13. भावी योजनायें
# भावी योजनायें
अस्पताल एवं पारंपरिक वेदिक चिकित्सा की पुनर्स्थापना

रागदिरोगान सततानुषक्तानशेषकाय प्रसतानशेषान। औतसुक्तय मोहारतिदाञ्जघान यो पूर्ववैद्याय नमोस्तु तस्मयै।।
उन आदि चिकित्सको को न ं मस्कार है, जिन्होंने राग (ना िन्हों शवान वस्तुओ की इ ं च्छा) एवं जीवन पर छाया की तरह पड़ने वाली अन्य व्याधियो, ं जो कि प्राणियो का अटूट भाग ं हैं और जो औतसुक्य (तनाव), मोह (लगाव) एवं आर्ति (बुरे समय में घबराहट) को पूर्णरूप ह से समाप्त करते हैं। ~ अष्टांग हृदय (आयुर्वेद अंश), १
आयुर्वेद, सिद्ध, वर्मा, प्राकृ तिक चिकित्सा और उनकी शाखाओ ं का पुनर्गठन

वैदिक काल में अद्वितीय चिकित्सा अनुसं धानो ंके जीवित विज्ञान ने मानव स्वास्थ्य एवं उसकी दीर्घ आयु को अकाल्पनिकस्तर तक पहुंच ा दिया था। वैदिक परंपरा चिकित्सा, जैव शास्त्र एवं मानसिक स्वास्थ्य एवं जीवन विज्ञान का अध्यात्मिक मूल हैं, जिसने मानव मस्तिष्क-शरीर को एक अलग जैव रसायन के रूप में नही ं बल्कि दिव्य ऊर्जा के सूक्ष्म रूप में माना।
वैदिक परंपरा आपके माध्यम से अद्वि तीय शक्तियो ंके तीन रास्ते बताती है, जिससे आप एक प्रबुद्ध मनुष्य बनते हैं। ये हैंः मणि - वह तकनीक जैसे उड़न यं त्र, मं त्र - पवित्र ध्वनिया ं और औषध - विशेष जड़ी-बूटियां, रसायन जो चेतना को जाग्रत करते हैं। गुरू की दीक्षा से आपमे तुरन्त आत्मबोध या असाधारण सिद्धियां जागृत हो सक्ति हैं, किं तु मानव शरीर इन दिव्य ऊर्जाओ ं को ग्रहण करने के लिये तत्पर नही होता है। यह एक उलटे बर्तन पर पानी उंड़ेलने की तरह है। पवित्र औषधियो ं को जब ऊर्जाम य करके दिया जाता हैं, तो मानव मनो-शरीर के नाडी मार्ग सरलता से खुल जाते है और गुरू द्वारा प्रसारित शक्तिशाली दीक्षा को ग्रहन कर पाते हैं।