35. दीष् ््र् कु डललनी ज्गरण
# दीष् ््र् कु डललनी ज्गरण

एक बार िागत होने पर, क ृ ुणडमलनी वयज्त के शरीर ् मन रणाली मं अतत असाधारण परर्तणन लाती है, िैसे ऊिाण के सतर मं भारी उछाल, पुरानी बीमाररयं की धचककतसा और मानमसक िमताओं मं ्वध। क ृ ुणडमलनी िब सुषुमना नािी (रमुख सू्म ऊिाण मागण) के माधयम से री़ द्ारा ऊध्णधगत होती है, यह मजसतषक मं एक व्शाल ऊिाण के अनत्ाणह का पररणाम लाती है।
वपछले दशक काल से, परमहंस तनतयानंदिी तनकटता से सहकायणरत रहं हं ्ै्ातनकं और शोधकताणओं के साथ, ्ैददक परंपरा मं िडित रहसयमय व््ानं को अधधक रकाशमान करने हेतु, तथा इन व््ानं से िनमे सुलाभं को व्श्भर के लोगं मं रसाररत करने हेतु।
हाल ही के अधययनं का धयान कंदित रहा है कुणडमलनी शज्त की 'िागतत' या सकरयण, िो हर वयज्त म ृ ं व्दयमान आतंररक संभाव्त उिाण है। िबकक कुणडमलनी पू्ी योधगक व््ान मं सुरमसध ् रचमलत है, यह के ्ल एक आरमभ है पजशचमी धचककतसक समूहं के समि इस ्ै्ातनक ्ासतव्कता को मानयता रापत कराने हेतु।
कुणडमलनी ऊिाण व्मभनन माधयमं से िागत की िा ृ सकती है िैसे की योग, राणायाम (श्ास तकनीके ), कुछ औषददक साम्ी, मं्ोचचारण द्ारा शरीर मं व्शेष सपंदन उतपनन करना तथा एक योग मं मसध पुुष की 'दीिा' (ऊिाण संचारण) से, जिनकी कुणडमलनी पू्ण ही िागत है। इनमे से दीिा सबसे गततशील, सबसे सरल ृ ् सबसे सुर्ित पधतत है, कुणडमलनी िागरण हेतु।