1. Meditation Is for You
ध्यानशील रहन सहन की ओर
क्या ध्यान में तपस आवश्यक है? जागरूकता ही कुंजी है 'जीवन में ध्यान' से 'ध्यान में जीवन' की ओर बैठने की तकनीक और कभी भी - कहीं भी तकनीक बदलाव जिसे आप देखेंगे परेशानियां जिसका आप सामना करेंगे ध्यान का आनंद कैसे लिया जाता है
तकनीकों के विषय में तकनीके आनंद नतन अहम् ब्रह्मास्मि अंतर ध्यान आत्मा स्फुरन चित्ताकाश ध्यान हृदय कमल ज्योति स्तम्भ उस क्रिया को रोको! उस मनोवेग को रोको! काम हरण कृष्णा वेणू प्राण स्तम्भन प्राण श्राद्धि प्रतिबिम्ब ध्यान शक्ति धारण शक्ति स्तम्भ सूक्ष्म शरीर ध्यान सूर्य ध्यान
| कभी भी - कहीं भी ध्यान |
|---|
| अचल ध्यान |
| आनंद ध्यान |
| अनिमा ध्यान |
| हास्य ध्यान |
| मौन बिन्दु |
| प्रत्याहार ध्यान |
| स्फूर्ति बाण |
| पाँच मिनट में शक्ति देने वाल्ता |
| चरम उच्छावारप |
हथेली के द्वारा हाथ पैर ढीला करना
सात दिवसीय चक्र की प्रक्रिया
आनंद स्फुरण ध्यान
परिशिष्ट : एक योगी का मस्तिष्क
अमेरिकी तंत्र विज्ञानियों ने स्वामी जी के तंत्रिका विज्ञान तंत्र पर शोध किया शोध के परिणाम ।
प्रारम्भ करने के लिए कुछ प्रश्न
ध्यान की आवश्यकता क्यों? प्रारम्भ करने के लिए यह प्रश्न बिल्कुल सही है! ध्यान क्यों 7 क्या सच में हमारे जीवन में ध्यान की आवश्यकता है? मैं पूछता हूं, आप यही किताब क्यों पढ़ रहे हैं? इस क्षण आप जो भी किताबें पढ़ सकते थे, उसमें से आपने यही किताब पढ़ने के लिए चुनी । आपकी प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि आपके भीतर ध्यान की आवश्यकता है और केवल आप में ही नहीं हम सब में है। आपके जीवन का अन्तिम लक्ष्य क्या है? अधिक कमाना ? हमेशा जवान, स्वस्थ, सुन्दर बने रहना? बेहतर और स्थायी रिश्ते को अपनाना? अपने व्यक्तित्व में अधिक से अधिक निखार लाना? यह एक ऐसी सूची है जो कभी खत्म नहीं होगी। हर इंसान का लक्ष्य अलग होता है। परन्तु बिना अपवाद के हर लक्ष्य का एक ही अतिम लक्ष्य होता है- आनंद की अवस्था अथवा परम सूख को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा ।
हम सभी लोग जीवन में जाने अनजाने आनंद की खोज करते हैं। क्या कोई भी व्यक्ति यह कह सकता है कि मेरी आनंद में कोई रूचि नहीं है? मुझे परम सुख प्राप्त हो या न हो मुझे इसकी कोई परवाह नहीं।
हम सभी आनंद की खोज करते हैं। अलग-अलग व्यक्ति आनंद को विभिन्न नामों से व्यक्त करता है । कोई इसे बौद्धिकता का नाम देता तो कोई व्यवहार कुशलता का । नाम चाहे जितने भी हों सच तो यही है कि हम सभी लोग आनंद को खोजते फिरते हैं, केवल तरीके अलग-अलग हैं।
कोई रूपये में खोजता है, तो कोई शक्ति अथवा रिश्तों में या दैनिक जीवन की हास्यास्पद एवं दर्दनाक घटनाओं में। आनंद ही हमारे जीवन का एकमात्र प्रेरणा स्रोत है।
यदि हम जीवन भर आनंद की खोज कर रहे हैं तो वह हमें अभी तक मिल्म क्यों नहीं?
क्योंकि आनंद की खोज हम अचेतन मन से करते हैं। ९९ प्रतिशत लोग इस बात के प्रति जागरूक ही नहीं हैं कि आनंद ही उनका एकमात्र और अतिम लक्ष्य है| अधिकांश लोगों को इतना ही पता है कि उनकी जिंदगी में कुछ कमी है, एक खालीपन है जो धन, रिश्ते या संपत्ति से नहीं भरा जा सकता।
मुझे बताइए, अब तक आपने बाहरी दुनिया से क्या पाया जिसका मूल्य स्थायी हो? फिर भी हम खोजना बंद नहीं करते ।
हम लोग अनजान हैं इसलिए हम आनंद की खोज अपने बाहर करते हैं। हम पूरी दुनिया में उसी की तलाश करते हैं जो हमारे भीतर ही विद्यमान है! विश्वास करें या नहीं, आनंद हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है! आनंद ही हमारी सही प्रकृति है।
एक छोटी सी कहानी :
एक दिन शाम को कुंवर कुलजीत अपने घर के सामने व्याकूल होकर कूछ खोज रहा था । इतने में उसकी पत्नी ने पूछा कि वह क्या खोज रहा है। उसने कहा कि उसका एक सिक्का गिर गया है। इतना सुनते ही वह भी सिक्का खोजने में लग गई। थोड़ी देर में कुछ और लोग जमा हो गये । देखते ही देखते पूरा पड़ोस जुट गया और खोए हुए सिक्के को खोजने लगा।
अचानक एक लड़के ने कुलजीत से पूछा, तुमसे सिक्का ठीक किस जगह गिरा है। हमें वह अभी तक मिला क्यों नहीं?
कुलजीत ने कहा - सिक्का मुझसे घर के अंदर खोया है।
हैरान होते हुए उस लड़के ने पूछा फिर हम लोग यहां क्यों खोज रहे हैं?
कूलजीत ने कहा - असल में मेरे घर के अंदर अंधेरा है, इसीलिए हम वहां नहीं खोज सकते । हां यहां कम से कम सड़क पर रोशनी तो जल रही है, हम लोग उसी रोशनी में सिक्का खोज तो सकते हैं।
हम अपने जीवन में यही तो करते हैं । गलत जगहों पर सही उत्तर खोजने में हम माहिर हैं। अपने आपको खोजने की कोशिश हम हर जगह करते हैं - धन में, शक्ति में, रिश्ते या विचारधारा में । परन्तु हम सबसे सरल दिशा की ओर नहीं देखते - अपने भीतर ।
जागरूकता की पहली सीढ़ी आपको महसूस करायेगी की सिक्का आपने घर के अंदर खोया है, तब अपने आप ही सडकों पर उसे ढूढंना बन्द कर देंगे।
ध्यान और कूछ नहीं बल्कि अपने अन्दर छिपे आनंद की अवस्था को खोजने की तैयारी भर है।
आनन्द को सड़कों पर खोजने की व्यर्थता को आप जिस पल समझ जाएंगे, उसी पल आप ध्यान के लिए तैयार हो जाएंगे।
आनंद की अवस्था का क्या अर्थ हैं? क्या इसका अनुभव केवलध्यान से ही हो सकता है?
मैं आनंद को समझाने के लिए सैकड़ों तरीकों का प्रयोग कर सकता हूं लेकिन वह आपकी समझ में तभी आएगा जब आप उसका अनुभव करेंगे। खैर मैं आपको इसका अर्थ समझाने की कोशिश करता हूं।
जीवन में हम सभी को खुशी के कुछ पल मिले होंगे परन्तु इसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है।
क्या यह गलत है?
आप तभी खुश होते हैं जब आपको पदोन्नति मिलती है, आप की बीमारी ठीक हो जाती है या नई गाड़ी खरीदते हैं (आपके पड़ोसी की गाड़ी खराब होने पर भी आप खूश हो जाते हैं)
जब आप खूश होते हैं तो आपको लगता है कि कुछ भी हो जाए यह खुशी कम नही होगी। परन्त्र उसी दिन आपका अपने पति या पत्नी से झगड़ा होता है और आपको लगने लगता है कि आपका जीवन कष्टों से भरा है। देखा जाए तो खूशी कभी अकेले नहीं आती । वह हमेशा अपने साथ दखों को भी लाती है। जिन्दगी में सुख के पलों की जो अवस्था होती है वह ज्यादा दिन नहीं टिकती । जब यह अवस्था बदल जाती है तो बहुत दर्द होता है अर्थात खुशी के खत्म होते ही उसकी जगह गम ले लेता है। जो आनंद बिना किसी कारण के मिले वह स्थायी होता है क्योंकि यह घटना पर निर्भर नहीं करता ।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आनंद का अर्थ खुशी नहीं है। यह आपकी वह अवस्था है जो न कभी कम हो सकता है, न ही कोई छीन सकता है।
आनंद (परम् सुख) सुखद अवस्था को नहीं कहते हैं। आनंद की अवस्था का अनुभव आपको तभी होगा जब आप गम और खुशी को बहुत पीछे छोड़ देंगे। आनंद वह शांत अवस्था है जिसमें गम और खुशी आपके लिए निरर्थक हो जाएंगे। 'स्थायी और बेवजह शांति' ही आनंद की अवरन्था है।
ध्यान आनन्द को अनुभव करने का एकमात्र रास्ता नहीं है पर निश्चित मार्ग अवश्य है। ध्यान से दैनिक जीवन के झमेले बहुत पीछे छूट जाते हैं । जब आप ध्यान लगाते
हैं तो आप अपने शरीर, अपने अहम् की संकूचित सीमा के बाहर फैलते हैं एक बार आप सबमें स्वयं को विलीन करने का अनुभव प्राप्त कर लेंगे तो आपके दैनिक सुख द्रख में स्वतः ही कमी आने लगेगी। बौद्धिक तरीके से इस धारणा को समझाना आसान नहीं है परन्तु सच्चे ध्यान से आप आनन्द का अनुभव करेंगे, इसकी एक झलक पाएंगे और तभी आप समझेंगे।
हमारे सामान्य जीवन में, हमें कभी आंनद का अनुभव नहीं हुआ। हमें यह भी मालूम नहीं कि 'बेवजह खुशी' भी सम्भव है! फिर आनंद की तीव्र इच्छा क्यों? तीव्र इच्छा इसलिए होती है क्योंकि यह स्वाभाविक है। मुझे समझाने दें : तैव्रेया उपनिषद के एक बहुत ही सुंदर श्लोक के अनुसार इथास आत्मनह आकाशर्य सम्भूत: आकाशात वायुहू, वायोर अग्निहि अग्नेर आपाहा आपह पुथ्विही
पुथ्वियोर औषधः
इस श्लोक में यह बताया गया है कि किस प्रकार पंच तत्व-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं अंतरिक्ष से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है। इन्हीं पंच तत्वों से मनुष्य का भी निर्माण हुआ है। यही मनुष्य का स्रोत है। वह हमेशा ही अपने स्रोत की ओर लौटना चाहता है इसलिए सदा ही पंच तत्व से अपने आपको बांधे रखने की तीव्र इच्छा उसमें होती है। मूर्ति पूजा से मनुष्य अपने को बांधे रखता है पुथ्वी की शक्ति से। पवित्र नदियों में ड्रबकी लगा के जल शक्ति से, यज्ञ और होम के द्वारा अग्नि की शक्ति से और मंत्रों का उच्चारण करके वायू शक्ति से। इन सारे तरीकों से वह यह साबित करता है कि आज भी मनुष्य पंच तत्वों से नाता नहीं तोड़ सकता। वह पंच तत्वों के सूर में सूर मिलाता है। यह सब बाहरी तरीके हैं अपने आपको पंच तत्व से जोड़ने का। आकाश की सूक्ष्म, उच्च शुद्ध शक्ति तक पहुंचने के लिए बाहरी तरीके काम नहीं आते हैं इसका अनुभव तो अंदर से किया जाता है। ध्यान ही वह माध्यम है जिससे हम आकाश की ऊर्जा से अपने सुर जोड़ सकते हैं।
जब हम ध्यान में प्रवेश करते हैं, तो परिधि को बंद कर देते हैं। इस अवस्था में हम एक खोई हुई कड़ी, हम और हमारे स्रोत अविष्कार करते हैं। हम अपने स्रोत में लौट जाते हैं। हमें पूर्णता का अहसास होता है। सुरक्षा का अहसास होता है। इसीलिए ध्यान आपको आनंद या परम सुख की ऊंचाई तक ले जाती है।
आंनद की तीव्र इच्छा और कूछ नहीं प्राकृतिक अवस्था में लौटने की कामना है। आपको पता हो या न हो, आप जागरूक हों या न हों हम सबके भीतर ध्यान की तीव्र इच्छा होती है।
ध्यान का अर्थ क्या है?
ध्यान की अलग-अलग कई परिभाषाएं हैं।
विभिन्न गुरूओं ने इसकी व्याख्या अपने-अपने अनुभवों के आधार पर की है, या उन व्यक्तियों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए जिनसे वे बात कर रहे हों।
ध्यान प्रार्थना है।
ध्यान वह विधि है जिससे हम अपने भीतर छिपे खजाने का अविष्कार करते हैं। ध्यान वह तकनीक है जो आपको ब्रह्मांड की शक्ति से जोड़ने में मदद करता है। सभी वाक्य सही हैं। मैं आपको बताता हं- ध्यान पल में आनन्दित होना है! आप अगर इस पल शांति से हैं तो आप ध्यान की अवस्था में ही हैं। आपको कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है।
क्या सभी लोग ध्यान लगाना सीख सकते है?
आपको ध्यान सीखने की आवश्यकता नहीं है।
आप तो ध्यानी हैं ही।
आपकों जिंदगी के उस पल को याद करिये जब आपने चरम सौंदर्य का अनुभव किया। अचानक ही सूर्य एक पहाड़ के पीछे से उगता है, या पहली बार आपने बहुत सूरीला संगीत सुना हो।
ऐसे ही किसी पल में आप पूरी तरह स्थिर हो जाते हैं, बिल्कूलस्तब्ध!
क्या हमने ऐसे पलों का अनुभव नहीं किया है?
इस पल को ध्यान कहते हैं।
असीम सौंदर्य की मौजूदगी के किसी पल में आप और कुछ नहीं सोच सकते। आप केवल चुप हो जाते हैं, उस सौंदर्य के प्रति जागरूक होकर। इस पल को ध्यान ही तो कहेंगें।
क्रूछ पलों के बाद, आपकी बोलने की आंतरिक क्षमता जाग उठती है। तब आपका दिमाग कहता है, कितना सुंदर सूर्योदिय है।
आपका दिमाग सुरीले संगीत की तुलना किसी दूसरे संगीत से करता है जिसे आपने कहीं सुना हो।
इसका मतलब है आप ध्यान से बाहर आ चुके हैं।
ध्यान और कुछ नहीं बल्कि शांत और आंनददायक अवस्था में रहना है।
आप इस अवस्था को सीख नहीं सकते। केवल इसका अनुभव कर सकते हैं।
इस बात का ख्याल रखें - आप ध्यान 'कर' नहीं सकते ध्यान की अवस्था आप पर तभी निखरती है जब आप अपनी सारी क्रियाएं करना बंद कर देंगे। क्रिया केवल शारीरिक ही नहीं सोचना भी एक क्रिया है, चिंतन भी एक कर्म है।
जब आप अपनी सारी क्रियाएं, सारी सोच, सारे कार्य, सारी भावनाएं त्याग देते हैं। तब जो बचता है वही ध्यान है।
ध्यान ही अस्तित्व है।
जेन गूरू की कहानी के अनुसार - ध्यान, वर्तमान पल को बिना विरोध अनुभव करना है।
इसी तरह आंनद वह परिणाम नहीं है जिसे आप कड़ी मेहनत से प्राप्त करते हैं। आप आनंद को 'पां नही सकते! केवल आनंद में विभोर हो सकते हैं।
फिर हमें ध्यान के तकनीकों की आवश्यकता क्यों होती है?
ध्यान की तकनीकें आपको कुछ पाने में सहायता करने के लिए नहीं है। यह आप को कूछ याद रखने में मदद करते है, अगर मैं अचानक आपसे कहूं आनंद में जाओ क्या यह संभव है? आपको तो यह भी नहीं पता कि आनंद आपकी प्राकृतिक अवस्था है। और जब आप नहीं जानेंगे तो ध्यान के तरीके आपको और उलझाने वाले और भयावह लगेंगे। ध्यान में प्रवेश करना एक छोर रहित समूद्र में प्रवेश करने के समान है। जब आप तैरना सीख रहे हैं तो क्या आप अपने आपसीधे समुद्र में कूदेंगे। नहीं!
आपको मार्ग दर्शन के लिए प्रकाश स्तम्भ की आवश्यकता होगी। तैरते रहने के लिए जीवन पेटी की आवश्यकता होगी।
इसी तरह जब आप ध्यान लगाने का प्रयत्न करते हैं तो आपको कुछ विधियों की आवश्यकता होगी, एक मार्ग दर्शन की जरूरत होगी जो आपके लिए सबसे उपयुक्त हो यह बताएगा कि क्या करना स्वाभाविक है।
ध्यान की तकनीकें भी जीवन पेटी के अलावा और कछ नहीं हैं। एक बार ध्यान आपके जीवन का अंग बन जाए आप इन औपचारिक तकनीकों को छोड़ देंगे।
मुझे प्रतिदिन कितने घंटे ध्यान लगाने की आवश्यकता है?
घंटों का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता। जब कोई चीज जिंदगी का अंग बन जाती है तो इस बात का कोई मतलब नहीं है कि उसमें कितने घंटे प्रतिदिन व्यतीत होंगे। यह तो ऐसी बात हुई 'मैं प्रतिदिन कितनी देर तक सांस लूंगा। मैंने पहले ही कहा है कि ध्यान को आपकी जिंदगी से जोड़ा नहीं जा सकता।
आप यह नहीं कह सकते कि 'मैं प्रतिदिन इतने घंटे ध्यान में लगाऊंगा और बाकी का समय मैं वैसे ही बिताऊंगा जैसे अभी बिताता हूं।
ध्यान आपके भीतर एक असाधारण बदलाव चाहता है। यह आपके जीवन शैली को पूरी तरह से बदल देता है।
बीज आपके अंदर मौजूद है परंतु उसे पेड में परिवर्तित होने और फलने-फूलने के लिए बीज का पहले फूटना आवश्यक है।
आपको स्वयं में हो रहे इस फूटन को स्वीकार करना होगा। जब आप सच्चे मन से ध्यान का अभ्यास करेंगे तो यह अपने आप ही होगा। परंतु आपके अंदर फूटने के लिए पूरी तरह बदलने की इच्छा होनी चाहिए।
ध्यान पुनर्जन्म से कम नहीं है! आपके अंदर मौत का सामना करने की शक्ति होनी चाहिए - आपकी अपनी मौत! और आप एक संपूर्ण नये व्यक्ति के रूप में जन्म लेंगे।
ध्यान के क्या लाभ हैं?
ध्यान आपको पूरी तरह से बदलने की शक्ति रखता है-वह शारीरिक रूप से हो, मानसिक, भावनात्मक या आध्यात्मिक रूप से हो।
ध्यान के जो लाभ शरीर पर होते हैं वह तो जग प्रसिद्ध है।
ध्यान से उच्च रक्त चाप व खून में शर्करा को नियंत्रित किया जा सकता है। रोगों से लड़ने की शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। कुछ प्रकार के त्वचा रोग. अस्थमा व गठिया जैसी पूरानी बीमारी भी ध्यान के द्वारा ठीक हो सकती है। ध्यान की शक्ति से कोई भी बीमारी भाग नहीं सकती।
हां ध्यान दवा या चिकित्सा का पूरक हो सकता है उसकी जगह नहीं ले सकता। मानसिक स्तर पर ध्यान विचारों में स्पष्टता व क्रियापद परिवर्तन को बढाता है। विचारों के बीच में रिक्त स्थान बढते हैं। ध्यान एक निश्चित तरीका है एकाग्रता व स्मरण शक्ति बढ़ाने का। यह आपको बूद्धि सम्पन्न व्यक्ति से बूद्धिमान बनाती है। ब्रुद्धिमान होने से किसी भी स्थिति में सुजनात्मक व रचनात्मक तरीके से जवाब देने की क्षमता बढ़ती है। यह कला आप सीख नहीं सकते वरन् ध्यान करने से यह अपने आप ही निखरता है।
ध्यान के आध्यात्मिक लाभ बहुत से हैं। ध्यान आपको ब्रह्मांड की अनंत शक्तियों के सीधे संपर्क में लाता है। ध्यान आपके सामने उस द्वार को खोलता है जिससे आप अपने भीतर छिपे हुए दैवीय शक्ति का आविष्कार करते हैं। सच में कहा जाए तो ध्यान शब्दों से परे है। इसके लाभ अनुभव करने के हैं। व्याख्या करने के नहीं ।
अगर ध्यान चौबिस घंटे चलने वाली विधि है, तो जीवन कैसे चल सकता है? यदि हमेशा मेरा ध्यान केवल्र अस्तित्व पर ही केंद्रित रहे, तो मैं दूसरे काम कैसे कर पाऊंगा?
ध्यान कार्य विरोधी नहीं है। आप उसी अवस्था में रहते हुए कई कामों को एक साथ कर सकते हैं। आपको आवश्यकता है अपने आप में परेशान न होने के कौशल को सीखने की। बाहरी कार्य या अकर्मण्यता यहां अप्रासंगिक है। इस विधि के दो भाग हैं। सबसे पहले आपको अपने अन्तर्त्मा को स्पर्श करने की आवश्यकता है। सबसे पहले आपको समझना होगा कि ऐसी कोई वरन्तु विद्यमान है। अपने आप में होने की अवस्था का आनंद लेना सीखें। पहले पहले जब आप ध्यान में बैठेंगे तो इसको प्रतिदिन केवल आधे घंटे या एक घंटे के लिए ही कर सकेंगें।
एक बार आप इस अवस्था में सहज महसूस करने लगें तो इसकी अवधि को बढाने की कोशिश कीजिए और इस अवधि को औपचारिक ध्यान की अवधि के बाहर ही बढाएं। आप छोटे छोटे कामों से शुरूआत कर सकते हैं: ध्यान को केंद्र बिन्दू बनाकर रखने की कोशिश करें जब आप खाना खा रहे हों, चल रहे हों, बरतन धो रहे हों। एक बार आप यह सब कर सकेंगे तो जटिल कार्यो की ओर बढ सकेंगे।
आपकी दिनचर्या साधारण ढंग से चलती रहती है। सही मायने में आप अपने जीवन का निर्वाह बेहतर ढंग से कर सकेंगे। आपकी एकाग्रता बढ़ेगी, आप अधिक स्पष्ट होंगे, अधिक जागरूक और सुजनशील बनेंगे।
हां भीतर ही भीतर आप गहरी बाधा रहित शांति का अनुभव करेंगे क्योंकि अब आप कुछ कर नहीं रहे हैं केवल देख रहे हैं।
यही ध्यान का पूर्ण रहस्य है आप द्रष्टा एवं अपने ही कार्यो और भावनाओं का साक्षी बन जाते है?
जब आप अपने ही कर्मो का साक्षी बनने लगेंगे तो आप समझेंगे कि आप के भीतर कोई ऐसा है जो कभी नहीं बदलता, गूस्सा या दुखी नहीं होता, धन सूरक्षा या यश की चिंता नहीं करता। यही असली आप हैं। बाकी तो एक व्यक्ति है जो आपने अपने इर्द गिर्द बनाया है। एक बार आपको पता चल जाएगा आप वो नहीं हैं जो काम करता है. गुरन्सा होता है, दर्द का अहसास करता है या तनाव में रहता है- आप एक प्रबल आजादी का अनुभव करेंगे।
यह ध्यान से ही संभव है।
ध्यान से आपको ऐसी मुक्ति मिलती है जैसी आपको पहले कभी न मिली हो अपने आप से मुक्ति, आपके द्वारा बनाए गये व्यक्तित्व की सीमा से मुक्ति। ध्यान तक पहुंचने का सही मार्ग कौन-सा है? अच्छा सवाल है। उस तक ईमानदारी के साथ पहुंचें। मैं आपको ध्यान में विश्वास या अविश्वास करने के लिए नहीं कह रहा हूं। मैं आरन्था रखने के लिए भी नहीं कह रहा हूं। मैं भरोसा रखने के लिए कह रहा हूं। आस्था किसी पर बना बनाया श्रद्धा है। भरोसा केवल प्रयोग में खुलापन है। तो अपना दिमाग खुला रखिए और ध्यान को एक मौका दें। उत्साही बनें ऐसे किसी चीज के लिए तैयार रहें जो असाधारण हो! ध्यान तक पहुंचने का दूसरा रास्ता है आशावादिता । परम सूख की अवरश्था केवल योगियों या संयासियों के लिए आरक्षित नहीं है। परम सुख आपके लिए पूर्णत: अनुभव करने योग्य लक्ष्य है- अगर आप ध्यान से पूरी तरह अपरिचित हों फिर भी। ध्यान के लिए योग्यता निर्धारित नहीं है। एक बार एक आदमी महान आध्यात्मिक गूरू रमण महर्षि के पास गया और उनसे पूछा भगवन क्या मैं योग्य हूं आध्यात्मिक जीवन के लिए? रमण ने एक प्रश्न के साथ उसका उत्तर दिया क्या तुम जीवित हो? आदमी आश्चर्यचकित हो गया।
हां, अवश्य।
रमण ने जवाब दिया यही काफी है, तुम्हारे पास आध्यात्मिकता के लिए निर्धारित योग्यता है।
केवल जीवित रहना ही आध्यात्मिकता के लिए आपकी योग्यता है।
जब दैवीयता आप पर प्रतिबंध नहीं लगाती, आप स्वयं पर प्रतिबंध क्यों लगाते हैं? शरू करने से पहले स्पष्ट हों: आपका एक निश्चित लक्ष्य होना चाहिए, और आप वहां तक अवश्य पहुचेंगे।
तीसरा तरीका है प्रफूल्ट्रचित्त रहें!
ध्यान एक बडा रोमांच है। देखा जाए तो यह आपके जीवन का सबसे बडा प्रयोग है। ध्यान के विषय में गंभीर हो जाने से आप लक्ष्य को ही खो देंगे।
आध्यात्मिकता कोई गंभीर मसला नहीं है।
ध्यान और कुछ नहीं केवल समझना है कि जीवन एक लीला है. दैवीय नाटक। इसमें गंभीर होने का क्या है।
ध्यान को उत्सव की तरह मनाएं।
सामान्य ढंग से इसका आनंद लें।
चौथा तरीका है धौर्य धरना।
आप जब पहली बार ध्यान लगाने के लिए बैठेंगे तभी आपको दैवीय शक्ति का अनुभव नहीं होगा।
ध्यान शुरू करते ही आप फल की चिंता करना शुरू न करें। एक छोटी-सी कहानी:
एक बार तीन बंदरों को एक पका हुआ, रसीला आम मिल्रा।
सभी बंदरों की तरह थोडी देर वे उस आम के लिए लडते रहे।
फिर किन्हीं कारणों से उनमें ब्रुद्धिमानी का एक पल आया और उन्होंने बुद्धिमानी से इस मसले को हल करने का निश्चय किया।
आम को तुंरत खाने के स्थान पर उन्होंने आम को बोने का निश्चय किया। एक बार आम का बीज उगना शुरू हुआ और एक पेड़ बन गया, तो उन तीनों के लिए काफी आम हो जायेगा।
बंदरों ने यह तय किया कि वे मिलकर पेड़ की देखभाल करेंगे
पहले बंदर ने कहा, मैं प्रतिदिन पेड़ में पानी डालूंगा!
दूसरे ने कहा, मैं मिट्टी को स्वस्थ रखूंगा, उसमें खाद डालूंगा और सुनिश्चित करूंगा की पेड़ अच्छी तरह बढ़े।
तीसरे बंदर ने कहा, मैं पेड़ की रक्षा करूंगा और इसे खराब मौसम व जानवरों से बचाऊंगा।
तीन महीना बीत गया फिर भी बीज से पेड़ उगना प्रारम्भ नहीं हुआ।
तब तीनों बंदरों ने अपने भूमिका और कार्यो के बारे में बातचीत करने के लिए आपात्कालीन बैठक बुलाई।
पहले बंदर ने कहा, वादे के मुताबिक मैं बीज में प्रतिदिन पानी डालता हूं।
दूसरे बंदर ने कहा, मैंने जैसा वादा किया था मैं मिट्टी में खाद मिला रहा हं और उसे स्वर्स्थ बना रहा हूं।
तीसरे बंदर ने कहा. मैनें जो वायदा किया था वह निभा रहा हं। मैं बीज की रक्षा बहत ध्यानपूर्वक कर रहा हूं ! इतना ही नहीं मैं रोज बीज को निकाल्कर देख लेता हूं कि वह उगना शुरू हुआ या नहीं।
इसलिए पहले सत्र में ही चमत्कारों की अपेक्षा करना शुरू न करें।
ध्यान की विधि को अपने भीतर उगने के लिए थोड़ा वक्त दीजिए।
यदि आप तरंत फल पाने के लिए लालच करेंगे तो विधि को आप अपनी विचारधारा में बसने से रोकेंगे धैर्य रखें नहीं तो आप पूरीविधि के मार्ग में बाधा खड़ी करेंगे ।
पाँचवां तरीका है एकान्त या अकेल्ठेपन का आनंद लेना। ऐसी अवरस्था बनाएं जिसमें अपने अंतर में झांकने की कोशिश करेंगे। अकेले रहें, प्रतिदिन कुछ समय खामोशी में बिताएं। अपने आपको मौका दें अपने आंतरिक परिवेश को महसूस करने का। जब ध्यान आपका हिस्सा बन जाए तो यह अवस्था अपने आप ही होती है पर शुरूआत करने वालों के लिए, इस अवस्था को सचेत होकर रक्षा करना होगा।
ध्यान की इतनी सारी तकनीकें हैं मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरे लिए कोन-सी तकनीक सही है?
परिणाम से जाएं।
यदि कोई तकनीक आपको अच्छी लगती है तो उसे अपनाएं। इस प्रयास के पीछे अपनी पूरी शक्ति लगाएं। ईमानदारी के साथ इसका अभ्यास करें। पूरी तरह विश्वास करें कि यह आपके लिए सही होगा। कुछ ही दिनों में आप जान जाएंगे कि यह तकनीक आपके लिए सही है या नहीं। शुरूआत में, मैं तो यही कहंगा कि ''बैठने की'' तकनीक की जगह ''करने की''. तकनीक का अभ्यास करें क्योंकि अभी आपके अंदर बहत ज्यादा अशांति होगी अगर आप शांत बैठकर देखेंगे तो आपको अपने अंदर की अशांति ही दिखेगी।
इसलिए जब आप ध्यान की शुरूआत कर रहे हैं तो 'करने की' तकनीक का चुनाव करें - क्योंकि यह दबी हुई भावनाओं को बाहर निकालने की व पवित्र करने की तकनीकें हैं। यह तकनीकें बाहरी तौर पर क्रियाशील होंगे पर अंदर ही अंदर आपको शांति और खामोशी का अनुभव करायेंगे।
एक बार ध्यान में आप बस जाएंगे, पुराने सारे गतिरोधों को साफ कर लेंगे, तो आप जिस तकनीक को चाहेंगे उसे ही अपना सकते हैं।
किसी तकनीक की सत्यता का अनुमान कैसे लगाएंगे?
यदि किसी तकनीक से आप अधिक सहज, अधिक एकाग्रचित्त,अधिक संवेदनशील महसूस कर रहे हैं तो यह आपके लिए सही है। यदि कोई तकनीक आपको ज्यादा आनंददायक बनाती है, विकसित करने में मदद करती है, अधिक ऊर्जावान बनाती है तो वह आपके लिए सही है।
अगर आपको लगता है कि वह सही नहीं है तो उसे ताक पर रखिये और नये तकनीक का प्रयोग करना शुरू करें।
फल के लिए लोभ न करें. धैर्य रखें एवं हडबड़ी में सही तकनीक को दरकिनार न करें। प्राय: आप पहले पांच या आठ तकनीकों को चुनते हैं उनमें से ही कोई एक आपको मिलेगा जो सही हो।
उसका पता लगाएं।
उसे करते रहें।
ध्यान में प्रवेश
यान वह रास्ता है जो आपको अंदर झांकने में मदद करता है परंतु शुरूआत आपको बाहर से ही करनी पड़ेगी। अभी आप किनारे पर हैं। अभी तक पानी में उतरें नहीं हैं केवल एडी डूबोकर देख रहे हैं कि पानी कितना ठंडा है।
बहत से लोग मेरे पास आते हैं और कहते हैं, स्वामीजी मैं आध्यात्म के बारे में कुछ नहीं जानता। मैने कभी ध्यान लगाने की चोष्टा भी नहीं की। क्या मैं तैयार हूं? मैं कहां से शुरू करूँ? मैं बताता हूं : शुरू करने का सबसे अच्छा स्थान वही है जहां आप इस समय हैं।
इस समय आप अपने बारे में जो भी समझते हैं वह आपके शरीर, भावना एवं चिंतन से संबंधित है यानि जो भी आप अपने आपको समझते हैं वह आपका शरीर, चिंतन एवं भावना ही है।
स्वाभाविक है वहीं से शुरू करें।
पहला कदम: शरीर के साथ क्रिया
आप अपने शरीर के बारे में कैसा महसूस करते हैं?
हम सभी की अपने शरीर के बारे में एक सोच है।
यह हमारी अपनी नहीं होती है।
हमारे विषय में, यह दूसरे लोगों की धारणा पर बनती है। हम सभी अपने शरीर के विषय में बहत नकारात्मक सोच रखते हैं। आप इसके बारे में जागरूक नहीं भी हो सकते हैं। परंतु अचेतन मन में आप अपने शरीर के विषय में गहरी नकारात्मक सोच रखते हैं।
ध्यान में प्रवेश
बहुत कम ही मैं ऐसे व्यक्ति से मिला हूं जो अपने शरीर को लेकर पूर्णतया संतूष्ट है। अपने शरीर को लेकर संतुष्ट होने का मतलब यह नहीं कि आपकी धारणा अपने शरीर के बारे में अच्छी ही है। इसका मतलब है कि जिस तरह का भी शरीर आपके पास है आप उसी के साथ आराम से हैं।
सारी जिंदगी आप सुनते हैं कि तम्हारा शरीर ही तुम्हारा शत्रु है, तुम्हारा शरीर दुष्ट एवं पापी है अपने शरीर को यातना दो उसकी उपेक्षा करो विशेषतः आध्यात्मिक पथ पर शरीर को ही कामयाबी की राह में सबसे बड़ी बाधा बताया जाता है।
अपने शरीर के प्रति अस्वाभाविक घुणा पैदा करें ।
यह आपके अचेतन मन में कहीं गहरे में जरें. जमा लेता है।
आप सोचने लगते हैं कि आपका शरीर आपके विरूद्ध काम कर रहा है। परंतु सच्चाई कुछ और ही होती है वही शरीर नाव होती है जिसमें बैठकर आप संसार की नदी को पार करने वाले हैं। क्या आप इस दूनिया में अपने शरीर के बिना चल सकते हैं? क्या आप ध्यान अथवा आध्यात्म की ओर मन लगा सकते हैं जब तक आपका शरीर अच्छी अवस्था में न हों? क्या आप इस किताब को अपनी आंखें और दिमाग के बिना पढ़ और समझ सकते हैं?
यह सच है कि अंत में आपको शरीर से परे जाना है। परंतु शरीर के साथ युद्ध करके ऐसा नहीं करना चाहिए। आप इस शरीर को समझकर व स्वीकार करके करें, और शरीर पर क्रिया करके उसेध्यान के लिए उपर्यूक्त बनाएं।
याद रखें शरीर एक शक्तिशाली यंत्र है/ भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तर में ही। परंतु वह केवल एक यंत्र ही है| यह न अच्छा है न बूरा, न ही आपका दोस्त न ही
ध्यान में प्रवेश
शत्र। शरीर के द्वारा आप भौतिक दुनिया में भी घुम सकते हैं. उसी शरीर के द्वारा आप दैवीयता की ओर जा सकते हैं यह मात्र आपके हाथ में एक माध्यम है।
स्वीकार करने के लिए यह एक कठिन धारणा है क्योंकि जीवन भर आपने अपना परिचय अपने शरीर के साथ ही पूर्ण होते देखा है। जब तक आप पहचान को तोड़ नहीं पाएंगे तब तक आप शरीर से परे नहीं जा सकते। तो पहले कदम में आप अपने शरीर पर ध्यान देना शूरू करें। जब तक आपका शरीर सूचारू रूप से काम नहीं करता तब तक आप ध्यान में प्रवेश नहीं कर पाएंगे इतना तो तय है। अपने शरीर के बारे में आपकी जो भी नकारात्मक या सकारात्मक धारणा हो उसे छोड दें! बस छोड दें।
पहला कदम है शरीर को स्वच्छ करना ।
शरीर को स्वच्छ करने का क्या मतलब है?
हमारे शारीरिक अंगों का हिस्सा है अशांति, शक्ति का गतिरोध, जटिलताएं। इन्हें हटाना ही शरीर को स्वच्छ करना है।
शक्ति का गतिरोध और अशांति हमारे शरीर में कैसे बनते हैं?
बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि कैसे हमें अपने स्वाभाविक भावनाओं को दबाना है क्योंकि हमेशा समाज में हम अपनी भावनाओं को वैसे नहीं दर्शा सकते जैसे हम चाहते हैं।
उदाहरणत: जब आप गुरूसा होते हैं, शरीर तुरन्त ही लड़ने के लिए आवश्यक रसायन पैदा कर देता है । यहां तक की उस व्यक्ति पर हाथ उठाने के लिए शक्ति भी पैदा कर देता है। क्योंकि क्रोध हर जीव के लिए जीने का आवश्यक उपकरण है। परन्तु हमारे सभ्य समाज में हमें कभी-कभी अपने गुरूसे पर काबू रखना पड़ता है। हो सकता है कि
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ध्यान में प्रवेश
सामने वाला व्यक्ति आपका बॉस हो या आपकी पत्नी जिससे आप डरते हों। जो भी शक्ति आपके शरीर में बनती है उसका प्रयोग नहीं होता है। यह अतिरिक्त शक्ति आपके शरीर में जमा होती है और ऊर्जा के बहाव में अशांति पैदा करती है।
चाहत, भय, दुख यही आपकी सभी भावनाओं के साथ होता है। ज्यादातर समय आप डरते हैं कि कहीं आपका शरीर अपने को दर्शा न दे। आप अपने शरीर को अविश्वास करते हैं और गहरे डर में जीते हैं । आप सोचते हैं कि आपका शरीर सभ्यता की भाषा नहीं जानता है। वह समाज के नियमों को भी नहीं पहचानता । आप सोचते हैं कि अगर आप अपने शरीर को स्वतंत्र छोड देंगे तो कौन जाने क्या होगा? पता नहीं आपका शरीर क्या करे? तो आपको काब में रहना होगा. आपको दमन करना होगा।
जब आप बार-बार अपनी भावनाओं को दबाते हैं तो आपके भौतिक शरीर में गतिरोध बन जाते हैं. इससे आगे चलकर मानसिक बीमारी हो सकती है। उदाहरण के लिए गरन्सा दबाने से हिस्टिरिया हो सकता है।
इसी तरह से मानसिक अशांति भी शारीरिक बीमारी की तरह प्रत्यक्ष हो सकती है। केवल हृदय रोग अथवा माइग्रेन ही नहीं तनाव से त्वचा रोग व पेपटिक अल्सर भी हो सकता है। शोध बताते हैं कि हमारी बीमारी का ८० प्रतिशत स्वभाव से साइकोसोमेटिक (शारीरिक बीमारी के चलते स्वभाव से मानसिक और भावनात्मक प्रक्रिया में अंसतलन पैदा करते हैं और हालात गम्भीर बना देते हैं) इसलिए हमारी शारीरिक और मानसिक अवरथा ही इन बीमारियों के लिए जिम्मेदार है।
आपके शरीर के सारे गतिरोधों और दबावों को समाप्त करने के लिए ध्यान की तकनीकें आपको बाद में इसी किताब में बताई गयी है। एक बार आप सारे गतिरोधों से मुक्त
हो जाएं आप देखेंगे आपका शरीर कैसे स्वभाविक रूप से फलता फूलता है, आपका शरीर अधिक सुन्दर और पवित्र लगने लगता है। आपका शरीर आप नहीं हैं, परन्तु वह आपको सहारा देने के लिए है। अपने शरीर के साथ एक सुन्दर, दोस्ताना सम्बन्ध विकसित करें।
केवल दबी हई भावनाएं ही हमारे शरीर में अशांति का कारण नहीं हैं वरन हमारी बरी आदतें भी इसमें सहायक होती हैं। शरीर पूरी तरह से शारीरिक कलपुरजा है। आपके खाने, सोने, व्यायाम करने व आराम करने के तरीकों का इस पर प्रभाव पडेग़ा ही। जैसा मैं हमेशा कह रहा हूं बीमारियां आपकी मेहमान हैं। शरीर के साथ आपका लापरवाही भरा व्यवहार ही इनको न्योता देता है।
उदाहरणतः आपका शरीर विरोध करता है जब आप मसालेदार खाना खाते हैं। आपकी आंखों से पानी बहता है! शरीर कहता है 'मैं नहीं संभाल सकता'' क्या आप उसकी सुनते हैं? नहीं!
जब आप मध्य रात्रि तक टी.वी. देखते हैं तो आपके सारे अंग चीख चीख कर कहते हैं मुझे आराम चाहिए! परन्तु हमेशा की तरह आप उसकी नहीं सुनते। आप अपने शरीर की बुद्धिमता से अनजान हैं। जानकर रखिए उसका अपना ज्ञान है। वह बार बार आपको इशारे करता है पर आपमें समझ नहीं है उसे समझने की।
हम क्यों खाना खाते है?
इसका सबसे आसान उत्तर ऊर्जा पाने के लिए। पर क्या आपका भोजन आपको सच में ऊर्जा प्रदान करता है। भोजन करने के बाद आप ऊर्जा का अनुभव करते हैं या नींद का? ज्यादातर लोग नींद का अनुभव करते हैं। क्योंकि हम अच्छे खाने का चयन नहीं
ध्यान में प्रवेश
करते और पेट जब कहता है कि वह भर गया है तब भी हम खाते रहते हैं| हम अपने पेट में कूछ भी डालते रहते हैं। अपने पेट का इस्तेमाल कूड़े-दान की तरह करते हैं। पाचन तंत्र पर हम बहत अधिक बोझ डालते हैं। आश्चर्य की बात नहीं है हम खाने के बाद ऊर्जा का अनुभव नहीं करते।
आपको आलस घेर लेता है जब आप अधिक भोजन करते हैं, जब आप व्यायाम नहीं करते । एक आलसी शरीर ध्यान के लिए पूर्णतः अयोग्य है। जब हमारी शक्ति का स्तर नीचा होता है तब बीमारियां हमारे शरीर पर आसानी से आक्रमण कर देती हैं।
व्यायाम आपको फैलने में मदद करता है। जब आप व्यायाम करते हैं तो आपके शरीर की प्रत्येक जीवित कोशिका फैलने लगती है। जब आपके फेफडे में ऑक्सीजन भर जाता
है तो कार्बन-डाई-आक्साइड के साथ अशूद्धियां भी बाहर फेंक दी जाती हैं। हमारी जीवन शैली में हमारे पास न व्यायाम करने के लिए समय है न आराम के लिए। हम जिसे आराम कहते हैं वह सम्पूर्ण आराम नहीं है| यदि हमने ठीक से आराम किया हो तो हमें चहकते हुए मुंह धोना चाहिए। हममें से कितने लोग जब सूबह सोकर उठते हैं तो ऊर्जा और खुशी का अनुभव करते हैं ? इसकी जगह आप क्या करते हैं, सुबह सवेरे जब अलार्म बजता तो उसे बन्द करके पुन: सो जाते हैं!
सच्ची नींद तभी होती है जब शरीर पूरी तरह से आराम की स्थिति में होता है, जब आपके अंग मरम्मत एवं देख-रेख का काम पूरा कर सकते हैं। हम गहरी, बाधारहित, स्वप्नरहित नींद का आनंद कितने दिन ले पाते हैं। बहुत कम है न परंतु आपका यह जानना आवश्यक है कि हम उन्हीं दिनों सही अर्थ में सोते हैं।
आप सोच रहे होंगे कि इस सबका ध्यान से क्या संबंध ? पहली बात है ध्यान में प्रवेश करने के लिए शारीरिक रूप से स्वस्थ शरीर अतिआवश्यक है। यह ध्यान में आपकी
मदद करता है। परंतु ध्यान का अभ्यास ही आपको आराम करने में सहायता करता है। हम लोग उन तकनीकों को देखेंगे जो आपकी नींद की गुणवत्ता बढ़ाएगी। जब नींद की ग्रणवत्ता में सुधार आता है तो अपने आप ही आपके जागे हुए वक्त की उत्पादकता व गुणवत्ता बढ़ जाती है।
दुसरा कदम: चिंतन के साथ क्रिया
चिंतन हमारे जीवन में सबसे चंचल वस्तु है। ज्यादातर समय, हमारा चिंतन पर कोई बस नहीं होता। हमारे चिंतन हमें जिधर चाहते हैंउधर ही ले जाते हैं। यदि आप अचानक ही जोर जोर से अपने विचारों को शब्दों में ढ़ालना शुरू करें तो अपने शब्दों को सुनकर आप स्वयं ही शर्मिन्दा हो जाएंगे।
हमारी चिंताएं एक दूसरे से बहुत अलग होती हैं भविष्य से कोर्सों
द्र। फिर भी हम अपने जीवन में चितनों में विश्वास रखते हैं। हम इन्हीं चिंतनो से ही जीते हैं।
एक छोटी सी कहानी:
एक राज्य में एक बुद्धिमान व्यक्ति रहता था जो भविष्य वक्ता था। एक दिन उस राज्य के राजा ने उस बुद्धिमान व्यक्ति के बारे में सूना तो उसकी परीक्षा लेने की सोची। वह उस व्यक्ति को राज्य के सबसे व्यस्ततम बंदरगाह पर ले गया, जहां प्रतिदिन सैकडों जहाजें आती जाती हैं। राजा ने पूछा क्या तुम मुझे बता सकते हो यहां आज कितनी जहाजें आने वाली हैं? केवल तीन उसने कहा और केवल आज नहीं रोज ही यहां तीन जहाजें आती व जाती हैं। राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा इसका क्या मतलब हैं। कौन सी तीन जहाजें?
धान का जहाज, शक्ति का जहाज, कामुकता का जहाज मेरे आका!
यह सही है। ज्यादा से ज्यादा वक्त हम धन, शक्ति, कामुकता के बारे में सोचते रहते हैं। हम अपनी चिंताओं को कई नाम देते हैं पर अन्त में इन तीनों में से किसी एक पर आकर वह खत्म होता हैं। यहां कामुकता का अर्थ केवल कामुकता से नहीं है किसी भी प्रकार की आसक्ति से है।
यदि आप किसी कार्यालय में काम करते हैं तो आप धन और शक्ति के लिए ही करते हैं।
यदि आप छुट्टिटयां मना रहे हैं तो आपकी चिंता आसक्ति पर ही केंद्रित होगी। थोडा विचार करिये : आप हर समय क्या सोचते रहते हैं ? जरूर इन तीनों में से ही कुछ!
आप कितने समय के अन्तराल में सच्चाई, अच्छाई व सौन्दर्य को दर्शाते हैं। आप सोचते होंगे कि इसकी क्या दरकार है? मेरी जिंदगी इस बात पर निर्भर करती है कि मैं कितना पैसा कमाता हूं, कितनी शक्ति अर्जित करता हूं न कि मेरी जिंदगी में कितनी सच्चाई व सौंदर्य है।
पंरत् चिंतन हमारे जीवन को बदल सकते हैं| जब आप बार बार किसी चीज को दर्शाते हैं तो वह आपकी मानसिक अवस्था ही नहीं जीवन की अवरश्था भी बदल सकती है। आप अगर बार बार सुन्दरता के बारे में सोचते हैं तो आपका जीवन और सुन्दर हो जाता है।
यह सब तो ठीक है परतु आप हमेशा इस बात से सर्तक रहिए कि कौन सा चिंतन आपके दिमाग में घुस रहा है व निकल रहा है| अभी आपके दिमाग में स्थान है जो सबके ध्यान में प्रवेश
लिए है। कोई भी विचार स्वतंत्र है वहां प्रवेश करने के लिए, दूसरे विचारों से लडने के लिए ताकि वह अधिक स्थान घेर सके।
जितनी देर इच्छा हो वहां ठहर सके और जब मन हो चला जाए। जो विचार आपके दिमाग में प्रवेश करता है और जीवन को प्रभावित करता है उन पर आपका कोई बस नहीं।
केवल अपने विचारों को देखें।
देखें कि आपके अंदर क्या होता है जब किसी एक प्रकार के चितंन या विचार प्रवेश करते हैं।
आपने देखा होगा जब भी आपके दिमाग में गूरसा, हवस, लालचीपन से संबंधित विचार प्रवेश करते हैं तो एक अशांति सी फैल जाती है। यही विचार अशांति को जन्म देते हैं। जब आपका अहम् जाग जाता है, आप असूविधाजनक महसूस करते हैं। देखें कौन से विचार आपको खुशी और शांति का अहसास कराते हैं। उन विचारों को रोकें और दूसरों को बाहर निकाल दें।
अपने दिमाग का चौकीदार बनें। विचारों की धारा के विषय में जागरूक हों। देखें कि अपने आपको कितनी गहराई से अपने विचारों के साथ पहचानते हैं। आप पाएंगे कि यह विचार आपके गहरे अचेतन मन से पैदा होते हैं। यदि आप अपने अच्चेतन मन में विचारों को बदल सकते हैं, तो आप अपने सचेत जीवन की धारा को बदल सकते हैं। इसको करके देखें : यदि आप अपने सचेत जीवन के कुछ पहलूओं को बदलना चाहते हैं- उदाहरण के लिए, आप अपने गुरने या पूर्वाग्रह से छुटकारा पाना चाहते हैं - ठीक सोने से पहले अपने दिमाग को बदलने का निर्देश दें।
आप यह देखकर आश्चर्यचकित हो जाएंगे कि बार-बार अचेतन मन को निर्देश देते देते आपका सचेत जीवन भी उसी दिशा में बदल जाएगा।
तीसरा कदम : भावनाओं पर क्रिया
आपकी भावनाएं आपकी द्रनिया बनाते हैं।
आप विश्वास करें या न करें. स्वीकार करें या न करें- आप सब भगवान हैं। आप अनुभव करने की क्षमता और भावनाओं से अपनी दुनिया बनाते हैं। एक चीज जानकर रखिये : आपकी जिंदगी भी वैसी ही होगी जैसी अवस्था आपकी चेतना की होगी।
जब आपकी भावनाएं स्पष्ट व सकारात्मक हों तो पूरी दुनिया एक सुंदर स्थान बन जाएगी। जीवन आप पर आशीर्वाद बरसाएगी। जब आप प्यार से भरे होते हैं, आपको हर तरफ प्यार ही दिखता है। जब आप नफरत से भरे होते हैं तब आपको नफरत ही मिलता है।
यह एक नैतिकता की कहानी नहीं है। यह सच है। हमारी सीमित समझ के कारण हम इसका अनुभव नहीं कर सकते। हम हर जगह कारण ढूंढ़ते फिरते हैं। सच्चाई तो यही है कि अपनी जिंदगी की गुणवत्ता के लिए हम ही १००% जिम्मेदार हैं। जब आप अपनी ही भावनाओं के साथ क्रिया करेंगे तब आप स्वयं ही इसे देखेंगे।
हम यह समझ ही नहीं पाते कि हमारी भावनाएं हमें कितनी गहराई से प्रभावित करती हैं। हम यही सोचते हैं कि हमारे सारे कार्य दिमाग से ही नियंत्रित होते हैं, निर्णय लेने के लिए हम अपनी बुद्धिमता का प्रयोग करते हैं- परंतु सच्चाई यह है कि हमारी सारी जिंदगी हमारी भावनाओं का ही फल है।
ध्यान में प्रवेश
| अपनी भावनाओं के साथ क्रिया करने के तीन तरीके हैं : |
|---|
| (अ) अपनी प्रबल भावनाओं को पहचानें। |
| आपकी स्थिति में परिवर्तन क्यों होता है? |
| कौन-सी भावनाएं आपके कार्यो को नियंत्रित करते हैं? |
| क्या आपकी जिंदगी शत्रुता, आक्रमण एवं गुरन्से के चारो ओर घूमती है? |
| क्या आप अक्सर बिना कारण के मायूस होते हैं? |
| प्यार करना या लड़ना आपके लिए आवश्यक है? |
| अपने आप से इमानदार रहें! |
| पहले अपनी भावनाओं को मान्यता दें नहीं तो आप उन्हें कैसे बदलेंगे। |
| अक्सर देखा जाता है कि जो इंसान शत्रुतापूर्ण वातावरण में रहता है वह नकारात्मक |
| भावनाओं से एक रिश्ता बना लेता है उन्हें इसकी आवश्यकता होती है यह उनके |
| लिए जीवित रहने की तकनीक है। उन्हें नकारात्मक भावनाओं से ही सारी ऊर्जा मिलती |
है।
शोध में यह साबित हो चुका है कि युद्ध के समय अपराध और आत्महत्या की दरें आश्चर्यजनक रूप से कम हो जाती है क्योंकि इस समय लोगों को अपनी नकारात्मक भावनाओं को व्यक्त करने के लिए खूला मंच मिलता है, निजी तौर पर उन्हें अपराध करने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती!
ध्यान में प्रवेश
यहां तक कि हिटलर ने भी कहा है कि यदि देश को शक्तिशाली बनाना चाहते हो तो शत्रू बनाओं! शत्रू असल में ही हो यह जरूरी नहीं वह काल्पनिक भी हो सकता है। जब तक लोग शत्रुतापूर्ण स्थिति में रहते हैं शक्तिशाली महसूस करते हैं। जब वह विद्रोह करते हैं, तो उनकी अनुभव क्षमता उन्हें शक्तिशाली बनाती है। हमारी सारी शक्ति नकारात्मकता में बंट जाती है।
जब अपने आप पर गूरसा होता है तब मायूसी होती है। जब आप भावना को व्यक्त करते हैं तब वह गुरूरे की शक्ल में दिखता है| जब उसे दबाने की कोशिश करते हैं तो वह मायूसी या उदासी का रूप ले लेता है। पर दोनों ही नकारात्मक ऊर्जा है।
हमारा अहम् शक्तिशाली बनने का अनुभव करता है, जब हमारा ध्यान नकारात्मक भावनाओं पर केन्द्रित होता है, जब हम अलग थलग रहने की प्रवृत्ति का लालन पालन करते हैं, 'मैं बनाम् वह' का अनुभव करते हैं। इसीलिए जब हम लड़ने की स्थिति में होते हैं तो ऐसी परिस्थिति का आनंद हममें से बहुत लोग उठाते हैं।
सकारात्मक, कोमल भावनाएं हमेशा ही हमें कमजोर बनाती हैं। प्यार, खुशी, करूणा दिमाग की बहत नाजुक अवरश्याएं होती हैं| जब हम इन भावनाओं का अनुभव करते हैं तब हमारे और दुनिया के बीच की दीवार कमजोर हो जाती है| अहम् कम शक्तिशाली अनुभव करने लगता है। इसीलिए हम सभी इन भावनाओं से डरते हैं। कही गहरे अचेतन
मन में हम प्यार से डरते हैं क्योंकि प्यार में अहम् का त्याग करना पड़ता है। आध्यात्म और कुछ नहीं बल्कि अपने अहम् को खोने की प्रक्रिया है। यदि आप प्यार करने से भी डरते हैं क्योंकि यह हमें कमजोर बनाता है तो आप ध्यान के अंदर कैसे प्रवेश करेंगे।
(ब) अपने सकारात्मक भावनाओं पर ध्यान केंद्रित करें
आपकी नियमित दिनचर्या कैसी है? जरा सोचें।
सारा दिन आप विभिन्न तरह की भावनाओं में डूबे रहते हैं। जब आप सो कर उठते हैं तो खुशी का अनुभव करते हैं- नहीं तो सामान्य महसूस करते हैं। तभी आपकी पत्नी आपके लिए कॉफी लेकर आती है और मेज पर रखते समय थोड़ा-सा गिरा देती है-आप तूरंत गूरसा हो जाते हैं।
अच्छा नाश्ता करने के बाद आपके मिजाज बदल जाते हैं। काम के लिए जाते वक्त भीड़ में फंस जाते हैं- और तब आप किसी को मार डालने के लिए भी तैयार हो जाते हैं। कार्यालय में कोई कार्य ठीक से नहीं हो रहा है- तो आपको फिर से तनाव का अनुभव होता है और इसी तरह से चलता रहता है।
हर पल आपको लगेगा कि आप पर भावनाओं की बरसात हो रही है। आप भावनाओं की गाड़ी पर अपनी जिंदगी जी रहे हैं। कब तक आप इसके साथ जूझेंगे?
अच्छी बात यह है कि हम हमेशा ही बुरी भावनाओं का अनुभव नहीं करते। हममें से अधिक से अधिक लोग दिन में कूछ पल शांति, खूशहाली और ध्यानशीलता का भी अनुभव करते हैं।
यह पल बहत साधारण रोजमर्रा की जिंदगी के हो सकते हैं।
बगीचे में बैठकर एक कप चाय पीना।
स्नान करते वक्त।
संगीत सुनते समय।
अपने बच्चों के साथ खेलते हुए।
हम सबके जीवन में प्रतिदिन ऐसे पल आते हैं किंतु हममें से कितने लोग इन पलों पर ध्यान केंद्रित करते हैं?
जब हमसे कोई पूछता है कि दिन कैसा रहा ? तो हमें केवल भीड़, गिरी हुई कॉफी व अधूरा कार्य ही याद रहता है।
बदलाव के लिए हर दिन के सकारात्मक अनुभवों पर ध्यान केंद्रित करें?
इस प्रयोग को करें :
चौबीस घंटे उस दिन घटी अच्छी घटनाओं को याद करें। छोटी से छोटी घटनाओं का शुक्रिया अदा करें : कि काम के लिए निकलते वक्त पानी नहीं बरसा, आपके बगीचे में गेंदे खिले हैं। धन्यवाद दें कि आपकी नौकरानी ने उस दिन छटटी नहीं कर ली। यही वह बातें हैं जिन्हें हम भूल जाते हैं! जिस दिन हमारी नौकरानी नहीं आती हम उसे नहीं भूलते लेकिन क्या हम ख्याल करते हैं जब वह आती है? क्या हम मन ही मन उसे धन्यवाद देते हैं।
मैं जब कहता हूं कि सकारात्मक घटनाओं को याद करें तो केवल २४ घटे तक ऐसा करें पूरी इमानदारी के साथ। आप देखेंगे आपकी जिंदगी बदलाव महसूस करेगी। एक बार आपको सकरात्मक अनुभवों का आनंद मिल जाता है तो फिर से अपने आप पर मायूसी छाने नहीं देंगे।
यह क्रिया केवल मौज मस्ती के लिए नहीं है। यह जीने की एक तकनीक है! यदि आप जीवन का स्वागत फूलों से करेंगे तो बदले में आपको फूल ही मिलेंगे। जब आप जीवन
पर पत्थर मारेंगे तो जीवन भी आप पर पत्थर मारेगा। बाद में आपको ध्यान की एक तकनीक बताई जाएगी जो जीवन का स्वागत कृतज्ञता के साथ करने पर केंद्रित होगा।
(स) नकारात्मक भावनाओं को बदलना सीखें
आप मझे पछ सकते हैं. सारे दिन के नकारात्मक भावनाओं के अनुभव का क्या होता है? अगर आप सकारात्मक भावनाओं पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं, नकारात्मक भावनाएं आपके तंत्र में तब भी रह जाती है! और वह हमेशा जमा होती जाती है। आपके तंत्र के पूराने गतिरोधों को आप ध्यान द्वारा मिटा सकते हैं- पर सावधान रहना होगा कि नये गतिरोध बनते न जाएं। हर पल आप नई परिस्थिति का सामना करते हैं। उदाहरण के लिए बहत लोग आपको मिलेंगे जो बार-बार गरस्सा दिलाएंगे। आप उस अतिरिक्त शक्ति का क्या करेंगे जो आपके तंत्र में घूमता रहता है।
अपनी नकारात्मक शक्तियों को सकारात्मक शक्तियों में बदलना सीखें। याद रखें शक्ति हमेशा निष्पक्ष होती है| गुरूसा न अच्छा है न बुरा| कामकता न अच्छा होता है न बूरा| यह शक्ति के रूप हैं। उसे सुजनात्मक या विध्वंसक तरीके से प्रयोग करना आप पर निर्भर है। जिस तरह से एक छूरी बच्चे के हाथ में विध्वंसक हो सकती है, किन्तू एक शल्य चिकित्सक के हाथ में जीवन दायी यंत्र हो सकता है उसी शक्ति का इस्तोमल आप दूसरी तरह के फल पाने के लिए कर सकते हैं।
यदि आप अपनी शक्तियों को सही दिशा देते हैं तो गुरूसे को सृजनात्मकता में बदल सकते हैं। सुजनात्मक तरीके से जीना सीखें। अपने ऊर्जा को कला, संगीत, खेल कूद की ओर मोडें. I
चित्रकारी
ध्यान में प्रवेश
किसी खेल कूद को शुरू करें। किसी शौक को संवारे।
नृत्य करें।
यह सभी ऊर्जा के मार्ग हैं गूरनो के तरह ही! एक ही फर्क है यह सभी सुजनात्मक मार्ग हैं। जीवन को नया रास्ता दिखायें, अपने साधारण जीवन को सुजनात्मक दिशा दें। इस तरह आपकी विध्वसंक ऊर्जा सुजनात्मक ऊर्जा में बदल जाती है सकारात्मक फल के साथ।
जब आप सकारात्मक भावनाओं पर ध्यान केंद्रित करेंगे तो पाएंगे कि जिंदगी अपने आप अच्छे के लिए बदल जाएगी यह एक बहुत ही सुंदर चक्र है। जब आप प्यार का अनुभव करेंगे, प्यार बाटेंगे तो प्यार ही पाएंगे। ऐसा सच में होता है परंतु इस पर विश्वास आपको इसका अनुभव होने पर ही होगा।
जरूरी नहीं कि जन्म से ही आपका रवैया ऐसा ही हो। ऐसा कभी न कहें, अरे वह आदमी कितना किस्मतवाला है, वह हमेशा अपने चेहरे पर हँसी लेकर घूमता है। एक मैं ही हूँ जो इतने तनाव में जी रहा हूं।
सकारात्मक रवैये को आप संवार सकते हैं। जब आपका मन खुशियों से भर जाता है तो गुरूसा आपको छू भी नहीं सकता और दुख आपसे डरने लगता है। जब आप अपने अंदर परम सुख की अवस्था को संवारते हैं तब क्या आप ध्यान में आगे बढ़ सकते हैं।
अपने जीवन को प्यार, हंसी और कृतज्ञता से बदलें। जीवन को खुशियों में बदलें। तभी जाकर जीवन ध्यान बन जाएगा।
ध्यानशील रहन-सहन की ओर
लोग मुझसे पूछते हैं, तपस (प्रायश्चित) क्या है? क्या तपस ध्यान में आवश्यक है। मैं आपको जो बता रहा हूँ वह तपस्ननहीं तो और क्या है! शरीर, चिंतन, भावना के साथ क्रिया-तपस नहीं तो क्या है?
तयस का मतलब यह नहीं है कि आप पहाड़ों पर जाएं और सभी तरह के आध्यात्मिक तरीकों को अपनाएँ एवं सभी प्रकार के रीति-रिवाजों को निभाएं।
तपस का मतलब यह नहीं है कि आप भोजन और वस्त्र के बिना रहें. या किसी अंधेरी गफ्त में रहें, अथवा अपने शरीर को किसी भी तरह का कष्ट दें। अगर आप अपने शरीर को किसी भी तरह से वंचित रखेंगे, तो आपका मन उसी में लगा रहेगा ध्यान में नहीं अगर मैं आपको २४ घंटे भी भोजन से दूर रहने पर मजबूर करूँ आप शायद भोजन नहीं करेंगे बदले में आप भोजन का ध्यान करना शुरू कर देंगे। आप भोजन के अलावा कूछ भी सोचने के लायक नहीं रहेंगे। असल उपवास ऐसा नहीं होता है कि जो भोजन आपने किया ही नहीं उसका ध्यान करें, इसका मतलब होता है भोजन को पूरी तरह से भूल जाना। इस अंतर को सभी लोग नहीं समझ सकते। इसीलिए अपने को वंचित रखने का मार्ग सबके बस का नहीं है।
यह सभी शरीर को इस्तेमाल करने के अलग-अलग मार्ग हैं। कुछध्यानी शरीर को नियंत्रित करने के लिए तप मार्ग अपनाते हैं, परंतू जरूरी नहीं कि हर कोई इसी मार्ग का अनुसरण करे। एक छोटी-सी कहानी :
पहाडों पर एक योगी ने कई साल तप के त्रृटि रहित नियमों का निर्वाह करने में बिताया। जटिल रीति-रिवाज और मंत्रों में वह माहिर हो गया। कई पवित्र ग्रंथ पढ़े और अनगिनत घंटे गहन विचार में बिताये। पंद्रह साल बाद जब योगी को लगा कि उसकी तयस्त्रपूरी हो गयी है, वह मैदानों में उतर आया। जीवन में आध्यात्म की आवश्यकता पर योगी दूसरे लोगों को पढ़ाना चाहता था। वह एक छोटे से नगर में पहुंचा। उसके पहुंचने की खबर आग की तरह पूरे नगर में फैल गई। उसे एक आध्यात्मिक सभा में जाने का न्योता मिला। दूसरे मेहमानों में एक आधुनिक युवा गुरू भी था जो पारम्परिक तपस्रके नियमों में विश्वास नहीं रखता था। जैसे ही योगी ने कक्ष में प्रवेश किया युवा गूरू योगी की ओर मूड़ा और अप्रिय शब्द कहे। युवा गुरू की बातों से योगी बहुत आश्चर्यचकित हुआ जब उसने अपने अंदर गूरने की एक लहर को बढ़ता हुआ पाया। इतने सालों की इतनी मेहनत के बाद भी एक अजनबी की कुछ बातों से उसके अंदर गुरन्सा फिर से सर उठाने लगा।
बिना कोई उत्तर दिये ही योगी मूड़ा और चुपचाप कक्ष से बाहर जाने लगा। एक व्यक्ति दौड़ता हुआ आया और माफी मांगने लगा। योगी से वापस जाने के लिए कहने लगा। योगी ने शांत भाव से कहा, मेरा तपस पूरा नहीं हुआ है! मैं अभी भी सीख रहा हूं। मुझे अपना कार्य शुरू करने के लिए अब जाना चाहिए। मैं पूरी तरह से तैयार होकर लौटूंगा।
सबसे कठिन तपस है अपने आप पर क्रिया करना, अपने को समझना व बदलना।
अपने शरीर, चिंतन और भावनाओं को स्वच्छ रखने से बड़ा तपस नहीं है। यह तपस्रआप कहीं पर भी कभी भी कर सकते हैं। यह तो हुई ध्यान की सही नींव डालने के लिए जमीन की तैयारी।
जागरूकता ही कुंजी है
मैंने कहा है, शरीर को देखें, चिंतन को देखें, भावनाओं को देखें। दूसरे शब्दों में जागरूक बनें।
ध्यान की बुनियाद, केन्द्र और लक्ष्य जागरूकता है।
जागरूकता आपका संकेत शब्द है।
अधिक जागरूक बनने पर ही केन्द्र बिंद्र होना चाहिए न कि कौन-सी तकनीक है, कौन-सा धर्म या कौन-सा आध्यात्मिक अनुशासन। यही वह सूत्र है जो पूरे किताब की हर तकनीक में मिलेगी।
जब आप किसी चीज को देखते हैं तो साक्षी बन जाते हैं, बाहरवाले बन जाते हैं। आप जिस चीज को देख रहे हैं उस चीज के साथ अपनी पहचान को छोड़ देते हैं। धीरे-धीरे आप देखते हैं कि वह आपसे अलग कोई चीज है।
अपने शरीर, दिमाग व चेतना के प्रति जागरूक बनकर आप उनसे मुक्त हो सकते हैं। अपने बुद्धिमता को जगाएं, अपनी चेतना को जगाएं। अपने शरीर की क्रिया को ऐसे देखें जैसे कि आप बाहरवाले हैं और आप अपने शरीर पर ध्यान न दें। अपने निरर्थक भागते हुए विचारों को देखें आप उसके साथ अपनी पहचान को त्याग देंगे। अपने चंचल और बदलते हुए भावनाओं को देखें और यह समझते देर नहीं लगेगी कि आप और आपकी भावनाएं अलग-अलग हैं।
गहरी जागरूकता से ही आप स्वतन्त्र हो सकते हैं।
जीवन में ध्यान' से 'ध्यान में जीवन
अभी आप शुरूआती स्तर पर ही हैं ध्यान की खोज कर रहे हैं।
तभी आप पछते हैं. मैं ध्यान को अपनी जीवन शैली में कैसे शामिल करूं 7 कितने घटे अभ्यास करूं? कौन-सी तकनीक मेरे लिए सही है?
Part 2: Meditation Is for You_Hindi_part_2.md
इस स्तर पर यह सवाल बिल्कुल सही है।
प्रारंभ में आप जीवन में ध्यानका अभ्यास करेंगे। बहत सावधानी पूर्वक अपनी जीवन शैली में ध्यान को शामिल करना होगा। एक तकनीक को चुनकर प्रति दिन आधे घंटे या एक घंटे तक उसका अभ्यास करें। इस तकनीक को अपनाकर यदि आपको अच्छा अनुभव होता है तो बिना फल की आशा किए दस दिन तक इसे करें। यदि कोई तकनीक आपको छू जाती है तो किसी न किसी तरह आप बदलेंगे जरूर। कभी-कभी बदलाव बहुत सूक्ष्म होता है, और कभी कभी उसे अपने से ज्यादा दूसरे देख सकते हैं।
लोग मेरे पास आते हैं और कहते हैं स्वामीजी जबसे मैंनें ध्यान का अभ्यास करना शरू किया लोग कहते हैं कि मेरे चेहरे पर एक चमक है, मैं पहले से ज्यादा ऊर्जावान और सकारात्मक हो गया हँ।
किसी न किसी स्तर पर बदलाव होना तय है। धैर्य से चमत्कार होते हैं इसीलिए अगर आपको फल नहीं मिल रहा है तो अधैर्य न हों।
जब आप कुछ तकनीकों का पता लगा लेंगे जिनके साथ आप सहजता का अनुभव करते हैं तब उसके साथ अभ्यास करने का आपका नियम बन जाएगा। धीरे-धीरे नई तकनीकों के पीछे भागना आप बंद कर देंगे। अभी यह तकनीकें आपके लिए नई और उत्तेजना से भरपूर है, आपका दिमाग कभी यह इस्तेमाल करने के लिए कहेगा तो कभी वह। यह तो एक मिठाई के द्रकान में जाने जैसी बात है- जहां इतने प्रकार होते है कि आप यह तय ही नहीं कर पाते कि कौन सी मिठाई खाएंगे।
दिमाग आपसे जो भी कोशिश करने के लिए कहे करें। अपने आपको रोकें नहीं। जो भी आप करें पूरी ईमानदारी के साथ करें। अपनी पूरी ऊर्जा व प्रेरणा इस अभ्यास में डालें।
हर तकनीक का प्रयोग ऐसे करें जैसे कि वही आपके पास उपलब्ध एकमात्र तकनीक है। जिददी और अधैर्य न हों अन्यथा आप ध्यान की आत्मा का अनुभव कभी नहीं कर पाएंगे, ध्यान का विचार लेकर घूमते ही रह जाएंगे।
एक अनुभव ही काफी है।
ध्यान के मोह में पड़ने के लिए, ध्यान के आनंद की एक झलक ही काफी है।
तब आप मुझसे नहीं पूछेंगे कि कितने घंटे अभ्यास करना आवश्यक है। जब आप सूबह सोकर उठेंगे तो आपका पहला विचार ध्यान का होगा। स्नान करते वक्त, कपड़े बदलते वक्त, खाना खाते समय, सभी काम इतना ध्यानपूर्वक करेंगे कि हर पल ध्यान के साथ जीवित हो उठेगा। ध्यानशीलता आपके जीवन की स्वाभाविक अवस्था बन जाएगी। आप ध्यान में जीवन जीना प्रारंभ करेंगे।
मैं चाहता हूं कि आप अंत तक इस अवस्था को हासिल कर लें।
परंतु यह आसान नहीं है। प्रथमतः आप ध्यान के विचार के आदी हों। आपको हर रोज थोड़ी देर के लिए अभ्यास करना पडेगा, फिर उस अनुभव को पूरे दिन में फैलाएं।
इस किताब में आपको दोनों तरह के ध्यान की तकनीकों का संग्रह मिलेगा।
बैठने की तकनीकें तय कर लें कि इसका अभ्यास आप प्रतिदिन नियमित समय पर कितनी बार करेंगे।
कभी भी कहीं भी तकनीक, जिसका अभ्यास आप जैसे भी हो कर सकते हैं कभी भी कहीं भी तकनीकों का अभ्यास आप गाड़ी चलाते समय, कपडे.प्रेस करते समय, सोने के कमरे से रसोई तक जाते हुए भी कर सकते हैं।
यदि आप चाहें तो एक दो बैठने की तकनीकें और कभी भी कहीं भी तकनीक का चुनाव प्रति दस दिन के लिए कर सकते हैं। एक साथ कई तकनीकों का अभ्यास न करें आप किसी के साथ भी न्याय नहीं कर पाएंगे। सारे जीवन को ध्यान में बदलने का पहला कदम है कभी भी कहीं भी तकनीक।
सावधानी के दो शब्द
ध्यान एक स्वच्छता प्रणाली है। ऐसी घटनाएं घटेंगी जिसकी आपने आशा भी न की हो। जब आप प्रारंभ में ध्यान का अभ्यास करेंगे तो आपके शरीर व मानसिक स्थिति में असाधारण बदलाव होंगे। जीवन भर के दबावों और गतिरोधों को आप बाहर फेकेंगे, आप शरीर को ऐसी ऊर्जा से भर देंगे जिसकी उसे आदत ही नहीं। आप कूदेंगे, चीखेंगे, तेजी से चक्कर लगाएंगे ऐसी चीजें करेंगे जो आपने बहुत दिनों तक न की हो। किसी समस्या को हल करने के लिए आपके तंत्र को थोड़ा वक्त चाहिए।
शुरू में आपके शरीर में बहुत अधिक ऊर्जा का अनुभव होगा-सरदर्द, उंगलियों एवं पैर के पंजों में सनसनाहट अथवा झुनझुनाहट। यह सब कुछ अचानक ही अधिक ऊर्जा के आ जाने से होता है। किसी-किसी को दर्द, अनिद्रा, यहां तक की तनाव भी हो सकता है। परंतु यह सारी चीजें अस्थायी हैं। ध्यान करते रहो यह सब कुछ चला जाएगा।
यदि आपको कोई गंभीर रोग होता है, या कोई तकनीक आपको बहुत दिनों से तकलीफ दे रही है. तो अपने चिकित्सक से संपर्क करें या उस तकनीक को छोड़ दें।
पर इन सब परेशानियों से घबराकर किसी तकनीक का प्रयोग करना बंद न करें।
आगे बढ़ते जाएं और अपने आपको ध्यान में मिला दें। आप देखेंगे कि आपकी आंखों के आगे ही जिदंगी कैसे बदल जाती है।
बदलाव जिन्हें आप देखेंगे
ध्यान के साथ और किसका ख्याल रखेंगे?
जब प्रथम शारीरिक लक्षण शांत हो जाए तो आप स्वयं ही गहरे और अधिक दिनों तक चलने वाले बदलावों को देख सकेंगे। यह रसायनिक बदलाव अपरिवर्तनीय है। एक बार आप ध्यान के केन्द्र को छू लें, तो आपकी जिंदगी पहले जैसी कभी नहीं हो सकेगी। आप कैसे समझ पाएंगे कि आपने वारनव में ध्यान को स्पर्श किया है? अपने अंदर इन बदलावों को खोजें।
सिर्फ मुक्ति
मुक्ति का आभारत एक महत्वपूर्ण बदलाव है, जिसका अनुभव आप करेंगे।
मुक्ति क्यों? यहां मुक्ति का क्या काम?
क्या पता हम समझते हैं या नहीं, लेकिन पूरे जीवन काल में हममें से हर कोई मुक्ति की ही खोज करता है।
ध्यान मुक्ति की प्रबल खोज नहीं तो और क्या है? हमने सुन रखा है कि ध्यान से मुक्ति मिलती है, और मूक्ति पाने के लिए ही हम ध्यान की ओर मूड़ जाते हैं।
हम 'मूक्ति' शब्द का गलत मतलब निकालते हैं अपने दैनिक जीवन में खोज करते हैं 'मूक्ति के लिए' अथवा 'मुक्ति से'।
मुक्ति के लिए अपनी हर उस इच्छा को पूरा करना जिसे कभी हम करना या पाना चाहते थे। स्वतन्त्रता के साथ जीना जैसा हम सही समझते हैं।
मुक्ति स्मेहर उस चीज, रोग, चिंता, गुरन्सा, तनाव, दर्द इत्यादि से डर एवं घूणा ।
हमारे सभी कामों में इन दो में से हमें कोई न कोई अवश्य प्रेरित करता है। कुछ अच्छा पाने का लोभ या कुछ बुरा होने का डर।
हमारा संपूर्ण जीवन लालच या डर के डोर से नियंत्रित होता है। परंतु यदि आप इन्हीं दो डोर से नियंत्रित होंगे तो उस मूक्ति का क्या होगा जिसकी प्रबल इच्छा आप में थी।
कुछ हफ्ते पहले मेरा एक कलाकार भक्त मुझसे बात कर रहा था। वह मुझे बता रहा था कि उसे ध्यान से नफरत क्यों है।
स्वामी जी मैं नियम और अनुशासन से नफरत करता हूं। मैं चाहता हूं कि जिस तरह से चाहूं उसी तरह से जिंदगी बिताने के लिए स्वतन्त्र रहूं। मैं सुबह दस बजे सोकर उठता हूं, सबसे पहले कॉफी पीता हूं, उसके बाद जब मेरा मन होता है तैरता हूं। उसने अपनी पूरी दिनचर्या मुझे बताई।
तब मैंने उससे पूछा, कोई अगर तुम्हें सुबह छः बजे ही नींद से उठा दे? या एक स्नुबह अगर तुम्हारी कॉफी बिस्तर पर न आए तो ?
में सच में पागल हो जाऊंगाउसने हंसते हुए कहा। बारिश की वजह से तुम तैरने न जा सको तो? मैंने पूछा, यह सच में कष्टदायक होगा। यदि मैं तैरने नहीं जाता हूं तो मेरा सारा दिन बहुत बुरा बीतता है।
तब मैंने उससे पूछा
अगर तुम्हारी आजादी इतने सारे परिस्थितियों पर निर्भर है तो क्या तुम सच में आजाद हो? सच में आजाद होना किसी भी चीज पर निर्भर नहीं करता।
इसी को मैं 'सिर्फ मुक्ति'कहता हूं।'मुक्ति के लिए'या 'मुक्ति सें'नहीं।
पूरी तरह से वर्तमान पल में जीने से ही सिर्फ मुक्ति होती है। इस मुक्ति का अनुभव आपको तब होगा जब आप लालच या डर से नहीं बंधे होंगे, भविष्य की उम्मीद से या पूर्व की घटनाओं के प्रायश्चित से। मुक्ति जो किसी बाहरी परिस्थिति पर निर्मर नहीं करती है वही सही मायने में मुक्ति है। ध्यान से आपको इसी मुक्ति का अनुभव होगा।
बिना किसी कारण के स्रेह
ध्यान से आप एक अजीब अवस्था का अनुभव करना प्रारंभ करेंगे वह है स्नेह या प्रेम।
लोग हर तरह के चमत्कार के लिए तैयार रहते हैं, काल्पनिक दृष्टि के सच होने का, अपने पसंदीदा भगवान के दर्शनका इत्यादि परन्तु वही लोग प्रेम के चमत्कार के लिए तैयार कम ही होते हैं।
आप यह जानकर आश्चर्यचकित होंगे कि ध्यान में प्रवेश करने के बाद किस तरह आपके भीतर प्रेम का ज्वार उठता है और फैल जाता है। ध्यान के द्वारा आप कुछ जागरूकता का अनुभव करेंगे, अपने भीतर का वह स्तर जिसे आपने अभी तक नहीं छुआ। आप अपनी खुशी
हर किसी के साथ बांटना चाहेंगे! प्रेम के रूप में यही खूशी आपमें से बाहर आएगी।
मुक्ति की ही तरह यह प्रेम पहले अनुभव किए गये किसी भी तरह के प्रेम से अलग होगा। अपने पूरे जीवनकाल में हम स्वार्थपरता से भरपूर प्रेम लेते व देते आए हैं। जानते हुए या अनजाने ही हम किसी कारण के लिए ही प्रेम करते हैं। बहुत ही घनिष्ठ संबंध में, पति-पत्नी या अभिभावक-संतान के बीच के प्रेम में भी छूपे कारण होते हैं। प्रेम ईर्ष्या व एकाधिकार की इच्छा रखने के कारण नष्ट हो जाता है।
जब आप ध्यान करेंगे तो आप समझेंगे कि बिना किसी कारण के प्रेम क्या होता है। पहली बार आप कुछ पाने के लिए नही देंगे। आप प्रेम बाटेंगे क्योंकि आपके पास बहत है। जिस तरह बादल धरती पर पानी बरसाता है, ठीक उसी तरह पुथ्वी पर आप प्रेम बरसाइये या फूल जिस तरह से अपनी सुगंध चारों ओर बिखेरती है।
आप प्रेम करेंगे क्योंकि उसे रोक नहीं सकते!
असीमित खुशी
ध्यान करने से जीवन वह खुशी बन जाता है जिसका कोई कारण न हो।
जब खुशी किसी कारण की वजह से आती है, तो दर्द भी साथ लाती है, जल्दी हो या देर से हो।
यदि आप इसलिए खुश हैं क्योंकि आपने अच्छा भोजन किया है तो जैसे ही फिर से भूख लगेगी आपका जीवन दुखों से भर जाएगा। यदि आप इसलिए खुश हैं क्योंकि आपको प्यार हआ है तो पहला झगड़ा होते ही आप दूखी हो जाएंगे। यह सभी के साथ होता है यह न सोचें कि आपके साथ नहीं होगा यह जीवन का नियम है।
जैसे ही खुशी का अंत होता है उसकी जगह दर्द ले लेता है। इसीलिए प्राचीन भारत में दर्द और खुशी दोनों को जताने के लिए केवल दर्दशब्द का प्रयोग किया जाता था।
ध्यान के द्वारा अनुभव हई खूशी बाधा रहित होती है| आप स्वस्थ हों या बीमार हों आपकी खुशी एक जैसी ही होगी। ठंड हो चाहे गर्मी, बारिश हो या बर्फ गिरे खूशी वैसी ही रहती है। आपकी अपनी अवस्था या बाहरी परिस्थितियों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जब आप गहराई से भीतर की ओर जाते हैं तब आपकी अनुभव की हुई स्थाई खुशी को बाहरी परिस्थितियां बदल नहीं सकेंगी।
ज्ञान की जागुति
जीवन हर समय बदल रहा है। पल पल जीवन के प्रतिक्रिया करने की क्षमता को ही ज्ञान कहते हैं, उन चुनौतियों के प्रति सक्रिय होना जिन्हें जीवन हमारे सामने लाता है। ज्ञान को परिस्थितियों के प्रति जागरूक होना चाहिए, हर पल की मांग के अनुसार जवाबों को बदलना चाहिए। जब आप अपने ऊपर भरोसा नहीं रख पाते तो समाज, कानून और धर्म द्वारा बनाए गये नियमों पर निर्भर करना पड़ता है। ब्रुद्धिमान व्यक्ति स्थापित नियमों के बिना ही जीता है। वह अपने आप पर निर्भर करता है, अपनी अन्तर्रात्मा के मार्गदर्शन पर करता है, किसी और पर नहीं। ज्ञान आपकी जिम्मेदारी आप पर छोडता है। हम सभी जन्म के समय बुद्धिमान ही होते हैं परन्तु समाज हमसे भी चतुर होता है। बचपन से ही जब हम विकसित नहीं होते हैं समाज अपने नियम बनाकर हमारे ज्ञान के चारों ओर एक दीवार बनाकर उसे बांध देता है। वह हमारी शक्ति को स्वाभाविक रूप में बहने से रोकता है। अंतिम ज्ञान इन बंधनों को तोडने की क्षमता ही है।
ज्ञान को जगाने का निश्चित मार्ग है ध्यान, क्योंकि जो बंधन आपको बांधता है वह आपके मस्तिष्क में है।
ध्यान आपको चेतना से परे ले जाता है अन्तर्तात्मा में। वहां पर कोई नियम नहीं होता। अपने संपूर्ण क्षमता की खोज करने के लिए आप आजाद हैं। ध्यान के द्वारा अचानक ही आप अपने आस-पास की परिस्थिति के साथ बहुत सहज रह सकेंगे। आप आसानी के साथ नई परिस्थितियों का सामना कर सकेंगे। स्वाभाविकता की पुन: खोज करेंगे।
अन्तर्द्रीष्टि का खिलना
अन्तर्द्रष्टि, उस अर्थ में नहीं जिसमें हम साधारणतया इसका प्रयोग करते हैं। आपमें से कुछ लोग गहरी शारीरिक संवेदना का विकास करेंगे, कल्पना दृष्टि पाएंगे इत्यादि परंतु यह आवश्यक नहीं। यह तो विकास की विधि का सहायक उत्पादन है। सही अन्तर्द्रष्टि स्पष्टता के साथ अपने आपको समझना व आवश्यकताएं पूरा करना है।
हम अपनी पूरी जिंदगी में कितनी सारी भूमिकाएं निभाते हैं। हर भूमिका, हर मौके के लिए हमारे पास अलग-अलग चेहरे हैं। माता-पिता, पति-पत्नी, डाक्टर, गुहिणी, मालिक .................. यह सूची तो अंतहीन है। हम अपने पूरे जीवनकाल में कितने सारे चेहरे लगाकर घुमते हैं। समाज हम पर जिस तरह की भूमिकाएं थोपता है हम उसी से सोचते व जीते हैं। यही भूमिकाएं अन्त में हमारा व्यक्तित्व बन जाती हैं।ध्यान से हम अंतर की ओर जाते हैं। हम अपने अस्तित्व के बाहर जीते हैं। हम समग्र बनते हैं। हम व्यक्तित्व की ओर मूड़ते हैं।
व्यक्ति की निजी विशेषता बदल सकती है पर व्यक्तित्व नहीं। हर एक व्यक्ति अपने ढंग का अनोखा होता है। ध्यान के द्वारा आप अपने व्यक्तित्व को स्पर्श करते हैं। आप उसी दिशा में जाना शुरू करते हैं जहां अंत तक आप स्वयं को व्यक्त करते हैं, आवश्यकताओं को व्यक्त करते हैं। यही अन्तर्द्रष्टि है।
आपके मार्ग में कांटें
ध्यान के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है अहम्। कोई भी मुश्किल आपके सामने आए, आप जान लें कि यह अहम्म के ही विविध प्रकार हैं।
अहम क्या है
अहम और कुछ नहीं अपने आपके बारे में अपना विचार है। अहम् विचारों का संग्रह है एक काल्पनिक वस्तू। अहम् का वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं होता है। फिर भी यह अहम ही आपकी जिंदगी को नियंत्रित करता है।
यह अहम ही तो है जो अलगाववाद को जन्म देता है।
जन्म के समय अहम् आपको आपकी मां से अलग करता है। जन्म के समय जैसे ही नाभि नाल कटता है और बच्चा मां से अलग होता है, ठीक उसी क्षण पहली बार बच्चे को अपनी सीमा का अहसास होता है। जन्म से पहले कोई अहम नहीं होता है कोई सीमा नहीं होती। बच्चा तो अपनी मां का ही अंश होता है। जन्म के बाद पहले साल में ही अहम् आपकी और दनिया की छवि बना देता है। अहम ही आपमें 'मैं' और 'मेरा' की धारणा को पक्का करता है। अहम् आपको सबसे दूर ले जाती है। माता-पिता, दोस्त, अजनबी, प्रकृति, पूरे अस्तित्व से ही द्र ले जाता है। जीवन भर अहम् आपको 'मैं बनाम् वह' की स्थिति में डाले रखती है।
जब भी आप 'मैं' शब्द का उच्चारण करते हैं अस्तित्व से नाता तोड़ देते हैं। आप अस्तित्व का एक स्वाभाविक अंश हैं इसीलिए वास्तव में उससे नाता नहीं तोड़ सकते, लेकिन दिमागी तौर पर अवश्य अलग हो जाते हैं। आप अपनी एक दुनिया बनाते हैं जिसमें आप सबसे दूर रहते हैं। यह केवल एक मानसिक धारणा है जिसे हम अनुमति देते हैं, अपने सभी कार्यो पर राज करने की।
आपने लोगों को अवश्य ही कहते सुना है कि अहम् दुखों की जड़ है।
क्यों ?
जहां पर विरोध, होता है वहीं पर अहम् पनपता है अहम् के जीवित रहने के लिए वही वातावरण सही है जहां अलगाव की धारणा पनपती है।
अहम् आपकी अपनी कल्पना की उपज हो सकती है परतू वह है बड़ा ही धूर्त जीव ।
जीवित रहने के लिए अहम् वास्तविकता का विकृत रूप पेश करता है जिसमें हर चीज असमंजस की स्थिति में होता है। अपने जीवन की ओर देखें।
जब भी आपका किसी से अलगाव होता है, या अकेलापन अथवा ठगा हुआ महसूस करते हैं तो आपको अवश्य ही दर्द, गुरन्सा, ईर्ष्या का अनुभव होता होगा। दुख के समय आप अपने को अकेला पाते हैं और खुशी के समय अपने को सबसे घिरा पाते हैं। जब आप प्रसन्न, खुश और हंसते हुए होते हैं तब आपका अहम् सबसे कमजोर होता है।
वर्तमान जीवन में आपको इन क्षणों का अनुभव कभी-कभी होता है। ध्यान आपको स्थाई रूप से परम सुख की अवस्था में ले जाएगा।ध्यान द्वारा आप संपूर्ण अस्तित्व के साथ सुर में बंध जाएंगे। ध्यान में अलगाववाद, अहम् के लिए कोई जगह नहीं है।
एक बार आप सबमें स्थाई सामंजस्य का अनुभव कर लेंगे, एक बार संपूर्ण अस्तित्व में मौजूद गहरे अन्त:संबंध का पता चल जाता है तो अहम् को बनाए रखने की क्या आवश्यकता? अहम् दुनिया के खिलाफ़ आपका कवच है| युद्ध के समय अहम् आपकी ढ़ाल है| यदि सब कुछ शांतिपूर्ण है, सद्भावपूर्ण है तो कवच और ढ़ाल की क्या जरूरत।
इसीलिए ध्यान लगाते वक्त यह प्रक्रिया आपको इतना कठिन लगता है। ध्यान लगाना इतना आसान है। केवल शांत होकर बैठें व अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करें। ध्यान सीखने या सीखाने की चीज नहीं है। यह तो बस हो जाता है।
परंत् कूछ देर शांत बैठने के लिए भी वास्तविकता की एक झलक पाना जरूरी है। कुछ पलों के लिए भी यदि आप बैठ सकते हैं, दौड़ते हुए विचारों को शांत कर सकते हैं तो सच्चाई को समझने के लिए यह काफी है। एक बार सच्चाई जान जाएंगे तो अहम् की जगह कहां है। अहम अपने आप ही आपसे छूट जाएगा।
इसीलिए ध्यान और अहम् की लड़ाई इतनी जबरदस्त है| ध्यान से अहम् की मृत्यु हो जाती है।
सबसे बडी समस्या है अहम की शक्तिशाली प्रतिरोधक क्षमता पर नजर रखना। जब आप ध्यान लगाते हैं तो अहम हजारों सवाल करता है।
अहम् का सबसे घातक हथियार शक है।
अहम् आपके दिमाग में क्रमश: शक और सवाल पैदा करता है।
प्रारंभ में आप चिंता करेंगे,
क्या मैं सच में ध्यान कर सकुंगा? क्या मैं कमर दर्द के साथ इतने घंटे बैठ सकंगा? क्या यह मार्ग मेरे लिए है? क्या होगा अगर मैं गहराई से जूड़ जाऊं? मेरे परिवार का क्या होगा? मेरे दोस्तों मुझे सनकी तो नहीं कहेंगे? क्या मैं वाकई में सनकी हूं?
अगर आप किसी गुरू के साथ काम कर रहे हों, तो गुरू के खिलाफ आपके मन में शक पैदा करेंगे!
क्या गुरू सही है?
क्या वह जानते हैं मेरे लिए कौन-सी तकनीक सही है?
मूझे ध्यान सिखाने में उनका क्या उद्ददेश्य है?
क्या यह किसी प्रकार का मोह है?
तो अगर इस तरह के प्रश्न उठते हैं तो चिंता न करें।
इन प्रश्नों को छोड़ दें और ध्यान करते रहें। इन प्रश्नों के कारण अपने आपको दोषी न समझें! यह प्रश्न सभी के दिमाग में उठते हैं।
इन प्रश्नों से संघर्ष करने का प्रयास न करें। अहम् से लड़ने की गलती कभी मत करें। क्योंकि अहम एक काल्पनिक धारणा है। इसका कोई सकारात्मक अस्तित्व नहीं है। अहम् और कुछ नहीं जागरूकता की कमी है। जिस तरह अंधकार रोशनी न होने की अवस्था है, उसी तरह अहम् जागरूकता न होने की अवरन्था है।
अगर आप एक अंधेरे कमरे में हैं तो क्या आप अंधकार से लड़ पाएंगे, उसे दूर करके कमरे को उज्ज्वल कर पाएंगे? अंधेरे के खिलाफ संघर्ष करने का क्या मतलब? आप अंधकार का कोई हल नहीं निकाल पाएंगे। अंधकार की उपेक्षा करें और एक दीया जला लें। इस तरह अपनी शक्ति अहम से लडने में बरबाद न करें।
ध्यान में जागरूकता लाने पर केंद्रित हों। धीरे-धीरे सारे सवाल अपने आप ही पीछे छूट जाएंगे।
दिमाग का सबसे बड़ा प्रवक्ता है अहम।
शरीर की तरह ही दिमाग भी आपके हाथ का एक यंत्र है।
दिमाग एक चमत्कारी यंत्र है, बहुत शक्तिशाली।
यह सृजन का चमत्कार है। यह नमूने की श्रेष्ठाकृति है। दिमाग एक सामाजिक आवश्यकता है- इसके बिना हम इस दुनिया में नहीं जी पाएंगे।
हम भूल जाते है कि दिमाग एक यंत्र है- हम स्वयं ही दिमाग का यंत्र बन जाते हैं और पूरी तरह से उसके द्वारा नियंत्रित होते हैं।
वास्तविकता से अलग करने के लिए दिमाग एक बहुत बड़ा खेल खेलता है, भाषा के प्रयोग का।
शब्द ही हमें वास्तविकता से अलग करते हैं। हम जिस क्षण किसी चीज को सीखते हैं उसे याद करने की कोशिश करते हैं। जब आप किसी फूल को देखते हैं तो अपने आप से कहते हैं यह एक फूल है/वार-तविकता से दूर अव्यावहारिक धारणाओं से हम जिंदगी भर शब्दों को आत्मसात करते हैं। परतशब्द अनुभव नहीं होते ।
फूलशब्द फूल नहीं है, प्रेम शब्द प्रेम नहीं है, आलोकितशब्द आलोकित नहीं है। शब्द आपके और वास्तविकता के बीच अवरोध पैदा करता है।
ध्यान को शब्दों की कोई आवश्यकता नहीं। ध्यान वास्तविकता का सीधा अनुभव है।
दिमाग इस तरह की व्यर्थ की बातों को लगातार करता रहता है। दिमाग आपको एक पल के लिए भी आराम करने नहीं देता । यह हमेशा ही आपके विचार, धारणा, राय बनाता रहता है और वास्तविकता को बिगाडने के लिए शब्द का प्रयोग करता है।
आप दिमाग का इस्तेमाल कैसे करते हैं?
जैसा कि मैंने अहम के लिए कहा था, दिमाग से भी मत लडिये। दिमाग के साथ संघर्ष करके आपको कुछ नहीं मिलेगा। वास्तव में आप संघर्ष भी नहीं कर सकते क्योंकि संघर्ष करना भी दिमाग का ही कार्य है। यह तो दिमाग के एक भाग का दूसरे भाग से संघर्ष करना होगा। इसके बदले में दिमाग के कार्यों का साक्षी बनें।
यह आसान नहीं होता है। विशेषकर इस मार्ग में, दिमाग बहुत खतरनाक साथी है। शुरू में वह आपके दिमाग में सभी तरह के डर और शक पैदा करेगा। जब आप विचारों का साक्षी बनने का प्रयास करेंगे तब आपको समझा देगा कि आप सच में साक्षी हैं। परंत्र यदि आपका दिमाग आपको ऐसा बताता है तो इसका मतलब है कि दिमाग काम कर रहा है। अगर आप
वास्तव में साक्षी बने हैं तो कोई मत, राय, यहां तक की धारणा भी नहीं होगी।
यह विचार है। मैं इनका गवाह बना हूं।
पर एक बात स्पष्ट रूप से समझ लें दिमाग आपका शत्र नहीं है। सोचने में कोई खराबी नहीं है। यह किसी दूसरे चीज की तरह एक प्रक्रिया है। अपने आपको कभी लड़ने की स्थिति में न डालें। केवल दिमाग का अनुसरण करें, विचारों का अनुसरण करें। दिमाग के इस खेल का आनन्द लें।
जब आप अपने विचारों को देखना प्रारंभ करेंगे तो उनका बहाव धीरे धीरे कम होता जाएगा।
जैसे-जैसे आपकी जागरूकता गहरी होती जाती है, आप बहाव में पैदा हुए अंतरालों के बारे में महसूस करते हैं। एक अंतराल का अनुभव आपको क्षणिक तेज प्रकाश जैसा होता है। आपको एक झलक दिखती है और वह गायब हो जाती है। अंतराल जिसमें आप शांति का अनुभव करते हैं। धीरे-धीरे अंतरालें जल्द पैदा होने लगेंगी। इन अनुभवों से लगाव न होने दें। अंतरालों का इंतजार न करें। जब अंतरालें देर से आने ल्गें, तब आप प्रबल स्पष्टता के साथ केवल बाहरी दुनिया को ही नहीं बल्कि अंदरूनी दुनिया को भी देख सकेंगे।
यह शून्य का अनुभव है।
यह न सोचें कि यह आपके लिए बहुत मुश्किल है यह अवश्य होगा जब आप इसका अभ्यास ईमानदारी से करेंगे, पूर्णता के साथ।
ध्यान का आनंद कैसे ल्ठें
समय बनाएं
प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा समय ध्यान के लिए निर्धारित करके रखें। यदि आपने कभी भी कहीं भी ध्यान का अभ्यास करने की योजना बनाई है फिर भी प्रतिदिन आधा घंटा समय 'बैठकर' ध्यान के लिए रखें। शुरू में आवश्यकतानुसार आप ध्यान के अनुशासन कोसुधारेंगे। आवश्यक है कि आप सचेत होकर अभ्यास करें उस वातावरण में जो ध्यान के लिए बनाया गया हो।
स्नुनिश्चित कर लें कि इस समय के दौरान कोई आपको परेशान न करे। कोई भी काम-काज स्वीकार न करें। अपने परिवार और दोस्तों को जानने दें कि इस समय आपके लिए जरूरी है अकेला रहना। अच्छा हो आप प्रतिदिन एक ही समय नियत कर लें। शरीर और दिमाग रोज के नियमों का अभ्यस्त होता है। आप अगर एक ही समय पर हर दिन अभ्यास करेंगे तो उस समय आसानी के साथ ध्यान की अवस्था में आ जाएंगे।
जगह बनाएं
ध्यान के लिए एक साफ, शांत जगह को चुनें जो टूटी-फूटी न हो। अगर संभव हो तो घर के किसी कमरे को ध्यान का कमरा बना दें। अगर आपके घर में पृजा कमरा है तो वह आदर्श होगा। जिस जगह का प्रयोग पहले से ही पूजा या तपस्या के लिए किया जाता हो उसका शक्ति स्तर ऊंचा होगा और वह आपको ध्यान में मदद करेगा। अच्छा होगा कि आप प्रतिदिन एक ही जगह पर ध्यान लगाएं। यदि वह जगह घर के अंदर है तो निश्चित कर लें कि पर्याप्त सूर्य की रोशनी आए और हवादार हो। अगर जगह घर के बाहर है जैसे बाग में तो सुनिश्चित कर लें कि वह जगह एकांत में हो जहां बगीचे का शोर न पहुंचे।
आरामदायक महसूस करें
जब तक आप भौतिक दुष्टि से आरामदायक नहीं होगें तब तक आप ध्यान नहीं लगा सकते। ध्यान में आवश्यक है कि आप अपने शरीर को भूल जाएं। अगर आपके शरीर में कष्ट होगा तो आप उसको कैसे भूलेंगे और उसके परे कैसे जाएंगे।
कूछ तकनीकों में आपको जमीन पर पाल्छथी मारकर बैठना पडेगा। अगर आप इस तरह बैठने के आदि नहीं हैं, तो कूर्सी का प्रयोग करें पर जमीन पर बैठने की कोशिश करते रहें। अगर आप चाहें तो बैठने के स्थान पर तकिया लगा सकते हैं। लेटने की तकनीकों के लिए, कभी भी खाली फर्श पर न लेटें। दरी या चटाई का उपयोग करें।
ध्यान करने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि पिछला भोजन आपने कम से कम दो घंटे पहले किया हो।
शरू में ध्यान के वक्त आपको थोडी नींद आएगी। यह तमस (आलस) है जो आपके तंत्र को भारीपन का बोध कराएगी। नींद से लड़ने की कोशिश न करें- नहीं तो आप न सोने के काबिल रहेंगे न ध्यान करने के! नींद आए तो अपने आपको दोषी न समझें। अगर आपको नींद आए तो सो जाएं जब नींद पूरी हो जाए तब पुनः ध्यान करें बस।
प्र. क्या ध्यान भी एक कर्म है
उ. श्रूआत में हां। शांति के साथ बैठना भी कर्म करना है। अपने सांसों को महसूस करना भी कुछ करना है। शुरूआत में ध्यान भी एक कर्मजैसा लगेगा-क्योंकि आप कूछ ऐसा कर रहे हैं जो आपके लिए स्वाभाविक नहीं है।
जब आप कूछ स्वाभाविक कर रहे हैं-जैसे बैठना, यदि वह आप पर औपचारिक रूप से थोपा जाएगा तो वह प्रयत्न जैसा लगेगा।
क्या आप जानते हैं, केवल बैठनाही, ज़ेन ध्यान की एक तकनीक है परंतु वहां भी भाग लेने वाले कुछ पाने के लिए संघर्ष करते हैं।
हां शूरू में यह अवश्य ही एक प्रयास है। परंतु गहरे समझ बूझ के साथ देखा जाए तो ध्यान एक कर्म नहीं है-क्योंकि जब इसे सही तरीके से करते हैं, इसमें सफल हो जाते हैं तो सारे प्रयास गायब हो जाते हैं।
जब आप पूर्णतया आरामदायक स्थिति में होते हैं, फल पाने की कोशिश बंद कर देते हैं, केवल ध्यान का आनंद उठाते हैं, आप धीरे धीरे इस बात से अभिज्ञ होना बंद कर देंगे कि आप ध्यान कर रहे हैं। तब यह कोई कर्म नहीं रह जाएगा।
निम्न पन्नों पर दी गई सभी ध्यान की तकनीकें मेरे द्वारा बनाई नहीं हैं।
यह प्राचीन धार्मिक पुस्तकों से लिए गये हैं, महान आध्यात्मिक शिक्षकों एवं गुरुओं से लिए गये हैं जो स्वयं प्रेरणा के लिए दुनिया के प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं की ओर मुड़े थे।
कई तकनीकों में मैंने अपने अनुभव के बल पर कुछ परिवर्तन किए हैं। कुछ मेरे द्वारा बनाए गये हैं, और कुछ दूसरों से उधार लेकर उसमें बदलाव किए बिना आपके सामने रखे हैं।
कुछ तकनीकों की जड़ें गुमनामी में खो गई हैं, इसलिए ये किसी की नहीं हैं। इन पर किसी का एकाधिकार नहीं है। सच्चाई तो यही है कि किसी भी सच्चे गुरु का वास्ता तकनीक के नाम से नहीं होगा। उसका वास्ता इससे होगा कि तकनीक आपकी मदद करता है या नहीं। तो तकनीक का आनंद उठाएं और ऐसे किसी व्यक्ति को अवश्य सिखाएं जो इसका आनंद उठाने के लिए तैयार हो।
ध्यान की सुगंध को फैलाएं।
आनंद नतन
ध्यान के बारे में
ध्यान का एक शक्तिशाली रूप है नृत्य!
औपचारिक नृत्य एवं मुक्त नृत्य दोनों ही ध्यान की तकनीकें हो सकती हैं। मूक नृत्य शुद्धिकरण की एक अच्छी तकनीक है। इसके पीछेधारणा है कि अपने आपको नृत्य में भूला दें। एक कुशल नर्तक इसे औपचारिक नृत्य में भी कर सकते हैं क्योंकि अब आप नियमों के प्रति सचेत नहीं रह जाते। जिस तरह से हम सही बोलते वक्त व्याकरण को रूकावट नहीं मानते उसी तरह से एक कुशल नर्तक स्वाभाविक तौर पर नुत्य करता है चाहे नत्य का रूप औपचारिक ही क्यों न हो। अगर आप शौकिया नर्तक हैं तब आप मुक्त नृत्य का आनंद उठाएं अन्यथा नियमों में बंधा हुआ महसूस करेंगे।
कुछ निर्देश
मुक्त नृत्य में आप कहीं भी कैसे भी कदम रख सकते हैं, कोई नियम नहीं है। शरीर को जैसे चाहें हिलाएं। नृत्य का बहाव मुक्त होना चाहिए। प्रफुल्लचित्त रहें और आनंद लें। नत्य के तीव्र ऊर्जा में भागीदार बनें।
मुक्त नृत्य के दो पड़ाव हैं : नृत्य करना व आराम करना।
नृत्य करना (२१ मिनट)।
आंखें बंद करके नृत्य प्रारंभ करें। कदमों के बारे में चिंता न करें। शरीर को ढ़ीला छोड़ दें।
अपने अचेतन मस्तिष्क को नृत्य का संचालन करने दें। आप कैसे लग रहे हैं, या आपके कपड़े कैसे लग रहे हैं यह बिल्कुल न सोचें। आपको कोई नहीं देख रहा है; यह कोई सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं है।
जब आप नृत्य कर रहे होंगे तो थकान महसूस नहीं करेंगे।
आपके अंदर अधिक से अधिक ऊर्जा का अहसास होता रहेगा और आप चलते रहेंगे।
आप जितना अधिक नुत्य करेंगे उतने ही ओजस्वी बनेंगे। ध्यान के दूसरे तरीकों से भिन्न, नुत्य या नुत्य करने वाले के बारे में न सोचें। नृत्य में गहराई से प्रवेश करें। अपने आपको पूर्ण रूप से भूल जाएं। नृत्य और आप एक हो जाएं। आप नृत्य हो जाएं और नृत्य आप।
गति रहित अवरस्था (१० मिनट)
४५ मिनट के अन्त में, एक घंटी बजेगी। जहां भी हों, जिस स्थिति में हों फर्श पर गिर जाएं। लेट जाएं और शांत, मौन, गति रहित हो जाएं।
उन्मत्त गति से अचानक गतिरहित अवस्था में आ जाने से जो बदलाव होता है उससे आपको आंखें के आगे अंधकार छाने का अनुभव होगा। आपके दिमाग में कोई विचार नहीं होगा, केवल एक खामोशी। कुछ ही क्षणों में विचार वापस आने शूरू होंगे। विचारों को शांतिपूर्वक देखें। उनसे लड़ने की कोशिश न करें या उनमें खो न जाएं। जागरूक बनें रहें। आपके अंदर एक स्थाई शांति का अहसास होगा, एक ऐसी खमोशी जो विचारों के लौटने के बाद भी रहे। इस शांति और खामोशी को अपने आपमें पूरे दिन बनाए रखें सोते वक्त भी। जब जागेंगे तो नयेपन और ताजगी का अहसास होगा।
अहम् ब्रह्मास्मि
इस ध्यान के बारे में
यह एक कठिन, परंतू सूखद तकनीक है ध्यान की। यह ध्यान है सब कुछ सम्मिलित करने का। साधारणतः हमारी सारी ध्यान की तकनीकें कुछ नकारने पर ही आधारित होती है- मैं शरीर नहीं हुं, मैं दिमाग नहीं हूं। परंतु यहां हम इसका उलटा करते हैं- सब कुछ शामिल करके अनंत में एक निष्कर्ष पर पहुचते हैं, मैं सब कुछ हूं।
निर्देश
आंखें बंद करके ध्यान में बैठें। आपके अंदर और बाहर जो कुछ भी है उसके प्रति जागरूक बनें।
अपने आप से शुरू करें। अपने शरीर, अपने दिमाग, अपने विचार, अपनी सांसें , अपनी सोच के प्रति अभिज्ञ रहें। इन सबको अपने आप में शामिल कर लें। केंद्रित न हों, बहते रहें। अपनी सांसों के बारे में जानें। अपने शरीर के तरल रूप को पहचानें। अपने शरीर को आप जितना कठोर सोचते हैं उतना है नहीं।
जब आप आंखें बंद करते हैं तब पता चलता है कि आपके शरीर में सक्ष्म बदलाव होते हैं। उसका आकार और रूप बदलता है। वह भारी और हल्का होता है, फैल्रता और सिक्रृड़ता है। केवल उसके बारे में हमारी धारणा एक-सी बनी रहती है इसीलिए हम इन बदलावों परध्यान नहीं देते।
प्राय: हम इन चीजों का ख्याल अचेतन अवस्था में करते हैं। जब आप प्रतिकूल वातावरण में होते हैं, डरे होते हैं, अलगाव और अकेलापन होने का अहसास करते हैं
तो एक सिकुड़न महसूस करते हैं। जब आप खुश होते हैं प्यारे और प्रवाहमान होते हैं तो आपको लगता है कि आप उस अहसास से पूरा कमरा भर देते हैं। जब आप विस्तृत होते हैं तो फैलने का अहसास कर सकते हैं।
अपने आप में सब कुछ शामिल करें। यह न कहें, मैं नहीं हूं। बल्कि कहें, मैं हुं। धीरे-धीरे आप महसूस करेंगे कि आप में कोई केन्द्र नहीं है। जब कोई केन्द्र ही नहीं होगा तो अहम् स्थायी रूप से एक जगह कैसे बस सकेगा। अलगाव का अहसास होना अहम् के लिए आवश्यक है। विस्तुतता में अहम् का स्थान कहां होता है?
जब अहम् चला जाएगा तो रह जाएगी चेतना। चेतना जो आकाश को शामिल करती है, आपका अंश बन जाती है। सूर्योदय जैसा आलोक अपने अंदर महसूस करते हैं। सुबह की महक, वह भी आप हैं। आपकेा पता चलेगा कि हवा आपके अंदर बह रही है। वह पेड़ पत्थर यहां तक की तारे भी जिन्हें आप देख नहीं सकते आपके अंदर हैं। यह एक प्रबल अनुभव है। जब तक आप इसका अनुभव नहीं कर लेंगे तब तक हर चीज के बीच के अंतःसंबंध को कैसे समझेंगे। आपकी सीमा हमेशा बहत छोटी रही है-जब वह पूरे अस्तित्व को अपने में शामिल करने के लिए फैल रही है।
तकनीक के बारे में
प्राचीन काल से ही कहा गया है कि आंखें बन्द करें और अपने अंदर के स्वभाव को समझें। यही निर्देश शिव ने देवी को विजनान भैरव तंत्र में दिया था। यह ध्यान की तकनीकों का पुराना खजाना है।
आंखें दोहरी भूमिका निभाते हैं। जब वह खुली रहती है तो पूरी दुनिया की खबरें लाने वाला संदेशवाहक है। जब वह बन्द होती है तो अंदरूनी दुनिया के दर्शन कराती है।
आंखे बंद करने का मतलब केवल पलकें बन्द करना नहीं है! सामान्यतः जब हमें आंखें बन्द करने को कहा जाता है तो हम अपनी पलकें बन्द कर लेते हैं। बंद पलकों के पीछे से भी. हम बाहरी दुनिया की छवि को देखते रहते हैं| उदाहरण-हम टी. वी. को बाहर बंद करके अंदर चालू करते हैं। हमारी आंखें वास्तव में कभी बन्द नहीं होती। आंखों की गति को स्थिर बनाने का एक असरदार तरीका है। सोचें कि आपके नेत्र-गोलक पत्थर के हो गये हैं| नेत्र-गोलक के स्थान पर आपके पास दो छोटे, चिकने, गोल पत्थर के पिंड हैं। इसे देखने की कोशिश करें। जिस पल ऐसा करेंगे, आप पायेंगे कि आपके आंखों की गति भी थम चुकी है और विचार भी। जब आंखों की गति थम जाती है तो विचार भी तीव्रता के साथ धीमा हो जाता है।
निर्देश
आंखें बन्द करें और सोचें कि आपके नेत्र गोलक पत्थर के हो गये हैं।
कुछ न करें, उसी अवरश्या में बने रहने की कोशिश करें। यह आसान नहीं है। कई हफ्तों के अभ्यास के बाद कुछ क्षणों के लिए इस अवस्था में रहने लायक होंगे। परन्तु यह प्रयास रंग लायेगा-क्योंकि आप पहली बार अपने अन्दर देखेंगे।
आपने अपने शरीर को अंदर से कभी नहीं देखा है।
अब अपने शरीर के सभी अंगों को अंदर से देखने की कोशिश करें। जब आप अपना हाथ हिलाते हैं तो इसका पता बाहर से चलता है, अब अंदर से भी जानें। भीतर से अपने शरीर की यात्रा करें।
ध्यान की तकनीकें
एक उंगली के छोर से शरू करें। उसके बारे में भीषण जागरूक हो जाएं। केवल अपने उंगली के छोर के बारे में सोचें। धीरे-धीरे हाथ पर ऊपर की आरे बढ़ते जाएं। प्रत्येक
हाथ-पैर में जाएं। शरीर के हर भाग में अतिसंवेदनशीलता का अनुभव होगा।
जब अपने शरीर को अंदर से देखने की अनुभूति आपको हो जाती है, आप इस बात के प्रति जागरूक हो जाते हैं कि आप ही शरीर नहीं हैं। यदि आप अपने शरीर को देख रहे हैं तो आप अपना शरीर कैसे हो सकते हैं| आप इस भ्रम से मुक्त हो जायेंगे कि आप ही अपना शरीर हैं। आप स्वयं ही अपने शरीर के साथ अपनी पहचान को तोड देंगे।
अब आप गहराईयों में जाने के लिए मक्त हैं. मस्तिष्क की अथाह गहराईयों में। अपने मस्तिष्क को भी भीतर से देखें। यह आसान नहीं होता है। पहले पहल आप सर का भीतरी भाग देखेंगे। परन्तु यह मस्तिष्क नहीं है आपका मस्तिष्क आपके भेजे से अलग है। आप अपने मस्तिष्क के बारे में वैसी ही चिंता करें जैसा सोचते हैं। उसे बाहर से देखें। अब उस प्रक्रिया को उलट दें। मस्तिष्क में प्रवेश करके उसे भीतर से देखने की कोशिश करें।
अभ्यास के साथ ऐसा होने लगेगा। शरीर की ही तरह आप देखेंगे कि आप अपने मस्तिष्क से भी अलग हैं। आप साक्षी हैं।
अगर आप शरीर नहीं हैं. मस्तिष्क भी नहीं हैं तो कौन हैं ?
आप वह हैं जो इन दोनों को देख रहे हैं। यही सच में आप हैं। आप सच में अपने स्वरूप का साक्षी नहीं बन सकते, क्योंकि आप इसके बाहर नहीं हैं जिसका साक्षी आप नहीं बन सकते, वह आप हैं।
इन तकनीकों को अपनाते वक्त धैर्य धरें, तुरन्त फल की आशा न करें। चमत्कार पहले ही दिन आपके पास नहीं आ जायेगा। हताश न हों। जब अनुभव होगा, तब सारे प्रयत्नों का मूल्य आपको मिल जायेगा। यह आपके भीतर एक स्थायी बदलाव लायेगा। तैयार रहें।
आत्म स्पूरण
तकनीक के बारे में
यह तकनीक है हर पल. हर काम में अपने बारे में जागरूक होने का। मूल्र रूप से विजनान भैरव तंत्र से लिया गया है, लेकिन पाश्चात्य देशों में इसे लोकप्रिय बनाया है महान गुरू गर्डिफ ने।
निर्देश
आप केवल अपने को याद रखें- मैं हूं। हर समय खाते-पीते, चलते या बातें करते हुए भी। कूछ देर के लिए अपने आप के बारे में सोचें। फिर हम भूल जाते हैं। हम सोचते हैं कि हमें याद है, परन्तू हमारा दिमाग एक नये विचार की ओर छलांग लगा चुका होता है।
अपने आपको याद रखना सोचना नहीं है यह केवल जागरूकता है अगर आप सोचते हैं मैं हूं, तो आपसे मुख्य बिंदू ही चूक जाता है। ज्यादातर हम यही करते हैं- शब्दों को दोहराते हैं मैं हूं, मैं हूं। शब्द अनुभव नहीं होते हैं। उन्हें याद न करें। उनका स्पर्श करें। उसके बारे में न सोचें।
जब आप पैदल चल रहें हों एक क्षण के लिए रूकें और सोचें कि आप हैं। इस सोच को अपने साथ ले जाएं। आपको इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि आप अपने चेहरे पर धूप का अनुभव कर रहे हैं, बालों में हवा का जो अनुभव कर रहा है उसके बारे में जानें।
केवल अनुभव करें मैं हैं। एक पल के लिए आप अपने आप में अचानक लौट आएंगे! शांति और वास्तविकता की एक झलक पाएं। इसका वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता. अनुभव करना पड़ता है।
जब आप कुछ छूते हैं तो उसका अनुभव करें जब आपको कोई छूता है तो उसका अनुभव करें। जिसको छूआ जा रहा है उसको अनुभव करें। आपकी चेतना और तीक्ष्ण हो जाती है।
हर समय अपने साथ इस जागरूकता को रखें। यह कभी भी-कहीं भी ध्यान है। सही मायने में इसे हर समय ध्यान बनायें।
चित्त्ताकाश ध्यान
ध्यान के बारे में
आकाश में ध्यान शुन्यता पर ध्यान है। साफ नीला आकाश बिल्कुल शून्य है। इस पर ध्यान करने के लिए रूपष्टता में प्रवेश करना पड़ता है।
निर्देश :-
एक दिन चूनें जब आकाश नीला, बादल रहित व विशाल हो। एक शान्त जगह पर पीठ के बल लेट जाएं और आकाश की ओर देखें।
आंखों में पानी आ जाने से भी पलकें न झपकाएं। केवल टकटकी लगा के देखते ही रहें। आंखों में दर्द होने लगेगा इस पर ध्यान न दें। एक बार आंसुओं से आंखें धूल्र जाएं तो टकटकी लगाना आसान हो जायेगा।
आकाश के बारे में न सोचें। यह न सोचने लग जाएं कि आकाश कितना सून्दर व नीला है। जिस पल आप ऐसा करेंगे. अपने आपको आकाश से अलग कर लेंगे। आपका काम आकाश के बारे में सोचना नहीं है, उसमें प्रवेश करना है।
सिर्फ देखकर ही आकाश की स्पष्टता का स्पर्श करें। नीले आकाश की शुद्धता के बारे में जानें। उसके स्पष्टता में प्रवेश करें। आकाश की गहराई में जाएं। आकाश की गहन गहराई में झाकें, जैसे कि आप किसी चीज़ को तलाशने के लिए गहराई में जा रहे हैं।
तब तक टकटकी लगाए रहें जब तक आप उसके साथ एक न हो जाएं। जब तक आप न सोचें कि उसके साथ एक हो गये हैं। आपको स्वयं ही पता चलेगा जब आप आकाश के साथ एक हो जायेंगे। इसमें एक घण्टे या उससे ज्यादा समय लग सकता है। अपने ध्यान को भटकने न दें। अपनी आंखें आकाश से न हटाएं।
अब आंखें बन्द करें। अगर वास्तव में मेल हुआ है, आप अपने अंदर ही आकाश का अनुभव करेंगे। अनुभव करेंगे कि आकाश आपके अंदर प्रवेश कर गया है। आपकी चेतना पीछे छूट जायेगी, विचार पीछे छूट जाएंगे उसी आकाश में रहें।
शुरू में आप इसे कुछ पलों के लिए ही कर पाएंगे। अभ्यास के साथ इस अवस्था की अवधि बढ़ती जायेगी। साफ आकाश जब आपके भीतर होगा तो शून्यता का अनुभव होगा।
हृदय कमल
तकनीक के बारे में
यह ध्यान आपके हृदय के केन्द्र को खोलने का एक तरीका है। वास्तविकता में प्रवेश करने का मुख्य द्वार है। यह ध्यान की तकनीक आपके लिए तभी काम की होगी जब आप चिंता शक्तियुक्त व्यक्ति होंगे. यदि आप में भावना से अधिक तर्क करने की शक्ति हो। हममें से ज्यादातर लोग चिंता शक्तियुक्त हैं। जो दिमाग से नहीं सोचते अर्थात भावना में बहकर सोचते हैं। ऐसे लोग आज की दनिया में ज्यादा दिन नहीं जी सकते। इसीलिए हम सबने अपने दिमाग को शक्तिशाली बना लिया है। हमारे हृदय का केन्द्र कमजोर है क्योंकि हम इसका अधिक उपयोग नहीं करते। हम हृदय से कार्य नहीं करते। हम हृदय से काम नहीं करवाते।
हृदय से दुनिया की ओर देखने की कोशिश करें, आप दुनिया में एकता पाएंगे। दिमाग अवरोध पैदा करता है, दिल उन्हें धो डालता है| हृदय के केन्द्र से काम करने पर स्वाभाविक रूप से आपके जीवन में प्रेम का ज्वार आ जायेगा।
निर्देश
साधारण किन्नु अद्भुत
सिर्फ अपने आपको मस्तिष्क रहित समझना होगा।
यह मजेदार नहीं है, कठिन तकनीक है। पैदल चलें, बैठें, लेकिन अपने आपको मस्तिष्क रहित समझें, अनुभव करें कि आपका सर गायब हो गया है। हृदय पर ही आपका सारा
केन्द्र होना चाहिए। प्रारम्भ में यह एक दिखावा होगा, आप अनूठेपन और दिशा भ्रमित होने का अनुभव करेंगे।
आप पूछेंगे कि मेरे इन्द्रिय व शारीरिक अंगों का क्या होगा ? मैं कैसे देखूंगा, सूनुंगा या बोलूंगा?
आपके इन्द्रिय व शारीरिक अंग गायब नहीं हुए हैं। वे केवल ह्रदय प्रान्त में विलीन हो गये हैं।
जिस तरह एक अंधा आदमी हाथों से देखता है उसी तरह आप हृदय द्वारा देखेंगे. हृदय से देखेंगे।
कोशिश करें। आप कर सकते हैं।
एक आइने के सामने खड़े हों और गहराई से अपनी आंखों में देखें। अनुभव करें जैसे अपने हृदय से देख रहे हों।
अपने सभी कामों को हृदय द्वारा नियंत्रित होने दें। अपने सभी कामों में प्रेम का अनुभव करें।
धीरे-धीरे आप अनुभव करेंगे कि आपके हृदय का केन्द्र पूष्पित हो रहा है। अपने भीतर खिलने का अहसास होगा।
इसके बाद आप प्रेम के बाढ़ का अनुभव करेंगे।
आपको अपना हर काम अधिक प्यारा लगेगा। इसलिए जब किसी को प्यार हो जाता है तो हम कहते हैं कि उसका दिमाग खो गया है!
जब आपमें प्रेम का बहाव हो रहा हो, हृदय का केन्द्र उमड़ रहा हो, आप वास्तव में अपना दिमाग खो देते हैं। आपके कार्य अब दिमाग द्वारा नियंत्रित नहीं होते।
इस ध्यान की तकनीक के लिए कोई अवधि निश्चित नहीं है। इसे तब करें जब आपको जरूरत महसूस हो और महसूस होता ही रहे। इस ध्यान का अभ्यास करते रहें आप स्वयं को और प्यारे इंसान के रूप में देखेंगे। आपके रिश्ते नाटकीय ढंग से सुधर जाएंगे। आप दुनिया के ताल-मेल का अनुभव करेंगे। भगवान के एक कदम पास चल जायेंगे।
ज्योति स्तम्भ
ध्यान के बारे में
यह तकनीक विजनान भैरव तंत्र से लिया गया है। उसके अनुसार सोचिए कि केन्द्र बिन्दु से केन्द्र बिन्दु तक उगता हुआ आपका सत्व, मेरूदण्ड से उठता हुआ, आपमें 'स्फूर्ति' का उदय करेगा।रीढ़ की हड़डी शरीर और दिमाग दोनों का आधार है। शरीर एवं दिमाग की जड़ें मेरूदण्ड अर्थात् रीढ़ की हड़डी में ही हैं। आपकी आयु आपके मेरूदण्ड में रहती है। अगर आपका मेरूदण्ड लचीला है तो आप जवान रहेंगे, अगर आपका मेरूदण्ड सख्त है तो आप बूढ़े होंगे।
सात बडे चक्र या शक्ति के केन्द्र शरीर की लम्बाई में स्थित हैं। मेरूदण्ड के आधार में है मूलाधार चक्र कामुकता का केन्द्र। सर के मुकूट पर है सहसरार चक्र। यह केन्द्र हमें भगवान के पास लाता है।
मेरूस्तम्भ ऊर्जा का मार्ग है। इस ध्यान की तकनीक में ऊर्जा नीचे से ऊपर की ओर जाती है मूलाधार से सहसरार तक।
यह आसानी से नहीं होता है क्योंकि यह गुरूत्वाकर्षण के खिलाफ है। ऊर्जा ऊपर से नीचे की ओर बडी आसानी से चली आती है। देखा जाय तो हमारी ८०% ऊर्जा मूलाधार में ही अटकी है। ऐसा लगता है जैसे कि एक भार आपको नीचे की ओर पूथ्वी पर ले आती है। आपने कभी ध्यान दिया है कि पीठ का निचला हिस्सा कितना भारी होता है।
जब यह ऊर्जा ऊपर की ओर जाती है और सहसरार से निकलती है तो आपको बहुत अधिक हल्केपन का अहसास होगा। आप अचानक ही भार रहित हो जायेंगे, एकदम आजाद। इस अवस्था में आपको परमसुख का आनन्द मिलेगा।
निर्देश
आरामदायक स्थिति में आंखें बन्द करके और मेरूदण्ड सीधा करके बैठें।
कल्पना करें जैसे कि आपका अस्तित्व प्रकाश का बना हो। यह कल्पना नहीं है। आप प्रकाश हैं, सब प्रकाश है। वास्तव में अपने को ऊर्जा समझने के आप आदी नहीं हैं। अपने आपको पदार्थ समझते हैं।
कल्पना करें कि आप एक प्रकाश स्तम्भ हैं।
अब अपना ध्यान कामुकता के केन्द्र पर ले जाएं। अनुभव करें कि यह केन्द्र चमकीला और जागरूक हो गया, प्रकाश के गोले की तरह। अब कल्पना करें कि वह प्रकाश ऊपर की ओर जा रहा है, नाभि केन्द्र की ओर। अपने अन्दर एक गरमाहट का अनुभव करेंगे यह असली गरमाहट है। जब नाभि चमकीले प्रकाश का गोला बन जाए, प्रकाश का एक स्रोत, यह ऊपर उठने लगेगा।
प्रकाश के ऊपर हृदय केन्द्र की ओर उठने का अनुभव करें। प्रकाश और गरमाहट का अनुभव हृदय से करें। अनुभव करें गहरी होती अपनी सांसों को, हृदय की धड़कनों के और अधिक आरामदायक बनने का।
ऊर्जा के प्रतिबिम्ब को भौं चक्र तक उठाएं, भौहों के बीच का स्थान। अनुभव करें कि पूरा क्षेत्र प्रकाश में डूबा हो। धीरे-धीरे ऊपर की ओर मुकुट चक्र तक जाएं, सिर के शीर्ष पर स्थित ऊर्जा का क्षेत्र।
जब ऊर्जा सिर के ऊपर मुकुट तक पहुंचती है तब आपको बहुत अनोखे अनुभव हो सकते हैं। आप चकराया हुआ या उबकाई महसूस कर सकते हैं। आपका मस्तिष्क इतनी ऊर्जा को संभालने का आदी नहीं है। यदि बहुत अधिक ऊर्जा आपके मस्तिष्क की ओर जाती है तो लग सकता है कि मस्तिष्क में धमाका हुआ हो। डरें नहीं। अगर आपका सर चकरा रहा हो, आप गिर रहे हों तो अपने आपको गिरने से रोकें नहीं। अगर आपको लग रहा है कि बेहोश हो जायेंगे तो भी चिन्ता न करें। यह गहरी निद्रा की अवस्था है। जिसे योगा तंद्र के नाम से जानते हैं। कई ध्यानियों ने इस अवस्था का अनुभव किया है। इसमें डरने की कोई बात नहीं है| आधे घण्टे में ही आप अपने पुराने रूप में वापस आ जाएंगे।
जब ऊर्जा आपके मस्तिष्क में पहुंच जाती है, तो पूरा मस्तिष्क गर्म हो जाता है। यह प्रकाश का एक गोला बन जाता है।
अब ऊर्जा को ब्रह्माण्ड में छोड़ दें। अनुभव करें कि आपका मस्तिष्क एक फूल बन गया है, एक सुन्दर कमल का फूल। अब फूल्र कोधीरे-धीरे खिलने दें और अपनी ऊर्जा को ब्रह्माण्ड में छोडने दें।
सतर्कता के दो शब्द:- इस ध्यान को कभी भी अधूरा न छोड़ें। शूरू करने से पहले, यह सुनिश्चित कर लें कि कोई भी कम से कम दो घंटे तक विघ्न नहीं डालेगा।
ध्यान के दौरान सभी विघ्न, बाधाओं, उपद्रव की उपेक्षा करें। अगर आप ध्यान को बीच में ही अधूरा छोड़ देते हैं तो ऊर्जा किसी खास केन्द्र पर जमा हो जायेगी और शारीरिक व मानसिक समस्या पैदा हो सकती है।
ध्यान की यह तकनीक एक सुन्दर उपाय है कामुकता की ऊर्जा को आध्यात्म की ऊर्जा में बदलने का। जब आप प्रतिदिन इसका अभ्यास करेंगे तो देखेंगे की आपकी कामक इच्छाएं धीरे-धीरे कैसे थमने लगेंगी। इससे आपमें जब चाहे उपासना करने की इच्छा जागेगी। जब इतनी अधिक ऊर्जा आपके मस्तिष्क में जायेगी तो आप अधिक सचेत होने का अनुभव करेंगे, अधिक कुशलता के साथ काम करेंगे और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आप चिरस्थायी आनन्द की अवरन्था में होंगे।
इस क्रिया को रोकें -
ध्यान के बारे में
हमारा सम्पूर्ण जीवन हमेशा ही ''करने'', ''पाने'' और ''होने'' के बीच में झूलता रहता है।
जीवन में हम सदा ही कर्म पर केन्द्रित होते हैं। बेचैनी के साथ हम एक काम को छोडकर दूसरा करने लगते हैं। अपने सम्पूर्ण जीवन काल में हम काम करते जाते हैं, करते जाते हैं, करते ही जाते हैं। हम कार्य करते हैं, बोलते हैं, रिश्तों में उलझते हैं, हिलते-ड्रुछते हैं, योजना बनाते हैं। शारीरिक और मानसिक रूप से हम हमेशा कुछ न कुछ करते रहते हैं।
हम कूछ न कुछ क्यों कर रहे हैं क्योंकि कुछ पाना चाहते हैं, और इसी में उलझ कर रह जाते हैं। हम हमेशा ही अधिक से अधिक पाना चाहते हैं। पाना हमें शक्ति का अहसास कराती है। इसीलिए हमअधिक धन प्राप्त करना चाहते हैं, अधिक यश, अधिक दोस्त, महिला मित्र, प्रमाण पत्र, स्वारश्य, सौन्दर्य, बुद्धि यानि की सब कुछ अधिक चाहते हैं।
करने और पाने के बीच हम समझ ही नही पाते कि ''होने'' को भूल गये हैं। सच्चाई यह है कि ''होना'' ''करना और पाना''से अधिक महत्व का है। परन्तु काफी समय हो गया है कि हमने इस महत्वपूर्ण बिन्दु को छुआ ही नहीं।
"रोकना" एक और तकनीक है जो विजनान भैरव तंत्र से लिया गया है और गर्डिफ ने लोकप्रिय बनाया।
यह तकनीक आसान है : इसमें अचानक रूक जाना पडता है :- जो भी काम कर रहे हों उसे बीच में ही छोडें.! इस बात के प्रति अनभिज्ञ रहें कि आप रूकने वाले हैं। सबसे अच्छा है कि कोई आप पर नजर रखे और चिल्लाए रूको! जब भी वह चाहे। यह स्टैचू खेलने जैसी बात है !
जब आप किसी काम में डूबे हुए होते हैं, तो उसे अचानक रोक देने से आघात की वजह से खामोश हो जाते हैं। ऐसा होने से आप अपने अस्तित्व की ओर लौट जाते लाए
निर्देश
इस ध्यान को आप अकेले भी कर सकते हैं या समूह में। एक व्यक्ति को आप ''रोको'' आदेश के लिए चुन सकते हैं। परन्तु यह आदेश बार-बार नहीं दिये जाने चाहिए, नहीं
तो आप हमेशा ऐसे आदेश के लिए तैयार रहेंगे। चाहे आप पैदल चल रहे हों, बातें कर रहे हों, कार्य या नत्य कर रहे हों- जैसे ही यह आदेश सुनें पत्थर की मूरत बन जाएं। तुरन्त उस काम को रोकें और मूर्ति बन जाएं। अगर आपका एक हाथ उठा हुआ है, मुंह खूला हुआ है तो भी कोई बात नहीं। इसे पूरी ईमानदारी के साथ करें। आरामदायक स्थिति में आने की कोशिश न करें। एक पल का विलम्ब हुआ तो भी बहुत देर हो जायेगी।
इस खेल को अपने आप भी खेल सकते हैं। जब आप दौड़ रहे हैं, स्नान कर रहे हैं या चाय पी रहे हैं- अपने आपको केवल आदेश दें 'रोको''! रूकने की कोशिश न करें, बस रूक जाएं।
जब आप पूरी तरह से किसी काम में डूबे हों और आपको अचानक रूकना पड़े तो अपका संतुलन खो सकता है और आप अपने केन्द्र में लौट जायेंगे। शान्ति का एक पल, ध्यान के एक पल का अनुभव होगा आपको।
उस मनोवेग को रोको
ध्यान और निर्देश
रूकना केवल शारीरिक कार्यों से ही सम्बन्धित नहीं है| आप आसानी से किसी मनोवेग को रोक सकते हैं, किसी इच्छा, कोई बेमकसद कार्य या कोई अनुभव सब कुछ रोक सकते हैं।
जैसे ही कुछ करने की इच्छा हो रोकें। जब आप बहुत दुखी हों और रोते जा रहे हैं तो अपने को आदेश दें रोको! आप आश्चर्यचकित होंगे कि कितनी जल्दी आप रूक सकते हैं ! केवल रूक जाते हैं बरन।
अगर छींक आ रही हो जिस पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता है, न ही रोका जा सकता है, उसको भी बीच में ही इस तकनीक द्वारा रोका जा सकता है।
जब आप बहुत गूरन्से में हों, इतना गूस्सा की सामने वाले पर हाथ उठाना चाहते हैं या कूछ तोड़ना चाहते हैं तो बस रूक जाएं।
आप अपने बच्चे, पत्नी या दोस्त को देखते हैं और अचानक ही उन्हें गले लगाने की इच्छा हो रही हो हो तो बस रूक जाएं।
आप जब रूक जाते हैं तो क्या होता है ? एक ऊर्जा होती है जो आपमें से बाहर की ओर बहती है, लक्ष्य की ओर। जब आप बातें कर रहे हैं, चल रहे हैं, आपका मनोयोग आपकी ऊर्जा बाहर की ओर अन्य लक्ष्य, दूसरे लोगों की ओर बह रही है। आपका मनोयोग ही आपकी ऊर्जा है। जब आप ऊर्जा के उस बहाव को अचानक ही रोक देते हैं तो ऊर्जा का क्या होता है। वह वापस आपके अंदर चला जाता है। आपकी ऊर्जा, आपका मनोयोग अचानक ही अंदर की ओर मूड़ जाता है। एक बार फिर आप अपने शांत केन्द्र की ओर चले जायेंगे।
एक बार इस केन्द्र की झलक आप पा लेंगे. अपने को कभी भी किसी गतिविधि में नहीं खोएंगे। जब आप ''कर'' रहे होते हैं, तो हमेशा ''होने'' के प्रति जागरूक रहेंगे। अपने भीतर की शांति का स्पर्श करेंगे, समझ जायेंगे कि सभी कार्य सतह पर लहरों की तरह है। यह चिरस्थायी ध्यान की अवरन्था है।
काम हरन
ध्यान और निर्देश
यह भी ''रोको''की तकनीक है। एक अंतर यह है कि आप अचानक नहीं रूकेंगे। किसी कार्य या इच्छा के बीच में भी नहीं रूकेंगे। आप अभ्यास करेंगे मनोवेग या इच्छाओं को धीरे और नियंत्रित तरीके से रोकने की तकनीक का।
जब मन में एक चाह उठे तो उसके बारे में भली-भांति विचार करें। पूरी शक्ति के साथ चाहत का सामना करें।
सचेत रहें कि आप इस मनोवेग, इस चाहत का अनुभव कर रहे हैं। फिर अचानक भूल जाएं। बस भूल जाएं।
कल्पना करें कि आप एक सुन्दर महिला को देखते हैं और आपमें एक इच्छा जागती है। इसका परीक्षण करें। ध्यानपूर्वक ख्याल करें कि इस पल आप में क्या हो रहा है। सचेत हों कि कैसे आपका शरीर ज्वर एवं कंपकपी का अनुभव कर रहा है। सचेत रहें कैसे आपकी नब्ज भागती है, आप स्पष्ट रूप से सोच नहीं सकते। ध्यान दें किस प्रकार इच्छा आप पर अपना नियंत्रण बना लेती है।
इच्छा या अपने आपका निर्णय स्नयं न लें अपने आप से यह भी न कहें, यह बुरी इच्छा है। कोई भी धारणा न बनाएं, केवल देखते जाएं।
फिर अचानक इच्छा को त्याग दें।
यह सम्भव है।
आप इसे त्याग सकते हैं।
इस बात को लेकर स्पष्ट रहें : आप इच्छाओं को नहीं दबाएंगे! इच्छा को कभी न दबाएं। हममें से ज्यादातर लोगों की मानसिक परेशानी की जड है इच्छाओं को दबाना। कभी न सोचें, मैं कैसे छोडूं ?
जब आप अपने मनोवेग से लड़ रहे हों या उसे दबा रहे हों, वह शक्तिशाली बन जायेगा। जब आप किसी चीज पर पूर्ण विचार कर चुके हों, तो उसे त्यागना आसान होता है। जिस पल आप कहते हैं मैं छोड़ रहा हूं, आप अलग हो जाते हैं, प्रहरी बन जाते हैं। आप देख रहे हैं कि आपका शरीर इच्छाओं से भरा है, आपका दिमाग इच्छाओं से भरा है-पर वह आप नहीं हैं।
उसी पल आप जान जाते हैं कि इनमें से कोई भी आप नहीं हैं। एक बार फिर आप अपने अस्तित्व में वापस लौट जाते हैं।
यह ध्यान अपने लत से छूटकारा पाने के लिए बहुत बढ़िया है। हम सबने सूना है कि लगातार सिगरेट पीने वाले व्यक्ति, शराबी, लडकियों का पीछा करने वाले, एक दिन अपने सभी लत छोड देते हैं और फिर उस ओर कभी नहीं लौटते। वह छोड़ने की कोशिश नहीं करते हैं. बस छोड़ देते हैं।
इस ध्यान से केवल शारीरिक हरकत ही नहीं प्रबल लालसा ही खत्म हो जायेगी। आपको लत से संघर्ष करने की आवश्यकता ही नहीं पडेगी क्योंकि इच्छा स्वयं ही नहीं रहेगी।
कृष्णवेनू
ध्यान और निर्देश
यह बहत सुन्दर ''खोखलापन ध्यान'' है। एक ऐसी तकनीक जिसमें आपके अंदर जो है उसे बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे कि ब्रह्माण्ड की ऊर्जा आपमें समा सके।
शांत और खामोश स्थान पर गतिरहित अवस्था में बैठें। अपने शरीर के प्रति सचेत हों। अपने शरीर को आरामदायक अवरस्था में छोड़ दें।
कल्पना करें कि आपका शरीर बांस बन गया है! एक खोखला बांस बनें। पूरी तरह आराम की स्थिति में रहें। आपका पूरा शरीर, त्वचा, मांस, आपकी हडि़डयां सभी बांस का हिस्सा हैं। इस स्थान के भीतर, कुछ नहीं बल्कि खालीपन, खोखलापन और शान्ति है। अपने मस्तिष्क को निष्क्रिय हो जाने दें। किसी भी अनुभव के लिए इंतजार न करें। बस रहें।
अचानक आप पाएंगे कि ऊर्जा आपके भीतर समा रही है। यह बेकार की चिंताएं नहीं हैं। यह बिल्कुल व्यावहारिक तकनीकें हैं। यह आपको कुछ अदभुत जरूर लग सकते हैं क्योंकि इससे पहले आपने इस माप की छानबीन नहीं की। कोशिश करें और अपने को देखें। जब आप अपने को खोखला बनाते हैं और आप प्रतिरोध नहीं करते, दैवीय शक्ति आपके अंदर बहने लगती है। आप दैवीय संगीत की बांसूरी बन जाते हैं।
आपको कुछ नहीं करना होगा, केवल खोखला बन जाएं। यह आसान नहीं है। आप हमेशा ही ''कोई'' या ''कूछ'' होने के आदी हैं। खोखला बनने के लिए प्रबल प्रेम, प्रबल विश्वास की आवश्यकता है।
यदि आप किसी गूरू के साथ काम कर रहे हैं, खोखला बंसी बन जाएं जिसे आपके गुरू बजा सकें। अपने को प्रेम के लिए कूर्बान करना आसान है रहस्यमय दैवीय शक्ति की तुलना में।
शुरू में आप एक खोखला बांस होंगे. परन्तु एक समय आयेगा जब बांस अपने आप गायब हो जायेगा। अब आप नहीं रह जायेंगे।
इस प्रक्रिया में वक्त लग सकता है, परन्तू इसके फल्क चौंकाने वाले होते हैं। अपने आपको हारकर भी उस आत्मा के साथ एक होने का अहसास होता है जो हर जगह व्याप्त है।
प्राण स्त्रम्भन
तकनीक के बारे में
यह तकनीक विपासन्ना से ली गई है।
लगातार सांसों को अनुभव करना ही ध्यान का सार है।
ध्यान की कोई भी तकनीक इतने अधिक लोगों को उजाले की ओर नहीं ले गई है. जितना की इस तकनीक से हुआ है।
विपासन्ना सबसे आसान और कठिन तकनीक के साथ काम करती है-जागरूकता बढ़ाना।
निर्देश
विपासन्ना को आप तीन तरीके से कर सकते हैं।
- अ) अपने शरीर, अपने हाव-भाव, अपना दिमाग, अपने हृदय के प्रति गहरी जागरूकता। जब आप चलते हैं, हाथ हिलाते हैं, मूस्कूराते हैं, जागरूकता के साथ करें। अच्छी तरह से समझ लें कि यह क्रियाएं करने वाले आप ही हैं। सावधान रहें। एक पल भी अचेत अवस्था में नहीं गूजरना चाहिए। हर कार्य पर आपकी नजर होनी चाहिए।
शरीर की तरह ही, अपने हृदय और मस्तिष्क को भी देखें।
अपने हृदय में उठी हर भावना के प्रति सचेत हों। मस्तिष्क में प्रवेश करने वाले एवं बाहर आने वाले हर विचार के प्रति आप जागरूक रहें। कोई धारणा न बनाएं, किसी चीज का मूल्यांकन न करें - केवल साक्षी बने रहें।
- ब) दूसरा तरीका है सांसों को महसूस करना। प्रत्येक अन्तःश्वसन और उच्छावास के साथ अपने पेट को ऊपर नीचे होता हुआ अनुभव करें। जीवन शक्ति का स्रोत नाभि भी पेट के क्षेत्र में ही है। जब आप नाभि पर अधिक ध्यान देते हैं तो शरीर में जीवन शक्ति के बहाव के प्रति अधिक सचेत हो जाते हैं। जैसे आप अपने पेट के प्रति सचेत हो जाएंगे, आप पाएंगे कि आपका हृदय और दिमाग शान्त हो रहा है।
पेट से सांस लेने का यह स्वाभाविक और आरामदायक तरीका है। हम इस तरह से सांस लेना भूल चुकें हैं। बहत छोटे बच्चे पेट से सांस लेते हैं। हम भी कभी-कभी गहरी नींद में पेट से सांस लेते हैं।
- स) विपासन्ना का तीसरा तरीका है नाक के छेद से जब सांस आपके शरीर में प्रवेश करता है उसको अनुभव करना नाक के छेद अर्थात् नथुनों में मौजूद ठंडी हवा के बारे में जानें। अनुभव करें कि किस सुगमता से सांसें नथुनों में प्रवेश करती है व उससे निकलती है। आप दो या तीनों तरीकों को मिला सकते हैं। परन्तु वही करें जिसके लिए आपको कोशिश न करनी पड़े।
विपासन्ना का अभ्यास बैठकर भी हो सकता और चलते हुए भी।
बैंडे हुए
अवधि : ४५ मिनट+१५ मिनट आराम
आरामदायक स्थान पर बैठें, मेरूदण्ड सीधा, चेहरा आगे की ओर उठा हुआ। आंखें बन्द करके सामान्य सांस लें। गति रहित हो जाएं व स्थान न बदलें।
सांस अंदर लेते हुए व बाहर छोड़ते हुए पेट के ऊपर नीचे होने के क्रम को देखें।
सांसों पर ध्यान केन्द्रित न करें। केवल अनुभव करें अगर आपको लगता है कि अन्य विचार, अनुभव या शारीरिक अनुभूति आपके अंदर उमड रहे हैं तो उन्हें उमडने दें। उन्हें भी देखें और वापस सांसों पर नजर रखें।
देखने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है न कि आप क्या देख रहे हैं। हर चीज को देखें!
(४५ मिनट बाद, देखना छोड़ दें। बस सब कुछ त्याग दें और आराम करें।)
चलना
अवधि : २० मिनट+१० मिनट आराम
यहां आपकी जागरूकता पूरी तरह आपके पैरों पर होती है, क्योंकि वह धरती का स्पर्श करती है।
आप गोलाई में चल सकते हैं, या एक सीधी रेखा पर १५ मिनट के लिए चलें, आगे-पीछे होते हुए। इस ध्यान का अभ्यास आप घर में ही एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाकर कर सकते हैं, या घर के बाहर बाग में।
आंखें झुकी हुई, जमीन पर कुछ कदम आगे केन्द्रित होनी चाहिए। जैसे बैठकर ध्यान करने पर आप अपने पेट को देखते हैं उसी तरह पैर के उठने को भी देखें और जानें, क्योंकि हर कदम उठता है तो उसका स्पर्श धरती से होता है। यदि दूसरे विचार व अनभतियां आती हैं तो आने दें। कछ भी विघ्न के रूप मे नहीं देखा जायेगा। देखना खत्म कर चुके हों, तो वापस अपने कदमों को देखें।
प्राण श्रृद्धि
ध्यान के बारे में
यह तकनीक सांस बाहर निकालने पर केन्द्रित है-गहरी और पूरी सांस, सम्पूर्ण जिन्दगी हम सांस अंदर लेने पर ही केन्द्रित रहते हैं। सांस अन्दर लेना जीवन है। सांस बाहर निकालना मृत्यु। जीवन तनाव, प्रयास है। मृत्यु विश्राम है।
मृत्यु से हम भयभीत होते हैं, इसलिए सांस बाहर निकालने से भी डरते हैं। सांस अंदर लेने पर ही बल देते हैं सांस बाहर निकालने की क्रिया इसलिए होती है क्योंकि हम उसे रोक नहीं सकते।
शोध बताते हैं कि आवश्यकता से सांस बाहर निकालते हैं। फेफडे के छः हजार थैलियों में से केवल दो हजार ही सांस बाहर निकलने से खाली होते हैं। बाकी चार हजार बासी हवा से भरे रहते हैं| जहरीला हवा सीने में रहता है जिससे रोग होता है, चिंताएं होती हैं।
इस ध्यान में आप सांस अंदर लेना बन्द करके सांस बाहर निकालने पर ध्यान केन्द्रित करेंगे। विपरीत आयाम का अनुभव होगा। सांस बाहर निकालने से हुए पूर्ण खालीपन का आप अनुभव करेंगे।
निर्देश
इस तकनीक में, आप खामोशी से एक शब्द सूर में बोलें जो आह शब्दांश से खत्म होता हो। यह कोई भी शब्द हो सकता है। खामोशी से करें और आपका किरण बिन्दू समाप्ति पर होना चाहिए, आह के साथ आपको पूर्ण रूप से खालीपन का अहसास होगा। आपकी सांस पूरी तरह बाहर निकल जाती है। एक पल के लिए आप सांस नहीं ले रहे हैं। आप एक पल की मृत्यु का अनुभव करेंगे।
जन्म से ही हम सांस लेते हैं और छोड़ते हैं परन्तु कभी भी इस पल इस खाली समय के प्रति सचेत नहीं हुए।
जब आप इसके बारे में जागरूक हो जाएं तब आप अपनी मृत्यु का साक्षात् करेंगे। आप समझ जाएंगे कि सांसों से परे भी जाया जा सकता है।
हम हर समय मृत्यू के बारे में सुनते हैं, मृत्यू देखते हैं-परन्तु कल्पना भी नहीं करते कि मौत हमें भी आ सकती है। जब भी सांसों को बाहर छोड़ते हैं, हमारा तंत्र खामोशी के साथ मृत्यु की तैयारी करता है। आपका तंत्र मुत्यु की अवस्था को स्वीकार करता है। सांसों से अपने आप को खाली करने का अर्थ है, अपने आपको जीवन से खाली करना- उसके सारे तनावों, द्रख, विचार, इच्छाओं के साथ। यह सबसे ज्यादा विश्राम का पल है। कभी-कभी हम न जानते हुए भी ऐसा करते हैं। जब हम दुखी अथवा तनाव में होते हैं, जब हम आराम करना चाहते हैं, तो आह भरते हैं। आह भरने के बाद, एक पल होता है जब हम सांस नहीं लेते, आप बस खाली हो जाते हैं। उस पल में एक शांति का अनुभव होता है।
उस पल हम जीवन की गतिविधियों में शामिल नहीं होते, करने और पाने की दौड़ में शामिल नहीं होते तो उसके पीछे जो होना छूपा होता है वह प्रकट हो जाता है। आपको एक झलक मिलती है। एक बार यह झलक दिख जाय आप भूल नहीं पाएंगे। इतना साधारण अभ्यास, परन्तु स्थायी परिणाम के साथ! जब आप ध्यान की इस तकनीक को जारी रखेंगे. आप और अधिक शांति और विश्राम का अहसास करेंगे। चिंता आपको आसानी से छू भी नहीं पायेगी। बाहरी परिस्थितियां जैसी भी हों आप आसानी से उसको हल कर पाएंगे। एक बार गहरी जागरूकता के साथ जब आपने मौत की झलक देख ली है तो जीवन के मुद्दे आप पर कैसे काबू पा सकते हैं।
तकनीक के बारे में
आप हमेशा बाहर की ओर बहते हैं। आपकी ऊर्जा हमेशा ही बाहरी दूनिया पर केन्द्रित होती है। जब आप कुछ देखते हैं तो आपकी चेतना उसी तरफ बहने लगती है। आपका किरण बिन्द्र आप स्वयं कभी नहीं होते। वह तो हमेशा उस वस्तु पर होती है पर जिस पर आपका ध्यान हो। हर पल अपने बाहर भी कुछ हैं के प्रति जागरूक होते हैं। जब हमें किसी चीज के बारे में प्रबल जानकारी होती है-एक खूबसूरत सूर्यास्त, सूरीला संगीत-हम अपने आपको उसमें पूर्णरूप से खो देते हैं। यह एक असाधारण अनुभव है-पर यह अनभिज्ञता है। जागरूकता में केवल वस्तू के बारे में ही नहीं बल्कि विषय के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए। आपको सिर्फ इतनी जानकारी ही नहीं होती है कि आप क्या देख रहे हैं, बल्कि कौन देख रहा है-आप। साधारणतः आपकी ऊर्जा बाहर की ओर बहती है। यही एकाग्रता है।
एक ताओवादी अनुभव के अनुसार आप इस ऊर्जा को बाहरी दूनिया में न लूटाकर, इसको मोड़कर अपनी ओर कर लें।
यही चेतना है।
निर्देश
पूर्ण लम्बाई के एक आईने के सामने खडे हों। बाहर से अच्छी तरह अपने आपको देखें। आप विषय हैं, आईने में दिखता प्रतिबिम्ब आपके ध्यान की वरन्तु।
आप महसूस करेंगे कि ऊर्जा वस्तु की ओर बह रही है। बाहर से अपनी आंखों में देखें। आप देख रहे हैं और प्रतिबिम्ब को देखा जा रहा है।
कल्पना करें कि दोनों भूमिकाओं की अदला-बदली हो गई है !
कल्पना करें कि प्रतिबिम्ब आपको देख रहा है। यह पहले तो डरावना लगेगा। आप अपने प्रतिबिम्ब के बारे में ऐसा सोच ही नहीं सकते, कि आपको भी देखने वाला कोई है।
Part 3: Meditation Is for You_Hindi_part_3.md
अगर ऐसे अहसास भी आपको विचित्र और भयावह लगते हैं तो भी जारी रखें। कुछ ही पलों में, आपमें एक बडा बदलाव होगा। ऊर्जा प्रतिबिम्ब से आपकी तरफ बहने लगेगी। यह सच में डरावना हो सकता है, सच में आपको व्यग्र कर सकता है।
पूरी जिन्दगी आप ऊर्जा के बाहर की ओर बहने के आदी हो गये। यह अनुभव आपको धक्का पहुंचायेगा।
परन्तु आप निश्चय ही बहाव का अनुभव करेंगे क्योंकि आपनेपरिधि बंद कर दी है। ऊर्जा की परिधि को बंद करके आपने यह सुनिश्चित कर दिया है कि ऊर्जा बर्बाद नहीं होगी, वह बहकर वापस आपकी तरफ ही आ रही है। आप अपनी ऊर्जा का संचय अपने लिए ही कर रहे हैं।
कुछ दिनों तक इस तकनीक का अभ्यास करें, आप निश्चित बदलाव का अनुभव करेंगे। आप अधिक ऊर्जावान, सजीव बनेंगे। आप अनुभव करेंगे कि आप प्रमूख व्यक्ति हैं, अधिक शांति से रहेंगे।
आप दिन भर इसका अभ्यास कर सकते हैं। केवल अपने आप पर ही नहीं बल्कि जिस किसी वरन्तु पर ध्यान केन्द्रित करके। जब आप अपनी ऊर्जा किसी और को पहुंचा चुके हों तो कल्पना करें कि ऊर्जा आपको वापस किया जा रहा है। यदि वह कोई निर्जीव वरन्तु है तो भी फर्क नहीं पडता। आप महसूस करेंगे कि ऊर्जा वापस आपकी ओर बह रही है, आपका यौवन लौटाती हुई, आपको जानदार बनाती हुई।
शक्ति धारणा
ध्यान के बारे में
यह इतनी सून्दर ध्यान की तकनीक है जिसका वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता। यह ध्यान से अधिक प्रार्थना की तरह है।
यह ध्यान सीधा तरीका है आपको अस्तित्व की सम्पूर्ण ऊर्जा के सम्पर्क में आने का। इसका अभ्यास सबसे अच्छी तरह रात को होता है, ठीक सोने से पहले। यदि आप इसे दिन में करेंगे, तो इसके बाद १५ मिनट आराम अवश्य कर लें, ताकि ऊर्जा घूल जाए, नहीं तो आप घंटों तक भौचक्के रहेंगे।
निर्देश
ठंडा, हवादार और अंधकार किया हुआ कमरा चुनें।
अगर आप चाहें तो अभ्यास के लिए बाहर किसी व्यक्तिगत स्थान को भी चुन सकते हैं।
घूटनों के बल झूक कर बैठें। अगर आप ज्यादा आरामदायक चाहते हैं तो चटाई का प्रयोग करें। घुटनों के बल पर ही थोडा उठें और अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठा दें। अपना चेहरा आकाश की ओर उठाएं और इंतजार करें।
कुछ ही पल्रों में आप संपूर्ण अस्तित्व की ऊर्जा को अपने अंदर बहता हुआ महसूस करेंगे। इसका प्रतिरोध न करें। ऊर्जा को अपने अन्दर प्रवेश करने दें।
अपने हाथों में आप एक कंपकपी का अनुभव करेंगे, धीरे-धीरे आपका पूरा शरीर कांपने लगेगा और ऊर्जा के साथ हिलने लगेगा। इस गति को होने दें।
जब आप ऊर्जा को अपने अंदर सोख लेते हैं तो धरती और स्वर्ग के मिलन स्थल का बिन्दु बन जाते हैं। आपको हवा में उड़ने का अनुभव होगा, जैसे कि आपका शरीर है ही नहीं।
जैसे ही आप पूरी तरह भीग जाते हैं, झूकें और धरती को चूमें। अपने हाथों को धरती पर रखें। हथेली धरती से स्पर्श करनी चाहिए। अपना सम्पूर्ण प्रेम धरती को दें। अनुभव करें कि वह आपके होठों और हथेलियों से बाहर निकल रही है। केवल दैवीय शक्ति को धरती तक पहुंचाने का यंत्र बनें।
सात बार ऐसा करें। हर बार सात बड़े चक्र ऊर्जावान बन जाते हैं। अगर आप इसको सात बार से अधिक करेंगे तो जरूरत से ज्यादा ऊर्जा का अनुभव करेंगे और बेचैन होंगे।
जब अपनी प्रार्थना समाप्त कर चुके हों तो उपासना की अवरथा में ही सोने के लिए जाएं। उसी ऊर्जा में बने रहें और जब आप सोकर उठेंगे तो ताजगी भरा अहसास होगा और खोई हुई शक्ति पून: पाएंगे।
तकनीक के बारे में
यह एक प्राचीन और शक्तिशाली तकनीक है जो सूफी मत से ली गई है। यह इस्लाम की ही एक शाखा है।
ध्यान की तकनीकें
यह बहत ही आसान तकनीक है। इसमें केवल आपको गोल-गोल घूमना होगा जैसा कि बचपन में करते थे। तेजी से गोल-गोल घूमना एक शक्तिशाली तकनीक है केन्द्र पर ध्यान केन्द्रित करने की। इस तकनीक के बारे में सबसे सुन्दर बात यह है कि आपका शरीर गोल-गोल घूमेगा परन्तु अन्तर्तात्मा मध्य में ही रहेगी, गति रहित-बिल्कूल घूमते हुए पहिये के मध्य भाग जैसा जो स्थिर रहता है।
निर्देश
ध्यान के कम से कम तीन घंटे पहले से ही भोजन-पानी नहीं करेंगे। यह ध्यान दो भागों में होगा : तेजी से गोल-गोल घूमना और आराम करना।
घूमना
यह तकनीक आमतौर पर घड़ी की सूईयों के विपरीत दिशा में की जाती है। दांया हाथ ऊपर उठाएं, हथेली भी ऊपर उठी हुई, और बांया हाथ नीचे की ओर होना चाहिए, हथेली भी नीचे की ओर हो।
अगर आपको घड़ी के सूई की विपरीत दिशा में घूमने में परेशानी हो रही हो तो इसका उलटा करें। घड़ी की सुई की दिशा में घुमें।
घूमने का अभ्यास तब तक करें जब तक आरामदायक लगे। आप घंटों इसका अभ्यास कर सकते हैं, परन्तु ''ऊर्जा भंवर'' का अनुभव करने के लिए कम से कम एक घंटा गोल-गोल घूमना होगा।
धीरे-धीरे घूमना शुरू करें, अपने पूरे शरीर को कोमल बनाए रखें और वह प्रतिरोध न करे।
जब आप घूमेंगे तो गूजरती हुई तस्वीरें धुंधली पड़ती जायेंगी। उनको गुजर जाने दें। किसी चीज पर केन्द्रित होने की कोशिश न करें-यह आपको विभ्रान्त बनाएगा व उबकाई आएगी।
पहले १५ मिनट धीरे-धीरे घूमें अगले आधे घन्टे तक गति बनाएं। ४५ मिनट बाद आपको अनुभव होगा कि गोल-गोल घूमना पूरी तरह आपको अपने कब्जे में ले चुका है।
गोलाई की बाहरी सीमा पर क्रिया और गति होगी, परन्तु मध्य में गति रहित अवस्था होगी।
आप अनुभव करेंगे कि इस क्रिया के आप साक्षी हैं, प्रतिभागी नहीं।
आराम करना
जब आप बहुत तेजी से घूम रहे होते हैं, इतनी तेजी से कि सीधे नहीं हो सकते, आपका शरीर स्वयं ही गिर पड़ेगा। गिरने की योजना न बनाएं । यदि आपका शरीर कोमल व लचीला है तो आपको चोट नहीं आयेगी।
जैसे ही आप गिरते हैं, तुरन्त ही पेट के बल लेट जाएं जिससे आपकी नाभि धरती के सम्पर्क में आ जाए। अनुभव करें कि आपका शरीरधरती के साथ एक हो रहा है। अपनी आंखें बन्द करें। कम से कम १५ मिनट के लिए उसी अवस्था में रहें-निष्क्रिय एंव शांत।
इस ध्यान के बाद कुछ घंटों तक शान्त व ध्यानशील बने रहें।
क्रूछ लोग इस ध्यान के दौरान मिचली का अनुभव कर सकते हैं। यह कुछ दिनों में गायब हो जायेगा। अगर ऐसा नहीं होता है तो ध्यान केा रोक दें।
सूक्ष्म शरीर ध्यान
ध्यान के बारे में
ध्यान की यह तकनीक आपको स्वयं के दिव्य उपस्थिति का बोध कराती है। इस ध्यान का अभ्यास करना आपके लिए आसान होगा यदि आप स्पर्श तकनीक के आदी हों।
हम सभी के पास सात पिंड हैं। हर एक पिंड दैवीयता का द्वार है। भौतिक शरीर के बाद, दिव्य शरीर ही समझने के लिए आसान होता है क्योंकि यह भौतिक शरीर के सबसे पास है, भौतिक शरीर की सीमा के बस बाहर।
दिव्य शरीर भौतिक शरीर के साथ घूल-मिल कर खेल की तरह उसकी सीमा के बाहर चारों तरफ फैल जाता है।
निर्देश
जब आप रुपर्श तकनीक का अभ्यास कर लेंगे तो कभी-कभी आपको अनभव होगा कि आप भारहीन हो गये हैं. जैसे कि उड़ने के लिए तैयार हों। ध्यान की किसी अन्य तकनीक का अभ्यास करते समय भी, आपको ऐसा अनुभव हो सकता है। जब आप ऐसा महसूस करते हैं, तो आंखें बन्द कर लीजिए और अपने शरीर के प्रति जागरूक हो जाएं।
अपनी आकृति के बारे में जागरूक हों। बन्द आंखों से शरीर के हर अंग की आकृति का अनुभव करें। अपनी उंगली, हथेली, हाथ की आकृति का अनुभव करें। अपने पैरों, धड़ व सर का अनुभव करें। अपने सम्पूर्ण शरीर के आकृति के बारे में जागरूक हों।
जब आप अपनी आकृति का अनुभव करने का प्रयास करेंगे, तो वह आपके सामने आएगा। धीरे-धीरे आप ख्याल करेंगे कि आपके शरीर के चारों ओर एक नीली रोशनी है। यह रोशनी बढ़ती जायेगी, आपके शारीरिक आकृति के चारों ओर बढ़ता अदृश्य वातावरण।
प्रारम्भ में बन्द आंखों से इसका अभ्यास करें। जब आप इस अदृश्य वातावरण को अच्छी तरह देख सकेंगे, तब आप खूली आंखों से भी इसका अभ्यास कर सकते हैं। एक पूरी तरह अंधकार कमरे को चुनें। अच्छा हो रात को अभ्यास करें। जब आप अदुश्य वातावरण को बन्द आंखों से देखेंगे तो धीरे-धीरे आंखें खोलें। आप उसी नीले वातावरण को अपने शारीरिक आकृति के चारों ओर पाएंगे।
पहली बार आप अपने दिव्य शरीर को देखेंगे।
हम इस शरीर का जीवन में कई बार अनुभव करते हैं परन्तु हम इस बारे में जागरूक नहीं होते हैं। जब आप अजनबियों से भरे एक कमरे में जाएंगे और दोस्तों से भरे एक कमरे में जाएंगे तो अगर आपकी आंखों पर पट्टी बंधी हो तब भी आप आसानी से अंतर बता देंगे। जब एक व्यक्ति आपकी ओर शत्रृतापूर्ण रवैया रखता है, तो उसका दिव्य शरीर आपके उपस्थिति में सिकूड़ जाता है। जब आप गूस्से में होते हैं, बेचैन या दूखी होते हैं, तो आपको सिकूड़न का अहसास होगा। यह आपके दिव्य शरीर के सिकूड़न की प्रक्रिया है। जब आप अत्यधिक प्रिय व्यक्ति से मिलते हैं, दोनों को अहसास होता है कि दोनों का बहाव एक दूसरे की ओर हो रहा है। यह आपके दिव्य शरीर के फैलने की प्रक्रिया है। सजग न होते हुए भी हम दिव्य शरीर के सूचकों का प्रयोग स्थिति का मूल्यांकन या दूसरों से विचारों का आदान-प्रदान करने में करते हैं।
ध्यान की तकनीकें
जब आप अपने अदृश्य वातावरण को देखेंगे तो कुछ न करें। केवल बैठकर देखें। आपके देखते-देखते ही यह अदृश्य वातावरण फैलने लगेगा। यह और बड़ा होने लगेगा। जब आप कुछ नहीं करते हैं तो आपकी ऊर्जा बाहर की ओर नहीं जाती है। यह आपके दिव्य शरीर में जमा होती है।
जैसे-जैसे यह अदुश्य वातावरण शक्तिशाली होता जायेगा आपको गहरी शांति का अहसास होगा। खामोशी का अनुभव होगा। जब आप ध्यान की इस तकनीक का बार-बार अभ्यास करेंगे तो स्थायी शांति का अहसास होगा।
सूर्य ध्यान -
ध्यान के बारे में
प्रकाश पर ध्यान, इसके कुछ सुन्दर अनुभव ला सकता है। जब आप प्रकाश पर ध्यान कर रहे हों तो चारों ओर फैलने वाले शक्तिशाली ऊर्जा के साथ एकाकार हो जाते हैं। जीवन का बोझ संभालने वाले प्रवाह का आप हिस्सा बन जाएंगे।
निर्देश
अवधि २० मिनट
ध्यान की इस तकनीक का अभ्यास सूबह करें। सूर्योदय के साथ ही सभी वस्तुओं जिनमें जीवन हो सूर्य से ऊर्जा लेते हैं। इस महान लहर का हिस्सा बनें।
सूबह आप जैसे ही जागते हैं तो चाहें तो इस तकनीक का अभ्यास कर सकते हैं। केवल बिस्तर पर लेट जाएं, आंखें बन्द करें और सांस लें। जैसे ही सांसों को अन्दर लेते हैं, कल्पना करें कि आपके अन्दर जाती हुई सुनहरी रोशनी आपके मस्तिष्क के माध्यम से अंदर जा रही है। रोशनी आपके अंदर पैरों की उंगलियों तक जाती है। वहां से यह बहकर बाहर निकल जायेगी। यह न सोचें कि आप केवल कल्पना कर रहे हैं। आप जैसे-जैसे कल्पना करेंगे यह उसी क्रम में घटता जायेगा। असल में ऊर्जा आपके अंदर बहती है।
जब आप सांसों को बाहर निकालेंगे तो कल्पना करें कि इसका उल्लटा होगा। कल्पना करें एक घना अंधकार आपके पैरों की उंगलियों से चढ़ता हुआ मस्तिष्क तक जाता है। अंधकार मस्तिष्क द्वारा भाग जाता है।
सुनहरी रोशनी मर्द है-शक्ति देने वाला व बोझ सम्भालने वाला।अंधकार नारी है-शांत।
आप इसका अभ्यास रात को बिस्तर पर जाने से बिल्कुल पहले भी कर सकते हैं। यदि इसे करते हुए आप सो जाते हैं, तो एक बहुत ही अनोखा अनुभव होगा।
इसे दो या तीन महीने के लिए करें, आप अपने में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव पायेंगे। यह तकनीक आपकी यौन ऊर्जा (मूलाधार ऊर्जा) को ऊपर की ओर ले जाने के लिए बहुत अच्छी है| आपके पीठ के निचले हिस्से में हमेशा भार रहता है, यह अब भार मुक्त अनुभव करेगा। आपकी ऊर्जा ऊपरी केन्द्रों में चली जाती है।
यन्त्र ध्यान
ध्यान के बारे में
जब आप किसी वस्तु पर ध्यान करते हैं तो धीरे-धीरे आपके और उस वस्तू के बीच में ऊर्जा चक्र बन जाता है।
यंत्र या ऊर्जा के मानचित्र आवश्यक रूप से रेखागणित सम्बन्धी आकृतियां हैं जिसकी खुदाई धातु, लकड़ी पर की गई हो या कागज पर उकेरी गई हो।
आरम्भिक यंत्र आध्यात्मिक गूरूओं द्वारा इच्छानुरूप ध्यान के उन पलों में बनाए गये हैं, जब ध्यान का स्तर सर्वोच्च था। ध्यान की पूरानी पुस्तकों में, यंत्र को ब्रह्माण्ड के ढांचे का आकृति के रूप में प्रतिनिधि बताया गया है। जैसे कि शुण्डाकार स्तम्भों के ढांचों को ऊर्जा सोखने और बनाए रखने के लिए जाना जाता है, यंत्रों का भी एक निश्चित रेखागणितीय ढांचा होता है, जो लम्बी अवधि तक ऊर्जा का संग्रह करने की अनुमति देता है।
जब एक आध्यत्मिक रूप से विकसित इंसान यंत्र पर ध्यान करता है तो दुखों को हरने वाली ऊर्जा का स्थानान्तरण यन्त्र में कर देता है। यन्त्र तब एक बैटरी की तरह कार्य करने लगता है जो दूखों को हरने वाली ऊर्जा का संग्रह करता है। जब एक बीमार व्यक्ति उसी यंत्र पर ध्यान करता है तो ऊर्जा उसमें स्थानान्तरित हो जाती है और उसे आध्यात्मिक परमानंद की एक झलक का अनुभव होता है जिसने पहली बार रेखागणितीय आकृति को जन्म दिया है।
निर्देश
अवधि-२१ मिनट
चूंकि चक्र हमारे शरीर में ऊर्जा के मुख्य द्वार हैं, हम चक्रों के द्वारा ऊर्जा को बहत जल्द और कारगर तरीके से सोखते हैं। चक्र को दूखों से मुक्त कराने के लिए यह ध्यान दूखों का हरन करने वाले यंत्र का प्रयोग करती है।
जब किसी परेशानी का अनुभव हो तो चक्र पर ध्यान केन्द्रित करें। अपनी आंखें लगातार दूखों को हरने वाले यंत्र पर रखें, कल्पना करने की कोशिश करें कि यंत्र को चक्र में से देख रहे हैं। चक्र से अपना ध्यान यंत्र की ओर केन्द्रित करें। कल्पना करें कि ऊर्जा का बहाव यंत्र से आपकी तरफ हो गया है।
अपने और उस यंत्र में ऊर्जा चक्र बनाएं। बहाव को महसूस करें।
इसे ११ मिनट के लिए करें।
इसके बाद आंखें बंद करें और कल्पना करें कि आपके शरीर में यंत्र का प्रवेश चक्र के बिन्दू पर हो चुका है।
उस बिन्दु पर यंत्र को पकड़े रखें। आपके पूरे शरीर में उस ऊर्जा को फैलाने की आज्ञा दें। बीमार अंग या हाथ-पांव के मध्य दुखों को हरने वाली ऊर्जा का अनुभव करें।
इसे १० मिनट के लिए करें।
अगर चाहें तो इस चक्र को दोहरा सकते हैं।
इस ध्यान को लगातार २१ दिनों तक करें।
कभी भी कहीं भी ध्यान
खाते हुए, सोते हुए, चलते हुए, काम करते हुए, हर पल आपके दैनिक जीवन को आध्यात्कि अभ्यास में बदलने का मौका आपके पास है।
यहाँ तक कि जागरूकता के साथ किया जाए तो गाड़ी चलाना, संगीत सूनना, खेलना और बागवानी करना भी शक्तिशाली ध्यान की तकनीकें हो सकती हैं। हममें हरेक के द्वारा किये गये आसान से आसान दैनिक कार्यों को हर दिन के ध्यान में बदलने की तकनीक कुछ सुझावों के साथ दी गई हैं।
अचल ध्यान
ध्यान के बारे में
ध्यान की यह तकनीक ज़ेन से ली गई है। ज़ेन शब्द ज़ाज़ेन का अर्थ है केवल बैठना बहुत कठिन होता है कछ न करके सिर्फ बैठना बैठने का मतलब है मस्तिष्क को ढील दे देना। आपके दिमाग में इस तकनीक के खिलाफ कई तरह के तर्क, कारण, बहाने उठ सकते हैं।
यह आपको समझाने की कोशिश करेगा कि यह समय की बर्बादी है।
अगर आप इस पर डटे रहे तो आपका दिमाग सोने को तैयार हो जाएगा, यह दिवा स्वप्न होगा, यह भ्रम की शुरुआत कर सकता है।
इस ध्यान का आशय है कि दिमाग को जितना चाहे चाल चलने दें क्योंकि एक दिन दिमाग आपसे चाल चलते-चलते तंग आ जायेगा। उसे यह महसूस होगा कि अब वह अपने चालों से आपको अपने नियंत्रण में नहीं रख सकता।
तब दिमाग अपनी मर्जी से यह सब छोड़ देता है।
निर्देश
आप कहीं भी बैठ सकते हैं, परन्तु सुनिश्चित कर लें कि वहां किसी तरह का उपद्रव न हो। यदि वहां बहुत ज्यादा हलचल होगी तो आप परेशान हो सकते हैं या आपकी एकाग्रता भंग हो सकती है। प्रकृति को देखना अच्छी बात है। घर के अन्दर रहकर भी आप खिडकी से आकाश को देख सकते हैं। आप एक साधारण सफेद दीवार की ओर मुंह करके बैठ सकते हैं। या फिर आप कमरे के किसी कोने की ओर मूंह करके बैठ जाएं और उसे देखें।
अपना ध्यान किसी भी चीज पर केन्द्रित न करें। अपनी आंखेंअधखूली रखें और किसी भी चीज पर न गड़ाएं, अपने ध्यान को फैलाएं। कहीं दूरी पर अपनी कोमल दुष्टि से टकटकी लगाएं।
इससे आपको आराम मिलेगा।
आपकी सांसे स्वाभाविक व विश्राम की स्थिति में हो। एक आराम की मुद्रा खोजें और सुनिश्चित करें कि इस मुद्रा में रहने पर आप आधे घंटे तक नहीं हिलेंगे। अगर आवश्यक हो तो चटाई अथवा तकिये का प्रयोग करें। जब शरीर स्थिर हो जाता है, तो दिमाग अपने आप गतिरहित हो जाता है।
अपना मेरूदण्ड सीधा रखें। अगर सहारे की आवश्यकता हो तो लें परन्तु कोशिश करें कि सहारे के बिना ही ऐसा कर सकें।
एक हथेली दूसरे के अन्दर रखें, अंगूठे स्पर्श करते हुए गोला बनाएं।
सावधान और होशियार रहें. ग्रहण करने को तत्पर हों. किसी विशेष वस्तु पर अपने ध्यान को केन्द्रित होने की अनुमति न दें। पल-पल में उपस्थित रहें।
प्रारम्भ में कुछ न करते हुए केवल बैठे रहना बहुत मुश्किल होगा। परन्तु कुछ ही दिनों में आपको बहुत आनन्द मिलने लगेगा। परत दर परत, आप दिमाग को छूटते हुए अनूभव करना प्रारम्भ करेंगे।
अन्त में एक दिन ऐसा आयेगा जब दिमाग पूर्णतया छूट जायेगा। आपको शून्यता की अवरन्था की झलक मिलेगी।
तकनीक के बारे में
इस ध्यान की तकनीक का नाम सूफी संत अबदुल्ठाह से मिला है। अबदूल्राह हमेशा हंसते रहते थे और इस हंसते हुए चेहरे के कारण ही मशहर थे। कहा जाता है कि अपनी मत्यू श या पर वह हंस रहे थे। अन्त में उनके कुछ शिष्य अपने को रोक न सके और उनसे पूछा कि मृत्यू में इतनी मजेदार बात क्या है ?
तब अबदुल््याह ने इस रहस्य को अपने शिष्यों को बताया जिसकी शिक्षा उन्होने अपने गुरू से पाई थी। उन्होने कहा, याद रखना खुशियां हमेशा अपने हाथों में होती है। त्रम्हारी खुशियां १००% तुम्हारा अपना चुनाव है। प्रतिदिन जीवन तम्हें खुश होने का मौका देती है और दुखी होने का भी। यह तुम पर निर्भर करता है कि क्या चुनते हो।
निर्देश
इससे आसान ध्यान की तकनीक हो ही नहीं सकती। परन्तु इसके सादेपन से धोखा न खाएं यह सबसे साधारण और बुनियादी तकनीक है जो सच में काम की है। प्रति दिन सुबह जैसे ही आप जागें, आंखें खोलने से पहले बैठ जाएं। अपने आपको नाम से पुकारें।
अपने आप से पूछें. आज आप क्या चुनेंगे ? आप खुश होना चाहते हैं या दुखी ? स्वाभाविक है, आप दिन की शुरूआत दूख से नहीं करना चाहेंगे! तो आपका दिमाग कहेगा मैं खुशी को चुनता हूं।
अब इसका उत्तर दें, और बस खुश रहें।
यह बहत ही साधारण है! अब आप प्रतिदिन इस सच्चाई का सामना करेंगे कि खुशियां और दख आपके अपने हाथों में है, तब आप बाहरी परिस्थितियों को दोषी ठहराना छोड़ देगें।
आप खुश रहने की आदत डालेंगे-बाहरी परिस्थितियों के लिए नहीं बल्कि बाहरी परिस्थितियों के प्रतिकूल होने पर भी उनकी परवाह न करते हुए।
आप प्रसन्न हैं क्योंकि आप प्रसन्न हैं बरन।
अनिमा ध्यान
ध्यान के बारे में
क्या आपने ध्यान दिया है कि किसी-किसी दिन हम कितना भारी महसस करते हैं। असल में आप जिस भार का अनुभव करते हैं वह आपके शरीर का है आपका नहीं। आप भार शुन्य हैं। लगातार शरीर के साथ अपनी पहचान बनाएं रखने से हम सोचने लगते हैं कि भार हमारा है क्योंकि हम शरीर के साथ एक होते हैं।
स्नाभाविक है कि आपके शरीर का भार होगा क्योंकि वह पदार्थ है।
आपने ध्यान दिया होगा, एक व्यक्ति जब सोता है या बेहोश होता है तो उसका शरीर भी भारी हो जाता है, उसकी तूलना में जब वह जागता है तो शरीर हल्का होता है। जब आपकी चेतना जीवित रहती है, तब आप हल्के होते हैं। आपको हल्केपन का अहसास नहीं होता है, आप हल्के हो जाते हैं।
अपने अन्तर्तात्मा के एकदम सही हल्केपन का अनुभव करने के लिए आपको न केवल शरीर से परे जाना होगा बल्कि दिमाग के परे भी क्योंकि दिमाग का भी एक निश्चित भार होता है। जब आप दूखी होते हैं शारीरिक रूप से भार महसूस करते हैं। आपको लगता है कि कोई आपको खींचकर ले जा रहा है। जब आप प्रसन्न होते हैं तो आप हल्केपन का अहसास करते हैं जैसे कि आप हवा में चल रहे हों, क्योंकि जब आप प्रसन्न होते हैं आप शरीर और दिमाग को भूल जाते हैं। बिना प्रयास के, आप भार शून्यता का अनुभव करेंगे। परन्तु हमारे दैनिक जीवन में हम बाहरी परिस्थितियों द्वारा नियंत्रित होते हैं। इस ध्यान में हम इच्छानुसार भार शून्यता के अनुभव को पैदा करना सीखेंगे।
निर्देश
कहीं भी बैठ जाएं और सोचें कि आप भार शून्य हैं।
अपना मेरूदण्ड सीधा रखें और आंखें बन्द करें। जब मेरूदण्ड सीधा होगा तो भार शून्यता का अहसास करना प्रारम्भ करेंगे।
आप कैसे समझेंगे कि आपका मेरूदण्ड बिल्कुल सीधा हैं ?
सीधा बैठें, और धीरे-धीरे सम्पूर्ण मेरूदण्ड को आगे-पीछे करना प्रारम्भ करें। थोड़ा-सा हिलें। किसी एक बिन्दू पर अपने आपकोअधिक आरामदायक अवस्था में पाएंगे। इस बिन्दु को मध्य में रखते हुए अपने मेरूदण्ड को दोनों ओर हिलाना शुरू करें। अचानक किसी उचित स्थिति पर आपको अनुभव होगा कि आप हल्के हो गए हैं, प्राय: भार शून्य। यह वही बिन्दु है जहां गुरूत्वाकर्षण का केन्द्र न्यून होता है। इस दिशा में आपका मेरूदण्ड बिल्कुल सीधा होगा।
अब कल्पना करना शुरू करें कि आप भार शुन्य है।
प्रारम्भ में यह आसान नहीं होगा। आपको अपने भार का अहसास होता रहेगा। परन्तु अपने आप से कहते रहें कि आप भार शून्य हैं, भार शून्यता का अहसास करें। अचानक एक पल आएगा जब आपको महसूस होगा कि आप भार शून्य हैं और यही वास्तव है।
यह अपने आपको वशीभूत करने का तरीका नहीं है। असल में आप पूरी जिन्दगी इसी भ्रम में जीते हैं कि आपका भार है| आप शरीर के भार का अनुभव करते हैं और कल्पना करते हैं कि यह आपका भार है। यह अपने आपको वशीभूत न करने की प्रक्रिया है।
भारशून्यता को महसूस करते ही रहें।
जब आप बहुत गम्भीरता से ध्यान कर रहे होते हैं, तो आप अपने शरीर के साथ अपनी पहचान पूरी तरह तोड देते हैं| आप शरीर की सीमा को तोडते हैं| आपके पास असीमित ऊर्जा है। आप असीमित स्थान घेर सकते हैं। परन्तु आपने अपने को दबाकर शरीर के आयतन में डाल दिया है! आपके दुख, दर्द, भारीपन की यही जड़ है। आप जब इसे पहचान जाते हैं तो स्वयं में भार शून्यता का अनुभव करते हैं।
जब आप ध्यान में गहराई से जाते हैं तो आप शरीर को भी अपने साथ उठाकर ले जा सकते हैं। आपके चेतना की पूरी शक्ति शरीर को उठाकर ले जाती है। यह गुरूत्वाकर्षण को तोड़कर हवा में उठना शुरू करती है।
इसे आकाशगमिता कहते हैं अर्थात हवा में ऊपर उठ जाने की क्रिया। बहत सारे योगी और योगिनियां हैं जो हवा में ऊपर उठने की क्रिया को सम्पन्न कर सकते हैं।
भार शुन्यता का अनुभव होने का अर्थ है शरीर व दिमाग से मुक्ति। भार शुन्यता का अनुभव करने के लिए कूछ पलों के लिए ही सही पूर्ण रूप से चेतना का बोध होना आवश्यक है। यह तकनीक पूर्ण विश्राम व सम्पूर्ण काया कल्प है।
हास्य ध्यान
तकनीक के बारे में
कितनी बार आप हंसते हैं?
जब हम हंसते हैं तो इस बात से पूर्णत: अनभिज्ञ होते हैं कि हम एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अभ्यास कर रहे हैं।
अपने स्रोत से जुड़ने का सबसे अंतरंग तरीका है हँसी।
इतना आसान और इतना शक्तिशाली। यह ध्यान की एक ऐसी तकनीक है जिसका अभ्यास अपने जीवन में हर एक व्यक्ति ने कभी न कभी किया होगा। हँसी ऊर्जा का एक प्रबल स्रोत है। बस हँसें, और अनुभव कर सकते हैं कि ऊर्जा का उफान स्रोत से लहरों की भांति आगे बढ़कर आपको भर देता है।
जब आप हंसते हैं अपनी सीमा खो देते हैं। अपने समझ बूझ को खो देते हैं। आप हँसी द्वारा आक्रान्त हो जाते हैं।
क्या आपने ध्यान दिया है कि हंसना और सोचना एक साथ एक ही समय में असंभव है! जब आप हंसते हैं, हंसते जाते हैं तो अचानक उस पल का अनुभव होता है जब सोचना संभव नहीं रह जाता है। आपको शून्यता का अनुभव होता है।
मैं जिस हँसी की बात कर रहा हूं वह अशिष्ट हँसी नहीं है। न ही वह व्यंग्यपूर्ण अर्ध हँसी है। यह सौन्दर्य से भरपूर, अट्टाहास है जो आपके अस्तित्व को भर देती है और आपमें से बह कर निकलती है| यह बिना किसी कारण के हँसी है| आप हंसना हमेशा किसी कारण से शुरू करते हैं-परन्तु आप एक बार हंसना शूरू कर देते हैं तो हँसी आप पर हावी हो जाती है! तब आप इसलिए हंसते हैं क्योंकि आप हँस रहे हैं। हँसी का उल्लास आपको हंसाता रहता है। आपको इसके बारे में ज्ञान भी नहीं होता है।
एक जापानी साधू होतेई को लाफिंग बूद्धा कहते थे। उसके सारेआध्यात्मिक संदेशों को संक्षिप्त करके एक ही कर्म के अन्तर्गत लाया जा सकता है-हँसी। वह एक जगह से दूसरे जगह घूमते थे और सार्वजनिक स्थानों पर खड़े होकर हंसना शुरू कर देते थे उनकी हँसी पेट से उठते हुए गरज के साथ बाहर आती थी।
हँसी के मारे उनका पूरा शरीर कांपने लगता था। हँसी उनसे शुरू होकर ऊर्जा की विशाल लहर के रूप में फैल जाती थी। उनकी हुँसी इतनी संक्रामक होती थी कि उनके साथ पूरा नगर हंसने लगता था। पूरा नगर हँसी से आनंदमय हो उठता था। बिना किसी तकनीक के, प्रयास के यहां तक की बिना किसी ज्ञान के पूरे नगर को शून्यता की अवरथा की झलक मिल जाती थी।
कितनी उत्तम तकनीक है ध्यान की!
निर्देश
प्रतिदिन सबह, जागने पर सबसे पहले, बच्चों की तरह अपने हांथ-पांव को फैलाएं। क्या आपने ध्यान दिया है कि बच्चे नींद से जागने पर अपने हांथ-पांव को किस तरह फैलाते हैं। इस ओर, उस ओर फैलाएं, झूकें और शरीर को मरोड़ें। अनुभव करें कि आपकी सारी मांसपेशियां फैल गई हैं।
फिर आंखें खोले बिना ही हंसना शरू करें पहले तो यह प्रयास जैसा होगा। परन्त जल्द ही वास्तविक हँसी के बुलबूले आपके भीतर उठने लगेंगे। कुछ नहीं तो हास्य के प्रयास आपकी हँसी को वास्तविक हँसी में बदलने के लिए काफी होगा।
एक बार हँसी आपके उपर छा जाए, उसे छाने दें। हंसने की कोई अवधि नहीं है। जब तक आप हंसते-हंसते हँसते हँसी से तंग न आ जाएं तब तक हंसते रहिए। जैसे-जैसे आप आगे बढते जाएंगे, तो आपको लगेगा कि हँसी को ज्यादा देर तक सहन कर सकते हैं।
ब्रद्धा ने कहा है कि अगर आप लगातार पैंतालिस मिनट तक हँस सकते हैं तो आप आलोकित हो जाएंगे । केवल पैंतालिस मिनट की हँसी।
तो जितनी देर हँस सकते हैं हंसिए। हँसी के उफान को अपने अन्दर बनाए रखने के लिए आपको ऊर्जा का अहसास होगा।
हँसी खत्म होने के काफी देर बाद भी आपके अन्दर सतह के नीचे हँसी की लहर बनी रहेगी। सूबह की हँसी के कुछ मिनट आपका पूरा दिन बदल सकता है।
मौन बिन्दु
तकनीक के बारे में
यह ''सुनने वाला ध्यान'' है।
सुनने वाला ध्यान निष्क्रिय ध्यान है। आपको सुनने के अलावा और कुछ नहीं करना है। परन्तु केवल सुनने से ही बहुत कुछ घट सकता है।
हम हमेशा ध्वनि के तूफान में जीते हैं। ध्वनि हमेशा हमारी ओर बढ़ रही है, हमें कुचल रही है, हमें निगल रही है। हम तुफान में खो जाते हैं। परन्तु तुफान के मध्य में एक खामोशी होती है जिसे हमने नहीं सूना है। यह ध्यान हमें ध्वनि के तूफान के केन्द्र बिन्दू की खामोशी का ज्ञान कराती है।
निर्देश
किसी भी स्थान पर बैठ जाएं। जितना शोरगुलयूक्त स्थान हो उतना ही बेहतर है। एक ऐसे स्थान की तलाश करें जहां लगातार आवाज होती हो। यह प्राकृतिक आवाज भी हो सकती है, जैसे कि नदी का बहाव या झरना अथवा रेलवे स्टेशन या बाजार।
खामोशी से बैठें। हर दिशा से लहरों की भांति अपनी ओर आती हई ध्वनियों को महसूस करें। जब हर दिशा से ध्वनि आपकी तरफ आने लगेगी तो अपने आपको ध्वनि के तूफान के केन्द्र बिन्दू में महसूस करें।
आप केन्द्र बिन्द्र में हैं और ध्वनियां आपकी ओर बह रही है।
महसूस करें कि आप केन्द्र बिन्दू में जहां पर हैं वहां पर ध्वनि नहीं है। केन्द्र बिन्द्र में पूर्ण खामोशी है। यदि केन्द्र बिन्दू में भी ध्वनि होती तो आप बाहर की ध्वनियों को नहीं सुन सकते। ध्वनियां आपके भीतर प्रवेश कर रही हैं, आपको वेध रही हैं, पर वह केन्द्र बिन्दू में जाकर रूक जाती है।
आपके भीतर एक ऐसा बिन्दू है जहां सब ध्वनियां रूक जाती हैं। यह वह बिन्दू है जहां से सब ध्वनियां सूनाई देती हैं। उस केन्द्र बिन्दू का पता लगाएं।
अचानक आप उसका पता लगा लेंगे। अचानक आपकी जागरूकता भीतर की ओर मुड जाएगी।
आपकी जागरूकता बाहरी दुनिया की ध्वनि से हट जाएगी। आप केन्द्र बिन्दू में होंगे. जहां पर खामोशी है। वहां पर एक बिन्दु होगा जहां ध्वनि प्रवेश नहीं कर सकता। वह बिन्दू आप हैं। आप एक बार खामोशी को सुन लेंगे, तो कभी भी ध्वनि से आपकी शांति भंग नहीं होगी, ध्वनि आपको स्पर्श नहीं करेगी।
हम हमेशा सोचते हैं कि ध्वनियां हम कानों से सूनते हैं। परन्तू न हम कानों से सूनते हैं, न ही मस्तिष्क से, हम नाभि बिन्दू से सुनते हैं। इस बात का अनुभव हमें इस तकनीक से होता है। नाभि बिन्दू ध्वनि का केन्द्र बिन्दू है।
शोर-शराबे पर इतना अधिक बल क्यों? क्योंकि अत्यधिक शोर भी कानों पर वही असर डालती है जो कानों को बन्द करने से होती है। जब ध्वनि अस्पष्ट और लगातार हो, आप अलग-अलग ध्वनियों में अंतर न कर सकें. तो ध्वनि स्वयं ही बाधा बन जाती है। गानों पर आप इस तकनीक का प्रयोग नहीं कर सकते क्योंकि उसकी भाषा रुपष्ट होती है, आप उसके अर्थ पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, तुरन्त ही दिमाग का इस्तेमाल करने लगते हैं। इस तकनीक का प्रयोग केवल ध्वनि पर कर सकते हैं।
जब शोर हो रहा हो तो उसके बीच में ही अपने कानों को उंगलियों से बंद करें। अचानक आप एक नई ध्वनि को सूनेंगे-ध्वनि रहितध्वनि। यह नई ध्वनि, ध्वनि की अनुपस्थिति है। एक ऐसी ध्वनि जिसे आप आसानी से सून सकेंगे! ध्वनि के साथ, हम ध्वनि के स्रोत की ओर बहने लगते हैं ध्वनि रहित अवस्था में, हम अन्दर की ओर बहने लगते हैं, अपने केन्द्र बिन्दु में।
दोनों को सनना सीखें, ध्वनि रहित ध्वनि एवं बाहर के ध्वनि की दनिया। एक से दसरे में जाएं। बाहर से अंदर जाएं और वापस आएं। हर बार किसी विषय को समझने के ढंग का पैनापन बढता ही जाएगा। अंदर और बाहर आसानी से आना-जाना सीखें। आप उस खेल को देखेगें जो सब कुछ है।
प्रत्याहार ध्यान
ध्यान के बारे में
यह तकनीक बाहरी दुनिया से आपकी ओर आती हुई सब संकेतों को बन्द कर देती है। आप दुनिया से जो भी अनुभव करते हैं वह आपकी पांचों इन्द्रियों-दुष्टि, ध्वनि, स्वाद, गंध एवं स्पर्श से जो सूचनाएं आपको मिलती है उसी से करते हैं। इन्द्रियों द्वारा मिली हर अनुभव को ध्यान की यह तकनीक नकारती है। जब आप दुनिया के सामने अपने को बंद करते हैं तो शरीर के सामने भी अपने को बंद करते हैं। आपकी ऊर्जा अंदर लौट जाती है।
निर्देश
यह ध्यान कहीं भी कभी भी किया जा सकता है।
इस पल आप जहां कहीं भी हों, इन्द्रियों द्वारा आप तक आने वाले संकेतों पर ध्यान दें। आप बगीचे में फूलों को देख सकते हैं। चिड़ियों का गाना सुन सकते हैं। अपने पैरों पर चीटिंयों के चढ़ने का अनुभव कर सकते हैं।
आप क्या करते हैं?
बस अपने इन्द्रियों को बन्द कर लें।
कल्पना करें कि आप अंधे हो गए हैं, पक्षियों का चहचहाना नहीं सुन सकते हैं, चींटी का चढ़ना महसूस नहीं कर सकते हैं।
कल्पना करें कि आप पत्थर की मूरत बन गये हैं, आप बर्फ जैसे जम गये हैं। कल्पना करें कि आप अब हिल-डुल नहीं सकते। इस अनुभूति को गहराई से महसूस करें। आप कर सकते हैं।
कैसे ?
एक पल के लिए अपनी सांस रोकें, आपकी इन्द्रियां अपने आप बन्द हो जाएंगी। जब सांसें रूक जाएंगी, तो उत्तेजना भी बन्द हो जाएगी। अपनी सांसों को रोकें और देखें। क्या आप अपनी त्वचा पर उत्तेजना को महसूस कर सकते हैं ? ध्वनि भी पीछे हटती हई दूर चली जाती है। आपका शरीर असल में जमने का अनुभव करता है| आप अपना हाथ भी नहीं उठा सकते।
विश्राम करने के लिए यह अति उत्तम तकनीक है।
जब आप बाहर की ओर बहना बंद कर देंगे. जब आप इन्द्रियों के द्वारा सूचनाएं प्राप्त करना बंद कर देंगे, आप वापस अपनी ओर लौट जाते हैं अर्थात् पूर्वावस्था में आ जाते हैं। आप खामोशी का द्वीप बन जाते हैं। इस खामोशी में अपने केन्द्र को पा लेंगे। एक बार जब आप खोजते हैं, सुनते हैं तो ऐसा अपने केन्द्र के खामोशी के बिन्दू से करते हैं। एक बार आप इस इस बिन्दू को खोज लेंगे तो इन्द्रियों के कोलाहल में कभी नहीं खोएंगे। अपनी इच्छा से इन्द्रियों पर प्रतिबन्ध लगा सकते हैं, अपनी इन्द्रियों के आप साक्षी बन जाते हैं।
स्फूर्ति बाण
तकनीक के बारे में
शुरूआत करने वालों के लिए वह ध्यान सर्वोत्तम है जिसमें आप कूछ करते हैं। जब आप क्रिया करते हैं तो जागरूकता बनाए रखना आसान होता है न कि गति रहित अवस्था में बैठे रहने से।
यह ऊर्जा उत्पन्न करने वाला ध्यान है, ''दौड़ लगाकर ध्यान''
दौड लगाकर क्यों ?
जब आप दौड़ लगाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से सावधान और होशियार हो जाते हैं। जब आप दौड़ते हैं तो शरीर, दिमाग और अन्तात्मा की सुन्दर एकता का अनुभव करते हैं। जैसे कि आपके भीतर सब कुछ एक ही लक्ष्य के साथ एक होकर काम कर रहा हो।
जब आप गति रहित अवस्था में बैठे रहते हैं तो आपका शरीर स्थिर होता है, दिमाग तब भी भागता है! आपका दिमाग और शरीर पुथक् हो जाता है शरीर बैठा रहता है, परन्तु दिमाग अपनी यात्रा पर निकल जाता है।
जब आपका शरीर दौड़ता हैं, तो इसका उलटा होता है।
जब आप दौड रहे होते हैं. तो दिमाग स्थिर बैठता है। आपका दिमाग बात करना बंद कर देता है। जब आप दौडना जारी रखते हैं, तो कुछ देर बाद दौड आप पर हावी हो जाता है। तब न शरीर आपका होता है न दिमाग। आप अपनी दौड़ के होते हैं| आप दौड़ बन जाते हैं।
निर्देश
दौड़ शुरू करने के लिए एक समय चुनें। भोर का समय सर्वोत्तम है, उसके बाद सबसे अच्छा है देर शाम। सूर्योदिय और सूर्यास्त के समय आपका शरीर सबसे अधिक खूला होता है, प्रकृति की ऊर्जा कोअधिक ग्रहण कर सकता है अर्थात अधिक ग्रहणशील। एक ऐसा मार्ग चूनें जो ज्यादा कठिन न हो, सामन्यतः सीधा और आसान हो। जिसमें काफी खामोशी और एकान्त हो। एक ऐसा मार्ग जिसमें किनारे से गिरने का डर न हो या फिर भीड़ में कुचले जाने की चिंता। मार्ग ऐसा होना चाहिए जहां आप अपना ध्यान दौड पर केन्द्रित कर सकें।
यदि आप दौड़ने के आदी नहीं हैं तो कम दूरी से प्रारम्भ करें-जैसे आधा मील। फिर आप दूरी को धीरे-धीरे बढ़ाएं।
उसके बाद बस दौड़ें।
पेट से गहरी सांस लें। शरीर के सभी अंगों के साथ दौर्डे।
जब आप थक जाएं, तो अपने को आगे न धकेलें। आराम करें और बाकी समय आनंद लें। अपने जतों को उतारें और नगें पांव से धरती का अनुभव करें। ऊर्जा के एक स्रोत के साथ हमारा रिश्ता टूट चुका है। वह है धरती की ऊर्जा क्योंकि हर जगह आजकल
कुत्रिम फर्श होता है और हमें नंगे पैर चलने में कोई आनंद नहीं मिलता। भारतवर्ष में. नंगे पैर चलना एक पवित्र अभ्यास है। इसीलिए बहुत सारे पूजा स्थलों के अन्दर जूता पहनकर नहीं जा सकते। इन स्थानों का ऊर्जा स्तर ऊँचा होता है, और अति उत्तम होगा अगर हम ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए अपनी सारी इन्द्रियों को खुला छोड টিভ
यदि मार्ग अच्छा है, तो उस पर नंगे पैर दौडना एक असाधारण अनुभव है। घास पर इसका प्रयोग करें या समुद्र तट पर। हम केवल धरती का रुपर्श होने से ही जीवन के स्रोत से जूड़े रहते हैं।
केन्द्रित रहने का यह एक सुन्दर तरीका है।
अतिरिक्त दौड़ने के चक्कर में फंस न जाएं। अपने आपको समय में न बांधें. अपने प्रदर्शन को सुधारने की कोशिश न करें। वजन घटाने के लिए भी न दौडें। अगर इस दौरान आपका वजन घट जाता है तो अच्छी बात है| किसी प्रयोजन के लिए न दौड़ें। बस दौडें।
अगर कुछ दिन दौडने के बाद, आपको यह कार्य नीरस लगने लगता है, तो इसे छोड दें और किसी दूसरे ध्यान को अपनाएं। तैरने या नृत्य करने की कोशिश करें। जब इच्छा हो तो पून: दौड़ना प्रारम्भ करें। ध्यान के लिए जो निर्देश बने हैं उनका ही पालन करें। स्वयं कोई नियम न बनाएं वरना ध्यान का आनन्द नष्ट हो जाएगा।
पाँच मिनट में स्फूर्ति देने वाला
काम के दौरान जब आपको तनाव महसूस होता है तोसाधारणतः आप क्या करते हैं?
या एक लंबे दिन के अन्त में थक जाते हैं तो?
कुपा करके सिगरेट का कश न लें, या टी.वी. न चलाएं।
एक छोटा-सा ध्यान का सत्र आपको कुछ ही मिनटों में रुफूर्ति प्रदान करेगा। यहाँ आपको पाँच मिनट में स्फूर्ति देने वाले कुछ आसान से तकनीक बताए गये हैं जिनका प्रयोग आप कार्य के दौरान या घर पर कर सकते हैं।
चरम उच्छावास
ध्यान और निर्देश
जब आप तनावग्रस्त हों तो ध्यान की यह तकनीक आश्चर्यजनक रूप से काम करती है।
बहत अधिक गहराई से साँस बाहर निकालें।
हमेशा शुरुआत साँस बाहर निकालने से ही करें।
गहराई और शक्ति के साथ साँस बाहर निकालने पर ध्यान केन्द्रित करें। जब आप पूरी तरह से साँस बाहर निकाल लें तो अपना पेट अंदर को खींचें और पूनः साँस लेने से पहले तीन सेकेंड तक रुकें।
जितनी गहरी साँस आप ले सकते हैं लें। तीन सेकेंड के लिए साँस रोकें। फिर साँस बाहर निकालना शुरु करें।
फिर से साँस लें और बाहर निकालें। साँस लेने, निकालने में लय का सुजन करें। धीरे चलें, साँसों को पूरी तरह से शरीर में प्रवेश करने दें व शरीर को छोड़ने दें।
जब आप गहराई से साँस बाहर निकालते हैं, तो आप अपने शरीर का पूरा विष बाहर निकाल देते हैं। आप तनाव को बाहर निकालते हैं। साँस लेने के १०-१२ चक्रों के बाद आप महसूस करेंगे कि चिंता और तनाव घट चुका है!
हथेली के द्वारा
ध्यान के बारे में
यह तकनीक भौं चक्र को शक्ति देती है जो आपके ललाट पर दोनों भौंहों के बीच में है। इस चक्र को अज्न कहते हैं जिसका शाब्दिक रूप से अनुवाद है आज्ञा।
यह मुख्य चक्र है। यह चक्र मानसिक शक्ति का स्थान है। जब यह सक्रिय हो जाएगा तो ब्रुद्धि में प्रबल स्पष्टता का अनुभव करेंगे। आपकी तर्कशक्ति और निर्णय लेने की योग्यता बढ़ जायेगी।
प्रधानतः तीसरी आंख अपने अंदर देखने वाली आंख है। आप अपने अंदर पहली बार देखेंगे।
निर्देश
एक आरामदायक स्थान पर अपनी आंखें बन्द करके बैठें।
अपने दोनों हथेलियों को धीरे-धीरे सावधानी के साथ नेत्र गोल्कों पर रखें। आपका स्पर्श एक पंख की तरह होना चाहिए। किसी तरह उसको दाबें नहीं। प्रारम्भ में बिना जाने बूझे शायद आप दबा रहे होंगे। धीरे धीरे नेत्र गोलकों को दबाना कम करते जाएंगे। वहां आंखों से ऊर्जा बाहर की ओर बहती है। यह बहुत बारीक ऊर्जा है। जब आप नेत्र गोलकों का स्पर्श करेंगे तो ऊर्जा का बहाव वापस आपके अन्दर होने लगेगा। अगर आप
नेत्र गोलकों को दाबेंगे तो आंखें प्रतिरोध करेंगी। आपको उन्हें इस तरह से स्पर्श करना है जैसे उन्हें स्पर्श कर ही नहीं रहे हैं।
जब आप कोमलता से स्पर्श करेंगे, तो आपके विचार भी स्थिर हो जाएंगे। जब आपकी आंखों की गतिविधियां बढ़ती हैं तो विचार भी दौड़ने लगते हैं। क्या आपने ख्याल किया है जब आंखें स्थिर हो जाती हैं, तो विचार भी स्थिर हो जाते हैं।
कोमलता से स्पर्श करने पर भी आप तुरन्त महसूस करना प्रारम्भ करेंगे कि ऊर्जा वापस अंदर की ओर जा रही है। जब ऊर्जा वापस चली जाएगी, आप को तूरन्त ही रूफूर्ति और एक हल्केपन का अनुभव होगा जो आपके चेहरे और सर पर फैल्र जाएगी। ऊर्जा अज्न चक्र पर असर करती है। कुछ ही मिनटों में आप स्पष्ट और शक्तिदायक बन जाते हैं।
जब आप ध्यान को आधे घंटे तक जारी रखते हैं तो ऊर्जा धीरे-धीरे नीचे हृदय की ओर चली जाती है। आपकी हृदय गति धीमी हो जाती है और पूरा शरीर आराम की स्थिति का अनुभव करती है।
तुरन्त आराम पाने के लिए यह सर्वोत्तम तकनीक है। आपको ध्यान में प्रवेश करने की भी आवश्यकता नहीं है। आप बस नेत्र गोलकों पर कोमलता से हथेली रख कर आंखों को विश्राम दे सकते हैं। टी.वी. या कम्प्यूटर के सामने कई घंटे बिताए हों तो इस तकनीक का प्रयोग करें या जब भी आंखें थक जाएं तो इससे आपको आराम मिलेगा।
जब आप महीनों तक इस ध्यान को करना जारी रखेंगे तो आप अपने अज्न और हृदय क्षेत्रों में स्थायी ऊर्जा का अनुभव करना प्रारम्भ करेंगे। शुरूआत में ऊर्जा की एक पतली धार होगी, परन्तु एक वर्ष बीतते-बीतते आप हर समय अपने अंदर ऊर्जा की बाढ़ का अनुभव करेंगे।
अज्न के जागने के साथ ही आप उददेश्य में स्पष्टता का अनुभव करेंगे। आप अपनी वास्तविकता को स्वयं ही देखना प्रारम्भ करेंगे। हृदय चक्र के सक्रिय होने के साथ ही आप अनुभव करेंगे कि आपके अंदर से अत्यधिक प्रेम बहकर बाहर आ रहा है। अपने को अस्तित्व के साथ जुड़ा हुआ पाएंगे।
हाथ पैर ढीला करना
निर्देष और ध्यान
तत्काल विश्राम पाने का यह सबसे तेज और सबसे अधिक लोकप्रिय तकनीक है। यदि कोई सुरक्षित स्थान उपलब्ध हो, तो इस तकनीक का अभ्यास लेटकर करें।
आंखें बंद करें।
एक गहरी सांस पेट से लें। आप अपनी सांस रोकने जा रहे हैं, इसलिए जितनी गहरी सांस ले सकें लें।
सांस अपने अंदर रोककर एक-एक करके अपने शरीर के अंगों को जकड़ना प्रारम्भ करें। पंजे से प्रारम्भ करें।
पंजों को जितना तान सकें तानें। उनको ढीला न करें। पैरों से ऊपर की ओर जाएं। टखनों से होते हुए घूटने और नितम्ब तक जाएं। तूरन्त ही ऊपर की ओर चलते जाएं क्योंकि आप ज्यादा से ज्यादा एक मिनट तक ही सांस रोक पाएंगे।
अब कमर से होते हुए पेट तक जाएं। पेट की मांसपेशियों को जितनी मजबूती के साथ संभव हो तानें। अपने आप ही रान की मांसपेशियां भी तन जाएंगी।
ऊपर की ओर छाती और पीठ तक आएं। पीठ के साथ रीढ़ की हड्डी के खंड को भी तानें। हाथों को तानें-उंगलियों से लेकर भूजा के ऊपरी भाग तक। कंधे, गरदन और गले की मांसपेशियों को तानें। विशेष रूप से कोशिश करें कि गरदन की मांसपेशियों पर खिंचाव बना रहे।
चेहरे तक जाएं।
आपके चेहरे पर इतनी मांसपेशियां हैं कि इसकी जानकारी आपको भी नहीं है। मुख, नथना. आंखें. भौहें. माथा और गाल की मांसपेशियों को तानें। पलकों को दबाकर बंद करें। दांतों को मरोड़ें। चेहरे को एक सख्त गेंद की तरह कस दें। याद रखें इस अवधि के दौरान अपने बाकी के शरीर को आराम न दें।
खिंचाव की इस अवस्था में आप जितनी देर तक रह सकते हैं रहें। जब अपनी सांस को और नहीं रोक पाएंगे. तो एकाएक जोर से उसे निकाल दें. साथ ही साथ हाथ, पैर और चेहरे को पूरी तरह से विश्राम की स्थिति में ले जाएं। इस शारीरिक और मानसिक विश्राम की स्थिति में एक मिनट तक रहें।
यह तकनीक शरीर और दिमाग दोनों को विश्राम देता है, और दो मिनट में रूफ़र्ति प्रदान करता है। यदि आपके पास समय हो तो इस प्रक्रिया को तीन बार दोहराएं।
सात दिवसीय चक्र प्रक्रिया
आनंद स्पुरन ध्यान
चक्र क्या है?
चक्र हमारे शरीर में सुक्ष्म ऊर्जा की धुरी हैं। सात बडे चक्र हैं मूलाधार, स्वादिष्ठान, मणिपुराका, अनाहत् विशुद्धि, अज्न और सहसरार, इनका कोई शारीरिक स्थान निर्धारित नहीं है, परन्तु ये ऊर्जा चक्र शरीर की लम्बाई में उपस्थित हैं| ये कभी-कभी आदान-प्रदान करते हैं, और शरीर की महत्वपूर्ण ग्रन्थियों की सक्रियता को प्रभावित करते हैं। चक्र हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालते हैं। बदले में यह हमारे विचारों और भावनाओं से प्रभावित होते हैं।
चक्र ब्रह्माण्ड के बंधन रहित ऊर्जा का सीधा मार्ग है। परन्तु अमर्यादित जीवन शैली, तनाव और नकारात्मक भावना चक्रों में अवरोध पैदा करती है. या इसी कारणवश वह काम नहीं करते। इसके बारे में जानकार न होते हुए भी हम ऊर्जा के महत्वपूर्ण स्रोतों को लगातार बंद कर रहे हैं।
ऊर्जा स्वास्थ्य है। इसलिए प्रायः सभी शारीरिक और मानसिक बीमारी पूर्णतः या कुछ हद तक चक्रों की सफाई और उनमें शक्ति का संचार करने से ही ठीक हो जाती है।
आनंद रूपुरन कार्यक्रम (ए.एस.पी.) में क्या होता है?
आनंद स्परन कार्यक्रम में दो दिवसीय शिविर लगता है जिसमें ध्यान द्वारा चक्रों को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया सिखाते हैं। शिविर में हर चक्र की प्रकति और भमिका के बारे में सिखाते हैं एवं सातों चक्रों की सफाई तथा पून: सक्रिय करने हेतु सात शक्तिशाली तथा व्यावहारिक ध्यान की तकनीकें बताते हैं।
ध्यान की इन सभी तकनीकों का हफ्ते में एक बार निःसंकोच रूप से अभ्यास किया जा सकता हैह ( सिवाय स्वाधिष्ठान चक्र के लिए निर्भय ध्यान का) या आप किसी एक तकनीक का चुनाव करें जो आपको सबसे अधिक भाए। ( महामंत्र, दुख्खा हरण एवं मणिपुराका, शुद्धिक्रिया प्रारंभ करने वालों के लिए सबसे अधिक सहायक होगी) और इसको २१ दिन तक जारी रखें। इसके बाद आप एक नए तकनीक का प्रयोग कर सकते हैं। इन तकनीकों का अभ्यास यदि ईमानदारी से किया जाय तो शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक स्तर पर चमत्कार दिखा सकती है।
सातों तकनीकों के लिए निर्देशों के टेप उपलब्ध हैं।
द्:खहरण ध्यान (फंतासी उन्मुलक)
स्वस्थ होनेवाला चक्र : मूलाधार चक्र का स्थान : मेरुदण्ड का आधार चक्र के अस्वस्थ होने के कारण : फन्तासी (दिवास्वप्न) और अपेक्षायें चक्र के स्वस्थ रहने की मनोस्थिति : सत्य की समझ
ध्यान विधि का स्त्रोत
दु:खहरन ध्यान करने की विधि (कुल समय: ३० मिनट)
इस ध्यान को दु:खहरन कहते हैं और इसे कुलार्नव तंत्र से लिया गया है। यह ध्यान सभी अवचेतन में दबी भावनाओं को बाहर करके दूर कर देता है। बहुत से महात्माओं ने इस ध्यान का प्रयोग किया है पहले और इस ध्यान में कुल ३० मिनट लगेगा।
मनुष्य के श्वास प्रश्वास की क्रिया, वस्तुतः समग्र विश्व के साथ एक सेतु की तरह है। इस प्रक्रिया के द्वारा आपका मनस कार्यशील होता है। यदि आप शान्तचित्त हैं तो श्वसनक्रिया भी शान्त होगी और यदि उद्विग्नता है मन में तो यह क्रिया भी असंतुलित होगी। अतः मन को संयमित करने के लिये श्वास-प्रश्वास क्रिया का संयमित होना आवश्यक है।
अभी हम अपनी दबी हुई आकांक्षाओं के साथ अर्द्धमृत के रूप में जीवित हैं। ध्यान के पहले भाग में, गहरी श्वास लेनी है ताकि दबे हुए अवचेतन मन का
मंथन हो सके। आपका मानसिक तल पूर्ण जीवन्त हो जाता है, अधिक आक्सीजन के अन्दर जाने के कारण। सभी सेल को अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है। अतः उनसे अधिक जीवनी शक्ति उत्पन्न होती है। यह बढ़ी हुई जीवनी शक्ति, दबी हुई वासनाओं को गला देता है। बिल्कुल उसी तरह जैसे बर्फ पिघलती है। जैसे आग को हवा दी जाती है, वैसे ही यह मूलाधार चक्र को हवा देता है। यह ध्यान, खाली पेट करना है और प्रात:काल का समय अधिक उचित है। २१ दिन तक इस ध्यान का लगातार प्रयोग आपके अन्तरतम को बदल देगा और आपका चेहरा और शरीर कान्तिमान बन जायेगा। यह मनस को स्नान कराने जैसा है। इस ध्यान में आप अपने अन्दर शान्ति एवं नि:शब्दता का अनुभव कर पायेंगे। इस विधि से आप अपने दु:खों को विनष्ट कर देंगे तब आपके अन्दर आनन्द पुष्पित हो उठेगा और आपके आसपास सुवास फैलने लगेगी ।
खड़े हो जाइये और आँखों को बंद कर लीजिए, फिर लयबध्द तरीके से खूब गहरी श्वास-प्रश्वास लेना प्रारम्भ कीजिए। सदैव नासिका के द्वारा ही लगें और मुख बन्द रहेगा। हाथों को उठाइये, घुटनों को थोड़ा मोड़िये और झुक जाइये जैसे आधे बैठे हों फिर सीधे खड़े हो जाइये। पक्षी जैसे ऊपरनीचे होता है उड़ते समय वैसे ही करिये, घुटनों को मोड़ते और सीधा करते साथ में हाथ ऊपर-नीचे हों, यह सब, गहरी श्वास और प्रश्वास के साथ लयबद्ध होकर।
ये सभी शरीर संचालन मधुरता के साथ करिये, झटके से नहीं, अन्दर आती श्वास के साथ शरीर सीधा करिये एवं बाहर जाती श्वास के साथ घुटनें थोड़ा मोड़ने और शरीर थोड़ा झुकाने (बैठने की तरह) की क्रिया। जिनको हृदय रोग की समस्या हो, वे उतना ही करें जितना उनके लिये आसान हो और सुविधापुर्वक हो सके। जो स्त्रियाँ गर्भ से हैं, या और व्यक्ति जिनको किसी तरह की शारीरिक समस्या हो, वे अपनी क्षमता के अन्दर ही सुविधापूर्वक जितना हो पाये उतना ही करें। यह क्रिया १० मिनट तक करनी है।
अब अगले १० मिनट, अपनी आँखें बन्द रखे और खड़ेखड़े ही अपने शरीर के सभी हिस्सों को एक एक करके तानें और ढीला छोड़े। एक अंग ताने, ढीला करें फिर दूसरा ताने और ढीला छोड़े। इस तरह एक एक अंग पर यह तानने और ढीला छोड़ने की प्रक्रिया करते जायें। पैरों से प्रारम्भ करें फिर टाँगे, कुल्हे, फिर पेट, फिर पीठ, फिर छाती, फिर बाँहे और उंगलियाँ, फिर कन्धे, फिर गर्दन, फिर चेहरा और अन्त में सर का ऊपरी हिस्सा। जो अंग तनाव में लाया गया उसको आप कितना भी प्रयत्न कर लें, आप कुछ नहीं देख पा रहे हैं। मात्र स्पर्श से ज्ञात हो रहा है कि आप वहाँ हैं .... (१ मिनट)। आप इसी तरह अन्धकार से उत्पन्न हुए में जो आपकी माता के गर्भ में था और उसी प्रेमपूर्ण, करुणामय अन्धकार में आप विगलित हो रहे है, लय हो रहे हैं … (१ मिनट)
गहरा अन्धकार जो सब तरफ से आपको घेरे हुए हैं उसको गहरी श्वास द्वारा अपने अन्दर ले लीजिए। गहरा घना अन्धकार जिसमें आपकी पहचान खो गई है। उसको गहरी श्वास से अपने अन्दर भर लीजिए। .... (५ मिनट)
धीरे, बहुत धीरे, अनुभव कीजिए कि आपका शरीर उस अन्धकार में लीन हो रहा है, लय हो रहा है। ... (५ मिनट)
धीरे, बहुत धीरे धीरे, अनुभव कीजिए, आपका शरीर अन्धकार बनता जा रहा है।
अपने परे शरीर से अपने अन्दर उस अन्धकार की श्वास लीजिए। शरीर के कण कण से उस अन्धकार को अपने अन्दर लीजिए... (१५ मिनट)
अब अपने शरीर को अनुभव करना प्रारम्भ कीजिए। अपनी सभी इन्द्रियों के द्वारा अपने शरीर का अनुभव करिये। अब अपने शरीर को, उसी बैठी हुई स्थिति में धीरे धीरे हिलाइये। अब आप खड़े हो गये हैं और उस गुफा के बाहर निकल रहे हैं। अब आप उस घने जंगल से बाहर आ रहे है।
अब आप इस ध्यान के कार्यक्रम स्थल पर वापस आ रहे हैं ... (३ मिनट) ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः
अपने अन्दर की इस शून्यता के साथ रहिये जब तक हम अगले सेशन के लिए मिलते हैं।
धन्यवाद
द्रितीय दिवस
निर्भय ध्यान (अन्धकार ध्यान) स्वस्थ होनेवाला चक्र : नाभिस्थल से २ इंच नीचे चक्र का स्थान चक्र के अस्वस्थ होने का कारण : भय, विशेषत: मृत्यु का भय चक्र के स्वस्थ रहने की मनोस्थिति : भय की समझ और उसका सामना करना
ध्यान तकनीक का स्त्रोत
ध्यान की विधि: (कुल समय - ३० मिनट)
निर्भय ध्यान की विधि, वेदान्त से ली गई है। इस ध्यान से, शरीर के बाहर रहने के अनुभव होते हैं।
शरीर से बाहर रहने का अनुभव, मृत्यु का अनुभव है। जब यह ध्यान नियमित रूप से किया जाता है, हर बार सुक्ष्म ब्रह्मांडीय शक्ति, जो गहरे अन्धकार के रूप में है हर जगह, वह मन, शरीर को ऊर्जा देती है। यह स्वाधिष्ठान चक्र को शक्तिशाली करती है, यह ध्यान ३० मिनट का दिग्दर्शित ध्यान है, यह कराया जाता है। अपने अपने स्थान पर आरामपूर्वक बैठे जायें, जो नीचे नहीं बैठ सकते, वह लोग कुर्सियों पर बैठ सकते हैं। अपने सिर, गर्दन और रीढ़ की हड़ी को सीधी रखें।
(हल्का संगीत बजता है) आँखें बन्द कर लीजिए। गहरी श्वास लीजिए। कल्पना कीजिए कि आप एक घने जंगल के बीच से गुजर रहे हैं। आप जंगल में उस जगह पहुँच गये हैं जहाँ यह बहुत ही घना है, वहाँ आप एक गहरी, एकदम अन्धेरी गुफा में प्रवेश कर रहे हैं, आँखों को कहीं कुछ नहीं दिखाई पड़ रहा है। उस अन्धेरी गुफा में आप बैठ गये हैं। आपको अपना शरीर भी दिखाई नहीं पड़ रहा है, माल आपको अपने होने के अनुभव के अतिरिक्त, आपकी और कोई पहचान नहीं है।
उसको ढीला छोड़ने के बाद ही अगले अंग को तनाव में लाना है। यह आइसोमेट्रिक व्यायाम की तरह है जो आप शरीर के सभी अंगों के साथ करते हैं।
इस २० मिनट की क्रिया के बाद आप अपने को एकदम खाली, ठंडा और पूर्ण शान्त अनुभव करेंगे। फिर अगले १० मिनट के लिए, आप बैठ जायें और आँखे बन्द करके हुंकार करे, केवल हू शब्द का उच्चारण करें। बहुत जोर से और गहराई से करने की कोई आवश्यकता नहीं, बिल्कुल शान्त तरीके से करें। जैसे जैसे 'हू' का जाप करें, साक्षी की तरह होकर जो भी आपके अन्दर और बाहर हो रहा है उसका अवलोकन करें, आप मात्र साक्षी होकर देखेंगे। इस तकनीक के जो पहले हिस्से हैं १०-१० मिनट के सिर्फ तैयारी हैं अन्त के तीसरी क्रिया के लिए, जो वस्तुत: असली ध्यान है। जब आप तीसरी प्रक्रिया पर पहुँचेंगे, तब आप पायेंगे कि आपका मन पुर्ण शान्त है बिना किसी प्रयत्न के, अपने आप। यह शान्ति प्रयत्न से नहीं लाई जा सकती बल्कि पहले दो भागों की क्रिया के बाद अपने आप आ जाती है।
इस शान्त और आनन्दपूर्ण स्थिति में बने रहिये, इस समय बहुत से अनुभव होंगे उनको बस टेलिविजन की तरह देखते रहिये। अपने मन और विचारों को एक एक करके देखते रहिये। इस ध्यान के दौरान अपने मन को मुलाधार अथवा अन्य कहीं केन्द्रित करने का बिल्कुल प्रयास न कीजिए। अन्यथा और फन्तासी / वासनायें जमा होने लगेंगी, जिनको निकालने का प्रयास आप कर रहे हैं। अन्त में स्वामीजी शान्ति मंत्र उच्चारित करते हैं:
ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः
धीरे, बहुत धीरे धीरे अपनी अपनी आँखे खोल दीजिये, इस शक्ति और शान्ति के अनुभव के आनन्द में रहिये। फिर अगले सेशन पर मिलेंगे।
धन्यवाद।
मणिपूरक शुद्धि क्रिया
(तनावमुक्त होना)
स्वस्थ होनेवाला चक्र मणिपुरक : नाभि क्षेत्र चक्र का स्थान : चक्र के अस्वस्थ होने के कारण :
स्वस्थ चक्र रखने की मनोस्थिति : सकारात्मक चिन्तन
ध्यान तकनीक का स्त्रोत
ध्यान विधि - निर्देश (कुल समय: ३० मिनट)
मणिपूरक शुद्धि क्रिया की विधि प्राचीन ईसाई साधनाओं से लिया गया है, उसे 'ग्लासोलोलिया' बोलते थे, फिर बाद में, सूफी मतावलम्बियों ने इसे अपनाया और इसे "जिबरिश'' कहते थे। यह तकनीक, आपके अन्दर दबे हुए नकारात्मक मानसिक प्रवृत्तियों और चिन्ताओं का उन्मूलन कर देती है। यह आपकी दबी हुई भावनायें जैसे कि क्रोध एवं लगातार चिन्तित रहने की, को साफ कर देती है। जब आप इस तकनीक का प्रयोग करते हैं, उसके बाद मणिपूरक चक्र के क्षेत्र में, नाभि के पास, बहुत हल्का अनुभव होगा, क्योंकि इसी क्षेत्र में आपकी चिन्तायें एवं सभी नकारात्मक अनुभव जमा रहते हैं। इस ध्यान को करने के बाद, यह आप पर निर्भर करता है, कि आप फिर से चिन्ताओं से अपने मणिपूरक को बोझिल करना फिर से शुर कर दें, या इसे साफ ही रखें।
इस तकनीक को खाली पेट ही करना उचित है, या कम से कम खाना खाने के दो घंटे बाद करें, अन्यथा भोजन का वमन हो जायेगा।
खडे हो जाइये और आँख्रें बन्द कर लीजिए। गहरे में अपने मणिपरक पर ध्यान कीजिए और उस क्षेत्र के भारीपन का अनुभव कीजिए। यह आपकी चिन्ताओं से भरा हुआ है। एक निमट के लिए, मणिपुरक चक्र पर अपना ध्यान केन्द्रित कीजिए। प्रयत्न कीजिए, वहाँ जमा हुए क्रोध और चिन्तायें जो विभिन्न कारणों से अन्दर जमा होती गई है।
अब, अजीब अजीब आवाजें अपनी नाभिस्थल से करना शुरु कीजिए, जितनी जोर से कर सकें। ध्यान रहे चिल्लाने में शब्दों का प्रयोग नहीं करना है। यदि शब्दों का प्रयोग करेंगे, तो सिर्फ जानी पहचानी और ताजी भावनायें ही ऊपर आ पायेंगी, इतना ही नहीं, शब्द और शब्दों का को जन्म देगी बिना शब्दों के साथ जुड़ी हुई भावनाओं को उखाड़ने के। सिर्फ अजीब आवाजें निकालें. जिनको आप भी नहीं समझ सकें, समझ में आनेवाली किसी भाषा के शब्द न हों. तभी आपका अवचेतन ख़ूलेगा, और छूपी हुई भावनायें बाहर निकल पायेंगी। हाथों को हिलाइये चीखिये, चिल्लाईये, आँसू बहने लगे, उन्हें बहने दीजिए।
इसे पूरी शक्ति से, पुरा जोर लगाकर करिये, ताकि सारी नकारात्मक भावनाओं का वमन हो जाये। जीवन की सभी दु:खू की और बुरी घटनाओं को याद कीजिये, जो भी व्यक्ति कारण था या उन घटनाओं में सम्मिलित था, उसको याद कीजिए और उसके प्रति वैदा हुए विचारों और भावनाओं को याद कीजिए और चिल्लाईयों अनजान आवाजों में। सभी दबी हुई यादों को निकालिये, पूरी
तरह उन दु:खद घटनाओं, कष्टकारी स्थितियों में मन को लीन कर दीजिए चिल्लाने के साथ साथ। और किसी भी चीज के बारे में मत सोचिये।
इस तरह करते हुए. २० मिनट के पश्चात रुक जाइये। आँखे बन्द रखे रखे, अब बैठ जाइये जहाँ हैं वहीं पर और अगले १० मिनट तक बिल्कुल मौन रहिये। कोई विचार उठे, तो मात्र साक्षीभाव से देखिये उसे। अपने मणिपुरक चक्र के क्षेत्र में आये हल्केपन को अनुभव कीजिए। आप इसे एकदम हल्का और आनन्द की अवस्था में पायेंगे। आपका सम्पूर्ण अन्तरतम एकदम हल्का और आनन्दमय अनुभव होगा।
(लोग इस मणिपूरक शुद्धि क्रिया को करते हैं साथ में चल रहे संगीत के साथ) (अंत में स्वामीजी शान्तिमंत्र का उच्चारण करते हैं ...)
ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः
धीरे, बहुत धीरे से अपनी आँखे खोलिये। अब हम अगले सत्र में मिलेंगे, धन्यवाद।
(आदि ध्वनि का जप)
| स्वस्थ होनेवाला चक्र | : अनाहत |
|---|---|
| चक्र का स्थान | : हृदय के पास |
| चक्र की अस्वस्थता का कारण की अपेक्षा | : |
| चक्र के स्वस्थ रहने की मनोस्थिति : स्वार्थरहित प्रेम | |
| ध्यान तकनीक का स्त्रोत | : तिब्बती तंत्रशास्त्र |
| ध्यान के निर्देश: (कुल समय: ३० मिनट) |
महामंत्र ध्यान की विधि तिब्बती बौद्ध परम्परा की बहुत ही प्राचीन ध्यान क्रिया, जिसका प्रयोग अनाहत चक्र को खोलने के लिए किया जाता रहा है। यह ध्यान, मन और बुद्धि को स्थिर करता है। आपका मन हर समय विचारों के झुले में झुलता रहता है। यह ध्यान मन को स्थिर करके मनरहित अवस्था का अनुभव देता है। यह अनन्त में प्रवेश का द्वार है।
यह ध्यान आपके अन्दर एक अच्छी ऊर्जा उत्पन्न करता है। और इस ऊर्जा के कारण, दूसरों का ध्यान पाने की अपेक्षा के बजाय दूसरों को ऊर्जा और प्रेम बाँटने लगते हैं। इस ध्यान को करते समय, आप अपनी माला पहने सकते हैं। यह माला ध्यान की ऊर्जा सहेज कर रखेगी।
यह ध्यान खाली पेट करना चाहिए, प्रात:काल अथवा जब किसी और समय करना हो, तो भोजन और ध्यान के बीच कम से कम र घंटे का अन्तर अवश्य होना चाहिए। इस ध्यान को आप अकेले या समुह में कर सकते हैं, यदि यह ध्यान, ध्यानियों के साथ समूह में किया जाये, तो ध्यान करने का स्थल भी ऊर्जा धारण कर लेता है।
अब मैं आपको यह तकनीक समझाता हँ:
सुखासन में नीचे बैठ जाइये। गर्दन, सिर और रीढ़ सीधी रहेगी। जो नीचे नहीं बैठ सकते, वे लोग कुर्सियों पर बैठ सकते हैं। बिल्कुल तनावरहित, आराम से हो जायें और आँख्रे बन्द कर लें। हम आँखे बन्द करने के बाद भी तमाम तरह के रूप और चित्र देखते रहते हैं, बन्द आँखों के पीछे से। इसको रोकने के लिए, कल्पना कीजिये कि आपकी पुतलियाँ पत्थर हो गई हैं, उनको कड़ा कर लीजिए, उनको मानसिक रूप से दबाव डालिये, ऐसा करने से बंद आँखों में विचार और चित्रों का आना बंद हो जायेगा। असल में पुतलियों के चलने और मन में उठने वाले विचारों का बड़ा नजदीक का सम्बन्ध है। इसलिये कहा गया कि पुतलियों का संचालन बंद कर लें, लेकिन इनको बंद करने के बारे में बहुत चिन्तित भी न हों, बस ध्यान की प्रक्रिया प्रारम्भ करें।
अपने होठों को बंद रखते हुए, म्म्म्म् .. की ध्वनि अन्दर से पैदा करें। यह वैसा होगा, जैसे यदि आप खाली ड्रम के अन्दर मुँह डालकर गुंजार करें। उसी तरह की आवाज पैदा होगी। कुपया ध्यान दें, यह ध्वनी हम् अथवा ॐ की नहीं है, यह सिर्फ होठों को बन्द रखते हुए गुंजार - मुम्म् ... की ध्वनि है। इस ध्वनि की जितना लम्बा खोंच सकें, दूसरी साँस अन्दर लेने के पहले, उतना लम्बा
खींचे। इस ध्वनि को खूब गहरा, नाभि से पैदा करें। और जितनी जोर से यह ध्वनि कर सकें, करें।
यह ध्वनि करने के बीच में. गहरी श्वास भरने की कोई आवश्यकता नहीं. शरीर को जितनी आवश्यकता होगी उतनी श्वास वह ले लेगा। तनाव मत पैदा होने दीजियेगा। अपनी सम्पूर्ण शक्ति से यह झंकार पैदा कीजिए, सिर्फ यह झंकार बनकर रह जाइये। आपका पूरा शरीर इस ध्वनि के झंकार से भर जाये। आप देखेंगे, कुछ समय पश्चात यह ध्वनि अपने आप हो रही है बिना आपके प्रयास किये और आप बस सुन रहे हैं
२० मिनट पुरा होने पर, यह ध्वनि करना बंद कर दीजिए। यदि आप कैसेट सुन रहे हैं तो स्टाप का निर्देश आयेगा। असके साथ ही यह ध्वनि अचानक बंद कर देनी है।
इस ध्वनि के बंद करने के पश्चात, आँखे बंद रखते हुए अगले १० मिनट तक मौन अवस्था में रहिये। आनन्दमय स्थिति और चेहरे पर मुस्कान के साथ यदि किसी तरह का विचार उठता है तो उसे उसी तरह देखिये जैसे टेलिविजन देखते हैं, विचारों को न रोकने की कोशिश करनी है, न हीं उनके ऊपर कोई निर्णय, अच्छे बुरे का देना है सिर्फ देखते रहना है।
मौन और आनन्दमय स्थिति में बने रहिये। इस १० मिनट के दौरान, पहले २० मिनटों में पैदा हुई ऊर्जा, शरीर के पोर पोर और अन्तरतम में छा जायेगी और बहुत ही गहरे स्तर पर शरीर मन को स्वच्छ करेगी)
(समूह ध्यान संगीत के साथ चल रहा है)
(अंत में स्वामीजी शान्तिमंत्र का पाठ करते हैं)
ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः
धीरे धीरे अपनी आँख्रे खोल दीजिए और अपने अन्दर आई हुई शान्ति के साथ बने रहिये, अब अगले सत्र में मिलेंगे।
धन्यवाद।
दिव्य नेत्र ध्यान
| (दिव्य चक्षु) | |
|---|---|
| स्वस्थ होनेवाला चक्र | : आज्ञा चक्र |
| चक्र का स्थान | : भ्रूमध्य में |
| चक्र के अस्वस्थता का कारण | : बहुत अधिक गम्भीरता |
| चक्र स्वस्थ होने की मन:स्थिति | : सहज स्वभाव |
| ध्यान तकनीक का स्त्रोत | : जरथुस्न परम्परा से |
| ध्यान निर्देश (कुल समय: ३० मिनट) |
दिव्यनेत्र ध्यान, आज्ञा चक्र को जागृत करने के लिए किया जाता है। जागत आज्ञा चक्र आपको सुष्टि की प्रज्ञा के साथ जोड़ता है। यह तकनीक जरथुस्र परम्परा से ली गई है। इस तकनीक के दो हिस्से हैं - पहला आज्ञा चक्र को स्वस्छ करने के लिए और दूसरा हिस्सा इसको उजीवान करने के लिए। आज्ञा चक्र जिसे तीसरा नेत्र भी कहा जाता , यह जागृत चक्र, माया और मोह को भंग करने वाला कहा जाता है। यह आपके अन्दर दिव्य चेतना को जागुत करता है।
यहाँ पर, आपके सामने एक प्रार्थनादीप जलाया गया है, इस दीप के लिये तिल का तेल या गाय का घुत प्रयोग किया जाता है। आप मोम्बत्ती का प्रयोग भी कर सकते हैं, सिर्फ एक बात का ध्यान हो कि यह वानस्पतिक वसा से बनी हो। यह ध्यान एक निर्देशित तकनीक है। आपको माल निर्देशों का पालन
करना है। सुखासन में नीचे बैठ जाइये एवं आँखे बन्द कर लीजिए। जो भी नीचे नहीं बैठ सकते वे कुर्सियों पर बैठ जायें।
(हल्का हल्का संगीत बजता है)
अब अपने अपने आज्ञाचक्र पर समग्रता लाइये जैसे कि इसके अन्दर घुसना चाहते हों (५ मिनट)
अब आँखे खोलिये और दिये की लव की तरफ अपने तीसरे नेत्र से, जो दोनों भौहों के बीच स्थित है, देखिये। आपकी आँखे लेंगी, झपकेंगी या आँस बहेंगे, ये सब होने दीजिये (५ मिनट)
फिर आँखे बन्द कर लीजिये, और एकाग्र होकर इसमें गहराई से प्रवेश कीजिए (५ मिनट)
अब फिर आँखे खोल दीजिए और तीसरे नेत्र से लव की तरफ देखिये (५ मिनट) आँखे फिर से बन्द कर लीजिये, इस बार दृष्टि एकाग्र मत कीजिये, सिर्फ आराम कीजिये। (५ मिनट)
ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः
धीरे, बहुत धीरे से अपनी आँखे खोलिये।
अब अगले सत्र में मिलेंगे। धन्यवाद।
सहस्रार ध्यान
सीधे बैठिये। आँखें बंद कीजिए। अपने सहस्रारा चक्र पर ध्यान दीजिए। शरीर के अन्य भागों को भलकर केवल अपने सहस्रार चक्र पर ध्यान दीजिए और उसी में आराम से बैठिए। अपने मुख पर एक मुस्कान रखिए और आराम से बैठिए। अपने पूरे अंतर से अपनी माँ को कृतज्ञता दीजिए जिन्होंने आपको यह शरीर दिया। उन्हें याद कर उन्हें पूरे तन-मन से अपना आभार दीजिए। अपने पिता को अपनी कुतज्ञता दीजिए जिन्होंने आपको यह जीवन दिया और आपकी सारी जरूरतों को पूरा किया। उन सारे डाक्टरों और नर्सों को अपना आभार दें जिन्होंने आपका इस धरती पर स्वागत किया जब आपने जन्म लिया। उन सारे लोगों को अपना आभार दें जिन्होंने वह अस्पताल और घर बनाया जिसमें आपने जन्म लिया। उन सारे लोगों को अपना आभार दें जिन्होंने आपका देखभाल किया जब आप एक नन्हें शिश थे। उस सब लोगों को अपना आभार प्रकट करें जिन्होंने आपके खाने, कपड़े और जीवन के लिए काम किया जब आप छोटे थे। अपने प्राथमिक शिक्षा के सारे अध्यापक, टीचर को अपना आभार प्रकट करें। अपने बालपन के सारे मित्रों को अपना आभार दें जिन्होंने आपके बचपन को खुश बनाया जिन्होंने अपनी खुशी, अपनी मासूमियत आपके साथ बाँटी।
अपने भाइयों, बहनों और अन्य परिवार सदस्यों को अपना आभार दें जिन्होंने आपका पालन-पोषण किया, आपकी देखभाल की।
उनसे माफी माँगिए उन सब चीजों के लिए जिनमें अपने जाने-अंजाने में जान बूझकर या बिना समझे उन्हें दु:ख पहुँचाया हो।
उन सब लोगों को अपना आभार दें जिन्होंने आपको शिक्षा दी. आपको व्यापारिक ज्ञान दिया, जिन्होंने आपको अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत दी।
उन सब लोगों को अपना आभार दें जिन्होंने आपको आर्थिक रूप में मदद की जब आपको जरूरत थी।
उन सारे डाक्टरों और नर्सों को अपना आभार दें जिन्होंने आपके स्वास्थ्य की देखभाल की, आपकी मदद की।
अपनी पत्नी या पति को अपने जीवन में प्रेम और सुरक्षा देने के लिए अपना आभार दें।
उन सब लोगों को अपना आभार दें जिन्होंने आपको आध्यात्मिक जीवन में प्रोत्साहन दिया और उत्तेजित किया।
उन सभी लोगों को अपना प्रेमपुर्ण आभार दें जिन्होंने किसी न किसी रूप में आपकी सेवा की। आपका दूधवाला जो आपको हर सुबह दुध लाकर देता है, सब्जी मंडी में बैठा सब्जीवाला, धोबी, कुरा-कचडा उठानेवाला, नौकर-चाकर, गाडी वाला, वह सब लोग जिनकी सेवा को हम कभी ध्यान नहीं देते। हर व्यक्ति से माफी माँगिए जिससे जाने या अंजाने में, जान बूझकर या बिना समझे जिन्हें आपने दु:ख पहुँचाया हो।
अपने शत्रओं को अपना आभार दें, उन लोगों को अपना आभार दें जिन्होंने आपको दु:ख़ पहुँचाया है क्योंकि उनके वजह से आप दुढ़- सबल और क्षमस्वी बने हैं। उन्हें आपके द्वारा पहुँचे दु:ख के लिए उनसे माफी माँगिए।
उन सब लोगों को अपना आभार दें जिन्होंने आपकी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक या आध्यात्मिक रूप में मदद की।
हर व्यक्ति को याद कर, अपना समय लेकर अपना आभार दें।
अपने शरीर और उसके हर भाग को अपना आभार दें।
अपने मन को उसके चमत्कारिक कामों के लिए अपना आभार दें।
उस दिव्य शक्ति, उस भगवान को अपना सादर आभार दें जिनकी वजह से ये सब चीजें आपके जीवन में संभव हुई है।
आखिरकार, उस गुरु को अपना आभार दें जो इस प्रपंच शक्ति, इस दिव्य शक्ति के जीते-जागते स्वरूप है।
आपके मुझपर विश्वास के लिए और इन दो दिनों तक मेरे शब्दों को सुनने के लिए मैं अपना आभार आप सबको देता / देती हूँ।
अब आप अपनी आँखें खोल सकते हैं और आपके हाथों में फूलों को इस सफेद कपड़े में डालकर प्रपंच शक्ति को अपनी कृतज्ञता अर्पण कर सकते हैं।
(हर व्यक्ति आकर कृतज्ञता के फूल अर्पण करता है।
शक्ति सागर ध्यान (३१ मिनट)
अपनी आँखें बंद कर खड़े हो। अपनी चक्र पर ध्यान दें। किसी कुर्सी के पीछे खड़े होकर उसे पकडकर खड़े हो। धीरे बहुत धीरे स्थान पर चलना शुरु कीजिए।
अब धीरे धीरे अपनी गति बढाइए। उसी स्थान पर और जल्द चलना आरंभ कीजिए। सिर्फ उसी हद तक गति बढाइए जिससे आपको तकलीफ न हो, जितना आप से हो सके। हर पल अपने विशुद्धि चक्र पर ध्यान दें आपको उससे आनी वाली ऊर्जा का आभास होगा। विशेष रूप से ध्यान रखे कि किसी भी समय गति धीमी नहीं होनी चाहिए। २१ मिनट के बाद रुक जाइए।
अगले १० मिनट के लिए शांत रूप से वहीं बैठ जाइए जहाँ कहीं भी आप हैं। आँखें बंद ही रखें और विशुद्धि चक्र पर ध्यान दें। इस क्रिया से उत्पन्न हुई शक्ति को आप इस तरह अंदर ले सकेंगे। किसी भी समय सिर्फ उतना ही श्रम करें जितना आप से हो हो सके।
इस ध्यान का विशेष तत्व है अपने मन को विशुद्धि चक्र पर केन्द्रित रखना जब कि आपका शरीर क्रिया के अनुसार हिलता रहे। जब आप यह करते हैं, तो प्रपंच शक्ति विशुद्धि चक्र द्वारा आपके अंदर जाती है और शक्ति का सागर बन जाती है।
यह ध्यान करते समय आप अपनी माला अपने गले में पहन सकते हैं। यह उस शक्ति को अर्जित कर सकती है जो इस ध्यान में उत्पन्न होती हैं। (सब शक्ति सागर करते हैं।)
ॐ शांति शांति शान्तिः
धीरे, बहुत धीरे अपनी आँखें ख़ुले।
परिचय
वर्तमान युग में. हमारे बीच, THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM गहन, अप्रकट सत-चित - आनन्द को प्रकट करने वाले आत्मज्ञानी व्यक्तिरुप हैं। मनुष्य के मूल स्वरुप आन्तरिक आनन्द की प्राप्ति एवं आनन्दमय जीवन जीने के विज्ञान को, इस विश्व में पून:स्थापित करना ही इनका ध्येय एवं कार्य है। दक्षिण भारत के तिरुवन्नामलाई शहर में THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM का जन्म हुआ। एकनिष्ठ आध्यात्मिक खोज में वर्षों की कठिन साधनाओं एवं गहन तपस्या करते हुए, सत-चित-आनन्द अवतरित हो गया, ठोस अनुभव के रुप में नित्य-आनन्द होकर।
स्वामीजी की आध्यात्मिक खोज बहुत छोटी वय में ही स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह प्रारम्भ हो गई थी। १२ वर्ष की अल्प आयू में ही प्रथम संघन आध्यात्मिक अनुभव हुआ। १७ वर्ष की आयु में गुह त्यागकर निकल पडे आत्मज्ञान की खोज में। सम्पूर्ण भारत की हर दिशा में एवं नेपाल तक की यात्रा की, योगतंत्र, गूढ़तम एवं ग्राम आध्यत्मिक विज्ञानों को शोधते हुए एवं कठिन साधनाओं में तपते हुए। इस बीच तपस्या करते, कई गहन आध्यात्मिक अनूभव भी हुए। लगभग ३०००० किलोमीटर की यात्रा हो गई इस खोज और तपस में. इसमें लगभग २००० किलोमीटर की पैदल यात्रा रही - घने जंगलों मे बीच, मंदिरों, तीर्थस्थानों और आश्रमों की।
गहरे अध्ययन और सघन ध्यान साधना के फलस्वरुप, करोड़ो मनुष्यों के कल्याण हेतू, करुणा एवं आनन्द का एक ईश्वर प्रेरित व्यक्तित्व के रुप में उदय हुआ। बहुत गहरे आध्यात्मिक अनुभव के आधार पर, स्वामीजी ने मनुष्य जीवन को आनन्दमय बना देने की तकनीक विकसित कर दी है। यह तकनीक व्यक्तिगत चेतना में विस्फोट करके, व्यक्ति के अन्तरतम में देवत्व को जगाने एवं आनन्द का अविरल प्रवाह अनुभव कराने में पर्ण सक्षम है।
अन्तरतम को उद्घेलित करने वाले शब्दों और ध्यान की तकनीकों द्वारा, जीवन की समस्त समस्याओं का निश्चित समाधान मनुष्य को प्राप्त हो गया है।
इस लघ समयकाल में ही. विश्व भर के लाखों लोगों ने आन्तरिक क्रान्ति और परिवर्तन का अनुभव किया है। THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM कहते हैं कि ध्यान एक ऐसी सर्वसमाधान क्रिया है, मास्टर की है, सब द्रु:खों की एक औषधि है, जो गहरे अन्तरस में पूर्णता की उपलब्धि के साथ जीवन के सभी भौतिक क्षेत्रों में भी सफलता प्रदान करती है।
उन्होंने, विभिन्न ध्यान की तकनीकें विकसित की हैं, जो किसी भी तरह के व्यक्तिगत स्वभाव पर प्रभावी हैं तथा आन्तरिक शान्ति प्रदान करने और आनन्द का अनुभव कराने में पूर्ण सक्षम हैं। हर व्यक्ति को आत्मबोध और आनन्दानुभव हो, यही उनका मिशन है, ध्येय है।
परिशिष्ट
विज्ञान एवं आध्यात्मिकता के मध्य सेतु .......
आधुनिक तकनीक के द्वारा स्वामीजी दुनिया भर के चिकित्सकों एवं वैज्ञानिकों के साथ मिलकर रहस्यमयी तथ्यों को लिपिबद्ध कर रहे हैं एवं छानबीन कर रहे हैं| वह अपने तंत्रिका विज्ञान तंत्र (न्यूरोलॉजिकल सिस्टम) के परिणामों के अध्ययन से लगातार चिकित्सा विज्ञान की दुनिया को प्रभावित करते जा रहे हैं| लिपिबद्ध परिणामों से वैज्ञानिकों को लगता है कि चाल को बदलने की संभावना एवं कई तरह के रोग जैसे हृदय रोग, कैंसर, गठिया, शराब से होने वाले विकार इत्यादि की अग्रगति प्राप्य लगनी शुरू हुई है। इसके संकेत मिल रहे हैं कि मानव मस्तिष्क मानव शरीर के घाव भरने के लिए उसका चुनाव कर सकता है, इसकी घोषणा मजबूरी में चिकित्सकों को करनी पडी है ।
मानवता के लिए स्थाई महत्व जैसे विषयों पर शताब्दियों से विज्ञान और आध्यात्मिकता में यूद्ध होता आ रहा है| यद्यपि आध्यात्मिक गूरू हमेशा कहते आए हैं कि शून्यता की अवस्था ही 'असली' तथ्य है, और हम सभी के लिए एक अनुभव करने योग्य लक्ष्य है, स्वाभाविक तौर पर वैज्ञानिक समूह इस बात को बिना किसी ठोस सबूत के मानने को तैयार नहीं हैं।
पहली बार हमारी शताब्दी में, विज्ञान को आशापूर्ण तरीके से स्वाभाविक से अधिक (सपरनॉरमल) और अस्वभाविक (पैरानॉरमल ) की कुंजी गहन चिकित्सकीय साक्ष्य के साथ मिल गई है, जो यह समझाती है कि आध्यात्मिक रूप से बहुत अधिक विकसित व्यक्ति को क्यों कुछ 'शक्तियां' मिलती हैं बाकी सब जिसका सपना ही देख सकते हैं। निम्नलिखित कूछ पुष्ठों पर स्वामीजी के संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की यात्रा के दौरान उनके तंत्रिका विज्ञान तंत्र पर किये गये विभिन्न प्रकार के शोधों का सारांश है।
एक योगी का मस्तिष्क
डॉ. आर मुरली कृष्ण, अध्यक्ष सीओओ, इनटेग्रिस मेंटल हेल्थ एण्ड जेम्स एल हॉल, जुनियर सेंटर फॉर माइंड, बॉडी एण्ड स्पिरिट ओक्लाहोमा का विवरण
माइंड मैटर्स का कॉलमुरी P एक योगी का मस्तिष्क आर. मुरली. कुष्ण, एम.डी. अध्यक्ष सीओओ, इंटेग्रिस मेंटल हेल्थ एण्ड जेम्स एल. हॉल, जूनियर सेंटर फॉर माइंड, बॉडी एण्ड स्पिरिट का विवरण
THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM स्वामी एक छरहरे, स्वस्थ दिखने वाले यूवा पूरुष हैं जिनके बाल कंधे तक लंबे और काले हैं। सुन्दर एवं नम्र होने के साथ स्वामीजी खुले तौर तरीकों के स्वामी हैं। उत्सुकता का खजाना लिए हुए वह किसी भी साधारण अमरीकी कॉलेज के छात्र प्रतीत होते हैं| अमरीकी कालेज छात्रों और स्वामीजी में यह अंतर है कि छात्र भगवा वरन्त्र नहीं पहनते, न ही भगवा पगड़ी बांधते हैं. उन्हें आध्यात्म के आलोक का अनुभव नहीं हुआ है और न ही दनिया के हर कोने में बसे सैकडों लोगों ने छात्रों को शिक्षक, दूखों को हरने वाला और योगी का दर्जा दिया है।
एक योगी? स्वामीजी इसी नाम से जाने जाते हैं और यह बूरा नाम नहीं है उनके लिए। लोकप्रिय संस्कृति बताती है कि योगियों का ईश्वर के साथ सीधा संपर्क होता है। यह समझा जाता है कि न समझ पाने वाले या न नापे जा सकने वाले माध्यमों के द्वारा ही योगियों की पहुंच अंतिम वास्तविकता या सच तक होती है। एक योगी की तस्वीर खींचें, आप देखेंगे कि ऐसे व्यक्ति परम सुख से पूर्ण होते हैं, इनमें उच्च विचार और तह तक पहुंचने की योग्यता जैसे जन्मजात गुण होते हैं जो कि दूसरे लोगों के पास नहीं होते।
समझा जाता है कि योगी की उपस्थिति से दूसरों को शांति का अनुभव होता है और वह स्वस्थ रहते हैं।
यह दक्षिण भारत के २७ वर्षीय स्वामी का सही वर्णन है। प्रतिवर्ष उनके पास हजारों लोग परम्परागत चिकित्सा पद्धति से निराश होकर अपने व्याधि एवं रोगों से छूटकारा पाने के लिए आते हैं। स्वामीजी की पृष्ठभूमि भी उनको एक योगी का आभास देती है। उन्होंने अपना घर तरुण अवस्था में छोड़ा, उन्होंने संपूर्ण भारत में आश्रमों का दौरा किया. अपने को दर्शन शास्त्र में विलीन किया, विस्तार से पढ़े और ध्यान की कल्रा का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया।
हाल ही में स्वामीजी जब अपनी विश्व यात्रा के दौरान ओक्लाहोमा शहर में रूके थे, तो मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं आधुनिक चिकित्सा की नवीनतम तकनीक के सहारे ध्यान करते वक्त उनके मस्तिष्क में झांक सकता हूं। मेरा लक्ष्य रहस्यमयी परिस्थिति के दौरान जो कूछ भी घट रहा है उसे समझना, नापना व रहस्यों से परदा हटाना था।
स्वामी जो यह समझते हैं कि ध्यान का आधार विज्ञान है प्रसन्नता पर्वक राजी हुए।
जिन प्रक्रियाओं से रवामी गूजरे उसका संचालन ओक्लाहोमा शहर के कुछ सबसे अच्छे एवं सबसे अधिक अनुभवी चिकित्सकों.
तंत्रिका विज्ञान मनोवैज्ञा- निक एवं शोधकर्ताओं द्वारा किया गया इन चिकित्सकों ने उन पर भी उसी तकनीक का प्रयोग किया जिसका इस्तेमाल दूसरे रोगियों पर नियमित रूप से किया जाता था। जब उन्होंने अपनी तकनीक से निकाले गये चित्रों को देखा तो वे स्वयं ही समझ गए क्या स्वाभाविक है और क्या अस्वाभाविक।
स्वामी के परिक्षणों का परिणाम? निश्चित रूप से स्वाभाविक नहीं थे।
दिमाग के कार्य कलापों का चित्र लेना
स्वामी के दिमाग में झांकने का पहला मौका हमें पोजीट्रोन एमिसन टोमोग्राफी (पी.ई.टी.) की मदद से मिला। पारम्परिक निदान सूचक तकनीकें जो शारीरिक बनावट और शरीर रचना के चित्र पेश करती हैं जैसे-एक्स-रे. सीटी स्कैन या एम आर आई से हटकर, पी ई टी मस्तिष्क के क्रिया कलापों का चित्र कोशिका के उपापयची क्रिया के द्वारा प्रस्तुत करती है। शर्करा (ग्लूकोज) की तरह एक द्रव्य को रेडियो एक्टिव पी ई टी ट्रेसर से जोड़ा जाता है। फिर पी ई टी स्कैनर परिवर्तनशील सक्रिय मस्तिष्क के क्षेत्रों का चित्र किसी भी निर्धारित समय के अंदर दे देता है।
स्वामी के प्रकरण में. औषधि योजनाबद्ध तरीके से सतर्क एवं चेतन अवस्था में मस्तिष्क के उच्च सक्रिय क्षेत्रों को खोजने के लिए दिया गया. ध्यान की प्रारम्भिक अवरश्या में एवं गहन ध्यान के दौरान।
पी ई टी चित्रण परिक्षण (स्कैन टेस्ट) के परिणाम स्तब्ध कर देने वाले थे। शुरूआत में, स्वामी के भेजे का बाहर निकले हुए भाग की क्रिया ध्यान की प्रारंभिक अवस्था में भी अदभूत रूप से सक्रिय था।
सक्रियता का स्तर किसी आम इंसान के दिमाग की तुलना में कई गुना अधिक था। ललाट के नीचे के बाहर निकले हुए भाग को बुद्धिमता, सर्तकता, ज्ञान एवं विचार शक्ति से जोडा जाता है।
उसके बाद जब हम लोगों ने स्वामी को गहन ध्यान की अवरश्या में जाने के लिए कहा, तो वहां दो और आश्चर्यजनक निष्कर्ष सामने आए।
पहले, स्वामी के मस्तिष्क का मुख्य अर्धवुत्त ९०% से अधिक बंद था। ऐसा लग रहा था जैसे स्वामी का दिमाग बोरिया बिस्तर बांधकर छूटटी पर गया है। यह शांत एवं स्थिर. पूर्ण रूप से शांतिपूर्वक था और यह स्वामी स्वेच्छापूर्वक कर रहे थे।
गहन ध्यान के दौरान द्वितीय अद्भूत पहलू -मध्यम ललाट की हड़डी के क्षेत्र का निचला हिस्सा आश्चर्यजनक रूप से आलोकित था।
यह क्षेत्र प्रसिद्ध स्थान रहस्यपूर्ण 'तीसरे नेत्र' से लगभग मिलता-जूलता है।
बाद में जब हमने स्वामी से पूछा कि मध्यम ललाटीय क्षेत्र का निचला हिस्सा जब आलोकित हो रहा था तो वह क्या कर रहे थे, उन्होंने कहा कि वह अपना तीरिरा नेत्र खोल रहे थे।
ब्रह्माण्ड एवं भीतरी ज्ञान दोनों से संबंधित और स्पष्टता व शांति का स्थान समझे जाने वाले तीसरे नेत्र को आत्मा का स्थल माना जाता है। क्या हमें संकेत मिल रहे थे कि गहन ध्यान मस्तिष्क के उस क्षेत्र को खोल सकता है जो दैवीय शक्ति के साथ आदान प्रदान करने के लिए जिम्मेदार है एवं स्वयं अथवा सुष्टि के रहस्यों में गइराई से झांकता है। मझे विश्वास है कि पी ई टी स्कैन से जिसे मैं मस्तिष्क का 'डी-स्पॉट' कहता हूं जाहिर होता है। यदि आप समझते हैं कि 'डी-रुपॉट' का डी डिलाइट (प्रसन्नता), डिवाइन (दैवीयता) या डोपामाइन (वह रसायन जिससे हमारा शरीर आनंद का अनुभव करता है) के लिए है, तो प्रारंभिक संकेत बताते हैं कि ध्यान इन्हें स्फूर्ति प्रदान कर सकता है।
मस्तिष्क की लहरों को नापना
स्वामी के मस्तिष्क में झांकने के लिए हम लोगों ने जिस दूसरी प्रक्रिया को अपनाया उसे कांटिटेटिव इलेक्ट्रोएनसिफेलोग्रॉफी या क्यू ई ई जी कहते हैं। क्यू ई ई जी मस्तिष्क के इलेट्रिकल पैटर्नस् (बनावट) को नापता है। बनावट जिन्हें आमतौर पर मस्तिष्क की लहरें कहते हैं।
मस्तिष्क के लहरों की चार पटिटयां हैं, प्रत्येक की गति अलग है, और हर पट़टी मस्तिष्क की विभिन्न अवस्था से संबंधित है। उदाहरण के लिए, बीटा मस्तिष्क की लहरें छोटी और तेज गति की होती है एवं मस्तिष्क के सजग, सर्तक अवस्था से जूड़ी है। अल्फा मस्तिष्क की लहरें धीमी और बड़ी तथा आनंद के अहसास से जुड़ी हैं। थीटा लहरें सचेत अवस्था का प्रतिनिधित्व करती हैं जो नींद के नजदीक है; वह अवस्था जिसमें सक्रिय विचारों को छोड़कर शांति व सुकून का अहसास हो।
एक दिन के अंदर, अधिकतर व्यक्ति मस्तिष्क की चारों प्रकार के लहरों का अनुभव करेंगे। यद्यपि एक पटटी से दूसरे पटटी में बढना, उनके काबू में आसानी से नहीं होगा। यद्यपि THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM के क्य ई ई जी से पता चलता है उनका अपने मस्तिष्क के लहरों पर पूर्ण नियंत्रण है। गहन ध्यान के दौरान, उनका मस्तिष्क एक अवस्था से दूसरी अवस्था में आसानी से दौड़ रहा था जैसे कि एक हुनरमंद पियानो बजाने वाले की उंगलियां पियानो पर दौड़ती हैं। इसमें किसी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं थी, न ही पीछे की ओर मूड़ना, केवल लगातार, तरल का बदलाव एक प्रकार के मस्तिष्क की लहर से दूसरे प्रकार में हो रहा था। लग रहा था कि क्यू ई ई जी में पांचों मस्तिष्क के लहरों की पदिटयां रंगीन हो गई हैं, जैसे कि THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM इंद्रधनूष में तैर रहे थे!
निष्कर्ष
मस्तिष्क शरीर का सबसे जटिल अंग है, उसमें १०० अरब से अधिक न्यूरॉन्स होते हैं. प्रत्येक न्यूरॉन रसायनिक एवं वैद्युतिक संयोग से १०,००० अन्य न्यूरॉन पैदा करता है। इसकी सुचना को विधिवत् संचारित करने की शुद्ध क्षमता चकित कर देने वाला है।
प्रशंसनीय बात यह है कि जटिलता के कारण THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM को अपने मस्तिष्क की क्रियाओं को व्यवस्थित करने में अधिक परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM का मस्तिष्क-उनके विचार, भावनाएं, तर्क करने की शक्ति-उनके दिमाग को नियंत्रित करती है। वह द्रव्य की भांति अस्थिर और आसान तरीके से, मस्तिष्क के कार्यो को बदल सकती है व मस्तिष्क की लहरों में परिवर्तन कर सकती है।
योगी के मस्तिष्क की जो यात्रा हमने की थी उससे जवाबों का हल निकलने के स्थान पर शोध के लिए रहस्यमय प्रश्न सामने आने लगे।
लोगों के जीवन में संतुलन एवं शांति लाने के लिए क्या हमारे पास कोई तकनीक है जिससे हम सीख और पढ़ा सकते हैं?
क्या हम आरोग्य होने की दिशा में आहवान कर सकते हैं या विशेष प्रशिक्षण द्वारा निरामयता की चाल को तेज कर सकते हैं? क्या हम ऐसी तकनीकें सीख सकते हैं जो कि दर्द को नियंत्रण में रखने की अनूमति दे या व्याधि के मार्ग को बदल सके?
जिसे मैं ''डी-स्पॉट'' कहता हूं क्या हम उसे कार्यान्वित करना सीख सकते हैं, जिससे लगातार हमारा संपर्क प्रसन्नता या दैवीयता से बना रहे?
THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM पर हुए हमारे शोध के परिणाम मस्तिष्क के शोध पर विश्व की पुस्तकों में नये पृष्ठ हैं| मानव मस्तिष्क मानव शरीर के घावों को भरने के लिए उसका चुनाव कर सकता है इस बात के लगातार संकेत मिलते रहे हैं। अब हम उस संभावना की ओर देख रहे हैं जो लोगों को निरामय रखने की क्षमता सीखाती और हासिल कराती है, यह मानवता के लिए वहद लाभ की घटना होगी। गति को बदलने की संभावना और कई रोगों जैसे-हृदय रोग, कैंसर , गठिया, शराब के अधिक सेवन से होने वाली व्याधियों की बढत को रोकना संभव लगने लगा है।
THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM सेतु हैं अद्रश्य, रहस्यवादी पुरातन दुनिया एवं आधुनिक विज्ञान और अविष्कार के प्रत्यक्ष दनिया के बीच में जैसे-जैसे मस्तिष्क का शोध विस्तत आधार पर बढता जा रहा है और जैसे ही हम आगे के शोध के लिए रहस्यमय तथ्यों को विज्ञान के क्षेत्र के तहत लाएंगे, हम आशा एवं स्वारश्य के मार्ग में लंबे कदम भरते नजर आएंगे।
परमहंस श्री नित्यानंदजी (स्वामीजी) ध्यान में पर्ण परिवर्तन कर देने की शक्ति ध्यान द्वारा आप अपने में शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक बदलाव कर सकते हैं। इसकी बीज आप में पहले से ही विद्यमान है। लेकिन उस बीज को खिलने और फ़लने के लिए. सबसे पहले उस बीज का विस्फोट होना आवश्यक है।
- (स्वामीजी)
क्या हर कोई ध्यान सीख सकता है?
ध्यान को सीखने की आवश्यकता नहीं होती । आप स्वतः ध्यानी है। बस स्मरण कीजिए जीवन के किसी एक क्षण को जब आपने असीम सुन्दरता का कहीं अचानक अनुभव किया था। उगता हुआ सूर्य, अचानक पर्वतों के पीछे से निकलता हुआ या, पहली बार जब कोई दिव्य एवं मधूर संगीत सनायी पड़ा था। ऐसे अवसरों पर अचानक आप स्तब्ध, शब्दहीन, पर पूरी तरह अवगत स्थिति में हो जाते हैं। क्या इस तरह के क्षणों का आपने अनभव नहीं किया? ये सभी क्षण आपकी ध्यान की अवरुंथा है। इन सभी क्षणों की घटना की तरंत पश्चात सोचने की प्रक्रिया कुलबुलाहट, सामान्यतः प्रारंभ हो जाती है। मन शब्दों का निर्माण करने लगता है। मन कहना प्रारंभ करता है, कितना सुन्दर सूर्योदय है। उस दिन्य संगीत का, पूरानी सूने हुए संगीतों से तुलना प्रारंभ कर देता है। इस मन की क्रिया का अर्थ है कि. आप ध्यान के बाहर निकल गये। आनंद अवरन्था में पहुंच जाना हर बार, ही ध्यान है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।