते, आप यह सोचते हैं कि यह चमत्कार है। वास्तव में, जो होता है, वह यह है कि अदृश्य रूप से मँगाने की क्रिया (Teleporting) होती है। उसी तरह से जैसे टेलीफोन पर आवाज विद्यूत तरंगों में परिवर्तित हो जाती है और पूनः आवाज की तरंगों में परिवर्तित हो जाती है दूसरी तरफ, मैंने उसी तरह से पदार्थ को ऊर्जा में परिवर्तित किया और हवा के माध्यम से मँगाया और पुनः उसे पदार्थ में परिवर्तित किया, बस इतना। इसमें कोई चमत्कार नहीं है।

जब आपकी बुद्धिमत्ता बढ़ेंगी, आप अपने दिन-प्रतिदिन की क्रियाओं को प्रयासरहित और शांतिपूर्ण ढंग से नियंत्रित करोगे। उदाहरण के लिये जैसे यदि आप प्रबन्धक हैं तो आपके सामने बहुत सी जिम्मेदारियाँ हैं। क्या ऐसा नहीं है? आप लोगों को पारिश्रमिक पर बूलाते हो, उनके कार्य की देखभाल करते हो, उनकी तनख्वाह निश्चित करते हो इत्यादि। क्या आप इन सब चीजों को बिना तनाव के कर लेते हो? बुद्धिमत्ता के साथ आप इन सब चीजों को बिना तनाव के कर सकोगे। आप शांति में स्थिति होगे। तुम्हें जिस तरह की आवश्यकता है, वह बुद्धिमत्ता है न कि शक्ति। यह याद रखना।

जब आप समझ जायेंगे और अनुभव कर लेंगे कि अस्तित्व आपका ख्याल रख रहा है, आप परिवर्तित हो जायेंगे, जो मुक्त होगा, इस तरह के सारे भ्रमों से। हम हमेशा अपनी आस्था लोगों में रखते हैं, ज्योतिषियों में रखते हैं, भविष्यवक्ताओं में रखते हैं, ग्रहों और नक्षत्रों में रखते हैं और जाने किन-किन चीजों में रखते हैं, अस्तित्व में नहीं रखते, जो कि आधार श्रोत है, इस पूरे ब्रह्माण्ड का।

भारत में, एक मजेदार प्रथा है, जिसमें लोग अपना भविष्य तोते से पूछते हैं। सड़क के किनारे पटरी पर अक्सर एक पिजड़े में एक तोता लिए उसका मालिक बैठा रहता है।

जो लोग उधर जाते हैं, वो रुककर के तोते के मालिक को कुछ पैसा देते हैं और फिर विश्वासपूर्वक अपना भविष्य पूछते हैं।

मालिक पिंजडे का दरवाजा खोल देता है और तोते को निर्देशित करता है कि वो निकलकर एक करीने से लगे हुए कागजों में से एक कागज उठाये।

तोता पिजड़े से बाहर आयेगा, अपनी चोंच से एक कागज उठायेगा और मालिक की तरफ बढ़ा देगा।

मालिक तब उस कागज पर जो लिखा है, उसे पढ़कर सूनायेगा। यही भविष्यवाणी होगी उस व्यक्ति के भविष्य के बारे में।

एक आदमी जिसके पास छः इन्द्रियाँ हैं वो चार इंद्रियों के तोते से अपना भविष्य बताने के लिए कहता है। ये कैसे संभव है? मैं आपसे बताता हूँ : बस इन सारी मूर्खतापूर्ण चीजों को छोड़ दो और लयबद्ध होना प्रारम्भ करें, मूख्य सूत्र को पकड़े जो कृतज्ञता और अस्तित्व के साथ तारतम्य बनाकर आगे बढ़ें।

जब आप स्वामियों को ध्यान से देखेंगे, वे कितने सुशोभित, चमत्कारित और दैवीय लगते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वो अस्तित्व के साथ तारतम्य में चलते हैं। लेकिन आप उनकी स्थिति को नहीं समझते, आप उनका केवल स्तर देखते हों। जब आप उनकी स्थिति को समझ जायेंगे, आप समझ जायेंगे कि वो बस अस्‍तित्‍व के साथ समाहित हैं और यही कारण है वो हर समय इतना आनन्दित लगते हैं। यही वो स्थिति है, जिसे आपको कोशिश करके प्राप्त करना है।

इसकी जगह पर हम कहते हैं? "अरे वो तो स्वामी हैं, वो तो हमेशा आनन्दित रहते हैं। वो किसी समस्या को कैसे जानेंगे? यहाँ मैं रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहा हूँ और वो कह रहे हैं कि तुम हमेशा कृतज्ञता के साथ रहो।''

मैं आपसे बताता हँ : आप स्वामी के पैरों के पास गुलाब की पंखुडियाँ ही देखते हो, आप केवल उनका स्तर देखते हो और यह सोचते हो कि वह आपकी दिन-प्रतिदिन की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं जानता। याद रखो : जो सम्मान उन्हें मिलता हैं, वह उनकी स्थिति को मिलता हैं, उनके स्तर को नहीं। आपको इस बात का कोई ज्ञान नहीं है कि इस स्थिति को प्राप्त करने के पीछे कितना संघर्ष किया गया।

आप रोजी-रोटी के लिए संघर्ष की बात करते हैं। मैं आपसे बताता हूँ अपने अनुभव से : भ्रमण के दौरान कई दिनों तक, मैं बिना भोजन के रहा। निश्चित रूप से, मैंने उस वक्त अस्तित्व के प्रति उन्हें एक कमी के रूप में नहीं सोचा। मैं इतने जोश के साथ सत्य की खोज में लगा हुआ था कि हर चीज मेरे लिए साधना बन गयी थी। बिना भोजन के रहना भी।

Section 13

आप जानते हों, दान करने वाले कुछ घरों को छोड़कर, उत्तर भारत में जहाँ सन्यासियों को महान सम्मान दिया जाता है, सन्यासियों से लोग बचते हैं। उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। आप सोचते हो कि वो आपकी सम्पत्ति चुराने आया है। मैं आपसे बताता हूँ : उन्हें दूर मत करिये। उन्हें एक पात्र में थोड़ा चावल क्यों नहीं दे देते? उतना उनके लिए पर्याप्त है। जब किसी को देने की बात आये, तब कंजूसी से कार्य मत करिये। याद रखो : यदि आप दानी बनने के लिए इच्छुक नहीं हो, तब आप महादानी बन जाओगे, जब अपनी सारी सम्पत्ति छोडकर मर जाना पड़ेगा।

किसी तरह से, कृपया समझो मैं केवल अपने अनुभव से बोल रहा हूँ। बड़ी से बड़ी समस्या और संघर्ष में भी यदि तुम न विचलित होने वाली आस्था और क्रतज्ञता के साथ क्रियाशील रहो और अपनी आंतरिक ब्रद्धिमत्ता का प्रयोग करते हुए आगे बढ़ो, आप देखेंगे कि आप सफल होकर उभरेंगे महा-कृतज्ञता और बुद्धिमत्ता के साथ।

चाहे आप कोई बहुत कीमती चीज ही क्यों न खो दो, मात्र इसी बात के लिए कृतज्ञ रहे कि आपने कुछ समय के लिए ही उसका आनन्द उठाया है, बस इतना। जब आपके अन्दर शुद्ध कृतज्ञता आ जायेगी, तब आप किसी खोने वाली चीज पर दू:खी नहीं होंगे। आप बस उसका आनन्द उठायेंगे, जब तक कि वह चीज होगी और कृतज्ञता का अनुभव तब भी करेंगे, जब वह चली गयी रहेगी। एक छोटी कथा :

एक राजा वेष बदलकर अपने ही राज्य में रात्रि में घूमने निकलता था। हर रात्रि में, वह एक स्वामी को एक वुक्ष के नीचे आनन्द की स्थिति में बैठा देखता था, जबकि सारा शहर सोता था।

उसने स्वामी के प्रति गहरा सम्मान महसूस किया और अनुरोध किया कि वो उसके साथ एक दिन महल में रहे।

स्वामी ने कहा, "ठीक है, मैं आज ही आऊँगा, कल का निश्चित नहीं है। "

राजा चौंका, स्वामी के अचानक स्वीकारक करने पर लेकिन फिर भी उसे महल में ले आये।

महल के अन्दर राजा ने स्वामी को सबसे अच्छा कमरा दिया और सबसे अच्छा भोजन।

स्वामी ने हर चीज का अधिक से अधिक आनन्द लिया।

राजा स्वामी को बड़े ध्यान से हर सांसारिक चीज और सूख-सूविधाओं का आनन्द लेते हुए देख रहा था। उसे यह विश्वास नहीं हो रहा था कि एक सच्चा संयासी इस तरह से आनन्द लेगा।

स्वामी के प्रति उसका सम्मान दिन-प्रतिदिन कम हो रहा था, वह छला हुआ महसूस कर रहा था।

अंत में एक दिन, स्वामी ने उससे कहा, "कोई चीज आपको परेशान करती दिखती है, आप उसे बताते क्यों नहीं?''

राजा ने कहा, "हाँ, मैं आपमें और मुझमें फर्क नहीं समझ रहा हूँ। जब

मैं आपको मेरी ही तरह इन सब चीज का आनन्द लेते हुए देखता हूँ।'' स्वामी मुस्कुराये और बोले, "ठीक है, चलो हम टहलने चलते हैं।" राजा तैयार हो गया और वो दोनों टहलने निकले। वे बहुत देर तक शांति के साथ टहलते रहे।

तब वे एक नदी के निकट पहुँचे, जो राजा के महल की सीमा थी। स्वामी ने कहा, "ठीक है, मेरा रुकने का समय समाप्त हुआ। मैं जा रहा हूँ, आपका राज्य छोड़कर, क्या आप आ रहे हो?''

राजा ने कहा, "मैं कैसे आ सकता हूँ? मेरे पास मेरा राज्य है, मेरे लोग हैं और बहुत सी चीजें हैं, करने के लिए।"

स्वामी मूस्कूराये और बोले, ''अब क्या आपको आपके प्रश्‍न का उत्तर मिल गया?''

राजा को स्वामी के शब्दों से मात्र झटका लगा।

स्वामी जानते हैं कि हर चीज अस्तित्व की है। यही करण है वो हर क्षण पूर्णता से जीते हैं, उसका पूरा आनन्द लेते हुए। हर क्षण पूर्णता से जिया जाता है। वो किसी भी चीज को खोने से कभी नहीं डरते, क्योंकि आपका है क्या खोने के लिए?

हमेशा याद रखो : हर चीज अस्तित्व की है, आप केवल एक अस्थायी धारक हो बस इससे अधिक और कुछ नहीं। हमेशा कृतज्ञता का अनुभव करो, चाहे आपके पास बहुत सी चीजें हों या न हों।

जीवन को मुक्त करने का यह तरीका है। तुम प्रचण्ड स्वतंत्रता का अनुभव कर सकते हो, जब आप इस एक बात को समझ जायेंगे।

एक और छोटी खूबसूरत कथा :

विश्व के सारे वैज्ञानिकों सब ने मिलकर के एक गोष्ठी की और ईश्वर से प्रतियोगिता की।

जो कुछ भी ईश्वर ने बनाया था, वैज्ञानिकों ने भी एकदम उसी तरह का बना दिया, किसी पदार्थ से। वैज्ञानिक बना सकने में सक्षम हुए बिना किसी समस्या के।

अंत में, ईश्वर ने मिट्टी से आदमी बना दिया और वैज्ञानिकों को चुनौती दी।

वैज्ञानिकों ने मिट्टी उठाई..........

F&Õej ves keâne, ''®keâes! cesjer efceóer mes cele yeveeDees, Deheveer efceóer mes yeveeDees~''

ceveg<Ùe keâes mecePevee ner nw efkeâ DeefmlelJe ner efvecee&lee nw, Jener efveefce&le nw, Jener efvecee&Ce nw~ kesâJeue leye Jen ÛeerpeeW keâe Deevevo ues heeÙesiee efyevee efkeâmeer efÛeblee kesâ~ kesâJeue leye Jen Deheves mJeeefcelJe Deewj keâefle&lJeeefYeceeve keâe lÙeeie keâj heeÙesiee~

FmeefueS mecePees : peye Deehe Demeblees<e, efÛeblee Deewj nleeslmeen mes Deheves jJewÙes keâes Jele&ceeve ke=âle%elee kesâ Øeefle heefjJeefle&le keâjles neW, Deehe mJele: ner Skeâef$ele keâjves ceW me#ece neWies, DeefmlelJe keâer Tpee& yesnlej ™he ceW~ Deehe DeefmlelJe keâer mejenvee yesnlej lejerkesâ mes keâj mekeâesies Deewj leye ke=âle%elee ner Deehekeâe jJewÙee yeve peeÙeWieer~

Skeâ Úesšer keâLee :

Skeâ JÙeefòeâ Deheveer helveer kesâ efueS meefypeÙeeB uesves yeepeej ieÙee~ Gmeves efYebef[ÙeeB KejeroeR Deewj Jeeheme Deekeâj Deheveer helveer keâes efoKeeÙee~

Gmekeâer helveer ves efYebef[ÙeeW keâes osKee Deewj keâne, ''Dejs! Ùes keâÌ[er efYeb[er ueeÙes nes, ceQ FvnW hekeâe veneR heeTBieer~''

Jen JÙeefòeâ otmejs efove efheâj yeepeej ieÙee Deewj efheâj kegâÚ Deewj efYebef[ÙeeB ueeÙee, Fme yeej yengle OÙeeve mes Ûegvekeâj kesâ ueeÙes Deewj ues peekeâj kesâ Deheveer helveer keâes efoKeeÙee~

helveer ves keâne, ''Ùes keäÙee ues DeeÙes? Ùes yengle cegueeÙece nQ, Gme JÙebpeve kesâ efueS pees ceQ yeveevee Ûeenleer Leer~''

Deieues efove Jen JÙeefòeâ efheâj yeepeej ieÙee Deewj Gmeves ogkeâeveoej mes ØeeLe&vee keâer Deewj keâne, ''ke=âheÙee cegPes kegâÚ DeÛÚer efYebef[bÙeeB oerefpeS, pees ve lees yengle keâÌ[er neW Deewj ve yengle cegueeÙece~''

ogkeâeveoej ves Deheves Deehe DeÛÚer-DeÛÚer efYebef[bÙeeB Ûegvekeâj kesâ oeR Deewj Gmes ueskeâj Deheveer helveer kesâ heeme ieÙee~

helveer ves GvnW osKee Deewj keâne, ''keäÙee? Deehe Deepe efheâj mes efYeb[er G"e ueeÙes~''

nceceW mes yengleeW ceW mejenvee keâjvee menpelee mes veneR Deeleer~ peye nce menpelee mes mejenvee veneR keâj mekeâles, Fmekeâe DeLe& nw, nceejs Devoj Demeblees<e Je efMekeâeÙele Yejer ngF& nw~ JeemleJe ceW, Demeblees<e ner Yeespeve nw, ceve keâe~

Demebleg° jnvee Jewmes ner nw, pewmes Keeves kesâ efueS ceve keâes Yeespeve osvee~ ceve keâe Gmeer hej hees<eCe nesiee Deewj Jen Gmeer ceW JÙemle jnsiee~ keäÙee neslee nw, peye nce yengle mebleg° jnles nesles nQ? ceve YetKeeW cejves ueielee nw~ Gmes metPe ner veneR heelee efkeâ Jees keâjW keäÙee? FmeefueS Jees Deheves Yeespeve keâer Keespe keâjves ueielee nw~

Skeâ ceefnuee petles keâer ogkeâeve ceW ieÙeer~

Gmeves Deheves hewj keâer veehe kesâ petles ceeBies Deewj ogkeâeveoej ves OewÙe&hetJe&keâ keâF& peesÌ[er petles efoKeeÙes~

Gme ceefnuee ves Skeâ kesâ yeeo Skeâ keâF& petleeW keâe hejer#eCe efkeâÙee ceiej "erkeâ mes keâesF& efheâš veneR yew" jne Lee~

DeeefKej ceW ogkeâeve ves Gme ceefnuee keâes Skeâ Deewj peesÌ[er petlee efoKeeÙee Deewj keâne, Fme hej ØeÙeeme keâjW~

ceefnuee ves Gmes henvekeâj keâne, ''Ùes lees yengle "erkeâ nw, ceQ meesÛe jner ntB, keäÙee Ùener cesjer ceehe nw?''

(nBmeer!)

Ùeefo Deehe ÂÌ{ nes efkeâ Deehekeâes mebleg° nesvee ner veneR nw, leye Deehekeâer ceoo keâesF& veneR keâj mekeâlee~ Ùen Deehekesâ ceve keâer efmLeefle nesleer nw Deewj kesâJeue Jener Deehekeâer ceoo keâj mekeâleer nw~ nceceW mes yengle Demeblees<e kesâ yeejs ceW DevegYeJe keâjkesâ Deewj yeele keâjkesâ LeesÌ[e Deejece cenmetme keâjles nQ, keäÙeeWefkeâ kegâÚ ve kegâÚ lees yeele keâjves kesâ efueS neslee nw Deewj nceeje ceve Gmeer ceW efuehle jnlee nw~

ncesMee meblees<e keâe DevegYeJe keâjvee Gmeer lejn nw, pewmes ceve keâe heefjlÙeeie keâj osvee~ Ùen Yeer Skeâ keâejCe nw pees nce oeJee lees keâjles nQ efkeâ nce ncesMee kesâ efueS mebleg° nesvee Ûeenles nQ, uesefkeâve peye Jees neslee nw lees nce Gmekesâ efueS lewÙeej veneR nesles~ nceeje ceve kegâefšuelee mes ef›eâÙeeMeerue neslee nw, keäÙeeWefkeâ Gmes kegâÚ ve kegâÚ ÛeeefnS Deenej kesâ leewj hej~

nce yengle megjef#ele cenmetme keâjles nQ, peye nce ef#eeflepe kesâ heerÚs Yeeieles nQ~ ef#eeflepe Skeâ heefjkeâefuhele jsKee nw, uesefkeâve nce Gmekesâ heerÚs Yeeiekeâj megjef#ele cenmetme keâjles nQ, keäÙeeWefkeâ keâesF& Ûeerpe nesleer ner veneR, efpemekesâ heerÚs Yeeiee peeÙes~ ceve keâes lees meoe ef›eâÙeeMeerue jnvee ner efmeKeeÙee ieÙee nw~

Section 14

peye Deehe Fme lejn kesâ neWies, Deehe JeemleJe ceW Deheves Deehe keâes cetKe& yevee jns neWies~ Deehe Deheves efueS Deelce efJejesOeer heefjCeeceeW keâe efvecee&Ce keâj jns neWies~ GoenjCe kesâ efueS, Deehe Deheves ùoÙe kesâ Skeâ keâesves ceW mebleg° jnvee Ûeenles neW, uesefkeâve Deehe ncesMee Deheves Deehe keâes Yeüefcele keâjles jnles neW, meblegef° keâes ueskeâj~ efvejblej efMekeâeÙele keâjles ngS Fme yeele keâe efkeâ pees Deehekeâes efoÙee ieÙee nQ, Gmes Deehe osKevee veneR Ûeenles~ Deehekeâes ÛeeefnS kegâÚ Deewj uesefkeâve ueeles nes kegâÚ Deewj Deheves efueS Deewj Deehe इसी में आराम महसूस करते हैं कि निरंतर प्रयासरत हो संतूष्टि की प्राप्ति के लिए, एक न खत्म होने वाले जीवनपर्यन्त प्रक्रिया की तरह।

एक बात समझो : जिस क्षण आप अपने लिए आत्म विरोधी परिणामों का निर्माण कर लेते हो, आपकी पीड़ा शुरू हो जाती है। इस बात पर स्पष्ट रहें कि आप कैसा जीवन चाहते हैं और उसके पश्चात अपनी ऊर्जा का हर भाग उसी दिशा में लगाये, जिससे कि कि आपका जीवन वैसा बन सके। जब आप स्पष्टता से क्रियाशील होंगे, तब आप अपने आप को धोखा नहीं दोगे और आप ये देखेंगे कि अति शीघ्र आप वह बनेंगे, जो आप बनना चाहते हैं।

जब आप ऐसे स्थान में प्रवेश कर जाते हो, जहाँ क्रतज्ञता आपकी साधना बन जाती है, संतुष्टि स्वतः हो जाती है। सामान्य संतुष्टि जिसे हम बस जानते हैं, हमेशा किसी कारण से आती है। वह हमेशा संबंधित रहती है, किसी चीज से, जो वाह्य जगत में घटी है। जिसने अस्थायी रूप से आपके मन को आराम दिया, बस इतना। जब आपका मन आराम से रहता है, आप कहते हैं, आप संतूष्ट हैं। यह सच्ची संतुष्टि नहीं हैं।

सच्ची संतूष्टि तब है, जब आप अस्तित्व की उदारता के प्रति स्थायी कृतज्ञता का अनुभव करें। सच्ची संतुष्टि और कुछ नहीं माँगती, वह बिना कारण के ही हर चीज का आनन्द लेती है, उसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं पड़ती। जब आप इस स्थिति को प्राप्त कर लेंगे, तब आप ये जानेंगे ही नहीं कि असंतोष किसे कहते हैं।

एक छोटी कथा :

एक व्यक्ति चिकित्सक के पास गया और नींद न आने की शिकायत की।

चिकित्सक ने उससे पूछा, "तो, आप पूरी रात्रि एकदम नहीं सो पाते?" व्यक्ति ने उत्तर दिया, "मैं रात्रि में ठीक से सोता हूँ।"

चिकित्सक ने पूछा, "तब समस्या क्या है?"

व्यक्ति ने कहा, "मैं दोपहर में और शाम को नहीं सो पाता।"

हम सब अधिक से और अधिक माँगते ही रहते हैं, बिना किसी माप के। यदि हमारे पास कोई माप है तो वह असीमित है, समस्या है। हम अपने माँगने वाले रवैये के कारण पूरी तरह से अंधे हैं। हम इसी कारण से यह जानते भी नहीं कि हम खड़े कहाँ हैं? हमने अपने अन्दर की तरफ कभी देखा ही नहीं बहुत समय से। हम केवल अपने मन द्वारा ही भ्रमित किये जाते रहे। हम इस तरह का अज्ञानतापूर्ण जीवन जी रहे हैं। हम अपने लिए पीडा का निर्माण अपने अन्दर करते हैं और उसका निदान बाहर खोजते हैं।

आप इस हास्य कथा पर हँस सकते हो, क्योंकि आप केवल देख रहे हो, आप ये जानते हो कि आप इसका एक भाग भी नहीं हो। जीवन में बहुत बार आप इसी तरह की परिस्थिति में होते हो और आप उसे नहीं जानते। उन समयों पर आप दृष्टा नहीं होते। आप पूरी चीज में इतना लिप्त रहते हो कि वह बहुत गंभीर बात हो जाती है, आपके लिए। वह आपके लिए एक ठोस वास्तविकता बन जाती है। इस हास्य कथा को हमेशा याद रखना, जब भी आपको कोई चीज परेशान करें। तुरन्त अपने आप को इस कथा से जोड़ना और सजगता से देखना कि आपको क्या परेशान कर रहा है? गहराई तक उनके अन्दर जाना और देखना कि क्या वास्तव में आपके सामने कोई समस्या है या आपका मन अपना खेल, खेल रहा है। हो सकता है, अंत में आप मात्र हँसों।

एक महिला एक लंबी दूरी की हवाई जहाज की यात्रा पर थी।

वायु-परिचारिका सब को भोजन उपलब्ध करने के लिए आयी। उसने महिला को सोते हुए पाया, इसलिए वो दूसरे व्यक्ति की तरफ बढ़ गयी।

महिला थोड़ी देर बाद जागी और अपना भोजन माँगा।

वायु-परिचारिका ने उसके लिए भोजन लाकर दिया।

महिला ने भोजन को स्पर्श किया और गुस्से से बोली, "यह किस तरह की वायु-सेवा आप लोग चला रहे हैं? भोजन गर्म नहीं है। मैंने अपनी नाक के दम पर पैसा दिया है, इस उड़ाने के लिए और मुझे गर्म भोजन भी नहीं मिल रहा है।"

वाय-परिचारिका ने क्षमा माँगी और कहा, "महोदया, कुपया हमें क्षमा करें। गर्म करने वाला यंत्र कार्य नहीं कर रहा है। बाकी लोगों ने भी इसी तरह का भोजन किया है।"

महिला ने कहा, "क्या ऐसा है? तब ठीक है।"

देखो. भोजन अब भी ठंडा ही है। लेकिन महिला अब दुःखी नहीं है, क्योंकि वो जानती है कि और बाकी लोगों ने भी उसी तरह का भोजन किया है। यही है जो मेरे कहने का अर्थ है। जब मैं कहता हूँ कि हर चीज केवल मन का खेल है, हर चीज मन का ही समाधान है, मन हमेशा अपना दृष्टिकोण बदलता रहता है और आपके ऊपर खेल खेलता रहता है, क्योंकि आपने उसे खेलने की अनूमति दी है, आपने अपने आप को संतुष्टि पर केन्द्रित नहीं किया, इसलिए आप अपने मन के साथ प्रभावित होते रहते हो।

lees pewmee ceQ keân jne Lee, Ùeefo Deehe efove kesâ Deble ceW nBme veneR mekeâles, Fmekeâe DeLe& ngDee efkeâ Deehe hetjer Ûeerpe kesâ efueS Deye Yeer iebYeerj nes, Deehe Deye Yeer meesÛeles nes efkeâ Deehe hetjs mebmeej keâe Yeej Deheves kebâOeeW hej efueS ngS nes Deewj Ùes Deehe nes, efpemekesâ keâejCe meejs mebmeej keâe Kesue Ûeue jne nw~

Deehe osKees, ienjeF& mes veerÛes Skeâ melÙe Ùen nw efkeâ nce meye Gme DeefmlelJe kesâ nQ, pees Debeflece Deewj meJe&JÙeehle Tpee& nw Deewj pees hetjs mebmeej keâes efveÙebef$ele keâj jner nw~ nceeje Deebleefjkeâ mJeYeeJe Yeer Ùener nw efkeâ nce Jeeheme DeefmlelJe mes mebyebOe mLeeefhele keâjW, efpememes efkeâ nce efyevee efkeâmeer mecemÙee kesâ yen mekeWâ~ uesefkeâve efkeâmeer lejn Ùen mecePeves ceW nce Ûetkeâ peeles nQ Deewj DeefmlelJe mes Deheves Deehe keâes he=Lekeâ keâj uesles nQ Deewj Yeeweflekeâ JemlegDeeW kesâ heerÚs Yeeieves ueieles nQ, Ùen meesÛeles ngS efkeâ Ùener nw pees nce Keespe jns nQ~

Ùeefo peerJeve ceW keâYeer Skeâ yeej Yeer Deehe efÛeefÌ[ÙeeIej ieÙes nes, Deeheves Ùen osKee nesiee efkeâ meyemes uebyeer keâleej Gme keâ"Iejs kesâ meeceves jnleer nw, efpeveceW Mesj Deewj Ûeerles jnles nQ~ ncesMee Deehe Ùes heeDeesies efkeâ ueesie yengle osj lekeâ Mesj Deewj ÛeerleeW kesâ meeceves KeÌ[s jnles nQ, ØeMebmee kesâ meeLe Gvekesâ Øeefle Dee§eÙe& Deewj mecceeve kesâ YeeJe mes~

nce Ssmee FmeefueS keâjles nQ, efyevee Ùes cenmetme efkeâÙes ngS efkeâ nce efJeefÛe$e lejerkesâ mes GvnW osKekeâj kesâ efveef§eble nes peeles nQ efkeâ ÛeerpeW ncemes DeefOekeâ yeÌ[er Deewj MeefòeâMeeueer Yeer nQ~ nceW Ùen Skeâ DeejeceoeÙekeâ YeeJe oslee nw efkeâ nce Debeflece Meefòeâ veneR nw~ nce peeveles nQ efkeâ nce Debeflece Meefòeâ veneR nQ~ nceeje mJe™he JeemleJe ceW Keespelee jnlee nw, Gme cenevelece meòee mes cegueekeâele keâes, pees nceW Ùeeo efoueeÙesieer nceejer meÛÛeer Yetefcekeâe keâes Fme met#ce yeÇÿeeC[ (Macrocosmic Universe) ceW~

ueesie cebefojeW ceW kesâJeue Fmeer DeeÕeemeve kesâ efueS peeles nQ pees GvnW efceueleer nw, peye Jes cetefle& keâes osKeles nQ~ efpeve ueesieeW keâes Ùen DeeÕeemeve cebefojeW ceW veneR efceuelee, Jees DevÙe mLeeveeW hej Keespeles nQ~ uesefkeâve efkeâmeer lejn, Deheveer ienjeF& ceW Devoj lekeâ nce Fme yeele keâes peeveles nQ efkeâ nce Debeflece Meefòeâ veneR nQ~ Ùen YeeJe nceejs efueS ØeeÙeesefiekeâ meÛÛeeF& yeve peeveer ÛeeefnS~ leye nce peeveWies Ùen efveef§ele nQ~

Ùeefo Deehe, efnceeueÙe hej peeÙeW, Deehekeâes JeneB DeefmlelJe keâer iebYeerjlee keâes Ùeeo efoueeves Jeeues mLeeÙeer Deewj cepeyetle ØeceeCe efceueWies~ Ûeesšer mes Ûeesšer lekeâ G"s ngS heneÌ[, otj lekeâ hewâues ngS cewoeve Deewj cewoeve mes hegve: yeveles ngS heneÌ[, ve keâesF& Meg®Deele Deewj ve keâesF& Deble Deewj iebiee veoer efvejblej Gmeer cewoeve ceW Skeâ Deueie ceve:efmLeefle ceW yenleer ngF&, efJeefYeVe jbieeW Deewj efJeefYeVe lejbieeW ceW keâue-keâue keâjkesâ nBmeleer ngF& DeefmlelJe keâer Yee<ee ceW~ Ùeefo keâesF& mebmeej nw pees ceveg<Ùe Éeje veneR yeveeÙee ieÙee, lees Jen efnceeueÙe nw~ efnceeueÙe efmeæ keâjles nQ efkeâ ceeveJe Debeflece jepee veneR nw~

peye Deehe efnceeueÙe keâes osKeWies, Deehe osKeWies kewâmes mewkeâÌ[eW efkeâueesceeršj yehe&â kesâ heneÌ[ kesâJeue yehe&â keâer ner lejn ueieles nQ Deewj Jener heneÌ[ yeeo ceW heneÌ[ yeve peeles nQ Deewj efheâj heeveer~ Fme lejn kesâ Dee§eÙe& nw, Øeke=âefle kesâ Deheveer hejekeâe‰e hej~

Section 15

pees MeyoeW kesâ ceeOÙece mes keâesF& hegmlekeâ legcnW veneR heÌ{e mekeâleer, efnceeueÙe legcnW efmeKee oWies cee$e osKeves kesâ DevegYeJe kesâ ceeOÙece mes~ kesâJeue Deehekeâes yeme lewÙeej jnves keâer DeeJeMÙekeâlee nQ~ efnceeueÙe Skeâ peerJeble Tpee& nw, efpemekesâ heeme leer#Ce ØeJesMe keâj peeves Jeeueer Meebefle nw~ Deehekeâes cee$e yeme Gmekeâes Deheves Devoj ØeJesMe keâjves osvee nw~ Ùeefo Deehe Ùen mecePeles nQ efkeâ Deehe Fme ceneve DeefmlelJe keâe Skeâ šgkeâÌ[e nQ, lees Deehe mJeerkeâej keâj ueesies Gmes efJeveceülee Deewj ke=âhee kesâ meeLe, efyevee keâesF& ØeMve hetÚs ngS~

peye Deehe DeefmlelJe kesâ Øeefle Deheves Deehe keâes Keesue osles nQ, Jen Deehekeâes Yej oslee nw~ efpelevee DeefOekeâ Deehe Deheves Deehe keâes KeesueWies, Glevee ner DeefOekeâ legceceW Jees Yejsiee~ Deehe Ùes meesÛeles nQ efkeâ Deehe F&Õej keâes hekeâÌ[ves kesâ efueS yengle keâÌ[er cesnvele keâjveer nw~ Skeâoce veneR~ keäÙee Deeheves keâYeer osKee nw, kewâmes yevojkeâe yeÛÛee Deheves ceeB mes efÛehekeâe jnlee nw? Fme yeele keâer hetjer mebYeeJevee jnleer nw efkeâ Jees Útškeâj efiej ve peeÙes Deewj efyeuueer kesâ meeLe Yeer ceeB Deheves yeÛÛes mes efÛehekeâer jnleer nw, yeÛÛee hetCe&le: megjef#ele jnlee nw~

Deehekeâes F&Õej mes efÛehekeâves keâer pe™jle veneR nw~ Ùeefo Deehe Deheves Deehe keâes Devegceefle oW Deewj Deheves keâle&JÙeeW keâe heeueve keâjW, yeekeâer meye ÚesÌ[keâj kesâ lees mJeÙeb F&Õej Deehemes efÛehekeâ peeÙesiee~ F&Õej kesâ efueS Pegkeâvee yengle yeÌ[er yeele veneR nw~ Deheves efueS F&Õej keâes Pegkeâe osvee Ùes yeÌ[er yeele nw~ Ùen leye nesiee, peye Deehe ve efJeÛeefuele nesves Jeeueer DeemLee mes heefjhetCe& mesJee Deewj Øesce kesâ meeLe peerJeve efpeÙeWies~

Skeâ Ketyemetjle Úesšer keâLee :

Skeâ JÙeefòeâ pees F&Õej kesâ Øeefle yengle mepeie Les, Øesceer Les Deewj peerJeve ceW yengle mes DeÛÚs keâeÙe& efkeâÙes Les~

Gvekeâes Ùes helee Ûeuee efkeâ Skeâ efJeMes<e hegmlekeâ nw, Skeâ Deeoceer kesâ heeme, efpemeceW Gve ueesieeW keâe veece efueKee ngDee nw, pees F&Õej mes Øesce keâjles Les~

Jen Ùen peeveves kesâ efueS Gòesefpele ngDee efkeâ Gmekeâe veece Gme hegmlekeâ ceW nw efkeâ veneR Deewj Jen Gme JÙeefòeâ kesâ heeme ieÙee Deewj Gmemes hetÚe efkeâ keäÙee Jen Jees hegmlekeâ osKe mekeâlee nw?

Gmeves keâF& yeej meejs he=‰eW keâes osKee, uesefkeâve Gmes keâneR Dehevee veece veneR efceuee~

वह बहत दुःखी हुआ और चला गया। एक वर्ष पश्चात वह वापस आया, यह देखने के लिए कि उसका नाम उस पुस्तक में जोडा गया कि नहीं? फिर से उसने देखा तो पाया कि उसका नाम नहीं है। जैसे ही वह वापस आने वाला था, उस व्यक्ति ने उससे कहा, "महोदय, कृपया रुकिये। इस पुस्तक में उन लोगों के नाम हैं जो ईश्वर से प्रेम

करते हैं। मेरे पास एक छोटी पुस्तक और है, जिसमें कुछ नाम हैं। वह उन लोगों के नामों की सूची है, जिन्हें ईश्वर प्रेम करते हैं।"

उस व्यक्ति ने उसे वह पुस्तक दिखायी।

उसको उसमें अपना नाम मिल गया।

ईश्वर के लिए झुकना अत्यन्त सरल है। आखिर वो इतना अधिक प्रेम करने वाले हैं, इतने बड़े दाता है, इतने शक्तिशाली हैं और क्या नहीं है? आप निरंतर यह कह सकते हैं कि आप उन्हें प्रेम करते हैं और जहाँ हो वहाँ रह सकते हैं। लेकिन जब आप उस ईश्वर को स्वरूप के स्तर पर अनुभव करना शुरू कर दोगे, परिवर्तन आपके अन्दर हो जायेगा, तब ईश्वर आपके लिए झूकेंगे। तब आप ये पायेंगे कि आपको कई तरीके से प्रेम किया जा रहा है, जिन्हें आप पहले जानते भी नहीं थे। इतनी अधिक दया से भरा हुआ है, ईश्वर का प्रेम।

हमें हमेशा से यह सिखाया गया है कि हम प्रकृति, ईश्वर या अस्तित्व के प्रति सावधान रहें। हमें सिखाया गया है कि हम हमेशा चप्पल पहनें, जब हम पैदल चलें, जिससे कि पुथ्वी से चोट न लगे। हमें सिखाया गया है कि हम वर्षा से दूर रहें। हमें सिखाया गया है कि हम घर के अन्दर रहें, जब तुफान चल रहा हो। हमें सिखाया गया है कि हम जानवरों से दूर रहें और बहुत सी चीजें।

मैं आपसे बताता हूँ, इस पुथ्वी ग्रह पर अस्तित्व ही एक मात्र मित्र है। क्या आप जानते हैं कि भूमि के स्पर्श अनुभव के साथ पैदल चलना कितना लाभप्रद है? मैं अपने बचपन के दिनों में कभी चप्पलें नही पहना करता था। सिवाए जब कॉलेज जाना होता था, क्योंकि वहाँ नियम था और मैं पहनता था। मैं बस नंगे पाँव ही चला करता था, चाहे वह घर रहा हो, चाहे स्कूल या मेरे भ्रमण के दिनों में।

आज भी आश्रम में, मैं अधिकतर समय नंगे पाँव ही चलता हँ। निश्चित रूप से, मेरे आस-पास लोग मेरे प्रति लाड-प्यार में मूझे चप्पलें लाकर दे देते हैं कि कहीं मेरे पाँव में चोट न लग जाये। मैं उनसे कहता हूँ कि ये मेरे पाँव जो भारतवर्ष की लम्बाई और चौड़ाई में नंगे होने पर चोट नहीं खाये, तो यह अब क्या चोट खायेंगे।

आप इन सब चीजों को करके मात्र अपने आपको पूरी तरह से प्रकृति से अलग कर लेते हो। बहुत से लोग मुझसे कहते हैं, "स्वामी जी, ये कैसे हैं संभव कि आपके पाँव में इतने वर्षों के ऊबड-खाबड रास्तों पर भ्रमण के कारण भी कोई कठोरता नहीं आयी और ये इतने मूलायम कैसे हैं?'' मैं आपसे अब बताता हूँ : मैंने अस्तित्व से अलग कभी महसूस नहीं किया, इसलिए, यही सही कारण है। मैंने हमेशा महसूस किया कि मैं अस्तित्व का ही भाग हूँ।

मैंने हमेशा अनुभव किया कि मैं प्रकृति का ही हँ। इसीलिए तो मैं बिना ख्याल किए हुए भ्रमण करता था, बिना किसी चीज के भय के।

बस कल्पना करो, यदि आप जंगली जानवरों के साथ अँधेरे जंगल में अकेले हो, और आपके पास भोजन भी नहीं है और ये जानकारी भी नहीं है कि भोजन कब मिलेगा और सोने के लिए कोई स्थान भी नहीं है, सिवाए खुले आसमान के? कैसे रहोगे? पूरी तरह डरे हुए, क्या ऐसा नहीं है?

ऐसा इसलिए हैं, क्योंकि आपको कभी यह नहीं सिखाया गया कि अस्तित्व आपका न धोखा देने विचित्र मित्र हैं। आपने हमेशा सहायता के लिए लोगों की तरफ देखा, क्योंकि आपको विश्वास था कि केवल लोग मदद करते हैं। आप यह समझने में भूल गये कि यह अस्तित्व है जो लोगों के माध्यम से सहायता करता है। आपका विश्वास हमेशा लोगों के प्रति रहा, अस्तित्व पर नहीं।

जब आप अस्तित्व पर विश्वास करेंगे, तब आप इस पुथ्वी ग्रह पर एक राजा की तरह रह सकेंगे। मैंने अपने भ्रमण के दिनों का आनन्द लिया। मैं केवल बस चलता था और वहाँ जाता था, जहाँ मेरे पाँव ले जाते थे, बिना इस बात की जानकारी के कि मेरा अगला पड़ाव क्या है? मैं रेलगाड़ी में बैठ जाता था और कहीं भी उतर जाता था, जहाँ मुझे दुश्य आकर्षित करते थे। मैं उस समय हिन्दी भाषा नहीं जानता था और मेरा अधिकतर भ्रमणकाल उत्तर भारत के हिमालय में बीता। मैं बस हिन्दी भाषा के कुछ शब्द चुनकर के अपना काम चलाता था। वास्तव में, किसी भाषा को सीखने के लिए सबसे पहली दिक्कत तुम्हारे विचार होते हैं, कि आप उस भाषा को नहीं जानते। आप पहले अपने आपको उस भाषा से अलग करते हैं और तब वो कठिन दिखती है। यहाँ फिर, आप अपने आप को प्रकृति से अलग किये हुए हैं जो आपको पूरी तरह से जानती है।

किसी तरह अधिकतर बार, मैं अपने आप अकेले ही भ्रमण करता था, किसी के समूह के साथ नहीं और कभी भी मैंने अपने आपको अकेला नहीं समझा। अस्तित्व का एक भाग बनकर मैंने आनन्द लिया। जब आप प्रकृति से जूडा सीख जायेंगे, तब आप अस्तित्व का आनन्द लेंगे। मुझे भोजन के लिए भिक्षा कभी नहीं माँगनी पड़ी। जब भी मैं भूखा होता था या वैसे भी, भोजन किसी न किसी के माध्यम से या किसी न किसी रूप में आ जाता था। यह है मेरे कहने का अर्थ, जब मैं कहता हूँ कि बस विश्वास करो और चलने दो, अस्तित्व आपका ख्याल रखेगा।

लोग मूझसे पुछते हैं, "स्वामी जी, आपने अपने जीवन में इतना संघर्ष किया और तब अपने लक्ष्य को प्राप्त किया। क्या हम लोगों को भी कष्ट नहीं उठाना चाहिए, अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए?'' मैं उनसे बताता हूँ : मैं संघर्ष इसलिए किया, क्योंकि मैं एक ताले को खोलने के लिए 10 हजार चाभियों का प्रयोग कर रहा था।

मैं वर्षों तक इकट्ठे प्रयोग करता रहा और सही चाभी खोजा। अब मेरे पास सही चाभी है। मैं उसे जो भी चाहे उसे देने के लिए तैयार हूँ। आपको उसके माध्यम से एक क्षण लगेगा खोलने में। फिर भी, अगर आप महसूस करते हैं कि आपको कष्ट उठाना ही है, वो आपकी स्वतंत्रता है, मैं हस्तक्षेप नहीं करूँगा।

आपका केवल एक ही प्रयास होना चाहिए कि आप अस्तित्व को अपने अन्दर से बहने दें, जितना कम विरोध आप अस्तित्व का करेंगे, उतना ही कम विरोध आपको अपने आपका करना पड़ेगा। यह सीधा अनुपातीय संबंध है। जब आप जाग्रत हो जाते हो, आप केवल एक अबाधित खाली मार्ग होते हो, जिसके माध्यम से अस्तित्व निरंतर बहता है, बस इतना। जब आपके भाग के सारे प्रयास खत्म हो जाते हैं, तब अस्तित्व बिना प्रयास के आपके अन्दर से बहेगा। हाँ ...........कोई प्रश्न, आप पूछना चाहते हैं?

Section 16

प्रश्‍न : स्‍वामी जी, संतुष्‍ट महसूस करने में ध्‍यान हमारी मदद कैसे करता हैं? आप देखो, जब आप लगातार ध्यान करते हो, आप सरल और असूरक्षित बन जाते हो। आप छिद्रिल बन जायेंगे, संवेदनशील और सजग बन जायेंगे। आप यह पायेंगे कि चेतनता का हर क्षण विस्तार हो रहा है। तब आपकी चेतनता, आपकी भावनाओं और क्रियाओं को निर्धारित करती है। यही कारण है कि मैं आपसे बार-बार ध्यान करने के लिए कहता हूँ। मैं आपकी चेतना को शुद्ध कर दूँगा। चीजें आपके लिए और स्पष्ट होंगी।

आप यह महसूस कर सकेंगे कि आपका केन्द्र मन से हृदय की तरफ हट रहा है। जब आपमें और आपके मस्तिष्क में दूरी बढ़ती है, तो आपका स्वरूप एक दूसरी प्रकार की भावना से तरंगित होता है और यही भावना है, जिसे संतोष कहते हैं, एक गहरी परिपूर्णता, एक गहरा प्रेम बिना किसी कारण के - संपूर्ण के प्रति, एक निरंतर अनुभव आनन्द और परमानन्द का।

जब तक आप अपने मस्तिष्क के माध्यम से क्रियाशील रहोगे, आप केवल और अधिक माँगते रहेंगे, आप विश्लेषण करेंगे, विभाजन करेंगे और असंतोष पर अंत करेंगे, किसी भी चीज से अधिक। जब आप अपने हृदय से क्रियाशील होंगे, आपका सारा विश्लेषण समाप्त हो जायेगा, उसके पश्चात न तो आप विभाजित करेंगे पूर्व को और न ही चिंतित होंगे, भविष्य के लिए। आप बस वर्तमान में रहेंगे, बिना किसी निर्णायक भावना के और इस स्थिति में आप केवल संतृष्टि और क्रतज्ञता का अनुभव करेंगे। आपके अन्दर एक नया स्थान खूल गया होगा। जब आप इस स्थान को पा जायेंगे, आपके अन्दर की समस्त ऊर्जा जो आपने पहले नकारात्मक सोच और असंतोष में खर्च की है, वह मक्त हो जाती है और आप एक, परमानन्दित और ऊर्जा से भरा हुआ महसूस करेंगे। कृतज्ञता तब आपकी प्रार्थना बन जाती है और धन्यवाद आपका मंत्र होता है।

अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता के भाव की स्थिति में जो आप अपने अन्दर ऊर्जा की बाढ महसूस करेंगे, उसकी व्याख्या शब्दों में नहीं की जा सकती। इसे प्रायोगिक रूप से समझना होगा। हर एक चीज जो आपके मार्ग में आयेगी, वह आपको इतना अधिक संतोष देगी और आपको और अधिक अस्तित्व के प्रति आकर्षित करेगी और आप ये पायेंगे कि अस्तित्व की कृपा की वर्षा आपके ऊपर हो रही है। अचानक, सारी चीज एक नये स्वरूप में परिवर्तित हो जाये, जहाँ अधिक से अधिक आनन्द को अनुभव किया जा सकेगा। आप आनन्द से परिपूर्ण होंगे, हर बीते हुए क्षण में। मात्र रहना इतना आनन्ददायक लगेगा कि आप यह महसूस करेंगे कि आप अपने आप को आशीर्वाद दें और सारे संसार को भी।

जब आप माँगते हैं, आप स्पष्ट रूप से चूक रहे हैं। जब आप क्रतज्ञ होते हो, आपके ऊपर वर्षा होती है। बस धन्यवादपूर्ण रहो, हर समय यही मुख्य चाभी है, सब चीजों की। निश्चित रूप से, आपको अपने स्वरूप से कृतज्ञता अनुभव करने की आवश्यकता है, वाह्य सीमा से नहीं। केवल तब जब आप अपने स्वरूप से क्रतज्ञता अनुभव करेंगे, चीजें होना शुरू हो जायेंगी।

जब आप सोने जायें, सोने से पूर्व कृतज्ञता का अनुभव करें कि आपने एक और दिन अस्तित्व के साथ बिताया। जब आप जागे, इस कृतज्ञता के भाव से जागो कि आप अस्तित्व के साथ एक दिन और बिताने के लिए मिल रहा है। यह सबसे सरल और सबसे अधिक प्रभावशाली साधना है, जो आप कर सकते हैं और जो कृतज्ञता को ही आपका स्वरूप बना देंगी।

मैं आपसे बताता हूँ, मात्र अनुभव करके और अपने स्वरूप से कृतज्ञता का प्रसार करके, तुम पृथ्वी का स्वरूप बदल सकते हो। सारा आतंकवाद, युद्ध, धार्मिक उन्माद, खराब स्वास्थ, गरीबी इत्यादि दूर किये जा सकते हैं। बस सजगता को फैलाकर के कृतज्ञता के बारे में, जिसकी हर एक व्यक्ति के अन्दर ले जाने की आवश्यकता है।

जब हर एक व्यक्ति कृतज्ञता का अनुभव करेंगे और कतज्ञता का प्रसार करेंगे, तब कोई द्वेष नहीं होगा, कोई घुणा नहीं होगी, कोई ईर्ष्या नहीं होगी। विश्व में नकारात्मकता की हर संभावित जड को नष्ट किया जा सकता है, मात्र एक भावना से, क्योंकि सारी नकारात्मकता के कारण बस नष्ट हो जायेंगे, ये है खूबसूरती कृतज्ञता की।

ठीक है, अब हम कुछ समय एक सुन्दर ध्यान करने में बितायेंगे, जिसे सहस्रार साधना तकनीक कहते हैं - कृतज्ञता की साधना।

(स्वयं सेवक, उपस्थिति समूह में सबको पुष्प बाँटते हैं।)

सहस्रार ध्यान

(काल अवधि : 30 मिनट)

(मंद संगीत बज रहा है)

सहस्रार ध्यान एक कृतज्ञता की साधना है, जो सूफी धर्म से लिया गया है। सीधे बैठ जायें, पुष्पों को अपने हाथ में लें और अपने नेत्र बन्द करें।

अपने सहस्रार चक्र पर ध्यान केन्द्रित करें। अपने शरीर के अन्य भागों को भूल जायें। अपने ध्यान को अपने मुकुट क्षेत्र पर केन्द्रित करें और वहीं आराम से स्थित हो जायें। एक मुस्कुराहट धारण करो और आराम से स्थित रहें।

अपने संपूर्ण स्वरूप के साथ, अपनी माता के प्रति कृतज्ञता अर्पण करें, जिसने आपको यह शरीर दिया। याद करो और उन्हें अपने संपूर्ण हृदय से कृतज्ञता अर्पित करें।

अपने पिता के प्रति कुतज्ञता अर्पित करें, जिन्होंने यह जीवन दिया और आपकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति की।

सारे चिकित्सकों और नर्सों के प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करें, जिन्होंने आपका स्वागत किया, जब आप इस पुथ्वी ग्रह पर आयें।

हर उस व्यक्ति के प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करें, जिन्होंने वह अस्पताल या घर बनाया, जिसमें आपने जन्म लिया।

अपनी कृतज्ञता हर उस व्यक्ति के प्रति अर्पित करें, जिन्होंने आपका बचपन में ख्याल रखा।

अपनी कुतज्ञता अर्पित करें, हर उसके प्रति जिसने आपके भोजन, वस्त्र और रहने के लिए कार्य किया जब तुम छोटे थे।

अपनी कृतज्ञता अर्पित करो हर उस शिक्षक के प्रति जिसने तुम्हें प्राथमिक शिक्षा प्रदान की।

अपनी कुतज्ञता अर्पित करो अपने बचपन के हर मित्र के प्रति जिसने आपको कभी खुश या आनन्दित किया हो, जिसने अपनी निश्छलता और खुशी आपकी साथ बाँटी हो।

अपनी कृतज्ञता अर्पित करो हर भाई-बहन के प्रति और अन्य संबंधियों के प्रति जिन्होंने आपका रख-रखाव और ख्याल रखा। उनसे क्षमा माँगों यदि आपने उन्हें कभी पीड़ा पहुँचाई हो जाने या अनजाने में, चेतनता या अचेतन अवस्था में।

अपनी क्रतज्ञता अर्पित करो हर उस व्यक्ति को जिसने आपको व्यवसायिक शिक्षा प्रदान की, जिसने आपका आपके व्यवसाय में खड़े होने में मदद की जिसने आपको वह साहस दिया कि आप अपने पैरों पर खड़े हो सकें।

अपनी कृतज्ञता अर्पित करो हर उस व्यक्ति के प्रति जिसने कभी आपको आवश्यकता पड़ने पर आर्थिक की हो।

अपनी क्रतज्ञता अर्पित करो हर चिकित्सक और नर्स पर जिसने आपका स्वास्थ का ख्याल रखा हो, जिसने आपको चिकित्सीय सहायता प्रदान की हो, जब आपको उसकी आवश्यकता रही हो।

अपनी कृतज्ञता अर्पित करो आनी पत्नी या पति के प्रति जिसने आपको प्रेम दिया और जीवन में सुरक्षा दी। उन्हें क्षमा करो हर चीज के लिए उन्होंने आपके साथ की हो, जिससे आपके पीड़ा पहुँची हो, उनसे क्षमा माँगो हर उस चीज के लिए जो आपने उनके साथ की हो और जिससे उन्हें पीड़ा पहुँची हो, बिना आपकी जानकारी के।

अपनी कुतज्ञता अर्पित करो हर उस व्यक्ति के प्रति जिसने आपको साहस दिया हो और प्रेरणा दी हो, आपके आध्यात्मिक जीवन में।

अपनी क्रितज्ञता अर्पित करो हर उस व्यक्ति के प्रति जिसने आपको किसी न किसी रूप में पूरे जीवन में कभी मदद की हो। दुधवाला जो दुध देता है, पंसारी, धोबी, कूडा बटोरने वाला, आपका नौकर, आपका कार चालक और हर वो व्यक्ति जिसको आपने सोचा कि उन्हें तो ये करना ही था। हर उस एक से क्षमा माँगो यदि आपने किसी न किसी रूप में उन्हें पीड़ा पहुँचाई हो, जाने या अनजाने में, चेतन या अचेतन में।

Deheveer ke=âle%elee Deefhe&le keâjes Deheves Me$egDeeW kesâ Øeefle efpevneWves Deehekeâes heerÌ[e hengBÛeeF&, Deehekeâes cepeyetle yeveeves kesâ efueS Deewj #ecee keâjves kesâ efueS~ Gvemes #ecee ceeBieeW efkeâmeer heerÌ[e kesâ efueS pees Deeheves GvnW oer nes~

Deheveer ke=âle%elee Deefhe&le keâjes nj Gvekeâes efpemeves Deehekeâer Meejerefjkeâ, ceeveefmekeâ, meeceeefpekeâ Deewj DeeOÙeeeflcekeâ ceoo keâer nes~ nj Gme JÙeefòeâ keâes Ùeeo keâjes meceÙe ueskeâj kesâ Deewj GvnW Deheveer ke=âle%elee Deefhe&le keâjes~

Deheveer ke=âle%elee Deefhe&le keâjes Deheves Mejerj kesâ Øeefle Deewj Deheves Mejerj kesâ nj Yeeie kesâ Øeefle Skeâ-Skeâ keâj~

Deheveer ke=âle%elee Deefhe&le keâjes Deheves ceefmle<keâ kesâ Øeefle Gmekeâer Ûecelkeâeefjle ef›eâÙeeMeeruelee kesâ keâejCe~

Deheveer ke=âle%elee Deefhe&le keâjes Gme hejcemeòee kesâ Øeefle, mebhetCe& kesâ Øeefle, Gme F&Õej kesâ Øeefle efpemeves Deehekesâ efSue, Deehekesâ peerJeve ceW nj Ûeerpe mebYeJe keâer~

Deye ceQ Deehe meyekesâ Øeefle Deheveer ke=âle%elee Deefhe&le keâjlee ntB Fme yeele kesâ efueS efkeâ Deeheves cesjs Øeefle efJeÕeeme efkeâÙee Deewj cesjs MeyoeW keâes megvee Fve kegâÚ efoveeW lekeâ~ Deye Deehe Deheves ves$e Keesue mekeâles nes Deewj DeefmlelJe kesâ Øeefle ke=âle%elee kesâ Ùes heg<he Deefhe&le keâjes Fme Õesle Ûeeoj hej~

(mecetn keâe nj Skeâ Deeies Deelee nw Deewj ke=âle%elee kesâ heg<he Deefhe&le keâjlee nw~) Deye, Deevevo oMe&ve nesiee~

DeOÙeeÙe - 10

DeOÙeeÙe 10

Deevevo oMe&ve

Section 17

(Ùen Yeeie Deevevo oMe&ve kesâ yeejs ceW nQ - oMe&ve keâe meceÙe peye mJeeceer peer Deheves Devoj mes owJeerÙe Tpee& yenves kesâ efueS Skeâ Megæ ceeOÙece yeve peeles nQ, pees DeJemej mJeeceer peer nj Skeâ keâes osles nQ, pees JeneB GheefmLeefle neslee nw, Skeâ owJeer Ghenej kesâ ™he ceW~)

mJeeceer Jen nw efpemekesâ Devoj yeÇÿeeC[erÙe hejeÛeslevee nesleer nw~ Jen Skeâ ™he nw ™henerve keâe, Jen mJeÙeb ceW DeefmlelJe nw~ Deheves Devoj ienjs Øesce Deewj oÙee kesâ keâejCe, Deevevo oMe&ve kesâ ceeOÙece mes, Jen Deheves Deehe keâes hetjer lejn mes Keesueles nQ meyekesâ efueS, Gvekesâ ceeOÙece mes yeÇÿeeC[erÙe hejeÛeslevee keâes DevegYeJe keâjves kesâ efueS~

mJeeceer keâer oÙee Deewj owJeerÙe Øesce ØeÛeC[ ienvelee kesâ meeLe meyekesâ Éeje cenmetme efkeâÙee peelee nw~ mJeeceer Deheves Deeme-heeme nj meceÙe DeefmlelJe keâer Tpee& keâe Øemeej keâjles jnles nQ~ oMe&ve kesâ meceÙe Jees Deheves Deehe keâes meyekesâ efueS megueYe yevee osles nQ, efpememes efkeâ Jen nj Skeâ kesâ Devoj owJeerÙe Tpee& keâes mebmLeeefhele keâj mekeWâ, nj Skeâ kesâ Devoj Gme peÌ[ keâes yeesves kesâ efueS pees efKeuekeâj kesâ GvneR keâer megievOe keâe Øemeej keâjW, DeefmlelJe keâer megievOe~

Ùeefo kesâJeue nce Tpee& keâes Deelcemeele keâjves kesâ efueS lelhej neW, Jen nceejs Devoj ØeJesMe keâjkesâ mJe™he kesâ mlej hej nceeje heefjJele&ve keâj osieer~ Ùeefo nce Deheves Devoj Meeble jn mekeWâ, meebmeeefjkeâ lekeâeX kesâ hekeâÌ[ mes cegòeâ, efJeÛeejeW Deewj MeyoeW mes cegòeâ, lees nce Gme Deevevo kesâ mecegõ pees ÙeneB efveefce&le neslee nw, keâe yetBo yeve mekeâles nQ~ DekeâejCeØesce keâe DeveJejle œeeJe keâjves Jeeues mJeeceer keâer Skeâ ner Dehes#ee nw Deewj Jen nw

nceejer lejheâ mes DeemLee kesâ meeLe Deelcemeele keâjves Jeeuee ØeÙeeme~ Ùeefo nce kesâJeue Deheves ceve keâe heefjlÙeeie kegâÚ IeCšeW kesâ efueS keâjkesâ JeneB hej efveefce&le JeeleeJejCe mes meecebpemÙe ceW Dee mekeWâ, lees nce mebhetCe& DeefmlelJe kesâ Øeefle Deheveer meyemes ienjer ßeæe Deefhe&le keâjWies~

oMe&ve kesâ meceÙe JeneB ve=lÙe Deewj keâerle&ve neslee nw~ Guueefmele keâjves Jeeueer mJeeceer keâer GheefmLeefle Deewj Jen Tpee& pees Fme oMe&ve keâeue ceW JÙeehle jnleer nw, JeneB GheefmLele mecemle ueesieeW keâes heefjJeefle&le keâj osleer nw hejce osJelJe ceW~ Ùen DeefmlelJe keâe Skeâ Megæ GlmeJe nw~

oMe&ve kesâ meceÙe pees Deevevo JÙeehle neslee nw, Jen ceve keâes PekeâPeesj oslee nw Deewj Gmekesâ hejs ues peelee nw, mebhetCe& ceW Skeâ™helee keâes DevegYeJe keâjves kesâ efueS~ ceve DevegheefmLele neslee nw, mJe™he keâes Yeej mes cegòeâ keâjkesâ, efpememes efkeâ mJe™he Deevevo DevegYeJe keâjs, efpemekeâe DevegYeJe keâjves keâer Gmes yengle uebyes meceÙe mes keâecevee Leer, Ùen DevegYeJe keâjves kesâ efueS pees meÛecegÛe ceW Jees nw, DeefmlelJe keâe Deevevo «enCe keâjves kesâ efueS, efpemekeâe Jen DebieYetle Yeeie nw~ ceve DeÂMÙe nes peelee nw, Skeâ Keeueer mLeeve ÚesÌ[keâj pees Yej peelee nw hetjs peerJeve kesâ efueS Demeerefcele Øesce mes~

oMe&ve keâe meceÙe Jen meceÙe nw peneB mecemle yebOeve Deewj meerceeÙeW štš peeles nQ, - meeceeefpekeâ, DeeefLe&keâ Deewj Ûeens pees, Deewj nj JÙeefòeâ osJelJe keâes meyekesâ Devoj yejeyej osKelee nw Deewj Fme lejn mes cegefòeâ keâe DevegYeJe keâjlee nw~ Ùen Jen meceÙe nw peye Deheveer Deewj otmejeW keâer meejer henÛeeve Kelce nes peeleer nw Deewj nj Ûeerpe Deewj nj Skeâ yeme cee$e Deevevo mes GlmeJe DevegYeJe keâjles nQ~ nj mJe™he Ûecekeâ G"lee nw, osoerhÙeceeve neskeâj kesâ Deheves Devoj osJelJe keâe Øemeej keâjles ngS~

mJeeceer kesâ nj Skeâ MeyoeW keâes pees mJeeceer yeesueles nQ, DevÙe meceÙe hej megvee pee mekeâlee nw~ uesefkeâve oMe&ve kesâ meceÙe, Jen veneR yeesueles, Jees kesâJeue Deheves Deehe keâes nceW efoKeeleW nQ~ Ùen cenevelecece Deewj meerOee Ghenej mJeeceer keâe nj Skeâ kesâ efueS neslee nw~ Ùeefo nce Deewj mepeie jn mekeWâ, lees nce Ùen osKe mekeWâies~ Ùeefo nce meesÛeves mes Deewj ef›eâÙee™helee mes «eefmele nQ, lees nce Gmemes Ûetkeâ peeÙeWies~

Ûeens nce mJeerkeâej keâjW, oMe&ve kesâ ÂMÙe keâes Ùee Gmes DemJeerkeâej keâjW, nce yeme Ûetkeâ peeÙeWies~ Ùeefo nce oesveeW ve keâjkesâ Deewj yeme JeneB neW, efyevee ceeves ngS Ùee ve ceeves ngS, efyevee efkeâmeer efveCe&Ùe kesâ, efyevee ef›eâÙee™helee kesâ ØeÙeeme kesâ, efyevee efkeâmeer mekeâejelcekeâ Ùee vekeâejelcekeâ meesÛe kesâ, leye mecePe uees nceves met$e hee efueÙee~ Ùeefo nce yeme JeneB nes mekeWâ, Øesce keâe DevegYeJe heeves, Øesce meerKeves veneR, leYeer nce DevegYeJe keâj heeÙeWies~ efyevee MeyoeW keâe Deeoeve-Øeoeve efkeâÙes ngS, nce Ùes osKeWies efkeâ nceejs Devoj keâesF& Ûeerpe Øeef›eâÙee keâj jner nw~ keâjesÌ[eW ueesieeW kesâ efueS, oMe&ve heefjJele&ve keâjves Jeeuee DevegYeJe

442

Deevevo oMe&ve keâer Dee§eÙe&pevekeâ mce=efleÙeeB efueS ngS, ueesie meejs mebmeej ceW hewâues ngS nQ~ ueesieeW keâes oMe&ve kesâ meceÙe yengle meer heerÌ[eDeeW mes efveoeve efceuee nw, ueesieeW keâes efJeefYeVe Øekeâej kesâ oMe&ve ngS nQ, GheÛeej kesâ yengle mes °eble oMe&ve kesâ meceÙe kesâ nQ, yengle mes ienve DeeOÙeeeflcekeâ DevegYeJe Yeer ueesieeW keâes oMe&ve kesâ meceÙe ngS nQ~

efJeefYeVe ueesieeW kesâ Éeje Ùen Tpee& efJeefYeVe lejerkesâ mes DevegYeJe keâer ieF& nw~ oMe&ve kesâ meceÙe efkeâmeer DevegYeJe kesâ efueS ueeueeefÙele nesves keâer keâesF& DeeJeMÙekeâlee veneR nw~ pees nes jne nw, yeme Gmes nesves osves keâer ner nceW DeeJeMÙekeâlee nw~ leye nce Deheves Devoj Jen mLeeve yevee heeÙeWies, efpememes efkeâ nce oMe&ve keâes Deelcemeele keâj mekeWâ~ Tpee& Øe%ee nw Deewj Jen peeveleer nw efkeâ keäÙee keâjvee nw~ efkeâmeer Dehes#ee keâer keâesF& DeeJeMÙekeâlee veneR nw~ efkeâmeer ØekeâeMe kesâ DevegYeJe keâjves keâer keâesF& DeeJeMÙekeâlee veneR nw Ùee Keeueerheve Ùee Tpee& keâe DevegYeJe Ùee efkeâmeer DevegYeJe Ùee efkeâmeer DevÙe Ûeerpe keâer Dehes#ee keâjves keâer keâesF& DeeJeMÙekeâlee veneR nw~

Fme meceÙe kesâJeue ØeeLe&veeceÙe ceve:efmLeefle ceW jnvee ner heÙee&hle nw~ Jen nceeje heefjJele&ve MeyoeW mes DeefOekeâ keâj mekeâlee nw~ ØeeLe&veeceÙe keâe DeLe& Ùen veneR nw efkeâ ÛeerpeeW keâes ceeBiee peeÙes, ØeeLe&veeceÙe keâe DeLe& nw efkeâ nj Ûeerpe kesâ Øeefle ke=âle%elee DevegYeJe keâjvee~ efveef§ele ™he mes, mJeeceer ncesMee keânles nQ efkeâ nce oMe&ve kesâ he§eeled pees Yeer cenmetmeme keâjW, Jees ceeBie mekeâles nQ, G"ves mes hetJe&~ Jees keânles nQ efkeâ nce Gvemes keâesF& Yeer ØeMve hetÚ mekeâles nQ pees nceejs ceve ceW nw, efkeâmeer mecemÙee kesâ yeejs ceW Yeer hetÚ mekeâles nQ, efpemekeâe nce meceeOeeve Keespe jns nQ~

uesefkeâve Jen #eCe Deevevo mes Flevee Yeje ngDee neslee nw Deewj meebmeeefjkeâ ØekeâjCeeW keâer heefjefOe kesâ Flevee hejs neslee nw efkeâ efkeâmeer Ûeerpe kesâ efueS kegâÚ hetÚvee DelÙevle keâef"ve neslee nw~ efpeme #eCe nce kegâÚ ceeBieves keâer ceve:efmLeefle ceW Deeles nQ, nce mebhetCe& Ûeerpe mes Ûetkeâ peeles nW~ keäÙeeWefkeâ nceejs efueS kegâÚ hetÚves keâe DeLe& nw, nceejs ceve keâe heoehe&Ce

nesvee Deewj peye nceeje ceve heoehe&Ce keâjlee nw, nce hetjer Ûeerpe mes Ûetkeâ peeles nQ~ Ssmes yengle mes ØekeâjCe ngS, efpeveceW ueesieeW ves yeleeÙee efkeâ oMe&ve kesâ meceÙe peye Jees mJeeceer peer kesâ heeme ieÙes, lees GvneWves yeme "erkeâ Gmeer mLeeve hej neLe jKee, peneB Gvekesâ Mejerj ceW heerÌ[e Ùee efJekeâej Lee~ ueesie nleØeYe Les~ Jees "erkeâ Gmeer mLeeve hej neLe jKeles nQ, efpeme #es$e hej OÙeeve osves keâer DeeJeMÙekeâlee jnleer nw, efyevee GvnW kegâÚ Yeer yeleeÙes~ mJeeceer nceejs efueS Deheves Øesce kesâ meeLe nceW nceejer Devekeâner mecemÙeeDeeW kesâ meeLe mebyeesefæle keâjles nQ~

oMe&ve keâeue ceW peye ØeMve hetÚs peeles nQ, mJeeceer Gme meceÙe lejue oÙee Deewj meboYe& kesâ meeLe Gòej osles nQ, Gvekeâe Gòej efYeVe neslee nw, nj JÙeefòeâ kesâ efueS Ûeens ØeMve Skeâ ner

रहा हो। ये तो तभी कोई समझ पाता है कि हर स्वरूप भिज्ञ हैं, हर एक का मार्ग भिज्ञ है, हर एक स्वामी से अलग और स्वतंत्र तरीके से संबंधित है। स्वामी हर एक व्यक्ति के स्वरूप के अन्दर देखते हैं और प्रश्नकर्ता के यह कहते हैं, 'मैं ख्याल रखुँगा'। स्वामी जी के मात्र आश्वासन के कुछ शब्दों पर लोग अपनी उत्सूकता और हतोत्साह को वहीं छोड़ देते हैं।

Section 18

इन कुछ क्षणों में, यदि हम अपनी प्रार्थना को भूलकर के केवल अस्तित्व में विश्वास रखें, तब हम अनुभव कर सकेंगे। यदि अस्तित्व के प्रति मात्र थोड़ी सी आस्था होगी और वो जानेंगे हमारे लिए जो भी सबसे अच्छा होगा वह पर्याप्त होगा। यदि हम इस रवैये से होंगे, तो हम प्राप्त कर सकेंगे, जो हमें देने का प्रयास कर रहे हैं, और कूछ नहीं। वह हम सब के लिए एक प्रचण्ड क्षण होता है। दर्शन काल एक आश्चर्यजनक अवसर होता है, जब हम स्वामी के प्रति सम्पर्क से साथ की तरफ बढ़ जाते हैं। स्वामी जी के सब व्याख्यानों में हम अधिक से अधिक बौद्धिक स्पष्टता के लिए प्रश्‍न पूछते रहते हैं। हम मस्तिष्क से संबंध बनाने का प्रयास करते हैं। हम हर सत्र के अंत में अधिक से अधिक शब्द एकत्रित कर लेते हैं और हम वापस लौटते हैं और अधिक शब्दों और प्रश्नों के साथ। दर्शन वह समय होता है, जब हम अपने स्वरूप से संबंधित होते हैं।

हम अपने अन्दर कुछ अनुभव होने देना संभव कर सकते हैं। यह अच्छा होगा कि प्रयास करके मस्तिष्क को छोड़ दिया जाए और हृदय के साथ रहा जाए, कम से कम इस काल के दौरान। हम अपने मस्तिष्क के माध्यम से अस्तित्व के साथ एकरूपता नहीं बना सकते। वह केवल हमारे हृदय या स्वरूप के माध्यम से संभव है। किसी भी प्रकार का समाहित होना केवल हृदय से संभव है या स्वरूप से। दर्शन काल में स्वामी सीधे हमारे नेत्रों में देखते हैं और हम अपना प्रतिबिम्ब उनके अन्दर देख सकते हैं। वह निदान करते हैं, अपनी दृष्टि से, स्पर्श से और आलिंगन से। हर दर्शन के पश्चात हम वापस लौटते हैं एक भिन्न व्यक्ति के रूप में और कुछ अधिक जाग्रत।

हर दर्शन भिज्ञ होता है। अस्तित्व की संपूर्ण खूबसूरती, प्रकृति की संपूर्ण खूबसूरती यह है कि वह अपनी पुनरावृत्ति नहीं करती। हर दर्शन एक भिज्ञ रूप में प्रकट होता है, एक नये आयाम के साथ, अपने आप में एक नयी गहनता लिए हुए, एक अंजाने जोश के साथ। हर दर्शन उत्कृष्ट लगता है केवल तब तक, जब तक अगले का प्रकटीकरण नहीं होता।

स्वामी द्वारा दर्शन काल में हमारे अन्दर ऊर्जा का स्थानान्तरण सीधे हमें कामनारहित स्थिति में पहुँचा सकता है। यदि हम प्रेमी हैं और खुले हुए हैं, वह हमारा परिवर्तन एक ही नहीं, बल्कि कई तरीके से कर सकता है। निरंतर साधना और

बौद्धिक समझ के माध्यम से कामनारहित स्थिति को भी प्राप्त भी किया जा सकता है। लेकिन दर्शन काल वह समय है, जब किसी को भी मात्र स्वामी की कृपा से सीधे कामनारहित स्थिति में पहुँचाया जा सकता है।

यदि हम पूरी तरह से आनन्द और कृतज्ञता से भरे हुए हो सकें और पूर्णता से उपस्थित रहें, तो ऊर्जा हमारे अन्दर प्रवेश कर सकेगी और हमारी कामनाओं की पूर्ति करते हुए कामनारहित स्थिति और उससे परे ले जा सकती है। पूरी तरह से आनन्द में होना वास्तव में एक कामनापूर्ण स्थिति में पागल होना है, किस विशेष के लिए नहीं। मात्र तीक्ष्ण कामना का होना होता है, किसी विशेष चीज के लिए नहीं। इस स्थिति में हम स्वामी के समक्ष खुले हुए होते हैं और ग्रहण करने के लिए तत्पर रहते हैं। इसके लिए हमें कोई प्रयास नही करना पड़ता। हमें मात्र सारे प्रयासों को छोड़ना पड़ता है इसके लिए, बस इतना। इसके पश्चात ऊर्जा हमारा ख्याल रखेगी। शेष कार्य वह करेगी। ऊर्जा ही भौतिकता है। अस्तित्व की ऊर्जा हमारे माध्यम से बह सकती है और जो भी आवश्यक हो कर सकती है, यदि हम उसे ऐसा करने दें।

दर्शन का अर्थ होता है, स्पष्ट दृष्टिकोण का मिलना, स्पष्टता की झलक का मिलना, बिना धुँधलेपन के देखना। जिस ऊर्जा का प्रसार होगा वह स्वरूप के स्तर पर चमत्कार कर सकती है। यदि हम अपने अन्दर दर्शन काल में पर्याप्त सजगता ला सकें, तो हम देखेंगे कि उस जोश के मध्य, जो निर्मित होता है, उस संगीत और नृत्य के मध्य पूरे दृश्य में एक शांति की चमक दृष्टिगोचर होती ਗ੍ਰ और दृष्टिगोचर होती है, अस्तित्व की समुद्र की तरह गहनता। जो शोर वहाँ निर्मित होता है, उसमें हम पायेंगे वह मुख्य सूत्र तरंगमय शांति का, जो पूरे खेल दुश्य में व्याप्त रहता है। तब हम समझेंगे कि स्वरूप के स्तर पर केन्द्रि होने की अवधारणा सब कुछ समाहित करके किसी चीज का परित्याग न करके हर चीज को अपने साथ लेते हुए और फिर भी अपने आप में केन्द्रित होकर के आनन्द में रमण करते हुए संपूर्ण दृश्य का दृष्टा की तरह रहना क्या है।

हर दर्शन के पश्चात, हर स्पर्श के पश्चात हमारी ऊर्जा बढ़ती है, कामनाओं में और स्पष्टता आती है और या तो वो पूर्ण हो जाती हैं या समाप्त हो जाती हैं। स्वामी के समक्ष, हम पूर्णतः आवरणहीन होते हें। वह हमें हमेशा स्वरूप के स्तर पर देखता है। किसी चीज को माँगने का प्रयास वास्तव में किसी काम का नहीं होगा, क्योंकि हम केवल अपने गहरे भ्रम और अपनी गहरी अज्ञानता की ही अभिव्यक्ति करेंगे। हम जानते ही नहीं कि हमारी वास्तविक आवश्यकता क्या है? वो जानता है कि क्या करने की आवश्यकता है हमारे लिए, हमको आगे ले जाने के लिए।

Ùeefo nce kesâJeue Deheves Devoj cee$e mebieerle keâes ØeJesMe keâjves oW Deewj Deheves Deehe keâes DeevevoeoeÙekeâ lejerkesâ mes DeefYeJÙeefòeâ keâjves oW, Ùeefo nce hetCe& Deewj Guueefmele jns, Ùeefo nce cee$e Tpee& kesâ meeLe leejlecÙe mLeeefhele keâj mekeWâ Deewj Deheves Deehe keâes hetCe&le: Yetue mekeWâ, leye nce mJele: ner Deheves meye Skeâef$ele efkeâÙes ngS efJeÛeejeW Deewj MeyoeW mes cegòeâ nes peeÙeWies~ leye nceejs Devoj kesâJeue Keeueerheve nesiee Deewj Deevevo nesiee, peye nce efvekeâš peeÙeWies~

Fme ceve:efmLeefle ceW, nce Devoj mes mJele: ner Meeble nesles nQ, nce «enCe keâjves kesâ efueS lelhej Deewj Øesceer nesles nQ, nceejs Devoj Deebleefjkeâ Meebefle Gyeeue ceejleer jnleer nw~ leye Tpee& nceejs DevojSkeâ efkeâjCe keâer lejn ØeJesMe keâj mekeâleer nw, Skeâ #eCe ceW Jen nceejs Devoj ienjeF& lekeâ pee mekeâleer nw yeerpe mlej lekeâ Deewj nceeje heefjJele&ve Fleves lejerkesâ mes keâjsieer efpemes nce veneR peeveles~

oMe&ve kesâ meceÙe cee$e GheefmLele jnes Deewj mJeeceer keâes osKees, Ùen Deheves Deehe ceW Skeâ Guueefmele keâjves Jeeueer meeOevee nw~ efkeâmeer kesâ peerJeve ceW Ùen Skeâ ogue&Ye DeJemej nw~ Fme Jeòeâ efkeâmeer DevÙe Ûeerpe mes «eefmele nesvee efkeâmeer Yeer ™he ceW ueeYeØeo veneR nes mekeâlee~ cee$e hetCe&lee kesâ meeLe GheefmLele jnes - efyevee efkeâmeer ueesYe kesâ uesefkeâve hetCe& Øesce Deewj ke=âle%elee kesâ meeLe, Flevee heÙee&hle nw~

mJeeceer peer Fleves Ketyemetjle nQ osKeves ceW, efkeâleves ueeefuelÙehetCe& nQ, ncesMee mecceesefnle keâjves Jeeues nQ, uesefkeâve oMe&ve keâeue ceW lees Deewj ner~ Jees Skeâ oÙee kesâ meeiej keâer lejn Ûecekeâ G"les nQ, efkeâleves lejue, efkeâleves Demegjef#ele, npeejeW Fkeâªs ueesieeW keâer Meeble hegkeâej kesâ Øeefle~ nj Skeâ DeefmlelJe keâer Tpee& keâe mheMe& heelee nw pees Gmekeâer Deelcee keâes GÉsefuele keâjkesâ mJeÙeb DeefmlelJe ceW meceeefnle nesves ueeÙekeâ yevee osleer nw~ nj Skeâ Deheveer henÛeeve Keeskeâj kesâ Skeâ ceW meceeefnle nes peelee nw~

mJeeceer kesâ mJe™he kesâ nj Skeâ FbÛe kesâ ceeOÙece mes DeefmlelJe keâer Tpee& yenleer nw Deewj Deheves Deehe keâes JÙeòeâ keâjleer nw~ GvnW osKeves cee$e mes Gme meceÙe nceW nukeâer-hegâukeâer Peuekeâ Gme osJelJe keâer efceueleer nw pees Jees OeejCe efkeâÙes jnles nQ~ efpelevee DeefOekeâ nce Deheves Deehe keâes mebhetCe&, ceW efceueeÙeWies, Glevee DeefOekeâ nce Gmekesâ meeLe leejlecÙe yew"e mekeWâies Deewj Glevee ner DeefOekeâ nce pee«ele neWies, yeÇÿeeC[erÙe Tpee& kesâ mheMe& Deewj yeneJe kesâ Øeefle~

Ùener Jees meceÙe nw peye nce Deheveer ke=âeflece henÛeeve keâes leesÌ[W, Deheveer meeceeefpekeâ oMeeDeeW keâes leesÌ[W Deesj GlmeJe ceveeÙeW~ Ùen Jen meceÙe veneR nw, peye nce Deheveer kegâmeea hej šskeâ ueieekeâj yew" peeÙeW~ Tpee& nceW mheMe& keâjsieer FmeceW keâesF& mebosn veneR nw, uesefkeâve nce Kegues veneR jnWies, FmeefueS Gmes «enCe veneR keâj heeÙeWies~

Fme keâeue ceW mJeeceer kesâ efvekeâš jnves cee$e kesâ keâejCe nce GveceW meceeefnle nes mekeâles nQ Deewj ÛesleveleeDeeW keâes efceuee mekeâles nQ~ pewmes Skeâ veoer mecegõ ceW efceueleer nw, nce meceeefnle nesles nQ mJeeceer ceW pees DeefmlelJe keâe mecegõ nw, ™henerve keâe ™he nw Deewj yeÇÿeeC[erÙe hejeÛeslevee nw~ FmeerefueS nce Deevevo oMe&ve kesâ Deble ceW veÙeeheve keâe DevegYeJe keâjles nQ~ keâF& yeej lees Ùes IeCšeW lekeâ, jele Yej Ûeuelee nw~ efheâj Yeer Gmekesâ Deble ceW nj Deeoceer efkeâlevee keâcheeÙeceeve cenmetme keâjlee nw~ Ûeslevelee ceW yeoueeJe yeme Deewj TBÛes mlej hej G"e oslee nw~

oMe&ve keâeue ceW Ùeefo keâesF& mJeeceer peer kesâ efvekeâš nw, lees DeJeÛesleve YeÙe, keâecevee, ienve Meebefle, Deevevo kesâ Deßeg meye Ùee Fmemes kegâÚ DeefOekeâ GYej Deeles nQ~ nes mekeâlee nw efkeâ keâesF& Fmekeâe keâejCe Yeer ve peeves, keäÙeeWefkeâ Ùes nceejs ienjs DeÛesle mlejeW mes GYejles nQ, pees mJeeceer keâer cee$e GheefmLeefle kesâ keâejCe neslee nw~

Section 19

Fve YeeJeveeDeeW keâes ve lees efkeâmeer keâes jeskeâves keâer DeeJeMÙekeâlee nw Deewj ve ner oyeeves keâer~ mJeeceer keâer GheefmLeefle ceW FvnW mJeleb$elee mes GYejves oes~ Jes hetCe&lee mes yeenj Dee peeÙeWieer~ Jen pees kegâÚ Yeer nce JÙeòeâ veneR keâj heeles MeyoeW ceW Deewj pees kegâÚ Yeer nceejs Devoj ienjeF& mes nceejer DeÛesle mce=efleÙeeW ceW mLeeefhele nQ Deewj efpevekesâ yeejs ceW nceW keâesF& peevekeâejer veneR nw uesefkeâve Jes nceW hejsMeeve keâjleer nQ, Jes meye keâer meye YeeJeveeDeeW keâer lejn yeenj efvekeâue DeeÙeWieer~ Fve ienjeF& mes mLeeefhele mce=efleÙeeW mes cegòeâ nesves keâe Ùen ogue&Ye DeJemej neslee nw~ Ùes meejer YeeJeveeÙeW yeme peÌ[ mes meeheâ nes peeÙesieer~ mJeeceer keâer yenleer ngF& oÙee FvnW yene ues peeÙesieer~ pees oyeeJe yeveekeâj kesâ Skeâ {eBÛee nceves Je<eeX ceW efveefce&le efkeâÙee jnlee nw Jen Fme meceÙe štš mekeâlee nw, Ùeefo kesâJeue nce Skeâ DeJemej oW~

oMe&ve keâeue ceW pees kegâÚ Yeer neslee nw, Jen hetCe&lee mes neslee nw~ nce neLeeW mes leeefueÙeeB yepeeles nQ Ùee veeÛeles nQ Ùee nBmeles nQ Ùee jesles nQ - efyevee efkeâmeer leke&â kesâ, Deheves Devoj yeÌ{leer ngF& hetCe&lee keâer YeeJevee kesâ keâejCe cee$e mes~ DeeBmet Ùee nBmeer efkeâmeer efJeMes<e keâejCe pewmes KegMeer Ùee og:Ke mes veneR efvekeâueles, yeefukeâ cee$e Deheves keâes JÙeòeâ nesves keâe ceeOÙece nesles nQ~ Jen ncesMee oyee jnlee nw Deewj «eefmele jnlee nw ceefmle<keâ Éeje~ Ùen Jen meceÙe nw peye mJe™he Deheves Deehe keâes JÙeòeâ keâjele nw Deewj peye Jen JÙeòeâ keâjlee nw, lees DeefYeJÙeefòeâÙeeW keâes mebyebOeeW kesâ mJe™he ceW yeeBOee veneR pee mekeâlee, yeme Flevee~

nce efpelevee mebhetCe& Deheves Deehe keâes mecePeles nQ, Glevee nce nQ veneR~ nce JeemlJe ceW šgkeâÌ[eW ceW nQ, Skeâ-otmejs mes Deheves Devoj ueÌ[les ngS~ Skeâ #eCe nce efkeâmeer Ûeerpe keâe keâecevee keâjles nQ Deewj otmejs #eCe nce otmejer Ûeerpe keâer keâecevee keâjles nQ~ peyeefkeâ Skeâ #eCe Skeâ efJeMes<e YeeJevee G"leer nw nceejs Devoj, otmejs ner #eCe efJehejerle YeeJevee

GYejkeâj meeceves Deeleer nw~ nce Deheves Devoj yengle DeJÙeJeefmLele jnles nQ Ûeens yeenj mes nce Meeble ner keäÙeeW ve efoKeW~ oMe&ve keâeue Jen keâeue neslee nw peye nce Fme Deebleefjkeâ mebIe<e& keâe heefjlÙeeie keâj mekeâles nQ Deewj mJeeceer keâes Deheves Thej DeefOekeâej osles ngS pees Yeer DeeJeMÙekeâ nes, Jen GvnW keâjves oW~ Jese nceW peeveles nQ Deewj Jees pees DeeJeMÙekeâ nesiee Jees keâjWies~ Ùeefo kesâJeue nce Deejece mes jnW Deewj Ùen nesves oW~ oMe&ve keâeue Jen meceÙe nw peye Deheveer mecemle meerKe keâes Skeâ efkeâveejs jKe oW, meejs Skeâef$ele efveCe&Ùe, meejs efve<keâ<e& Deheves yeejs ceW Skeâ efkeâveejs keâj oW Deewj Deheves Deehe keâes hetCe&le: Keesue oW, mJeeceer kesâ heefjJele&ve keâjves Jeeues Øesce kesâ Øeefle~

nj oMe&ve kesâ meeLe mJeeceer nceejs mJe™he keâes ØekeâeefMele keâjles nQ~ JeemleefJekeâ ™he Gvemes Fmeer meceÙe hej neslee nw, Jen Debeflece neslee nw, pees Jees nceW osles nQ~ Jese nceW Dehevee ØekeâeMe osles nQ, Skeâ yeej peye Jees nceW ØekeâeefMele keâjles nQ, Ùeefo nce ÛeenW, nce Gme ØekeâeMehegbpe keâes Deheves meeLe ues pee mekeâles nQ, peneB Yeer nce nQ, peneB Yeer nce peeÙeW Deewj pees Yeer nce keâjW~ cee$e Skeâ mheMe& heÙee&hle nw, Ùen Skeâ DeJemej nw peeveves keâe efyevee %eeve kesâ, DevegYeJe keâjves keâe efyevee JÙeeKÙee kesâ~

Deewj Ùeefo Fme Tpee& ves nceW ienjeF& mes mheMe& keâj efoÙee, nceeje peerJeve heefjJeefle&le nes peeÙesiee ncesMee kesâ efueS~ Skeâ mLeeve keâe efvecee&Ce nceejs Devoj nesiee, peneB mepeielee ØeJesMe keâj mekesâieer Deewj meejs ØeMveeW keâes meguePee osieer~ hejcemeòee kesâ efueS yengle mes ojJeepes nQ~ Skeâ yeej legce ØeJesMe keâjesies DevegYeJe Skeâ ner nesiee~ oMe&ve keâeue efpeleves Yeer ojJeepes nQ, Gve meyekeâes Keesue oslee nw~ Debeflece DevegYeJe kesâ efueS Ùen Skeâ efveceb$eCe nw~ nj Skeâ keâe ojJeepee efYeVe nw, ojJeepee cenlJehetCe& veneR nw, peneB lekeâ efkeâ legceves Skeâ ojJeepee hee efueÙee nes~

oMe&ve keâeue ceW Øemeeefjle Tpee& Fleveer ienve nesleer nw efkeâ Jen legcnejs efJeÛeejeW keâes Fleveer cepeyetleer os osieer Devlej %eeve kesâ Éeje ceeie& efveoxMeve kesâ Øeefle~ Jen nceejer yegefæceòee keâes Fme lejn mes ØekeâeefMele keâjsieer, pees nceW yegefæ mes Devlej keâer lejheâ ues peeÙesieer~ nce DeefOekeâlej meceÙe «eefmele jnles nQ, Deheves ceve kesâ ienjs DeÛesle efveCe&Ùe uesves keâer lejheâ~ Devlej %eeve keâer Meefòeâ mes nce Deheves mJe™he keâer Tpee& keâer ceoo ues mekeâles nQ, efveCe&Ùe uesves ceW, pees peerJeve kesâ efkeâmeer Yeer #es$e mes mebyebefOele nes~ oMe&ve keâeue keâer Tpee& Ssmeer nesleer nw efkeâ nceejs Devoj Devlej %eeve keâer Meefòeâ keâes Keesue mekeâleer nw~

nce nes mekeâlee nw, oMe&ve keâeue ceW pees neslee nw, Gmekeâer ienjeF& keâes ve mecePe heeÙeW, Jen ØeÛeC[ Ghenej pees nceW efoÙee peelee nw, uesefkeâve nce Ùen lees keâjves keâe ØeÙeeme keâj mekeâles nQ efkeâ nce Kegues ngS jnW Deewj Deevevo uesles ngS Keguesheve mes Gmekeâe mJeeiele keâjW, Mes<e mJele: ner nes peeÙesiee~

Deevevo oMe&ve keâeue Skeâ meceÙe nw peye nce mJeeceer kesâ efvekeâš Dee mekeâles nQ, peye nce Gvekesâ Øesce keâes Gvekeâer Yeeweflekeâ efvekeâšlee mes DevegYeJe keâj mekeâles nQ, Gvekesâ Devoj keâer Tpee& keâe Deheves Devoj mLeeveevlejCe DevegYeJe keâj mekeâles nQ~ pees meye nce veneR nQ, pees meye nceejs Devoj Yeüce keâe keâejCe nQ, nceejs Devoj keâer meYeer Deejesefhele keâeceveeSB pees nceW heerÌ[e os jner nQ, oMe&ve Gve meyekeâes ve° keâj mekeâlee nw~ oMe&ve keâeue Skeâ ØeÛeC[ DeJemej nw Skeâ nesves keâe Gme yeÇÿeeC[erÙe hejeÛeslevee mes, hejceevevo kesâ mecegõ ceW meceeefnle nesves keâe~