1. Prem Ki Samajh
परमहंस नित्यानंद -
प्रेम की समझ सारा विश्व के आनन्द समाजियों और नित्यानन्द आश्रम के स्वामियों को दिया हुआ प्रवचन प्रेम की समझ नित्यानंद वैदिक साइन्स् यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित नित्यानंद वैदिक साइन्स् यूनिवर्सिटी यू. एस. ए. का एक विभाग Ebook ISBN: 979-8-88572-489-0 नित्यानन्द वेदिक साइन्स यूनिवर्सिट प्रिस से प्रकािशनित्यानन्द वेदिक साइन्सेस यूनिवर्सिट विभाग, यूएसए. सर्वाधिकार...२००७ प्रथम संस्करण:...........२००७ आईएसबीएन १३: ९७८-१-९३४३६४-३०-७ आईएसबीएन १०: १-९३४३६४-३०-४ सर्वाधिकार सुरक्षित. इस प्रकाशन का कोई भी अंश पुनः प्रस्तुत नहीं कि याजा सक ता. न कि सी और रूप या माध्यम से प्रेषित कि या जा सक ता है, इलेक्ट्रॉनिक ,मैके निक ल, फोटो कॉपीरिक डि"मा वफ कोई भी तरीक हो । इसके लिये प्रकाशक की लिखित अनुमति की जरू रतहोगी । यदि आप इस पुस्तक में से क ईसूचना अपने लिये लें तो आपके कृ त्यके लिये लेखक या प्रकाशक की कोई ईजिम्मेदारी नहीं होगी। इस पुस्तक की बिक्री से आने वाली राशि परोपकर यर्यके लिये जायेगी। भारत में मुद्रक आदित्य मुद्रक ,बंगलौर. फोन:८०२६६०६७७६ प्रेम वह है जो अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है। अपना सब कुछ देने को तैयार रहता है पर बदले में कभी कुछ नहीं मांगता। ... प्र. प्रेम क्या है ? यह छ दूमरू पमेँ साधारण प्रश्न है, परंतु देखें यह आपके कि तनी गहराई तक ले जाता है! जिसे सामानयतः प्रेम क हतेहैं वह हार्मोन की क्रियाशीलतासे अधिक कु छनहीं है। यह लोभ, भय, गुस्सा और ईर्ष्या की खींच तानी के बीच में क मिक रहतहै। इस तरह के प्रेम में जीना जो हार्मोन और मन क खेल है एक नरक के समान है। परंतु हममें से अधिक तरलोग छ मेटे -छ मेँटोलबी प्रेम जिसे हम जीवन भर देते व लेते आए हैं के परे कु छ लपनाही नहीं कर पातेहैं। प्रेम के वास्तविक अर्थ क समझने के लिए, पहले हमें मनुष्य के स्वभाव क समझना होगा। मनुष्य कु छसीमा तक तीन स्तर वाला है, जो कि बुद्धि, भावना एवं अन्तरात्मा से बना है। सबसे भीतर क ट के द्रिभाग, आत्मन या स्व सबसे परे है। जब आत्मान के रिश्ते बुद्धि के मिर देता है, बुद्धि पर क जावक बिरसात होती है—और प्रज्ञा में बदल जाती है। जब आत्मन भावना के द्वार क रताहै, भावना शुद्ध होती है और विश्वास के रूम प में व्यक्त होता है। और जब आत्मन स्व क स्पर्श क रताहै, तो अन्तरात्मा प्रेम के रूम प में खिलती है। अंततः: चेतना के चरम रूम पमेँ खिलने क प्रेम क हतेहैं। यही हमारे पास मौजूद अंतिम संभावना है। ... प्र. क्या हम सभी एक ही तरह से प्रेम करते हैं, या प्रेम के अलग प्रक रहें ? प्रेम के वलएक ही होता है, परंतु उसके अभिव्यक्ति विभिन्न लोगों में भिन्न-भिन्न प्रक उसे होती है। बौद्धिक प्रेम मस्तिष्क द्वारा व्यक्त कि याजाता है। मस्तिष्क से इसके नजदीकीसंबंध होने के क रण, यह प्रेम सबसे अधिक भ्रष्ट है। बौद्धिक प्रेम का अनुभव सौदे के रूप में कर रते हैं, कु छसीमा तक ठे के जैसा। यह सख्ती से लेने-देने में विश्वास रखता है। इसके तसम्बन्ध हिसाब से - 'मेरे लिए इसमें क्या है ?' इस तरह के प्रेम के परिणाम हमेशा चाहत, अधिक रकिभावना, ईष्र्या और हिंसा होता है। इस तरह के प्रेम न ही देने वाले, न ही लेने वाले को बदलता है। भावनात्मक प्रेम हृदय द्वारा व्यक्त होता है, और वह और अधिक शुद्र अभिव्यक्ति है प्रेम की। यहां सौदेबाजी पर नहीं संपर्क पर है। यह प्रेम विश्वास कर रताहै और अधिक चाहत के बिना ही देता है। इस प्रेम में जो भी परेशानियां पैदा होती हैं वह प्रेम द्वारा ही सुलझा लिया जाता है। इस प्रक रक प्रेम देने वाले को बहुत ज्यादा बदल देती है। जब प्रेम की अभिव्यक्ति अन्तात्मा से होती है, तो देने और लेने का तसवाल ही नहीं उठ ता, तब के वलप्रेम को फै लानाहोता है। यह प्रेम अपने साथ कि सीतरह के दद्र या परेशानी को नहीं लाती, क्योंकि यह दूसरों पर निर्भर नहीं है। इसे तो कि सीभी वस्तु कीआवश्यक तान नहीं होती, यह तो केवलएक चमक है, छलक नके अहसास। इस तरह क प्रेम सुन्दर तरीके से दोनों ही पाने वाले और देने वाले को बदल देती है। जब प्रेम बुद्धि के मध्य फै लताहै तो सही तरह से 'प्यार में पड़ नाक हतेहैं! जब यह भावनाओं के मध्य फै लताहै, हम उसे 'प्यार में उड़ नाक हसरक रहतें हैं। जब यह अन्तात्मा में फै लताहै, तो उसका नतीजा 'प्यार में उड़ नाहोता है! एक ही प्रक रक प्यार जो नाम के अनुरुपआपक टउड़ नेके लिए पंख देता है। ... प्र. साधारण प्रेम कि सतर्ह से दैवीय प्रेम से अलग है? क्या यह दोनों ही एक ही तलाश कीअभिव्यक्तियं हैं? मैं क हसक ताहूं कि प्रेम दो तरह के हैं--बांट क रपेम और दैवीय प्रेम! साधारण प्रेम बांट ताहै, दैवीय प्रेम जोड़ ताहै। साधारण प्रेम दीवारों का अनुभव करताहै, दैवीय प्रेम दीवारों को नहीं पहचानता है। परंतु हां, यह एक ही तलाश कीअभिव्यक्तियं हैं। इन दोनों तरह के प्रेम के प्रक रमें अंतर नहीं है, परंतु स्तर में है। जब साधारण प्रेम बुद्धि से अन्तात्मा की ओर जाता है, तब यह दैवीय प्रेम कीगुणवत्ता की ओर जाता है। ... प्र. परंतु हमारे दैनिक रिश्तों में, क्या हमेशा ही कु छत्व अधिक र की भावना और ईर्ष्या इत्यादि के नहीं होंगे ? नहीं। यदि यह कि सीरिश्ते में रहते हैं, तो यह प्यार क रिश्ता बिल्कु लनहीं होता है; यह के वलअहम् के सन्तुष्टि क रनेवाला खेल है जिसमें प्यार क स्वांग रचा जाता है। यदि आप प्यार क रते हैं तो अधिक रक ी भावना नहीं रख सक ते - और इसके ठीक विपरीत के वलसम्पत्ति पर क कोई अधिक रक र सक ताहै। अन्तात्मा को अधिक परमें लेने कीक ोशिशक रनेकीहिम्मत क कोईकै सेक र सक ताहै? इसक प्रयास भी उर्जा कोपदार्थ में बदल देना है। यह उस व्यक्ति के प्रति गहरा अनादर जाहिर क रतीहै। तब आप उस व्यक्तिसे अपना रिश्ता कै से जो़ड सक तेहैं या कै सेउम्मीद क रेंकि वह पुरू ष/महिला आपसे रिश्ता जोड़े ?इसके कoiमायने नहीं कि वह कि तनी अच्छी तरह छि पाहै, अन्तात्मा इस अनादर के रवैये का अनुभव कर लेती है। इसीलिए जिसका रिश्ता अधिक रजताने वाले इंसान से हुआ हो वह जल्द हो या देर से आजाद होने की कि कोशिशक रेगा। ईर्ष्या तो, बिल्कु लप्रेम के विपरीत है। ईर्ष्या, प्रेम, विश्वास और ईमानदारी के दूसरों पर थोपने की कि कोशिशक रतीहै। यह दूसरों से उन उपहारों को छीननेकी कि कोशिशक रतीहै जो के वलराजी खुशी दिया जा सके । ईर्ष्या और प्रेम एक साथ कै सेरह सक ते हैं। अधिक रक ीभावना और ईर्ष्या दोनों ही मूलतः भय से पैदा होती है। अहम् डरपोक है ! वह डरताहै कि हिंousकीशक्ति दूसरों के आगे न खो जाए। इसीलिए वह दूसरे को 4 पिंजरे में बंद करना चाहता है। वह वफादारी का कर्तार चाहता है, जिसका नवीनीक रणप्रतिदिन हो। इसक आतक्र मण क संपूर्ण दिखावा गहराई में बैठ चुके डर पर पर्दा डालनके लिए कि यागया के वलेक नाट कहै। दूसरी तरफ ,प्रेम, भय को नहीं जानता। वह इतना पूर्ण विश्वास में होता है कि भय क तअनुभव ही नहीं कर सक ता। प्रेम प्रशन नहों क रता, वह वफादारी की मांग भी नहीं क रती। वह के वल समर्पण क रताहै। जब दो इंसान सच्चे प्यार में बंधे होते हैं, तो वह एक दूसरे को समर्पण नहीं क रते, वह दोनों तो प्यार के सर्वोच्च अनुभव को समर्पित हैं। आपके प्रेम क रतनाही अपने आप में पूर्ण आश्वासन है। किसी और प्रतिबूति या जमानत की क ि आवश्यकता ता नहीं है। सच्चाई में, प्यार विश्वास करताहै अगर विश्वास क उल्ंघन हो ता भी। उसे और क ि ईरास्ता नहीं आताि। कि सीदूसरे तरह से प्रतिक्रि याक रनेक ि अर्थ है दूसरों की खुशियों क ि बर्बाद क रना, और जो सच्चा प्यार क रताहै वह ऐसा क भीभी सहन नहीं क रसक ता! प्यार ईष्र्या और अधिक कर्ता भावना की भाषा नहीं जानता। प्यार के रिश्ते में इनको लाना निश्चित तरीक ा रहै प्यार को मार डालनके ट सावधान रहें! ... प्र. बिना अधिक कर्ता भावना के , निष्ठ के लिये बाध्यता जैसी बातों से, क्या रिश्तों क पतन जिसे 'मुक्त प्रेम 'या 'यौन मुक्तता 'क हते हैं हमें नहीं होगा? नहीं। इसके विपरीत, इसक टेक आउट रहता है। अधिक तरकीभावना के अस्तित्व क परिणाम ही यौन मुक्तता है। जब प्रेम बुद्धि के द्वारा लिया और दिया जाता है, तो रहे थे। जब प्यार गिने-चुने तरीके से किया जाए, तो वह साधारण और सीमित मात्रा में व्यक्त होता है, उन सबसे सुरक्षित रहने के लिए उन चुने हुए कुछ लोगों को जो ग्रहणशील हों से बचाने के लिये। इस प्रकार का प्रेम अपने साथ अपेक्षा, दर्द और निराशा को भी लाता है। परंतु प्रेम जब आपके अन्तरात्मा का गुण बन जाता है, तो वह सूर्य की किरणों की तरह छिट बिखेरता है, इस बात की चिंता न करते हुए कि कौन इसे ग्रहण कर रहा है या इसका आदान प्रदान कर रहा है। इस तरह के प्रेम से अन्तरात्मा के खिलने की अभिव्यक्ति होती है। यह समान रूप से सब में फैली हुई है, और बिना कि सीसवाल के एवं बिना कि सीशर्त के सबके रोशिक रक रती है। ... प्र. हम साधारणतः क हते हैं कि दैवियता की ओर जाने वाले मार्ग पर अकेले ही चलना पड़ ताह। पर क्या यह संभव है कि दो इंसान प्रेम के माध्यम से एक साथ चल सकें? दैवियता की ओर जाने वाला मार्ग बहुत ही व्यक्तिगत है। कुछ दूरी तक तो, आप एक साथ चल सक ते हैं। वह मार्ग को और सुंदर बनाता है जब उसे अपने प्रियजन के साथ बांटे। परंतु कुछ देर बाद, एक वक्त आएगा जब आप स्वयं समझ जाएंगे कि इस हद के बाद, प्रत्येक व्यक्ति को अकेले ही के दमबढ़ नापड़ ताहै। प्रत्येक व्यक्ति अनूठ है, और इसी तरह हर एक का मार्ग भी। जब यह आभास हो जाएगा, एक साथ चलने की आवश्यक ताभी स्वेच्छ से छू टजाएगी। अंततः दैवियता कीओर अंतिम उड़ अनहेमेशा बिल्कु लअके लेही भरना पड़ ताहे! ... प्र. क्या प्रेम क आर्थ है दूसरे व्यक्ति क उसी रु पमें स्वीकार क रनाजैसा वह है, उसके ग़लतियों और क मियोंके साथ ? यह शब्द, 'दूसरे व्यक्ति क विसे ही स्वीक रक रनाजैसा वह है, उसके सीरारी ग़लतियों के साथ......' एक तरह क दोषरोपण क रतीहै, है कीनहीं ? 'दूसरे व्यक्ति का स्वागत क रनाजैसा वह आपके सामने है!' प्रेम के और क रीबहोगा! संपूर्ण अस्तित्व आपके ईश्वर क उपहार है। अनुक म्पा और विनम्रता के साथ उसे स्वीकार क रक रें। ... प्र. क्या प्रेम अहम् कृतुष्टि क रनेबाला भी हो सक ताहे ? हां- जब वह बुद्धि से पैदा होता है। वास्तव में, अधिक तर लोग कि सीरिश्ते में या तो शोषण क रते हैं या उनका शोषण होता है। आजक लह म जिसे प्रेम और नफ रतक। रिश्ता क हतेहैं उसका संपूर्ण आधार अहम् है। अधिक तर'प्रेम' के रिश्ते इस राह पर चलक रख्तम हो जाते हैं क्योंकि आपके साथी एक सीमा के बाद आपके अहम् की मांग के पूरा क रनese अस्वीक रक रताहे (या असमर्थ होता है)। प्रेम में टू बेरहने क दाव क रनेबाले लोगों के आहत अहम् कीशिक यतआप सुनते हैं: 'वह क भीनहीं सुनती', 'वह मेरा सम्मान नहीं क रता', 'वह मेरे आवश्यक ताओंक नहीं समझती', वगैरह, वगैरह। यह और कु छ नहीं बिल्क चोट खाए अहम् की प्रेम की समझ सिसकि यांहैं। याद रखें, अहम् संघर्ष पर फ लता-फू लतहै। संघर्ष अलगाव की भावना क प्रारम्भ क रताहै, 'मैं और तुम की भावना जगाता है' जिसमें अहम् अपने आप को बलशाली महसूस करे। जब आपके मन में नया प्यार होता है तो आप स्वतः ही सुंदरता के अनुभव के आगे समर्पण कर ने के तैयार हो जाते हैं। अहम् को जबरदस्ती कि या जाता है कि वह सक्ति य संयोग न कर सके। परंतु जब प्रेम बुद्धि द्वारा आता है, वह अधिक देर तक इस 'ऊँ चाई को संभाल नहीं सक ता। जितनी जल्दी रिश्ता परिचित हो जाता है, अहम् वार क रताहै, संघर्ष की स्थितियों के बनात हुआ जो उसके जीवित रहने के लिए आवश्यक है। प्यार और नफरत भरा रिश्ता के वल रू मानीलगावों तक ही सीमित नहीं है। अभिभावक और संतानो में स्थायी अहम् क युद्ध चलता रहता है, अभिभावक अपने बच्चों के द्वारा अपना दूसरा जीवन जीना चाहते हैं, और बच्चे का अहम् उसकी अपनी स्वतन्त्रता पर हुये आरोपण के खिलाफ विरोध क रताहै। यदि आप अपने रिश्ते में इन लक्षणों को पहचानने लगे, तो वक्त आ गया है आप समझ जाएं कि जो आप अनुभव कर रहे हैं वह प्यार नहीं है। जैसा कि वह क हतेहैं, सच्चे प्यार में कु छ विपरीत नहीं होता। जो कु छ भी हो, वह नफरत में नहीं बदल सक ता। वास्तव में जो आप तलाश रहे हैं वह है स्वयं क बेहत्तर अनुभव, जो दूसरे व्यक्ति की उपस्थिति, अस्थायी रूप से पूरा कर रही है। सावधान हों! ... प्र. मुझे कै से पता चलेगा कि मैं जिस प्यार का अनुभव कर रहा हूँ वह सच्चा प्रेम है कि नहीं ? प्रेम हमेशा सत्य होता है, भ्रम क भीनहीं। देखना होता है कि क्या गलत भावना को आपने प्रेम समझ लिया है! प्यार वह है कि जिसे कु छ भी नष्ट नहीं कर सक ता - विशेषक वास्तविक तासे! यदि मधुमास के खत्म होते ही वह खिँड क से उड़ जाए, वह प्यार नहीं है। यदि प्यार इसलिए क महो जाता है क्योंकि आपके साथी क वजन बढ़ गया है या उसे शादी की जयंती याद न रहा हो, तो वह प्यार नहीं है। अगर विश्वास हमेशा बना रहता है, जब साथी विश्वास के लायक न हो तब भी - वह प्यार हो सक ताहै। आपकै सेपता चलेगा कि कि सीके लिए आप जो महसूस क रतेहैं वह सच्चा प्यार है ? इसक परीक्षण क रें। क्या के वलउस व्यक्ति कीउपस्थिति से आप खुशी से भर उठ तेहैं, शांति के साथ, क्या आपक सेवयं में और ज्यादा के द्रितमहसूस क राताहै ? क्या आप दोनों खोजोभी के साथ एक साथ बैठ नापसंद क रतेहैं, विचारों के आदान-प्रदान क अनुभव क रतेहुए जो शब्दों से परे हो ? जो भी हो, आपकैक भीभी उस व्यक्ति क खोने क डर रत सताए ? क्या चुनौती एवं चिंताओं ने आपके प्यार क और अधिक निखरने में मदद कीहै ? क्या उस व्यक्ति क प्यार क रनक रख्याल आपक स्वाभाविक त ही आता है - जैसे कि और क ईरास्ता न हो ? प्रेम की समझ यह प्यार क सत्व है। वास्तव में, प्यार इस ड र्केजानता ही नहीं है कि हो सक ताहै सब कु छभ्रम हो। तो जब आप प्यार करैं,तो ऐसे करैंजैसे कि वही एक मात्रसत्य है और अगर क भीऐसा पल आए जब आपकोलगे कि यह सब भ्रम है, इसक। साधारण सा मतलब होता है कि प्यार खत्म हो चुक हैै और अब वक्त आ गया है कि आप आगे बढ जाएं। ... प्र. यदि रिश्ते में क कोईअनबन हो, तो क ोशिशक रतैरहना चाहिए या आगे बढ जाना चाहिए ? अच्छ सव प्यार सबसे खतरनाक मार्ग है। जिन लोगों में बहुत हिम्मत होती है वही उस राह पर चलते हैं। इस राह में कि सीभी मोड पर आपको, बहुत सी खुशी, बहुत सा दर्द, अत्यधिक सुंदरता, बहुत ज्यादा संघर्ष और अत्यधिक समझ के लिए तैयार रहना पडैग। हां, हर रिश्ते में संघर्ष होना अवश्यम्भावी है, क्योंकि हर व्यक्ति अपने आप में अनूठ होता है, और क कोई भी दो व्यक्तित्व ऐसे नहीं होते जिनकासामंजस्य इतनी अच्छ तरह बैठे कि उसमें क ोईदरार न रह जाए। यदि झगड होता है, तो उसे इस ड रसे दबा न दें कि क हींरिशता ही न खत्म हो जाए। इसके विपरीत, इसे अनदेखा करनाभी ऐसा ही होगा। झगड को होने दें। उसक परीक्षण करें। देखें कि आप उससे क्या सीख सकतें हैं। क्या वह आपके अंदर कुछ पनपने से हो रहा है क्योंकि आप गुप्त रु पसे कु छस्वीक रत नेक ओराजी नहीं हैं ? कि सीबहुत घनिष्ट रिश्ते में ही आप स्वयं को परख क रसक तेहैं। आप क साथी एक परत कीतरह है जो आपके स्वाभाविक स्वभाव को प्रतिबिम्बित क रताहै। कि समें इतनी हिम्मत होगी कि आपके बदतर दोषों कीओर इतनी स्पष्ट ताके साथ इशारा कर सके ! तो अपने झगड़े कीप्रकृ तिक परीक्षण क करें।याद रखें हर रिश्ते में एक वक्त होता है साथ रहने क टऔर एक वक्त होता है आगे बढ नेक ट।आप कि सतरह क टप्यार बांट ना चाहते हैं? क्या आप वास्तव में, सच में, निश्चित रु पसे प्यार क रतेहैं ? क्या आप लोग दोनों एक दू सेरे से गहराई से सम्बद्ध हैं, अन्तरात्मा से अन्तरात्मा ? क रण और बहस न खोंजें, इस प्रक्रि या को बौद्धिक ताक जामा न पहनाएं- बस प्रश्नों को अन्तर कीओर मोड़ संपूर्ण ईमानदारी और सच्चाई के साथ। उत्तर, अपने आप निक लाएगा। यदि आप क टजवाब हां है, तो समझ जाएं कि झगड़े क टविषय रिश्ते में उठे महज बुलबुले हैं। यह अह म् के द्वारा बनाई गई स्थितियां हैं निस्वार्थ भावना के ,समर्पण के अहसास जो प्रेम से आरती है क विरोध क रतीहै। प्रेम एवं लगाव के साथ धीरे-धीरे प्रेम की समझ इन स्थितियों से अवगत हों। जो जवाब आप सुन रहे हैं वह अगर ना हो, तब हो सक ताहै आगे बढ़ नेक समय आ गया है। कि सीऐसे रिश्ते में जहां अन्तात्मा से अन्तात्मा के रिश्ते की सच्चाई न हो धार्मिक दुरोपयोग है, आप दोनों के लिए अनुचित। प्यार, आपके लिए, क हंऔर भी हो सक ताहै। उसके तिलतिश ने क ई संभावनें के लिए बस खुले रहें। इसी बीच, झगड़ क औरिश्ता खत्म कर रने न दें, आप दोनों को बर्बाद कर रने दें। क कोईभी इसके योग्य नहीं है। स्वीकार रक रें कि वह व्यक्ति आपके लिए नहीं था बिना कि सीरोष व कटु ता के आगे बढ़ जाएं। प्यार क रने की अपनी क्षमता क नष्ट न करें। अपने में कटु तमाने पर स्वयं ही अधिक क ढूंढाएंगे, और प्यार में आपकी आस्था क नष्ट कर रेंगे और यह कि सीके साथ घट ने वाली सबसे खतरनाक बात है। ... प्र. हमेशा ही प्रेम और दर्द एक साथ क्यों चलते हैं ? यह सारे प्रश्न एक ही दिशा की ओर इशारा क रते हैं। जब वहां पर गणना है, प्रेम का परिणाम दर्द होना ही है। हम जो नहीं समझते हैं वह यह है कि हम दूसरे व्यक्ति की ओर मुड़ तेहें कि सीक मी को पूरा क रने के लिए, क उछअधूरापन जो हम अपने आप में अनुभव क रते हैं। जब तक दूसरा व्यक्ति हमारे अहम् को सहारा देकर रहें, संपूर्ण बनाता है, रिश्ता प्यार का होता है। परंतु एक वक्त आता है जब दूसरा व्यक्ति हमारे अहम् की ओर देखभाल नहीं क रसक ता, न ही उसक बोझ सहन क रसक ताहै। जब अहम् दूसरे व्यक्ति के सहारे से वंचित होता है, तब क मी, असुरक्षा एवं ड रकी दबी हुई भावनाएं पुनः अप्रतिबंधित हो जाती हैं। स्पष्ट हो: रिश्ते दर्द क वक रणनहीं बनते, वह तो दबे हुए दर्द क बाहर लाती है जो आपमें पहले से ही है। जब तक आप अपने को संपूर्ण बनाने और आवश्यक ताएं पूरी क रनके लिए बाहरी स्रोतों की ओर देखेंगे, ऐसा होता ही रहेगा। अपने आप में संपूर्ण बनने की कोशिश करें, अपने आप में कें द्वितहों। इस पर ध्यान कें द्वितक रने की कोशिश करें कि आप रिश्ते को क्या दे सक ते हैं, बजाए इसके कि आप इससे क्या ले सक ते हैं। प्यार क पहला पाठ है, प्यार न मांगना। इस तरह से या उस तरह से, हम सभी ध्यान की भीख मांग रहे हैं, प्यार की भीख मांग रहे हैं। जब आप स्वयं ही प्यार के भिखारी हैं, तब आप दूसरों को प्यार कै से दे सक तेहैं ? चिंता न क रें कि आपका प्यार लौट आया रहा है या नहीं। प्यार सौदा नहीं है, यह एक उपहार है। जब प्रेम कि सीके अन्तातमा से निक लताहै, तो वह 'सही व्यक्ति ' या सही स्थान या सही समय के लिए नहीं रू क ता वह इसकी भी परवाह नहीं क रताकि प्रेम के बदले में प्रेम मिल रहा है या नहीं। आप प्रेम से इतने भरे होते हैं कि उस अनुभव को बांट ने की बाध्यता को महसूस क रते हैं, जैसे कि 14 बादल की आवश्यकताहै बारिश को बांट ना, या फूल अपनी सुगंध को बांट ना। इस तरह का प्रेम दोनों पर आशीर्वाद बरसाती है, देने वाले पर और लेने वाले पर। जब दोनों साथी प्रेम 'मांगते 'की ध्रुवता से प्रेम 'देते 'की ध्रुवता की ओर बढ़ेंगें, तब 'अस्तित्व' से 'परमात्मा' तक पहुंचा जा सक तेहैं। ...प्र. क्या गुरु के साथ प्रेम में पड़ नाभी 'गिरना' है ? हां और नहीं। साधारण 'प्रेम में पड़ ना' रुक पकड़ लगाव है। गुरु के साथ, यह मात्र एक प्राथमिक कदम हैरू पसे परे जाने की ओर। सामान्यतः, जब आप प्यार में पड़ तेहैं, आप केई तरीक से गिरते हैं - क्योंकि अधिकतर की भावना, ईर्ष्या, आधिपत्य, गुस्सा जरूर इसकेपीछे तक रहेंगे। प्रेमी एक दूसरे के साथ लुक-ऐ-हि ड़ॉट मा खेल खेलते हैं। यद्यपि हर की सी को अपने आप को संपूर्ण महसूस कर ने के लिए दूसरे की आवश्यक तपड़ तीहै, अहं भी अपने पर दूसरे केप्रभुत्व पर नाराज होती है। यह नाराजगी दूसरे पर गुप्त शारीरिक या मानसिक हिंसा केरू पमें अपने को व्यक्त कर तीहै। गुरु के साथ, भी यही प्रेम और यही ड़खना रहता है - लेकिन वहाँ पर केई समझौता नहीं है। आपको पूरी तरह से गिरना होगा - दिमाग से समर्पण और हृदय से समर्पण! गुरु संपूर्ण प्रेम देते हैं और पूर्ण समर्पण चाहते हैं। प्रेम और समर्पण दोनों का अर्थ है अहं की निश्चित मौत। जब आप गुरू के पास आते हैं, तो धोखा और प्रभुत्व क खेल नहीं खेल सक तेजो कि आपके अहम् के जिंदा रखने के लिए इतना आवश्यक है। यह आपके अहम् की अंतिम परीक्षा है; कहीं भागना नहीं है। आपको प्रेम और डर में से, कि सीए को हमेशा के लिए, चुनना पड़े गा। यदि आप संपूर्ण प्रेम और विश्वास के साथ गुरू क स्वागत अपनी अन्तरात्मा में कर रते हैं, तो गुरू की उपस्थिति की लौ की चमक आपके अहम् को जलाक र अन्तरात्मा को बदल सक ती है। गुरू के हाथों में, आप नए जन्म क अनुभव करेंगे। इसीलिए गुरू के प्रेम में पड़ नेक परिणाम प्रचंड ऊर्जा ओर उठ नाहोता है। आप मेरे प्रेम में भी पड़ सक ते हैं- पर मैं आपके गिरा हुआ नहीं रहने दूंगा। बल्कि मैं सुनिश्चित करूं गकि आप प्रेम में उड़ जायें। ॐ ॐ ॐ 16 ‘Ordinary love divides; divine love unites.’
- Nithyananda Ebook ISBN: 979-8-88572-489-0 PUBLISHED BY NITHYANANDA VEDIC SCIENCES UNIVERSITY PRESS A division of Nithyananda Vedic Sciences University, USA