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33. निराहार सं्म -उपवास एवं उपभोग के परे

# **निराहार सं्म -उपवास एवं उपभोग के परे**

्यं म भोिन के बबना िीते ं

वनरोगी तन कोई इ्ानिीं अनंत्िीन उज्ा

तनराहार ने मुझे मस खाया की अपने अनदर ् बाहर होने ्ाली हर चीि के मलए म ही उततरदायी ह ं ूँ | इससे मेरे अनदर हमेशा ि ी्न के मल ए एक

उतसाह बना रहता है।

Nithyadevi, 27, BSBA, MBA, Entrepreneur, Singapore

भोजन माया िै!

'सुतनए। म दो महत्प ं ूणण पव्् रहसय आपको बता रहा हूँ। पहला, आपके शरीर को उतने भोिन की आ्शयकता नहीं है जितना की आप लेते हं। उतना भोिन करना एक शारीररक आ्शयकता नहीं है। यह पहला तथय है। दसरा यह है ू कक आपके शरीर को िीव्त रहने हेतु भोिन की आ्शयकता ही नहीं है।

मेरे पहले कथन को समणझये - आपके शरीर को उतने भोिन की आ्शयकता नहीं है जितना आप लेते हं, ्यूंकक भोिन आपके मलए महि एक शारीररक आ्शयकता

नहीं है। भोिन के साथ अनेक ्ासना ए्ं संसकार भी िुिे हुए हं। िब आप तनराहारी बन कर जियगे, तब आपको पता चलेगा ं कक भोिन एक रबल सामूदहक ्ांतत है जिससे आप पीडित हं। इसी को म माया कह ं ूँगा, 'माया' श्द की यही सबसे सटीक पररभाषा है।'

- परमहंस तनतयानंद

दतनया भर के हिारं ु रततभाधगयं ने अनु भ् ककया:

  • भोिन की तषणा म ृ ं घटा्
  • भोिन समबनधी व्कारं से
  • मुज्त
  • असाधारण ऊिाण सतर
  • उर से १० साल कम होने की अनुभूतत
  • यदद अधधक ्िन है तो ५-१० ककलो तक ्िन घटा्
  • आसज्त से उबरना

आतमव्श्ास और िी्न के रतत उतसाह