3. ईर्ष्या से मुक्ति
# ईर्ष्या से मुक्ति
अब हम 'विशुद्धि चक्र' को देखेंगे जो स्थित है कण्ठ क्षेत्र में। संस्कृत में 'विशुद्धि' का अर्थ है 'शुद्धि और अशुद्धि से परे'।
यह चक्र बाधित रहता है तुलनाओं से और ईर्ष्या से और इसे खिलाया जा सकता है, जब हम अपनी विशिष्टता की अभिव्यक्ति बिना दूसरों की चिंता किये करते हैं और अपनी पूरी एकाग्रता, पूरी क्षमता और पूरी रचनात्मकता से अपने आप को व्यक्त करते हैं।
(ध्यान तकनीक : शक्ति सागर ध्यान - जेन बौद्ध धर्म से ली गयी तकनीक)
हम हमेशा अपनी तुलना दूसरों से करते हैं और अक्सर हम ये महसूस करते हैं कि जो कुछ दूसरों के पास है या जो दूसरों ने प्राप्त किया है वो अपेक्षाकृत अधिक है उससे जो हमारे पास है, और ईर्ष्या का अनुभव करने लगते हैं। जब हम दूसरों की उत्कृष्टता बर्दाश्त नहीं कर पाते तो हम ईर्ष्याग्रस्त हो जाते हैं। तुलना बीज है और ईर्ष्या उसका फल।
तुलना और ईर्ष्या दोनों वास्तव में अस्तित्वहीन हैं। हम स्वयं उसका निर्माण करते हैं और एक न खत्म होने वाली, उस पर चर्चा करते हैं कि कैसे उस पर विजय प्राप्त करें। इस धारणा को बहुत स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है, इस चक्र के नाम को ही देखकर के जिसे विशुद्धि कहते हैं।
शुद्धि का अर्थ है निर्मल। अशुद्धि का अर्थ है, अनिर्मल। विश्रद्धि का अर्थ है, निर्मलता और अनिर्मलता से परे। इस नाम का अर्थ इसलिए यह है क्योंकि इस चक्र को कभी भी अशुद्ध किया ही नहीं जा सकता और इसलिए इसे शुद्ध करने
की कभी आवश्यकता ही नहीं होती। यही कारण है कि तुलना जो इस चक्र को बाधित करती है वह एक परछाँई की तरह है, किसी चीज की, बिना उस चीज के। तलना की धारणा का कोई आधार नहीं है। यह शुद्ध रूप से हमारी परिकल्पना की रचना है।
एक छोटी कथा :
एक व्यक्ति था जो उस संगीत समूह का सदस्य था, जो सारे विश्व में संगीत कार्यक्रम किया करता था।
एक विशेष कार्यक्रम में उसने कुछ गानों पर लाल बालों की टोपी (Wig) और कुछ पर काले बालों की टोपी पहनने का निर्णय लिया। उसने बालों की टोपियाँ बदल-बदल कर आधा कार्यक्रम पूर्ण किया। मध्यान्तर के समय कार्यक्रम के निदेशक ने उससे आकर कहा, "महोदय, बचे हुए कार्यक्रम में आपको केवल लाल बालों वाली टोपी ही पहननी है। "
उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ और उसने पूछा, क्यों?
निदेशक ने उत्तर दिया, ''लोग लाल बालों वाले की आवाज को ज्यादा पसन्द कर रहे हैं बजाय काले बालों वाले की आवाज को।''
हम हर समय तुलना करने में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि हम चीजें जैसी है वैसा देख ही नहीं पाते। हमारा मस्तिष्क तुलना से इतना ग्रसित रहता है कि जिस को वो देखता है उसके वास्तविक गुण को देखने से चूक जाता है। हमें इस तुलना करने की प्रवृत्ति को त्यागने की आवश्यकता है जिससे कि हम चीजों को उस रूप में देख सकें, जिस रूप में वो हैं।
तुलना है क्या?
क्या कोई मुझे बता सकता है, वो कौन से महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जिनमें हम सामान्यतः तुलना करते हैं? मुझे विश्वास है कि तुम इस पर जरूर बता सकोगे।
(श्रोताओं) का प्रयास)
खूबसूरती स्वामी जी..........
हाँ! खूबसूरती, हर आदमी के अपने तुलना के क्षेत्र होते हैं। ठीक है, दूसरा। सम्पत्ति. . . . . . . .
नाम और ख्याति ........
शक्ति और प्रतिष्ठा...................
ज्ञान...........
स्वास्थ.................
ठीक है, ये सारे क्षेत्र हैं तुलना के जहाँ हम सामान्यतः अपनी दूसरों से तुलना करते हैं, क्या ऐसा नहीं है? हम इन्हें चार वर्गों में बॉट सकते हैं : धन, ज्ञान, खूबसूरती जिसमें स्वास्थ जुडा हुआ है, और स्तर। तुम्हारी सारी समस्याएँ, सारे पूर्वाग्रसन और कुछ नहीं बल्कि ये चार वर्ग हैं, ठीक है न?
अब .............हम कहते हैं कि संसार के सारे लोगों की, धन के दुष्टिकोण से बढते हुए क्रम में एक पंक्ति बनाओ। तुम भी उस पंक्ति का भाग हो। तुम्हारी समझ में उस पंक्ति में तुम कहाँ होगे?
कहीं बीच में स्वामी जी.........
निश्चित रूप से। तुम कहीं बीच में ही होगे, क्या ऐसा नहीं है? तुम्हारे आगे और पीछे दोनों तरफ जो लोग होंगे तुम इनकी गिनती तो कर नहीं पाओगे। तुम्हारे आगे भी इतने अधिक लोग होंगे और तुम्हारे पीछे भी इतने अधिक लोग होंगे।
और लोगों को अपनी जगहें बदलनी भी पड़ती रहेंगी, क्योंकि जो धन उनके पास है वो हर क्षण बढ़-घट रहा है। अब अपने विचारों से तुम्हें निर्णय लेना है, यदि तुम अपने सामने की पंक्ति की लम्बाई देखो और ईर्ष्या का अनुभव करो या अपने पीछे ही पंक्ति की लम्बाई देखो और आराम से ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करो। ये तुम्हारे हाथ में है।
तुम अच्छी तरह से जानते हो कि इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि उस पंक्ति में तुम्हारी स्थिति क्या है, परन्तु विचार तुम्हें निरंतर परेशान करते हैं। हम इस एक ऐसे तथ्य से परेशान हो जाते हैं, जिसका वास्तव में कोई अस्तित्व है ही नहीं। उसका नकारात्मक अस्तित्व है।
मैं तूम्हें समाझाता हूँ नकारात्मक अस्तित्व से मेरा क्या अर्थ है। इस घण्टी को ही लो. जो मेरे बगल में है। यदि मैं इस घण्टी को हटाना चाहूँ, मैं मात्र इसे ले जाकर कमरे के बाहर रख दुँगा और फिर वो उस कमरे में नहीं होगी, मैं ठीक हूँ न? क्योंकि इस घण्टी का एक भौतिक अस्तित्व है इसलिए यह करना मेरे लिए संभव है। अब, हम कहते हैं इस कमरे में अंधकार है। क्या ये संभव है कि इस अंधकार को ले जाकर बाहर कर दिया जाए।
नहीं............
परन्तू यदि मैं इस कमरे में प्रकाश ले आऊँ, अंधकार अपने आप अदृश्य हो जाएगा, सही है? यह इसलिए है, क्योंकि अंधकार का कोई सकारात्मक अस्तित्व veneR nw, Gmekeâe vekeâejelcekeâ DeefmlelJe nw~ Deye keäÙeeWefkeâ Gmekeâe vekeâejelcekeâ DeefmlelJe nw, nce Gmekeâes cee$e nše veneR mekeâles~
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Section 2
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उसने अपने मित्र से टिप्पणी की, "उच्चति ने आस-पास पड़ोस का स्वरूप ही बदल दिया।''
मित्र ने उत्तर दिया, "नहीं, उन्नति ने नहीं, मात्र ईर्ष्या ने।"
हम हर समय दूसरे को परास्त करने के लिए प्रयासरत रहते हैं। जब तूम दूसरों से ली गयी कामनाओं के पीछे, जाओ, तुम कभी नहीं रुकोगे। क्योंकि जब तुम उनमें से एक कामना की पूर्ति के कगार पर होगे, दूसरी माँगी हुई कामना सामने आयेगी कहीं से और तुम पुनः उस कामना के पीछे चलोगे।
तुम लगातार भागते रहोगे, क्योंकि तुम अपने आप में केन्द्रित ही नहीं रहते। तुम्हारा केन्द्र बदलता रहता है। तुम्हारा केन्द्र दूसरों पर स्थित होता है, अपने आप के अंदर नहीं और उनके केन्द्र कहीं और रहते हैं, उनके भी अन्दर नहीं। कल्पना करो कि तुम्हें कितना भागना पड़ेगा, कितनी खींचातानी करनी पड़ेगी इस विशाल अनियंत्रित अतिरिक्त कामनाओं और भावनाओं के समूह में। तुम एक कठपूतली बन जाते हो।
मैं तुमसे बताता हूँ : जब भी तुम्हें किसी चीज की इच्छा हो, अपने आप में एक जगह बैठ जाओ और सोचो क्या तुम वास्तव में उस चीज को चाहते हो या तुम उस चीज की कामना इसलिए करते हो क्योंकि वह किसी दूसरें के पास भी है। अपनी हर कामना का ईमानदारी से विश्लेषण करो, जब भी वो बली हों। अपनी प्रतिष्ठा की सारी समस्या का परित्याग कर दो और आत्मविश्लेषण करो। यदि तुम अपनी प्रतिष्ठा का परित्याग अकेले में नहीं कर सकते, तुम उसका परित्याग कैसे करोगे, जब तुम लोगों के साथ होगे?
यदि तुम केवल अपनी कामनाओं को जी सको, तुम एक शांतिपूर्ण मृत्यु को प्राप्त होगे, पूर्णतया संतुष्ट चाहे वह किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर ही क्यों न हो। यदि तुम पूरे जीवन माँगी हुई कामनाओं के साथ जियोगे, तो तुम वास्तविक परिपूर्णता कभी नहीं देखोगे चाहे तुम संगमरमर के घर में ही क्यों न रह रहे हो, तुम्हें एक बहुत लम्बी मृत्यू प्राप्त होगी, खींचतान के साथ, अतृप्त कामनाओं से मुक्त हुए बगैर।
जैन धर्म में एक ऐसा विश्वास है कि जब तुम्हारा जन्म होता है, तुम्हारे साथ जीवन भर की आवश्यकतानुसार खाने-पीने की चीजें और ऊर्जा भेजी जाती है। यही तरीका है यह कहने का कि तुम्हारी सही आवश्यकताएँ इस जन्म में स्वयं अस्तित्व पूरी करता है, ऊर्जा के साथ तुम्हें इस पृथ्वी ग्रह पर भेजने के पूर्व।
परन्तू जब तुम इस ऊर्जा को माँगी हुई कामनाओं की पूर्ति में लगाने लगते हो, तब यह कम पड़ती है और तुम यह महसूस करना शुरू कर देते हो कि तुम्हें कुछ दिया ही नहीं गया और पर्याप्त कुछ भी नहीं है। तूम थकावट महसूस करते हो, पूर्णता खाली और हतोत्साहित कि कुछ हुआ ही नहीं। इस तरह से समस्या शुरू होती है।
तुम देखो : एक फर्क है आवश्यकताओं में और कामनाओं में। तुम्हारी आवश्यकताओं का किसी न किसी तरह से पहले से ही ख्याल रखा जाता है। यह संभव है कि तुम्हारी आवश्यकताओं की पूर्ति की जाये, लेकिन तुम्हारी कामनाओं को पूर्ण करना असंभव हो जाता है, क्योंकि वह परिवर्तनशील हैं और अस्पष्ट हैं हर समय। हर बार एक कामना पूर्ण की जायेगी, सौ और पैदा हो जायेंगी।
कभी न खत्म होने वाली कामनायें करना हमारी प्रकृति है, केवल हम दूसरों को देखते रहते हैं कि उनके पास क्या है और लगातार वो सब चीजें हमारे पास भी हों, इसकी कामना करते रहते हैं। शुरू में हो सकता है कि तुम इस तथ्य को जैसा है उस रूप में स्वीकार न करो, परन्तु यदि तुम अपना गहराई से विश्लेषण करोगे, तो तुम देखोगे कि यह सत्य है। तुम्हारा मस्तिष्क इतनी कुटिलता और इतने परोक्ष रूप से खेल खेलता है कि तुम इस बात को पहले तो मानोगे ही नहीं।
उदाहरण के लिए : तुम एक दुकान पर घर घर के लिए पंखा खरीदने जाते हो। लेकिन रास्ते में सड़क पर तुम्हें कुछ मित्र मिल जाते हैं, जो तुम्हें बताते हैं कि वे भी कुछ और चीजें खरीदने जा रहे हैं, किसी अन्य दुकान से। तत्काल, तुम प्रलोभित होते हो उन चीजों को खरीदने के लिए, इसलिए तुम अपना मार्ग बदल देते हो और उन लोगों के साथ जाकर खरीदते हो। तब तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारे पास पंखा खरीदने के लिए पर्याप्त धन नहीं है।
यदि तुम दूसरों से तुलना करना और दूसरों की कामनाओं के हिसाब से जीना शुरू कर दोगे तुम अपने आप को बहुत गहरी समस्या में डालोगे, क्योंकि तुम जानोगे ही नहीं कि तुम कहाँ खड़े हो। हमेशा अपने आप को अपने ही माप पर तौलों, दूसरों के माप पर कभी नहीं। यह सबसे मूर्खतापूर्ण और खतरनाक चीज होती है।
भारत में कई स्थानों पर तुम देखोगे : बन्दरों को अभ्यास कराकर नचाने वाले लोग होते हैं, जो उसी से अपना जीविकोपार्जन करते हैं।
वो अपने साथ एक छड़ी लिए रहते हैं जिसका, जो वो चाहते हैं बन्दर करे, उसके लिए प्रयोग करते हैं। वे छड़ी घुमाते हैं और चिल्लाते है, "नाचो राम! नाचो!" और बन्दर नाचता है।
उसके बाद वो कहते हैं, "बैलगाड़ी का पहिया घुमाओं राम। बैलगाड़ी का पहिया
घुमाओ।" और तब बन्दर बैलगाडी का पहिया घुमाता है।
बन्दर मात्र उस छडी के इशारे पर नाचता है।
इसी तरह से, हम एक छड़ी जिसे तुलना कहते हैं से अपना जीवन चलवाते हैं। हम उसकी धुन पर नाचते हैं, वो चीजें करते हैं जो हमारी चीजें नहीं होतीं, परन्तु वो चीजें करते हैं जिन्हें छड़ी निर्देशित करती हैं।
तुलना का कोई अन्त नहीं है, हमारी अपेक्षाओं का भी कोई अन्त नहीं है। हम हमेशा अधिक, अधिक और अधिक की माँग करते रहते हैं। तुम लगातार चूहे की दौड़ में रहते हो। तब तुम कैसे आराम महसूस करोगे और कैसे सुखी होगे, और कैसे परिपूर्णता का अनुभव करोगे? और वो चूहे की दौड़ है, उसे यदि तुम जीत भी गये, तुम चूहे के चूहे ही रहोगे।
लेकिन किसी तरह, जीवन के आखिर में, समय के किसी बिन्दु पर, तुम समझ जाते हो कि उस चूहे की दौड़ में जीत का भी कोई मतलब नहीं है। क्योंकि उससे भी परिपूर्णता नहीं मिलती, सफलता भी एक प्रकार का गहरा असंतोष पैदा करती है। यह इसलिए क्योंकि जब तुम अपने जीवन की भौतिक कामनाओं को वाह्य जगत में पूर्ण कर रहे थे, तब तुमने अपने आप के स्वरूप का ध्यान नहीं दिया। असंतोष की यह पुकार तुम्हारे अन्तरस्वरूप की है। जब तुम इसे समझते हो, तूम आध्यात्मिकता की तरफ घूमते हो, हालांकि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और तुम उसे नहीं समझते, तो तुम हतोत्साह की तरफ घूमते हो, क्योंकि तुम यह जानते ही नहीं कि तुम चूके कहाँ हो, तुम जानते ही नहीं कि सूत्र है कहाँ, तुम नहीं जानते तुमने उसे कहाँ खोया, तुम्हें यह पता भी नहीं रहता कि तुमने कहाँ गलती की।
Section 3
मैं तुम्हें अपना अनुभव बताता हूँ - अस्तित्व तो हर समय हमारे ऊपर बरसात कर रही है। इतनी प्रचुरता है वहाँ। लेकिन हम असंतुष्ट रहने का इतना बढ़िया अभ्यास किये हैं, इतना असंवेदनहीन हो गये हैं, कि हम हमेशा और अधिक चाहते हैं क्योंकि किसी अन्य के पास हमसे ज्यादा है, यह ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तुलना हमारे अन्दर की अचेत प्रक्रिया बन चुकी है, क्योंकि हम अपने आप में केन्द्रित होकर के पूर्णता का जीवन जीना जानते ही नहीं।
एक छोटी कथा :
एक व्यक्ति जंगल में कठोर तपस्या कर रहा था, इसलिए कि ईश्वर उसे दर्शन दें।
ईश्वर ने क्रपा की और उसके सामने प्रकट हुये। उन्होंने उससे कहा कि वो क्या चाहता है।
वह व्यक्ति आनन्द से ओत-प्रोत हो गया और कहा कि वो एक जमींदार था और उसकी सारी सम्पत्ति खो गयी है वह चाहता है एक बार फिर धनवान होना।
ईश्वर को उस पर दया आयी और उन्होंने कहा कि दूसरे दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक जितना क्षेत्र वो दौड़कर घेर लेगा, वो उसी का होगा।
वह व्यक्ति अत्यधिक खुश हुआ, दूसरे दिन व सूर्योदय के पूर्व से ही दौड़ने लगा।
वह दौड़ा जितनी तेजी से वह दौड़ सकता था।
दोपहर के आस-पास जब उसे भूख ने सताना शुरू किया, तो भी उसने ध्यान नहीं दिया और दौडता रहा।
सूर्यास्त से थोडा पहले थकान और प्यास ने उसे ग्रसित कर लिया, परन्तु उस पर, अपने पड़ोसी जमींदार जिसके पास कई एकड़ जमीन थी, इस विचार का अंकुश था। उसके समकालीन धनियों की तस्वीर उसके आँखों के सामने नाचती थी, जब वो दौड रहा था।
सूर्यास्त के थोड़ा पहले उसे कमजोरी महसूस हुई और चक्कर आने लगा, परन्तु वह कुछ कदम और चला।
सूर्यास्त हुआ, वो लड़खड़ाया..........और गिरकर मर गया।
इसी तरह से हम सब अपना जीवन जी रहे हैं। हम दौड़ में दौड़ रहे हैं रुककर के बिना यह सोचे हुए कि हम क्यों दौड रहे हैं। शंकराचार्य ने खुबसुरती से इसका वर्णन किया है - 'तथ किम, तथ किम' जिसका अर्थ है 'इसके बाद क्या, इसके बाद क्या।'
हम हर समय यही सोचते रहते हैं, "इसके बाद क्या।" यह है जो हमारे दौड़ने का कारण है।
एक दूसरी छोटी कथा :
चन्दबासू अपने घर के दरवाजे पर रोते हुए पाये गये।
उनके एक मित्र ने पूछा, क्या कारण है?
उन्होंने कहा, "मेरी बडी चाची मेरे लिए अपनी सारी सम्पदा छोडकर मर गयीं। ''
मित्र परेशान हुआ और पूछा, "लेकिन वो तो बहुत वृद्ध थीं और दूसरी तरफ उन्होंने अपने सारी सम्पत्ति तुम्हारे लिए छोड़ी। तुम रो क्यों रहे हो?"
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चन्दा ने उत्तर दिया, "तूम नहीं जानते - उससे एक सप्ताह पहले, मेरे चाचा मर गये थे और अपनी सारी सम्पत्ति मेरे लिए छोड़ गये थे।''
मित्र परेशान हुआ और पूछा, "उसके बाद तुम क्यों रो रहे हो?"
चन्दा कहता रहा, "उससे भी एक सप्ताह पहले, मेरी चाची मर गयीं अपनी सारी सम्पत्ति मेरे लिए छोडकर के।''
मित्र समझ नहीं पाया कि ये सब चन्दा के रोने का कारण कैसे हो सकता है।
उसने पूछा, "चन्दा, कृपया मुझे बताओं कि इन सब चीजों के लिए तुम क्यों रो रहे हो?''
चन्दा बोला, "तुम नहीं जानते, मेरे और कोई रिश्तेदार नहीं है, जो मरकर मेरे लिए अपनी सम्पत्ति छोड़ें।"
निश्चित रूप से, यह बढ़ा-चढ़ाकर कही गयी कथा है, परन्तु हम इसी तरह के हैं, यहाँ बहुत स्पष्ट रहो। हम यही देखते रहते हैं कि हर क्षण हम जीवन से क्या छीन सकते हैं। हमारा सारा तथाकथित प्रेम और कुछ नहीं, अपितु समझौता है। कुछ मामलों में, वह समग्र है और सब द्वारा देखा जा सकता है, और अन्य मामलों में, वह सूक्ष्म है और आसानी से अनुभव नहीं किया जा सकता। वास्तव में, यह इतने अचेत तरीके से खेला जाता है तुम्हारे द्वारा कि तुम सोचते हो कि यही सही प्रेम है।
तुलना का मूल कारण यह है कि हम अपने आप में परिपूर्णता का अनुभव नहीं करते, जो कुछ भी हमारे पास है हम उससे खुश नहीं है। मात्र 24 घण्टे के लिए, प्रातःकाल से रात्रि तक, जरा सोचो कि तुम्हारे देखने की क्षमता चली गयी। अपना हर कार्य आँखे बंद करके करने का प्रयास करो। कुछ ही क्षणों में मात्र तूम महसूस करोगे कि तुम्हारी असीमित दिनचर्या परिकल्पना से परे हो गयी है। 24 घण्टे क्यों, मात्र कुछ क्षणों में तुम परेशानी को समझोगे। तुम जब नेत्र खोलेगे और इस संसार को पुनः देखोगे, तब तुम समझोगे कि तुम्हारे लिए देखने की क्षमता कितनी बड़ी राहत है। तब शायद तुम ईश्वर को अपनी देखने की क्षमता के लिए धन्यवाद दोगे।
क्या तूम अपनी तुलना उन लोगों से कभी करते हो, जिनके पास देखने की क्षमता नहीं है और क्या तब तुम ईश्वर को धन्यवाद देते हो कि तुम्हें ये क्षमता प्राप्त है। क्या तूमने कभी अपनी इच्छा से, अपनी आँखों के लिए ईश्वर के प्रति आभार महसूस किया है? नहीं, क्यों नहीं? क्योंकि जो कूछ भी तुम्हें दिया गया है उसे तुम हमेशा अपने अधिकार के रूप में लेते हो, जैसे ये तो तम्हें मिलना ही
था। यही कारण है। तुम सोचते हो : यह तो है ही, अब देखना है और क्या है? हम तीन धूरी पर क्रियाशील रहते हैं, करना, पाना और होना। करना है पाने के लिए, होने पर आनन्दित न होना, हमारी समस्या का मूल कारण है। करना पाने से तारतम्य नहीं बैठा पाता है। हम जब भी कार्य करते हैं मेहनत के साथ एक कामना को पूर्ण करने के लिए और अधिक कामनाएँ रहती हैं जो हमें दौड़ाती रहती है।
ऐसा कभी मत सोचो, कि अभी मुझे कार्य करने दो, सूख बाद में लूँगा। ये कभी मत सोचो कि वापस लौटकर बाद में सुख लोगे। मैं तुम्हें बताता हूँ : ये कभी नहीं होगा हर कल आज के रूप में ही आयगा। करना हर क्षण होने की तरफ ही ले जाना चाहिए केवल तब तुम सही रास्ते पर होगे।
हर क्षण के जीने को टालो मत उत्सव मनाओ जीवन का आनन्द लो - या तो ये अभी है या कभी नहीं। हम सारे जीवन भागते रहते हैं ये सोचते हुए कि हम बाद में सुख लेंगे, परन्तु हम अन्ततोगत्वा कब्र में पहुँच जाते हैं। जब तुम दौड़ने वाले रास्ते पर होते हो, तुम सुख लेने की वास्तविक क्षमता को भी खो देते हो। कैसे सुख लेना चाहिए तुम ये भी भूल जाते हो।
जैसा वे कहते हैं, किसी चीज का पीछा करने में जितना सुरख है, उतना प्राप्त करने में नहीं है। हमेशा, जब तक तुम किसी चीज का पीछा करते रहते हो, ऐसा लगता है कि वह सारे संसार के बराबर है - परन्तु जब तुम उसे पा जाते हो, किसी तरह से वो और ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रह जाता। यदि तुम अपने आप के बारे में सजग हो जाओ और ये समझ जाओ कि वास्तव में तुम क्या चाहते हो और अकेले वही करने का प्रयास करो, तुम अपने आप को इस तरह की आत्म विरोधी दुकड़ों में बँटी हुई स्थिति में कभी नहीं पाओगे।
महर्षि रमण बहुत खूबसूरत तरीके से कहते हैं :
अदईवदर मुन कदुगे आनालुम मालाया काट्टी।
अदईन्दा पिन मलये आनालुम कदुगई काड्डुम माया मानम। ।
इसका अर्थ है, मन वह भ्रम है जो एक छोटे से सरसों के बीज को बहुत बड़े पहाड़ के रूप में दिखाता है जब तक वह प्राप्त नहीं हो जाता, और पहाड़ को गैर महत्वपूर्ण बना देता है, एक सरसों के बीज के बराबर एक बार जब वह प्राप्त हो जाता है।
इस तरह के व्यवहार का मूल कारण तुलना ही है। मस्तिष्क अपनी आस-पास की चीजों को देखता है और उसके साथ खेलता है। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम अपनी समस्त कामनाओं का परित्याग कर दो। मैं तुमसे ये भी नहीं
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हर व्यक्ति अपने आप में विलक्षण है। क्या तुम शेर की तूलना घोड़े से कर सकते हो? क्या हम कभी अपना तूलना फलों से, पक्षियों से या पहाड़ों से करते हैं? हम मात्र उनकी खूबसूरती का आनन्द लेते हैं, क्या ऐसा नहीं है? इसी तरह से, तुम दूसरे मनुष्यों को देखकर के आनन्द क्यों नहीं लेते हो?
हालांकि मानव देखने में एक जैसे लगते हैं, हर एक विशिष्ट है और अलग मार्ग पर यात्रा कर रहा है। जब तक तुम अपने मार्ग पर पूरी एकाग्रता से चलते रहोगे, तुम हर क्षण परिपूर्णता का अनुभव करते रहोगे। तुम यह बात जान भी नहीं पाओगे कि दूसरे के मार्ग को देखने का मतलब क्या होता है।
एक छोटी कथा :
एक व्यक्ति कार चला रहा था एक गाँव की अँधेरी सड़क पर, जिस पर मार्ग प्रकाशक नहीं थे।
उसने आगे जाती हुई कार के पीछे चलना सुरक्षित समझा।
वे कुछ दूर तक गए और अचानक आगे वाली कार रुक गयी।
पीछा करने वाला आगे वाली कार से भिड़ गया।
"तुमने रुकने का संकेत क्यों नहीं दिया?" वह जोर से चीखा।
आगे वाले चालक ने सिर बाहर निकाल कर कहा, "अपने गैरेज में भी। ''
यदि तुम अपने मार्ग पर ध्यान केन्द्रित करो, तो तुम निरंतर उच्चति करोगे और तुम्हारी क्षमता का विस्तार होगा। तुम्हें अपनी तुलना केवल अपने आप से करनी है, दूसरों से कभी नहीं। तुम्हें अपने आप पर विजय प्राप्त करनी है, अपने आप से दूसरों से नहीं। हर क्षण दूसरों से तुलना समय की बर्बादी है जो तुम्हारी उन्नति में नहीं लगता।
एक छोटी कथा :
एक व्यक्ति 1,000 मीटर की दौड़ में दौड़ रहा था।
200 मीटर दौड़ने के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा, बाकी लोगों को जो उसके पीछे दौड़ रहे थे। वह खुशी से दौड़ता रहा।
500 मीटर दौड़ने के बाद उसने फिर पीछे मुड़कर देखा और खुश था कि वह अभी भी आगे है और दौड़ता रहा।
हर कुछ मीटर के बाद यह वही करता था और अन्त में दौड़ जीत गया। यदि उस व्यक्ति ने पीछे मुड़कर न देखा होता और केवल तेज दौड़ने पर ध्यान केन्द्रित करता, तो भी वह जीत जाता लेकिन और कम समय में। शायद उसने नया कीर्तिमान स्थापित किया होता। इसी तरह से, हमारे जीवन में भी, अगर हम पूर्णता से ध्यान केन्द्रित करें केवल अपनी उन्नति के प्रति दूसरों के प्रति ध्यान देने की अपेक्षा, हम अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर सकेंगे। लेकिन हम दूसरों को देखते रहते हैं और चूक जाते हैं अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने से।
अपने आप को एक कमरे के अन्दर बंद कर दो और इस बात का विश्लेषण करो कि तुम कितनी ऊर्जा और समय दूसरों से तुलना में बर्बाद करते हो, मुझे विश्वास है 60 प्रतिशत से अधिक।
तुलना और ईर्ष्या खास तौर से, किसी भी अन्य चीज से ज्यादा तुम्हारी ऊर्जा को बर्बाद करती है। तुम्हारा मन इतना व्यस्त हो जायेगा और गणना करता रहेगा, किस तरह से दूसरे लोग अन्य चीजों को प्राप्त किये हैं। तुम्हारा मन इतना गर्म हो जायेगा और तुम्हारी पूरी कार्य प्रक्रिया इस अवांछित गणना से नकारात्मक रूप से प्रभावित होगी। तुम मात्र अपनी ऊर्जा को बिना समय खोये हुए तुलना और ईर्ष्या के कारण बहा देते हो।
हम हर समय पेट्रोल, पानी और बिजली की बचत करने की बात करते हैं। अपनी ऊर्जा की बचत करने के बारे में क्या करें? अपनी ऊर्जा को उचित तरीके से इस्तेमाल करने के बारे में क्या करें? हम अपनी ऊर्जा के बारे में सजग क्यों नहीं हैं? हम क्यों नहीं समझते कि हमें ऊर्जा आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त हुई, कारण यह है। हम वाह्य ऊर्जा को बर्बाद होता देखते हैं इसलिए कि वह देखी जा सकती है और छूई जा सकती है। जबकि हमारी अपनी ऊर्जा, हम गहरे असजग तरीकों से छितराकर के नष्ट करते हैं और उसके पश्चात इस बात की शिकायत करते हैं कि हमें पर्याप्त दिया नहीं गया।
यदि तुम अपनी समस्त ऊर्जा को अपने विस्तार में लगाओं, तो मात्र परिकल्पना करो कि तुम क्या पा सकते हो। तुम्हारा विस्तार इतना हो सकता है कि तुम मुक्ति को अनुभव करके आनन्दित हो सकते हो।
देखो, तुलना के बारे में एक चीज है और तुम हमेशा अपना माप अपने आप की सबसे कमजोर कड़ी से करते हो या अपने प्रदर्शन से करते हो। परेशानी यह है। तुम ये क्यों करना चाहते हो? अपना माप सबसे कमजोर कड़ी से कभी मत करो। तुम्हें अहंकारी नहीं होना है और सबसे बड़े होने का दावा नहीं करना है। लेकिन तुम्हें कुछ आत्म सम्मान रखना है और देखना कि तुम अपने आप में विलक्षण हो उसके पश्चात् तुम अपना माप इस तरीके से नहीं करोगे।
जब तुम्हारे अन्दर आत्म सम्मान होगा, तुम इस बात का सम्मान करोगे कि हर एक विलक्षण है और समझोगे कि तुलना करने की कोई जगह ही नहीं है। अपने स्वरूप के प्रति कृतज्ञ होने का यह पहला कदम होगा।
एक छोटी कथा :
एक राजा एक स्वामी के पास गया कुछ जादुई ताकतों को प्राप्त करने के लिए, जिससे कि वो अपने पड़ोस के राजाओं से अधिक शक्तिशाली हो जाए।
वह स्वामी के समक्ष बैठा और उसे बताना शुरू किया वहाँ आने का कारण।
स्वामी ने धैर्यतापूर्वक राजा की बात सुनी।
उसके बाद स्वामी ने उनसे बगीचे में जाने को कहा, जहाँ एक गुलाब की झाडी और एक साइप्रस का पौधा साथ-साथ अगल-बगल लगे हुए थे। उन्होंने राजा से कहा, "ये तुम्हारे शिक्षक हैं। ये तुम्हें सिखायेंगे जो तुम्हें सीखने की आवश्यकता है।''
राजा बगीचे में गया, दोनों पौधों को देखा कुछ समझ नहीं पाया कि उसे इनसे क्या सीखना है?
वह वापस स्वामी के पास आया और पूछा, "आप के कहने का क्या अर्थ है स्वामी? मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि वो पौधे मुझे कैसे शिक्षा देंगे?''
Section 5
स्वामी राजा को उन पौधों के पास ले गया और समझाया, "ये साइप्रस का पौधा कई वर्षों से गुलाब के पौधे के बगल में है। एक बार भी इसने गुलाब बनने का प्रयास नहीं किया। इसी तरह से, गूलाब के पौधे ने भी साइप्रस बनने का प्रयास नहीं किया। ये दोनों अपने-अपने दायित्वों बढ़ने के और खेलने के प्रतिदिन पूरा कर रहे हैं। यदि आदमी साइप्रस का पौधा होता, तो उसने अपनी तूलना गुलाब से की होती, उससे ईर्ष्या की होती कि क्यों इतने लोग गलाब को महत्व दे रहे हैं या यदि वह गुलाब होता तो वह साइप्रस को देखकर जलन महसूस करता कि ये कितना शांति से है और इसको कोई भय भी नहीं है लोगों से कि इसको कोई तोडेगा।"
स्वामी ने कहा, "यह सबसे शक्तिशाली जादूई शक्ति है, जो तूम प्राप्त कर सकते हो।''
तुम देखो : दोनों पौधे उन्नति कर रहे थे क्योंकि वे अपनी सारी ऊर्जा अपने बढ़ने में लगा रहे थे। उनकी ऊर्जा का एक भी टूकड़ा बर्बाद नहीं हो रहा था, दूसरों की
बढ़त का विश्लेषण करने में। ऊर्जा का 100 फीसदी पौधों ने अपनी बढ़त में ही डस्तेमाल किया।
इसी तरह से, यदि तुम अपनी समस्त ऊर्जा अपने आप से दौड़ने में लगाओ, अपने आप से प्रतियोगिता करने में लगाओ, तुम दिन-दूना रात-चौगुना बढ़ोगे। जब तुम पीछे मुझ्कर देखोगे कि तुमने कितनी उच्चति की, तुम विश्वास नहीं कर पाओगे। यह ही एक मात्र तरीका है न प्रभावित होने वाली स्थायी शांति को प्राप्त करने का।
समझो कितना महत्वपूर्ण है यह न प्रभावित होने वाली शांति को प्राप्त करना। जब तुम दूसरों के साथ दौड़ोगे, तो थोड़े समय के लिए शांति मिलेगी। जैसे हर कामना की पूर्ति के बाद और यह शांति अदृश्य हो जायेगी, जिस क्षण तुम दूसरी तुलना करने लगोगे और दूसरी तरफ, जब तुम अपने आप के साथ दौड़ रहे होगे तो तुम्हारी प्रगति अप्रत्याशित होगी और न प्रभावित होने वाली तुम्हें शांति मिलेगी।
ऐसी शांति की प्राप्ति जो दूसरों के द्वारा प्रभावित न हो सके, यह एक तरह की मुक्ति है। बहुत स्पष्ट रहो : जिस क्षण तुम किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा विचलित किया जाना अनुभव करते हो, इसका अर्थ है कि कहीं कोई व्यवधान है, समझ की कोई कमी है तुम्हारे अन्दर। इसका अर्थ है तुम अब भी अपनी शांति के लिए दूसरों के ऊपर आश्रित हो।
समाज ही वह नाम है जो तुम देते हो अपनी कमजोरियों को, अपने स्पष्टता की कमी को। समाज जैसी कोई चीज है ही नहीं। आकाश ही लक्ष्य है और आकाश जैसी कोई चीज है ही नहीं। विस्तार जीवन है, संकुचन वृत्ति है। तुम अपने आप में अस्पष्ट हो इसलिए लोगों को दोषी ठहराते हो उसके लिए।
जिस क्षण दूसरों के स्वप्न को अपनी सच्चाई बनाने के चक्र में तुम फँसते हो, उसी दिन से तुम चूहे की दौड़ दौड़ने लगते हो। तुलना और ईर्ष्या और कुछ नहीं अपितु दूसरे के स्वप्न को माँग लेना और उसे अपनी सच्चाई बनाने का प्रयास करना है। चूहे की दौड़ में दौड़ने के लिए शक्ति ही है जो तुम्हारे स्वप्न को सच्चाई में परिवर्तित करेगी। लेकिन सच्ची उपलब्धि है यह समझने में कि सच्चाई ही वास्तव में तुम्हारा स्वप्न है। यह समझने के लिए, तुम्हें शक्ति की आवश्यकता नहीं है, तुम्हें बुद्धि की आवश्यकता है।
शक्ति तुम्हारे स्वप्न को सच्चाई बना देगा, जब कि बुद्धिमत्ता तुम्हें यह समझायेगी कि सच्चाई ही तुम्हारा स्वप्न है। बुद्धिमत्ता तुम्हें समझायेगी कि तुम्हें जो होना है वह तुम पहले से ही हो, बस तुम्हें जागने की आवश्यकता है, और जो अन्य चीजें तुम कर रहे हो इस सच्चाई को बनाने के लिए, वो भ्रामक हैं और माँगी हुई हैं। हम हमेशा वाह्य जगत में कुछ प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहते हैं। यह मूल कारण है तुलना और ईर्ष्या करने का। लोग तुम्हारा सम्मान केवल तब करते हैं जब तुमने इस वाह्य जगत में कुछ प्राप्त किया हो, जैसे शिक्षा की उपाधि खूबसूरती का कोई तमगा, किसी कम्पनी में कोई ओहदा, लेखों का छपना, बैंक में खाते, ये सब माप हैं समाज के तुम्हें श्रेणीबद्ध करने के।
देखो, सर्वप्रथम, तुम्हें किसी के द्वारा श्रेणीबद्ध किये जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। अपनी बुद्धिमत्ता में आस्था रखो और अपनी श्रेणी स्वयं बनाओ। निश्चित रूप से, वाह्य जगत में बहुत कुछ है जो तुम प्राप्त कर सकते हो और मानवता की सेवा कर सकते हो। आखिरकार विज्ञान की इस उपलब्धि के कारण, तुम मुझे सुन पा रहे हो जब मैं आज इस माइक्रोफोन के माध्यम से बोल रहा हूँ।
लेकिन समझो कि आंतरिक संसार में बहुत कुछ है, जो प्राप्त किया जाना है। वाह्य जगत की उपलब्धियाँ सारी घटना के फलस्वरूप हैं। वे तुम्हें तत्काल नाम, कीर्ति और धन दे सकती हैं। सच्ची उपलब्धि तो आंतरिक जगत में है।
अपने आप को आत्म केन्द्रित करो पूरी तीक्ष्ण सजगता के साथ बस और वाह्य जगत की गतिविधियों में इस तरह से सम्मिलित हो, जैसे पानी में कमल होता है। अपने आस-पास के सारे कार्यों को अबाधित गति से होने दो, लेकिन तुम अपने आत्म स्वरूप पर ही केन्द्रित रहो। तब तुम वाह्य जगत में और बेहतर तरीके से क्रियाशील रह सकोगे, क्योंकि तुम्हारी आंतरिक बुद्धिमत्ता का विस्तार हो रहा होगा और वह तुम्हारी मदद करेगी क्रियाशील होने में वाह्य जगत के हर परिणाम के प्रति मात्र एक दृष्टा के रूप में।
तब तुम स्वतः ही अपने आत्म स्वरूप में केन्द्रित होकर वाह्य जगत की उपलब्धियों से प्रभावित हुए बगैर स्थिरता और आनन्द का अनुभव करोगे। अपने आत्म स्वरूप के केन्द्र को पाना ही एक मात्र रास्ता है इस पूरे तुलना और ईर्ष्या के चक्र से बाहर निकलने का।
आज बहुत से बड़े व्यवसायी ऐसे हैं, जिन्होंने अपने जीवन में जो कूछ उन्होंने चाहा था उसे प्राप्त कर लिया। कितने ही व्यवसायी ऐसे हैं, जो आज सफलता का दबाव हतोत्साहित होकर अनुभव कर रहे हैं, उन्होंने अपने सारे स्वप्नों को सच्चाई में परिवर्तित किया, माँगे हुए स्वप्नों को भी, हर चीज प्राप्त की है, लेकिन वो परिपूर्णता का अनुभव नहीं कर रहे हैं। उनके अन्दर अपने आप में एक न भरने वाला अभाव है।
उन लोगों ने आश्चर्य करना शुरू किया है कि आज तक इतनी भागदौड़ उन्होंने
किसलिए की। जो कामनाओं का और तीक्ष्ण भावनाओं का अंकूश उनके ऊपर था, अब वह और नहीं था। वह अपने आप के बारे में भ्रमित हैं। जो पकड़ वे अपने आप पर महसूस करते थे अपने व्यवसाय के दिनों में, अचानक वह पकड़ कमजोर होती दिख रही थी।
ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह बिना सजगता के दौड़े, बिना कोई आत्म विश्लेषण किये हुए और अपने आप के बिना कोई समय दिये हए। परिणामस्वरूप, जब उन्होंने दौड़ना बंद कर दिया या अचानक वह और अधिक दौड़ने के काबिल नहीं रहे, वह पीठ के बल गिर पड़े और अचानक वे महसूस करने लगे कि वह अत्यधिक असहज हैं और उनके आत्म स्वरूप से उनका एक अलगाव है, और यही है जो हतोत्साह बन जाता है या कोई बीमारी।
जब तुम सफलता के हतेात्साह से घिर जाते हो, तुम तीन चीजों का सहारा ले लेते हो। पहला है नशे का सहारा - ऐसी लत जो और हतोत्साहित करेगी। दूसरा है आत्महत्या - जो भगोड़ों का काम है। तीसरा है ध्यान - अपने अन्दर देखना समाधान के लिए। बुद्धिमान तीसरा रास्ता चुनते हैं।
एक आत्म निरीक्षण तुम्हें इस हतोत्साह से बाहर निकालने का मार्ग हो सकता है। समस्या तुम्हारे अन्दर रहती है, जब कि उसका समाधान तुम बाहर खोजते हो। तुमने अपने आत्म स्वरूप को बहुत लम्बे समय से नजर अंदाज किया है और जो हतोत्साह तुम महसूस कर रहे हो वह वास्तव में तुम्हारे आत्म स्वरूप की पुकार है। यही कारण है कि बार-बार स्वामियों ने बहुत से तकनीक और मार्ग बताये हैं, तुम्हें अपने आत्म स्वरूप के अन्तःकरण में केन्द्रित होने के और वाह्य जगत के प्रति क्रियाशील रहने के मात्र एक दृष्टा के रूप में।
यही बात तुमसे बतायी जायेगी, जब तुम अपने जीवन की पराकाष्ठा पर होगे, तब तुम उस वक्त इस बात के प्रति ध्यान नहीं देना चाहोगे, क्योंकि उस वक्त तुम्हारे पास पर्याप्त ऊर्जा होगी, वह सारी ऊर्जा जिसके साथ तुम आये हो, सामना करने के लिए अनिश्चित व्यवहारों के उतार-चढ़ाव का। एक बार तुम्हारी ऊर्जा नष्ट होना शुरू हो जाती है, तुम महसूस करते हो कि कोई चीज गडबड है कहीं न कहीं। वही कोई चीज ही है जिसके बारे में स्वामी बार-बार बताने का प्रयास करते हैं।
महान भौतिकशास्त्री 'एलबर्ट आइंस्टीन' अपनी मृत्यु शैया पर पड़े थे।
उनके कुछ नजदीकी लोग उनके आस-पास बैठे थे।
उनमें से एक ने पूछा कि यदि उनका पुनर्जन्म हो तो वो किस रूप में पुनर्जन्म चाहेंगे।
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Section 7
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हर मानव को मात्र इस तरह से देखो जैसे कोई नदी बह रही हो। मात्र आनन्द लो कि वह स्त्री या पुरुष एक अभिव्यक्ति है? क्या तूम किसी नदी का स्वामी बनकर उस पर अधिकार करने का प्रयास करोगे? यदि तुम जल को अपने हाथ में पकड़ने का प्रयास करोगे तब तुम एक मूर्खतापूर्ण चीज करोगे, क्या ऐसा नहीं है? इसी तरह से लोगों पर भी अधिकार करने का प्रयास मत करो। बस उनसे सुख लो जिस चीज के लिए वो बने हैं और तुम स्वतंत्र होगे ईर्ष्या के चंगुलों से। तब तुम समझोगे कि अपनापन या किसी पर धारण करने की कामना एक ऐसी चीज है जो तुम्हारे गहरे व जटिल मस्तिष्क द्वारा निर्मित होती है और जिसे तुमने इतनी ज्यादा शक्ति दे रखी है।
जब तम किसी व्यक्ति पर अधिकार करने का प्रयास करते हो, यह बात उस व्यक्ति के लिए भी कठिनाई पैदा करती है। तुम अपनी सारी विचारधारा का आरोपण उसके ऊपर करने लगते हो, उसे उसी रूप में क्रिया करनी पड़ती है जिससे तुम्हारे आरोपित विचारों से उसकी क्रिया में मेल हो सके। वो अपने आप को पिंजड़े में महसूस करता है। उसका अपना व्यक्तित्व विभाजित हो जाता है। वह अपने स्वाभाविक स्वरूप में तुम्हारे साथ हो ही नहीं सकता और इसे संबंध नहीं कहा जा सकता।
यदि तुम किसी से सच्चा प्रेम करते हो, उसे मुक्त करो। उस पर अधिकार करने का प्रयास मत करो केवल तब सच्चा संबंध प्रफूल्लित होगा, तब एक संबंध किसी अन्य चीज पर आश्रित न होकर के, बल्कि गहरे प्रेम और आस्था के मध्य खिलेगा। जिस क्षण तुम किसी चीज को पकड़ने का प्रयास करते हो, तुम चूक जाते हो। मात्र प्रेम करो बिना किसी डोर में बाँधे हुए।
मुझे एक कथा का स्मरण आता है :
दक्षिण भारत के सुदूर गाँव में, जहाँ लोग ये भी नहीं जानते थे कि कोई सभ्यता भी है, वहाँ एक वृद्ध दम्पत्ति रहता था। एक दिन, पहली बार, उस गाँव में एक मेला लगा। वह आदमी मेले में गया और हर तरह की चीजों को कार्यक्रमों में देखा। उसने एक शीशा उठाया और हतप्रभ था जो उसने देखा।
उसने अपने पूरे जीवन में पहले कभी शीशा देखा ही नहीं था।
वह उसे अपने साथ घर ले गया।
कभी-कभी वो शीशा निकालता है, उसे देखता है और वापस रख देता है इसके पूर्व कि उसकी पत्नी देखे।
उसकी पत्नी ने किसी तरह उसे देख लिया और एक दिन जब वो बाहर गया हुआ था, उसने उसे उठाया और देखा।
दूसरी औरत, जैसा मैंने सोचा था। वह चिल्ला उठी।
अपनी ईर्ष्या और अधिकार करने की भावना के कारण परिकल्पना का कोई अंत नहीं है। करीब-करीब हमेशा हमारी परिकल्पना सच्चाई से मेल नहीं खाती। यदि हम मात्र रुककर के गहराई से अपनी ईर्ष्या में देखें, तो हम देखेंगे कि वह आधारहीन है और अनावश्यक है।
निश्चित रूप से, तुम कह सकते हो, "स्वामी जी, मैं कैसे चुप रहूँ, यदि मेरा पति या पत्नी किसी अन्य के साथ आकर्षित हो रहा है यदि तुम्हारा पति या पत्नी सचमुच किसी दूसरे व्यक्ति से आकर्षित हो रहा है, मात्र उस प्रकरण में जागरूकता से और पूरी सजगता से देखो बजाए इसको कि तुम अचेत अवस्था में क्रियाशील हो जाओ।
जब तूम अधिकार जताने और ईर्ष्या में सजगता से देखोगे, तो तूम अवांछित कल्पनाओं और भावनाओं से ग्रसित नहीं होगे। तुम चीजों को सही प्रकाश में देख सकोगे, उचित व्यवहार कर सकोगे और सही निर्णय ले सकोगे।
अपने आप को यह बताकर के कि तम्हें ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, तम इससे कभी नहीं उबर पाओगे। केवल तब जब तुम पूरी चीज में सजगता लाओगे और गहराई से समझोगे, तभी लाभ होगा।
ईर्घ्या पर नियंत्रण करने के लिए, मात्र देखो कि कैसे ईर्ष्या तुम्हारी प्रक्रिया में आयी, बस विश्लेषण करो अपनी प्रक्रिया के विचारों और भावनाओं का और तब उसे निकाल दो पूरी प्रक्रिया से बुद्धिमत्ता से तर्क द्वारा।
एक बार तुम समझ लो कि ईर्ष्या एक परछाँई की तरह है बिना उस चीज के जिसकी परछाँई उसे होना चाहिए, तुम यह बात महसूस करोगे कि वह कितना बेतुका और तूम्हें कितनी अधिक यातना देने वाली है। किसी के जीवन में ईर्ष्या से मुक्ति एक महान मुक्ति की तरह है।
एक बात और, ईर्ष्या के लक्ष्य की भर्त्सना करके तुम ईर्ष्या मुक्त नहीं होगे, क्योंकि जिस क्षण तुम उसकी भर्त्सना शुरू करोगे, इसका अर्थ होगा कि तुम्हारे
ईर्ष्या से मक्ति
अन्दर कहीं कोई घाव है जिसे तुम छुपाने का प्रयास कर रहे हो।
ईर्या के लक्ष्य की भर्त्सना करके, तुम किसी एक विशेष ईर्ष्या के लक्ष्य से मुक्त हो सकते हो, लेकिन तुम बस अटक जाओगे ईर्ष्या के किसी दूसरे लक्ष्य में, इतना ही होगा। यह कुछ इस तरह का कहना होगा- "अंगूर खट्टे हैं" और दूसरे अंगूर के बाग में चले जाना। इसलिए ईर्ष्या के किसी लक्ष्य पर विजय प्राप्त करना कोई समाधान नहीं है, तुम्हें कार्य करने की आवश्यकता है मुख्य विषय पर और वो है तुम स्वयं।
हमेशा याद रखो : यदि तुम महसूस करते हो कि तुम किसी भावना को दबाये हुए हो जिससे तुम वास्तव में मुक्ति चाहते हो, कोई ऐसी भावना जो तुम्हारी उन्नति के लिए सहायक नहीं है, उसका प्रतिरोध मत करो। क्योंकि यदि तुम उसका प्रतिरोध करोगे तुम केवल उसे और शक्तिशाली बनाओंगे। जब तुम कहते हो, "कि मुझे ईर्ष्यालु नहीं होना चाहिए", उस वक्त भी तुम ईर्ष्या शब्द को शक्ति देते हो जैसे तुम, 'मुझे नहीं करनी चाहिए' को शक्ति देते हो।
इसलिए इस तरह की चीजों को मत कहो। बजाए इसके अपने आप से कहो, "मूझे सबके प्रति हमेशा दयावान होना चाहिए।" ईर्ष्या शब्द का प्रयोग कभी मत करो। इस भाव को नकार करके जो तुम चाहते हो वह कभी नहीं प्राप्त कर पाओगे। इस तरह के किसी भी संदर्भ में पूर्णतः सकारात्मक बातें कहो, इतना पर्याप्त है।
एक बात और, ईर्ष्या से बचने या भागने के बजाए, उसे पूरी सजगता के साथ जियो। जब तुम इससे बचने का प्रयास करते हो, वह किसी अन्य समय पहले की तुलना में और तीक्ष्णता के साथ तुम्हारे सामने होगी। एक बात याद रखो गहरी सजगता से : ईर्ष्या तुम्हारा सच्चा स्वभाव नहीं है। ईर्ष्यालू होना तुम्हें समाज ने सिखाया है।
मात्र विश्वास करो कि तुममें ईर्ष्या नहीं है, इतना पर्याप्त है। इसके पश्चात्, स्वतः ही तुम उस पर हँसोगे उसमें लिप्त होने की अपेक्षा। एक बार तुम उस पर हँस सको, इसका अर्थ होगा तुमने साक्षी बनना शुरू कर दिया है बजाए उसके भाग बनने के। जिस क्षण तुम साक्षी बन जाते हो, किसी भी चीज के परे जाना सरल हो जाता है।
एक बात और, यदि तुम देखो तो संपूर्ण अस्तित्व और कुछ नहीं एक ईश्वरीय खेल है, तुम यह देखने में सक्षम होगे कि तथाकथित ईर्ष्या की भावना भी एक ईश्वरीय खेल है जिसकी अपने आप में कोई सच्चाई नहीं है। ईर्घ्या को वाह्य पदार्थ विषयक के रूप में देखों न कि उससे ग्रसित हो जाओ। वह स्वतः ही
तम्हारे ऊपर से अपनी शक्ति खो देगा।
Section 8
यदि तुम समझ जाओ कि तुम विलक्षण हो और इस संसार में दूसरा तम्हारे जैसा कोई नहीं, तुम्हारे अन्दर तुलना करने का स्वभाव तुम्हारे लिए किसी मतलब का नहीं रह जायेगा और तूम स्वतः ही ईर्व्या का अनुभव करना बंद कर दोगे। मात्र इतना समझने का प्रयास करो कि अस्तित्व सब को और सब चीज को एक समान प्रेम करता है।
प्रश्न : स्वामी जी......स्वामियों ने समय समय पर बार-बार हमें प्रेरित करने का प्रयास किया है कि हम प्रेम, ईर्ष्या से मुक्ति, अच्छी समझ और न निर्णय देने वाली प्रवृत्ति जैसी चीजों को ग्रहण करें। हमारे अन्दर यह समझ आ क्यों नहीं रही है?
तुम देखो, इसमें दो बातें हैं। जब तुम स्वामी के सिद्धान्तों को पकड़ लेते हो और निष्ठापूर्वक प्रयास करते हो अपने आप को परिवर्तित करने का, तब समझ लो कि तुमने सही सुत्र पकड लिया है और परमानन्द को प्राप्त होगे। लेकिन होता क्या है, हम स्वामी के सिद्धान्तों की अपेक्षा स्वामी के व्यक्तित्व के महत्व देते हैं। तुम्हें स्वामी के सिद्धान्तों और दर्शन को महत्व देना है। यदि तुमने स्वामी के व्यक्तित्व को महत्व दिया तुम पूरी तरह से चूकोगे, तुम चूक जाओगे संदेश लेने में पूरी तरह से।
देखो और समझो : यदि तुम इस शिक्षा का पालन करोगे, तुम एक आध्यात्मिक फल होगे, यदि तुम उसके व्यक्तित्व में हो अटके रहे तो तुम एक धार्मिक मतान्द्य ही रह जाओगे। धार्मिक मतान्द्य वो होते हैं जो विरोध और भ्रम फैलाते हैं और वहीं रहते हैं जहाँ वो हैं।
भगवतगीता में चाहे श्री कृष्ण का संदेश हो, या पवित्र कुरान में मोहम्मद साहब का या पवित्र बाइबिल में ईसा मसीह का, संदेश एक ही रहता है, केवल अभिव्यक्ति बदलती है। जिस भी स्वामी का अनुसरण तुम्हें ठीक लगे, उस स्वामी का अनुसरण करो। लेकिन जब तुम उनके व्यक्तित्व का अनुसरण करने लगते हो, बजाए उनकी शिक्षा के, जब क्रूष्ण अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं तुम्हारे लिए भगवत्गीता की अपेक्षा तब तुम अपने लिए और दूसरों के लिए समस्याएँ खड़ी करना शुरू कर देते हो।
जब क्रष्ण और ईशू मिलेंगे, वे निश्चित रूप से एक-दूसरे का आलिंगन करेंगे। लेकिन जब कृष्ण की गायें ईशू की भेड़ें मिलेंगी, लड़ाई होना निश्चित है। विभिन्न अनुयायियों में से हर एक इस बात का दावा करते हुए शांति को फैलाने का प्रयास करता है, इस दावे के साथ कि उसके स्वामी का दर्शन सबसे अच्छा है।
क्या होता है तब? शांति फैलाने के स्थान पर हम दुकड़ों में फैल जाते हैं। जब तुम अपनी तथाकथित शांति को दूसरों पर आरोपित करने का प्रयास करते हो, समस्या शूरू हो जाती है। यह है हम किस तरीके से किसी भी प्रकरण को जटिल बना देते हैं और संदेश पाने से चूक जाते हैं। केवल एक जन्म में नहीं, अपित कई जन्म में।
स्वामी होते रहते हैं, इस पुथ्वी ग्रह पर मात्र अपनी दया की भावना के कारण मानवता के लिए और मनुष्य किसी तरह से उनसे भी कन्नी काट जाता है।
दूसरी चीज यह है : दूसरे के प्रति उंगली उठाने की अपेक्षा या बजाए इसके कि अभ्यास शुरू करने के लिए अच्छे समय की प्रतीक्षा की जाये, हममें से हर एक जिस क्षण सुनता है उसी क्षण से अभ्यास करना शुरू कर दें, चीजें स्वतः ही उसके आस-पास होने लगेंगी।
उदाहरण के लिए, मैं तुमसे कहता हूँ कि पौधों से प्रेम करना शुरू करो, जानवरों से, पेड़ों से, उस तरह का प्रेम करो जैसा मनुष्यों से करते हो। बजाए इसके कि अभ्यास शुरू करने के लिए किसी शुभ घड़ी की प्रतीक्षा की जाये और अन्ततोगत्वा उसके बारे में सब कुछ भूल जाये, जो मैंने कहा उसे तुम तुरन्त आत्मसात करो और अभ्यास शुरू करो।
शुरू करने के लिए सबसे सरल तरीका यह हो सकता है कि हम प्रक्रति को अपशब्द कहना बंद करें, जब हम सड़क के किनारे या अपने घर में हों। जब हम पैदल चलते रहते हैं, हममें से कुछ लोगों की आदत होती है कि किसी पेड़ की टहनी तोड़ लें या कोई फूल तोड़ लें। तुम्हें इन चीजों को करने से जागरूकता से रोकना होगा और इन चीजों को अधिक सजगता और प्रेम से देखना होगा। तुम शुरू करने के लिए आलिंगन कर सकते हो प्रकृति का। यह सबसे निश्चित तरीका होगा शुरू करने के लिए आनन्दित होने के लिए और सराहना करने के लिए बजाए इसके कि ईर्ष्या का अनुभव करें।
ये वो तरीके हैं, जिससे तुम स्वामियों की शिक्षा ग्रहण करने से चूकोगे नहीं। लेकिन तुम क्या करते हो? तुम यहाँ आते हो, जो मैं कहता हूँ उसे सुनते हो या मेरी कुछ किताबें खरीदते हो, उन्हें पढ़ते हो, मुझे एक वक्ता के रूप में मेरी प्रशंसा करते हो और फिर उसके बारे में सब कुछ भूल जाते हो या तुम अपने मित्रों को राय देते हो कि वो आकर के मेरे वक्तव्य को सुनें, और उसके बाद बस तुम लौट जाते हो अपने पुराने रास्ते पर, जिस पर चलकर तुम चीजों को किया करते थे। क्या किया जा सकता है तब? कृपया समझो : मैं अपनी शिक्षा का दूसरों को उपदेश देना नहीं चाहता, मैं चाहता हूँ कि तुम उसका अभ्यास करो।
एक छोटी कथा सनो :
एक व्यक्ति छूट्टियों के लिए अफ्रीका गया।
एक दिन जब वो अपने पिछवाडे टहल रहा था, तो उसका सामना शेर से हो गया, जिसने उसके ऊपर छलांग लगा दी।
उसने जल्दी से एक किनारे होकर अपने आप को बचाया और शेर पास की झाड़ी में जा गिरा।
द्रसरे दिन, वह व्यक्ति जब टहल रहा था, शेर फिर दिखायी दिया और उसने उसके ऊपर आक्रमण कर दिया उसने जल्दी से अपने आप को फिर बचाया और शेर एक बार फिर दूर की झाड़ी में जा गिरा।
उसके दूसरे दिन, वह व्यक्ति अपने घर में था और वहीं से देख रहा था कि शायद शेर कहीं फिर दिखायी दे। उसने एक झाड़ी के पीछे शेर को पाया।
वह आश्चर्यचकित था, शेर छोटी ऊँचाई की कूद का अभ्यास कर रहा था।
देखो, जो ज्ञान तुम प्राप्त करते हो उसे जब तुम क्रिया में उतारते हो, तुम जीवन में उन्नति करोगे। यदि तुम मात्र ज्ञान एकत्रित करोगे, वह किसी काम का नहीं होगा। यदि तुम केवल ज्ञान एकत्रित करने जा रहे हो, तो तुम्हारी स्मरण शक्ति बढ़ेगी, तुम्हारे स्वरूप का विस्तार नहीं होगा।
सारा ज्ञान जो अर्जित किया जाये उसे आंतरिक उन्नति में लगाना चाहिए। अन्यथा तम किसी चलते-फिरते हुए पुस्तकालय से अधिक और कुछ नहीं। मैंने लोगों को देखा है वे बहुत गहनता से पढ़ते हैं, लोगों के व्याख्यान भी जाकर के सुनते हैं और वृहद रूप से वार्तालाप भी करते हैं दर्शन इत्यादि पर। लेकिन जब बात उस ज्ञान को क्रिया में उतारने की आती है तो वे पूर्णता शून्य होते हैं। वे मात्र पूस्तक की तरह होते हैं जो दूसरों को संदर्भित की जाये। वे पढ़ते हैं, वे पूरी तरह से हजम नहीं करते, वे मात्र उल्टी कर देते हैं दसरों पर। क्या प्रयोग है इसका?
केवल तब जब तुम स्वयं सजगता के साथ उन्नति करोगे, तभी तुम अपनी भी मदद कर पाओगे और दूसरों की भी। तुम्हें एक प्रायोगिक समझ की आवश्यकता है। जो कुछ भी तुम सुनते हो उसका महत्व इस चीज में नहीं है कि तुम उसका उपयोग सांसारिक उपलब्धियों के लिए करो, उसका महत्व इस चीज में हैं कि तूम जो कूछ भी सूनते हो उसे अपनी सजगता में लाओ और अपने आप में ये समझो कि वाह्य जगत मात्र एक भ्रम है और जो चीज भी प्राप्त किये जाने की आवश्यकता है वह तम्हारे अन्दर है। वाह्य जगत में प्राप्त की गई कोई भी उपलब्धि या मील का पत्थर पूरी प्रक्रिया में मात्र एक घटना बनकर रह जायेगा। जब तुम स्वामियों को बोलते हुए सुनते हो, मात्र ग्रहण करो और आत्मसात
स्वामी केवल सत्य बोलते हैं।
करो।
यह इस तरह से हैं : एक बहुत बड़ा घना जंगल है और तुम उसकी छानबीन करने का प्रयास कर रहे हो, एक छोटा सा दिया लेकर के - वह तुम्हारा मन है। उस छोटे से दिये के प्रकाश में, तुम कुछ फुट दूरी तक ही देखते हो और जो कुछ भी तुम देखते हो, उसी को ही सत्य मान लेते हो।
ये है वो जो जो वैज्ञानिक करते हैं।
वो कुछ फुट दूरी तक देखते हैं और एक नया सिद्धान्त लेकर बाहर आते हैं। कुछ समय पश्चात कुछ फट और आगे जब वो चले जाते हैं, उसी प्रकाश में और अब वो कूछ और देखते हैं, तब वो पहले कहे गये सत्य को नकार देते हैं और नये सत्य की घोषणा करते हैं।
बहुत स्पष्ट रहो : जो कल सत्य था और आज असत्य है वो निश्चित रूप से, कल भी सत्य नहीं हो सकता।
कुछ भी हो यही वो तरीका है जिससे वो अपने मस्तिष्क के माध्यम से उस गहन जंगल की खोजबीन कर रहे हैं।
लेकिन परिकल्पना करो एक बिजली चमकती है और पलक झपकते ही एक प्रकाश में सारा जंगल दृष्टिगोचर होता है।
तब तुम पूरे जंगल को जानोगे और तुम समझा सकते हो चीजों के बारे में, कैसे और कब किस चीज की तुम्हें आवश्यकता है।
जागरूकता के बारे में यही है सब कुछ। जैसे पूरे जंगल को एक प्रकाश की चमक में देखना।
एक बार यह तुम्हारे साथ हो गया, तो तुम समझ लो कि तुम जान गये। यही कारण है, कि जो सत्य है एक स्वामी के लिए वही सत्य है दूसरे स्वामी के लिए भी। उनकी अभिव्यक्ति भिन्न हो सकती है, परन्तु उनका अंतिम अनुभव एक होगा। या तो तुम अनुभव से जानोगे या तुम नहीं जानोगे। जब तुम अपनी बुद्धि से उत्तर देने का प्रयास करते हो, तुम केवल दर्शनों का निर्माण करते हो। तो केवल दर्शन मत बनाओ अपनी समझ को अनुभव में परिवर्तित करने पर कार्य करो।
Section 9
भारत के सूदूर गाँव में बहुत सी चाय की दुकानें होती है वहाँ एक परिचित दृश्य देखने के लिए मिलेगा। उस चाय की दुकान पर कुछ स्तरीय ग्राहक भी होंगे जो प्रतिदिन विश्व के सारे दर्शनों पर चर्चा करते हैं। सारे संप्रदायों के बड़े भगवान, स्वामियों और राजनीतिज्ञों को ये लोग कायदे से चबाकर के हजम कर जाते हैं। गाँव में जितना भी अत्याचार होता होगा, उन सब पर बिना किसी भी प्रकरण को छोड़े हुए चर्चा होगी। सारे संसार में फैली हुई अराजकता और अव्यवस्था पर वहाँ विश्लेषण होगा। अन्त में, जो व्यक्ति इन सब बातों पर बोला होगा अपनी चाय खत्म करेगा और यह कहते हुए चला जायेगा कि चाय का पैसा कल लेना।
जो व्यक्ति, जो अपने चाय का पैसा भी देने की स्थिति में नहीं होता, वो चाय की दकान में एक बेंच पर बैठकर के पहले पुष्ठ से लेकर अंतिम पुष्ठ तक सारा अखबार पढ़ डालेगा और जो कूछ भी पढ़ा होगा उस पर अपना फैसला भी दे देगा। शायद प्रधान संपादक ने भी इतनी गहराई से पूरे अखबार को नहीं पढ़ा होगा। जितना समय ये लोग चाय की दुकानों में बेंचों पर बैठकर व्यतीत करते हैं उससे शायद बेंचों में भी हतोत्साह जरूर पैदा हो जाता होगा।
वे अपना सारा समय इसी रूप में बिताते हैं। वे एक क्षण के लिए भी कोई चीज प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते।
इसलिए कम से कम तुम ये तो कर ही सकते हो, जो कुछ मैं कह रहा हूँ उसे आत्मसात करो और उसके पीछे सत्य को अनुभव करना शुरू करो। पातंजलि कहते हैं : यदि तुम 5 इंच झूक सकते हो आज, तो कल आधा इंच और झुकने का प्रयास करो। इस तरह से तुम्हें दृढ़ता से सत्य को अनुभव करने की तरफ कार्य करना चाहिए। अन्यथा, तुम चाय की दुकान पर बैठने वाले लोगों से अधिक और कुछ नहीं होगे। वे लोग वहाँ बेंच पर दबाव पैदा करते हैं और तुम लोग यहाँ दरी में पैदा कर रहे हो, इतना ही हो रहा है।
समस्या यह है, कि कई बार जब हम बुद्धिमानी के शब्द सुनते हैं, हम महसूस करते हैं कि ये एकदम लागू होता है हमारे मित्र या संबंधी पर। यद्यपि कि यह व्याख्यान इस वक्त हम भी सुनते रहते हैं। हम उसे उनके ऊपर लागू करते हैं और गुप्त रूप से उम्मीद करते हैं कि उन्हें संदेश मिल गया होगा। यह करने में, हम स्वयं संदेश लेने में चूक जाते हैं, इतना ही होता है। मैं तुमसे कहता हूँ, जब मैं बोलता हूँ, मैं तुमसे बातें करता हूँ। चाहे इस प्रांगण में 1000 लोग हो, परन्तु मैं तुमसे बातें कर रहा हूँ। कृपया, इसे समझने का प्रयास करो।
मेरा हर शब्द ऊर्जा से भरा हुआ है जो तुम्हारे लिए ही है। तो कृपया इस तरीके के विचारों को मस्तिष्क में लेकर मत सुनो। खासतौर से जब पति और पत्नी oesveeW Skeâ meeLe cesje JeòeâJÙe megveves kesâ efueS Deeles nQ Deewj peye ceQ kegâÚ yeeleW Gvekesâ JÙeJeneefjkeâ peerJeve mes mebyebefOele yeleelee nBt, lees heefle Ùes meesÛelee nw efkeâ Gmekeâer helveer Jees yeele OÙeeve mes megves Deewj helveer Ùes meesÛeleer nw efkeâ Gmekeâe heefle Gme yeele keâes OÙeeve mes megves, Deewj DeeefKej ceW oesveeW Ûetkeâ peeles nQ~
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उससे यह कहने का प्रयास कर रहे थे कि आध्यात्मिकता यही है कि किस तरह से जीवन के समुद्र को बिना अपना पैर भिगोये हए पार किया जाये। यह सब उसी तरह से हैं जैसे तालाब में एक कमल - पानी में गहराई तक मगर पानी से अछूता। आध्यात्मिकता इसलिए नहीं है कि भौतिक चीजों से भागा जाये। इस बारे में बहुत स्पष्ट रहो।
Section 10
आध्यात्म्किता वास्तव में जीवन अभियंत्रण (Life-Engineering) है। कॉलेज में वे तुम्हें विभिन्न प्रकार अभियंत्रण पढ़ाते हैं। वो मात्र प्रमाण-पत्र है जो तूम अपना मस्तिष्क बेचने के बदले में पाते हो। जीवन अभियंत्रण ही है जिसे हम सबको पढ़ाये जाने की आवश्यकता है। आध्यात्मिकता तुम्हें परमहंस की तरह जीवन जीना सीखाती है इस भौतिक जगत में, गले तक पानी में डूबा हुआ फिर भी पानी को स्पर्श किये बगैर।
यह तुम्हें सिखाती है, एक प्रखर और परिपूर्ण जीवन जीना, बिना किसी व्यक्ति या उसकी सम्पत्ति का अतिक्रमण किये हुए। यह तुम्हें सिखाती है, तुम्हारी अपनी बुद्धि से अलग होना और बिना किसी भ्रम जैसे ईर्घ्या, तुलना, तृष्णा इत्यादि के खुले हुए निश्छल नेत्रों से अस्तित्व के आश्चर्यों को देखना। यह तुम्हें अस्तित्व के साथ तारतम्य बनाकर के चलना सीखती है और संयोग के शक्ति का अनुभव कराती है, जहाँ तुम यह पाते हो कि चीजें तुम्हारे आंतरिक आनन्द की प्रतिक्रिया स्वरूप स्वतः ही हो जाती है।
यह तुम्हें हमेशा प्रार्थनामय और कृतज्ञता के भाव से परिपूर्ण प्रकृति के प्रति हमेशा सजग रहना सिखाती है। यह तुम्हें सिखाती है हर क्षण अपने अन्तःकरण से आनन्दित रहना, बजाए कि तुम प्रभावित हो अपने वाह्य सीमाओं से और उससे जुड़ी हुई भावनाओं से। यह तुम्हें सिखाती है कि तुम्हारे जीवन का हर क्षण एक उत्सव हो न कि तुम उत्सव के लिए कोई कारण द्वूढो।
वह तुम्हारे आंतरिक बुद्धिमत्ता को प्रकाशित करती है और तुम्हारे वाह्य जगत के प्रदर्शन को तीव्र कर देती है। वह तुम्हारी सजगता को जाग्रत करती है और तुम्हें गहरी जागरूकता में ले जाती है। वह तुम्हें ले जाती है तृष्णा से प्रेम तक, चिंता से आश्चर्य तक, असत्य से सत्य तक, पीड़ा से आनन्द तक, ईर्ष्या से उत्सव तक। एक बात और : लोग सोचते हैं कि आध्यात्मिकता के लिए उन्हें अलग समय निर्धारित करना चाहिए, कभी नहीं। यह बात जो मैंने पहले कही है, उससे तुम जान जाओगे कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। जो लोग इस बात का दावा करते हैं कि उन्हें आध्यात्मिकता के लिए निर्धारित समय चाहिए, वह आध्यात्मिक लोग नहीं है, वो धार्मिक लोग हैं।
धार्मिक अनुष्ठानों और धार्मिक क्रियाओं के लिए धर्म में समय चाहिए। आध्यात्मिकता का समय की मात्रा से कुछ लेना-देना नहीं है। उसे अगर कुछ लेना-देना है तो तुम्हारे जीवन की विशेषता से। यदि तुम्हारे अन्दर सत्य को खोजने की निष्ठा है, इतना पर्याप्त है। तब तूम अपना सारा समय सब कूछ करने में लगा सकते हो। एक गम्भीर साधक के रूप में और तुम अपना लक्ष्य प्राप्त कर लोगे। तूम स्वतः ही चमकोगे अपने कार्य में, अपने घर पर, अपने परस्पर संबंधों में, बिना ऊर्जा व्यवधानों के जैसे ईर्घ्या और तूलना।
तुम अपने आप को किसी भी परिवेश में बहुत सरलता से ढाल लोगे। तुम किसी भी जगह पर और किसी भी प्रकार के लोगों के मध्य सहज महसूस करोगे। घर मात्र वह स्थान नहीं होगा जहाँ तुम रहते हो, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व ही तुम्हारा घर होगा। तूम मानसिक और शारीरिक परिस्थितियों से मूक्त हो जाओगे और उठकर के अस्तित्व में ही मिलकर के एक हो जाओगे।
समस्या यह है, लोग अनुष्ठानों का ही अनुसरण करके संतुष्ट हैं। उसमें उन्हें एक विशेष प्रकार की सुरक्षा का अनुभव होता है। धार्मिक अनुष्ठानों के पीछे विज्ञान को तो लोग जानते नहीं मगर अनुष्ठान उन्हें अहंकार की पूर्ति के लिए याद है। धार्मिक कार्यक्रम जटिल होते हैं और हम इसे एक चुनौती के रूप में लेते हैं, जब हम उन जटिल चीजों के साथ चलते हैं।
लोग मेरे पास अपनी समस्यायें लेकर आते हैं और मुझसे समाधान पूछते हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि मैं ख्याल रखूँगा और फिर उनसे कहता हूँ कि जाकर के आश्रम में बरगद के पेड़ के नीचे कुछ देर बैठें, जब तक वो आश्रम में हैं। आश्रम में बरगद का पेड़ एक ऊर्जा क्षेत्र है। लेकिन वो इस उत्तर से खुश नहीं होते। वो मुझसे पूछते हैं कौन सा अनुष्ठान वो करें, जिससे चीजे बेहतर हो जाएँ।
यदि मैं उनसे कहूँ कि वो 108 बार आश्रम में बरगद के पेड़ का चक्कर लगायें, तो ये करने में वो बहुत खुश होंगे। ये तुम्हारे अंहकार को बल देता है। तब तुम ये महसूस करते हो कि तुमने बहुत कड़ी मेहनत की और उसके बदले में तुम्हें लाभ मिलेगा। धर्म के प्रति सम्मान के बारे में हमने मस्तिष्क को इसी तरह का अभ्यास कराया है।
धर्म और धार्मिक अनुष्ठानों में भी, मैंने देखा है लोगों को एक-दूसरे का मुकाबला करते हुए। यदि तुम्हारे पड़ोसी ने एक विशेष मंदिर में एक विशेष चढ़ावा चढ़ाया, बस उसके तुरन्त बाद तूम उस मंदिर में जाकर के वही चढ़ावा चढ़ाते हो। किस चीज पर केन्द्रित हैं ये? मूर्ति पर या पडोस पर? तुम पूरी चीज से चूक गए ये सब करके।
लोग गौरवान्वित महसूस करते हैं यह कहकर कि उन्होंने बहुत से विश्व के महत्वपूर्ण पवित्र स्थानों का दर्शन किया है। वो उन मंदिरों की एक सुची बना लेते हैं जहाँ वो गये हैं। जो लोग इस कहानी को सूनते रहते हैं, वो उनको पीछे छोड़ने के लिए तत्काल प्रयास करने लगते हैं।
इन सारे पवित्र स्थानों का दर्शन करने के पश्चात भी तुम्हारा अहम उसी तरह से ठोस है और तम्हारी विशुद्धि चक्र अब भी बाधित है। क्या तुमने इसके बारे में कभी सोचा? ये सब सारी चीजें की जाती हैं आंतरिक जगत की उन्नति के लिए, तलना और ईर्ष्या से बचने के लिए, मगर यहाँ भी तुम बार-बार चूक रहे हो, तुम जो भी करते हो वह वाह्य जगत के लिए कर रहे हो न कि अपने आंतरिक जगत की उन्नति के लिए।
मैंने लोगों को मूर्ति के सामने प्रार्थना पढ़ते हुए देखा है। वे कुछ पंक्तियाँ पढ़ते हैं उसके बाद नौकरानी से बुलाकर पूछते हैं कि जो काम उसे कहा गया था उसने पूर्ण किया कि नहीं, या कुछ कुछ पंक्तियाँ पढने के बाद वो देखते हैं कि कितने पृष्ठ और बचे हैं पढ़ने के लिए। इस तरीके से वे अपने आप को ईश्वर से जोड़ते हैं और वे संतुष्ट रहते हैं कि उन्होंने दिन के अंत में प्रार्थना पढ़ा।
और इसके ऊपर, वे इसी प्रक्रिया को दोहराते हैं 21 दिनों तक क्योंकि उन्होंने संकल्प लिया है ये करने का। उसके पश्चात वे गौरव के साथ अपने पड़ोसियों से ये बात बताते भी हैं कि उन्होंने कितना कठिन संकल्प पूरा किया।
अधिकतर जो चीज हम करते हैं वो लोगों को बताने के लिए कि हमने ऐसा किया और यह करके हम उनके अन्दर तुलना का बीज बोते हैं। तूम देखो, यदि तुम किसी धार्मिक प्रक्रिया का अनुसरण करना चाहते हो, तो इसे पूर्ण निष्ठा के साथ करो, अस्तित्व से गहरे संबंध के भाव से करो। जब तुम इस तरह से करोगे, तुम इसके बारे में बातें भी नहीं करोगे।
यदि तुम धार्मिक अनुष्ठान का मार्ग अपनाना चाहते हो, तो ध्यान रखो कि निष्ठा और उत्तरादायित्व उसका आधार होना चाहिए। इसलिए उसे पूरी निष्ठा के साथ करो। उपासना करने के आजकल सैकड़ों तरीके हैं। तुम्हें उनमें भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है कि किस मार्ग का अनुसरण किया जाये। मात्र किसी एक का चयन कर लो और उसी मार्ग पर पूरी निष्ठा से चलो। यह तुम्हारी निष्ठा है जो तुम्हें लाभ देती है, न कि वो अनुष्ठान।
एक बात और है : तात्कालिक फल की अपेक्षा मत करो। आज हर व्यक्ति उपासना का भी तात्कालिक फल चाहता है, जैसे तत्काल चाय या तत्काल कॉफी। हममें से ज्यादातर लोग ऐसा सोचते हैं कि हमारी उपासना की अपेक्षा दूसरों को उनकी उपासना का फल जल्दी मिल रहा है। इसलिए हमें अपनी उपासना उस तरीके की कर देनी चाहिए जैसी दूसरा करता है। ये सब मूर्खतापूर्ण है। उपासना में भी इतनी तुलना। जो तुम कर रहे हो उसे पूरी निष्ठा और आस्था के साथ करो, चीजें स्वतः ही होंगी।
इसके साथ-साथ धार्मिक अनुष्ठान के पीछे के विज्ञान को भी समझने का प्रयास करो। जब तुम उसका अनुसरण करते हो, इसलिए कि तुम्हारा मन उससे पूरी तरीके से तारतम्य में रहे बजाए इसके कि तुम उसी अनुष्ठान में फँस जाओ। अस्तित्व के साथ तारतम्य स्थापित करना ही किसी धर्म या धार्मिक अनुष्ठान का अंतिम लक्ष्य है। इसे समझने की आवश्यकता है किसी भी प्रकार की अनिश्चितता के बगैर।
धार्मिक अनुष्ठान एक प्रकार का कोई सौदा नहीं है जिसे ईश्वर को घूस दिया जाये। वे किसी प्रकार का तुम्हारा बैंक खाता नहीं है, जो तुम अपनी सुरक्षा के लिए निर्मित करते हो। ये कोई दौड नहीं है, जो तूम किसी अन्य के साथ दौड़ रहे हो और देखना चाहते हो कि कौन अधिक कर रहा है। इसलिए तुलना करना बंद करो और पूरी तीक्ष्णता के साथ जो कर रहे हो उसे करो।
मुझे एक कथा याद आ रही है :
तीन लोगों ने एक साथ व्यापार शुरू किया।
उन्होंने अपने व्यापार में ईश्वर को भी एक भागीदार बनाया।
उन्होंने आपस में तय किया कि जो भी लाभ होगा, उसका एक फीसदी ईश्वर को देंगे।
उन लोगों ने व्यवसाय शूरू किया और अपेक्षा से बहुत अधिक लाभ हुआ।
तब समस्या खड़ी हुई : कि ईश्वर को इतना अधिक कैसे दिया जाए। उनमें से हर एक ने एक सूझाव दिया।
पहला व्यक्ति बोला, ''ठीक है हम एक घेरा खींचते हैं और उसी में सारा पैसा फेंकते हैं, जो कुछ घेरे के अन्दर गिरेगा वह ईश्वर का है और जो कुछ घेरे के बाहर गिरेगा वह हमारा।"
दूसरा व्यक्ति बोला, "नहीं, मैं तुम्हें एक बेहतर तरीका बताता हँ। हम सचमुच का एक बड़ा घेरा बनायेंगे और सारा पैसा उसमें फेकेंगे, जो कुछ घेरे के अन्दर गिरेगा वह हमारा होगा और जो बाहर गिरेगा वह ईश्वर का होगा। "
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Section 11
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296
थे। केवल इस जन्म में नहीं बल्कि पहले के कई जन्मों से। जब तुम इस स्थान को पा जाते हो, तुम पहुँच गए।
यह इस तरह से हैं :
एक गाय को रस्सी से बाँध दिया जाता है और उसे कुछ मीटर के दायरे में घूमने के लिए छोड़ दिया जाता है।
वो चारों तरफ घूमती है और अपनी बुद्धि से परिपक्व और सजग हो जाती है। तब रस्सी को ढीला किया जाता है कुछ मीटर और लम्बा वृत्त बना दिया जाता है।
वो और अधिक दायरे में घूमते हैं, अधिक बुद्धिमान हो जाती है, तब उसकी रस्सी की लम्बाई और बढ़ाई जाती है कि और लम्बाई में घूमे।
समय के किसी बिन्दु पर उस गाय को उसकी बढ़ती हुई बुद्धिमत्ता के आधार पर उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है।
यही चीज मनुष्य के साथ होती है। जो रस्सी या घेरा मनुष्य के आस-पास होता है वो उसकी जागरूकता के अनुपात में होता है। जितना अधिक वो जागरूक होगा, उतनी अधिक स्वतंत्रता का आनन्द लेगा और उतनी अधिक उसकी जाग्रति बढ़ेगी।
देखो, प्रश्न इस बात का है कि तूम अपनी ऊर्जा परिवर्तन के लिए कितना तैयार हो और यही एक मात्र तरीका है इसके होने का।
लेकिन जब ये होता है, तो समाज तुमसे कहेगा कि तुम भाग रहे हो। वह तुमसे बतायेगा कि जो सही है तुम उससे भाग रहे हो। भ्रम उसी के बाद शुरू होता है और जब ये होता है, तब तुम्हें अपने आप और अस्तित्व पर विश्वास और साहस की आवश्यकता पड़ती है।
यह है जहाँ किसी पूस्तक या किसी व्याख्या से अधिक एक स्वामी तुम्हारी मदद एक योग दण्ड - एक छड़ी के सहारे के लिए से कर सकता है कि तूम खड़े हो सको अपने आप के लिए। हर बार जब तुम समाज द्वारा, अपने आध्यात्म के मार्ग पर, पराजित किये जाओगे जब तुम ये महसूस करोगे कि तुम बहुमत के खिलाफ हो, स्वामी तुम्हें अपने तरीके से ऊपर खींचेगा और तुमसे कहेगा कि बस चलते रहो। कमजोर क्षणों पर तुम्हें छड़ी के सहारे से ठेले जाने की आवश्यकता पड़ती है और छड़ी ही वह स्वामी है, जो तुम्हें सहारा देती है कि तुम खड़े होकर के और सिर ऊँचा करके चल सको। हर उस क्षण पर जब तुम लड़खड़ाते हो , वह छड़ी तुम्हारे सामने सहारे के रूप में तुम्हारी मदद करती है।
स्वामी की सहायता से, तूम अकेले व्यक्तिगत रूप से खड़े हो सकते हो, एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह, जिसने अपनी विलक्षणता खो दी हो। इसका ये अर्थ नहीं है कि तूम स्वामी के ऊपर आश्रित हो, कदापि नहीं। ये भी सामान्यतः दूसरी गलत अवधारणा है। लोग सोचने लगते हैं कि तूम एक-दूसरे मनुष्य के ऊपर आश्रित हो गये हो अपने जीवन के लिए।
Section 12
यह इस तरह से : तुम एक विशेष स्थान के लिए अपने तरीके से अपना मार्ग खोजने का प्रयास कर रहे हो। यदि तुम्हारे ऊपर छोड़ दिया जाये, तो तुम कई स्थानों पर निर्देशों के बारे में पूछोगे। कई बार तुम्हें गलत निर्देश भी मिल जायेंगे और तब तुम्हें वापस भी आना पड़ेगा, और इस रूप तूम किसी तरह से अपने लक्ष्य को प्राप्त करोगे। इसमें तुम्हें काफी लम्बा समय लग सकता है, लेकिन तुम पहुँच जाओगे। लेकिन यदि तुम्हारे पास एक नक्शा या एक मार्गदर्शक हो? तब तुम सीधे अपने लक्ष्य तक बिना समय खाये हुये पहुँच सकते हो, क्या ऐसा नहीं है? क्या इसका अर्थ होता है कि तूम आश्रित हो उस नक्शे पर या मार्गदर्शक पर? नहीं, ये मात्र किसी चीज को जल्दी करने का एक तरीका है, इतना पर्याप्त है। इसी तरह से, स्वामी एक मार्गदर्शक हैं जो रास्ता जानते हैं, जो उस जगह पर पहले जा चूके हैं और जिसे तूम खोज रहे हो और वो स्वामी तुम्हारी मदद करने के लिए उपलब्ध है।
यदि तुम्हारे अन्दर केवल समर्पण भी है, तुम निःसंदेह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लए कड़ी मेहनत करोगे, लेकिन यदि तुम्हारे अन्दर समर्पण के साथ साहस भी है तो तुम छलांग लगा दोगे अपने लक्ष्य की तरफ। यह साहस तुम्हारे अन्दर केवल तब आयेगा, जब तुम दूसरों की तरफ देखना बंद कर दो और केवल अपने आप की तरफ देखो, यदि तुम अपनी तुलना दूसरों से करना बंद कर दो और अपने आप को सजगता से देखो तुम्हारे अन्दर की व्यवस्था में जो परिवर्तन सूक्ष्म ढंग से हो रहा होगा।
तुम्हें दृढ़ता से साहस के साथ खड़े होने की आवश्यकता है अपने मार्ग पर। साहस की द्रद्रता तुम्हारे अन्दर केवल तब आयेगी, जब तुम अपने आप के प्रति ही कठोरता से केन्द्रित रहोगे, बिना अपनी किसी दूसरे से तुलना किये हुये।
समाज तुम्हें परिचित स्वरूपों में जिन्हें वो जानता है, खींचने के लिए तैयार है। जिसमें पीड़ा है, जिससे वो परिचित है और जिसे वो नियंत्रित कर सकता है, एक ऐसे मार्ग पर जो बहुतायत द्वारा चला जाता है और टूट-फूट गया है। इस मार्ग पर जाने में किसी साहस की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह अत्यन्त सरल है। परन्तु उस आध्यात्म के मार्ग पर चलना जिस पर कम लोग चलते हों, उस पर चलने के लिए साहस की आवश्यकता पड़ती है। जब मैं साहस कहता हूँ तो मेरा
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Jee¢e peiele mes Devlej peiele keâer lejheâ Ietceves keâe legcneje keâoce Fme efoMee ceW henuee कदम होगा। जिस क्षण तुम यू (U) आकार में घूमते जाते हो वह क्षण अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षण होता है और ध्यान रहे, तुम्हारी सजगता तुम्हें बता देगी कि तुम यू आकार में घूम चुके हो। तब तक, तुम्हारा मस्तिष्क अन्यन्न बहाने बनाता रहेगा उदाहरण देते हुए विभिन्न लोगों, स्थितियों और घटनाओं का जो वाह्य जगत से संबंधित होंगी, जिससे कि तुम अपने आप से एकीकृत न कर सको।
एक बार तुम यू (U) आकार में घूम जाओगे, तो ये सारी चीजें हल्की होकर के नगण्य हो जायेंगी। वे धीरे-धीरे अपना महत्व खो देंगी। वे रहेंगी इसमें कोई संदेह नहीं है, परन्तु तुम स्थायी रूप से उन्नत करते रहोगे, अपने लम्बे कदमों के मध्य उन्हें लेते हुये। वे तुम्हारी मदद करेंगी, और अधिक प्रभावशाली द्रष्टा बनने में, जब वे अतिसावधानी से अपना प्रभावत डालेंगी। पहला कदम उठाना या यू (U) घुमना ही है जो सबसे कठिन चीज है। जब तुम यू आकार में घूम जाते हो, आधा कार्य तुम्हारा पूरा हो जाता है। तब तुम अधिक लचीले हो जाते हो अस्तित्व के रास्तों के प्रति।
जब तुम यू (U) आकार में घूमते हो, हर चीज तुम्हारे लिए ध्यान बन जाती है। चाहे वह चलना हो या बोलना हो या गाना हो या नाचना हो या मात्र कपड़ा पहनना हो या कपड़ा उतारना हो हर चीज ध्यान बन जाती है और ये की जाती है बढ़ती हुई जागरूकता के साथ।
यदि तुम, अपने आप को ये सब करते हुए बस ध्यान से देखो, तो धीरे-धीरे तुम समझ जाओगे कि सारा संसार एक भ्रम है। जब तुम अपने अन्तर जगत की तरफ पहला कदम लेते हो, तुम वास्तव में एक छलांग लगा देते हो पहले कदम के रूप में। क्योंकि पहला कदम अत्यन्त महत्वपूर्ण है और वास्तव में एक छलांग है। उसके पूर्व तुम केवल अपने आप को और दूसरों को विश्वास दिलाने में लगे रहते हो कि तुम क्या खोज रहे हो और अधिक भ्रमित भी हो जाते हो और तुम्हारी दृढ़ता भी धीरे-धीरे कम होती रहती है।
जब तुम पहला कदम लेते हो, तुम अपने आप पर विजय प्राप्त करने के लिए तैयार रहते हो। दूसरों पर विजय प्राप्त करना बहुत सरल है। बस मात्र कुछ हथियार ले लो या अपनी जीभ का इस्तेमाल करो और उसको फाइकर दो दुकड़े में कर दो, इतना ही सब कुछ है। लेकिन अपने आप पर विजय प्राप्त करने के लिए सच्चे साहस की आवश्यकता पड़ती है। यह विशुद्धि चक्र अपने आप पर विजय प्राप्त करने के बारे में ही है।
जब तुम अपने अन्दर की तरफ देखते हो, तुम अपने आप पर विजय प्राप्त करने के लिए तैयार रहते हो। निश्चित रूप से, जब तुम अपने अन्दर की तरफ के मार्ग
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पर होते हो तो जो कुछ भी तुम करते रहते हो उससे तुम्हारे आस-पास के लोगों का कोई सरोकार नहीं होता। केवल तूम जानोगे कि जो कुछ भी हो रहा है, अन्दर हो रहा है और बाहर नहीं। केवल तूम अपने अन्दर हो रहे उद्घेलन के प्रति सजग होगे। अपने अन्दर बढ़ती हुई बुद्धिमत्ता के बारे में केवल तुम बता सकोगे। तम्हारे आस-पास के लोग यह नहीं समझ सकेंगे, जो अनुभव तुम प्राप्त कर रहे होगे। मैं तुम्हें बताता हूँ : कभी किसी को इस बात के लिए संतुष्ट करने का प्रयास मत करो, जो तुम्हारे अन्दर हो रहा है। तुम अपने इस अनुभव को अपने आध्यात्मिक मित्रों से बाँट सकते हो, जो तुम्हारी सोच और स्तर के अनुरूप हो लेकिन यदि तूम अपने अनुभव ऐसे लोगों से बाँटोगे जो ईश्वरीय क्रुपा से अन्दर की यात्रा के प्रति भूलक्कड़ हैं, तो तूम केवल गहरी पीड़ा ही पाओगे।
इस अनुभव को मात्र अपने अन्दर होने दो, न तो उनको रोकने का प्रयास करो और न उनके पीछे भागो। उन्हें अपने अन्दर कार्य करने दो जिससे कि तूम परिपक्व हो जाओ। यदि तुमने उनको किसी बिन्दू पर नियंत्रित किया तो तूम उसी बिन्द्र पर अटक जाओगे और पूरी चीज से चूक जाओगे।
याद रखो ये सारे अनुभव एक देखने बताने वाले लक्षण हैं कि तूम अपने अन्तःकरण की यात्रा पर हो। ये उस संकेत-पटल की तरह हैं जो तुम सड़कों पर देखते हो। क्या तुम उसी संकेत-पटल पर अटक जाते हो यह कहते हुए कि तुम्हारा लक्ष्य आ गया? नहीं, उन संकेत-पटलों पर मत अटकों, अपने लक्ष्य के प्रति बढ़ते रहो।
एक पूर्ण निष्ठा और दृढ़ता की आवश्यकता है और ये स्वतः आ जायेगी जब तुम तैयार हो जाओगे, जब तुम अपने मन का परित्याग करने के लिए तैयार हो जाओगे - जो समाज है, और अपने हृदय से जीना शुरू कर दोगे, जब तुम दूसरों के प्रति उँगली उठाना बंद कर दोगे और अपनी तरफ उँगली उठाओगे, चाहे जो हो जाये। जब तुम प्रायोगिक रूप से यह समझ जाओगे कि तुम्हारा मस्तिष्क सामाजिक है और तुम्हारा हृदय स्वाभाविक है।
एक बात और : जब तुमसे लोग तुम्हारे अनुभव के प्रमाण के बारे में पूछने लगें इतना समझो उनसे प्रमाणित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम्हारा अनुभव इतना व्यक्तिगत और अन्तरंग है तुम्हारे लिए कि तुम उसे प्रभावित रूप से किसी दूसरे व्यक्ति से बाँट नहीं सकोगे। वास्तव में यदि तुम उसे बाँटोगे तो तुम्हारे सम्पूर्ण अनुभव में एक गिरावट आयेगी और दूसरा व्यक्ति हो सकता है कि जो तुम कह रहे हो उस पर विश्वास भी न करे। वे लोग कह सकते हैं कि तुम अपने आप को धोखा दे रहे हो। वो तुमसे ये भी कह सकते हैं कि उन्हें तार्किक ढंग से पूरी चीज बताओ।
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जब तुम दूसरों से मुकाबला करना प्रारम्भ करते हो, तुम अपने आप को भूल जाते हो। तुम अपने स्वरूप को शक्तिशाली बनाना भूल जाते हो, जो न छुआ गया तम्हारा वास्तविक ऊर्जा स्रोत है। यदि तुम्हारे अन्दर शारीरिक शक्ति है और बौद्धिक शक्ति है, तो बिना आत्म की शक्ति के ये सब बेकार है। केवल तब जब तुम अपनी आत्मा की शक्ति को खोज लेते हो, तब तुमने जीवन की ऊर्जा सोत को छू लिया?
प्रश्न : स्वामी जी, एक बार हम ईर्ष्या से मुक्त होने में सफल हो जायें, तो क्या हम कम से कम अपने अन्दर की कमियों में से एक से पूर्णरूपेण स्वतंत्र हो जायेंगे ?
निश्चित रूप से, यदि तुम यह देख सको कि तुम्हारे अन्दर प्रेम बिना किसी राग या ईर्ष्या के हैं तूम निश्चित रूप से आगे बढ़ गये, लेकिन तुम्हें पूरी सजगता से आगे बढ़ना है क्योंकि तुम बहुत सरलता से वापस फिसल सकते हो अपने पूर्व के अचेतन तरीकों में और पूर्व के भावनाओं में एक बार फिर।
अपनी इस नयी खोजी हुई सजगता को पकडे रखो और उसी के साथ चलते रहो। वह तुम्हारे लिए और खुबसूरत संभावित मार्ग खोलेगी जिसका तूम अन्वेषण कर सको। कहीं अटको मत। सबसे बड़ा खतरा कुछ अनुभवों में अटकने का है जो तुम्हें ठोस प्रतीत होंगे।
स्वामी अपने अनुयायियों को किसी भी प्रकार के अनुभवों में अटकने नहीं देते। वो हमेशा अपने अनुयायियों को ठेलते रहते हैं और आगे बढ़ने के लिए जिससे कि वो अपनी खोज में गहराई तक जा सकें। जो लोग देवी या देवता का दर्शन पा जाते हैं अक्सर अपनी आध्यात्मिक यात्रा में वहीं अटक जाते हैं। वे महसूस करते हैं कि अब और कुछ अधिक देखा जाना नहीं है इसलिए अपने उसी अनुभव में वहीं रुक जाते हैं। इसे कभी मत होने दो।
तुम देखो, जब तक तुमने परमानन्द की स्थिति को नहीं प्राप्त कर लिया, तूम कभी भी धरातल पर वापस गिर सकते हो, इसलिए याद रखो और अपनी सजगता को निरंतर पोषित करते रहो रहो जिससे कि तुम गहराई और गहराई तक समझ सको।
एक बात समझो : स्वामी का कार्य बहुत नाजुक है। उसे तुममें से हर एक को अलग-अलग बड़ी सजगता से और बहुत संभाल कर नियंत्रित करना पड़ता है। उसे देखना रहता है कि तुमसे कौन किस तरीके से बढ़ेगा और प्रफुल्लित होगा,
अपने तरीके से। तुममें से हर एक ने अपने पूर्व के बहुत से जीवन में बहुत ज्यादा अनभिज्ञता एकत्रित कर ली है उसे सब पर कार्य करना रहता है और तुम्हें जाग्रत करना रहता है।
एक बात और याद रखो :
जीवन बहुत से समाधान देता है, लेकिन उनमें से कुछ ही तुम पर तुम्हारे अनुरूप होते हैं। बुद्धिमत्ता उनको खोजने में हैं। जब तुम अपनी बुद्धिमत्ता की मदद लोगे और खोज लोगे तब उसके लाभ से आनन्दित होगे। उसकी तुलना में, यदि तुम दूसरे के समाधानों को अपने ऊपर लगाने दोगे तो तुम मार्ग से ही भटक जाओगे और ये भूल जाओगे कि तुम कहाँ हो।
एक छोटी कथा :
एक सुदूर गाँव में एक वृद्ध महिला अपने पुराने घर में झाड़-पोछ कर रही थी।
अचानक दरवाजा खुला और एक युवा विक्रेता (Salesman) अन्दर आया। उसने महिला को झाड़-पोछ करते देखते उत्तेजित होकर के बोला।
उसने उस महिला से बताया कि उसके पास कई उपकरण ऐसे हैं जो घर साफ करने में उसकी मदद करेंगे।
व्रद्ध महिला ने कहा, ''लेकिन..............''
उस व्यक्ति ने बीच में ही रोककर के एक बैग से ढेर सारा कूड़ा-करकट जमीन पर निकाला।
वृद्ध महिला ने फिर प्रयास किया, "लेकिन…………"
Section 16
उस व्यक्ति ने उससे कहा कि चुपचाप खडी होकर के देखे। उसने एक उपकरण निकाला और समझाया, "तुम इस मशीन को देख रही हो? यह चाहे जितनी धूल हो बहुत कम समय में साफ कर देगी। यह इतनी हल्की है इसलिए इस्तेमाल करने में बहुत सरल है, खासतौर से आपकी उम्र में। मैं प्रयोग करके दिखाता हूँ।"
वृद्ध महिला ने पुनः प्रयास किया, "लेकिन..................''
व्यक्ति बीच में ही रोककर के बोला, ''बस मुझे बिजली का प्लग दिखाओ। "
तब उस महिला ने अन्त में कहा, "लेकिन बिजली अभी हमारे गाँव तक आयी ही नहीं है।''
जीवन में हमें इस बात को निश्चित करने की आवश्यकता है कि हमारे लिए सबसे उपर्युक्त अधिक से अधिक क्या है? यदि हम इस बारे में स्पष्ट हैं तो हम बिना किसी चिंता के उच्चति करेंगे। परन्तु ज्यादातर मौकों पर हम लोभ में पड़ जाते हैं और दूसरों के समाधानों को अपने ऊपर लागू करते हैं और तब दुःखी होते हैं।
यदि हम स्पष्ट हैं इस बारे में कि हम कहाँ खड़े हैं और हमारी आवश्यकता क्या है, तब हम स्थिरता से आगे बढेंगे। इसमें अगर हमें कुछ उतार-चढ़ाव भी आयेगा तो भी वह केवल हमारी कार्यशैली को और बेहतर तरीके से करने में अधिक बुद्धिमान बनायेगा। इस तरह से, तुम अपनी बुद्धिमत्ता से क्रियाशील रहोगे और यह तुम्हारे लिए एक प्रायोगिक समझ होगी।
जब बस तुम दूसरों के समाधानों का अनुसरण करते हो, तब तुम्हारे अन्दर कुछ नहीं होता, क्योंकि तुम बस अपनी सीमा-रेखा की चारदीवारी से क्रियाशील रहते हो। जब तुम्हारे अन्दर कुछ नहीं होगा तो तुम्हारी उन्नति भी नहीं होगी, याद रखो जब मैं कहता हूँ कि तुम्हारी उन्नति नहीं होगी, तो मेरे कहने का अर्थ है तुम अन्दर से नहीं बढ़ोगे। भौतिक उपलब्धियाँ मिल सकती है, परन्तु तुम अन्दर से मृत होगे।
एक बात याद रखो : केवल तब जब तुम अन्दर से उच्चत करोगे, तभी तुम वास्तव में उन्नति करोगे। वाह्य जगत की दौड़ में खतरनाक तरीके से मत फँसो। इसे मात्र एक खेल की तरह देखो और अच्छी तरह खेलो। भौतिक उपलब्धियों की आवश्यकता जीवित रहने के लिए हैं।
लेकिन इन सबको सीमा के अन्दर ही रहना चाहिए। अन्तःकरण को स्थिरता के साथ बढ़ना चाहिए। यही है जो तुम्हारी सहायता करेगा वाह्य जगत के खेल में। जब तुम अपनी बुद्धिमत्ता को उद्घेलित करना सीख जाओगे, तब तुम यह महसूस करोगे कि दूसरों की उन्नति की तरफ देखना और दूसरों की क्रियाओं को देखना कितना अर्थहीन है। संपूर्ण चीज कितनी मूर्खतापूर्ण है तुम यह देखोगे। जब तुम्हारी बुद्धिमत्ता बढ़ेगी, तब तुम यह समझ जाओगे कि हर एक को अपनी दौड़ दौड़नी है किसी दूसरे के मुकाबले में नहीं दौड़ना है। सच्ची दौड़ ता वह है कि तूम अपनी असीमित बुद्धिमत्ता की खोज की तरफ दौड़ो। तुलना के लिए इसमें स्थान कहाँ है?
जीवन और कुछ नहीं, बल्कि अपने असीमित बुद्धिमत्ता को खोजने की प्रक्रिया है। इसीलिए मैं अक्सर कहता हूँ : जीवन एक लक्ष्य है मार्ग नहीं। जैसे-जैसे तुम्हारी बुद्धिमत्ता बढ़ेगी, तुम और आनन्दित रहोगे और जीवन के खेल को और प्रभावशाली ढंग से खेलोगे। इसलिए तुलना करना बंद करो और खोजना शुरू करो - अपनी सच्ची उन्नति का स्रोत।
विश्वद्धि चक्र उच्च रचनात्मकता का स्थान है। जब इस चक्र की ऊर्जा खुलेगी, तुम देखोगे कि तुम्हारे पास प्रचण्ड रचनात्मकता उपलब्ध होगी।
जब तुम अपने स्वरूप का प्रकार बदल दोगे, स्वाभाविक रूप से अपनी क्रियाशीलता के प्रकार को भी बदल दोगे। जो भी तुम करोगे वो महान दक्षता और रचनात्मकता से करोगे। परिणामस्वरूप जो उपलब्धियों का प्रकार होगा वह भी बदला हुआ होगा। जो भी तुम्हें मिलेगा, उससे तुम खुश रहोगे और तुम देखोगे कि भौतिक धन सम्पदा और सफलता तुम्हारी तरफ स्वाभाविक रूप से बहेगी। इसलिए तुलना का परित्याग करो और अपने स्वरूप में वापस लौटो और खोजो परमानन्द या नित्यानन्द।
हाँ.......अब हम एक ध्यान तकनीक में प्रवेश करेंगे जिसे शक्ति सागर ध्यान कहते हैं। यह तुम्हें प्रायोगिक रूप से समझायेगा कि तुम्हारे विशुद्धि चक्र की प्रचण्ड ऊर्जा का तुम कैसे प्रयोग कर सकते हो।
शक्ति सागर साधना
(काल अवधि : 30 मिनट)
शक्ति सागर साधना जेन धर्म से ली गयी है। वह तुम्हारे ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को उद्घेलित करने में मदद करती है। इस ध्यान की मुख्य चाभी यह है कि तुम अपने मन को विशुद्धि चक्र पर ही केन्द्रित रखो जब शरीर चल रहा हो। जब तुम यह ध्यान करोगे तो उस ऊर्जा को सीधे उद्घेलित करोगे।
खड़े होकर के अपने दोनों नेत्र बंद करो और ध्यान अपने विश्रद्ध चक्र पर केन्द्रित करो। किसी कूर्सी या सहारे के पीछे खड़े हो और उसको पकड़े रहो। धीरे-धीरे चलना शुरू करो बहुत धीरे उसी स्थान पर जहाँ तुम खड़े हो।
अब धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाना शुरू करो। वहीं चलते रहो उसी स्थान पर तेज और तेज गति से। अपनी चलने की सीमा वहीं तक ले जाओ, बिना किसी कष्ट के। अपने ऊपर आवश्यकता से अधिक दबाव मत दो किसी भी समय। हर समय अपने विशुद्धि पर ध्यान केन्द्रित रखो। तुम उससे निकलती हुई ऊर्जा को अनुभव करोगे। सबसे महत्वपूर्ण भाग यह है कि इसमें किसी भी समय गति धीमी नहीं की जा सकती। 20 मिनट के पश्चात् रुक जाओ।
अगले 10 मिनट जहाँ भी हो तुम वहीं शांति के साथ चुपचाप बैठ जाओ। अपने नेत्र बंद रखो और विशुद्धि पर ध्यान केन्द्रित करो। अब तुम उस ऊर्जा को अपने अन्दर ग्रहण कर रहे होगे, जो तुमने इस चलने से पैदा की।
इस ध्यान की चाभी इसी में है कि तुम्हारा ध्यान केन्द्रित रहना चाहिए विशुद्धि
चक्र पर, जब तुम्हारा शरीर चल रहा हो। जब तुम इसे करोगे, तो ब्रह्माण्डीय ऊर्जा तुम्हारे विशुद्धि चक्र के माध्यम से प्रवेश करेगी और तुम्हारे लिए ऊर्जा का प्रचण्ड स्रोत बन जायेगी।
जब तुम ये ध्यान कर रहे होगे, तुम अपनी माला अपने गले में पहन सकते हो। जो ऊर्जा तुम इस ध्यान के दौरान पैदा करोगे यह माला उसे अपने आप में एकत्रित करेगी।
(समूह संगीत के साथ शक्ति सागर ध्यान का अभ्यास करता है।) ओम शांति शांति शांतिः
धीरे, बहुत धीरे, अपने नेत्र खोलो। अब हम दूसरे सत्र में मिलेंगे। धन्यवाद


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आज्ञा चक्र का सीधा संबंध अहंकार से, गंभीरता से, अपने आप के बारे में अत्यधिक सोचने से और जीवन को अति गंभीरता से लेने के स्वभाव से है। गंभीरता है क्या?
गंभीरता और कुछ नहीं है, बल्कि किसी चीज को आवश्यकता से अधिक महत्व देना है, अन्य चीजों की कीमत पर। यह जन्म लेती है हमारी यह देख पाने की अक्षमता से कि जीवन मात्र एक नाटक है जो हर क्षण हो रहा है। गंभीरता परिणति है हमारी जीवन से आवश्यकता से अधिक अपेक्षा की।
एक छोटी कथा :
दो लड़के समुद्र के किनारे बालू का महल बना रहे थे।
वे अचानक आपस में किसी बात पर लड़ने लगे और उनमें से एक ने क्रोधित होकर के पैर से बालू के महल को मारा।
दूसरे लड़के ने जाकर के अपनी इस गंभीर समस्या की शिकायत राजा से की।
राजा हँसने लगा उसके बालू के महल पर इतना अधिक महत्व देने पर। लेकिन राजा का सलाहकार, एक ज़ेन भिक्ष, ने राजा पर ही हँसना प्रारम्भ किया।
उसने पूछा, ''जब आप'यूद्ध लड़कर पत्थर के किलों के कारण अपनी नींद खो देते हो, तो ये लड़के जो बालू के किलों के लिए लड़ रहे हैं उस पर हँस क्यों रहे हो?''
हमारी सारी गंभीरता मात्र बालू के किलों के बारे में हैं। इसको समझ लें। उस लड़के के लिए इस उम्र में बालू का किला कीमती है, जब कि हमारे लिए हमारी उम्र में पत्थर का किला कीमती है, बस इतना है। चाहे वो बालू का किला हो या पत्थर का किला, उसके पीछे जो गंभीरता रहती है वह एक ही रहती है, गंभीरता का मात्र लक्ष्य भिच्न होता है। इसलिए हँसें मत बच्चों पर, जो बालू के किले के लिए लड़ते हैं।
Section 17
गंभीरता जीवन के प्रति आपके मस्तिष्क के खुलेपन और स्वतंत्रता को बंद कर देती है। आपको वह सुस्त और मृत बना देती है। वह आपके सोचने को दबाती है और आपको, आपके उन्हीं परिचित स्वरूपों से जिन्हें आप जानते हो, चिपकाये रहती है।
एक ज़ेन आश्रम में एक प्रतियोगिता थी, जो भिक्षुओं के मध्य हुई कि किसका बगीचा सबसे अच्छा है।
एक अनुयायी अत्यन्त गंभीर प्रकार का था। उसने प्रतियोगिता को भी बहुत गंभीरता से लिया। उसने अपने बगीचे को बहुत साफ-सूतरा रखा, अच्छी तरह झाड़ लगाकर। हर घास बराबर थी। हर झाड़ी सफाई से कटी हुई। उसे पूरा विश्वास था कि उसे ही प्रथम पुरस्कार मिलेगा। प्रतियोगिता के दिन, स्वामी ने घुमकर सारे बगीचे देखे। तब उन्होंने आकर के बगीचों की श्रेणियाँ बनाई। उस अनुयायी का बगीचा श्रेणियों में सबसे नीचे था। हर व्यक्ति आश्चर्यचकित था। अनुयायी ने जाकर इस बारे में स्वामी से प्रश्न किया। उसने पूछा, "स्वामी जी, मेरे बगीचे में क्या कमी है? आपने मुझे सबसे नीची श्रेणी में क्यों रखा?" स्वामी जी ने उसकी तरफ देखा और पूछा, "सारी सूखी हुई पत्तियाँ
कहाँ हैं?''
जो बगीचा इस तरह से रखा जायेगा, वो बहुत दिनों तक जीवित नहीं रहेगा। वह मृत लगता है।
गंभीरता सहजता को मार देती है। वह रचनात्मकता को नष्ट कर देती है। विज्ञान ने इस बात को सिद्ध कर दिया है कि यदि आप कोई कार्य आराम से और हल्के तरीके से करो, तो आपके सोचने की और निर्णय लेने की क्षमता स्वतः ही
बढ़ जाती है। वही कार्य अगर बहुत गंभीरता से किया जाये, यह आपके मस्तिष्क को सूस्त बना देता है।
मैं आपको बताता हैं : हमारी सारी गंभीरता मात्र बीमारी है। जब मैं कहता हँ सारी तो मेरे कहने का अर्थ है सारी। और हमारी सारी बीमारियाँ गंभीरता से ही जन्म लेती हैं। गंभीरता बीमारी लाती है और बीमारी गंभीरता लाती है।
एक रात्रि, एक व्यक्ति ने मुझे फोन किया और फोन पर ही रोने लगा।
उसने कहा, "मैं आपके पैरों में गिरकर कह रहा हूँ कृपया मेरी मदद कीजिये स्वामी जी, मैं इतना हतोत्साहित हो गया हूँ कि मैं अपना जीवन समाप्त करने जा रहा हूँ।''
मैंने उसे शांत करने का प्रयास किया, और अंत में उससे कहा, "तुम आश्रम में कल सुबह क्यों नहीं आ जाते और कुछ दिन मेरे साथ यहाँ रहो। हम लोग देखते हैं क्या किया जा सकता है?"
उसने उत्तर दिया, "कल स्वामी जी? अरे कल मुझे दफ्तर जाना है……..क्या मैं
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यह वही रवैया है कि - आज मैं गंभीर रहुँगा, कल मैं खूश होऊँगा। अन्त में आप न तो आज खुश होगे और न कल। आप अपने खुश होने की क्षमता ही खो दोगे, किसी भी समय।
मात्र साधारणता से, सहजता से और निश्छलता से जियो।
Section 18
परिपूर्णता और दोष रहित की धुन में बहुत अधिक मत रहो। मैं आपको बताता हूँ : परिपूर्णता की धुन आपको मानसिक रोगी बना सकती है। जो कुछ भी आप करते हो उसे पूरी तरह से लगन से करो। तब जो आप करते हो वही पूर्ण होगा और आपको परिपूर्णता के लिए एकदम चिंता करने के लिए आवश्यकता नहीं पडेगी।
परिपूर्णता की धुन हमेशा आपके मस्तिष्क से ही उत्पन्न होती है। फिर आपके लिए एक लक्ष्य बन जाती है। तब आप उसी लक्ष्य के लिए कार्य करते हो और जब आप उस लक्ष्य के प्रति कार्य करते हो, वह सांसारिक और मृत हो जाता है। लेकिन जब आप पूर्ण हो, अपने हृदय में स्थित होते हो और वह एक गहरा अनुभव बन जाता है। तब उसका प्रतिफल अच्छा होना ही है और वो आपको आनन्द भी देगा। उसके पश्चात जो भी आप करोगे वह अस्तित्व के तारतम्य में होगा।
परिपूर्णता की धुन आपको आनन्द कभी नहीं देती, यह केवल आपके अहंकार को संतुष्ट करती है। चाहे आप अंत में अपने आप को पूरी तरह से ही परिपूर्ण क्यों न महसूस करो केवल यह आपके अहंकार की संतुष्टि होगी, आपके स्वरूप की परिपूर्णता कभी नहीं। बहुत स्पष्ट रहो : जो परिपूर्ण धुन के होते हैं वो बहुत बड़े अहंकारी होते हैं। वो पूर्णता की सीमाओं से ही चूक जाते हैं और एक बात जान लो संपूर्णता तभी संभव है जब तुम उसमें गहराई तक प्रवेश करो। परिपूर्णता कभी संभव नहीं है, क्योंकि वह आपके मस्तिष्क में है और आपका मस्तिष्क परिवर्तनशील है और वो परिपूर्ण की परिभाषा बदलता रहता है।
हाँ एक बात और : व्रुटि करने का साहस करो। गंभीर लोग त्रुटियाँ करने से हमेशा इरते हैं, वे अपने आप को बहुत गंभीरता से लेते हैं, वे अपने आप के बारे में बहुत अधिक सोचते हैं ये उनके लिए बहुत अधिक होता है कि वो कोई त्रुटि करें और उनकी तरफ कोई उँगली उठायें। मैं आपको बताता हूँ कि वास्तव में, ये लोग छोटी-छोटी त्रूटियाँ करने से डरते हैं और अंत में बहुत बड़ी त्रुटियाँ करते हैं। त्रुटियाँ हो जाने में क्या गलत है? आप कहोगे, "स्वामी जी, मैं अपने कार्य में तो कोई गलती करने का साहस ही नहीं कर सकता, यही कारण है कि मैं गंभीर रहता हूँ।" जो तुम कह रहे हो वो सत्य हो सकता है, आपका कार्य व्युटियाँ करने
की अनुमति नहीं देता होगा, मगर वह बात नहीं है जो यहाँ मैं कहने का प्रयास कर रहा हैं। जब आप त्रृटि करोगे, तो लोग आपके ऊँपर उँगली उठायेंगे और आप उसे बर्दाश्त नहीं कर पाओगे। आपके अहंकार के निश्चित रूप से चोट लगेगी क्योंकि आप इसके प्रति बहुत अधिक संवेदनशील हो, आप इस बात को जानते हो। इसलिए आप अपने अहंकार के चोट से बचने का प्रयास करते हो, और आप अपना पूरा प्रयास करते हो कि आपसे कोई त्रूटि न हो।
आप निरंतर अपने अचेतन में अपने अहंकार की रक्षा की योजना बनाते रहते हो। लेकिन जो कारण आप बताते हो वो सब भिन्न होते हैं। ऐसा नहीं कि आप झूठ बोलते हो। नहीं, यह मात्र इसलिए हैं, क्योंकि आप इस बात से भिज्ञ नहीं हो कि कितने सुक्ष्म तरीके से आपके अन्दर आपका अहंकार काम करता है। यदि आप गहराई से विश्लेषण करो और देखो, तो आप समझोगे कि मैं क्या कर रहा हैं।
त्रुटियाँ करने में कोई गलती नहीं। वास्तव में, कुछ त्रुटियाँ करके आप स्पष्ट रूप से जानोगे कि त्रुटियाँ करने से कैसे बचा जाता है, क्योंकि आपने प्रायोगिक रूप से समझा है उसे। त्रुटियों से जितना अधिक आप सीखोगे, उतना ही अधिक आप इस बारे में जानोगे कि कैसे त्रुटियाँ न की जायें।
यह जानना कि त्रुटियाँ कैसे न की जायें, एक बहुत महत्वपूर्ण बात है। तभी आप उसके दोनों पहलूओं को देख पाओगे, तभी आप प्रायोगिक रूप से दोनों पहलुओं की छानबीन कर पाओगे। अन्यथा इस बात का खतरा हमेशा बना रहेगा कि किसी विषम परिस्थिति में किसी गलत पहलू की तरफ तुम चले जाओ, खासतौर से जब आप उस तरफ जाने की स्थिति में नहीं रहोंगे।
केवल एक बात : वही त्रुटि दोबारा मत करो। आपका मस्तिष्क स्वरूपों की पुनरावृत्ति हमेशा करता है। वही त्रुटियों के साथ भी मत करो, नयी त्रुटियाँ करो और बेहतर समझ की तरफ बढ़ो। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि जानबूझकर त्रूटियाँ करो। वह पुनः मूर्खतापूर्ण होगा। मैं केवल यह कह रहा हूँ कि चीजों को अपनी पूरी बुद्धिमत्ता और अधिक से अधिक उत्साह से करो बिना इस बात की चिंता किये हुए कि शायद कहीं वो त्रुटि न हो जाये। जिस क्षण आप इस बात के लिए चिंतित होते हो कि कहीं त्रुटि न हो जाये, आप अपने अहंकार पर पड़ने वाली चोट के बारे में चिंतित रहते हो।
अपने अहंकार पर पड़ने वाली चोट के प्रति, जब आप इतना चिन्तित नहीं राहेगे तब आपके अन्दर इतना साहस होगा कि आप कोई भी छलांग लगा लो। आपकी सारी तथाकथित चिंता वास्तव में सब आपके अहंकार के चोट के बारे में है। जब आप इससे मुक्त हो जाओगे, तब आप अधिक स्वतंत्रता और साहस के साथ क्रियाशील होगे। तब आप छानबीन करने के और इच्छूक होगे।
एक छोटी कथा :
एक क्लब में, एक व्यक्ति ताश खेलने के पश्चात वहाँ से वापस जा रहा था।
वो जहाँ कोट टँगी रहती है वहाँ जाकर अपना कोट पहन रहा था, अचानक एक धीमी आवाज में पीछे से उससे कहा गया, "महोदय, लेकिन क्या आप श्री फिलिप हैं?''
व्यक्ति ने घूमकर उत्तर दिया, "नहीं मैं नहीं हूँ।"
आवाज आयी, "ईश्वर को धन्यवाद। मैं फिलिप हूँ और वो कोट मेरी है।"
हम कितना भयभीत रहते हैं, इस बात से कि हमसे व्रुटि हो सकती है और हमको या हमारे अहंकार को चोट लग सकती है। इसलिए हम इतनी गंभीरता, सहृदयता, विनम्रता और इसी तरह के कई तरीके से कार्य करते हैं। ये और कुछ नहीं बल्कि हमारे अहंकार के निष्क्रिय स्वरूप हैं। क्योंकि तुम अपने अहंकार पर चोट पड़ने से इतना भयाक्रांत रहते हो कि तुम इन तरीकों से व्यवहार करते हो। अपने अहंकार की रक्षा करना बंद करो और स्वतंत्रता से घूमो।
'गंभीरता', से दूर हटों। किसी तरह से हम आध्यात्मिकता को हमेशा जोड़ देते हैं गंभीरता से। यह बहुत गलत अवधारणा है। गंभीरता कभी भी धर्म या आध्यात्मिकता नहीं हो सकती।
क्या आप सोचते हो कि मैं तूम लोगों को इतने हास्य दुष्टांत (Joke), और छोटी कथायें क्यों बताता हूँ? यदि मैं आप लोगों से यह सब चीजें न बताऊँ, आप धीरे-धीरे बहुत गंभीर हो जाओगे, और जब आप गंभीर हो जाओगे, आप मृत और बोझिल हो जाओगे, आप हल्के और जीवन्त नहीं रह जाओगे। मैं आपको यहाँ और बोझिल करने के लिए नहीं हूँ।
मैं यहाँ आपको हल्का करने के लिए हूँ। मैं आपको यहाँ यह बताने के लिए हूँ कि आपकी गंभीरता और कुछ नहीं, बल्कि आपके अहंकार का ही एक रूप है। मैं यहाँ आपको यह दिखाने के लिए हूँ जो आप नहीं हो। मैं यहाँ इसलिए नहीं हूँ कि जो आप पहले सोच रहे हो, उसी को आपके अन्दर पुनर्स्थापित करूँ।
जो लोग पूर्व और भविष्य के भार से ग्रसित रहते हैं, वे हमेशा गंभीर रहते हैं। वे स्वच्छंदता से हँसना नहीं जानते। वे महसूस करते हैं कि उन्हें पूर्व और भविष्य का भार अपने कंधों पर लेना उनका कर्तव्य है और इसीलिए वे गंभीरता में डूबे रहते
हैं। यह बहुत ही उच्च अहंकारी प्रवृत्ति है। वे महसूस करते हैं कि यदि वो नहीं करेंगे, तो इसे कोई और नहीं करेगा।
सर्वप्रथम, पूर्व और भविष्य का भार अपने कंधों पर लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। मात्र वर्तमान में रहो, इतना पर्याप्त है। ये लोग हमेशा वर्तमान को पूर्णतः खोते रहते हैं। ये लोग हँसी से अपने जीवन में पूर्णतः वंचित रहते हैं।
हँसी वह चीज है, जो आपके अन्दर के स्वरूप से आपके शरीर को ऊर्जा की किरण प्रदान करती है। यह आपके अपने पूरे व्यक्तित्व को एक नवयौवन प्रदान करता है। यह आपको पूर्णतः स्वस्थ करने में किसी अन्य चीज से अधिक मदद करेगी। यह आपको वर्तमान की आश्चर्यजनक छवि दिखायेगी, जो आप कठिन साधना से प्राप्त करने का प्रयास करते हो। हँसी अत्यन्त शक्तिशाली ध्यान तकनीक है।
हँसी महानतम आध्यात्मिक गुण है। निश्छलता और हँसी साथ-साथ चलती है। जैसा कि मैंने पहले कहा कि गंभीरता और हँसी दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते। या तो आप गंभीर रहोगे या हँसोगे, जब तुम निष्ठावान रहोगे, तो आप हँस सकते हो और अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से पूरा कर सकते हो।
हममें से कितने अपने खुले हृदय से हँसते हैं? हँसी पर भी हम अपना नियंत्रण प्रभावी रखते हैं। तथाकथित सामाजिक तरीकों ने आपको सिखाया है कि किस तरह से शिष्ट तरीके से हँसा जाये। जब बच्चे हँसते हैं तो हम उन्हें हँसने का तरीका सिखाते हैं। हम उनके स्वाभाविक तरीके से हँसने को भी गलत तरीके से प्रभावित करते हैं। हम उन्हें तत्काल बताते हैं, बहुत हँस चुके अब बस। हम उनके हँसने को भी नियंत्रित करते हैं।
मैंने माताओं को अपनी पुत्रियों से कहते सूना है, "पुरुषों की तरह मत हँसो औरतों की तरह हँसना सीखो।" तुम हँसी को कैसे परिमार्जित कर सकते हो? हँसी एक ऐसी चीज है जो आपके अन्तःस्वरूप से निकती है। मैं आपसे बताता हूँ, कि ये सारे तरीके आप जो अपने बच्चों पर आरोपित करते हो, वो और कुछ नहीं मात्र आपके सुस्त और मृत स्वरूप का प्रतिबिम्ब है। जब तक आप अपनी संतान पर अपने आप को पूर्णतः प्रतिबिम्बित नहीं कर दोगे, आप आराम से नहीं बैठोगे। इस वर्ष जब मैं अमेरिका गया था, तो मैंने कुछ बच्चों के साथ थोड़ा समय बिताया। मैंने कुछ घण्टे उन बच्चों के साथ बिताये। मैं हतप्रभ था जब मैंने देखा कि वो एकदम हँसे ही नहीं, जबकि मैंने उनके साथ बहुत सी हास्य कथायें कहकर के उन्हें हँसाने का प्रयास किया। बच्चे आजकल अपने ऊपर एक क्रतिम परिपक्वता ओढ लेते हैं और हँसी को अपनी व्यवस्था से निकाल देते हैं। यदि वो बच्चों के रूप में नहीं हँसेंगे तो बड़े होकर वो करेंगे क्या? मेरे लिए यह बात बहुत महत्वपूर्ण थी।
Section 19
लोग मुझसे कहते हैं कि मेरी हँसी सब को छू जाती है। उन बच्चों के साथ, पहली बार मुझे लगा कि मेरी हँसी उन्हें छू भी नहीं रही है। वे मुझ मात्र देख रहे थे अपने चेहरों पर वही परिपक्वता लिये हये। मैंने उन्हें छोड़ दिया इस डर से कि कहीं वे मूझे भी गंभीर न बना दें।
आप देखो, परिपक्वता या शालीनता का कभी न हँसने से या हँसी छोड़ देने से कोई संबंध नहीं है। लेकिन किसी तरह से, हम यह महसूस करते हैं कि हम यदि परिपक्व हो गए हैं तो स्वतः ही कम हँसना चाहिए। हँसी ताकत है क्योंकि वह तुम्हारे सम्पूर्ण परिवेश को आपके अन्तःकरण से ऊर्जा प्रदान करती है।
यदि आप, मेरे किसी सत्र में बैठो, तो अधिकतर समय आप देखोगे, वहाँ हँसी ही होती है। कोई हास्य कथा होगी या कोई कथा कहीं जायेगी, और हर व्यक्ति हँसता हुआ होगा। मैं गंभीरता को कभी व्याप्त नहीं होने दुँगा। मैं उन लोगों के अन्दर भी, जो मेरे आश्रम में काम नहीं करते, कभी गंभीरता को व्याप्त नहीं होने दुँगा।
एक छोटी कथा :
एक हास्य वक्ता को एक शहर में कार्यक्रम देने के लिए निमंत्रित किया गया।
वह उस कार्यक्रम में लोगों के बहुत बड़े समूह के साथ आया।
जो व्यवस्थापक था वह आश्चर्यचकित था, जब उसने वक्ता के साथ इतने लोगों को देखा।
वक्ता ने उनके आश्चर्यचकित चेहरे को देखा और समझाया, "आजकल लोगों को हँसना कठिन होता जा रहा है, इसलिए मैं अपने साथ श्रोताओं को लेकर चलता हुँ। "
इस तरह के तथाकथित विशिष्ट क्षेत्रों में लोग हँसेंगे, लेकिन बहुत व्यवस्थित और बड़े सभ्य तरीके से। यह सच्ची हँसी नहीं है, ये मृत हँसी है, हँसी को कभी भी परिमार्जित नहीं किया जा सकता। यदि वह परिमार्जित हुई तो वह हँसी नहीं रह जाती, तब वह, वह ध्यान वाली हँसी नहीं रह जाती जिसकी हम बात कर रहे हैं। वह मात्र अन्दर के अहंकार की अभिव्यक्ति होती है, बस इतना।
जब कोई हास्य कथा सूनाई जाती है उस वक्त आप अपनी हँसी का विश्लेषण करो, आप समझ जाओगे : पहले आपको कूछ अन्तर संबंधित तार्किक कथन बताये जाते हैं। उसमें जो तर्क रहता है, जब आप उससे लीन जाते हो, तब मुख्य बात बताई जाती है और आपका तर्क बिखर जाता है। उस क्षण जब आपका तर्क बिखरता है, आपका मन भी बिखर गया, उस समय आप बिना मन की स्थिति में होते हो या सतोरी में। आप बुद्ध हो गये।
जब आप बिना मन की स्थिति में हो, आप वर्तमान में होते हो, जब तुम हँस्सेते हो तो आप वर्तमान में होते हो उस वक्त आपके कोई विचार हो ही नहीं सकते। जब आप विचारहीन होते हो, आप वर्तमान में होते हो। जब आप विचारों में होते हो, या तो आप पूर्व में होते हो या भविष्य में।
हँसी अपने आप में पूर्ण होती है। यह बस आपको स्वस्थ करेगी और आपका परिवर्तन करेगी। यह मानवता के लिए उपलब्ध सबसे सरल और आसानी से प्राप्त होने वाली सबसे अच्छी औषधि है।
मैं आपको बताता हूँ : जीवन इतना कीमती है कि उसे अस्वस्थ और अकर्मण्य होकर के नहीं बिताया जा सकता। हँसों और अपने जीवन में परमानन्द की ऊर्जा भर दो। बस निर्णय लो कि निरंतर आनन्दित रहोगे, चाहे जो भी कार्य आप कर रहे हो। बस निष्ठावान रहो, गंभीर नहीं।
जब आप हँसते हो, आप अपने आस-पास ऊर्जा का प्रसार करते हो। यह सबको छू जाती है। आप अपने आस-पास चिकित्सीय आनन्द फैलाते हो। यही कारण है, जब कोई व्यक्ति खराब मन:स्थिति में आ जाता है तो वह अपने आस-पास वही खराब परिवेश लिए हुये आता है और इस बात की पूरी संभावना रहती है कि वहाँ उपस्थित सब लोग उससे प्रभावित हों, क्योंकि वह उसी प्रकार की मनःस्थिति का प्रसार करता है। मैं चिकित्सकों से हमेशा बताता हूँ, कि वो एक प्रकार की मनःस्थिति को स्वच्छ करने वाली ध्यान, क्योंकि वे मरीजों के संपर्क में निरंतर रहते हैं जो बहुत सी नकारात्मक विचारधारा और बीमारियों से ग्रसित रहते हैं।
प्रश्न : स्वामी जी, हमारे पास हँसने का कोई कारण होना चाहिए। हम कैसे बिना कारण के ही हँसने की मनःस्थिति में आ सकते हैं?
हम हमेशा सोचते हैं कि हँसने के लिए या तो हमें कोई हास्य कथा चाहिए या कोई विदूषक। मैं आपको बताता हूँ : जब आप वर्तमान में रहना शुरू कर दोगे, तो आपका अस्तित्व बहुत खूबसूरत और भारहीन होगा। आपका साँस का ग्रहण करना और निकालना, आपके शरीर के अन्दर आपके भोजन का रक्त में परिवर्तित होना, अस्तित्व के साथ तारतम्य से घटनाओं का घटना, हर चीज बहुत खूबसूरत होगी। आप इतने अधिक आनन्द की अनुभूति करोगे कि हमेशा मुस्कूराते और हँसते हुए रहोगे। आपका संपूर्ण स्वरूप केवल हँसी और आनन्द का प्रसार करेगा।
किसी भी हँसने वाली बात पर हँसना ठीक है, लेकिन जब आप अस्तित्व के साथ तारतम्य में हो जाते हो, तो इस संपूर्ण ब्रह्माण्डीय नाटक का आप आनन्द लेते हो और जो भी कुछ होता है उस पर तुम हँसते हो। तब गंभीरता के लिए कोई स्थान नहीं रहता आप और अधिक ठोस नहीं रह जाते। आप छिद्रिल (Porous) हो जाते हो और आप मात्र हँसते हो। आपमें अस्तित्व के खेल की गहरी समझ पैदा हो जाती है और आप हँसते हो।
आप यह देखने में सक्षम होते हो कि हर एक केवल एक खिलाड़ी है, लेकिन अपना भाग खेलने में कितना गंभीर हो गया है, और आप उस पर हँसते हो। आप इस बात पर भी हँसते हो कि कैसे हर एक-दूसरे को जीवन का खेल खेलते समय, छल रहा है। आप इस विचार से हँस देते हो कि आप एक खेल, खेल रहे हो। जब आप हँसने में सक्षम होते हो, आप एक दृष्टा बन जाते हो और जब आप एक दृष्टा बन जाते हो, आप 'मैं', 'मेरा' और अहंकार से अलग हो जाते हो। एक छोटी कथा :
- एक बार, बौद्ध भिक्षुओं का एक सम्मेलन, 'सच्ची आध्यात्मिकता का अर्थ' पर हुआ। हर भिक्षु ने मंच पर जाकर के लंबे वक्तव्य दिये।
अंत में, एक जेन भिक्ष्यु के बोलने की बारी आई।
वह मंच पर गया और मात्र हँसना प्रारम्भ किया। वह हँसता रहा और हँसता ही रहा.........अपने अन्तर स्वरूप से।
उसकी हँसी उसके पेट से उठ रही थी। वह असहज होकर के हँसने के कारण काँपने लगा।
और उसकी हँसी जल्द ही और लोगों को उस प्रांगण में इस तरह छू गयी कि हर एक जो वहाँ मौजूद था हँसने लगा, बिना यह जाने हुए कि क्यों ?
बिना उनके इस बात के भिज्ञ हुए उन लोगों ने उस प्रांगण में एक बहुत बड़ी सकारात्मक ऊर्जा की लहर पैदा कर दी।
सारे भिक्षू एक प्रचण्ड ऊचाई की स्थिति में पहुँच गए।
उनकी सोच बिखर गयी और उनका स्वरूप आनन्द से भर गया। अन्त में जेन भिक्षू बोला, "यह है सच्ची आध्यात्मिकता।"
हँसना सर्वोच्च आध्यात्मिक गुण है। यह आपको पराचेतनता तक ले जा सकता है। हँसना एक महान चिकित्सीय ऊर्जा है। यदि आप अपनी बीमारी पर हँसों, आप स्वस्थ हो जाओगे।
अस्तित्व की ऊर्जा से संबंध स्थापित करने का हँसी एक खूबसूरत मार्ग है, जो एक शुद्ध चिकित्सीय ऊर्जा है।
हमारे ध्यान कार्यक्रमों में, हम हँसी और नृत्य को हमेशा सम्मिलित रखते हैं। बुद्ध बनने के ये सबसे सरल तरीके हैं। नृत्य आपको भारहीन और सरल बना देगा। नृत्य हँसी की ही तरह एक दूसरी सरल और आनन्ददायक ध्यान है। जब आप बिना किसी परवाह के नृत्य करते हो, आप नृत्य स्वयं बन जाते हो। ऊर्जा आपके अन्दर से तीव्र गति से निकलती है।
बिना परवाह के नृत्य आप तभी कर सकोगे, जब आप हर तरह के अपने कृत्रिम प्रमाण-पत्रों से मुक्त होगे। जब तक आप यह सोचते रहोगे कि आप कुछ हो, आप आनन्द से नाच नहीं पाओगे। नृत्य आपके आंतरिक आनन्द की वाह्य अभिव्यक्ति है।
और मैं इस वक्त नियोजित कार्यक्रमों के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ, जिसमें आप यह जानते हो कि कौन सा कदम कब उठाना है। मैं बातें कर रहा हूँ अपने तथाकथित प्रमाण पत्रों के परित्याग की और अस्तित्व से एकीकरण अनुभव करके आनन्द से नृत्य करने की।
जो आत्म सजग होते हैं वही अहंकारी होते हैं। वे इस बात के प्रति इतना अधिक चिंतित रहते हैं कि उनके नृत्य करने पर लोग क्या कहेंगे, इसलिए वे चुपचाप बैठे रहते हैं। एक बार फिर वे अपने अहंकार की ही रक्षा करते रहते हैं और जीवन के आनन्द को खोते रहते हैं।
कभी किसी दिन एक बार ही सही, अपने घर में ही, कोई संगीत बजाओ और नृत्य करो। केवल निर्णय भर ले लो और शुरू करो। यह एक ऐसी गहन साधना होगी जो आपको आपके मन के परे ले जायेगी और आपका परिवर्तन इस तरह से कर देगी जिसकी व्याख्या शब्दों में नहीं की जा सकती, स्वाभाविक रहो। जो लोग आपके नृत्य पर टीका करें, वो मात्र खो रहे हैं, नृत्य के आनन्द को। उनके बारे में चिंतित मत हो। मात्र घुस जाओ और नृत्य स्वयं बन जाओ। हँसी और नृत्य सरलतम तकनीक हैं अपने अहंकार का परित्याग करने के लिए और अस्तित्व में समाहित होने के लिए।
प्रश्न : स्वामी जी, हम कब जानेंगे कि अब हमारे अन्दर अहंकार नहीं है? सरलतम तरीके से समझाया जाये तो ये समझो, जब तम अपने आप को एक अलग अस्तित्व के रूप में महसूस न करो, समझ लो तुम्हारा अहंकार समाप्त हो गया। जब तुम पराचेतन हो जाते हो, तुम्हारा अहंकार पक कर के फूट चुका रहता है। जब तुम्हारे अहंकार का परित्याग हो जाता है, तो जो बंधन तुम्हारे सामने पहले रहते हैं वो अदृश्य हो जाते हैं और अस्तित्व तुम्हारे माध्यम से अबाधित गति से बहता रहता है।
चाहे तुम जानते हो इसे चाहे न जानते हो, चाहे तुम इसे स्वीकार करो या न करो, अस्तित्व तुम्हारे माध्यम से बहने के लिए हर क्षण प्रयासरत है, लेकिन तुम इतना अधिक अहंकार से भरे हुए हो कि तुम उसे ग्रहण करने में असफल हो। तुम अस्तित्व के चमत्कारों को देखने से चूक जाते हो मात्र अपने अहंकार के कारण। तुम असफल होते हो अपने आप को अस्तित्व से जोड़ने में और इसलिए अहंकार के साथ जीते रहते हो तथा अज्ञानता और पीड़ा में रहते हो।
Section 20
तुम इतना अधिक अहंकार से भरे हुए हो कि तुम अपने स्वरूप से ही बहुत दूर रहे हो। तुमने एक जीवन में नहीं, बल्कि बहुत से जीवन में इतना अधिक इकट्ठा कर लिया है कि तुम्हें उसे अपने अन्दर इकट्ठे किए हुए से मुक्ति पाने की आवश्यकता है। तुम्हारे अन्दर तुम्हारे अपने लिए ही कोई स्थान नहीं है और इसी कारण से तुम क्रियाशील रहते हो अपनी वाह्य सीमा से हर समय, बजाए इसके कि तुम अपने अन्तःकरण से क्रियाशील रहो।
जब तुम्हारा अहंकार समाप्त हो जाता है, तुम और अधिक इस रूप में नहीं रहते और तुम बस समाहित हो जाते हो अस्तित्व में। यही स्थित है पराचेतन स्वामियों की। मैं हमेशा लोगों से कहता हूँ, "जो तुम नहीं हो उसे नष्ट करो।" लोग मुझे हतप्रभ होकर देखते हैं। जब मैं यह कहता हूँ, मेरे कहने का अर्थ है, तुम अपना अन्तर स्वरूप हो और उस अन्तर स्वरूप को इस वक्त दूषित कर दिया गया है हर चीज से जो वह नहीं है - विभिन्न प्रकार की क्रियाशील और सक्रिय अहंकार के स्वरूपों से। ये हैं जिन्हें नष्ट करने की आवश्यकता है और यही मेरे कहने का अर्थ है जब मैं कहता हूँ, "नष्ट करो जो तुम नहीं हो और यह करकर तुम अपने लक्ष्य तक पहुँच जाओगे। "
तुम अस्तित्व का एक भाग हो, और जितने भी कारण तुम्हें इससे अन्यथा सोचने पर विवश करते हैं, वह तुम्हारा अहंकार है। बस इतना। यह कुछ इस तरह से हैं : एक मछली, चाहे वह चाहती हो या न चाहती हो, चाहे वह स्वीकार करे चाहे न स्वीकार करे, चाहे वह विश्वास करे चाहे न करे, वह समुद्र का एक भाग है, यदि वह समुद्र से लड़ती रहती है और फिर भी उसी में निरंतर रहती है, तो अपने ही जीवन को और पीड़ादायक बनाती है।
यदि तुम अस्तित्व के साथ चलोगे, तूम अपने जीवन के हर क्षण का आनन्द लोगे। तूम तरल रचनात्मक संवेदनशील और छिद्रिल बन जाओगे। एक छोटी कथा :
एक अध्यापिका अपने छात्रों को बाहर घुमाने ले गयी।
वे वहाँ खेल खेले, नाश्ता किया और खूब खुशी मनायी।
अचानक अध्यापिका ने उन लोगों का ध्यान उस खूबसूरत इन्द्रधनुष के प्रति आकर्षित किया, जो आसमान में बना था।
बच्चों ने उसे आश्चर्य से देखा।
अध्यापिका ने उन्हें देखकर उनसे कहा, "ठीक है, अब हम इस रचना के पीछे जो कलाकार है उसके लिए ताली बजाते हैं।''
छात्र एक क्षण के लिए भ्रमित हुए, मगर तरन्त समझ गए और सम्मान में ताली बजाने लगे।
बच्चों को अपने चारों तरफ फैली हुई अस्तित्व की खूबसूरती की सराहना करना सिखाये जाने की आवश्यकता है। अन्यथा, अतिशीघ्र वे अपना अस्तित्व से संबंध खो देंगे और अहंकारी हो जायेंगे। उन्हें तकनीकी रूप से क्रियाशील होने और अहंकारी बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्हें छिद्रिल और संवेदनशील बनाया जाना ही चाहिये।
जब आप अस्तित्व की सराहना करोगे, आप उसके निकट आओगे। संपूर्ण अस्तित्व रचनात्मकता ही है। एक रचनात्मक व्यक्ति अपने मस्तिष्क की अपेक्षा अपने हृदय के अधिक निकट होता है। जब आप रचना करते हो, आप ईश्वर के निकट होते हो। ईश्वर ही रचयिता है, वही रचा जा रहा है और वही रचना है। जब आप रचना करते हो, आप अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति करते हो, जो अस्तित्व का ही गुण है। जब आप रचना करते हो, तो आप अस्तित्व के प्रति अपना प्रेम और अपनी सराहना दिखाते हो, आप अस्तित्व की खूबसूरती को थोड़ा और बढ़ाते हो।
जब आप अस्तित्व के लिए आश्चर्य से भरे हुए होगे, तभी आप रचना कर सकोगे और दूसरी तरफ यदि आप अहंकार से भरे हुए होगे, आप रचना नहीं कर पाओगे, और यदि आपने रचना की भी, तो आपकी रचना एक मत रचना होगी, वह एक कागज के गूलाब की तरह होगी, जो देखने में तो ठीक लगता है परन्तु उसमें जीवन ओर सुगन्ध नहीं होती। जब एक कलाकार प्रेम से रचना रचता है, तो वह अपनी रचना में एक विशेष प्रकार का गूण लाता है। यदि वह अहंकार से रचता है, तो उसकी रचना जीवनहीन होती है।
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Section 21
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राक्षस मुल रूप से प्रतिबिम्बित करते हैं हमारे अन्दर विभिन्न प्रकार के दर्शृणों को, और हमारे अहंकार को और देवी ने इसी अहंकार को मार डाला मनुष्य को मुक्त करने के लिए उस अहंकार से और उन दुर्गूणों से। हमें यह समझने की आवश्यकता है। एक राक्षस भैंस के सिर वाला राक्षस है। यह हमें इस बात को समझाने के लिए दिखाया गया है कि हममें से कूछ इतनी मोटी त्वचा के होते हैं कि चाहे जितनी बार गुरु उन्हें अपने मार्ग ले जाने के लिए जाग्रत करे, वे अपने ही मार्ग पर चलने पर डटे रहेंगे। वे न तो छिद्रिल होते हैं और न संवेदनशील अपने गुरु के पूकार के प्रति।
तुम देखो, गूरु के साथ तर्क-कूर्तक करना सबसे बड़ी सजा है जो तुम अपने आप को देते हो। मैं पूरी ईमानदारी से तुम्हें बताता हूँ, जब तुम गूरु से बहस में फँस जाते हो, उससे अधिक नुकसान तुम्हारा और कोई नहीं कर सकता। तूम गुरु से बहस करके अपना पर्याप्त नूकसान कर लेते हो। गूरु जानता है सबके बारे में कैसे, कौन, किस तरह से प्रस्फूटित होगा अपने तरीके से और जो भी कोई गुरु के प्रति कर सकता है वह कम से कम इतना कि उसके प्रति आस्था और साहस के साथ खुला रहे।
प्रश्न : स्वामी जी, हालांकि मैं जानता हूँ कि आप मेरे स्वामी हैं, आपकी उपस्थिति में मुझे हिचकिचाहट और भय क्यों होता है?
(स्वामी जी हँसे) तुम इस कथन के साथ खुलकर के मेरे सामने आये हो यह तथ्य अपने आप में एक प्रमाण है कि तुम अपनी इस स्थिति पर विजय प्राप्त करना चाहते हो। तुमने एक लम्बी छलांग लगाने का निर्णय लिया है।
मैं तुम्हें समझाता हूँ : तुम्हारे स्वरूप ने मुझे स्पष्ट रूप से पहचान लिया है, लेकिन तुम्हारा मन विरोध कर रहा है। यदि तुम्हारे स्वरूप ने मूझे न पहचाना होता, तो तुम बार-बार मेरे पास न आ रहे होते। तुम्हें अपने घर पर यहाँ आने के लिए बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, क्या ऐसा नहीं है? सबसे सरल तरीका है तुम्हारे लिए कि तुम घर बैठो और अपना काम करो। इस चीज ने तुम्हारे परिवार को खुश किया होता, क्या ऐसा नहीं है?
तुम क्यों बार-बार मेरे आश्रम पर आकर के मुझे देखना चाहते हो? क्यों तुम बार-बार अपने घर पर उन्हीं समस्याओं और तर्कों का सामना करते हो, जो तुम्हें मेरे पास आने में देखनी पड़ती हैं? क्या इससे अधिक यह सरल नहीं है कि तुम घर बैठो और अन्य लोगों को खुश करो? इसका कारण है कि तुम एक खिंचाव महसूस करते हो अपने अन्दर स्वरूप के स्तर पर। यह तुम्हें वापस नहीं जाने देगा, एक बार जब तुमने मुझे पहचान लिया है। चाहे जितनी कोशिश करो, तुम बच नहीं पाओगे।
अब तुम्हारा स्वरूप मूझे जानता है। लेकिन तुम्हारा मन बाधक प्रतीत होता है। याद रखो : हमेशा अपने हृदय की सूनो। तुम्हें वास्तव में बस इस वक्त यही करने की आवश्यकता है। यदि तूम अपने हृदय का अनुसरण करोगे, तुम मूझ तक पहुँच जाओगे। यदि तूम अपने मस्तिष्क का अनुसरण करोगे, तूम मूझे प्राप्त करने से चूकते रहोगे।
तुम अपने आप को मेरे प्रति खोने में कितना डरते हो। समस्या यह है। तुम्हारे अहंकार पर खतरा मंडराता है। तुम अपनी पहचान के बारे में असूरक्षित होने लगते हो। तूम ऐसा महसूस करते हो जैसे तुम्हारी पहचान मिट रही हो। तुम अचम्भित होना प्रारम्भ कर देते हो कि बिना अपनी पहचान के तूम किस दिशा में बढ़ रहे हो। तुम्हारे अहंकार के सामने एक गंभीर संकट उत्पन्न हो जाता है।
जब यह होता है, जीवन में अन्य परिस्थितियों की ही तरह, तुम्हारा अहंकार तुमसे तत्काल अपनी पुष्टि की कामना करता है और इस बार तुम उसकी पूष्टि नहीं करते। इसलिए, तुम मेरे ऊपर संदेह करना प्रारम्भ करते हो। तूम विभिन्न तरीकों से तर्क द्वारा अपनी भावनाओं को अनुभव करना प्रारम्भ कर देते हो। तुम इस पर कार्य करना प्रारम्भ कर देते हो कि क्या सही है और क्या किया जाना चाहिए? तुम्हारा मन हाथी के सूँड़ की तरह इधर-उधर झूलता है - एक तरफ मेरे प्रति प्रेम और दूसरी तरफ मेरे प्रति प्रेम के प्रति संदेह।
याद रखो, प्रेम तुम्हारे हृदय से उत्पन्न होता है, जबकि भय तुम्हारे मस्तिष्क से उत्पन्न होता है। हमेशा, और हमेशा, अपने हृदय का ही अनुसरण करो। प्रेम प्राकृतिक है, भय सामाजिक है। भय और संदेह बहुत गहराई से संबंधित हैं और मात्र तुम्हारे द्वारा प्रतिस्थापित हैं।
बहुत स्पष्ट से समझो : संदेह करने में कोई गलती नहीं है। संदेह पराचेतन के मार्ग में तुम्हारे हाथ में टार्च (Torch) की तरह है। तुम्हारे मन के लिए बिना संदेह के आगे बढ़ना अत्यन्त कठिन है। लेकिन तुम्हारे संदेहों को अन्ततोगत्वा विश्वास में परिवर्तित होना है। केवल तब तुम उन्नति कर रहे होगे। जैसे-जैसे तुम अन्दर की तरफ बढ़ोगे, ऐसा होगा, हाँ........?
प्रश्न : हमें क्या करने की आवश्यकता है स्वामी जी?
मात्र पूर्णता से प्रेम करो, इतना पर्याप्त है। पूर्णता से प्रेम करने का अर्थ पूर्णता से अहंकाररहित स्थिति में आना। यही कारण है, कि एक स्वामी - जो अहंकाररहित स्थिति में होता है, यह केवल दया व प्रेम करने में ही सक्षम होता है। उसके और अन्य भाव जैसे क्रोध, चिड़चिड़ापन इत्यादि उसके प्रेम का कृत्रिम प्रदर्शन होते हैं। वह क्रोधित और चिड़चिड़ा होने का अभिनय करता है। वह तुम्हारे स्तर पर उतरकर के, तुम्हारे स्तर पर भावुक होकर के तुम्हें समझ की एक और पायदान से आगे ले जाता है, बस इतना। वह तुम्हारी भाषा में बात करता है, तब तक जब तक तुम उसकी भाषा न समझने लगो-अस्तित्व की भाषा। हाँ?
लेकिन स्वामी जी, हम पूर्णता से प्रेम करना कैसे शुरू कर सकते हैं? यह कहने में सरल प्रतीत होता है अपेक्षाकृत कि करने के।
पहली चीज : अपनी हर क्रिया को सजगता से भर दो दुष्टा बन जाओ। तुम यह महसूस करना शुरू कर दोगे कि सारी चीजें मात्र एक नाटक है और तुम बस एक द्रष्टा हो और उस नाटक में तुम्हारा भी एक भाग है। दूसरी चीज : हर चीज जो तुम देखते हो उसके बारे में निर्णायक मत बनो। जब तुम निर्णायक होना बंद कर दोगे, तुम बस सबसे प्रेम करोगे और हर चीज पूर्ण निश्छलता से होगी।
जब तुम निर्णायक होते हो, तो तुम जो होता है वो नहीं देखते, तुम देखते वो हो जो तुम देखना चाहते हो। हममें से बहुत से लोग पहले से ही अपने निर्णय निर्धारित कर लेते हैं। यही हमारे लिए आधार का पत्थर होते हैं। तब हम बस उन्हीं को ठोस आधार मानकर क्रिया करते रहते हैं। जो कुछ भी हम देखते हैं, सबसे पहली चीज जो हम करते हैं, वह यह है कि हम उसे पूर्वाग्रसित निर्णय की दृष्टि से देखते हैं।
यदि हम इस रूप में क्रिया करेंगे, तो हम चीजें के असली रूप को हम कैसे देखेंगे? हम प्रेम कभी कैसे करेंगे? तुम प्रेम तभी कर सकोगे, यदि चीज का ताजगी के साथ स्वागत करो, एक विशेष प्रकार की निश्छलता के साथ। लेकिन तुम करते क्या हो? तुम प्रेम करने में भी अच्छाई और बुराई का विश्लेषण करना प्रारम्भ कर देते हो। जब तुम विश्लेषण करना प्रारम्भ करते हो, तुम उससे चूक जाते हो और जब तुम अंत में प्रेम करने का निर्णय लेते हो, तब तक बहुत देर हो चुकी रहती है।
देखो, गुरु और अनुयायी का संबंध केवल इसलिए हैं कि तुम्हारा अहंकार चला जाये। जब तुम अकेले होते हो, तुम अपने अहंकार को नहीं छोड़ सकते। गुरु ही वह माध्यम होता है, वह सहारा होता है तुम्हारे लिए अपने अहंकार का परित्याग करने के लिए। जितना अधिक तुम उसमें मिलोगे, उतना अधिक तुम खुलने के लिए तैयार रहोगे और अपने अहंकार का परित्याग करोगे। कब तुम जानोगे कि तुम्हारा अहंकार समाप्त हो रहा है? जब तुम एक विशेष प्रकार के आनन्द की
अनुभूति करना प्रारम्भ कर दो जिसकी अनुभूति तुमने पहले कभी नहीं की। तुम बिना किसी कारण के आनन्द का अनुभव करना प्रारम्भ करोगे। अस्तित्व में रहना मात्र ही तुम्हें खुश रखेगा। निश्चित रूप से, गुरु के साथ तुम्हारे अहंकार की शल्य चिकित्सा होती रहेगी और बहत से क्षण ऐसे होंगे जो पीडा-दायक होंगे जब तुम्हारा अहंकार काटकर के निकाला जायेगा। लेकिन जब तुम इन क्षणों से उभरोगे, तब तक तूम उन्नति के मार्ग पर बहुत से कदम उठा चुके रहोगे और असीमित आनन्द का अनुभव करोगे बिना किसी कारण के बिल्कुल।
Section 22
जरा युवा बच्चों की तरफ देखो, वे जीवन के प्रति कितना उत्साहित रहते हैं। वे इतना प्रेम करने वाले होते हैं। क्या तुमने कभी सोचा है कि तुम इतना उत्साहित उनकी तरह क्यों नहीं रहते? तुम एक समय में उन्हीं के तरह थे, क्या ऐसा नहीं था? तब, कहा खो दिया हमने वो उत्साह और निश्छलता? आगे बढ़ो और मूझे बताओ। कहाँ, सोचते हो तुम हमने खोया है इसे?
(एक भाग लेने वाले ने साहस किया) अब हम बड़े हो गये हैं अधिक परिपक्व हो गये हैं स्वामी जी। हम अधिक अनुभवी हो गये हैं उनसे ............
वाह, वाह! अनुभव किस बात का? उदास होने का? देखो, बहुत स्पष्ट रहो : हम सोचते हैं कि हम बच्चों से अधिक परिपक्व हैं और जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण सही है और बच्चों को अपने जीवन में इसी परिपक्वता को प्राप्त करने की आवश्यकता है।
सच्चाई यह है, हम इतना अधिक बौद्धिक हो गये हैं कि हम अपने हृदय से अपना सारा संबंध खो चुके हैं। हम केवल अपने मस्तिष्क से ही क्रियाशील रहते हैं। यहाँ तक कि हमारी भावनाओं को भी मस्तिष्क से ही निर्देशित किया जाता है। हमने अपने स्वरूप से भावुक होना बंद कर दिया है। हम अपने अन्तःकरण से संबंध खो चुके हैं।
जब हम इस संसार में आये थे, हम उत्सव मनाने की स्थिति में थे और स्वच्छंद थे। वर्षों के अंतराल में समाज ने हमें परिस्थितियों में ढाला और हमारे लिए मन का निर्माण किया। मन धीरे-धीरे अपने आप में ठोस हो गया और हमारे ऊपर शर्तें लगाने लगा। हमारे अन्दर की सहजता खो गयी।
मैं तुम्हें बताता हूँ, अपने अहंकार को खोने की इस प्रक्रिया में, हम अपने में उसी बच्चे को पुनः खोजने का प्रयास करते हैं। जब हम युवा थे, हम ईश्वर को अनुभव करने के नजदीक थे। जैसे-जैसे हम बड़े हुए और तथाकथित परिपक्व हुए, हमारी सामाजिक परिस्थितियों ने बस हमारे अन्दर के उस बच्चे को मार डाला।
बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं, "स्वामी जी, आप हालांकि अंतिम सत्य पर बोलते हैं, लेकिन आप कैसे एक बच्चे की तरह लगते है?'' अब तुम मुझे बताओ, क्या मैं बच्चें की तरह हूँ क्योंकि मैं बड़ा नहीं हुआ और परिपक्व नहीं हुआ? तुम बस
अहंकार की निर्जरा
337
चीजों को अपने हिसाब से और अपनी सुविधानुसार निरूपित कर लेते हो, अपने दार्शनिक तरीके से, समस्या यह है।
सामाजिक दशाओं के कारण, नहीं तो हमारे अन्दर क्षमता है तैरने की और उड़ने की बिना किसी अभ्यास के। तुम्हें यह बात सुनने में बेतुकी लगेगी, लेकिन यह सत्य है। हमारे अन्दर ये क्षमतायें हैं। हम तैर सकते हैं ओर उड़ सकते हैं, तब तक जब तक लोग हमें बताना शुरू न कर दें कि न तो हम तैर सकते हैं और न उड़ सकते हैं। यदि तुम एक नवजात शिशु को एक तालाब में डालो, वो तैरता रहेगा, इबेगा नहीं।
अहंकार अपने आप को इतने अधिक तरीके से प्रदर्शित करता है और हम अपने जीवन को हर क्षण उसी के अनुरूप बिताते हैं। हम सब वास्तव में अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में एक मुखौटा ओढ़े रहते हैं। जब हम अपनी माँ से मिलते हैं तो एक मुखौटा होता है, अपने पिताजी से मिलते समय दूसरा मुखौटा लगा लेते हैं, अपने मालिक से मिलते समय हम एक भिन्न मुखौटा लगा लेते हैं और इस तरह से अलग-अलग मुखौटे इस्तेमाल करते हैं। जब तक हम सही व्यक्ति के लिए सही मुखौटे के प्रयोग करते हैं, सब कुछ ठीक-ठाक रहता है। जिस क्षण हम किसी व्यक्ति के साथ गलत मुखौटा लगा लेते हैं, उसका अर्थ होता है कि, तुम्हारा अहंकार पदार्पण कर चुका है। तुम्हें जो करना है यह है कि दक्षता के साथ मुखौटे बदलते रहो और खेल का आनन्द लो। तब तुम एक दृष्टा कहे जाओगे और खेल में लिप्त नहीं होगे, एक ठोस तत्व की तरह।
तुम आनन्द तभी ले पाओगे, जब तुम यह जानोगे कि तुम कुछ हो मुखौटे के पीछे। अन्यथा तुम मुखौटे के साथ ही बह जाओगे और पूरे जीवन का आनन्द खो दोगे। जब तुम जानोगे कि तुम केवल मुखौटों का प्रयोग कर रहे हो, तुम्हारी कामनायें समाप्त हो जायेंगी।
ये कुछ इस तरह से हैं : जब तुम बड़े हो जाते हो, तुम स्वतः ही अपने खिलौने छोड़ देते हो, क्या ऐसा नहीं है? खिलौनों में तुम्हारी रुचि और अधिक नहीं रह जाती। इसी तरह से यदि तुम बुद्धिमत्ता की तरफ देखो, तुम्हें इनकी कोई कामना नहीं हैं, तुम बस इन्हें प्रयोग करो और आगे बढ़ते रहो।
अहंकार अपना प्रदर्शन बड़े कुटिल तरीकों से करता है - यही कारण है कि इसकी इतनी अधिक व्याख्या किये जाने की आवश्यकता है। यह सब तुम्हारी मदद करेंगे, तुम्हें यह देखने में कि तुम अपने अन्दर की यात्रा में किस व्यवधान के फलस्वरूप कहाँ अटके हुए हो।
अपने अन्दर की तरफ तुममें जितने कम व्यवधान होंगे, तुम उतने ही अधिक
तरल व आसानी से बहते हुए होगे। जब व्यवधान कम होंगे, तूम अधिक छिद्रिल होगे व कोमल होगे। यदि तम्हारे अन्दर व्यवधान अधिक होगे, तम बहत ठोस होगे और तूममें प्रवेश कर पाना कठिन होगा। तुम्हारा अहंकार हर चीज के प्रति एक ठोस बाधा के रूप में होगा।
उदाहरण के लिए, यदि कोई कभी भी तूमसे कूछ कहेगा, तुम्हारी पहली प्रतिक्रिया उसके प्रति क्या होगी? तुम्हारी पहली प्रतिक्रिया एक निश्चित प्रतिरोध होगा, एक 'नहीं। जब तुम 'नहीं' कहते हो यह तुम्हारे अहंकार की पुष्टि होती है। तुम अपने अन्दर अपने आप को ठोस और दढ़ महसूस करते हो। जब तूम 'हाँ' कहते हो तुम तरल होते हो और कोमल। तुम अपने अहंकार को झूकता हुए महसूस करते हो। इसलिए तुम कहते हो 'नहीं'।
यही कारण है कि जब भी तुम घर पर या स्कूल में या कार्यशाला में या कहीं भी नियमों का उल्लंघन करते हो तो अच्छा महसूस करते हो। वास्तव में, जिस क्षण तुम किसी नियम का अतिक्रमण करते हो तुम्हारे अन्दर महानता का अनुभव होता है। स्कूल या कॉलेज के छात्र जब कक्षा छोड़ते हैं, तो उन्हें बहुत अच्छा महसूस होता है। क्यों? क्योंकि जब वो नियमों का उल्लंघन करते हैं तो उनके अहंकार में और बढ़ोत्तरी होती है। छोटे बच्चों के साथ जिस क्षण उन्हें किसी चीज के लिए मना किया जायेगा वे उसी चीज के लिए जिंद करेंगे। बड़े लोग भी दूसरों की अवहेलना करके आनन्दित होते हैं कई तरीके से।
पति और पत्नी में भी शायद ही कभी किसी सुझाव पर पहली बार में मतैक्त्य होता हो। उदाहरण के लिए, उनके अपने देवता। यदि पति का लगाव मुझसे पहले हो गया, पत्नी की पहली प्रतिक्रिया केवल मेरा विरोध करना होगा। वह मेरी पुस्तकें छुपकर के पढ़ भी सकती है और उसे अच्छा भी लग सकता है, लेकिन अपने पति के समक्ष वो मुझे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होगी। यही बात लागू होती है पतियों पर, जो हर तरह की दिक्कत पैदा करेंगें, पत्नियों के लिए, इसके पूर्व कि अंत में दोनों में सामंजस्य बैठे।
ऐसा खेल होता है अहंकार का। हाँ कहना तुम्हें प्राकृतिक रूप से तरल बनाकर के बहाता रहता है बिना किसी व्यवधान के। इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम हर चीज के प्रति आँखें बंद करके हाँ कहो। नहीं, इसका अर्थ है कोई निर्णय लो अपनी सहजता के हिसाब से बिना अपने अहंकार से प्रभावित हुए, बस इतना। तुम स्वतः ही हर सही चीज के साथ तारतम्य में आ जाओगे।
एक बात अच्छी तरह से समझ लो कि सतर्कता के साथ ना कहना कोई सूरक्षा शक्ति नहीं है, जो तुम्हारी सुरक्षा देव दूत की तरह तुम्हें रक्षित करें। बस मात्र खुले हुए रहो बिना किसी प्रतिरोध के और पूर्वाग्रसन के, इतना पर्याप्त है........?
लेकिन स्वामी जी, मैं अभी तक सोच रहा था कि अपने आप को महत्व देना ही अहंकार का एक मात्र प्रदर्शन है।
नहीं, अहंकार विभिन्न रूपों में आता है - सक्रिय व निष्क्रिय, जिसकी अब तक हम लोग चर्चा कर रहे थे। इसलिए यह इतना छदम है कि इसे पहचानना कठिन গাঁটে
सक्रिय अहंकार को पहचानना सरल होता है। सक्रिय अहंकार से ग्रसित लोग खुलकर के व्यवहार करते हैं, वे खुलकर के अपने महत्वपूर्ण होने का दावा करेंगे, उन लोगों के सामने झुकेंगे नहीं और बात-बात पर गर्म हो जायेंगे। इस अहंकार को स्वामी के लिए वास्तव में नियंत्रित करना सरल होता है। उसे बस उस अहंकार पर कुछ बार चोट करनी रहती है और वो टूट जाता है।
एक छोटी कथा :
एक व्यक्ति अपनी सारी सम्पत्ति जूओ में हार गया और करीब-करीब भिखारी हो गया।
एक दिन वो सड़क के किनारे एक होटल में गया और नाश्ता करने के लिए एक टेबिल पर बैठा।
बैरे (Waiter) ने आकर के खाने का आदेश माँगा।
वह व्यक्ति आश्चर्यचकित था। बैरा (Waiter) उसका पुराना मित्र था और वह भी उसी तरह पहले धनी हुआ करता था।
उस व्यक्ति ने उसकी तरफ देखा और कहा, "तुम इस होटल में एक बैरे (Waiter) का काम करते हो।"
बैरे (Waiter) ने उत्तर दिया, मैं यहाँ केवल बैरा (Waiter) हँ, मैं यहाँ खाना नहीं खाता।''
सक्रिय अहंकार को पहचानना अत्यन्त सरल होता है। सक्रिय अहंकार से ग्रसित व्यक्ति अपने अहंकार का परित्याग नहीं करेगा, चाहे उसकी सारी सुरक्षा उपकरण जैसे धन, सम्पत्ति इत्यादि उससे ले ली जाये। सक्रिय अहंकार की काट-छाँट अत्यन्त सरल है।
लेकिन निष्क्रिय अहंकार अत्यन्त सूक्ष्म और कुटिल होता है। जिन लोगों के अन्दर निष्क्रिय अहंकार होता है, वो अत्यन्त विनम्र होने का नाटक करते हैं, लोगों से मिलने का उनके अन्दर साहस नहीं होता, किसी तरह का श्रेय लेने में शर्माते हैं इत्यादि, इत्यादि। इसका सबसे बुरा भाग यह है कि वो ये सोचते हैं कि वो ऐसा इसलिए हैं क्योंकि वो अहंकारी नहीं हैं। सत्य यह है कि वो और लोगों
की अपेक्षा अधिक अहंकारी होते हैं। वे बड़े ध्यान से अपने अहंकार पर चोट न पड़ने से उसकी सूरक्षा करते रहते हैं, इन्हीं सारी चीजों को सरल तरीके से करके।
Section 23
जब तुम गहरी सजगता और समझ के साथ होगे, तुम अपने अहंकार के मात्र दुष्टा रहोगे और इस स्थिति में स्वतः ही न तो तुम अहंकारी होगे न विनम्नू, न तो तुम श्रेय लेने के इच्छूक रहोगे और न ही श्रेय लेने से शर्माओंगे और तूम ऐसा सोचोगे भी नहीं और इस बात का तुम दावा भी नहीं करोगे कि तुम उनमें से कोई नहीं हो, तूम मात्र रहोगे, बस इतना। जब कोई तुम्हारी सराहना करेगा या तुम्हें किसी चीज का श्रेय देगा, तो बस तुम उसे अस्तित्व का प्रदर्शन मात्र मानकर के उसे उसी रूप में छोड़ दोगे, बस इतना और वहाँ किसी भी प्रकार की तलना या दावा करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
इसलिए बहुत स्पष्ट रहो : बहुत से लोग प्रायः यही सोचते हैं कि सक्रिय अहंकार ही अकेले प्रकार का अहंकार का अस्तित्व है। नहीं, एक अहंकार यह भी है जिसे निष्क्रिय अहंकार कहा जाता है जिसकी अभी हमने चर्चा की, जिसे नियंत्रित करना अधिक क्रिक होता है।
सक्रिय अहंकार से ग्रसित लोग, सूखी हुई कड़ी लकड़ी की टहनी की तरह होते हैं। उन्हें आसानी से तोड़ा जा सकता है। निष्क्रिय अहंकार से ग्रसित लोग ताजी और हरी टहनी की तरह होते हैं। हर बार जब उनके अहंकार को चोट लगती है, वे झूक जाते हैं लेकिन टूटते नहीं। वे अपने अहंकार को इतना अधिक सुरक्षित करते हैं कि उसे नियंत्रित करना कठिन होता है। वास्तव में, वो उसे सुरक्षित करने के लिए बहुत मेहनत करते हैं, लेकिन बहुत मीठे और निष्क्रिय तरीके से। निष्क्रिय अहंकार सक्रिय अहंकार की तुलना में अधिक खतरनाक है।
उदाहरण के लिए, तुम इस वक्त मेरे साथ कक्षा में हो। तुम्हारे अन्दर बहुत से प्रश्न उठ रहे होंगे, लेकिन क्या तुम सहजता से सारे प्रश्न मेरे सामने रखते हो? नहीं, तुम उन्हें अपने अन्दर तोड़ते-मरोड़ते हो और अंत में फिर उन्हें दबा देते हो। तुम उन्हें इसलिए तोड़ते-मरोड़ते हो, क्योंकि तुम डरते हो कि जब तुम प्रश्न पूछोगे तो तुम्हें मूर्ख समझा जायेगा। क्योंकि तुम मूर्ख दिखना नहीं चाहते इसलिए तुम प्रश्न नहीं पूछते। तुम अपने अहंकार को बचा रहे हो। यदि तुम्हारे प्रश्न मेरी उपस्थिति में सुलझा दिये जायें, यह एक दूसरी बात होगी। लेकिन यहाँ वो बात नहीं है।
तुम दूसरों की प्रतिक्रिया अपने प्रति और दूसरों की राय के प्रति कितना सजग रहते हो। जिस अहंकार को तुमने बड़े ध्यान से वर्षों से पाल रखा है, तुम उस पर एक भी चोट बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हो। यही अहंकार तुम्हार लंगर बिन्दू है। यदि इसे झटका दे दिया जाये तो, तुम लंगरहीन महसूस करोगे। इसलिए झुकने की आड़ में तुम शांत रहते हो। गुरु के समक्ष अपने अहंकार को खोलने का एक और अवसर तुम खो देते हो। अपने खिलने की तरफ एक और कदम उठाने का एक और मौका तूम खो देते हो।
मैं तुम्हें एक बात बताता हँ : दिन के अंत में जब देखा जाता है, तो हर प्रश्न मुखतापूर्ण हो जाता है। यह एक क्षण के लिए भी मत सोचा करो कि कूछ प्रश्न बुद्धिमत्तापूर्ण होते हैं अन्य प्रश्नों की अपेक्षा। जब गहरी समझ पैदा होगी, प्रश्न स्वतः ही समाप्त हो जायेंगे। यह असली विवेक है। किसी तरह भी हम सब लोग बहुत सर्तकता से अपने अहंकार की रक्षा करते रहते हैं।
अहंकार का एक और खेल है। जिस रूप में हम उसको अच्छी तरह पालते हैं जिसे हम सामाजिक अहंकार कहते हैं।
यह सामाजिक अहंकार क्या है?
तुम ऐसा महसूस करते हो कि तुम्हारा जीवन तुम्हारे लिए बहुत अधिक व्यक्तिगत है और किसी को भी उसमें प्रवेश करने का अधिकार नहीं है।
उदाहरण के लिए, लोग मेरे पास आते हैं अपने बच्चों के असामान्य तरीकों के बारे में चर्चा करने के लिए। लेकिन और लोगों के सामने वो असहज महसूस करते हैं। वे नहीं चाहते कि और लोग उनकी ये सब बातें जाने, क्योंकि उनकी अपनी दृष्टि में एक 'प्रतिष्ठा' है जिस दृष्टि से समाज उनके व उनके परिवार को देखता है। यदि तुम बाहर के लोगों को अपने पारिवारिक मसलों में प्रवेश करने दोगे, तो तुम्हें महसूस होगा कि तुम्हारा सब कुछ उनके सामने खुल जा रहा है। तुम डरते हो कि तुम्हारी सारी प्रतिष्ठा टूटकर बिखर जायेगी और फिर तुम्हारे पास समाज में उठने के लिए कुछ नहीं रह जायेगा। इसे सामाजिक अहंकार कहते हैं।
जिस प्रतिष्ठा को तुमने बहुत पीड़ा लेकर के बनाया है, जो प्रतिष्ठा तुम्हारी पहचान बन गयी है, जिस प्रतिष्ठा से तुम समाज में अपनी पहचान बनाते हो, वही दांव पर है। यह तुम्हारे लिए पहचान की चीज अधिक है अपेक्षाक्रत कि दूसरों के लिए। यदि तुम अपने आप को या अपने परिजनों को जैसे हो वैसे दिखाओ, तुम अधिक आराम में रहोगे, क्योंकि किसी चीज को छुपाने का तुम्हारे ऊपर कोई दबाव नहीं होगा।
निश्चित रूप से, तुम कह सकते हो, "स्वामी जी, एक ही कारण है जिससे हम लोग इन सब चीजों को गुप्त रखना चाहते हैं, और वो यह है कि हम नहीं चाहते कि लोग तरह-तरह की बातें हमारे बारे में करें।" मैं तुम्हें बताता हूँ, किसी को
किसी के बारे में बात करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि वो बात करते हैं, तो वो मुर्ख हैं। इस बात को याद रखो ओर तब जो शक्ति तुम दसरों को और उनकी बातों को देते हो, वह स्वतः ही बस खत्म हो जायेगी। यह तुम हो जिसने उन्हें तुमको को प्रभावित करने की शक्ति दे रखी है, क्या ऐसा नहीं है? अब वह शक्ति समाप्त हो जायेगी।
बस निर्णय लो और एक खूली किताब की तरह जीवन व्यतीत करो, इतना पर्याप्त है। तुम्हारे साहस को देखकर और तुम्हारे शरीर की भाषा को देखकर, लोग स्वतः ही समझ जायेंगे कि तुम्हारे बारे में इधर-उधर की चर्चा से कोई लाभ नहीं होगा। मैं तुम्हें बताता हूँ : अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की इच्छा का परित्याग करके बिना किसी व्यक्तिगत स्वरूप के जीना एक महान मूक्ति है।
अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण हम हर समय अत्यधिक आत्म सजग भी रहते हैं। हम आत्म सजग इसलिए रहते हैं, क्योंकि हमको लोग देख रहे हैं और हर समय हमारे बारे में बातें करते रहें हैं। बहुत स्पष्ट रहो : जब तुम आत्म सजग होते हो, तब तुम अत्यधिक अहंकारी होते हो। तुम सोचते हो कि तुम बहुत बड़ी हस्ती हो और हर व्यक्ति की दृष्टि हर समय तुम्हारे ऊपर है। यही कारण है तुम आत्म सजग हो जाते हो।
यदि तुम सोचते हो कि तुम 'कोई नहीं' हो, तो तुम क्या आत्म सजग होते? केवल इसलिए क्योंकि तुम सोचते हो कि तुम 'कोई' हो, तुम आत्म सजग होते हो और इसके ऊपर तुम नम्रता का प्रदर्शन भी करते हो आत्म सजग होते हुए। यह वास्तव में ऐसी चीज है जिसको तुम जानते भी नहीं कि तुम इससे ग्रसित हो। तुम बस यही सोचते रहते हो कि तुम विनम्र हो और सरल हो और तुम निरंतर यहाँ यही करते रहते हो।
जब तुम आत्म सजग होते हो, तुम जीवित तो रहते हो, फिर भी जीवित नहीं रहते। यह एक बाधा के रूप में हैं, तुम्हारी खूबसूरती और आभा में। तुम्हारी खूबसूरती इसीलिए मुक्त हो कर नहीं निकलती। जानवरों और प्रकृति की तरफ देखो। वे कितनी स्वच्छंदता और खूबसूरती से रहते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि वे आत्म सजग नहीं हैं। वे मात्र खुश हैं बस अपने आप को अस्तित्व से एक किये हुए। जिस क्षण तुम सोचना शुरू करते हो कि लोग तुम्हें देख रहे हैं, तुम्हारा
अहंकार पदार्पण करता है और तुम अपने प्राकृतिक स्वरूप को खो देते हो। बच्चे आत्म सजग नहीं होते, बड़ों की तरह। यदि तुम उन्हें ध्यान से खेलते हुए देखो, तुम देखोगे, कितनी अधिक खूबसूरती और निश्छलता पूरी चीज में दिखाई देती है। यदि तुम अपनी तस्वीर खींचों और दूसरों को भी, तुम ये बात देख सकते हो कि जो तस्वीर तुम्हारी जानकारी के बगैर ली गई और जो तुम्हारी
जानकारी में ली गई पहले वाली, बाद वाली से ज्यादा अच्छी होती है, जब तूम कैमरे के सामने खड़े होकर के फोटो खिंचवाते हो।
जिस क्षण तुमसे कहा जाता है कि अब आपकी तस्वीर खींची जाने वाली है, तूम आत्म सजग हो जाते हो। तुम्हारा अहंकार घबड़ा जाता है कि लोग क्या कहेंगे और कैसी तोड़-मरोड़ करेंगे। तुम्हारा आत्म सजग अहंकार हर वक्त केवल फायदे और नुकसान की गणना करता रहता है, हर चीज में। वह हर समय दूसरों की आँखों और मतों को तौलता रहता है ओर उसके फलस्वरूप अपनी सहजता को खो देता है।
हमारी ध्यान कक्षाओं में भी, यदि तुम देखो मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम साधना तकनीक प्रारम्भ करने के पहले अपने नेत्रों पर जो पट्टी तुम्हें दी जा रही है उन्हें बाँध लो। लेकिन सबसे पहले तुम क्या करते हो? तुम सबसे पहले यह देखते हो कि और लोग अपनी आँखों पर पट्टी ठीक से बाँध रहे हैं कि नहीं? तुम इतना अधिक आत्म सजग रहते हो, ध्यान कक्ष के अन्दर भी। तुममें से कुछ तो ध्यान भी ठीक से नहीं करते इसलिए, क्योंकि वो आत्म सजग होते हैं। इस बात के कि मेरे और स्वयं सेवकों के नेत्र खुले रहते हैं। तुम एक दबाव के स्वरूप में ध्यान करते हो और इस तरह से ध्यान शिविर में आने का मुख्य अभिप्राय खो देते हो। जब तुम गणना करना बंद कर देते हो, निश्छल और खुला रहना प्रारम्भ करते हो, तो तुम यह पाओगे कि तुम ताजगी और आश्चर्य से हर समय भरे रहते हो। जीवन तुम्हें कभी भी तब नीरस और बाधित नहीं लगेगा।
और एक बात : निश्छल व्यक्ति कभी किसी का अहित नहीं करता, क्योंकि अहित करने के लिए तुम्हें गणना करने की आवश्यकता पड़ती है। यदि उन्होंने कभी किसी को अंजाने में हानि पहुँचायी होगी, तो लोग उससे पीड़ित नहीं होते, क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसे लोगों का अभिप्राय नुकसान पहुँचाना नहीं होता। ऐसे लोगों के शरीर की भाषा उनकी निश्छलता के बारे में बोलती है और उनकी रक्षार्थ उनके साथ रहती है।
ठीक है, अब हम एक अन्य महत्वपूर्ण अहंकार के प्रकार की तरफ बढ़ते हैं -अहंकार जो ज्ञान के साथ आता है।
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जैसे-जैसे तुम बड़े होते हो, तुम निर्णयों को इकट्ठा करते हो, लोगों के बारे में अपनी पारस्पारिकता के माध्यम से, और आँकड़ों से जो तुम ग्रंथों से और पुस्तकों से प्राप्त करते हो। ये दोनों एक साथ मिलकर के तुम्हारा ज्ञान बनते हैं, तुम्हारी पूरी मानसिक व्यवस्था। जो कुछ भी तुम देखते हो इसी मानसिक व्यवस्था के माध्यम से देखते हो।
जो कूछ भी तूम देखते हो, वे मात्र तुम्हारे पहले से निर्मित निष्कर्षों के लिए एक समर्थन देने वाले तर्क बन जाते हैं। तूम करीब-करीब एक जिंदा लाश की तरह होते हो। तुम्हारे अन्दर उन्नति की कोई संभावना नहीं रह जाती। तूम हर समय एक विशेष रंगीन शीशे के माध्यम से देखते हो - एक रंग जिसे तुमने ही रंगा है। तुम इसकी परिकल्पना भी नहीं कर सकते कि तुम इस आश्चर्य से भरे हुए संसार में इस कारण से कितना अधिक खो रहे हो।
एक छोटी कथा :
एक व्यक्ति अपने मित्र से कह रहा था, "क्या तुम जानते हो, मैंने वास्तव में अपने आप को बेवकूफ बनाया?"
मित्र ने पूछा, "क्यों, क्या हूआ?"
व्यक्ति ने कहा, "मैंने अपने घर की 10 टूटी हुई खिडकियों को बदल दिया। बाद में मैंने पाया कि मेरे चश्में का शीशा टूटा हुआ था।"
यदि हम एक क्षण के लिए अपने अन्दर देखें, हम समझ जायेंगे कि हम जो भी देखते हैं उसमें हम ही कारण हैं। लेकिन किसी कारण से हम अन्दर देखना ही नहीं चाहते। हम ये महसूस करते हैं कि हम सब कुछ जानते हैं, और यहीं समस्या शुरू हो जाती है। सांसारिक ज्ञान बस हमें उभरने का मौका नहीं देता।
इसमें सबसे खतरनाक बात यह है कि तुम ये महसूस करते हो कि तुम अपने ज्ञान के साथ-साथ ठोस हो। तुम्हें ऐसा प्रतीत होता है कि तुम अपने ज्ञान के कारण एक ठोस चरित्र बन गए हो। तुम शायद ये बात जानते ही नहीं कि तुम अपने स्वरूप पर एक बोझ बन गये हो और कुछ नहीं।
तुम्हारा स्वरूप एक बहती हुई नदी है और तुमने उसे स्थिर कर दिया है अपने इस तथाकथित ज्ञान के द्वारा। वास्तविक ज्ञान यह जानना है कि किस तरीके से ज्ञान का परित्याग कर दिया जाये, जो तुम्हारे जीवन में मिलता है और एक छोटे से बच्चे की तरह जीवन जीना है और सहजता से बहते रहना है। तुम्हें अहंकार से सहजता की तरफ बढ़ना है।
हम जो कूछ भी देखते हैं अपने जीवन में, उसे श्रेणीबद्ध करने और उस पर लेबल लगाने के लिए तैयार रहते हैं और इस तरह से इसके फलस्वरूप हम जीवन से सहजता चुरा लेते हैं, हम लोगों को श्रेणियों में बाँधते हैं, स्थानों को श्रेणियों में बाँटते हैं, परिस्थितियों को और हर चीज को हमारे जीवन के मार्ग में आती हैं।
एक छोटी कथा :
एक बार एक व्यक्ति एक सिनेमा हाल में सिनेमा देखने गया।
वह फिल्म जब शुरू हुई तो उसकी शुरुआत अंतर्राष्ट्रीय फिल्म स्टूडियो जिसने वह फिल्म बनायी थी उसके नाम से शुरू हुई।
उस व्यक्ति ने अपने आप से कहा, "अरे! इस फिल्म को हमने पहले भी देखा है।" और वह उठकर बाहर निकल गया।
हर फिल्म जो बनती है वह उस विशेष स्ट्रडियो की मोहर के साथ बनती है और बस उसी को देखकर के उस व्यक्ति ने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि उसने पहले भी यह फिल्म देखी है। वह बस चूक गया।
ऐसे ही हम सब हैं : खास तौर से वयस्क। बच्चे उस तरह के नहीं हैं। वे हर चीज को ताजगी के साथ देखते हैं। वो इतना अधिक जीवन से भरे हुए होते हैं, वो हमारी तरह मृत नहीं हैं।
जब तुम समूद्र के किनारे जाते हो, तो ध्यान से बच्चों को देखो कि वे कितना उत्तेजित रहते हैं। जहाँ भी, जब भी तुम समुद्र के किनारे जाओ, तुम ऐसा महसूस करते हो कि उस समुद्र तट को तुम पहले से जानते हो। वह अतुलनीय ताजगी जो प्रकृति से आती है, वो भी तुम अपने रंगीन शीशों के माध्यम से देखते हो। तूम अपने उस चश्में को नहीं छोड़ पाते जो तूम धारण किये रहते हो। वह समूद्र तट भी तुम्हारे लिए एक और स्थान बन जाता है जहाँ तुम अपना तथाकथित ज्ञान आरोपित कर देते हो। मैं तुम्हें बताता हूँ : यदि तुम किसी भी तरह यह महसूस करते हो कि तुम जीवन का आनन्द नहीं ले पा रहे हो, तो ये केवल तुम्हारे मस्तिष्क के कारण है, तुम्हारे ठोस अहंकार के कारण है, इसलिए नहीं है कि जीवन ही खूबसूरत नहीं है।
एक व्यक्ति छूट्टियों पर स्विट्जरलैण्ड गया और एक माह बाद वापस आया।
एक शाम वह अपने मित्र से मिला और बाहर खाने का निर्णय लिया। उसके मित्र ने उससे पूछा, "तो स्विट्जरलैण्ड में अच्छे और खूबसूरत दृश्यों का खूब आनन्द लिया तुमने?"
व्यक्ति ने उत्तर दिया, "हाँ, एक तरह से। लेकिन पहाड बार-बार बीच में आ जा रहे थे।"
हम इतने संवेदनहीन हैं, हम प्रकृति से इतने दूर हैं। हमारे आस-पास इतनी खूबसूरती है, लेकिन हम उसका आनन्द लेने में सक्षम नहीं हैं और हम शिकायत करते रहते हैं कि आनन्द लेने के लिए कुछ है ही नहीं।
आनन्द लेने की क्षमता तम्हारे अन्दर है। बाहर की किसी चीज को इसके लिए दोष मत दो। एक बच्चे के रूप में, तुमने अपने आस-पास की हर चीज का आनन्द लिया। उसके बाद क्या हो गया? तम गंभीर बन गए और भुल गये कैसे आनन्द लिया जाता है। तुम नीरस बन गए अपने तथाकथित ज्ञान के कारण।
मैंने तुम्हें पहले भी बताया है, लोग मुझसे पूछते हैं, "स्वामी जी, आप अपने इतने सारे ज्ञान के साथ एक बच्चे की तरह कैसे दिखते हैं। हर बार जब आप कोई हास्य कथा सुनाते हैं तो आप इतनी स्वच्छंदता से हँसते हैं कि हम लोगों को आपको देखकर आश्चर्य होता है। जब आप कोई हास्य कथा सूनाते रहते हैं, तो कई बार ऐसा होता है कि हम उस कथा को पहले भी सुन चुके रहते हैं इसलिए हँसते नहीं, लेकिन आप उसका आनन्द उसी तरह लेते हैं और उतना ही लेते हैं जैसे कोई और सुना रहा हो और पहली बार सूना रहा हो।"
तुम देखो, निश्चित रूप से मेरे कहने का अर्थ यही है कि जब मैं कहता हूँ कि तुम अपने आनन्द लेने की क्षमता और स्वछंदता खो चुके हो। तुम्हारे अन्दर एक प्रवृत्ति पैदा हो चुकी है कि तुम अपने ज्ञान के माध्यम से सब कुछ जानते हो।
तमिलनाडु के गाँवों में सालाना मंदिर के उत्सवों के समय छोटे-छोटे अस्थायी मंच बनाये जाते हैं, जिस पर विभिन्न मशहूर नाटक मंडलियाँ रामायण और महाभारत जैसे हिन्दू ग्रंथों से लिए गये दृष्टांतों पर नाटक खेलती हैं।
मैं इन नाटकों को देखने के लिए जाया करता था।
एक अवसर पर, जब वे महाभारत के द्रौपदी चीरहरण का दुश्य दिखा रहे थे जिसमें अंत में भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी की दुशासन से रक्षा की। उस नाटक में द्रौपदी का भाग खेलने वाला एक पुरुष था जो साडी पहने हुए था। उनकी योजना के हिसाब से उसे 7 साडियाँ पहननी थीं और दुशासन को एक-एक करके साडियाँ खींचनी थी, गिनती को ध्यान में रखते हुए।
जब सातवीं साड़ी खींची जाती, तो द्रौपदी चीखती कि श्री क्रूष्ण बचाओ और श्रीकृष्ण का पदार्पण हो जाता।
किन्हीं कारणों से द्रौपदी का अभिनय करने वाला एक साड़ी लपेटना भूल गया और उसने केवल 6 साड़ियाँ पहनी थीं।
मंच पर जब दशासन ने साडियाँ खींचना शुरू कीं और अचानक जब छठवीं साड़ी खींची, तो द्रौपदी को गलती का अहसास हुआ।
वह जोर-जोर से दुशासन से चीखने लगा, "हे छोड़ो इसे। हे छोडो इसे।"
दुशासन ने सोचा कि देखो द्रौपदी अपना भाग कितनी अच्छी तरह से निभा रही है और साड़ी खींचता रहा।
अंत में मंच पर द्रौपदी हाफ पैंट और ब्लाउज पहने खड़ी थी, एक महिला का मेकप किये हुए।
लेकिन उसके पास एक अच्छी प्रतिउत्पन्न मति थी और वो जोर से चीखा, "हे कृष्ण आप कितने दयालु हो, आपने मेरी इज्जत बचाने के लिए मेरा लिंग परिवर्तन कर दिया।"
आज भी जब मैं उस दृश्य के बारे में सोचता हूँ, तो मैं हँसने से रुक नहीं पाता। इसलिए समझो : ज्ञान ठीक है, लेकिन उससे अपने आप को ठोस मत बनाओ। तुम्हारी आंतरिक प्राकृतिक एक नदी की तरह है- बहती हुई। सहजता तुम्हारी प्रकृति है। अपने तथाकथित ज्ञान के माध्यम से तुम उस सहजता से दूर हो गये हो। यदि तुम निश्छलता से जियो, तुम्हारे लिए एक संपूर्ण नया संसार खुल जायेगा।
हर क्षण से खूलकर के मिलो। किसी प्रकार का पूर्वाग्रसन मत रखो। यदि तुम इस तरह से रहोगे, कोई भी चीज तुम्हें सांसारिक नहीं बना पायेगी। तुम देखोगे कि तब तुम्हारा अपना जीवन जो अब तक तुम जिये हो, वो अब प्रतिदिन कितना ताजा आनन्ददायक है।
जब यह तुम्हारा रवैया बन जायेगा, तब इस बात की संभावना है कि तुम्हारे अन्दर के खुलेपन को और लोग भी महसूस करेंगे और आनन्द के बहुत से मार्ग तुम्हारे लिए खुल जायेंगे। तब यह एक सक्रिय चक्र बनेगा, जिसमें तुम हर क्षण ताजगी और अधिक ताजगी की तरफ बढ़ोगे। तब तुम्हें हर जगह ताजगी ही मिलेगी, नयापन मिलेगा, कुछ भी बासी नहीं होगा।
जब तुम अहंकार के साथ जियोगे, तब तुम्हें बहुत सी अनावश्यक व्यवस्था करनी पड़ेगी, बहुत से सहारे हैं जो तुम्हें प्रमाणित करते हैं। बिना इसके तुम कुछ नहीं हो। एक राजा, राजा होता है केवल जब उसके पास एक राज्य है। दूसरी तरफ एक परमहंस जिसे किसी चीज की कोई आवश्यकता नहीं है जब वह अपने पैर फैलाता है तो सोता है, जब वह अपने हाथ फैलाता है तो भोजन करता है। वह मात्र अनुसरण करता है अस्तित्व के बहाव का। वह आत्मज्ञानी होता है और अपने आप में एक राजा होता है। उसे किसी राज्य की आवश्यकता नहीं पड़ती।
लेकिन जब तुम परमहंस हो जाओगे, एक विशाल साम्राज्य स्वतः ही तुम्हारे आस-पास बन जायेगा, लेकिन तुम उससे पूर्णता पृथक होगे बिना उसे स्पर्श किये और बिना उससे प्रभावित हुए। केवल कमजोर लोग साम्राज्य का निर्माण करते हैं अपने लिए और उसी से सहारा और शक्ति प्राप्त करते हैं। केवल कमजोर लोग हैं, जिन्हें प्रतिष्ठा के सहारे की आवश्यकता होती है, उनके अहंकार के सहारे की आवश्यकता पड़ती है। एक परमहंस के लिए उसकी स्थिति उसके लिए सब कुछ कर देगी, वह अपने आस-पास फैली प्रतिष्ठा से निर्लिप्त होगा।
Section 25
तुम व्यवस्थाओं की खोज इसलिए करते हो, क्योंकि तुम महसूस करते हो कि जीवन खाली है और एक तरह से सांसारिक है। तूम जीवन को सांसारिक महसूस करते हो, क्योंकि तुम हर समय चमत्कार की खोज करते रहते हो। अस्तित्व के महान चमत्कार तम्हारे नेत्रों के सामने हर क्षण होते रहते हैं। लेकिन क्योंकि तुम अपने अहंकार में पहले से लिप्त रहते हो, इसलिए तूम उसे देखने से चूक जाते हो।
तुम्हारा शरीर स्वयं एक चमत्कार है। वह किसी सुपर कम्प्यूटर, जिसकी भी आज तक खोज की गई है, से महान है। तुम्हारे शरीर की करोड़ों कोशिकायें और हजारों तारतम्यात्मक क्रियायें जो होती रहती हैं इस पृथ्वी ग्रह पर सबसे बड़ा चमत्कार है। यदि तुम अपने मन का परित्याग करके और अस्तित्व के साथ सामंजस्य बैठाकर जीना जानो, तब तुम समझोगे कि जो तुम चमत्कार के नाम पर द्वूँढ़ते रहते हो वह और कुछ नहीं, अपितु प्रकृति की एक तारतम्य से घटने वाली घटना है, जो अस्तित्व के कारण होती रहती हैं। तुम्हारा अहंकार इन्हें बस साधारण रूप में देखता है, बस इतना। तुम्हारा ज्ञान हर समय विभाजन करता है और विश्लेषण करता है और चीजों को सांसारिक तर्क तक घटा देता है।
प्रश्न : स्वामी जी, ऐसा क्यों है कि हम जानते हैं फिर भी हम इन चीजों को अपने ऊपर ले लेते हैं?
हाँ .........यह एक अच्छा प्रश्न है। जब हमारे पास खुशी के साथ जीने का विकल्प है, हम पीड़ा को क्यों चुने........?
तुम देखो, तुम अपने आप को नहीं जानते, तुम्हारा स्वरूप जो वास्तव में तुम्हारी सच्ची पहचान है। समय के साथ-साथ, तुम अपने आप को वाह्य जगत से जोड़ लेते हो और अपने लिए एक कृतिम प्रमाण का निर्माण कर लेते हो। इसी कृतिम प्रमाण से तुम वाह्य जगत से जुड़ सकते हो। यही कृतिम प्रमाण तुम्हारा अहंकार है। यह प्रमाण उन लेबलों से निर्मित होता है, जो दूसरे तुम्हारे ऊपर चिपका देते हैं। तुम जानते ही नहीं कि तुम वास्तव में कौन हो?
मान लो मैं तुमसे पूछू तुम कौन हो, तुम क्या कहोगे? तुम कहोगे, "मैं फलाँ का
पिता हूँ और इसी तरह से" या "मैं फलाँ की बहन हूँ इत्यादि-इत्यादि" या "मैं एक चिकित्सक हूँ" इत्यादि। लेकिन ये सब है क्या? ये तो सब तुम्हारे संबंध और व्यवसाय हैं। तुम अपने पिता की पुत्री हो, अपने पति की पत्नी हो, अपने बच्चों की माँ हो इत्यादि। तुम अपने आस-पास के लोगों के लिए हो ये। तब तुम अपने आप क्या हो?
वर्तमान में तुम्हारा अस्तित्व केवल संबंधों और व्यवसायों में रह गया है। तुम्हारा अहंकार इसी पर निर्मित है। तुम्हारी पहचान इसी के माध्यम से है। यही कारण है कि तुम्हें अपनी पहचान खोने का भय हमेशा बना रहता है। यह मनुष्य द्वारा निर्मित अत्यन्त नाजूक चीज है इसलिए किसी भी समय टूट सकती है। इसीलिए तुम्हें इसको बनाये रखने के लिए बहुत कड़ी मेहनत करने की आवश्यकता पडती है।
तुम्हारी आंतरिक प्रकृति वास्तव में अकेले रहना है। जब तुम अपनी माँ के गर्भ में थे, तुम अकेले थे। तुम वास्तव में अपने आप में पर्याप्त हो। यह तुम्हारा आत्मभिमान है। समय के साथ-साथ इस आत्मभिमान के ऊपर आरोपण हो गया उसका जिसे तुम अपना व्यक्तित्व कहते हो। आत्मभिमान प्राकृतिक है, व्यक्तित्व सामाजिक है।
यह कुछ इस तरह से है : एक पार्सल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाता है और हर स्थान पर उसके ऊपर मोहर लगती है और विभिन्न प्रकार के ब्यौरे लिखे जाते हैं। पार्सल वास्तव में ये मोहर नहीं है अपितु वो चीज है जो अन्दर भरी हुई है, क्या ऐसा नहीं है? इसी तरह से, तुम वो मोहर नहीं है जो लोगों ने तुम्हारे ऊपर लगा दी। तुम अपने अन्दर में जो है वो हो।
किसी तरह समय के साथ-साथ तुम्हारा अहंकार उन्हीं मोहरों पर निर्मित होता है और तुम्हें इसके पोषण के लिए अधिक से अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती है। यही कारण है कि तुम अनुभव करोगे कि तुम पूर्णतः अकेले रह ही नहीं पाते, अपने आप के साथ। जब तुम अपने आप के साथ होते हो, तब तुम दूसरों की आवाजें नहीं सुनते, जो तुम्हारे अहंकार का पोषण करते हैं। तुम्हारा अहंकार अपोषित रहता है। तुम करते क्या हो? कुछ नहीं तो दूर-दर्शन ही खोलकर के बैठ जाते हो।
एक छोटी कथा :
एक बहुत बड़ी राजनीतिक पार्टी से संबंधित एक व्यक्ति मर रहा था। उसके मित्र उसके पास आये, जानने के लिए कि अपनी मृत्यू के समय उसने अपनी निष्ठा विपक्षी पार्टी की तरफ क्यों कर दी भी।
वे आश्चर्यचकित थे और उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया?
उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, "ओह, इसलिए कि मैं नहीं बल्कि उनमें से कोई मरे। ''
हमारी कुत्रिम पहचान इतनी अधिक शक्तिशाली हैं यह हमारे लिए इतनी ठोस सच्चाई बन गई है कि इसने हमें अंधा कर दिया है कि हम और कूछ देख ही न पायें। मृत्यु के समय भी, हम अपनी प्रतिष्ठा का परित्याग करने में कितनी कठिनाई का अनुभव करते हैं। हम अचेतन अवस्था में जीते हैं और मरते हैं। अपने व्यक्तित्व के खोने का भय जो तुम्हारा एक मात्र लंगर बिन्दु है, तुम्हें इस तरह से व्यवहार कराता है जिस तरह का व्यवहार तुम करते हो। यही कारण है कि हम कहते हैं कि तुम्हारा अहंकार प्रभावी है। संपूर्ण आध्यात्मिकता बस इस व्यक्तित्व का परित्याग करने के बारे में है, इस कृत्रिम पहचान का परित्याग।
यह होना संभव है। जब तुम देखना शुरू करो बजाए इसके कि तुम उसी में लिप्त हो जाओ और विश्वास करो। जब तुम देखना प्रारम्भ करोगे, तब तुम समझोगे कि तुम पार्सल के अन्दर की वस्तु हो उस पर लगे हुए लेबल या नाम नहीं। जब ये सजगता तुम्हारे अन्दर आ जायेगी, तब तुम्हें किसी भी व्याख्यान की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, किसी प्रार्थना की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, किसी शिक्षा की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, किसी प्रवचन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
प्रश्न : स्वामी जी, यदि हम अपने स्वामी के समक्ष समर्पण कर दें, तो क्या हमारे अहंकार का निर्मूलन हो जायेगा?
सबसे पहले, यदि तुम वास्तव में समर्पण करो, तो तुम पराचेतन हो जाओगे। इस बात का कोई प्रश्न ही नहीं है कि कब मैं समर्पण करूँ इत्यादि। लेकिन किसी तरह तर्क के लिए, यदि तुम मुझे अपने अन्दर प्रवेश करने दो। तुम्हारे अहंकार को काट-छाँट कर एक बोंसाई वृक्ष की तरह बना दूँगा, तब तक के लिए जब तक पूर्णतः तुम उसका परित्याग नहीं कर देते और रूपान्तरित नहीं हो जाते।
तुम्हारे पास पर्याप्त अहंकार होगा अपना व्यवसाय करने के लिए और अपनी दैनिक क्रियायें करने के लिए, दूसरों को पीड़ा न देते हुए और अपने को भी पीड़ित न करते हुए। तुम्हारा अहंकार उस भुने हुए बीज की तरह होगा, जो अब कभी प्रस्फुटित नहीं होगा।
एक बात समझो : एक व्यक्ति जो अभी तक पराचेतन (enlishtened) नहीं हुआ, उसके अन्दर अहंकार किसी न किसी रूप में रहता है। चाहे वह सक्रिय अहंकार हो या निष्क्रिय अहंकार हो, जितना अधिक तूम दुष्टा बनोगे, उतना ही अधिक तम्हारा अहंकार मिटेगा। अब तक के लिए इतनी समझ पर्याप्त है।
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Section 26
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एक छोटी कथा :
एक रात्रि, दो शराबी सड़क के किनारे पैदल चल रहे थे, जब वो एक हैलोजन के प्रकाश के नीचे आए।
उनमें से एक ने देखा और कहा, "देखो सूर्य हम लोगों के लिए नीचे आ गया है।"
दूसरे ने उत्तर दिया, "नहीं, यह रात्रि का समय है, यह चंद्रमा है।" पहला लगातार कहता रहा, "क्योंकि यह रंग में पीला है इसलिए यह
सूर्य है।''
एक तीसरा व्यक्ति जो शराब पिये हुए था उनके पास से गुजरा। इन लोगों ने उसे पूछा, "महोदय, क्रूपया हमें बताइये क्या यह सूर्य है या चंद्रमा।''
उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, "मैं पड़ोस में नया हूँ, मैं जानता नहीं।"
तो, जब तुम किसी ऐसे व्यक्ति से प्रश्न करोगे जो उत्तर नहीं जानता, तो या तो तुम उत्तर नहीं पाओगे या गलत उत्तर पाओगे।
केवल वो जिन्हें अनुभव है, स्पष्ट व्याख्या कर सकते हैं। यदि तूम समर्पण का अर्थ किसी ऐसे व्यक्ति से पूछा जिसे समर्पण का अनुभव नहीं है, तो वो कहेगा, "मात्र हर चीज भगवान को समर्पित करो इतना पर्याप्त है।"
यह समर्पण नहीं है।
एक व्यक्ति मेरे पास आया और मुझसे पुछ। "यदि मैं सब कुछ ईश्वर को समर्पित करूँ, क्या हर चीज ठीक हो जायेगी?''
मैंने उत्तर दिया, "हाँ, यदि तुम सच्चाई से सब कुछ ईश्वर को समर्पित करो, हर चीज ठीक हो जायेगी। "
वह तीन दिन बाद वापस आया और मुझे बताया, "स्वामी जी, मैंने हर चीज ईश्वर को समर्पित कर दी।"
मैं खुश हुआ और उससे पूछा, "अब तुम कहाँ जा रहे हो?"
उसने उत्तर दिया, "शराब खाने में।"
वह कहता रहा, "जो कुछ भी मैं करूँगा, अब से ईश्वर ही उसके लिए जिम्मेदार होगा। "
यह वास्तव में एक तरीका है अपने आप को मूर्ख बनाने का। यदि उसने सचमुच समर्पण कर लिया है, तो उसे पीने की आदत का भी समर्पण कर देना चाहिए। उसके पश्चात उसे और आगे पीना भी नहीं चाहिए।
रामकृष्ण खूबसूरती से कहते हैं, "जब सच्चा समर्पण हृदय से होता है, तो ईश्वर तम्हारा हर कदम पर तम्हारे जीवन में मार्ग-दर्शन करता है और तुम कभी कोई गलती नहीं कर सकते।'' जब समर्पण तुम्हारे अन्दर से प्रस्फूटित नहीं होता और केवल जिह्वा के स्तर से होता है, तब तूम केवल अपने आप आप को और दूसरों को मूर्ख बनाते हो।
समर्पण तम्हें हर समय केवल अस्तित्व का ही चिंतन करायेगा। तुम धीरे-धीरे अपनी पहचान खो दोगे, तुम्हारा अहंकार समाप्त हो जायेगा। भागवतपुराण में आया है, एक छंद में गोपी अपने आप से कहती है, "मैं श्री क्रष्ण के अलावा कूछ भी नहीं सोच पाती। मैंने अपना मन उन्हें समर्पित कर दिया है। यदि मूझे किसी अन्य चीज के बारे में सोचना होगा, तो मुझे उनसे अपना मन वापस माँगना होगा, कैसे माँगू अब?"
रामकृष्ण परमहंस अपने जीवन के आखिरी दिनों में कैंसर से पीड़ित थे। उन्होंने बहुत से लोगों की बीमारियों को ठीक किया था।
किसी ने उनसे पूछा, "आप क्यों अपना मस्तिष्क एक क्षण के लिए अपनी बीमारी पर लगाकर के उसे ठीक नहीं कर देते?"
उन्होंने उत्तर दिया, "मैंने अपने मस्तिष्क को उस असीमित ऊर्जा के समक्ष समर्पित कर दिया है, मैं कैसे उसे वापस लेकर के इस बीमारी पर केन्द्रित करूँ।"
यह सच्चा समर्पण है।
वह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा हमारा ख्याल रखेगी। तुम मुझसे पूछ सकते हो, "क्या यह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा मेरी हर समस्या का ख्याल रखेगी?'' भगवतगीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं या यूँ कहिये वचन देते हैं, "यदि कोई व्यक्ति केवल मेरा ही चिंतन करेगा बिना किसी अन्य के, तो मैं उसकी हर उपलब्धियों, उपहारों और आनन्द का ख्याल रखूँगा। उनके लिए जो मेरे सामने पूरी निष्ठा से समर्पण करेंगे, मैं उनकी आमदनी और उनकी उन्नति का ख्याल रखूँगा। उनकी समस्यायें समाप्त हो जायेंगी। "
पूर्ण निष्ठा और मस्तिष्क की परिपक्वता आवश्यक है सच्चा समर्पण होने के लिए। तम्हें किसी ईश्वर या स्वामी के सामने समर्पण नहीं करना है। तम किसी भी चीज के प्रति समर्पण कर सकते हो। समर्पण अपने आप में एक सदगुण है और उसके अन्दर अपने आप में महान शक्ति है। जब तूम समर्पण करते हो, तो तुम इस बात को स्वीकार करते हो कि जीवन की शक्ति तम्हारे अहंकार से कहीं महान है, बस इतना।
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Section 27
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Fme hejeÛesleve DeelceeDeeW ves efJeefYeVe OeceeX keâes yeveeÙee, peerJeve keâer Meefòeâ pees Fme संसार को नियंत्रित कर रही है पर अपने विचार स्थापित करने के लिए। हम इस जीवन शक्ति को ईसा मसीह, अल्लाह, शिव इत्यादि से पुकारते हैं। तुम्हें किसी ईश्वर के ऊपर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है। नास्तिक ईश्वर के ऊपर विश्वास नहीं करते। लेकिन उन्हें अपने होने पर तो विश्वास करना ही पड़ता है। यदि हम अपने होने पर विश्वास करते हैं और हम इस प्रश्न का उत्तर खोंजे कि. 'मैं कौन हँ'? तो यह एक ध्यान तकनीक बन जायेगी और हम ईश्वर को जान पायेंगे। इसी तरह से, ये विभिन्न तरीके या ध्यान तकनीकें समय के साथ-साथ विभिन्न धर्म बन गए।
लेकिन बाद में क्या हुआ? लोग विभिन्न धर्मों की मौलिक विचारधारा को पीछे छोड़कर धर्म के नाम पर लड़ना शुरू कर दिये।
एक छोटी कथा :
एक तमिल, एक अंग्रेज, एक उत्तर भारतीय और एक बंगाली एक साथ यात्रा कर रहे थे।
उन लोगों ने दूर से एक झील देखी।
तमिल ने जो दक्षिण से था देखकर के कहा तन्नीर (पानी)।
तमिल में पानी को थन्नीर कहा जाता है।
अंग्रेज ने उसे पश्चिम दिशा से देखा और उसने Water कहा।
उत्तर भारतीय ने उत्तर से देखा और पानी कहा।
बंगाली ने पूरब से देख और जल कहा।
वे सब चारों एक ही चीज के संदर्भ में बोल रहे थे जो पानी था।
लेकिन वे चारों आपस में लड़ने लगे, यह कहकर कि उनमें से हर एक जो कह रहा था वही सही था।
चारों में से किसी भी एक ने झील में उतरने का प्रयास नहीं किया कि जाकर के अपने आप के लिए ही यह देखे कि वास्तव में वो है क्या?
तमिल इस बात पर अडा हुआ था, जो उसके पितामह ने उसे बताया था, अंग्रेज इस बात का दावा कर रहा था कि उसके पितामह ने उसे बताया था, उत्तर भारतीय और बंगाली भी अपने-अपने पितामह की बातों पर अटके हुए थे।
यही है वास्तव में जो हम सब भी कर रहे हैं। जो लोग धर्म के नाम पर लड़ते हैं, वही चीज कर रहे हैं। उन्हें यह समझना जरूरी है कि किस दृष्टिकोण से हमारे पूर्व की पराचेतन आत्माओं ने धर्म को देखा था, और उसी दृष्टिकोण से उसे नामित किया था, लेकिन हर चीज एक हैं - अस्तित्व या ईश्वर। कृष्ण और ईसामसीह, दोनों का अर्थ एक ही है, लोगों ने भिन्न दृष्टिकोणों से देखा था, बस डतना।
ये चारों लोग, बिना झील में उतरे हुए इस बात पर बहस कर रहे हैं जो उनके पूर्वजों ने उनको बताया है। होगा क्या? वे आपस में केवल लड़ेंगे, क्योंकि उनमें से हर एक ये सोचेगा कि उसके ही पूर्वज सही थे। यदि उन्होंने यह निर्णय लिया होता कि अपने पूर्वजों की बात को एक किनारे रख दें और झील में उतरकर स्वयं देखें तो वे समझ गये होते कि उनके सब के पूर्वज का कहने का अभिप्राय एक ही था और तब वे आपस में न लड़ते।
आज, केवल वे लोग जो झील तक नहीं गए हैं और एक घूँट पानी नहीं लिया है झील से, वही लोग लड़ रहे हैं। वो लोग उस झील में जिसे आध्यात्मिकता कहते हैं में कभी गये नहीं हैं और न ही सत्य का स्वाद लिया है, वही लोग धर्म और जाति के नाम पर आतंकवाद फैला रहे हैं। जो चारों व्यक्ति आपस में लड़ रहे हैं वो मात्र किनारे खडे होकर के लड रहे हैं। इसलिए समझो कि सत्य की अभिव्यक्ति विभिन्न रूपों में हुई है, इतना पर्याप्त है।
अब मैं ध्यान पर वापस लौटता हूँ, सरलतम तरीके से बताया जाये तो ध्यान तुम्हारे मन को आराम देता है, इतना पर्याप्त है। ध्यान जैसा कि लोग सामान्यतः अर्थ निकालते हैं ध्यान केन्द्रित करना नहीं है। जब तुम ध्यान केन्द्रित करते हो, तो तुम वास्तव में हर चीज को अपने से अलग करते हो अपने मन के द्वारा, जो एक असंभव कार्य है।
मात्र दो मिनट के लिए बैठकर के अपने मन से हर चीज निकालने का प्रयास करो, तुम पागल हो जाओगे। हर एक चीज जिसे तुम निकालने का प्रयास करोगे वो वापस आकर के तुम्हें पीड़ा देगी। इसलिए ध्यान केन्द्रित करना साधना नहीं है। ध्यान साधारण तरीके से हर चीज को सम्मिलित करके आराम से हो जाना है। जब तुम ध्यान केन्द्रित नहीं करोगे हर चीज को निकालने में, तुम आराम से होगे।
जब भी तुम्हें समय मिले, बस आराम करो और सजग रहो हर चीज के बारे में जो तुम्हारे आस-पास हो। अपने हृदय से सुनो हर आवाज को जो तुम्हारे आस-पास हो रही है। वह चिड़ियों की चहचहाहट हो सकती है वह हवा में कैलेण्डर के उड़ने की आवाज हो सकती है, वह पंखे की आवाज हो सकती है, वह तुम्हारे आस-पास के लोगों की आवाज हो सकती है या कुछ भी हो सकता है। बस खूले हुए हृदय से उसको सुनो। ध्यान रहे ये सब ध्यान भंग नहीं करते। तुम इन्हीं के साथ बह रहे हो, इसलिए तुम्हारा ध्यान बँटेगा नहीं। जब तुम इन्हीं के साथ बहोगे तब ये व्यवधान नहीं रह जायेंगे।
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प्रश्न : स्वामी जी, यह कैसे हैं कि आप हमेशा इतना खूबसूरत दिखते हैं…….। हाँ, यह एक रोचक प्रश्न है। मैं कैसे खूबसूरत दिखता हूँ हमेशा।
तुम देखो, यदि यह केवल इस रूप की बात है मेरा स्वरूप रूप जो तुम्हें अच्छा लगता है, जिससे तुम आकर्षित होते हो, यह आकर्षण समय के साथ क्षीण हो जायेगा। परिस्थितियों में परिवर्तन होगा, वस्त्रों में परिवर्तन होगा और कितनी चीजों में परिवर्तन होगा। जरा सोचो : तुम मुझे उसी पोशाक में देखते हो, वही गीत सुनते हो, वही आवाज सुनते हो प्रतिदिन और फिर भी उत्सुकता के साथ हमेशा आते हो। क्या तुम सोचते हो कि ऐसा और किसी के साथ कर सकते हो अपने जीवन में? समझो, यह व्यक्ति नहीं है, यह उपस्थिति है जो प्रसार करती है खूबसूरती का जिसे तुम महसूस करते हो और जो तुम्हें खींचती है।
जहाँ तक तुम्हारा तात्पर्य है, तुम एक व्यक्ति हो और जहाँ तक मेरा तात्पर्य है, मैं बस एक उपस्थिति हूँ, बस इतना। एक अहंकाररहित उपस्थिति इतनी शक्तिशाली होती है कि वो बस तुम्हें आकर्षित करती है। कितने पुरुष अभिनेता हैं जो मुझसे अच्छे व्यक्तित्व वाले हैं और देखने में मूझसे अच्छे हैं, मैं ठीक कह रहा हूँ न? तुम उन सबके प्रति आकर्षित हो सकते हो, लेकिन इतने गहरे आकर्षण और चाहत की तरह नहीं जितना कि मेरे प्रति।
यहाँ जो चाहत है वो तुम्हारे ही अन्तर स्वरूप की चाहत है, क्योंकि तुम्हारा स्वरूप इस रूप के पीछे की पराशक्ति को देख लेता है। यह केवल तुम्हारे स्वरूप का अभिप्राय है। अहंकाररहित उपस्थिति तुम्हारे स्वरूप के लिए कितना अधिक आनन्ददायक होती है। यही कारण है तुम बार-बार मेरी तरफ खिंचे चले आते हो।
तुम देखो : ईश्वर को महसूस करने की इच्छा हर आदमी के अन्दर होती है, लेकिन उसके लिए वो साकार नहीं होता। जब तुम मुझे देखते हो, तुम एक प्रकार का खिंचाव महसूस करते हो और आश्चर्य करते हो कि यह खिंचाव क्या है? ये खिंचाव तुम्हारे अन्तर स्वरूप की पुकार है। लेकिन तुम तुरन्त सोचना शुरू कर देते हो कि यह क्या हो सकता है, तुम केवल अपने मन का प्रयोग करना जानते हो और हर चीज को कम करके तर्क पर ला देते हो। ईश्वर तर्क से परे हैं। इसीलिए यह बात तुम तर्क से नहीं समझ सकते कि तुम क्यों मेरे प्रति खिंचाव महसूस करते हो।
तुम सब यहाँ बैठकर मुझे लगातार देखते रहते हो और सोचते रहते कि वो क्या है जो तुम्हें इतने समय तक बाँधे रहता है, बिना पलक झपकाये हुए। जब चाहत अन्दर से गहरी होगी तब ये होगा। ये चाहत घर वापस जाने की चाहत है। कई
जीवनों से तुम इस चाहत को पूरा करने का प्रयास कर रहे हो, लेकिन अब तक असफल हुए हो। इसलिए वापस आकर के तुमने पुनर्जन्म लिया है।
जब तुम इस चाहत को महसूस करोगे, तुममें से कुछ उसको पूरा करने के लिए लगेंगे और अपने अन्दर की यात्रा शुरू करेंगे और कुछ डरेंगे और बच निकेलेंगे। तुम वाह्य वृत्त के चारों तरफ घूमते हुए मुझे देखते रहते हो कि यदि कुछ हो तो तुम आसानी से भाग सको। तब मुझे तुम्हारे साथ छल करना पड़ता है और तुम्हें पढ़ाना पड़ता है और तुम्हें दिखाता हूँ कि तुम आ गये और तुम्हें अधिक कुछ नहीं करना है बस सिवाए अपने अहंकार का परित्याग करने के।
Section 29
तुम हमेशा भय से क्रियाशील होते हो, क्योंकि तुम्हें सिखाया गया है उस तरह से। भय निष्क्रिय रूप का अहंकार है। तुम इसलिए डरे रहते हो, क्योंकि तुम सोचते हो कि तुम समर्पित न हो जाओ इसलिए तुम एक दूरी बनाकर रखते हो भय की आड़ में। ऐसा मत सोचो कि भय कोई सम्मानजनक चीज है। भय एक धोखा देने वाले रूप का अहंकार है। तूम इतना अधिक भयभीत हो अपने अहंकार का परित्याग करने में, तुम इतना अधिक भयभीत हो कि कहीं तुम्हारा अस्तित्व न समाप्त हो जा जाये।
समझो : अस्तित्व ही प्रेम है। यह केवल प्रेम है और कुछ नहीं। एक बात और अस्तित्व तुम्हें जानता है, क्योंकि तुम उसका भाग हो। यदि तुम्हें अस्तित्व नहीं जानता तो फिर तुम्हें जानता कौन है? इसलिए डरने की कोई बात नहीं है।
अस्तित्व के साथ तुम्हें किसी भी प्रकार के प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं है। तुम अपने आप में वही बहुत साधारण से हो सकते हो और अस्तित्व तुम्हारे ऊपर क्रपा बरसायेगा। अस्तित्व केवल प्रेम करना और क्षमा करना जानता है। वह किसी अन्य सदगुण को नहीं जानता। तुम अस्तित्व का मूल्यांकन अपने अहंकार और तथाकथित धार्मिक माप से करते हो, समस्या यह है। यही कारण है कि तुम इस तरह से कार्य करते हो।
जब तुम यह जानोगे कि तुम अस्तित्व का ही एक भाग हो, तुम मुक्त महसूस करोगे। जब तुम अपने आप को अस्तित्व से अलग समझोगे, तुम पीड़ा में पड़ जाओगे। तुम जानते हो यह कितना महान अनुभव है कि तुम अस्तित्व का एक भाग हो। अपने अहंकार के कारण तुम ऐसा सोचते हो कि तुम अस्तित्व से पुथक हो।
जब तुम अपनी यात्रा अन्दर की तरफ घूमाते हो, तो तुम और अधिक सजगता से जानोगे कि तुम अस्तित्व का ही एक भाग हो। सजगता धीरे-धीरे अहंकार का स्थान ले लेगी। जब सजगता स्थान ले लेगी, अहंकार समाप्त हो चुका रहेगा,
दूसरा कोई रास्ता नहीं है। जब तक सजगता नहीं आयेगी, तूम अपने आप को एक ठोस सत्ता महसूस करोगे और अपने आप को पूरी तरह से अस्तित्व से अलग रखोगे।
वास्तव में, सम्पूर्ण आकाश तुम्हारे देखने के लिए हैं। लेकिन तूम उसे अपनी खिड़की से देखते हो, बस उतना ही जितना तुम्हारा अहंकार देखने की अनुमति देता है और तुम सोचते हो कि तुम्हारे उस ढाँचे में ही वास्तविकता आकाश है। यह सारे खेल और कुछ नहीं, अपितु अहंकार का खेल है। इसके प्रति सजग होना ही उससे बाहर निकलने के प्रति पहला कदम है। सजगता ही प्रधान कुंजी है जिससे तुम अपने अन्दर का कोई भी ताला खोल सकते हो। यही कारण है कि मैं बार-बार कहता हूँ - अपने अन्दर सजगता लाओ।
प्रश्न : स्वामी जी, हम लोगों के प्रति आपकी दिलचस्पी आप कैसे वर्णित करेंगे? तुममें मेरी दिलचस्पी केवल इतनी है कि तुम्हारी मदद मैं तुम्हारे खिलने में करूँ। यही सबसे महानतम चीज है, जो मैं तुम्हारे लिए कर सकता हँ और तुम मेरे लिए कर सकते हो। मैं चाहता हूँ कि लोग महसूस करें अपने प्राकृतिक आनन्द को, अपनी ऊर्जा की क्षमता को। ठीक इस वक्त, मनुष्य सोचता है कि वह एक मानव है, जो आध्यात्मिक अनुभव खोज रहा है। उसे यह समझने की आवश्यकता है कि वह एक आध्यात्मिक स्वरूप है जो मानव अनुभव खोज रहा है। मैं उसे यही शिक्षा देने पर कार्य कर रहा हूँ।
और एक मात्र तरीका यही है जिससे वह यह सीख सकता है, अहंकार के विभिन्न रूपों के बारे में जानकर। जो उसे यह महसूस कराते हैं कि वह एक मानव है बजाए कि आध्यात्मिक स्वरूप के। जब मनुष्य प्रार्थना करने से होने की तरफ बढ़ता है, तब समझ लीजिए वह कुंजी पा गया।
प्रश्न : स्वामी जी, जब कोई ध्यान करता है तो परिवर्तन कैसे होता है? और क्या आप हमें उसमें स्वामी की भूमिका के बारे में बता सकते हैं?
जब एक व्यक्ति ध्यान करता है, उसकी सारी आधार भावनायें जैसे, क्रोध, लिप्सा, ईर्ष्या, अत्यधिक राग। ये सब ऊँचे स्तर की ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती हैं। यह उसे चेतनता और सजगता के ऊँचे राज्य में पहुँचा देती हैं। तब वह पहले की तरह असहज नहीं रहेगा। ऊर्जा का परिवर्तन केवल ध्यान के मार्ग से ही हो सकता है।
जब यह परिवर्तन हर एक में होगा, तब संपूर्ण समाज परिवर्तित होगा। तब कम हिंसा होगी और अधिक भूमंडलीय सामंजस्य होगा। व्यक्तिगत परिवर्तन ही सबसे प्रायोगिक मार्ग है, भूमंडलीय शांति के लिए।
ध्यान के साथ गूरु के संरक्षण में, परिवर्तन ही वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से तुम उस सबको नष्ट करोगे जो तुम नहीं हो। यह बहुत पीड़ादाय प्रक्रिया होती है जिसके माध्यम से तुम गुजरते हो एक गुरु के साथ, क्योंकि तुम्हें हर उस चीज को इस प्रक्रिया में छोड़ना पड़ता है, जिसे तुम अपने हृदय से पकड़ कर रखते हो, उस हर एक चीज को जिसे तूम सोचते थे तूम हो।
गुरु तुम्हें लगातार यह दिखायेंगे वो सब, जो तुम नहीं हो और हर चीज छूटना शुरू हो जायेगी। वह तुम्हारी दबी हुई भावनाओं के उभरने के लिए स्थितियों का निर्माण करेंगे। तुम्हें बस यह करने की आवश्यकता है कि तूम गुरु को अपने ऊपर कार्य करने दो जिससे कि वह तुम्हारे अन्दर कई जन्मों से एकत्रित कूड़ा-करकट को जलाकर खाक कर सके।
मैं लोगों को बताता रहता हूँ : यदि तुम मुझसे भागने का प्रयास करोगे, तब तुम मुझे पाने से एक बार और चूकोगे। इसलिए बचने का प्रयास मत करो। मैं अपना हाथ ठीक उस जगह पर रखुँगा जहाँ पर तुम्हारे अन्दर छुपे हुए फोडे (Tumour) हैं, ये फोड़े तुम्हारा अहंकार हैं। बस मेरे प्रति आस्था रखो और खुलने का साहस करो। तभी मैं तुम्हारे सारे फोडों का इलाज कर सक्रुणा। गुरु के समक्ष खुल जाने मात्र से तुम्हारा आधा अहंकार खत्म हो जाता है। बाकी का गुरु ख्याल रखेगा। तुम्हें बस अपना हाथ बढ़ाने की आवश्यकता है, वह तुम्हें ऊपर उठा लेगा, बस इतना।
जब तुम निष्ठावान जिज्ञासु होते हो, जब तुम परिवर्तन के लिए तैयार रहते हो तुम गुरु के समक्ष खुल जाओगे और चीजें स्वतः ही हो जायेंगी। यदि तुम मात्र अपनी खिड़की के अन्दर से ही कार्य करने वाले हो, तब कुछ नहीं हो सकता, तुम बस एक गुरु से दूसरे गुरु तक घूमोगे और किसी से कुछ भी नहीं सीख पाओगे।
जब तुम ध्यान करते हो, गहनता से ध्यान करो। जब ध्यान के साथ-साथ गहनता भी होगी, परिवर्तन अवश्यंभावी है, पराचेतनता होना अवश्यंभावी है। सामान्यतः, हम या तो गहन होते हैं और साधना से चूक जाते हैं या साधना करते हैं बिना गहनता के। हम एक को पकड़ते हैं और दूसरा छूट जाता है। हमें दोनों को पकड़ने की आवश्यकता है, सच्चे रूप में खिलने के लिए।
कितनी देर तक तुम ध्यान करते हो, यह महत्वपूर्ण नहीं है, कितनी गहनता से तुम ध्यान करते हो यह महत्वपूर्ण है। किस स्तर की सजगता है महत्वपूर्ण यह है। जब तुम अन्दर की तरफ घूमने का सजग निर्णय लोगे, वह स्वयं ही तुम्हें ध्यान की गहनता देगा।
प्रश्न : स्वामी जी, हम जीवन में हमेशा कूछ न कुछ प्राप्त करने के बारे में सोचते रहते हैं, क्या यह भी हमारे अहंकार का खेल है?
हाँ, निश्चित रूप से। तुम सही बिन्दु पर आ गये। जब तुम यह सोचते हो कि जीवन का एक लक्ष्य है उसी लक्ष्य के पीछे भागते हो, तब तुम अहंकारी होते हो। जब तुम अस्तित्व की खूबसूरती को महसूस करते हो और अस्तित्व के बहाव के साथ-साथ चलते हो और यह समझते हो कि जीवन अपने आप में ही एक लक्ष्य है, तो बाकी सब लक्ष्य मात्र भ्रम होते हैं, तब तुमने सजगता प्राप्त कर ली होती है, तब तुम अहंकारी और अधिक नहीं रह जाते।
एक स्वामी वह है, जो तुम्हें जीवन की लक्ष्यहीनता समझाता है। जब तूम किसी कारण से खोज करते हो, तुम सच्चाई से चूक जाते हो। क्योंकि जब तुम कारण के पीछे भागते हो, तुम वर्तमान से चूक जाते हो। तुम बस अस्तित्व से चूक जाते हो।
जब तुम जीवन की लक्ष्यहीनता को महसूस कर लेते हो, तुम्हारे अन्दर एक नयी चेतनता खिलना प्रारम्भ कर देती है। तब तुम यह समझते हो कि जिन्हें हीरा समझकर अब तक तुम सूरक्षित करने आये हो वो हीरे नहीं, अपितु मात्र पत्थर थे। तुम यह समझोगे कि जिन चीजों को तुम महान समझते थे वह मात्र खिलौने हैं। तब तुम यह समझोगे कि धन ही सच्चा आनन्द नहीं है जिसे तुम खोजते हो। तूम उससे परे खोज रहे हो।
तुम जीवन को एक महान ईश्वरीय खेल के रूप में देखना शुरू करोगे - अस्तित्व का खेल। तुम इस नाटक से आनन्द लोगे और अपनी भूमिका पूरे आनन्द और पूर्णता से निभाओगे। तूम लक्ष्यों के लिए नहीं जियोगे, तुम जियोगे मात्र जीने के लिए और जीने के आनन्द लेने के लिए।
देखो, यह बात समझने का प्रयास करो कि मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि धनोपार्जन बंद कर दो। बिना धन के इस संसार में तुम कुछ भी नहीं कर पाओगे। मैं केवल यह कह रहा हूँ कि जीवन के हर क्षण को आनन्द के साथ जियो और अपने लक्ष्य को मात्र पूरी प्रक्रिया में एक घटना समझो। तुम्हें यह समझना ही होगा कि सारी चीजें मात्र एक नाटक हैं जिसके तुम एक पात्र हो। जब तुम लक्ष्य से जुड़ जाओगे, तुम संपूर्ण विचार से चूक जाओगे।
किसी नाटक में क्या इस बात का कोई अर्थ निकलता है कि उस नाटक में तुम्हारी जो भूमिका हो उससे तुम्हें राग हो जाये या उस चरित्र से तुम्हें राग हो हो जाये या उस नाटक की किसी अन्य चीज से तुम्हें राग हो जाये? नहीं, वह सीधे-सीधे बड़ा विचित्र सा लगेगा, क्या ऐसा नहीं? इसी तरह से जीवन भी एक महान नाटक है, इसलिए इससे किसी भी रूप में लगाव मत पैदा करो। मात्र अपनी भूमिका अदा करो और पूरे खेल का आनन्द लो।
Section 30
इस बात को समझो कि जीवन कोई लक्ष्य नहीं है, यह अपने आप में केवल एक मार्ग है। यदि तुम्हारे पास लक्ष्य होगा, तब तुम दौड़ोगे। जब तुम दौड़ोगे, तुम्हारे पाँव भूमी का स्पर्श नहीं करेंगे। जब तुम भूमी का स्पर्श नहीं करोगे, तुम अस्तित्व की खूबसूरती से चूक जाओगे। जब तुम दौड़ते हो, तुम वस्तुतः चूक जाते हो अपने नीचे अस्तित्व की उपस्थिति का अनुभव करने से। जब तुम लक्ष्य का परित्याग कर दोगे, तब सारा ध्यान स्वतः ही मार्ग पर केन्द्रित होगा। मार्ग आनन्द लेने के लिए होता है, लक्ष्य का ख्याल स्वतः ही रख लिया जायेगा।
जब तुम जीवन की लक्ष्यहीनता को समझ लोगे, तूम जीने का अर्थ समझ जाओगे। जब तक तुम यह नहीं समझोगे, तब तक तुम अपना जीवन अचेतन रूप में जीते हो। तुम बिना उचित जागरूकता के जीते हो। तुम एक ठोस अहंकार के साथ जीते हो, जो केवल लक्ष्य देखता है और स्वयं जीवन की खूबसूरती नहीं देखता।
लक्ष्य के लिए पूरे जीवन का बलिदान कर देना जीवन जीने का तरीका नहीं है। यदि तुम इस तरह से जीवन जिओगे, तो एक बार जब अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लोगे तो तुम्हें केवल पश्चाताप होगा कि संपूर्ण जीवन तुमने कितनी महत्वहीन चीजों को प्राप्त करने में बर्बाद किया। अपने लक्ष्य का परित्याग करो और मार्ग का आनन्द लो। इस शिक्षा पर बार-बार ध्यान करो। सत्य तुम्हारे ऊपर प्रकाशित होगा किसी भी समय।
एक बात और : अपने जीवन से कोई भी चीज बाहर मत निकालो और ये कभी मत सोचो कि तुम जीवन में किसी चीज से वंचित किये गये हो। आध्यात्मिकता छोड़ना नहीं है वह हमेशा ग्रहण करना है। जब तुम जीवन में किसी चीज को छोड़ेगे, तब तुम उसी चीज से वंचित महसूस करोगे, बजाए इसके जुड़ो और हर चीज को जोड़ो। तब तुम संपूर्ण बनोगे। जब तुम संपूर्ण हो जाते हो तब तूम पवित्र हो जाते हो।
निश्चित रूप से, यदि तुम्हारी रुचि कुछ चीजों में नहीं है, तो ये दूसरी बात है। तुम्हें इस बात के लिए चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है उन चीजों को अपने जीवन में ग्रहण करने की। मात्र क्रियाशील रहो सजगता से और बहते रहो।
समझो : एक वैज्ञानिक वह व्यक्ति होता है जो किसी सूत्र का निर्माण करता है, किसी चीज को पैदा करने के लिए जिसकी उसने खोज की है वाह्य जगत में, दूसरों को अनुभव करने के लिए।
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कल शाम को उन्हें यहाँ से छोड़ देंगे। क्या मैं जान सकती हूँ कि मैं किससे बात कर रही हूँ?''
इधर से उत्तर दिया गया, "मैं चन्दबासू बोल रहा हूँ। तुम लोग मरीजों से यहाँ कुछ नहीं बताते हो। ''
यह बुद्धिमत्ता है। जब तुम लम्बे समय तक किसी बिन्दू पर नहीं अटके रहते। जब तुम बहुत समय तक चुनौतीपूर्ण ढंग से नहीं रुके रहते, तब तुम बुद्धिमान होते हो।
अब तुम यह सुनो :
एक आदमी अपने शहर के मित्र को अपने खेतों पर ले गया।
उसने घुमकर के उसे दिखाया और बाद में उससे पूछा, "यह सब देखकर आश्चर्य हुआ होगा तुम्हें, इतनी अधिक भेंडें। क्या तुमने उन्हें गिनने का प्रयास किया?''
मित्र ने उत्तर दिया, "अरे हाँ, वे तीन सौ थी।"
वह व्यक्ति आश्चर्यचकित था और पूछा, "तुमने कैसे इन्हें गिन लिया?" मित्र ने उत्तर दिया, "अरे, ये तो बहुत सरल था मैंने सबके पैर गिन लिये और चार से भाग दे दिया।"
ये बुद्धिमत्ता नहीं है। यह तरीका है किसी सरल चीज को जीवन में कैसे जटिल कैसे किया जाता है।
Section 31
इसके पश्चात हम निश्छलता पर आते हैं : बच्चे सबसे अच्छा तरीका है निश्छलता को समझने के लिए। वो बोलते हैं बिना तोड-मरोड के, वो गणना नहीं करते, वे अपने व्यवहार में पूर्ण होते हैं, कभी कुटिल नहीं होते और दिखावा नहीं करते। ये निश्छलता है।
लेकिन हम उनके साथ क्या करते हैं? हम अपना सारा प्रयास करते हैं उन्हें ये सिखाने में कि किस तरीके से शब्दों की काट-छाँट की जाये, और किस तरीके से तोड़-मरोड़ किया जाये। हम उन्हें सिखाते हैं अपने हृदय से मस्तिष्क की तरफ जाना, जिसके फलस्वरूप उनकी शुद्ध निश्छलता प्रदूषित हो जाती है मस्तिष्क के द्वारा।
एक छोटी कथा :
एक लड़के से बताया गया कि उसी धनी चाची उस दिन उसके घर आ रही है और उसे अच्छे से अच्छा व्यवहार करना है। चाची आयी और एक भव्य दावत उसके सामने रखी गयी।
लड़का लगातार उसे देख रहा था, खाने के दौरान और अंत में उसने पूछा, "चाची, आप अपनी वो चाल कब दिखायेंगी?"
महिला ने पूछा, "कौन सी चाल, प्रिय?"
लड़के ने उत्तर दिया, "मेरे पिताजी कह रहे थे कि तुम मछली की तरह पानी पीती हो।''
बच्चे साधारणतः वह बोलते हैं जो वो महसूस करते हैं। वे स्वच्छंदता से अभिव्यक्ति करते हैं। इसीलिए वो देखने में हमेशा आनन्दित लगते हैं। इसीलिए हमें उनसे आनन्द मिलता है। उनकी निश्छलता हमें आकर्षित करती है। लेकिन हम यह समझ नहीं पाते और उन्हें कुटिल बनना सिखाते हैं, तोड़-मरोड़ करने वाला बनाते हैं। यह है जो हम लगातार करते रहते हैं।
एक छोटा सा बच्चा अपने बाबा के पास गया और पुछा, "बाबा क्या आप सचमुच मेढ़क की तरह बन सकते हो?''
बाबा आश्चर्यचकित हुए और पूछा, ''ऐसा तुम क्यों पूछते हो?''
बच्चे ने ने उत्तर दिया, "मैंने अपने माता-पिता से कहते सुना था कि जब तुम टर्र-टर्र करोगे, तो हम लोगों के लिए कुछ पैसा छोड़ जाओगे।"
हम हर समय पाखंडी रहते हैं। हम स्वतंत्रता से अपने आप को व्यक्त भी नहीं करते। हम सोचते कुछ हैं और बोलते कुछ और हैं, हम कितने बदसूरत हो गए हैं इस कारण से। हमने बस अपनी निश्छलता खो दी है। बच्चे पाखण्डी नहीं होते। वे इतना स्वाभाविक होते हैं। वे खूबसूरत होते हैं, क्योंकि वे स्वतंत्रतापूर्वक अभिव्यक्ति करते हैं।
एक और छोटी कथा :
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एक माता अपने बच्चे को एक दिन के लिए अपने मित्र के यहाँ छोड़ रही थी।
उसने अपने बच्चे से बताया कि ध्यान रहे, शाम को वापस आते समय उसके मित्र को धन्यवाद देना याद रखो।
बच्चा शाम को घर वापस आया, तो माँ ने पूछा उससे कि क्या उसने मित्र को धन्यवाद दिया?
बच्चे ने उत्तर दिया, "नहीं, मैंने धन्यवाद नहीं दिया, क्योंकि जब दूसरी लड़की ने धन्यवाद दिया, तो उसने कहा इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।"
बच्चे ऐसे होते हैं। निश्चित रूप से यह हमारा कर्तव्य है कि हम उन्हें मौलिक चीजें
जैसे सम्मान करना इत्यादि सिखायें, लेकिन मैं तुम्हें यह समझाने का प्रयास कर रहा हूँ कि हमें बच्चों को पाखण्डी नहीं बनाना है। उन्हें खेल को समझने दो और खेलने दो सजगता के साथ, बिना किसी अहंकार के लेकिन केवल सजगता से। उन्हें मौलिक नियम बताओं और बुद्धिमत्ता दो जिससे कि वो अपने आप के लिए चयन कर सके।
एक चीज : बच्चे की निश्छलता उसकी अज्ञानता के कारण होती है। यह निश्छलता एक बच्चे के अन्दर होनी ही है, क्योंकि उसे अभी सामाजिक शर्तों द्वारा प्रभावित होना है। लेकिन एक बार सामाजिक शर्तों का प्रभाव होने लगा और ज्ञान का लाभ होने लगा, बच्चा अपनी निश्छलता खो देगा। लेकिन वह बच्चा फिर से जुड सकता है अपनी उसी निश्छलता से जो उसने सालों में खोयी है, केवल सजगता के माध्यम से। यह निश्छलता जो पुनः प्राप्त की जाती है सच्ची निश्छलता है, क्योंकि ये निश्छलता अज्ञानता के कारण अब नहीं है, यह गहरी समझ से उत्पन्न हुई है।
यह फर्क है बच्चे की निश्छलता और स्वामियों की निश्छलता में। सांसारिक ज्ञान निश्छलता को नष्ट कर देता है और अहंकार का पोषण करता है, लेकिन बुद्धिमत्ता और सजगता ज्ञान को एक किनारे कर सकती हैं और एक बार पुनः निश्छलता को वापस ला सकती है। जब यह होता है, तब तुम समझ लेना तुम मार्ग पा गये।
प्रश्न : स्वामी जी, हम ईश्वर से किस तरह से संबंधित हों?
ईश्वर तुम्हारे लिए कोई अलग सत्ता नहीं है कि तुम उससे संबंधित हो। इसे पहले समझो। वह तुम्हारे सिर के ऊपर किसी स्वर्ग में नहीं बैठा है और प्रतीक्षा नहीं कर रहा है कि तुम उससे संबंध स्थापित करो। वह संसार की हर एक चीज में उपस्थित है, हर चीज उसके द्वारा निर्मित है।
वह ही रचयिता है, वह ही रचना है, उसने ही रचा है, वह ही अनुभव करने वाला है, वह ही अनुभव है और वह अनुभव किया गया है। ईश्वर तो नाम है जो हमने अस्तित्व को दिया है, बस इतना। जब तुम यह समझ जाओगे, तब तुम समझ लेना कि तुमने ईश्वर को अनुभव करना प्रारम्भ कर दिया, तब ईश्वर से संबंध का प्रश्न ही नहीं होगा।
लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैं ईश्वर के निकट होने का अनुभव करता हूँ? मैं उनसे बताता हूँ, कि मैं ईश्वर हूँ। मैं उनसे बताता हूँ, कि वे सब भी ईश्वर है। लेकिन निश्चित रूप से वे इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। वे जानना चाहते हैं कि ईश्वर के निकट कैसे आया जाये। निकट अपने आप में यह अर्थ
बताता है कि कोई दूरी तुम्हारे ईश्वर के बीच में है, जो तुमको और ईश्वर को अलग कर रही है। मैं तुमसे बताता हूँ कि तुम ईश्वर हो। तब कहाँ प्रश्न उठता है निकट आने का? क्या तूम समझ रहे हो मैं क्या कहने का प्रयास कर रहा हूँ? यह कितना सरल है। ईश्वर और कूछ नहीं, बल्कि वह नाम है जो तूमने अस्तित्व को दिया है, और तूम अस्तित्व का ही एक भाग हो।
जब अस्तित्व के साथ तारतम्य बनाकर रहोगे, जब तुमने अस्तित्व के साथ अपना संबंध पा लिया है, तुम ईश्वर हो, बस इतना। जब तूम आत्मीयता की भावना से जियोगे, किसी भी व्यक्ति या किसी भी चीज के साथ जो तम्हारे जीवन के मार्ग में आये, तूम शुद्ध चेतनता बन गये हो। जब तुम वही प्रेम सब के प्रति अपने आस-पास अनुभव करो, बिना इस बात से प्रभावित हुए कि तम उसे जानते हो कि नहीं, तूम अपने अन्दर ईश्वर का अनुभव कर रहे होगे। यह सबसे सरल माप है तुम्हें बताने का कि तुम कितनी दूर हो ईश्वर सजगता से।
जब तुम अस्तित्व के साथ तारतम्य में आना शुरू कर दोगे, तुम अपने अन्तःकरण की आवाज सूनना शूरू कर दोगे। तब किसी मार्ग-दर्शक की आवश्यकता नहीं होगी। तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी लोगों से पूछने की कि क्या किया जाये और क्या न किया जाये। तुम बस जानोगे, तुम्हारी बुद्धिमत्ता हमेशा तुम्हारा मार्ग-दर्शन करती रहेगी। तुम बस बहते रहोगे बिना निर्णय लेने के भार को अनुभव किये हुए। एक स्वामी वह व्यक्ति है जो तुम्हारे अन्तःकरण की आवाज को जाग्रत कर सकता है। वह तुम्हारे ऊपर कार्य करता है, तुम्हारी बुद्धिमता को जगाने के लिए।
हममें से अधिकतर प्रेम कर सकते हैं किसी कारण से। इतना शक्तिशाली हमारा अहंकार है। यदि तुम इस तरह के हो, तो बहत स्पष्ट हो तुम बहुत दूर हो ईश्वर से। हम दावा करते हैं कि हम अपने परिजनों और मित्रों पर प्रेम की वर्षा करते हैं। बस देखों, उन स्वामियों की तरफ जो अब तक इस पृथ्वी ग्रह पर हुए वह कौन सा समान गुण था उनके अन्दर, जिसने उन्हें इस मुहिम पर चलाया, शुद्ध प्रेम, बस इतना। यदि उन्होंने उसी साधारण प्रेम का अनुभव किया होता, जो तुम दिन-प्रतिदिन के जीवन में करते हो, तो क्या तुम सोचते हो कि वो इतने बड़े मुहिम को चला सकने में सक्षम होते?
क्या यह संभव है कि एक विश्वव्यापी मुहिम मात्र साधारण प्रेम से स्थापित किया जाये? यह साधारण प्रेम कितनी दूर तक हमें ले जायेगा? वह तो तुम्हें बहुत जल्दी थका देगा। यदि स्वामियों ने समय-समय पर सारे संसार में घूमकर जीवन परिवर्तित किये हैं, तो इसका कारण ईश्वरीय प्रेम है और एकरूपता है जिसको उन्होंने हर एक मानव के अन्दर देखा, जो इस प्रथ्वी ग्रह पर है।
वास्तव में, यदि तुम उनके जीवन वृत्तांत पढ़ो, तो तूम देखोगे कि उनमें से करीब-करीब सब ने अपने परिवार को एक किनारे कर दिया, अपने परिवार का कोपभाजन बने हैं है फिर भी बाहर निकले हैं लोगों से मिलने के लिए। परिवार हमेशा इन चीजों का विरोध करता है। निश्चित रूप से एक बार परिपक्वता और सजगता आ जाती है उनके अन्दर, तब वे भी बाकी संसार की तरह अनुसरण करते हैं।
कोई भी चीज जो तुम्हें ईश्वर से अलग होना महसूस कराती है, वह अहंकार है। यदि अहंकार होगा तब तूम निरंतर प्रेम नहीं कर पाओगे उसी गहरी भावना से हर समय, तुम्हारा प्रेम आत्मपरक होगा। वह झूलता रहेगा दो अंतिम परम के बीच में।
स्वामी के शरीर की भाषा को ध्यान से देखो और तुम जान जाओगे कि ईश्वरीय प्रेम से तारतम्य क्या है? अस्तित्व के साथ तारतम्य बनाने का सबसे सरल तरीका यही है कि तुम स्वामी के शरीर की भाषा को देखो। एक स्वामी अस्तित्व के साथ तारतम्य में हर समय रहता है। वह हर समय अपने अन्दर से प्रेम का ही प्रसार करता है, यह देखे बिना कि कौन उसके सामने बैठा है। जब तुम स्वामी के शरीर की भाषा को देखोगे, तो उसके पीछे जो गुण होते हैं उनको ग्रहण करोगे। यदि तुम स्वामी को लम्बे अंतराल तक ध्यान से देखो, तो तुम यह सीख सकोगे कि कैसे नदी की तरह बहा जाता है खूबसूरती के साथ, संगीतमय तरीके से, अस्तित्व से तारतम्य बनाते हुऐ। उसका हर कदम पूरी तरह से अस्तित्व के साथ सामंजस्य लिए हुए होता है। इसीलिए उसे देखना इतना खूबसूरत लगता है। स्वामी को देखकर के मात्र तुम समझ सकते हो और अनुभव कर सकते हो, अस्तित्व की खूबसूरती।
Section 32
क्योंकि स्वामी अहंकार रहित होता है, इसलिए वह बिना व्यवधान के बहता है। क्योंकि उसे 'मैं' और 'मेरा' के प्रति कोई सजगता नहीं होती इसलिए वो बहता है। क्योंकि वो प्रेम का ही प्रसार करता है और कुछ नहीं, इसलिए वह उपचार भी करता है। उपचार और कुछ नहीं, बल्कि प्रेम का केन्द्रीकरण है। यही कारण है कि हम समय-समय-समय पर सुनते हैं स्वामियों के उपचार करने की चमत्कारित शक्ति। इसीलिए स्वामियों को ईश्वर की तरह देखा गया है। बहुत स्पष्ट रहो : स्वामी लोग केवल जीवित ईश्वर हैं, वे अंतिम ऊर्जा का सर्वोत्तम प्रदर्शन हैं।
इसलिए ईश्वर से कैसे संबंधित होगे इस बारे में चिंता करना बंद करो। अस्तित्व के साथ सामंजस्य स्थापित करो और ईश्वर बन जाओ।
याद रखो, तुम अस्तित्व पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते। तुम केवल अस्तित्व से
पराजित हो सकते हो। जब तुम अपने अहंकार का परित्याग कर दोगे, अस्तित्व ने तुम पर विजय प्राप्त कर ली, बस इतना। जब तुम ईश्वर के लिए उचित गर्भ बन जाओगे, वो तम्हारे अन्दर आते रहेंगे। शुरू की स्थिति में तुम एक मेहमान हो और वह एक मेजबान और अंत में तुम बन जाओगे मेजबान और तुम्हारे पास वह गर्भ होगा, जिसमें तुम उसका स्वागत कर सको। गर्भ बन जाने का अर्थ है पिघलकर के कोमल बन जाना। कोमलता से तात्पर्य यहाँ इस बात से है कि तुम अपने समस्त अहंकार का परित्याग कर दो और समाहित हो जाओ ईश्वर में या अस्तित्व में। तब जीवन एक संगीत बन जायेगा और शाश्वत उत्सव।
हाँ…….अब हम एक खूबसूरत और बहुत प्रभावशाली ध्यान तकनीक करेंगे, जिसे दिव्य नेत्र ध्यान कहते हैं, जो इस आज्ञा चक्र के लिए हैं।
दिव्य नेत्र ध्यान
(काल अवधि : 30 मिनट)
दिव्य नेत्र ध्यान किया जाता है आज्ञा चक्र को जाग्रत करने के लिए। आज़ा चक्र को जाग्रत करने से तुम जूड़ जाते हो ब्रह्माण्डीय बुद्धिमत्ता से। इस साधना तकनीक को जोरोस्ट्रियन धर्म से लिया गया है। इस तकनीक के दो भाग है -एक आज्ञा चक्र को स्वच्छ करना और दूसरा ऊर्जावान बनाना। आज्ञा चक्र या तीसरा नेत्रा भ्रम और तुष्णा को नष्ट करने वाले के रूप में जाना जाता है। यह तम्हारे अन्दर पराचेतनता को जाग्रत करने में मदद करता है। यहाँ तम्हारे सामने एक प्रार्थना दीप जलाया गया है। उसे तिल का तेल इस्तेमाल किया गया है या शुद्ध गाय के दूध का मक्खन। तुम एक मोमबत्ती भी इस्तेमाल कर सकते हो, लेकिन ध्यान रहे कि वो वनस्पति तेलों से ही बनी हो। यह निर्देशन में की जाने वाली साधना तकनीक है। बस मेरे निर्देशों का ध्यान से पालन करो।
आराम से जमीन पर बैठ जाओ और नेत्र बंद कर लो। जो जमीन पर नहीं बैठ सकते, वह कूर्सी पर बैठ जाये।
(मंद संगीत बज रहा है।)
अपने आज्ञा चक्र पर ध्यान केन्द्रित करो जैसे कि उसमें छेद करोगे। (5 मिनट) अपने नेत्र खोलो और दीपक की लौ को अपने तीसरे नेत्र से देखो, जो तुम्हारे भौवों के मध्य है। तुम्हारी आँखें झपकें या जलें या आँसू बहें उन्हें बहने दो और ऐसा होने दो। (५)मिनट)
अपने नेत्र पुनः बंद करो और आज्ञा चक्र पर केन्द्रित करो और गहराई से उसमें ध्यान करो। (5)मिनट)
अपने नेत्र खोलो और दीपक की लौ को देखो, अपने तीसरे नेत्र से। (5 मिनट) अपने नेत्र बंद करो, अपने आज्ञा चक्र पर ध्यान केन्द्रित मत करो, बस आराम करो। (5) मिनट) ओम शांति शांति शांति ही धीरे, बहुत धीरे अपने नेत्र खोलो। अब हम दूसरे चक्र में मिलेंगे। धन्यवाद

| अध्याय 9 |
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| असंतौष स्वै कृतज्ञता तक |
अध्याय - 9