5. पवित्र शिल्पकलाओं का सं रक्षण एवं संवर्धन
# पवित्र शिल्पकलाओं का सं रक्षण एवं संवर्धन

शिल्पं हासमिन्नधिगमयत य एवं वेद। यदेव शिल्पाणी। आत्म सं स्कृर्तिवाव शिल्पाणी छंदोमयम वा येतैर्यजमान आत्मानं सं स्कृते।।
शिल्प, मनुष्य की कला का कार्य, दिव्य अवतारो की अनुकृ ं ति हैं। अपनी लय का उपयोग करके शिल्पी मापन करके मानवीय क्षमताओ की सी ं माओं के साथ पुनर्निर्माण एवं पवित्र ऋचाओ के अनंत ं ज्ञान का अर्थ प्रकट करते हैं।
~ ऐतरेय ब्राह्मण, ऋग्वेद, ६-५-२७





'नित्यानंद शिल्प पवित्र कला की स्थापना, लोगो को स ं मृद्ध चेतना पर आधारित वैदिक सं पत्ति के जीवन को अनुभव करने के उद्देश्य से - वैदिक मं दिरो की कला, उनके शिल्प ए ं वं मूर्तियों के सं रक्षण, पुनर्निर्माण व प्रसार के लिये की गयी है।"
~ परमहंस श्री नित्यानंद जी

Offering worship to Vishvakarma, the Divine Architect of Gods who builds their celestial abodes and sacred arts (at Nithyananda Sacred Arts, Bengaluru Aadheenam)

® पं चलौह (तांबा, पीतल, जस्ता, टिन व स्वर्ण) से निम्न प्रक्रियाओ के ं माध्यम से विस्तृत एवं प्रमाणिक एक ढांचे की पद्धति द्वारा देवताओ की ं मूर्तियो का ं निर्माणः
- w मोम द्वारा देवताओ के ं ढांचे का निर्माण।
- w कावेरी नदी की मिट्टी से मोम के ढांचो को ं ढकना।
- w अत्यधिक उच्च तापमान पर मोम को पिघलाना।
- w देवताओ की ं मूर्तियो के ं निर्माण के लिये पिघली धातु को मिट्टी के ढांचे में उंड़ेलना।
- w ढांचे से धातु की मूर्तियो को बा ं हर निकालकर कुशल शिल्पकार्यों द्वारा अंतिम रूप देना।
- ® सामान्य बाजार में जटिल रेखा चित्र और विलक्षण मूर्तियो के ं निर्माण से जुड़े अनुपलब्ध हैं।
- ® अतिसूक्ष्म यन्त्रो के प्रयोग से मूर्तियो के श ं ्रृंगार की सूक्ष्मतम विशेषताओ को 'स ं ितुजी वेलाइ' पद्धति द्वारा उभारना।
- ® केवल नारियल के पत्तों के प्रयोग से त्तों वैदिक मापन इकाई 'तालम' से मापन करना।





स्थपति, मं दिर वास्तुकला और मूर्ति निर्माण में विशेषज्ञ हैं। वे विश्वकर्मा समुदाय की अनोखी परंपरा के हैं, वास्तुकार विश्वकर्मा के वंशज है।

परमहंस श्री नित्यानंद जी मं दिर निर्माण की शिल्प कला के शुद्ध विज्ञान की स्थापना करते हुए, दर्ल ु भ स्थपतियो और ं शिल्पकारो के स ं मुदाय को नव जीवन और आजीविका प्रदान कर रहे है तथा प्रमाणिक मं दिर कलाओ की विश्वसनीय विद्या का भी विस्तार कर रहे है। स्थपति के शिल्प कार्य की प्रत्येक प्रणाली स्थापत्य वेद और अागम शास्त्रो मे वर्णित है, और उसे अति सावधानी व श्रद्धा से मानवता तक पहुंचाया गया है ।
स्थपतियो की शिल्प परंपरा और आ ं जीविका को पुनः जीवित करना
- ® सैकड़ों शिल्पकारो ड़ों और उनके पर ं िजनो को प्रशिक्षण, ं जीवन यापन एवं मं दिर शिल्प से जोड़कर उन्हें आर्थिक स्थिरता प्रदान करते हुये इस प्राचीन कला को पारिवारिक व्यवसाय के रूप में भावी पीदि़यो तक ं जारी रखना।

Ceremonial puja at the Sacred Arts

H.H.Paramahamsa Nithyananda training and inspiring the

His Holiness with Sadguru Sri Jayaprakeshendra Saraswathi Mahaswamiji, 169th Guru Mahasannidhanam of Sri Chakra Sri Deity of Vishvakarma, the Divine
















पं चलोह धातु की मूर्तियां
® मं दिर कला केवल पं च लौह में नही बं ल्कि चांदी, पत्थर, धातु की चद्दरो, सं ग ं मरमर और काष्ठ में भी होती है।
- ® निरंतर मं दिर के ढांचो, ं देवताओ, ं वाहनो, ध्वं ज दंडो, ं मं दिर के आभूषण, पूजा की वस्तु ओ, कं वचम्, पवित्र अस्त्र-शस्त्रों देवताओ के धनुषो ं , ं देवताओ के ं मुकु ट एवं आभूषणो, रं थों एवं राजगद्दियो का भग ं वान शिव द्वारा निर्देशित प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ पर आधारित निर्माण।
- ® इन पवित्र रचनाओ को 33 ं देशों में समस्त नित्यानंदेश्वर हिन्दू मं दिरो और गृ ं ह मं दिरों मे भेजा जाता है, जैसे कि सिं गापुर, मलेशिया, यू.एस .ए, कै नडा, औसट्रेलिया त था भारत के भिन्न राज्यों मे।
उपलब्धियां
| पदार्थ | मात्रा | वजन |
|---|---|---|
| धातु | 562 मूर्तियां | 17,325 किलोग्राम |
| पत्थर (ग्रेनाइट) | 2674 मूर्तियां | 1 .07 मिलियन किलोग्राम |
| सं गमरमर | 482 मूर्तियां | 96,400 किलोग्राम |
| काष्ठ | 261 मूर्तियां, वाहन, आसन, आदि | - |
| आभूषण व शगार ्रृं | देवताओं 1280 हेतु | - |

विशाल मं दिर सं रचनाओ और ं ग्रेनाइट पत्थर में मूर्तियाँ का निर्माण
परमहंस श्री नित्यानंद जी का कहना है कि आकाश मंडल की ऊर्जा का सदोपयोग करने का शाश्वत विज्ञान ही वास्तुशास्त्र का मूल है । हम ब्रह्मांड की दिव्य शक्तियो के सा ं थ साम्मनस्य भाव या एकत्व स्थिति प्राप्त पर सकते हैं यदि हम इस प्रकार निवास गृहो और सं रचनाओ ं का ं निर्माण करे जो ब्रह्मांड की स्थानिक ऊर्जा के अनुकू ल एवं अनुरूपित हो।


स्पटीक लिङ्गम्
दर्ल ु भ यंत्रों के सा त्रों थ वर्धित व शिल्पित कई दिव्य शिव लिङ्ग


दिव्य शिल्प कला के निर्मण पश्चात पत्थर में बनी भगवान श्री गणेश की विशाल मूर्ति उठायी जा रही है।





कवचम जीवमर्ती ू ओ के लिये दिव्य कवच






Temple jewelry production for adorning the deities
® समस्त भारत से1 लाखवैदिक कलाकृतियोंको एकत्र करके उन्हें पुन: निर्मित करके आधुनिक जीवन पद्धति में गहरी चेतना और उत्तम स्वास्थ्य का सं चार करने के लिये दैनंदिन प्रयोग के उद्देश्य से वितरित करना।




t वैदिक मं दिर कलाओ एं वं शिल्पों का ल्पों निर्माण करके सं पूर्ण विश्व के वितरण के लिये स्वतंत्र नगरो का विकास करना। आगा ं मी तीन वर्षों में 400 मं दिरो के ल ं िये विभिन्न वस्तुओ का ं निर्माण करना।
t बहुमूल्य वैदिक ज्ञान एवं कौशल का सं रक्षण कर रहे शिल्पकारो को ं डाक्टर की उपाधि प्रदान करना।
भावी योजनायें...

