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2. मणिपूरक शुद्धिक्रिया

# मणिपूरक शुद्धिक्रिया

(काल अवधि : 30 मिनट)

मणिपूरक शुद्धिक्रिया एक साधना तकनीक है जो प्राचीन ईसाई धर्म से ली गई ਹਪ੍ जिसे ग्लासालोलिया तकनीक के रूप में भी जाना जाता है। जो बाद में सुफियों द्वारा प्रयोग किया गया "गिबरिश" के नाम से। यह तकनीक आपको आपकी बहुत गहराई से अंतर्निहित नकारात्मक मानसिक स्वरूप और चिंताओं से मुक्त कर देगी। यह आपको आपके दबे हुए क्रोध और चिंताओं के भावों से मुक्त कर देगी। एक बार आप इस तकनीक का प्रयोग करोगे, आप मणिपूरक क्षेत्र में अपने आप को बहुत हल्का महसूस करोगे - नाभिक्षेत्र, आपकी चिंताओं और जटिल मानसिक स्वरूप का क्षेत्र। इस साधना को करने के बाद, ये आपके ऊपर होगा कि आप नयी चिंताओं को इकट्ठा करते हो और अपने मणिपूरक को पुनः भारग्रसित करते हो।

इस तकनीक को खाली पेट किया जाना चाहिए, या कम से कम भोजन के दो घण्टे बाद अन्यथा उल्टा होने की संभावना है।

खडे होकर के अपने नेत्र बंद करो। अपने मणिपूरक क्षेत्र में गहराई तक जाओ और उस क्षेत्र का भारीपन महसूस करो। वह आपकी समस्त चिंताओं से भरा हुआ है। अपना ध्यान मणिपूरक चक्र पर एक मिनट के लिए केन्द्रित करो मात्र यह अनुभव करने की कोशिश करो कि आपके अन्दर कितना क्रोध और कितनी चिंता विभिन्न कारणों से भरी हुई है।

अब अपने नाभिक्षेत्र में बिना मतलब की आवाजें पैदा करना शूरू करो जितनी जोर से कर सको। शब्दों का प्रयोग चिल्लाने के लिए मत करो। यदि शब्दों का प्रयोग करोगे तो परिचित और तात्कालिक भाव ही उभरेंगे और एक बात और होगी कि शब्द केवल शब्द को जन्म देंगे उनके पीछे की भावनाओं पर कोई प्रभाव नहीं होगा। पूर्णता से चीखो "गिबरिश" : केवल यह आपके अन्दर अवचेतन को खोलेगी, केवल यही आपके अन्दर के गहराई से छुपे हुए भावों को खोलेगी। अपने हाथ हिलाओ, चिल्लाओ, चीखो यदि आँसू निकल आते हैं तो बहने दो।

इसे अपनी पूरी शक्ति से करो, अपनी सारी नकारात्मक भावनाओं को उल्टी कर दो। याद करो उन दू:खद घटनाओं को। स्मरण करो उन लोगों का जो इसमें सम्मिलित थे और उन भावनाओं का जो इन घटनाओं से जड़ी हुई थीं। सारे भावों को बाहर लाओ अपने आप पूर्णतः दूबकर। किसी अन्य चीज के प्रति सजग मत रहो।

20 मिनट बीतने के पश्चात, रुको अपने बंद नेत्रों के साथ शांति से बैठ जाओ और 10 मिनट तक बैठे रहो। अपने विचारों के प्रति मात्र साक्षी रहो। अपने मणिपूरक क्षेत्र में हल्कापन अनुभव करो आप ये देखोगे कि वो कितना हल्का है और परमानन्दित है। आपका पूरा स्वरूप हल्का और स्वतंत्र होगा। (मणिपूरक शुद्धिक्रिया, संगीत के साथ पूरा समूह अभ्यास करता है।) (स्वामी) जी के लिए प्रार्थना............) ओम् शांतिः शांतिः शांतिः

बहुत धीरे-धीरे अपने नेत्र खोलें। अब हम दूसरे सत्र में मिलेंगे। धन्यवाद

DeOÙeeÙe - 5

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जो व्यक्ति इस विषय से बचना चाहता है उसे इसके बारे में कोई ज्ञान नहीं है, वह प्रवेश करना प्रारम्भ करेगा। केवल तब वो आपको यह दिखाना शुरू करेगा आप यह भी नहीं जानता कि वो खांई कहाँ है- तो उससे बच कैसे सकता है। जो वास्तव में हो क्या। यह एक कठिन कार्य है गुरु के लिए क्योंकि आप अपने मार्ग पर बहत आगे तक जा चुके रहते हो। आप इतना ज्यादा प्रगति कर जाते हो व्यक्ति इसके विषय में लिप्त हो जाता है वह उस खांई के बारे में तो जानता है, परन्तू दूसरा कोई मार्ग नहीं जानता सिवाए इसके कि सीधे उसी में कूद पड़े। अपने मार्ग में कि आपको आश्चर्य होता है कि आप कैसे गलत मार्ग पर हो सकते हो। क्या इन दोनों में से कोई एक भी समाधान हो सकते हैं? किया क्या जाए? अब हम विषय पर वापस आते हैं : काम क्या है? खाई जगह स्थित है यह बात पहले किसी को जाननी होगी, और तब उससे बचने के लिए सही कदम उठाने होंगे। काम एक प्रचण्ड रचनात्मक ऊर्जा है। यह एक ध्यानमय ऊर्जा है। संपूर्ण विश्व की उत्पत्ति काम ऊर्जा से ही हुई है। काम के प्रसंग को हमेशा छुपा के रखा गया है। यह एक ऐसा विषय है जिसके पीछे एक पूर्वाग्रसन, मनाही है। अभिभावक अपने बच्चों के सामने खूलकर के हमारे प्राचीन जाग्रत स्वामियों ने, ऋषियों ने, इस विषय पर प्रकाश डालकर, स्पष्टता दी है। क्या आप जानते हो कि वात्स्यायन- जिन्होंने कामसूत्र की इसकी चर्चा नहीं कर सकते। सर्वप्रथम, अभिभावक स्वयं ही इस विषय के अन्तर्निहित तथ्यों को नहीं जानते। किसी एक विषय पर, आपको किसी विशेषज्ञ रचना की, वह पुस्तक जो काम विज्ञान पर है- वह एक सन्यासी थे, वह एक से पूछना पड़ेगा, अन्यथा आप सही समझ से चूक जाओगे और यदि आप सही ब्रह्मचारी थे। समझ से चूक गए, आप गलत समझ लोगे। उन्होंने कामसूत्र का पहला व्याख्यान अपनी माता के समक्ष ही सूनाया, यह एक एक छोटी सी कथा : तथ्य है। आत्मज्ञान प्राप्त करने के पश्चात्, एक दिन वो अपनी माता के पास वापस आये। उनकी माता ने उन्हें बताया कि यदि वह आत्मज्ञानी हो चुके हैं, तब एक महिला को उसके लड़के के स्कूल अध्यापक का एक पत्र प्राप्त हुआ। उन्हें इस पृथ्वी ग्रह पर किसी भी विषय पर गहरी पकड़ होनी चाहिए। अध्यापक ने लिखा था कि लड़का श्यामपट को स्पष्टता से देखने में उन्होंने सहमति व्यक्त की और अपनी माँ से पूछा कि वह क्या सुनना पसन्द असमर्थ है इसलिए लिखने में गलितयाँ करता है। करेंगी। महिला तुरन्त लड़के को नेत्र चिकित्सक, डाक्टर के पास ले गयी। उनकी माता ने कहा, "आपकी माता के रूप में, मैं जानती हूँ कि जन्म से आप चिकित्सक ने लड़के का निरीक्षण किया और पर्ची लिख दी। उसमें ब्रह्मचारी हो। इसलिए कोई संभावना नहीं है कि आप काम विषय के बारे में कुछ लिखा था : बाल कटा लो! जानो। क्या आप मुझे उस विषय के बारे में कूछ बता सकते हो?'' हम इस बात पर हँसते हैं, परन्तु आपसे बताता हूँ, अपने जीवन में यदि आप वात्स्यायन मूस्कूराए और कामसूत्र को प्रकट किया - काम का विज्ञान। देखो : यदि पहले प्रयास में ही आप सही व्यक्ति के पास जाओ, आपको सही वात्स्यायन से एक बार प्रश्न किया गया, "आपको क्या अधिकार है इस विषय समाधान मिल जाएगा, अन्यथा आप चक्कर काटते रहोगे पीछा करते हुए पर बोलने का?'' निरर्शक उपायों का, जिनकी वकालत तथाकथित विशेषज्ञ करते हैं और आप एक संभावित प्रश्‍न। मैं सोचता हूँ कि आप भी मौन होकर के यही प्रश्‍न मुझसे भी अपने जीवन को व्यर्थ करोगे। पुछना चाहते होंगे। इससे भी बूरा होगा, जब आप उसी ज्ञान की वकालत भविष्य में आने वाली जो उत्तर वात्स्यायन ने दिया था, मैं उसी उत्तर का अनुवाद आधुनिक भाषा में पीढि़यों से करोगे। और यह प्रथा बन जाती है। जब आप प्रथा को लागू कर देते आपके लिए कह रहा हूँ, एक आधुनिक उदाहरण का प्रयोग करते हुए : हो, उसे तोड़ने का कार्य एक टेड़ीखीर हो जाता है क्योंकि प्रथा कूछ वर्षों के एक विद्युतकर्मी जो आपके घर आता है, यह बात निश्चित रूप से जानता है कि पश्चात एक सत्य मान ली जाती है। हर कमरे की विद्युत स्विच को बंद करने या खोलने पर क्या होगा। जब गुरु का आगमन होता है, उसका पहला कार्य होता है कि वह आपके साथ वह जानता है अच्छी तरीके से विद्युत के तारों के जाल को जो दीवार के अन्दर अब तक जो भी किया गया है उसे खत्म कर दे। केवल तब वह आपके अन्दर बिछा हुआ है।

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यदि कोई समस्या होगी, तो वह ढँढकर के उस संभावित का समाधान कर देगा, क्या ऐसा नहीं है?

वह विद्युत के विज्ञान को समझता है।

और एक तरफ आप हो, जो, पचासों बार दिनभर में स्विचों को दबाते रहते हो बिना वास्तव में जाने हुए कि उनके पीछे होता क्या है! क्या मैं सही हूँ?

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हममें से ज्यादातर लोग इस बात से ज्यादा और कुछ भी नहीं जानते, स्विच को कैसे ऑन-ऑफ किया जाता है। यही कारण है हमें कभी-कभी विद्युत का झटका भी लगता है! तो, समझो : हम पिता हो सकते हैं, माताएँ हो सकते हैं, घर के बुजुर्ग हो सकते हैं - परन्तु अब भी, हम काम के बारे में कुछ नहीं जानते।

हम लगातार एक भावनात्मक प्रताड़ना से प्रभावित रहते हैं। दूर-दर्शन व मीडिया के अन्य स्रोत विभिन्न रूपों में काम विषय पर लोलुपता का निरूपण करते हैं और हम उसे देखकर समझते हैं कि प्रेम व काम के बारे में हम सब जानते हैं। केवल एक जाग्रत व्यक्ति ही, आपको काम के विज्ञान के बारे में बता सकता है। भारत की, भूमि और धन को वर्षों से लूटा जाता रहा है। हर आक्रमण के बाद इनमें से किसी लूट ने इस देश का इतना बड़ा नुकसान नहीं किया, इन सब चीजों को अर्जित किया गया और समाज पुनः उठ खड़ा हुआ। लेकिन, अन्ततः जब हमारी गुरुकुल प्रथा- प्राचीन दिनों की गुरु के चरणों में बैठकर के अध्ययन करने की प्रथा, खत्म कर दी गयी और कामसूत्र - काम का विज्ञान - बच्चों को पढ़ाया जाना बंद कर दिया गया। भारत के ऊपर यह सबसे बड़ी चोट थी, यही है जहाँ लोगों ने काम के अर्थ को समझना बंद किया और लिप्सा और लोलुपता के पीछे भागने लगे।

कभी आपने दो लोगों को शतरंज खेलते देखा है? जब आप मात्र खेल को देख रहे होंगे, कई बार आपको सही चाल का ध्यान आया होगा - मगर किसी तरह दोनों खिलाड़ियों द्वारा वैसे नहीं खेला जाता। आप में से कितनों ने ऐसा अनुभव किया है? क्या सोचते हो इसका क्या कारण होगा? मुझे बताओ ………………

क्योंकि हम उस खेल में शामिल नहीं रहते स्वामी जी?

हाँ वास्तव में, जो व्यक्ति मात्र साक्षी होता है वह जीतने के भाव के दबाव में नहीं रहता। दबाव व तानव मस्तिष्क को सूस्त कर देता है। तो केवल वह व्यक्ति जो खेल से बाहर हो, जो मात्र दृष्टा ही तुम्हें उसके बारे में सही राय दे पाएगा। स्वामी ही हैं वो जो पूर्णता से सब कुछ जानता है। इसीलिए वह विषय पर एक विशेषज्ञ बन जाना है।

तो काम है क्या?

आज, जीव-विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि कोई पूरुष सौ फीसदी पूरुष नहीं है और कोई महिला सौ फीसदी महिला नहीं है। एक पुरुष 51 वर्ष फीसदी पूरुष है और 49 फीसदी महिला। उसी तरह एक महिला 51 फीसदी महिला है और 49 फीसदी पूरुष, मात्र एक फीसदी का फर्क है।

आपने पिता के मूलाधार और अपनी माता के मूलाधार से जन्म लिया है। तब, आप कैसे केवल पुरुष या केवल महिला हो सकते हो? आपके अन्दर दोनों के गुण होने ही ही चाहिए। क्या ऐसा नहीं है?

भगवान शिव के अर्द्धनारीश्वर स्वरूप का प्रतीक, इसी आधार पर है- वह स्वरूप जो अर्द्ध पुरुष है व अर्द्धनारी। चाहे हम स्वीकार करें चाहे न करें, हम एक सम्मिश्रिण हैं पुरुष और महिला दोनों ऊर्जाओं के। हम संपूर्ण हैं, बँटे हुए नहीं। काम का विषय तंत्र में बहुत अच्छी तरह वर्णित है। धर्म ग्रंथों में, भगवान शिव ने देवी पार्वती से इस विषय पर बातें कीं। ये बातें जो पाँच हजार वर्षों से पूर्व में कही गयी वो जीव-विज्ञान में आज भी प्रासंगिक है।

पूर्णता को प्राप्त होने के लिए और पूरा होने के लिए, यह आवश्यक है कि हम अपने स्वभाव के नारी व पुरुष दोनों भावों को स्वीकार कर सकें और व्यक्त कर सकें।

लेकिन क्या ये सम्भव है? क्या हम इस तरह से अभिव्यक्ति स्वीकृत हो सकती हैं ?

ठीक जन्म के क्षण से, समाज आपको पुरुष या स्त्री के रूप में परिभाषित कर देता है और आपसे अपेक्षा करता है कि उसी के अनुरूप व्यवहार करो।

समाज इस बात की अनूमति नहीं देता कि लड़के अपने स्त्रियोचित पक्ष की अभिव्यक्ति करे, या लड़कियाँ अपने पूरुषोचित पक्ष की अभिव्यक्ति करे। हमारी कम उम्र से ही, हमारे स्वरूप का आधा भाग दबा हुआ रहता है।

7 वर्ष की आयु तक, जब तक कि सामाजिक व्यवस्था हमारे अन्दर गहरी जड नहीं पकड़ लेती, बच्चा इस बात से भिज्ञ नहीं होता कि वह पूरुष है या स्त्री इसीलिए बहूत कम उम्र का बच्चा अपने अन्दर पूर्णता का बोध लिए हुए होता है और सूरक्षित। वह देखने में इतना खूबसूरत और आनन्ददाय लगता है। 7 वर्ष की अवस्था के आस-पास बच्चा साामजिक नियंत्रण में आ जाता है।

एक लड़का गूड़ियों से और रसोई की सामग्री के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता। एक लड़की को असहमत की दृष्टि से देखा जाता है जब वो राकेट, रेस कार से खेलना चाहती है। यहाँ तक कि जब उनके कपड़ों के रंग का प्रश्न पैदा होता है, वहाँ भी फर्क किया जाता है। आप लड़कों के लिए नीला और लडकियों के लिए गूलाबी चुनते हो। है न?

पूर्व के दिनों में, माता-पिता की जिम्मेदारी केवल संतान को जन्म देना ही था। चार वर्ष की अवस्था में, उन्हें गुरुकुल में स्वामी के पास छोड़ दिया जाता था। गुरुकुल में, बच्चों को गायत्री मंत्र सिखाया जाता था- बुद्धि को प्रकाशित करने की प्रारम्भिक प्रार्थना- 7 वर्ष की अवस्था पर। यदि 14 वर्ष की अवस्था तक उन्हें कोई आध्यात्मिक अनुभव हो जाता था तो उन्हें ब्रह्मसूत्र सिखाया जाता था-विश्व दर्शन पर सबसे महान पुस्तक, अन्यथा उन्हें कामसूत्र सिखाया जाता था-काम का विज्ञान, जिससे वे पारिवारिक जीवन की कला सीख सके। यदि वे 21 वर्ष की अवस्था तक जाग्रत हो गए, तो उन्हें सन्यास की तरफ प्रोत्साहित किया जाता है। यदि नहीं, तो उन्हें योगशास्त्र सिखाया जाता था। इस तरह से बच्चे को अपने तरीके से उभरने दिया जाता था एक स्वामी के मार्गदर्शन और प्रेम की छत्रखाया में।

परन्तु आज, इतनी कठोर परिस्थितियाँ हैं जो बच्चे के अन्दर तक प्रवेश कर जाती हैं, जो इतनी ज्यादा हानिकारक होती हैं उसके लिए। बच्चा, अपने उस भाग को दबाना शुरू करता है, जिसे समाज अनुमति नहीं देता है। हम इसे महसूस नहीं करते, परन्तु यह काल बच्चे के लिए अत्यन्त पीड़ादायक होता है। उसे अचानक लगता है कि जड़ से उखाड़ दिया गया है, अपने स्वरूप के आधे भाग से अलग कर दिया गया है। वह अपने उस आधे दबे हुए भाग को खोजना शुरू करता है, वाह्य जगत में।

आप देखो : मनुष्य की अन्तर्निहित प्रकृति परिपूर्णता है। वह परिपूर्णता से आया है और उसी परिपूर्णता को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता है तो वह शुरू करता है सुषुप्तावस्था में खोजना, उस खोये हुए आधे भाग को, दबा हुआ आधा भाग। वह वाह्य जगत में देखना शुरू करता है अपने उस खोये हुए आधे भाग को प्रतिस्थापित करने के लिए। एक लड़का एक लड़की की उपस्थिति खोजता है और एक लड़की एक लड़के की उपस्थिति खोजती है।

यही वो स्थान है जहाँ काम का विचार प्रारम्भ होता है। यही वो तरीका है जिससे काम जड़ पकड़ता है।

7 वर्ष से 14 वर्ष के काल में, बच्चा अपने माता-पिता के सबसे ज्यादा नजदीक होता है। उन्हीं से बच्चा उन स्वरूपों को इकट्ठा करता है कि आदर्श पुरुष और आदर्श नारी कैसे होने चाहिए। एक लड़के के लिए, उसके दबे हुए आधे भाग के व्यक्तित्व में उसकी माँ का स्वरूप आ जाता है और एक लड़की के लिए उसके दबे हुए आधे भाग के व्यक्तित्व में उसके पिता का स्वरूप आ जाता है।

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यही कारण है कि हर लड़के के लिए पहली नायिका उसकी माँ होती है और हर लड़की के लिए पहला नायक उसका पिता होता है। यह एक अलिखित कानून है। फ्रायडियन मनोविज्ञान के तथाकथित ओडीपस और ओफेलिया भावों (COMPLEXES) के पीछे यह गहरी मूल खोज ही, आधार है। एक लड़का अपनी पत्नी से उसी देखभाल की, उसी परवाह की अपेक्षा करता है जो उसने अपनी माँ से पाया था और एक लड़की अपेक्षा करती सुरक्षा और आश्वासन की अपने पति से, जो उसने अपने पिता से पाया था।

दूटे हुए घरों में, जहाँ बच्चे अपने अन्दर एक अपूर्णता का भाव लिए रहता है, क्योंकि माता या पिता का प्रभाव पहला और सबसे गहरा होता है। बहुत काल के बाद चाहे आप वयस्क ही क्यों न हो गए हों, चाहे जितने वैचारिक विरोध हों आपके माँ-बाप से, आप अपने स्वरूप के अन्दर से उनके प्रभाव को नहीं मिटा सकते।

14 वर्ष की उम्र में, बच्चा शारीरिक परिपक्वता को प्राप्त कर लेता है। निश्चित रूप से सामाजिक, कानून इस बात की अनुमति नहीं देते कि वह अब विरोधी लिंग वाले के साथ वही घनिष्ठता रखे, और उनकी जीवनशैली भी भिज्ञ हो जाती हैं और वो अपने माता-पिता के साथ उतना समय भी नहीं बिताते।

तो 14 वर्ष की उम्र में खोज शूरू रहती है, परन्तु इस समय वाह्य जगत में आज-कल तो ये सब 14 के पहले ही होने लगा है। आज-कल बच्चे दूर-दर्शन और इण्टरनेट देखने लगे हैं बहुत कम उम्र से। इसीलिए वो तेजी के साथ मानसिक रूप से बढ़ रहे हैं। यह बहुत स्वस्थ लक्षण नहीं हैं। कुछ भी हो, 14 वर्ष की उम्र में वाह्य जगत में खोज शुरू हो जाती है।

बच्चा अब बाहरी लोगों से और मीडिया के विभिन्न माध्यमों से स्वरूपों को इकट्ठा करने लगता है। मीडिया इस बात से पूर्णतः भिज्ञ है। इसीलिए आप देखोगे कि सारे विज्ञापनों में काम अन्तर्निहित है- एक आकर्षक महिला या पुरुष मॉडल के रूप में उस विशेष उत्पाद के लिए चाहे उनका उस उत्पाद से कुछ भी लेना-देना न हो।

करीब-करीब हम मोटर साइकिल का विज्ञापन एक महिला को दिखाता है- और कितनी महिलाएँ हैं जो मोटर साइकिल चलातीं हैं? चाहे जो उत्पाद हो, आप मुस्कुराती हुई एक महिला को उसकी संस्तुति करते हुए पाओगे और जब आप बाजार में जाते हो तो जल्दी से उसी उत्पाद को ले लेते हो- इस बात को भूल जाते हो तब कि महिला उस उत्पाद के साथ नहीं मिलती। जैसे साधारणतः (बिस्किट) का विज्ञापन केवल महिलाओं को दिखाता है। यह है मीडिया का तरीका आपकी दबी हुई कामनाओं से पैसा कमाने का।

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मीडिया के हर तरीके और हर रूप और कुछ नहीं केवल स्वप्न बेचने वाले हैं। हम उन्हीं स्वप्नों को इकट्ठा कर लेते हैं और उन्हीं में अपने मस्तिष्क के माध्यम से भागते रहते हैं इस उम्मीद से कि हमारी प्यास बुझ जाएगी। क्या यह संभव है? क्या पानी के लिए आपकी प्यास नमक खाने से बूझेगी? नहीं यदि आप यह करोगे, आपकी प्यास केवल बढ़ेगी, क्या ऐसा नहीं है?

यदि आप सजग और जागरूक हो, कोई भी विज्ञापन पटल आपको मूर्ख नहीं बना सकता। हाँ निश्चित रूप से, उन्हें देखकर के आप यह जरूर जान जाओगे कि बाजार में कौन सी नयी चीज आयी है, इसमें कोई संदेह नहीं, परन्तू वे आपको धोखा नहीं दे पाएंगे।

आप उनके लिए इतने आसानी से प्रभावित नहीं होंगे। आप उन्हें सकारात्मकता से देख सकोगे और उसी रूप में छोड़ भी सकोगे। आप तात्कालिक और अवचेतन खिंचाव उनके प्रति अपने अन्दर महसूस नहीं करोगे। केवल तब जब आप अपने प्रतिक्रियावान मस्तिष्क को निर्णय का अधिकार दोगे, तभी आप परेशानी में पडोगे। आपको अपने प्रतिक्रियावान मस्तिष्क को अपने बुद्धि में सम्मिश्रित करके, प्रज्ञा से काम करना है जिससे आप हर वक्त सजग रह सको। निश्चित रूप से, इस स्थिति को प्राप्त करने में ध्यान साधना आपकी बहुत सहायता करेगी।

और आप देखो, जबकि एक तरफ, मीडिया आपकी परिकल्पनाओं का पोषण कर रही है, दूसरी तरफ समाज आपको दबाने की कोशिश कर रहा है। जितना ज्यादा समाज आपकी परिकल्पनाओं और कामनाओं को दबाने का प्रयास करेगा, उतनी ही ज्यादा वो बढ़ेंगी, क्योंकि समाज का लक्ष्य लक्षणों को दबाना है बिना उनकी जड़ में गए हए। जब आप केवल वुक्ष की शाखाओं को काट देते हो और जड को उसी रूप में छोड़ देते हो, क्या होता है? वह वक्ष और प्रफूल्लित रूप में बढ़ता है, है की नहीं।

जो भी हो, अब इन वर्षों में, हम मीडिया के विभिन्न माध्यमों से विचारों को लेकर के एक परिपूर्ण स्त्री या परिपूर्ण पुरुष का स्वरूप बना लेते हैं। हर व्यक्तियों में से, हम सबसे अच्छी नाक इकट्ठी कर लेते हैं, सबसे अच्छी आँख इकट्ठी कर लेते हैं, सबसे अच्छा व्यक्तित्व इकट्ठा कर लेते हैं और अपने आदर्श व्यक्ति का निर्माण कर लेते हैं। हम काटो और चिपकाओं तकनीक का पालन करते हैं। अपने कम्प्यूटर में आप काटते और चिपकाते रहते हो हर समय, क्या ऐसा नहीं है? यह स्थिति करीब 7 वर्षों तक रहती है, तब तक, जब हम 20 या 21 वर्ष के हो जाते हैं। तब तक मीडिया के द्वारा परिभाषित होते रहना समाप्त हो जाता है-परन्तू तब तक विचार हमारे मस्तिष्क में गहरी जड़ पकड़ चुके होते हैं। तब एक नयी खोज शुरू होती है- एक आदर्श व्यक्ति को पाना अपने वास्तविक जीवन में।

यह वह खोज है जो इस विचार से होती है कि हमारा वो कैसा होगा, कैसा होना चाहिए। यह है जहाँ अपेक्षाएँ शुरू होती है।

अगले 7 वर्षों तक यह खोज चलती रहती है व्यक्ति के बाद व्यक्ति के पीछे हम प्रयास करते हैं और हतोत्साहित होते हैं। कुछ बुद्धिमान लोग कुछ समय बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि स्वप्न वास्तविकता नहीं हो सकते। इसलिए उन्हें स्वप्न कहा जाता है। परन्तु बहुत से लोग खोजते ही रहते हैं।

एक छोटी सी कथा :

एक 90 वर्ष का वृद्ध पुरुष रोज समुद्र के किनारे सुबह से शाम तक लोगों को देखते हुए बैठा रहता था।

एक-दूसरे पुरुष ने उसे देखा और उसके पास जाकर उससे पुछा, "आप प्रतिदिन यहाँ बैठकर वास्तव में करते क्या हो?''

वद्ध पुरुष ने उत्तर दिया, "मैं उस महिला को खोज रहा हूँ, जो मेरी पत्नी बने। "

दूसरा पुरुष बस हत्तप्रभ था इस उत्तर पर और उसने पूछा, "आपने युवावस्था में क्यों नहीं खोजा?''

वृद्ध पुरुष ने उत्तर दिया, "मैं जब 30 वर्ष का था, तब से खोज रहा हँ।" दसरा पुरुष अचम्भित था और पुछा, "आप किस तरह की महिला को खोज रहे हो?"

उसने उत्तर दिया, "मैं आदर्श महिला को खोज रहा हूँ।"

"और आपको एक भी नहीं मिली", दूसरे ने कहा।

वृद्ध पुरुष ने उत्तर दिया, "मैंने एक महिला को पाया था, जो मेल खाती थी उससे, जो मेरे दिमाग में था लेकिन उसके साथ बहुत दिन अच्छा नहीं चला।"

दूसरे पुरुष ने पूछा क्यों?

वृद्ध पुरुष ने उत्तर दिया, "वो आदर्श पुरुष खोज रही थी।"

हम जब भी अपने लिए हुए किसी स्वरूप का आदर्श जोड़ा खोजने का प्रयास करते हैं तो यही होता है।

लेकिन काफी लंबी खोज के बाद, हमें अचानक एक व्यक्तिम मिलता है जो लगता है हमारे मानसिक स्वरूप के अनुरूप है। हमारे मस्तिष्क में जो तस्वीर है वह हरी है - और वह व्यक्ति जिसे हम देखते हैं वो भी दूर से हरा लगता है और तब, सब कूछ हरा हो जाता है। ऐसा लगता है जोड़ा मिल गया।

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Section 4

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174

आप देखो, ऐसे कई प्रकरण होते हैं जब कोई व्यक्ति सनकी तरीके से या अवांछित तरीके से व्यवहार करना शुरू कर देता है। वो अपवाद स्वरूप में होता है जब कहीं आपको यह निर्णय लेने की आवश्यकता पड़ जाए कि ऐसे व्यवहार के साथ जिया जा सकता है या नहीं। मैं जो कह रहा हूँ वह ऐसे में लागू नहीं होता, क्योंकि अपवाद हर जगह है।

जो मैं कहना चाहता हूँ वो ये है कि वास्तव में आजकल बहुत से घरों में दोनों व्यक्ति सामान्य हैं और फिर भी वास्तविकता यही है कि वातावरण तनावपूर्ण है। परन्तु हम उसे समझने का प्रयास नहीं करते। हम सत्य नहीं करना चाहते। हम एक खुबसूरत कालीन के नीचे छपाकर के उसे अपने आप को छलते हुए उसी पर घूमते रहते हैं।

यदि आपको कोई ताजा घाव हो तो क्या यह सबसे उचित तर्क न होगा कि तत्काल उसका इलाज किया जाए जिससे कि आराम मिल सके? क्या होगा, अगर इसकी जगह पर आप उसे स्वर्ण से और सिल्क के कपड़ों से ढक दो और यह विश्वास करो कि आपके कोई घाव है ही नहीं? यह मात्र मूर्खतापूर्ण होगा, क्या ऐसा नहीं है?

तो समझो मैं क्या कहने का प्रयास कर रहा हूँ। अपनी परिकल्पनाओं का परित्याग करो और वास्तविकता के साथ जीना सीखो।

एक छोटी सी कथा :

एक व्यक्ति ने अपने मित्र को शादी के तोहफे के रूप में एक पिल्ला दिया।

तीन महीने के पश्चात, वह उससे सड़क पर मिला।

"वैवाहिक जीवन कैसा है?" उसने उससे पूछा।

"आह, समय के साथ-साथ छोट-मोटे परिवर्तन बस, इतना ही", मित्र ने उत्तर दिया।

"कैसे परविर्तन?" उसने उससे पूछा।

"शूरू में, आपका पिल्ला मेरे ऊपर भौंकता था, और मेरी पत्नी मूझे अखबार लाकर देती थी। अब, मेरी पत्नी मुझ पर भौंकती है, और आपका पिल्ला मूझे अखबार लाकर देता है।" व्यक्ति ने उत्तर दिया।

एक बार हनीमून समाप्त हो जाने के बाद, क्या होता है? कोई ताज्जूब की बात नहीं है उसे हनीमून (HONEYMOON) कहते हैं और हनीसन (HONEY SUN) नहीं कहते। खुशी को एक पखवाड़ा भी नहीं लगता कम होने में। मैं आपसे बताता हूँ चाहे आप सबसे बड़ी मॉडल से ही शादी क्यों न करो, उसकी खूबसूरती आपकी नजरों में धूँधली पड़ने लगेगी 15 दिनों में ही, क्योंकि आप किसी अन्य चीज की परिकल्पना पहले से ही करते रहोगे और आप कल्पनाशील ही रहते हो क्योंकि आप वास्तव में अपने अन्दर परिपूर्णता खोजते ही हो, परन्तु इस बात से अवगत नहीं रहते कि आप उसे वाह्य जगत में खोज रहे हो विभिन प्रकार के भ्रमों के माध्यम से।

एक दिन एक महिला विवाह के विषय पर अपनी पुत्री को सलाह दे रही थी : "सूनो प्रिय, जब आप किसी से प्रेम करोगी, वह जीवन भर के लिए होना चाहिए, केवल तभी वह सच्चा प्रेम होगा।''

पुत्री सून रही थी जो उस महिला ने कहा था। महिला कहती रही, "मेरी सलाह के ये शब्द ले लो। मैं जानती हूँ मैं किस बारे में बात कर रही हूँ, प्रिय। आखिर, मेरा विवाह तीन बार हुआ है।"

समस्या यह है कि हर व्यक्ति राय देने के लिए तैयार, परन्तु लेने के लिए कोई नहीं। प्रेम, परिकल्पना, दिवास्वप्न और जाने किस-किस विषय पर हर व्यक्ति व्याख्यान देने के लिए तैयार है। परन्तु जब उनके अपने जीवन की बात आती है, क्या हो जाता है सब चीजों को? वह मात्र एक और दिवास्वप्न रह जाता है, बस और कुछ नहीं।

किसी तरह से, अगर मात्र इस बिन्दू पर भी हम सच्चाई को स्वीकार कर लें तो भी कोई समस्या नहीं। परन्तु क्या हम मौन रह जाते हैं? नहीं, हम अपना रंगने वाला व्रश निकालते हैं और सफेद को वापस हरा रंगने का प्रयास करते हैं। हम द्रसरे व्यक्ति को अपने मानसिक स्वरूप के अनुरूप परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं। किसी भी संबंधों में यह सबसे अधिक नुकसान पहुँचाने वाली बात है। हम एक-दूसरे को तराशने का प्रयास करते हैं उस रूप में जिस रूप की हमने परिकल्पना की थी। हम दूसरे पर अधिकार करके उसके स्वामी बनने का प्रयत्न करते हैं और इस तरह उसे पदार्थ में परिवर्तित करते हैं। ऊर्जा को परिवर्तित हम करते हैं पदार्थ में। यहाँ समस्या प्रारम्भ होती है - जीवन में न समाप्त होने वाला युद्ध।

एक छोटी सी कथा :

एक व्यक्ति पेशे से पेंटर था।

वह अपने मित्र को बता रहा था, "आप जानते हो, एक दिन एक लड़की चलकर आयी अपने हाथ में नीले-काले रंग का चिप लिए हुए और वह मुझसे चाहती थी कि उसी रंग में एक मॉडल घर को रंगू। मैंने सोचा इस रंग के मिलाने में तो मुझे अपना पेशा छोड़ना पड़ेगा। उसे कोई भी चीज संतूष्ट नहीं कर रही थी।''

मित्र ने पूछा, "क्या आप अन्ततोगत्वा उस रंग को मिला पाए?"

उसने उत्तर दिया, "मैं भाग्यशाली था। उसके मोबाइल फोन पर किसी का फोन आया और मैंने जल्दी से उस चिप को रंग दिया, जब तक कि वो बातें कर रही थी। "

पूरे दिन भर, हम घर में बस ध्यान से पति-पत्नी को बातें करते हुए सूनो, और आप देखोगे किस तरह से दोनों एक-दूसरे को तराशने में लगे हैं। मैं सोचता हूँ शादियों के बाद, मंगल सूत्र और शादी की अँगूठी की जगह पर छिनी और हथौड़ा दी जानी चाहिए।

एक छोटी सी कथा :

एक शाम एक व्यक्ति और उसका मित्र साथ-साथ चाय पी रहे थे। उस व्यक्ति ने अपने मित्र से कहा, ''मैं अपनी पत्नी को तलाक देने की योजना बना रहा हूँ। उसने पिछले 6 महीनों में मुझसे एक शब्द भी नहीं बोला। ''

मित्र ने कहा, "ध्यान से सोचो इस निर्णय को लेने के पूर्व, आपको इस तरह की दूसरी पत्नी नहीं मिलेगी।''

जीवन में, हम निरंतर प्रयास करते रहते हैं अपने अन्दर के स्वरूप का बाहर की वास्तविकता से मेल करने का। हमें आदर्श मेल कभी नहीं मिलेगा। हमें आवश्यकता है इन स्वरूपों का परित्याग करने का जो हमारे अन्दर है और हमें असीमित संभावनाएँ मिलेंगी।

यदि आप अविवाहित हो, तो अपनी परिकल्पनाओं का परित्याग कर दो, जिससे आप अपना जीवन साथी द्वँढ़ सको न कि स्वप्न का साथी। जब आप किसी व्यक्ति का चयन करो, तो बस अपने आप को याद दिलाओ कि आप उसके साथ अपना समस्त जीवन बिताने जा रहे हो मात्र कुछ महीने नहीं। यह झटके से लिया गया निर्णय नहीं है, यह एक जीवन-पर्यन्त प्रभावी रहने वाला निर्णय है। जैसा कि आजकल, कोई भी काली जींस और नीली टी-शर्ट आपके दिवास्वप्न के संसार में हो सकता है और आप उसके प्रति आकर्षित हो जाओगे। परन्तू एक बात का ध्यान रखना और समझना कि ये काला और नीला हल्का पड़ जाएगा मात्र 6 महीने के समय में।

यदि आप पहले से विवाहित हो, अपनी परिकल्पनाओं का परित्याग कर दो,

केवल और केवल तब आप सच्चा संबंध शुरू कर सकोगे किसी के साथ। यदि आप उसके अन्दर एक छिनी-हथौड़ा लेकर प्रवेश करोगे, एक सच्चा संबंध कभी हो ही नहीं सकता।

आप देखो : ये छिनी-हथौड़ा चलाने से होता क्या है आप इसके चलाना शुरू करते हो और जब आप कार्य पूर्ण कर चुके रहते हो, तब तक आपकी परिकल्पना परिवर्तित हो जाती है अब वह कुछ भिज्ञ हो जाती है तब आपको और छिनी-हथौड़ा चलाना पड़ता है अपनी परिकल्पना से मेल खाने लायक बनाने के लिए और यह न खत्म होने वाला चक्र बन जाता है।

एक संबंध बन ही नहीं सकता, जब तक आपके अन्दर परिकल्पनाएँ हैं। चाहे आप चौबीसों घण्टों उसी घर में रहो, आप दूसरों की आँखों में नहीं देखते, क्योंकि आप परिकल्पनाओं के साथ जीते हो वास्तविकता के साथ नहीं। आप वास्तव में वास्तविक व्यक्ति के साथ रहते ही नहीं। आप दूसरे व्यक्ति द्वारा किए गए हर कार्य को परिकल्पना के माध्यम से देखते हो और यह निष्कर्ष निकाल लेते हो कि आपका जीवन एक सजा है, आपके लिए ईश्वर के द्वारा।

यदि आप अविवाहित हो, अपनी परिकल्पनाओं का परित्याग करो और आपका रक्त अपने आप शांत हो जाएगा, आप काम की भावनात्मक प्रताड़ना के प्रभाव में नहीं रहोगे। यदि आप विधुर हो, अपनी परिकल्पनाओं का परित्याग कर दो और अकेलेपन की पीड़ा से आप ग्रसित नहीं रहोगे।

Section 5

अपना पूरा प्रयास करो कि बच्चे दूर-दर्शन पर युगलों को न देखें। यदि वे मात्र संगीत का आनन्द लेते हैं और उसके साथ नाचते हैं तो ठीक है, परन्तु वो करते क्या हैं? वह यह है कि वो आत्मसात कर लेते हैं जो देखते हैं उन युगलों में उन भावनाओं को और क्या-क्या नहीं। यहाँ है जहाँ समस्या शुरू होती है। हर चीज मूलाधार चक्र में एकत्रित हो जाएगी जो कामचक्र है। तब मात्र एक सुझाव पर्याप्त होगा और मूलाधार तैयार रहेगा।

अपेक्षाओं का हल्का-सा भी भार मूलाधार चक्र में अव्यवस्था पैदा कर देता है। इसी तरह से मूलधार चक्र बाधित होता है। जब आप अपनी परिकल्पनाओं को दूसरे व्यक्ति के माध्यम से पूर्ण करने का प्रयास करते हो या दूर-दर्शन देखकर के या अपनी अपेक्षाओं को परिकल्पनाओं को दूसरे के ऊपर आरोपित करके उन्हें पूर्ण करना चाहते हो, यह चक्र बाधित हो जाता है।

इसे जीवन क वाह्य परिस्थितियों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। इसे तथाकथित ब्रह्मचर्य से भी कुछ लेना-लेना नहीं है। इसे कुछ करना है तो वह आपके अन्दर के दुकड़ों में बँटे हुए आपके आत्म-स्वरूप से करना है।

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बहत से बच्चे मुझे बताते हैं, "मेरे पिताजी चाहते हैं कि मैं डॉक्टर बनें या मेरे पिताजी चाहते हैं कि मैं वकील बनूँ।'' निश्चित रूप से यदि बच्चा यह निर्णय नहीं ले पा रहा है अपने आप से, और वह आपसे पूछता है कि उसे बताइये वो क्या करे, तब आप उसे बता सकते हो उसकी काबलियत और क्षमता के आधार पर कि वह क्या करे।

आप हमेशा सुझाव दे सकते हो, परन्तु कुछ भी जबरदस्ती उसके गले के नीचे मत उतारो। एक बात और बच्चे को यह समझाओं कि आपने उसे यह स्वतंत्रता और परिपक्वता दी है निर्णय लेने के लिए और स्पष्ट कर दो उसके सामने कि अन्त में वो किसी का दोष नहीं देगा। उसे स्पष्ट रूप से यह समझने की आवश्यकता है। आप देखो, हम अपनी छिनी हमेशा लिए हुए घूमते हैं अपने मित्रों को संबंधियों का और अपरिचितों को भी अपनी परिकल्पनाओं के हिसाब से तराशते हुए। और बदले में वो भी अपनी-अपनी छिनी लेकर घूमते रहते हैं, जो वो आपको तराशने में इस्तेमाल करते हैं। कैसी हिंसा है।

आज के गृहकार्य के लिए, मैं चाहता हूँ कि आप सब अपने विचार लिखो कि एक आदर्श पति कैसा होना चाहिए, एक आदर्श पत्नी, एक आदर्श पिता, एक आदर्श माता, एक आदर्श बच्चा और एक आदर्श मित्र ये सब कैसे होने चाहिए। अपने किन्हीं 5 संबंधियों को चुनो जो आपसे संबंध हों और उनके बारे में लिखो। इसे ईमानदारी से करना। मैं निश्चित हूँ, आप पाओगे कि आपके सारे विचार जो गहराई से आपके सुष्युत में हैं वो सब प्रचलित मीडिया से ही लिए गए हैं।

Section 6

आप दूर-दर्शन का कोई कार्यक्रम देखते हो और एक विशेष पात्र को चाहने लगते हो। वह पात्र आपके लिए एक ठोस सच्चाई बन जाता है। आप सुषुप्त ढंग से यह अपेक्षा करना शुरू कर देते हो कि आपके आस-पास के लोग वास्तविक जीवन में आपके साथ उसी जैसा व्यवहार करें।

क्या आप जानते हो : लोग 'आदर्श गुरु' का भी स्वरूप अपने मस्तिष्क में लिए घुमते हैं? सामान्यतः यह स्वरूप एक वृद्ध आदमी का होता है जिसकी सफेद होती हुई दाढ़ी है- जैसा कि आप दूर-दर्शन के कार्यक्रमों में और किताबों में देखते हो। और जब वो लोग मूझे देखने आते हैं तो मूझ जैसे यूवा व्यक्ति को सच्चे सन्यासी के रूप में स्वीकार नहीं कर पाते। तो हमारे सामने भी वही समस्या रहती है। हमें भी उन लोगों को गुरु के बारे में परिकल्पना से मुक्त करना पड़ता है, इसके पूर्व कि वो हमें स्वीकार करें।

लेकिन स्वामी जी. कभी-कभी हम महसूस करते हैं कि हमें तराशना जरूरी है......जैसे जब हम अपने कार्य करते हुए कर्मचारी को नियंत्रित करते हैं। उस वक्त हम क्या करें ?

आप अपने तराशने का काम लगातार करो। इस बात से सजग रहो कि आप क्या करते हो- तब आप आवश्यकता से ज्यादा तराशने का काम नहीं करोगे। आप देखों कि आपकी अपेक्षाएँ अपने कर्मचारी से सच्चाई पूर्ण है। इस बात की जाँच करो कि क्या कोई वैकल्पिक समाधान है। केवल तब जब यह नितांत आवश्यक हो जाए तभी आपको किसी दूसरे व्यक्ति को मोड़ने का प्रयास करना चाहिए।

जो भी शक्ति आपको दी गयी है, उसे सजगता से इस्तेमाल करना सीखो। क्रोध और तृष्णा महान ऊर्जाएँ हैं जो आपको ईश्वर द्वारा दी गयी हैं जब आपके अन्दर उन ऊर्जाओं के लिए सम्मान होगा, आप कभी इनका दुरुपयोग और बर्बादी नहीं करोगे।

क्या हम कभी धन का दुरुपयोग करते हैं? आप धन का दुरुपयोग कभी नहीं करते क्योंकि आप उसका सम्मान करते हो। जब कोई व्यक्ति 10 रुपये की कीमत का कार्य करता है, क्या आप एक भी पैसा अधिक उसे दोगे? परन्तु क्रोध के साथ आप हमेशा जरूरत से ज्यादा देते हो। यदि किसी व्यक्ति ने कोई गलती की जिसकी कीमत '10 रुपये का क्रोध है', आप हमेशा उसका भुगतान 50 रुपये के क्रोध से करते हो। क्या ऐसा नहीं है? क्यों? यह इसलिए है क्योंकि आप अपने क्रोध अवस्था में इस्तेमाल करो, वह आपको फायदा करेगा और आपको उसके बारे में कोई ग्लानि नहीं होगी, मैं आपको इसका आश्वासन देता हँ।

आपको अपने क्रोध से कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए। यदि आप विचलित होते हो, इसका अर्थ है कि आपने अपने क्रोध को सजगता से नहीं देखा, आपने क्रोध को अपने ऊपर हावी होने की अनुमति दी। यही वो माप है यह देखने का कि आपने क्रोध को उचित तरीके से प्रयोग किया।

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मंदिर के रूप में। हमारे घर धर्म क्षेत्र बनने के लिए हैं- सच्चाई का निवास स्थल। परन्तू वो कूरुक्षेत्र बन गए हैं- यूद्ध का घर। क्या मैं सही हूँ? और क्यूँ वे यूद्ध का घर बन गए क्योंकि हम मानवों को तराश रहे हैं। यदि हम मूर्ति तराशें या लकड़ी तराशें तो बहुत खूबसूरत मूर्ति या खूबसूरत असबाब (MATERIAL) बन जाएगा, परन्तु जब मानवों को तराशेंगे तो केवल पीड़ा निकलेगी।

प्रश्‍न : एक व्यक्ति ने मुझसे पुछा, "स्वामी जी, क्या कुपया आप मुझे कोई रास्‍ता बता सकते हैं 18 हाथों वाली देवी से संबंध स्थापित करने का।''

मैंने उसे बताया, "पहले आप अपनी दो हाथों वाली पत्नी से संबंध स्थापित करो, तब हम देखेंगे कि कैसे 18 हाथों वाली देवी से संबंध स्थापित किया जाए।"

Section 7

एक दूसरा व्यक्ति मेरे पास आया और मुझसे तलाक के लिए आशीर्वाद माँगा। मैंने उसे बताया कि मैं शादियों के लिए आशीर्वाद देता हूँ, तलाक के लिए नहीं। मैंने उससे पूछा कि समस्या क्या है शायद मैं उलझा दूँ।

उसने मुझे बताया, "स्वामी जी आज सुबह, मैंने उससे कॉफी के लिए कहा। वो कॉफी लेकर इतनी जल्दी में आयी कि सारी कॉफी मेरे कपड़ों पर गिरा दी।" में हतप्रभ था और उससे बताया कि ये घटना तो बहुत छोटी घटना है तलाक के लिए।

वह बताता रहा, "स्वामी जी, आप नहीं जानते आज उसने कॉफी उड़ेली है, कल तेजाब उड़ेल देगी। ''

मैं वास्तव में हतप्रभ था। मैंने उससे बताया, "अरे बिना कारण के आप कैसे कॉफी से तेजाब पर चले गए? आखिर उसने ज्यादा से ज्यादा यही किया है न कि गूस्से और जल्दी में कॉफी गिरा दी, तो ठीक है वही है जो आपके कपड़ों को धोयेगी भी। ''

वह कहता रहा, "स्वामी जी, हमारे यहाँ शादी के समय एक प्रथा है तीन पात्र पानी के रखे जाते हैं और जोड़े को उन तीनों पात्रों में से एक अँगूठी ढूँढ़नी रहती है जो उन्हीं तीनों पात्रों में से किसी एक में रहती है। उस समय इस औरत ने मेरे हाथ को नाखून से खरोंच दिया था।''

शादी के जोड़ों में आपस की दरी खत्म करने के लिए इस तरह के छोटे खेल खेले जाते हैं। वह आदमी 10 साल पहले इस छोटी सी घटना को अपने दिमाग में संजोए हुए था। मैंने उससे बताया, "ऐ, अगर आप इस तरीके से पूलिस रिकार्ड रखोगे तो आपके साथ कैसे कोई जियेगा।"

आप देखो : दो चीजें हैं जो हम करते हैं। एक है बहस करना और फैसले के प्रति

इच्छा करना और दूसरा है पहले फैसला बना लेना और उसके बाद उन तर्कों को एकत्रित करना जो उन फैसलों के अनुरूप है। 100 में से 99 बार हम दूसरा वाला करते हैं।

आप देखो, हमारे आस-पास कितनी चीजें घट रही हैं। परन्तु हम उन्हीं चीजों के प्रति ध्यान देते हैं जिन पर हम ध्यान देना चाहते हैं, उन चीजों पर नहीं जो वास्तव में घट रही हैं। इसी कारण से सच्चाई से चूक जाते हैं। वास्तविकता लगातार अस्तित्व में रहती है परन्तु आप वही देखते हो जो आप देखना चाहते हो। शादी में, पहले कुछ महीनों में पुरुष या महिला अपना एक फैसला बना लेते हैं एक-दूसरे के प्रति और उसके बाद चाहे जो ये दोनों करे दोनों उसी फैसले के दृष्टिकोण से देखते हैं। फैसला पहले से निर्धारित रहता है वे दोनों तर्क इकट्ठे करते हैं अपने उस फैसले के अनुरूप।

यही कारण है, यदि आपने निर्णय ले लिया कि आपकी पत्नी मूर्ख है वह आपको हमेशा मूर्ख ही दिखेगी। यदि आपने निर्णय ले लिया कि आपका पति ऐसा है जो आपको नियंत्रित करता है, वो आपको हमेशा वैसा ही लगेगा चाहे वो जो भी कर रहा हो। यदि आप यह करोगे, आप अपने जीवन साथी का सही पक्ष कभी नहीं देख पाओगे, आप केवल वो पक्ष देखोगे जो आपके फैसले का पोषण करेंगे। यह कुछ इस तरीके से है कि जब आप भूखे होते हो, सड़क पर आपकी आँखों को केवल जलपान गृह दिखायी देते हैं। किसी कुत्ते की हत्या करने के पूर्व हम क्या करते हैं? पहले हम उसे पागल घोषित करते हैं फिर मार डालते हैं। इस तरह के व्यवहार और रव्वैये को छोड़ दें। तब आप एक विशेष प्रकार की ताजगी पाओगे हर व्यक्ति में, हर चीज में जो आपके पास से गुजरेगी। एक छोटी सी कथा :

एक व्यक्ति एक पुलिस थाने में गया और अपनी पत्नी के 3 घण्टे से गायब रहने की शिकायत की।

पुलिस वाले ने उससे पूछा, "क्या आप मुझे विस्तार में उसकी लम्बाई और वजन इत्यादि के बारे में बता सकते हो।''

व्यक्ति ने कहा, "ओह! मैं नहीं जानता।"

पुलिस वाले ने पूछा, ''वो क्या पहने हुए थी, जब उसने घर छोडा?'' व्यक्ति ने उत्तर दिया, "मैंने ध्यान नहीं दिया, महोदय लेकिन एक बात मूझे याद है वो कूत्ते को साथ ले गयी है ये मैं जानता हूँ।"

पुलिस वाले ने पूछा, "कैसा कूत्ता है वो?"

व्यक्ति ने उत्तर दिया, "एक डालमेशन प्रजाति का कूत्ता है जिस पर भरे-भूरे धब्बे हैं काले नहीं, उसका वजन 50 पाण्डड है, उसकी पुँछ एकदम सफेद है. उस पर कोई धब्बा नहीं है, वो एक भूरे रंग का कॉलर पहने हुए है जिसमें एक चाँदी की चेन लगी है। उसका नाम स्पॉट है।"

पुलिस वाले ने कहा, "इतना पर्याप्त है। हम उन्हें खोज लेंगे।"

एक पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ कुछ ताजगी के साथ शादी के बाद कुछ महीनों तक रहते हैं। इन कुछ महीनों में एक-दूसरे के लिए वो फैसले एकत्रित करते हैं। उसके बाद वो एक-दूसरे से एकदम संबंधित नहीं रहते वो वास्तव में एक-दूसरे को देखते ही नहीं, वे संबंधित रहते हैं अपने फैसलों से एक-दूसरे से नहीं, बस यही होता है।

पति संबंधित रहता है अपने फैसलों से जो वो इकट्ठा किए रहता है अपनी पत्नी के बारे में और पत्नी संबंधित रहती है अपने फैसलों से जो वो इकट्ठा किए रहती है अपने पति के बारे में। वास्तविक पति और वास्तविक पत्नी दोनों भिन्न होते हैं। एक ही घर में चार लोग हो जाते हैं। एक बार फिर।

एक बार बस ईमानदारी से जाँच करो। कितने दिन हो गए जब आपने अपने पति या पत्नी की आँखों में आँखें डालकर उससे बात की? बहुत दिन हो गया होगा मुझे विश्वास है और हम सोचते हैं कि शुरू के दिन सुनहरे दिन थे और अब जीवन उबाऊ हो गया है। यह आपका व्यवहार है जो इसे उबाऊ बना रहा है।

आप किसी व्यक्ति को उभरने का एकदम से समय ही नहीं देते। आप हर वक्त एक ही तरीके से इतनी जल्दी में रहते हो कि उनके लिए आपके पास समय ही नहीं होता। आप उनके बारे में किसी नयी चीज का संदर्भ ही नहीं लेते। मैं आपसे बताता हूँ, आप अपने पति या पत्नी को वर्षों तक शादी के बाद देखते ही नहीं, क्योंकि आप उनके बारे में अपने स्वरूप से ही संबंधित रहने में खुश रहते हो। क्या होगा तब? आप उसी व्यक्ति की तरह हो जाओगे जो अपनी पत्नी के बारे में भी कोई विस्तृत जानकारी नहीं रखता था। इस तरह से अपनी पत्नी के भी बारे में कोई जानकारी न रखना ये तो बहुत ऊपरी स्तर की समस्या है। इसका प्रभाव और गहराई तक जाता है। आप वास्तव में खो देते हो उस वास्तविक व्यक्ति को जो आपके साथ रह रहा होता है। आप उस व्यक्ति के प्रति अपने विचारों के साथ रहते हो न कि उस व्यक्ति के साथ इतना पर्याप्त है।

मात्र बस 24 घण्टे के लिए इस बात के लिए मस्तिष्क को तैयार करो कि आप अपने पति या पत्नी को इस तरह से देखोगे जैसे पहली बार देख रहे हो। उसके हर शब्द और क्रिया को इस ताजगी और निश्छलता के साथ लेते हुए और बिना

किसी निष्कर्ष पर पहुँचे हुए। उसके प्रति अपने अन्दर प्रेम का भाव लिए हए। चाहे वो उस वक्त आपसे आपको उद्घेलित करने वाली बात ही क्यों न कहे, उन बातों को भी सजगता से सुनो और शांत और प्रेम से उसके प्रति प्रतिक्रया करो बजाए इसके कि सामान्य बहस करने वाले तरीके से। आप देखोगे कि आप वास्तव में एक-दसरे के लिए नए आयाम खोल रहे हो, आप दोनों अपने आप के लिए उभरने का और प्रेम से जीने का नया स्थान बना रहे हो।

अचानक आपको यह अहसास होगा कि अब तक सारे समय आपका ही व्यवहार ऐसा था कि चीजें इतनी खराब दिखती थीं। निश्चित रूप से, आप ये कह सकते हो कि पत्नी को भी उसी तरह की प्रतिक्रिया करनी चाहिए। लेकिन मैं आपसे बताता हूँ : आपके अन्दर वह शक्ति है कि तुम अपने आप को भी और दूसरे को भी परिवर्तित कर सकते हो। बस मात्र थोड़ा सा परिवर्तन अपनी मानसिकता में लाओं, और आप बहुत कुछ कर लोगे जब आप अपनी मानसिकता बदलने का निर्णय ले लोगे, आपकी पत्नी भी स्वतः ही अपनी मानसिकता बदल लेगी। एक छोटी सी कथा :

एक दिन एक व्यक्ति एक कब्रिस्तान से होकर के गुजर रहा था, जब उसने अन्दर से जोर से रोने वाली आवाज सुनी।

उसने अपना यह कर्त्तव्य समझा कि वह रुके और देखे कि वह कोई मदद कर सकता है। वह रुका और अन्दर गया और जाकर देखा कि एक कब्र के पास एक व्यक्ति जोर-जोर से रो रहा है।

वह लगातार कह रहा था, "आपको क्यों जाना पडा? आपको क्यों जाना पडा?"

वह व्यक्ति दू:खी हुआ उसकी पीड़ा देखकर के, इसलिए वो उसके निकट गया और पूछा, "महोदय, क्षमा चाहूँगा, क्या ये आपकी पत्नी थी?"

व्यक्ति ने उत्तर दिया, "नहीं ये उसका पहला पति था।"

संबंध वीभत्स हो जाते हैं मात्र बस मेल न खाने के कारण किसी की परिकल्पना और वास्तविकता में। इससे बूरा यह होता है कि इस उम्मीद में कि दूसरे के साथ अच्छा मेल होगा जो उनकी परिकल्पना के अनुरूप होगा किसी अन्य से संबंध बनाने के बारे में सोचने लगते हैं। कुछ दिन तक वो नये संबंध के साथ चलते हैं और फिर महसूस करते हैं कि वहाँ भी कुछ कमी है और फिर उसके बाद दूसरे संबंध के बारे में सोचने लगते हैं और फिर दूसरे। यह बात उन्हें कभी समझ में नहीं आती कि वास्तव में कमी उनके अन्दर है क्योंकि वह कमी उनकी अपनी परिकल्पना के कारण है, दसरे व्यक्ति में कोई गडबडी नहीं है।

वह अपनी परिकल्पना के संसार में इतना ज्यादा व्यवस्थित हो जाते हैं कि सच्चाई उन्हें परिकल्पना लगने लगती है। मैं आपसे बताता हूँ कि हमारी सारी समस्या की शुरूआत की बिन्दु यही है जिस दिन हम वर्तमान में रहना शुरू कर देंगे, उसी दिन से हम खुशी का अनुभव करना शूरू कर देंगे, उसी दिन हम ये समझ पाएँगे कि हम इतने दिनों तक परिकल्पनाओं के कितने भारी बोझ के नीचे दबे हुए थे।

आजकल नयी उम्र के लोगों के अन्दर यह बहुत तीव्रता से बढ़ती हुई समस्या है कि वह एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं और शादियाँ कितनी तीव्र गति से ट्रूट रही हैं। कितना दू:खद है यह सब होते हुए देखना। एक जागरूकता की आवश्यकता है इस वक्त। केवल एक गहरी समझ ही यह जागरूकता ला सकती है।

Section 8

जब संबंधों की बात आती है हम एक-दूसरे पर उँगली उठाने के लिए एकदम तैयार बैठे हैं। हम भूल जाते हैं कि ताली बजने के लिए दो हाथों की आवश्यकता पड़ती है। जब आप अपने आप पर काम करोगे, तो आप अपने लिए भी चीजें बेहतर करोगे और दूसरे के लिए भी। इस बात के लिए चिंतित मत हो, कि दूसरे व्यक्ति को भी बदलने की आवश्यकता है।

आज तक की जितनी भी प्रेम कथाएँ लिखी गयीं हैं, यदि आप उन्हें पढ़ो, तो कहीं भी स्त्री और पुरुष पूर्णरूपेण हर समय एक-दूसरे के साथ उमंग के स्तर पर वास्तव में रहने के आधार पर टिके नहीं हैं।

शाश्वत प्रेमियों की एक कथा में, रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा लिखी गई, नायक और नायिका शाश्वत प्रेमियों की तरह गंगा नदी के दोनों किनारों पर रहने का निर्णय लेते हैं। सप्ताह में एक दिन, दोनों नाव से आते हैं मिलते हैं और वापस चले जाते हैं।

यदि वो ये करते हैं, प्रत्यक्ष रूप से वो लोग शांति से होंगे जिस समय वो मिल रहे होंगे। हर बार जब वो मिलेंगे, हवा में एक ताजगी होगी क्योंकि वो ये जानते हैं कि वो कुछ ही घण्टों तक साथ रहेंगे, वह क्षण कितने कीमती हो जाते हैं।

सारे शाश्वत प्रेमी, चाहे वो रोमियो और जूलियट रहे हों या लैला और मजनू रहे हों या अम्बिका पति और अमरावती रहे हों, वो वास्तव में कभी एक साथ नहीं रहे। यदि वो एक साथ रहे होते तो उनके शाश्वत प्रेम की कहानी दूसरी होती। समस्या यह है हमारे जीवन में पृष्ठभूमि का संगीत नहीं है। जब आप दूर-दर्शन पर कोई कहानी देखते हो, तो सब पृष्ठभूमि के संगीत के साथ होती हैं और आप आसानी से कल्पना जगत में चले जाते हो। संगीत में आपको पिघलाने की शक्ति होती है और वह आपको परिवर्तन स्थिति में पहुँचा देता है। जितने भी दृश्य आप देखते हो, विशेष तौर पर प्रेम दृश्य वो सब पृष्ठभूमि के संगीत के साथ होते हैं। आप उनका इतना आनन्द पुष्ठभूमि के संगीत के कारण लेते हो। आप पर्णतः सम्मोहित हो जाते हो उस वातावरण से जो दूर-दर्शन के डिब्बे द्वारा निर्मित होता है।

वास्तविक जीवन में, आप संगीत खोजते हो और आप उसे पाते नहीं। कल्पना करके कविता लिखने में और मानस-दर्शन करके कविता लिखने में फर्क है। पहले वाली साधारण कल्पना है, वह आकाश को छूने जैसा है। दूसरी गास्तविक है।

याद रखो : आपका पति या पत्नी ईश्वर की रचना है। आपकी रचना ईश्वर की रचना की तुलना नहीं कर सकती। विजय केवल ईश्वर की रचना की होगी।

आज अश्लीलता, दिवास्वप्न, विक्रति के बहुत से उदाहरण समाज में हैं। लोग अपनी परिकल्पनाओं की पूर्ति के लिए और निक्कृष्ट विकल्पों का सहारा लेने लगे हैं। अश्लीलता जीवन में काम की शांति नहीं करता, वह और ज्यादा दिवास्वप्न और विकृति पैदा करता है, और इतना सब कुछ। परिकल्पना में रहने की इतनी ज्यादा बाध्यता है।

एक बात समझो, जब तक आप कमजोर और गैर बुद्धिमान नहीं हो, आपके लिए कुछ भी बाध्यता नहीं बन सकती। यदि आप बुद्धिमान बन जाओ आप उसका परित्याग कर सकते हो।

प्रश्‍न : स्‍वामी जी, आप हम लोगों से वैसा ही रहने के लिए कहते हैं जैसे हम हैं। परन्तु हम समाज में जैसे हैं वैसे ही कैसे रह सकते हैं? मैं समझती हूँ कि हमें बदलना चाहिए, परिवार और समाज के अनुरूप।

हाँ, प्रयोगिक स्तर पर हर व्यक्ति इस समस्या का सामना करता है। आपका कहते हो, "स्वामी जी हमें दूसरे के अनुरूप व्यवहार करना पड़ता है।" मैं आपसे कहता हूँ, कि क्यों नहीं निश्चिंत हो जाते कि दूसरे भी आपके अनुरूप व्यवहार करें? सत्य है समाज में हमें एक-दूसरे पर आश्रित रहना पड़ता है। दूसरा कोई रास्ता नहीं है, परन्तु अपनी सीमाओं को स्पष्ट रूप से जानो।

स्वतंत्रता से परतंत्र रहो।

बहुत स्पष्ट रहो, आपका क्या स्थान है और दूसरे का क्या है। अपने जीवन को समृद्धशाली बनाने का ज्यादा से ज्यादा प्रयास करो, दूसरे को परेशान किए बगैर।

निश्चित रूप से, मैं आपको एक पूर्ण समाधान दे सकता हूँ........ यदि मैं

आपको कोई प्रार्थना (मंत्र) दे सकता हूँ जो पति-पत्नी के बीच की सारी समस्याएँ सूलझा दे, तो मैं दुनिया का सबसे लोकप्रिय आदमी बन जाता।

प्रश्‍न : स्‍वामी जी......क्‍या दूसरे व्यक्ति के मूलाधार चक्र को नहीं खोला जा सकता, जिससे कि वो अपनी परिकल्पनाओं का परित्याग कर दे?

ये आप कैसे करोगे? आप केवल निश्चिंत हो सकते हो अपनी परिकल्पनाओं का परित्याग करके- जिससे कि चार लोग जो घर में रहे हैं वो गिनती घटकर के तीन हो जाएँ।

दूसरे व्यक्ति में परिवर्तन कैसे किया जाए.........? आजकल वैवाहिक जीवन की समस्याओं के सलाहकार सम्मोहन तक की राय देते हैं। मैं सोचता हूँ यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में आपत्तिजनक हस्तक्षेप है। यह पूर्णतः गलत है।

उस दिन मैंने अखबार में एक प्रकरण के बारे में पढ़ा था, जिसमें एक महिला अपने पति के गुस्से के स्तर को नीचे लाना चाहती थी। आपने भी पढा होगा-शिकागो विश्वविद्यालय में एक शोध चल रहा है जिसमें वो व्यक्ति के दिमाग में इलेक्ट्रोड स्थापित करके उसके गुस्से को पूर्णतः नियंत्रित करते हैं।

जब वहाँ पर उस शोध में भाग लेने के लिए स्वयं सेवकों की आवश्यकता पड़ी, तो सैकड़ों महिलाएँ जबरदस्ती अपने पतियों को लायीं।

प्रयोग के बाद, 72 महिलाएँ - ये सत्य है - 72 महिलाएँ वापस आयीं और विश्वविद्यालय से बताया, "कृपया इन इलेक्ट्रोडों को हटा दीजिए। हमें अपना पहला वाला पति चाहिए। मैं अपना पहले वाला गुस्सैल पति वापस चाहती हूँ। उन लोगों ने कहा, "जीवन का स्वाद ही खत्म हो गया है। जब तक हम लड़ते नहीं, तब तक मजा ही नहीं आता कोई पारस्परिकता रह ही नहीं गयी है ये मेरी तरफ कोई ध्यान नहीं देता।"

हर आदमी को ध्यान की आवश्यकता है। व्यवहारिक मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि एक सामान्य व्यक्ति बिना भोजन के 90 दिन तक जी सकता है परन्तु दूसरों के ध्यान के बिना केवल 14 दिनों तक जियेगा। वो पागल हो जाएगा।

हुआ यह है कि हम एक-दसरे को कैसे प्रेम करें यह भुल गए हैं, एक-दूसरे का रख-रखाव भूल गए हैं। प्रेम एक विस्मृत भाषा हो चुकी है। इसलिए एक मात्र पारस्परिकता और ध्यान जो हम उम्मीद कर सकते हैं वो एक-दूसरे से लड़ाई करते रहें तभी।

मैं सोचता हूँ कि वो लोग भी जो यहाँ बैठे हुए हैं अपने पति और पत्नियों के बारे में शिकायतें कर रहे हैं वो आध्यात्मिक नहीं है- यदि इनके जीवन साथियों को

ठीक है। आप लोग कहते हो कि आप भिन्न हो। देखते हैं हम।

मूलाधार चक्र के बारे में सबसे खूबसूरत चीज यह है कि यदि यह चक्र खुल गया तो आपकी 50 फीसदी समस्याएँ अदुश्य हो जाएँगी। यह एक चक्र आपके 50 फीसदी जीवन को नियंत्रित करता है। चाहे आप जो करते हो, आप इस चक्र का प्रभाव पाओगे। आपके दस्तखत में भी, आपको इस चक्र का प्रभाव मिलेगा। जब मूलाधार चक्र क्रियान्वित होता है, आपका दस्तखत भी भिन्न दिखेगा। आपके एक फूल तोड़ने का तरीका भी भिज्ञ होगा।

तमिल संतों का एम समूह हैं जिन्हें नयनार कहते हैं। एक गीत है जो उनके बारे में कहता है कि जब वे एक फूल तोड़ते हैं तो उस वृक्ष को पीड़ा नहीं होती। इससे क्या अर्थ समझते हैं हम? आप इतने प्रेमी और संवेदनशील हो जाते हो, जब यह चक्र खूलता है। जब इस चक्र की ऊर्जा परिवर्तित होती है तो यह आपके अन्दर से प्रेम के रूप में बहेगी।

काम कोयला है, प्रेम हीरा है। काम कीचड़ है, प्रेम कमल है जो उस कीचड़ में खिलता है। यह वही तत्व है- बस एक ही बात है कि आप जानों कि आप इसे धारण कैसे करोगे। बस अपनी अपेक्षाओं का परित्याग करो और आप देखोगे कि प्रचण्ड ऊर्जा का प्रस्फुटन होगा।

आज मैं चाहता हूँ कि आप जब घर जाओ तो इस कथन का प्रयोग करो।

बैठ जाओ और अपने मूलाधार पर ध्यान केन्द्रित करो। आप ध्यान दो तो पाओगे कि आपका मूलाधार तनाव में है। वह हमेशा तनाव में रहता है। 5 मिनट के लिए, मानसिक रूप से अपनी पत्नी या पति को क्षमा कर दो किसी भी चीज के लिए जिससे उन लोगों ने आपको परेशान किया हो। वास्तव में क्षमा कर दो, जड़ तक जाओ और उस पीड़ा के भाव का परित्याग करो। इसे पूर्णता से करो। बस उन्हें स्वीकार करो जैसे वो हैं। उन्हें अपना गहरा प्रेम दो।

बस 5 मिनट के बाद, आप ये देखोगे कि आपका मूलाधार चक्र पूर्णतः आराम से हैं।

यदि मात्र 5 मिनट आपको यह परिणाम दे सकता है, तो कल्पना करो क्या होगा जब आप अपने संपूर्ण दृष्टिकोण को बदल दोगे। कितनी प्रचण्ड ऊर्जा के बहाव को आप अनुभव करोगे।

जिस तरह से आप इस समय रह रहे हो, यह वैसे है जैसे आपको 1 लाख रूपया मिला हो, लेकिन उसमें से 90 हजार आपने कहीं बंद कर दिया है जहाँ से आप Jeeheme veneR hee mekeâles~ Deehekeâes meeje peerJeve Gmeer yeÛes ngS 10 npeej ceW Ûeueevee nw~ leye efveef§ele ™he mes Deehe Deheves Deehe keâes iejerye cenmetme keâjesies~

Section 9

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हमारे पशूता वाले भाव को ईश्वरीय भाव में परिवर्तित किया जाना है। हमारे सबके अन्दर तृष्णा है, जो पशुता का भाव है। एक बात और : जानवरों के अन्दर तो कम से कम शुद्ध तृष्णा होती है। जब वो संबंध स्थापित करते हैं तो बाकी सारे संसार को भूल जाते हैं। लेकिन हम लोग, हमारी तो तृष्णा भी शुद्ध नहीं है। वो तो ग्लानि और कामनाओं से हमेशा भरी हुई है।

या तो हमारे पूर्व की परिस्थितियाँ हमें ग्लानि से भर देती है और हमें वापस खींचती हैं या हमारे अन्दर तीक्ष्ण कामना पैदा कर देती हैं कि हम और ज्यादा लिप्त हों, जिससे कि और ग्लानि हो। यह एक चकरघिन्नी है जो वापस खींचती है और फिर अन्दर ढकेलती है। जिसके फलस्वरूप हमारी तृष्णा भी दूषित हो जाती है। वह शुद्ध नहीं रहती।

आपने हमेशा ध्यान दिया होगा, कि जिस क्षण आपकी अपेक्षाओं की पूर्ति होती है आप ग्लानि से भर जाते हो। इसीलिए काम हमेशा आपको ग्लानि का अहसास कराता है। परिवार ने आपके अन्दर पहले ग्लानि के भाव को भर दिया, जब आप मात्र बच्चे थे और उसके पश्चात आप अपने लिए ग्लानि पैदा करने की कला में निप्रण हो गए।

सर्वप्रथम ग्लानि को समझो। किसी व्यक्ति को जब आपके ऊपर नियंत्रण करने की इच्छा होती है तो सर्वप्रथम वो आपके अन्दर ग्लानि पैदा करता है वो आपको किसी न किसी रूप में निम्नता का अहसास कराता है। तब आप स्वतः ही उनकी बात का अनुपालन करते हो।

मनष्य केवल ग्लानि के माध्यम से ही नियंत्रण करना जानता है। मैं आपसे बताता हूँ ये नियम बच्चों के लिए ठीक है। नियमों से शुरू करना अच्छा होता है। परन्तु महत्वपूर्ण यह है कि जैसे-जैसे आप बड़े होते हो आपको मार्ग-दर्शन आपकी बुद्धिमत्ता को करना चाहिए। जब आप अपने व्यक्तित्व का एकीकरण कर लोगे ग्लानि का आपके अन्दर उदय ही नहीं होगा। वास्तव में कोई घटना आपके अन्दर ग्लानि नहीं पैदा करती। उस घटना का प्रभाव आपके अन्दर ग्लानि का कारण है।

लोग अंधों की तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को नियम विरासत में देते रहते हैं और उसी के साथ-साथ ग्लानि भी। जैसा राजा का मुकुट होता है, वो परदादा से दादा, दादा से पिता, पिता से पुत्र, पुत्र से परपुत्र ऐसे चलता है। बस इसी तरह से ग्लानि भी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है।

खुबसूरती बढ़ाने के हर उत्पाद आपको बताते हैं बार-बार कि आप देखने में उतने अच्छे नहीं हो। आप इस ग्लानि से भर जाते हो कि आपका शरीर उपयुक्त नहीं है। आप करते क्या हो? आप जाते हो उस उत्पाद को खरीदते हो और इस्तेमाल करते हो। आप स्वतः ही उनके नियंत्रण में फँस जाते हो। एक बार आप उसका प्रयोग कर लेते हो आप ग्लानि की एक और भावना से भर जाते हो- 'क्या इसी सब समस्या के लिए मैंने ये सब किया?'' जैसे ही आप किसी चीज को प्राप्त करोगे, पहली चीज जिससे आप ग्रसित होगे वह होगी ग्लानि।

हम वापस तुष्णा पर आते हैं, आपकी अपेक्षाएँ और परिकल्पनाएँ आपको एक निष्क्रिय चक्क में इबो देती हैं। आप अपने चारों तरफ अपनी परिकल्पनाओं जो आपने दूर-दर्शन, इण्टरनेट, किताबों इत्यादि से इकट्ठा किया है, से एक मानसिक दीवार खड़ी कर लेते हो और इसी दीवार के अन्दर आप मानसिक रूप से रहते हो। जब आप संबंधों में भी रहते हो, तब भी आप इसी दीवार से ही संबंधित रहते हो अपनी वास्तविक पत्नी या पति से नहीं। बेचारे वास्तविक पति और पत्नी तो मात्र एक विकल्प रह जाते हैं आपके मानसिक स्वरूपों से। आपकी तृष्णा भी दूषित हो जाती है।

जब आप इसी रूप में मग्न हो जाते हो, तो आप एक चकरघिच्ची में फँस जाते हो और इसीलिए आप उसमें गहराई तक नहीं जाते और किसी परिस्थिति के कारण वापस आते हो और ज्यादा परेशानियाँ लिए हुए। यदि आप उसमें और अन्दर गहराई तक जाओ, तब आप उसमें से खिलकर निकलोगे।

इसीलिए पूर्व के दिनों में, लोग अपनी तृष्णा का परित्याग 40 वर्ष की उम्र में ही कर देते थे। उनके पास इतने जटिल स्वरूप नहीं थे। वो सीधे अपने पति और पत्नी से संबंधित रहते थे इसीलिए वे बहुत कम उम्र से ही खिले हुए रहते थे। वो तृष्णा में गहराई तक जाते थे और उससे बाहर निकल आते थे। तृष्णा अपने आप उन्हें छोड़ देती थी, उन्हें उसका परित्याग नहीं करना पड़ता था।

भारत शादियों में एक बड़ा खूबसूरत छंद है जो पुजारी लोग शादी के जोड़ों से गाने के लिए कहते हैं। पत्नी-पति से कहती है, "आप मेरे ग्यारहवें पुत्र बनो" और पति-पत्नी से कहता था, 'आप मेरी ग्यारहवीं पुत्री बनो।'' इसका अर्थ है, विवाह के ग्यारहवें वर्ष में वे दोनों एक-दूसरे को पुत्र और पुत्री के रूप में देखेंगे। दोनों का संबंध इतने बड़े परिवर्तन से होकर के गुजर चुका होगा तब तक।

जब आप अपने बच्चों को देखते हो आप भर जाते हो कितनी खुशी से, क्या ऐसा नहीं है? पति और पत्नी से आपके संबंध तब तक में बहुत बड़े परिवर्तन की प्रक्रिया से होकर गुजर चुके होंगे और आप उसी खुशी का अनुभव करोंगे जब एक-दूसरे को देखोगे। पति पुत्र बन जाएगा उस महिला के लिए और पत्नी पुत्री

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अब सोचो कई बार जब आपने गैर जानकारी में किसी फूल या पत्ती को तोड़ा हो और तोडकर के कहीं और फेंक दिया हो। दोनों भावनाओं में फर्क समझते हो, दोनों व्यवहार में? अब मुझे बताओं क्या आप, अपने आस-पास हर चीज और हर व्यक्ति के प्रति मित्रता वाला व्यवहार रखते हो?

हर चीज को सजगता से देखो, अब आप सुषुप्तावस्था में व्यवहार कर रहे हो और हिंसक ढंग से व्यवहार कर रहे हो इन चीजों के प्रति बिना यह जाने हुए कि आप हिंसक हो गए हो। यदि आप इन चीजों के प्रति सजगता से देखो, आप इनके अन्दर की अपार खूबसूरती को देखोगे और इनके साथ प्रेम का व्यवहार करोगे।

और अब आप अपने शरीर के साथ कितना दुरव्यवहार करते हो? आप जरूरत से ज्यादाकार्य लेते हो और गडबडी करते हो उस खूबसूरत पाचन प्रक्रिया से जो आपके अन्दर क्रियाशील रहती है। आप देर रात तक जागते हो अपने शरीर को पीड़ित करते हो, तब जब कि वह चीखती रहती है आराम के लिए। आप सिगरेट पीते हो और शराब पीते हो इस बात को जानते हुए कि वह आपके शरीर के लिए ठीक नहीं है। क्या ये सारी क्रियाएँ मित्रता की हैं आपके शरीर के प्रति? आप में से कुछ अपने शरीर से घूणा करते हो इसलिए उसकी उपेक्षा करते हो।

इसलिए बाहर की हिंसा के बारे में बातें करना बंद करो और अपने अन्दर की हिंसा के बारे में बातें करो। बाहर की हिंसा स्वतः ही रूक जाएगी। हम दूसरों की खामियों के प्रति उँगली उठाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। हमारी अपनी खामियों के बारे में क्या कहेंगे जो गिनती में बहुत अधिक है?

एक बार एक व्यक्ति मेरे पास आया और अपने परिवार के बारे में बताया। उसने कहा कि उसकी पत्नी एक वकील है। मैंने पूछा, "ओह, वो अदालत में बहस करने जाती हैं?" उसने कहा, "नहीं स्वामी जी, वो घर में बहस करती हैं।"

हम दूसरे की तरफ उँगली उठाने के लिए तैयार रहते हैं और बहस करते हैं। इसकी जगह पर हमें अपनी अशुद्धता दूर करना प्रारम्भ कर देना चाहिए और तब बाहर स्वतः ही बहस करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

अपने साथ उन शब्दों को लेकर चलो जो दूसरों को और आपको स्वयं स्वस्थ करें। दूसरों के शरीर मस्तिष्क और स्वरूप के प्रति मित्रता का भाव रखो। यह है जिसे 'व्यवहारिक आध्यात्मिकता' कहते हैं। एक कमरे में पूजा करते हुए घण्टी बजाकर के लगातार माँ लक्ष्मी से धन के बारे में प्रार्थना करने की आध्यात्मिकता

नहीं करते। आध्यात्मिकता, माँ लक्ष्मी के गूणों जैसे कि क्रपा व सदभाव को अपने अन्दर आत्मसात करना है। धन तो स्वतः ही आ जाएगा।

Section 12

हम सब सोचते हैं कि हमें केवल धार्मिक क्रियाओं को करना है और हमें परिणाम मिल जाएगा। नहीं। बहुत स्पष्ट रहो : आप राम-राम की रट प्रतिदिन एक हजार बार लगाओ बिना इस अभिप्राय के और अभिरूचि के कि आपको अपने आप को परिवर्तित करना है, यह उसी तरीके से होगा जैसे दिन भर एक हजार बार कोला-कोला, कोला-कोला की रट लगाओ। धार्मिक क्रियाओं के पीछे जो मौलिक सोच है वो है समझने की और आत्मसात करने की अपने अन्दर परिवर्तन की प्रक्रिया को और तब भौतिक परिणाम अपने आप निरंतर आने लगेंगे।

एक बार आप दूसरों के प्रति मित्रता दिखा सकोगे, इतना धैर्य और दृढता रखना कि आपके भावनाओं की परिवर्तन प्रक्रिया हो सके और अंत में आप अनुभव करोगे उस परम पारस्परिक भाव को जिसे प्रेम कहते हैं। दूसरा भी आपके परिवर्तित भावों के प्रति प्रतिक्रिया करेगा और आप पहुँच गए। आपका स्वरूप परमानन्दित हो जाय। तब आपने साधना ठीक तरीके से की है।

जब प्रेम आपके स्वरूप का केन्द्र बन जाता है तो काम दो स्वरूपों को गहराई से जोड़ता है। समस्या यह है, कि सच्चा प्रेम खो गया है और तृष्णा द्वारा ढक लिया गया है। परिणामस्वरूप दोनों स्वरूप इकट्ठे होते ही नहीं, केवल शरीर इकट्ठे होते हैं। संबंध केवल सतही स्तर पर रहता है। कोई भी चीज यदि सतही स्तर पर है तो आसानी से टूट सकती है। न टूटने के लिए किसी भी चीज को बहुत गहरी जड़ की आवश्यकता है। बहुत साधारण तर्क है।

और. तष्णा आपको अंधा कर देती है। यह आपको सुष्प्त के नशे में ले जाती है। प्रेम का भी नशीला प्रभाव होता है, परन्तु इसका नशा आपको गहरी सजगता की तरफ ले जाता है। यह ऐसी खूबसूरत स्थिति होती है। प्रेम और तृष्णा एक ही स्वरूप के दो सिरे हैं। कुछ भी जो आपको गहरी सजगता में ले जाता है वह ध्यान साधना होती है। कोई भी चीज जो आपको सुषुप्तावस्था में ले जाए वह सहायक नहीं हो सकती। यही वह माप है यह देखने के लिए कि जो कुछ भी आप अनुभव कर रहे हो वह आपके लिए अच्छा है या नहीं।

एक बात और - जब आप गहराई से प्रेम करोगे, ईर्ष्या के लिए कोई स्थान नहीं होगा। ईर्ष्या इसलिए होती है क्योंकि आप भयभीत रहते हो कि हल्की जडे उखड न जाएँ। यदि जड़े गहराई तक हों तो आप भयभीत क्यों होंगे? आप ईर्ष्या क्यों करोगे? क्या आप समझ रहे हो मैं क्या बताने का प्रयास कर रहा हैं। अपने साथ ceW efJeÕeeme nukeâe neslee ner nw Ùeefo mebyebOe melener mlej kesâ neW~ Skeâ Ssmee mebyebOe pees heefjkeâuheveeDeeW Deewj le=<Cee hej DeeOeeefjle nw~

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बच्चे का बस अपने में स्वतंत्र रहने दो अपने तरीके से। चाहे आप ये सोचते हो कि आप खतरा मोल ले रहे हो। बच्चों के अन्दर अपने आप में एक नैसर्गिक अन्तर्ज्ञान होता है। इसलिए आवश्यक बचाव की व्यवस्था करके आप उन्हें अपने आप में छोड़ सकते हो।

Section 13

और, बच्चे अपनी अभिव्यक्ति में इतने पूर्ण होते हैं। इसलिए उन्हें दबाओ मत वो अपने मस्तिष्क का प्रयोग करके बनावटी और दिखावे वाला व्यवहार नहीं जानते। हम सब दिखावे की कला में निपुण हो गए हैं अपने मस्तिष्क का खुलकर के प्रयोग करके और रोककर के प्रयोग करके। हम पूर्णता से अपनी अभिव्यक्ति कभी नहीं करते।

और. उन्हें अपने दोनों हाथों का स्वतंत्रता से इस्तेमाल करने दो। हम अक्सर उन्हें बांयें हाथ का प्रयोग बहुत सी क्रियाओं में करने से हतोत्साहित करते हैं बच्चा सब्यसाची क्यों नहीं हो सकता? इसमें कोई बुराई नहीं है। महाभारत में अर्जुन सब्यसाची थे। क्या आप ये जानते थे? जब हम इन बातों को सूनते हैं तो आश्चर्य के साथ सुनते हैं लेकिन यह समझने में असमर्थ रहते हैं कि हम इन सब चीजों को करने में पूर्णतः सक्षम हैं बस यदि हमने अपने आप को मौका दिया होता।

एक बात और : आपने यह देखा होगा कि सारे बच्चे तेजी से नाचना पसंद करते हैं। तेजी से नाचना उनका अपना तरीका है जिससे वे अपनी ऊर्जा को केन्द्रित करते हैं। आप तेजी से केवल तब घूम सकते हो यदि आपका मणिपूरक चक्र जो नाभि क्षेत्र में स्थित है पूर्णतः साफ हो। बच्चे इतने निश्छल और चिंतामुक्त होते हैं कि वो बिना प्रयास के भी तेजी से नाच लेते हैं। परन्तु क्या हम उन्हें तेजी से नाचने देते हैं? जब हम उन्हें तेजी से नाचते हुए देखते हैं, तो हमारा सिर तेजी से नाचने लगता है इसलिए हम उन्हें रोक देते हैं और उनसे कहते हैं, "एक जगह बैठो ये स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।'' इसी तरह की और बातें कहते हैं। मैं आपसे बताता हूँ, बस उन्हें तेजी से नाचने दो, एक कम्बल नीचे बिछा दो जिससे कि यदि वो गिरें तो चोट न लगे।

एक बात और : बच्चे के अन्दर भय स्थापित मत करो। उसे स्वतंत्र रहने दो, उसे कुछ बार चढने दो और गिरने दो। यदि आप उसे लगातार करते रहे तो यह विभिन्न प्रकार के भय को जन्म देगा और ऊँचाई से भय, अँधेरे से भय और अन्य प्रकार के भय, जो आने वाले काल में एक डर के रूप में बैठ जाएगा। ऊँचाईयाँ चढने का डर, नई अंजान आयामों में प्रवेश करने का भय इत्यादि। इन छोटी सी बातों का पालन हमेशा करो, इतना पर्याप्त है।

प्रश्‍न : स्‍वामी जी, आप कह रहे थे कि एक आदर्श जीवन साथी जैसी कोई चीज नहीं है। तो विवाह के पूर्व कुण्डली मिलाने का क्या मतलब है?

अब यदि मैं बोलूँ इस विषय पर तो मुझे पूरी ज्योतिष शास्त्र का तर्क समझना पडेगा।

ज्योतिष अपने आप में नहीं, परन्तु जिस तरीके से हम उसका पालन करते हैं वह मूर्खतापूर्ण है और निरर्थक।

समझो : यह आपका जीवन है, आप इसे जी रहे हो आपको इसकी अच्छाई और बुराई समझनी है - परन्तु आप अपने जीवन के बारे में कुछ नहीं जानते, और आप जाते हो और दूसरों से पूछते हो। आपकी बुद्धिमत्ता कहाँ है?

किसी अंजान के प्रति अपने जीवन को समर्पित करना, उसके द्वारा अपने जीवन के निर्णय को लेने देना, मात्र यह दर्शाता है कि आप अपने जीवन को चलाने के बारे में कुछ नहीं जानते। बहुत स्पष्ट रहो। अपने जीवन की जिम्मेदारी आपको स्वयं लेनी पडेगी।

जब लोग मेरे पास आते हैं और अपने भविष्य के बारे में प्रश्‍न करते हैं, तो मैं उन्‍हें बताता हूँ कि मेरे पास अपना भविष्य कैसा होगा यह जानने के लिए मत आओ। मेरे पास केवल तब पाओ जब आप मेरी मदद चाहते हो अपने लिए एक अच्छे भविष्य का निर्माण करने के लिए। ये सारी भविष्यवाणियाँ केवल कमजोर मस्तिष्क वाले लोगों के लिए हैं इस बिन्दु पर बहुत स्पष्ट रहो।

प्राचीन ज्योतिष एक शुद्ध विज्ञान था। उसमें सत्य था।

अब मैं आपको बताता हूँ कि ज्योतिष का प्रार्द्रभाव कैसे हूआ।

पर्व काल में. जब एक बच्चे को स्वामी के पास गुरुकूल में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा जाता था, तो ज्योतिष से इस बात का विश्लेषण किया जाता था कि वह किस तरह के व्यक्तित्व, किस तरह की अभिरुचि और किस तरह के प्राक्रतिक रुझान का वह बच्चा स्वामी है। उसी के अनुरूप उस बच्चे को शिक्षा प्रदान की जाती थी।

इसी तरह से और पहले जाति का भेद जन्म पर आधारित नहीं था और उसका आधार चरित्र और व्यक्ति की प्राकृतिक क्षमताएँ थीं।

जब बच्चे को गुरुकुल में प्रवेश कराया जाता था, स्वामी ये देखते थे कि उसके प्राकृतिक रुझान क्या हैं। यदि उसके अन्दर ब्राह्मण के रुझान बुद्धिमत्ता अति महत्वपूर्ण कारक थी। उस बच्चे को वेद विद्या के अध्ययन के लिए प्रेरित किया जाता था- वैदिक ग्रंथों का अध्ययन। यदि उस बच्चे का व्यक्तित्व क्षत्रिय का था, जहाँ बहादरी और शक्ति की प्रधानता होती थी, उसे युद्ध की कला सिखायी

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विवेकानन्द ने कहा था, "चर्च में जन्म लेना अच्छा है, परन्त्र वहाँ मरना नहीं। सर्वप्रथम हमें इस विचारधारा को त्यागना होगा कि आध्यात्मिकता बहुत कठिन है और भिन्न है।

एक गीत है भगवान रमण द्वारा :

अयायी, अति सुलभम, आत्म विद्याई अयायी अति सूलभम!

इसका अर्थ है, 'ओह कितना सरल यह आध्यात्मिकता, ओह कितना सरल।' बाद के छंद में उन्होंने कहा यदि आपको धन चाहिए, आपको कड़ी मेहनत करने की आवश्यकता है। यदि आप नाम और ख्याति चाहते हो, आपको कड़ी मेहनत करने की आवश्यकता है। यदि आप आत्मदर्शन चाहते हो, आपको कुछ न करने की आवश्यकता है।

यदि आप गहरे आलस्य में जा सको, आप दैवत्व को प्राप्त हो जाओगे। यह वह आलस्य नहीं है जिस आलस्य को सामान्यतः हम लोग जानते हैं। वह शारीरिक आलस्य नहीं है यह एक प्रकार का मानसिक आलस्य है। यदि आप अपने आप को पूरी तरह से शांत कर सको, आप वस्तुतः आध्यात्मिक हो जाओगे।

आध्यात्मिक होना न तो कठिन है और न सरल। यह तो आपका दृष्टिकोण जिससे आप देखते हो। यदि आप इसे सरल समझोगे तो यह सरल होगा। यदि आप उसे कठिन समझोगे तो यह कठिन होगा। जैसे आप हो क्या आवश्यकता है? क्या यह कठिन है या सरल?

सरल है स्वामी जी............

आप सरल शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते। वह वैसा ही है जैसे हम हैं। आप पहले से ही वो हो, तब आप कैसे कह सकते हो कि वो बनना सरल है? केवल अन्दर देखो, अन्दर की तरफ घूमों थोड़ी आस्था आध्यात्मिकता में और थोड़ी सी साधना - इतना पर्याप्त है। जब आप अपने इस भय को त्याग दोगे कि आध्यात्मिकता कठिन है तब आपके अन्दर यह विश्वास पैदा होगा कि हाँ मैं आध्यात्मिक हो सकता हूँ, मैं जाग्रत हो सकता हूँ। तब यह प्रश्न, कि महत्व को त्यागना ठीक है, आपके अन्दर पैदा ही नहीं होगा।

ठीक इस वक्त हम इरे हुए हैं कि मुल्यों का त्याग कैसे करें, क्योंकि हमारे पास पकड़ने के लिए कुछ है ही नहीं। हम जानते हैं एक बार हम अपने मुल्यों का परित्याग कर देंगे, हमारी सभी दबी हुई भावनाएँ उभर आयेंगी, पण्डोरा का डिब्बा खुल जाएगा और हम जानते हैं, यदि पण्डोरा का डिब्बा खूला, तो अफरा-तफरी मच जाएगी। हम अपने अवचेतन से डरे हुए रहते हैं। यह अवचेतन का भय होता है जो इस प्रश्न को जन्म देता है। यदि आप लगातार ध्यान साधना का अभ्यास

करो आपका अवचेतन पूरी तरह से साफ हो जाएगा। तब आप देखोगे कि चाहे आप पण्डोरा का डिब्बा खोल ही दो उसमें से बाहर निकलने के लिए कुछ भी नहीं होगा, आप उसमें केवल अपने चेहरे का प्रतिबिम्ब देखोगे, एक स्पष्ट दर्पण। क्या आप समझ रहे हो मैं क्या कह रहा हूँ।

हाँ अब हम ध्यान तकनीक में प्रवेश करते हैं जिसे दुःखहरण ध्यान कहते हैं। जो मूलाधार चक्र के ऊपर क्रियाशील होती है और उसमें की ऊर्जा को जाग्रत करती है।

दुःखहरण ध्यान

(काल अवधि : 30 मिनट)

इस ध्यान तकनीक को दुःखहरण कहते हैं जो कुलार्नव तंत्र से ली गयी है। यह आपके अन्दर से सारे दबे हुए भावों को बाहर निकाल देगा। बहुत से स्वामियों ने इस तकनीक का पहले भी प्रयोग किया है। यह कुल 30 मिनट का समय लेगा। स्वांस लेना इस संसार के लिए पुल है। यही वो प्रक्रिया है जिससे आपका मस्तिष्क जीवित है। यदि आप शांति के साथ सोचोगे तुम्हारी स्वांस भी आराम से चलेगी। यदि आप उत्तेजित होकर सोचोगे, आपकी स्वांस भी तीव्र गति से चलेगी। अपने मस्तिष्क को नियंत्रित करने के पूर्व आपको अपने स्वांस पर नियंत्रण करना होगा। इस समय, अपनी दबी हुई स्थिति में हममें से ज्यादातर अर्द्ध-जीवित और अर्द्ध-मृत है। साधना के पहले भाग में, गहरी साँसें ली जाती हैं जिससे कि आपके दबी हुई व्यवस्था में मंथन हो सके। आपकी मानसिक व्यवस्था को पूर्णतः जीवित किया जाता है ढेर सारी ऑक्सीजन अन्दर लेकर के, वह और सक्रिय हो जाता है। आपकी कोशिकाओं को और अधिक ऊर्जा मिलती है और अधिक जैविक ऊर्जा का निर्माण होता है, यह ऊर्जा आपकी दबी हुई भावनाओं को बर्फ की तरह गला देगी। यह उसी तरह से है जैसे मूलाधार चक्र को हवा देना।

आप इस तकनीक का प्रयोग खाली पेट कर सकते हो। ज्यादा अच्छा होगा प्रातःकाल। 21 दिन तक दुःखहरण तकनीक आपके स्वरूप के अन्दर वह परिवर्तन लाएगी कि आपका चेहरा और शरीर चमकने लगेगा। यह एक मनोवैज्ञानिक स्नान की तरह होगा। आप अपने अन्दर उस शांति को अनुभव कर सकोगे। जब आप दुःख या पीड़ा को मार दोगे आपके अन्दर आनन्द खिल उठेगा और आपके अन्दर से एक खूबसूरत सुगन्ध निकलेगी।

खड़े होकर के दोनों नेत्र बंद कर लो। अपनी शरीर की गहराई से और तारतम्य से गहरी साँसें लो। ध्यान रहे स्वांस केवल नाक से ली जाए, मुँह बंद रहना

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चाहिए। अपने हाथ को मोड़ो अपने घुटनो को मोड़ो अर्द्ध बैठने के स्थान में आओ और उठो। इस तरह से क्रिया करो जैसे कोई पक्षी उड़ने वाला है ऊपर और नीचे, घुटने ऊपर और नीचे चलते हुए, हाथ ऊपर और नीचे चलते हुए, सब एक पंक्ति में आपकी स्वांस से तारतम्य रखते हुए।

इस चाल को धीरे-धीरे हल्के से करो। जब ऊपर उठो तो साँस अन्दर लो और जब नीचे बैठो तो साँस बाहर निकालो, इस तारतम्य के साथ। यदि आपको हृदय की कोई समस्या है, उतना ही करो जितना आप कर सकते हो। इसी तरह से गर्भवती महिलाएँ और शारीरिक रूप से कष्ट में जो लोग हैं, वो उतना ही करें जितना कर सकते हैं। इसे 10 मिनट तक करो।

अगले 10 मिनट, अपने नेत्रों को बंद रखो और शरीर के अपने हर भाग को तनाव में डालो, एक-एक भाग, हाथ-पैर अलग-अलग, फिर उन्हें आराम दो तनाव और आराम दो, एक हाथ तब दूसरे पे जाओ। अपने पैर से शुरू करो तब घुटनों तक आओ, तब जाँघों तक आओं, तब कमर तक आओं, तब पेट तक आओ, फिर पीठ पर आओ, फिर सीने पर आओ, तब पीठ के ऊपरी भाग पर आओ तब अपने हाथ और उँगलियों पर, कंधों पर पन्नः गले और कंधों पर, फिर अपने चेहरे पर और फिर सिर के ऊपरी भाग। अपने पूरे शरीर के हर भाग को पहले तनाव से मुक्त करो उसके बाद दूसरे भाग पर जाओ। यह सममितीय (ISOMETRIC) व्यायाम की तरह है जो आप अपने शरीर के हर भाग के साथ करते हो।

और इन 10 मिनट के अंत में, आप अन्दर से पूर्णतः खाली हो जाओगे, आप शीतल हो जाओगे, शांत हो जाओगे, संघटित हो जाओगे।

अगले 10 मिनट के लिए, बैठ जाओ अपने नेत्र बंद करके और "हू" कार की ध्वनि निकालो। जैसे शब्द हँ, इसे जोर से और उच्चारित करने की आवश्यकता नहीं है। इसे धीरे-धीरे और आराम से उच्चारित कीजिए जब आप इसका गान कर रहे होंगे, मात्र देखो कि आपके स्वरूप के अन्दर या बाहर क्या हो रहा है।

तकनीक के पहले दो भाग तो वास्तव में तैयार ही थे इस तीसरे भाग के लिए जो वास्तविक साधना है। जब आप इस तीसरे भाग पर आते हो, आप देखोगे कि आपका मस्तिष्क बिना किसी प्रयास के अपने आप शांत हो गया है। शांति आपके ऊपर आरोपित नहीं की जा सकती वह आपके अन्दर आपने आप ही हो सकती है। इसी आराम की स्थिति में हँसते हुए चेहरे के साथ परमानन्दित मनःस्थिति में रहो। इस समय के मध्य, बहुत से अनुभव हो सकते हैं, उन्हें मात्र देखो और आप दूर-दर्शन देखते हो। अपने मस्तिष्क में उठने वाले विचारों को अलग-अलग करके देखो। अपने मूलाधार पर साधना के मध्य में ध्यान केन्द्रित

मत करो, क्योंकि वह परिकल्पनाओं को जन्म देने लगेगा, जिन्हें आप दर करने के लिए प्रयासरत हो।

(समूह दुःखहरण साधना का अभ्यास करता है संगीत के साथ) ओम शांतिः शांतिः शांतिः

अध्याय - 6

भय से मुक्ति

अब हम 'स्वाधिष्ठान चक्र' में, प्रवेश करेंगे। जो नाभि क्षेत्र से 2 इंच नीचे स्थित है।

'स्वाधिष्ठान' का अर्थ है, 'जहाँ आपका स्व स्थित है' - 'स्व' से अर्थ होता है हम स्वयं और 'अधिष्ठान' का अर्थ होता है स्थित।

यह चक्र बाधित होता है भय से, विशेषतः मृत्यु के भय से और इसे प्रफूल्लित किया जा सकता है इस भय को स्वीकार करके, स्वयं मृत्यु को स्वीकार करके।

(ध्यान तकनीक : निर्भय ध्यान - एक तांत्रिक ध्यान)

Section 15

हमारे समस्त भय, वास्तव में मृत्यु के भय हैं, परन्तु विभिन्न रूपों के पीछे छुपे हुए हैं, बस। हमारा हर एक भय संबंधित है मृत्यु के भय से, लेकिन वह कुण्डलीय रूप में है (छुपा हुआ, लपेटा हुआ)। क्योंकि वह कुण्डलीय रूप में है इसलिए हम उसे सीधे मृत्यु के भय के रूप में नहीं देख पाते। बिना भय के, शब्द मृत्यु भी स्वयं वह अर्थ खो देता है जिससे हम उसे जोड़ते हैं।

तो मृत्यु है क्या?

यदि मैं आपसे यह प्रश्‍न पूँछू, आप मुझसे बताओगे, "गुरु जी, मृत्यु वह है जो हमारे जीवन के अंत में होती है।" यदि मृत्यु इससे ज्यादा और कुछ नहीं होती, तो कितना सरल होता।

परन्तू मृत्यसू हमारे जीवन के अंत में घटने वाली ही नहीं है, अपितू वह हमारे जीवन में हर क्षण घटनपे वाली कोई चीज है। हमारी हर क्रिया अवचेतन तरीके से मृत्यु से संबंधित है, मृत्यु के भय से। मृत्यु हमारे जीवन की गुणवत्ता को बदल देती है। वह अंत नहीं है, वह हमारे जीवन की पराकाष्ठा है - जिसके अनुकूल हमारे सारे संपूर्ण जीवन को बनाया गया है।

मैं ऐसा क्यों कहता हँ ?

क्योंकि हमारा संपूर्ण जीवन मृत्यू की धारणा से नियंत्रित है। हमारा सामाजिक ढाँचा भी मृत्यु की ही धारणा पर आधारित है।

विश्व के समस्त दर्शन और सारे महान धर्म इस एक प्रश्‍न : मृत्यु के पश्‍धात् क्‍या होता है? का उत्तर देने से पैदा हुए हैं।

इस एक प्रश्‍न का उत्तर देने में, जीवन के विभिन्न समाधानों ने जड़ पकड ली। वो संस्कृतियाँ, जो एक जीवन में विश्वास रखती हैं, जिनमें पूनर्जनम की कोई धारण नहीं है, उनमें समस्त ऊर्जाएँ जीवन को ही उत्कृष्ट बनाने में लगा दी गयी है। उन संस्कृतियों के ज्ञान प्राप्ति के क्षेत्र में, भौतिक सुख-सुविधाओं के क्षेत्र में, सूचनाएँ एकत्रित करने के क्षेत्र में ऊँचाइयों को प्राप्त कर लिया है।

इन संस्कृतियों ने विज्ञान को बढ़ावा दिया है। जीवन उत्कृष्ट तरीके से विज्ञान हमारी मदद करता है। हम अपने जीवन से अधिक से अधिक प्राप्त कर सकें, इसमें विज्ञान हमारी मदद करता है।

वो संस्कृतियाँ, जो पूर्नजन्म में विश्वास रखती हैं, उन्होंने जीवन का ध्यान अन्दर की तरफ केन्द्रित किया। उनकी खोज भिज्न है। वह जीवन जल्दबाजी में जीने के प्रति प्रेरित नहीं है, क्योंकि आपको शाश्वतता प्राप्त है।

आप इस धारणा का प्रभाव भारतीय लोगों के व्यवहार पर देख सकते हो। भारत में, यदि कोई कार्यक्रम 6 बजे से प्रारम्भ होना है, तो आप निश्चिंत रहो वो 7.30 के पूर्व शुरू नहीं होगा, क्योंकि उनके समक्ष शाश्वतता है।

हमारा सारा मानसिक ढाँचा, हमारे जीवन के तरीके, हमारा समाज, हमारी संस्कृति, हमारा धर्म- सब कूछ हमारे यहाँ आधारित है और किसी चीज पर नहीं, बल्कि मृत्यू के आधार पर। हम बहुत प्रयास करते हैं कि मृत्यू के बारे में न सोचे - परन्तु मृत्यू हमारे जीवन के हर क्षण में व्याप्त रहती है।

जब हम मृत्यू की गहराई उसके रहस्य, उसकी गोपनीयता के बारे में समझ जाएँगे हम जीवन की रहस्य के बारे में भी समझ जाएँगे। हमें मृत्यू को सूलझाने की आवश्यकता है और इसे विभिन्न रूपों में एक निरंतरता के रूप म... वेखना है। नहीं तो जीवन से ही ही हम चूक जाएँगे।

यदि हम यह समझ सके कि मृत्यु और कुछ नहीं बल्कि, दूसरे रूप में निरंतरता

है तो मृत्यु से भयभीत नहीं होंगे और जब हम मृत्यु से भयभीत होना बंद कर देंगे, तब हम यह जान पाएँगे कि जीवन को किस सीमा तक हमने खोया है।

हम जीवन को अत्यन्त सरल मान लेते हैं। हम जीवन जीते हैं बहुत हल्के तरीके से, जीवन के बहुत से पहलूओं को समझने में हम चूक जाते हैं मृत्यु हमें मात्र यह सिखा देती है कि हम अधिक सजगता से जीवन के अन्दर देखें। मृत्यू अब तक का हमारा महानतम गुरु है।

जब हम किसी चीज को सिद्ध करना चाहते हैं, हम उसे दो प्रकार से कर सकते हैं एक, हम प्रयोग कर सकते हैं और अपने आप देख सकते हैं और अपने आप देख सकते हैं, कि सत्य क्या है। दूसरा, हम किसी ऐसे व्यक्ति से संदर्भ ले सकते हैं जिसे पहले ही उसका अनुभव हुआ हो। अब मैं आपको उपनिषद से एक उद्धरण देता हँ।

एक उपनिषद है जिसे कठोपनिषद कहते हैं, जो मृत्यु से एक व्यक्तिगत साक्षात्कार का आश्चर्यजनक वार्तालाप है, एक बालक की यमराज से सीधे वार्तालाप। हिन्दु धर्म में मृत्यु का अधिष्ठाता देवता यमराज है। वह मृत्यु को प्रतिबिम्बित करता है।

एक प्रसिद्ध राजा था जिसका नाम उचैश्रवास था। अचानक उसके अन्दर समस्त संसार पर राज्य करने की कामना ने जन्म लिया इसलिए उसने वाजपेय यज्ञ किया - किसी के द्वारा अग्नि में आहृति डालकर समस्त संसार पर राज्य करने की कामना की पूर्ति के लिए यज्ञ।

डस यज्ञ के नियमों के अनूसार यज्ञकर्ता को हर अत्यन्त लगाव वाली और अत्यन्त कीमत वाली वस्तु को दान में देना पड़ता था।

केवल तब कोई विश्व के राजा का स्थान प्राप्त कर सकता था।

राजा हमेशा से अच्छे व्यवसायी हुए, आपको होना भी चाहिए। अन्यथा वो इतने बड़े राज्य और इतनी बड़ी संपदा पर नियंत्रण कैसे करते। वो ये देखते हैं कि कम से कम देकर अधिक से अधिक कितना वापस लिया जा सके।

राजा ने उपहार देने शूरू किए - वो गाएँ जो बूढ़ी हो चुकी थी, जो अब द्रध नहीं होती थी, जी अब बछड़े पैदा नहीं कर सकती थी और अब मृत्यू को प्राप्त होने वाली थी।

वह इसी तरह की बेकार वस्तूओं को उपहार में दे रहे थे।

उसका पुत्र नचिकेता जो लगभग 7 वर्ष की उम्र का था, देख रहा था कि क्या हो रहा है।

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Section 16

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परन्तु नचिकेता ने बलपूर्वक हठ किया।

उसने कहा, "यदि मैं आपसे इतनी सारी धन सम्पदा ले भी लूँ, तो मैं उसका मात्र रखवाला रहूँगा आपकी सम्पदा का चाहे सौ वर्ष के लिए या हजार वर्ष के लिए बस इतना। एक बार मुझे आपके यहाँ आना ही है और वह काल समाप्त हो जाएगा। वह मेरे किसी काम का नहीं होगा। इसलिए कृपया मुझे इसके बदले में मृत्यु का रहस्य बताइये।"

यमराज ने देखा बालक की परिपक्वता और दढ़ता. जो अन्दर सत्य को जानने के लिए थी।

तब उन्होंने निर्णय लिया कि बालक के समक्ष मृत्यु के जाग्रत अनुभव को प्रगट कर दें।

बालक को वह जिस अनुभव के माध्यम से ले गए, बालक के लिए आत्मिक अनुभव और नचिकेता खिल उठे एवं जाग्रत आत्मज्ञानी हो गए।

यह उपनिषद ली गयी एक खूबसूरत कथा है। इसका यह विश्लेषण मत करो कि यह सत्य है या नहीं। इतिहास और तारीखों के पीछे मत भागो। यह सत्य का संदेश देती है - इतना पर्याप्त है। सत्य तक पहुँचने के लिए इसे सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करो, बजाए इसके कि सीढी से चिपके रहो और सत्य को खोदो।

मृत्यु वह गुरु है जो हमें अपने आप जाग्रति प्रदान करता है। सामान्यतः हमारे सारे जीवन में, मृत्यु ही एक ऐसी चीज है जो समय पर आती है। हम एक मिनट और अधिक नहीं पा सकते। और हमारे जीवन में, मृत्यु हमसे हमारा सब कुछ ले लेती है - हमारे संबंधी, हमारी संपदा, सब कुछ। परन्तु नचिकेता के लिए, मृत्यु ने सब कूछ दिया और आत्मज्ञान भी। यह पक्षपात क्यो? हमारे और नचिकेता के बीच क्या फर्क है?

इसका एक ही कारण है : हम सब मृत्यु से भाग रहे हैं और नचिकेता मृत्यु का सामना करते हैं।

इस अद्भुत कथा से चार चीजों को समझने की आवश्यकता है। पहली चीज : जब हम मृत्यू की खोज में होते हैं उसे जानने के लिये, जब मृत्यू का सामना करने को तैय्यार रहते हैं, तब वह वहाँ नहीं होगी। दसरी चीज : और यदि मृत्यु होती भी है वहाँ, तो वह उतनी डरावनी नहीं होती है जितनी हम सोचते हैं, बल्कि वह वरदान देने वाली और प्रेम करने वाली हो जाती है। तीसरी चीज : मृत्यू हमारी सबसे महान शिक्षक है। चौथी चीज : मृत्यू वह चीज है जो हमें अंतिम उपहार दे सकती है - जाग्रति और आत्मज्ञान।

किसी तरह, अधिकतर लोगों के लिए जीवन स्वाधिष्ठान चक्क से आगे नहीं जा पाता। जीवन मृत्यू के भय को नहीं लांघ पाता। हम जीते हैं और मर जाते हैं मुलाधार और स्वादिष्ठान चक्र के मध्य में - कामना और भय के मध्य में। हम जीवन का कोई और तरीका जानते ही नहीं, या हमारे अन्दर जीवन के किसी अन्य मार्ग को अपनाने का साहस नहीं है।

प्राचीन काल में, लोग बिना किसी जीवन सुरक्षा के रहा करते थे। जैसे कि आज हम लोगों के पास है। महामारियों से बचने के लिए तब किसी प्रकार का टीका उपलब्ध नहीं होता था, प्राक्रतिक आपदाओं का पूर्व संकेत देने वाले उपग्रह भी नहीं थे, बाढ़ और सूखे से कोई सूरक्षा नहीं थी, इसलिए लोग मानसिक रूप से हर वक्त संघर्ष करने के तैयार रहते थे, मृत्यू के लिए भी। खासतौर से युद्ध करने वाला वर्ग मृत्यू के लिए तत्पर रहता था।

प्राचीन जापान के समुराई योद्धा शांति के साथ मृत्यु का सामना करने का मार्ग जानते थे। यदि वे यूद्ध में पराजित होते थे, तो वे एक लंबी सुई अपने स्वादिष्ठान चक्र में प्रवेश करा देते थे। यह एक उच्च रहस्यमय तकनीक है, जिससे कि स्वादिष्ठान चक्र में एकत्र जीवन ऊर्जा मुक्त की जाती है, जिसकी परिणाति पीड़ाहीन मृत्यु होती है। यह प्रक्रिया हारा-कीरी के नाम से जानी जाती थी।

हम सब निरंतर मृत्यु के भय में जीते हैं। हम हर कीमत पर उससे बचना चाहते हैं। मृत्यु को सबसे बड़े शत्रु के रूप में देखा जाता है।

सूकरात के बारे में एक छोटी कथा :

सकरात की हत्या आपको हेमलॉक नामक जड़ी का विषैला रस पिलाकर की गयी थी। मात्र इसके पूर्व कि वो जहर पीते, उनके एक अनुयायी ने उनसे पूछा "गुरु, क्या आपको मरने का भय नहीं है, आप कितने शांत लगते हैं?"

सूकरात ने उत्तर दिया, "मैं क्यों भयभीत होऊँ? मैं जानता हूँ कि मृत्यू के पश्चात केवल दो चीजें हो सकती है। या तो मेरा अस्‍तित्‍व किसी न किसी रूप में रहेगा या मृत्यु के पश्चात् मेरा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। पूर्व की स्थिति में चिंतित होने की कोई बात नहीं है और बाद की स्थिति में कौन रहेगा चिंता करने के लिए? तो दोनों स्थितियसों में किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।''

सुकरात मृत्यु से पूर्णरूपेण भयरहित थे, क्योंकि आपको मृत्यु की और उसकी परिणाति की स्पष्ट समझ थी। मृत्यु को हमेशा एक अंत के रूप में देखा जाता है इसीलिए लोग भयभीत होते हैं, जब वो मृत्यू को देखते हैं। मृत्यु को मौलिक समझ का अभाव है।

मृत्यू कभी भी अंत नहीं है। वह निरंतरता है किसी दूसरे रूप में, या मात्र मुक्ति बस इतना। जब मनुष्य उसे समझ लेगा, तब वह यह महसूस करेगा कि मृत्यू को भय से प्रभावित रहना कितना मूर्खतापूर्ण है। क्योंकि मनुष्य का अपने भौतिक स्वरूप से इतना लगाव है, यही कारण है कि वो इतना अधिक प्रभावित होता है। शरीर आत्मा के लिए मात्र एक वाहन है। यह बात बहुत स्पष्ट रूप से समझने की आवश्यकता है।

हालांकि इस पृथ्वी ग्रह पर मनुष्य के लिए एक मात्र निश्चित चीज मृत्यू है, परन्तु जब वह घटती है तो वह हमेशा आश्चर्यचकित होता है। मनुष्य के बारे में यह सबसे आश्चर्यजनक बात है।

एक छोटी कथा :

एक महिला अपना 100वाँ जन्मदिन मना रही थी।

इस अवसर पर उसका पूरा परिवार उपस्थित था।

वे परिजनों और मित्रों से प्राप्त सारे उपहारों को खोल रहे थे और कार्डों को पढ़ रहे थे।

उस महिला को उन लोगों ने उसकी 94 वर्ष की मित्र के द्वारा भेजा गया कार्ड दिखाया।

वह महिला चीखी, ''हे भगवान्! वह अब भी जीवित है।''

हम मृत्यू की संभावना का आरोपण दूसरों पर करते हैं सिवाए अपने आप पर। हम सब इसी तरह के हैं। जीवन में हम हर चीज के लिए तैयार हैं सिवाए अपनी मृत्यू के। विडंबना यह है, कि हमारे जीवन में हर चीज अनिश्चित है सिवाए मृत्यू के, जीवन में केवल एक चीज निश्चित है वह है मृत्यू। परन्तु सबसे आखिरी बात जो हम सूनना पसंद करेंगे, आज या कल वो यह है कि हम मरने जा रहे हैं। भगवान रमण महर्षि को चैतन्य मृत्यू की प्राप्ति सजग अनुभव द्वारा ही हुई थी। जब रमण यूवा थे, मदूराई में अपने चाचा के यहाँ अपने यहाँ अपने बिस्तर पर लेटे हुए थे। अचानक आपको ऐसा अनुभव हुआ कि वो मरने जा रहे हैं। आपको लगा कि अब उनकी मृत्यू होगी।

उनके पास दो विकल्प थे - या तो उस भाव का प्रतिरोध करते, या उसे स्वीकार करते और उसके अनुभव से गूजरते।

सामान्यतः लोग प्रतिरोध करते हैं, इसलिए वो संज्ञाहीन अवस्था कोमा में चले जाते हैं और शरीर को अचेत अवस्था में छोड़ते हैं।

हममें से 99 फीसदी लोग अपने शरीर को अचेतावस्था में ही छोड़ते हैं।

हालांकि हम इस बात को जन्म के क्षण से जानते हैं कि हमारे जीवन की परिणति मुत्यु है, हम इसे समझने का कभी प्रयास नहीं करते, हम इस संभावना की वास्तविकता को समझने का कभी प्रयास नहीं करते, हम इसका कभी स्वागत करने का प्रयास नहीं करते।

यदि एक बार इसके माध्यम से आप सजगता के साथ गुजरो, आप मृत्यु का का भय स्वतः ही त्याग दोगे।

रमण में पर्याप्त साहस था, इसलिए उन्होंने दूसरा मार्ग चुना। उन्होंने उस अनुभव के साथ सहयोग किया।

उन्होंने मृत्यू को होने दिया। उन्होंने निर्णय लिया कि वह देखेंगे कि मत्यू होते समय क्या होता है?

उन्होंने स्पष्ट रूप से देखा कि एक-एक करके उनके शरीर का एक-एक भाग मृत्यु को प्राप्त हो रहा था।

धीरे-धीरे उनका संपूर्ण शरीर मृत था। उन्होंने देखा उनका शरीर राख में परिवर्तित हो गया।

अचानक उन्होंने अनुभव किया कि उसके बाद भी कोई चीज बची हुई है, कोई चीज जिसको नष्ट नहीं किया जा सकता। आपको झटका लगा कि उस वक्त वो शूद्ध चैतन्य रूप में जीवित थे, शरीर और मस्तिष्क से परे। वह मात्र साक्षी थे सब चीजों के।

यह एक प्रचण्ड ज्ञान था, जिसका उन्होंने साथ नहीं छोड़ा तब भी जब वह पुनः अपने शरीर में आये। इस बार वो महर्षि भगवान रमण थे - एक जाग्रत गुरु। जब आप मुत्यू के भय पर विजय प्राप्त करते हैं, आप स्वयं मुत्यु पर विजय प्राप्त कर लेते हो, क्योंकि मृत्यू एक और परिकल्पना मात्र है। इसी तरह से जैसे हमारे मुलाधार चक्र में हमारा लोभ इस बात की परिकल्पना करवाता हैं कि संसार जैसा वास्तव में है उससे अधिक खुबसुरत होगा, यहाँ हमारा भय हमें यह कल्पना करने के लिए विवश करता है कि मृत्यू वास्तव में जैसी है उससे अधिक भयावह है।

हम लोभ और भय का चश्मा धारण किये रहते हैं। हम अपने आप को सच्चाई को देखने ही नहीं देते। जब आप मृत्यू का अनुभव मनोवैज्ञानिक तरीके से कर लेते हो, आप स्वाधिष्ठान चक्र में बाधित ऊर्जा को मृक्त करते हो जो मृत्यू के भय से बाधित रहती है, तब स्वाधिष्ठान चक्र खुल जाता है जीवन का संपूर्ण स्वरूप बदल जाता है।

मुत्यू को दसरे प्रकार में एक निरंतरता के रूप में स्वीकार करने के कारण

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Section 18

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पति और पत्नी के मध्य, यह भय बना रहता है कि दूसरा अन्य विवाह के बारे में न सोचने लगे। माता और पूत्र के मध्य यह भय बना रहा है कि पूत्र माता के स्थान पर अपनी पत्नी की तरफ अधिक ध्यान न देने लगे। पिता और पूत्र के मध्य यह भय बना रहता है कि पिता अपना वारिस किसी अन्य को न बना दे या पुत्र परिवार की प्रतिष्ठा न बचा पाये।

इसी तरह किसी भी संबंध में एक अन्तर्निहित अपेक्षा होती है, जिसे पूर्ण करने की और सुरक्षित रखने की आवश्यकता होती है, और यह है जो भय को बढ़ाता है। मैं आपसे बताता हूँ : आप कभी भी किसी संबंध को पूर्णता से संतूष्ट नहीं कर सकते। जिसने भी आज तक पूरे परिवार को खुश करने की कोशिश की वह केवल एक बहिष्कृत बन जाता है।

यदि एक संबंध का आधार शुद्ध प्रेम हो, बिना किसी अन्तर्निहित कारण के - तो उसी तरह का प्रेम होगा जिस तरह का प्रेम हमने अनाहत चक्र के बारे में बात करते हुए बताया था, तब कोई भय तत्व रहेगा ही नहीं।

आप जानते ही नहीं किस प्रकार की मुक्ति का अनुभव होता है, जब आप भय से प्रेम की तरफ बढ़ जाते हो। भय हमेशा एक बंधन है, प्रेम हमेशा एक मुक्ति है। परन्तु जब तक समाज आपके अन्दर भय न प्रतिस्थापित कर दे, तब तक आप उसकी सुनोगे ही नहीं, इसलिए वो हर संभावित तरीके के माध्यम से आपके अन्दर भय प्रतिस्थापित कर देता है - असुरक्षा के माध्यम से, कानून के माध्यम से, नियमों के माध्यम से, पूजा-अर्चना के माध्यम से एवं अन्य-अनेक माध्यम से।

समाज आपको एक संत बनाना चाहता है - ऐसा संत जो अस्तित्व और हर चीज से हर वक्त डरता रहे। मैं यहाँ आपको इस तरह का कोई संत नहीं बनाने आया हूँ। मैं यहाँ आपको परमानन्दित करने आया हूँ। जब आप परमानन्दित रहोगे, आप जीवन से परिपूर्ण होगे, जीवित और सजग।

किसी तरह से, भय ही है जो हमारे संबंधों में ईर्ष्या का रूप ले लेता है। हमारी अधिकतर क्रियाओं और भावनाओं के पीछे भय का ही भाव रहता है। ईष्यर्स, क्रोध, लोभ - ये सारे भाव भय में ही बीजारोपित है। परन्तु हम इस बात से जागरूक नहीं है। हम नहीं जानते कि भय ही कारण है इन सब चीजों का। समस्या यही है। जहाँ तक हमारे व्यवहारिक स्वरूपों का प्रश्न होता है इसी कारण से हम उनमें लगातार अंधकार में ही रहते हैं। यही कारण है कि संबंधों की परिणति पीड़ादायक होती है।

समझो : भय और प्रेम दोनों एक साथ नहीं रह सकते। यदि किसी संबंध में शुद्ध

प्रेम है, वहाँ भय हो ही नहीं सकता। यदि कहीं भय है, वहाँ शुद्ध प्रेम कभी नहीं हो सकता। बहुत स्पष्ट रहो : जहाँ संबंधों में सज्जहित स्वार्थ होगा, जहाँ संबंधों में कोई कारण होगा, कोई लक्ष्य होगा, सुरक्षा की कोई अपेक्षा होगी या लोभ होगा या संबंधों में प्रतिफल की अपेक्षा होगी, यही कारण होगा भय के स्थापित होने के।

हम हर संबंध में सूरक्षा देखते हैं। आराम से व्यवस्थित होने में हम उस सुरक्षा की आवश्यकता महसूस करते हैं। यह वास्तव में एक प्रकार की कैद है जिसका भाग हम कर सकते हैं। लोग स्वतंत्रता की बात करते हैं, परन्तु मैं आपको बताता हूँ : वह इतना भयभीत रहते हैं इससे। कि वो केवल कैद चाहते ही हैं। कैद के गद्देदार आरामदेय प्रभाव में वे सोचते हैं कि वे स्वतंत्र हैं।

एक छोटी कथा :

एक छोटी लड़की ने एक दिन अपने पिता से कहा, "पिताजी, 'निश्चित' शब्द का अर्थ क्या होता है ?

पिता ने उत्तर दिया, "इसका अर्थ है कि कोई चीज अच्छी तरह बनायी गयी है और अधिक समय तक रहेगी।"

उस रात सोने जाने के पूर्व, उस लड़की ने कहा, "शूभरात्रि निश्चित पिताजी। ''

हम सब अपने जीवन में निरंतर सूरक्षा की ही तलाश में रहते हैं। परन्तू हम कहते ये हैं कि हम स्वतंत्रता की तलाश में। यदि हम वास्तव में स्वतंत्रता की तलाश में हैं, तो सुरक्षा की तलाश क्यों कर रहे हैं? भय क्यों? जब तक आपके अन्दर भय है, आप सूरक्षा तलाशते होगे। तब तक आप अपने आप को धोखा देते रहोगे, यह कहते हुए कि आप स्वतंत्रता चाहते हो।

एक गुरु वह है जो आपको जीवन की विषम असूरक्षा में फेंक देगा। केवल वह अकेला है जो आपको पूर्ण स्वतंत्रता देता है। यही कारण है कि उसके साथ, आप असुरक्षित महसूस करते हो, आप डरे हुए रहते हो। स्वतंत्रता भय पैदा करती है। अन्य संबंधों में क्योंकि लोभ का, भय का और क्रोध का व्यवस्थापन रहता है परिचित स्वरूपों में, इसलिए आप विषम क्रोध का अनुभव नहीं करते, उन संबंधों में परिचित स्वरूपों के कारण। परन्तु एक गुरु के साथ, आप पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। इसलिए आप भयभीत रहते हो।

एक छोटी कथा :

एक व्यक्ति 20 वर्ष तक कैद में था।

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Section 20

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Section 21

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अपने शरीर के अन्दर, तब अम अपने शरीर को शांति के साथ छोड़ भी देंगे। समस्या यह है, कि जब हम जीवित रहते हैं, हम हमेशा शरीर से बाहर रहते हैं, अन्दर कभी नहीं।

मैं आपको इसे समझाता हूँ : मात्र गहराई से अपने जीवन के तरीके को देखो। प्रातःकाल जब आप अपने दाँतों में मंजन करते हो, आप क्या रहे होते हो? आप सोचते रहते हो, काम पर जाने के बारे में। जब आप काम पर होते हो, आप सोचते रहते हो, बस पकडकर घर जाने के बारे में। जब आप घर पर होते हो, तब आप दूसरे दिन के काम के बारे में सोचते रहते हो। जब आप छुट्टी पर होते हो, तब आप कार्यालय के बारे में सोचते हो और जब आप कार्यालय में होते हो, आप छूट्टी पर जाने के बारे में सोचते रहते हो।

आपका शरीर जहाँ भी रहता हो, आप निश्चित रहो आपका मन वहाँ नहीं होगा। आप अपने जीवन का कोई भी क्षण पूर्णता से नहीं जिये। आप या तो हमेशा पूर्व में जिये या भविष्य में। यह है जिसे कहते हैं, 'अपनी सीमाओं में न जीना'। यही कारण है कि मृत्यू के समय आप पूर्वाग्रसित और अपूर्ण अनुभव करते हो और जाने के लिए इच्छुक नहीं रहते और इसलिए आप मृत्यु से डरते हो।

आप पूछ सकते हो कि सजगता से मरना जानने की आपको क्या आवश्यकता है? मैं आपको बताता हूँ : केवल तब जब आप मृत्यु के बारे में जानोगे, आप जीवन को सही तरीके से समझ कर जी सकोगे। अन्यथा, आप जीवन को सही तरीके से नहीं जियोगे।

जीवन में, आप हर चीज को टालते रहते हो। आप अपने सुख को टालते हो, आप अपने कार्य को टालते हो, आप हर चीज को कल पर टालते हो। आपको यह समझना होना कि 'कल' केवल 'आज' के रूप में ही आएगा। जब वह आज के रूप में आ जाता है, आप कहते हो फिर कल। यह वह खेल है जो आप अपने साथ खेल रहे हो।

अन्ततोगत्वा जब मृत्यू आ जाती हे, तो आप एकदम तैयार नहीं रहते। आप सोचते हो कि अभी कितना कुछ करना बाकी है। आप महसूस करते हो कि स्वयं जीवन ने आपको छला है। सच्चाई यह है कि आप सारे जीवन अपने आप को धोखा देते आए हो और आप आज हर चीज के लिए जीवन को दोष दे रहे हो, इसलिए आपके लिए मृत्यु को समझना स्पष्ट रूप से आवश्यक है जिससे कि आप सही तरीके से जी सको। इसके पश्चात् कहीं कोई भ्रम नहीं होगा और आप तैयार रहोगे मृत्यु के लिए, जब समय आएगा।

टालमटोल करना एक मानसिकता है, जिसके कारण जीवन में बहुत सी चीजों को खो देते हैं। लोग मुझसे पूछते हैं, "गुरु जी, आप इतनी सारी चीजें इतने कम समय में कैसे कर लेते हैं?" उनका हर वर्ष का कैलेण्डर देखकर आश्चर्य होता है। वो यह देखकर आश्चर्यचकित होते हैं कि विभिन्न चीजें पूरे साल, पूरे विश्व में कैसे होती है? मैं उनसे बताता हूँ : "यह बहुत साधारण है - मैं पूर्णता से वर्तमान में जीता हूँ। मैं आपकी तरह टालमटोल नहीं करता।''

चीजों को टालने का आपका रुझान आपको हारा हुआ महसूस कराती है। हालांकि आप हारा हुआ महसूस करते हो, परन्तू फिर भी आप टालमटोल रोकने का प्रयास नहीं करते। हमारे ध्यान कार्यक्रम में, हम लोगों को एक निर्देशित ध्यान कराते हैं जिसमें उनसे बताया जाता है कि वो परिकल्पना करें कि मात्र 24 घण्टे में मर जाएँगे और आपको सारे कार्य पूर्ण कर लेने हैं, जो आपको करना है मरने के पूर्व। यह एक बहुत खूबसूरत ध्यान तकनीक है। आपको उनके मृत्यू के पश्चात के उत्सव की भी परिकल्पना करायी जाती है।

एक बार इस ध्यान के बाद, एक वयस्क लड़की अपने अनुभव बताने आयी। उसने कहा, "गुरु जी, मैंने एक दुकान में एक विज्ञापन पटल देखा, जिस पर लिखा हुआ था, जब आप योजना बनाओ, भविष्य के वर्षों का भी ध्यान रखकर योजना बनाओ। जब आप क्रियान्वयन करो, तो क्रियान्वयन इस तरीके से करो कि जैसे अगले क्षण आप मरने जा रहे हो। इस ध्यान को करने के पश्चात मैं समझती हूँ कि वास्तव में इसका क्या अर्थ है।"

मैंने कहा, "सुन्दर।"

आप देखो, जब आप योजना बनाते हो, तो भविष्य की योजना का भी ध्यान आपको रखना रहता है, जिससे कि बहुत सी चीजों को कम से कम कुछ वर्षों तक तो पुनर्व्यवस्थित न करना पड़े। परनु जब आप क्रियान्वयन करते हो, आपको इस ढंग से क्रियान्वयन करना पड़ता है कि हर छोटा कार्य जो उस बडी योजना में आप लेते हो, वह पूर्णता से सफल हो और उसका कोई भी सिरा अछूता न रह जाये।

चाहे आप मरने ही क्यों न जा रहे हो, उस बिन्दु तक जहाँ तक क्रियान्वयन हो चुका है, सब कुछ एकदम सही रहेगा और मुख्य योजना लोगों के सामने रह जायेगी, देखने के लिए, अनुपालन करने के लिए और संशोधित करने के लिए जैसे परिस्थितियों की माँ हो। यह स्थिति केवल तभी प्राप्त की जा सकती है, जब आप बिना टालमटोल किये कार्य करो हर छोटे से छोटे कार्य में जो आप करने के लिए लो।

कई बार, टालमटोल ही है जो आपको निर्धनता की तरफ ले जाती है। निर्धनता आपका अपना चयन है। जब आप अपने निर्णयों को टालते हो, आप गरीबी की तरफ कदम बढ़ाते हो। परन्त आप परमानन्दित रूप से इस चीज से अनभिज्ञ रहते हो। आप महसुस करते हो कि आपको ईश्वर द्वारा सही तरीके से ध्यान नहीं रखा गया और जीवन बहत छोटा रहा आपके स्वप्नों को पूरा करने के लिए। यदि आपने अपनी समस्त ऊर्जा को सही तरीके से स्पष्टता के साथ प्रयोग किया होता, तो आप इस तरह से महसूस न कर रहे होते और आप मृत्यू के लिए तैयार होते।

यदि आप प्रतिदिन दर्पण के समक्ष अपने आप से मात्र यह कहो कि आज आपके जीवन का आखिरी दिन है, आप टालमटोल करना बंद कर दोगे। आपको सारे जीवन अपने आप से यह कहने की आवश्यकता नहीं है, बस एक महीना पर्याप्त होगा। आप अपना जीवन बिना टालमटोल के स्वतः ही जीना शूरू कर दोगे। यही नहीं आपकी इज्जत जानने का भय भी खत्म हो जाएगा, लज्जा, मान, अपेक्षाएँ सब समाप्त हो जाएँगी, क्योंकि आप जानोगे कि आपके पास खोने के लिए कुछ है ही नहीं।

जो लोग मृत्यु का निकटता से किसी न किसी रूप में अनुभव कर लेते हैं जैसे दुर्घटना से बारीकी से बचना या कैंसर का इलाज करके बच जाना या इस तरह की कोई चीज, वो ज्यादा निर्भीकता से जीवन जी सकेंगे। क्योंकि वो जानेंगे कि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। वो अपना जीवन अधिक स्पष्टता और अधिक बुद्धिमत्ता के साथ जियेंगे।

अपनी समस्त शिक्षा से जो पहला सबक आपको सीखने की आवश्कयता है वह यह है कि आपको सही चीज, सही समय पर करना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए। पर किसी तरह, यह आखिरी सबक रहता है हमारे लिये, हर सबक पढ़ने के बाद अंत में हम यह सबक सीखते हैं। टालमटोल एक ऐसी चीज है जिसे आप अपने आप लाते हो। लेकिन बाकी को भय समाज आपके अन्दर भर देता है। समाज आपको अपने आप से भयभीत कर देता है, दूसरों से भयभीत कराता है, ईश्वर से भयभीत कराता है। है। आपको अपने आप से बहुत छोटी चीजों के लिए भयभीत कराता है जैसे नैतिकता, नाम और स्वरूप, प्रतिष्ठा और क्या नहीं।

नैतिकता के नाम पर वह आपसे आपके अन्दर अपना आत्मविश्वास खत्म कर देता है। इसलिए आप अपने बारे में ही अनिश्चित हो जाते हो, जब बात नैतिकता की आती है। जब आप नैतिकता का पालन भय के कारण करने लगोगे तो आपके आंतरिक ब्रद्धिमत्ता को मदद करने कोई मार्ग नहीं होगा। जब लोग मुझे

किसी महिला के साथ यात्रा करते हुए देखते हैं, "गरु जी, आप कैसे, एक आध्यात्मिक प्रमुख होकर के किसी महिला के साथ यात्रा कर रहे हैं? क्या लोग आपके बारे में बातें नहीं करेंगे?''

पहली बात, वे भूल रहे हैं कि वो एक जाग्रत गुरु से बातें कर रहे हैं और यदि वो पूर्णता सजग हैं कि वो किससे बात कर रहे हैं, तो वे इस प्रश्‍न को लेकर खड़े नहीं होंगे? किसी तरह से, मुझे आपको उसी भाषा में उत्तर देना है, जिस भाषा में उन्होंने प्रश्न किया इसलिए मैं उनसे कहता हूँ, "मुझे अपने ऊपर विश्वास है और महिला को मेरे ऊपर विश्वास है, आप क्यों चिंतित हैं?''

वे मात्र हतप्रभ होते हैं, जब मैं यह कहता हैं।

Section 22

हमारे जीवन में नैतिकता और कुछ नहीं, बल्कि सही समझ का ओछा विकल्प है। जब आप अपनी बुद्धिमत्ता से क्रिया करते हैं आपको अपने ऊपर विश्वास होता है। परन्तु जब आप कानून और नियमों के आधार पर क्रिया करते हैं, आपको अपने ऊपर कभी विश्वास हो ही नहीं सकता, क्योंकि आप अपने आप में प्रारम्भ नहीं करते। आप अपने आप में केन्द्रित नहीं रहते आप नियमों पर केन्द्रित रहते हैं।

यदि आप बुद्धिमत्ता से जीते हैं, इस तरह के भय आपको कभी ग्रसित नहीं करेंगे। जो लोग नैतिकता का उपदेश देते हैं। वो अत्यन्त गहरे भय से ग्रसित रहते हैं। यही कारण है कि वे इसका उपदेश देते हैं। वो डरे हुए रहते हैं या तो इसलिए, क्योंकि आपको अपने ऊपर विश्वास नहीं होता और या तो जानते हैं कि वो नैतिक केवल भय के कारण हैं। तथाकथित जो नैतिक हैं वे। अपनी नैतिकता और नियमबद्धता की अवधारणा के कारण मनोरोगी भी बन सकते हैं। एक छोटी कथा :

एक बार एक नैतिक था जो सामान्यतः सड़क पर बहुत नपे-तुले कदमों से चला करता था।

एक दिन अचानक बहुत तीव्र गति से वर्षा होने लगी।

जो नैतिक था वो भीड के साथ भागा। कुछ दूर भागने के बाद, उसने यह महसूस किया कि वो अपने चलने के व्यवहार के प्रति असावधान हो गया था।

उसने अपने आप से कहा, "मैं क्या कर रहा हूँ? दौड़ना अशोभनीय है। एक भले आदमी को गलती मानते हुए अपनी गलती को सूधार लेना चाहिए, यदि उसने कोई गलती की है तो।"

उसके पश्चात वो वापस उसी वर्षा के स्थान पर आ गया, जहाँ से वो

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भागकर गया था, और पुनः अपने पूर्व के तरीके से नपे-तूले कदमों में चलने लगा।

नैतिकता आपको पूर्णतः सुस्त और मृत बना देती है।

एक बात समझो : जब मैं यह बात आपसे कहता हूँ, तो मैं आपसे यह नहीं कह रहा हूँ कि यह एक मुक्त संसार है और आप जो भी चाहो वो कर सकते हो। मैं आपसे अपनी बुद्धिमत्ता को बढ़ाने के लिए कह रहा हूँ और इस तरह से जीने के लिए कह रहा हूँ कि नियम व कानून उस चीज की पुष्टि करे, जो आप पहले से जानते और महसूस करते हो। यह सच्ची बुद्धिमत्ता है। कोई भी उचित नियम केवल पुष्टि करेगा, उस बात की जो सही ढंग से बुद्धिमानीपूर्वक सोची गयी है। तो अपने भय का परित्याग करो और खोजने का प्रयास करो अपनी आंतरिक बुद्धिमत्ता को, प्रज्ञा को, अपने अन्तःकरण की आवाज को, अपने अन्तःकरण के गुरु को।

एक छोटी कथा :

एक यूवा सन्यासी सड़क की दूसरी तरफ एक दरबारी नर्तकी के सामने वाले घर में रहता था।

सन्यासी हर समय ध्यान करने का प्रयास करता था।

नर्तकी दूसरी तरफ अपने ढंग से धनोपार्जन में लगी हुई थी।

लोग उसके घर आते थे और घर से जाते थे।

सन्यासी अपनी पुरी कोशिश से एकाग्र होकर ध्यान करने का प्रयास करता था, परन्तु उसका ध्यान उस यूवा महिला के प्रति अधिक लगा हआ था और वो हमेशा उसे कोसता रहता था कि किस तरीके का अनैतिक जीवन वो जी रही है।

दूसरी तरफ नर्तकी को ये भी भान नहीं था कि सडक के उस पार कोई सन्यासी भी रहता है।

पुरुषों को सूख देने की अपनी जीवन शैली के बावजूद वह नर्तकी भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबी हुई थी और जो भी समय मिलता था, वो उनकी प्रार्थना और उनके स्वरूप से खेलने में बिताती थी।

सन्यासी और वह नर्तकी एक ही दिन मृत्यु को प्राप्त हुए और यमराज के दरवाजे पर पहुँचे - मृत्यु के देवता के घर।

जब उनके अभिलेखों का विश्लेषण किया गया, तो नर्तकी को स्वर्ग भेजा गया और सन्यासी को नर्क में भेजा गया।

सन्यासी ने यमराज की इस न्याय व्यवस्था में व्याप्त अन्याय के बारे में पूछा है।

यमराज ने शांति से सन्यासी को समझाया : "आपने सारा जीवन ध्यान की आड़ में अपने अन्दर उस नर्तकी के प्रति लिप्सा को पाला। वह दूसरी तरफ, बावजूद इसके कि वो क्या कर रही थी, पूर्णतः ईश्वर की सच्चाई के प्रति केन्द्रित थी। "

जो नैतिक होते हैं वो सतही, डरा हुआ और छिछला जीवन जीते हैं। वो पूर्णता से नहीं जीते। नैतिकता से उनके कदम हट न जाएँ, वे निरंतर इस भय से ग्रसित रहते हैं। उनका सच्चा अभिप्राय नैतिकता की आड़ के पीछे छुपा रहता है। समस्या यही है कि आपको क्रिया करनी पड़ती है, नैतिक नियमों के आधार पर बजाए अपनी आंतरिक बुद्धिमत्ता से।

जब आप अपनी बुद्धिमत्ता से क्रिया करोगे, आपके अन्दर एक प्रकार की शुद्धता होगी। जब आप वाह्य दीवार पर खडे होकर के नैतिक निर्मों के आधार पर क्रिया करोगे, आपमें न तो कोई खूबसूरती होगी और न शुद्धता।

जो डरे हुए होते हैं और जिन्हें अपने ऊपर विश्वास नहीं होता, वो नैतिक नियमों को बनाते हैं और उनका पालन करते हैं। जो बुद्धिमान होते हैं, वो अपने आप मात्र क्रिया करते हैं, सही चीज को करते हैं, गहराई से केन्द्रित होकर के क्रिया करते हैं और बिना भय के क्रिया करते हैं।

नैतिकता की ही तरह, प्रतिष्ठा भी भय को बढ़ाती को बढ़ाती है, प्रतिष्ठा, नाम और शोहरत, सामाजिक स्तर - ये सब भय को बढ़ाते हैं। ये भय और कुछ नहीं, बल्कि आपके अहम का भय है। किस प्रतिष्ठा को आप ढकने प्रयास कर रहे हो? मात्र आंतरिक परिपूर्णता और गरिमा के साथ जियो, इतना पर्याप्त है। जो लोग अपनी प्रतिष्ठा बचाने में लगे रहते हैं वो सबसे पाखण्डी हैं इस पुथ्वी ग्रह पर।

और यही वो लोग है, जो निरंतर भयग्रसित रहते हैं। उनकी तथाकथित प्रतिष्ठा उनके ऊपर इस तरह का नियंत्रण किये रहती है।

एक छोटी कथा :

एक व्यक्ति नदी में मछली पकड़ रहा था।

वो बहुत देर से बैठा था, बिना एक भी मछली पकड़े हुए।

वो मछली पकड़ने वाली छड़ी हाथ में लेकर के ऊँघ रहा था।

अचानक, एक बहुत बड़ी मछली डोर में फँसी और डोर अपनी तरफ खींची।

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इसके पूर्व कि वह आदमी जाग पाता, वह पानी में लूढ़क गया। एक लड़का ये सब देख रहा था, उसने अपने पिताजी से पुछा, "पिताजी क्या ये मछली पकड़ रहा था या मछली इसे पकड़ रही थी?"

प्रतिष्ठा के साथ भी आपको बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है। जब प्रतिष्ठा आपके लिए जीवन से बड़ी हो जाती है, वह आपको निगलना शुरू कर देगी। वह आपको मात्र खत्म कर देगी, इतना पर्याप्त है। आपको और अधिक उसकी खोज में जाने की आवश्यकता नहीं है।

और आप इस बात के लिए क्यों डरे हुए हो कि आपकी प्रष्ठिता खो जाएगी? क्योंकि आपकी प्रतिष्ठा आपको यह अहसास दिलाती है कि आप अति विशिष्ट हो। आपकी प्रतिष्ठा आपको समाज में एक ठोस पहचान देती है। धन और प्रतिष्ठा से सम्पन्न लोग इस तरीके की मूर्खतापूर्ण और अनैतिक चीजें करते हैं और उसी के साथ रहते हैं। लोग उन्हीं लोगों के पीठ पीछे बुराई करते हैं और सामने आने पर उनका स्वागत करते हैं, उनकी शक्ति और प्रतिष्ठा के कारण। यह इसी प्रकार की प्रतिष्ठा है जिसे वो सावधानी से सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहे हैं। एक बात मैं आपको बता देता हूँ : अस्‍तित्‍व आपका चयन कभी नहीं करेगी, यदि आप इस तरह के हुए तो। इस भौतिक जगत में, आप जो भी चाहो उसे पा सकते हो, आप देखने में सफल भी लग सकते हो, परन्तु अस्तित्व के नजर में आप निर्धन ही रहोगे। चयनित करने के अस्तित्व के अपने तरीके हैं। इस बात को अच्छी तरह से समझ लो कि प्रतिष्ठा, नाम, शोहरत और शक्ति ये सब आपकी अपनी परिकल्पनायें हैं। आप इन्हें जीवन प्रदान करते हो, आप इनका निर्माण करते हो, इन्हें बढ़ाते हो और फिर इन्हें खोने के डर से भयभीत करते हो।

अपने आस-पास की चीजों के लिए और लोगों के लिए मात्र असीमित प्रेम के साथ जियो। जो भी आपके मार्ग में आये, उसके लिए अपने अन्दर गहरा प्रेम अनुभव करो। यदि आप इस तरह से जियोगे, प्रतिष्ठा स्वतः ही आपके पास आएगी। लोग आपका सम्मान आपके गुणों के करण करेंगे, न कि आपके आकार के कारण और इस तरीके की प्रतिष्ठा का, खोने का भी कोई भय नहीं होता, आपको हमेशा सुरक्षित भी नहीं करना पड़ता, आप इन सब भयों से मात्र मुक्त हो जाते हो।

यहाँ तक कि इस बात का भय कि लोग क्या कहेंगे, इत्यादि। एक तरह से अपनी प्रतिष्ठा खोने का भय होता है। जब आप किसी समूह के समक्ष कुछ कहने में डरते हो, आप वास्तव में इस बात से भयभीत रहते हो कि लोग आपके बारे में

क्या कहेंगे। आप इस बात से भयभीत रहते हो कि जो कुछ भी लोग कह सकते हैं, उससे आपकी प्रतिष्ठा पर आघात आ सकता है। अपने अहम की रक्षा करने का यह एक निष्क्रिय स्वरूप है। भय बहुत कुछ आपके अहम का ही प्रकटीकरण है। इस बात को समझो।

क्या हुआ, यदि लोग आपके बात का अनुमोदन नहीं करते? आप जब भी बोलो पूर्णता की अनुभूति लिए हए बोलो, इतना पर्याप्त है। मात्र अपने आप में खूश रहो और उसे करो, दूसरे उसके बारे में क्या कहेंगे, इस बात की चिंता मत करो। जिस क्षण आप इस बात से भयभीत होते हो कि लोग क्या कहेंगे, आप अपने अहम की रक्षा करने लगते हो।

प्रतिष्ठा के प्रभावित होने का भय भी एक कारण है कि लोग डरते हैं, जब वे ध्यान करने जाते हैं। जब आप ध्यान में जाते हो, इस बात का भय हमेशा बना रहता है कि आप अपने आप को अस्तित्व के प्रति खो दो, उस विद्यमान ऊर्जा के प्रति जो आपके चारों तरफ पैली हुई है, इसलिए आप रुक जाते हो। आप ध्यान का विरोध करने लगते हो। बजाए उसके, यदि मैं आप से कुछ गाने के लिए कहूँ, आप खुशी-खुशी गाओगे। तब वहाँ कोई भय नहीं होगा।

आपको आपके अहम के खत्म होने का इतना अधिक भय होता है। यदि वह समाप्त हो गया, जितने लेबलों के द्वारा अपनी पहचान करते हो, वे भी समाप्त हो जाएँगे। यह आपके अहम के लिए बहुत अधिक होता है। आप 'कोई नहीं' बन जाते हो। इसलिए आप विरोध करते हो कि आप कम से कम अपने आप के लिए ही 'कोई है' बने रहो। यह विरोध शुद्ध रूप से आपके अहम का भी भय होता है। आप असुरक्षित बन जाने से इतना डरते हो, हल्के बन जाने से डरते हो।

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भय भी एक कारण है, जिसके कारण सामाजिक घेरों में लोग इतनी बातें करते हैं। यदि आप लोगों का अवलोकन करो, वे अपने आप को कितना बाध्य महसूस करेंगे, अपनी तरफ से भी कुछ कहने के लिए। वे महसूस करते हैं कि आपको कुछ न कुछ कहना ही है अन्यथा लोग आपको अनुपयुक्त समझ लेंगे। इसलिए वो कुछ न कुछ कहते हैं- चाहे उसका मतलब न निकलता हो। ये सब सूक्ष्म प्रकटीकरण हैं भय के जो आपके महसूस करना कठिन है।

प्रश्‍न : गुरु जी, आपने उस 'अज्ञात' के भय के बारे में बोला था। क्या आप और उसे स्पष्ट करेंगे.......?

हाँ, मैं उस पर आता हँ।

आप देखो : अज्ञात का भय और कुछ नहीं, बल्कि उस भय की तरह है जो हम लोगों को अंधेरों का है, जो भय भूत-प्रेतों का है, जो भय ईश्वर का है और अंत में जो भय हमें हमारी मृत्यु का है।

वास्तव में, हम अपने से भयभीत हैं। यह एक सत्य है। हम अपने भय का सामना करने से डरते हैं, इसलिए हम अपने भय का बहत बड़ा अनुपात बनने देते हैं और उससे अधिक से अधिक भयभीत रहते हैं।

एक छोटी कथा :

एक व्यक्ति रेलगाडी में यात्रा कर रहा था।

टिकट निरीक्षक उसके पास आया और उससे माँगा। वह उत्तेजित होकर के अपने टिकट को अपने पर्स में, अपने सामान में, अपनी पैंट में खोजने लगा। टिकट निरीक्षक जो उसे देख रहा था उससे कहा, 'महोदय, आप अपनी कोट की जेब में क्यों नहीं खोजते?'' व्यक्ति ने उत्तर दिया, "कृपया मुझे उसमें खोजने के लिए मत कहिये। वही स्थान मेरी अकेली उम्मीद बचा है कि वो वहाँ होगा जरूर।"

हम इतना भयभीत रहते हैं देखने में। हम इतना अधिक भयभीत रहते हैं अपने भय की तरफ देखने में, सारी समस्या यही है। इसलिए हम अपने आप को आरामदायक चीजों के क्षेत्र में ले जाकर के धोखा देते हैं और इसी तरह कार्य करते रहते हैं।

भय की तरफ देखने में भयभीत मत हो। जिस क्षण आप देखने में भयभीत होगे आप और अधिक भय का निर्माण कर रहे होगे, क्योंकि वह भय आपके लिए और अधिक अपरिचित हो जाता है। मात्र भय की तरफ देखो और स्वीकार करो कि आप भयग्रसित हो। भय स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। यदि आप सजगता के साथ एक भय के पश्चात् दूसरे का सामना करते रहोगे, कहीं न कहीं यह करते हुए बुद्धिमत्ता आपके भय का स्थान ले लेगी और धीरे-धीरे भय का भाव आपके अन्दर कम से कम हो जाएगा।

किसी तरह जब हम उस अज्ञात के भय की बात करते हैं, भूत और प्रेतों का भय बहुत सामान्य है। उनसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। मात्र इतना समझो कि भूत और प्रेत हमसे बहत कम और आपको अपने भय को नियंत्रित करने देते हैं। समस्या यहाँ शुरू होती है। भूत और प्रेतों के विषय में बहुत अधिक मत जाओ। वह किसी प्रयोग का नहीं। यदि आप अच्छी तरह से केन्द्रित हो और अपने आप में स्पष्ट हो, इतना पर्याप्त है। कोई भी चीज आपको स्वतः ही नहीं छू पायेगी और आपको इस तरह की चीजों का कोई भी नहीं होगा।

अंधकार का भय भी अज्ञात का ही भय है। अंधकार का भय और कूछ नहीं, अपितू मृत्यू का ही भय है। जरा सोचो : वही बगीचा आपके घर का, जिसमें आप दिन में टहलते हो, क्या आप उसमें रात्रि के समय टहलोगे? नहीं, आप इरते हो,

क्यों? आखिर आप जानते हो अपने बगीचे की चारदीवारी को अच्छी तरह, क्या ऐसा नहीं है? तब आप क्यों इरते हो? आप अपने बगीचे से नहीं डरते, बल्कि उसे अंधकार से डरते हो।

आप इस बात से डरते हो कि अंधेरे में आपको कहीं कुछ हो न जाए। आप अपने जीवन मात्र के लिए डरते हो। मेरे कहने का यह अभिप्रायः है जब मैं कहता हूँ कि आपके सारे भय किसी न किसी रूप में अन्ततोगत्वा मृत्यु के भय से संबंधित हैं। अंधेरे के बारे में तो ऐसा ही है, लेकिन आपके अन्य भयों के बारे में, यह अति सूक्ष्म है, इतना पर्याप्त है।

वास्तव में, अंधकार कितना खूबसूरत है। वह आपके माँ के गर्भ की ही तरह है। जब आप अपने माँ के गर्भ में थे, आप पूर्ण अंधकार में थे। परन्तु जब इस संसार में आये, आप अंधकार से अपने संबंध को खो देते हो, आप उससे डरने लगते हो जैसे कि वह कोई अपरिचित चीज हो। तांत्रिक ध्यान करने वाले अंधकार पर ही नहीं ध्यान करते हैं, अस्तित्व की गहनता को समझाने के लिए।

अंधकार से भयाक्रांत होने की आवश्यकता नहीं है। मात्र एक बार, यदि आप गहरे प्रेम से अंधकार में देख सको, एक शांति का अनुभव करने वाले भाव से कि वह आपके माँ का गर्भ हो, आप उससे भय का अनुभव और अधिक नहीं करोगे। जब एक बच्चा अंधकार से डरने लगता है, उससे यह मत कहो कि वह बहादूर बने। यदि आप उससे यह कहोगे, तो वह केवल तनावग्रस्त होगा, क्योंकि उसे डरना नहीं चाहिए था। वह अंधकार के प्रति अपने भय का परित्याग नहीं करेगा। उसे अंधकार के भय के अन्दर से मात्र जाने दो। उसे थोड़ा काँपने दो। कम से कम उसे एक मौका अपने भय का अन्वेषण करने को मिलेगा। जब वो इसे कुछ बात करेगा, तो वह धीरे-धीरे अंधकार के प्रति अपने भय को खो देगा।

अब ईश्वर के प्रति भय पर हम आते हैं, क्योंकि ईश्वर हमारे लिए अज्ञात है, इसलिए हम ईश्वर से डरते हैं। समझो : ईश्वर और कुछ नहीं, बल्कि वह नाम है जो हम अस्तित्व को देते हैं, ब्रह्माण्ड को देते हैं, ऊर्जा के अस्तित्व को देते हैं, उस जीवन के पीछे छुपी शक्ति को देते हैं जो समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। यह अस्तित्व, यह सर्वभौमिक ऊर्जा केवल प्रेम करना जानती है। यदि आप मात्र इतना समझ सको, आपके समस्त भय स्वतः ही खत्म हो जाएँगे। लोग ईश्वर से कितना भयभीत रहते हैं। लोग मुझसे पूछते हैं, "गुरु जी, लोग कहते हैं कि यदि हम अच्छे कर्म करेंगे या पुण्य करेंगे, वनस्पति के बूरे कर्म के या पाप करने के तो हम स्वर्ग में जाएँगे और नहीं तो नर्क में। क्या यह सत्य है?"

सर्वप्रथम यह समझो कि नर्क या स्वर्ग कोई भौगोलिक स्थान नहीं है। आपके

सिर के ऊपर कोई स्वर्ग या नर्क स्थित नहीं है। ये मात्र नामित कथन हैं, मनुष्य के अन्दर लोभ और भय स्थापित करने के लिए, इतना पर्याप्त है। नर्क या स्वर्ग की व्याख्या इस तरह भी की जा सकती है जैसे कोई अत्यन्त पीड़ादाय मृत्यु या शांति से मृत्यू (देह का परित्याग), इतना पर्याप्त है।

कोर्ड भी क्षण आपके जीवन का जो आपने ध्यान में गुजारा है वह पुण्य का क्षण है और अच्छा कर्म है। जब मैं ध्यान कहता हूँ, तो मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि आँखे बंद करके बैठ जाना। मेरे कहने का अर्थ है वो क्षण जो सजगता से आप वर्तमान में थे, जब आपकी जागरूकता आपके साथ थी, वो क्ष्ज्ञण जब आपकी अपनी सूषुप्तावस्था से बाहर निकल कर वर्तमान में थे, वो क्षण जब आपने अस्तित्व की ऊर्जा की प्रतिध्वनि को महसूस किया हो।

कोई भी क्षण जो उपरोक्त स्थितियों में नहीं बिताया गया वो सब पाप है। सजग स्थिति के सारे क्षण आपके बैंक के खाते में धन की स्थिति की तरह हैं। आपकी मृत्यु के समय, यही वो स्थितियाँ होंगी जो उभरेंगी और आपको मुक्त करेंगी। लोग सोचते हैं कि यदि वो किसी मंदिर के देवता के समक्ष एक पात्र में दुध चढ़ा देंगे, तो उनका पुण्य बढ़ जाएगा और वह स्वर्ग पहुँच जाएँगे। मैं आपको बताता हूँ : ईश्वर को दूध चढ़ाने से कुछ नहीं होने जा रहा है। जब आप अस्तित्व के प्रति अपने अन्दर आभार का भाव बढ़ता हुआ पाओ तो आप उसकी अभिव्यक्ति मूर्ति पर दूध चढ़ाकर कर सकते हो। यह एकदम ठीक है। परन्तु कृपया इसे पुण्य इत्यादि से मत जोड़ो।

वह एक क्षण जिस क्षण एक ब्रूँद भी दूध का यदि शुद्ध प्रेम और श्रद्धा के साथ अर्पित किया गया होगा तो वह भी ध्यान का क्षण होगा और वो आपके बगल में खड़ा होगा, आपकी मृत्यु के समय और दूसरी, तरफ घड़ों दूध यदि चढ़ाया गया होगा, केवल इस भाव से कि यदि पुण्य एकत्रित हो, तो उसका प्रतिफल कुछ भी नहीं मिलेगा। इसलिए कृपया अपनी सजगता को बढ़ाओ और जागरूकता के साथ जियो। चाहे आप जो भी कर रहे हो और चाहे जहाँ कर रहे हो, हर क्षण को ध्यान बना दो, इतना पर्याप्त है। इसके पश्चात पापों के भय से मुक्त हो जाओगे।

मैं आपको एक घटना सुनाता हुँ :

भारत के सुदूर गाँव में स्थित एक शिव मंदिर में मैं गया। मुख्य मूर्ति के प्रवेश द्वार पर एक ट्यूब लाइट जल रही थी। रोशनी बहुत मंद थी परन्तु उस पर लिखा गया काली स्याही से स्पष्ट होता था, विष्णूनाथन बी.एस.सी.।

मैं आश्चर्यचकित था कि कैसे भगवान शिव का नाम विष्णू नाथ पड़ा। तब उसी के नीचे मैंने देखा सामने की तरफ लिखा था कैलाशनाथन भगवान शिव का सही नाम।

विश्वनाथन उस व्यक्ति का नाम था जिसने ट्यूब लाइट दान में दी थी। अच्छे कर्मों को एकत्रित करने में चूक जाने से हम जीवन में इतना भयभीत क्यों रहते हैं, शायद इसलिए कि हम अत्यधिक भौतिकवादी हो गये हैं और अच्छे कर्मों को बैंक खाता निर्मित करके उसको अपने लिए बढ़ाने में लगे हैं और हम यही पर रुकते भी नहीं। इसके पश्चात भी हम लगातार ईश्वर को अपनी हर अच्छी चीज के बारे में सूचित करते रहते हैं, जिससे कि वो भूल न जाएँ। हम इतने अधिक भौतिकवादी बन गये हैं, चाहे वह बात ईश्वर से ही संबंधित क्यों न हो।

समझो : ईश्वर स्वर्ग में कोई आरामगाह नहीं चला रहे हैं, जहाँ आपको प्रवेश करने की अनुमति आपके प्रश्वी पर तथाकथित किए गए अच्छे कर्मों के कारण मिल जाएगी। जब आप जीवित रहते हो, आप हमेशा इसी तरह की भौतिकवादी चीजें करने के लिए प्रयासरत रहते हो बिना यह जाने या महसूस किये कि उसके पीछे सत्य क्या है और इन्हीं चीजों से आप एक बहुत बड़े महल का निर्माण कर लेते हो, जिसे पुण्य कहते हैं और उसके पश्चात आप यह अपेक्षा करते हो कि वह महल मृत्यु के समर्थ रक्षार्थ आपके बगल में खड़ा हो।

Section 24

यह कुछ इस तरह से हैं : आप स्वप्न में एक घर बनाते हो, उसे रंगते हो, सजाते हो और भोग करते हो। क्या होता है जब आप स्वप्न से जागते हो? घर कहाँ है? क्या वह आपके किसी काम का है जानने के बाद? नहीं, इसी तरह से, पुण्य की अवधारणा से अपने आप को केवल धोखा दे रहे हो। हम हर चीज को कम करते चले गये और अंत में ईश्वर को भी घटाकर के साधारण व्यापार बना दिया, इतना पर्याप्त है।

मैंने देखा है लोगों : वे लोग सप्ताह के प्रति शनिवार एक विशेष मंदिर में, एक विशेष देवता के पास चढ़ावा लेकर जाते हैं। यदि वो किसी कारण वश किसी शनिवार को नही जा पाये तो वे अपने कार चालक को ही चढ़ावा लेकर के मूर्ति के पास भेज देते हैं। बहुत स्पष्ट रहो यह भौतिक जगत आपके साथ नहीं आएगा, जब मृत्यु को प्राप्त हो रहे होगे। केवल सजगता, जागरूकता और ध्यान के ही क्षण आपके साथ होंगे।

इस एक चीज को और समझो : ईश्वर आपके बारे में जितना आप जानते हो, उससे बेहतर जानता है। आप उससे कुछ भी छुपा नहीं सकते, क्योंकि वो जानता

भय से म्त्रि

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GoenjCe kesâ efueS, pewmes Deehe Skeâ jsueieeÌ[er ceW Ùee$ee keâj jns nes~ peye Deehe yew"keâj स्थिर हो जाते हो, क्या करते हो? आप अपने बगल में बैठे हए व्यक्ति से वार्तालाप शुरू करते हो। आप उनसे पूछते हो वह कहाँ से आ रहे हैं। आप यह जानने का प्रयास करते हो कि वह किस धर्म के हो सकते हैं। आप उनसे उनकी पृष्ठभूमि के बारे में पूछते, इत्यादि। क्यों? क्या ये इसलिए कि आप वास्तव में इस सारी जानकारी में रुचि रखते हो? नहीं, यह इसलिए है कि आप आपको अंजान के रूप में देखते हो और जब आप उनके बारे में सारी जानकारी प्राप्त कर लेते हो, मनोवैज्ञानिक रूप से, किसी अज्ञात के प्रति जो आपका भय होता है वह घट जाता है और आप सामान्य हो जाते हो, इतना पर्याप्त है।

यदि आप एक हिन्दू हो और वो भी हिन्दू हैं, आप आराम महसूस करते हो। यदि आप हिन्दू हो और आपको पता चलता है कि वे मूसलमान हैं, आप असहज महसूस करने लगते हो और आपको शंका की दृष्टि से देखने लगते हो। आप अपनी जगह भी बदलने के बारे में सोचने लगते हो। इस तरह से आपका भय प्रभावी और क्रियाशील होता है। आप हमेशा सूषुप्त अवस्था में अपनी सम्पत्ति खोने के भय से ग्रसित रहे हो।

शारदा देवी कहती हैं, "दूसरों का विश्वास करो चाहे आपका शोषण ही क्यों न हो रहा हो। संसार के ऊपर विश्वास करने का गुण, आपके स्वरूप को आपको इस पृथ्वी पर ईश्वर की तरह जीने लायक बना देगा।"

जब बुद्धि प्रखर होगी, आप एक वैज्ञानिक की तरह समझोगे, जब भाव प्रखर होंगे, आस्था खिलेली, जब भावनाएँ प्रखर होंगी जागरूकता खिलेगी। इसलिए भय का परित्याग करो समझ और आस्था को अपने अन्दर पैदा होने दो।

Section 25

तो अपनी सम्पत्ति के भय का परित्याग करो। एक बात समझो : हर चीज अस्तित्व का है। आप एक अस्थायी धारक हो उसके, इतना पर्याप्त है। यदि आप इस बात को गहराई के स्तर पर समझोगे, तो आप अपने आप को सम्पत्ति के भय से ग्रसित नहीं होने दोगे।

सम्पत्ति के संदर्भ में हम लोगों ने अपरिचितों से भय के बारे में भी बात की थी। परन्तु देखो कि प्रतिष्ठा के संदर्भ में किस तरह से भय कार्य करता है। सोचो कि कोई ऐसा काम करना चाहता है जिसकी समाज अनुमति नहीं देता, जैसे विवाहेत्तर संबंध रखना या मात्र परित्याग करना, वे लोग क्या करते हैं? वे अपने आप में किसी अपरिचित व्यक्ति के साथ खुश रहते हैं, जो उनसे किसी भी तरह से समाज की नजरों में किसी प्रकार की पहचान नहीं बनाते।

इस तरह से वह अपरिचित भय का मित्र बन जाता है, यहाँ निष्ठा और सम्मिलित होना भय को बढ़ावा देते हैं और तब आप कम परिचित लोगों को खोजते हो, जहाँ निष्ठा और सम्मिलित होना कम किया जा सके, अगर पूर्णरूपेण खत्म न किया जा सके तो। मात्र देखो भय किस तरह से प्रभावी होता है। बस देखे कि आप हर समय किस तरह से भय के चंगूल में रहते हो।

गुरु जी, जब हमें भय होता है, तो आप कहते हैं कि और सजग रहो और उसमें देखो। परन्तु कूछ बार, भय एकदम अचानक होता है। वो आता है और जाता है - अचानक झटके के साथ। उस वक्त हमें उसके अन्दर देखने का हमारे पास समय ही नहीं होता...।

हाँ .......जो आप कह रहे हो उसे भय-आघात कहते हैं।

भय-आघात भय की छोटी-छोटी कीलियाँ हैं। वो मात्र आती हैं और जाती हैं कुछ क्षण के समय के लिए। उदाहरण के लिए, आप सड़क पर चल रहे हो और अचानक आपने एक रस्सी देखी और उसे साँप समझ लिया। आपको अचानक भय का उतना अनुभव होता है, जो शांत हो जाता है मात्र कुछ क्षणों में। क्योंकि तब तक आप यह जान जाते हो कि वह एक रस्सी है। यह एक भय-आधात है। आप देखो : यह इस तरह से हैं : हमारे अन्दर हर वक्त भय की एक लहर रहती है। कभी-कभी वह उठकर के पराकाष्ठा तक जाती है, इतना ही सब कुछ। ये जो भय-आघात है ये बहुत अधिक तीक्ष्णता से भी हो सकते हैं, हालांकि ये होते बहुत कम समय के लिए हैं। भय-आघात उन्मुक्त व्यवस्था को कमजोर करते हैं। ये निकालते हैं हतोत्साहित करने वाले रसायनों को और हमारी उम्र प्रक्रिया को भी तीव्र कर लेते हैं। ये हृदय-आघात भी करा सकते हैं या हमारे केशों को श्वेत भी कर सकते हैं।

औसतन, हर एक को प्रतिदिन लगभग छः बार जाग्रत या सुषुप्तावस्था में भय-आघात लगता है। जाग्रत भय-आघात लगते हैं उन चीजों से जैसे - अर्द्ध-रात्रि में मात्र टेलीफोन की घण्टी का बजना या जब आप कार में हो और कोई चालक आपकी तरफ मोटर घुमा दे या जब आप कोई इरावनी फिल्म देख रहे हो कोई आपकी पीठ ठोक दे और इसी तरह की बहुत सी चीजें।

आपको भय-आघात स्वप्न में भी लगता है, परन्तु आप उसे जागने पर भूल जाते हो। भय-आघात उसी तरह से हैं, जैसे किसी गुलाब के पौधे को जड़ से हिला दिया जाये। यह व्यवस्था के लिए अत्यन्त खतरनाक है।

जैसा कि आपने कहा, भय-आघात के समय, आपके पास सजगता में जाने का कोई समय नहीं होता, आपके पास किसी भी ईश्वर का नाम लेने का समय नहीं होता, उस आघात से होकर के गुजरने का, क्योंकि वह मात्र एक कील की तरह होती है। परन्तु भय-आघात के पश्चात्, आप बहुह अच्छी तरह से विश्लेषण कर

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yengle mes ØekeâjCe ceW Deeheves megvee nesiee : peye keâneR keâesF& Deeheoe nesleer nw Ùee Deeie ueie peeleer nw, ueesie nj efoMee ceW YeÙe kesâ keâejCe FOej-GOej Yeeieles jnles nQ, Jees ieuele efoMee ceW ojJeepes Keesueves ueieles nQ, Jees yeenj efvekeâueves kesâ ieuele ceeie& hej peeves ueieles nQ, peyeefkeâ meeceevÙe meceÙe ceW Jees peeveles jnles nQ efkeâ yeenj efvekeâueves

keâe Jen mener ceeie& veneR nw~ Ùes meejer ÛeerpeW keâF& yeej Deehekeâes ce=lÙeg keâes Yeer Øeehle keâje osleer nQ, Gme Deeheelekeâeueerve efmLeefle ceW~ YeÙe Fme meercee lekeâ DebOee keâj osves Jeeuee neslee nw~

ceQ Deehemes nj meceÙe YeÙe kesâ yeejs ceW mepeie jnves kesâ efueS keânlee ntB, keäÙeeWefkeâ kesâJeue mepeielee kesâ ceeOÙece mes Deehe DeeOeej Tpee&DeeW keâes Deewj TBÛeer Tpee& ceW heefjJeefle&le keâj mekeâesies~ pewmes efkeâme lejn mes le=<Cee Øesce ceW mepeielee Éeje heefjJeefle&le keâer pee mekeâleer nw, YeÙe heefjJeefle&le efkeâÙee pee mekeâlee nw, YeÙeYeervelee ceW Deewj yegefæceòee ceW Megæ mepeielee kesâ ceeOÙece mes~

keâesF& Yeer Ûeerpe oyeeÙeer peeÙesieer, kesâJeue Jener otmeje ™he uesieer~ Jen hetCe&lee mes peÌ[nerve veneR ngF& jnleer~ FmeefueS oyeevee YeÙe hej efJepeÙe Øeehle keâjves keâe ceeie& veneR nw~ mepeielee ner Jen ceeie& nw~ JeemleJe ceW, Ùeefo Deehe YeÙe keâes oyeeDeesies, Deehe Gme hej efJepeÙe Øeehle keâjves keâe Skeâ ceewkeâe Kees jns nesies~

peye Deehe ueieeleej mepeielee keâ meeLe YeÙe keâes osKeesies, Ûeens ce=lÙeg kesâ meceÙe ner, Deehe Gmekesâ Devoj mepeielee mes osKeesies Deewj Gmes nesves oesies~ Ùen cenlJehetCe& nw efkeâ Fmes efkeâÙee pee mekesâ, keäÙeeWefkeâ DevleleesielJee Deehekesâ meejs YeÙe Deewj kegâÚ veneR, yeefukeâ ce=lÙeg keâe YeÙe nQ~ peye Deehe Fme lejn mes efove-Øeefleefove kesâ Deheves YeÙe hej keâeÙe& keâjesies, Deehekeâe ce=lÙeg keâe YeÙe meg<eghle ™he mes keâce pees peeÙesiee Deewj peye Deehekeâe ce=lÙeg keâe YeÙe keâce nes peelee nw, Deehekesâ efove-Øeefleefove kesâ YeÙe Yeer keâce nes peeles nQ~ neB......nce Deye Skeâ Ketyemetjle OÙeeve keâjWies, efpemes efveYe&Ùe OÙeeve keânles nQ, pees keâeÙe& keâjlee nw meerOes mJeeefo‰eve Ûe›eâ hej~

efveYe&Ùe OÙeeve

(keâeue DeJeefOe : 30 efceveš)

efveYe&Ùe OÙeeve Jesoeble mes ueer ieÙeer OÙeeve lekeâveerkeâ nw~ Ùen OÙeeve Mejerj kesâ yeenj keâe Skeâ DevegYeJe nesleer nw~

Ùen Mejerj kesâ yeenj keâe DevegYeJe ce=lÙeg keâe DevegYeJe nw~ Ùeefo Ùen efveÙeefcele ™he mes keâer peeÙes, lees nj yeej meeJe&Yeewefcekeâ Tpee&, pees DebOekeâej kesâ ™he ceW Deehekesâ Deemeheeme JÙeehle jnlee nw, Deehekeâes ueieeleej MeefòeâMeeueer Deewj Tpee&Jeeve ceeveefmekeâ Deewj Meejerefjkeâ ™he mes yeveeleer nw~ Jen Deehekesâ mJeeefOe‰eve Ûe›eâ keâes Yeer Meefòeâ Øeoeve keâjlee nw~ Ùen Skeâ efveoxMe ceW keâer peeves Jeeueer 30 efceveš keâer OÙeeve nw~

Yetefce hej Deejece mes yew" peeDees~ pees Yetefce hej ve yew" heeÙeW, Jen kegâmeea hej yew" mekeâles nQ~ efmej, ieo&ve Deewj jerÌ{ leerveeW keâes Skeâ meerOeer jsKee ceW nesvee ÛeeefnS~ (cebo mebieerle yepe jne nw~)

Section 26

Deheves ves$e yebo keâjes~ ienjeF& lekeâ meeBme uees~ keâuhevee keâjes efkeâ Deehe Ieves pebieue ceW Ûeue jns nes~ Deehe pebieue kesâ meyemes Ieves Yeeie ceW Ûeue jns nes~ Deehe Skeâ ienjer DebOesjer iegheâe ceW ØeJesMe keâjles nes~ Deehe ves$eeW mes kegâÚ Yeer osKe veneR hee jns nes~ Deehe ienjer iegheâe ceW yew" peeles nes~ Deehe Dehesve Mejerj keâes Yeer veneR osKe hee jns nes~ efmeJeeS Deheveer YeeJeveeDeeW kesâ efkeâ Deehe JeneB nes Deehekesâ heeme Deewj keâesF& henÛeeve veneR nw~

Ûeens Deehe efpelevee ØeÙeeme keâjes, Deehe kegâÚ Yeer osKe veneR hee jns nes~ Gme ienve ceW Deehe kesâJeue Útkeâj cenmetme keâj mekeâles nes efkeâ Deehe JeneB nes.......~ (1 efceveš) Deehe DebOekeâej mes ner hewoe nes, pees Deehekesâ ceeB kesâ ieYe& ceW Lee Deewj Deehe Gmeer ceW efceue jns nes, Gmeer Øesce keâjves Jeeues oÙeeueg DebOekeâej ceW~ (1 efceveš)

Gme ienve DebOekeâej keâe pees Deehekesâ ÛeejeW lejheâ JÙeehle nw, ienjeF& lekeâ meeBme kesâ meeLe Devoj uees~ Gme DebOekeâej keâes ienjeF& lekeâ meeBme kesâ meeLe Devoj uees, efpemeves Deehekeâer henÛeeve Kelce keâj oer nw~

Oeerjs Deewj yengle Oeerjs, DevegYeJe keâjes efkeâ Deehekeâe Mejerj Gmeer DebOekeâej ceW efJeueerve nes jne nw~ (5 efceveš)

Oeerjs Deewj yengle Oeerjs, DevegYeJe keâjes efkeâ Deehekeâe Mejerj DebOekeâej ceW yeve jne nw~ (5 efceveš)

Deehekeâe mebhetCe& Mejerj DebOekeâej keâes meeBme kesâ ceeOÙece mes Deheves Devoj ues jne nw~ Deehekesâ Mejerj keâer nj keâesefMekeâe DebOekeâej keâes meeBme kesâ ceeOÙece mes ienjeF& lekeâ Devoj ues jner nw~ (15 efceveš)

Deheves Deehe keâes DevegYeJe keâjvee Meg™ keâjes~ Deheveer mecemle FbefõÙeeW mes Deheves hetjs Mejerj keâe DevegYeJe keâjes~ Deheves Mejerj keâes Oeerjs-Oeerjs yew"ves keâer cegõe ceW ueeDees~ G"es Deewj Gme iegheâe mes yeenj DeeDees~ Deehe Deye Gme Ieves pebieue mes yeenj Dee jns nes~

Deye Deehe OÙeeve keâ#e ceW Jeeheme ueewš jns nes....... (3 efceveš)

Deesce Meebefle Meebefle Meebefle ner

cee$e Fme Meebefle keâes Deheves meeLe ues peeDees peye lekeâ nce otmejs me$e ceW veneR efceueles~ OevÙeJeeo