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46. एन-िीतनयस

# एन-िीतनयस

परमहंस तनतयानंद के मागणदशणन मं अपने बचचे की िमता को रज्मलत करं| एन-िीतनयस अपने आप मं एक खास तरह का कायणरम है और यह एक मासटर के चारं ओर ती् ऊिाण िे् मं अपने बचचे को देने के मलया अनमोल उपहार है |

एन िीतनयस कायणरम बचचे के मजसतषक के गैर यांब्क दहससे को िागत कर उसके मजसतषक की ृ रासायतनक रकरयाओं को बदल कर गैर यांब्क दहससे को िागत करने की ृ िजषट से ूपांककत ककया गया है| | इस से बहुआयामी िे्ं मं बालक व्लिण रततभा दशाणता है और और सही मायने मं ्ैददक मशिा के तत् को ्हण करता है|

यह ्तणमान मं तनतयानंद गुुकुल मं रचमलत है और आतम्ान पर आधाररत मशिा रा्रण करने पर बनाया गया है| यह कायणरम संपूणण मजसतषक के अधययन को रज्मलत करता है िो की दाय मजसतषक की असाधरण कलपना ं और ृशय शज्त को बायीं मजसतषक के शज्तशाली और सपषट ताककण क सोच से िोिता है,इस से ्ह मजसतषक को साधारण से असाधारण बनाता है| अपने बचचे के रदशणन मं एक औसतन 94

दिे की ्वध की स ृ ूचना- तायदाद चेतना की ओर उछाल, उचच आतमसममान िी्न की खोि यौधगक शरीर का व्कास शज्तशाली धयान का ्ान रापत करना, राचीन ्ैददक कला को आतमसात, पूरे मजसतषक व्कास को ब़ा्ा देने आंखं पर प्ी बांध के प़ने का रहसयमय अनुभ्|

एन-िीतनयस रततभागी रशंसाप् - आनंददथा रततभा "मुझे यह बताते हुई बहुत ख़ुशी हो रही

है की अब म ्ो सभी चीि ं ं खा सकती हूँ िो म वपछले दस साल से खाने ं के मलए इंतज़ार कर रही था। मेरे डर के कारण एन-िीतनयस से पहले ऐसा करने मं म असमथण थी| अब ं मुझे लगता है कक म ्े सभी चीिं ं

को खाने के मलए काफी आश्सत हूँ जिनका म व्रोध ककया करती थी। ं अब मेरा मेरी भा्नाओं पर तनयं्ण है और म बह ं ुत िलद ही ्ापस अपने आनंद की अ्सथा रापत करने मं सिम हूँ।म धं ूरपान या धूल से खुद की रिा करने के मलए एक मुखौटा का उपयोग नहीं करती, इसके बिाय मं भीतर से काफी शज्तशाली बन गयी हूँ की अब कुछ भी पहले की तरह मुझे रभाव्त नहीं करता | स्ामीिी को मेरा आभार, तनतयानंदोहम!"

एन-िीतनयस िनक रशंसाप् – माँ आनंद रततभा

म एन-िीतनयस कायणरम म ं ं दहससा लेने ्ाली बामलका आनंधधता की माँ हूँ। म बह ं ुत राहत महसूस कर रही हूँ और मेरे सीने से एक बिा बोझ हट गया है। मेरी बामलका को उसके सांस लेने की घरघराहट समसया से मुज्त ममल गयी है| ्ह चार शज्तयं से पररधचत है और इसमलए ्ह उन का उपयोग काफी आसानी से कर सकती है| ्ह शारीररक ूप से भी काफी सकरय हो गयी है| म उसके रदय म ं ं स्ामीिी के रतत गहरी भज्त देख सकती हूँ| स्ामीिी से रापत ककये आशी्ाणद को ्ह लोगं मं समध करने के मलए ृ उतसुक है। मश्ोहम"