1. परमहंस नित्यानंद जिनका नाम है
परमहंस नित्यानंद जिनका नाम है - 1
(His name is Nityananda in Hindi) – धरती ग्रह पर फैले परमानंद की झलकियाँ परमहंस नित्यानंद वैदिक विज्ञान विश्वविद्यालय और लाइफ़ ब्लिस फ़ाउंडेशन प्रेस द्वारा प्रकाशित परमहंस नित्यानंद वैदिक विज्ञान विश्वविद्यालय, संयुक्त राज्य अमरीका के अंग कॉपीराइट २००८ प्रथम संस्करण मई २००८ Ebook ISBN: 979-8-88572-487-6 सभी अधिकार प्रकाशक के अधीन सुरक्षित हैं। इस प्रकाशन का कोई भी भाग बिना प्रकाशक की लिखित अनुमति के, पुनर्प्रकाशित, अथवा पुनः प्राप्ति व्यवस्था में संग्रह, अथवा किसी भी रूप में परिवर्तित अथवा इलेक्ट्रॉनिक मैकेनिकल फ़ोटोकॉपीरॉरिड रीथायवा कि सी अन्य साधन के रूप में, नहीं कि याजा सक ता। यदि इस पुस्तक में दी गई सूचनाओं का उपयोग आप उपरोक्त वर्णित कि सी रूप में करते हैं, तो लेखक अथवा प्रकाशक आपके इस के लिए कानूनीक पर्यवाहीक रनेके लिए स्वतंत्र होगा। इस पुस्तक की समस्त बिक्री से प्राप्त धन धमार्य कार्यकलापों को सहयोग देने के लिए है। परमहंस नित्यानंद जिनका नाम है
- धरती ग्रह पर परमानंद की झलकियाँ परमहंस नित्यानंद वैदिक विज्ञान विश्वविद्यालय और लाइफ ब्लिस फाउंडेशन प्रेस द्वारा प्रकाशित परमहंस नित्यानंद वैदिक विज्ञान विश्वविद्यालय, संयुक्त राज्य अमेरिका का अंग धरती ग्रह पर फैले परमानंद की झलकियाँ भूमिका मनुष्य बाहरी संसार में चाहे जो प्राप्त कर रहा रहे, किन्तु अन्तिम खोज तो शान्ति और आनन्द की प्राप्ति है। इस अस्तित्व स्तर पर वह परिपूर्णता को प्राप्त कर रहता है। जब वह इस खोज को प्राप्त कर रलेता है, तो अपने स्वयं के ज्ञान से इस संसार को प्रज्जवलित कर रनेमें समर्थ हो जाता है। पूर्व में ऐसे हजारों ज्ञानीओ ने जन्म लिया है, जिन्होंने इसी परमानंद की प्राप्ति के मार्ग मनुष्यों को दिखलाया है। ऐसे ही ज्ञानी के रूप में आज परमहंस नित्यानंद स्वामी इस संसार को ज्ञान से प्रक शित कर रहे हैं। आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण परिवेश में जन्में स्वामी जी ने तीन वर्ष की वाल्यावस्था से ही सत्य के प्रति तीव्र लालसा से हठ योग, मन-शरीर-आत्मा के एक जुट ताद्यान, तन्त्र, वेदान्त और अन्य पूर्वी तत्त्व-मीमांसा विज्ञान पर प्रयोग कर ने शुरू कर दिये। ज्ञान प्राप्त करने से पूर्व उन्होंने हजारों आध्यात्मिक तक नीकों का अध्ययन किया था। एक चित्त होक ज्ञान-प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने वाले स्वामी जी, आज विश्वभर के करोंड़ों लोगों के सम्मुख विस्मय-प्रेरणा व्यक्तित्व के रूप बने हुए हैं। वह ध्यान के यंक्र मोंके माध्यम से लोगों को सुस्पष्ट ता, आध्यात्मिक बुद्धि और जीवन समाधान प्रदान कर रहे हैं जिससे लोगों में ज्ञान-प्राप्ति के विश्ववास जग्रत हो। आज के युवाओं में वे स्वयं पर प्रयोग करने तथा ज्ञान-प्राप्ति करने की आश्चर्यजनक संभावनायें देखते हैं। परमहंस नित्यानंद स्वामी जी का लक्ष्य लोगों को अपने आपको जग्रत करने तथा उच्तता प्राप्त करने में सहायता प्रदान कर र्नाहै। धरती ग्रह पर नित्यानंद के विज्ञान को पुनर्स्थापित कर र्नाहै उनका लक्ष्य है। वह लोगों के उनके भीतर छीपी शक्ति के पहचानने में मदद कर रते हैं जिससे कि उन्हें ज्ञान प्राप्त हो सके। वह कहते हैं, "हमें एक ऐसे समाज का सुजन करना है जिसका सत्य के प्रति दृढ़ - विशवास हो।" विश्ञान और अध्यात्म को एक जुट कर ने के लिए वह वैजानिकों के साथ भी संपर्क र्ते हैं। यह पुस्तक परमहंस नित्यानंद स्वामी के ज्ञान प्राप्ति की झलकी यां प्रस्तुत कर र्ती है। रोचक घट नाओं एवं असामान्य सत्यों के माध्यम से, शब्दों में छिपे पेंगहन अनुभवों की ओर पाठक के एक ध्यान दिलाने के प्रयास किया गया है। कहा जाता है कि एक ज्ञान प्राप्त महापुरूष कि जीवन गाथा, एक साधारण मनुष्य के भीतर भी बेहतर जीवन शैली से अध्यात्म की ओर एवं स्वयं ज्ञान की ओर गहन इच्छा को विक सित कर ने में मदद कर सक्ती थी। आईये इस पुस्तक को पढ़ कर इस धरती ग्रह पर इस महापुरूष कि प्रोत्साहित झलकी यों का दर्शन करें। परमहंस नित्यानंद की विस्तृत जीवनो पढ़ने के लिए कृपया परमहंस नित्यानंद अंक की प्रतिलिपि खरोदें जिसमें उनके १७ वर्ष की आयु तक का विस्तृत वर्णन किया गया है। शेष अंक भी शीघ्र प्रकाशित किये जायेंगे। प्रकाशक 3 धरती ग्रह पर फैले परमानन्द की झलकियाँ धरती पर अवतरण "धरती ग्रह पर अवतरित होते समय प्रत्येक जीव का समय, स्थान, उसके माता-पिता तथा उसक लक्ष्य निर्धारित होता है।"
- परमहंस विवेकानंद आध्यात्मिक चुम्बक अरू णाचलके ओज तथा अरू पाचलेश्वर द्वारा प्रवाहित ऊर्जा केन्द्र के सहयोग से ही अरू णाचलम तथा लोक नायककि द्वितीय संतान के रूपमें परमहंस नित्यानंद का जन्म हुआ। अरू णाचलचोट एक आध्यात्मिक चिंतन स्थली है जिसने समय-समय पर ऐसे ज्ञानी महापुरूषोंके जन्म दिया है जिन्होंने ज्ञान कीखोज में भटक रहे विश्व के करोड़ों लोगों कोध्यु और उन्हें रु पान्तरितक रदिया। जिस तरह से एक अविकसित शिशु को क्लीनिकल इन्क्यूबेट रमें रखा जाता है उसी प्रकार रजव ऐसे ज्ञानी महापुरूषोंक जन्म होता है तो उन्हें भी आध्यात्मिक इन्क्यूबेट रकी आवश्यकता ताहोती है। शेषाद्री स्वामीजी, भगवान श्री रमण महर्षि तथा योगी रामसूरत कु मारुक छऐसे महान ज्ञानी पुरूषोंके नाम हैं जो अरू णावलमें अवतरित हुए। परमहंस नित्यानंद कीमाता जी जब दक्षिण भारत के तिरू पतिश्वर के पवित्र मन्दिर कीतीर्थयात्रा पर थी तब उन्हें अनुभव हुआ कि उनकेदूसरी संतान उनके गर्भ में पल रही है। १ जनवरी, १९७८ केदक्षिण भारत के तिरू वन्नमलईआध्यात्मिक शक्ति के न्द्रमें अद्दृश्यात्रि बीत जाने के बाद परमहंस नित्यानंद क इस धरती पर अवतरण हुआ। उनका नाम राजशेखर रखा आज अरू पाचल
- एक पवित्र पहहड़ी, शिव क प्रकट स्थल आध्यात्मिक चुम्बक जो विश्वभर के ज्ञान की खोज में भटक रहे लोगों को अनायास की अपनी ओर 5 पारिवारिक पुजारी "मेरा लक्ष्य अपनी दिव्यता सिद्ध कर रना नहीं बल्कि आपकी दिव्यता को सिद्ध कर रना हैं। - परमहंस नित्यानंद आज "अपना भविष्य जानने के लिए मेरे पास मत आओ। मेरे पास इसे नया रुप पेदाने के लिए आओ। मैं आपको ग्रहों से अप्रमावित रहना सिखा रहा हूं, न कि उन पर विजय पाना !" परमहंस नित्यानंद जब परिवार के पुजारी ने परमहंस नित्यानंद की जन्म-पत्री तैयार की तो उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके नक्षत्र एवं ग्रह अपवाद स्वरुप पऐक ही सीध में हैं, जोकि उन्होंने पहली बार देखा था। उन्होंने आश्चर्यचकित तहोक रमाता-पिता से हाकि यह बालक बड तहोक रएक राजा सन्यासी बनेगा। उस पुजारी ने परमहंस नित्यानंद की भविष्यवाणी कर ने में स्वयं को समरथ पाक र भाग्यशाली समझा और उसके बाद ज्योतिष भविष्यवाणी कर ना योग एवं पूज रघुपति योगी, एक मित्र एवं गुरु परमहंस नित्यानंद के माता-पिता ने अपने बालक क पाालन-पोषण एक संरक्षक कैभांति कि यऔर उनके आध्यात्मिक विक ासमे कोेईड चन पैदा नहीं कीं। जब परमहंस नित्यानंद क रींवतीन वर्ष के थे, तो उनकीमेंट रघुपति योगी से हुयी। रघुपति योगी योग व्यवहार में एक निपुण व्यक्ति थे जिनमें असामान्य क ौशलव शक्ति निहित थीं। वर्षों तक भारत, तिब्बत और बर्मा में अनुशासित होकर र ऒस तपस्या क र धनुष कीड ऒरकी भांति क साहुआ शरीर धारण कर ने वाले रघुपति योगी, युवा परमहंस नित्यानंद के मित्र व प्रारंभिक गुरु थे। भविष्य पर प्रत्यक्ष दृष्टि रख कर, उन्होंने परमहंस नित्यानंद के शरीर को कठोर्योगिक प्रशिक्षण के माध्यम से तैयार कि याजिसे कि उनका ैशरीर ज्ञान कीऊ र्जाक तोवहन कर रसके । रघुपति योगी धरती ग्रह पर फैले परमानंद की झलकियाँ पराशक्ति (सृष्टि ऊर्जा का मात्र स्वरुप) यह स्वरुप परमहंस नित्यानंद को स्वप्न में प्रतीत हुआ था और जिसे उन्होंने तुरंत, "योग मनुष्य और परमेश्वर का मिलन है। और आराधना सृष्टि को समर्पित कृ तजतता है।" ध्यान में लीन परमहंस नित्यानंद का आरंभिक चित्र जब वह मात्र दस वर्ष के थे। यद्यपि रघुपति योगी ने नित्यानंद के सम्मुख हवा में क रतबदिखाना और इसी प्रक रके अन्य साहसिक क यों का प्रदर्शन किया, साथ ही उन्होंने बालक परमहंस नित्यानंद को यह भी समझाया कि ये सब आध्यात्मिक विक ासे गुण नहीं हैं। परम सत्य क ओसमझना इन सब से परे है। यह रघुपति योगी ही थे जिन्होंने परमहंस नित्यानंद को मात्रम दस वर्ष क ाउम्र में ही पतंजलि योग सूत्र पर प्रथम भाषण देने क ाव्यवस्था की। प्रचारक सामग्रियों क अ वितरणक र, उन्होंने इस विशेष आयोजन में १००० से अधिक लोगों क ओएक जुट किया। आज रघुपति योगी से क ऋंतिकरी प्रशिक्षण प्राप्त कर, उन्हें विशुद्ध क ृतजता देते हुए, परमहंस नित्यानंद ने विश्व के लिए नित्य योग, ज्ञान प्राप्ति हेतु योग विद्या शास्त्र तथा कौशल को तैयार कर प्रस्तुत किया है। प्रशिक्षित तथा समर्पित नित्य योगाचार्य - गुरु इस अनूठे विद्याशास्त्र को विश्व के क रहें लोगों तक 7 मूर्ति पूजा "पूजा क भी मूर्ति 'की नहीं होती, यह तो मूर्ति के 'माध्यम से होती है।"
- परमहंस नित्यानंद परमहंस नित्यानंद घर पर एक छोटी सी वेदो पर सजीव सत्ता के प्रतीक देवी-देवताओं की बँड ही टूटीन होकर र पूजा किया करते थे। जहाँ कहीं भी वह पूजा के लिए लिए जाते इन पाँच देवी-देवताओं के समूह को अपने साथ ले जाते। आज परमहंस नित्यानंद सेक्रेड आर्ट्स प्रिज़र्वेशन, नित्यानंद के लक्ष्य क। एक विशेष अंग है जो मनुष्य जाति को इण्ड यन टे म्पल हेरिटेज को प्रस्तुत कर रहा। पाषाण, काष्ठ तथा संगमरमर के देवी-देवता, द्रविण शैली में निर्मित मन्दिर, धातु की शीट ओंपर हुआ कार य, देवताओं की काष्ठ से बनी सवारी, मन्दिर के आभूषण एवं वेभूषा, पूजा क चढावा इत्यादि परमहंस नित्यानंद के प्रवक्ता निदेशन में तैयार किये जाते हैँ। पूजा की वस्तुएं तथा देवी-देवताओं के अंशो के नमूने। परमहंस नित्यानंद मिट् टो से देवी-देवताओं को निर्मित कर रते, उन्हें सजाते -सँवारते और बड़ी ही श्रद्धा और उत्साह से उनकी पूर्जा-अर्चना कर ते। तिरु वन्नामलाई के नगर मन्दिर तथा आस-पास के गाँवों में परमहंस नित्यानंद तथा उनके मित्रों द्वारा उत्सवों के लिए निर्मित अनेक लाक तियाँ देखी जा सकती हैँ। इसे दिव्य लक्ष्य में सहयोग देने के लिए कु शल भारतीय शिल्पी अनंत कृ तजता के साथ अपना जीवन समर्पित गणेशजी के भोजन परमहंस नित्यानंद गणेशजी की उस मूर्ति को प्रतिदिन भोजन चढ़ याक रते थे। वह मूर्ति से चढ़ याहुआ भोजन ग्रहण क रनेके लिए विनय क रतेऔर क भी-क भी उंट भी दिया क रते थे। एक दिन उन्होंने एक बालक के पौराणिक क थ पढ़ । यह कि शोरमूर्ति को भोजन देता जो वास्तव में खा लिया क रतीथी। गणेश जी को परोसा हुआ भोजन ग्रहण कराने के दृढ़ इरादा कर, नित्यानंद ने यह निष्कर्ष निक लाकि वह अब क भीभी उन्हें नहीं ड टेंगे इसके बदले में उन्होंने तब तक भोजन ग्रहण क रताबंद क रदिया जब तक कि गणेशजी उनका परोसा हुआ भोजन ग्रहण नहीं क रलते। तीसरे दिन के समाप्त होने पर, चढ़ याहुआ भोजन गायब हो गया। इस पर वह अत्यधिक प्रसन्न हुए और गणेशजी के प्रति अत्यधिक कृ तजताप्रक ट की। इसके साथ ही उनकी अनुरक्ति एवं आस्था और भी बढ़ गयी। श्री चक्र पवित्र श्री चक्र थी जोकि ब्राह्मण्ड की एक शक्तिशाली एवं रहस्यमयी प्रदर्शक मानी जाती है। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने ऐसी जटि लआकृ तिक इतनी आसानी से क से बनाना लिया जबकि इसे देखक रएक कु शलक लाकक चक्कर रमें पड़ जाता है, तो परमहंस नित्यानंद ने कहा, "ये तो मात्र नौ त्रिक णहैं जोकि एक -दूसरे पर अलग क णसे रखे गये हैं। एक बार जब आप इस अवधारणा क समझ लेते हैं, तो इसे बनाना सुगम हो जाता है।" आज व रणाचलेश्वरमन्दिर में देवी पार्वती की आकृ तिक ल्यपनाहुई। इस स्वप्न क उन्होंने एक ताम्र प्लेट पर नाखून से स्मृति विश्वभर में परमहंस नित्यानंद द्वारा सृजित मन्दिरों में, विशाल पूजा-अर्चना इस श्रेष्ठ समझ के साथ की जाती है कि पूजा एक आश्चर्यजनक आध्यात्मिक तक नीक है जो सत्ता से जुड़ ती है। लांज एजेंस आष्राम में स्थित मन्दिर में विदयापूजा क रते पूजा आचार्य। वेदांत एवं तंत्र "बुद्धि के स्तर पर रूढ़ समझ, स्व को दूष कर रता है, जो शारीरिक एवं मानसिक दूष तासे अधिक है"
- परमहंस नित्यानंद माताजी कु प्याम्मल-एक प्रेरणास्रोत ब्रह्मयोगिनी विभुदानंद देवी माताजी कु प्याम्मलअरु णांचलमें नित्यानंद के आरम्भिक दिनों में उनकी देखभाल क रनेके साथ ही उन्हें आध्यात्मिक मार्ग निर्देशन भी दिया क रती थीं। बारह वर्श की बाल्यावस्था में जब परमहंस नित्यानंद को गहन आध्यात्मिक अनुभव हो रहे थे, उस समय माता क प्यामलने उन्हें उनकीबढ़ तिहीई चेतना के विषय में सविस्तार से समझाते हुए उनकी शारीरिक और मानसिक दोनों रु पसे देखभाल की।इसके साथ ही प्रत्यक्ष दूरदृष्टि रख उन्होंने उनको विभिन्न आध्यात्मिक अभ्यासों क प्रशिक्षण भी दिया। कु प्यामल एवं नित्यानंद इसाक्की स्वामीजी, आध्यात्मिक ताको बढ़ावा देते हुए एक ज्ञानी महापुरूष, इसाक्की स्वामीजी, युवा परमहंस नित्यानंद की प्रेरणा के मुख्य सोत थे। अनेक ज्ञानी महापुरूषों के सानिध्य प्राप्त क रने में भाग्यशाली परमहंस नित्यानंद क। प्रारिम्भक जीवन इन महापुरूषों के जीवन क देखक र बीत कि क सप्रक रये लोग हर समय परमानंद में लीन रहते हैं। इन महापुरूषों क परिपूर्णता से भराहुआ देखक रतथा उनकी साधगी से मोहित होक रउनक भी इस अगाध परिपूर्णता क प्राप्त क रनेक तीब्र इच्छा जागृत हुइ। इसाक्की स्वामीजल धरती ग्रह पर फैले परमानंद की झलकियाँ आत्म-पुराण (एक उपनिषद), इसाक्की स्वामीजल की एक भेंट।यह पुस्तक परमहंस नित्यानंद के अध्यात्म शिक्षा के प्रारम्भ के ओंचिन्हित कर तीहै। ओलई चुवाड़ी ओलई चुवाड़ी (भोज पत्र पर तैयार पांडू लिपि) में प्राचीन वैदिक भजन निहित हैं, जिसे परमहंस नित्यानंद ने इसाक्की स्वामीजी से भेंट स्वरूप प्राप्त किया। योगी रामसूरतकु माराएक रहस्यमय बंधन योगी रामसूरतकु मारया विश्री स्वामीजी एक ज्ञानी पुरूष थे जो तिरू वनमलईमें भगवान श्री रमण महर्षि के समक लीनथे। तिरू वनमलईमें वह एक सुप्रसिद्ध ज्ञानी पुरूष थे जिन्हें सभी जन प्यार कर रतेथे। परमहंस नित्यानंद नियमित रू पसे उनसे मिलने आया कर रते।
परमहंस नित्यानंद जिनका नाम है - 2
योगी रामसूरतकु मारथेरमुट् टक्के सन्निकट मन्दिर के रथ खड्ढ कि ये जाने वाले स्थान से, इमारत कीसीधिं योंसे कूड्ढ इक ट्ढ ठक रते और एक भिक्षुक की भॉति बीच में बैठ जाया कर रतेथे। लोगों क यह व्यवहार बन गया था कि वे रास्ते में जाते हुए वहाँ रु क जाते और अपने भविष्य के बारे में प्रश्न पूछने लगते। विद्यालय जाते बालक भी रु कर उनसे पूछा कर रतेकि क्या वे परीक्षा में पास हो जायेंगे। उन्हें क भी-क भीयोगी से कोईप्रतिक्रि यामिलती। एक दिन, परमहंस नित्यानंद विद्यालय जाते हुए वहाँ रु केऔर उनसे पूछा ंकि क्या वह आज अपनी परीक्षा में पास हो जायेंगे। उन्हें जवाब मिला, "पुत्र! तुम जीवन कीपरীক্ষा पास आज परमहंस नित्यानंद के आश्रम में युवा ब्रह्मचारी तथा गुरुकुल के बच्चे दिनचर्या के रूप में वैदिक ऋचाओं काझारण कर रते हैं। दिव्य गायन से सुर मिलाकर ये बच्चे आनन्दित चेतना के पालने में पल-बढ़ रहे हैं। क रलोगे| परमहंस नित्यानंद उस समय उन शब्दों क अर्थ नहीं समझ पाये| एक स्त्री जो बगल में बैठ थी, यह सुनकर बोली, "जाओ बालक ! अभी तुम्हें ये शब्द समझ नहीं आयेंगे, तिरु वन्नामलाई में योगी रामसूरतकुमार द्वारा एक उत्सव का आयोजन अन्नमलाई स्वामीजी एवं स्वयं को घायल कर रना "सत्य पर प्रयोग करने का साहस इसे अनुभव करने की कुंजी हैं|
- नित्यानंद अन्नामलाई स्वामीजी भगवान श्री रमण महर्षि के प्रत्यक्ष शिष्य थे| कबीरदास वर्ष कीउम्र से परमहंस नित्यानंद ने तिरु वन्नामलईमें रमण आश्रम में जाना प्रारम्भ कर दिया| व्याख्यान सत्र में वह अन्नामलाई स्वामीजल के शिष्यों के साथ नियमित रू पसे बैठ जाया कर रते थे| अन्नामलाई स्वामीजल के पास जाने के आक ष्णों में से एक यह भी था कि वह अपने सम्भाषण के बाद मिठ ई वितरित कि याक रते थे| एक बार, अन्नामलाई स्वामीजी ने माया की अवधारणा को समझाया। उन्होंने कहा, "हम शरीर नहीं हैं; यह शरीर वास्तविक नहीं है; जो वास्तविक है वो आत्मा है; कोई भी पीड़ इस आत्मा पर असर नहीं ड़ ल्सक थी; हम क ष्ठ और अन्नामलाई स्वामीजल धरती ग्रह पर फैले परमानंद की झलकियाँ पीड़ ओंसे परे हैं। इन शब्दों के अपने क ओंमें पीड़ तेही, परमहंस नित्यानंद उस दिन घर वापस लौट आये। उन्होंने रसोई से चाकू लिया और यह जानने के लिए कि क्या उन्हें पीड़ क अनुभव होता है अपनी दायेंी जांच को एक टटदिया। परिणााम स्वरू पाउनें बहुत पीड़ हूई और माँ से ड ओंटपड़ िसो अलग। ड िट रख िे उन्हें क ईंट िैकलगाने पड़े । वह वापस अन्नामलाई स्वामीजी के पास गये और इस विषय में सविस्तार जानना चाहा। अन्नामलाई स्वामीजल ने उनसे क हा, “पीड़ िखत्म हो जायेगी। मैं उन्हें अभ्यास क रनके लिए एक तक िनीक बताऊँ गा।सत्य पर प्रयोग क रनेक रतने का तुम्हारा आज आज परमहंस नित्यानंद क रोेढ़ ं लोगों के लिए प्रेरणा के सोत बने हुए हैं। इस महापुरू ष के मात्र दर्शन हेतु भक्तों की भारी भीड़ लगीरहती है। चेतना क ा विक ास “ध्यान वह मुख्य कुं जी है जो आपके अंतरमन के द्वार खोल देती है।” - परमहंस नित्यानंद अरू णाचलपरमहंस नित्यानंद क सब कु छथा। ऐसी क ईदरार या चट्ट ान नहीं थी जिसने उनकी अनु क म्पा के जोश को महसूस न कि ियाहो। वह नित्य ही अपनी परमप्रिय अरू णाचलकी आभा में ध्यानावस्था में लीन और धूप सेंक िते हुए देखा जा सक िते थे। उनके ट शरीर दुर्बल, क िन्तु आँखे सदैव इस तरह प्रज्ञवलित रहती थीं जैसे आंतरिक प्रक ाश िोनिहार रही हों। (रघुपति योगी और कु प्पाम्मलने प्रत्यक्ष दूरदृष्टि रखक रनित्यानंद क ी ध्यानावस्था के अनेक आज परमहंस नित्यानंद अनूठे ध्यान क ार्यक्रम म के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को ध्यानावस्था में पहुंचाते हैं। वह प्रत्येक साधक में पुष्टि होने की जगह को सुजित सत्ता की तूलिका I जब तक आपके हाथ खुले हुये हैं, आपको महसूस होगा कि इनसे होकर नदी बह रही है। जब आप इसे पकड़ ने का प्रयत्न कर रहे हैं, तभी आप चूक जाते हैं।
- परमहंस नित्यानंद एक दिन जब वह करीब १२ वर्ष के थे, अरु नाँचल चोटी में एक टॉलेरपर ध्यानावस्था में लीन थे। वास्तव में वह अन्नमलाई स्वामीजी द्वारा बतलायी गयी विद्या- विचारों के आने के सोत को देखना, पर प्रयोग कर रहे थे। जैसे ही वह बैठ गये, धीरे-धीरे उन्हें अनुभव हुआ कि वह लुप्त हो रहे हैं। उनके अपनी ही शब्दों में, "अचानक ! मैंने अपने भीतर शून्य को महसूस कि या। बंद आंखों से भी मुझे चारों ओर (३६० डि ग्री)क दिशलाई पड रहा था। मैंने इस जीवन शक्ति को के वल अपने शरीर में न बल्की बाहर की किसी वस्तुओं में महसूस कि या। मैंने महसूस कि यदि मैं चट् ट नोंऽपौधों में, पुष्पों में, और अपने चारों ओर की सभी सजीव व निजीव वस्तुआं में निहित हूं। यह मेरा प्रथम गहन अनुभव था। इस अनुभव ने मेरे भीतर हर वस्तु के लिए गहन दया और प्रेम भर दिया। इस अनुभव से मुझे जीवन के प्रति अपार श्रद्धा हो गयी। अपने भीतर हर वस्तु की चस्वीकू तिहोने की जो प्रथम झलक मुझे दिखलायी पडि थी उसने मुझे ज्ञान-प्राप्ति क। मार्ग दिखलाया। ऐसे मात्र एक ही अनुभव से क ई भी यह अनुभव क रेगा कि सभी धार्मिक उन्माद, जातीय या भाषायी क ट ट रक्मत: ही तंत्र से गायब हो गयी है।" आज परमहंस नित्यानंद की आध्यात्मिक अनुभव की वार्षिक बेला पर परमहंस नित्यानंद आश्रम के ब्रह्मचारी पवित्र टॅलेक टोसान क रहतेहुए। परमहंस नित्यानंद के प्रथम आध्यात्मिक अनुभव संध्याक ल के समय वैसाखी माह (अंग्रेजी क लेंड के अनुसार मई-जून धरती ग्रह पर फै ले परमानंद की झलकियाँ परमहंस नित्यानंद अरु नांचलपर्वत पर प्रतिदिन घूमने के लिए जाया क रतेथे। वह हर सुबह क रींव 4 बजे उठ जाया क रते और चोटी के चारों ओर तीन–चार घण्टे घूमते हुए भजन गाते हुए, वह पूर्णतया वर्तमान में विचरण क रते, तथा उन्हें इस बात की तनिक भी चिंता नहीं होती कि अगले पल क्या होगा। जिस तरह एक मासूम बालक अपनी माँ कीगोद में खेलता है उसी तरह वह भी अपने परमप्रिय अरु नांचलके परिवेश में खुशी से एक मासूम बालक कीभाँति विचरण क रते। एक दिन वह बहुत ही शीघ्र उठ गये, ठं डकडऋष्णि रात्रि के बाद। उन दिनों चोटी के मार्ग में जंगलों और कोइ सघ्घृड कया प्रक शक्ता रव्यवस्था नहीं थी। चारों ओर सिर्फ घना जंगल ही जंगल था। जैसे ही वह आगे बढ्ने एक नदी के पास, लकड्ड बघ्घोंएक झुंड उनके बहुत क रींवा आ गया। वह अपनी आँखें झुक यये भक्तिभाव गीत गाते हुए आगे बढ्ने रहे थे। वह गाने में पूर्णतया निमग्र थे और उन लकड्ड बघ्घोंपर उनका ् ध्यान तक नहीं गया जब तक कि वह उनके बिल्कु ल क रींव नह्हीं पहुंच गयेए। जब उन्होंने अपना सिर ऊ परउठ यातो देखा कि वो जानवर उनके बहुत समीप आ चुके थे। यह देखक रुनेह के अन्त्ःस्थल से लकड्ड बघ्घों द्वारा हमला करने पर प्रथम भय की अनुभूति ; एक बड्ड ईँही जोर कर्ई चीख निक ल ली।यह एक ड रावनी-चीख थी जिसे उन्होंने इस घट नासे न क भीपहले अनुभव कि या था और ने हो काभी बाद मी। इस चीख के साथ ही उन्होंने अपने आपकेऊ अरु नांचलके शरण में पाया जिससे उन्हें विश्वास हो गया कि अरु नांचलउनक्ई रक्षा क रे गा। अचानक ही कँ हसीेए एक वयो वृद्ध संयासी हाथ में ळ्ळड प्ळ्ळलिए हुए उनके सामने प्रकट हुए जिन्होंने उन लकड्ड बघ्घोंको खदेड़ दिया। जैसे ही जानवर भाग गये वैसे ही वृद्ध संयासी भी अन्तर्ध्यान हो गये। परमहंस नित्यानंद यह नही्ं समझ पाये कि वह संयासी क कहाँ से आये थे और वापिस क नांचले गयेए। इस प्राथमिक चीख के साथ, परमहंस नित्यानंद ने महसूस कियाकि अचानक उनके शरीर क फ हिलक ळ्हो गया है, उन्होंने तेजी से चलना शुरू क रदिया, वह लगभग हवा में तैर रहे थे। मानो उनकी तीव्रता बढ्ने गर्ई हो। (प्राथमिक चिकित्साएक मनोवैज्ञानिक निदान है जिसमें रोगी भय से बचने के लिए अपने अन्तर्ःस्थल से बड्ड ई जोर से चीख प्ळ्ळ ताहेे; जबकिक ळेई दूसरा नक रातक्मभावनाओं क ळेईदवा ळेता है।) विद्यालय जाना मात्र एक संयोग "एक ग्रह होकर र कि या गया कोई भी क र्य स्वयं ध्यान की अवस्था है और तब ऐसा जीवन स्वयं ध्यान की अवस्था बन जाता है।"
- परमहंस नित्यानंद विद्यालय जाना परमहंस नित्यानंद के जीवन में महज एक संयोग ही था। विद्यालय में उन्हें रसायन और भौतिक विषयों के एक नीरस क र्य के रू प में शोध क र्य लिखने पड़े ।इसके विपरीत मंत्रों के उद्धरण एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठ नोंक वे बड़े ही चाव से क र रते थे। यहां दिखाये गये दस्तावेज उनके उत्साह क े प्रमाणित क रते हैं- मंत्रों क ी ड यरी से लिया गया पृष्ठ ,उनके द्वारा लिखी गई विधिपूर्वक पूजा-अर्चना क े रने (देवी-देवताओं क ीपूजा क ेरणेक ेवर्णन) क े एक सम्पूर्ण सचित्र निर्देशिका। आज उनके शिष्य एवं सामान्य जन नित्यनंद पुस्तक क े रनेके व्यवहार जानने के लिए इस पुस्तक से लाभ लेते हैं। धार्मिक क्रि याक ेलापके प्रति उनके गगहन लगाव था। वाल्यावस्था में स्वतः ही यह सब सीखना बेहद ही आश्चर्यजनक है। आध्यात्मिक प्रवृत्तियों के प्रति उनके झुक वक ेदेख क ेरुनके मित्र प्रायः उन्हें परेशान क े रते थे। उनके मित्रों में से एक ने उनसे पूछा कि इतने लम्वे-लम्वे घण्ट ेंतक ध्यानावस्था में बैठे रहने से उन्हें क्या मिलेगा। उन्होंने उत्तर दिया, 'समय आने पर तुम सब जान जाओगे।' नोट बुक स और ड यरियां जिनमें मंत्र लिखे हुए हैं, के दस्तावेज। आज जब मैं छोटा था, तब मैं ऐसा स्थान तलाशना चाहता था जहां एक ही छत के नीचे परमानन्दपूर्ण जीवन जीने के रहस्य सीख सकूँ ।मैंने नौ वर्ष तक तलाश की। न तु मुझे ऐसा क ेभी भी ऐसा स्थान नहीं मिला। ज्ञान प्राप्ति के बाद, मैं युवाओं क ेऐसा ही स्थान अर्पित क े रना चाहता था। द ुसरे क ेलैंड ल ेटेक्नोलॉजी प्रोग्राम एेसा ही तीत ेच्छ के परिणाम हैं। यहां, युवा अनंत दिशाओं में अन्वेषण क े रना सीखते हैं। वे सीखते हैं कि बिना क ेक र्य किये हुए कैस े क े र्य क े रें, गहन चेतना से परमानन्दपूर्ण जीवन क ेसृजित क ेरें। परमहंस नित्यानंद नोट बूस और ड एयरियां जिनमें मंत्र लिखे हुए हैं, के दस्तावेज। हाल ही में तमिलनाडु क भ्रमण क रनके दौरान, उन्होंने तिरु वन्नमलाई में अपने गृह नगर में उपदेश देने और ध्यान शिविर क आयोजन कि या। कायक्रम के अन्त में परमहंस नित्यानंद ने ठ साठ सारे विशाल क क्षके मंच पर अपने शिष्यों के बुलाया तथा कु छलड़ क मेँ ओर संकेत कि या जो उनके आशीर्वाद पाने के लिए तारमें खड़े थे। यही वही लड़ के थे जिन्होंने पहले उनसे पश्न पूछे थे। स्वामी जी के पैरों में अपने सिर झुक तेहुए वे अनियत्रित रू पसे क ओंपरहे थे तथा एक अनूठ भावना उनके चेहरे पर देखी जा सक ती थी। जब परमहंस नित्यानंद स्वामी ने इन बालक ओं के एक मधुर मुस्क नव दयाभाव से अपनी भुजाओं में उठ यातो शिष्यों की भावनाएँ उमड़ पड़ न। एक श्रेष्ठ ता की ड ग्री परमहंस नित्यानंद ने तमिनाडु के गुडि याथामस्थित पोलिटेक्निक विद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डि प्लोमा लिय। क क्षाओं में अपने पाठ यक मेँ ध्यान देने के साथ ही उनके जीवन की उमंगों ने रंग भरना शुरू कर दिय। कु छ वर्ष बाद ही विद्यालय में पढ़ नेवाले एक शिक्षक ही उनके जीवन के लक्ष्य में प्रथम आरोग्यदाता बने। पवित्र शहर तिरु वन्नमलई के स्मशानस्थल ही नित्यानंद के लिए ध्यान क रनके लिए शांत स्थल हुआ क रते थे। वह प्रभात क अलमें ही घर वापस लौट त वह घर के ताला लगाये बिना ही चले जाते थे। असमय घर पर लौट ने के लिए उनके माता-पिता ने क भीमभी उनसे एक भी शब्द नहीं क हा। गुरु कु ल जीवन को चिरानंद प्रदान कर ने वाली तीक ज्ञान की खोज में आश्रम वह ऊर्जा क्षेत्र है जहां हर पथ अध्यात्मिक यात्रा है।
- परमहंस नित्यानंद घर त्यागने की इच्छा तेज हो गई। एक शाम को यह इच्छा इतनी तीव्र हो गई कि परमहंस नित्यानंद को यह महसूस हुआ कि इसे तुरंत पूरा किया जाए। उन्हें महसूस हुआ कि वो जो जीवन जी रहे हैं उसके उन्हें त्याग कर देना चाहिए और बिना देर कि ये उस जीवन में प्रवेश कर रना चाहिए जिसकी उन्हें तलाश है। जो जीवन वह जी रहे हैं उसे वह अब और नहीं जीना चाहते। परमहंस नित्यानंद अपना यह निर्णय पहले अपनी माँ को बताना चाहते थे। वह उन्हें अत्यधिक प्रेम कर रते थे और यह सुनिश्चित कर रना चाहते थे कि उनकी माँ को जितना हो सके कम कष्ट हो। उस रात को एक री वदस बजे वह अपनी माँ के पास गये और उनसे पूछा, "यदि मैं मर जाऊँ तो आप क्या करोगी?" उनकी माँ ने कहा, "तुम इतनी अशुभ बात मुझसे क्यों पूछ रहे हो? क्या परेशानी है?" परमहंस नित्यानंद ने कहा, "कुछ नहीं, कोई विशेष बात नहीं। मैं तो बस यूं ही जानना चाहता हूँ।" उनकी माँ ने भाग्यवाधीन होकर कहा, "मैं क्या कर सकती हूँ? यदि ऐसा होता है तो मुझे यह स्वीकार कर रना ही होगा।" तब परमहंस नित्यानंद ने अपनी माँ से घर त्यागने की इच्छा जताई। यह सुनकर रउनकी माँ के आंसू निक लपड़े दुःख से उनके शरीर काँपने लगा। "मैं जानती थी कि एक दिन तुम मुझे छ ह े क सले जाओगे।", उनकी माँ ने कहा। उन्होंने अपनी माँ से आगे कहा कि वह नहीं चाहती कि मैं घर छो हदूँ । इस पर उनकी माँ ने कहा, "नहीं, मैं जानती हूँ कि तुम जाना चाहते हो और मैं चाहती हूँ कि तुम वहीं क रोजो तुम भारत और नेपाल के पार "सभी महान तीर्थस्थलों में अस्तित्वीय ऊँ जिसके स्वर गुंजायमान हो रहे हैं जिनमें होना ही ध्यानावस्था की स्थिति है।"
- परमहंस नित्यानंद जीवन में क रनाचाहते हो। मैं तुम्हें ऐसा क रने से नहीं रोक सक ती, लेकि न मैं तुम्हें जाते हुए नहीं देख सक ती। इसीलिए मैं रो रही हूं।" परमहंस नित्यानंद अपनी माँ के शर्तविहीन प्रेम क देदेखक र आश्चर्यचककि तहो गये। वह गहन सदमें में थीं फि रभी वह चाहती थीं कि उनके पुत्र वही रेजो वह चाहता है। उन्होंने उनके के मार्ग में आने की कोशिश नहीं की। माँ के निष्कपट और स्वार्थरहित प्रेम ने उन्हें भीतर तक झक झोरदिया। वह निश्चय ही एक निःस्वार्थी थी। परमहंस नित्यानंद की ज्ञान-प्राप्ति की तीव्र लालसा उन्हें भारत और नेपाल के पार ले गई। हिमालय में तपोवन से दक्षिण में क न्याकु मारी तक , और पश्चिम में द्वारक से पूर्व में क लक त्तक तक । परिवारजनों , (ज्ञान की खोज में भ्रमण) अपने अस्तित्व की पूर्णता एक रु क रनेवक यह अनुभव ९ वर्ष में चरम सीमा पर पहुंचा। इस दौरान उन्होंने क रीब ८०,००० मील की पैदल यात्रा की। महावतार बाबा जी आज परमहंस नित्यानंद हिमालय की शृंखलाओं में और अन्य उच्च ऊर्जा के न्त्रों में समय - समय पर जाक र अपने शिष्यों के मार्ग - दर्शन क रते रहते हैं। आध्यात्मिक भ्रमण के पथ से वह प्रत्येक के मन में परिपूर्ण होने की गहन इच्छा को सुजित क रते हैं। हिमालय की यात्रा, २००७ बाबाजी
परमहंस नित्यानंद जिनका नाम है - 3
जी हिमालय के एक जीवित महापुरूष हेमालय पर परमहंस नित्यानंद के उस जब वह ज्ञान की खोज में भ्रमण कर रहे थे। यह बाबा जी ही थे जिन्होंने उस भेंट के दौरान नित्यानंद को 'परमहंस नित्यानंद' का हाथ। आज वह इसी नाम से जाने जाते हैं। ज्ञान की खोज में भ्रमण के दौरान वह इस रुद्राक्ष लंगर और पानी की एक मटकी को अपने साथ रखते थे। पानी पीने से पहले वह पानी की जाँच करने के लिए इस रु द्राक्षलंगर के मटके में लटका देते। यदि इस लंगर को यह पानी उपर्युक्त प्रतीत होता तभी वह पानी को पीते थे। पवित्र राख रखने का यह के सरियाथेला ज्ञान की खोज में भ्रमण के दौरान सदैव उनके साथ रहता था। रु द्राक्षक इस माला को वह भ्रमण के दौरान सदैव पहने रहते थे। स्पर्श चिकित्सा का प्रथम चमत्कार आज परमहंस नित्यानंद द्वारा प्रारम्भ की गई अरोग्य (हीलर) करने वाली यह पद्धति के स्तर पर विश्व को निशुल्क परमहंस नित्यानंद स्पिरिचुअल हीलिंग सेवा प्रदान कर रही है। धरती ग्रह पर फैले परमानन्द की झलकियाँ हिमालय श्रृंखलाओं में १७,००० फुट ऊँचाई पर तपोवन से लौटते हुए, परमहंस निल्यानन्द ने सेना के एक टुकड़े लिफ्ट ली। जैसे ही वह टू कखाई के ऊँ परसे गुजरा, उन्हें धक्का लगा और वह एक धातु के टुकड़े पर जा गिरे जिससे उनकी मेड़ दण्ड़ गंभीर रूप से घायल हो गयी। सेना के डाक्टर ने उन्हें १५ दिन के विश्राम की सलाह दी न्तु नित्यानंद ने उनकी एक न सुनी। बल्कि उन्होंने चोटी लस्यान पर अपनी हथेली रख दी और चलते रहे। जब हरिद्वार में उनका एक्स-रे किया गया तो सिवाय उनके सभी हैरान थे। उनकी चोटी पूर्णतया ठीक हो चुकी थी। इस छोटे से घट नासे परमहंस नित्यानंद को एहसास हो गया कि उनका यह छौ क शरीरोग्य कर नेवाली पद्धति एक दिन विश्व के करोड़ों गों को लाभ पहुंचायेगी। मणिकर्णिक घाट, बनारस - मृत्यु पर विजय पवित्र गंगा नदी के किनारे पर स्थित यह स्मशानघाट बनारस का अत्यंत पवित्र स्थल समझा जाता है। यह माना जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर ब्रह्माण्ड की सृष्टि की थी। यहाँ, परमहंस नित्यानंद को स्वयं मृत्यु का चेतन अनुभव हो चुका है जब वह आज परमहंस नित्यानंद कहते हैं, ‘आध्यात्मिक विकास के लिए आध्यात्मिक भ्रमण एक महान तकनीक व प्रक्रिया है।’ ब्रह्मचर्य प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान परमहंस नित्यानंद ने प्रतिभागियों को वैरागियों के रूप में भिक्षा मांगने के लिए भेजा। उन्होंने कहा, ‘वैरागी बनकर भिक्षावृत्ति करने की यह विद्या भावनात्मक चंचलता से मुक्ति दिलाती है। जब तुम भिक्षा मांगने जाओ हो, तो जो कुछ तुम्हें मिले उससे खुश मत होना, और जो कुछ तुम खो दो हो उसके लिए दुखी मत होना।’ ज्ञान प्राप्त हो जाने के शुरू आती दिनों में... गहन ध्यानावस्था में थे। इस गहन अनुभव के बाद वह यह जान गये कि इस धरती पर मनुष्य-जाति के सर्वाधिक भयभीत कर देनेवाली वस्तु 'मृत्यु' को उन्होंने जीत लिया है। ज्ञान की तलाश में भट कते हुए अंततः २२ वर्ष की उम्र में उन्हें नित्य आनंद की स्थिति प्राप्त हुई। ज्ञान-प्राप्ति के बाद यह उनका प्रथम चित्र है। जब उनकी आँखों के ज्वाला समाप्त हो चुकी थी सिर्फ एक सपना जो साकार हुआ सर्वोच्च निश्चलता विद्यमान थी। राजशेखरन परमहंस बन चुके थे। असीम सत्ता के अदृश्य हाथों से मार्ग-दर्शन लेते हुए, परमहंस नित्यानंद ओमक रेश्वर (मध्यप्रदेश) से तमिलनाडु (दक्षिण भारत) में अल्पक अल के लिए कावेरी नदी के किनारे ठहरे। भक्तजनों द्वारा लाया गया भोजन ग्रहण कर तथा खुले आकाश में या फिर कुटि यमें रहकर उन्होंने एक तंत्र में तथा जनसमूह के साथ पूजा, हवन इत्यादि के मंडल कि ये। उन्होंने लोगों को ध्यान सिखाया तथा जीवन की समस्याओं का समाधान निकलने में सहायता की। शीघ्र ही स्वामी जी की चमत्कारी अरोग्यक रशक्ति की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। "मैंने परमानंद पाने की तक तीक खोजी है धरती ग्रह पर फैले परमानंद की झलकियाँ परमहंस श्री नित्यानंद जी का परिचय आनंद ही जीवन क लक्ष्य है और आनंद ही उस लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग है। इस वाक्य के साथ ही मनुष्य के जीवन के लक्ष्य को जानने की आंतहीन खोज समाप्त हो जाती है। यह है अनुभव और शिक्षा श्री नित्यानंद जी जो हमारे बीच इस युग के आत्मज्ञानी सद्गुरु है। उनके उद्देश्य सबसे पहले यह बतला देना है कि शब्दों में नहीं बल्कि अनुभव के द्वारा कि आनंद ऐसा कोई लक्ष्य नहीं है जो अंत में मिलेगा बल्कि यह अपने आप में मार्ग भी है। अर्थात पूरे दिन २४ घंटे आनंद में रहना। यह बहुत ही सरल रूप में समझा देते हैं, कि ऐसा होना सबके लिए संभव है, यदि हम अपने चित्त में (अन्तःकरण) में इसके लिए प्रयत्न करें। श्री नित्यानंद जी का जन्म दक्षिण भारत के आध्यात्मिक स्थल तिरुवनामलाई में हुआ था। योग, तंत्र एवं अन्य पारभौतिक विज्ञानों के अध्ययन एवं गहन ध्यान के पश्चात इन्होंने नित्य आनंद की अवस्था को प्राप्त किया। और अपने स्वयं के अनुभव से इन्होंने आनंद प्राप्ति के लिए नीके सूत्रों का निर्माण किया, जिनसे व्यक्ति को चेतना में विस्फोट होकर एक आध्यात्मिक रूप से सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इन्होंने अनेक प्रकार के कार्य क्रमों की रचना की है, जिनके द्वारा हम अपने सहज स्वरुप स्थिति को प्राप्त कर र लेते हैं। और यही ध्यान है। श्री नित्यानंद जी का कहना है ध्यान एक ऐसी मास्त रखुं जी है, जो भौतिक जगत में सफ लतादेने के साथ-साथ आपके चित्त में शांति और पूर्ण तृप्ति प्रदान कर रती है। नित्यानंद मिशन पवित्र बरगद कॆ पे़ड़ , द्वि ह्री आश्रम, भारत नित्यानंद मिशन, श्री नित्यानंद जी का आंतरिक आनंद प्राप्ति का विश्वव्यापी आन्दोलन है। इन्टर्नेशनल वैदिक हिन्दू यूनिवर्सिटी (खतक़म) फ्लोरिडा, अमेरिका। इस मिशन के अंतर्गत आता है। इस पृथ्वी पर श्री परमहंस नित्यानंद की शुभ घुट ना व्यक्तिगत चेतना के नये युग की सूत्रपात है, जो विश्व चेतना को उच्चस्तरीय चैतन्य अवस्था में लाने का कार्य कर रही है। इस स्थिति को प्राप्त करने की मूलभूत आवश्यक तायह है, कि एक मिलियन लोग अद्भुत ध्यान की विधि - नित्यध्यान का अभ्यास करने लगे और कम से कम एक लाख लोग जीवन मुक्त की अवस्था को प्राप्त कर जीवन जीये। हैदराबाद आश्रम, भारत इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मिशन का तमक़ रहहा है। दुनिया भर में फैले नित्यानंद मिशन के केन्द्र और आश्रम व अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोगशालाये हैं। जहां आंतरिक चेतना उन्नतशील होती है। और व्यक्ति की भौतिक उन्नति परिणााम स्वरुप पसव्भावतः होती है। कॆ ओलोम्बस आश्रम, ओहियो, संयुक्त राष्ट्र अमरीकॊ। ये शिक्षा संस्थान ऐसा वातावरण और स्थान उपलब्ध कराते है, जिसमें विभिन्न क्रि याओं, ध्यान से विज्ञान तक में अनुसंधान और चेतना का विस्तार होता धरती ग्रह पर फैले परमानंद की झलकियाँ है। ये उस क्वान्टम अध्यात्मिक ता क पालन पोषण करते हैं जहाँ आध्यात्मिक ता और भौतिक ता मिलकर एक हो जाते हैं, और उससे आनन्दमय जीवन जीने की प्रक्रिया यावन्ती है। ये जीवन की समस्याओं क निश्चित समाधान प्रस्तुत करते हैं, जिनके द्वारा त्वरित एवं प्रभावशाली रूप से जीवन परिवर्तित हुए हैं और हो रहे हैं। ख.त.कण द्वारा अनेक प्रकार के ध्यान के विभिन्न विश्वव्यापी स्तर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। और भी कार्य जैसे - नित्य आध्यात्मिक चिकित्सा द्वारा निःशुल्क, ऊर्जा चिकित्सा निःशुल्क, युवा शिक्षा, कला एवं संस्कृति की बहुत सी सेवाएँ विश्वभर में दी जा रही हैं। इस मिशन के आध्यात्मिक क्रियाकलाप नित्यानंद ध्यानपीठ मु के तत्वाधान में होते हैं। लाइफ ब्लिस फाउन्डेशन(इंडिया) इस मिशन का एक दूसरा अंग है। जो टि'चिंग, शिक्षा के कार्य को संभालता है। नित्यधीर सेवा सेना (छऊड़) एक स्वयं से वक बल अनगिनित आनंद से वकों से बना हुआ है, जो अत्यंत उत्साह के साथ विश्वव्यापी स्तर पर इस मिशन की सहायता एवं समर्थन कर रहे हैं। सलेम आश्रम, भारत सियाटल आश्रम, संयुक्त राष्ट्र अमरीक। उत्साहित करना, व्यवसायिक संस्थानों के कार्यक्रम, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, निःशुल्क भोजन, एक वर्ष का आवासीय शिक्षण कार्यक्रम भारत में जिसे लाइफ ब्लिस टेक्नालजी कहते हैं। आवासीय गुरुकुल पद्धति से बच्चों की शिक्षा और इस तरह लॉज एंजेल्स आश्रम, संयुक्त राष्ट्र अमरिक। (लाइफ ब्लीस फ ाउन्डेशन शान्तिL.B.F.) की प्रस्तुतियाँ- लाइफ ब्लीस फ ाउन्डेशन शान्त्यानंद मिशन का शिक्षण अंग है । यह विभाग विशेष प्रक रके ध्यान के ार्यक्र म विश्व भर में प्रस्तुत क रताहै । इन के ार्यक्र मों के रौड़ि लोगों के शारीरिक , मानसिक और आध्यात्मिक स्तरों पर लाभ मिल रहा है । उन में से कूछ निम्न लिखित हैं । लाइफ ब्लीस प्रोग्राम पहला स्तर - आनन्द स्कू रणप्रोग्राम (LBP I)(ASP)
- उर्जावान बनिये यह चक्रों से सम्बन्धित क ार्यक्र म है। इसमें आपके शरीर के सातों मुख्य चक्र सहज और उर्जावान हो जाते हैं । यह क ार्यक्र म आपके विभिन्न वृत्तियों जैसे लोभ, भय, चिन्ता, ध्यान आक र्षितक रनेक इच्छा ,ईष्र्या, अहंकर ,अकुंठ त्ज्ञातिल्यादि के बारे में बुद्धि और अनुभव के स्तरों पर स्पष्ट समझ प्रदान क र रताहै । भौतिक स्तर पर आध्यात्मिक प्रभाव उत्पन्न क रने के लिए इसके र्ूपरेखाबनायी गयी है । यह निश्चित समाधान है। आपके आनन्द स्वभाव को अनुभव क रनेके लिए यह बहुत ही प्रभावी क ार्य क्र म है, विश्वभर में हजारों लोगों ने इसका ाप्रामण दिया है । लाइफ ब्लीस प्रोग्राम दूसरा स्तर - नित्यानन्द स्कू रणप्रोग्राम (LBP II)(NSP)
- मृत्यु क रहस्य यह एक ऐसा क ार्यक्र म है जो मृत्यु के रहस्य को खोलकर र्जीने के लासे भरपूर क र रताहै । यदि आपके मृत्यु क उद्देश्य और उसके होने क प्रक्रिया याक ज्ज्ञान हो जाय तो आप पूरे ज्जीवन क एक अलग तरह से ज्जीने लगते हैं। यह एक ऐसे अन्तःक रण क निर्माण क रतारहता है जिसमें मृत्यु से उत्पन्न भावों जैसे अपराध बोध सुख क लालसा और दुख दर्द इत्यादि से मुक्ति मिल जाती है। यह एक ऐसे ज्जीवन क शरूआत क रदेताहै जो सहज उत्साह एवं स्वाभाविक प्रज्ञा से संचालित हो । लाइफ ब्लीस प्रोग्राम तीसरा स्तर - आत्म स्कू रणप्रोग्राम (LBP III)(ATSP)
- आत्मा से जुड़िये- यह एक अद्भुत क ार्यक्र म है जो मन के क्रि याओं क लापों क विश्लेषण के रके अनुभव के स्तर पर मन के ऊप र प्रभुत्व सिखा देता है बजाय इसके कि मन आप क तमालिक बन बैठे। यह साफ बुद्धि के स्तर क समझ और विशिष्ट ध्यानों क अद्भुत संगम है, जो तत्क अल अनुभवोती प्रदान क रताहै । लाइफ ब्लीस टे क नालजोL.B.T) लाइफ ब्लीस टे क्नालजो(डि.इ.ठ.), १८ से ३० साल के ईउम्र वाले युवक ,युवतियो (युवाओं) के लिए जीवन की व्यवहारिक कला सिखाने के एक साल का आवासीय कॆर्यक्रम है। यह प्राच्य कॆवैदिक पद्धति पर आधारित है। इस कॆर्यक्रम जैन युवाओं को शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य प्रदान कॆरने के साथ स्वयं में उर्जावान बनाना है। सहजता और प्रज्ञा कॆपोषण कॆरते हुए और व्यवसायिक शिक्षा के साथ यह कॆर्यक्रम म्रार्थिक एवं आध्यात्मिक रूप से स्वयंपूर्ण युवाओं की रचना कॆरता है, और सबसे ऊँ परजीवन में सबसे बड़ॆ अवसर देता है आत्मज्ञानी गुरु के साथ रहने और उनसे ज्ञान प्राप्त कॆरने कॆलिए। नित्य आध्यात्मिक चिकित्सा-
- ब्रह्मांड की ऊर्जा द्वारा चिकित्सा- ब्रह्मांड की ऊर्जा के द्वारा उपचार कॆरने की यह एक शक्तिशाली एवं अदभूत पद्धति है। यह चिकित्सा कॆलिए ध्यान है, जब कि रोगी के लिए निरोग होने कॆसाधन। नित्यानंद जी लगातार पूरे विश्व में हजारों नित्य आध्यात्मिक चिकित्सा कॆइस वैज्ञानिक और समय के साथ प्रभावित चिकित्सा नीोक में शिक्षित कॆरते जा रहे हैं। इस चिकित्सा पद्धति ने माइग्रेन से लॆकॆर सरतक कॆरोगियों कॆस्वास्थ्य कि याहै। नित्यध्यान
- जीवन आनंद का स्रोत - ऑनलाइन रजिस्टर रकॆरकॆदीक्षा लॆकर रउन कॆरोगी लोगों में शामिल हो जाइये, जो इस पृथ्वी पर असम्बन्ध अनकॆत्व-अवस्था में आनंद कॆस्रोत के साथ जीवन जी रहे हैं। नित्यध्यान दॆनॆदिन ध्यान की प्रक्रिया याहै। जो पूर्ण मानवता कॆलिए नित्यानंद जी ने बनाया है। यह एक ऐसा सूत्र या तक नीकहै जो अपने आप में पूर्ण है। यह आपके पूरे अस्तित्व पर कॆर्यक रकॆइसकॆरूप पान्तरितक रताहै और तैयार कॆरता है इसकॆआत्मज्ञान कॆपरम अनुभव कॆलिए। इस तक नीकहै हर हिस्से अपने से आगे वाले हिस्सों कॆपरिपूर्ण कॆरते हैं। व्यक्तिगत चेतना कॆऊपर उठने कॆलिए यह मन से असम्बद्ध होकॆरजीवन कॆआनंदमय रूप से जीना सिखाता है। यह नित्य आनंद प्राप्त कॆरनेकॆध्यान विधि है वेबसाइट पर जाकॆर ऑनलाइन रजिस्टर रकॆजिये। आपके मेल (E-mail) द्वारा एक माला, ब्रेसलेट, नित्यानंद जी द्वारा दिया गया आध्यात्मिक नाम, आपकी आध्यात्मिक उन्नति कॆलिए (बैक लिंक) नित्य ध्यान की CD और पुस्तक Contact us: USA: Los Angeles Los Angeles Vedic Temple 9720 Central Avenue, Montclair, CA 91763 USA Ph.: 1-909-625-1400 Email: [email protected] URL: www.lifebliss.org Nithyananda Mission Ashram 928 Huntington Dr, Duarte, Los Angeles CA 91010 Ph.: 1-626-205-3286 NDIA Bangalore, Karnataka (Spiritual headquarters. Vedic Temple located here) Nithyananda Dhyanapeetam Nithyanandapuri Kallugopahalli Mysore Road, Bidadi Bangalore - 562 109 Karnataka Ph.: +91+80 65591844 / 27202084 Email: [email protected] 米米米米△∇米米米□□米◇□∇米米□米米**□米 ◎◎◎ Life Bliss Foundation offers many volumes of books and CDs across 23 languages. They are tools of blissful living for any type of person. A few of the books are listed here: Guaranteed Solutions fir sex, fear, worry etc. Nithyananda Vol. 1 of Paramahamsa Nithyananda's Biography Meditation is for you Bliss is the path and the goal They only way out is IN Rising in love with the Master Bhagavad Gita series 'Why' series A to Z 'click' books Uncommon answers to common questions Open the door ... Let the breeze in! 米□◇□米米**△米◎□□米◎△◎∇米□*∇米○△ visit www.lifeblissgalleria.com or contact us www.dhyanapeetam.org www.lifebliss.org www.nithyananda.org ••• A vision that has come to be A mission that is the master key To take one from mind to no-mind To bring bliss to all of mankind ••• क कहा जाता है कि ज्ञान प्राप्त महापुरुष की जीवन-गाथा एक सामान्य पुरुष को भी ज्ञान प्राप्ति की ओर प्रेरित कर सकती है। यह पुस्तक इस सहस्त्राब्दि के महान गुरु परमहंस नित्यानंद की जीवन-गाथा के विस्मय‑प्रेरक अंशों को उद्घाटित करती है। ज्ञान‑प्राप्ति की उनकी साहसयात्रा को रोचक तथ्यों एवं घटनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
- प्रकाशक जीवन मात्र ज्ञान के लिए नहीं, अपितु रु पान्तरण के लिए है। - परमहंस नित्यानंद Ebook ISBN: 979-8-88572-487-6 परमहंस नित्यानंद वैदिक विज्ञान विश्वविद्यालय और लाइफ ब्लिस फाउंडेशन प्रेस द्वारा प्रकाशित