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क्या आध्यात्मिकता आज के समय में प्रासंगिक है ?
'डळीळोंरशळूं को ळपपरोंश ळपोंशश्रथशळसशपलश ंहरी जशशी ंं गुरीश रपव िहरी रोौं शीर्षी ंी वरळशू रर्लींळींळशी.' Ebook ISBN: 979-8-88572-167-7 PUBLISHED BY NITYANANDA VEDIC SCIENCES UNIVERSITY PRESS A division of Nityananda Vedic Sciences University, USA — परमहंस नित्यानंद —
SPIRITUALITY RELEVANT IN OUR LIFE IS
सारा विश्व के आनन्द समाजियों और नित्यानन्द आश्रम के स्वामीगणों को दिया हुआ प्रवचन
क्या आध्यात्मिकता आज के समय में प्रासंगिक है ?
नितत्यानंद वैदिक साइन्सस् यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित नित्यानंद वैदिक साइन्सस् यूनिवर्सिटी यू.एस.ए. का एक विभाग Ebook ISBN: 979-8-88572-167-7 नित्यानंद वैदिक साइन्सेस यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित नित्यानंद वैदिक साइन्सेस यूनिवर्सिटी विभाग, यूएसए॥ सर्वाधिकार...२००७ प्रथम संस्करण: .............. २००७ आईएसबीएन १३: ९७८-९-९३४३६४-३०-७ आईएसबीएन १०: ९-९३४३६४-३०-८ सर्वाधिकार सुरक्षित।इस प्रकाशन का कोई भी अंश पुनः प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, न किसी और रूप या माध्यम से प्रेषित किया जा सकता है, इलेक्ट्रोनिक, मैकेनिकल, फोटोकॉपी, रिकॉर्डिंग्स या कोई भी तरीका हो। इसके लिये प्रकाशक की लिखित अनुमति की जरूरत होगी। यदि आप इस पुस्तक में से कोई सूचना अपने लिये लें तो आपके कृत्य के लिये लेखक या प्रकाशक की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। इस पुस्तक की बिक्री से आने वाली राशि खैराती कार्य के लिये जायेगी। भारत में मुद्रक आदित्य मुद्रक, बंगलौर. फोन: ८०२६६०६७७६ "आध्यात्मिकता हर समय में और हर युग में प्रासंगिक है। ध्यान मनोपी और योगियों द्वारा अभ्यास की जाने वाली व्यक्तिगत कला नहीं है। हममें से प्रत्येक के लिए इसका व्यावहारिक लाभ है, इसका सम्बन्ध हमारी उम्र, संस्कृति या धर्म से नहीं है। ध्यान न केवल हमारे शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक खुशहाली को बढ़ाता है, यह हमारे आपसी रिश्ते को और बेहतर तरीके से समझने में मदद करती है। विशेषकर, यह हमें हमारे दैवीय स्वभाव के निकट लाती है जिसे हम भूल चुके हैं।"
... प्र. आज के समाज में ध्यान के क्या लाभ हैं ?
किसी भी समय या युग में, प्रत्येक मानव के जीवन की क्या आवश्यकताएं हैं? शक्ति एवं स्वस्थ प्रसन्न शरीर मन एवं चित्त। शरीर की शक्ति (शरीर बल) हमें शारीरिक रोगों से मुक्त रखती है और शरीर को बनाए रखने में मदद करती है ताकि वह दैनिक कार्यों का निर्वाह बिना किसी परेशानी के कर सके। मन की शक्ति (मनोबल) मस्तिष्क को शांत और संतुलित बनाए रखती है और जीवन को पूरी तरह और आनंदपूर्ण तरीके से जीने में मदद करती है। चित्त की शक्ति (आत्मबल) हमें इन दोनों से परे ले जाती है; आत्मबल के साथ संवेदना का अनुभव पनपता है, त्याग की भावना समाज के काम आने लायक बनाती है। यद्यपि पहले दोनों अनिवार्य हैं किसी व्यक्ति की बराबर खुशहाली के लिए तथापि, आत्मबल अनिवार्य है समाज और मानवता की एवम् स्वयं की खुशहाली के लिए। शारीरिक बल के साथ मनुष्य समाज में एक ठग, झगड़ा फसाद करने वाला, परेशान करने वाला बन सकता है। अगर उसके पास आत्मबल के ब्रह्म शारीरिक बल और मानसिक बल है तो वह धूर्त और खतरनाक बन जाता है। वह एक अपराधी बन सकता है, समाज के लिए एक खतरा बन सकता है। जब एक व्यक्ति में तीनों बलों का सम्मिश्रण होता है तो ही वह एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में निखरता है। वह
चलेगा हमारे लिए कौन सी तकनीक सही है ?
मैं तो यही सलाह दूंगा कि जितनी तकनीकें सीखने को मिलती हैं। सभी को आजमाकर देखने की कोशिश करें। सभी को कुछ तकनीकें आजमानी चाहिए, कम से कम ४-५ तकनीक। देखें जो भी प्रचार करता है उसके अंदर सत्य की झलक होती है - उसके बिना बाहर आना और गुरु बनना असंभव है। परंतु विभिन्न गुरु एक ही सत्य को विभिन्न प्रकारों से व्यक्त करते हैं। अलग अलग व्यक्तियों की मानसिक प्रस्तुति अलग अलग होती है। कुछ लोगों का सुर ताल किसी गुरु के साथ ठीक बैठता है अन्य गुरु की तुलना में। तो तकनीकों को आजमाने की कोशिश करें और देखें: जिस तकनीक से आपको सबसे अधिक अपने अंदर की शांति और सबसे अधिक स्पष्टता मिलेगी, उसका अनुसरण करें और बाकी भूल जाएं। ... प्र. दुनिया में इतनी सारी तकलीफें हैं जिनका हल नहीं निकाला गया है। आध्यात्मिकता उन्हें कैसे हल कर देगी ? जो भी परेशानी हो, आपको उसे हल करने की शुरुआत करनी पड़ेगी। दृढ़ता व आस्था रखें, यह पहला कदम है। ... प्र. परंतु मेरा मतलब व्यक्तिगत परेशानियों से नहीं है, बड़े-बड़े सामजिक परेशानियों का क्या ? आध्यात्मिकता कोई व्यक्तिगत वस्तु नहीं है। इसका निश्चित प्रभाव सामजिक स्तर पर भी होता है। आध्यात्मिकता केवल ध्यान नहीं है, यह संवेदना भी है, यह ह की सेवा है। स म टी ज विवेकानंद बड़ी ही खूबसूरती से कहते हैं: "आत्मनो मोक्षार्थम् जगत् हिताय च" ":धपि हम आलोकित अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं, मानवता की सेवा के लिए इसका उपयोग करना ही वास्तव में आध्यात्मिकता है।" नहीं तो यह आधी अधूरी आध्यात्मिकता होगी, जो कि भगवान के अस्तित्व पर संदेह करने से भी अधिक नुकसान पहुंचाती है।
... प्र. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ है इच्छाओं का न होना ?
नहीं, इसको देखने का यह गलत नजरिया है। मेरे अनुभवों के अनुसार, इच्छाओं को दबा देने से बेहतर होगा, अपनी भीतरी ऊर्जा का बेहतर उपयोग करें, ताकि आप उन्हें पूरा कर सकें। ...प्र. परंतु आज के आधुनिक जीवन में, बहुत सारी इच्छाएं हैं, बहुत सारी आशाएं। हम इसे कम कैसे करें ? इच्छाओं को कम करने का मतलब है जीवन की समृद्धि को कम करना। मैंने जैसा कहा, सबसे महत्वपूर्ण बात है अपने अंदर उस ऊर्जा को पैदा करना जो इच्छाओं को पूरा करती है। इच्छा होना कुछ भी गलत नहीं है। परंतु उसको पूरा करने के लिए आपको कड़ी मेहनत करनी होगी। वह भौतिक इच्छाएं हैं, यदि आप बेंज कार खरीदना चाहते हैं, तो भी कुछ गलत नहीं है। ध्यान आपको भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए शक्ति देता है। ... प्र. परंतु आप कैसे अपने इच्छाओं को बढ़ाते जाएंगे, संतुष्ट और इटच्छा- रहित जीवन जीने की जगह ? कभी भी संतुष्ट जीवन और आध्यात्मिक जीवन को एक समान न समझें। सतही तौर पर सत्व और तमस दोनों एक जैसे ही लग सकते हैं। क्या आप सोचते हैं कि जो साधारण कपड़े पहनकर जमीन पर बिछाई चटाई पर बैठता हो वह अधिक सात्विक और संतुष्ट होगा ? यह तो केवल बाहरी स्वरूप हो सकता है। वह बहुत साधारण भी हो सकता है क्योंकि उसके पास शक्ति नहीं है, वह केवल उसी से करेगा जो उसके पास है। हार मानकर बैठ जाना और संतोष एक समान नहीं है, यचपि ऐसा दिखता है। ... प्र. परंतु यदि आपके पास जो कुछ भी है उसी से आपका मस्तिष्क स्वभावतः संतुष्ट हो तो ? इस तरह का मस्तिष्क आध्यात्मिकता का सहायक उत्पादन है, यह आपको आध्यात्मिकता की ओर नहीं ले जा सकता है। आप संतुष्टि का भाव थोपकर इसे अध्यात्म का माध्यम नहीं बना सकते, जब कि लोग सदैव यही सिखाने का प्रयत्न करते हैं। लोग हमेशा आपको संतुष्ट होना सीखने के लिए कहते हैं। यह बात स्पष्ट रूप से समझ लें, आप संतुष्ट होना नहीं सीख सकते, संतुष्टि का भाव आप प्राप्त नहीं कर सकते। संतुष्टि आपके भीतर स्वतः ही पैदा होगी आध्यात्मिकता, ध्यान के स्वाभाविक परिणाम के रूप में। ध्यान के द्वारा, जीवन से आपको गहरा संतोष मिलेगा, जो आपके पास जितना भी है उसी में संतुष्ट होने की अनुमति देता है। ... प्र. दूसरे स्वामियों की तुलना में, आप बहुत युवा हैं। क्या आप इसे असुविधाजनक मानते हैं? कुछ भी सुविधाजनक या असुविधाजनक नहीं है। अंततः मैं लोगों को जो कुछ भी दे सकता हूं लोग उसी में दिलचस्पी लेते हैं। इन सब बातों से कोई भी प्रभावित नहीं होता। हाँ, जहाँ तक आध्यात्मिकता का सवाल है, साधारण "जीवन के अनुभव" मायने नहीं रखते। देखिये, अनुभव दो प्रकार के होते हैं - अनुभव और अनुभूति। अनुभव जीवन भर एकत्रित किया जाता है। यह उस सीखने जैसा है कि आग जलती है जो सीखा जाता है, जीवन भर सैकड़ों तरह के आग का परीक्षण करने के बाद। पहले आप लकड़ी के आग को स्पर्श करेंगे और पाएंगे कि वह जलता है, उसके बाद आप गैस लाइट का स्पर्श करेंगे और पाएंगे कि वह जलता है, उसके बाद आप तेल के लैम्प पर हाथ आजमाते हैं और फिर माचिस- और अंत में जब आप यह समझते हैं कि आग हमेशा ही जलता है, तब तक आपके श्मशान घाट जाने का समय हो जाता है! यह अनुभव है। मेरा अनुभव है अनुभूति। यह तब होता है जब आप पहली बार आग का स्पर्श करते ही सीख जाते हैं: कि सभी आग एक जैसे हैं, सभी इच्छाएं, ऐसी ही हैं। इस छलांग को आध्यात्मिकता कहते हैं। यदि आप अनुभव के द्वारा आते हैं तो पूरी जिंदगी बुद्धिमान बनने में गुजार जाती है। अनुभूति को बुद्धिमता की आवश्यकता है, आयु की नहीं। तो उम्र मेरे लिए न सुविधाजनक है न असुविधाजनक- यह ऐसा ही है, बस! ... प्र. संपूर्ण विश्व में ध्यान के द्वारा सामाजिक रूप से बुरा काम करने वालों को सुधारने का प्रयास हो रहा है जैसे जेल इत्यादि में। क्या आप इन प्रयासों से सहमत हैं? अवश्य ही हमें ऐसी प्रयास निश्चित रूप से करने चाहिए। यह सब स्थान नकारात्मकता के केन्द्र बन चुके हैं। जिस तरह विश्वविद्यालय सातक बनाते हैं या मठ आध्यात्मिक व्यक्ति बनाते हैं, उसी तरह जेल इन प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले अपराधियों के लिए बड़े. बड़े प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले संस्था बन गए हैं बजाए इसके की अपराधियों को सुधार जाए। ध्यान इस क्षेत्र में निश्चित रूप से बहुत कुछ कर सकता है- क्योंकि अंततः बदलाव उस आदमी के अंदर से ही आना है। इससे पहले कि आप समाज में बदलाव देखें, हर व्यक्ति के अंदर बदलाव आना चाहिए, हर क्षमतावान अपराधी के अंदर। ध्यान केवल अलग-अलग इंसान को ही नहीं बदल सकता है बल्कि समाज में अत्यंत अपराध दर को भी घटा सकता है।
... प्र. पाप और पुण्य क्या है ?
जो भी आपको प्रेम और खुशी से भर देती है, आपके व्यक्तित्व को विकसित करती है, जो भी आपको प्रेम और संवेदना का अहसास कराए, वही पुण्य है। जो भी आपको दूसरों से अलग करती है, और दुखी एवं उदासी का अहसास कराती है, वही पाप है। खुशी आपका स्वाभाविक स्वभाव है। जो भी आपको इससे दूर ले जाती है, स्वपी़डन रति करने वाला बनाती हो या परपी़डन रति, जिससे भी आपको अपने लिए या दूसरों के लिए अफसोस हो, वही पाप है। ... प्र. आध्यात्मिक विषयों में, क्या हमें दूसरों की धारणा की चिंता करनी चाहिए या नहीं ? जब तक हम दूसरे के लिए सरदर्द नहीं बनते, जब तक हम उनके जीवन की गतिविधियों में टांग नहीं अड़ाते तब तक हमें दूसरों के धारणाओं की कोई परवाह नहीं करनी चाहिए। ... प्र. जो आत्मज्ञानी हो जाते हैं वह संस्था क्यों बना लेते हैं ? एक समय ऐसा था, जब यह रास्ता अकेले चलने के लिए ही बनाया गया था। आज, मैं समझता हूं यह मेरी जिम्मेदारी है कि आनंद और लाभों को सब में फैलाऊं। अवश्य ही आप कह सकते हैं, कि यह वास्तविक आध्यात्मिकता नहीं है। मेरे गहरे व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर, मैं आपको केवल इतना बता सकता हूं कि, जैसे विवेकानंद कहते थे, वास्तविक आध्यात्मिकता केवल आलोकित अवस्था पा लेना ही नहीं है, बल्कि उसके लाभों को सब में फैलाना है! इस जन्म को मैंने इसी काम के लिए चुना है! इसके लिए जो भी आवश्यक है-यहां तक कि संस्था भी- मुझे बनाए रखना है।
... प्र. क्या आध्यात्मिक परम्परा आज भी प्रासंगिक है ?
यह हर समय प्रासंगिक ही है। बिना आध्यात्मिक परम्परा के आज हमारा देश कहां पर होगा ? हजारों सालों से वह हमारी संपूर्ण संस्कृति का रखवाला बना हुआ है- संस्कृत और धार्मिक ग्रंथ, भरतनाट्यम से लेकर कालाचारा तक, आयुर्वेद से लेकर सिद्धा तक, धर्म से लेकर आध्यात्मिकता तक, पुर्वजों से मिली इस विरासत की रक्षा मुट्ठी भर कुछ लोग कर रहे हैं! भागवत के अनुसार, पृथ्वी का अस्तित्व ही आत्मज्ञानियों से टिका हुआ है।
क्या आध्यात्मिकता आज के समय में प्रासंगिक है ?
उन्होंने अपने जीवन को उसमें डालकर इस कला और विज्ञान की रक्षा की है। आज सभ्यता के पास जो कुछ भी है, संस्कृति के नाम पर आप जिसका मजा लेते हैं वह उनका ही दिया हुआ उपहार है। हमारी शताब्दी में भी, अकलंकित रूप में उसकी रक्षा करने की जिम्मेदारी उन्हीं की है, और निरंतरता को बनाए रखने की भी। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ... प्र. परंतु भगवा वस्त्र पहने हुए कुछ लोगों के गलत कामों की वजह से, उनका नाम कलंकित हुआ है ................ मुझे आपसे एक सवाल पूछना है जब हर्षद मेहता- मुंबई शेयर-बाजार घपला आपको याद है ? जब हर्षद मेहता ने देश को अरबों का धोखा दिया था, उसने कमीज़ और पतलून पहनी थी। क्या इसका मतलब है कि कमीज़ और पतलून पहना हर शख्स हर्षद मेहता है? अगर आप ऐसा सोचते भी हैं तो क्या यह उस तरह के कपड़े पहनने वालों की गल्ती है, या आपकी समझ में गल्ती है ? ऐसे वाक्ये हुए हैं जहां सैकड़ों नकली डॉक्टरों को जनता को धोखा देने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है। तो क्या आप अब प्रत्येक डॉक्टर को शक की निगाह से देखते हैं? क्या आपने डॉक्टर के पास जाना छोड़ दिया है ?
बाहर आइए !
पुराने तर्क भूल जाएं। यह तो केवल भागने के रास्ते हैं। आपकी अज्ञानता के कारण आध्यात्मिक गुरु कुछ नहीं खोते हैं। अगर आप मुझे चूक जाते हैं, तो आप मुझे खो देंगे
क्या आध्यात्मिकता आज के समय में प्रासंगिक है ?
न आएं।
ठीक है, तो आप सहमत हैं?
... प्र. (एक पत्रकार): नहीं, मैं सहमत नहीं हूं। मैंने एक बार एक गुरु के सामने समर्पण किया था परंतु वह चल नही पाया ............ क्या आपने सचमुच समर्पण किया था। पत्रकार: अपनी तरफ से मैंने समर्पण करने की पूरी कोशिश की थी। एक बात आपको समझने की आवश्यकता है। जब आप कहते हैं आपने समर्पण करने की बहुत कोशिश की, इसका मतलब है समर्पण हुआ नहीं था। अगर वास्तव में समर्पण हुआ होता तो, यह सवाल, यह संदेह पैदा ही नहीं होता। यह उलझन और पाखण्ड को छुपाने का रास्ता है। हम अपने दिमाग में धर्म के बारे में सुन्दर सोच रखते हैं, पर अपने व्यावहारिक जीवन को जैसे हम चाहते वैसे गुजारते हैं। धर्म वह है जिसके साथ जीवन भर सुर मिलाया जाए, यह आंशिक मनोरंजन नहीं है। वास्तविकता यह है कि, जैसी जिंदगी हम गुजारते हैं, वही हमारा सच्चा धर्म है। वह धन हो सकता है, वह शक्ति हो सकती है, वह कामुकता हो सकती है। वही आपका धर्म है, इसीलिए आप अपनी पूरी जिंदगी इसी विचारधारा के अनुसार बिता देते हैं! क्या आप समझ गये ? कोशिश करें और पता लगाएं कि आपका वास्तविक धर्म क्या है।
क्या आध्यात्मिकता आज के समय में प्रासंगिक है ?
अपनी विचारधारा और जीवन को अलग रखना पाखण्ड है। आप राजी खुशी जिसे अपना धर्म मानते हों अपने जीवन में उसका पालन पूरी तरह से करें। ... प्र. पत्रकार: परंतु इस गुरु में मेरी पूरी आस्था भी है। फिर भी ...... देखिये, मैंने आपसे कहा कि, धर्म वह नहीं है जो आस्था ही रह जाए, वह आपके जीवन में घुल मिल जाना चाहिए। धर्म और जीवन को अलग-अलग रखना एक प्रकार का भ्रम है। पाखण्ड हमारे अस्तित्व पर राज करने लगता है। यदि आप विश्वास करते हैं कि जीवन जीने का एक निश्चित तरीका है या एक निश्चित विचारधारा सही है, तो अपनी जिंदगी को उस तरह ढालने के लिए राजी हो जाएं। नहीं तो, आप जिसे सच समझते हैं उसकी तलाश करें। जो आपका जीवन नहीं बदलती है वह आपके लिए सच नहीं है। अगर कुछ सच है तो उसका एक हल्का सा स्पर्श भी आपकी जिंदगी बदल सकता है। यदि वह आपको अन्दर से नहीं बदलता है, तो उसे जाने दें। उसे थामे रखकर शिकायत न करें। वह विचारधारा आपके लिए सही नहीं थी, बस। ... प्र. सत्तर के दशक तक, बहुत सी आध्यात्मिक संस्थाएं संस्कृति के स्थानों, धर्म, मंदिर, पवित्र ग्रंथ इत्यादि का रख-रखाव बहुत अच्छी तरह कर रही थी। परंतु अब इसमें गिरावट आई है यह बाहरी हस्तक्षेप से हुआ है या किसी और वजह से ? जब से ईश्वर के अस्तित्व पर शक करने वालों ने समाज पर अपनी पकड़ बना ली
... प्र. आत्मज्ञानी गुरु कर्मकांडों को भी बढ़ावा क्यों देते हैं ?
इंसान के सामने जब महान सत्य को साधारण तरीके से पेश किया जाता है तो वह इंसान के लिए मुसीबत बन जाता है, वह इसे अस्वीकार करता है। वह केवल जटिल कर्मकांडों को ही समझता है क्योंकि मस्तिष्क जटिल है और इसे जटिल अवस्था ही भाता है। यदि मैं किसी व्यक्ति से केवल आधे घंटे तक शांत बैठकर ध्यान करने के लिए कहता हूं तो वह नहीं कर सकता। परंतु यदि मैं किसी को एक मंदिर की एक सौ आठ बार प्रदक्षिणा (चक्कर लगाना) करने के लिए कहता हूं, तो वह खुशी - खुशी राजी हो जाता है। जटिल चीजों को करने में अहं की संतुष्टि ज्यादा होती है। परंतु ज्ञानी गुरुओं का संबंध तरीके से नहीं होता, उनका संबंध परिणामों से होता है। जब आप कर्मकांडों को निभाने में व्यस्त होंगे, आपका दिमाग उसी ओर लगा रहेगा। इस समय आपकी अन्तरात्मा मेरे सामने खुली रहती है, और मैं जो आपको देना चाहता हूं दे सकता हूं। यह एक सूक्ष्म तकनीक है। मस्तिष्क जो सवाल
क्या आध्यात्मिकता आज के समय में प्रासंगिक है ?
केवल अपने जीवन में ही नहीं, परंतु उन तरीकों में भी जिनके द्वारा आप दूसरों तक पहुंचते हैं और समाज में एक निश्चित बदलाव लाते हैं। धन्यवाद।
यू एस ए:
नित्यानंद ध्यानयीठम् ९२८ हंटिंग्टन डी आर, दारते, लॉस ऐंजेलेस सी ए ९१०१०, यूएसए फोन: ९१-६२५९८०० ईमेल: [email protected] यू आर एल: www.lifebliss.org, www.lifeblissgalleria.com [email protected]
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