1. Living Enlightenment (Gospel of Paramahamsa Nithyananda) - Abridged Edition
The Supreme Pontiff Of Hinduism Bhagawan Sri Nithyananda Paramashivam मिशन की विशेषताएं
- मेडीटेशन एण्ड डी-एडिक्शन कैम्पस वर्ल्डवाइड : आज तक 50 लाख लोगों को लाभान्वित कर चुके हैं।
- नित्या स्पिरीचुअल हीलिंग : एक ब्रहमाण्डीय ऊर्जा चंगा करने का तंत्र जो 5000 से अधिक निष्णातु शिक्षकों द्वारा प्रदान कर शरीर और मन को दरुस्त करता है।
- अन्न-दान ( मुफ्त भोजन कार्यक्रम ) : आगन्तुकों, भक्तों और शिष्यों के लिए हर हफ्ते भोज्य पदार्थों का मुफ्त वितरण आश्रम के अन्न मंदिरों में किया जाता है जिससे उनका स्वास्थ्य अच्छा रहे।
- दि THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM ऑर्ट एंड इट्स ट्रेनिंग : यह प्रशिक्षण आध्यात्मिक साधना के इच्छुक संन्यासियों, ब्रहमचारियों एवम् ब्रहमचारिणियों को दिया जाता है। इसके दौरान इन्हें योग, ध्यान, गहन आध्यात्मिक अभ्यासों. संस्कृत, वैदिक उच्चारण, एवम जीवन में योग्यता पाने की कलाओं का कडी तपस्या द्वारा ज्ञान दिया जाता है। फिर ये ही लोग 100 प्रतिशत स्वयंसेवी रूप में विश्व भर के THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM ध्यान पीठम् चलाते हैं और मिशन की सारी गतिविधियां नियंत्रित करते हैं।
- नित्य योग : पंतजलि ऋषि की मुल शिक्षा पर आधारित एक क्रांतिकारी योग-शिक्षा का कार्यक्रम जो 15 देशों में संचालित किया
जाता है।
- THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM वैदिक टेम्पल्स : 33 से अधिक वैदिक मंदिर और आध्यात्मिक शोध अकादिमयां जो सारे विश्व में फैली हई हैं।
- मेडीटेशन प्रोग्राम्स इन प्रिजन : कारागारों एवम बाल सुधार गहों में संचालित यह कार्यक्रम बन्दियों में अतिवादी व्यवहार में सुधार लाता है जिससे उनके जीवन में एक अदुभृत और आश्चर्यजनक परिवर्तन आता है।
- मेडिकल कैम्प्स : एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद, एक्युपंक्चर, नेत्र परीक्षा व नेत्रों की शल्य-क्रिया, कृत्रिम अंग-दान के कैम्प, स्त्री-चिकित्सा इत्यादि को लिए ये मफ्त इलाज के शिविर हैं।
- ग्रामीण क्षेत्रों में बाल-सहायता : ग्रामीण इलाकों में स्कूल की इमारतें, बच्चों को यूनिफार्म बनवाना, पढाई की सामग्री मुफ्त प्रदान करना इत्यादि।
- THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM विद्यालय : ऐसी शिक्षा द्वारा छात्रों को प्रबुद्ध करना जिसमें प्राचीन वैदिक तंत्र और आधुनिक प्रौद्योगिकी का ज्ञान समाहित हो तथा बिना किसी दबाव, भय या मां-बाप की जोर जबरदस्ती को बच्चों को फूलों की तरह वृद्धि सुनिश्चित करना।
- कारपोरेट मेडीटेशन प्रोग्राम्स : विश्व भर की बडी-बडी कारपोरेट फर्मों तथा माइक्रोसॉफट. एटी एण्ड टी. क्लालकोम्म. जेपी मोरगन. पेट्रोबाज, पेप्सी, ओरेक्ल, अमेरिकन एसोशिएशन ऑफ फिजीशियन ऑफ Hindu ओरिजिन (ए ए पी आई) को लिए डिजाइंड और संचालित इन प्रोग्राम का इन्ट्यूटिव मैनेजमेंट (अन्तप्रज्ञात्मक प्रबन्धन), नेतुत्व की दक्षता और समुह के रूप में कार्य प्रशिक्षण पर रहता है।
- THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM इन्स्टीट्युट ऑफ टीचर्स ट्रेनिंग : 300 से अधिक शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाता है : टॉन्सफारमेशनल मेडीटेशन प्रोग्राम्स. क्वांटम मेमोरी प्रोग्राम्स. नित्या-योग. हेल्थ एण्ड हीलिंग प्रोग्राम्स एवम् स्प्रिचुअल प्रोग्राम्स सदुश कार्यक्रमों को दूसरों को सिखाने के लिए।
- मीडिया : राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय अखबारों तथा पत्रिकाओं में छपने वाले लेखादि निकाले जाते हैं जो THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी से प्राप्त क्रॉनिकारी
परिवर्तन पाने के संदेशों से भरे-पुरे रहते हैं।
- THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM पब्लिशर्स : इन हाउस में 5000 घंटों से ज्यादा अवधि के THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM के प्राक्थकनों को लिपिबद्ध करना, संपादन को बाद प्रकाशन कर, उन्हें पुस्तक, डी वी डी या सीडी के जरिए पस्तक भंडारों में उपलब्ध करने का काम चलता रहता है।
- लाइफ बिल्स गैलेरियाज : विश्व व्यापी स्टोरों और मोबाइल शॉपों में THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी के 23 भाषाओं में लिपिबद्ध पुस्तकों एवं THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM कीर्तनों को उपलब्ध कराना।
- THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM मेडीटेशन एण्ड हीलिंग सेन्टर्स : विश्वभर में व्याप्त, ध्यान एवं रोग-हर तकनीक का मफ्त ज्ञान देने वाले केंद्र।
- THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM संगीत अकादमी : संगीत, नत्य एवं अन्य कला-विधियों को युवाओं तथा व्यस्कों को सजीव रूप से इन्टरनेट के माध्यम से सिखाता है।
- यू ट्यूब पर मुफ्त डिस्कोंर्सेज : 1500 से अधिक मफ्त प्रवचन www.voutube.com पर उपलब्ध. जो स्वामी जी के ज्ञान से भरपुर रहते हैं। ये आसानी से उपलब्ध हैं और दर्शकों को बेहद प्रिय भी हैं।
- सपोर्ट टू साइन्सटिस्ट्स एण्ड रिसर्च: विज्ञान और अध्यात्मक के मध्य लगातार एक पुल बनाने में संलग्न जिसमें आध्यात्मिक ऊर्जा द्वारा हीलिंग पर विशेष ध्यान रहता है।
- THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM इन्टरनेशनल युथ फाउण्डेशन ( एन आई वाई एफ ) : एक प्रेरक युवाओं का चुना हुआ सम्दाय जो निरंतर शांति एवम उद्बोधन के आदर्शवाद से प्रेरित एक गतिशील समाज बनाने में संलग्न रहता है।
- वीमैन्स एम्पॉवरमेंट ( डब्लू ई ): महिला सशक्तिकरण हेतु जुडी कर्मठ महिलाओं का एक गतिशील समुह जो महिलाओं को प्रबद्ध करने. समाज की हर स्तर - शारीरिक. मानसिक एवम आध्यात्मिक स्तर पर सेवा करने को तत्पर रहता है।
- नित्य धीर सेवा सेना : आत्म-रूपांतरण के माध्यम से 'आनंद सेवकों' का यह स्वयंसेवी दल मानवता की सेवा में निरंतर दत्त चित्त है यदि कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो पुरी तत्परता से राहत के
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प्रेम में बहना
मनोविज्ञान बतलाता है कि विचार मस्तिष्क से प्रकट होते हैं और मनोभाव हृदय से। बिना इस बात से प्रभावित हुए कि वे कहां से प्रकट होते हैं. विचार और मनोभाव अपथक रहते हैं। प्राचीन धर्मग्रंथ बतलाते हैं कि विचार हमें निर्मित करते हैं और इसी प्रकार मनोभाव भी। हम वैसे ही बनते हैं जैसे हमारे मनोभाव होते हैं। अपने जीवन का रुपांतरण करने के लिए मनोभावों की ठीक समझ होना अत्यंत आवश्यक है।
प्रेम क्या है ?
जब कभी भी हम कोई व्यक्ति या वस्तु देखते हैं, तो सर्वप्रथम हम यह गणना करना शुरु कर देते हैं कि इससे हमें क्या प्राप्त हो सकता है। यह कोई व्यक्ति हो सकता है या फिर कोई वस्तू, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे विचार या तो भय से या लोभ से यह परिकलन करना शुरु कर देते हैं कि इस स्थिति में हमारे लिए क्या है ? हमारा ध्यान उस व्यक्ति या वस्तु पर केन्द्रित हो जाता है।
अपने ध्यान को अपने अन्तरतम में ले जाना और यह सोचना सम्भव है कि- "मैं क्या योगदान दे सकता हँ?'' "मैं क्या जोड़ सकता हूँ?" "मैं दूसरों को सम्पन्न कैसे बना सकता हूँ?'' अगर यह प्रक्रिया मात्र यह जानने के लिए है कि- "मैं इससे क्या प्राप्त कर सकता हँ?" तो यह वासना से प्रेरित है। अगर यह प्रक्रिया यह जानना चाहती है कि- "मैं इसे कैसे सम्पन्न बना सकता हूँ" तो यह प्रेम से प्रेरित है। वासना वह उर्जा है जो मांग करती है। प्रेम वह उर्जा है जो देती है।
ईमानदारी से कहूँ तो प्रेम को पूर्णरूप से परिभाषित करना बहुत ही कठिन है। मात्र शब्दों से प्रेम को सुस्पष्ट रूप से वर्णित नहीं किया जा सकता। मैं यहाँ-वहाँ से कुछ शब्दों का उपयोग करने का प्रयास कर रहा हूँ, जिससे कि आप इसे समझ पायें।
प्रेम किसी भी व्यक्ति के अन्तरतम का गहन अनुभव है। हम में से अधिकांश लोग सोचते हैं कि प्रेम एक चयन है। हम यह विचार करते हैं कि प्रेम का अनुभव और वर्णन एक चयन है। हम सोचते हैं, कि अगर हम चाहें, तो प्रेम को नियन्त्रित कर सकते हैं, या फिर इसे छोड़ सकते हैं। नहीं! प्रेम कोई चयन नहीं है, जैसा कि हम सोचते हैं। यह जीवन की आधारभूत आवश्यकता है।
जब मैं जीवन कहता हूँ तो इसका तात्पर्य मात्र श्वांस लेना और जीवित रहना नहीं है। मेरा अर्थ अस्तित्व के तल पर जीने से है, जीवंत चैतन्य के रूप में।
यदि आप प्रेम को अभिव्यक्त कर सकते हैं और प्रेम का अनुभव कर सकते हैं, तभी आप चेतना के तल पर जीवित हैं। यदि आप प्रेम का अनुभव नहीं करते हैं न ही उसे अभिव्यक्त करते हैं, चाहे आप श्वांस लें रहे और छोड रहे हैं, आप स्वयं को जीवित नहीं कह सकते है।
यदि,आप प्रेम को सुजित करने का प्रयास करते हैं, तो यह फल की पंखुडी को बलपूर्वक खोलकर खिलने के लिए बाध्य करने जैसा है।
अनेक जानवर , पेड-पौधे और अन्य जीव जन्तु हैं जो प्रतिदिन इसी तरह श्वांस लेने और छो डने का कार्य करते रहते हैं, और आप भी बस उन्हीं में से एक हैं।
एक छोटी कहानीः
एक शिष्य ने जेन गुरू से पूछा, "क्या एक ज्ञानी महात्मा बोलता है?"
गुरू ने कहा, 'नहीं, ज्ञानी महात्मा कभी नहीं बोलता! केवल वही व्यक्ति जो ज्ञानी नहीं है, बोलता है।' शिष्य ने फिर पूछा, ''तो क्या, ज्ञानी महात्मा चुप रहता है?' गुरू ने कहा, 'नहीं! ज्ञानी महात्मा कभी चुप नहीं रहता। अगर वह चुप रहता है, तो वह ज्ञानी नहीं है।" शिष्य अचम्भित था। उसने पूछा, 'गुरूजी, आप कहते हैं वह न तो बोलता है और न ही चुप रहता है। तो, वह क्या करता है?'
गुरू ने उत्तर दिया, "वह गाता है। उसका अस्तित्व गाता है। न तो वह बोलता है और न ही चुप रहता है। उसका अस्तित्व हमेशा गाता रहता है। "
प्रेम मनुष्य का चरम अनुभव है। जब अनुभव घटित होगा, तो हम अनुभव पर अधिकार रखने में समर्थ नहीं होंगे, बल्कि अनुभव हम पर अधिकार रखेगा। यही गुरू का अर्थ है। जब अनुभव हमारे ऊपर अधिकार करता है, तो जो कुछ भी हम करते हैं, तो वह एक सुंदर गीत बन जाता है। कोई भी शब्द जो प्रकट होता है, कविता बन जाता है। हमारा अस्तित्व इतना हल्का हो जाता है कि हम (सरलता से) बहने लगते हैं। हमारा साधारण चलना भी एक नृत्य बन जाता है। हमारी शारीरिक भाषा कोमल लालित्य बिखेरने लगती है। हमारी समस्त अभिव्यक्ति, मानवता की महान सेवा बन जाती हैं।
सभी मनुष्यों का जन्म एक प्रेमी के रूप में हुआ है। एक नया जन्मा शिशु अकारण प्रेम बिखेरता है। क्या जन्म के समय उसे ज्ञात होता है कि उसके चारों ओर कौन है? नहीं! उसकी ऊर्जा कारण रहित प्रेम होती है। जैसे-जैसे हमारी समाज हमारे भीतर भय और लालच बैठा देता है और हम अपने प्रेम को लोभ और भय के आधार पर ही पहचानते हैं। और तब यह अकारण प्रेम नहीं रह जाता। तब इस प्रेम में कारण होता है। यह दम घोंट देता है। मनोभावों में हमे ईर्ष्या, भय और क्रोध को अनुभव करते हैं। हम केवल कारण और तर्क सहित प्रेम का अनुभव करते हैं। परन्तु थोडी-सी सजगता और जागरूकता से ही हम अपने वास्तविक प्रेम को पुनः प्राप्त कर सकते हैं।
प्रेम को निर्मित नहीं किया जा सकता
आप अपने तर्कयुक्त निर्णय से प्रेम को कभी भी पैदा नहीं कर सकते। आपकी मानसिक संरचना स्वयं इस तरह से होनी चाहिए कि आप प्रेम बन जाएं और आपका प्रत्येक कार्यकलाप प्रेम की भाषा बोले। आपका तर्क इस तरह प्रेम को विकीर्ण करे जो तर्क से परे हो! जब आपमें वास्तविक प्रेम घटित होता है, तो आप स्वयं ही यह नहीं जान पाते हैं कि आप प्रेम प्रदाता हैं। सिर्फ दसरे लोग ही यह जान पाते हैं कि आप प्रेम की वर्षा कर रहे हैं।
वास्तविक प्रेम घटित होने पर आपके भीतर से इतनी ऊर्जा उमड़ती है कि आपके पास जो कुछ भी होता है, आप उसे दूसरों को बाँटना शुरू कर देते हैं। आप आश्चर्यजनक विश्वास प्राप्त कर लेते हैं, क्योंकि आप
जेन - जापान के लोग जो बुद्धा को मानते है, जोकि ध्यान व ध्यान क्रिया करते है।
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है। यह हर पल नई है। दर्शनशास्त्र और कुछ नहीं बस उन्हीं परानी बातों को अलग तरीके से दोहराना मात्र है। इसमें क्रुछ भी नया नहीं जीवन प्रतिपल नया है। दर्शनशास्त्र जीवन से ताजगी चुरा लेता है।
एक छोटी कहानी :
एक देश में दस दर्शनशास्त्रियों को कारावास में डाल दिया गया। उन सबको एक ही कोठरी में रखा गया। उन दर्शनशास्त्रियों ने किसी भी तरह कारावास से भाग निकलने का निर्णय किया और एक साथ बैठकर एक बडी योजना बनायी। उन्होंने कारावास के द्वार की कुंजी का सांचा प्राप्त कर लिया और किसी तरह से इप्लीकेट कुंजी बना ली।
अंत में, उन्होंने भाग निकलने की तिथि निश्चित की। पुरी योजना अच्छी तरह से तैयार कर ली गई। उन्होंने तय किया कि एक निश्चित रात्रि को उनमें से कोई दो जाकर इप्लीकेट कुंजी से कारावास का द्वार खोल देंगे और दूसरे लोगों को इशारा कर देंगे। दूसरे लोग भाग निकलेंगे तथा बाद में ये दो लोग कारावास का द्वार बंद करने के बाद भागेंगे।
भाग निकलने की तिथि आयी और उनमें से दो द्वार खोलने के लिए गए। शेष बचे लोग उनके इशारा करने की प्रतीक्षा करने लगे। वे प्रतीक्षा करते रहे किन्तु उन्हें कोई इशारा नहीं मिला। तीन घण्टे व्यतीत हो गए। अचानक वे दो लोग जो द्वार खोलने के लिए गए थे, वापिस लौटे और बोले, 'हमें भाग निकलने की अपनी योजना को टालना होगा। यह योजना आज संभव नहीं हो सकती। हम अन्य किसी दिन भागने की योजना बनायेंगे।' दूसरे लोगों ने पूछा, 'क्यों, क्या हुआ? उन्होंने उत्तर दिया, 'क्या करें? मूर्ख द्वारपालक कारावास के द्वार पर ताला लगाना ही भूल गए। हम लोग खोलें क्या?
जो दार्शनिकता में रहते हैं वे कुछ नया नहीं सोच सकते। उनकी वही पुरानी मानसिकता रहती है। अगर कोई परिवर्तन होता है, या कोई नई स्थिति बनती है, तो उससे निपटने के लिए वे रचनात्मक तरीके से नहीं सोच सकते, क्योंकि वे खूले हुए नहीं होते। वे एक बंद परिपथ की भांति होते होते हैं
अपने जीवन से बर्ताव के लिए हम भी दर्शन-शास्त्रियों की भांति हो गए हैं। हम अतीत के ढाचे में अवरूद्ध हो गये हैं। कभी वर्तमान के क्षण में नहीं होते हैं। अगर कुछ नया होता है, तब हम किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाते हैं।
दर्शनशास्त्र के साथ निश्चित धारणा हो जाती हैं, आप हठधर्मी हो जाते हैं। जब आप हठधर्मी बन जाते हैं, तो आप प्रेम नहीं कर सकते। हठ धर्मिता एक तरह की आक्रामकता होती है, जो प्रेम को भीतर नहीं आने देती। जब आप अत्याधिक सुनिश्चित हो जाते हैं, और पूर्व-निर्धारित विचारों से भर जाते हैं, तो प्रेम को प्रवेश करने के लिए रिक्तता ही कहां रह जाती है? प्रेम को पुष्पित होने के लिए संदर रिक्तता की आवश्यकता होती है।
दर्शनशास्त्र के रहते, प्रेम के अस्तित्वगत स्थिति में रहने के लिए स्थान ही नहीं होता। यह कुछ इस तरह है : आप यदि अमृत का स्वाद लेना चाहते हैं, तो क्या आप इसके बारे में कुछ विचारों को तैयार कर इसका अनुभव कर सकते हैं? नहीं। इसके लिए आपको अमृत को ही चखना होगा, इसे कुछ खाली स्थान दें, ताकि यह, यह आपको भरकर अपनी अस्तिवगत स्थिति में आ जाएं। तभी आप इसका स्वाद जान पायेंगे। उसी प्रकार, प्रेम का अनुभव करने के लिए, मात्र थोड़े से विचार सहायक नहीं होंगे। आप इसे अपने अंतरतम में अस्तित्वगत अवस्था में विकसित होने दें, तभी आप इसे जान पायेंगे। इसे आप अपने हृदय में घटित होने दें, न कि मस्तिष्क में। हृदय के साथ होने का निर्णय लें, तभी यह विकसित और घटित होगा।
मस्तिष्क के भीतर जो एक बार असफल था, वह हृदय में सफल हो सकता है। प्रेम वास्तव में हृदय की
सफलता के भीतर है। जिसे प्रत्येक को अनुभव करना चाहिए। मस्तिष्क में रहना आसान कार्य है। आखिरकार, यह एक साधारण और जानी-पहचानी विचार शक्ति है। हृदय में रहने के लिए साहस की आवश्यकता होती है क्योंकि हृदय के साथ कुछ जाना-पहचाना नहीं होता, सबक्कूछ नया होता है। मस्तिष्क स्तर पर ठोस पहचान होती है और जानी पहचानी संरचना होती हैं। जबकि हृदय-स्तर पर कोई पहचान नहीं होती, कोई संरचना नहीं होती। यह एक खुला रिक्त-स्थान होता है। इसमें प्रवेश के लिए आपको साहस की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि अधिकांश लोगों के लिए प्रेम भय देने वाला होता है। यह एक अपरिचित क्षेत्र होता है। मस्तिष्क के साथ विश्रामपूर्ण परिचय होता है।
अंहकार तोड़ता है- प्रेम जोड़ता है।
अगर ब्रम्हाण्ड एक विशाल समूद्र है, तो हम सब इसके अंश हैं। हम सब सागर के साथ एकाकार हैं, हम सागर में व्यक्ति की पुथक ब्रंद नहीं हैं। जब हम स्वयं को पुथक बुंद समझते हैं, तो हम अपने को सीमा और भावनाओं में पुथक समझते हैं। इसी को अहंकार कहते हैं। तब हम मैं और मेरे द्वारा चलाये जाते हैं। जब तक यह अलगाव रहता है, तब तक हम सागर की ऊर्जा, जो कि प्रेम है, का अनुभव नहीं कर पाते। हम अकारण प्रेम और प्रेम की तरंग का अनुभव नहीं कर पाते।
जब तक हम सागर में एक बूंद की तरह रहते हैं, तबतक हम जीवन को 'न' कहते हैं। न तो हम प्रेम कर पाते हैं, और न ही विश्वास। हम आनंदमय नहीं रह पाते क्योंकि आनंद का अनुभव मात्र उसे ही होता है, जो प्रेम और विश्वास करना जानता है। यह मात्र उन्हीं को घटित होता है जो सागर का अंग बन जाते हैं। आनंद तभी संभव है जब हमारा हृदय 'हाँ' कहे और जब 'ना' हमारे अस्तित्व से पुरी तरह से मिट जाए। 'ना' अंधकार है। 'हाँ' प्रकाश। 'ना' अहम है, 'हाँ' अहमरहित है।
जीवन-मुक्ति
'ना' अचेतन व्यक्ति का मार्ग है और 'हाँ' जागत व्यक्ति का। हमारे जीवन की समस्त पीडाएं, संघर्ष हमारे 'ना' कहने के कारण हैं। 'ना' अस्तित्व के साथ एक लडाई है। 'हाँ' अस्तित्व के साथ प्रेम है, शान्ति है। 'हाँ' हम जो सागर-हैं, उसके साथ पुर्णता की गहन सहमति है। आनंद उसी सहमति, सामंजस्य का दसरा नाम है। आनंद में होना सागर में विलीन हो जाना है, बुंद होना नहीं बल्कि सागर के साथ विलय होना है। बुंद में रहना, अहम का बना रहना है। समस्त दर्दशाओं की जड अहम में निहित है। जब अहम का नाश होता है, तो अस्तित्व के सागर के प्रत्येक कोने से आनंद हम तक पहुंच जाता है, मानो यह अहम नाश होने की ही प्रतीक्षा कर रहा था।
अहम चेतना की बंद अवस्था है। अहम में समस्त द्वार एवं खिडकियां बंद रहती हैं। जीवन स्वयं अवरोधक बन जाता है। हमारा अहम एक कैप्सूल की भांति हमे चारों ओर घेरे होता है। हमारा अहम एक सीलबंद कैप्सुल की भांति होता है, जिसमें
किसी भी वस्तु के प्रवेश के लिए एक छोटा-सा छिद्र भी नहीं होता। यह भय के कारण स्वयं को बंद कर लेता है और स्वयं में सिकुड़ जाता है। इस प्रकार, अपनी दर्दशाओं का सजन हम स्वयं करते हैं।
प्रेम अस्तित्व के साथ बहना है इसके प्रति पूर्ण समर्पित हो जाना है।
प्रेम अस्तित्व के साथ बहना है इसके प्रति पूर्ण समर्पित हो जाना है। अहम ठोस बर्फ जैसा है। प्रेम तरल जल की भांति होता है। जब हम तरल होते हैं तभी हम सागर में विलीन हो सकते हैं। तब हमारा कोई निजी लक्ष्य या गंतव्य नहीं रह जाता। प्रत्येक क्षण आनंदमय हो जाता है, अविश्वसनीय रूप से अत्यंत प्रसन्नता मात्र ब्रम्हाण्ड की योजना के अनुरूप हो जाना।
मस्तिष्क अहम का एक अंग है। यह बंद होना
जानता है, किन्तु खुलना नहीं जानता। प्रेम करने का अर्थ है खुलना, समर्पण करना। इसका अर्थ है अस्तित्व के लिए. पृष्पों के लिए, मधुमक्खियों के लिए और सितारों के लिए खुलना। हम इस संदर संगीत जो सम्पूर्ण अस्तित्व में व्याप्त है, के प्रति कैसे खुलें?
हम इस उत्सव को जो चलता ही रहता है- पृष्प पवन में नृत्य करते रहते हैं, वृक्ष पवन और सितारों का आनंद उठाते रहते हैं, हमेशा आनंद की अवस्था बनी रहती है, कैसे मनाएं? मनुष्य के अतिरिक्त हर चीज में सामंजस्य प्रतीत होता है।
कृपया समझें कि मनुष्य में सामंजस्य समाप्त हो जाता है क्योंकि उसी के पास 'चेतना' है जो अन्य किसी सजीव प्राणी के पास नहीं है।
चेतना दो कार्य कर सकती हैः यह अहम का सुजन कर सकती है और यह अहम रहित भी बन सकती है। अगर यह अहम का सृजन करती है, तो हम नर्क में रहते हैं। अगर यह अहम रहितता का सूजन करती हैं. तो हम स्वर्ग में रहते हैं। अहम से परिचित हुए बिना सम्पूर्ण विश्व स्वर्ग है। जब मनुष्य स्वर्ग में प्रवेश करता है, तो वह इसे पूरी तरह से जानने के लिए प्रवेश करता है। मनुष्य की यही महिमा है। यही सौन्दर्य है। और यही भय भी है, क्योंकि अहम् के पाश में फंसना आसान है और स्वर्ग को जानते हुए भी उसमें प्रवेश करने की अपेक्षा उसमें प्रवेश न करना आसान है। समस्या यह है कि हम यह भूल चुके हैं कि हम कौन हैं? और हमारा सजन क्यों किया गया है? हम प्रेम के सम्राट हैं, किन्तु हम इस स्वप्न में रहते हैं कि हम भिक्ष हैं। हमारे भीतर अस्तित्व का सम्पूर्ण राज्य है और फिर भी हम लगातार तुच्छ वस्तुओं की कामना करते रहते हैं। अपने भीतर असीम, अपार खजाना होने पर भी हम तुच्छ वस्तुओं के संग्रह में लिप्त रहते हैं। हम स्वयं सागर होने के बावजुद प्यासे हैं। क्योंकि हम स्वयं से असंतुष्ट हो चुके हैं। किन्तु हम कितने ही असंतुष्ट क्यों न हों, हम कितना ही क्यों न भुल चुके हों, ये सब एक पल में याद आ सकता है और हम तरंत जड़ सकते हैं। प्रेम जोडता है।
जीवन-मुक्ति
आनंद प्रेम से उत्पन्न होता है। प्रेम वह कविता है जो वापिस आपको अस्तित्व से जोडती है। प्रेम वह तलवार है जो अहम को काट देती है और आप सागर में मिल जाते हैं। जब हृदय प्रेम से भर जाता है, तो आपका सम्पूर्ण जीवन गद्य से पद्य में, शोर से सर में, असहमति से सहमति में रूपांतरित हो जाता है। अस्तित्व ही अनवरत आनन्द हो जाता है। मात्र 'होना' ही पर्याप्त है। किन्तु होने के आनंद की अनुभूति के लिए हमें संवेदनशील होने की आवश्यकता है। हमें भाव का विकास करने की आवश्यकता है। भाव वही है जिसे हमें प्रेम कहते हैं। प्रेम होने के आनंद की अनुभूति कराता है। जब आप प्रेम भाव में होते हैं तब जीवन स्वतंत्र विचारों से बना नहीं होता है, अपितु निरंतर भाव बन जाता है। तब अहम का विलय होने लगता है। एक बार जब हम सोचने से अनुभूति पर पहुंच जाते हैं, तो बस हमें एक कदम और बढ़ाना होता है और वह है अनुभूति से होने पर पहुंचना, और यह बिल्कुल आसान है। सोचने से अनुभूति पर पहुंचने का पहला कदम मुश्किल है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि हमारे अहम ने हमारे मन को अत्याधिक सोचने के लिए प्रशिक्षित कर लिया होता है। दूसरा कदम लगभग स्वतः ही आ जाता है। इसके होने के लिए हमें किसी चीज की आवश्यकता नहीं होती। अनुभूति से होने में थोड़ी सी भी दूरी नहीं होती। यह किसी भी समय घटित हो सकता है। कवि किसी भी समय ऋषी बन सकता है। वह लगभग वहां पहुंच ही चुका होता है। वास्तविक समस्या यह है कि हम अपने विचारों से बाहर निकलें और अधिक से अधिक अनुभूति प्राप्त करें।
बस हृदय का अनुकरण कीजिए। अधिक प्रेममय हों। भावमय हों। अधिक से अधिक आनंद लीजिए जिससे कि आपके हृदय को भोजन प्राप्त हो सके। सूर्योदय, सूर्यास्त, बादल, इन्द्रधनुष, पक्षियों, पुष्पों, चट्टानों और लोगों को देखिए, उनकी आंखों में देखिए। अस्तित्व इतना बहुआयामी है। एक कवि की भांति हर आयाम में देखिए। उसकी प्रशंसा कीजिए। इसकी अनुभूति कीजिए। अति प्रसन्न रहिए! अपनी चेतना की वृद्धि कीजिए। और अस्तित्व
के प्रत्येक विवरण का प्रेम से अनुभव कीजिए। धीरे-धीरे, अहम अपनी पकड छोड देगा और विलाप्त हो जायेगा।
प्रेम के लिए एक मात्र बाधा भय है। जब चीजें घटित होनी आरम्भ होती हैं, तो हम भयभीत हो जाते हैं क्योंकि प्रेम के साथ हम विलीन होते हैं। यह हमारे अहम के आधार के लिये खतरा है। अहम अलगाव है, प्रेम विलय है। जिस भय की हमें अनुभूति होती है वह अन्य कुछ नहीं है वरन अहम के विलीन हो जाने का भय है। भय को होने दो। ये कुछ ही देर रहेगा। अगर हम इसकी सरलता से उपेक्षा कर देते हैं, तो यह हमें छोड़कर चला जाता है। यह एक महान दिन होता है जब अहम खोने का भय हमसे छूट जाता है। तब, विकास सरल आसान और स्वः स्कूर्त होने लगता है। तब हम नहीं होते होते मात्र प्रेम होता है।
हर क्षण प्रेमी बनें
जीवन की हर परिस्थिति का सामना अत्यधिक प्रेम से कीजिए। शीघ्र ही आप विशद्ध प्रेम बन जाते हैं। चाहें कोई व्यक्ति हो या आपका कार्य या कोई राहगीर या देवता या कुछ भी, प्रेम की ही खातिर इनके साथ गहन प्रेम कीजिए। अगर आप कोई चित्रकार हैं तो चित्रकारी के साथ प्रेममय हो जाएं। अगर आप कोई नर्तक हैं, तो नृत्य के साथ पूर्णतया प्रेममय हो जाएं। अगर आप अपने कम्प्यूटर पर कार्य करते हैं, तो इसके साथ अत्यंत प्रेम के साथ व्यवहार करें और इस कार्य में खो जाएं। पूर्णतया निःश्छल हो जाएं और हर पल पुर्णतया प्रेम में रहें।
अगर आप चित्रकारी कर रहे हैं और इसी समय यह भी सोच रहे हैं कि अपनी चित्रकारी को किस गैलरी में रखें या इसे कितने मूल्य पर बेचें, तो स्पष्ट रूप से जान लीजिए कि आप प्रेम में खोए हुए नहीं हैं। आपको किसी विशेष चीज जैसे धन के साथ प्रेम है। अगर आप नत्य कर रहे हैं, और साथ ही यह गणना भी कर रहे हैं कि नृत्य समाप्त हो जाने पर आपको क्या प्राप्त होगा
तो आप स्पष्ट रूप से जान लीजिए कि आप प्रेम में खोए हुए नहीं हैं। ऐसा करके आप अधिक से अधिक बंधनों का सूजन कर रहे हैं। जब आपके जीवन में गरू घटित होता है, तो उसके साथ भी आप ऐसा ही करते हैं।
मैं लोगों से कहता हूँ, 'मैं अपनी उंगली से संकेत करके आपको चन्द्रमा दिखा रहा हूँ। अगर आप चन्द्रमा को देख लेते हैं, तो आपको वही अनुभव होता, जो मूझे अनुभव होता है। किन्तु इसकी अपेक्षा अगर आप मेरी उंगली देखते हैं, तो आप न तो चन्द्रमा देख पाएंगे और न ही अनुभूति प्राप्त कर पाएंगे।'
अगर आप हर क्षण में खो जाओ, तो आप प्रेम ही होते हैं। फिर जब आप सभी कार्य करते हैं, उस पर अत्याधिक केन्द्रित होकर कार्य करते हैं, क्योंकि आपको अपने कार्य से गहन प्रेम होता है। इस प्रकार, आपका जीवन एक गहन ध्यानमय प्रेम हो जाता है।
तब आप हर चीज को सजीव जीव की भांति जैसे आप स्वयं हैं, अनुभव करना, संबंधित होना और आदर देना शरू कर देते हैं। आप दसरे लोगों के विचारों को अनुभव करने लगते हैं। आप अन्य व्यक्तियों के साथ भी प्रतिसंवाद व संबोधित होने लगते हैं, चाहे वे आपके साथ खले न भी हों। आप ब्रम्हांड को पारभासिक, सदा सजीव उपस्थिति के रूप में अनुभव करते हैं। आप में अत्याधिक प्रज्ञा होती है। आप चीजों से ठीक तरह से जड़ना सीख लेते हैं। यही प्रेम की शक्ति है।
वास्तविक प्रेम आपको वर्तमान क्षण में रखता है। यह आपको वास्तविक सजगता प्रदान करता है। इसीलिए यह इतना शक्तिशाली होता है। कुछ भी इतना तीव्र नहीं है जितना कि वर्तमान क्षण में होना। प्रेम, अपनी पूर्णता में, क्षण-क्षण में जीने का अनुभव है। और यह दो व्यक्तियों या किसी वस्तू के विषय में नहीं है। यह मात्र प्रेम के लिए प्रेम है। अगर आप वास्तविक प्रेम की झलक का अनुभव एक क्षण के लिये प्राप्त करते हैं, और अपने भीतर इसे पोषित कर सकते हैं और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व और जीवन को भरने के लिए इसका विकास कर सकते हैं। तब
यह चिंगारी ही पर्याप्त है।
तब आप एक अद्भुत रचयिता बन जाते हैं क्योंकि प्रेम ऊर्जा भी एक सूजनात्मक ऊर्जा है। इसीलिए कवि ऐसी सुजनात्मकता को अभिव्यक्त करते हैं। वे प्रेम में खो जाते हैं और एक आनंदमय सजनकर्ता बन जाते हैं। क्षण के नयेपन द्वारा सजनात्मकता घटित होती है।
सुफी-संत, जलालुद्दीन रूमी कहते हैं, 'आप जहां कहीं भी हैं, आपकी जो भी स्थिति है, हमेशा एक प्रेमी बनने का प्रयास करें।' समग्र अस्तित्व स्वयं एक गहन रोमांस में है। और आप इसके एक अंश हैं। इसीलिए प्रत्येक क्षण एक प्रेमी बनना आपकी प्रकृति है। मात्र ऐसा बनकर ही, आप अपने मूल स्वभाव की वास्तविक परिपूर्णता का अनुभव कर सकते हैं।
सर्वप्रथम स्वयं से प्रेम कीजिए
आज एक बड़ी समस्या यह है कि अधिकांश व्यक्ति स्वयं से ही प्रेम नहीं करते। समाज कभी भी यह नहीं सिखाता कि अपने आप से प्रेम करना संभव है! समझने की चेष्टा कीजिए कि जबतक आप स्वयं से प्रेम नहीं करते हैं, तब तक आप अन्य व्यक्ति से प्रेम नहीं कर सकते। जब आप स्वयं को स्वयं में खो देते हैं, मात्र तब ही आप स्वयं को दूसरों में भी खो सकते हैं। हमें सिखलाया जाता है कि जब हमारे पास कोई कारण होता है तभी हम स्वयं से प्रेम कर सकते हैं। अगर हम अच्छा करते हैं, तो हम स्वयं से प्रेम करते हैं। किन्तू, अगर हम असफल होते हैं, तो हम स्वयं से घूणा करते हैं। और यही युक्ति हम दूसरों पर भी लागू करते हैं। हम मात्र किसी कारण से ही उससे प्रेम करते हैं, बिना किसी कारण के कभी नहीं। जब आप स्वयं से प्रेम नहीं, करते, तो आप जीवन के प्रति नकारात्मक हो जाते हैं और सभी को स्वार्थी समझने लगते हैं। जब आप अपनी माँ के गर्भ में अकेले थे, तब आप पुर्णतया प्रेममय एवं आनंदमय थे। गर्भ में अपने अकेलेपन में आपने स्वयं को प्रेम करने का अनुभव किया। इसीलिए आप देखेंगे कि जब कभी भी आप सरक्षा में लेटे होते हैं, तो आप माँ के शरीर में बढ़ते बच्चे से संबंधित मुद्रा में हो जाते हैं। आनंदमय एकाकीपन आपका वास्तविक स्वभाव होता है। एक बार जब आप इस संसार में आ जाते हैं, तो समाज ने यह शर्त रख दी होती है कि आपको प्रेममय और प्रसन्नचित्त होने के लिए व्यक्तियों की और टेलिविजन इत्यादि की आवश्यकता है। इससे कभी भी आपकी मुल गुणवत्ता का पोषण नहीं हुआ। आपकी मूल गुणवत्ता आनंदमय एकाकीपन है। अगर आप वापिस उसके सम्पर्क में आते हैं, तो आरामदेह स्थिति में पहुंच जाते हैं। और आपको स्वयं में शान्ति और शिथिलता की अनुभति होती है।
प्रतिदिन कुछ मिनटों के लिए, स्वयं के साथ बैठें और स्वयं में प्रेम के प्रवाह की अनुभूति करें। यह अनुभूति करें कि आप कितने अदभुत प्राणी हैं। यह अनुभूति करें कि आपने अब तक अपनी कितनी उपेक्षा की है। आप स्वयं को अस्तित्व का अंग समझें और इसके लिए स्वयं से प्रेम करें। स्वयं के लिए प्रेम की अनुभूति में विलीन हो जाए। अगर आप प्रतिदिन ऐसा अभ्यास करेंगे, तो आप पायेंगे कि एक समय था जब आप कठोर थे, पर अब आप कोमल और प्रेममय हो गए हैं।
जब आप शान्ति, और प्रेम सहित स्वयं के साथ आरामदेह स्थिति में बैठते हैं, तो आनंद आपसे प्रस्फुटित होगा। जब आपका स्नायु-तंत्र शान्ति से स्वच्छ होता है, तो आनंद फूट पड़ता है। आप भी वही आनंद अभिव्यक्त करने लगते हैं जोकि गुरू की शारीरिक भाषा से अभिव्यक्त होता है। तब जब लोग आपसे प्रेम करते हैं, तो आपको अपराध-बोध या अयोग्य होने की अनुभूति नहीं होती क्योंकि जैसा कि वे आपसे प्रेम करते हैं, वैसा ही आप भी स्वयं से प्रेम करते हैं। आप दूसरों से प्रेम प्राप्त करने
सूफी - सूफीवाद को मानने वाले यह मुस्लिम की एक रहस्य ज्ञान की धारा है।
रुमी - 13वीं शताब्दी के परशियन सूफी कवि।
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केलीव बेक्सटर - ये पॉलीग्राफ के विशेषज्ञ हुये है, जिन्होनें पौधो के व्यवहार कि खोज कि थी और झूठ पकडने वाली मशीन भी बनाई है।
सना हो, 'आपको अपने बड़ों को प्यार करना चाहिए।'' यही समस्या है।
सम्मान आपके भीतर सबसे पहले तो यह अपराध बोता है कि आप कुछ निक्रष्ट हैं। यह आपको उस व्यक्ति से जिसे आप सम्मान करते हैं अलग होने का एहसास कराता है। दूसरी तरफ, प्रेम आपके भीतर आनंद और एकता के बीज बोता है। यह आपको दूसरे व्यक्ति तथा वह सबकूछ जो सत्ता में निहित है, से जुड़े होने का एहसास कराता है। सम्मान के साथ भय जुड़ा है। प्रेम के साथ वास्तविक सम्मान जुड़ा है तथा गहन समझ के घटित होने की संभावना होती है। अकेले सम्मान के साथ अधिक समझ संभव नहीं है। सम्मान कम या अधिक अंधा होता है। प्रेम के साथ, अत्याधिक समझ और रूपांतरित होने की संभावना होती है। प्रेम का स्वभाव ही रूपांतरण है। यह आपको सौम्य और पिघला देता है।
सम्मान आपके और दूसरों के बीच दूरी बढ़ाता है। प्रेम आपके और दूसरे के बीच सेतु बनाता है। क्योंकि लोगों ने स्वयं प्रेम का अनुभव नहीं किया है, इसीलिए स्वीकृत व्यवहार के नियमानुसार वे सम्मान देते हैं। सम्मान आसान है किन्तु वास्तविक नहीं। प्रेम कठिन हो सकता है क्योंकि अधिकांश लोग इसे व्यवहार में लाना नहीं जानते, किन्तू यह वास्तविक होता है। प्रेम के साथ सम्मान स्वतः ही होता है और प्रामाणिक भी होता है। विश्वद्ध सम्मान से प्रेम के दिखावें के रूप में बाध्य किया जाता है जो कभी भी प्रामाणिक नहीं होता।
प्रेम समस्त धर्मों का मल है
प्रेम ही मूल धर्म है। यह समस्त आध्यात्मिकता का मूल है। अन्य सभी धर्म प्रशाखायें हैं। प्रेम किसी वृक्ष की जड़ की तरह है और सभी धर्म पत्तियों एवं शाखाओं की तरह हैं। प्रेम की धर्म से तुलना करने पर महानतम धर्म भी मात्र सबसे बड़ी शाखा ही है।
जीवन-मुक्ति
प्रेम का कोई मन्दिर नहीं है, कोई धर्मग्रंथ नहीं है। यह जडों की भांति है जो भूमि में दबी रहती है किन्तु पोषण प्रदान करती है। बिना इसके सम्पूर्ण व्रक्ष का नाश हो जाता है। प्रेम से अनेक शाखाओं एवं पत्तियों का सूजन होता है। किन्तु हम क्या करते हैं? हम जड़ से चिपकने की अपेक्षा शाखाओं और पत्तियों से चिपके रहते हैं। जब हम जड से चिपकते हैं, तो हमारा प्रत्यक्ष पोषण होता है। जब हम शाखाओं से चिपकते हैं, तो हम पोषण के मात्र एक आयाम का आनंद उठा पाते हैं। जब आप अधिक प्रेममय हो जाते हैं, तो आप प्रेम के अदश्य मन्दिर में प्रवेश कर जाते हैं।
वृक्ष की जड़ें इस विश्व के समस्त वृक्षों के विषय में उसी प्रकार जानकारी रखती हैं जिस प्रकार ओस की बूंदें इस विश्व के समस्त समुद्रों के विषय में जानकारी रखती हैं। अगर हम ओस की बुंद का ढांचा समझ लें तो हम इस धरती के समस्त सागरों के विषय में जान जायेंगे। हम उस यौगिक के विषय में जान जायेंगे जो स्वयं जल कहलाता है। जल कहीं भी कुछ नहीं हो सकता सिवाय अपने रासायनिक घटक के। घटक सबसे छोटे अणू में परिवर्तित होता है, तो यह ओस बुंद बन जाता है। इसी प्रकार, मनुष्य प्रेम का अणु है। और प्रेम कुछ नहीं अस्तित्व की गुणवत्ता है। अगर प्रेम का ज्ञान हो जाए, तो सम्पूर्ण अस्तित्व का अनुभव हो सकता है। यह समझें कि मनुष्य का घटक शारीरिक, रासायनिक या मनोवैज्ञानिक भी नहीं है। इसीलिए कोई भी हमें यह नहीं बता सकता कि यह क्या है। हमें इसे स्वयं ही अनूभव करना चाहिए। अन्य सभी ज्ञान-शारीरिक, रासायनिक, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सभी परिवर्तनीय हैं। इस प्रकार का सभी ज्ञान सरलता से परिवर्तित हो जाता है। मात्र आध्यात्मिक ज्ञान परिवर्तित नहीं होता। उसे इस तरह सिखाया नहीं जा सकता अपितु अनुभव किया जा सकता है।
एक छोटी कहानी :
एक दिन एक गुरू ने अपने शिष्यों से पुछा कि आप कैसे बता सकते हो कि रात्रि समाप्त हो
चुकी है और दिन निकल चुका है।
एक शिष्य ने कहा, 'जब आप दूर खड़े पशु को देखकर बता सकते हैं कि वह गाय है या घोड़ा। '
गुरू ने कहा, 'नहीं।'
एक अन्य शिष्य ने कहा, 'जब आप दूर स्थित वुक्ष को देखकर बता सकते हैं कि यह देवदार का वक्ष है या फिर आम का वक्ष।'
गुरू ने फिर कहा, 'नहीं।'
शिष्यों ने पुछा, 'तब यह क्या है?, गुरूजी।'
गुरू ने उत्तर दिया, ''जब आप किसी व्यक्ति के चेहरे को देखते हैं और उसमें अपने भाई को पहचानते हैं। जब आप किसी महिला का चेहरा देखकर उसमें अपनी बहिन का स्वरूप पहचाते हैं। अगर आप ऐसा नहीं कर सकते, तो दिन होने के बावजूद भी यह रात के ही समान है।"
गुरू कुछ संकेत दे सकता है। कुछ यहां-वहां के संकेत। तब हमें ध्यानपूर्वक, सावधानी से अपना मार्ग तलाशना चाहिए। प्रेम मात्र एक संकेत है, किन्तु यदि हम धीरे-धीरे प्रेम का अनुकरण करें, तो हम यह जानकर अचम्भित होंगे कि परमात्मा अधिक से अधिक एक वास्तविकता बन गया है। अब वह कोई विचार नहीं है, कोई मत नहीं है, किन्तु कुछ ऐसा है जिसका हम एहसास कर सकते हैं। जितना ही अधिक गहनता से हम इस प्रेम में उतरते हैं उतनी ही अधिक निकटता से हमें यह अनुभूति होती है। जिस दिन हमारा प्रेम में विलय हो जाता है उसी दिन हम एकाकार हो जाते हैं।
प्रेम समस्त धर्मों का रहस्य है। इन सबके बावजूद हम तर्कों और धर्मशास्त्रों में डूबे रहते हैं। धर्मशास्त्र किसी भी चीज की तरह धर्म से दूर हैं। ईश्वर के विषय में कोई तर्क नहीं हो सकता, मात्र प्रेम हो सकता है।
ईश्वर कविता है। वह संगीत में है। वह नत्य में है, किन्तु तर्क में नहीं है।
ईश्वर कोई विचार नहीं है जिसे तार्किक प्रक्रिया से प्राप्त किया जाए। यह एक अन्तस अनुभव है, इतना गहन अन्तस अनुभव कि इसकी खोज मनुष्य अकेला होकर ही कर सकता है।
दीर्घकाल से अधिकांश रहस्यवादी इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि पदार्थ आपस में प्रेम से साथ जूडा है। एक अदृश्य शक्ति अणूओं और परमाणूओं को एक साथ जोड़े हए है। इस अदृश्य शक्ति के कारण इनका पुथकीकरण संभव नहीं है। विज्ञान को अभी भी इस परम ऊर्जा की खोज करनी है। इसने अभी इसके कुछ प्रकटीकरणों जैसे गुरूत्वाकर्षण एवं विद्युतधारा का पता लगा लिया है, किन्तु ये मात्र स्थूल प्रकटीकरण ही हैं। जिस दिन विज्ञान ने इस प्रेम को खोज लिया उस दिन धर्म और विज्ञान का एक ही भाषा में एक-दूसरे के साथ संवाद करेंगे।
अब, सिर्फ आनंद मनाएं क्योंकि प्रेम संभव है। इस आनंद में रहो कि प्रेम आपकी आन्तरिक संभावना है। प्रेम से आप चरम ऊंचाईयों को छू सकते हैं। प्रेम से कुछ भी असंभव नहीं है क्योंकि प्रेम स्वयं ईश्वर में रूपान्तरित हो सकता है।
प्रेम के तीन प्रकार और उनका एकीकरण
अधिकांश व्यक्ति प्रेम और वासना को लेकर दुविधा में रहते हैं। यह सबसे अधिक दुख की स्थिति है। वह व्यक्ति जो यह समझता है कि वासना ही प्रेम है. वह भौतिक तल तक सीमित है। वह कभी भी इसके ऊपर नहीं उठ सकता। वह कभी भी सोच नहीं कर सकता कि भौतिक सतह से ऊंचा तल भी है। वह अपने घर के भूमिगत हिस्से में रहता है। यौन वह भूमिगत स्थल है। यह रहने के लिए स्थान नहीं है। आप इसका उपयोग अन्य उद्देश्यों के लिए कर सकते हैं, किन्तु यह आपका
घर नहीं हो सकता। आपका घर इससे ऊपर है।
मनुष्य के होने के तीन तल हैं-
पशु, मानवीय और ईश्वरीय। पहली तल है वासना की तल, जोकि पशु तल है। यह प्रेम का अपरिष्कृत रूप है। ऐसा नहीं है कि प्रेम इसमें नहीं है। प्रेम इसमें है बस भय और कामना से यह प्रदूषित है।
जैसे-जैसे हमारा अस्तित्व अधिक विश्वद्ध होता जाता है, हम दसरे तल पर पहुंच जाते हैं, साधारण मानवीय प्रेम। मानवीय प्रेम में अधिकार एवं ईर्ष्या के लक्षण होते हैं। चुंकि मानवीय प्रेम में, पशु प्रेम की अपेक्षा अधिक समझ होती है। इस प्रेम में कोई भी व्यक्ति अन्य व्यक्ति का उपयोग लाभ लेने के लिए नहीं करता। मानवीय प्रेम में एक व्यक्ति दसरे व्यक्ति को
आपके जीवन में कम से कम एक ऐसा संबंध अवश्य होना चाहिए जिसका अस्तित्व बिना किसी कारण के, बिना किसी प्रयोजन के हो।
अपने समरूप समझने में समर्थ होता है।
तीसरे प्रकार का प्रेम ईश्वरीय प्रेम होता है। यह प्रेम की तरह स्वयं वना उच्चतम रूप होता है, लगभग एक प्रार्थना की तरह। इसमें कोई अधिकार
नहीं होता। इसमें कुछ भी सांसारिक नहीं होता। यह अदृश्य हो जाता है किन्तु इसमें शक्ति होती है। और यह तब होता है जब प्रेम प्रार्थना बन जाता है और हमें विश्रामपूर्ण संतोष प्राप्त होता है। मैं विश्राम शब्द का उपयोग कर रहा हूँ क्योंकि अन्य दोनों प्रेम में अधिक से अधिक पाने की इच्छा रहती है या फिर हमें किसी अभाव की अनुभूति होती है। इनमें विश्राम प्राप्त नहीं होता। जब तीसरे प्रकार का प्रेम घटित होता है, तो यौन भी भौतिक सुख से परे गहन और ईश्वरीय बन जाता है।
भारत में, उस स्थान को जहां तीन नदियां मिलती हैं, पवित्र माना जाता है। यह एक रूपक है क्योंकि मनुष्य तीन शक्तियों शारीरिक, मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक का संगम स्थल है। जब ये तीनों शक्तियां वास्तविक रूप से मिलती हैं, तो अत्यंत उत्साह एवं आनंद की अनुभति होती है।
आम तौर पर हम कक्षों में रहते हैं- हमारा शरीर एक कक्ष में रहता है, हमारा मन दूसरे कक्ष में रहता है और आत्मा किसी तीसरे कक्ष में रहती है। शरीर को मन का ज्ञान नहीं होता। मन को शरीर का ज्ञान नहीं होता। आत्मा को मन को मन नहीं होता। शरीर आत्मा से बेखबर रहता है। ये सब साथ-साथ रहते हैं, किन्तु एक-दूसरे को नहीं जानते।
ध्यान का पहला कदम इन सबको अधिक निकट लाना है, उन्हें एक-दूसरे से परिचित कराना है, और उन्हें गहन मित्रता में जोड़ना है, जिससे कि उनका आपस में विलय संभव हो। और जब तीनों आयाम एक ही बिन्द पर आकर मिल जाते हैं, तो एक नये आयाम का जन्म होता है। तीनों के संगम से एक चौथे का जन्म होता है। यह चौथा ईश्वर है या अस्तित्व है या ईश्वरीय है या जो कुछ भी आप इसे कहना चाहें। आध्यात्मिकता का सम्पूर्ण कार्य आपस में मिलाने वाली एक कीमिया का सुजन करना है जिसमें शरीर का विलय मन में हो जाता है, मन का विलय आत्मा में हो जाता है, आत्मा मन में विलय हो जाती है, और मन शरीर में विलय हो जाता है। बहुत धीरे-धीरे ये एक संयुक्त घटना बन जाते हैं। और इसका परिणाम प्रेम ही है।
अकारण प्रेम में प्रवेश करें
लोग मुझसे कहते हैं कि वे मेरे प्रति अगाध प्रेम रखते हैं। मैं उनसे सदैव कहता हूँ कि इस प्रवाहमय प्रेम का उपयोग सम्पूर्ण मानवता की ओर अग्रसर होने के द्वार के रूप में करो। गुरू को किया जाने वाला प्रेम भोजन की भांति होता है। अगर आप इसे पचा लेते हैं, तो आप ऊर्जावान बन जाते हैं और अपने जीवन में उसी की ऊर्जा का बिखेरते हैं।
बुद्ध कहते हैं, मैं संघ में जीता हूँ। उनका अर्थ है, 'सीधे मुझ पर ध्यान न दें। अपना ध्यान सम्पूर्ण विश्व पर दें।' अगर प्रेम के व्यक्तिगत लक्ष्य को हटा दिया जाये, तो सम्पूर्ण ही लक्ष्य बन जाता है। फिर कभी आपको पीड़ा नहीं सताती।
पहली बात जो हमें समझने की आवश्यकता है वह यह है कि संबंध अकारण, और बिना किसी उद्देश्य के भी हो सकता है। तब ही हम यह समझ पायेंगे कि प्रेम का अनुभव, प्रेम के विषय से अधिक महत्वपूर्ण होता है। आपके जीवन में कम से कम एक ऐसा संबंध अवश्य होना चाहिए जिसका अस्तित्व बिना किसी कारण के, बिना किसी प्रयोजन के हो। अगर आपका ऐसा कोई संबंध नहीं है, तो यह बात स्पष्ट रूप से जान लीजिए कि धन होने के बावजूद भी आप निर्धन ही हैं। आज से ही बिना किसी प्रायोजन के किसी से संबंध जोड़ना शुरू कीजिए। इस संबंध से कोई वित्तीय या भौतिक लाभ नहीं होना चाहिए। अगर एक बार आप अकारण प्रेम का अनुभव कर लेते हैं, तो उसके पश्चात, अगर धन साझा किया जाए, अगर शरीर साझा किया जाए तो कोई बात नहीं है। तब गुणवत्ता पूर्णतया विभिज्ञ होती है। मैं धन या विवाह के विरूद्ध नहीं हूँ। मैं शारीरिक संबंध के विरूद्ध भी नहीं हूँ, किन्तु अगर यह आपके जीवन का केन्द्र बन जाता है, तो आप बहुत महत्वपूर्ण चीज से वंचित हो रहे हैं। यही संदेश मैं यहां देना चाहता हैं। आप अपने अस्तित्व के एक बडे आयाम या ऊर्जा केन्द्र से वंचित रह जाते हैं।
मझे एक छोटी कहानी याद आ रही है -
एक बार एक अंधी लड़की थी जो अपने अंधेपन के कारण स्वयं से घुणा करती थी। वह अपने दोस्त के सिवाय हर किसी से घुणा करती थी।
एक दिन उस लड़की ने कहा कि यदि वह इस
संसार को देख पाये, तो वह अपने दोस्त से विवाह कर लेगी।
अचानक एक दिन उसके चिकित्सक ने कहा कि किसी ने उसे अपनी आंखे दान कर दी हैं। उसकी शल्यचिकित्सा हुई और उसने हर चीज जिसमें उसका वह दोस्त भी शामिल था, देखने के लिए आंखें खोलीं।
उसके दोस्त ने उससे पुछा, 'अब तुम देख सकती हो। क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?'
जब उस लड़की ने यह देखा कि उसका दोस्त अंधा है, तो उसे बहत धक्का लगा। उसने कहा, 'माफ कीजिए, मैं आपसे विवाह नहीं कर सकती क्योंकि आप अंधे हैं।''
उसका दोस्त उदास होकर चला गया। उसने मात्र इतना कहा, 'प्रिय, मेरी आंखों का ध्यान रखना।'
इसीलिए यह कहा जाता है कि आपको अपने होने के अस्तित्व का सूजन करना है। आपको अपने भीतर प्रेम का केन्द्र जगाना है। आपके जीवन में कम से कम एक ऐसा संबंध होना चाहिए जिससे आप संबंध के सिवाय कोई और आशा न करें। उस संबंध में आप किसी उपयोगिता को शामिल न करें- वित्तीय या भौतिक सूख या नाम और प्रतिष्ठा। कम से कम एक संबंध अवश्य हो- यह किसी वृक्ष, चंद्रमा या सूर्य के साथ भी हो सकता है। शर्त यही है कि इस संबंध से आपको कोई लाभ नहीं होना चाहिए। केवल तभी आप प्रेम शब्द को समझ पायेंगे। मात्र तभी आपके भीतर प्रेम का केन्द्र जाग्रत होगा।
मैं हमेशा लोगों से कहता हूँ, 'प्रतिदिन आधा घण्टा कोई ऐसा कार्य करो जिससे आपको धन, नाम या यश न प्राप्त हो। सिर्फ आधे घण्टे के लिए, मन्दिर या गिरिजाघर जायें, फर्श को साफ करें, झाड लगायें, कुछ सेवा करें। उस स्थान की समिति का सदस्य बनने की योजना न बनायें। ऐसा न सोचें कि ऐसा करने से आपको श्रेय हासिल होगा या फिर स्वर्ग में स्थान मिलेगा-नहीं। उस कार्य को आधे घण्टे करने के सिवाय कुछ न
प्रेम में बहना
सोचें। '
आरम्भ में आप सोच सकते हैं, 'यह आधा घण्टा समय की बर्बादी है। कुछ दिनों के बाद आपको यह अनुभूति होगी कि इस आधे घण्टे में ही आप वास्तव में जीवित हैं। मात्र इसी आधे घण्टे में आप अपने लोभ या भय से प्रेरित नहीं होते। आप बिना कोई हिसाब लगाये अपने आस-पास के लोगों पर मुस्कुराते हैं। आपको अद्भुत सच्ची अनुभूति होती है जिसे आपने पहले कभी नहीं महसूस किया।
अगर किसी अन्य समय आप अपना निरीक्षण करें, तो आप देखेंगे कि आप मुस्कराते भी हैं, तो मन में कुछ हिसाब किताब करने के बाद। मुस्कूराने के पहले आप देखते हैं कि आपके सामने वाला मनुष्य कौन है। उसके आधार पर, आप निर्णय लेते हैं कि अपने मुंह को कितना इंच खोलना है, आपको कितना विनम्र बनना है, आपको कितना घुलना-मिलना है। इन संस्कारों पर विजय पाने के लिए, सिर्फ आधे घण्टे इस तकनीक का प्रयास करें जो आपको धन नहीं देती, जो आपको नाम और प्रतिष्ठा नहीं देती, जो आपको कोई सामाजिक पद नहीं देती, जो बदले में आपको कुछ नहीं देती। तब आप समझ जायेंगे कि 'कारण रहित संबंध' से मेरा क्या तात्पर्य है। आप देखेंगे कि शीघ्र ही मात्र वह आधा घण्टा आपके लिए वास्तविक जीवन बन जाता है।
जैसा कि अब, आपका प्रत्येक कार्य भय और लोभ से प्रेरित है। भय और लोभ से आपको ईधन प्राप्त होता है। यही कारण है कि आपको अकेलेपन की और थके हुए होने की अनुभूति होती है।
अगर आप इस तकनीक का अभ्यास करते हैं, तो आप अचानक देखेंगे कि आपका शरीर और मस्तिष्क बिना भय और लोभ की आवश्यकता के कार्य करना शुरू कर देता है। जब एक बार आप इस साधारण कुशलता को सीख लेते हैं कि किस प्रकार अपने शरीर को बिना किसी भय और लालच के गतिशील बनाएं, तो स्पष्ट रूप से आप प्रेममय होना सीख सकते हैं। आप प्रेम की ऊर्जा का उपयोग करना सीख लेते हैं कि प्रेम की संदर ऊर्जा के साथ अपने जीवन को कैसे जीना है। तभी आप समझ पायेंगे कि शब्द प्रेम का क्या अर्थ है।
आपके भीतर एक नया केन्द्र जागृत हो जायेगा। आपके भीतर एक नई ऊर्जा अभिव्यक्त होनी शूरू हो जायेगी। फिर आप समझ पायेंगे कि किस प्रकार प्रेममय एवं स्वार्थरहित संबंध संभव है।
प्रेम, घणा और ध्यानाकर्षण- आवश्यकता
जब तक कि प्रेम एक शर्त है घुणा और प्रेम एक ही सिक्के वेत दो पहलु हैं। जिस क्षण हमारी अपेक्षायें पुरी जिस क्षण हमारी अपेक्षायें होती नहीं दीखती पूरी होती नहीं दीखती हमारा प्रेम तत्क्षण घणा में बदल जाता हमारा प्रेम एक झटके में है। घुणा में बदल जाता है।
इस प्रकार के
प्रेम में , जब तक
शर्ते आकांक्षानुसार होती हैं तब तक ही प्रेम टिका रहता है। जिस क्षण शर्तें बदल जाती हैं, प्रेम भी बदल जाता है।
प्रायः हमारा विश्वास है कि प्रेम समय और स्थान से जुड़ा है। जब तक प्रेमियों के बीच शारीरिक दूरी बनी हई है और सम्पर्क का समय कम है, उन्हें एक-दूसरे के प्रति प्रेम की अनुभूति होती है। हालांकि, जब एक बार वे निकट आ जाते हैं, और साथ-साथ अधिक से अधिक समय व्यतीत करते हैं, तो उन्हें ये अनुभूति होने लगती है कि उनमें आपस में इतना प्रेम नहीं है। इसीलिए वे कहते हैं, "परिचितता घुणा को उत्पन्न करती है।" परिचितता प्रेम को भी घुणा में बदल सकती है। प्रेम और घुणा के सीमित दायरे को समाप्त करने के लिए सर्वप्रथम हमें अपेक्षाओं को त्यागना है। अपेक्षा प्रेम का प्रथम शत्र है।
हम सभी अपने जीवन में संबंधों के विभिन्न चरणों से गुजरते हैं। अगर हम अत्याधिक निकटता से अवलोकन करें, चाहे हम किसी भी चरण में हों, हम जब प्रेम की बात करते हैं, तो सिर्फ दूसरों से ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। जब हम कहते हैं कि यह व्यक्ति हमें प्रेम नहीं करता, तो हम यही कहना चाहते हैं कि वह व्यक्ति हम पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता है। किसी भी व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता दूसरों लोगों से ध्यान प्राप्त करना है।
जीने के लिए, दूसरों पर हमारी निर्भरता के साथ-साथ ध्यान की आवश्यकता को हम प्रेम का अनुभव कहते हैं। दूसरों पर निर्भरता मनोवैज्ञानिक, शारीरिक एवं आध्यात्मिक हो सकती है। उदाहरण के लिए, जब हम रोने के लिए किसी दूसरे के कंधे की अपेक्षा करते हैं, तो हम उस पर मनोवैज्ञानिक रूप से निर्भर हैं। जब हम दूसरे से पैसा लेने की या अपनी शारीरिक सुखों की पूर्ति के लिए अपेक्षा करते हैं, तो हम उस पर शारीरिक रूप से निर्भर हैं। अगर आप वास्तविक रूप से देखें तो निष्कर्ष यही है कि किसी भी तरीके से लोग इस निर्भरता को पूरा कर सकते हैं। यह एक प्रकार का अवधान है जो वे हमें देते हैं। प्रेम का सम्पूर्ण विचार कुछ नहीं, मात्र किसी भी तरीके से दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचना है।
ध्यान शिविर के प्रथम सत्र में, मैं लोगों से ईमानदारी से ऐसे एक या दो लोगों की सूची बनाने के लिए कहता हूँ जिन्हें वे अपने जीवन में वास्तविक रूप से प्रेम करते हैं। प्रारम्भ में लोग बड़ी-बड़ी सूची तैयार करते हैं - पति, पत्नी, माता, पिता, भाई, बहिन और इसी प्रकार ...। स्वयं को खुश करने के लिए उन्हें जिन व्यक्तियों को खुश करने की आवश्यकता है या जिन व्यक्तियों से खुश होने की आवश्यकता है उन व्यक्तियों का नाम भी वे इस सुची में लिख लेते हैं। जैसे ही वह मुझसे वास्तविक प्रेम के बारे में सुनते हैं, वे एक के बाद एक अपनी सूची में से नाम काटना शुरू कर देते हैं। समझिए, अगर आप किसी चीज को काट देते हैं, तो वास्तविक रूप से वह
जीवन-मुक्ति
पहले स्थान पर नहीं थी। कुछ लोग अपनी प्रेम की सची में ऐसे व्यक्तियों का नाम शामिल कर लेते हैं जो उन्हें 'खुशनुमा एहसास' की अनुभूति कराते हैं। 'खूशनुमा एहसास' की अनुभति से मेरा क्या तात्पर्य है? यह एक प्रमाण-पत्र है, कहने के लिए, 'आप अच्छे हैं। आप ऐसे हैं। आप वैसे हैं, इत्यादि।' हम ऐसे लोगों से प्रेम करते हैं जो हमें बधाई देते हैं। क्या नहीं? हम उनसे तर्क-वितर्क करने से पहले दो बार सोचते हैं। प्रेम के नाम पर हम चुपचाप उनके नाम के साथ अपने शुभ नाम को प्रोत्साहित करते हैं। अगर वे हमसे अपना अनुमोदन वापिस ले लेते हैं। तो हम निराश हो जाते हैं। इसीलिए हम लगातार उन्हें प्रसन्न करते रहते हैं और उन्हें प्रेम करते रहते हैं। इसी प्रकार, हमारे प्रेम का सदा ही कुछ न कुछ छिपा कारण होता है।
कुछ लोग मुझसे कहते हैं, 'नहीं स्वामीजी, मैं बिना इनमें से किसी कारण के अपने बेटे-बेटियों को प्रेम करता हूँ।' मैं उनसे पूछता हूँ, 'ठीक है अगर आपका पत्र अचानक अपने निर्णय स्वयं लेना शुरू कर देता है, अगर वे अचानक आपके ढाँचे पर उपयुक्त नहीं बैठता, अगर वह आपके मार्गनिर्देशों का अनुकरण नहीं करता, अगर वह आपके नियमानुसार नहीं चलता है, तो भी क्या आप उससे वैसा ही प्यार करते हैं?'
वे कहते हैं, 'नहीं, ऐसा नहीं होगा। मेरा प्रेम तब थोडा कम हो जायेगा।'
इसका क्या अर्थ है? हम नई पीढ़ी को तब तक ही प्रेम करते हैं जब तक वे हमारे जीवन का विस्तार हैं। जब तक कि वे हमारे विचारों के तरीकों को ग्रहण करते हैं, जब तक वे हमारे रीति-रिवाजों के अनुसार चलते हैं, हम उन्हें प्रेम करते हैं। उनके माध्यम से हम अपनी इच्छाओं को पूरा करते हैं। अपनी युवावस्था में हम जो नहीं कर पाये, हम उनके माध्यम से उन इच्छाओं को पूरा होते देखना चाहते हैं। हम उनका स्वयं के जीवन के विस्तार के रूप में उपयोग करते हैं। अगर हम चिकित्सक बनना चाहते थे, किसी परिस्थितिवश हम चिकित्सक नहीं बन पाए तो हम उन्हें चिकित्सक बनने
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सच्चा प्रेम एक तरह का संवाद है। यह दो प्राणियाँ के बीच एक अनुनाद की भांति होता है।
घर से लगाव या जाडा हुआ महसूस नहीं करता, बल्कि मैं पूरे संसार के साथ जाड़ा हुआ महसुस करता हँ। पूरे संसार में घर जैसी गहन अनुभूति है। जब इस भावदशा के साथ आप कहीं भी जाते हैं, तो
आपको गहरे विश्राम पूर्ण आनंद और हर्षोल्लास का अनुभव होगा, क्योंकि यह आनंद वहाँ से नहीं, अपित् भीतर से आता हैं।
संबंधों में प्रेम
वास्तविक जीवन में हम सदा दूसरों के साथ अपना प्रेम स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करते है। यदि प्रेम का दिखावा अनुमोदित होता है तो ही प्रेम कहलाता है।
एक बात-सच्चा प्रेम एक तरह का मौन संवाद है। यह दो प्राणियों के बीच एक अनुनाद की भांति होता है। बिना प्रगट किये इसकी अनुभूति की जा सकती है। इसमें किसी बातचीत की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यह संवाद पहले से ही घटित हो रहा होता है।
अगर आप वास्तव में किसी व्यक्ति को प्रेम करते हैं, तो आपकी शारीरिक भाषा ही यह दर्शा देगी। शब्दों में अभिव्यक्त करने पर तो यह बहुत अधिक हो जायेगा। आपको अनुभूति होगी कि इस सच्चे प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए शब्द अपर्याप्त हैं। किन्तु यदि आप शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो कहीं न कहीं प्रेम वास्तविक रूप से घटित नहीं हुआ है। जब प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए आपको शब्दों का उपयोग करना पड़ता है, तो इसका अर्थ है कि इस प्रेम में कहीं न कहीं झूठ निहित है। सिर्फ झूठ को सजाने-संवारने के लिए आप शब्दों का सहारा ले रहे हैं।
वास्तविक प्रेम मुक्त करता है क्योंकि यह आपको हर समय अभिव्यक्त करने के लिए बाध्य नहीं करता।
क्योंकि यह हमेशा विद्यमान रहता है। वास्तविक प्रेम आप जो कुछ आप कहना चाहते हैं उसे मुक्त रूप से अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता भी प्रदान करता है। आप कुछ भी आसानी से व्यक्त कर सकते हैं जैसे अस्वीकृति या क्रोध, और यह अभिव्यक्ति कभी भी प्रेम में कमी नहीं आने देगी।
न केवल इतना बल्कि वास्तविक प्रेम में, संबंधों में हावी होना या शक्ति प्रदर्शन नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति एक सुंदर फूल की भांति होता है जो अपनी अनूठी सुंगध को बिखेरने के लिए खिला है।
वास्तविक प्रेम में भय या असुरक्षा लेशमात्र की भी नहीं होती। सामान्य प्रेम में, दो व्यक्तियों के बीच शारीरिक दूरी एक बड़ी असुरक्षा और अविश्वास का कारण बनती है।
एक छोटी कहानी :
एक युवा सैनिक अपने वरिष्ठ अधिकारी के पास गया और बोला, 'श्रीमानजी, मेरा दोस्त अभी तक युद्ध क्षेत्र से नहीं लौटा है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे बाहर जाकर उसे ढूंढकर लाने की आज्ञा प्रदान करें।'
अधिकारी कहता है, 'आज्ञा नहीं दी जा सकती। तुम्हारा दोस्त सम्भवतः मर चुका होगा। मैं वहां भेज कर तुम्हारी जान जोखिम पर नहीं ले सकता।'
वह युवा सैनिक फिर भी चला गया और जब वह लौटकर आया तो वह बुरी तरह से घायल था और उसके कंधे पर उसके दोस्त का शव था।
अधिकारी हैरान था। वह चिल्लाया, 'मैंने तुमसे कहा था कि वह मर गया है। अब मैंने तुम दोनों को खो खो दिया है। जरा मुझे बताओं लाश को लेने के लिए वहाँ जाने की क्या आवश्यकता थी?'
मरते हुए, उस सैनिक ने कहा, 'नहीं, श्रीमानजी, जब मैं वहां पहुंचा तो वह जीवित था। 'मरते समय उसने मुझसे कहा था, 'मुझे विश्वास था कि तम अवश्य आओगे।'
वास्तविक प्रेम उपयोगिता की बात नहीं देखता। यह महज विश्वास पर आधारित होता है और समय और सीमा से परे होता है।
आजकल मैं लोगों को प्रेम-प्रदर्शन के लिए एक-दुसरे को उपहार देते हुए देखता हँ। प्रेम प्रदर्शित करने के लिए उपहार देना एक प्रचलन बन गया है। अकारण प्रेमप्रवाह के लिए उपहार देना तो ठीक है, किन्तु शर्तों को पूरा करने के लिए उपहार देना वाकई एक समस्या है। तब यह वास्तविक प्रेम का एक तुच्छ विकल्प बन जाता है।
जहां तक वास्तविक प्रेम है, कोई भी संबंध ऊबाऊ नहीं बन सकता। क्योंकि जब तक प्रेम है प्रत्येक व्यक्ति या पदार्थ अनूठा है। उदाहरण के लिए, अगर आपके आफिस का क्लर्क मर जाता है, तो आपके जीवन में कुछ रूकने वाला नहीं है। अन्य लोगों के साथ आप भी उसके परिवार को सांत्वना दे देते हो, और जीवन चलता रहता है। किन्तु क्या होगा अगर आप उसी क्लर्क से प्रेम करते थे? तब आपका जीवन वैसा नहीं रह जाएगा, क्या मैं सही कह रहा हूँ? जब आप किसी पदार्थ या व्यक्ति से प्रेम करते हैं, या कोई व्यक्ति आपसे प्रेम करता है, तो सारी बातें अनोखी हो जाती हैं। प्रेम जीवन की सब चीजों को अनुठा बना देता है।
एक दिन एक आश्रमवासी ने मुझसे पूछा, 'स्वामीजी, प्रत्येक दिन आप हमें, हमारी गलतियों और दुविधाओं को देखते हैं। आपके लिए प्रतिदिन यह एक जैसी ही बात है। क्या आप हमसे ऊब नहीं जाते?' यह बहुत ही ईमानदारी भरा प्रश्न था। मैंने उनसे कहा, 'ज्ञान प्राप्त पुरूषों के लिए, उनके प्रेम के कारण हर कोई व्यक्ति उनके लिए अनूठा होता है। वे लोगों को केवल संख्या के तौर पर नहीं देखते। वे प्रत्येक व्यक्ति में अनूठापन देखते हैं।'
इसीलिए, इतनी धैर्यता के साथ गुरू हर एक व्यक्ति के साथ काम करता रहता है। अगर वह शिष्यों को केवल लोगों की एक भीड़ मानता है, तो यह बहुत ही अलग बात होगी। जब आपका प्रेम इस तरह का होता है, तो आपका अन्तस स्थल ऐसा हो जाता है कि आपके कार्यकलापों के लिए किसी तर्क को प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। आपको जुड़े हुए होने की अनुभूति होती है और आप प्रेम बिखेरते हैं।
न केवल इतना, बल्कि अकारण प्रवाहमय प्रेम अपनी अभिव्यक्ति में भी परिपूर्ण होता है। इसमें भय या लोभ नहीं होता। तो ऐसे किसी भी व्यक्ति को जिसे आप प्रेम करते हैं, आप पुरी तरह करते हैं। चाहे वह जैसा भी है ऐसे प्रेम में अगर वह व्यक्ति आपको छोड़कर भी चला जाता है, तो आप दुखी नहीं होते हैं। जब कोई व्यक्ति आप उसे प्रेम करते हैं, मर जाता है, तो आप डसीलिए दुखी होते हैं, कि आपने उसे पूरा से प्रेम नहीं किया था। और आप किसी व्यक्ति को तब ही पूरी तरह से प्रेम कर सकते हैं, जब आपका अपना प्रेम स्वयं पूरा होता है। किसी अन्य व्यक्ति का इससे कोई लेना-देना नहीं होता है। वह किसी भी तरह का व्यक्ति हो सकता है, इससे कोई फर्क नहीं पडता। वास्तविक प्रेम की यही संदरता है। यह प्रेम के लिए प्रेम करता है, न कि किसी दूसरे व्यक्ति के कारण।
अगर आप किसी व्यक्ति के खोने का दुख मना रहे हैं, तो यह जान लीजिए कि इसका एक मात्र कारण यह है कि आपने उसे पूर्णता से प्रेम करने का अवसर गंवा दिया था, अगर आपने उसे पूर्णता से प्रेम किया होता तो, आप विलाप नहीं करते अपितु उसे आराम से अलविदा कहते। आपका दुख इसीलिए है क्योंकि आपने कुछ गंवा दिया है। वह कोई भी हो-आपका पिता, पति या पत्नी। जब वे जीवित थे, अगर आपने उस समय उनके प्रति अपना प्रेम विकीर्ण किया होता होता तो उनके छोडकर चले जाने पर आपको पछतावा न होता। किन्तु आपने उनके प्रति अधुरा प्रेम किया है, इसीलिए उनके
छोड़कर चले जाने पर उनके प्रति आपके अधरे प्रेम के कारण एक बेचैनी उत्पन्न होगी। और यह बेचैनी ही आपके भीतर द्रख का सृजन करती है।
सुझाव -
अपनी आंखें बंद कर लीजिए और आरामदेह स्थिति में बैठ जाइए।
अपना ध्यान, अपने हृदय क्षेत्र पर केन्द्रित कीजिए। अन्य कुछ भी शामिल न करें सिर्फ हृदय पर ही केन्द्रित कीजिए।
भाव करें कि आपका हृदय एक अंतहीन जलाशय है, जहां से आशीर्वाद आ रहा है।
प्रत्येक धड़कन को गहनता से अनुभव करें, प्रत्येक धड़कन को आपके पूरे अस्तित्व में गूँजने दें।
धड़कनों के बीच प्रेम की उर्जा घटित होने को अनुभव करें।
आपके शरीर, मस्तिष्क और आत्मा के गहनतम भागों में, प्रेम ऊर्जा अभिव्यक्त होने को प्रतीक्षारत है।
हृदय की प्रेम ऊर्जा को प्रवाहित होने के लिए आमन्त्रित कीजिए और अपने शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को इस प्रेम ऊर्जा से भर लीजिए।
धीरे-धीरे अपनी आंखें खोलिए।
...
चिंता की कोई बात नहीं ...
हमने अभी तक प्रेम की बात की है । प्रेम हमारे दूसरों के साथ संबंध के बारे में हैं। प्रेम हमारे स्वयं के साथ भी संबंध के बारे में है। अपने आप को प्रेम किये बगैर हम दूसरों को प्रेम नहीं कर सकते हैं। जो चीज हमें अपने आप से प्रेम करने से रोकती हैं वह चिंता हैं या झुंझलाहट जो हम अपने भीतर पैदा करते हैं। चाहे सही हो या गलत, हम चिंता करते हैं। चिंता से अधिक कुछ भी हमारे स्वाभिमान का क्षय नहीं करता है। यह चिंता क्या हैं ।
चिंता क्या है ?
एक लघु कथा :
एक व्यक्ति शराबखाने में गया। वह चिंतित और अशांत दिख रहा था।
शराब परोसने वाले ने उससे पूछा ''क्या बात है, आप किसी बात पर बहूत चिंतित नजर आ रहे हैं ?''
उस व्यक्ति ने कहा, ''मेरी पत्नी और मुझमें झगड़ा हुआ था और उसने कहा कि वह महीने भर मुझसे बात नहीं करेगी।''
शराब परोसने वाले ने उसे समझाया, ''कोई बात नहीं हैं, एक महीना कोई बहुत लंबा समय नहीं है ।'' '
उस व्यक्ति ने कहा, ''मैं जानता हूं । आज ही वह महीना पूरा होने वाला है।
'चिंता' का अर्थ क्या है? चिंता तभी उठती है जब चीजें हमारे अनुसार नहीं घटती है। यह तुम्हारी अपेक्षायें और यथार्थ के बीच की विसंगति हैं। उदाहरणार्थ— तुम चाहते हो कि तुम्हारा पुत्र घर में तुम्हारे साथ रहे, जबकि वह सोचता है कि उसे अकेला रहना चाहिये—तुमसे दूर। तुम एक नियत समय में अपनी योजना पूरी करना चाहते हो। किंतु चीजें बहुत धीमी गति से हो रही हैं और वह कार्य असंभव लगने लगता हैं। ये सब चिंताओं का कारण हैं। जो आप चाहते है और अपेक्षा करते हैं उससे मेल नहीं खाता हैं, जो अन्य व्यक्ति चाहते हैं और जिसकी वे अपेक्षा रखते हैं।
चिंतायें कैसे जड़ जमाती हैं ?
चिंता आपके अपने विचारो और शब्दो के माध्यम से जड़ें जमाती हैं। दो बातें आपके अंदर चिंता की कोई बात नहीं.....
सदा होती रहती है। पहला है संवाद और दूसरा एकालाप— जिसे मैं आंतरिक बातचीत कहता हूं। या तो आप बाहर दूसरे व्यक्ति से बात करते हैं या फिर अपने आप से। किसी भी रूप में, शब्द और विचार वे आधारभूत तत्व हैं जो चिंताओं का निर्माण करते हैं ।
ये इस तरह हैं आपके अंदर सतत चौबीसों घंटे एक संवाद का प्रवाह हर पल, हर दिन चलता रहता है इस प्रवाह से कुछ अवरोध उभरते हैं इन्हीं अवरोधों को आप चिंता समझते या कहते हैं। चिंतायें और कृछ नही बस सतत आपके अंदर चलने वाले विचारों के प्रवाह से उत्पन्न अवरोध है।
ये विचार ज्यादातर नकारात्मक होते हैं। यही समस्या है। अगर में आपसे आपकी अपनी जीवन कथा कुछ पन्नों में लिखने के लिए कहं तो आप कुछ ऐसी घटनाओं पर प्रकाश डालेंगें जिसमें दिखेगा कि आपने-अपने जीवन में कहाँ और कैसे संघर्ष किया हैं। आप उन बहुत सी आनंद से भरी घटनाओं का जिक्र नहीं करेंगें जो इस बीच हुई हैं। मन बस नकारात्मक बातों को ही याद रखने के लिए जैसे प्रशिक्षित है। इसके बावजूद कि कुछ खुशी से भरी बातें भी हई हैं, आप बस उस क्षण को याद रखते है जब वे खत्म हुई, न कि जब आपने खुशी का अनुभव किया है। क्योंकि तब भी जब आप आनंद के चरमोत्कर्ष पर होते है, आप बस इससे चिंतित रहते हैं कि कहीं यह आनंद खत्म न हो जाये। मन जीवन के आरंभिक अवस्था से इस बात को सोचने के लिये अभ्यस्त हुआ रहता है कि जीवन एक चिंता से दसरी चिंता की ओर अग्रसर होता है। ऐसा कभी नहीं होता है कि वह एक खुशी
से दूसरे खुशी की ओर अग्रसर हो ।
एक कक्षा में, एक शिक्षिका ने देखा कि एक विद्यार्थी बहुत उदास चेहरा लिये बैठा है।
उसने उससे पूछा, ''क्या हुआ? तुम इतने उदास क्यों दिख रहे हो?"
लडके ने कहा, ''ये मेरे अभिभावक हैं। मेरे पिता मुझे अच्छे कपड़े और शिक्षा देने के लिए दिन भर काम करते हैं। वो मुझे कुछ भी खरीद कर दे देते हैं जो मैं चाहता हूँ। मेरी मॉ मेरे लिए सबसे अच्छा खाना पकाती हैं और सुबह से लेकर रात, जब तक कि मैं सोने नहीं चला जाता हूँ, मेरा ख्याल रखती हैं।''
शिक्षिका ने पूछा, ''तो तुम्हारी समस्या क्या है। तुम चिंतित क्यों हो?''
लड़के ने जवाब दिया, "मुझे डर लगता है कि कहीं वो मूझे छोडकर न चले जायें। "मन का स्पष्ट तादात्म दर्द के साथ है, न कि खुशी के साथ ।
इसीलिए खुशी से भरे क्षणों को भी याद कर मन दुखी हो जाता है।
खुशी विचार के रूप में याद नहीं रहती हैं, किंतु पीड़ायें इस तरह विचार को रूप में अमिट रहती हैं। इसीलिए हमारी आंतरिकता सदा नकारात्मक विचार लिए होती हैं। खुशी का स्थान खाली होता है। उदाहरण के लिए, अगर आपको संपूर्ण जीवन एक समय सारणी की तरह हो, उस
जीवन-मुक्ति
चिंता की कोई बात नहीं. ...
सारणी में खुशी से भरे क्षण एक खाली स्थान की तरह होते हैं। उससे संबंधित कोई विवरण वहाँ दर्ज नहीं रहता है। किंतु चिंता और पीड़ा के क्षण वहॉ स्पष्ट रूप में एक काले अक्षरों की तरह दर्ज रहते हैं।
चीजें जैसी हैं, उसे वैसा ही देखिये—और आगे बढ़ जाइये—
महात्मा बुद्ध—एक आत्मज्ञानी गुरू और बौध्द धर्म के प्रणेता, संस्थापक, तथाता शब्द का प्रयोग करते थे—वैसा ही देखिये जैसा है। यह किसी चीज को उसी रूप में देखना है जैसी वह है—बिना किसी पक्षपात को
किंतु ज्यादातर समय हम चीजों को अपनी चिंताओं के माध्यम से देखते हैं । एक आम कहावत है, 'हम चीजों को वैसा नहीं देखते हैं जैसी वह हैं हम चीजों को उस तरह देखते हैं जैसे हम हैं।' अगर आप अनुभव करते हैं कि जिस रूप में आप चीजों को देख रहे हैं उसमें कुछ गलती (त्रुटि) है, तब आपको फिर से अपने आप पर गौर करना चाहिये क्योंकि आप जो बाहर देखते हैं वह बस उसका प्रतिबिम्ब है जो आपके अंदर है। अगर आप अपने अंदर शुध्द प्रेम का अनुभव करते हैं, तो फिर आप बाहर भी शुध्द प्रेम ही देखते हैं। यह सदा आपके साथ कार्यरत होगा, उसके साथ नहीं जो आप देख रहे हैं।
जो वास्तव में है, उससे आप विचारों को
कैसे दूर रखेंगे? जो असल में हैं? कैसे आप हर एक क्षण का सदा आनंद उठायेंगे?
इस छोटी सी विधि का प्रयोग करें। जब आप कुछ देखते हैं—
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कोई व्यक्ति, या कोई स्थिति या कोई किताब या कुछ, सामान्यतः पुराने विचार और परिचित प्रतिक्रियायें तुरंत आपके अंदर जाग्रत हो उठती हैं। लेकिन अब, तत्क्षण सजगता लाइये और उन विचारों को दृष्टि पटल से ओझल कर दीजिये। फिर, रिश्यति को या व्यक्ति को या वस्तु को नए नजरिए से देखिए, जैसे कि आप उसे पहली बार देख रहे हों। अचानक आप पाते हैं, अपनी चिंताओं और अपने विचारों के कारण आप देखने से कितने वंचित हो गये हैं।
यहॉ तक कि जब आप अपने पति-पत्नी, भाई या किसी अन्य को देखते हैं; उन्हें ऐसे देखिये जैसे कि आप उन्हें पहली बार देख रहे हों। अचानक, आप पाते हैं कि न सिर्फ चिंतायें नहीं उठ रही हैं बल्कि परिचित या अपरिचित दोनों को आप एक समान देखना शुरू करते हैं। यही सही तरीका है। कोई भी परिचित या अपरिचित नहीं। यहां तक कि आप अपनी पत्नी को भी नहीं जानते हैं। उससे भी ठीक से परिचित नहीं हैं। हर चीज अस्तित्व के
बुद्धा - जीवन मुक्त गुरु जिन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना किया।
चिंता की कोई बात नहीं. ...
साथ हर क्षण बदल रही है। सिर्फ हमारा मन उसे उन्हें स्थायी देखने के लिये प्रयत्न कर रहा है।
एक बार जब आप जैसा है, वैसा ही देखने लगते हैं तब आपकी सारी ऊर्जा आपके अंदर एक जुट होने लगती है। अब कोई चिंता वहां नही है, कोई द्वंद्व वहां नहीं है।
किसी ने जे. कृष्णमूर्ती (एक प्रख्यात हिन्दू दार्शनिक) से पूछा, स्वयं को कैसे, जो है के साथ
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समस्वर करें। उन्होंने सुन्दरता पूर्वक कहा, "बस उसका नामकरण नहीं करें आप अपने को उसके साथ संयोजित पायेंगे।''
साधारणतः, जब
हम किसी चीज को देखते हैं, या तो हम उसके साथ अपना तादात्म्य स्थापित करने लगते हैं या फिर हम उसकी भर्त्सना करने लगते हैं। उदाहरणार्थ अगर आपसे कहा जाए कि आप घमण्डी है तो या तो आप उसे स्वीकार कर लेते हैं या फिर आप घमण्डी नही होने की कोशिश करने लगते हैं। आप इसे समझ नहीं पाते न घमंड के पार जा पाते हैं। आप बस अपने ढांचे के अंदर ही समझ सकते हैं, जिससे कि आप परिचित हैं। इसकी वजह से, आप संभावनाओं के सीमित दृश्यों में बंध जाते हैं। वास्तव मे समझने के लिए, आपको इस सीमित सोच से परे जाना पड़ता है। यह करने के लिए,
जे. कृष्णमूर्ति - जाने माने हिन्दू दर्शनशास्त्री।
आपको इसका नाम घमण्ड रखने से परहेज करना होगा। बस यही! अब वहां कोई घमण्ड नही होगा। बस वह नाम रखकर आप द्वंद्व शुरू करते हैं। यही ढंग है देखने का, क्या है, उसे नाम देकर नहीं। उसका नामकरण करके नहीं।
जब आप किसी चीज को उसी रूप में देखते हैं जिस रूप में वह है, आप स्वर्ग में हैं। जब आप वह देखते है जो आप देखना चाहते हैं, तब आप नरक में हैं। अगर आप समझते हैं कि सब कुछ शुभ है तब आप अपेक्षायें छोड़ देते हैं और चीजों को उस रूप में देखते है, कि जिस रूप में वह है, क्योंकि सब कुछ शुभ है ।
एक लघु कथाः
एक शिष्य अपने गुरूसे पूछता रहा, ''गुरूजी स्वर्ग कहॉ है? ''
आखिर एक दिन, गुरू ने उससे पूछा ''क्या तुम सचमुच जानना चाहते हो?''
वह शिष्य बैठ गया और बोला, ''हॉर!''
गुरूजी ने कहा, ''ठीक है, मेरा पहला शिष्य हेमचन्द्र स्वर्ग में है।'' ऐसा कह कर गुरूजी ने अपनी ऑखे बंद कर ली और ध्यानस्थ हो गये।
शिष्य जानता था कि अब गुरूजी बहुत देर बाद अपनी ऑखें खोलेंगें। इसीलिए, वह गया और दूसरे शिष्यों से पूछा कि क्या वह जानते हैं कि
चिंता की कोई बात नहीं....
हेमचन्द्र कहॉ रहता था? सब अनभिज्ञ से लगे।
वह शिष्य अपनी यात्रा पर निकल पड़ा। वह कई दिनों तक चलता रहा, गर्मी, वर्षा, बर्फ क्या-क्या से नहीं गुजरा। मृत्यु के कगार तक, वह थक गया। उस घाटी तक पहुंचने में उसे सौ दिन लगे थे। जब वह अंततः वहॉ पहुँचा उसने घाटी पर नजर दौड़ायी और सोचा, ''यह घाटी उतनी विलक्षण नहीं लगती है। मैंने कई और सुंदर घाटिया देखी हैं। गुरूजी इसे क्यों स्वर्ग कहते हैं?'' उसने चारों तरफ देखा और कुछ आगे चला और अंत में उसे हेमचन्द्र की कुटिया मिली उसे देखकर बहुत खुश हुआ। उसने उसे खाना खिलाया और पूछा कि गुरूजी और दूसरे शिष्य कैसे हैं?
पूरे रास्ते, वह शिष्य अपने आप से पूछता रहा, ''गुरूजी इसी जगह को स्वर्ग कहते हैं?' मैं विश्वास नहीं कर सकता।''
एक सप्ताह रहने के बाद वह वहॉ से चला और अपने गुरूजी के पास लौटा । लौटने में उसे फिर सौ दिन लग गये।
वह सीधे गुरूजी के पास गया और बोला 'आपने कहा कि वह जगह परवर्ग है, लेकिन जो कुछ मैंने देखा वह मुझे बिलकुल साधारण जगह लगी, जैसी मैं अब तक देखता रहा था।
गुरूजी ने कहा, ''हे भगवान! अपनी जिज्ञासा के समय अगर तुम अपने चाहत के प्रति स्पष्ट रहते, तो मैं तुम्हें सत्य बताता।''
शिष्य ने पूछा, ''तो सत्य क्या हैं?''
गुरूजी ने उतर दिया, ''हेमचन्द्र स्वर्ग में नहीं हैं। स्वर्ग उसमें है।
जब आप अस्तित्व के साथ करीब रहते हैं, बिना किसी अपेक्षा के, जो जैसा है उसे वैसा ही देखते हुए और उसमें आशीर्वाद देखते हुए, तब आप अपने अंदर स्वर्ग लेकर चलते हो! स्वर्ग कोई भौगोलिक चीज नहीं
हैं, यह मनों – वैज्ञानिक है। यह भौतिक नहीं है यह मानसिक है। अगर तुम निर्णय लेते हो तो तुम अभी स्वर्ग में हो सकते हो ।
चिंता एक विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचती हुई—
चिंता एक अनचाही, संपदा है जो पीढी दर पीढी दादा—दादी से माता—पिता को, माता—पिता से उनके बच्चों को मिलती है। बच्चे स्पंज की तरह होते हैं। वे सरलता से अपने अभिवावकों की शारीरिक भाषा और दृष्टिकोण ग्रहण कर लेते हैं। अभिवावक लोग इस बात से भी अनभिज्ञ रहते हैं कि ऐसा हो रहा है। उदाहरण के लिए अगर कोई बच्चा अपनी माँ की किसी चिंता को चार—पाँच बार दुहरता हुआ सुनता है, तब वह बच्चा बस उस आदत को आत्मसात् कर लेता है। वह कथनों को अनावश्यक रूप से दोहराता हुआ बड़ा होता है, जो चिंता का एक रूप है।
यही चिंता वह अपने साथ अपने विवाह में
जीवन-मुक्ति
चिंता की कोई बात नहीं....
भी ले जाता है और फिर दोनों, वह और उसकी पत्नी उस चिंता के साथ जीते हैं जबकि असल में वह उसकी माँ की चिंता होती है। फिर वे उसे अपने बच्चों को हस्तांतरित कर देते हैं, जब तक कि वे उसे नाम देना बंद नहीं करतें हैं और उसे जैसा है वैसा ही के साथ जीना नहीं सीख लेते हैं।
एक व्यक्ति अपने शिशु को बच्चे की गाड़ी में ले जा रहा था। वह शिशु बहुत जोर से रो रहा था। वह व्यक्ति शांत चित बस दोहरा रहा था, ''जॉर्ज चुप रहो, रोओ नहीं। सब ठीक हो जाएगा'' उसकी पत्नी ने भी उसे चुप रहने को कहा।
एक महिला जो यह देख रही थी, उसकी पत्नी से बोली, ''आप उसके साथ इतनी कूर क्यों हैं? वह सचमुच अपनी पूरी कोशिश से बच्चे को चुप करा रहा है।''
उसकी पत्नी ने गुस्से से उस महिला को देखा, और फिर अपने पति की ओर इशारा करते हुए बोली, ''वह जॉर्ज है।''
जब माता पिता सतत् चिंता प्रकट करते है, बच्चे यह सोचते हुए बड़े होते हैं कि जीवन चिंताओं से ही चलता है। समझिये कि जीवन हमारे वजह से नहीं चलता है, बल्कि हमारे बिना भी चलता रहता है।
समस्या यह है कि अभिभावक आशा करते हैं अपने बच्चों से कि वे चिंता करें! यदि वे चिंता नहीं करते है, वह उसे बेपरवाह नाम देते हैं। चिंता किए बिना परवाह करना संभव है। परवाह
मतलब देखभाल करना, चिंता मन में चल रही, निरंतर बकबक है, जिससे कोई लाभ नहीं होता। यह अंतरंग बकबास पुल के आने से पहले ही उसे पार करने की कोशिश है।
एक लघु कथाः
एक युवक अपनी मॉ को पड़ोस को एक गाँव में कार से ले जा रहा था । जब वे उस गाँव के नजदीक पहुंचे तो उन्हें याद आया कि वह खास पुल बहुत पुराना है और अब प्रयोग करने लायक नहीं है।
माँ बहुत चितिंत हो गई और बोली, "मैं कार से कभी उस पुल को पार नहीं करूँगी।''
उस पुत्र ने कहा, ''जब आ ही गए हैं तो चलो पहले देखते हैं वह कैसा है?
मॉ ने कहा, ''मुझे पक्का विश्वास है कि जब हम उसे पार करने की कोशिश करेंगे तो वह टूट जाएगा।''
उस पुत्र ने जबाब दिया, "चलो देखते हैं कि वह कितना मजबूत है। हम उसे सावधानी पूर्वक जांचे—परखे बिना पार नहीं करेंगे।''
माँ ने कहा, ''अगर तुम्हें कुछ हो जाता है तो तुम्हारे पिता मुझे माफ नहीं करेंगे। वह उसी तरह बोलती रही, और ज्यादा से ज्यादा चितिंत होती हई ।
जल्द ही वे उस जगह पहुँच गए जहाँ उस
चिंता की कोई बात नहीं ...
पुल की जगह अब एक नया पुल था।
यहॉ दो बातें समझनी हैः समयानुसार योजना और मानसिक चिंता। समयानुसार योजना जरूरी है किसी कार्य या योजना को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए। उदाहरण के लिए आप निर्णय लेते हैं 'मैं सुबह छः बजे उठ जाऊँगा, अपना ध्यान लगाउंगा, फिर सात बजे नहाऊँगा, और फिर ऑफिस के लिए आठ बजे तक चल दुर्गा । अपना काम शाम पॉच बजे तक खत्म कर लुंगा और शाम छः बजे तक घर लौट जाऊँगा।
इस तरह की योजनाऐं बिल्कुल सही हैं। लेकिन जब आप अपनी लिस्ट या योजना के अनुसार अपने हर कार्य को करने जाते हैं, आप चिंता करना शुरू कर देते हैं। आप परिणामों के होने और न होने के बारे में सोचने लगते लैं या कुछ और इसी को मनोवैज्ञानिक या मानसिक चिंता कहते हैं। इसकी जरूरत नहीं है। समयानुसार योजना टीक है, लेकिन मानसिक या मनोवैज्ञानिक चिंता की जरूरत नहीं है। यह पुल के आने से पहले ही उसे पार करने का प्रयत्न है।
चिंता पर हम बहुत उर्जा खर्च करते हैं— जिसकी कोई, जरूरत नहीं है। यह कहानी जो मैंने अभी सुनाई, ऐसा नहीं हैं कि बेटा परवाह नहीं करता वह बिना चिंता किये हुए परवाह है। क्यों पुल के बारे में बिना उस तक पहुंचे हुऐ सोचें?
आप अपने घर के भौतिक भागों जैसे फर्श दरी आदि को साफ कर सकते हैं— आपके घर के अंदर के आकाश का क्या होगा? इसी जगह वह ऊर्जा है जो आपके घर के भीतर प्रवाहित होती है।
जीवन-मुक्ति
यह आकाश उन विचारों को अधिग्रहित करता है जो आप संचारित करते हैं। यही आपके घर में माहौल बनाता है। आपकी चिंताएं मकड़ी के जाले की तरह आपके घर के भीतरी आकाश में रहती हैं। इसीलिए जब आप अपने घर के अंदर प्रवेश करते हैं, आप एक परिचित चिंताओं को ढांचे को अनुभव करते हैं। वह ढांचा जो आपके घर में रहता है आपको ग्रसित करने लगता है जब आप घर में प्रवेश करते हैं। समझिये यह आपकी मानसिक अवस्था आपके घर में विद्यमान रहती है। सबसे बड़ी समस्या यह हैं कि आप अपनी चिंताओं के ढांचो के इस कदर आदी होते हैं कि आप एक द्वीप की तरह समाप्त होते हैं जो मुख्य भूमि की सुगंध से अलग थलग रहता है। आप चिंताओं के कारण आप अस्तित्व की सुंगध से कटे हुए रहते हैं। आप उस सृष्टि की विलक्षणताओं को खोते हैं जो सतत् आपके चारों घटित हो रही हैं। आप किसी चीज की प्रशंसा करना भूल जाते हैं और बस शिकायत करना याद रखते हैं। आप हंसना भूल जाते हैं और सिर्फ शिकायत करने की याद रखते हैं। आप हंसना भूल जाते है, और बस तनाव को याद रखते हैं। इन नकारात्मक चीजों को याद रखना आपकी आदत हो जाती है।
इस संदर्भ में एक लघु कथा है बुध्द और उनके शिष्यों के बारे में: सदा की तरह एक दिन महात्मा बुध्द अपने शिष्यों को प्रातः कालीन प्रवचन देने के लिए आए। उनके हाथ में एक गाँठे लगा हुआ रूमाल था। उन्होने अपने शिष्यों को वह रूमाल दिखाया और पूछा कि उनमें से कोई यहाँ आकर इस गांठ को खोल सकता है।
चिंता की कोई बात नहीं.....
एक शिष्य महात्मा बुद्ध के पास गया और उस गाँठ को खोलने की कोशिश करने लगा । वह उसे खीचता रहा और गांठ कसती रही फिर दूसरा शिष्य वहाॅ गया, उसने उस गॉट को गौर से देखा और आसानी से उसे खोल दिया।
उसने यही किया कि उसने उस गांठ को गौर से देखा और तुरंत समझ कि यह गांट कैसे बनी है। इसलिए उसने बस पूरी प्रक्रिया को पलट दिया और उसे खोल दिया! उस गांट ने उसे सिखा दिया कि उसे कैसे खोलना है।
जीवन की चिंतायें रूमाल में पड़ी गाँठों की तरह है। अगर हम उनको सजग होकर देखते हैं तो हम जान जायेंगे कि उसे कैसे मिटाया जाए। हम जान जायेंगे कि कैसे यह चिंता निर्मित हुई है और तब जान जाते हैं कि उसे कैसे सुलझाना है। चिंता खुद हमें सिखा देगी कि उससे कैसे छूटकारा पाया जाए ।
प्रेरणा से कार्यरत हों—चिंता से नहीं:
अगर आप गौर से देखते हैं, आप पायेंगे कि लक्ष्य सदा हमारे अंदर चिंताऐं उत्पन्न करता है। जब हम किसी लक्ष्य की तरफ बढ़ते होते हैं। हम परिणाम की चिंता के साथ बढ़ते हैं। कृष्ण ने भगवत गीता में बहत ही सुन्दर ढंग से कहा है, 'वह व्यक्ति जो लाभ या हानि की चिंता किये बगैर कोई कार्य करता है, वह खुशी—खुशी—खुशी कोई भी काम करता है, यहां तक कि उसे प्रेरणा की भी आवश्यकता
नहीं है।
जब आप परिणामों के प्रति चिंतित रहते हैं, तो वही चिंता आपके कार्य को प्रभावित करती है। कार्य सदा प्रेरणा के द्वारा होना चाहिए, न कि चिंताओं के द्वारा। किसी भी कार्य के प्रति प्रेरणा लगन से आनी चाहिये न कि चिंता से। प्रेरणा एक प्रवाहमान ऊर्जा है जो आपके काम करने की क्षमता को बढ़ाती है। यह आपको उर्जावान बनाती है। जबकि दुसरी ओर चिंता आपकी कार्य क्षमता को सीमित कर देती है जो आप कर सकते हैं क्योंकि यह आप की ऊर्जा को क्षीण कर देती है।
जब आप चिंता से प्रभावित होकर कुछ करते हैं, तब आप सदा परिणामों के प्रति सशंकित रहते हैं। जब प्रेरणा से कुछ करते हैं, तब परिणामों के लिये चिंतित नहीं रहते हैं। आप बस कार्य को पूरे मन और पूरी क्षमता से करने के प्रति सोचते हैं। कोई भी कार्य तब प्रेरणा की ऊर्जा से प्रेरित हो कर किया जाता है तो वह सदा अच्छा परिणाम देता है। इसके बावजूद कि तब वह मनोवांछित फल नहीं आप उदास नहीं होते हैं क्योकि आप उसको करने भर से संतृष्ट हो गये। कार्य करना (स्वयं में) आपको संतुष्ट करता हैं।
कोई भी जगह चिंता से भरने के लिए न रखें :-
जब आप अपेक्षा किए बगैर जीते हैं, तब आप पहले से ही तप्त रहते हैं। वहाँ किसी असंतुष्टि
जीवन-मुक्ति
बुद्धा - जीवन मुक्त गुरु जिन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना किया।
चिंता की कोई बात नहीं.....
या चिंता के लिए कोई जगह नहीं हैं। जब आप चिंता रहित हैं, तब आप चीजों को वैसे ही देखते हैं जैसी वह हैं। आप इससे परेशान नहीं हैं कि क्या
होगा और क्या नहीं। चिंता के साथ बस बात यह है कि वह तभी होती है जब आप उसे जगह देते हैं। चिंता को स्थान अतीत या भविष्य में मिलता है। वर्त मान में उसके लिए कोई स्थान नहीं हैं।
एक लघु कथाः
एक माँ अपने छोटे बच्चे को लिए खाना बना रही थी। उसने दाने निकालकर कढाही में डाले और उसे चूल्हे पर पकने के लिए चढ़ाया। तभी फोन की घंटी घंटी बजी। वह एक कॉल कॉल का इंतजार कर रही थी और बात करना चाहती थी, लेकिन उसे चिंता होने लगी कि जब वो क् फोन उठाने जाएगी तो उसका बच्चा कमरे में कुछ देर के लिए अकेला रह जायेगा।
उसने कढोरता से बच्चे को कहा, 'यहीं रहो, जब तक मैं फोन पर बात करती हॅ, मैं तुरंत वापस आउंगी। कोई गलत व्यवहार नहीं करना, और चाहे जो करो उन दानों को नाक में मत
डालना।'
हम सदा उन बातों के प्रति चिंतित रहते हैं जो हो रहा हैं और उसके प्रति भी जो हो सकता है! उस लड़के के मन में उन दानों को नाक में डालने की बात न भी हो किन्तु अब उसकी माँ ने उसके अंदर उस विचार का रोपण कर दिया। जीवन में चिंताएँ बहत सी ऐसी बातों को लेकर आती हैं जो शुरू में कभी होती ही नहीं है। अब, जब वह बच्चा दानों को अपनी नाक में डालता है तो उसकी माँ की चिंता सत्य हो जाती है! वह इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि उसकी चिंता हमेशा सही होती है ।
चिंतायें बस भ्रम हैं:-
अगर आप चिंताओं पर गौर करें तो पाऐंगे
कि वे इस सत्य के प्रति आपकी अनभिज्ञता कि सुष्टि यह सारा खेल खेल खेल रही हैं, इस कारण होती है। अगर आप गौर करें तो पायेंगें कि सारी चिंतायें बस भ्रम हैं। आप यह तब समझ सकते हैं जब आप यह गौर करें कि मत्यु के समय क्या होता है। जब आप जीवित रहते हैं, तब आपको लाखों चिंतायें हो सकती हैं, लेकिन कल्पना करें कि आप मुत्यु शैय्या पर हैं। उस समय, आपको कितनी चिंतायें उस तरीके से घेरती है जिस तरह पहले आपको घेरती थीं। निश्चित रूप से बस एक चिंता सबसे प्रबल होंगी, (कि आप मरने जा रहे हैं)। पिछली किसी चिंताओं में से कोई भी आप पर अधिक प्रभावी नहीं होगी। संसार की सारी वाहय परिस्थितियॉ वहीं
भागवत गीता - एक हिन्दू पुरातन ग्रंथ जो प्रबुद्ध गुरू श्री कृष्ण द्वारा बताया गया है जिसमें प्राचीन ग्रंथों और उपनिषदों की बातों का समावेश है।
चिंता की कोई बात नहीं....
रहती हैं, फिर भी चिंतायें लुप्त हो जाती हैं। बस आपके चारों ओर उपस्थित आपके प्रिय लोगों को बारे में प्रेम से भरे विचार होते हैं।
यह कैसे संभव है? यह संभव है सबसे पहले यह समझ कर कर कि आपकी चिंतायें कभी आपका अंग नहीं यह केवल आपके मन का अंग हैं, वे कभी ठोस नहीं थीं। अगर वह ठोस होतीं तो निश्चित रूप से वह आप के मरने के समय भी आप पर अपना प्रभाव डालतीं।
चिंता का स्वरूप ही ऐसा है कि वह उन बातों पर आश्रित रहती है जो होती ही नहीं है। अगर आपके पास धन है, तो चिंता संबंधों पर होगी; अगर आपके पास संबंध है, वह शिक्षा पर होगी; अगर आपके पास शिक्षा है, तब यह आपकी खूबस्तुरती पर होगी। अगर सब कुछ है, तो वह जो है उस पर संशय करेगी।
समर्पण करें और निश्चित हों :-
जब आप स्पष्ट रूप में समझते हैं कि आप सृष्टि के वैभवशाली योजना के अंग हैं, तब कोई चिंता आपको नहीं घेर सकती । सृष्टि एक जीवंत ऊर्जा स्वरूप है। इसके पास विलक्षण बुद्धि है जिसके सहारे यह सारा खेल खेलती है। हम सब इसके अंग है। वही बुद्धिमत्ता जो सुष्टि को संचालित करती है, हमारे पास भी है। अगर हम उसके साथ सामंजस्य बिठा लेते हैं तो हमारी क्रियायें भी सरल और स्वतः स्फूर्त होंगी, जैसे कि सृष्टि की होती है। अगर हम उससे तारतम्य नहीं बिठा पातें हैं तो हम चिंता और भयग्रस्त होते हैं और बंद रहते हैं।
जीवन-मुक्ति
सुष्टि से कितना कुछ समझने को है! उदाहरण के लिए पशुओं को लीजियें। क्या आपने कभी चिंताग्रस्त भेड़, बकरी या गाय के बारे में सुना है? नहीं! वह भी आप ही की तरह जीवन में आये हैं, वह भी जन्म लेते हैं, संतान को जन्म देते हैं, खाते हैं और मरते हैं— मनुष्य की तरह ही। आप कह सकते हैं, उन्हें वैसी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ता है जैसी चुनौतियों का सामना हम करते है। लेकिन उनकी अन्य क्रियाओं के बारे में— जैसा कि संतानोत्पति, मृत्यु का सामना करना या अन्य? क्या वह उन चीजों के प्रति चिंतित होते हैं? नहीं। लेकिन ये बातें उनके साथ भी होती है। इसलिए समझिए जो सुष्टि सारे ब्रम्हाण्ड को चला रही है, वह आपका भी ख्याल रखेगी।
सृष्टि के नियमों के प्रति समर्पण चिंताओं से सबसे बड़ा विश्राम है।
अहम् एक छूपे हुए वेश में-
अगर आप अपने अंदर उठने वाली हर चिंता का गंभीरता से विश्लेषण करें, तब आप पायेंगे कि निन्नानवे प्रतिशत आपकी चिंताए आधारहीन हैं। लेकिन समस्या यह है कि अहम उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। अहम् ने चिंताओं में बहुत ज्यादा समय दिया हैं। चिंताऐं उस तरह नहीं हटायी जा सकतीं! बस कोशिश कीजिये किसी को यह कहने की कि उसकी चिंतायें महत्वहीन हैं। उन्हें आघात पहुंचेगा। अगर आप उनसे कहते हैं कि उनकी चिंतायें महत्वपूर्ण नहीं हैं तो वे खुश नहीं होगे। आप यह आशा रखे होंगे कि कोई व्यक्ति प्रसन्न अनुभव करेगा, जब
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आप उसे यह बतायेगें कि उसकी चिंता सही नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं हैं। उन्हें आघात पहचेंगा। अहम को दुख होता है, जब उसकी चिंताओं को उचित आदर के साथ नहीं लिया जाता है।
अहम ही ही चिंताओं को कायम रखता हैं। चिंतायें अज्ञानता के कारण जन्म लेती हैं, लेकिन वह अहम के द्वारा पोषित होती हैं। चिंता वह धुरी हो जाती हैं जिसके चारो और अहम घूमता हैं। अगर चिंता को हटा दे तो अहम को दु:ख होने लगता है। कार्य की चिंता और जिम्मेदारी की चिंता इसके विशेष उदाहरण है।
अगर आप कुछ लोगों पर गौर करें तो पायेंगे कि वे अपनी स्थितियों को बढा— चढा कर बताते हैं जिससे समझा जा सके कि पुथ्वी पर उनकी चिंता सबसे बड़ी है। अगर आप उनका विरोध करेंगे,तो उनको बहुत दु:ख होता है।
इस बात की भी चिंता कि लोग हमारे बारे में क्या कहेंगे, अहम की एक समस्या है। अहम सदा इस बात के प्रति सतत चिंतित रहता है कि सतत चिंतित कहीं उसके बारे में कोई गलत धारणा न बन जाय। कहीं कोई उसकी प्रतिष्ठा को न बिगाडे दें। अहम् के कारण ही हम विशिष्ट होने की कोशिश करते हैं यानी हम सदा कोई विशिष्ट व्यक्ति बनना चाहते हैं। हम अपनी बहुमूल्य और बहुत ज्यादा समय दुसरों के लिए अपनी स्वयं की छवि के प्रति चिंता में बितातें हैं। समझिये, कि सबसे बड़ा आनंद कछ नहीं होने में हैं और फिर भी आनंदित रहने में है। यही सबसे बड़ी विशेषता है। यह कहा गया है कि एक आत्मज्ञानी व्यक्ति की सबसे विलक्षण बात यही होती है कि वह अपने को साधारण व्यक्ति ही समझता है। इसलिये आत्मज्ञान स्वयं में विश्राम से रहने की यात्रा है। आप हर समय तभी विशिष्ट होते हैं, जब आप चिंता और अहम् को छोड देते है।
अपनी सहज अवस्था से निकलिये:-
अगर आप सचमुच अपनी चिंताओं से उबरना
चाहते हैं, तो आप अभी तुरंत पा जायेंगें, किसी भी तरह की चिंताओं को सही प्रमाणित किये बिना। बात यह है कि हमारी चिंतायें ही हमारी सहज अवस्था बन जाती हैं। हम उनमें छूपते हैं। उनमें छिपकर और उनकी बातें करके हमें आलसी बने रहने में मदद
मिलती है।
किसी ने महावीर (चौ बी बी स वे अौ र अंतिम तीर्थं कर, आत्मज्ञानी ग रू. जिन्होने जैन धर्म को स्थापित किया जो पूरी दुनिया में
आज लाखों लोगों द्वारा माना जाता है) से पूछा, "वह कौन है, जिसे चिंता है?"
उन्होंने सुन्दरतापूर्वक जवाब दिया, ''वह
महावीर - यह 24वीं एवं अंतिम तीर्थंकर या प्रबुद्ध गुरु हुये है, जिन्होंने जैनवाद को स्थापित किया। जिसे भारत के साथ पूरी दुनिया में माना जाता है।
चिंता की कोई बात नहीं.....
व्यक्ति जो चिंतित है।''
उन्होने उनसे पूछा, "चिंता का कारण क्या है?"
उन्होंने उत्तर दिया, "आलस्य!"
फिर उन लोगों ने उनसे पूछा, ''चिंता कौन दूर करता है?''
उन्होंने जवाब दिया, ''मनुष्य खुद।''
उन्होंने पूछा, ''कैसे चिंता का अंत किया जा सकता है?''
उन्होने उतर दिया, ''आलस्य छोड़कर।''
अगर आप आलस्य को छोड़ते हैं, आप सही कार्य करने में शामिल हो जाते हैं। और जब आप सही कार्य करने में शामिल होते हैं, तब आप चिंता छोड़ते हैं। आपकी चिंता के साथ सहजता को आपका दूसरों के चिंता के प्रति प्रतिक्रियाओं के द्वारा भी समझा जा सकता है। अगर आप गौर से देखें, आप पायेंगे कि जब कभी कोई व्यक्ति अपनी चिंताओं के बारे में बात करता है, आप उनसे कहें, ''आप कर ही क्या सकते हैं यही वह तरीका है, जिसके द्वारा यह होता है।'' आप सीधे—सीधे उन्हें समाधान नहीं देते हैं। आप जब यह करते हैं, तो स्पष्ट रहें, आप बस उसे प्रोत्साहित ही नहीं कर रहें हैं, बल्कि आप अपने को भी सहजता से आलस्य की अवस्था में रहने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
अगर आप सचमुच गौर करें, तो आप पायेंगे कि हम चिंता करना और उस पर बात करना
पसंद करते हैं। यह हमें यह आभास देता है कि हम बहुत सी समस्याओं का भार ढो रहे हैं। यह हमें महत्वपूर्ण होने की अनुभूति देता है, जैसे कि दुनिया हमारे बिना इसका ख्याल नहीं रख सकती है।
जब आप कोई समस्या देखते हैं, और आप उसका समाधान चाहते हैं तब आप उस समस्या पर एक क्षण के लिए भी नहीं रहते हैं, आप बस सरलता से समाधान की ओर बढ़ जाते हैं, और कुछ नहीं! उसी तरह, हर समस्या के लिए एक तत्काल समाधान होता है। आपको उस समाधान को खोजना होगा, यही बात हैं।
ज्यादातर समय, आप अपनी चिंता की सहज अवस्था में रहने को प्राथमिकता देते हैं। यह आपको आश्वस्त रखता है। उदाहरण के लिए, आप अपनी बच्ची के कॉलेज जा रहे हैं। आप पाते हैं कि कुछ बच्चे अपने कमरे को एकदम अव्यवस्थित रखे हुए हैं, या फिर एक दूसरे के कपड़े पहन रहे हैं। आप मन ही मन सारी बातों को दर्ज करते हैं और सोचते हैं कि डॉरमेटरी की यही व्यवस्था है। आपने अपनी बच्ची को साफ—सुथरा रहने के लिये और दुसरों के कपड़े नहीं पहनने की सलाह देते हैं। इसके बावजूद कि वह आपसे कहती है कि वह अपने समानों को व्यवस्थित रखती है और वह दूसरों के कपड़े नहीं पहनती हैं, आपके मन से उस अव्यवस्था की बात जो आपने दर्ज कर ली थी उसे नहीं मिटाते है। आप उन बातों से चिपके ही रहते हैं जिसे आपने पहले देखकर दर्ज कर लिया था।
वहॉ डॉरमेटरी में संभवतः बहुत सी अच्छी
जीवन-मुक्ति
चिंता की कोई बात नहीं.....
बातें भी गौर करने लायक होती हैं— जैसे कि विद्यार्थियों की खुशियाँ उस कैम्पस की अपनी कुछ अच्छी बातें या अन्य कुछ पर आपके मन में वही सब बातें बार–बार आ जाती हैं उसकी ही पुनरावत्ति होती जाती है और इसीलियें वही चिंतायें आपके मन में घुमडती हैं। जब भी आप अपनी बेटी को याद करते हैं। सिर्फ यही नहीं, जो कोई आपसे मिलता है और वहाँ की बात करता हैं, आप बस वही बातें करने लगते हैं, कि उसकी डॉरमेटरी में कुछ अव्यवस्थित है और कैसे वहॉ हर कोई एक दूसरे के कपडे बदल—बदल कर पहनते है! जबकि आपका अनुभव वहॉ की सच्चाई नहीं है। लेकिन आपने, अपने लिए वही क्षेत्र चुना है। आप बार—बार उसी पर जोर देते हैं।
यहाँ तक कि आपके धन से जुड़ी आपकी चिंतायें भी इसी तरह की है। अगर धन कमाना चिंता की बात हैं, तो स्पष्ट तौर पर इसका मतलब है कहीं न कहीं आपका आलस्य आपको आपको आपकी चिंता की सहज अवस्था की ओर खींचता है। लेकिन यदि आप अपने आलस की अवहेलना करके आगे बढ़ते हैं तो आप धन कमाते हैं। आज की दुनिया में पैसा कमाने के करोड़ो अवसर हैं।
चिंता छोड़ें, स्वास्थ्य को पायें:-
जब आप अपने भीतर चिंताओं को द्वारा अधिक विचार पैदा करते हैं, तो आपके नाभि क्षेत्र पर भार बढ़ता है। नाभि क्षेत्र से विचार या चिंतायें उत्पन्न होती हैं। जब आप ज्यादा से ज्यादा चिंताओं या विचारों को निर्मित करते हैं तो आपका पेट बोझिल होता जाता है। नाभि क्षेत्र में एक ऊर्जा केन्द्र होता है, जिसे मणिपूरक चक्र (सुक्ष्म ऊर्जा केन्द्र नाभि क्षेत्र के पास, जो चिंताओं से संबंधित होता है) कहते हैं। यह ऊर्जा केन्द्र चिंताओं के भार से सिकडता जाता है। यह ऊर्जा केन्द्र चिंताओं के प्रति सीधी प्रतिक्रिया
दर्शाता है. और पेट में बेचैनी पैदा करता है। इसीलियें जब आप किसी चीज के प्रति चिंतित होते हैं, आपका पेट अशान्त
होना आरंभ कर देता है या फिर जब आप बेंचैन करने वाले या अघात पहुंचाने वाली बातें सुनते हैं, आप कहते हैं, '' मैं इसे पचा नहीं सकता'' कोई भी अशान्त करने वाली बात आपके पाचन (पेट) को गड़बड़ा देती है। आपका उदर आपकी चिंताओं को प्रति अति संवेदनशील होता है।
एक डॉक्टर थे, जो गठिया रोग के असाधारण और प्रभावकारी इलाज के लिये बहुत प्रसिद्ध थे। उनके यहाँ हमेशा रोगियों की भारी भीड लगी रहती थी। एक दिन एक वुद्ध महिला बुरी तरह से अपनी पीठ झुकाकर चलती हुई उनके क्लीनिक में पहुंची। जब उसकी बारी आई तो वह डॉक्टर के कमरे में घुसी और आश्चर्यजनक ढंग से पॉच मिनट के अंदर बिल्कुल सीधी खड़ी होकर, अपना सिर सीधा करके बाहर निकली प्रतीक्षालय की एक महिला उसकी तरफ दौडी और बोली, "यह जादु है! उस डॉक्टर ने क्या किया?"
उस महिला ने जवाब दिया, 'उसने मुझे और लम्बी छडी दे दी।''
चिंता की कोई बात नहीं.....
कभी-कभी हम किसी खास तरह से जीने के इतने ज्यादा आदी होते हैं कि उससे बेहतर तरीके से जीने की संभावना देख ही नहीं पातें हैं। चिंता वह व्यसन है जो हमें अपनी पुरी क्षमता के साथ जीने से रोकती है और शरीर के अंदर बीमारियों को न्यौता देती है। बीमारी मन में जन्म लेती हैं।
चिंतायें आदत का रूप ले लेती है, जिसके हम अभ्यस्त हो हो जाते हैं और जो व्यक्ति की क्रियाशीलता को धीमा कर देती हैं। वह क्षमताओं का ह्लास करने लगता है। इस तरह की चिंताओं को (जेनरेलाइज्ड एंग्जाईटी डिसार्डर) कहते हैं। यह व्यक्ति के रोजमर्रों की सामान्य चिंताओं से ज्यादा होती हैं, जिसे व्यक्ति महसस करता हैं। संयक्त राष्ट्र अमेरिका के नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ में किये गए शोध के अनुसार (जेनरेलाइज्ड एंग्जाईटी डिसार्डर) 6 मिलियन अमेरिकी वयस्कों और लगभग उससे दोगुनी महिलाओं को प्रभावित किये हये है।
ध्यान कैसे मदद करता है:-
एक बार जब चिंतायें होती हैं, तो हम मनोचिकित्सक के पास जाते हैं। जबकि चिंताओं का कारण हमारे मन में होता है, बाहर नहीं। तब सिर्फ दवा कैसे मदद कर सकती है? बहुतायत में लोग चिंताओं के ईलाज के लिए मनोचिकित्सक के पास जाते हैं। दवा ठीक है, लेकिन मनोदैहिक
अवस्था जैसे कि चिंताओं को लिए, ध्यान की भी आवश्यकता है।
ध्यान आपको कोमल करता है, जब आप कोमल होतें हैं, आपके अंदर प्रेंम और कृतज्ञता का जन्म होता है। फिर धीरे-धीरे चिता की वहॉ कोई जगह नहीं होती है। चिंता एक तरह की हिंसा हैं। यह एक तरह की सूक्ष्म हिंसा का रूप है। यह हमारे शारीरिक व्यवस्था के अंदर छिपी हई चिडाचिडाहट है।
ध्यान सजगता को भी बढ़ाता है। जब सजगता बढ़ती है तब आप पूरी तरह से बाह्य संसार में उलझे हो कर भी आंतरिक रूप से आप हर उस चीज से अस्पर्शित रहते हैं। यही असली चिंतामुक्त जीवन है।
जीवन-मुक्ति
मणिपूरक चक्र - सूक्ष्म ऊर्जा चक्र जो कि नाभि के स्थान पर रहता है, चिन्ता रूपी भावना से संबंधित होता है।
तनाव क्या है ?
चिंता और तनाव एक दूसरे के करीब से अंतः संबंधित है। ये अभिभावक और बच्चे की तरह हैं। उनमें से कोई एक दूसरे के बिना संभव नहीं है, उनमें किसी का अस्तित्व दूसरे के बिना संभव नहीं है। जो एक के लिए काम करता है वही दूसरे के लिए भी काम करता है। फिर भी, यह देखते हुए कि आज के जीवन में तनाव स्वास्थ्य का सबसे बडा दुश्मन है, इसके विषय को गहराई से जानने की आवश्यकता है।
चार सौ साल पहले फ्रांस के महान दार्शनिक डेकार्ट ने घोषणा की मैं सोचता हूं, इसीलिए मैं हूँ। यह कथन आधुनिक चिंतन का आधार बना। इस संसार में करोड़ो लोगों ने पीढ़ी दर पीढ़ी डेकार्ट के इस कथन पर विश्वास किया कि जब तक कोई व्यक्ति दूसरे से आगे नहीं सोचता है वह इस संसार में सफल नहीं हो सकता है।
डेकार्ट सही थे, और वे गलत भी थे। वे इस रूप में सही थे कि मानवतंत्र नहीं समझता है कि वह अपने मन के बिना कैसे जिये परिणामत: मानव अपने मन का गुलाम हो गया। वे बंधन में रहते है।
डेकार्ट से कई शताब्दी पहले, एक वैदिक (प्राचीन वैदिक धर्मग्रन्थ से संबंधित) ऋषि ने घोषणा की कि मानव का अस्तित्व तब तक संभव नहीं है जब तक कि वह सोचना बंद नहीं कर दें। आदि शंकराचार्य (प्रबुद्ध हिन्दू गुरू, अद्वैत वेदांत के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता, जिनके आंदोलन ने हास होते वैदिक परंपरा को उनके समय में पुनः स्थापित किया), आठ वर्ष की आयु में अपने होने वाले के गुरू से पवित्र तुंगभद्रा नदी में रनान करते हुए मिले। गुरू ने उनसे पूछा, 'तुम कौन हो?'
उत्तर देते हुए शंकराचार्य ने कहा, 'मैं मन नहीं हूँ, न मैं बुद्धि हूँ, न मैं विचार हूँ, न मैं अहम् हूँ, न मैं इन्द्रिय हूँ। मैं इन सबसे परे हूँ। मैं एक शुद्ध चेतना हूँ।
जब तक हम यह सोचते हैं कि हम शरीर और मन हैं तब तक हम बस एक जैविक तंत्र होते
तनाव रहित विकास
हैं। हम उस पशु से बस छाया मात्र अधिक होते हैं जिससे हम विकसित हुए हैं. जब तक तक कि हम अपनी इंन्द्रियों द्वारा चलाये जाते हैं। किन्तु मनुष्य की असली संभावना मात्र सोचना और अपने को पशु से बेहतर साबित करना ही नहीं है। मानव का उद्देश्य मन से परे होना और चेतना के उच्चतम अवस्था को प्राप्त करना है। उस अवस्था में हम सच्ची दिव्य स्थिति में होते हैं जिससे हम अवतरित हुए हैं।
जब तक कि हम उस एकात्म अवस्था का स्पर्श नहीं कर लेते हैं जो असल में हमारा होना हैं, हम अशांत अवस्था में रहते हैं। हमारे असली स्वभाव और जो हम बनने का दिखावा करने का प्रयत्न करते है, इनके बीच यह अशांति, यह दुविधा को ही तनाव कहते है।
मस्तिष्क मशीन नहीं है-
वैदिक मनोविज्ञान के अनुसार, हम परेशान—अशांत नहीं हैं। हम परेशानी के कारण स्त्रोत हैं। इसे अच्छी तरह समझे, आप तनावग्रस्त नहीं हैं बल्कि आप तनाव हैं। आप (दबाव में) नहीं हैं, बल्कि आप दबाव (तनाव) के स्त्रोत हैं। दोनों में बहुत अंतर है।
आइयें इसको गहराई से देखें। तब आप इसे समझ पाऐंगे। आप तनाव में नहीं हैं। आप ही तनाव हैं। आप अशांत होते हैं और आप अशांति हैं। दोनों में बहुत बड़ा अंतर हैं।
एक प्रसिद्ध और अनुभवी वैज्ञानिकों का दल कई वर्षों के शोध के बाद, इस निष्कर्ष पर पहुंच वे कहते हैं, हम मनुष्य को उसके आचरणों के लिए जिम्मेदार नहीं टहरा सकते हैं जब तक तक कि हम उसे उसके अंदर क्या हो रहा है उस पर नियंत्रण कर उसकी भावनाओं पर नियंत्रण करने की शिक्षा नहीं देते हैं (नियंत्रण करने में प्रशिक्षित नहीं करते हैं ।)
जो कुछ वैदिक ग्रन्थों ने पाँच हजार वर्ष पहले कहा वही बातें आज हमारे आधुनिक वैज्ञानिक कह रहे हैं। ये ग्रन्थ पुरानी समस्याओं का समाधान और उतर देते हैं। ये ग्रंथ पश्चिमी मनोविज्ञान और वैदिक मनोविज्ञान के बीच की दूरी को पाटने का काम कर सकते हैं। पश्चिमी मनोविज्ञान लगातार हमें यह आशा प्रदान कर रहा है कि हम मै को 'मैं की तरह ही रख कर सामान्य अवस्था को पुनः प्राप्त कर सकते है। उदाहरण के लिए, अगर हम इस (कमरे) में गरमी महसूस कर रहे हैं तो एअर कंडीशनर को व्यवशित कर इसे टण्डा कर आराम का अनुभव कर सकते हैं। लेकिन हम एक महत्वपूर्ण कारक को भूल जाते हैं। ज्यों ही हम एअर कंडीश्नर
रेने डेसकार्ट - यह एक फ्रेंच दार्शनिक और वैज्ञानिक हुये है जो "मैं सोचता हूँ कि केवल मैं ही हूँ" कहने के लिये प्रसिद्ध हये है।
वैदिक - पुरातन ग्रंथों में वेदों में जो कहा गया है।
आदि शंकराचार्य - ये भारत के जीवन मुक्त गुरू हुये है, इन्होंने अद्वैत के सिद्धांत का प्रचार किया और प्राचीन वैदिक हिन्दूत्व को पुनः स्थापित किया। जो कि उस समय कमजोर पड़ गया था।
तनाव रहित विकास
को इस कमरे में लाते हैं, हमें उसे व्यवस्थित ही रखना होगा। यह एक अतिरिक्त तनाव को जन्म देता है। यह एक अतिरिक्त समस्या को ले आता है। अब हमें बिजली की जरूरत है, उसके लिए भुगतान करना होगा और इन सब सुविधाओं के लिए हमें धन की आवश्यकता होगी। और जब आप बाहर काम पर जाते हैं और ज्यादा उस कमरे का मजा नहीं ले पाते हैं, वह कमरा और एअर कंडीश्नर अब भी है, लेकिन आप उस से दर उसके बिल के भुगतान के लिए पैसे का इंतजाम करने में लगे हैं।
हम एक महत्वपूर्ण कारण को भूल जाते हैं। तुम, जैसे तुम हो एक बीमारी हो। मन की धारणा पश्चिमी मनोविज्ञान के अनुसार, एक मशीन की है। वैदिक मनोविज्ञान के अनुसार यह एक प्रक्रिया है। मन एक मशीन नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है। यह सतत् घटित हो रहा है। शब्द 'मनस' जो मन के लिए संस्कृत का शब्द है, का अर्थ एक सतत प्रक्रिया का होना है, जो निष्क्रिय (निश्चल) और मुत नहीं है बल्कि जो क्रियाशील और जीवंत है।
पश्चिमी मनोविज्ञान इस एक विचार विशेष पर जोर देता है कि मन एक जैव यांत्रिक मशीन है। हम अचेतन रूप से मानते हैं कि मस्तिष्क एक पदार्थ है, एक वस्तु या एक मशीन है। इसीलिए हम अपने मन के अतीत में घटी हर घटना को सतत एक कड़ी के रूप में जोड़ते हैं, और यह मानना शुरू कर देते हैं कि हमारा मन एक टोस चीज है।
असंबंधित को जोड़ना -
एक उदाहरण देता हूँ। वह उदासी जो आपने दस साल पहले वर्ष महसूस की थी, वह उदासी जो आपने नौ साल पहले महसूस की थी, वह उदासी जो आपने आठ साल पहले महसूस की और वह उदासी जो आपने सात साल पहले महसुस की और वह उदासी (अवसाद) जो आपने कल महसूस की यह असंबंधित और अलग घटनाएं हैं। ये विभिन्न उद्देश्यों, विभिन्न कारणो के कारण विभिन्न अवस्थाओं में घटित हुई। आप इन सभी असंबंधित घटनाओं को जोड देते हैं, और कहते हैं—'मेरा जीवन एक अवसाद है।'
वह उदासी जो आपने वर्षों पहले महसूस की महीनों पहले महसूस की सप्ताहों पहले महसूस की या कई दिनों पहले महसूस की सभी असंबंधित हैं और अलग घटनाएँ हैं। दस साल पहले, आप उदास हुए होगें और अवसाद का अनुभव किया होगा क्योंकि आपका खिलौना खो गया होगा। नौ साल पहले महिला मित्र के खो जाने के कारण आपने अवसाद का अनुभव किया होगा। कुछ साल पहले आप दुःखी हुए होगे या अवसादित हुए होंगे क्योकि आपका बेटा आपकी बात नहीं मानता था। हर समय कारण अलग या परिस्थितियां भिन्न थी और विषय कारण पूर्णतः भिन्न थे। फिर भी जब आप इन सभी उदासियों को जोडते हैं और निर्णय लेते हैं। मेरा जीवन अवसादों से भरा हुआ है, आपने अपना जीवन नरक बना लिया? ज्योंही आप
वैदिक - प्राचीन वेदों के ज्ञान को बताने वाला।
तनाव रहित विकास
यह मानना शुरू कर देते हैं कि आपका जीवन एक अवसाद है, आपका जीवन निश्चित रूप से अवसाद हो जाता है। कृपया यह समझें कि जो आप अपने अतीत के लिये विश्वास करते हैं, आप अपने भविष्य के लिए पैदा करतें हैं। हम जानते हैं कि हम अपने अतीत के अनुभव से छूटकारा नहीं पा सकते हैं। हम कैसे मान सकते हैं कि आने वाले कल से इससे छुटकारा पा लेंगें? नहीं, हम नहीं मान सकते। जो कुछ हम अपने अतीत के बारे में मानते हैं, सिर्फ वही हम अपने भविष्य के बारे में मानेंगें कि हो सकता है। इसीलिए एक बार जब हम यह मान लेना शुरू कर देते हैं कि हमारा अतीत अवसादों से भरा है, हम अचेतन में यह भी मान लेते हैं कि हमारा भविष्य भी अवसादों से भरा होगा।
जब हम यह मानते हैं कि मन बस एक वस्तु है, एक जैविक मशीन (यंत्र), हम अपने लिए नरक का निर्माण कर लेते हैं। सौभाग्यवश हमारे लिए मन कोई वस्तु नहीं हैं, यहाँ आशा है। असल में सत्य यह हैं कि मन कोई वस्तु नहीं हैं, जैसा कि हमको यह सिखाया गया है, यह एक प्रक्रिया है। यह कोई संज्ञा नहीं है बल्कि एक क्रिया है।
जब हम मानते हैं कि मन एक वस्तु है; बिल्कुल स्पष्ट रहें, हम समस्या निर्मित करते हैं जिसका अस्तित्व ही नहीं हैं।
एक लघु कथा:
जाता है और कहता है, 'डॉक्टर मेरा जीवन समस्याओं से भरा है।'
डॉक्टर ने कहा, 'हर व्यक्ति की जिंदगी एक समस्या हैं। चिंता नहीं करें। हर सप्ताह हम (तीन सत्र में बैठेंगे) और आपको सौ डॉलर देने होंगे ।
वह व्यक्ति बोला, 'हर सप्ताह तीन सत्र के सौ डॉलर आपकी समस्या सुलझा देगा, लेकिन मेरी समस्या का क्या होगा!'
समझिये, जिस क्षण हम यह मानना षुरू कर देते हैं कि मन सिर्फ एक मशीन है, हम लाचार हो जाते हैं। कोई मनोवैज्ञानिक हमारी मदद नहीं कर सकता। कोई मनोविश्लेषक मदद नहीं कर सकता है। कोई दूसरा तरीका मदद नहीं कर सकता है, क्योंकि आधारभूत समझ ही गलत है। ज्यों ही हम गलत विश्वास करने लगते हैं जो कुछ उसके आधार पर बनेगा वह गलत ही होगा। यह कभी (सही) नहीं हो हो सकता। हमें इस प्राथमिक सत्य को समझना होगा कि मन एक प्रक्रिया है; हम तनाव में नहीं हैं, बल्कि हम तनाव हैं।
हम कैसे निर्णय करते हैं-
जो कुछ हम अपनी इन्द्रियों के द्वारा महसूस करते हैं उसका सिर्फ दस प्रतिशत ही हमारी चेतन मन में दर्ज होता है। दूसरी अन्य सभी बातें (सीधे) हमारे अचेतन मन में चली जाती है। इसीलिए ज्यादातर समय हम उन जगहों के बारे में भी याद नहीं रखते हैं जहा से हम रोज गृजरते हैं। जब एक व्यक्ति मनोवैज्ञानिक डॉक्टर के पास तक कि ये इन्द्रिय अनुभूतियां हमारी रूचि को जागुत नहीं करती हैं, यह हमारे मन में दर्ज नहीं होता है ।
समय का अतिक्रमण हों-वर्तमान में रहें:
आपके विचार सदा या तो अतीत के बारे में होते हैं या भविष्य के। आप बस क्या अतीत में हुआ या क्या भविष्य में होगा यही सोच सकते हैं आपके अतीत की बातें सामान्यतः या तो उन कार्यो के बारे में होती है जो आपने नहीं किये है उनके न कर पाने का दुख या फिर उन अपराधों के बारे में जो आपने किये है उनके पश्चाताप। भविष्य की वे बातें होती हैं जो आप करना चाहते हैं।
कृपया समझिए, न ही अतीत सत्य है न ही
भविष्य। अतीत बीत चुका है और खत्म है। अधिकतर हम अपने अतीत से कुछ सीखते भी नहीं हैं। हम बस यही करने की कोशिश करते हैं कि हम अपने अतीत का इस्तेमाल भविष्य के संचालन के लिए करते हैं। यह कार को पीछे देखने वाले आइने से देखकर चलाने की तरह है! आप पूरी तरह से जानते हैं कि आप का अंत क्या होने वाला हैं ।
भविष्य और भी असत्य है। यह घटित नहीं हुआ है। अब आप जिस तरह से है उस रूप में आपका अपने भविष्य पर बहुत कम नियंत्रण है क्योकि आपका सारा कार्य अचेतन मन द्वारा संचालित होता है। आप अपने अतीत की बैठी हई स्मृतियों को आधार पर संचालित होते हैं। आपके विचार और कुछ नहीं बल्कि आपके मन की अतीत और भविष्य के बीच की गतिविधियां हैं। आपका मन कभी आराम करना नहीं चाहता है। अगर यह आराम करता है तो आप जान जाऐंगे कि इसके बिना भी काम चला सकते हैं।
आइये हम देखते हैं उन इन्द्रिय अनुभूतियों
का क्या होता है जो हमारे चेतना मन में दर्ज होता है। ये प्रभाव हमारे मन के अंगों (प्रभागों) के द्वारा चयनित किये जाते हैं—छांटे जाते हैं और पहचाने जाते है। आपका चेतन मन यह दर्ज करता है कि जो व्यक्ति आपके सामने है वह आपका परिचित है या अपरिचित। आप उसके साथ किस तरह संबंध स्थापित करना पसंद करेगे इसका निर्णय अब आगे चेतना स्तर पर नहीं होता है। इस अवस्था में जब आप उसे जानते हैं उसके प्रति आपका (रूख और) व्यवहार आपके मन में दर्ज स्मृतियों के आधार पर होता है। उस अवस्था में भी जब वह व्यक्ति अनजान है आपके लिए, उस व्यक्ति का रूप अचेतन प्रतिक्रियाओं को सक्रिय करता है। किसी भी रूप में यह बात निर्णय के लिए आपके अचेतन मन में जाती है कि आपको क्या करना चाहिए।
हम लोगों में से (अधिकांश) के लिए मन का मात्र दस प्रतिशत ही चेतन मन होता है। आप जो इंन्द्रियों के द्वारा ग्रहण करते हैं उसका दस प्रतिशत से भी कम चेतन रूप से दर्ज होता है। यह संभव है कि आप जो निर्णय लेते हैं उसका एक प्रतिशत से भी कम विवेकपर्ण निर्णय होता हैं।
दो तरीके हैं जिसके आधार पर हम पुनः नियंत्रण पा सकते है। पहला है कि उन मान्यताओं या संस्कारों को कम करें जो हमें बांधती हैं। हमारे ध्यान कार्यक्रम में, हम इन संस्कारों का जो हमें बांधते हैं को खत्म और विलीन करने पर काम करते हैं। दूसरा तरीका है कि हम वर्तमान में रहें, पूरे नियंत्रण और चेतना में के साथ।
बीच में रिश्यत 'साफ्ट' (दण्ड, धुरा) 'समय को निरूपित करता है। किसी भी नियत समय में, जितना ज्यादा आपका TPS (विचार प्रति सेकेंड) है, उतने ज्यादा आप वर्तमान पल चेतना से दूर हैं। आप बस भविष्य के प्रति चिंतित हैं इसीलिए कभी आप उसे अतीत में
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जाब अापका TPS गिरता है, आप
फिसल जाने देते हैं,
(वर्तमान) क्षण की
झलक का बोध हए
बिना ही)।
ज्यादा से ज्यादा वर्तमान का अनुभव करते हैं, और जब यह होता है, आपके पास अतीत और भविष्य का एक ज्यादा स्पष्ट रूप होता है।
आपको आश्चर्य हो हो सकता है कि अतीत के विषय में स्पष्ट होने का क्या अर्थ है। आप सोच सकते हैं टीक है, भविष्य अस्पष्ट हो सकता है, किंतु अतीत कैसे? मैनें इसे जिया है तो यह अस्पष्ट कैसे होगा? तो आपको समझना होगा कि बातें आप अपने अतीत की याद करतें हैं वह वस्तुतः आप का अतीत का अनुभव नहीं है, बल्कि वह आपके अतीत के प्रति निर्णय है। हम कितनी बार अपने स्वर्णिम अतीत की बात करतें है। 'स्वर्णिम अतीत' के बारे में कितना लिखा गया है! क्योकि अतीत के विषय में कुछ भी स्वर्णिम नहीं है। हम बस अतीत की अच्छी बातों को ही (चुन कर) याद करतें हैं, इसी लिए यह स्वर्णिम लगता है।
जब आप अंतः ज्ञान की अवस्था में होतें हैं,
तनाव रहित विकास
यदि आप मन को आराम करने देते हैं या फिर आप अपने मन को आराम करने को लिए फ़सलाते हैं, आप पाएंगे कि आप आनंद की रिश्यति
में पहुंच गए हैं। वह स्थिति (अवरश्था) वर्तमान पल है। आपके सारे भविष्य को इस वर्तमान क्षण में घटित होना चाहिए। यही निर्णय जो आप इस वर्तमान क्षण की रिश्यति में लेते हैं आपके भविष्य का निर्माण करता है। यदि एक बार आप अपने वर्तमान का ख्याल रखते हैं, यदि एक बार आप चेतन रुप से इस वर्तमान पल को जी लेते हैं तो ज्यादा आपको अपने अतीत के बारे में पश्चाताप नहीं करना होगा या फिर उसके प्रति अपराध बोध का अनुभव नहीं होगा।
तनाव रहित विकास
तो स्पष्ट रहें: उस कुछ खास पलों में, आपका TPS (विचार प्रति सेकेंड) गिरता है और आप ज्यादा से ज्यादा वर्तमान में होते हैं। और जब आपका TPS शून्य होता है, आप स्पष्ट रूप से पूरे अतीत और पूरे भविष्य को देख सकते हैं।
वह बिंदु जहा अतीत और भविष्य मिलता है वही वर्तमान है। आपके विचारो की आवृत्ति शून्य
होती है आप अमन अवस्था में होते हैं। आपने मन को नियंत्रित या सुप्त नहीं किया है, वह असंभव है। आप मन से परे होतें हैं,
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जो संभव है।
ध्यान मन को आराम देता है। ध्यान मन को व्यस्त होने से रहित कर देता है, जिससे कि मन कोई खेल नहीं खेल सके। आप इस अवस्था में गुरू के सानिध्य में पहुंच सकते हैं। गुरू सदा इस अमन अवस्था में होते हैं, जो कि शून्य TPS अवरश् है। जब आप इस चेतना में होते हैं, शारीरिक रूप से या अन्य रूप में, आपका TPS भी गिरता है। आप इस शून्य TPS अवस्था में गुरू के के सानिध्य मात्र से पहुंच सकते हैं। गुरू का सानिध्य ध्यान है। गुरू की सजगता ध्यान है।
तनाव के शारीरिक प्रभाव:-
हमने देखा कि हमारे धार्मिक ग्रंथ क्या कहतें हैं और तनाव कैसे और क्यों जन्म लेता है
उसके बारे में मै क्या सोचता हूँ। अब आइये देखते हैं इस (संदर्भ में) विज्ञान क्या कहता है।
हम सभी व्यक्तियों के मरिताष्क का एक भाग है जो हमारे सभी क्रिया-कलापों जैसे श्वांस लेना, पाचन क्रिया और वे सभी क्रिया कलाप जो हमारा शरीर अपने आप स्वतः करता है, का नियंत्रण करता है। प्रकृति ने हमारे मस्तिष्क के एक भाग में एक त्रुटि से सुरक्षा संरचना की व्यवस्था की है जिसे हम हाइपोथेलमस कहते हैं। मस्तिष्क के इस प्रभाग में वह हिस्सा भी है जिसे जीव—वैज्ञानिक एडरीनेलिन भी कहते हैं।
व्यवहार विषयक वैज्ञानिक अक्सर ही सामना या भागना प्रतिक्रिया की बात करतें हैं। जब शरीर-मन जीवन के प्रति किसी खतरे को महसूस करता है तो हाइपोथेलेमस हमारे अचेतन मन के द्वारा सचेत कर दिया जाता है। अचेतन मन चेतन मन की तुलना में करोडों गुना ज्यादा वेग से कार्य करता है। इसीलिए इससे पहले कि चेतन रूप में हम खतरे के प्रति सचेत हो हम स्वभाविक रूप से खतरे के प्रति सचेत हो जाते हैं। हाइपोथेलेमस पिटयुइटरी (श्लेष्मीय) ग्रंथि जो मुख्य ग्रंथि है, को क्रियाशील कर देता है जो फिर ऐडरीनेलिन (अधिवृक्क) ग्रंथी को क्रियाशील कर देता है जो ऐडरीनेलीन हार्मोन का स्त्राव करता है, जिसे हमारे हाथों और पैरों में भेज दिया जाता है। तब हम सामना या भागना प्रतिक्रिया के लिए तैयार हो जातें हैं— जब ऊर्जा या तो हमें संकट का सामना करने के लिए तैयार करती है या फिर संकट से भाग जाने के लिए ।
एक बहुत बड़ा भाग भावनात्मक अवरथा है। यह अब अच्छी तरह से प्रमाणित हो चुका है कि भावनात्मक आघात ही हृदयाघात को तुरंत जन्म दे देता है जो की तात्कालिक कारण बन जाता है, जबकि उसके किए शारीरिक अवरश्था लम्बें समय से व्यक्ति के अंदर मौजूद रहती है।
तनाव मारक है, किंतु यह मन में होता है।
क्या तनाव कार्य-संबंधित होता है?
एक आई. टी. कम्पनी में मुख्य अधिकारी के पास एक योजना के संबंध में पूछताछ की गई। उसने उसे एक प्रस्ताव के लिए भेज दी। वह दल जो ऐसी योजनाओं पर काम करता था उसने उसका पूरा अध्ययन किया और कहा कि यह काम दस लाख डॉलर के खर्च पर छः महीने में हो जाए। प्रबंधक ने उस दल के प्रस्ताव का पुनः अध्ययन किया और कहा कि यह काम चार महीने में तीन चौथाई मिलियन डॉलर के खर्च में हो जाएगा।
वह प्रस्ताव मुख्य प्रबंधक के पास गया, उस प्रबंधक ने सब को बुलाया और शुरूआती बातचीत के बाद कहा, 'हम इस इस कार्य को तीन महीने में आधे मिलियन डॉलर में कर सकते है। तब उसने इस प्रस्ताव को मुख्य अधिकारी के पास भेज दिया।
मुख्य अधिकारी ने उस ग्राहक को बुलाया और उसे कहा कि उसकी कम्पनी वह उत्पाद उसे दो महीने में आधे मिलियन डॉलर पर दे देगी।
वे लोग जो कॉरपोरेट में काम करते हैं इस
तनाव रहित विकास
मनुष्य पर आज एडरीनेलिन के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए एथलीटों पर प्रयोग किये जा रहे हैं। धावक लोग पर खड़े हो गए और धावकों को दौड़ लगाने के लिए इशारा करने के लिए पिस्टल उठाने से टीक पहले अम्पायर ने अपनी बाँह नीचे कर ली। जिससे कि धावक पीछे झुक जाएं और अपने को पुनः प्रस्थान रेखा पर नियोजित कर लें। इसकी छ: बार पुनरावृत्ति की गई। बिना एक मीटर दौड़े धावक लोग प्रस्थान रेखा पर गिर पड़े। उनके शरीर का ऐडरीनेलिन का स्तर खतरनाक स्तर तक बढ़ गया। जीवन रक्षक ऐडरीनेलिन मारक भी हो सकता है अगर इसका प्रयोग अकारण किया जाए।
आजकल हमारे बाघ या शेर से सामना का मौका बहुत ही कम है। फिर भी हमारा चेतन मस्तिष्क वैसे खतरों का संकेत देता रहता है। उसे 'भय—अघात' कहते हैं। मनोवैज्ञानिकों का अनुमान है कि लगभग आधे दर्जन वैसे भय-अघातों का सामना हम रोज करते हैं। ये भय—अघात हमारें अंदर बहुत अधिक मात्रा में ऐडरीनेलिन का स्त्राव करते हैं। यह प्रमाणित हो चुका है कि अवसादों का सीधा कारण इन्हीं ऐडरीनेलिनों का स्त्राव है। बदले में अवसाद कई पुराने और मारक बीमारियों का मुख्य कारण माना जाता है।
मेडिकल शोधों ने पाया है कि धनी (विकसित) देशों में कई युवाओं, यहां तक कि किशोरों की भी धमनियां इतनी बुरी तरह से अवरोधित है, कि ये साठ साल के बूढ़े लोगों की तरह ही हैं। डॉक्टरों ने यह मान लिया है कि शारीरिक अवस्था इन समस्याओं का बस एक अंश रूप है। जबकि इसका
हैं। हमें जीवन के शुरूआती अवस्था से ही प्रतियोगी होने की शिक्षा दी जाती है। यह तुलना कार्यक्षेत्र में भी होती है और उसे युद्ध का मैदान बना देती है।
तथाकथित मानव संसाधन कार्यक्रम बताता है, कि व्यक्तियों का वर्गीकरण होना चाहिए। मैंने सुना है कि बहुत सी कम्पनियों में दस से पंद्रह प्रतिशत व्यक्तियों को खराब कार्य करने वाला दिखाना जरूरी है। व्यक्तियों को आंकड़ा बना कर रख दिया गया हैं, अपने अस्तित्व के लिए दूसरो को शिकार बनाने के लिए वे बाध्य हैं। संभवतः इसीलिए इन कार्यालयो को वे 'कंक्रीट का जंगल' कहते हैं ।
जब तक व्यक्ति डर, लोभ के कारण कार्य करेगें, वे प्रेरित नहीं हो सकते। वे सामान्य कार्य करने के लिए नियंत्रित और बाध्य हो सकतें हैं। किंतु कभी भी असंभव कार्य करने को लिए प्रेरित नहीं हो सकते। यह वह दुविधा है जिसका सामना आज का कारपोरेट करता है। उन्हें कार्य करने वाले लोग चाहिए लेकिन उनका प्रेरित करने का आधार समुचित नहीं है। इनका तरीका जोर जबरदस्ती का है और कुछ नहीं।
एक सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ने एक मॉडल बनाया कि मनुष्य जीवन में कैसें अपने आकांक्षाओं से ऊपर उठ सकता है। यह अब मैसलो (एक अमेरिकन मनोवैज्ञानिक जो अपने आवश्यकता के पाँच क्रम के विचार के लिए प्रसिद्ध हैं) इसके आधार में मनुष्य को जीवन को बचाने हेतु भोजन, वस्त्र, आवास और अन्य अतिआवश्यक भौतिक जरूरतें हैं। फिर व्यक्ति जिस समाज में रहता है
घटना से अपने को जोड़कर देख सकते हैं। वे लोग जो निर्णय लेते हैं और वचन देते हैं अक्सर ही जमीनी सच्चाई से अनभिज्ञ रहते हैं। एक बार जब निर्णय ले लिया जाता है उनका अहम आड़े आने लगता है। हर चीज की कुर्बानी दी जा सकती है किंतु अहम् की नहीं। कॉरपोरेट इतिहास का सामान्य अध्ययन यह दिखाता है कि कई कम्पनियां अपने इन अधिकारियों की इस अहम् के चलते कैसे असफल हो गई जो इसका नेतृत्व करते हैं।
मैनें अपने कारपोरेट क्षेत्र के शिष्यों के मुंह से इस लेवल (स्तर) पांच नेतृत्व के बारे में कुछ सुना है। यह उन कारपोरेट नेतृत्वकर्ताओं के बारे में है जो अपने को कम्पनी की जरूरतो के पीछे रखते हैं और उन लोगों के पीछे जो उनके लिए काम करते हैं न कि अपने अहम पहले रखते हैं। शोध ने बताया है कि उन कम्पनियों के मुख्य अधिकारी जो बड़े स्तर पर सफल रहे हैं, सदा मुश्किल से बाहरी दुनिया में जाने जाते हैं। ये नेतृत्वकर्ता (लीडर) अति विनम्र और आंतरिक रूप से केद्रिंत होते हैं।
कई क्षेत्रों में तनाव हमारी शिक्षा प्रणाली के
साथ ही शुरू हो जाता
है। हम अपने बच्चों का
स्तर उनके शुरूआती
जीवन से ही प्रारंभ
करना शुरू कर देते हैं।
जब किसी दल में तीन
व्यक्तियो को हम हीरो
के रूप में मानतें है तब
दल के बाकी सदस्य
अपने को व्यर्थ समझते
dbZdEfu; la vi usbu vf/k &difj; ledIhbl vge dspyrs d Ssyl Qy gle xb2 kbl d k us Ro dj r sga
Part 2: Living Enlightenment (Gospel of THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM) - Abridged Edition_Hindi_part_2.md
उस समाज में अपनी परितृप्ति को देखना है, जैसे कि एक नेटवर्क बनाता है या कुछ और फिर वे प्रेम और आकर्षण चाहते हैं। फिर वह आदर, नाम और प्रसिद्धि के लिए जीता है। फिर भी मनुष्य असंतुष्ट रहते है। वे अनुभव करते हैं कि अब भी उनके जीवन में कुछ कमी है।
वह 'कुछ' अपने भीतर हैं। मैशलो ने उसे आत्म—साक्षात्कार कहा है। यह वह क्षेत्र है जहा हम तनाव से मुक्त होते हैं। यहीं वह आंतरिक अनुभूतियों का क्षेत्र है। यही वह क्षेत्र है जहां आप समझ पाते हैं कि आप सार्वभौमिक ऊर्जा के साथ एक हैं। चाहे आप घर पर कार्य करें या कार्यालय में या फैक्टरी में या फिर आप कहीं कार्य ही करें, आप फिर भी (तब भी) उस अवस्था की ओर देखते हैं जहां आप कोंद्रित हैं।
यही हम अपने लाइफ ब्लिस प्रोग्राम को कोर्स में प्राथमिक ज्ञान में सीखते हैं। वे पिरामिड के पाँच स्तर जिसमें दर्शाया हैं ऊर्जा के सात स्तर के समकक्ष है जो हमारे भीतर हैं। वैदिक पद्धति में उर्जा के सात केन्द्रों को चक्र कहते हैं। शब्दशः इनका अर्थ 'पहिया'है जो उसे ऋषि के अनुभवों पर कहा गया जिन्होने इन केन्द्रों के चक्र कहते हैं। सर्वप्रथम महसूस किया था। हर चक्र एक भावनात्मक अवस्था के साथ कामना की अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। जैसे हम हर चक्र से संबंधित कामना को पूरा करते हैं, हमारी ऊर्जा में विकास करते जाते हैं जब तक कि हम परितृप्त ने हो जायें। यह एक प्रक्रिया है जिससे हजारों लोग
उसके आश्चर्यजनक प्रभावों को जान सकें हैं। हमने पूरे संसार में इन कार्यक्रमों को कई कंपनियों में सिखाया हैं। मैं इसे 'सुनिश्चित समाधान' कहता हैं।
ध्यान विधि (विधि, शैली) तकनीक-
यह एक सरल किंतु प्रभावशाली तकनीक (तरीका) है तनाव को दूर करने की। यह विधि हम अपने लाइफ ब्लिस कार्यक्रम में मणिपूरक चक्र या नाभि उर्जा केन्द्र जो कि तनाव का घर हैं, को खोलने के लिये करते है। इस विधि को अभ्यास सदा खाने से पहले करना चाहिए, जब पेट खाली रहता है या सोने से कुछ घंटे पहले।
खड़े होकर उस भाषा में जो आप नही समझते हो, नहीं जानते हो चिल्लाओं, चिघांड़ों, गरजो और प्रलाप करो। अगर कोई सुन रहा है तो उसके लिए भी यह निर्र्थक है (उसके समझ की भी चीज नहीं, उसे भी कुछ समझ नहीं आएगा)। अपनी सारी भावनाओ और अनुभवों को पूरी ताकत से उलीच दें जो अपने आप उलीचनी शुरू हो जायेंगी जब एक बार आप शुरू कर देंगे। रोंऐं, अगर आपका मन होता है। जमीनी पर लोट—पोट करने लगें यदि आपकी भावनाऐं ये करने को प्रेरित कर रही हो। यह एक प्रभावशाली ध्यान की विधि है। यह अचेतन का दरवाजा खोल देती है और आपके अंदर संचित सारी नकारात्मक भावनाओं को दूर कर देती है। कोई भी खास मनोविश्लेषण के सत्र में जब मरीज अपने मनोविश्लेषक से बात
मैशलो - अमेरिकी मनौवैज्ञानिक जो कि इस सिद्धांत के लिये प्रसिद्ध हुये कि आवश्यकता के पाँच क्रम हैं, पाँच क्रम की होती है।
करता है, या फिर मन की शांति पाने के लिए अपनी बातें रखता रहता है, तब भी यह प्रक्रिया चेतन ही होती है। सिर्फ दस प्रतिशत आपकी संचित स्मृतियां ही बाहर आ पाती हैं (मुक्त हो पाती हैं)। सम्मोहन जैसी प्रक्रिया अचेतन मस्तिष्क के द्वारा होती हैं, और आपका उस पर कोई नियंत्रण नही होता हैं। यह विधि एक (अतिचेतन) प्रक्रिया है जिसमें आप अपनी सजगता कायम रखते हये मन को साफ करते हैं ।
इस विधि का प्रयोग बीस मिनट तक करें। फिर शांत बैठ जाऐं और ऊर्जा को दस मिनट तक अपने शरीर में (फैलने) दें। इस शांति में बस अपने अंदर विचारों के साक्षी बनें। उसे दबाएं नहीं न ही उसका पीछा करें।
...
जीवन-मुक्ति
चक्र - अपने शरीर के ऊर्जा चक्र जो कि चक्के के जैसे होते है, जो कि आपके आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर लगातार आपको शक्ति और ऊर्जा देते रहते है। सात मुख्य चक्र है, जो कि आफ्के मेरूदण्ड पर स्थित होते है। उदाहरण मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रसार चक्र है। मणिपूरक चक्र - यह सूक्ष्म ऊर्जा चक्र है, जो कि चिंता की भावना से संबंधित है।
अपने भय का सामना करें और मुक्त हो
भय क्या है?
भय चिंता का एक गहरा आयाम हैं। चिंता से अल्सर हो सकता है। दूसरी तरफ भय जीवन को ही नष्ट कर सकता है। फिर भी, चिंता से भिन्न जिसके बिना जीवन संभव है, भय हमारे जीवन में गुथा हुआ लगता है। भय का सामना भय से रहित होकर करना संभव है। वह व्यक्ति जिसे हम साहसी कहते हैं वह भी भय रहित नहीं होता है, बल्कि वह व्यक्ति है जिसने भय का सामना निर्भय होकर करना सीख लिया है।
भय हमारे अंदर एक प्रकार की ऊर्जा है। इसीलिए इसे खत्म नहीं किया जा सकता है। ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है न ही क्षय? इसका एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन हो सकता हैं ।
समझिये, आपका मन सीधे—सीधे (प्रत्यक्ष रूप से) आपके जीवन की ऊर्जा से जुडा हुआ है। जब कभी आप संकट का सामना करते हैं, आप अनुभव करेंगे कि आपका भय बढ़ता है और आपके शरीर में एड्रीनलीन छूटने लगता है। यह एड्रीनलीन का निकलना आपको इतनी ऊर्जा देती है कि आप तेज भाग सकते हैं। हम उसे सामना या भागना प्रतिक्रिया कहते हैं, या तो आप उस भय का सामना करते हैं, या फिर आप भाग खड़े होते हैं। जिस पल आप जीवन के संकट का सामना करेंगे आपके अंदर अपार ऊर्जा आ जाएगी। जब कभी वह संकट वास्तविक होगा, स्वाधिष्ठान चक्र जीवन का केन्द्र, पुरी तरह से हिल जाएगा!
बिग बैंग और ब्लैक होल आपके अंदर:-
जब बिना किसी विशिष्ट वस्तु के आपके अंदर शुद्ध इच्छा या शुद्ध लोभ होता है, तो वह सुजन, विस्तार या बिग बैंग की उत्पलावित ऊर्जा हो जाती है! बिना किसी कारण के, आप बस ऊर्जा
स्वाधिष्ठान चक्र - यह सुक्ष्म ऊर्जा चक्र है जो कि स्प्लीन के पास होता है।
बिग - बैंग - यह एक ब्रम्हाण्डीय चित्रण है जिसके अनुसार ब्रहुत ही संघनित रूप में था। तब से लेकर अभी तक वह फैल रहा है। ब्लैक होल - एक ऐसा स्थान जोकि आकाश में होता है जिसका कि गुरूत्वाकर्षण बल बहुत अधिक होता है, जिससे वह प्रकाश तक को अपने अंदर तक सोख लेता है।
अपने भय का सामना करें और मुक्त हो
से विस्फोटित हो रहे होते हैं। उसी तरह, जब आपके अंदर बिना किसी विशिष्ट बात के शुद्ध भय उत्पन्न होते हैं, तो वह सिक़ड़न, ब्लैक होल होता हैं ।
समझिये भय आपका स्वभाव है, किंतु उसे किसी उद्देश्य वस्तु की ओर निर्देशित न करें। भय का होना स्वाभाविक है। किंतु भय को किसी वस्तु
से जोडना सामाजिक है। शुद्ध भय जीने में मदद करता है और यह स्वस्फूर्त है।
बिना कारण के आपके द्वारा आत्याधिक ऊर्जा का विकिरित
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होना शुद्ध लोभ है। अगर यह किसी वस्तु के कारण है तो यह साधारण लोभ है। इसी तरह बिना किसी कारण के आपके अंदर जो ऊर्जा भीतर संक्चित रह जाती है वह शुद्ध भय है। अगर यह किसी वस्तु के कारण है तो यह साधारण भय है। जब तक कि ब्लैक होल का निर्माण नहीं होता, बिग बैंग नहीं हो सकता है। यह जीवन का अंग है, नाटक का भाग है, खेल का अंग है। शुद्ध भय का अर्थ है आप अपने अंदर आराम कर रहे हैं, अपने अंदर बैठ रहे हैं। इसी को हम विध्वंस कहते हैं। इस ब्रह्मांड का जन्म, बिग बैंग है और मृत्यू ब्लैक होल है। आपके अस्तित्व का जन्म आपके लिए बिग बैंग है। आपके अस्तित्व की मुत्यु आपके लिए ब्लैक होल है। सांस लेना शुद्ध इच्छा है। सांस
छोडना शुद्ध भय।
प्राण— जीवन ऊर्जा जो वायु के द्वारा शरीर के भीतर जाती है-आपके अंदर बिग बैंग के कारण जाती है। प्राण जो आपके तंत्र को छोड़ता है, वह ब्लैक होल है। जब आप बिग बैंग या ब्लैक होल का प्रतिरोध या उससे संघर्ष करते हैं, तब आप अपने तंत्र के अंदर बाधा उत्पन्न करते हैं।
जब भय होता है, जब ब्लैक होल होता है, इसका अर्थ है कि आप शांति की ओर मुड़ रहे हैं या बिग बैंग के लिए तैयार हो रहे हैं। जब कभी शुद्ध भय होता है, आप आत्याधिक विश्राम के साथ तरोताजा होते हैं, आपके अंदर साहस और ऊर्जा का संचार होता है।
आपकी संभावना अभीर अज्ञापको नकारात्मकता के बीच का संघर्ष ।
जब कभी आपको, आपके पास जो है उसे खोने का डर होता है, या फिर जो आप पाना चाहते हैं उसे नहीं पा सकने का डर होता है, तो आपके अंदर आपकी संभावना और आपकी नकारात्मकता के बीच संघर्ष चलता रहता है।
अगर आप आश्वस्त हैं कि जिसकी क्षमता आपमें नहीं है उसे पाने की संभावना नहीं है, तो आपकों डर नहीं होगा। अगर आप आश्वस्त हैं कि आप वह पा सकते हैं तब भी आपको डर नहीं होगा।
भक्ति योगी - एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पण पर आधारित कर दिया है। यह जीवन मुक्त के जैसा ही है। ज्ञान योगी - ऐसा व्यक्ति जिसने ज्ञान के पथ को अपनाकर स्वयं का ज्ञान हासिल कर लिया है।
जीवन-मुक्ति
जीवन-मुक्ति
अपने भय का सामना करें और मुक्त हो
भय एक तरफ आपके अंदर विश्वास और आरथा बनाम दूसरी तरफ नकारात्मक विचार और अपेक्षा का जो आपने अपने भविष्य के लिये किया है के बीच संघर्ष है। शब्दत: आप अपने ही सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जाओं के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
अगर आप पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि आपके पास क्षमता नहीं है, आप नहीं पा सकते हैं, तो आपको भय नहीं होगा। अगर आप पूरी तरह से आश्वस्त हो कि आप हासिल कर लेंगे, तब भी आपको भय नहीं होगा। फिर भी, अगर कुछ है जो आप पाना चाहते हैं, किंतु आप आश्वस्त नहीं हैं कि आप पा सकते हैं, तब आपको डर होगा। इन दो विचारों के बीच के संघर्ष उस द्वंद्व को ही हम भय या डर कहते हैं।
भय से बचने के दो तरीके हैं। एक है सभी संभावनाओं को अवरूद्ध कर देना। इसका अर्थ है आप मर गये हैं, तब वहां कोई भय नहीं होगा। भय से बचने का दूसरा तरीका संभावनाओं की सीमा को तोड़ने का है। अगर वहां अनंत संभावनाऐं हैं, अगर वहां कोई सीमा नहीं है, अगर वहां ऐसा कुछ नहीं है जो आपको सीमित कर सके, तब आप निर्भीक हो जाते हैं। बस इस समझदारी के साथ, कोई चीज आपके अंदर चोट करेगी और आपके अस्तित्व से कई तरह के भय गायब हो जाऐंगे।
एक व्यक्ति ने दीवाल पर जहाँ उपदेश लिखे होते हैं, लिखा ''सोहम्'' – मैं वहीं हूँ, इसका अर्थ है मेरे द्वारा सब कुछ संभव हैं। दूसरा व्यक्ति आया और उसने लिखा 'दासोहम' मेरे द्वारा कुछ भी नहीं पुनः यह भी ठीक है।
एक तीसरा व्यक्ति आया और लिखा, 'सदासोहम'— 'मैं सदा वहीं हूं।'
अगर आप इस विचार में गुथे हुए हैं, 'मेरे द्वारा कुछ नहीं किया जा सकता है, 'आप एक भक्ति योगी हैं-आप समर्पण करते हैं। अगर आप सोचते हैं, 'मेरे द्वारा सब कुछ किया जा सकता है, 'आप' एक ज्ञान योगी हैं—आप अनुसंधान करते हैं और अनुभव प्राप्त करते हैं। चाहे आप इस मार्ग पर चलें या उस पर, डर (भय) से परे जाना संभव है। किंतु आपको किसी न किसी विचारधारा से जुड़कर रहना होगा। चाहे आपको 'मेरे लिए सबक्छ संभव है 'इसके साथ कार्य करना होगा, या फिर 'मेरे लिए कुछ नहीं संभव है, 'इसके साथ।
आत्मज्ञान के लिए बढ़ती हुई संभावनाः
लोग मेरे पास आकर कहते हैं, 'मुझे बहुत से भय हैं। मैं क्या कर सकता हूं? मैं उन्हें कहता हूं, 'अगर आपके पास बहुत सारे भय हैं, तो आत्मज्ञान की संभावना बहुत है। आपके लिये बहुत द्वार उपलब्ध हैं।'
एक व्यक्ति जिसे बहुत से डर नहीं हैं, उसके लिये संभावना, द्वारों की संख्या भी कम है क्योंकि वह एक नीरस जीवन जी रहा है। एक व्यक्ति जो एक नीरस जीवन जी रहा है उसे ज्यादा भय नहीं होगा। उसके पास बहुत कुछ खोने को नहीं है, बहुत ज्यादा निर्णय करने को नहीं है। वह ज्यादा जोखिम नहीं उढाता है।
आपको जो करना है वह यह है: जब कभी आपको भय हो, स्वयं का अनादर न करें। अपना अपने भय का सामना करें और मूक्त हो
आत्मविश्वास न खोंऐं या अपनी सोच की निंदा न करें, 'मैं भी कैसा व्यक्ति हूं?' असल में जो व्यक्ति अपने भय का सामना कर सकते हैं उन्हें ज्यादा समस्याऐं नहीं होती हैं। जो व्यक्ति अपने भय से भयभीत होते हैं वो अपने लिए ज्यादा समस्याऐं पैदा करते हैं। जब आप अपने भय के बारे में ज्यादा सोचते हैं, तो आप यह सोचना शुरू करते हैं कि आपको समस्याऐं हैं।
कभी-कभी, बस अपने ध्यान को कहीं और बदल कर, आप अपने भय से उबर सकते हैं। किंतु वह निर्भीकता नहीं है। निर्भीकता का अर्थ चेतना में
एक अभूतपूर्व ऊंचाई का आना है जहां आपको कुछ भी खोने का भय अनुभव नहीं रहेगा।
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बिल्कूल स्पष्ट हों: वह भय, जो
आपको अपने जीवन के प्रति है-असफलता का भय, अपने संगे संबंधियों को खोने का भय, अपने धन के खोने का भय, अज्ञात का भय-हर भय को आत्मज्ञान के लिए द्वार के रूप में उपयुक्त किया जा सकता है।
एक और महत्वपूर्ण सत्य जो आपको जानना चाहिए: आपके अंदर ऐसा कुछ है, जो आपकी ऊर्जा का स्त्रोत है, वह कभी खत्म नहीं होता है। आपके अंदर ऐसा भी कुछ है, मरता है; जो असल में कभी भी जीवित नहीं था, अभी भी नहीं। मृत्यु का भय आपके अंदर इसलिए है, क्योंकि आप सोचते हैं कि आपके पास अभी कुछ है जो आपसे ले लिया जाएगा। नहीं! आपके पास अभी जो कुछ है वह आपसे नहीं लिया जा सकता है। जो कुछ आपसे लिया जा सकता है, वह पहले से ही आपके पास कभी भी नहीं था। कोई भी चीज जो मर सकती है वह आपके अंतः आकाश में कभी स्थान नहीं पा सकती है।
निर्भीकता भय का सामना करने का साहस है:
आप भय पर विजय नहीं पा सकते हैं। निर्भीकता का अर्थ है, तीव्र भय को बिना किसी वस्तु की ओर दिशा दिये बिना उसे बुद्धिमत्ता से जीना। जब कोई वस्तु नहीं होती है डरने के लिए, तो वह प्रबल भय एक प्रबल आराम और शांति देता है।
भय एक शक्तिशाली ऊर्जा है जो एक गहरी विश्रांति देता है, आत्मकेंद्रितता। भय केंद्र नव जीवन देने का ऊर्जा केंद्र है।
बहुत स्पष्ट हों: निर्भीकता का अर्थ भय का नहीं होना नहीं है। इसका अर्थ वहां भय है, किंतु आपके पास अपार ऊर्जा है या साहस है उसका सामना करने के लिए, उसके साथ जीने के लिए। निर्भीकता का अर्थ है अधिकतम भय के साथ जीने के लिए भी ऊर्जा या साहस का होना उस भय से परे जाना और न ही उसके साथ जुड़ना न ही उससे अलग होना।
एक और महत्वपूर्ण बात जो आपको जानना चाहिए कि भय, जीवन की प्रकृति का अंग है। आप अपने कब्र में ही (अपनी मृत्यू के बाद ही) निर्भीक हो सकते हैं! तब वहां किसी भी बात से डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आपके पास खोने को क्छ भी नहीं है! अगर आपके पास खोने को कुछ है, तब
जीवन-मुक्ति
अपने भय का सामना करें और मुक्त हो
आपको भय होगा। यह जीवन की प्रकृति है।
जब जब चीजें निश्चित और ज्ञात होती है, भय नहीं होता है। भय का अस्तित्व तभी होता है
जब कोई चीज निश्चित नहीं होती है, जब वे चीजें
उस रूप में बस एक संभावना और अज्ञात होती हैं। उदाहरण के लिए मृत्यु एक संभावना है। एक घटना के रूप से में बाद यह निश्चित है, किंतु कब और कहां यह हो सकती है, यह स्पष्ट नहीं है। इसीलिए उसके साथ सदा भय जुड़ा रहता है।
अगर आप अंधकार में डर को सजगता से देख सकते हैं, तो आप उस भय के साथ रह लेंगे और उस से उबर जाऐंगे।
पहचान खोने का भयः
मनुष्य का सबसे बड़ा भय उसको अपनी पहचान खोने का भय है। यहां तक कि जीवन गंवाने का भी भय उतना बड़ा भय नहीं है जितना कि उसका अपनी पहचान खोने का भय है। अपनी पहचान खोने का भय मृत्यू के भय से भी बुरा भय है।'
मृत्यु का भयः
हमारे सभी भय–शारिरिक स्वास्थ्य खोने
का, मानसिक संतुलन खोने का, धन का, नाम और यश का या प्रियजनों को खोने का, वास्तव में रूप से विभिन्न वेश में मृत्यु के ही भय है।
एक लघु कथा
एक व्यक्ति एक सार्वजनिक सभा में एक भाषण देने की पूरी तैयारी कर चुके थे। अचानक जब वह मंच पर पहुंचे और माइक्रोफोन अपने हाथ में लिया। वे किं कित्वयविमूढ़ हो गये। वह मंच भय से ग्रस्त हो गए। एक मिनट के लिए अपार भीड़ के सामने वह बस मूक खड़े रहे।
तभी अचानक, कुछ समय बाद, उन्होंने कहा, 'मानव मन इस संसार का सबसे आश्चर्यजनक वस्तु है। यह आपके जन्म लेने के क्षण से मृत्यु के क्षण तक बिना रूके काम करता रहता है, सिवाय उस क्षण के जब आपको भाषण देना हो।
सामाजिक भय — समाज से बहिष्कृत होने का भय– हमें समाज को खुश करने के लिए कार्य करवाना है, तब भी जब वह हमारे लिए अच्छा नहीं होता है। इस प्रक्रिया में, बहुत बार, हम असल में जो करना चाहते हैं उसका बलिदान कर देते हैं। समाज के द्वारा स्वीकृत न होने का भय बस मृत्यु के भय का ही एक दूसरा रूप है— अहम् की मृत्यु।
हमारा हर कार्य अचेतन रूप से मृत्यु से और मृत्यु के भय संबंधित है। मृत्यु के बारे में आपकी समझ आपके जीवन के प्रति दृष्टि को बदल सकती है, यह आपके भय के सामना करने के तरीके को आसानी से बदल सकती है। (मृत्यु की विस्तृत समझ 'मृत्यु' पर लिखे अध्याय में दी गयी हैं ।)
अपने भय का सामना करें और मुक्त हो
क्रोध-भय का क्रियाशील रूप:
भय ही वह चीज है जो क्रोध की ओर ले जाती है। भय ऊर्जा का अप्रत्यक्ष रूप है जबकि क्रोध प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है।
एक लघु कथा
एक व्यक्ति अपने हाथ में कागजों का पूरा बंडल लेकर यह कहते हुए क्रोध से पोस्ट ऑफिस में तेजी से घुसा, 'उन्हें ऐसी धमकी भरे पत्र भेजने का साहस कैसे हुआ!' पोस्ट ऑफिस के कर्मचारियों ने कहा, 'हां, 'हां, 'धमकी भरे पत्र भेजना एक कानूनन जुर्म है। क्या आप जानते हैं आपको ये पत्र किसने भेजे हैं?'
वह व्यक्ति उत्तर देते हुए चिल्लाया, 'निश्चित ही मैं जानता हूं! ये इन्कम टैक्स विभाग के लोग हैं।'
जब आप गुरसे में होते हैं, बस गुस्से पर गौर करें। उसकी जड़ में, आपको गहरा भय मिलेगा।
इसे खुद करने की कोशिश करें: अगर आपको भय होता है, उस समय गुस्सा प्रकट करें। अपने हाथ फेंके, पैर पटकें—ऊर्जा व्यक्त करें। आप पाऐंगे कि भय गायब हो गया। आप खुद देखेंगे कि कैसे भय गुरूसे में बदल जाता है। उसी तरह, भय घुणा में भी बदल सकता है। आपको बस अपनी सजगता में रहनी है और देखना है कैसे भावनाऐं सूक्ष्म रूप में एक रूप से दूसरी में परिवर्तित होती है। जब आप इस खेल को समझते हैं, तो आप आसानी से इस खेल से बाहर निकल सकते हैं।
भयाधातः
मनोवैज्ञानिक भयाघात की बात करते हैं। जैसे आप अंधेरे में बाग में टहल रहे हैं, और आप एक रस्सी देखते हैं। आप उसे सांप समझकर सिहर जाते हैं। वह अचानक का आघात इस समझ से पहले होता है कि वह बस एक रस्सी है न कि सांप यही भयाघात है। भयाघात एक गुलाब के पौधे को जड़ से हिलाने जैसा है— अगर आप उसे लम्बे समय तक हिलाते रहते हैं तो वह मर जाएगा। ऐसा कहा जाता है कि हम हर रोज रात-दिन मिलाकर छः से बारह भयाघात झेलते हैं, स्वप्न में भी और जागृत अवस्था में भी। सोचिये हमारे अस्तित्व के साथ क्या बीतता है! भयाघात अचेतन में जन्म लेता हैं। जब वह चेतन रूप में और सजगता द्वारा समझा जाता हैं, तो उन्हें काफी कम किया जा सकता है।
साक्षी होएं और स्वीकार करें,
जब आपका सामना भय से होता है, तो उसका प्रतिरोध मत कीजिए या उसे दबाइये नहीं। बस भय पर गौर करें, भय को पहचानें और स्वीकार करें। भय की स्वीकृति ही उसे विलीन कर देती है। भय को अनुमति दें कि वह आपको झकझोर दें। अगर आपका शरीर थरथराता है, उसे थरथराने दें। अगर आपकी आंखों से आंसू आते है, तो उन्हें आने दें। आप बस हवा के झोंको के बीच घास की पत्ती की तरह रहें—बिना प्रतिरोध के झुक जाएं।
अपने भय का सामना करें और मुक्त हो
एक लघु कथाः
एक अंधेरी रात में, एक व्यक्ति एक संकरी सड़क पर जा रहा था, उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वह लड़खड़ाकर गिर पड़ा। किसी तरह उसने पत्थर के ऊपर झूलती एक शाखा को पकड़ लिया। वहां बहुत अंधकार था उस व्यक्ति ने शाखा को कस कर पकड़ रखा था।
वह मदद के लिए चिल्लाया किंतु जो दूसरी आवाज उसे सुनाई दी वह उसकी अपनी ही प्रतिध्वनि थी। प्रतिध्वनि सुनकर वह व्यक्ति घबरा गया कि वह किसी बड़ी खाई के मुंह पर है।
वह रात उसे बीतती नहीं लग रही थी और वह व्यक्ति बूरी तरह से उस शाखा को पकडे रहा इस आशा में कि कहीं से कोई मदद उसे मिलगी। अंततः सुबह हई। उसने नीचे देखा कि वह खाई कितनी गहरी थी, किंतु वहां कोई खाई नहीं थी। बस दो फीट नीचे एक बड़ी सी चट्टान थी!
आपका भय बिल्कुल इसी तरह है। आप सोचते हैं वह एक गहरी खाई की तरह होगा किंतु वास्तव में वह कुछ फीट होता है। अगर आप अपने भय का सामना करेंगे, आप पाऐंगे कि वहां कोई गहराई नहीं है। क्योंकि आप अपने भय को बढ़ाकर देखते हैं, आप उसे एक खाई समझते हैं। यह आपका चयन है, उस शाखा को छोड़कर भय से दूर जाइये या उस पर लटके रहिये और अपने को कष्ट देते रहिये ।
जिस चीजों को टाला न जा सके उसे स्वीकार करना ही उस पर विजय प्राप्त करने का एक मात्र तरीका है। जब आप स्वीकार करते हैं, अचानक आप देखते हैं कि भय गायब हो गाया गायब हो गाया। जिस क्षण आप स्वीकार करते हैं, भय आपको भयभीत करने की अपनी शक्ति को खो देता है। जब आप उसके साथ संघर्ष नहीं करते हैं, तो आप भय को एक गहरी शांति के रूप में देखेंगे। जब भयाघात होता है, बस उसके साथ रहें। यही एक मात्र तरीका है।
जब आपके भय के साथ कोई वस्तु जुड़ी होती है, उसे स्वीकार करें। वह स्वीकारोक्ति आपको बदल देगी। आप जितना ज्यादा संघर्ष करते हैं, उतना ज्यादा ही आप भय को शक्ति देते हैं। अपने ध्यान को भय से अलग करना भी कोई तरीका नहीं है क्योंकि तब भय आपके साथ ही रहता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप भय से उबर चुके हैं। भय को स्वयं इसके ऊपर हावी न होने दें। भय मे दुबारा या तीन बार जाऐं। बिना किसी संकोच के भय को पूरी प्रबलता से जीयें। अचानक आप पायेंगे कि वह अब और ज्यादा आपको स्पर्श नहीं करता हैं ।
स्वाधिष्ठान चक्र: जीवन और मृत्यु का स्थान :
भय स्वाधिष्ठान चक्र के साथ जुड़ा हुआ है, जो शरीर में नाभि क्षेत्र से दो ईंच नीचे एक सूक्ष्म
जीवन-म्त्रि
अरुणांचला पर्वत - दक्षिण भारत का एक पवित्र पर्वत जो कि अरुणांचला में स्थापित है, तमिलनाडु के तिरूआनामलई गांव में हैं, जो कि पूर्ण रुप से भगवान शिव को प्रदेशित करता है। जो कि एक जीवन मुक्त गुरू हुये है।
हारा - उर्जा और जीवन का स्थान जो पेट के पास के क्षेत्र में है, जापानी और चीनी परम्परानुसार।
जीवन-मुक्ति
अपने भय का सामना करें और मुक्त हो
ऊर्जा केंद्र है।
भाग गए, वे वृद्ध व्यक्ति भी गायब हो गए!
उस प्राथमिक
चीख के साथ, मैंने पाया कि मेरा शरीर अचानक, बहुत हल्का हो गया। मैं चलने के बजाए लगभग बह रहा था, जैसे कि मेरी भीतरी आवृत्ति बढ़ गयी थी। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में, "प्राथमिक सिद्धान्त" का उपयोग किया जाता है, जिसमे रोगी चीखते हैं, रेचन के रूप में, अपनी हारा की गहराई से, अपने नकारात्मक भावनाओं और भय से छुटकारा पाने के लिए।
मानसिक पटल पर दृश्य चित्र बनानाः
भय पर विजय प्राप्त करने का एक अति शक्तिशाली तरीका यह है उस भय को स्पष्ट करते हुए मानसिक चित्रण करें। इस विधि की सुंदरता यह है कि इसका प्रयोग आप उस समय भी कर सकते हैं, जब भय की स्थितियां नहीं है, जब आप शांत चित्त हैं और अपने आप भय से निपट सकते हैं।
आप अकेले बैठ सकते हैं और उस स्थिति
का मानसिक चित्रण करने की कोशिश करें जो आप में भय पैदा करती हैं। इस बात को पूरी स्पष्टता से अनुभव करें कि आप में भय उत्पन्न हो रहा है, भय का सामना पूरी सजगता से करें। अगर आप पीड़ित होते हैं, अगर आपका शरीर दिक्कत
यह घटना मेरे जीवन की है जब मैं युवक थाः मैं हर रोज अरुणाचलम पर्वत की परिक्रमा करता था। मैं लगभग चार बजे सुबह अपनी परिक्रमा शुरू करता और पर्वत के चारो ओर मंत्रोच्चारण और कीर्तन करते हुए गुजरता।
एक दिन सुबह मैंने बहुत जल्दी अपनी परिक्रमा शुरू की, मध्यरात्रि के कुछ देर बाद ही। उन दिनों पर्वत के चारों ओर के रास्तों पर सड़क नही बनी थी, और रोशनी नहीं जली थी। संपूर्ण रास्ते में घना वन और रोशनी भी नहीं थी। सारे रास्ते में घना वन था। मैं खुशी—खुशी—खुशी अपनी आंखें नीचे किये गाता जा रहा था। अचानक, एक रशान पर जो छोटी सी नदी के समीप था, मैंने ऊपर देखा, मैंने पाया एक गोघढ़ का झुण्ड मुझे घूर रहा था और मुझ पर छलांग लगाने के लिये तत्पर था।
अचानक उस डर में, मैं अपने हारा (जापानी और चीनी मान्यता के अनुसार पेट के क्षेत्र में ऊर्जा और जीवन का केंद्र) स्वाधिष्ठान चक्र की गहराई से चीख उठा। वह शुद्ध भय की चीत्कार थी जिसका अनुभव मुझे पहले कभी नहीं हुआ था। यह इतना पूर्ण था कि फिर भविष्य में मैं कभी भय से नहीं घबराया!
मैंने अरूणांचल के प्रति अपना पूरा समर्पण अनुभव किया और एक गहरा श्रद्धा कि अरूणांचल मेरा ख्याल रखेगा। अचानक, एक बुजुर्ग सन्यासी मेरे सामने एक बड़ी सी लाठी लेकर प्रकट हो गए और उन हिरणों को भगा दिया। ज्योंहि वे जानवर
हमसा मंत्र - इसको सोहम मंत्र भी कहते है, इसको करने के लिये श्वांस लेते समय "हम" और श्वांस छोड़ते समय "सो" का उच्चारण करते है।
अपने भय का सामना करें और मुक्त हो
महसूस करता है, तो यह टीक है। अपने भय को दबाये नहीं, उसे बस होने दें। जब आप किसी चीज को पूरी तरह से अनुभव करते हैं, आपसे वह छूट जाती है।
ध्यान विधि:
हमसा मंत्रः
यह अति शरीक्षिशाली तकनीक है (विधि है) जिसका प्रयोग दिन में चौबीसों घंटे हो सकता है। जब कभी आप पर भय का आक्रमण होता है, बस विश्रामपूर्वक बैठ जाइये।
अपनी सजगता को सिर्फ छोड़ती हुई श्वांस पर केंद्रित करें। जब आप श्वांस छोड़ रहे हों चुप—चाप 'सह' शब्द को दोहरायें वह भी बाहर जाती हुई सांस के साथ। सांस छोड़ना मन को आराम देना है और हर उस चीज को जाने देना है जो मर सकता है। सांस लेने के समय आप सतत् किसी चीज को पकड़ कर रखने की कोशिश करते हैं। सांस छोड़ना किसी चीज को जाने देना है। सांस छोड़ने पर ध्यान केंद्रित करें सांस लेने के बारे में बिना कुछ सोचते हुए (बिना फिक्र किये हुए)। जब आप सांस लेते हैं, तो 'हम' शब्द दोहरायें।
श्वांस छोड़ने पर आप और ज्यादा सजगता और ऊर्जा को केंद्रित करें। ज्यादा से ज्यादा गहरी श्वांस छोड़ने में अपनी मदद करें, सांस लेने की क्रिया स्वयं शरीर को करने दें। अपनी ऊर्जा, अवधान और प्रयास को सिर्फ श्वांस छोड़ने पर
केंद्रित करें।
यह एक 'हम सह हम सह' का शांत मंत्रोचारण है। इस हम सह मंत्र का शांत मंत्रोचारण आपको अचानक सजगता में ले जाता है, जस विश्राम की रिशति में जो कभी खत्म नहीं होती। जो कुछ भी मर सकता है वह आपके तंत्र को छोड़ देगा, आपके अंतः आकाश को भी।
इस विधि का प्रयोग उन परिस्थितियों में भी किया जा सकता है जब आप भय का सामना नहीं कर रहे हों— जब आप बैठे हों, बात कर रहे हों, चल रहे हों, खा रहे हों, तब भी जब आप सो रहे हों। यह अति शक्तिशाली विधि है। सतत चौबीसो घंटे अपने अवधान को सांस छोड़ने की क्रिया पर केंद्रित करें और बस हम सह मंत्र का चुपचाप उच्चारण करें— 'हम सह', 'हम सह', 'हम सह'। जब आप सांस लेते हैं 'हम' का उच्चारण करें और जब आप सांस छोड़ते हैं, 'सह' का उच्चारण करें।
समझिये, जब इस मंत्र का सतत उच्चारण किया जाता है, तो अजपा जप (पवित्र मंत्र का स्वतः उच्चारण) हो जाता है— प्रयास रहित उच्चारण। प्रयास के साथ किये गये मंत्रोचारण को जप कहते हैं। प्रयास रहित मंत्रोचारण को अजप कहते हैं। इसका अर्थ है वह आपमें अपने आप हो रहा है। आप को केवल मंत्रोचारण करना है, बस इतना। उसके साथ रम जायें। पूरे दिन वह आपमें प्रतिध्वनित होता रहेगा।
जीवन-मुक्ति
अजपा जप - पवित्र मंत्रों का जप जो कि मन ही मन किया जावें।
अपने भय का सामना करें और मुक्त हो
जो कुछ मर सकता है वह आपके तंत्र को छोड़ देगा और आप अनुभव करेंगे कि जो कुछ मर सकता है, वह कभी आपका अंग नहीं हो सकता है। अगर आप अपने आपको हर उस चीज के साथ जो मर सकता है (खत्म हो सकता है, नाशवान है) के साथ तादात्म करते हैं तो यह तादात्म टूट जायेगा और आप मुक्त होगें और जो नही मर सकता उसके साथ जुडा महसूस करेगें। जो नही मर सकता है, वही आप का अपना होना है।
इस विधि का प्रयोग बस तीन दिनों तक करें। आप अचानक देखेगे की धन के खोने का भय, अपने अंग के खोने का भय या अपने स्वारश्य के खोने का भय या अपने संगे संबंधियों के खोने का भय, या अज्ञात का भय सभी प्रकार के भय खत्म हो जाऐंगे। जब आप अपनी सजगता सांस के छोड़ने पर रखतें हैं, तो जो अंतः आकाश में आपके उस अंश के रूप में है जो मर सकता है (खत्म हो सकता है), वह बस आपके अंतः आकाश को छोड देगा। आप मुक्त हो जाऐंगे।
...
जीवन-मुक्ति
दर्द एक महान शिक्षक है
प्रायः भय स्वयं को दर्द के रूप में प्रगट करता है। इस संसार में सर्वाधिक डरावनी चीज दर्द है।
सभी जीवित प्राणी एक चीज से डरते और वह दर्द है। अगर आप गहनता से देखें, तो जानेंगे कि लोग मृत्यू से भी इतना नहीं डरते जितना कि मृत्यू के समय झेली जाने वाली पीड़ा से वे डरते हैं! बहुत से लोग गरीबी से डरते हैं, तो बहत से संबंधों से, और बहत से बीमारी से डरते हैं। इन सब डरों का मूल कारण वह दर्द है जो इन सब चीजों से गुजरते समय हमें होता है। ये सब डर दर्द के इर की वजह से होते हैं।
दर्द क्या है
दर्द शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक हो सकता है।
शारीरिक दर्द, शरीर के लिए मूलभूत आवश्यकता है। अगर हम अपने शरीर में दर्द का अनुभव न करें तो, हम अपने चेहरे, हाथ और पैरों को उसी तरह स्टाइलिश बनाकर जिस प्रकार हम अपने बालों को बनाते हैं, दर्घटनावश घायल कर लेंगे। दरअसल, दर्द एक विनती का पत्र है, जो शरीर दिमाग को लिखकर कहता है, 'कृपया मुझ पर ध्यान दें!' क्योंकि ध्यान ऊर्जा है। जब किसी विशेष क्षेत्र पर ध्यान दिया जाता है, तो वह ध्यान उस क्षेत्र के लिए ऊर्जा बन जाता है। जब शरीर दर्द का संचार करता है, तो दरअसल यह ध्यान या ऊर्जा देने के लिए कहता है, जिससे इसे पुनः स्वस्थ हो जाने में मदद मिलती है।
मानसिक या भावनात्मक दर्द एक मनोवैज्ञानिक अनभति है जो तब उत्पन्न होती है जब आपको कुछ ऐसी का सामना करना पड़ता है जिसे आप पसंद नहीं करते। शोध दर्शाती हैं कि भावनात्मक दर्द भौतिक शरीर को अत्यधिक परेशान करता है। उदाहरण के लिए, काम-विषयक दमन से जो मनोवैज्ञानिक अनुभति उत्पन्न होती है उससे आपको पीठ के निचले हिस्से में या बहुत अधिक जिम्मेदारी उठाने से कंधों में अत्यधिक दर्द की अनुभति होती है।
चाहें दर्द शारीरिक हो या मानसिक एक महत्वपूर्ण चीज आपको समझ लेनी चाहिए कि दर्द सदा वर्तमान पल का विरोध करने से से उत्पन्न होता है।
समय बनाम समझ
यदि किसी के जीवन में कोई दुखद घटना घटित होती है जैसे - बालक, पति या पत्नी की मृत्यु हो जाना, पति एवं पत्नी के बीच संबंधों का टूटना, घनिष्ठ दोस्ती में दरार आ जाना, तो व्यक्ति को पीडा की अनुभूति होती है किन्तू समय के साथ-साथ वह इसे स्वीकार कर लेता है। कोई-कोई बहुत दिनों तक दिन-रात रोता है या उदास रहता है, किन्तु फिर वह जो कुछ हुआ है, उसे स्वीकार कर लेता है। आम कहावत है, 'समय बड़े से बडे घाव भर देता है।' तो यह समझने का प्रयास करें दर्द एक महान शिक्षक है
दर्द और खुशी की जड एक ही है..मन। कि दर्द से उबरने के लिए समय की ही आवश्यकता पडती है क्योंकि घटना के घटित होते समय आप चेतन रूप से और सजग तरीके से उस दर्द और पीडा को झेलने के योग्य
नहीं थे।
अगर आप दर्द का अनुभव करते समय भावनाओं का सजग गवाह बनें और मन के खेल को देखें, तो आपको स्थिति-विशेष की समझ आ जाती है और तूरंत ही उपचार घटित हो जाता है। क्योंकि आपके पास समझ नहीं होती, इसीलिए समय की आवश्यकता पडती है। इसीलिए आप अत्यधिक पीड़ित होते हैं। समय के साथ, कुछ सप्ताह, महीने या साल बाद, घटना पुरानी हो जाती है और धुंधली स्मृति बन जाती है।
हालांकि, दर्द आपके तंत्र से पूरी तरह से नहीं चला जाता है। अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं जो आपके खोये हुए बालक, पति या पत्नी की तरह होता है, तो आपकी यादें ताजा हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, अगर उस व्यक्ति का बात करने, हंसने, या चलने का अंदाज वैसा ही होता है, तो घाव फिर से हरा हो जाते हैं। आप आहत हो जाते हैं क्योंकि आपके अतीत की यादें उभर आती हैं। इसी कारण, आपको जीवन एक भारी बोझ सा दिखलाई पड़ता है। आप अपने अतीत में चले जाते हैं, जब आप बच्चे थे, जब आप किशोर थे, जब आप पहली बार काम पर गए थे। आपको जीवन की प्रत्येक अवस्था, अनुभव, दर्द और गलतियां याद आ जाती हैं। वह बोझ और भावनाओं का भार जो आपके अतीत से जुड़ा रहता है, वह ही आपके अनुभव किए जाने वाले दर्द का कारण होता है। अगर
आप अतीत को छोड़ने का निर्णय लेते हैं और प्रत्येक स्थिति को नयी संभावना से देखते हैं, तो आपको अत्यधिक दर्द नहीं झेलना होगा। आपके दर्द का तरन्त उपचार हो जायेगा। आपको अधिक समय की आवश्यकता नहीं होगी।
एक छोटी कहानी -
एक बार एक शिष्य अपने गुरू के पास गया और बोला, 'गुरूजी, मैं ध्यान लगाने में असमर्थ हूँ। मेरे पैर दर्द करते हैं। मेरा ध्यान अन्यत्र हो जाता है।' गुरू ने कहा, 'यह स्थिति गुजर जायेगी।'
दो सप्ताह बाद, वह शिष्य वापस आया और कहने लगा, 'मैं अच्छी तरह से ध्यान लगाने में समर्थ हो गया हँ। मैं काफी सजग और आनंदमय महसुस करता हँ।'
गुरू ने फिर कहा, 'यह स्थिति गजर जायेगी।'
दर्द और खुशी की जड़ एक ही है। ये दो अलग-अलग नाम की एक ही अनुभूति है। यह इस तरह है- दो लोग एक ही आदमी से बॉडी मसाज कराते हैं। एक ने निष्कर्ष निकाला कि मसाज कराने से उसे दोबारा से ताजगी की अनुभूति होती है जबकि दूसरे ने कहा कि इससे उसे चोट लगती है। एक जैसी मसाज ही आपको दर्द या प्रसन्नता की अनुभूति दे सकती है। यह उस व्यक्ति पर निर्भर है जो अपनी मसाज करवाता है। जीवन में दोनों विपरीताएँ सुख और दुख है। सुख-दुख दोनों मन से होते है। मन सदा एक छोर से दूसरे छोर में गति करता रहता है।
यह कठिनाई से ही मध्य में ठहर पाता है। सुख से आप दुख की ओर उन्मुख होते हैं, और दुख से
जीवन-मुक्ति
भागवत गीता - एक हिन्दू पुरातन ग्रंथ जो प्रबुद्ध गुरू श्री कृष्ण द्वारा बताया गया है जिसमें प्राचीन ग्रंथों और उपनिषदों की बातों का समावेश है।
कुष्ण - जीवन मूक्त गुरु जिन्होंने भागवत गीता के सत्य को बताया था, ये भारत से है।
हिन्दू - हिन्दू धर्म को मानने वाले ये लगभग करोड़ों लोग है।
सुख की ओर। जैसा कि हमने पहले देखा कि सुख या दुख पूर्णतया व्यक्ति की अनुभूति पर निर्भर करते हैं। किसी चीज से आपको सुख की अनुभूति हो सकती है जबकि वही चीज दूसरे के दुख का कारण बन सकती है।
स्वयं को जानने के विभिन्न मार्ग दिखलाने वाले महान धर्मग्रंथ, भगवद्गीता में प्रबुद्ध कृष्ण बडे ही सूंदर ढंग से कहते हैं, 'वह व्यक्ति जो सुख और दुख को समान समझता है और पृथ्वी पर पड़े सोने और पत्थर को एक ही आंख से देखता है, जो प्रशंसा और निंदा को एक ही तरह से स्वीकार करता है, जो सम्मान या अपमान में एक सा बना रहता है, और जो मित्रों व शत्रुओं के साथ समान व्यवहार करता है, कहा जाता है कि ऐसा व्यक्ति प्रकृति के तौर तरीकों से परे चला जाता है।उसके लिए सूख व दुख एक समान हो जाते हैं और वह ज्ञान प्राप्ति के लिये तैयार हो जाता है।
स्वयं को सूख और दूख से मुक्त कीजिए
| स्वयं को सुख और दुख से |
|---|
| मुक्त कीजिए। आत्मसिद्ध गुरू, |
| बुद्ध कहते हैं, 'अपने आपको |
| सुख व दुख से मुक्त रखो।' |
| सुख की लालसा और दुख |
| का टालना दोनों एक ही |
| अनुभव के विभिन्न पहलु हैं। |
| दोनों ही जंजीर हैं। दर्द एक |
| भद्दी कड़ी प्रतीत होती है, |
| जबकि सुख एक सुंदर कड़ी। |
जिस प्रकार दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन होता है, उसी प्रकार सुख व दुख एक दुसरे का अनुसरण करते हैं।
जब आप यह समझ जाते हैं कि सुख व दुख दोनों ही मन की रचना हैं, तो आप जान जाते हैं कि
दुखातीत - दुख और दर्द से परे।
जीवन-मुक्ति
दोनों ही अस्थाई हैं, वे दोनों ही साबून के बलबुले की तरह प्रकट होते हैं और फिर लुप्त हो जाते हैं। कोई भी सूख की स्थिति में नहीं रह सकता क्योंकि हमारा मन सदा दोलक की तरह एक विचार (सुख से) से दूसरे विचार (दुख पर) पर झुलता रहता है। सूख और दूख से परे जाना ही एक मात्र रास्ता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सूख को दबा दो और दुख को भूल जाओ। यह एक सजगता है जो दर्द को आनंद में परिवर्तित कर देती है, एक ऐसी ऊर्जा में जिस पर बाहरी स्थिति का कोई प्रभाव नहीं पडता। आनंद आपका वह स्वभाव बन जाता है जिसे कोई भी आपसे छीन नहीं सकता। जो कुछ घटित हो रहा है उस पर आपके प्रतिरोध करने से आपको दर्द की अनुभूति होती है और आप अपने स्वाभाविक आनंद को भुल जाते हैं।
पीड़ा की समझ
दर्द चाहें शारीरिक हो, मानसिक हो या फिर भावनात्मक, इसका सिर्फ अंधकार जैसा नकारात्मक अस्तित्व होता है। प्रकाश की अनुपस्थिति में ही अंधकार का अस्तित्व होता है। इसका अपना कोई सकारात्मक अस्तित्व नहीं होता। उसी प्रकार सजगता के अभाव में ही दर्द का अस्तित्व होता है। जिस प्रकार कमरे में प्रकाश करने पर अंधकार स्वतः ही विलुप्त हो जाता है उसी प्रकार जब आप अपनी सजगता की ऊर्जा दर्द पर केन्द्रित करते हैं, तो दर्द स्वतः ही विलुप्त हो जाता है।
आपको होने वाला कोई भी मानसिक या भावनात्मक दर्द सिर्फ हिमखंड का शीर्ष मात्र होता है। आपको इसकी जड़ में, जहां से यह शुरू होता है, जाने की आवश्यकता है। आपको इसके मूल कारण का निदान करने की आवश्यकता है, तभी आप अरोग्य हो सकते हैं। वरना, इस बात की पूर्ण संभावना है कि आप उस दर्द का किसी अन्य या स्वयं को आहत करने के लिए प्रयोग करेंगे। मैं लोगों से सदा कहता हूँ, 'अगर आपको दर्द है, तो सब कुछ छोड़ दो और इस पर काम करो। देखो कि जड से उपचार हो गया है। तभी आप सरक्षित क्षेत्र में हो सकते हैं। तब तक न तो आप और न ही आपके आस-पास रहने वाले लोग सुरक्षित क्षेत्र में रह पायेंगे। '
जब आप सजगता के साथ किसी दर्द का सामना करते हैं, तो आप इस बात से परिचित हो जाते हैं कि आप सिर्फ शरीर नहीं हैं। आप जान जान जाते हैं कि कोई भी दर्द आपके वास्तविक 'स्वयं' को छू नहीं सकता। जब आपको इसका अहसास हो जाता है तो आप दर्द से परे हो जाते हैं, आप दुख से ऊपर उठ दुखातीत हो जाते हैं। आपको विरली स्वतंत्रता का अनुभव होता है जो देह से मोह के बगैर होती है और यह स्वतंत्रता आजीवन आपके साथ बनी रहती है। आप अपना साधारण जीवन पीछे छोड देते हैं और आध्यात्मिक यान में सवार हो जाते हैं। सम्पूर्ण भौतिक संसार विलुप्त हो जाता है और एक अतुलनीय सौन्दर्य, निर्दोषता, आनंद और करुणा के एक अन्य संसार की रचना होती है।
जब आप गहन स्पष्टता से दर्द का स्वभाव और कारण देखते हैं, तो दर्द स्वयं छुमंतर हो जाता है क्योंकि आपमें निहित स्पष्टता दर्द के कारण को वाष्पित कर देती है। यह अनुभूति एक पूर्ण आनंद की अवस्था लाती है, जिसे जीवनमुक्ति की अवस्था कहा जाता है।
बिना दर्द के शिशू को जन्म देना
मेरी आध्यात्मिक यात्राओं से जुड़ी एक बहुत ही रोचक घटना है। मैं आपको उस घटना में साझी बनाता हूँ घूमते-घूमते मैं मध्य प्रदेश के कबीले के लोगों के पास पहुंचा। मैं गांव के मध्य में स्थित एक छोटे से मन्दिर में ठहरा हुआ था। एक दिन मैंने देखा कि एक गर्भवती महिला ने एक छोटी-सी झोपड़ी में प्रवेश किया। आधे घण्टे बाद वह अपने हाथ में एक नवजात शिशू को लेकर बाहर निकली। कोई दर्द नहीं, कोई चिकित्सक नहीं, कोई दवा नहीं, कोई दाई नहीं, और न ही किसी तरह का दर्द। आधे घण्टे बाद वह एक नवजात शिशू के
साथ बाहर आ रही थी।
मैं अचम्भित था। मैं कुछ नहीं पूछ पाया क्योंकि मुझे उनकी भाषा नहीं आती थी। एक महीने बाद, मैंने एक अन्य गर्भवती महिला को भी इसी तरह झोपडी में जाते हुए और एक नवजात शिशू के साथ बाहर आते हुए देखा। मैंने मन्दिर के स्थानीय पुजारी से पूछा, 'यह कैसे हो सकता है? क्या इन्हें कोई दर्द नहीं होता?' उसने पुछा, 'दर्द? दर्द क्यों?'
मैं अचम्भित था। इस समाज में यह विचार कि गर्भवती महिला को प्रसव के दौरान दर्द की अनुभूति होनी चाहिए, से हर कोई अनजान था! न सिर्फ इतना बल्कि, किसी को रजोनिवृत्ति जैसा स्त्री-रोग भी नहीं होता है।
मैंने उनकी जीवन शैली के बारे में जानकारी लेनी शुरू की। मुझे मालूम पड़ा कि उनके समाज में स्त्रियों को बहुत सम्मान दिया जाता है। जब कोई लड़की शारीरिक रूप से प्रौढ़ हो जाती है, तो उसको यह मानकर काफी सम्मान दिया जाता है कि वह अब माँ बन सकती है। लोग उसके पैर छूते हैं और वह उन्हें छूकर निरोग कर देती है! इस भिज्ञ धारणा के कारण हीं की महिलाओं को अन्य संस्कृति की महिलाओं की भांति दर्द की अनुभूति नहीं होती है।
काल्पनिक दर्द
'काल्पनिक दर्द' के उदाहरण भी रिकार्ड किए गए हैं। शरीर के उस भाग में दर्द का अनुभव जो शरीर में मौजूद ही नहीं है। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान, एक सैनिक के पैर को इसीलिए काट देना पडा क्योंकि वह बूरी तरह से खराब हो चुका था। चौंकाने वाली बात यह थी कि जन उसे दुबारा होश आया तब भी वह उसी पैर में दर्द होने की शिकायत कर रहा था। उसे एक कंबल उढाया गया था जिससे उसे पता ही नहीं चल पाया कि उसका पैर काट दिया गया है। जब कंबल हटाया गया तो उसे मालूम पड़ा कि उसका पैर काटकर अलग कर दिया गया है। उसे बहुत सदमा पहुँचा।
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ह्युलेसीबोस प्रभाव
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एक छोटी कहानी -
एक बार एक शिष्य एक जेन गुरू के साथ घूम रहा था, तब बतख का एक झुण्ड सिर के ऊपर से उड़ा~ गुरू ने पूछा, 'ये कौन हैं?' शिष्य ने उत्तर दिया, 'ये जंगली बतख हैं~' गुरू ने फिर पूछा, 'वे कहाँ गये?'
शिष्य ने उत्तर दिया, 'वे उड गए हैं।'
अचानक गुरू ने शिष्य की नाक पकड ली और मोड़ दी। शिष्य दर्द से कराह उठा। गुरू ने कहा, 'तुम तो कहते थे, कि वे उड गए हैं, किन्तु वे तो प्रारम्भ से ही यहीं हैं।' कहानी बताती है कि शिष्य को उसी क्षण ज्ञान-प्राप्त हो गया।
यह कहानी बड़ी अजीब लगती है,किन्तु अधिकांश जेन गूरू इसी प्रकार अपने शिष्यों को ज्ञान प्राप्त कराते हैं। आपको वास्तविकता के प्रति जगाने में दर्द की अद्भुत योग्यता होती है। इसीलिए सोते हुए शिष्य को जगाने के लिए अधिकांश गुरू इसका इस्तेमाल करते हैं। आमतौर पर जब कोई व्यक्ति दर्द में होता है, तो हम क्या करते हैं? हम उसे सांत्वना देते हैं। अज्ञानवश, हम उस व्यक्ति को सोते हुए ही रहने देते हैं। किन्तु गुरू की सांत्वना देने में कोई रूचि नहीं होती है। उसकी रूचि सिर्फ आपको जगाने में होती है। अत्यधिक दर्द की स्थिति में, मन ठहर जाता है, सिर्फ दर्द ही होता है! उस क्षण सत्य प्रतिपादित होता है! कहानी में आप देख सकते हैं कि दर्द की स्थिति में, शिष्य का भीतरी आकाश गुरू के द्वारा सत्य को लेने के लिए तैयार था, और गुरू ने उसे सत्य प्रदान कर दिया।
रूपांतरण का दर्द
दर्द एक बहुत ही रचनात्मक ऊर्जा हो सकती है। यह ईश्वर की स्मृति बन सकता है। यह प्रार्थना बन सकता है। यह ध्यान बन सकता है। यह सजगता बन सकता है। यह आपके भीतर अदभूत रूपांतरण का कारण बन सकता है।
जीवन का एक महत्वपूर्ण रहस्य जिसे आपको समझने की आवश्यकता है वह यह है कि जब किसी चीज के प्रति सजग हो जाते हैं, तो आप इससे आसानी से छुटकारा प्राप्त कर लेते हैं। अगर आप इसके प्रति सजग नहीं हैं, तो छूटकारा पाने का प्रश्न ही नहीं उठता। यह जीवन-मुक्ति
आपके साथ ही रहता है। दर्द इसीलिए दर्द है क्योंकि यह आपके अचेतन में विद्यमान रहता है, सजगता में नहीं। दर्द का सामना करने में आपका भय इसे बना रहने और टयूमर की भांति अधिक से अधिक विकसित होने देता है। एक गरू अपनी सर्जरी से इस ट्यूमर को हटा देता है! और जब यह आपको छोड़ देता है, तो आप एक नए व्यक्ति में रुपान्तरित हो जाते हैं। एक बार एक भक्त ने मुझसे पुछा, 'स्वामीजी, मैं जानता हँ कि मेरे अंतः आकाश की स्वच्छता हेतु सर्जरी की आवश्यकता है किन्तु क्या कोई गरू इस सर्जरी करते समय कोई दर्दनाशक दवा भी देता है?'
गुरू की दर्दयुक्त 'सर्जरी' से निपटने के लिए किस चीज की आवश्यकता होती है? कभी-कभी, बस सजगता स्वयं दर्द को विलूप्त कर देती है। कई बार, मैं दर्द पर ध्यान आकूष्ट करता हूँ, और कुछ नहीं! यह विलुप्त हो जाता है, छू-मंतर हो जाता है।
अब, इस दर्दयुक्त 'सर्जरी' से निपटने के लिए उचित रवैया क्या है? यह पूर्ण विश्वास होना है, कि गूरू जो भी दर्द दे वह आपकी भलाई के लिए होता है और किसी चीज के लिए नहीं। 'सर्जरी' स्वयं गुरू के असीम प्रेम और करूणा के कारण होती है। अगर आप इसे स्पष्टरूप से जान लेते हैं, तो चाहे इस सर्जरी से आप आहत हो, फिर भी गुरू आपके लिए जो कुछ कर रहा है उसके लिए आप गरू के प्रति गहन कतज्ञता से भर जाते हैं। मैं कह सकता हँ कि गुरू की ओर से दिया जाने वाली दर्दनाशक दवा वह प्रेम और करुणा है जिसकी वर्षा गरू के देखने मात्र से ही होने लगती है।
दर्द का एक कारण यह है कि आप यह सोचने लगते हैं कि यह दर्द है और उस नाम का ठप्पा लगा देते हैं। एक साधारण व्यक्ति को जो जो कुछ सीखने में पूरा जीवन या कुछ सैकड़ों वर्ष या कुछ जन्म लग जाते हैं, वह सब गुरू दो या तीन सेकेण्ड में सिखा देता है। गुरू आपके ट्युमर को निकाल फेंकता है। इसीलिए आपका दर्द कितना ही
जेन - जापानी बौद्ध परम्परा, मूल शब्द ध्यान से उत्पन्न.
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peerJeve-cegefòeâ
दर्द एक महान शिक्षक है
होते हैं, आपके शरीर की प्रज्ञा ऊर्जा की आपूर्ति उस भाग का उपचार करने के लिए करता है, इस दौडती उर्जा को आप दर्द का नाम दे देते हैं। अगर आप सहज होकर ऊर्जा के गति करने और उपचार करने का गवाह बनें, तो दर्द विलप्त हो जाता है और उपचार हो जाता है। अगर हम इसे समझ लें, तो फिर हम कभी भी दर्द को रोकेंगे नहीं और इससे पीड़ित नहीं होंगे, हम शरीर की आरोग्य करने वाली प्राकृतिक ऊर्जा के साथ सहयोग करेंगे।
मैं इसे अपने निजी अनुभव से बता सकता हूँ। एकबार एक व्यक्ति ने मेरी उंगली पर कार का दरवाजा बंद कर दिया। मेरे साथ के लोग परेशान हो गए और प्राथमिक चिकित्सा के लिए दौड़े। मैंने उनसे परेशान न होने के लिए कहा।
जैसा कि मेरी उंगली पर सूजन आ गई थी, मैंने इसे बस ध्यान से देखा कि मेरे शरीर के भीतर क्या हो रहा है। मैंने अनुभव किया कि मेरे नाभि केन्द्र से ऊर्जा मेरी उंगली की ओर दौड़ रही थी। मैं स्पष्ट रूप से देख सकता था कि शरीर की प्रज्ञा खुद ही इस आपात स्थिति से निपट रही थी। इसने खुद ही इसका उपचार कर दिया।
आप अपने भीतरी आपात तंत्र को दर्द कहते हैं।
जब आप दर्द पर केन्द्रित होकर इसके गवाह बनते हैं. तो आप जान जाते हैं कि आप महज शरीर नहीं कुछ और हैं। आप अपनी मौलिक उर्जा का स्पर्श करते है और यह जान पाते हैं कि आप शरीर-मन से कहीं अधिक हैं।
दर्द को गहनता से देखें किन्तु शब्द 'दर्द' और 'पीड़ा' से आपको ज़ड़ना नहीं है। कुछ पल के लिए, दर्द प्रबल होता दिखाई पड़ता है, किन्तु शीघ्र ही यह विलुप्त हो जायेगा।
दरअसल, हमारा शरीर पर्याप्त ज्ञानवान है। यह जानता है कि शरीर का कौन-सा भाग ऊर्जा की मांग कर रहा है और यह उस भाग में ऊर्जा का प्रवाह जीवन-मुक्ति
कर देता है। किन्तु आप ऊर्जा प्रवाह को 'दर्द' के नाम का ठप्पा लगाकर रोकने का प्रयास करते हैं। सिर्फ शरीर के उस भाग पर पूर्ण सजगता को प्रविष्ट कराकर ऊर्जा के प्रवाह को देखें। सिर्फ उत्सुकता से इस ऊर्जा प्रवाह को देखें। पूर्णतया बाहरी बन जाओ, इस प्रक्रिया में भागीदार न बनें। बस उस क्षेत्र में ऊर्जा के प्रवाह को होने दें और इसे काम करने दें। और आप इसे स्वस्थ होता देखेंगे।
इच्छा एक संक्रिय ऊर्जा है
हमारी वास्तविक इच्छाएं कौन-सी हैं?
भय और इच्छा वे मूलभूत ऊर्जाएं हैं जो हमारे जीवन को नियंत्रित करती हैं। इच्छावश या तो हम कुछ पाने के लिये कार्य करते हैं या कहीं पहुँचना चाहते हैं, या भय ग्रस्त होकर किसी चीज का अनुभव नहीं लेना चाहते। आकर्षण और प्रतिकर्षण न केवल अणू शक्तियां हैं बल्कि मनुष्य व्यवहार के भी आवश्यक अंग हैं।
अपनी वास्तविक इच्छाओं को पहचानें
मनष्य जीवन को गतिमय बनाने वाली महत्वपूर्ण शक्तियों में से एक है इच्छा। अगर आप अपने जीवन को देखें, तो आप पायेंगे कि अधिकांश समय आप इच्छा या भय से प्रेरित रहते हैं।
हमारी बहुत सारी इच्छाएं होती हैं और अधिकतर समय हम यह महसूस करते हैं कि हमारे पास उन इच्छाओं को पुरा करने की ऊर्जा नहीं है। जैन परंपरा के अनुसार, ईश्वर हमें अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा एवं क्षमता के साथ इस धरती पर उतारता है। लेकिन हम में से अधिकांश अपनी ऊर्जा और क्षमता को पहचान ही नहीं नहीं पाते। क्यों?
हमारी वास्तविक इच्छाओं और 'उधार ली हुईं' इच्छाओं के मध्य बहुत अंतर होता है। हमारी वास्तविक इच्छाएं 'आवश्यकताएं' कहलाती हैं। उधार ली हुईं इच्छाएं 'चाहत' कहलाती हैं। अपनी वास्तविक इच्छाओं या आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हमारे पास पर्याप्त ऊर्जा होती है।
लाइफब्लिस प्रोग्राम स्तर-2 (THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM स्फूरण कार्यक्रम) के दौरान, हम एक सत्र में लोगों से अपनी इच्छाओं, आवश्यकताओं और चाहतों की सूची बनाने के लिए कहते हैं। फिर वे इन इच्छाओं पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। ध्यान के अंत में, मैं उनसे अपनी इच्छाओं की सूची याद करने के लिए कहता हूँ। जो वे याद कर पाते हैं वे उनकी लिखी हुईं इच्छाओं का अंश मात्र होती हैं! यह कुछ इस तरह से जैसे उन्होंने अपनी इच्छाओं को पत्तियों से युक्त एक विशाल वुक्ष के रूप में लिखा था और ध्यान के दौरान इस वृक्ष की लगभग समस्त पत्तियां सूखकर झड़ गई हैं। अब वृक्ष जो नई पत्तियां प्राप्त करेगा वे स्वर्ण पत्तियों की भांति होंगी। अगर आप समझ जायें कि कौन-सी इच्छा अंतर्निहित है और कौन-सी संचित की हुई है, तो आप स्वतः ही आध्यात्मिकता का विकास कर लेंगे।
जब हमारी इच्छाएं हमारी स्वयं की वास्तविक इच्छाएं ही होती है, जब वे हमारी मूल आवश्यकता को प्रतिबिंबित करती हैं तब वे इच्छायें स्वयं हमारी आंतरिक ऊर्जा से व्यक्त होती हैं। तब उन्हें पाने की कोशिश में हमें निराशा की अनुभूति नहीं होती। घटनाओं के प्राकृतिक दौर से, ये स्वतः ही पूरी हो जाती हैं।
पर्ण तप्ति की वास्तविक इच्छा
जब आपके सिर में दर्द होता है, तो उस स्थिति में आपको सहजता की अनुभूति नहीं होती होती है- क्योंकि आप जानते हैं कि यह आपका प्राफुतिक स्वभाव नहीं है। आपके प्राकृतिक स्वभाव में सिरदर्द के लिए जगह नहीं होती। उसी प्रकार जब आपकी कोई इच्छा होती है, तो आप तुरंत उसे पूरा करना चाहते हैं- क्योंकि गहन परिपूर्णता आपका प्राकृतिक स्वभाव है और इच्छा उस परिपूर्णता में असंतुलन पैदा करती है।
आपको दो महत्वपूर्ण सत्यों को समझने की आवश्यकता 前に
1- आपका सम्पूर्ण जीवन पूर्णतृप्ति प्राप्ति हेतु घटनाओं की एक लम्बी शुंखला है। आप जो कुछ भी करते हैं, चाहें यह खाना हो, पीना हो, रिश्तों को निभाना हो, धन हो या खुशी हो, यह सब परिपूर्णता के अनुभव के लिये ही है। इसे सीधे तौर पर पाने की अपेक्षा आप विभिन्न दिशाओं से परिपूर्णता को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
2- पुर्णतप्ति आपके भीतर है। यह आपका स्वभाव है। इसीलिए आप अपूर्ण तुप्ति से बाहर आने का प्रयत्न करते हैं।
यह सत्य कि आप पूर्णतृप्ति की खोज कर रहे हैं का अर्थ है कि आप परिपूर्णता से परिचित हैं। वरना आप इसकी खोज नहीं करते। जब आप अपने जीवन में कुछ परितुप्ति अनुभव हासिल कर लेते हैं, तो इस बात की आशा की जाती है कि आप इसे दुबारा भी अनुभव कर पायेंगे। इसीलिए आप अपने जीवन का विस्तार करते हैं।
इच्छा, ज्ञान और कर्म
वह इच्छा जो विशुद्ध है और जो किसी वस्तु या व्यक्ति विशेष के लिए निर्देशित नहीं है, वह साधारतया एक प्रवाहमय ऊर्जा है जिसे इच्छा शक्ति या 'इच्छा ऊर्जा' कहा जाता है।
नाभि से ऊर्जा, विशुद्ध ऊर्जा के रूप में आती है। हृदय क्षेत्र में, यह ऊर्जा इच्छा शक्ति में परिवर्तित हो जाती है। फिर यह कंठ क्षेत्र में शब्दों में परिवर्तित की जाती है। जब यह ऊर्जा शब्दों में परिवर्तित की जाती है,तो इसे वाक या 'भाषा ऊर्जा' कहा जाता है। अगर हम इसकी तुलना करें तो वह ऊर्जा जो नाभि क्षेत्र से आती है, वह खुली रूई की भांति होती है। यह रूई कंठ क्षेत्र में धागा बन जाती है। या फिर आप इस तरह समझ सकते हैं -वह ऊर्जा जो नाभि से आती है वह एक पिघले हए लोहे की भांति है। गला एक ढलाई घर है जहां उत्पाद का निर्माण होता है।
किसी तरह, भाषा ऊर्जा आगे मस्तिष्क तक पहुंचती है। वहां यह ज्ञान के तौर पर टिकती है या आज्ञा में परिवर्तित हो जाती है। मस्तिष्क में यह ज्ञान शक्ति के रूप में ठहरती है। उदाहरण के लिए, आपके शरीर से जुड़ी इच्छा शक्ति शरीर के बारे में ज्ञान बन सकती है।
अन्य विकल्प यह है कि शब्द आज्ञा में परिवर्तित हो जाते हैं और क्रियान्वित हो जाते हैं। आज्ञा पूरे शरीर में जाती है और आपको गतिमान कर देती है। इसी को क्रिया शक्ति कहते हैं। उदाहरण के लिए, आपके शरीर से जुड़ी इच्छा ऊर्जा आपके शरीर को गतिमान करने जैसी क्रिया शक्ति बन सकती है।
आपके अस्तित्व से आने वाली विशुद्ध इच्छा शक्ति कंठ क्षेत्र में ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति के रूप में परिवर्तित हो जाती है। यदि उर्जा की शुद्ध कर उचित रूप से चैनल नहीं किया जाता है तो ज्ञान और कर्म, इच्छा शक्ति से अलग हो जाते हैं। ज्ञान और कर्म को ऊर्जा शक्ति के साथ लय में होना चाहिए। फिर, यह इच्छा का शुभ चक्र बन कर बेहतर ज्ञान और कर्म का मार्ग प्रशस्त होकर जिससे अधिक सुस्पष्ट इच्छाओं का मार्ग निर्धारित होता है।मान लीजिए कि आपकी इच्छा करोडो रूपये कमाने की है। अगर इसे ज्ञान में पूर्णतया परिवर्तित कर दिया जाए, तो आपके पास स्पष्ट योजना होगी और आप उचित कार्यकर करोडपति बन जायेंगे। यदि इच्छा ऊर्जा अत्यधिक ज्ञान और कम कर्म में परिवर्तित होती है, तो आप बस सोचते ही रहेंगे। केवल हवाई किले ही बनाते रहेंगे।
दूसरी तरफ, जब इच्छा ऊर्जा अत्यधिक कर्म और कम ज्ञान में परिवर्तित होती है, तो आप दिशाविहीन होकर कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए, मुंबई से कोलकाता तक गाडी चलाकर आप निश्चय ही कडी मेहनत कर सकते हैं, किन्तु क्या ऐसा करने से आप करोड़पति बन जायेंगे। कार्य आप जरूर कर रहे हैं किन्तु उचित ज्ञान नहीं है। इसलिये इच्छाशक्ति का सही ज्ञान और कर्म में परिवर्तित होना आवश्यक है। सजगता के अभाव में ही यह क्रिया नहीं हो पाती।
अगर आप इच्छा के प्रति ईमानदार और एकीकृत हैं तो कोई संघर्ष नहीं होगा और आप अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे।
प्रेम की शक्ति
आपने भी अपने जीवन में अवश्य ही इस तरह की घटनाओं का अनुभव किया होगा। एक महिला जो एक व्यस्त सड़क को पार करने से डरती है, अगर अपने बच्चे को सड़क पार करते हुए देख ले, तो वह अपने बच्चे को बचाने के लिए सड़क के सामने आ जायेगी बिना अपनी सरक्षा की परवाह किए।
हमें यह समझना चाहिए कि वह किस तरह अचानक अपने डर को भूल गई। कारण यह है कि उसके पुत्र प्रेम ने उसके भीतर मातृत्व के आयाम को जगा दिया। प्रेम के प्रत्येक रिश्ते में ऐसा ही होता है। यदि किसी में प्रेम की खिलावट होती है, तो तुरंत उस व्यक्ति जीवन-मृत्ति
के भीतर से सारा भय दर हो जाता है। समझें, प्रेम में अद्भुत शक्ति होती है और इसी प्रकार वासना में भी। अगर आपके मूलाधार चक्र में पर्याप्त ऊर्जा है, तो यह किसी अन्य चक्र से अधिक महत्वपूर्ण हो जायेगा। आपके स्वाधिष्ठान चक्र में कोई भय नहीं होगा और आपके मणिपुरक चक्र में कोई चिंता नहीं होगी। जब मुलाधार चक्र में पूर्ण शक्ति होगी, तो ये उच्च चक्र काम नहीं करेंगे। व्यक्ति को पता भी नहीं होगा, यह उसके भीतर छिपी हई अज्ञात क्षमता को उन्मुक्त कर देगा। यह बाहरी संसार में भी उसकी क्षमताओं का विस्तार कर देगा।
आपके भीतर अलग-अलग लोग अलग-अलग आयाम सक्रिय करते हैं। अगर आपका प्रेमी है, तो आपके भीतर प्रेम की अनुभूति जागत होगी। अगर आपका कोई पुत्र या पुत्री है, तो आपके भीतर मातृत्व या स्नेह का आयाम जागत होगा। अगर आपका मन विभिन्न आयामों के अनुभव को ग्रहण करने के लिए तैयार है, तो वे आयाम आपके भीतर खिल उठेंगे।
अगर आप पूर्णतया खुले-हृदय वाले व्यक्ति हैं, तो अपने जीवन में आप जिस व्यक्ति से भी मिलते हैं, आप खिल जायेंगे। किन्तु यदि आप अहंकारी हैं, तो आपका साथी या प्रेमी भी आपको खिला नहीं सकता। कुपया समझें, जब आप किसी रिश्ते में प्रवेश कर रहे हैं जैसे कि पति या पत्नी के या प्रेमी के तो आपको खुले और अहंकार रहित मन का सुजन करना आपका दायित्व है। तभी वह अनुभति आपको सदा के लिये परिवर्तित कर देगी। यदि यह शाश्वत परिवर्तन नहीं होता है, तो आप जीवन के एक बड़े आयाम को गंवा देते हैं।
हम वास्तविक प्रेम की अनुभूति कर पाने में समर्थ क्यों नहीं होते? यह हमारे संस्कारों, अतीत की स्मृतियों से
मूलाधार चक्र - सुक्ष्म ऊर्जा चक्र जो रीढ़ के निचले स्थान पर रहता है, लोभ और काम की भावना से संबंधित होता है।
चक - आपके शरीर के ऊर्जा चक्र पूर्ण रूप से पहिये के समान जिसके द्वारा गए आध्यात्मिक शुल्भवों के द्वारा ऊर्जा का प्रभाव होता है, ये सात चक्र है जो हमारे मेरल्यूड के भीतर रहते है। जैसे मलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपरक, अनाहत, विश्वि, आज्ञा, और सहस्वसार स्वाधिष्ठान चक्र - सूक्ष्म ऊर्जा के कि नाभि के दो अंगुल नीचे की ओर रहता है यह आपके अंदर भय की भावना से संबंधित होता है। मणिपुरक चक्र - सुक्ष्म ऊर्जा चक्र जो कि नाभि के स्थान पर रहता है, और चिंता की भावना से जुड़ा रहता है।
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इच्छा एक सक्रिय ऊर्जा है
'जैसी मेरे दिमाग में कल्पना थी वैसी मुझे एक मिली थी किन्तु बात नहीं बन पाई।' व्रद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया।
उस व्यक्ति ने पुछा क्यों।
वुद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया, 'वह एक पूर्ण आदमी की तलाश कर रही थी।'
अपने भीतर की छवि के लिए जब हम पूर्ण मिलान पाने की कोशिश करते हैं, तब ऐसा ही होता है।
किन्तु एक लम्बी तलाश के बाद, हम अचानक एक व्यक्ति को पा लेते हैं जो दूर से हमारी मानसिक छवि से मिल खाता प्रतीत होता है। इस समय जो कुछ होता है उसे हम 'प्रेम में गिरना' कहते हैं। प्रेम में गिरने के पीछे यह विज्ञान है। ध्यान दें कि यह सदैव प्रेम में 'गिरना' होता है, कभी भी प्रेम में 'उठना' नहीं होता! अपनी सशक्त इच्छाओं और अपेक्षाओं के कारण, हम चीजों को वैसे ही देखते हैं जैसा कि हम उन्हें देखना चाहते हैं। जब तक यह दूरी बनी रहती है, सब कुछ ठीक तरह से चलता रहता है। हम अपनी कल्पना को एक-दूसरे पर लगाए रखते हैं। किन्तू, जैसे ही व्यक्ति करीब आता है हम पाते हैं कि कल्पना और वास्तविकता पूर्णतया भिन्न हैं।
हमें यह समझने की आवश्यकता है कि कोई भी जीवित प्राणी अपने मस्तिष्क में रहने वाली छवि को नहीं पा सकता क्योंकि छवि वास्तविकता से निर्मित नहीं होती है। कोई भी छवि वास्तविकता से मेल नहीं खा सकती, क्योंकि आखिर यह सिर्फ छवि, एक कल्पना ही होती है।
अंतिम कीमियाँ
यह कीमिया क्या है - साधारण धातृओं जैसे तांबा या लोहे को सोने में बदलने की विधि कीमिया कहलाती है। उसी प्रकार जब हमारा अस्तित्व परिपूर्ण हो जाता है, तो वासना की मूल अनुभूति प्रेम में परिवर्तित हो जाती है। हम उच्चतम संवेग (प्रेम) को पाने में समर्थ हो
जाते हैं।
इसी प्रकार, कल्पनाओं की अशाद्भि को हटा दो और अपने रिश्तों में मैत्री की शुद्धता को शामिल करो और धैर्य के साथ इस प्रक्रिया को करो। आरम्भ में, लोग आपमें हुए परिवर्तन को समझने में समर्थ नहीं हो सकेंगे। बस अपने आप में विश्वास करते रहें। आपकी सच्चाई और सामर्थ्य आपके चारों और के लोगों को सकारात्मक बना देगी।
प्रेम में मैत्री को शामिल करो। अब तक, हमारी वासना दुसरे व्यक्ति पर अधिकार पाने के लिए गहन-जड जमायीं हई हिंसा है। रिश्ते में मैत्री को शामिल करो। अपने साथी को जैसा वह है, वैसा ही उसका स्वागत करो, उसे बस स्वीकार ही मत करो । उसका मन, शरीर और अस्तित्व जैसा है वैसा ही उसका स्वागत से स्वीकार करो। तब आप देख सकते हैं कि वासना प्रेम में बदल जाती है और आपका अस्तित्व ईश्वरीय आनंद बन जाता है।
प्रेम मनुष्य में जीवन को भी जोड़ता है। प्रेम के साथ मनुष्य आत्मा बन जाता है। प्रेमविहीन व्यक्ति एक उपयोग की जाने वाली वस्तु मात्र होता है। जब आप बिना प्रेम के किसी पुरूष या स्त्री को देखते हैं, और योजना बनाते हैं कि आप इस व्यक्ति से क्या प्राप्त कर सकते हैं, तो आप उसे वस्तु बना देते हैं। जब आप किसी व्यक्ति को प्रेम से देखते हैं, तभी वह व्यक्ति आत्मा है, एक जीवंत अस्तित्व।
ब्रह्मचर्य कुछ नहीं है सिवाय अपने भीतर दबे हुए आधे की ललक न उठना। यदि आप पुरूष हैं, तो आपके स्वयं के भीतर इतनी परितृप्ति का अनुभव होने की आवश्यकता है कि आप अपने दमित आधे या भीतरी स्त्री की कमी को महसुस न करें।
अगर आप स्त्री हैं, तो आप स्वयं इतनी पर्याप्त हों कि इस परितृप्ति के अनुभव के लिए आप बाहर न देखें।
जब आप स्वयं में ही परितृप्ति होंगे तब, चाहें आप
इच्छा एक सक्रिय ऊर्जा है
विवाहित हों या न हों, आपके मन में शांति होगी। आप विवाहित होकर भी ब्रह्मचर्य में हो सकते हैं। यही वास्तविक ब्रह्मचर्य है।
ध्यान तकनीक
1- दुख हरण ध्यान
कुल अवधि : 30 मिनट
यह ध्यान तकनीक आपके भीतर की समस्त दबे हए संवेगों को बाहर निकाल देगी।
आपकी श्वास मन से ज़ुड़ी है। यदि आपके विचार शांत हैं, तो आपकी श्वसन भी शांत सहज हो जायेगी। अगर आपके विचार आक्रामक हैं, तो आपके श्वास भी आक्रामक होंगे।
आप इस तकनीक का अभ्यास प्रातकाल खाली पेट करें। 21 दिन का दुख हरणा ध्यान आपके अस्तित्व को
परिवर्तित कर देगा और आपके चेहरे और शरीर पर
रौनक आ जायेगी।
चरण 1 - 10 मिनट
अपनी आंखें बंद करके खड़े हो जाओ। ध्यान के इस प्रथम भाग में, आपका मानसिक तंत्र गहन श्वास से
पुर्णतया सजीव हो जाता हैं। यह ऊर्जा समस्त दबे संवेगों को पिघलती बर्फ की तरह पिघला देगी।
अपने शरीर की गहराई से सदैव मुंह बंद रखते हुए नाक से गहरी और अव्यवस्थित श्वास लो। अपने हाथों को फैला लो, अपने घुटने मोड़ लो, पहले नीचे झूको फिर खड़े हो जाओ। ऐसे क्रिया करो मानो आप चिड़िया हैं। अपने श्वास के साथ ऊपर-नीचे उठो, घुटनों को ऊपर से नीचे मोड़ो, हाथों को फैलाओं और सिकोड़ों।
यह गतिविधि सहजता से करो। अपना श्वास भरते
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अपराध-बोध क्या है?
जब आपकी इच्छाएं होती हैं, तो साथ ही आपको अपराध-बोध भी होता है। अपराध-बोध इच्छा का विपरीत चेहरा होता है। कभी-कभी कुछ इच्छाएं करके आपको अपराध बोध होता है क्योंकि आपको एहसास होता है कि यह इच्छा करना उचित नहीं है। किसी दूसरे समय आपको तब भी अपराध-बोध होता है जब आपकी इच्छा परिपुर्ण हो जाती है। ऐसा इसीलिए होता कि आपको यह एहसास होता है कि जो कुछ आपने प्राप्त किया है, आप उसके लायक ही नहीं हैं। जब आपकी इच्छाएं पूर्ण नहीं होती, तो आपको अपराध-बोध का एहसास होता है क्योंकि आपको एहसास होता है कि आपने वह सब नहीं किया जो आपको करना चाहिए था। इच्छाएं सदा अपराध-बोध को उत्पन्न करती हैं।
अपराध-बोध और कुछ नहीं है सिवाय आपके अतीत में लिए गए निर्णयों और कार्यकलापों की नवीनतम प्रज्ञा के साथ समीक्षा करने के।
उदाहरण के लिए- जब आप विद्यालय में थे, तब आपने अपने मित्रों में से किसी एक को नीच शब्द कहे थे और जिसकी वजह से आपकी दोस्ती टूट गई थी। अब,इतने वर्षों बाद, प्रज्ञा से उस घटना की समीक्षा करना और अपराध-बोध महसूस करना क्या उचित है? नहीं! उस समय आपकी वैसी ही ही प्रज्ञा थी, इसीलिए आपने उसी तरह से व्यवहार किया। अब, आपकी प्रज्ञा उच्चतर है।
अपनी अतीत की प्रज्ञा द्वारा किये गये कार्यों की वर्तमान की प्रज्ञा से समीक्षा करने का कोई औचित्य नहीं है।
अतीत की व्यर्थता
जो बीत गया सो बीत गया। जो हुआ सो हुआ। अब आप उसे बदल नहीं सकते। अब अगर आप निरंतर अतीत के विषय में सोचते हुए अपराध-बोध महसूस करते रहेंगे, तो आप अपने वर्तमान और भविष्य को भी नष्ट कर लेंगे। जो हो चुका है उसका कुछ नहीं किया जा सकता, इसीलिए अपराध-बोध करना व्यर्थ है। आप क्या कर सकते हैं? आप जो कर सकते हैं वह सिर्फ इतना है कि आप उस रवैये को दुबारा न दोहरायें। उस समय आपकी जो प्रज्ञा थी उसी अनुसार आपने कार्य किया, बस!
हमारा अतीत सदा अतीत ही होता है, वह खत्म हो चुका है। इसीलिए इसे अतीत कहा जाता है। फिर भी, हम अतीत को अपने ऊपर हावी होने देते हैं। हम अतीत को अपने आप पर प्रभावित कैसे करने देते हैं? यह दो प्रकार से होता है -
1- अगर आप अपनी वर्तमान प्रज्ञा का इस्तेमाल कर अपने अतीत की घटनाओं या निर्णयों की समीक्षा करते हैं, तो आप अपने अस्तित्व में अपराध-बोध का सुजन कर लेते हैं।
2- यदि आप अपने अतीत के अनुभवों के आधार पर ही वर्तमान निर्णय लेते हैं, तो आप भविष्य में भी थोडे से नवीनतम तरीके से उसी अतीत को दोहरायेंगे।
हालांकि, चाहें आप ठीक वैसी ही गलती न करें, फिर भी आप वैसे ही प्रयोगात्मक स्तर से गूजरेंगे।
हमारा मन एक खांचे में ढल जाता है और सदा वही करता रहता है जो हमने किया है। इसीलिए हम सदा एक जैसी गलतियां दहराते रहते हैं।
तीन प्रकार के अपराध-बोध
तीन प्रकार के अपराध-बोध हमारे भीतर जड़ जमा लेते हैं और हमारी प्रज्ञा को नष्ट कर देते हैं -
- 1- परिवार द्वारा सृजित अपराध-बोध
- 2- सामाजिक नियमों द्वारा सृजित अपराध-बोध
- 3- हमारे स्वयं के द्वारा सुजित अपराध-बोध
परिवार द्वारा सृजित अपराध-बोध
सात वर्ष की वय के पहले अपराधबोध परिवार द्वारा सजित होते हैं। यदि आप अपने माता-पिता की इच्छाओं अनुसार कार्य नहीं करते हैं, तो इससे आपके मन में अपराध-बोध बैठ जाता है। वे कहते हैं कि आप जो कर रहे हैं उसे ईश्वर स्वीकार नहीं करेगा। बेचारा ईश्वर उसके विषय में लोग जो कुछ कहते हैं, उसे उसका समर्थन करना ही पडता है। या आपके माता-पिता कहते हैं कि आपको उनकी इच्छाओं को पूरा करना चाहिए। और तरंत ही आप उन्हें अप्रसन्न कर अपराध-बोध करने लगते हैं। इस प्रकार, आपके भीतर अपराध-बोध का पहला बीज आपका परिवार ही बोता है। और बड़े हो जाने पर वे बच्चे भी अपने बच्चों के साथ वैसा ही करते हैं । उन्हें भी विरासत में आप वही देते हैं, जो आपको मिला है। इस प्रकार यह ताज पीढ़ी दर पीढ़ी एक सिर से दसरे सिर पर पहनाया जाता रहता है।
क्योंकि आपके पास यह व्याख्या करने के लिए प्रज्ञा ही
जीवन-मुक्ति
नहीं होती कि चीजों को एक निश्चित तरीके से ही क्यों किया जाए, आप इस नियम को अपने बच्चों पर थोपते हैं और इस तरह अपराध-बोध का सूजन करते हैं। उदाहरण के लिए, बच्चों को चक्कर खाना (गोल-गोल घुमना) पसंद होता है। अपनी ऊर्जा को केन्द्रित करने का यह उनका प्राकृतिक स्वभाव है। किन्तु हम क्या करते हैं? हम बच्चों को ऐसा करने से रोक देते हैं और उनके मन में भय बैठा देते हैं कि ऐसा करने से वे गिर सकते हैं। और हम तब तक अपने प्रयासों को नहीं रोकते जबतक बच्चे अपनी इन स्वाभाविक क्रियाओं को रोक कर निष्क्रिय नहीं हो जाते।
बच्चा बाहर धूप में जाकर खेलना चाहता है, या कुछ फूल चुनना चाहता है या फिर ताजी हवा खाना चाहता है। यदि आप इस विषय में सोचें तो बच्चा कुछ अधिक नहीं माँग रहा है। किन्तु माँ कहती है, 'नहीं' - ध्रुप में खेलकर वह बीमार पड़ सकता है। यदि आप थोडी गहराई से देखें तो पायेंगे कि 'न' कहकर माँ शक्ति की एक सूक्ष्म अनुभूति प्राप्त करती है, नियंत्रण में करने की अनुभूति।
माँ द्वारा कहा गया 'न' बच्चे पर एक गहन प्रभाव डालता है। इससे बच्चे में एक अपराध-बोध का सुजन होता है। अब, या तो बच्चा अंदर रहने के लिए अपने आपको बाध्य करेगा, या फिर जैसे ही उसकी माँ का ध्यान उससे हटा, वह तुरंत बाहर जाकर खेलने लगेगा। किन्तु दोनों ही तरीकों से वह अपनी मुल ऊर्जा को दबा रहा है। यदि वह अंदर ही रहने के लिए अपने आपको बाध्य कर रहा है, तो अपनी ऊर्जा को अभिव्यक्त होने से रोक रहा है। यदि वह बाहर जाता है, तो उसे अपराध-बोध की अनुभूति होती है, उसे डर लगा रहता है कि कोई उसे देख लेगा। और यह सब उसके साथ सिर्फ धूप में खेलने की इच्छा करने से हो रहा है।
जैसे-जैसे बच्चा बड़ा हो जाता है, अपराध-बोध की यह गहन अनुभूति उसके भीतर जड़ जमा लेती है। अब बड़ा होने के बाद यदि वह अपने बगीचे में बैठा धूप सेंक रहा होता है, तो अचानक बचपन की पुरानी स्मृतियां उसके मन में कौंध जाती हैं। वह बिना किसी कारण के अपराध-बोध महसूस करने लगता है और उसे बैचेनी होने लगती है। बगीचे में धूप में बैठने में कोई परेशानी नहीं है,किन्तु पुरानी स्मृतियां जागृत हो उठती हैं।
इसी प्रकार अपराध-बोध की उत्पत्ति होती है। इसी तरह की छोटी-छोटी घटनाएं इकट्ठी हो जाती हैं और आपके जीवन के प्राकृतिक स्वभाव में अपराध-बोध भर देती हैं।
अपराध-बोध और खुशी
हम बच्चे को उस आनंद और स्वाभाविक खुशी से जिससे वे जीना चाहते हैं, उसे क्यों रोकते हैं?
यदि आप थोड़ी-सी गहनता से देखें, तो आप पायेंगे कि खुशी खुद अपराध-बोध से जुड़ चुकी है। एक छोटा बच्चा अपराध-बोध के विषय में कुछ नहीं जानता। वह जो कुछ भी करता है, वह स्वाभाविक होता है। इसीलिए छोटे से बालक को देखना इतना लुभावना होता है। वह जो कुछ करता है, उसमें खो जाता है। अभी वह सभ्यता के मुखौटे से परिचित नहीं होता है। अभी वह जंगली ही होता है। इसी कारण वह ऊर्जा से भरा होता है। आनंद और उत्सुकता उसमें निरंतर प्रवाहित होते रहते हैं। उसके भीतर से ऊर्जा के बुलबुले उठते रहते हैं।
बच्चा हर चीज का आनंद लेना चाहता है किन्तु माता-पिता सामाजिक नियमों - अपराध-बोध, गंभीरता, मिथ्याचार से बंधे होते हैं। बच्चा चिल्लाना और कूदना चाहता है जोकि उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। किन्तु वयस्क उसे रोक देते हैं, 'चिल्लाओं मत! यह अच्छा आचरण नहीं है। तुम्हें सभ्य बनना चाहिए। तुम्हें हमारी तरह व्यवहार करना आना चाहिए।' इस प्रकार, मुक्त और खुश होने का विचार स्वयं ही अपराध-बोध की अनुभूति से जुड़ जाता है।
समाज द्वारा सृजित अपराध-बोध
सात से चौदह वर्ष की उम्र में समाज अपने नियमों से आपके भीतर अपराध-बोध को उत्पन्न करता हैं।
है। भय पर आधारित अपराध-बोध सामाजिक नियमों द्वारा सृजित होता है।
चौदह वर्ष की उम्र तक, परिवार और समाज आपके लिए अपराध-बोध को निर्माण करते हैं। इस अपराध-
अपराध-बोध यौन का मेरे अनुसार, अपराध-है। माता-पिता या बोध सबसे बडा पाप परिवार यौन विषय है। कम से कम अन्य पर कभी भी चर्चा नहीं सभी पापों की सजा करते। जब आपमें रासायनिक परिवर्तन आपको मुत्यु के बाद हो रहे होते हैं, तो आप मिलती है। किन्तु यह महसूस करते हैं अपराध-बोध तो कि आपका शरीर आपको अभी सजा नया है। अनेकानेक देता है जब आप प्रश्न उठते हैं जिनके स् स्पष्ट उत्तरों वी जीवित होते हैं। आवश्यकता होती है किन्तु कोई भी उत्तर
देने के लिए लैयार नहीं होता।
इस नाजूक परिवर्तन की उम्र में आपकी दुविधा और इच्छा को बढाने के लिए आपके चारों ओर मीडिया लगातार कल्पनाओं की वर्षा करता रहता है।
समाज आपके भीतर यह अहसास करा देता है कि आप स्वयं में पर्याप्त नहीं हैं। इससे आप जो हैं, उससे आपको अपराध-बोध होने लगता है। एकबार जब समाज आपको अहसास करा देता है कि आप पापी हैं, तो फिर आप इसकी पकड में आ जाते हैं। फिर आप और अधिक
जीवन-मुक्ति
बोध में एक महत्वपूर्ण
मिलारेपा - ये मारपा के शिष्य हुए है जो कि तिब्बत के योगी है।
अपराध-बोध ही मूल पाप है
जीवन का आनंद नहीं ले पाते।
मेरे अनुसार, अपराध-बोध सबसे बडा पाप है। कम से कम अन्य सभी पापों की सजा आपको मृत्यु के बाद मिलती है। किन्तु अपराध-बोध तो आपको अभी सजा देता है जब आप जीवित होते हैं।
तिब्बती कवि-संत मिलारेपा ने गीत लिखा है, 'मेरा धर्म बिना कोई खेद किए जीना और मरना है।'
केवल समाज ही आपको संत या पापी कहता है। जब समाज आप पर संत का ठप्पा लगाता है, तो आप संत होते हैं। जिस पल समाज आप पर पापी का ठप्पा लगाता है, आप पापी हो जाते हैं। यदि आप समाज में किसी की हत्या कर देते हैं, तो आपको हत्यारा कहा जाता है, और दण्डित किया जाता है। किन्तु यदि रणभूमि में जब आप किसी कि हत्या करते हैं, तो आपको नायक कहा जाता है। आपको कोई बड़ा सम्मान दिया जाता है। इसीलिए यह निर्णय करने का कि क्या उचित है क्या गलत कोई पूर्ण पैमाना नहीं है। यह समाज के अपने तर्क हैं।
स्वर्ग और नर्क
आज स्वर्ग और नर्क की धारणा के माध्यम से आपके भीतर अपराध-बोध के बीज बोने का बहुत ही आसान तरीका है। लोग स्वर्ग और नर्क का विचार दिखलाकर आपको भय और लोभ द्वारा शोषण करते हैं। वे आपके भीतर स्वर्ग के लालच और नर्क के भय का सृजन करते हैं। वे नर्क और स्वर्ग की अनेकानेक अवधारणाएं सृजित कर आपको बेच देते हैं। वे कहते हैं, 'यदि आप इस प्रकार के प्रयोग करें तो, आपको स्वर्ग मिलेगा, और यदि आप इस प्रकार का प्रयोग नहीं करते हैं, तो आपको नर्क मिलेगा।' जब आपको भय और लालच पर आधारित नियमों को दिया जाता है, तो आप स्वतः ही अपने भीतर गहन अपराध-बोध का सृजन करना प्रारम्भ कर देते हैं।
एक छोटी कहानी -
एक बार एक सेना के अधिकारी ने जेन गुरू से पूछा, 'गुरूजी, स्वर्ग और नर्क क्या हैं?'
गुरू ने पूछा, 'अपने जीवन-यापन के लिए आप क्या करते हैं?'
सेना अधिकारी ने कहा, 'मैं सेना का नायक हँ।'
गुरू हंस पड़े और बोले, 'किस मूर्ख ने तुम्हें सेना का नायक बना दिया? तुम तो कसाई दिखलाई पड़ते हो।'
वह सेना अधिकारी क्रोधित हो गया और चिल्लाते हुए उसने अपनी तलवार बाहर निकाल ली, 'मैं तुम्हारे दुकड़े-ट्रकड़े कर दुंगा।'
गुरू ने अपना हाथ उठाया और कहा, 'ये नर्क के द्वार हैं।'
सेना अधिकारी को अपनी गलती का एहसास हुआ और गुरू के समक्ष गिरकर क्षमा-याचना करने लगा।
गुरू ने कहा, 'ये स्वर्ग का द्वार हैं।'
स्पष्टरूप से जान लीजिए कि स्वर्ग और नर्क कोई भौगोलिक स्थल नहीं हैं। वे आपके मन की मनोवैज्ञानिक दशाएँ हैं। एक पल में मन नर्क में हो सकता है, तो दुसरे पल में स्वर्ग में। स्वर्ग और नर्क के द्वार समय समय पर वैकल्पिक रूप से खुलते और बंद होते रहते हैं।
आपके द्वारा सृजित अपराध-बोध -
इक्कीस वर्ष की आयु तक, परिवार एवं समाज द्वारा दिये गये निर्देश और ज्ञान, अपराध-बोध सृजित करते हैं। इक्कीस वर्ष के बाद, परिवार और समाज द्वारा बोया गया अपराध-बोध आपके भीतर अपनी जडे विकसित करता है। तब बिना किसी कारण के, आप स्वयं के लिए अपराध-बोध का सृजन शुरू कर देते हैं। अपराध बोध बोध अस्तित्व का स्थाई अतिथि बन जाता है।
अपराध-बोध ही मूल पाप है
परिवार द्वारा सृजित अपराध-बोध और समाज द्वारा सृजित अपराध-बोध थोपे गए अपराध बोध होते हैं। वे एक ताज की तरह होते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया जाता है। तीसरा अपराध-बोध जिसका सृजन आप स्वयं करते हैं, सबसे बुरा होता है। जब आप अपने भीतर लोभ और भय से आधारित अपराध-बोध का अनुभव करते हैं, तो आप एक नए प्रकार के अपराध-बोध का सृजन करते हैं।
यदि आप अपना जीवन देखें तो आप देख पायेंगे कि कैसे हर पल आप स्वयं से संघर्ष करने के लिए कारण ढ़ंढ रहे हैं। आप बिना किसी संघर्ष के रह नहीं सकते, आप अपने लिए मूसीबतों का पैदा करना चाहते हैं क्योंकि यही तो आपको सिखाया गया है- कि सुख पाप है।
आपके मन की नदी में अपराध-बोध का पत्थर, प्रज्ञा के प्रवाह में बाधा है
आपका सृजन मुक्त रुप से प्रवाहित नदी के रूप में किया गया है। अपराध-बोध जल के मार्ग में चट्टानों की भांति है। समाज ने सक्ष्मता से खुशी को पाप का नाम दे दिया है। यही समस्या है। इसीलिए आपने ध्यान दिया होगा कि जब भी सब कुछ ठीक-ठाक और खुशी से हो रहा होता है, तब आपके भीतर छिपी बैठी अपराध-बोध की अनुभूति जागृत हो उठती है। समाज आपको सिखाता है कि खुश रहना और जीवन का आनंद उठाना गैर जिम्मेदाराना हो जाना है। इसीलिए आप को अपराध-बोध की अनुभूति होती है।
किन्तु क्या कभी जब आपको दुख और निराशा की अनुभूति होती है, तो क्या आपको अपराध-बोध की अनुभूति होती है? नहीं!
आपको सिखाया जाता है कि जीवन पीड़ा और सहिष्णूता की श्रृंखला है जिसमें खुशी कभी कभी ही अपने कदम रखती है।
इसी कारण जब कभी आप खुश होते हैं और मस्कराते हैं, तो लोग इसे स्वीकार नहीं करते। वे आपको जीवन-मुक्ति
तथा कथित वास्तविक - अपराध-बोध की स्थिति में लाने का भरसक प्रयास करते हैं।
जब आप समुद्र तट पर बैठे आनंद ले रहे होते हैं, नृत्य कर रहे होते हैं, विश्राम कर रहे होते हैं, तो आपने अनुभव किया होगा कि अचानक छुटे हुए काम को लेकर, समस्त जिम्मेदारियों को जिनको पूरा किया जाना शेष है, के विषय में आपको एक अपराध-बोध की अनुभूति होने लगती है।
अपराध-बोध का कोई आधार नहीं होता किन्तु यह आपके समस्त जीवन को नष्ट कर सकता है। यदि आप बिना अपराध-बोध के रह सकते हैं, तो आप हर क्षण का आनंद उठायेंगे बिना किसी खेद के। और आप अपनी समस्त जिम्मेदारियों का भी भली-भांति निर्वाह कर सकेंगे।
समस्या यह है कि आपका अस्तित्व आवाजों की भीड़ है, जो आपकी नहीं हैं। यह आपकी माँ की, आपके पिता की, आपके पड़ोसी की, आपके शिक्षक की और न जाने किस-किस की कुल आवाज है! यहाँ सभी आवाजे हैं। यदि केवल एक ही आवाज होती तब कोई समस्या ही नहीं होती। तब आपका मन एक नदी की तरह प्रवाहित होगा। किन्तु यहां ढेर सारी आवाज हैं जो आपको ढेर सारी बातें बता रही हैं और आपके मार्ग में अपराध-बोध की चट्टानों का सृजन कर रही हैं।
जब तक आप एक नदी की भांति प्रवाहित
| जब तक आप एक नदीकी भांति प्रवाहित होतेहैं, तब तक आप अपनेजीवन में असाधारणप्रज्ञा को अभिव्यक्तकरते हैं। | अपने जानन मेंअसाधारण प्रज्ञा कोअभिव्यक्त करते हैं।आप ऐसी ऊर्जा केसाथ जीते हैं जो हरमिनट उमड़ रही है।जिस प्रणल आणअपराध-बोध वनो |
| जन्म देते हैं, उसी क्षण |
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अखण्डता से मेरा क्या तात्पर्य है? अखण्डता से तात्पर्य वर्तमान पल में होने और सिर्फ एक ठोस व्यक्तित्व होने से है न कि बहत से खण्ड खण्ड व्यक्तित्वों से। यह मन के खेल के बीच में लाये सत्यता को देखना है। जब मन हस्तक्षेप करता है, तो द्वैत भी हस्तक्षेप करता है। केवल वर्तमान पल में प्रगाढ होकर, आप अखण्डता प्राप्त कर सकते है। जहां केवल आपका एक ही व्यक्तित्व होगा न कि दो, तीन या चार व्यक्तित्व आपसे संघर्ष कर रहे होंगे। जब मस्तिष्क अतीत और भविष्य में कुदता रहता है, तभी आप खण्डित व्यक्तित्व बन जाते हैं और उसमें अखण्डता स्थापित नहीं हो पाती। जब मस्तिष्क वर्तमान में होता है, तो स्वतः ही आप एकीकृत हो जाते हैं और अखण्डता स्थापित हो जाती है।
एक छोटी कहानी-
एक दिन, एक पुजारी ईश्वर के समक्ष घुटनों के बल बैठ गया और जोर से रोने लगा, 'मैं पापी हँ। हे ईश्वर! कुपया मुझ पर दया करो।' एक व्यक्ति जो शांतिपूर्वक
यदि आप गलतियां करते समय सजग रहें, तो आप कभी भी गलती नहीं करंगे।
प्रार्थना कर रहा था, यह देखकर प्रेरित हो गया और वह भी पुजारी के बगल में घुटनों के बल बैठ, प्रार्थना करने लगा। और एक अन्य व्यक्ति भी घुटने के बल बैठकर रोने लगा। ऐसा ही करने लगा। यह देखकर, पुजारी ने पहले व्यक्ति को कोहनी मारकर कहा. 'देखो
कौन सोचता है कि वह पापी है!'
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जीवन-मुक्ति
अपराध-बोध ही मूल पाप है
जब कभी भी कोई बाध्यकारी नियम होता है, आप सदा ही उसे तोड़ना चाहते हैं। उदाहरण के लिए, जब आप पुलिस वाले को नहीं देखते, तो निश्चय ही अपनी गाडी की गति तेज कर देते हैं और टैफिक लाइट की परवाह नहीं करते।
एक छोटी कहानी -
एक पुलिस वाले ने मुख्य मार्ग पर तेज गति से जाती गाड़ी को रोक लिया। जब उससे चालक लाइसेंस मांग गया तो उसने उत्तर दिया, 'किन्तु श्रीमानजी, मैं तो बस अपनी कार और पिछली कार के बीच सूरक्षित दूरी बनाए रखने का प्रयास कर रहा था।'
जब आप नियमों की मनोवृत्ति को समझे बिना उनका अंधानुकरण करते हैं, तो ऐसा ही होता है। आप उन्हें तोड़ने के लिए बहाने बनाने की प्रतीक्षा करते हैं।
ईमानदारी से उत्तर दीजिए- यदि कोई नियम न होते, जो कुछ आपने किया उसे जांचने वाला कोई न होता, तो क्या आप वैसे ही व्यक्ति होते जैसे कि आप आज हैं। क्या आप चीजों को वैसे ही कर रहे होते जैसे कि आप कर रहे हैं? यदि आपका उत्तर न है, तो स्पष्टरूप से जान लीजिए कि नियम आपके नियमबद्ध अंतकरण से आ रहे हैं, न कि आपकी सचेतना से। आपने नियमों की शुंखला को अंतर्निहित नहीं किया है या फिर आप नियम से सहमत नहीं हैं। यही कारण है कि आप चीजों को अपने स्वाभाविक तौर पर नहीं कर रहे हैं।
'न' का रोमांच
आप देख सकते हैं, कि जब आप बच्चों को कोई काम न करने के लिए कहते हैं, तो वे उसी काम को करने के लिए लालयित रहते हैं। जब तक आप यह नहीं कहते कि यह काम करना है या नहीं करना है, तबतक वह उस काम की परवाह भी नहीं करते। किन्तु जिस पल आप उन्हें कुछ न करने के लिए कहते हो, तो आप उन्हें वही काम करते हुए देख सकते हो।
एक छोटी कहानी -
एक व्यक्ति कहता है, 'किसी काम को करने के मेरे पास तीन तरीके हैं।' उसके मित्र ने पूछा, 'वे तीन तरीके कौन-से हैं?'
उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, 'पहला, उस काम को स्वयं करो। दूसरा, किसी दूसरे से यह काम करा लो। तीसरा, अपने बच्चों से कहो, कि यह काम मत करना। बस! यह काम हो जायेगा।'
वास्तव में, जो आप नहीं करने की सोच रहे हैं, उसे करने में एक रोमांच होता है। अधिकतर समय, यदि आपसे कुछ न, करने के लिए कहा जाता है, तो उस काम को करने की आपमें एक तत्काल इच्छा विकसित होती है। ऐसा करके आपको आनंद की अनुभूति होती है या संतुष्टि प्राप्त होती है। यही प्रत्येक मनुष्य की मूल प्रवृत्ति होती है।
एक छोटी कहानी-
एक बार एक दुकानदार अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए कठिन प्रयास कर रहा था। उसने बहुत से विकल्पों का इस्तेमाल किया - छूट देना, विज्ञापन कराना, बेहतर ग्राहक सेवा। किन्तु कुछ भी कारगर नहीं था। फिर एक दिन, उसने अपनी दुकान पर एक काला पर्दा टांग दिया और उसमें एक छोटा-सा सुराख कर दिया। सुराख के नीचे उसने एक बोर्ड लगा दिया जिस पर लिखा था, 'झांकना मना है।' उस दिन से उसने देखा कि उसकी दुकान पर भीड लग रही है। हर कोई उस सुराख के पीछे क्या है, इसे जानने के लिए उत्सूक था। उसकी दुकान की बिक्री स्वतः ही बढ़ गयी क्योंकि लोग अब उसकी दुकान पर विभिन्न प्रकार का पंसारी का सामान देख सकते थे।
जब आपसे कुछ न करने के लिए कहा जाता है, तो मनुष्य की मूल प्रवृत्ति उसी काम को करने की होती है। किशोरावस्था में जब आप अपने माता-पिता को किसी DehejeOe-yeesOe ner cetue heehe nw
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एक बार जब आप ऐसा कर लेते हैं, तो अपराध-बोध भी गायब हो जाता है। जितने समय तक आप बिना कोई कदम उठाए इस अपराध-बोध को छिपाए रहते हैं, उतने समय तक ही आप इससे पीडि़त रहते हैं। इस अपराध-बोध का यही एक साधारण तर्क है।
इस अपराध-बोध के घटित होने का एक अन्य संकेत यह है कि कुछ निश्चित परिस्थितियों में आपका अहम प्रकट हो रहा है और आप इस पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं। आपको अपने अहम की अनुभूति हो रही है, किन्तु आप इस पर नियंत्रण करने में असमर्थ हैं। तब आपको इस अपराध-बोध का सामना करना होता है। यह अपराध-बोध भी उपयोगी है क्योंकि यह आपके अपने अहम के प्रति गहन सजागता का चिन्ह है। यह अपराध-बोध भी आपको अपने अहम का बहिष्कार करके सचारू ढंग से अपने कार्य को करने की प्रेरणा प्रदान करता है।
अपराध-बोध शारीरिक बीमारी का कारण बन सकता है
अपराध-बोध निश्चित तौर पर प्रज्ञा के लिए घातक है। मेरे अनुसार, अपराध-बोध प्रज्ञा को मार डालता है। यह कभी भी आपको आपके जीवन में आगे नहीं बढ़ने देता।
एक बार मेरे भक्तों में से एक को रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर हो गया। बीस वर्षों से वह ट्यूमर से पीड़ित रही। वह मेरे पास आकर शिकायत करने लगी, 'क्रपया मेरी मदद करो, मेरा उपचार करो। मैं कितने वर्षों से इस ट्यूमर से पीड़ित हूँ। सर्जरी कराने के उपरांत यह फिर से हो गया।'
मैंने समस्या की मूल वजह का पता लगाने के लिए उससे धीमे से बात करनी शुरू की। मैंने उससे कुछ प्रश्न पूछे। और अंत में वह रो पड़ी। मैंने उससे पूछा, 'क्या
तम्हें अपनी यौन ऊर्जा से संबंधित कोई अपराध-बोध हैं?' उसने विस्तारपूर्वक धीमे स्वर में बताया।
उसने कहा कि जब वह छोटी थी तो उसके साथ शारीरिक तौर से अशोभनीय व्यवहार किया गया था। उसके एक निकट के रिश्तेदार ने वर्षों तक उसका शारीरिक शोषण किया। यह अपराध-बोध उसके साथ रह गया। उसने कहा, 'मैं अपने शरीर के उस अंग से घुणा करने लगी। मैं यह अनुभूति करने लगी कि वह अंग मेरे शरीर में विद्यमान नहीं होना चाहिए। मैंने यह महसूस किया कि शरीर का वो अंग मेरा नहीं है। उस व्यक्ति के प्रति मेरी घुणा मेरे स्वयं के शरीर की घुणा बन गई।'
उसकी घूणा अत्यंत गहन थी। मैं निरंतर उससे बात करता रहा। धीरे-धीरे उसने और भी काफी कुछ बतलाया। जब उसने अपने उस अपराध-बोध को बाहर निकाला तो वह अपराध-बोध से मुक्त हो गई। उसका मनोवैज्ञानिक तरीके से उपचार हो गया।
उस स्थान पर ध्यान करने के लिए मैंने उसे एक छोटी सी ध्यान तकनीक बतलायी। मैंने उससे कहा, 'उस व्यक्ति के प्रति अपने क्रोध को अभिव्यक्त करो। चिल्लाओ, रोओ, आंसू बहाओ, मारो। दरवाजे बंद कर लो, एक तकिया लो, कल्पना करो कि यह तकिया ही वह व्यक्ति है और इस पर अपना क्रोध दिखलाओ। और उसके बाद शांत होकर बैठ जाओ और यह अनुभव करो कि शरीर का वह अंग भी तुम्हारा ही है। शरीर के उस अंग के प्रति प्रेम दर्शाओ।'
आप आश्चर्यचकित होंगे कि केवल दस दिनों में उसका टयुमर विलुप्त हो गया। उसके फिर लक्षण नहीं दिखलाई पडे।
हमारी अधिकतर व्याधियां मनोवैज्ञानिक बाधाओं के कारण होती हैं जहां अपराध-बोध महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
अधिकतर समय, हमारा ऊर्जा प्रवाह अपराध-बोध के कारण अवरोधित हो जाता है। अगर आप गहनता से अपराध-बोध ही मूल पाप है
देखें, कि आप आगे बढ़ने में समर्थ नहीं होते हैं, आप निर्णय लेने में समर्थ नहीं होते हैं, जब आपको भय लगता है, तो इसके पीछे आपका कोई न कोई अपराध-बोध छिपकर बैठा होता है।
स्वीकृति - एक सुदर पर्याय
स्वीकृति एक संदर पर्याय है जो आपको अतीत और भविष्य की बीच की खींच-तान से मृक्ति दिलाता है। स्वीकृति के साथ आप सीधे वर्तमान के साथ जूड जाते हैं। पहली चीज आपको बाहरी संसार की समस्त घटनाओं और भीतरी संसार की समस्त घटनाओं को स्वीकार करना है। बाहरी और भीतरी संसार के साथ आपकी जो भी समस्याएं हैं, आपको उन्हें पूर्णतया के साथ स्वीकार करना है। उन सभी समस्याओं के सूची बनाओ और पूर्णता के साथ उन्हें स्वीकार करो।
समस्त अपराध-बोध. गलतियों और असफलताओं को स्वीकार करो। यदि आप स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, तो इस बात को भी स्वीकार करो कि आप स्वीकार नहीं कर सकते। तब आप तनावमुक्त हो जायेंगे, और अपराध-बोध आपके मन से निकल जायेगा।
केवल इस छोटे से प्रयोग को करो-
पुर्ण स्वीकृति के साथ तीन दिन तक तनावमुक्त रहो। यदि आप बिना भीतरी और बाहरी खींचतान के तीन दिन तक तनावमूक्त रह पाते हैं, तो क्या आपका धन चला जायेगा? निश्चिततौर पर नहीं! इसीलिए कोई परेशानी नहीं है। तीन दिन में आप अपना कुछ भी तो नहीं खोयेंगे। तो फिर आप कोशिश करके क्यों नहीं देखते? केवल तीन दिन के लिए, निष्ठापूर्वक, पुर्णतया के साथ, सौ प्रतिशत रूप से अपने जीवन के हर चीज को स्वीकार करो। यथावत स्वीकार कर लें।
अगर आप सौ प्रतिशत तक स्वीकार करने में समर्थ नहीं हैं, तो आप इस बात को स्वीकार करो कि आप सौ प्रतिशत तक स्वीकार करने में समर्थ नहीं हैं। यहां तक कि यह स्वीकृति, 'मैं स्वयं को भीतरी और बाहरी संसार में स्वीकार करने में समर्थ नहीं हुँ' ही आपको अतीत और भविष्य के मध्य की खींचतान से मुक्त कर देगी। जिस पल आप यह समझ लेते हैं, 'मैं इच्छाओं और भय की खींचतान से मुक्त होने में समर्थ नहीं हँ, मैं अपनी वास्तविकता को स्वीकार करने में असमर्थ हँ।' ठीक इसी समझ से आपका काम हो जायेगा।
यदि आप तीन दिन, बाहरी और भीतरी संसार से तनावमूक्त होकर वर्तमान पल में पहुंच सकते हैं,तो आपको एक झलक दिखलाई पड़ेगी - जीवन क्या है? वर्तमान पल में रहने का क्या अर्थ है? यदि आपके साथ ऐसा होता है तो आप ऐसे परम आनंद का अनुभव करेंगे ऐसी रिक्तता का अनुभव करेंगे जिसका आपने कभी भी अनुभव नहीं किया होगा।
आप अपने पिछले तीस वर्ष के दर्शन पर जी रहे होंगे। केवल तीन दिन के लिए बाहरी दुनिया में किसी को बदलने की कोशिश मत करो।
आप देखेंगे कि जब आप इतनी महान तकनीक के साथ प्रयोग करते हैं तो इससे आपके भीतर एक चमत्कार होता है। आपके भीतर परिवर्तन शुरू हो जाता है। यदि आप निश्चल बनने में समर्थ नहीं हैं, तो स्वीकार करें कि आप ऐसा नहीं कर सकते। केवल यही निष्ठा पर्याप्त है। आप अपने भीतर एक भिन्न रिक्त स्थल देखना प्रारंभ करेंगे।
मस्तिष्क से हृदय तक
नीचे बैठ जाएं और अपनी आंखें बंद कर लें। कूछ मिनटों के लिए धीमी और गहरी सांस लें। इसके साथ ही, यह विचार करें कि आपका सिर आपके हृदय, आपकी छाती पर दबाव डाल रहा है। अब पूर्णतया सिर विहीन हो जाएं। अब आपका सिर नहीं है। आप सिर विहीन हैं। यह अनुभव करो कि आप हृदय से सांस ले रहे हो। अनुभव करो कि आप हृदय से देख रहे हो। यह अनुभव
जीवन-मुक्ति
अपराध-बोध ही मुल पाप है
करो कि आप अपनी हृदय से सूंघ रहे हो। स्पष्ट रूप से यह अनुभव करो कि आप हृदय से सांस ले रहे हो। हृदय से सुनो, हृदय से देखो, और हृदय से महसूस करो।
खड़े हो जाओ। हृदय से सचेतना प्राप्त करो और अपनी गतिविधियों को जितना संभव हो उतना धीमी गति से करो। घुमो मत। सिर्फ अपने शरीर को चारों और धीरे-धीरे घुमाओ। याद रखो आप हृदय से गति कर रहे हो। आपका केन्द्र हृदय है, न कि सिर। सिर को भूल जाओ। हृदय से गति करो। यही याद रखो कि आप सिर विहीन हैं।
एक स्थान पर खड़े हो जाओ। अब, धीरे-धीरे गति बढ़ा दो, बहत ही धीरे-धीरे। याद रखो हृदय से गति करनी है, न कि सिर से। अपने सिर को भूल जाओ। आप सिर विहीन होकर आगे बढ़ रहे हैं।
(कुछ मिनट बाद)
जहां हो वहां बैठ जाओ। बस बिना सिर के। अपने हृदय के साथ बैठ जाओ। तनावमुक्त हो जाओ।
(कुछ मिनट बाद)
धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे अपनी आंखें खोल लें।
...
जीवन-मुक्ति
तुलना एवं ईर्ष्या
भय, इच्छा एवं अपराध बोध के मनोभाव व्यक्तिनिष्ठ होते हैं। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि इन मनोभावों के सजन के लिए आपको किसी अन्य व्यक्ति या पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती। कल्पना कीजिए कि आप, किसी ध्वनिनिरोधी कक्ष में बैठे हैं, आपकी आंखें बंद हैं, आप कुछ छू नहीं सकते, किसी चीज का स्वाद नहीं ले सकते हैं और किसी चीज को सूंघ भी नहीं सकते हैं। फिर भी आपको भय अथवा इच्छाओं के भावों की अनुभूति हो सकती है। किन्तु किसी व्यक्ति से अपनी तुलना करने और उससे ईर्ष्या करने के लिए, आपको उस व्यक्ति की उपस्थिति की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, ईर्ष्या एक वस्तुनिष्ठ मनोभाव है। इसे सक्रिय होने के लिए किसी व्यक्ति या वस्तु की आवश्यकता होती है।
एक छोटी कहानी -
एक शाम एक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ बगीचे में बेंच पर बैठा था। उन लोगों पर ध्यान दिए बगैर एक युवक और उसकी प्रेमिका उनके करीब आकर बैठ गए। वह युवक अपनी प्रेमिका से अत्यंत प्रेममय तरीके से बात करने लगा।
यह सुनकर, पत्नी ने अपने पति के कान में फूसफूसाया, 'मुझे लगता है कि वह उसे प्रस्ताव देने वाला है। आप खांसकर या कुछ और ऐसा कर उसे सावधान कर दो।'
पति ने उत्तर दिया, 'मैं उसे सतर्क क्यों करूं? मुझे किसी ने सतर्क किया था,क्या?'
ईर्या तुलना करने से शुरू होती है। हम सदा ही दूसरों से विभिन्न क्षेत्रों में तुलना करते हैं- रूप-रंग, धन, ज्ञान, नाम व यश आदि में। जब हम दूसरों से अपनी तुलना करते हैं, तो हमें यह अनुभूति होती है कि दूसरों के पास हमसे कुछ ज्यादा है, और हम ईर्ष्या में जकड जाते हैं।
तुलना बीज है और ईर्ष्या फल है!
तुलना क्यों?
हम दूसरों से अपनी तुलना क्यों करते हैं?
पहली बात, हम अपनी तुलना इसीलिए करते हैं क्योंकि हमने कभी अपने आपको समझा ही नहीं है। हम इस बात से अवगत ही नहीं हैं कि हम कौन हैं और हमारे पास क्या है।
दूसरी बात जन्म से ही समाज हमारे साथ ऐसी परिस्थितियां बना देता है कि हम दूसरों के आधार पर अपना मुल्यांकन करते हैं। बचपन से ही तलना शुरू हो जाती है। विद्यालय में, ग्रेडिंग व्यवस्था एक बालक में दुसरों के साथ तुलना और प्रतिस्पर्धा करने को प्रेरित Deehe meJe&ßes‰ nQ, efheâj efÛeblee keäÙeeW ?
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हम सब करने. एकत्रित करने और होने, इन तीनों धुरियों के इर्दगिर्द रहते है अनुभति होगी , इसीलिए लगातार सीढी पर ऊपर चढकर आप उनसे बेहतर होने का प्रयास करेंगे।
अब, जीवन के किसी पडाव पर आप कभी न खत्म होने वाले इस खेल की व्यर्थता
को समझेंगे। तब आप इस सीढ़ी से कूदना चाहेंगे। आप नीचे देखते हैं। अब आपको क्या दिखलाई देता है? अनेक लोग आपके नीचे हैं। अचानक, अनेक सारे लोगों को अपने नीचे पाकर आप खुश होने लगते हैं और आपको इस आशा की अनुभृति होती है कि आप इतने निकृष्ट नहीं हैं जितना कि आपने तब समझा था जब आपने अपने ऊपर के लोगों को देखा था।
यहीं से संघर्ष शुरू होता है। जब आप ऊपर देखते हैं, आपको दुख की अनुभूति होती है, किन्तु जब आप नीचे देखते हैं, तो आप खुश हो जाते हैं। यद्यपि, अब आपको सीढी पर ऊपर चढने में अपने जीवन को व्यतीत करने में व्यर्थता का एहसास होने लगता है, फिर भी आप नीचे नहीं कूद पाते, क्योंकि यदि आप सीढ़ी से नीचे कुद जायेंगे, तो आप अकेले रह जायेंगे। कोई भी आपके ऊपर या नीचे नहीं होगा।
करना, एकत्रित करना और होना -
हम सब करने, एकत्रित करने और होने, इन तीनों धूरियों के इर्द गिर्द रहते हैं। हमारे दुखों का मूल कारण यही है कि हम अपने होने का आनंद लिये बगैर मात्र एकत्रित करने के लिये कार्य करते हैं। मात्र करने से आप कभी भी पूरा संग्रह नहीं कर सकते है। हर बार आप कठिन परिश्रम करके, अपनी किसी इच्छा को परिपूर्ण कर लेते हो, किन्तु अचानक एक नयी इच्छा उत्पन्न हो जाती है। तुम्हारे पास इतना समय नहीं होता है कि इस इच्छा का आनंद ले कर इससे संतुष्ट हो सके।
प्रब्रद्ध, गुरू रमण महर्षि बड़ी ही सुंदरता से कहते हैं,मन ऐसा है कि एक राई के बीज को, जब तक कि वह पा नहीं लेता है एक विशाल पर्वत की भांति देखता है और जैसे ही उसे प्राप्त कर लेता है तब उसे एक पहाड भी राई की दाने जैसा क्ष्व्रद्र दिखाई पड़ता है। जैसे ही एक इच्छा परिपूर्ण होती है, तुरंत ही दूसरी आपको खींचने लगती है। आपके पास उस इच्छा का आनंद लेने और संतुष्ट होने का समय ही नहीं होता। आप सोचते हैं, 'मुझे बस! यह चीज और मिल जाए, फिर मैं ,जो मेरे पास है उसका आराम से आनंद ले सकूंगा।' स्पष्टरूप से जान लीजिए कि आपका मन कभी भी ऐसा नहीं होने देगा।
जीवन को वास्तविक तौर से जीने और इसका आनंद लेने का एक मात्र मार्ग यह है कि प्रत्येक कार्य को करते हुये ही आनंद लें। फिर स्वतः ही आपका करना, संग्रह होना और आपका स्वयं का होना, एकजूट होकर घटित होगा।
आप अनुठे हैं
प्रकृति के पास हम सभी के विकास का विशिष्ट तरीका है।
चीन के एक बांस के वृक्ष का ही उदाहरण लीजिए। जब यह अंकूरित होता है, तो प्रारम्भ के चार वर्ष यह अधिक विकास नहीं दिखाता। फिर पांचवें वर्ष के छह सप्ताह में ही बांस नब्बे फूट तक बढ़ जाता है। ऐसा नहीं है कि पिछले चार वर्षों में यह विकास नहीं कर रहा था। यद्यपि, विकास दिखलाई नहीं पडता था। जड़ें मजबूती प्राप्त कर रही थीं जिससे कि पौधे को विकास कर एक विशाल वृक्ष बनने में मदद मिल सके।
बांस के वृक्ष की ही भांति, आपको मापने के लिए कोई और पैमाना नहीं है सिवाय आपके। यदि आप
जीवन-मुक्ति
रमण महर्षि - प्रबुद्ध गुरू जो कि तिरूआमलई दक्षिण भारत से है, उन्होंने स्वयं को बताया और स्वयं से पूछिये "मैं कौन हूँ" के द्वारा स्वयं को महसूस करना सिखाया है।
समस्त ऊर्जा स्वयं को स्वयं देखने तथा अपने से ही प्रतिस्पर्धा करने में लगाते हैं, तो आप दिन-रात उच्चति कर सकते हैं।
सर्वप्रथम, यह जान लीजिए कि ईश्वर एक कलाकार है न कि कोई इंजीनियर। यदि वह इंजीनियर होता, तो उसने एक पूर्ण पुरूष और एक पूर्ण महिला का सुजन किया होता और फिर इस ढांचे से करोड़ों नम्मूने तैयार कर लेता। किन्तु ऐसा नहीं है! ईश्वर ने हम सभी को अनूठा बनाया है।
कोई फर्क नहीं पडता कि आप गुलाब हैं, कुमुदिनी हैं या फिर जंगली पूष्य। महत्वपूर्ण यह है कि जंगली पूष्य को भी अपनी वास्तविक क्षमता का उसी प्रकार एहसास होना चाहिए जैसा कि गुलाब को अपनी अंतर्निहित क्षमता का एहसास होता है। अपने आपको पहचानने की आपकी अनूठी क्षमता वह खुशबू है जो विकीर्ण होती है और बिना प्रयास किए ही, आपके चारों ओर लोगों को छू लेती है।
चाहें यह सौंदर्य हो या ज्ञान, आप अनूठे हैं। आप दूसरों से अपनी तुलना तभी करते हैं, जब आप अपने अनूठेपन को सम्मान नहीं देते। हो सकता है कि आपका पसंदीदा फिल्मी कलाकार या मॉडल बहुत सुंदर हो, किन्तु क्या उसका शरीर आपको एक गिलास पानी पिला सकता है? नहीं! आपका अपना सर्वश्रेष्ठ मित्र, आपका शरीर ही आपको एक गिलास पानी पिला सकता है, आनंद दे सकता है। इसे स्वीकार करो, इसका स्वागत करो।
समकक्षों का दबाव - ईर्ष्या की छड़ी
प्राचीन धर्मग्रंथों में एक बहुत ही सुंदर रचना है जो बताती है कि माया की शक्ति, (वह ऊर्जा जो ब्रह्माण्ड को चलाती है,) आपसे वह सब कराने के लिए जो वह चाहती है, ईर्ष्या का उपयोग एक छडी के रूप में करती
गली में मदारी बंदरों को लेकर घूमते हैं। उनके पास एक छोटी छडी होती है। एक बार जब वे छडी उठा लेते हैं, तो
अहम खेल है। दरअसल, आपको विकास करने की बिल्कुल भी
आवश्यकता नहीं है। बंदर वही करता है, जो उसे कहा जाता हैं। यदि वे संकेत से बंदर को कुछ कहते हैं
तो वह नहीं सुनता। यद्यपि वह जानता है कि मदारी किसी भी समय छडी उठा सकता है, किन्तु जबतक कि मदारी छड़ी नहीं उठा लेता, बंदर उसका कहना नहीं मानता। यदि वह छडी उठाकर, बंदर से सीधे चलने के लिए कहता है, तो वह वैसा ही करता है। यदि वह बंदर से तीन बार उछलने के लिए कहता है, तो वह तीन बार उछलता है।
मदारी छडी का इस्तेमाल उसी तरह करते हैं, जिस तरह रिंगमास्टर सर्कस में इस्तेमाल करता है। इसी प्रकार, माया की शक्ति शक्ति आपसे वह सब कराने के लिए जो वह चाहती है, समकक्षों का दबाव तथा ईर्ष्या का उपयोग एक छड़ी की तरह करती है। समझें दबाव एक बड़ा अहम खेल है। दरअसल, आपको विकास करने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है। हमारी समस्त आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संसार में पर्याप्त भोजन, शरण, चिकित्सकीय देखभाल और कपड़े मौजूद हैं। प्रतिस्पर्धा करने की कोई आवश्यकता नहीं है!
ईर्या पर विजय कैसे प्राप्त करें
ईर्या अनेक नकारात्मक मनोभावों जैसे क्रोध, लोभ, अधिकार और निराशा से जुड़ी है। जब हम ईर्ष्या के इस चक्र को तोड़ देंगे, तो ये समस्त मनोभाव समाप्त हो जायेंगे।
जीवन-मुक्ति
समझे दबाव एक बड़ा भारत में. गली-
बुद्ध - प्रबुद्ध गुरू जिन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना किया।
1- साक्षी होना
र्डर्घ्या से पलायन कर या ईर्ष्या की वस्तु से घूणा करके ईर्या को जीत जीत पाना संभव नहीं है। आपको बस यह करना है कि जब कभी भी ईर्ष्या की अनुभूति जाग्रत हो, अपने आपको पूर्णतया सजग रखना है। फिर आप विस्मित होंगे कि यह स्वतः ही विलुप्त हो गई है।
प्रबृद्ध, गुरू बुद्ध कहते हैं, 'इन ईर्ष्या की जड़ों को नष्ट कर दो और कभी न समाप्त होने वाले असीम आनंद का अनुभव लो।'
बस सजग हो जाओ और ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, और तुलना का नाश कर दो। जिसने आपकी अपनी स्वाभाविक प्रकृति जोकि परम आनंद है, को आपसे छीन लिया है। इन नकारात्मक मनोभावों की ध्रृंधली प्रकृति को उजागर करने के लिए सजगता रूपी प्रकाश को जला दो। वरना, आप चूहा दौड़ में ही फंसे रह जायेंगे। मैं सदा लोगों से कहता हूँ, आप भले ही चूहा दौड़ जीत लें, किन्तु आप रहते चूहा ही हैं!
समझें ईर्ष्या से मुक्त होने का मार्ग यह नहीं है कि हम उसे दबायें या इसके अस्तित्व को नकार दें। इसे अभिव्यक्त करना या प्रोत्साहित करना भी कोई विकल्प नहीं है क्योंकि तब आप सजगता के साथ ईर्ष्या का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं।
बस देखों कि ईर्ष्या कैसे आपके भीतर जन्म लेती है, कैसे ईर्ष्या के विषय के प्रति यह घुणा विकसित करती है, आपके भीतर किस प्रकार यह बैचेनी और निराशा का सजन करती है और आपका समस्त सुख और चैन छीन लेती है।
ईर्या या ईर्ष्या के विषय से घुणा करने की अपेक्षा आपको इससे सजग होना है। बस देखो, जैसे कि आपको इसके साथ कुछ नहीं करना है। वैज्ञानिक तरीके से इसे देखो। वैज्ञानिक तरीके से मेरा क्या तात्पर्य है?
वैज्ञानिक अभिवृत्ति - कोई पूर्वाग्रह नहीं
जब कोई वैज्ञानिक प्रयोग करता है, तो वह बिना कोई पूर्व निर्णय लिए, बिना किसी पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष के सरलता से प्रयोग करता है। यदि उसके मन में पहले से ही कोई निष्कर्ष होगा, तो इसका अर्थ है कि वह वैज्ञानिक नहीं है क्योंकि उसका निष्कर्ष प्रयोग को प्रभावित कर सकता है।
अब, आप अपने भीतरी संसार की प्रयोगशाला के वैज्ञानिक हैं। अपने भीतरी संसार के वैज्ञानिक बनो और अपने मन को प्रयोगशाला बनाओ। बिना किसी पूर्वाग्रह के बस सजग रहो और साक्षी रहो।
मनोभाव की यह कहकर निंदा मत करो कि यह बुरा है,यही तो आपको सिखाया गया है। यह आपका अनुभव नहीं बना है। यदि यह आपका अनुभव है कि ईर्ष्या एक नकारात्मक मनोभाव है, तो आप स्वतः ही इसे त्याग देंगे। यह आपका अपना अनुभव नहीं बना है। यह सिर्फ आपने दूसरों से ले लिया है। जब आपको यह प्रायोगिक समझ आ जाए कि ईर्ष्या और तुलना नकारात्मक हैं, यह आपके जीवन का अंग नहीं बनेगा।
ईर्या के विषय की निंदा मत करो। विषय ने बाहर से मनोभाव को सुजित नहीं किया है। ईर्घ्या आपके भीतर घटित हो रही है।
एक बार जब आप सजगता के साथ अपनी ईर्ष्या को देखने लगते हैं, तो आप जान जायेंगे कि इसके अस्तित्व का कोई आधार नहीं है। जब ऐसा होता है, ईर्ष्या स्वतः ही छूट जाती है। आपको इसे छोड़ना नहीं पडता।
एक छोटी कहानी -
एक बार एक महिला ने अपना चित्र बनाने के लिए एक पेशेवर कलाकार से कहा। कलाकार ने ध्यानपूर्वक एक विशाल चित्र बनाया। उस चित्र को महिला को देते हुए, कलाकार ने कहा, 'आपको यह कैसा लग रहा है?'
महिला ने चित्र देखा और कहा, 'हाँ, बहत अच्छा है। किन्तु क्या आप इसमें कुछ चीजें जोड सकते हैं? मैं चाहती हूँ कि आप एक चमकता हुआ हीरे का हार, एक सोने की घडी और कडा, पन्ना जडित कान की बाली और हाथों में संदर मोती की अंगुठी शामिल कर दो।' कलाकार बहुत विस्मित हुआ और उसने कहा. 'किन्त महोदया, चित्र तो काफी साधारण और संदर दिखलाई पड़ता है। आप ये सब आभुषण क्यों शामिल करवाना चाहती हैं?'
महिला ने उत्तर दिया, 'मैं चाहती हँ कि मेरी धनी पडोसन यह चित्र देखे । वह यह कल्पना करें कि ये समस्त आभूषण मेरे पास हैं और ईर्ष्या से पागल हो जाए।'
यदि आप सजगता रूपी अग्निशामक यंत्र से अपनी ईर्या की अग्नि पर नियंत्रण नहीं करोगे, तो यह आपको भस्म कर देगी।
2- अनंत प्रेम
ईर्या आपको अपनी वास्तविक प्रकृति प्रेम और आनंद का अनुभव नहीं लेने देती। यह जीवन के बारे में आपकी स्वयं की गलत समझ से उत्पन्न होती है। आप अपनी गलत समझ से प्रेम को भी कोई बाहरी चीज समझते है और जिसे आपको बाहर से प्राप्त करना है। न केवल इतना बल्कि, आप यह भी मानते हैं कि प्रेम की मात्रा होती है जिसको बांटा जा सकता है। इसी कारण आप डरते हैं कि यदि आप प्रेम को बांटेगें। तो आपका प्रेम कम हो जाएगा।
समझिये प्रेम आपके भीतर एक गुणवत्ता है। यह एक सीमित मात्रा में नहीं होता। प्रेम आपके भीतर कभी न समाप्त होने वाला प्रवाह है। आपके सिवाय कोई भी इसे नहीं रोक सकता। क्योंकि यह आपका स्वभाव है।
जब इस प्रेम का अनवरत प्रवाह प्रारम्भ हो जाता तब ईर्ष्या एवं अधिकार की भावना का अस्तित्व ही नहीं जीवन-मुक्ति
रहता।यदि आप स्वयं को वैसे ही स्वीकार कर लेते हैं जैसे कि आप हैं, तो आप दसरों को भी वैसा ही स्वीकार कर लेते हैं, जैसे कि वे हैं।
...
गंभीरता बनाम लगनशीलता
हम अपने बारे में जैसा सोचते हैं उसी से हमारी अन्य लोगों के साथ तुलना शुरू होती है। जब हम अपने अनूठेपन को समझ लेते हैं, तो हमारी ईर्ष्या विलुप्त हो जाती है। फिर हम अन्य समस्या का सृजन कर सकते हैं। हम स्वयं को इतना विशेष मानते हैं कि हम अपने आपको गंभीरता से लेना शुरू कर देते हैं। अपने बारे में आवश्यकता से अधिक गम्भीर हो जाते हैं।
गंभीरता क्या है?
गंभीरता और कुछ नहीं, सिवाय इसके कि अन्य सभी चीजों की कीमत पर किसी चीज को अनावश्यक अधिक महत्व देना। जब हम यह नहीं देख पाते कि पूरा जीवन हर मिनट उदघाटित होने वाला नाटक है, तब यह गंभीरता उत्पन्न्न होती है। यह जीवन से अत्याधिक अपेक्षा रखने का परिणाम है।
एक छोटी कहानी-
दो लड़के समुद्र के किनारे रेत का महल बना रहे थे। अचानक वे आपस में लड़ने लगे और एक लड़के ने लात मारकर दसरे लडके का रेत का महल तोड दिया।
दुसरा लडका अपनी इस गंभीर समस्या की शिकायत लेकर राजा के पास गया। राजा उसकी बात सुनकर हंसने लगा कि वह अपने रेत के महल के लिए इतना परेशान है। किन्तु राजा का सलाहकार, जो जेन गुरू था, वह राजा पर हंसने लगा।
उसने पूछा, 'जब आप युद्ध कर सकते हैं और पत्थरों के महलों के लिए अपनी रात का चैन खराब कर सकते हैं. तो भला यह लडका अपने रेत के महल के लिए बैचेन क्यों नहीं हो सकता।'
हमारी सारी गंभीरता रेत के महल की ही भांति है। अंतर सिर्फ इतना है कि एक छोटे बालक को अपना रेत का महल बहमुल्य दिखलाई पड़ता है और हमारे लिए अपने पत्थर के महल बहुमूल्य होते हैं। जबकि इसके पीछे की गंभीरता एक सी ही होती है। वस्तु भिज्ञ हो सकती हैं किन्तु गंभीरता एक सी ही है। इसीलिए, जब बच्चे अपने रेत के महलों पर झगड़ा करें, तो हंसो मतो।
गंभीरता आपके जीवन के खूलेपन और स्वतंत्रता को बंद कर देती है। यह आपको ऊबाऊ और मृत बना देती है। यह आपकी सोच को नियंत्रित कर देती है। यह आपको आपके स्निश्चित तौर-तरीकों से जिनका आप सदा उपयोग करते हैं, चिपकाए रखती है।
एक छोटी कहानी -
एक जेन मठ में एक बार एक प्रतियोगिता आयोजित की गई। प्रत्येक शिष्य को अपना बगीचा सर्वश्रेष्ठ बनाना था। एक शिष्य अत्यंत ही गंभीर प्रवृत्ति का था। उसने इस प्रतियोगिता को अत्यंत गंभीरता से लिया। वह
आप वह नहीं हैं जो आप सोचते हैं
लगन, किसी भी कार्य को बिना परिणाम की चिंता किए, अपना सर्वश्रेष्ठ देकर करना हैं।
अपने बगीचे की सदा साफ-सफाई करता और उसे स्वच्छ रखता। सभी घास एक बराबर ऊंचाई पर उगी थीं। सभी झाडियां कांट-छांट कर संवार दी गई थीं। उसे पुरा विश्वास था कि प्रथम परस्कार उसे ही मिलेगा।
प्रतियोगिता के दिन गुरू सभी बगीचों में गए। फिर वापिस आकर उन्होंने बगीचों का वर्ग निर्धारण किया। इस शिष्य के बगीचे को सबसे नीचे के वर्ग में रखा गया। हर कोई अचम्भित था। वह शिष्य अपने आपको रोक न सका और उसने पूछा, 'गुरू जी, मेरे बगीचे में क्या खराबी है? आपने मुझे निम्नतम श्रेणी क्यों प्रदान की?'
गुरू ने उसे देखा और पूछा, 'समस्त मृत और सूखी पत्तियां कहां हैं? इस तरह के रखरखाव से कोई भी बगीचा अधिक समय तक जीवंत नहीं रह सकता! यह मत है!'
गंभीरता सहजता को मार देती है। गंभीरता रचनात्मकता का नाश कर देती है।
विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब कभी भी आप किसी कार्य को सहजता और धैर्य से करते हैं, तो आपके विचार करने और निर्णय लेने की क्षमता स्वतः ही बेहतर बन जाती है। किन्तु जब वही कार्य गंभीरता से करते हैं, तो इससे आपका मन सुस्त हो जाता है। जब आप अत्यधिक गंभीरता से कोई कार्य करते हैं, और कार्य के परिणाम को लेकर काफी चिंतित होते हैं, तो आप अपने आपको उच्चतम स्तर पर कार्य संपादित करने से रोकते हैं। निस्संदेह, आपको योजनाएं बनाने की आवश्यकता होती है। और आपको आगे के लिए सोचना होता है। किन्तु यह सब गंभीरता से नहीं वरन् लगन से करें। गंभीरता लगन के समान नहीं है। लगन किसी कार्य को उत्साह और युवापन से करने पर केन्द्रित होती है। लगन किसी भी कार्य को बिना परिणाम की चिंता किए, अपना सर्वश्रेष्ठ देकर करना हैं। जब आप गंभीर होते हैं, आप आनंद नहीं ले पाते। आप हंसते नहीं हैं। जब आप गंभीर होते हैं, तो भला हंस कैसे सकते हैं।
सर्वश्रेष्ठता
सर्वश्रेष्ठता सदा आपके मन से आती है। यह आपका लक्ष्य बन जाती है। आप इसे लक्ष्य मानकर कार्य करते हैं। जब आप इसे लक्ष्य मानकर कार्य करते हैं, तो यह साधारण और मृत हो जाती है, किन्तु जब आप और अपने हृदय स्थापित हो जाते है, तो यह गहन अनुभव बन जाती है। परिणाम सुंदर बन जाता है और आपको आनंद प्रदान करता है। फिर, जो कुछ भी आप करते हैं, आप अस्तित्व की लय में होकर करते हैं। जो कुछ भी करें उसमें पूरे हृदय को उड़ेल दे। तभी यह पूर्णता होगी। फिर आपको सर्वश्रेष्ठता की चिंता नहीं रह जाती।
सर्वश्रेष्ठता कभी भी आपको आनंद प्रदान नहीं करती। यह सिर्फ आपके अहम को संतुष्ट करती है। चाहें अंत में आपको संतुष्टि की अनुभूति क्यों न हो, किन्तु यह आपके अहम की ही पूर्णता होती है, कभी भी भी आपके अस्तित्व या होने की पूर्णता नहीं।
सुस्पष्ट रूप से जान लीजिए, सर्वश्रेष्ठतावादी सदा सबसे बड़े अहमवादी होते हैं। वह होने को गंवा देते हैं। जब आप किसी भी चीज में गहनता से उतर जाते हैं, तो पर्णता संभव है। सर्वश्रेष्ठता कभी भी संभव नहीं हो सकती क्योंकि यह आपके मन में होती है और यही नहीं सर्वश्रेष्ठता की परिभाषा भी बदलती रहती है।
जीवन आपके तर्क से परे है
अधिकतर लोगों का यह विश्वास है कि जीवन उन घटनाओं से भरा है जो हमारे तर्क के नियंत्रण में हैं। किन्तु जीवन बारंबार आपको इसी सत्य से अवगत कराता है कि वह आपके तर्क से परे है। आप इस तथ्य
Part 3: Living Enlightenment (Gospel of THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM) - Abridged Edition_Hindi_part_3.md
आप वह नहीं हैं जो आप सोचते हैं
से विशेष कर तब अवगत होते हैं जब आपके किसी करीबी रिश्तेदार या प्रिय मित्र की मृत्यू हो जाती है या आपके जीवन में कुछ अप्रत्याशित घटित होता है। जब आपकी नौकरी छट जाती है, तो अचानक आप देखते हैं कि जीवन आपके नियंत्रण में नहीं है। अचानक आप इस वास्तविकता से परिचित होते हैं कि जीवन आपके तर्क से परे है। तब आप सत्य की तलाश शुरू कर देते हैं।
विशेष तौर पर यदि आप शहर में रहते हैं, तो आपकी दिनचर्या निर्धारित होती है। प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक आपको ठीक-ठीक पता होता है कि आपको क्या-क्या करना है। आप जानते हैं कि आप कहां जायेंगे, क्या करेंगे, क्या नहीं करेंगे, कब और क्या खायेंगे। व्यावहारिक तौर पर, आपका अहम आपको यह विचार देता है, आपका तर्क आपको यह एहसास कराता है कि आपका जीवन आपके तर्क के नियंत्रण में है। इसीलिए जब भी कोई घटना आपके तर्क से परे घटती है आप पुरी तरह से कंप जाते हैं, आप उसे नियंत्रण में नहीं रख पाते है। और संभाल नहीं पाते है। आप नहीं जान पाते कि क्या करें। या तो आप निराशा में इब जाते हैं या फिर पीडा सहते हैं।
एक परम सत्य, महत्वपूर्ण रहस्य को समझिए। कभी भी यह न समझें कि घटनायें आपकी वजह से सरलता से सम्पन्न हो रही हैं। ये आपके बावजुद भी सरलता से सम्पन्न हो रही हैं। यही महत्वपूर्ण रहस्यों में से एक है। जबतक आप यही समझते रहते हैं कि चीजें आपकी वजह से सरलता से संपन्न हो रही हैं, तबतक आप निरंतर अहम से पीड़ित रहते हैं।
अहम क्या है?
उपनिषदों के अनुसार जबतक आप विचार करते हैं कि जीवन का एक उद्देश्य है और आप उस उद्देश्य के पीछे भागते रहते हैं, तबतक आप अहमवादी हैं। जब आप यह जानते है कि जीवन उद्देश्य रहित है इसलिये इसमें सौंदर्य है, आपका अहम लुप्त हो चुका होता है। गुरु के
द्वारा ही जीवन वेन अहम से जीवन के उद्देश्य रहित होने की वास्तविक सत्य को नहीं समझ मिलती है। जाना जा सकता जिसे आप मुल्यावान समझ रहे थे वह अब वास्तव में सत्य और
मुल्यवान नहीं है। अहमपूर्ण व्यक्ति उद्देश्य को तलाशता है और वास्तविकता को गंवा देता है।
मृत्यु स्पष्ट तौर से दर्शाती है कि जिस मन से आपने जीवन जीया है उसका कोई अस्तित्व नहीं है। जब आपको जीवन की उद्देश्यहीनता का अहसास हो जाता है, तो आपमें एक नई सचेतना पुष्पित होने लगती है। जिस क्षण आपको अहसास हो जाता है कि प्राप्त करने के लिए कुछ नहीं है, कि वह हीरा जिसकी आप रक्षा कर रहे हो, वह हीरा नहीं पत्थर है, और आपके जीवन की समस्त भौतिक वस्तुएं खिलौना मात्र हैं, तो आप जीवन की उद्देश्यहीनता को समझ लेते हैं।
अहम से जीवन के वास्तविक सत्य को नहीं जाना जा सकता। जब आप अहम त्याग देते हैं, तो आप जीवन के दिव्य उद्देश्य को जान जाते हैं, उस लीला को, दिव्य नाटक को जान जाते हैं और उसका आनंद लेते हैं। यदि आप यह सोचते रहेंगे कि जीवन का उद्देश्य है, और कुछ पाने की प्रतीक्षा करते रहेंगे, तो आप स्वयं जीवन को ही गंवा देंगे।
जीवन स्वयं ही मार्ग व लक्ष्य है। जब आपके पास लक्ष्य होता है, तो आप उसके पीछे भागते हैं। आपके पैर धरती पर नहीं होते, और आप अस्तित्व या प्रकृति के सौंदर्य को गंवा देते हैं। जब आप लक्ष्य को त्याग देते हैं, तो समस्त ध्यान मार्ग पर होता है।
जब आप जीवन की उद्देश्यहीनता को समझ लेते हैं, तो आप जीने का अर्थ समझ जाते हैं। उससे पहले तक आप मात्र 'सजीव मृत' प्राणी ही होते हैं। अस्पताल के बिस्तर पर कोमा में पड़ा व्यक्ति और एक सामान्य व्यक्ति जिसने सत्य को नहीं जाना है, दोनों ही बिना उचित
आप वह नहीं हैं जो आप सोचते हैं
जब आप जीवन की उद्देश्यहीनता को समझ लेते हैं, तो आप जीने का अर्थ समझ जाते हैं।
सचेतना के जीवन जीते हैं। गरू ही आपको यह वास्तविक ज्ञान कराता है। जीने का अर्थ है जीवन का या अस्तित्व का अर्थ।
लक्ष्य त्याग दो अौर जीवन का आनंद लो। इस शिक्षा पर बारंबार
ध्यान एकत्रित करो। आपके भीतर सत्य अवतरित होगा और नित्यानंद अवस्था आपके भीतर पृष्पित होगी, वह अवस्था जिसका जीवन में व्यापक अर्थ है।
न' की ठोस अनुभूति
अधिकांश समय आपने देखा होगा कि जब कभी भी आपसे कोई कुछ कहता है, तो आपकी भीतरी प्रतिक्रिया एक निश्चित प्रतिरोध एक 'न' होती है। जब आप 'न' कहते हैं, तो यह अहम-की तुप्ति होती है। आप अपने भीतर ठोसपन और दढ़ता का अहसास करते हैं। जब आप 'हां' कहते हैं, तो आप तरलता और असूरक्षा का एहसास करते हैं। आपका अहम दब जाने की अनुभूति करता है, जोकि असहय है, इसीलिए आप 'न' कहते हैं।
इसीलिए जब कभी भी आप घर पर, विद्यालय में, कार्यस्थल पर या कार चलाते समय नियमों को तोडते हैं, तो आपको खुशी की अनुभूति होती है। जब आप नियमों को 'न' कहते हैं, तो आपके अहम को प्रोत्साहन मिलता है। आप बच्चों में ऐसा अक्सर देख सकते हैं। जब कभी भी आप उनसे कहते हैं, कि इन चीजों को आपको जानने की आवश्यकता नहीं है, तभी वे उन बातों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।
साधारण बनाम असाधारण
जब कभी भी आप अपने अहम के साथ रहने की कोशिश करते हैं, तब आप अपने और दूसरों के जीवन को
दयनीय बना देते हैं। अधिकतर समय जब आप अपने जीवन में परेशानियों से जुझते हैं, तो उनके लिए आप स्वयं ही जिम्मेदार होते हैं। दूसरे लोग आपके लिए परेशानियों का सृजन नहीं करते। इन परेशानियों से आप कोई लाभ भी नहीं प्राप्त करते, किन्तु बस अपने अहम को सिद्ध करने के लिए, आप उनका सजन करते हैं।
एक छोटी कहानी -
एक प्रबुद्ध गुरू, सुजुकी जापान में रहते थे। जब उनके गुरू का स्वर्गवास हुआ, तो वह जोर-जोर से रोने लगे। एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, 'आप' एक ज्ञानी महात्मा हैं। आप अपने गरू के देहांत पर इतना दुख क्यों व्यक्त कर रहे हैं?' सुजुकी ने उत्तर दिया, 'मेरे गुरू इस धरती गुह पर सर्वाधिक असाधारण व्यक्ति थे' वह व्यक्ति अत्यंत अचम्भित हुआ और उसने उनसे पूछा, 'वे किस प्रकार असाधारण थे?' सूजूकी ने उत्तर दिया, 'मैंने कभी भी इतने असाधारण व्यक्ति को नहीं देखा जो यह समझता था कि वह सर्वाधिक साधारण व्यक्ति है।'
साधारण जीवन में, प्रत्येक औसत व्यक्ति यह समझता है कि वह असाधारण व्यक्ति है। जब आपको यह अहसास होता है कि आपने अधिकतम पीड़ाओं को झेला है, तो आपके अहम को खुशी होती है कि आप एक कठिन जीवन को संभाले हुए हैं। जब आपका शत्रु बड़ा होता है, तो आपको बड़ा होने का अहसास होता है। जब आपका शत्रु छोटा होता है, आपको छोटा होने का अहसास होता है।
उसी प्रकार जब आपकी पीडाएं बडी होती हैं, तो आपको अच्छा होने का अहसास होता है। आपके अहम को संतुष्टि प्राप्त होती है। आप जीवन को पीड़ा की मात्रा से मापते हैं। अनजाने में, आप दुसरों को और अपने आपको प्रताड़ित करते हैं। सुजुकी के गुरू असाधारण थे क्योंकि उन्होंने यह समझा था कि वह अत्यंत साधारण हैं। जबकि इस संसार में हर व्यक्ति यही सोचता है कि वह असाधारण है।
देंह कैंइऐ छुंए के री अनुभूति हमैशा डर से जुडी रहती है
यदि आपके आंतरिक डर हाेै तो आपके डर का कारण ढूँढो क्योकि डर में मन हमेशां अस्तित्व और जुड रहता हैं जुडने से आप अपने सीमाओ से भागते है इस कारण आप परमआनंद को नही छु सकते कृपया कभी भी ऐसा न सोचे की आप परमआनंद को छु सकते है नही, वास्तवीकता यह है की आप सुख और परम आनंद से डरते है जब कभी भी आपको शांतमय, चिंता मुक्त होने की अनुभूति हाे तो कृपया स्वंय कि जाँच करे जब सोचमे के लीऐ कुंछ नही होता ताे आपको ऐसा अनुभव होता है की आपको डर है जब तक आपके भीतर कुंछ डर नही रहता हैं डर हमैशां होता हैं
आपके मन का डर तब अस्तित्व हाेता है जब यह पीडा से शांत हाेता है जब तक आपकी पर्याप्त पीडा नही होता आपके स्वंय को यां अपने पहचान का अनुभव नही होगा यदि आप गहराई से देखेगें तो पाएगें की आप अपने आप को अकेला महसुस करते है ईसलीये आप स्वंय पर विश्वास करते है क्याेंकी ईसी स्वभाव से डर से नकारात्मक चिजाें काे बाहर रखते है मन हमेशां सोचता रहता है यह अधिक से अधिक विचारो से पीडा से पीडीत, जुड और डर का कारण है। सीमा से परे हाेना ही आनंद का गुणवता है जब आप आनंदमय हाेते है आप किसी सीमा में नही हाेते जब आपके काेई सीमा नही हाेती आनंद शांति और तृप्ती का अनुभव हाेता हैं
पीडा डर का मार्ग प्रशस्त करती है
बीना आपकी पीडा डर का अस्तित्व नही हाे सकता पीडा ही डर कि जड है। आपको यह महत्वपूर्ण बात पता हाेना चाहीऐ। हम हमेेेेशं साेेेेेचते है कि डर से पीडा हाेती हैं।
यादि आप यह परिक्षण करना चाहते हैं कि आप औसतन हाे तो इस प्रयोग को करे यदि आपको असाधारण होने कि अनभुती हाे तो समझ लीजीऐ कि आप औसतन हैं यादि आपको साधारण होने कि अनभुती हाे ताे आप असाधारण है।
उचित मुखौटो का उपयाेग
आप सभी अपने दैनंदिन जीवन में विभिन भुमिकाए निभते है और विभिन मुखौटे पहनते है आप अपनी माँ के सामने एक मुखौटै में उपस्थीत हाेते हैं तो अपने पिता के सामने किसी दुसरे मुखौटे में, अपने बॉस के सामने किसी अन्य मुखौटे में और ऐसा ही चलता रहता है जब तक आप उचित व्यक्ती के साथ उचित मुखौटे का प्रयाेग करते है तब तक सब कुंछ "ठीक हैं" जिस पल आप किसी व्यक्ती के साथ गलत मुखौटे का इस्तेमाल करते हैं तो जान लीजीऐ कि आपके डरने हस्तेक्षैप कर दिया है
आप बस निरंतरता से मुखौटे बदलते रहीऐ और शान का आनंद लीजीऐ तब आप दर्षक बन जाएगें। आप ऐसा तभी कर सकते है जब आप यह जानते हैं कि आप मुखौटो से परे कुंछ हैं वरना, आपका मुखौटा आपको लूटेगा और आप जीवन के समस्त आकर्षण को खो देगें। जब आप यह जान लेते है कि आप ही
| आपके मन का डर तब | मुखौटे का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो आपके इच्छाए कम हो जाती हैं। |
|---|---|
| अस्तित्व हाेता है जब यह पीडा से शांत होता है | जिस तरह बडे होने पर आप अपने खिलौनो को त्याग देते हैं उसी |
| देखते हैं, तो आपको उनकी | तरह जब आप इन मुखौटों को बुद्धि मता से इच्छा नहीं रह जाती और |
| आवश्यकता पडने पर ही आप उनका सरलता से उपयोग करते है। |
नहीं! पीडा से अहम प्रोत्साहित होता है। एक महत्वपूर्ण बात और जान लो कि जितनी ही कम आपकी पीड़ा होगी उतना ही कम आपका अहम होगा। आपको यह अनुभति होती है कि आप बहत छोटे हैं, इसीलिए आप अपनी पीडा बढ़ा लेते हैं जिससे कि आपको यह एहसास हो सके कि आप कुछ हैं।
ध्यान दें जितनी कम पीडा, उतना कमजोर आपका अहम। जितनी अधिक आपकी पीडा, उतना ही सशक्त आपका अहम होगा। इसीलिए, आप सदा अपनी पीडा को बढ़ाते रहते हैं। समस्या यह है कि कुछ समय बाद आप भूल जाते हैं कि आपने अपनी पीडा को बढाया है। फिर आप उसी जाल में फंस जाते हैं। आप सहमत नहीं होते और कहते हैं, 'नहीं, आप मेरा जीवन नहीं जानते, आप मेरी पीड़ा नहीं जानते।' किन्तु स्पष्टतौर से जान लीजिए कि आप सदा अपने बनाए जाल में फंस रहते हैं।
दोहरी पहचान
हम सभी की दो पहचान होती हैं, एक पहचान जो हम अपने बाहरी संसार के लिए रखते हैं और दूसरी पहचान हम अपने भीतरी संसार के लिए रखते हैं।
वह पहचान जो आप अपने भीतरी मन में रखते हैं उसे संस्कृत में ममकार कहते हैं। यह सदा जो वास्तव में आप हैं उससे बहुत छोटी होती है। आप अपनी समस्त असफलताएं, अतीत की गलतियां और अपराध-बोध को याद करते रहते हैं, और लगातार उन पर काम करते रहते हैं।
वह पहचान जो आप बाहरी संसार के लिए रखते हैं, उसे अहंकार कहते हैं। अहंकार आपका विजिटिंग कार्ड है। आप अपने विषय में दूसरों को जो कुछ बताना
जीवन-मुक्ति
चाहते हैं, वह सब इस पर प्रिंट होता है। यह आपकी उस पहचान पर आधारित होता जो आप बाहरी संसार को दिखाना चाहते हैं। यह आपके पास जो कुछ है उससे कहीं अधिक होता है, आप जो कुछ हैं उससे कहीं अधिक है। यह हमेशा आप जो कुछ हैं उससे कहीं अधिक होगा क्योंकि आप सोचते हैं कि आपको स्वयं को बेचना है। यह विशेषकर ऐसे समाज में जहां आपको अपनी मार्केट वेल्यू बनानी होती है, ऐसा करना आपकी मलभूत आवश्यकता बन जाती है।
अहंकार श्रेष्ठता के भाव पर आधारित होता है। ममकार हीनता के भाव पर आधारित होता है। अहंकार भय पर आधारित होता है। ममकार लोभ पर आधारित होता है।
मुलभूत सत्य यह है कि आप इन दोनों ही पहचानों से कहीं अधिक हैं। जब आप इन दोनों पहचानों से स्वयं को अलग कर लेते हैं, तो आपको अचानक एहसास होता है कि आप इन दोनों पहचानों से परे हैं। फिर, ये दोनों पहचान आपको फिर बांध नहीं सकतीं।
निकुष्ट अहम
रमण महर्षि के जीवन की एक घटना -
रमण महर्षि के शिष्यों में से एक ने उनकी पुस्तकों में से किसी एक पुस्तक को एक अन्य भाषा में अनुवाद किया। पुस्तक के भीतर, अनुवादक के रूप में उसका नाम भी प्रकाशित हुआ।
जब शिष्य ने पुस्तक को देखा, तो यह देखकर उसे दुख हुआ। वह संबंधित व्यक्ति के पास गया और इस गलती के लिए उसकी डांट लगाई। फिर वह रमण महर्षि के पास गया और बोला, 'भगवन, उन्हें मेरा नाम नहीं
ममकार - आपका आन्तरिक अहंकार जो कि आपको जो आप है उससे कम आंकता है।
अहमकार - यह आपका अन्तःकरण को बाहरी दुनिया के हिसाब से दिखाना अपने आपको गलत दिखाना है। इसके द्वारा आप बाहरी दुनिया में अपनी गलत पहचान बताते है।
रमण महर्षि - प्रबुद्ध गुरू जो कि तिरुवनामलई दक्षिण भारत से है उन्होंने स्वयं को विधि को बताया और स्वयं से पूछिय कि मैं कौन हँ के द्वारा स्वयं को महसूस करना सिखाया।
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कतज्ञता क्या है
जब हम यह जान लेते हैं कि हम अस्तित्व की पूर्ण योजना का ही एक हिस्सा हैं और प्रत्येक मिनट सत्ता हमारी प्रेम से देखभाल कर रही है, तो हम कुतज्ञता से भर जाते हैं। तब हर पल जो हमें प्राप्त होता है, उसके लिए हम हृदय से आभारी हो जाते हैं, चाहें ये हमारे अंग और इन्द्रियों का उपयोग मात्र ही क्यों न हो।
कृतज्ञता अस्तित्व की बहुलता की पहचान स्वरूप आपका प्रतिसंवेदन है। यह आपके भीतर एक अदभुत रिवलावट है।
यदि कोई ऐसी ऊर्जा है जो आपके जीवन में हर चीज की देखभाल करती है, तो वह कृतज्ञता की ऊर्जा ही है। यदि कभी आपको यह अनुभव होता है कि आप जीवन में कुछ गंवा रहे हैं, तो इसकी वजह यह है कि आपके जीवन में कृतज्ञता का अभाव है। कृतज्ञता तो आपकी श्वास बन जानी चाहिए। कृतज्ञता एक रूपान्तरण कर देने वाली ऊर्जा है। यह आपमें और आपके चारों ओर घटित होने वाली घटनाओं को रूपान्तरित कर देती है। यह वह ऊर्जा है जो ब्रह्माण्ड की ऊर्जा के साथ आपसे सामंजस्य बैठाती है और आपके लिए अद्भुत संपन्नता लाती है। आप देखते हैं कि कृतज्ञ होने पर अस्तित्व आपके साथ एक सजीव प्राणी की भांति प्रतिक्रिया करता है। कृतज्ञता परम सत्ता के
साथ एकाकार होने का मार्ग है। जब कृतज्ञता घटित होती है, तो यह आकर्षण के नियम के माध्यम से संदर ढंग से कार्य करती है और आपके लिए अपार संपन्नता लाती है। यह कैसे संभव होता है?
एक छोटी कहानी
प्राचीन Bharat का महान शासक अकबर और उसका सलाहकार, बीरबल एकबार साथ-साथ शहर में घुम रहे थे। वे चंदन की लकड़ी के बिक्रेता के पास से गजरे और अकबर ने बीरबल से कहा, 'न जाने क्यों? मेरी इच्छा इस व्यक्ति को फांसी पर चढाने की हो रही है।'
इस घटना को एक महीना बीत गया और वे दोनों फिर से उसी चंदन की लकड़ी के बिक्रेता के पास से गुजरे।
इस बार अकबर ने कहा, 'बड़ी अजीब बात है। किन्तु आज मेरी इच्छा इस व्यक्ति को कुछ ईनाम देने की हो रही है। यह कैसे संभव है?'
बीरबल ने उत्तर दिया, 'महाराज! एक महीने पहले इस व्यक्ति का व्यवसाय खराब चल रहा था और जब उसने आपको देखा, तो उसके मन में विचार आया कि यदि राजा मर जाए, तो दरबारी उसके अंतिम संस्कार के लिए बहत सारी चंदन की लकडी खरीदने आयेंगे।'
उसके इन नकारात्मक कंपनों ने आपके भीतर उसके प्रति घूणा भर दी। इसीलिए पिछले माह आप बिना
जीवन-मुक्ति
कृतज्ञ रहना पर्याप्त है
यह वह ऊर्जा है जो ब्रह्माण्ड की ऊर्जा के साथ आपसे सामजस्य बनाती है और आपके लिए अद्भुत संपन्नता लाती है।
किसी वजह से इस व्यक्ति को फांसी देने की इच्छा रखते थे। अचानक अपने राज्य के लिए मेज-कृर्सियां बनबाने के लिए मैंने इससे बहुत सारी चांदन वकी लकडियां खरीद लीं। इससे उसे बहत खुशी मिली। और इसी वजह से आज यह आपके प्रति कुतज्ञता प्रकट कर रहा है। और उसके इन्हीं सकारात्मक कपनों की वजह
से आपकी उसे ईनाम देने की इच्छा हो रही हैं।'
आकर्षण के नियमानुसार दो एक जैसी उर्जायें ही एक-दूसरे को आकर्षित करती हैं। यह कुतज्ञता पर कैसे लागू होती हैं? यह समझें- आप हर चीज के प्रति कुतज्ञता प्रदर्शित करते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप परितृप्ति का अनुभव करते हैं आनन्द का अनुभव करते हैं। इसीलिए जब आप कुतज्ञता विकरित करते हैं, तो आपकी परितुप्तता की ऊर्जा, भौतिक लाभ, अच्छे संबंध, अच्छा स्वास्थ्य और इसी प्रकार अन्य रूपों में आपकी तरफ आकर्षित होती है। इस प्रकार यह कार्य करती है। मुख्य बात यह है कि कुतज्ञता परम सत्ता के साथ गुंजायमान होती है और आपको एक भले मानव के रूप में रूपातंरित करती है।
मनोवैज्ञानिकों ने लोगों पर क्रतज्ञता की अनुभूति के प्रभावों का अध्ययन किया है। इलास स्थित दक्षिणी मेथोडिस्ट विश्वविद्यालय के डा.माइकल मेक्गला तथा डेविस. कैलफोर्निया स्थित कैलफोर्निया विश्वविद्यालय के राबर्ट एम्मोन ने अपने पहले शोध-अध्ययन में बतलाया कि किसी व्यक्ति के स्वस्थ और प्रसन्न होने में कुतज्ञता एक अहम भुमिका निभाती है।
अध्ययन के परिणाम बतलाते हैं कि प्रतिदिन अभिव्यक्त की जाने वाली कृतज्ञता के परिणाम स्वरूप सजगता का स्तर, उत्साह, दृढ़निश्चय, आशावाद, ऊर्जा में वृद्धि होती है तथा निराशा एवं तनाव में कमी आती है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सौभाग्य एवं शुभकामना की भावना सबके प्रति करके कोई भी अपने स्वास्थ्य और प्रसन्नता की अनुभति को बढ़ा सकता है और सकारात्मक सामाजिक प्रभावों का सुजन कर सकता है।
अपने अस्तित्व के लिये कुतज्ञ अनुभव करें
जब मैं लोगों से कहता हूँ कि कृतज्ञता के बोध से रहो, तो वे तूरंत कारण खोजने लगते हैं। वास्तविक क्रतज्ञता में कभी भी कारण नहीं होता। यह आपके भीतर कारणविहीन पूष्य की तरह घटित होती है। क्या पूष्प किसी औचित्य के लिए खिलता है? नहीं! यह इसीलिए खिलता है क्योंकि खिलना ही इसका स्वभाव है। कुतज्ञता हमारा वास्तविक स्वभाव है। किन्तु समाज द्वारा बनाई गईं नियम व शर्तों से यह ढक जाता है।
समस्या यह है कि समाज कृतज्ञता की भाषा ही नहीं जानता। यह मात्र उपयोगिता की ही ही भाषा जानता है। यह आपके भीतर सदा भय व लोभ भरता रहता है जिससे कि आप इसे इसकी इच्छानुसार परिणाम दे सकें। समाज यह नहीं जानता कि एक मार्ग कुतज्ञता का भी होता है जो भय व लोभ की अपेक्षा कहीं बेहतर परिणाम दे सकता है।
कृतज्ञता की अनुभूति करने के लिये अनंत कारण हैं। जीवन स्वयं एक उपहार है, जो ईश्वर ने हमें प्रदान किया है। क्या हम में से किसी ने इसे पाने के लिए कोई श्रम किया था? नहीं! ईश्वर का प्रथम उपहार तो यह मनुष्य चेतना ही है, जो उसने हमें दी है। हमारी कुतज्ञता ठीक यहीं से शुरू हो जानी चाहिये। अपने अस्तित्व के लिए हमें ईश्वर के प्रति कुतज्ञ होना चाहिए।
एक युवा लडकी रात्रि-भोज के लिए मेज पर बैठी। जब उसने खाना शुरू ही किया कि उसकी माँ ने उसे रोक दिया। उसने कहा, 'क्या भोजन के लिए तुमने ईश्वर को धन्यवाद दिया?' उस लडकी ने उत्तर दिया, 'किन्तू इस प्लेट में ऐसा कुछ नया नहीं है जिसके लिए मैंने ईश्वर
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जीवन-मुक्ति
कृतज्ञ रहना पर्याप्त है
जब आप अपने संबंधियों के प्रति सच्ची कृतज्ञता रखते हो, तो आप उन पर अधिकार नहीं जतलाते।
समय भी दसरे व्यक्ति के शरीर के प्रति गहन कृतज्ञता रखी जा सकती है। इससे पुरी प्रक्रिया मात्र शारीरिक आनंद न होकर दिव्य अनुभव बन जाएगी। जब आपको दसरों से इतना आनंद प्राप्त होता है, तो आप दसरों के प्रति कुतज्ञता क्यों नहीं प्रकट करते ? यदि दसरों को
आरम्भ से ही सम्मान दिया जाए, तो अनेक वैवाहिक रिश्तों को टूटने से बचाया जा सकता है।
एक छोटी कहानी -
एक व्यक्ति ने ईश्वर से प्रार्थना की, 'हे ईश्वर! मूझ पर दया कर। मैं इतना कठिन परिश्रम करता हूँ और मेरी पत्नी घर पर रहकर आराम करती है। घर पर रहकर वह आनंद मनाती है और मुझे कठिन परिश्रम करना पडता है। मुझे एक ऐसा वरदान दे कि मैं उसकी पत्नी बन जाऊं और वह मेरा पति। मैं उसे यह एहसास कराना चाहता हूँ कि एक पुरूष का जीवन कितना कठिन होता है।' ईश्वर ने उसकी इच्छा स्वीकार कर ली।
अगले दिन वह व्यक्ति जो अब स्त्री बन गया था। प्रातःकाल जल्दी उठ गया। उसने नाश्ता तैयार कियार किया, बच्चों का टिफिन लगाया, बच्चों को तैयार किया और उन्हें विद्यालय छोड़कर आया। लौटकर आने के बाद उसने कपड़े धोए और उन्हें सुखाने के लिए धूप में डाला। अब वह बैंक गया, उसने नकदी निकाली और बिजली और टेलिफोन के बिलों का भुगतान किया। उसके बाद वह बाजार जाकर पंसारी का सामान लेकर आया। फिर वह बच्चों को लेने के लिए विद्यालय गया, उनकी समस्याओं से जूझा, उन्हें गृहकार्य करवाया, कपड़ो में इस्तरी किया। फिर उसने रात का भोजन तैयार किया बच्चों को खिलाया और उन्हें सूलाया। और अंत में उसने खुद भोजन किया और सोने के लिए गया।
अगली सबह उसने ईश्वर से फिर प्रार्थना की, 'हे ईश्वर! मुझे नहीं लगता कि मैं आज फिर ऐसा कर पाऊंगा, इसीलिए मूझे फिर से पुरूष ही बना दे।'
ईश्वर ने उत्तर दिया, 'निस्संदेह मैं तुम्हें पुरूष ही बना दुंगा, किन्तू अब तुम्हें नौ महीने तक प्रतीक्षा करनी होगी क्योंकि अब तुम गर्भवती हो चुके हो।'
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अपने दायित्वों का बखुबी निर्वाह करता है। किसी भी व्यक्ति की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। इस धरती ग्रह पर हर व्यक्ति कुतज्ञता के योग्य है। मैं सदा लोगों से कहता हैं कि यदि आप और आपके जीवन-साथी के बीच अच्छे संबंध नहीं बन पा रहे हैं, और आप अलग होना चाहते हैं, तो अलग हो जाइए किन्तु कुतज्ञता के साथ।
समस्या यह है कि कहीं न कहीं हमें यह अनुभूति होती है कि लोग हमें आहत करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसा नहीं है। यह हमारी अपनी ही असुरक्षा की भावना है जिसे हम दूसरों के पर थोप देते हैं।
अनेक ऐसे लोग हैं जो अपनी समस्याओं के लिए अपने माता-पिता और समाज को दोषी ठहराते हैं। कुपया समझने की चेष्टा करें कि वह प्रज्ञा जो अब आपके पास है, उससे आप यह देखने में समर्थ हैं कि अतीत में आपको सही समझ नहीं दी गई वे जिन्होंने इसे यह शरीर और मन दिया है, उनकी हमें किसी भी तरीके से दुख पहुंचाने या परेशान करने की कोई इच्छा नहीं थी। जो कुछ भी सर्वश्रेष्ठ उनसे बन पडा, उन्होंने हमारे लिए किया। अब हम इससे परे इसीलिए जा रहे हैं क्योंकि हम अधिक प्रज्ञावान बन चुके हैं हमारी समझ अब ज्यादा हो चुकी है। बस उनके प्रति कृतज्ञ रहो यही पर्याप्त है।
एक और बात- जब आप अपने संबंधियों के प्रति सच्ची कृतज्ञता रखते हो, तो आप उन पर अधिकार नहीं जतलाते। आप उन्हें एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में देखते हैं। अधिकार तब होता है, जब आप किसी व्यक्ति को वस्तू के रूप में देखते हैं। कृतज्ञता भाव के साथ आप उस व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता उसे रखने का अवसर कृतज्ञ रहना पर्याप्त है
देते हो।
चेतनापूर्वक निश्चय कीजिए कि अगले दो दिन आप विश्वद्ध प्रेम और कुतज्ञता से प्रतिसंवेदन करेंगे, चाहें परिस्थितियां कुछ भी बनें। स्वतः ही आप प्रत्येक व्यक्ति को दिव्यता के प्रतिबिम्ब के रूप में परम सत्ता की अनूठी रचना मानने लगेंगे।
न केवल इतना, बल्कि आप अपने चारों ओर हर चीज के प्रति करूणा से भर जायेंगे। यदि आप ऐसे व्यक्ति थे जिसे शीघ्र ही क्रोध आ जाता था, तो अब आपका क्रोध स्वतः ही विलुप्त हो जायेगा। समस्त ऊर्जा जो नकारात्मक मनोभावों में खर्च हो रही थी, को विकसित होती कुतज़ता मुक्त कर देगी। आप एक दयावान एवं प्रेममय पुरूष बन जायेंगे।
धन्यवाद अपनी देह को
एक छोटी कहानी -
एक अधेड़ उम्र की स्त्री को हार्ट अटैक आया और उसे अस्पताल ले जाया गया। ऑपरेशन टेबल पर उसे मृत्यु की समीपता का अनुभव हुआ। अनुभव के दौरान, उसे मृत्यु भगवान के दर्शन हुए। उसने भगवान से पूछा, 'भगवन! क्या मेरे जीवन का अंत समय आ गया है?' भगवान ने उत्तर दिया, 'नहीं! अभी तो तुम्हें तीस-चालीस वर्ष और जीवित रहना है।'
यह सूनकर वह अत्यधिक प्रसन्न हुई और एक बार ठीक हो जाने के पश्चात नाना प्रकार की सर्जरी जैसे - चेहरा सूंदर करवाना, जबड़ा बदलवाने, नाक सुंदर करवाने और अत्यधिक मोटापा कम करवाने के लिए अस्पताल में ही रहने का निश्चय किया। उसने सोचा कि जब वह तीस-चालीस वर्ष और जिंदा रहने वाली है, तो उसे आकर्षक दिखना चाहिए। अपनी सर्जरी करवाकर जब वह अस्पताल से बाहर निकल रही थी, तभी अस्पताल की एम्बूलेंस ने उसे कुचल दिया और उसकी मृत्यू हो गई।
वह भगवान के सामने उपस्थित हुई और उसने पुछा, 'भगवन! आपने तो कहा था कि मैं अगले तीस वर्ष और जीवित रहंगी। '
भगवान ने उत्तर दिया, 'माफ कीजिए, किन्तु मैंने आपको पहचाना नहीं। '
प्रत्येक मनुष्य ईश्वर की अद्भुत रचना है। इसीलिए दो शरीर कभी भी एक से दिखलाई नहीं पड़ते। ईश्वर कोई इंजीनियर नहीं है। वह एक कलाकार है। इसीलिए हम सब अलग-अलग दिखलाई देते हैं। यदि वह कोई इंजिनियर होता, तो उसने हम सबको एक ही सांचे से बना दिया होता। किन्तु उसने हम सभी को बडे ही अनुठे तरीके से सजित किया है। किन्तु फिर भी हम स्वयं को सुंदर नहीं मानते। हम सदा अपनी तुलना दुसरों से करते रहते हैं और उनकी तरह दिखने की कोशिश करते हैं। हम कभी भी अपने शरीर को यह अनुभूति नहीं कराते कि वह सुंदर है।
हमारा शरीर उन्हीं विचारों से प्रभावित होता है जिनसे हम इसका मनोरंजन करते हैं। प्रत्येक कोशिका हमारे विचारों पर प्रतिक्रिया करती है और अनुभूति देती है। यदि हम अपने शरीर के प्रति कृतज्ञता की अनुभूति करते हैं, तो हमारा शरीर हमें स्वस्थ रखकर प्रतिक्रिया देता है। यदि हम अपने शरीर से घृणा करते हैं, तो हमारा शरीर बीमारी से घिर कर प्रतिक्रिया करता है। सूफी परंपरा में, शरीर कृतज्ञता प्रतिदिन स्वयं ध्यान के रूप में की जाती है जहां शरीर के प्रत्येक अंग को प्रेम और धन्यवाद के साथ याद किया जाता है।
सब कुछ शुभ है, इसे उत्सव के रूप में लें!
एक चीज सूस्पष्टरूप से जान लीजिए। सम्पूर्ण सत्ता एक मांगलिक घटना है। आप परम सत्ता के अंग हैं, तो आपके चारों ओर जो भी हो रहा है, वह भी मांगलिक है। यही परम सत्ता की वास्तविकता है। जो परम सत्ता में घटित नहीं होता वही अमांगलिक है। हर चीज आनंद से परिपूर्ण है और जिसके लिए हमें कुतज्ञता की अनुभूति होनी चाहिए।
यदि इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लिया जाए, तो फिर जीवन में कोई शिकायत नहीं रह जाएगी। यदि आप इस बात को स्पष्टरूप से समझ लेते हैं, तो आपकी आंखें कुतज्ञ आंखें बन जायेंगी। फिर इन्हें हर वस्तु असाधारण दिखलाई पडेगी। कुछ भी साधारण नहीं रह जायेगा। हर चीज एक चमत्कार होगी।
एक छोटी कहानी -
एक दिन एक शिकारी पक्षियों को उठाकर लाने वाला एक कुत्ता खरीदने के लिए बाजार गया। उसे वहां एक ऐसा कुत्ता मिला जो पानी पर चल सकता था। उसने उस कुत्ते को तूरंत खरीद लिया और घर ले आया।
अगले दिन उसने अपने मित्र को बुलाया और कुत्ते को साथ लेकर वे शिकार पर निकल पड़े। जब बत्तखों का झुण्ड करीब आया तो उस शिकारी ने उन पर निशाना साधकर गोली मारी। उसके बाद कुत्ता पानी में गया और पक्षी को उठा लाया। अब उस शिकारी ने प्रतिक्रिया जानने के लिए अपने मित्र की ओर देखा किन्तु उसका मित्र चुप ही रहा।
उसने पूछा, 'क्या तुम्हें मेरे कुत्ते में कुछ असाधारण दिखता है?'
उसका मित्र बोला, 'हाँ, वह पानी में तैरना नहीं जानता।'
हमारी नेत्रों के सामने हर पल चमत्कार हो रहे हैं। किन्तु हम निरंतर उन्हें गंवा देते हैं! और चुंकि हम उन्हें गंवा देते हैं, इसीलिए कभी-कभी हमें अपना जीवन नीरस लगने लगता है। जब हम इन्हें ग्रहण करना शुरू कर देते हैं, हमारा जीवन चमत्कार बन जाता है। सत्य यही है कि हमारे जीवन में चारों और अनेकानेक चमत्कार हो रहे हैं।
अस्तित्व को इसके समस्त आयामों और अंतर्विरोधों के साथ स्वीकार करो। किसी भी चीज का आंकलन मत करो। आप निरंतर जो हो रहा है, उसका आंकलन करने बैठ जाते हैं। आपको यह अनुभूति होती है कि
जीवन-मुक्ति
यह उचित है और यह अनुचित। यह कार्य ऐसे होना चाहिए था और यह कार्य ऐसे नहीं होना चाहिए था।
सजग होकर यह जान लीजिए कि सत्ता में जो कुछ होता है वह मांगलिक है, शुभ है। सम्पूर्ण संसार में मात्र दो प्रकार के लोग होते हैं। पहले प्रकार के लोग यह मानते हैं कि जो कुछ भी हो रहा है वह मांगलिक है। दुसरे प्रकार के लोग मानते हैं कि हर चीज उनकी इच्छा के विरूद्ध हो रही है। उनके अनुसार चीजों को कुछ बदलकर होना चाहिए था। इस प्रकार के लोग संसार में जो कुछ हो रहा है, उसे अपने विचारों के अनुसार बदलने, आंकने, आलोचना करने और विकसित करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार के लोग चीजों को अपने अनुसार बदलने की सोच के कारण सदा पीडित रहते हैं।
समझें - हमारे साथ जो कुछ भी होता है उसमें एक संदेश होता है फिर चाहें यह मृत्यु या बीमारी भी क्यों न हो। हर चीज से हमें शिक्षा मिलती है। प्रत्येक घटना हमारी प्रज्ञा को बढ़ाती है, हमारी सचेतना की आवृत्ति को बढ़ाती है।
आपको एक महत्वपूर्ण बात जान लेनी चाहिए - आपमें और एक प्रबुद्ध महात्मा में कोई गुणावत्तापरक या परिमाण परक अंतर नहीं है सिवाय इसके कि वह (ज्ञानी) आंतरिक और बाहरी दोनों ही संसार में संतोष की अनुभूति करता है जबकि आपके साथ ऐसा नहीं होता। आपको सदा यही अनुभूति होती है कि आप कुछ गंवा रहे हैं। जिस प्रकार परम सत्ता ज्ञानी को इसी धरती उपग्रह पर चाहती है, उसी प्रकार परम सत्ता आपको भी यहीं चाहती है। आपका यहां होना कोई दुघर्टना नहीं वरन् एक घटना है। आप परम सत्ता का चमत्कार हैं। यही सीधा और सूबोध सत्य है। यह मत सोचना कि यह सकारात्मक विचार है। नहीं! यह साधारण सत्य है। यदि आप इस सत्य पर विश्वास करते हैं, तो आप स्वतः ही सकारात्मक हो जायेंगे, बस!
यदि आप यहां नहीं होते हैं, समझिये कि आप अस्तित्व
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कृतज्ञ रहना पर्याप्त है
घटना पर चर्चा करने लगे। फिर अचानक उन्हें साधु महात्मा के सत्य वचनों का एहसास हुआ। वे उनकी कुटिया पर गए किन्तु कुटिया खाली थी। साध्रु महात्मा जा चुके थे। कोई नहीं जान पाया कि वह कहां चले गए थे।
अस्तित्व कोई संयोग नहीं है। यह एक स्वतंत्र प्रज्ञा है। जब आप यह समझ जाते हैं कि यह स्वतंत्र प्रज्ञा है, जब आप यह समझ जाते हैं कि यह गहन रहस्य है, अनुभव करने के लिए, न कि हल करने के लिए, तो आपके जीवन में प्रत्येक चीज स्वतः ही खुल जाएगी और आपको जीवन का प्रत्येक रहस्य उजागर हो जायेगा।
कुछ लोग मुझसे पूछते हैं, 'स्वामीजी, आपके प्रति अपनी गहन कृतज्ञता को कैसे अभिव्यक्त करें?' मैं उन्हें बताता हँ कि अपनी कुतज्ञता को अभिव्यक्त करने का एक मात्र रास्ता है उस ज्ञान-प्राप्ति के मार्ग में जीना जिसका मैंने अभी वर्णन किया है। यही एक मात्र सर्वश्रेष्ठ आप मेरे लिए कर सकते हैं और मैं आपके लिए कर सकता हैं।
लोग मुझसे पूछते हैं, 'मिशन के लिए हम क्या सेवा कर सकते हैं?' मैं उन्हें बताता हूँ, विश्व के लिए जो महानतम कार्य कोई कर सकते हैं, वह है स्वयं की चेतना को खिलाना। एक बार ऐसा हो जाता है, तो स्वतः ही, आप जहां आवश्यकता है वहां सेवा करेंगे, अहम के लिए नहीं और न ही श्रेय पाने के लिए बल्कि इसीलिए आप इसे जी रहे हैं, इसमें प्रवाहमय हो रहे हैं। फिर यह सेवा नहीं कहलाती। फिर यह प्रवाह बन जाती है, स्वतः ही उमड़ने लगती है। सेवा करने का यही एक मात्र तरीका है - देने की तरह नहीं बल्कि स्वस्फूर्त बांटने के लिये।
क्रतज्ञता आपके कर्मों को जला सकती है
सुफीवाद पूर्णतया कुतज्ञता-आधारित धर्म है। यदि मुझे सम्पूर्ण सुफीवाद को एक शब्द में संक्षिप्त करना हो, तो वह एकमात्र शब्द है - कृतज्ञता। आप इसे समस्त महान सूफी संतो जैसे जलालाउद्दीन रूमी और अन्यों की कविताओं में देख सकते हैं। आप उनके शब्दों में कुतज्ञता की प्रवाहमय ऊर्जा को देख सकते हैं। कुतज्ञता आपको कुछ नहीं बस एक प्रवाहमय ऊर्जा बना देती है।
कृतज्ञता एक अग्नि की भांति है जो आपके समस्त कर्मों को जला सकती है। कर्म क्या हैं? यह आपका भूतकाल का कोई अपूर्ण कार्य है जो आपको बारंबार इसे पूर्ण करने के लिए खींचता रहता है। इस प्रकार के अधूरे कर्मों को पूरा करने और उनका उपयोग करने के लिए ही हमें बार-बार जन्म लेना पडता है। महज क्रतज्ञता की ऊर्जा में होकर ही, इन कर्मों का नाश किया जा सकता है! कुतज्ञता में ऐसी अद्भुत शक्ति होती है।
कतज्ञता -सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना एवं धर्म है
जब आपकी प्रार्थना कृतज्ञता बन जाती है, तो आप अपने लिए अधिक से अधिक आशीर्वाद का सुजन करते हैं। कृतज्ञता सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है जो हमारे लिए हमारी आशा से भी अधिक प्रदान कर सकती है। वास्तविक प्रार्थना, प्रार्थना की पूस्तकें पढना नहीं है, यह ईश्वर को भेंट अर्पित करना नहीं है, यह मंदिर में धन दान करना नहीं है, यह समस्त सत्ता के प्रति गहन एवं शांत कुतज्ञता है। यह अटूट विश्वास, कि परम सत्ता सदैव हमारी देखभाल कर रही है।
अधिकतर लोग मानते हैं कि प्रार्थना और कुतज्ञता बंधन हैं। नहीं! ये तो महानतम मुक्तिप्रदाता हैं। ये आपको असंतोष से मुक्ति दिलाते हैं। आपकी प्रार्थना में कुतज्ञता उमडनी चाहिए, आपकी प्रार्थना कुतज्ञता से परिपूर्ण होनी
चाहिए। कुछ लोग पूछते
| हैं, 'हम मंदिर में जाकर | |
|---|---|
| आपको समझना पूजा क्यों करते हैं? ' | |
| चाहिए कि प्रार्थना | आपको समझना चाहिए |
| अस्तित्व के | कि प्रार्थना, अस्तित्व द्वारा |
| आशीर्वाद का | दिये वेन आशीर्वाद का |
| उत्सव है। जब हमारी | |
| समारोह है | प्रार्थना इस रूप में होती |
| 2 वो विश्वा ने अधितम |
प्रतिसंवेदन देता है। जब अस्तित्व प्रतिसंवेदित होता है। तो
आपके जीवन में अधिक से अधिक कल्याण घटित होता है। प्रार्थना और कुपा का यही पवित्र चक्र हैं!
मैं सदा लोगों को एक सूफी संत की आश्चर्यजनक कहानी सुनाता हँ। सुफीवाद ऐसा धर्म है जिसकी जडें कुतज्ञता में निहित हैं। यह और कुछ नहीं बस परमसत्ता के प्रति कूतज्ञता मात्र है।
एक सूफी संत और उनके शिष्य आध्यात्मिक यात्रा पर थे। उन्होंने पिछले तीन दिनों से कछ भी नहीं खाया था। चौथे दिन भी कुछ ग्रामीणों ने भी उन्हें खदेड दिया और उस रात वे एक कब्रुगाह में सो गये। अगली सुबह वह संत प्रतिदिन की ही भांति ईश्वर की प्रार्थना कर धन्यवाद देने लगे। उनके शिष्यों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। वे इतने दिनों से बिना कुछ खाये-पिये और बिना विश्राम किए हुए थे और उनका गुरू ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था। उन्होंने प्रार्थना में सम्मिलित होने से इंकार कर दिया।
शिष्यों ने संत से पूछा, 'हम ईश्वर की प्रार्थना क्यों करें जबकि हमें पिछले तीन दिनों से न कुछ खाने को मिला है और न ही विश्राम करने के लिए कोई ठिकाना।'
संत ने उत्तर दिया, 'ईश्वर, तुम लोगों के लिए पिछले तीस वर्षों से निरंतर खाने-पीने और विश्राम करने की व्यवस्था करता रहा है। इस विषय में तुम लोगों का क्या कहना है?'
प्रार्थना परम सत्ता की अनवरत क्रुपा के लिये कृतज्ञता का उदगार है।
अपेक्षा ही मूल दोषी है इससे मुक्त हो जाओ
बैठ जाइये और दो सूची तैयार करिये। एक सूची में उन चीजों को लिखो जो आपके पास हैं। दूसरी सुची में उन चीजों को लिखो जो आपके पास नहीं हैं। पहली सूची में आपको प्रत्येक छोटी सी छोटी चीज जो आपके पास है, उसे लिखना है। अपनी आंखों, कान, हाथों और पैरों को लिखने से शुरूआत करो, क्योंकि ऐसे भी लोग हैं जिनके पास ये चीजें नहीं होतीं। भौतिक चीजों को लिखने से पहले अपनी समस्त शारीरिक और मानसिक चीजों को लिखो। यदि आप ईमानदारी से लिखना शुरू करेंगे तो यह सूची कभी भी खत्म नहीं होने वाली। यही सत्य है। यदि आप यह पाते हैं कि आपकी यह सुची खत्म ही नहीं हो रही है, तो इसका तात्पर्य है कि कुतज्ञता आपके भीतर घटित होने लगी オレ
समस्या यह है कि हमारे जीवन में हर समय अपेक्षा बनी रहती है। इसीलिए कृतज्ञता आसानी से घटित नहीं होती। अपेक्षा इसी तरह है है जैसे अग्नि को बूझाने के लिए उसमें शुद्ध घी को डालना। क्या घी डालकर अग्नि को बुझाया जा सकता है? कभी नहीं! यदि आपके कार्यकलापों की जडें अपेक्षा से जुड़ी हैं, तो आपको कभी भी परितृप्त या पूर्ण संतोष की अनुभूति नहीं हो सकती। आप मात्र अपनी इन्द्रियों को थकाते रहते हैं।
आप एक बार में या तो अपेक्षा में रह सकते हैं या फिर कृतज्ञता में। दोनों में एक साथ कभी नहीं। अपेक्षा में सदा चीजों को रखने की, उन पर अधिकार की इच्छा रहती है। आप मालिक बन जाते हैं। कृतज्ञता में, आप आनंद लेते हैं। जब आप मालिक होते हैं, तो आप उन कुछ चीजों का ही आनंद ले पाते हैं, जिनके आप स्वामी होते हैं। किन्तू जब आप आनंद लेते हैं, तो सत्ता में जो कुछ भी उपस्थित है, उस सबका आनंद लेते हैं। जब आप उन वस्तुओं को देखते हैं, जिनके आप स्वामी हैं, आपको संतृष्टि नहीं मिलती, सब कुछ आपके लिए अपर्याप्त होता है। जब आप हर स्थिति में आनंद लेते हैं, सबकुछ उमडने लगता है। यही अंतर है!
एक छोटी कहानी -
एक गांव में एक रात्रि पहरेदार पहरा दे रहा था। समय-समय पर वह अपनी सीटी बजाता रहता। उसके पास एक चिलम थी। उसने उसमें तम्बाकू भरा और उसे जलाने के लिए दिया सलाई ढूंढने लगा किन्तु उसके पास दियासलाई नहीं थी। तब वह पास ही में रहने वाली एक बुढी स्त्री के पास गया और बोला, 'मुझे अपनी चिलम जलानी है, मुझे आग दे दो।' उस बूढ़ी ने कहा, 'मेरा चूल्हा तो पिछले तीन कतज्ञ रहना पर्याप्त है
दिन से ही नहीं जला है। किसी तरह से मन्दिर से मिले जाती है भोजन पर मैं गुजारा कर रही हूँ।'
इस प्रकार वह पहरेदार कई जगह गया किन्तु उसे निराशा ही हाथ लगी। अंत में वह गांव के मुखिया के घर गया, वहां उसने नौकरानी से कहा कि उसके चिलम के लिए थोडी सी आग दे दे।
एक लडकी ने उसकी तरफ देखा और कहा, 'तुम्हें अपनी चिलम को जलाने के लिए आग चाहिए? जिस लालटेन को लेकर तुम घुम रहे हो उससे आग क्यों नहीं ले लेते?'
पहरेदार को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। जब वह दियासलाई की तलाश कर रहा था, तो वह अपने साथ एक लालटेन लिए घूम रहा था।
जब हम यह सोचते हैं कि जिस चीज की हमें आवश्यकता है, वह सब बाहर है, तो हम बाहरी अपेक्षा में जीते हैं और हम निरंतर रात्रि प्रहरी की तरह खोज करते रहते हैं। किन्तु जब हम यह सोचते हैं कि सत्ता हमें वह सब दे देती है, जिसकी हमें आवश्यकता है, तो हर समय हमारे पास सबकुछ होता है।
कृतज्ञता के साथ आपकी शरीर की भाषा भी बदल
जब हर समय हम अपेक्षा से प्रेरित होकर कार्य करते रहते हैं, तो हम अपनी शारीरिक भाषा में एक सुक्ष्म हिंसा को ढोते हैं, योजनाबद्ध हिंसा नहीं एक अन्तर्निहित हिंसा। यदि हम अपनी शारीरिक भाषा के प्रति थोडा बहत सजग हो जाएं, तो इसे आसानी से लेंगे।
जब आप कम्प्यूटर पर टाईप करते हैं, जब आप फोन रिसीव करने के लिए रिसीवर उठाते हैं, तो आप वापिस रिसीवर को कितना संभालकर रखते हैं। कितनी आक्रामक भावनाओं से आप चलते हैं... सब कुछ । आप देखेंगे कि इन सबमें एक सूक्ष्म हिंसा छिपी होती है।
कृतज्ञता के साथ आपकी समस्त शारीरिक भाषा बदल जाती है। जब आप गहन कुतज्ञता का अनुभव करने लगते हैं, तो परिस्थितियों पर आपकी प्रतिक्रिया बदल जाती है। आप सत्ता के साथ गुंजायमान होने लगते हैं। आपका शरीर अनुनाद से, कुपा एवं सहज कोमलता से प्रवाहित होने लगता है। आपके समस्त कार्यकलाणों से प्रेम प्रकट होने लगता हैं। फिर कोई हिंसा नहीं होती। बस आनंद की ही वर्षा होती है। फिर आप जो कुछ भी करते हैं, उससे जीवन मीठा बनते जाता है।
आप सामुहिक चेतना के अंग है
अब हम थोड़ा ज्यादा जिटिल विषय की ओर बढ़ेंगे। यह उस संबंध के बारे में है जो हमारे चारों ओर का संसार हैं। हम वह क्यों देखते हैं जो हम देखते हैं? हम वह कैसे देखते हैं? हम अस्तित्तव की परिकल्पना में कैसे उपयुक्त होते हैं?
पदार्थ,ऊर्जा और उससे परे:
यह जगत किन चीजों से मिलकर बना है? हमारी पांच देखने, सुनने, सूंघने, स्वाद और स्पर्श की इन्द्रियां हमारे इस संसार को अनुभव करने के द्वार हैं। वे बताती हैं कि यह संसार पदार्थ से बना है—वस्तुऐं अपने विभिन्न रूपों, आकारों, रंगों और ग्णों में ।
हम अपने आप को एक त्रिआयामी संसार में देखते हैं जो मूलभूत रूप से पांच तत्वों: मृदा, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना हैं। हम पाते हैं कि समय के साथ ये सारी वस्तुऐं परिवर्तन से गुजरती हैं। ये सभी समय के प्रवाह के साथ उत्पत्ति, पालन और विनाश से गुजरती हैं।
परंपरागत भौतिक विज्ञान हमें बताता है कि पदार्थ पर भौतिकी के नियम लागू होते है-
जैसे कि गति के तीन सिद्वांत, गुरूत्व का सिद्धांत, तरल गतिशीलता का सिद्धांत अन्यथा अन्यथा अन्यथा। सभी वस्तुऐं अणुओं से मिलकर बनी हुई मानी जाती है, जो परमाणुओं से मिलकर बने है, जो तीन तरह के कणों– प्रोटोन, न्यट्रोन और इलेक्ट्रोन से मिलकर बने हैं। हमने स्कूल में इन सब प्राथमिक बातों को पढा हैं ।
किंतु आधुनिक विज्ञान के अनुसार, यह संसार मूलभूत रूप से पदार्थ से नहीं बना है, मूलभूत कण प्रोटोन, न्यूट्रोन और इलेक्ट्रोन नहीं है। आधुनिक विज्ञान कहता है पदार्थ अपने आप में ही ऊर्जा है!
अल्बर्ट आईन्सटीन के प्रसिद्ध समीकरण, E=MC² (जहां E ऊर्जा है, M द्रव्यमान है और C प्रकाश की गति है) पदार्थ अर्थात द्रव्यमान और ऊर्जा के समरूपता को साबित करता है। मैं एक नये लेख को पढ रहा था, जो यु एस जरनल साईंस में छपा था (http://www.physorg.com. news/46415074.html) जो एक शोध पर था जो आईंस्टीन के समीकरण को साबित करता था नाभिक के अन्दर मुल कणों को भी और छोटे कणों जिन्हें क्वार्क कहते है, से बना हुआ माना जाता है
ध्यान क्यों ?
आगे के चार अध्यायों में, साथ ही जो
अध्याय ध्यान की विधियों पर हैं, वह इस पुस्तक के एक अलग प्रभाग में आगे हैं। अब मैं आपको मार्ग देता हूं, उस सत्य के अनुभव के लिए जिसके बारे में हमने बातें की। अब आपके पास एक बौद्धिक समझ है, क्या करने की आवश्यकता है और क्यों?
अब हम 'कैसे' करेंगे? उस प्रभाग में हैं। सभी ज्ञान बस किताबी रह जाएगा अगर हम उसको अनुभव में परिवर्तित नहीं करते हैं।
जीवन का असली उद्देश्य क्या है?
आपके जीवन का परम उद्देश्य क्या है?
ज्यादा कमाना..........? सदा युवा, स्वस्थ, सुंदर बने रहना....? एक बेहतर, ज्यादा समय तक रहने वाला संबंध……? अपने व्यक्तित्व विकास…..?
हममें से हर कोई आनंद की खोज में हैं, किंतु हम बहत से विभिन्न तरीकों से खोजते हैं। किंतु हममें से निन्यानवें प्रतिशत इस बात से परिचित भी नहीं हैं कि हमारा असली उद्देश्य वह आनंद है! हम बाहरी संसार में हर जगह उस चीज को खोजते हैं जो हमारे अंदर है, बस खोजे जाने की प्रतीक्षा में है।
एक लघु कथा
एक शाम, एक व्यक्ति अपने घर के प्रांगण में किसी चीज को बहत मेहनत से खोज रहा था। उसकी पत्नी ने पूछा वह क्या है। उसने उत्तर दिया कि उससे एक सोने का सिक्का गिर गया है। उसकी पत्नी भी खोजने में लग गयी। जल्द ही, और लोग जमा हो गए और व्यवहारिक रूप से उसका पूरा पड़ोस उस सोने के सिक्के की खोज में जुट गया।
अचानक एक पड़ोसी ने उस व्यक्ति से पूछा, तुमने किस खास स्थान पर वह सिक्का गिराया? ये कैसे हो सकता है कि अब तक हम उसे नहीं खोज पाए हैं? 'उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, 'ओह, मैंने वह सिक्का घर के अंदर खोया था, 'हर कोई जो खोज रहा था गुस्सा हो गया और उससे पुछा, 'तब हम यहां बाहर में क्यों खोज रहे हैं?'
उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, 'समस्या यह है कि मेरे घर के अंदर कोई रोशनी नहीं है। इसीलिए मैं इस रास्ते की रोशनी में यहां खोजना शुरू कर दिया।
ध्यान क्यों
असल में हम यही अपने जीवन में करते हैं। हम सब गलत जगहों पर जवाब खोजने के उस्ताद हैं। हम आनंद को प्रत्येक जगह, धन, शक्ति, संबंधों, विचारधाराओं में खोजते हैं। किंतु हम एक स्वाभाविक दिशा में कभी नहीं बढ़ते हैं जो हमारे अंदर हैं।
आनंद क्या है?:
जीवन में हर किसी ने अपार खुशी के कुछ क्षणों का अनुभव किया है। किंतु वह सदा किसी कारण से होती है। खुशी की वह अवस्था सदा के लिए रिथर प्रतीत नहीं होती है। वह वहां अरथाई हैं, और जब वह बदलती है, या चली जाती है, आप फिर पीड़ा का अनुभव करते हैं। सिर्फ वही खुशियां जो आप बिना किसी कारण के अनुभव करते हैं, और जो किसी कारण से खत्म नहीं होती है, वास्तविक और स्थाई खुशियां हैं। यही वह आनंद कहलाता है। वह खुशी आपके बाहर की किसी चीज पर निर्भर नहीं होती है।
शब्द 'आनंद' का अर्थ ही है, 'वह जो कम नहीं हो सकता है, जो खोया नहीं जा सकता है।' आनंद 'खुशी' में परिवर्तित या रूपांतरित नहीं होता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा, इसका अर्थ है बस 'जो कम नहीं हो सकता है, खोया नहीं जा सकता है।' और आनंद वह चीज है जो किसी कारण से कम नहीं होता है।
ध्यान क्या है?
चेतना के विकास की विधि:
कोई भी विधि, कोई भी तरीका जो आपके चेतना का विकास करता है, ध्यान है।
जीवन-मुक्ति
ध्यान एक सरल श्वसन विधि भी हो सकती है। किसी शब्द की सरल पुनरावृत्ति या बैठना भी हो सकती है। जेन परंपरा में, मात्र बैठना ही ध्यान है। आप सोच सकते हैं यह सबसे सरल चीज है करने के लिए, किंतु असल में, मात्र बैठना सबसे कठिन ध्यान है। कोई भी चीज ध्यान हो सकता है अगर वह आपके चेतना का विकास करती है।
हर क्षण अत्यधिक आनंद :
ध्यान केवल किसी क्षण में आनंदमय होना है। जब आप वर्तमान पल के साथ पूर्ण शांति में हैं, तो आप पहले से ही ध्यान की अवस्था में हैं।
अपने जीवन के किसी क्षण को याद करें जब आपने चरम सुंदरता का अनुभव किया है। भले ही वह सूर्य का पर्वत के पीछे से अचानक उगना हो, या फिर पहली बार जब आप किसी सुंदर संगीत को सुने हों। अचानक आप एकदम शांत हो गए, शब्दहीन। उस सुंदरता के समक्ष आप कुछ और नहीं सोच सकते। आप बस शांत थे, मन में आराम का अनुभव कर रहे थे, उस विचारहीन सजगता में। आप पूरी तरह से उस सुंदरता में लीन हो गए थे। वह पल ध्यान था।
कुछ पलों के बाद आपकी आंतरिक वार्तालाप फिर शुरू हो गया। आपके मन ने कहा, 'क्या सुंदर सूर्योदय था।' जिस पल वह शब्द आपके मन में उभरे, आप ध्यान से बाहर थे! या तो आप सोच सकते है , या आप ध्यान कर सकते हैं। आप दोनों साथ—साथ नहीं कर सकते। ध्यान मात्र होना है। यह वर्तमान पल को निर्विरोध अनुभव करना है।
ध्यान की ओर पहुंचने का उचित तरीका क्या है?
पहला चीज है, निष्ठावान होना। खुला मन रखें। प्रयोग के प्रति खुले रहें। उत्साही रहें।
जेन परंपरा में उस मनोभाव को वर्णन करने के लिए एक बहुत सुंदर शब्दावली है— नौसिखिये का मन। इसका अर्थ है जीवन की हर चीज को नये चीज के रूप में देखना, जिससे कि हर चीज आपको आवाक करें।
दूसरी बात है, आशावादी रहें। आनंद आपके लिए एक पूरी तरह से प्राप्त योग्य उद्देश्य है, इसके बावजूद कि आप ध्यान के प्रति पूरी तरह से अपरिचित हैं।
एक बार एक व्यक्ति महान आत्मज्ञानी गुरू रमण महर्षि से मिला और उनसे पूछा, 'भगवान, क्या मैं आध्यात्मिक जीवन के योग्य हूं?' भगवान ने उसको एक प्रश्न के द्वारा उत्तर दिया, 'क्या आप जीवित हैं?' वह व्यक्ति आश्चर्यचकित हो गया। उसने कहा, 'हां, 'निश्चित रूप से!
भगवान ने उसे उत्तर दिया, 'यही काफी है। आपके पास अध्यात्मिक को लिए आवश्यक योग्यता है?'
जीवन का मूल उद्देश्य ही आत्मज्ञान है। आत्मज्ञानी बनने की संभावना कुंडलिनी शक्ति में होती है, एक असाधारण संचित ऊर्जा जो हर व्यक्ति के अंदर छूपी है। अगर उसे जागृत किया जा सके, तो वह आपको चेतना के विभिन्न सतहों पर ले जाएगी, अस्तित्व के विभिन्न सतह पर एक अलग चेतन जीव बनने की संभावना केवल मानवों में है। पशुओं में यह आत्मज्ञानी बनने की क्षमता नहीं होती है, अलग चेतन जीव।
तीसरी बात है, खेलपूर्ण हों! ध्यान एक बड़ा साहस है। ध्यान के प्रति गंभीर होना सभी बातों को खोना है। ध्यान का उत्सव मनायें, केवल आनंद लें।
चौथी बात है, धीरज रखें। ध्यान शुरू करते ही परिणाम के बारे में चिंतित न हों।
एक लघु कथा
तीन बंदरों को एक पका हुआ रसीला आम मिला। सभी बंदरों की तरह, कुछ देर तक वे उस आम के लिए लड़ते रहे । तब किसी तरह से, उन्हें एक स्पष्ट बात सूझी, एक बुद्धिमत्तापूर्ण पल में।
एक अलग चेतन जीव बनने की संभावना केवल मानवों में है।
तुरंत उस आम को खाने को बजाए उन्होंने उसे बोने का मन बनाया। वो जानते थे कि एक बार जब वह आम का पेड़ बन जाएगा, तब तीनों की जरूरत से वहां ज्यादा वहां आम होगें।
उन तीनों में से हर एक ने उस आम के पोधे की देखभाल का एक—एक कार्य बांटने का निर्णय लिया। पहले बंदर ने कहा, 'मैं हर रोज उसमें पानी दूंगा!' दूसरे ने कहा, 'मैं मिट्टी को उपजाऊ रखूंगा और उसमें खाद दुंगा जिससे कि इस पौधे का विकास सुनिश्चित हो। 'तीसरे बंदर ने कहा, 'मैं इस पौधे की सावधानीपूर्वक सुरक्षा करूंगा', और खराब मौसम तथा जानवरों से इसकी रक्षा करूंगा।
ध्यान क्यों
एक महीना बीता, फिर दो, फिर तीन। लेकिन वहां पौध के उगने का कोई चिन्ह नहीं था।
तीनों बंदरों ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई (इस मुद्दे पर बातचीत के लिए)। पहले बंदर ने घोषणा की, 'जैसा कि मैंने वचन दिया था, मैने हर दिन इसमें पानी दिया है।' दूसरे बंदर चिल्लाया, 'मैं भी अपने वचन के अनुसार इसमें खाद दे रहा हं और मिट्टी को पोषित करता रहा हूं।
तीसरे बंदर ने कहा, 'वचन के अनुसार, मैं इस बीच की सुरक्षा बहुत सावधानी से कर रहा हूं। न सिर्फ यह, मैं हर दिन इस बीज को जमीन से निकाल कर देखता हूं इसमें से पौधा निकला या नहीं!'
अगर आप तत्काल परिणाम के लोभ में हैं,
| तो असल में आप | |
|---|---|
| प्रक्रिया को पूरी | |
| हमारी सभी | |
| शारीरिक और | व्यवस्था |
| व्यवस्थित होने से | |
| मानसिक बीमारियां रोकते हैं। आप खुद | ही पूरी प्रक्रिया को |
| स्वप्नावस्था में जड़ | रोक देते हैं। |
| जमाती हैं। | पांचवी बात है, |
एकांत का आनंद उठायें। स्वयं को अपने अंतः वातावरण का अनुभव करने का मौका दीजिए। जब ध्यान आपका अंग हो जाएगा, आनंद अपने आप प्रस्फुटित हो जाएगा।
ध्यान क्यों: चेतना के विभिन्न अवस्था
| चेतना के विभिन्न चरण | ||
|---|---|---|
| विचारों के साथ | विचारों के बिना | |
| 'मैं' चेतना के साथ | जागृत, अवस्था सोचना | तुरीयावस्था, आनन्द अवस्था पूर्ण सजगता की अवस्था |
| 'मैं' चेतना के बिना | स्वप्नावस्था सपने देखना | सुष्पि, अचेतन अवस्था गहरी निंद्रा |
विचार सहित विचार रहित
'मैं' के साथ चेतना जागृत अवस्था सोचना तुरीया आनंदमय अवरथा पूर्ण सजग अवरथा 'मैं' के बिना चेतना स्वप्न, स्वप्नावरश्था, सपने देखना सुष्प्ति अचेतन अवस्था, गहरी निद्रा
तीन अवस्थाऐं हैं जिसे हम अपने जीवन में सतत अनुभव करते हैं— जागुत अवरश्था, स्वप्नावरथा और गहरी निद्रावस्था। किंतु एक चौथी अवरश्था भी है जिसे हमने अनुभव नहीं किया है। वह तुरीया अवस्था कहलाती है। इस अवस्था में 'मैं' की चेतना होती है किंतु इसे विचाररहित सजगता कहते हैं। बहुत कम लोग अपने जीवन में इसका अनुभव करते हैं। कुछ लोग इसका अनुभव कृछ सेकंड के लिए करते हैं और फिर अपनी नियमित जागृत अवस्था में लौट जाते हैं।
ध्यान क्यों
अगर आपको अचानक सदमा लगता है या फिर आप प्रकृति के साथ एक पूर्ण विश्राम और गहन मौन के साथ बैठे हैं, यह संभव है कि एक सेकंड के लिए आप इस विचार रहित अवस्था का अनुभव कर सकें। आपकी पहचान जीवंत हैं, 'मैं की चेतना जीवंत है, किंतु वहां कोई विचार नहीं है। यही वह तरीया की चौथी अवस्था है।
हमारी सभी शारीरिक और मानसिक बीमारियां स्वप्नावरथा में जड जमाती हैं। स्वप्नावरथा गहरी निद्रा अवस्था और जागृत अवस्था में प्रवेश कर हमारे ऊपर पकड़ बनानी शुरू करती है। अगर हमारी जागृत अवस्था स्वप्नावस्था के द्वारा भेदी जाती हैं, यह स्वप्न कहलाती है, हम अनंत चीजों की कल्पना करते हैं जिसे करने की हमारी इच्छा होती है। अगर हमारी गहरी निद्रा स्वप्न के द्वारा भेदी जाती है, यह भंग निंद्रा कहलाती है।
रात या दिन में लगातार, हमारी स्वप्न अवस्था हमारी शांति भंग करती है। जब हमारी गहरी निद्रा अवस्था स्वप्न के द्वारा भंग होती है, तो इसका परिणाम घोर थकान और अनिंद्रा के रूप में होता है। जब हमारी जागृत अवस्था स्वप्नों के द्वारा भंग होती है, तब हम दिवास्वप्न के साथ अपने चारों ओर के संसार में बहुत ही कम सजग होते है। उसके साथ दिवास्वप्न में खोते हैं। स्वप्नावरथा जितना ज्यादा जागुत अवस्था को भेदता है, उतना ज्यादा हमारी चेतना की आवृति कम होती है। हम भले ही मानव शरीर में रहते हों, किंतु हम असली मानव जीवन को नहीं जीते हैं। जब चेतना की आवृत्ति कम होती है, हम जो निर्णय लेते हैं उसके बारे में पूर्ण अभिज्ञ नहीं होंगे जिसे हम सोचते हैं। हम उनके बारे में अभिज्ञ नहीं होंगे जो हमारे अंदर हो रहा है। यह उसी तरह है जैसे हम किसी घर में रह रहे हों किंतु घर में जो हो रहा है उसके बारे में पूरी तरह से नहीं जानते हों।
आप पुछते हैं, 'मैं क्यों ध्यान लगाऊं? ध्यान की आवश्यकता आपकी जागृत अवस्था और आपकी गहरी निंद्रावस्था दोनों में गहरी अभिज्ञा को जगाने के लिए है। सिवाय इसके कि स्वप्नावरथा द्वारा जागृत अवस्था और गहरी निंद्रावस्था को भेदी जाए, ध्यान के द्वारा तुरीया या आनंदमय अवस्था आपके जागुत और गहरी निंद्रावस्था को भेदना शुरू कर देता है।
ध्यान का उद्देश्य इस चौथे अवस्था को कम से कम एक बार अनुभव करना है। एक बार जब हम इस चौथी अवस्था का अनुभव कर लेते हैं. तो हम इसके प्रभाव को अपने जागृत अवस्था और गहरी निंद्रावस्था पर ज्यादा से ज्यादा ला सकते हैं। अगर हमारी जागृत अवस्था और गहरी निंद्रावस्था इस चौथी अवरथा से पूरी तरह प्रभावित है तो तुरीया, जिसे हम जीवन मुक्ति कहते हैं या जीवित आत्मज्ञान, वह प्राप्त करते हैं।
दैहिक स्वास्थ्यः
ध्यान में आपको दैहिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से परिवर्तित करने की शक्ति है। देखिये शारीरिक स्वास्थ्य का अर्थ है जो कुछ भी आप खाते हैं उसका पाचन और उस खाने का आपके शरीर का अंग बनना। मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ है आप जिस किसी भी चीज का सामना करते हैं उन विचारों और समस्याओं को पचाकर एक स्पष्ट समाधान खोजना। दसरे शब्दों में यह द्वंद्व रहित जीवन जीना है। आध्यात्मिक
स्वास्थ्य का अर्थ है सभी महान् शिक्षाओं और ऊर्जाओं को ग्रहण करना, उन्हें पचाना और एक मुक्त जीवन जीना। इन तीनों को प्राप्त करना संपूर्ण स्वास्थ्य है।
ध्यान चिकित्सकीय पूरकता है। ध्यान के द्वारा, आप अपने रक्तचाप और मधुमेह को नियंत्रित कर सकते हैं और अपने शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को (बीमारियों को विरूद्ध) बढ़ा सकते हैं। ध्यान के द्वारा पुराने चर्म रोगों, यक्ष्मा, अर्थराईटिस (गठिया) जैसी बीमारियों का ईलाज संभव है। ध्यान की शक्ति से कोई बीमारी नहीं बच सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य– बुद्विमत्ता की जागृति और अंतः प्रज्ञा का प्रस्फुटीकरणः
मानसिक स्तर पर, ध्यान विचारों की स्पष्टता को बढ़ाता है। ध्यान, एकाग्रता और स्मृति शक्ति (स्मरण शक्ति) को बढ़ाने का एक सिद्ध तरीका है। सबसे ऊपर, ध्यान आपको बौद्धिकता से बुद्धि और समझदारी (अंतः प्रज्ञा) की ओर ले जाता है।
ध्यान के साथ, आप मन से परे जाते हैं, अपने होने में आरंभ में कोई नियम नहीं होता है। आप अपनी पूरी संभावना को प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसीलिए ध्यान के द्वारा स्वयं आप को अचानक अपने वातावरण के साथ निश्चिंत विश्राम में पाएंगे, आसानी के साथ नई स्थिति के साथ तारतम्य बना लेंगे। आप अपने स्वस्फूर्तता को पुनः पा लेंगे।
स्वचिकित्सकीय विचार:
चित्किसीय रूप से आपके पास भले ही एक स्वस्थ शरीर है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप पूरी तरह से स्वस्थ हैं। निश्चित रूप से, मैं
अपने करोड़ों लोगों को देखने के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं, निन्यानवे प्रतिशत लोग जिनके तंत्र मे 'स्वचिकित्सकीय स्पष्टता' नहीं है, वो कभी अपने शारीरिक स्वास्थ्य को बनायें नहीं रख पाऐंगे। जब में कहता हं 'स्वचिकित्सकीय स्पष्टता', तो मेरा तात्पर्य उस स्पष्टता और समझदारी से है जिससे आप जब चाहें अपने आपको अवसाद से उबार लें जब भी वह आपकी चेतना को अपने चंगुल में फंसाने की कोशिश करता है।
केवल साल भार पहले, मैं ने एक अनुसंधानात्मक अध्ययन किया। मैंने एक खास वर्ग के लोगों को चुना जो किसी ध्यान कार्यक्रम के अंतर्गत रहे थे और उन पर कुछ आध्यात्मिक अध्ययन किये। मैंने उनसे बिना किसी काट छांट के जो कुछ उनके मन में आता है वह लिखने को कहा। फिर मैंने दूसरे समूह के लोगों को जो कभी अध्यात्म के साथ नहीं जुड़े थे, उन्हें भी बिना किसी काट छांट के बीस मिनट तक जो कुछ उनके मन में आता है वह लिखने को कहा। मेरे अध्ययन का परिणाम चौंकाने वाले थे।
उन लोगों के संदर्भ में जो अध्यात्म के साथ कभी नहीं जुड़े थे, अगर उन्होंने एक सौ विचार लिखे थे तो उनमें से अरसी अवसाद के प्रति संपूर्ण राज है- अपनी भावनाओं और कार्यों का साक्षी बनना।
एक बार जब आप इस बात से अभिज्ञ हो जाते हैं कि असल में आप वो नहीं हैं जो गुरसाता है, या दुखी होता है या अवसाद ग्रस्त होता है, तब आपको एक स्वतंत्रता का बोध होता है। यह ध्यान के द्वारा होगा। और यही असली स्वतंत्रता है।
अपने संपूर्ण जीवन में हम स्वतंत्रता की खोज में रहते हैं। चाहे हम उसे समझें या नहीं, हम में से हर कोई स्वतंत्रता की खोज में है। हम सोचते हैं कि हमारी स्वतंत्रता दूसरे पर निर्भर है। अब आप यह समझते हैं (जानते हैं) कि दूसरा व्यक्ति किसी भी तरह से आपकी स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ नहीं है।
बिना किसी कारण के प्रेम और आनंद:
ध्यान के साथ पहली बार आप समझेंगे कि अकारण प्रेम का अर्थ क्या है। पहली बार आप कुछ पाने के लिए कोई चीज नहीं देंगे। आप बस इसलिए प्रेम करेंगे क्योंकि आपके पास इतना ज्यादा देने के लिए रहेगा! आप पूरे संसार में उसी तरह प्रेम वर्षा करेंगे जैसे मेघ पुथ्वी पर करता है या कोई फूल जिस रूप में स्वस्फूर्त अपनी सुगंध को बिखेरता है। आप बस इसलिए प्रेम करेंगे क्योंकि आप इतने अधिक भरे—पूरे हैं।
क्रीडा रूप कार्यः
सिर्फ कोशिश करें: जो कुछ आप करते हैं, सजगता से करें। अगर आप खाते हैं, सजगता से खाएें। इसके लिए अतिरिक्त समय की जरूरत नहीं पड़ती है। इसमें आपको खाने में कम समय लगेगा क्योंकि जितना आपके शरीर को जरूरत है बजाए इसके कि बिना सोचे समझे बस खाना रूझान लिए हुए थे। उनमें से सिर्फ बीस प्रतिशत ही स्वचिकित्सकीय या अवसाद से उबरने के प्रति थे। किंतु उनके संदर्भ में जो अध्यात्म और ध्यान से जुड़े थे, मैंने पाया कि साठ प्रतिशत से ज्यादा विचार स्वचिकित्सकीय है! सिर्फ चालीस प्रतिशत ही अवसाद के प्रति थे। यही ध्यान का प्रभाव है। यह आपको सम्पूर्ण स्वस्थ रखता है।
ज्ञान अवसाद से लड़ने का अस्त्र :
सत्य के ज्ञान को मैं 'ज्ञान अस्त्र' कहता हूं या शास्त्र–शस्त्र। शास्त्र–अर्थ है सत्य, ज्ञान। शस्त्र का अर्थ है हथियार। ज्ञान अस्त्र का अर्थ है सत्य का हथियार जो आपके आत्म के अवसाद को नष्ट करता है। जितना ज्यादा ज्ञान—अस्त्र आपके पास है, उतना ज्यादा अवसाद आपसे भयभीत होगा! अगर आपके पास एक विशाल सेना होगी तो स्वाभाविक ही शत्रू राज्य आप पर आक्रमण करने से डरेगा। बस आपके हथियारों के जखीरे को देखकर, दूसरा देश आप पर आक्रमण करने से पहले सौ बार सोचेगा। उसी तरह, जितना ज्यादा स्वचिकित्सकीय विचारों का आप संग्रह करते हैं, ज्ञान—अस्त्रों का, आपके व्यक्तित्व के अंदर, उतना ज्यादा अवसाद आपके पास आने से डरेगा।
स्वतंत्रताः
ध्यान के साथ, आप अपना जीवन और ज्यादा स्पष्टता और प्रगाढ़ता से जी सकते हैं। आप और ज्यादा सजग और प्रगाढ़ होगें। फिर आंतरिक रूप से आप एक गहरी और अविचलित शांति का अनुभव करेंगे।
अब आप और ज्यादा कुछ करेंगे नहीं, आप बस करने वाले को देखेंगे। यही ध्यान का जीवन-मुक्ति
ध्यान क्यों
जा रहे हैं, गले के नीचे।
सजगता में अत्यधिक ज्ञान है। सजगता आपकी सभी योजनाओं से ज्यादा जादुई कार्य करेगी। सजगता योजनाविरोधी नहीं होता है, यह योजना की सपुरकता है। यह क्षमता को बढ़ा देती है।
| ध्यान के साथ | ||
|---|---|---|
| पहली बार आप | ||
| समझेंगे कि | ||
| अकारण प्रेम का | ||
| अर्थ क्या है। |
जब आप सजग होते हैं, आप अनुपस्थित हैं। जब सजगता उपस्थित है, आप का अहम नहीं होता है। जब आपका अहम् होता है, सजगता नहीं हो सकती है। आपकी अहम अनुपर्स्थिति आपको आत्मज्ञानी रूप में जीवित रखती है।
जब आप सजग होते हैं, आप अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य करते हैं और आप अपनी ऊर्जा को कुशलतापूर्वक प्रयोग करते हैं। इसीलिए दिन के अंत में आप उतने ही तरोताजा रहते हैं जितना कि सुबह में। आप देखिये, वह कार्य नहीं है जो आपको थकाता है, यह है आपका मन, आपका दृष्टिकोण। ध्यान के संपूर्ण खेल का उद्देश्य इस कार्य उन्मुख मन से उबरना है और जीवन के हर पल को एक सुंदर दैविक क्रीड़ा के रूप में देखना है।
ध्यान कब करें?
अगला प्रश्न है ध्यान कब करें। यह सदा से एक विवाद का प्रश्न है! सभी बच्चे सोचते हैं, कि मैं इसे बड़े होने पर करूंगा जब मैं अपना पूरा जीवन जी लूंगा और मेरे पास कोई कार्य नहीं रहेगा करने को। 'सभी बुजुर्ग लोग सोचते हैं, 'मुझे इसे अपने युवावरश्था में कर लेना चाहिए था जब मैं ऊर्जावान और युवक था।'
इसीलिए प्रश्न बस यह नहीं है कि हर दिन कितने देर ध्यान लगाना चाहिए, बल्कि यह भी कि ध्यान में कब भाग लेना चाहिए। कृपया समझिये, ध्यान हर व्यक्ति की मूल आवश्यकता है। यह चयन नहीं है। यह मूलभूत नितांत आवश्यकता है।
ध्यान के प्रकारः
ध्यान के तीन प्रकार हैं।
प्रथम है अपने जीवन में सत्य या सजगता को लाना। यह ध्यान दिन में चौबीसों घंटे करना माना जाता है। श्वसन संबंधी विधि जैसे विपरसना या फिर वे विधियां जिसमें आप हर समय अपनी सजगता को वर्तमान क्षण पर केंद्रित करते हैं, इस प्रकार के ध्यान में आते हैं। यह आपकी दिनचर्या का अंग नहीं है। यह आपके दिनचर्या का प्रमुख गुण होना चाहिए। भले ही आप कुछ भी कर रहे हों जैसे कि लिखना, पढ़ना, खाना बनाना, बातचीत करना किंतु इस ध्यान की डोर सतत उसके साथ—साथ एक अंतः धारा के रूप में होना चाहिए।
दूसरे ध्यान की विधि के साथ, आपको एक खास समय व्यतीत करना है, जैसे कि सुबह में एक घंटा या शाम में एक घंटा, या फिर कोई भी समय जो आपको सुविधाजनक लगे।
महामंत्र ध्यान विधि, जहां आप कुछ मिनट के लिए मंत्रोचारण करते हैं और फिर कुछ मिनट
विपासना -श्वांसो को महसूस करते हुये अपने अंदर को देखना यह विधि को जीवन मुक्त गुरू बुद्धा जी ने दिया था। महामंत्र - अनाहद चक्र को ऊर्जावान करने के लिये हम्म करना जो कि नित्यानंदा लाइब्रिस कार्यक्रम में सिखाया जाता है।
ध्यान के लाभ
स्वास्थ्य—
ध्यान का परिणाम संपूर्ण स्वास्थ्य है। यह शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करता है। जो ध्यान करते हैं उनके द्वारा बताये गये कुछ स्वास्थ्य लाभ इस प्रकार हैं :
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उच्च और निम्न रक्तचाप, मधुमेह, दैहिक ताप और हृदय स्पंदन का नियमन।
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मस्तिष्क और शारीरिक तारतम्य का संतुलन।
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मांसपेसियों के तनाव में कमी, हड्डियों को मजबूती, बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता
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स्वच्छता—विषाक्त और शारीरिक मल का जल्द नष्ट होना।
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अनिंद्रा पर विजय और निंद्रा की गुणवत्ता में सुधार।
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ऊर्जा में विकास, कार्य क्षमता में बढ़ोतरी।
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ज्यादा जीवन काल– शारीरिक संरचना और शारीरिक कोशिकाओं में ज्यादा जीवन काल के साथ उसमें विकास।
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संबंध– ध्यान अपने अंतः स्वरूप से आपको स्वयं के साथ और दूसरों के साथ तारतम्य में रखता है। इसका सीधा प्रभाव है गहरा, मित्रों और हर किसी के साथ जिनके साथ आप का जीवन में सामना होता है. ज्यादा अर्थपर्ण अंतःव्यक्तिगत संबंध।
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स्वस्थ्य कारक शारीरिक रसायनों का स्त्राव– यह प्राकृतिक अवसादविहीन रसायनों के स्त्राव को बढ़ाता है, इण्डोरफीन के स्नाव को बढ़ाता है, जो शरीर का 'आनंदकारक रसायन' है।
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बद्धिमत्ता– सक्षमता से कार्य करने के लिए व्यक्ति को बहिमत्ता की जरूरत होती है। ध्यान आपके अंतः बुद्विमत्ता को जागुत करता है जो आपको ज्यादा सजग और तीक्ष्ण बनाता है। इसका प्राकृतिक परिणाम है जो कुछ आप करते हैं उसका विकसित, सक्षम और प्रयासहीन निष्पादन।
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सुजनात्मकता– हममें से हर कोई अपने अंदर एक छपे हुए योग्यता और क्षमता को रखता है जिससे हम अनजान हैं। ध्यान उस छुपी हुयी सुजनात्मकता और अंतः योग्यता का अनुभव कराने में मदद करता है और उसको उजागर करता है।
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विश्वसनीयता– ध्यान आपको अपने सत्यरूप से स्पर्श करता है और आपको अपने अनुठेपन का अनुभव कराता है, आत्मविश्वास तब उसका स्वभाविक उपपरिणाम होता है।
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संतुलन– हममें से ज्यादातर लोग जीवन को एक roller-coaster ride की तरह जीते हैं और भावनाएं जैसे चिंता, ईर्ष्या, असंतष्टि, भय, क्रोध, अपराधबोध इत्यादि के बंधनों में झलते हैं, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता है। ध्यान आपको अपने आप पर केंद्रित करने में मदद करता है, और आपको एक टोस आंतरिक संतुलन प्रदान करता है और इस तरह आपको अपना नियंत्रक बनने की क्षमता देता है।
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विश्राम, शांति और आनंद– यह ध्यान का स्वभाविक उप परिणाम है जिसको पाने के प्रयास में हम लगभग संपूर्ण जीवनकाल को व्यतीत कर देते है। आंतरिक मन को आराम और शांति। ध्यान के साथ, आप अपने आप भय, लोभ और तनाव, के दुष्चक्र से उबरते हैं और आनंद के सुचक्र में प्रवेश करते हैं।
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संपर्ण आध्यात्मिक विकास– बुद्धिमत्ता को मापने के लिए हमारे पास आई क्यू या बद्विमत्ता मापदंड हैं, जिसे बहत से स्तरीय परीक्षाओं से मापा जाता है। हाल ही में एक अन्य मापदंड महत्वपूर्ण होता जा रहा है, खासकर कॉरपोरेट (उद्योग जगत) जगत) जगत में, वह है ई.क्यू या भावनात्मक मापदंड। फिर भी हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कारक आंतरिक संतुष्टि और परिपूर्णता भाव ही अंत में मायने रखता है। ध्यान जीवन के इसी महत्वपूर्ण कारक को विकसित करता है, एस.क्यू या आध्यात्मिक मापदंड के साथ में विकसित आई.क्यू और ई.क्यू को भी।
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जीवन- अभी, हमारी मानसिक संरचना कटोर है और हमारे व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित करती है। इसके कारण हम अपने जीवन में बहत सी कठिनाईयों का सामना करते हैं और जीवन का पूरी तरह से आनंद नहीं उठा पाते हैं। ध्यान मस्तिष्क के सॉफ्टवेयर को पुनः निर्धारित कर देता है जिससे कि हम जीवन को परिपर्णता में जी सके।
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अंतिम संभावना – आप एक हवाई जहाज की तरह उड़ने की संभावना के साथ हैं, किंतु आप सोचते हैं कि आप एक बैलगाडी हैं क्योंकि आपने अपनी संभावना को वास्तविक नहीं बनाया है। ध्यान आपको वास्तव में आप जो हैं और जिस अपार क्षमता के साथ आपने जन्म लिया है उसका अभिज्ञान कराता है और उसका अनुभव आपको प्रदान करता है।
के लिए एक साक्षी के रूप में रहते हैं, को इस तरह के ध्यान के वर्ग में उदाहरण के तौर पर दिया जा सकता है। नित्य ध्यान इस तरह के ध्यान का एक अन्य उदाहरण है, क्योंकि इसको अभ्यास एक खास समय में हर दिन किया जाता है।
फिर तीसरे तरह की ध्यान विधि है, जहां विधि का स्मरण ही काफी है।
इसका उदाहरण महान सनातन सत्य वचन हैं। जब आप एक उच्च परिपक्व अवस्था में होते हैं, तो आपको किसी पृथक विधि की जरूरत नहीं पड़ती है। आपको सारे दिन या किसी खास समय पर अभ्यास करने की जरूरत नहीं पड़ती है। बस इन वचनों की स्मरण ही आपको उस उच्च अवरश्या में पहुंचा देंगे। यह तीसरे तरह का ध्यान है। इसका उदाहरण सुंदर जेन कोआन है (जेन पद्वति में आत्म अनुभूतियों की मदद के लिए इन पहेलियों को विधि के रूप में दिया गया है)। ये एक अतिशक्तिशाली सत्य हैं जो सार रूप में लिखे हुए हैं। बस इनका स्मरण ही आपको सत्य की परिधि में पहुंचा देगा!
उपनिषद् में एक बहुत ही सुंदर कथा है। जहां एक शिष्य गुरू जी को पास आता है और आत्मज्ञान की विधि या तरीके के बारे में पूछता है। गुरूजी कहते हैं, 'तत् त्वम असी, तत् त्वम् असी, तत् त्वम् असी', तुम ही वह हो, तुम ही वह हो, तुम ही वह हो, और यह कथा कहती है, वह शिष्य आत्मज्ञानी हो गया!
यह एक अजीब कथा लगती है। वह गुरू केवल कुछ शब्दो को दोहराते हैं और वह शिष्य अचानक आत्मज्ञानी हो जाता है। यह कैसे संभव हुआ? यह अविश्वसनीय लगता है! असल में यह वैसा नहीं है। अगर हमने प्रथम दो विध्यों को किया है, वह विधि जिसे पूरे दिन करना पड़ता है और वह विधि जिसे किसी नियत समय पर करना होता है, तब उन अभ्यासों से जो परिपक्वता प्राप्त होती है वह आपको उस सत्य का अनुभव उस क्षण करा देगी जिस क्षण आप उसे अपने गुरू के मुख से सुनते हैं।
स्वप्न के रूप में सत्य:
आपको आश्चर्य हो सकता है, 'यह कैसे है कि हर दिन जब मैं जागता हूं, तो मैं इसी संसार को देखता हूं, किंतु हर रात जब मैं स्वप्नावस्था में लौटता हूं, तो उसी संसार को नहीं देखता हूं? इसीलिए, क्या इसका प्रयोग एक मापदंड के रूप में हो सकता है? जिसके साथ हम कह सकते हैं कि यह जागृत—अवस्था का संसार ही सत्य संसार हैं?'
कृपया किसी रात के स्वप्न का विश्लेषण करें। उदाहरण के लिए, कहिए कि चौदह तारीख की रात को आप सोने के लिए गए, और पन्द्रह तारीख की सुबह आप जागे। आप लगभग दस घंटे सोए। मुझे विश्वास है आपमें से बहुतों ने दस से बीस वर्षों के जीवन को एक रात के स्वप्न में जीया होगा, बस दस घंटे के समय में।
शायद, आपका स्वप्न आपके कॉलेज के दिनों से शुरू हुआ होगा और धीरे-धीरे, कदम दर कदम, आपके विवाह तक पहुंचा होगा, आपके पुत्र होने तक, आपके पुत्र के विवाह तक, अन्य बातों
कोनस - जेन सम्प्रदाय के रेडलेस के द्वारा आत्मबोध प्राप्ति के लिये दी गई एक विधि। उपनिषद - साधारणतौर पर गुरू के चरणों के पास बैठना।
जीवन-मुक्ति
यह आपको एक बड़ी स्पष्टता की ओर ले जाएगी, जो आप जिस रूप में अपने जीवन के बारे में सोचते हैं, जिस रूप में आप अपने जीवन की समस्याओं के समाधान की कोशिश करते हैं, उसमें सचमुच एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है।
कल्पना कीजिए एक व्यक्ति स्वप्न देख रहा है। स्वप्न में वह देखता है कि एक बाघ उसे खदेड़ रहा है, और वह चिल्लाना शुरू करता है, कि 'ओह, एक बाघ मुझे खदेड़ रहा है! मुझे बचाओं, मुझे बचाओ!' उसकी पत्नी उसके बगल में सो रही है। वह जागती है, और देखती है कि उसका पति चिल्ला रहा है। पत्नी भ्रमित है, 'मुझे क्या करना चाहिए?' बस उसे कहने की जरूरत है, 'हे जागो! बजाए इसके अगर वह उसे स्वप्न में बाघ को मारने के लिए कोई हथियार दे, तो क्या होगा? या तो वह अपने आप को मार डालेगा या पत्नी को मार देगा! कोई दूसरा समाधान जो वह खोजेगी वह केवल उसे और ज्यादा समस्या में डाल देगा। पति को जो कुछ करने की जरूरत है वह है जागाना।
अगर आप इन मूलभूत बातों को समझते हैं, अचानक आप देखेंगे कि आपकी निर्णय लेने की प्रक्रिया में क्रांतिकारी बदलाव आ गया है। आप में एक स्पष्ट बदलाव आ गया है। वह तरीका जिसमें आप सोचते हैं और वह तरीका जिसमें आप निर्णय लेते हैं, वह तरीका जिसमें आप अपनी समस्याओं का समाधान खोजते हैं, वह सब बिल्कुल अलग होगा। आप उचित समाधान की ओर कार्य करना शुरू कर देंगे।
जब आप स्वप्न देखते हैं, दस घंटे की एक अवधि में, आप आसानी से बीस वर्ष का जीवन जी सकते हैं। आप कई बार गहरी निंद्रा में जाते हैं
तक। इस तरह, आप अपने जीवन के बीस वर्ष सिर्फ एक रात के स्वप्न में जीते हैं। क्या मैं सही हूं? अगर आपने इसे कम से कम एक बार अनुभव किया है, तो आप अब मैं जो प्रस्तुत करने जा रहा हूं उसका बहुत नजदीक से अनुकरण करेंगें।
आप देखिये, सोते समय, हम स्वप्नावरथा में जाते हैं और गहरी नींद की अवरश्या में। भले ही आधे घंटे के लिए, आप गहरी नींद मे चले जाते हैं। फिर आप स्वप्नावस्था में चले जाते हैं और फिर क्छ स्वप्न देखते हैं। फिर आप शायद बीस मिनट के लिए गहरी नींद की अवस्था में चले जाते हैं, और फिर एक बार, आप स्वप्नावस्था में लौट आते हैं। इस तरह आप स्वप्नावस्था से गहरी नींद की अवस्था में आते जाते रहते हैं।
समझिये: एक रात, आपने स्वप्न देखा कि आपने अपने जीवन का बीस साल जीया है। अपने स्वप्न के प्रथम चरण में, आप कॉलेज में हैं। दूसरे चरण में, जब आप गहरी निंद्रा अवरश्था से स्वप्नावरथा में लौटते हैं, आप विवाहित हैं। अपने स्वप्न के तीसरे चरण में, आपको पुत्र है। हो सकता है चौथे चरण में, आप देखें कि आप का पुत्र विवाह कर रहा हैं ।
एक महत्वपूर्ण बात आपको जानना जरूरी है: जब आप गहरी निंद्रावस्था में जाते हैं और फिर जब आप स्वप्नावरथा में लौटते हैं, और फिर इस प्रक्रिया को दोहराते हैं, इन विभिन्न चरणों में, आप स्वप्नावस्था में भी उसी संसार को देखते हैं। क्या मैं सही हूं? कभी—कभी आप स्वप्नावरश्था में भी वही संसार को देखते हैं।
समझिये, यह बहुत ही सूक्ष्म बिंदु है, एक सूक्ष्म समझदारी। अगर आप इसे पकड़ सकते हैं,
ध्यान क्यों
ध्यान क्यों
और स्वप्नावस्था में लौटते हैं। जब कभी आप गहरी निंद्रावस्था से स्वप्नावरश्था में जाते हैं, यद्यपि उसमें पिछले स्वप्न से अलगाव होती है, आप वही संसार देखते हैं। इसीलिए, आपको स्पष्ट रूप समझना होगा कि ब्रेक के बाद उसी संसार को देखना उसे सत्य के रूप में जानने का गुण नहीं हो सकता है। तभी जब आप नींद से जागते हैं, तभी आप समझते हैं कि बस दस घंटे में आप बीस साल के जीवन को 'जी' लिया।
उसी तरह, जब आप इस जागृत स्वप्न से जागते हैं, जिसमें अभी आप जी रहे हैं, अचानक आप समझेंगे कि आप कुछ ही घंटे में नब्बे वर्ष के जीवन का स्वप्न देख लिया। जागृत अवस्था का यह जीवन भी एक अन्य जीवन का स्वप्न हो सकता है!
जब आप स्वप्न में होते हैं, तो आप स्वप्न को असली जीवन समझते हैं। जहां आप होते हैं, उस पल के लिए वही सत्य होता है। वहां कोई दूसरा मापदंड नहीं होता है। स्वप्न में आप कभी कल्पना नहीं कर सकते, 'यह स्वप्न है।' वास्तविक जीवन में, आप कभी नहीं सोच सकते हैं, 'यह एक और स्वप्न है।' जब आप स्वप्न से जागते हैं, तब कोई स्वप्न स्वप्न स्वप्न लगता है। किंतु जब आप स्वप्न में ही रहते हैं, यह एक स्वप्न के रूप में नहीं दिखता है।
स्वप्न में, भी जब अपने असली जीवन के बारे में सोचते हैं, आपको वह एक स्वप्न लगता है। असल जीवन में, भी जब आप स्वप्न के बारे में सोचते हैं, आप सोचते हैं कि यह एक स्वप्न है। इसीलिए वह उस सतह पर निर्भर करता है जिस पर आप होते हैं। वहां कोई दूसरा मापदंड नहीं है
यह कहने के लिए कि सत्य क्या है और स्वप्न क्या ।
यह समझ और ज्ञान कि ऐसा संभव है कि यह जाग्रत अवस्था भी एक लम्बा स्वप्न हो सकती है। तब यह समझ ही आपके अधिकांश अवधान और सजगता को केन्द्र की ओर, चेतना की तरफ, परम सत्य की ओर मोड देगी। जब आप इस जागृत अवस्था की आवृत्ति से परे जाते हैं, तो यह जागुत अवस्था भी एक और स्वप्न की तरह लगेगा।
आध्यात्म की ओर यह प्रथम कदम है। मनोवैज्ञानिक क्रांति में यह प्रथम कदम है।
बार—बार, आपकी पीडा आपको एक स्पष्ट वक्तव्य प्रदान करती है कि आप सत्य में नहीं जी रहे हैं।
बहुत बार मुझे एक ही अर्थ में अन्य तरह से प्रश्न पूछे जाते हैं, 'न सिर्फ मैं इस संसार को देख रहा हूं, यहां तक कि वे लोग भी जो मेरे चारों ओर रहते हैं उसी संसार को देख रहे हैं। आप कैसे कह सकते हैं कि यह एक स्वप्न है?'
समझिये, स्वप्न में अगर आप किसी खास शहर को देखते हैं, और अगर आप स्वप्न में अपने संपूर्ण परिवार के साथ उस शहर में जाते हैं, तब न सिर्फ आप, बल्कि स्वप्न में आपके साथ आपका परिवार भी उस शहर को देखेगा, क्योंकि तब वे भी आपके मन के द्वारा निरूपित हैं! बस इसलिए कि आपके चारों ओर के लोग भी वही दृश्य देखते हैं जो आप देखते हैं, वह दृश्य सत्य है, ऐसा नहीं है। आपके चारो ओर के वे लोग भी उसी दृश्य का निरूपण हो सकते हैं!
परम सत्य यह है कि जिन चीजों से
आपके स्वप्नलोक का निर्माण होता है वह वही हैं जिससे इस जागृत संसार का निर्माण होता है।
अगर आपका ध्यान स्वप्न लोक पर केंद्रित है, स्वभाविक ही तब अंत चिकित्सा अपना उपचार नहीं कर सकती है। अगर आपका ध्यान बराबर रूप में चेतना और उन वस्तुओं में बंटे हुए हैं, तो यह स्वस्थ और संतुलित जीवन है। आपके पास दैहिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और एक जीवंत जीवन होगा।
अगर आपका ध्यान पूर्ण रूप से चेतना पर केंद्रित है न कि उन चीजों पर जिससे इस संसार का निर्माण हुआ है, इसे ही मैं 'जीवंत आत्मज्ञान' या जीवन मुक्ति कहता हूं।
चाहे आप जीवन मुक्ति चाहें या नहीं, चाहे आप आत्मज्ञान चाहें या नहीं, यह अप्रासांगिक है। किंतु अगर आप अपना थोडा सा अवधान भी इस 'मैं' चेतना की तरफ देते हैं, सत्य की तरफ, केंद्र की तरफ अचानक आप देखेंगे कि तीब्र आंतरिक चिकित्सा होने लगती है।
उदाहरण के लिए, अगर आप किसी बड़ी समस्या या अवसाद का सामना कर रहे हैं, अगर आप बहुत स्पष्ट रूप से और चेतन रूप से यह समझते हैं कि यह सब एक स्वप्न हैं, आप इतना आराम का अनुभव करेंगे और आंतरिक चिकित्सा आप में होना आरंभ हो जायेगी। आंतरिक चिकित्सा को ही मैं ध्यान करता हूं। वह विश्रामपूर्ण सजगता जो आपमें होती है, उसे ही ही मैं सतोरी कहता हूं समाधि का प्रथम अनुभव ।
एक अधारभूत मनोवैज्ञानिक क्रांति, सरल समझ के साथ कि जो कुछ आप देख रहे हैं, वह सत्य नहीं भी हो सकता है जैसा कि आप सोचते है, आपमें एक प्रबल अंतः चिकित्सा ला सकता है, आपके अंदर एक अपार विश्रामपूर्ण सजगता ला सकता है।
ध्यान पर वैज्ञानिक अनुसंधान की झलकें:
विज्ञान अभी—अभी ध्यान के उस अपार शक्ति का रूप देख पाया है जो संपूर्ण शरीर-मन की संरचना को पूर्ण रूप से बदलता है। ध्यान के लाभ असंख्य है और सभी सतहों से परे है, चाहे वह दैहिक हो, मानसिक हो, भावनात्मक हो या आध्यात्मिक। ध्यान आपके जीवन के स्तर को सरलता से बदल सकता है।
विकसित मानसिक शाक्तिः
अभी हाल तक, यह माना जाता था कि मस्तिष्क की नसों की कोशिकाओं का संबंध बाल्यावरश्या में ही निश्चित हो जाती हैं जो बदलता नहीं हैं, इसीलिए मस्तिष्क का विकास जीवन के पूर्वाद्व में ही बंद हो जाता है। अब वैज्ञानिक लोग पा रहे हैं कि असल में मस्तिष्क जीवनपर्यन्त विकसित होता रहता है और नए नए नसों में नया संबंध होता रहता है, वे इसे न्यूरोप्लास्टी—सिटी कहते हैं ।
एक दिन मैं विसकॉनसीन विश्वविद्यालय के द्वारा की गई खोज के बारे में जो मस्तिष्क पर ध्यान के प्रभाव से सबंधित थी, को अखबार में (वांशीगटन पोस्ट, 3 जनवरी 2005) पढ़ रहा था। वह अध्ययन एक तिब्बती साधुओं के समूह पर किया गया था, जो वर्षों से ध्यान लगाते आ रहे है और ऐसे विद्यार्थियों के समुहों पर जो ध्यान के प्रति नए थे, किंतु जिन्हें ध्यान कैसे लगाया जाए यह
जीवन-मुक्ति
ध्यान क्यों
सिखाया जा रहा था।
उन्होंने पाया कि ध्यान लगाने वाले साधुओं में उन विद्यार्थियों के उपेक्षा जो ध्यान के प्रति नए थे, सजगता ज्यादा थी और उनके मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रखर व्यवस्थित और सुनियोजित थी। न सिर्फ यह, मस्तिष्क का वह भाग जो खुशी से जूडा हुआ था, सकारात्मक विचारों और भावनाओं से जुड़ा हुआ था, वह भी उन साधुओं में उन विद्यार्थियों के अपेक्षा ज्यादा क्रियाशील था।
एक और महत्वपूर्ण बात, अनुसंधानकर्त्ताओं ने पाया कि ध्यान लगाने से पहले ही ध्यान साध्कों के मस्तिष्क की कार्यक्षमता ज्यादा सुनियोजित और प्रखर थी (उन विद्यार्थियों से)। इसलिए ध्यान के लाभ वास्तव में स्थाई होते हैं। ध्यान ही मस्तिष्क के तंत्र संरचना और आंतरिक क्रिया विधि को बदल सकता है।
अमेरिका के बहत सी अग्रणी विश्वविद्यालय जैसे हार्वर्ड और एम आई टी (मसैचुसेट्स तकनीकी संस्थान) ने भी ध्यान के प्रभाव का अध्ययन किया है |
उन अध्ययनों ने एम. आर. आई. (मैगनेटिक रिजोनेंस प्रतिलिपि) के प्रयोग के द्वारा यह दिखलाया है कि ध्यान असल में मरितिष्क के उन क्षेत्रों की मोटाई को बढ़ा देता है जो सजगता और एकाग्रता से जुड़ी हुई है, उसके साथ—साथ पहचानने की प्रक्रिया और भावनात्मक स्वास्थ्य को।
अनसंधानकर्ताओं ने पाया कि रक्तध्मनियों
चौडी हो जाती हैं, आधार संरचना संख्या में बढ जाती हैं और उनकी शाखाएं और संबंध बढ़ जाते हैं ।
ध्यान बनाम निंद्रा
केनट्टकि विश्वविद्यालय में एक अन्य अनसंधान हुआ जहां उन्होंने व्यक्ति की अभिज्ञा पर निंद्रा के प्रभाव का अध्ययन किया। एक व्यक्तियों के समुह को एक स्क्रीन (पर्दा) पर देखनें को कहा गया और उन्हें स्क्रीन पर कुछ देखते ही एक बटन को दबाना था। साधारणतः वे व्यक्ति जो कम सोये थे उन्हें ज्यादा समय लग रहा था। बटन दबाने में बजाए उनके जो सामान्य नींद लिये हुए थे। कभी-कभी वे स्क्रीन पर उभरते बिंबों को पूरी तरह से भी नहीं देख पाते थे।
अनुसंधानकर्त्ताओं ने शामिल लोगों का परीक्षण चालीस मिनट की नींद, ध्यान, पढ़ाई और कुछ हल्के क्रियाकलापों के पहले और बाद किया।
उन्होंने पाया कि ध्यान के साथ, हर शामिल व्यक्ति का प्रत्युतर सबसे तेज था, इसके बावजूद कि वे ध्यान के अनुभवी नहीं थे। असल में उनका प्रत्युत्तर पूरी रात जागकर भी बेहतर था!
एकाग्रता में सुधार और प्रत्युत्तर की रफ्तार
प्रत्यक्षज्ञान और प्रत्यूत्तर की गति शरि सटीकता पर ध्यान का प्रभाव को जानने के लिए बहुत से अध्ययन हो रहे हैं।
लीवरपुल जॉन मुरेस विश्वविद्यालय लीवरपुल, इंग्लैंड में कुछ एक अध्ययन किए गए हैं। एक अध्ययन में, प्रतिभागी व्यक्तियों को वर्णमालाओं की पंक्तियां दी गयीं थी जिनमें अक्षरों के ऊपर विभिन्न संख्याओं की रेखाएें चिन्हित थीं। उन्हें जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी उन अक्षरों को काटना था जिनके ऊपर बहत सी रेखाऐं थीं ।
दुसरे अध्ययन में, प्रतिभागियों को 'लाल', 'नीला', या 'हरा' जैसे शब्दों को दिखाया गया जो विभिन्न रंगों की स्याही में छपे हुए थे। उन्हें जल्दी से जल्दी स्याही के रंगों के नाम को बताना था, जिनमें वे शब्द लिखे हुए थे। सामान्यतः यह मुश्किल है क्योंकि आपका मस्तिष्क शब्द को पढने के प्रति कार्य करता है न कि उसको देखकर उसकी स्याही के रंग को पहचानने के प्रति जिनमें वह लिखा हुआ होता है।
उन्होंने पाया कि ध्यान साधक लोगों ने कहीं ज्यादा तीव्रता से और ध्यान साधना न करने वालों की अपेक्षा लगभग आधे से भी कम त्रुटियां की थी।
ध्यान प्रत्यक्ष रूप से और अर्थपूर्ण रूप से अभिज्ञा, एकाग्रता, रमृति, अवधान, प्रत्युत्तर दुष्टिगोचर क्षमता, भावनात्मक स्वास्थ्य और सामान्य स्वास्थ्य का विकास करता है।
विज्ञान अभी-अभी ध्यान को प्रभाव और लाभ के विशाल आयामों को खोजना शुरू किया है। किंतु हजारों सालों से वैदिक युग से ही, मनुष्य ध्यान के लाभ का फायदा उठा रहा है जो परम
सत्य को पाने का परम मार्ग है! यह एक पर्ण रूप से सुस्पष्ट, त्रुटिहीन, समयसिद्ध विधि है स्वयं को
...
जानने की ।
परमविधिः
कुछ ध्यान विधियां हैं जो विशेष कर खास समय और लोगों के लिए है, और कुछ विशेष कर ऐसी हैं जो सार्वभौमिक हैं। नित्यध्यान आज के जिज्ञासुओं के लिए हैं। यह साइबर युग का ध्यान 机
नित्य ध्यान का जन्म:
सर्वप्रथम मैं यह बतलाना चाहुंगा कि इस ध्यानविधि नित्य ध्यान का जन्म कैसे हुआ। ग्यारह वर्ष की आयु तक, मैंने बहुत सी ध्यान विधियों का अनुभव किया था। बारह वर्ष की आयु में मुझे मेरा गहरा अध्यात्मिक अनुभव हुआ। ग्यारह से इक्कीस वर्ष तक, मैंने सजगतापूर्वक विभिन्न ध्यान विधियों के लाभों का विश्लेषण और अवलोकन किया। अपने आत्मज्ञान के तीन वर्ष के बाद, मैं एक सबल विधि के सुजन पर कार्य किया जिससे कि मैं इस आत्मज्ञान के अनुभव को दूसरों में पुनः जागृत कर सक्रुं। इस संपूर्ण अंतः संसार अनुसंधान का निचोड जो मैंने आज तक किया है इस नित्यध्यान विधि में समाहित है।
नित्यध्यान एक सुत्र और विधि है जो सभी व्यक्तियों पर कार्य करती है जो उन्हें आत्मज्ञान के परम अनुभव के लिए तैयार कर उन्हें उनके रूपान्तरित लिए तैयार करती है। इस खास विधि का हर चरण आगामी चरण (स्तर) (प्रभाग) का पुरक हैं वैयक्तिक चेतना को जागृत करने के लिए। यह परम आनंद नित्युआंनद के लिए नित्य दिन किया जाने वाला ध्यान है।
चक्र सजगताः
इस विधि को समझने के लिए, हमें थोड़ा सा चक्रों या सूक्ष्म ऊर्जा केंद्रों के बारे में जानने की जरूरत है। सातों चक्रों पर कार्य करने का अर्थ है ऊर्जा के नए रास्तों को जगाना। यह टेलीविजन पर नए चैनल को लगाने या ट्यून करने जैसा है।
हमारे अंदर सात ऊर्जा केंद्र है, हर केंद्र किसी खास भावना से जुड़ा हुआ है। ये सात भावनायें हैं, वासना, भय, चिंता, स्वयं के प्रति ध्यान आवश्यकता, ईर्ष्या, अहम् और असंतुष्टि। वर्तमान में मनुष्य बस इस सात भावनाओं पर आधारित होकर ही सोच सकता है। उसका शरीर इन्हीं
भावनाओं में से एक की जरूरत को कारण अपने आप संचालित होता है। कुछ व्यक्ति इच्छा को कारण वासना या स्पर्श के कारण संचालित होंगे। कुछ एक को बस भय संचालित करेगा।
इच्छा जैसी भावनाओं के कारण संचालित होने में कुछ भी गलत नहीं है। किंतु आपको प्रेम जैसे उच्च आयामों का अनुभव भी करना चाहिए। आपको समझना चाहिए कि मात्र ऊर्जा के कारण भी कार्यरत होना संभव है, न कि सिर्फ इन भावनाओं के बल पर।
चक्रों को जागृत कर, आप इन भावनाओं की मानसिक बुनावट से छुटकारा पाऐंगे। आप एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह कार्य करना शुरू करेंगे। अगर आप ऐसी मानसिक बुनावट से मुक्त होते हैं, तभी आप स्वतंत्रता का महत्व समझेंगे।
उदाहरण के लिए अगर आप किसी खास चक्र से मुक्त होते हैं, जैसे ईर्ष्या से संबंधित चक्र से तो आप उस आयाम में एक नए संसार का अनुभव करेंगे, एक ईर्ष्या मुक्त संसार का! चाहे जिस किसी पहचान पर आपका व्यक्तित्व खड़ा हो, वह पहचान या विचार खत्म हो जाऐंगे। आप पूर्णतः एक नई ऊर्जा का अनुभव करेंगे।
उदाहरण के लिए अगर आप अचानक शेयर बाजार में रूचि लेने लगते हैं, आप टेलीविजन, पत्रिकाओं और लोगों इत्यादि से शेयर बाजार के बारे में ताजा सूचनाओं का संग्रह करने लगते हैं। एक महीने या ज्यादा के बाद आप यह मानने लगेंगे कि संपूर्ण संसार शेयर बाजार के बारे में ज्यादा सजग हो रहा है। आप शेयर बाजार से संबंधित लोगों से ज्यादा घिरा हुआ पाएंगे। ऐसा नहीं है कि दुनिया बदल गयी है, वह आपका विचार है जो बदल गया है। जब आप अपने ऊर्जा केंद्र को बदलते हैं, आप अपने चारों ओर वैसे लोगों को इकटटा करने लगेंगे।
अगर आप अपने ऊर्जा केंद्र को बदलते हैं, आप उस संसार को भी बदल सकते हैं जिसे आप देखते हैं। हिंदू पौराणिकताओं में वे कहते हैं सात संसार है। असल में उनका यही तात्पर्य है— सात भावनाऐं जो निर्णय करती हैं कि आप संसार को कैसे देखते हैं ।
नित्यध्यान ध्यान विधि:
यह पंच—चरण विधि है, हर चरण सात मिनट का है।
1. अव्यवस्थित श्वसनः
अवधि—सात मिनट। वज्रासन (एक) योग आसन जिसमें ठेहुने को मोड़कर बैठें और आपका पैर अंदर मुड़ा हो, जिसके ऐड़ी पर आपका नितम्ब हो) हमारे शरीर में सामान्यतः ऊर्जा सहस्रार चक्र (ताज केंद्र) से मूलाधर चक्र (जड़ केंद्र) की ओर प्रवाहित होती है। वज्रासन मुद्रा इस प्रवाह को मोड़ने में मदद करता है और ऊर्जा की उर्ध्वगमन
बज़आसन - एक योग मुद्रा जिसमें घुटनो को मोड़ कर व अपने पिछले हिस्से को ऐडी पर रखना है।
सहस्रसार चक्र - यह सातवाँ और अन्तिम चक्र है, जो सिर के ऊपरी हिस्से में रहता है। इसे ऊर्जा चक्र से ज्यादा एक प्रवेश द्वार जैसा माना जाता है।
मूलाधार चक्र - सूक्ष्म ऊर्जा चक्र जो रीढ़ के निचले हिस्से में रहता है। यह लोभ व काम की भावना से संबंधित है।
जब आपके शरीर की क्षमता उच्चत्तम सीमा में पहुंचती है, तो आप पाचन तंत्र बहुत सुंदर होगा। नित्य ध्यान का यह प्रथम चरण एक स्वस्थ शरीर का निर्माण करने के लिए है।
एक महत्वपूर्ण बात आपको समझने की आवश्यकता है कि आपके मानसिक अवरश्या पर आप के श्वसन का बदलाव निर्भर करता है। आपकी भावनाओं का प्रभाव आपके श्वसन प्रक्रिया पर पड़ता है। जब आप झुंझलाहट में होते हैं, आपका श्वसन बदलता है। जब आप तनाव में होते हैं, और यदि आप गहरी सांस लेते हैं, अचानक आप हल्का ज्यादा आराम, अनुभव करते हैं और आपका तनाव खत्म हो जाता है।
श्वसन और मन अंतः संबंधित हैं, एक में बदलाव स्वतः दूसरे में बदलाव लाता है। भावनाऐं हमारे हाथ में नहीं भी हो सकती हैं. किंतु श्वसन हमारे हाथ में है। अगर हम अपने श्वसन पर नियंत्रण करते हैं या
आपके मानसिक अवस्था के स्तर के बदलाव पर आप के श्वसन के स्तर का बदलाव निर्भर करता है।
अपने श्वसन रूप में कोई बदलाव लाते हैं, हम सीधे अपनी भावनाओं और मनः स्थिति पर प्रभाव डालते हैं ।
हम एक खास तरह से सांस लेने के आदी हैं। हमारे पूर्व संस्कार, पूर्व स्मृतियां हमारे अचेतन क्षेत्र में बंद हैं, जो हमारे तंत्र में एक खास तरह की
में सहायक होता है।
आंखें बंद कर बैठें, अपने हाथ कूल्हे पर रखें और अव्यवस्थित रूप में सांस लें। सांसे गहराई से और अव्यवस्थित रूप में अंदर ले और बाहर छोड़ें, बिना किसी लय के। अपना ध्यान बस सांस पर केंद्रित रखें। आपका संपूर्ण व्यक्तित्व श्वसन रूप हो जाएगा।
यह प्रथम चरण बहुत दैहिक है— व्रजासन में बैठकर जोर—जोर से अव्यवस्थित रूप में सांस लें और छोड़ें। आप अनुभव करेंगे अगर आपको कोई पाचन समस्या है, वह पूरी तरह से ठीक हो जाएगा। आपका शरीर तैयार हो जाएगा।
श्वसन प्रक्रिया का निर्माण करते है। इसके परिणाम स्वरूप हम एक ही तरह की भावनाओं और संस्कारों को आकर्षित करते हैं। हम एक दुष्चक्र में फंसे होते हैं जहां हमारे पूर्व संस्कार हमारी श्वसन प्रक्रिया को निर्धारित करते है और हमारी श्वसन प्रक्रिया भविष्य में वैसी ही संस्कारों और घटनाओं को आकर्षित करती है। इस दुष्चक्र को तोड़ना होगा।
नित्य ध्यान, अव्यवस्थित श्वसन से आरंभ होता है। क्योंकि यह श्वसन अव्यवस्थित है, इसका कोई तय प्रारूप नहीं है। मन का प्रारूप जो इसके अस्तित्व और अभिव्यक्ति का निर्माण करता है वह टूटता है। विचार उस प्रारूप का अनुकरण नहीं करते है जिसे वह कई वर्षों से इतने समय से अनुकरण करता आ रहे है।
हमारी मांसपेसियां हमारे सभी अतीत की
अंतः वार्ता को कम करने का यह गूंजायमान ध्वनि एक उत्तम विधि हैं ।
स्मृतियों को जैविक स्मृति ऊर्जा के रूप में संग्रह कर के रखती हैं। वह गहरी अव्यवस्थित श्वसन हमारी मांस पेशियों के तनाव को मुक्त करना शुरू करता और र The यो मांसपेशियों और
शरीर पर अंकित स्मृति प्रारूप दूर हो जायेंगे। हमारी मांसपेशियों सामान्यतः तनाव में होती हैं। अव्यवस्थित श्वसन हमारी मांसपेशियों को ढीला कर देगा और अंकित स्मृतियों को साफ करना शुरू कर देता है।
जीवन-मुक्ति
हमारे अंदर अवस्थित हर भावनाऐं एक खास तरह के श्वसन प्रारूप को जन्म देती है। आपने शायद देखा होगा कि बच्चे गहरी और आनंदपूर्ण सांस लेते हैं। किंतु जैसे—जैसे—जैसे वे बढ़ते हैं, वे समाज के द्वारा संस्कारित होना शुरू कर देते हैं, वे समाज से दर्द, सुख, अपराधबोध, आरश्थायें चुनने लगते हैं। फिर श्वसन का बिल्कुल गुण बदल जाता है। इस प्रारूप को ध्वस्त करने के लिये, जो आदतन दबाकर रखी भावनाओं के कारण निर्मित होता हैं, हमें अव्यवस्था को डालना होता है। दूसरे प्रारूप को उसके अंदर डालना समाधान नहीं है।
अतीत के सभी प्रारूपों को खोदकर हटाने के लिए आपको अपने व्यवस्था के अंदर एक पूर्ण अव्यवस्था का निर्माण करना होगा। इसीलिए मैं इस ध्यान में किसी लयबद्ध श्वसन प्रारूप जैसे कि प्राणायाम की सलाह नहीं देता हूं। बस अव्यवस्थित रूप से सांस लें। ये अव्यवस्थित श्वसन आपके अतीत की सभी पूर्व स्मृतियों से भावनात्मक लगाव को खत्म कर देगा। यह मृत पत्तों से लदे पेड़ को हिलाने जैसा है। सभी मृत पत्ते गिर जाऐंगे। इसी तरह अव्यवस्थित श्वसन आपके दबे तंत्र को झकझोरने जैसा है। सभी पूर्व की अंकित स्मृतियों मुक्त हो जाऐंगी।
गहरी अव्यवस्थित श्वसन अपार ऑक्सीजन को शरीर में भीतर डालती हैं और शरीर से कार्बन डाइऑक्साईड को निर्गत करती है। यह उच्च वायुद्वार का निर्माण करती है और इसके परिणाम स्वरूप आप ज्यादा ताजा और गुंजायमान महसूस करते हैं। रक्त में ज्यादा ऑक्सीजन के कारण कोशिकाओं में स्वतः ज्यादा जैविक ऊर्जा का निर्माण होता है और शरीर के सभी अंग जीवंत हो उठते
पर रखें, हथेली ऊपर की ओर हों। इस मुद्रा में बंद मुंह जब होंठ सटे हुए हों, एक जितना ज्यादा जोर से हो सके उतने ज्यादा जोर से मिनमिनाने (म...) की आवाज निकालें, जितना ज्यादा जोर से हो सके उतनी ज्यादा जोर से और जितने लम्बे समय तक हो सके उतने लम्बे समय तक म्म......... की ध्वनि उत्पन्न करें। अगर आपको किसी खाली अलम्युनियम के बर्तन में मुंह रखना पडडे और गुंजायमान ध्वनि निकालने को कहा जाए, वह इस तरह की ध्वनि उत्पन्न होगी। ध्यान रखें यह 'हम्म. ….' नहीं होगा न हि 'ओम्……', यह बस अपने होठों को एकसाथ रखकर 'म्म......' की ध्वनि उत्पन्न करना है। सांसों के बीच में यह गुंजायमान ध्वनि जितनी लम्बी हो सके उतनी लम्बी ही। यह जितना गहरा हो सके उतना गहरा हो (नाभि केंद्र से) और जितना जोर से हो उतने ज्यादा जोर से। यहां गहरी सांस लेने की कोशिश करने की जरूरत नहीं है। शरीर अपने आप जरूरत के अनुसार सांस ले लेगा जब उसे जरूरत होगी।
अपना संपूर्ण अवधान इस गुंजायमान ध्वनि
पर केंद्रित रखें। आप गुंजायमान हो जाएें। मस्तिष्क के अंदर एक सतत वार्ता चलती रहेती। इस अंतःवार्ता को कम करने का यह गुंजायमान ध्वनि एक उत्तम विधि है। अंतः वार्ता और कुछ नहीं बस स्वतंत्र विचारों का एक सतत् प्रवाह है जो सतत हमारे अंदर चलता रहता है। गुंजार से आप अपने शरीर को एक ऊर्जा के रूप में महसूस करते है। जिससे करते क्षण आप गुंजार शुरू करते हैं, आप हल्का महसूस करने लगते हैं, जैसे कि आप वह रहे हों। आप अपने शरीर में भारीपन महसुस नहीं करते हैं
नित्यध्यान - आनन्द जीवन ध्यान
हैं। वह जैविक ऊर्जा, जिसका निर्माण होता है वह संस्कारों को साफ करने लगेगी, आप हल्का ऊर्जावान
रेंगो ।
न्नानाः
रहें, अपनी ऊंगलियों से ने हाथों को अपने घुटने
घुटनो को मोड़ कर व अपने पिछले हिस्से को ऐड़ी पर रखना है। अंगूठा और प्रथम ऊंगली गोल घेरा बनाती हुई और शेष तीन ऊंगली सीधी रहे। जलि के द्वारा दिये गये आष्टांग योग में से एक।
जीवन-मुक्ति
बाद, आप अनुभव करेंगे कि यह गुनगुनाना आपके प्रयास के बिना जारी है और आप बस गुंजार के श्रोता बन गए हैं। शरीर और मन गुंजार के कंपन के साथ अनुनादित हो रहे है।
यह गुंजार एक स्वस्थ अंतः वार्ता और एक उच्च स्वरथ भावनात्मक सजगता का निर्माण करेगा।
3. चक्र पर अवधान :
अवधि सात मिनट:
वज्रासन में या आप चाहें तो पालथी मारकर बैठे रहें। अपनी ऊंगलियों को चिन मुद्रा में रखें। अब अपने अवधान को हर चक्र केंद्र पर ले जाएं, मूलाधार चक्र से शुरू करके सहस्त्रार चक्र तक। आपको हर वह ऊर्जा केंद्र हो जाना है जब आपको हर उस ऊर्जा केंद्र पर ध्यान केंद्रित करने को कहा जाए। उस ऊर्जा केंद्र को पूरी तरह से अनुभव करें जैसे कि आपका संपूर्ण व्यक्तित्व वह ऊर्जा केंद्र हो गया है।
इन सातों ऊर्जा केंद्रों में हर ऊर्जा केंद्र हमारे व्यक्तित्व की एक विशेष भावना से जुडा होता है। किरलियन फोटोग्राफी (चित्रांकन) ने इन चक्रों की पिक्चर लिये एवं ऊर्जा के तल पर इन चक्रों के वास्तविकता को प्रमाणित किया है। ये भावनाएं अतीत में इकट्टे होते हये नकारात्मक स्मृतियों की परिणाम हैं जब हम किसी चीज पर अवधान डालते हैं तो उसकी नकारात्मकता खत्म हो जाती है। शारीरिक दर्द के लिए भी यह सही
चिन मुद्रा - हथेली ऊपर की ओर व अंगूठा और प्रथम ऊंगली गोल घेरा बनाती हुई और शेष तीन ऊंगली सीधी रहे। सहस्वसार चक्र - यह सातवाँ व अन्तिम चक्र है जो सिर के ऊपरी हिस्से में रहता है, इसे ऊर्जा चक्र प्रवेश द्वार जैसा माना जाता है। किरिलियन फोटोग्राफी - बहुत उच्चधारा पर फोटोग्राफ लेना जिससे जीवित व्यक्ति के औरा को संरक्षित किया जा सकता है।
नित्यध्यान - आनन्द जीवन ध्यान
क्योंकि यह गुंजार मन के कंपन के साथ शरीर के कंपन को मिलाता है। आप अपने आपको ऊर्जा के रूप में अनुभव करना शुरू कर देते हैं।
तनाव में न रहें। इसे बस आराम से करें। अपने अस्तित्व और उजर्जा को इस यह गुंजार एक गुंजार को उत्पन्न स्वस्थ अंतः वार्ता करने में लगा दें। और एक उच्च इस गुंजार की स्वस्थ भावनात्मक ध्वनि के बीच के सजगता का निर्माण अंतराल को कम करेगी। करने की कोशिश करें। कुछ देर के
है। अगर शरीर के एक अंग में दर्द है और अगर हम उसमें अपनी सजगता डालते हैं, हम देखेंगे कि वह दर्द एक बिंदु पर सिमट जाता है और खत्म हो जाता है!
सातों ऊर्जा केंद्रों में से प्रत्येक को एक मिनट के लिए पूरी सजगता से भर दीजिए, बस यह अनुभव कीजिए की संपूर्ण संसार में सिर्फ वही खास केंद्र है। और कुछ नहीं। बस वह ऊर्जा केंद्र हो जाइये। उस ऊर्जा केंद्र को पूरी तरह से अनुभव करें ताकि आपका सारा अस्तित्व वह उर्जा केन्द्र बन जाय। फिर दूसरे केन्द्र पर चलें। इस प्रक्रिया के अंत तक आप पूर्णरूपेण उर्जावान सकारात्मक एवं हल्कापन का एहसास करेंगे। यह मनो चित्रण एक स्वस्थ मन और भावना उत्पन्न करेगा स्वस्थ अंत वार्ता और उच्च भावनात्मक सजगता के निर्माण में आपकी मदद करेगा। इस चरण के अंत में आप ऊर्जावान और हल्का अनुभव करेंगे।
अगर आप ऊर्जा केंद्रों पर एकाग्रचित होते हैं, आपका मन इतनी आसानी से नहीं भटकेगा। वह बस स्थिर हो जाएगा क्योंकि यह जीवंत ऊर्जा केंद्र हैं। अगर आप शरीर के किसी और अंग पर एकाग्रचित होने की कोशिश करेंगे, आपका मन आसानी से भटकेगा।
4. असंलग्न (अनक्लच) हों:
अवधि सात मिनट
इस चरण में अपने साथ यह समझ ले कर चलें कि आपके विचार असंबंधित हैं, अविवेकपूर्ण हैं और मुक्त हैं। इसके बावजूद कि आवजूद कि आपके पास विचार हों, न ही उन्हें दबाने की कोशिश करें न ही
उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करें। बस उसे इस समझ के साथ कि वे मुक्त हैं, देखें। अपने आप, साक्षी-चेतना आपके अंदर स्थापित होने लगेगी।
समझिये चाहे आप उसे समझे या नहीं, स्वीकार करें या नहीं आप पहले से ही आत्मज्ञानी हैं। अपने स्वभाव से ही आप मुक्त हैं। शांत बैठें और मुक्त अवरश्या को अनुभव करें, शुद्ध अपने होने की अवस्था का। यह परम विधि है, आत्मज्ञान की अवरश्था को अनुभव करने की।
विशेष विस्तार के लिए कृपया 'मन के जाल से मुक्त हो सकते हैं' अध्याय को पढ़ें।
5. गुरू पूजा (गुरू की विधि विधान से पूजा):
अवधि सात मिनट
हम नित्यध्यान का समापन संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ संयुक्त होने, उसमें विश्राम करने और लीन होने के अनुभव द्वारा करते है।
बस आराम से बैठें, संपूर्ण ब्रह्मांड के साथ जुड़कर। अगर आपको गुरू के प्रति प्रेम है, या किसी देवता को प्रति तो एक अति गहरे और निष्क्रिय रूप में ब्रह्मांड के साथ या देवता के साथ या अपने गुरू के साथ जुड़कर बैटें। मन को आराम दें और उसमें डूब जाएं।
केवल आनंद के भाव में शांत बैठें और गुरू पूजा मंत्र के मंत्रोच्चारण को सुनें। सृष्टि के साथ जुड़ा हुआ अनुभव करें और उस शक्तिशाली मंत्रों के कंपन (स्पंदन) को अपने भीतर अनुभव करें। वे मंत्र सृष्टि के प्रति और गुरू के प्रति अपना आभार व्यक्त करने का तरीका है जिन्होंने इस महान ज्ञान को जिसने हमें अज्ञानता से मुक्त किया है और हमें परम आनंद नित्यानंद की इस अवस्था को पाने में मदद की है, आभार व्यक्त करें।
यह मंत्रोच्चारण संस्कृत में है जिसका भाषाई और स्वरात्मक (ध्वन्यात्मक) दोनों महत्व है। अपने आप को इस स्पंदन (कंपन) पर केंद्रित करके जिनका निर्माण इन संस्कृत की ध्वनियों को उच्चारण के समय होता है, हम मन के शब्दों से परे जाते हैं, अपनी आत्मा की शांति में जाते हैं।
गुरू पूजा - गुरू के लिये पूजा की क्रिया विधि।
तब भी जब हम ध्वनियों के अर्थों को नहीं समझते हैं, संस्कृत भाषा का ध्वन्यात्मक महत्व हमारे अंदर एक सकारात्मक स्पंदन का निर्माण करके, हमारे भाव और मनस्थिति को रूपान्तरित कर देगा। और हमारे संपूर्ण शरीर एवं मन को शुद्ध कर देगा।
आप इस चरण में मंत्रों का उच्चारण करके और धार्मिक अनुष्ठान करके गुरू पूजा (गुरू के प्रति आभार व्यक्त करना) का भी चयन कर सकते हैं।
इस ध्यान विधि का अभ्यास दिन में एक बार करें और अपने व्यक्तित्व में एक नए आयाम का अनुभव करेंगे। नित्य ध्यान आपके शरीर और मन को इस शुद्ध चेतना और आनंद के अनुभव के लिए तैयार करेगा।
नित्य ध्यान के लाभः
आधे घंटे का नित्य ध्यान आपको दे सकता है:
- :: तनाव से आराम
- :: संबंध में सुधार
- :: आंतरिक शांति और संतुष्टि
- ः जागृत प्रज्ञा
- ः नियमित रक्तचाप
- :: विकसित निंद्रा प्रारूप
- :: विकसित स्पष्टता
- :: पूरे दिन के लिए विकसित ऊर्जा स्तर
- :: दैविक कर्जा के साथ संबंध
आप अपने परिवार और मित्रों को नित्यध्यान में दीक्षित कर सकते हैं। यह सीधे रूप में पृथ्वी की सामूहिक सकारात्मकता के प्रति योगदान होगा) क्योंकि ज्यादा से ज्यादा लोग 'मुक्त' स्वतंत्र रूप में जैसे जीवनमुक्त (मुक्त आत्मज्ञानी आत्मा) के रूप में जीवन जीऐंगे। किसी पुथक चेतना में यह बदलाव सामूहिक चेतना में एक सकारात्मक बदलाव के रूप में होगा जो बदले में संपूर्ण पृथ्वी पर अपना प्रभाव छोड़ेगा।
नित्ययोग-शरीर, मन और उसके परे के लिए
योग सिर्फ शारीरिक चुस्ती ही नहीं है। यह शरीर मन और आत्मा को एक करने के उद्देश्य के लिए, तैयार करने में भी सहयोग करता है। नित्य योग इस एकात्मकता के लिए पतांजलि के शरीरिक भाषा के अनुरूप तैयार विधि है। जैसे हम ध्यान तकनीकों के बीच हम नित्यध्यान की बात करते हैं, नित्ययोग जेट—युग के लिए योग है।
योग क्या है?:
पातंजलि, योग के प्राचीन विज्ञान के जनक, पातंजलि योगसूत्र, योग का आधारभूत ग्रंथ के आरंभ में ही कहते हैं
योगाः चित्त—वृति निरोध :
वे कहते हैं, 'योग मन का रूक जाना है। 'समझिये इसका यह अर्थ नहीं है कि योग मन के रूक जाने के साथ खत्म हो जाता है, बल्कि जहां मन का अंत होता है वहां योग शुरू होता है। असल में योग का कभी अंत नहीं होता है, इसका केवल प्रारंभ हो सकता है। यह सतत घटित होता है।
यह समझने के लिए कि कैसे योग एक सतत घटनाक्रम है, हमें इस महत्वपूर्ण सत्य को जानने की आवश्यकता है: जो कुछ हो रहा है वह शभ है। बहत स्पष्ट हों, हर अनुभव आपकी चेतना का विकास करता है और आपको और ज्यादा परिपक्व बनाता है। यहां तक कि धन का खोना भी आपको कुछ परिपक्वता प्रदान करती है। स्वास्थ्य का खोना आपको कुछ समझदार बनाता है। जब आप इस सत्य को अंतःनिहित कर पाते हैं, तो आप जीवन को एक आश्चर्यचकित करने वाली घटनाक्रम के रूप में देखते हैं।
एक लघु कथाः
एक बार एक जहाज महासागर में जा रहा था। अचानक, उस जहाज के कप्तान ने एक चमकती रोशनी आगे देखी और यह चेतावनी देने के लिए कि जहाज को उसके रास्ते से हटाना होगा दौडा। उसने तुरंत घोषणा की, 'कृपया अपने मार्ग को पंद्रह डिग्री उत्तर की ओर मोडे उससे टकराने की संभावना को टालने के लिए।'' उत्तर में
योग - साधारण तौर पर अप्रभावित रखना, शरीर, मस्तिष्क, आत्मा को।
एक आवाज आयी, 'हम आपको जहाज को पंद्रह डिग्री दक्षिण की ओर मोड़ने का सलाह देते हैं उससे तकराने की संभावना को टालने के लिए।'
अब वह जहाज का कप्तान गुरस्से में आ गया और धमकी भरे स्वर में जवाब दिया, 'यह राष्ट्र की सबसे बड़ा जहाज है। हमारे पास तीन विध्वंसक हैं, सुरक्षा उपाय हैं और बहुत सी सहायता जहाज हैं । मैं
| जहां मन का अंत | चाहता हूं कि आप जहाज के मार्ग को |
|---|---|
| होता है, योग शुरू पंद्रह डिग्री उत्तर की | |
| होता है है। | |
| अवश्यक सुरक्षा ईंतजाम की तैयारी | |
करें इस जहाज की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए ।'
उस दूसरे स्वर ने सीधे स्वर में उत्तर दिया, 'हम लाइटहाउस हैं !'
समझिये, सृष्टि सतत् घटित हो रही है और आपका मार्गदर्शन भी कर रही है जिससे कि जो कुछ आपके साथ घटित हो रहा है वह सबसे अच्छे रूप में आपके साथ घटित हो। बस उसके अनुसार चलें, वहीं सर्वोत्तम मार्ग है। योग स्वयं को (समस्वर) करने का मार्ग है। जैसे कि रेडियो को उच्च आवृति पर (समस्वर) करना! 'योग' शब्द का शब्दिक अर्थ है 'एक करना' ।
पतंजलि योग के जनकः
पतंजलि योग विधा के जनक है। वे पहले गुरू हुए जिन्होंने एक स्पष्ट, वैज्ञानिक, तार्किक व्यवस्था का आत्मज्ञान के अनुभव को पुनः उत्पन्न करने के लिए सृजन किया।
पतंजलि पहले गुरू थे या मैं कह सकता हूं 'अध्यात्मिक नाविक', जिन्होंने नक्शे का निर्माण किया और आत्मज्ञान के लिए एक संपूर्ण दिशा—निर्देश दिया। उन्होंने एक सुस्पष्ट दिशा का सृजन किया, चरणबद्ध तरीके दिये जिनसे कि आत्मज्ञान के अनुभव को पुनः पैदा किया जा सकें। उसी तरह जैसे वैज्ञानिक बाह्य संसार की प्रकृति के जानने के सूत्र का पुनः निर्धारण करते हैं, पतांजलि ने आत्मज्ञान के लिए एक सुंदर सूत्र का सुजन किया, एक तकनीक का, अंतः संसार के ज्ञान की समझ और आत्मज्ञान के अनुभव को पुनः उत्पन्न करने के लिये।
रघुपति योगी- योगी- योग के गुरू:
मेरा यह अहोभाग्य रहा है कि मैं योग के जीवित गुरू, योगीराज योगानन्द पुरी, जो रघुपति योगी भी कहे जाते हैं, के सान्निध्य में रहा। उन्होंने पातंजलि द्वारा सृजित योग के संपूर्ण विज्ञान पर सिद्वहस्तता पाई थी।
उन्होंने योग के संपूर्ण आयामों पर, हट योग के साथ जिसमें शरीर को विभिन्न आसनों के रूप में मुद्रागत होकर मोड़ना होता है, प्राण या जीवन ऊर्जा पर, मन पर, मनोचित्रण शक्ति पर, भावनाओं पर, और योग के विभिन्न आयामों पर कार्य कर सिद्धहरतता पाई। उन्हें योग के केन्द्रीय सत्य की गहरी अंतःदृष्टि थीं।
सिर्फ वहीं व्यक्ति जिसने पातंजलि के चेतना को अनुभव किया हो पतंजलि को पतंजलि को पुनः
नित्ययोग-शरीर, मन और उसके परे के लिए
जीवित कर सकता है। मेरा यह सौभाग्य रहा है कि मैं ऐसे गुरू के सान्निध्य में रहा जिन्होंने पतंजलि की चेतना, उनके अंतः आकाश को अनुभव किया है।
उनके पास अविश्वसनीय शक्ति और अकल्पनीय शारीरिक शक्ति थी जो वह सरल, सामान्य रूप में अभिव्यक्त करते थे। वह लोहे की रस्सी को अपनी छाती से बांधकर पुरी सांस बाहर छोडते थे, फिर सांस भीतर लेते और वह लोहे की रस्सी टुकडों में टूट जाती।
सामान्यतः एक तार्किक मन इसे नहीं समझ नहीं पाता है या स्वीकार करता है कि यह संभव है किंत इस महान योगी ने सब कछ संभव कर दिया। मेरा यह परम सौभाग्य है कि मैं उनके सानिध्य में रहा और उन्हें हवा में उठते हुए देखा, न सिर्फ एक बार बल्कि कम से कम बीसों बार। वह गहरी सांस लेते और सांस को रोक लेते। ज्योंही वह यह करते, शरीर जमीन से एक फुले हुए गुब्बारे की तरह उठने लगता!
तीन वर्ष की आयु से तेरह वर्ष की आयु तक, मेरा यह सौभाग्य रहा कि मैं उनके चरणों में रहा, उनके मार्गदर्शन और देखभाल में। हर दिन सुबह से दोपहर तक कम से कम एक दिन में चार से पांच घंटे, वह मुझसे हर परंपरागत यौगिक विधि, जैसे विभिन्न आसन, नेति धौति का नाक साफ करने की विधि और धौती :योग की पेट साफ करने की विधि करवाते। जहां मुझे एक लम्बे कपडे को निगलना होता अपने अंतज्जियों को और अंतः तंत्र को साफ करने के लिए।
बस शरीर को ध्येय के साथ हिलायें और परिणाम पायें:
उन्होंने एक सुंदर बात कहीं किसी—किसी दिन, रघुपति योगी मुझे एक दम स्थिर बैठने को और एक दम शांत रहने के लिए कहते। फिर दस मिनट के बाद वो अचानक मुझे खड़े होने के लिए कहते और पूरे मंदिर के चारों ओर जितना तेज हो सके उतनी तेजी से दौडने के लिए कहते!"
| वह मुझे इधर या उधर मेरे शरीर को | |
|---|---|
| मुड़वाते। उस मंदिर | |
| में जहां वह मुझे | |
| चाहे जिस किसी | योग की दीक्षा देते |
| उद्देश्य के लिए तुम | थे, वहां बीस रे |
| अपने शरीर को | तीस स्तम्भ थे। वह |
| झुकाते हो या | मुझे हर उस पत्थर |
| हिलाते हो, वह | के रूत्वम्भों पर |
| स्मृति और वह | च ढ़ वा ते |
| उतरवाते और मुझे | |
| विचार पूरी तरह से | बस एक हाथ क |
| तुम्हारे शरीर और | प्रयोग उन स्तम्भो |
| मन में अंकित या | पर चढ़ने अंग्र |
| अंतः निहित हो | उतरने के लिए |
| जाऐंगे । करना होता था। |
मैं उनसे पुछता
आसन - शारीरिक मुद्रा और पंताजलि के द्वारा दिये गये आष्टांग योग विधि में से एक आसन में स्थिरता और आराम दोनों होना चाहिये।
नेती - नाक को साफ करने की योग की विधि।
धौती - आंतों को साफ करने की योग की विधि।
सूत्रांस - आध्यात्मिक शिक्षा का सुभाषित रूप।
वह मुझे सभी स्तंभों पर क्यों चढवाते हैं, क्योंकि मैं किसी भी पुस्तक या सूत्र में योग के अंतर्गत स्तंभों पर चढने के बारे में नहीं जान सका था।
उन्होंने एक सुंदर बात कही, 'चाहे जिस किसी उद्देश्य के लिए तुम अपने शरीर को झुकाते हो या हिलाते हो, वह स्मृति और वह विचार पूरी तरह से तुम्हारे शरीर और मरितष्क में अंकित या अंतः निहित हो जाऐंगे।
वह बहत ही विस्मयकारी खुलासा था! उन्होंने कहा, तुम जिस किसी उद्देश्य से अपने शरीर को हिलाते हो, मोडते हो, या अपने शरीर को क्रियाशील करते हो, तो वह ध्येय तुम्हारे शरीर में अंकित हो जाएगा, वह संस्कार तुम्हारे शरीर से व्यक्त होना शुरू होगा।
आज खासकर पश्चिम में बीमारियों या आसनों के बीच बहुत ज्यादा संबंध हैं जैसेकि इस बीमारी को लिए
आपका शरीर भी आपकी स्मृतियों से निर्मित हुआ है।
करना चाहिए, उस उद्देश्य के लिए आपको वह विधि करनी चाहिए ।
आपको वह आसन
समझिये रोगों के समाधान के लिए आसन करना योग का उद्देश्य नहीं है! जब आप किसी रोग के बारे में सोचते हैं और अपने मन में उस विचार के साथ योग करते हैं, तो आप असल में उस रोग के विचार की छाप अपने शारीरिक व्यवस्था में मुद्रित करते हैं!
रघुपति योगी कहते हैं किसी भी उद्देश्य के लिए किसी आसन का अभ्यास, या किसी दैहिक गतिविधि का अभ्यास आपके शरीर पर एक प्रभाव छोड़ेगा। वो कहते हैं यह किसी सामान्य बैठने से भी संभव है। अगर आप प्रगाढ़ता से सोचते हैं कि बैठने से आपको स्वास्थ्य मिलेगा और आप बस स्वास्थ्य के लिए बैठते हैं, आप देखेंगे कि आप स्वस्थ हो रहे हैं।
समझिये आपका शरीर भी आपकी स्मृतियों से निर्मित हुआ है। आपका मन, जिसे आप स्वयं के रूप में सोचतें है आपके शरीर के निर्माण के लिये ईटें हैं।
हर स्मृति आपके मांसपेशियों पर अंकित है। इसीलिए जब आप अपनी स्मृतियों को बदलते हैं, आप अपनी शारीरिक व्यवस्था को भी बदलते हैं। आपकी शारीरिक व्यवस्था आपके स्मृतियों को प्रति जिसका आप निर्माण करते हैं, प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकती है और करेगी। इस तरह नित्य योग के द्वारा शरीर-मन में परिवर्तन होता है। पहले अंतः आकाश साफ होता है, जिससे कि मन उसके अनुसार हो। फिर शरीर उसका अनुकरण करता है क्योंकि दैहिक गतिविधि इस ध्येय के साथ की जाती है। यह ध्येय मांस पेशियों की स्मृति और कोशकीय बुद्धिमता में अंतःनिहित हो जाता है।
वैज्ञानिक प्रमाणः
'हम वही होते होते हैं जो हमारा दुष्टिकोण होता हैं। जो हमारे दृष्टिकोण होता हैं वैसे ही
डॉ. ब्रुश लिप्टन - आण्विक कोशिकीय जीव बैज्ञानिक और "जीव विज्ञान" पुस्तक के लेखक, अनुवांशिक अनुकूलन के कार्य में विशेष सराहना प्राप्त हुई है।
हमारी क्रियाऐं होती हैं। जैसी हमारी क्रियाऐं होती हैं, वैसी ही हमारी नियति।' यह उपनिषद की उक्ति नहीं है, बल्कि डॉ. ब्रूस लिपटन द्वारा लिखी एक नई किताब, 'द बायोलॉजी ऑफ बिलीफ' से है, जो कोशिकी जीव—वैज्ञानिक हैं जिन्होंने कोशिकाऐं कैसे व्यवहार करती हैं उस पर नया सिद्वांत प्रस्तुत किया है। हम सबों को यह सीखाया गया है कि हम वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा हमारे जीन का प्रारूप है। डॉ. लिपटन अपने अनुसंधान के बाद, इसके विपरीत कहते हैं— हमारे जीन का प्रारूप वैसा होता है जैसा हम व्यवहार करते हैं।
इसके बारे में बहुत सी दर्ज घटनाऐं हैं कि ध्येय और मानसिक पटल पर चित्रण की क्षमता असल में ध्येय की भौतिक सत्यता में परिणत हो जाना ही है! उदाहरण के लिए, लोगों ने अपनी जानलेवा बीमारियों जैसे कैंसर का ईलाज खुद कर लिया है या अपनी क्षमताओं को बढाकर और उसके परे जाकर जिसे वो अपनी क्षमता समझते थे। ये चीजें उनकी ध्येय की शक्ति के द्वारा हुई हैं जो मुलभूत कोशकीय स्मृति को परिवर्तित करता है।
प्राचीन सत्य अब आधुनिक वैज्ञानिक खोजों की मदद से प्रमाणित हो चुके हैं। यह पाया गया है कि जो कुछ हम गहराई से और सतत सोचते हैं उसका हम पर शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक रूप से गहरा प्रभाव होता है।
नित्य योग का उद्देश्य:
नित्य योग संसार को मेरी प्रस्तति है। यह विज्ञान है, सुत्र है, जो दसरों को वही आत्मज्ञान का अनभव देगा जो मझमें घटा।
नित्य योग का उद्देश्य सरल है— आनंद का अनुभव करना और उसे व्यक्त करना। नित्य योग के साथ आपके अंतः आकाश में आनंद को अनुभव करने की क्षमता प्रस्फ़टित हो जाएगी। आपके शरीर में आनंद को प्रकाशित करने की क्षमता घटित होना शुरू हो जाएगा।
अभी, आपका शारीरिक तंत्र उस आत्मज्ञान के संसार में ठहरने के लिए तैयार नहीं भी हो सकता है, उस अनुभव को सतत प्रकाशित करने के लिए। नित्य योग आपके शरीर को उस अंतः आनंद परम आनंद को
अनुभव करने को लिए और उसमें नित्य योग आपके टहरने के लिए और जीवन में ज्यादा उसे प्रवाहित करने गतिविधि को जोड़ना के लिए तैयार नहीं है। यह आपके करता है। गतिविधि में ज्यादा नित्य योग के जीवन को जोड़ना है। द्वारा, मैं अन्वेषक को न सिर्फ आनंद के अनुभव का प्रशिक्षण
देता हूं, बल्कि उन्हें उस अनुभव का स्थायित्व देता
डॉ. ब्रूश लिप्टन - आण्विक कोशिकीय जीव वैज्ञानिक और "जीव विज्ञान" पुस्तक के लेखक, अनुवांशिक अनुकूलन के कार्य में विशेष सराहना प्राप्त हुई है।
जीवन-मुक्ति
नित्ययोग-शरीर, मन और उसके परे के लिए
हूं, और अपने जीवन में उस अनुभव को सतत विकीर्ण करना भी सिखाता हूं। नित्य योग का उद्देश्य है लोगों को मक्ति पाने में और परम आनंद के अनुभव में मदद करना। लोग यह भी जान सकते हैं कि शारीरिक उपचार एक उप परिणाम के रूप में भी आ सकता है। किंतु, वह केवल योग का एक लाभ है। भावनात्मक लाभ भी अपार है किंतु यह भी ज्यादातर उप—परिणाम के रूप में है!
इसी तरह, ध्यान बस मानसिक स्वास्थ्य के लिए नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य बस एक उप परिणाम है जो ध्यान के द्वारा होता है। नित्य योग का उद्देश्य आपके संपूर्ण जीवन, हर क्रिया कलाप और हर क्षण को योग में, आनंद क्षण में परिवर्तित करना है।
नित्य योग आज संपूर्ण संसार में किया जा रहा है। नित्य योग का हर सत्र सभी अंगों आसन, प्रणायाम, मुद्रा, इत्यादि को इसमें शामिल कर पतंजलि के अष्टांग योग के सभी आठो अंगों को एक साथ लाकर शरीर-मन-आत्मा को एक कर गहराई दे रहा है।
नित्य योग आपके जीवन में ज्यादा गतिविधि को जोड़ना नहीं है। यह आपके गति —विधि में ज्यादा जीवन को जोडना है।
हर क्षण सजग हैं, यही योग है— नित्य योग।
अगर आप उपस्थित हैं, अगर आप सजग हैं. और अगर आप कुछ भी करते हुए पूर्णतः रूप
अष्टांग योग - पतांजलि के योग के आठ अंग है - यम (अनुशासन), नियम (शासन (शारीरिक मुद्रा), प्राणायाम (श्वांस नियमन), प्रत्याहार (सचेतना में वापसी), धारणा (एकाग्रचित्त होना), ध्यान, मनन, समाधि (आनंद)।
प्राणायाम - श्वांसों का नियमन, पतांजलि के द्वारा दिये गये अष्टांग योग में से एक।
मुद्रा - हाथों के द्वारा बनाये गये चिन्ह जो योग के अभ्यास के समय बनाये जाते है, विशेषतया ध्यान के समय शरीर में बह रही ऊर्जा को शरीर में वितरित करने के लिये और शरीर से बाहर जाने से रोकने के लिये।
प्रतिदिन आनंदमय जीवन के लिये आठ चरण
आनंद में जीनाः-
आनंदपूर्ण जीवन जीने के आठ मार्ग या आनंद अष्टांग
जीवन्त आत्म ज्ञान के लिए आनंद अष्टांग या आनंदपुर्ण जीवन आठ चरणों का एक सरल तरीका है। ये सरल विधियाँ हैं, जो बिना इसकी समझ या आत्मसात की जरूरत के बिना आपको सीधे अनुभव कराते हैं ।
ये हैं:-
- आनंदपुर्ण हंसी 1.
- आनंदपूर्ण आश्वरित 2.
- आनंदपूर्ण स्वच्छता 3.
- आनंदपूर्ण योग 4.
- आनंदपूर्ण ध्यान ട്.
- आनंदपूर्ण उपकरण 6.
- आनंदपूर्ण ऊर्जा 7.
- आनंदपूर्ण मंत्रोच्चारण 8.
आनंदमय हंसी: हास्य ध्यान
ध्यानः सुबह ज्योंही आप जागते हैं । अपना बिस्तर छोड़ने से पहले ही पाँच मिनट तक हँसें! बस अपने आप पर हँसें। बिना किसी कारण के हँसे (अकारण हँसे)!
हास्य एक अदभूत ध्यान विधि है। प्राचीन
जेन परंपरा के गुरू और शिष्यों की यह विधि हास्य (हँसी) के द्वारा अमन को स्पर्श करने की है। हँसी कार्य करता है चाहे हम माने या नहीं। इसका अविलम्ब प्रभाव होता है। दूसरी विधियों में, हमें परिणाम को देखने के लिए अभ्यास करने की आवश्यकता होती है, किंतु हँसी में हमें अभ्यास की आवश्यकता नहीं है। यह पहली बार से ही होता है और हर बार होता है। यह गहराई तक जाकर हमें शारीरिक और मानसिक स्तर पर स्वस्थ करती है।
हँसी स्वस्थ अवस्था में ही जन्म लेती है और स्वास्थ्य का निर्माण करती है। यह एक
उत्प्लावित ऊर्जा है। यह भावनात्मक दमन को मुक्त करती है।
हँसी सबसे बड़ा आध्यात्मिक गुण है। हँसी में हम आत्मज्ञानी, बुद्ध हो जाते हैं। बुद्ध 'मन—रहित' अवस्था है। जब हम हँसते हैं, तो उन पलों में हम एक मन—रहित की अवस्था में होते हैं। या तो हंसी या हमारा मन होता है, साथ—साथ दोनों का अस्तित्व नहीं हो सकता है। जब हम हँसते हैं, उस पल में हमारा मन खत्म हो जाता है और हम सुष्टि की ऊर्जा के साथ एकात्म हो जाते हैं। हम अपनी पहचान को महसूस नहीं करते हैं। हँसी के चरमोत्कर्ष में क्या हम अपने आप को पुथक महसूस कर सकते हैं? नहीं! उस अपने अस्तित्त्व के अनुभव नहीं करना, क्षणिक 'मन—रहित होना है, और मूल सृष्टि के साथ एक होना है। इसलिए हमें ज्यादा हँसने की जरूरत है। स्वयं के खोने के पलों को बढ़ाया जा सकता है जिससे कि हम अपनी पहचान को अंततः खो दें और सृष्टि की ऊर्जा के साथ एक होकर रहें।
हँसी बहुत सी बीमारियों के उपचार के लिए जानी जाता है, खासकर स्नायुतंत्र और गले से संबंधित बीमारियों के लिए। एक हार्दिक हँसी कोशकीय क्रियाकलाप के हानिकारक पदार्थों को बाहर करने के लिए जानी जाती है।
आनंदमय आश्वस्तिः आनंद की शपथ या आनंद संकल्प।
आनंद को अंग्रेजी में ब्लिस (Bliss) कहते हैं, संकल्प को कसम (Vow)। आनंद संकल्प को
बो ऑफ ब्लीस (Vow of bliss) कहते हैं।
आप आनंदमय होने का निर्णय ले सकते हैं। यह एक चुनाव है जो आप करते हैं। अगर आप अपने आप को सृष्टि जो आपसे चाहती है उसे वैसे ही रूप में प्रवाहित होने देते हैं, तो आप सदा के लिए आनंद में रहेंगे। चुनाव रहित होने का यह भाव जागृत किया जा सकता है।
इस ध्यान की उत्पत्ति सूफी रहस्यवादी अब्दुल्ला से हुई, जो देहात के रहने वाले थे। सूफी लोग आज तक के सबसे ज्यादा समाधिस्थ हुए। उनकी प्रार्थना एक कृतज्ञता है और कुछ नहीं। अब्दुल्ला अपने सदा हँसते हुयें चेहरे के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि अपनी मृत्यु शैय्या पर भी वे हँस रहे थे। अंत में उनके कुछ शिष्यों से नहीं रहा गया और वे पूछे बैठे कैसे वह सदा आनंदमय रहते हैं? उन्होंने उनसे पूछा, 'गुरूजी, मरने में ऐसी क्या खुशी है?'
तब अब्दुल्ला ने उन्हें वह ज्ञान दिया जो उन्हें उनके गुरूजी ने उन्हें सिखाया था। उन्होंने कहा, 'याद रखो तुम्हारी हँसी सदा तुम्हारे अपने हाथ में हैं! तुम्हारी हँसी शत् प्रतिशत तुम्हारा चुनाव है। हर दिन, जीवन तुम्हें हँसने का या दया दयनीय होने का मौका देता है। तुम क्या, तुम पर है।
ध्यानः
इससे ज्यादा आसान ध्यान विधि कोई दूसरी नहीं हो सकती है। फिर भी यह सबसे ज्यादा प्रभावी है।
अब्दुल्लाह - अब्दुल्लाह अंसारी जो हराद से है एक सूफी संत।
आयूर्वेदा - परम्परागत हिन्दू तंत्र जो कि चिकित्सा के लिये है। आयुर्वेद का साधारण मतलब जीवन का ज्ञान है।
नित्य सुबह (हर सुबह) ज्योंही आप उठते हैं, अपनी आँखे खोलने से पहले ही, बिस्तर पर बैट जाएँ ।
अपना नाम जोर से बोलें। अगर आप जोर से चिल्लाकर अपने चारो तरफ के लोगों को बाधा नहीं पहुँचाना चाहते हैं तो फिर चुपचाप अपने आप से कहें ।
अपने आप से पूछें (अपना नाम प्रश्नम पुरूष) आज मैं क्या अनुभव करना पसंद करता हूँ? क्या मैं खुशी या उदासी पसंद करूँ?
स्वाभाविक रूप से, सुबह की पहली चीज में, आप दुख चुनना पंसद नहीं करेंगे। इसलिए आपका मन कहेगा, मैं खूशी पंसद करता हूँ।
फिर जबाब दें, टीक है (आपका नाम), खुश रहें बस!
फिर, आँखें बंद करते हुए, कुछ मिनट के लिए, प्रगाढ़ता से और चेतनापूर्वक, इस बोध में रहें कि आपकी मौन अनुमति के बिना कोई भी चीज आपको पीड़ा नहीं प्रदान कर सकती। आप पीड़ित होते हैं क्योंकि आप बाह्य परिस्थितियों से प्रभावित रहने के लिए सहमत हैं। आपके अंदर आपके पास जीवन-मुक्ति
वह शक्ति है कि आप सभी समय खुश रहें। अब अपनी आँखें खोलें और अपनी सहमति से जीयें!
दिन के समय आप देखेंगे कि बस अपनी (संपूर्ण) सहमति की शक्ति के बल पर आपने अपने मन की वृत्ति को बदल दिया है। आप देखेंगे कि कैसे अब तक आप अपने दुखों के लिए दूसरों को जिम्मेदार मानते थे। ये असल में हर घटनाक्रम के साथ आप खुद देख कर उसका चयन करते थे। आप खुश रहने का एक मनोभाव विकसित करेंगे, न कि बाह्य परिस्थितियों के कारण, बल्कि उनके बावजूद—(उनसे निरपेक्ष रहकर)। आप खुश हैं क्योंकि आप खुश हैं बस।
आनंददायक (शुद्धिकरण) तेल खींचनाः-
शरीर में क्या हो रहा है, जीभ उसका संकेत माना जाता है। जीभ को परखकर, उसके रंग को देखकर, व्यक्ति के स्वास्थ्य के बारे में कुछ भी अनुमान लगाना संभव है।
जीभ शरीर के विभिन्न अंगो, इन्द्रियों की रिथतियों का द्योतक है (रेखांकन) है। जीभ का खास भाग शरीर के खास अंग से जुड़ा हुआ है, जैसे फेफड़ा, गुर्दा आदि से। जब हम तेल का खिंचाव करते हैं, तेल कफ, जीवाणु, विषाणु को आपके लार और जीभ के द्वारा खींच लेता है। आयुर्वेद औषधि के अनुसार कफ विष है जिसे निश्चित रूप से बाहर कर देना चाहिए।
ध्यानः
सुबह—सुबह, मुँह धोने से पहले, कुछ भी खाने या पीने से पहले, एक बड़े चम्मच में तिल या सूर्यमुखी का तेल लें। उसे अपने मुँह में डालें, एक
जगह बैठ जायें, अपने थोडी को ऐसे मोडें कि तेल पिछले मसुढ़े के दाँत में जाए, और धीरे- धीरे पन्द्रह से बीस मिनट तक अपनी दाँत से धीरे धीरे मुलायम रूप से भीतर उसे पीसें। यह करते समय कुछ और नहीं करें। जब समय हो जाए, तेल को थुक दें और अपने दाँत को अच्छी तरह साफ कर लें। अगर आपने टीक से तेल को लिया होगा, तो जो तेल आप थुकेंगे वह पतला और रंग में उजला होगा। मुँह को धेने के बाद दो ग्लास पानी पीयें।
नोट (टिप्पणी)— उस तेल को निगलें नहीं जिसे आपने मुँह में लिया है। उसमें विषाणु और जीवाणु होंगे ।
अगर खाने के बाद तेल लेना हो, तो उसे करने से पहले कम से कम चार घंटा प्रतीक्षा करें।
तेल लेना बहुत बातों, परिस्थितियों को संबोधित करता है, एड़ी फटने से लेकर कैंसर तक को। इंटरनेट पर तेल लेने की विस्तृत अनुसंधान रिपोर्ट उपलब्ध है।
आनंदमय योगः – सूर्य नमस्कार
सूर्य नमस्कार नित्य योग का अंग है। नित्य योग की विलक्षणता यह है कि यह जीवन में पतंजलि की मूल शिक्षाओं को आधुनिक मन के अनुरूप ढाल कर सीधे लाती है। दक्षिण भारत के ऋषि पतंजलि योग के जनक माने जाते हैं।
सूर्य नमस्कार- सूर्य को नित्य प्रणाम करना है। न सिर्फ यह शरीर को उच्चतम रूप में क्रियाशील रखता है, बल्कि यह मन-शरीर के संबंध में एक पूर्ण सजगता में लाता है।
सूर्य नमस्कार के लाभ:
सूर्य नमस्कार का अभ्यास शरीर की मेधा को सूर्य से सीधे ऊर्जा प्राप्त करने के लिए जागृत करता है। सूर्य नमस्कार का प्रारूप हमारे चारो ओर की आकाशीय ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए किया गया है। जब पूरब की ओर मुड़कर सुबह की पहली सूर्य की किरणों को देखते हुए उचित श्वसन विधि और मंत्र के साथ इसका अभ्यास किया जाता है तो इससे मन, शरीर और आत्मा पर प्रबल प्रभाव होता है और कुछ करने की जरूरत नहीं है।
सूर्य नमस्कार का प्रभाव शरीर के सभी अंगो, इन्द्रियों, तंत्रों और चक्रों (शरीर के विशिष्ट ऊर्जा केन्द्र) पर पड़ता है। यह उचित श्वसन क्रिया के साथ गत्यात्मकता और तरलता के साथ आसनों की एक श्रृंखला है।
हर सुबह (नित्य प्रातःकाल) आप छः से बारह बार सूर्य नमस्कार के आवर्तन कर सकते हैं। सभी आसनों में सूर्य नमस्कार संपूर्ण शरीर के अंगों और रीढ़ के फैलाव और मजबूती के लिए सबसे प्रभावी आसन माना जाता है। सूर्य नमस्कार
सभी आसनों का राजा कहा जाता है।
सूर्य नमस्कार मंत्रोच्चारण का महत्त्वः
कोई भी मंत्र अक्षरों, शब्दों, पदबंधों और वाक्यों की एक संरचना होती है जिसको जब सजगता के साथ सतत उच्चारण किया जाता है तो उसका शरीर और मन पर एक गहरा और शक्तिशाली प्रभाव पडता है। सूर्य नमस्कार मंत्र एक बीज मंत्र और स्तुति मंत्र है। यह स्तुति मंत्र का शाब्दिक अर्थ है: जो मार्गदर्शन करे। पवित्र अक्षर जिसका एक सकारात्मक स्पंदन प्रभाव होता है। सूर्य देवता के प्रति स्तुति है।
बीज मंत्र का अपने आप मे कोई अर्थ नहीं होता है किंतु वह स्पंदन जो इसके सतत उच्चारण से पैदा है, उसका शारीरिक तंत्र पर एक अति शक्तिशाली प्रभाव पड़ता है। आधुनिक वैज्ञानिकों के द्वारा प्रतिपादित स्पंदन के सिद्धांत का प्रत्यक्ष प्रमाण आज से हजारों वर्ष पहले अंतः ज्ञानी (विश्व) वैज्ञानिक हमारे (वैदिक) ऋषियों के द्वारा बहत पहले किया गया।
जापानी वैज्ञानिक डॉ. मसारू ईमोटो जल के गुप्त संदेश पुस्तक के लेखक, एक जापानी वैज्ञानिक के द्वारा किये गए वैज्ञानिक अध्ययन ने स्पष्ट रूप से ध्वनि के स्पंदन का जल पर (एक शक्तिशाली) प्रभाव को प्रमाणित किया है। और क्योंकि हमारे शरीर का साट प्रतिशत अंग जल से बना है, यह बहुत ही स्पष्ट है कि ध्वनि स्पंदन हमारे मस्तिष्क – शरीर तंत्र पर एक गहरा प्रभाव डाल सकता है।
अचेतन विचार और भावनाएँ, संचित स्मृति और संस्कार के रूप में हमारे अंदर एक प्रबल स्पंदन पैदा करते हैं। हमें एक सजगता के साथ उसे विलय या समाप्त करने की जरूरत है। तभी हम पूर्ण सकारात्मक चेतना को अनुभव कर सकेंगे जो पहले से ही हमारे अंदर गहराई में अवस्थित हैं ।
छ: बीज मंत्र हैं। ये हैं:-
- ॐ हरम
- ॐ
- ॐ हरूम
- ॐ हराईम
- ॐ हराउम
- ॐ हू:
स्तुति मंत्र सूर्य के अपार गुणों का महिमा मांडित करता है। प्रथम मंत्र से प्रारंभ करते हुए सूर्य नमस्कार के हर चक्र से पहले पूरी सजगता से हर मंत्र का उच्चारण करते हैं। हर मंत्र निष्ठावान अभ्यासी के अंदर उन्हीं महत्त्वपूर्ण गुणों को प्रतिस्थापित करने की शक्ति से परिपूर्ण है।
इन सरल पदों के द्वारा अनुभव कर सकते हैं कि बाह्य सूर्यप्रभा हमारे अंदर के अंतःस्व का ही निरूपित करता है। हम ब्रहमाण्डीय ऊर्जा के साथ अपने संबंध को सर्वत्र विद्यमान समझते हैं। सूर्य नमस्कार मंत्र बीज मंत्र और स्तुति मंत्र को मिलाकर बनाये गये हैं।
बीज - संतान
डॉ. मासारू ईमाट - जापानी वैज्ञानिक और "पानी के छिपे हुये संदेश" नामक पुस्तक के रचयिता जिसमें कि बताया गया है कि विचारों और शख्दों का पानी पर क्या प्रभाव पड़ता है।
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(१) ॐ हरम् मित्राय नमः सभी के परम मित्र को प्रणाम
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(२) ॐ हरिम् स्वाऐ नमः परम प्रभा मित्र को प्रणाम।
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(३) ॐ हरूम् सूर्याय नमः उस परमात्मा को प्रणाम जो क्रियाशीलता को जागृत करता है
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(4) ॐ ॐ हरेम् भानवे नमः उस परमात्मा को प्रणाम जो प्रकाशित करता है।
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(५) ॐ हेरोम् खागाय नमः उस परमात्मा को प्रणाम जो तीव्रता से गतिमान है।
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(6) ॐ हराह पुश्ने नमः उस परमात्मा को प्रणाम जो शक्ति प्रदान करता है
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(७) ॐ हराम हिरण्य गर्भाय नमः उस परम स्वर्णिम ब्रह्मांडीय गर्भ को प्रणाम।
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(८) ॐ हरिम मारीच्ये नमः
उस ऊषाः काल के परम देवता को प्रणाम।
- (९) ॐ हरूम् आदित्याय नमः
अदिति के उस परम पुत्र को प्रणाम जो अनंत ब्रह्मांडिय माता है
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(१०) ॐ हरमे सावित्रे नमः उस परम सहृदय माता को प्रणाम।
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(11) ॐ हरौम अरकाय नमः उस परम सत्य को प्रणाम प्रशंसा योग्य है
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(१२) ॐ हरः भारस्कराय नमः उस परम सत्य को प्रणाम जो मोक्ष (आत्मज्ञान) की ओर ले जाते हैं।
श्वास नियंत्रणः
सूर्य नमस्कार में, शरीर का हर अंग सांस के साथ लयबद्ध होता है। हर अंतः श्वसन और बाह्य श्वसन के साथ स्पष्ट रूप से यह दृष्टिगोचर (भाव) कीजिए कि आप परमानंद ऊर्जा को आत्मसात् और निःगमन कर रहे हैं। महसूस कीजिए कि यह परमानंद ऊर्जा आपके शरीर की हर कोशिकाओं तक गतिमान है और आपने मन और शरीर को पुनः जीवंत कर रहा है।
ध्यानः
यह योग खासकर सुबह खाली पेट करना चाहिए ।
आसन : सूर्य नमस्कार के क्रमः
पैरों को संतुलन के लिए थोड़ा अलग 1. करके खड़े हों। नमस्कार की मुद्रा में हाथो को सीने के समक्ष जोड़े। नेत्र सूर्य – नमस्कार के जोड़े दौरान खुला रखें और संगत का उच्चारण।
सांस लेते हुए आराम से अपने हाथों को 2. अपने सिर के ऊपर ले जाएँ और पीठ पीठ को धीरे—धीरे पीछे की ओर मोड़ें।
साँस छोड़ते हुए हाथों को आगे की ओर 3. लाते हुए नीचे ले जाएँ जिससे कि वो आपने पैर के
पास जमीन को छू सके और माथा घुटने को छुए। आप आराम के लिए आप अपने घुटने को हल्का मोड़ सकते हैं।
सांस लेते हुए अपने दायें पैर को जितना 4. हो सके पीछे की ओर ले जाएँ और अपने सीने को हृदय चक्र कपर देखते हुए उठायें।
सांस रोककर, अपने बायें पैर को पीछे ले ട്. जाएँ और पीठ, गर्दन और सर को एक रेखा में सीधे रखते हुए तख्ते की मुद्दा में आएँ, आपके हाथ आपके कन्धे के सीधे नीचे हो और आँखें जमीन को देखती हों।
सांस छोड़ते हुए घुटने, सीने और दुड्डी 6. को जमीन के पास नीचे लाएँ और अष्टांग नमस्कार की मुद्दा धारण करें। अपने पेट को जमीन से ऊपर रखें जब आपका चुतड़ ऊपर की ओर आराम से उठा हुआ हो, और केहुना अंदर की ओर हो।
सांस लेते हुए अपने पैर के अंगुठे को 7. (बाहर की ओर) कर पेट को आराम देते हुए जमीन के सहारे पर लेटें, और केहुने से नब्बे डिग्री का कोण बनाएँ। फिर, धीरे से हाथ के सहारे सीने को जमीन से उठाएँ। भुजंगासन में आएँ। (कोबरा की आकृति)
सांस छोड़ते हुए अपने हाथों के सहारे 8. अपनी चूतड़ को ऊपर उठायें और अधोमुख श्वानासन की मुद्रा धारण करें। ऊंगलियों को पूरा फैलायें और अपनी एड़ी से जमीन को धक्का दें। अगर आप अपनी एड़ी से जमीन को नहीं छू पा रहे हैं, तो चिंता न करें। किंतु अपनी अवस्था को जमीन छूने के लिए नहीं बदलें।
एक विनम्र भाव से अपनी हाथों के बीच 9. सीधे सामने देखें, और अपने दायें पैर को जितना हो सके उतना आगे करें, अपने हाथों के बीच में सीधे अगर संभव हो। सांस लें, अपनी दुड़डी और सीने को उठाकर।
अपने दायें पैर को साथ लाने के लिए 10. बायें पैर को आगे करें, अगर जरूरत हो तो अपने ठेहुने को हल्का मोड़ सकते हैं। सांस छोड़िए और अपने माथे को घूटने के नजदीक ले जाइए।
सांस लेते हुए अपने सर के ऊपर ले जाएँ 11. और आराम से पीठ को पीछे मोड़े, सूर्य नमस्कार करते हुए।
सांस छोड़ते हुए हाथों को नीचे लाएं और 12. अपनी हाथों को प्रार्थना की मुद्रा में अपने हृदय के सामने जोड़ें।
हर चक्र ऐसी दो गतियों के साथ बारह अवस्थाओं में है। चक्र के प्रथम अवस्था में, पद 4 और 9 में अपने दायें पैर के साथ शुरू करें। चक्र के दूसरे अवस्था में बायें पैर से शुरू करें।
कम से कम ऐसे छ: चक्र पूरा करें, और अगर सभव हो बारह। हर चक्र से पहले मंत्र का उच्चारण सिल—सिलेवार रूप में करें।
आनंद जीवन ध्यान या नित्य ध्यानः
ग्यारह वर्ष की आयु तक मैंने बहुत सी परंपरागत ध्यान विधियों को समझा और उनका अनुसंधान प्रयोग किया। बारह वर्ष की आयु में, मुझे मेरा गहरा आध्यात्मिक अनुभव हुआ। बारह वर्ष से इक्कीस वर्ष की आयु तक, मैंने ध्यानपूर्वक बहुत सी विधियों को खंगाला और विश्लेषित किया। अपने परम ज्ञान प्राप्ति के बाद तीन वर्ष तक मैंने दूसरों के अंदर परम ज्ञान के अनुभव को जागृत करने की एक विधि का आविष्कार किया और उसे पूर्ण बनाया। आज तक के इस संपूर्ण अंतः संस्रार अनुसंधान के सार इस नित्य ध्यान विधि में समाहित हैं ।
नित्य ध्यान एक सूत्र और विधि है जो संपूर्ण आत्म को रूपान्तरित कर और उसे परम ज्ञान अनुभव प्राप्ति के लिए तैयार करने का कार्य करता है। इस अनोखी विधि का हर प्रमाग दूसरे पद का पूरक है जो व्यक्ति की आत्म चेतना को और ज्यादा विकसित करता है। यह परमानंद के लिए दैनिक ध्यान है—नित्य आनंद ।
ध्यानः
यह पाँच चरणों की एक विधि है। हर पद सात मिनट का है। कृपया ध्यान निर्देश के लिए नित्य ध्यान अध्याय देखें।
आनंद शस्त्र :
ज्ञान अस्त्र या शास्त्र शस्त्र
ध्यानः
हर रोज आधे घंटे के लिए, किसी परम ज्ञानी गुरू की पुस्तक पढ़ें या उनके प्रवचन को सुनें। किसी गुरू के शब्द प्रत्यक्ष शास्त्र हैं- परम ज्ञान सत्य
अपनी अज्ञानता को दूर करने को लिए हथियार ही शस्त्र है। जब शब्द ही अज्ञानता के अंधकार को दूर करने का हथियार बन जाता है तो यही शास्त्र—शस्त्र कहलाता है।
गुरूओं के शब्द ज्ञान अस्त्र है जो सीधे अज्ञानता को दूर कर देते है। एक गुरू लगातार बहुत से विचारों को व्यक्त करते हैं। अचानक, कुछ विचार आपके लिए कौंधेगे। यह आपको कुण्ठा से उबारेंगे। यह आपकी किसी समस्या का समाधान होगा। यह एक कौंध (Click) है और यही वेग दीक्षा हैं ।
वह व्यक्ति जो यह ज्ञान—अस्त्र अपने शब्दों, विधियों और दैहिक भाषा के द्वारा देता है, गुरू है।
वह व्यक्ति जो यह ज्ञान-अस्त्र गुरू के द्वारा प्राप्त करते हैं वही दीक्षित है।
गुरू वह व्यक्ति हैं जो दूसरों में उस परम
जीवन-मुक्ति
अनुभव को जागृत करने के तकनीक का सृजन करता है जो अनुभव उसे घटित हो चुका है। दीक्षा एक तकनीक है। ज्ञान—अस्त्र अपने आप को बार बार उच्चतम चेतना में विकसित करने की विधियाँ हैं। इन ज्ञान—अस्त्रों की सम्पूर्णता जो हमारे अंदर विद्यमान है वही अंतः गुरू हैं। जब तक वह अंत गुरू हमारे अंदर जागृत नहीं होता है वही बाह्य गुरू हम पर कार्य करता है। वह शब्दों, विधियों, अपने दैहिक भाषा के द्वारा कार्य करता है और हमें ज्ञान के उपयोग का, और सबसे बड़ी बात एक परम ज्ञानी व्यक्ति के रूप में जीने का आत्म विश्वास देता है।
वे सौभाग्यशाली हैं जिन्होनें परम ज्ञानी व्यक्ति के साथ उस कौंध को पाया है। यह कौंध (क्लिक) तर्कों के द्वारा नहीं पायी जाती है। अचानक गुरू के कुछ शब्द हमारे हदय से जुड़ जाते हैं। जब पहली बार यह होता है, हम अचानक यह समझते हैं कि यही हमारे गुरू हैं, यही हमारा मार्ग है। वही क्लिक प्रथम दीक्षा है। जिस किसी ने भी गुरू क शब्दों, शिक्षाओं, पुस्तकों, आशीर्वादों, तकनीकों ऊर्जाओं या दैहिक भाषाओं के द्वारा इस क्लिक का अनुभव किया है, वह सौभाग्यशाली है।
समझिये कि बीज सदा टूटने और अंकुरित होने से घबराता है। किंतु वही बीज जो टूटता है, अंकुरित होता है, वृक्ष बनता है। फिर वह वृक्ष को दूसरे बीजों को यह कहकर 'डरो मत, तुम अंक्रुरित होने पर मरोगे नहीं, तुम बस जीयोगे। तुम बस मेरी तरह बढ़ोगे' उत्साहित करना है। किंतु बीज वृक्ष होने का प्रतीक्षा करता है और वृक्ष बीज के टूटने की प्रतीक्षा करता है। यही समस्या है।
मैं उस सत्य को जानता हूँ जो मैं कह रहा
हूँ। ओ! अमरता के पुत्रों अंकुरित होने और वृक्ष बनने का साहस जुटाओ।
यही ऊर्जा, यही प्रोत्साहन गुरू है। गुरू का आना ही किसी के जीवन में सबसे बडा साहस होता है। एक बार ज्योंहि गुरू हमारे अंतः आकाश में प्रवेश करते हैं, हमें बस श्रद्धा, साहस और आत्मविश्वास के साथ उनके समक्ष प्रस्तूत होने की जरूरत है।
बार-बार उसे क्लिक का प्रयोग करें जो आपके जीवन में घटित हयी है। कोई भी अस्त्र जिसका उपयोग नहीं हुआ है, न सिर्फ अपनी शक्ति खो देता है, बल्कि हम उसका उपयोग करना भी भूल जायेंगे। वह अस्त्र असल में जिसका उपयोग बार–बार होता है हमें स्पष्टता और साहस देता है और हमारे अंदर उसे उपयोग करने की बुद्धिमत्ता भी प्रदान करता है।
गुरू के शब्दों को सुनकर अपने जीवन में उस क्लिक को ज्यादा से ज्यादा जोड़िए। उसे अपने अंतः आवृति में जोड़िए। एक परिवार, मित्रों, एक आध्यात्मिक वर्ग का निर्माण हमें एक साहस और उत्साह देता है उस ज्ञान-अस्त्र के प्रयोग का ।
एक और बात, जब हम गुरू को बात करते देखते हैं, तो हम एक परम ज्ञानी व्यक्ति के दैहिक भाषा को देखते हैं। किसी व्यक्ति की दैहिक भाषा उसकी सत्यता और सम्पूर्णता को तरंगित करती है। एक गुरू अस्तित्त्व के परम ज्ञान का साक्षात रूप है। इसलिए उनकी दैहिक भाषा परम सत्य अस्तित्त्व की दैहिक भाषा है। उनको देखकर हम पर परम सत्य, तर्कों से परे कार्य करता है।
आनंद ऊर्जाः
शक्ति धरणा (अस्तित्व से उर्जा ग्रहण करना) —
यह तकनीक तंत्र शास्त्र कुलार नव तंत्र से ली गयी है। अस्तित्व की ऊर्जा से जुड़ने की यह एक सुंदर विधि है।
रात्रि में सोने से पहले इसका अभ्यास करना आदर्श समय है। इसे सुबह भी किया जा सकता है, किंतु इसके पश्चात पन्द्रह मिनट का विश्राम आवश्यक है, अन्यथा उस ध्यान के प्रभाव में
आप एक परमानंद मदहोशी की अवस्था में होंगे। यह ध्यान आपको अस्तित्त्व की ऊर्जा में समाहित होने की ओर अग्रसर करता है। शक्ति धारण ध्यान का महत्त्व यह है कि यह ध्यान आपको तुरिया अवस्था की चौखट तक ले जाता है। जहाँ आप पूर्ण जागृत रहते हैं किंतु बिना किसी विचार के।
सकते हैं जैसे कि आपके नीचे की धरती और आपके ऊपर का आसमान आपस में मिल रहा है,
समाहित हो रहा है। जैसे कि नर नारी की ऊर्जा समाहित हो रही हैं। आप हो सकता है कि महस्सूस करेंगे जैसे कि आप बह रहे हैं या समाहित हो रहे हैं। किसी भी अनुभव को आने दें और बस अपने आपको उसमें पूरी तरह डुबा दीजिए। अब 'आप नहीं हैं। आपका अस्तित्व में विलय हो गया है। आप नहीं हो, आप बस अस्तित्त्व में विलय हो चुके हो ।
दो - तीन मिनट के बाद जब आपको महसूस हो कि आप अस्तित्त्व की ऊर्जा से पूरी तरह भर चुके हो, झुकिए आगे की ओर, केहुने और बाहों के सहारे अपने को रखें और धरती को चुमें या कम से कम अपने माथे को जमीन से स्पर्श करें। आप उस दैविक ऊर्जा के लिए माध्यम या मार्ग बन जाते हैं जिसे आपने पुथ्वी की ऊर्जा के
हर दिन एक आनंदमय जीवन के लिये आठ कदम
अपने घुटने पर खड़े हों, और अपने आप को पूर्ण संतुलित रखें। अपने चुतड़ के सहारे न बैठें। अपनी आँखें बंद रखें और अपनी दोनों हाथों की हथेलियों को आकाश की ओर रखते हुए ऊपर ले जाएँ। अपने सिर को हल्का ऊपर उठाइए।
इस अवस्था में, अस्तित्व की ऊर्जा को अपने अंदर प्रवाहित होता महसूस कीजिए। शुरू करने के लिए आप किसी भी परम ज्ञानी गुरू के परमानंद मुख मंडल को मन में देख सकते हैं। बस उसी तरह जैसे कोई कंजुस पैसा गिनते समय या फिर कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ अपने पूर्ण ऊर्जा में होता है, उसी तरह कोई परम ज्ञानी गुरू अपनी परम ऊर्जा में होते हैं जब वो मुस्कुराते हैं या हँसते हैं।
इसलिए मैं आपको उनके परमानंदित मुख मंडल को दृष्टिगोचर करने के लिए कहता हूँ, उस ऊर्जा को अपने अंदर प्रवाहित होने दें। और यह ज्यादा अच्छा है कि आप उस गुरू के बारे में सोचे बजाय जिसमें कि आपका मन इधर उधर कुछ और सोचे ।
ज्यों ज्यों अस्तित्त्व की ऊर्जा आपके बाहों के सहारे प्रवाहित होता है, आप एक (tingling) स्पंदन महसूस करेंगे, एक मधुर स्पंदन, या आपके अंदर एक हल्का उद्दवेलन। यह ऐसा भी हो सकता है जैसे एक कोमल पत्ता हवा के झोंको के साथ नत्य कर रहा है। बस इस उद्वेलन को होने दें। उस उद्वेलन को इतनी मदद कीजिए कि उस ऊर्जा के साथ आपका पुरा शरीर स्पंदन करने लगे। बस उसकी मदद कीजिए और उसे होने दीजिए जो कुछ हो रहा है। आप अनुभव कर
साथ एक करने के लिए आकर्षित किया है। अपनी सारी ऊर्जा को धरती माता में समाहित होने दें। आप जब इस मुद्रा में हो, अपने गुरू के चरणों को दृष्टिगोचर कर सकते हैं। यह ऊर्जा समर्पित करते समय धरती माता के प्रति समर्पण के भाव में होने में मदद करेगा।
अब, अपनी स्वभाविक अवरश्था में आ जाएँ और इस चक्र को कम से कम छः बार करें। आप कुल मिलाकर सात चक्र करेंगे।
यह ध्यान शरीर में ऊर्जा के प्रवाह को आश्चर्यचकित रूप से बढ़ा देता है। रीढ़ की हड़डी से संबंधित आपकी सारी समस्याएँ इस ध्यान के करने से बस गायब हो जायेंगी क्योंकि ऊर्जा सीधे मूलाधर चक्र में जाती हैं, वह ऊर्जा केन्द्र जो रीढ़ के आधार में है।
इस ध्यान के करने के बाद आप उसी ध्यान की अवस्था में, भाव में सोने जा सकते हैं। वह नींद जो इस ध्यान के बाद आएगी, वह प्रगाढ़ और स्वप्न रहित होगी। जब आप अगली सुबह जागेंगे आप आश्चर्यचकित रूप से ऊर्जावान और ताजा महसूस करेंगे।
यह एक बहुत ही शक्तिशाली तकनीक है। जब इसका सतत् नियमित किया जाता है, एक नया जीवन, एक नया अर्थ, एक नया सत्य आपके अंदर प्रवाहित होने लगेगा। एक सुंदर और जीवंत संबध आपके और अस्तित्त्व के बीच निर्मित होगा। आप अति आनंद का अनुभव करेंगे और हर दिन एक उत्सव बन जाएगा।
आनंद मंत्रोच्चारण:
पुरूषचरणम या आनंद मंत्र का मंत्रोच्चारण—
मंत्र वैदिक भाषा संस्कृत में पढ़े जाते है।
संस्कृत की सुंदरता यह है कि सभी संभव ध्वनियाँ उसके इक्यावन ध्वनि अक्षरों में वर्णित है। संस्कृत भाषा न सिर्फ अर्थ संप्रेषित करती है, उसकी मौखिक ध्वनियाँ खास स्पंदन भी संप्रेषित करती है अपने साथ। इसके बावजूद भी कि आप मंत्रों का अर्थ नहीं समझते हैं, वह स्पंदन आप पर काम करेगा।
पूर्वीय देशो में, संस्कृत मंत्रो का उपयोग (दीक्षित करने) दीक्षा देने के लिए किया जाता है। गुरू मंत्र का उच्चारण करेंगे वह मंत्र स्वयं शिष्य के अंदर एक जागृत दीक्षा देगी। वह स्पंदन सीधे उसके चेतना में समाहित होगा और कार्य करना शुरू करेगा।
गुरू मंत्र है –
ॐ हरीम् नित्यानंदाय नमः ।
हिंदू विचारो में, हर साधारण, सरल, संभव क्रिया समझ के अनेक स्तरों से भरी हुई है। समझ व्यक्ति के चेतना (व्यक्तिगत) बोध पर निर्भर करती है। 'ओहम्' ध्वनि या शब्द बहुत से स्तरों पर बहुत अर्थ रखते हैं।
'ॐ' प्राथमिक ध्वनि है। सम्पूर्ण सूष्टि माना जाता है कि इसी से उत्पन्न हुई है। इसमें तीन वर्ण भेद हैं— अ, उ और म। ध्वनि 'अ' ब्रह्मा के लिए है, हिंदू देवता जिन्होंने इस सुष्टि का सुजन किया है, 'उ' विष्णु के लिए है, हिंदू देवता जो सृष्टि का पालन करते हैं, और 'म' शिव के लिए, हिंदू देवता जो नव सृजन के लिए, जगह के निर्माण के लिये विनाश करते हैं।
संयुक्त ध्वनि 'ॐ' इसलिए सम्पूर्ण सृष्टि द्योतक है।
गहरे स्तर पर देवता लोग सुजन, निर्वाह और विनाश की की ऊर्जाओं का निरूपण है, जो कोषकीय स्तर पर हमारी व्यक्तिगत सुष्टि में घटित होता है हमारी मन शरीर इकाई में।
ॐ का स्पंदन जब हम उसका उच्चारण करते हैं, हमें धरती माता की अडिगता की ताकत देता है। यह क्रोध, इच्छा और मनोशारीरिक रूग्णता को हमारे अंदर खत्म करता है। यह हमें धरती माता की विस्तुता और असीमितता से भर देता है। यह मन को नकारात्मक विचारों से मुक्त करता है। यह आश्चर्यजनक ऊर्जा की स्नाव करता है, और मस्तिष्क को पुनः शक्तिशाली बना देता है। यह मन को शांति और एकाग्रता की असीम शक्ति प्रदान करती है। यह मन को शान्त करने और स्व में प्रवेश करने के लिये जपिंग बोर्ड का काम करता है।
हरीम' देवी का बीज मंत्र है पवित्र स्त्रैण सिद्धांत।
प्राचीन भारत के ऋषि इन आदि ध्वनियों का उच्चारण किया करते थे और मन, शरीर और स्व के स्तर का गहराई से अनुभव करते थे। उन्होंने इसके विद्वान और विधियों के अभ्यास को मानवता के लिए प्रस्तुत किया जिससे कि वो भी उस महान अनुभव से गुजर सके, जिससे वे महान ऋषि गृजरे थे। वैदिक युग में ये मंत्र उन ऋषियों के शोध पत्र है जिनके उस परम अनुभव के प्रति प्रेम ने इसे मानवता के साथ बाँटने के लिए उन्हें प्रेरित किया।
'ॐ' और 'हरीम' का मंत्रोच्चारण एक साथ पुरूष और स्त्रैण ऊर्जाएँ जो हमारे अंदर विद्यमान हैं, उसे जागृत करते हैं।
नित्यानंद का उच्चारण गुरू के नाम का उच्चारण परम सत्य के निरूपण के रूप में करते जीवन-मुक्ति
हैं। यह पूर्ण मूल मंत्र है क्योंक यह भौतिक संसार में शक्ति या सफलता के लिए और ब्रह्मांड संसार में परम ज्ञान, शिव, सफलता के लिए, जो कि आत्मज्ञान है, का सीधा रास्ता है।
शब्द नित्यानंद का अर्थ शाश्वत आनंद भी है। इसके उच्चारण से हम अपने स्व को और इस
ब्रह्मांड को अपने परम उद्देश्य परमानदं या परम ज्ञान का एक स्पष्ट ध्येय देते हैं।
'नमः' का अर्थ है 'मैं नहीं' हूँ। 'मैं नहीं हँ कह कर हम सुष्टि के प्रति या उस गुरू के प्रति जो सुष्टि का शुद्ध रूप है, हम अपने अहम् का समर्पण करते हैं। नमः शब्द का जब पुनरावृति होती है, तो यह हमारे त्याग के अनुभव को पुष्ट करता है। यह हमारे अंदर नम्रता और श्रद्धा का भाव लाती है।
ध्यानः
गुरू मंत्र का उच्चारण हर रोज चौवन बार करें या ग्यारह दिनों के लिए सतत जब कभी यह याद आए यह उच्चारण जोर से बोलकर या मन में भी चुपचाप कर सकते हैं। मंत्रोच्चारण का रफ्तार व्यक्ति दर व्यक्ति बदलती है।
इस मंत्र में आपके आंतरिक स्थल को ऊर्जावान और अनचाहे विचारों के उत्पन्न होने से रोकने का गुण है। विचार नाभि क्षेत्र में मणिपुरक चक्र से मौन शब्द के रूप में उत्पन्न होते हैं, जो नाभि क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा केन्द्र है। जब आप गुरू मंत्र का उच्चारण करते हैं, तो मणिपूरक चक्र पूर्णतः स्वच्छ हो जाता है। यह स्वतः हर चिंता नकारात्मक विचारों और भावनाओं को दूर कर देता है।
गुरू मंत्र वाणी की परोक्ष ऊर्जा को शुद्ध करता है, जो 'वाक' ऊर्जा कहलाती है। यह उर्जा से सतत भरपूर करता है और जीवन के प्रति प्रगाढ़ उत्साह और उमंग भरता है।
इस मंत्र का स्पंदन व्यक्ति के आवृति और स्पंदन को बदल सकता है। यहाँ महत्वपूर्ण बात है मंत्र के प्रति सजगता रखना। जब आप सतत् अपनी चेतना को मंत्र पर वापस लाते हैं तो आप अपने अंतः चेतना के नजदीक बढ़ते हैं।
जैसे किसी पानी के टंकी में, अगर हम उसके तले में नीला पाउडर को रखते हैं, तो उठते हुए बुलबुले भी नीले होंगे, उसी तरह जब आप इस मंत्र को अपनी चेतना के केन्द्र में रखते हैं, तो आपका संपूर्णत वैचारिक तंत्र शुद्ध हो जाएगा।
शनै शनै आप देखेंगे, यह मंत्र स्वयं प्रयास
रहित होने लगेगा और आप प्राकृतिक ध्यान अवस्था में चले जाएँगे।
यह मंत्र, एक खास सकारात्मकता के साथ किया जाता है, जो एक शक्तिशाली प्रार्थना बन जाती है। चिकित्सकीय शोधों ने यह प्रमाणित किया हे कि प्रार्थना का शरीर मन और आत्मा पर अदभुत प्रभाव पडता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका को अग्र णी विश्वविद्यालयों ने यह पाया है कि प्रार्थना ने हृदय रोग या कैंसर जैसे रोग से मृत्यू दर को चालीस प्रतिशत कम कर दिया है। हृदय शल्य चिकित्सा के बाद रोगियों को जीवन दर को चौदह प्रतिशत बढ़ा दिया है, बुजुर्गो के हृदयाघात दर को आधे से ज्यादा कम कर दिया है, और अस्पताल में रहने के समय तीन सप्ताह तक कम कर दिया है। इंटरनेट पर प्रार्थना के सकारात्मक प्रभाव का एक वृहत आंकड़ा स्थापित है।
गुरूः - जीवंतमुक्त
चित्रम वदतरू मूले वृद्धा शिष्य गुरूर युवाह गुरूस्तु मौनं व्याख्यानम् शिष्यास्तु चिहुन संशय वो वटवुक्ष के नीचे बैठे थे— गुरू, एक नवयुवक, शिष्य और वुद्ध।
गूरू मौन रहकर ही बोलते हैं। लेकिन शिष्य का प्रश्न अपने आप खत्म हो जाता है।
परिकल्पना की समझ सदा शैक्षिक रहेगी और तकनीक रूपांतरण की शक्ति के बिना सदा औजार की ही तरह रहेगी जब तक कि गुरू की उपस्थिति उस प्रक्रिया को उत्प्रेरित नहीं करती है। ईश्वर का अनुभव पाने के लिए गुरू की जरूरत पडती है।
वैदिक परंपरा में, आध्यात्मिक शिक्षक गुरू, ईश्वर से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। धार्मिक ग्रंथ कहते है कि गुरू माँ है, पिता हैं और भगवान हैं, एक में सब और सब से परे।
हम में से अधिकांश के लिए ईश्वर एक परिकल्पना हैं। बहुत ही कम ऐसे व्यक्ति (लोग) हैं जो दैविक अनुभव के बारे में पूरे प्रमाण के साथ बोल सके जो उन्होंने खुद अनुभव किया है।
ऐसा कहा जाता है कि जो अनुभव करते हैं, व्यक्त नहीं करते हैं, और जो व्यक्त करते हैं उन्होंने उसका अनुभव नहीं किया है। गुरू वे हैं जिन्होंने अनुभव किया है और वो उस अनुभव को केवल अभिव्यक्ति द्वारा नहीं बल्कि अपनी स्व शारीरिक भाषा और जीवन शैली के रूप में दूसरे के लिए संचारित भी करते हैं।
गुरू आपके अपने दैविक अनुभव के द्वार हैं। वो शिष्य का अपने हाथों से मार्गदर्शन करते हैं जिसके द्वारा वे अपनी स्वयं की भीतरी दिव्यता के मौलिक सत्य का अनुभव करते है। इस प्रक्रिया में वे शिष्य गुरू बन जाता है और वह चक्र चलता रहता है।
परम ज्ञान का यह सदचक्र जो अपने सत्य रूप के ज्ञान के अनुभव के रूप में परिणत होता है, इच्छा और पीड़ा के उस दुष्चक्र को तोड़ देता है जिसमें हम सब फंसे हुए हैं। बहुत ही गहरे ज्ञान के साथ महात्मा बुद्ध ने कहा था कि सभी इच्छाएं पीड़ाएं हैं। महात्मा बुद्ध का इशारा मनुष्य के उस स्वभाव की ओर था जिसमें मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति बाह्य रूप में अपनी इन्द्रियों को द्वारा करता है। यह कभी नहीं हो सकता है। इच्छाएं बार-बार जन्म लेती हैं। बस वह अंतः आनंद का अनुभव ही है जो अपनी अनंत संभावनाओं के ज्ञान के साथ जागृत होता है, उस पीड़ा को मिटाता है जो मनुष्य का स्वभाव हो गया है।
गुरू दर्पण हैं। वह ऊर्जा का एक कुशाग्र दर्पण हैं जो हमें उस खोज की ओर ले जाता है कि हम कौन हैं। आइये अब इस यात्रा को शुरू करें।
शेर और शेर का बच्चा (Cub) की कथा:
एक लघुकथा —
बहुत दिन पहले, भोजन के लिए एक गर्भवती शेरनी ने एक बकरियों के झुण्ड पर आक्रमण किया। वह ज्यों हि एक बकरी पर झपटी, तनाव की पीडा उसके लिए असह्य हो गयी और वह एक शेर का बच्चा को जन्म देकर गुजर गई।
नवजात शेर का बच्चा मुश्किल से अपनी आंख खोल सकता था। उसने कुछ आवाज दी और जमीन पर लाचार इधर—उधर चलने लगा। बकरियों ने उस अनाथ Cub को देखा, और उन्हें उस पर दया आ गयी।
आपको आश्चर्य होगा कि कैसे बकरियां उस शेर के बच्चे के प्रति दया का भाव अनुभव कर सकती हैं।
समझिये, जब शत्रु आपको बाधा नहीं पहुंचाए या आघात नहीं दे और अगर आप किसी रूप में उसकी उपस्थिति से खतरा महसूस नहीं करते हैं, आप महसूस करेंगे कि आप उसके प्रति दया का भाव रखते हैं, इसके बावजूद भी वह स्वभाव से आपका शत्रु है। उसी तरह, क्योंकि बकरियों शेर के बच्चे से खतरा नहीं महसूस कर रही थीं, उन्होंने उसके प्रति स्नेह दर्शाना शुरू कर दिया।
उन बकरियों ने यह समझा कि वह शेर का बच्चा उन पर आक्रमण नहीं करेगा और इसलिए वे उसके प्रति सहानुभूति दर्शा पा रही थीं। उन्होंने उसकी देखभाल की, उसका लालन-पालन अपने अनुसार सबसे अच्छे ढंग से किया। उन्होंने उसे घास कैसे चरा जा सकता है, कैसे बकरी का दूध पिया जाता है, कैसे उनकी तरह रहा जाता है, और यहां तक कि उनकी तरह कैसे (Bleat) मिमियाया जाता है। उसे सिखाया।
जीवन-मुक्ति
उस शेर के बच्चे ने बकरी के शारीरिक भाषा को भी सीख लिया। जन्म से उसे किसी ने नहीं बताया कि वह एक शेर है, इसलिए वह कभी नहीं समझ पाया कि शेर होना क्या होता है। इसलिए, वह उन उन बकरियों की तरह बढ़ता रहा। बकरियां भी उसके साथ सामान्य महसूस कर रही थीं क्योंकि वह भी उन्हीं की तरह एक लग रहा था उन्हें।
और ज्योंही वह शेर का बच्चा बड़ा हुआ वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन अपने प्राकृतिक रूप में करने लगा। जब कभी शिशु बकरियां उसके साथ लड़ती, वह उनको जोर का धक्का मारता। शिशु बकरिया अपनी माँ से शिकायत करतीं कि वह हमें मार रहा है!' माता बकरियां शिशु बकरियों को पुचकार कर और उन्हें उस लड़ाई को भूलने का सलाह देकर अपना भरसक प्रयास करतीं उनमें मेल जोल बढ़ाने का ।
एक दिन एक शेर ने बकरियों की झुण्ड पर आक्रमण किया। डरी हुए बकरियां विभिन्न दिशाओं में तितर बितर हो गई। शेर ने तब देखा एक शेर का बच्चा Cub बकरियों के साथ, उन्हीं की तरह मिमियाता हुआ उनके साथ भागा। शेर को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। वो
नहीं समझ पाया कि वह Cubउसको देखकर भागने क्यों लगा और वह क्यों बकरियों की तरह मिमिया रहा था।
अगले दिन वह शेर शिकार की भावना से नहीं बल्कि बस शिशु शेर की खोज में आया। जब उसने उस (Cub) बच्चे को देखा, वह उसके पीछे धीरे से गया और उसे अपने कब्जे में लिया, ज्योंही उस शेर ने उसे पकड़ा, वह शेर का बच्चा चिल्लाने लगा– 'मुझे जाने दो! मुझे जाने दो! बा …….बा…… ... ' /
शेर ने कहा – 'मूर्ख' डरो मत। मैं तुम्हें मारने नहीं जा रहा हूं। क्या तुम नहीं जानते हो? तुम कौन हो'? वह Cub बच्चा चिल्लाया, 'मैं एक बकरी हूं। मुझे जाने दो! मुझे जाने दो!'
शेर ने कहा– 'मूर्ख' तुम बकरी नहीं हो। मुझसे डरो मत'। किंतु वह बाल्य शेर भयभीत था और किसी के बात सुनने के लिये तैयार नहीं था। किसी तरह वह उसके चंगुल से मुक्त हो पाया और वह भाग गया।
अगले दिन शेर फिर उसी जगह पर आया जहां बकरियां थीं। वह फिर उस शेर के बच्चे को पकड़ने में कामयाब हुआ। इस बार उसने उसे जोर से पकड़ा।
वह शेर का बच्चा उसके चंगुल में फंसा संघर्ष कर रहा था, किंतु उसका एक मन पूरे जोर से उसे बचने के लिए कह रहा था। वहीं दूसरे मन में उस शेर का स्पर्श उसे अच्छा लग रहा था। शेर के स्पर्श का वह आश्वस्त, आरामदायक अनुभव ने उस शेर के बच्चे के अंदर कहीं गहराई में किसी बात को जागृत कर दिया। उस शेर के बच्चे के संघर्ष को देखते हुए, वह शेर बोलता रहा–'मैं कल
फिर आऊँगा। किंतु उस समय मैं तुम्हारा पीछा नहीं करूंगा।' और वह शेर फिर जंगल में चला गया।
वह शेर का बच्चा रात भर जागा रहा। वह सो नहीं पाया। उसके मन में बहुत सी बातें आने लगीं————————' मैं उसे स्वीकार नहीं कर सकता हूं जो उस शेर ने मुझे कहा है, 'किंतु मुझे लगता है उसने जो कुछ भी कहा है, उसमें कुछ सच्चाई है, 'नहीं! नहीं! नहीं! मुझे नहीं लगता है उसने जो क्छ कहा है, वह सही है।' मैं जानता हूं कि मैं एक बकरी हूं। मैं यह जन्म से ही जानता हूं। और उसने जो कुछ कहा है उसका मुझे कोई अर्थ समझ में नहीं आता है। वह बस मुझसे कुछ पाने के लिए झूट बोल रहा है।
समझिए, उस शेर की बातों ने शेर के बच्चे के मन पर उसके तर्क से परे असर डाला था। यहां मैं स्पष्ट होना चाहता हूं कि अगर गुरू की उपस्थिति आपके तर्कों से परे आप पर असर करती है तो आपके अंदर गुरू की जागृति हो चुकी है।
आप शेर के साथ तब तक तक जुड़ा हुआ अनुभव नहीं करेंगे जबतक कि आपके अंदर का शेर जाग न गया हो। अगर आपको गुरू के स्पर्श से उस शेर से कुछ उमंग महसूस होता है, कुछ आराम का आभास होता है, और अगर आप बार—बार उसी अनुभव को जगाना चाहते हैं जो आपके स्मृति में उस शेर, गुरू के साथ रहने पर होता या यहां तक कि दुष्टिगोचर करने पर भी एकदम स्पष्ट रहें, उस शेर ने आपको बहुत गहरा स्पर्श किया है! आपका एक अंग ने आराम का अनुभव पाना पहले से ही शुरू कर दिया है। आपका अंग पहले से ही यह अनुभव करना शुरू कर दिया है कि गुरू जो कुछ कहते हैं उसमें कुछ है।
गुरूः - जीवंतमुक्त
अगले दिन जब वह शेर आया, तो वह शेर का बच्चा वहां खड़ा उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। वह शेर का बच्चा पूरे धीरज के साथ जंगल के छोर पर उस शेर को खोज रहा था। किंतु जब वह शेर आया, वह शेर का बच्चा उस शेर से अलग उन बकरियों की झुंड की तरफ बढ़ने लगा। किंतु वह उस शेर पर से अपनी दृष्टि नहीं हटायी क्योंकि वह उस शेर का रूप नहीं खोना चाहता था।
वह बस सावधानीपूर्वक कुछ कदम पीछे हटा शेर से यह कहते हुए 'तुम वहीं रूको जहां तुम हो और मैं वहां खड़ा होता हूं जहां मैं अभी हूं। हम धीरे से बात कर सकते हैं। यह सत्य है कि मैं तुम्हें नहीं भूल पाया हूं। किंतु हम, अपने बीच यही दूरी बनाएं रखें।' उस शेर ने जबाव दिया, मेरे लिए यह ठीक है। तुम वहीं रहो, जहां तुम हो और अब हम बात करें।
वह शेर बोलता रहा, 'समझो तुम शेर हो! तुम अपने आप को कुछ और समझाते हुए अपनी असली स्वभाव की अनदेखी कर रहे हो। ध्यान से देखो और तुम खुद में और उन बकरियों में अंतर पाओगे, 'वह शेर का बच्चा चिल्लाया, 'नहीं! नहीं! यह
कैसे हो सकता है? मैं भी उन्हीं की तरह वही घास खाता हूं जो वे खाती हैं। मैं बिल्कुल उसी तरह रहता हूं जैसे अन्य बकरियां रहती हैं।
शेर ने कहा- 'मूर्ख! तुम इस मूलभूत बात को समझो। खुद गौर करो। कोई दूसरी बकरी मुझसे जुड़ी हुई महसूस नहीं करती है। कोई अन्य बकरी मेरी प्रतीक्षा नहीं करती हैं। वो सब मुझसे घबराती हैं। बस तुम मेरे लिए प्रतीक्षा करते हो। बस तुम इस एक बात से समझो कि तुम्हारे भीतर कुछ हो रहा है। तुम्हें मेरे लिए यहां प्रतीक्षा करने की क्या जरूरत है? मेरे साथ नजदीक के नदी पर चलो और अपनी परछाई को पानी में देखो। तुम, अपनी और मेरे चेहरे को देख पाओगे।'
उस शेर के बच्चे को उस शेर के साथ जाने में डर लग रहा था, उसने उससे कहा 'नहीं, हम बस यही खड़े रहें और बात करें। तुम वहीं खड़े रहो जहां तुम हो, मैं यहीं खड़ा रहता हूं जहां मैं हूं। तुम्हें जो कुछ कहना है, तुम कहो। मैं यहीं खड़ा रहकर तुम्हारी
बात सुनता हूं।'
फिर उस शेर ने कहा, टीक है, मुझे तुमसे यह कहना है, अगर र तु म दिखाने दो, मैं तुम्हें तुम्हारा असली रूप नदी में दिखा सकता हूं और मैं तुम्हें साबित कर दूंगा कि
किंतु फिर एक बार उसके मन ने हस्तक्षेप किया और उसका भाव निराशावादी होने लगा और वह अपने मन में संदेह करने लगा।
तुम मेरे जैसे ही हो। किंतु मैं तुम पर जोर नहीं दूंगा। मैं एक सप्ताह बाद फिर आऊँगा। अगर
तुम तैयार रहते हो तो उसी जगह पर आना और मेरी प्रतीक्षा करना। फिर मैं अपने साथ तुम्हें नदी के तट पर ले जाऊँगा। अगर तुम नहीं चाहो तो बस भूल जाओ। मुझे याद करने की कोशिश भी मत करना, बस चले जाना!' वह शेर फिर चला गया।
वचनानुसार, वह शेर एक सप्ताह के बाद फिर आया। उस शेर के बच्चे का मन अभी भी दिग्भ्रमित था, 'क्या मैं उस शेर से मिलने जाऊं या नहीं'। किंतु अपने अंतर्मन में, वह शेर का बच्चा उस शेर से मिलना चाहता था किंतु साथ में वह उस शेर से डरा हुआ भी था।
अंततः, वह उस शेर का बच्चा उस स्थान पर पहुंचा जहां वह अंतिम बार उस शेर से मिला था और उस शेर को वहां देखा था। शेर ने उसे देखा और उठ खड़ा हुआ। धीरे-धीरे वह उसका मार्ग प्रशस्त करते हुए नदी की ओर बढ़ने लगा। जब वह जा रहे थे, वह शेर उस शेर के बच्चे के थोड़ा नजदीक आया। वह शेर का बच्चा डर गया और चिल्लाने लगा 'नहीं! नहीं! तुम वहीं खड़े रहो जहां तुम हो। तुम बस मुझे नदी का रास्ता दिखाओ। कृपया तुम मेरे इतने नजदीक मत चलो। मैं खुद नदी तक चल सकता हूं। वह शेर थोड़ा दूर हटा और शेर के बच्चे को अपनी कहानी सुनाने लगा कि कैसे वह भी एक शेर का बच्चा था और कैसे वह बड़ा हुआ। इन कहानियों को सुनकर, वह शेर का बच्चा उसमें इतना डूब गया कि वह उस शेर से दूरी बनाए रखना ही भूल गया। ज्यों हि वे जा रहे थे, वह शेर उसके नजदीक आता चला गया। वह शेर का बच्चा उस कहानियों में डूबा हुआ बस पूछता रहा, 'क्या ऐसा था'। 'क्या ऐसे वह हुआ'? 'क्या आपको भी ये सब समस्याएं झेलनी पड़ी थी।'
शेर का बच्चा समझ भी नहीं पाया और साथ चलते हुए वह शेर उसके इतने नजदीक आ गया कि वह अब उसका स्पर्श कर रहा था। अचानक उस शेर के बच्चे का ध्यान उस ओर गया, किंतु उसने पाया कि इससे उसे कोई फर्क महसूस नहीं होता है। उसे शेर का स्पर्श ऐसा आरामदायक अनुभव हुआ, कि उसने उसका विरोध नहीं जताया।
वह शेर बात करता रहा और वह शेर का बच्चा कहता रहा, 'ओह! ये अच्छा था..... ये रोचक था.. ...' वह शेर अब लगभग उस शेर के बच्चे को उठाए हुए था, किंतु वह शेर का बच्चाा शेर के बचपन की कहानियों में पूरी तरह डूबा हुआ था।
ज्यो हीं वह नदी के तट पर पहुंचे, उस शेर ने उस शेर के बच्चे को पकड़ा और उसे पानी के पास ले गया। वह शेर का बच्चा अब जान गया था कि अब बचने का कोई उपाय नहीं है, किंतु उसे यह आश्चर्य हुआ कि उसके अंदर अब बचने की कोई इच्छा नहीं थी।
समझिए, वह शेर का बच्चा अब जान गया था कि न सिर्फ अब वह नहीं भाग सकता था, बल्कि वह भागना भी नहीं चाहता था। किंतु, फिर एक लघु अहम् उसके मन को कोने में कहीं छुपा उसे समस्याग्रस्त कर रहा था और वह बोला– 'नहीं! नहीं! मुझे जाने दो। तुम मेरे साथ क्या कर रहे हो? तुमने मुझे पकड़कर क्यों रखा है?' उस शेर के बच्चे के अंदर अभी भी कुछ भय बना हुआ था। इसलिए उसने पूछा— 'तुम मेरे साथ क्या कर रहे हो? कृपया मुझे बताओ, तुम मेरे साथ क्या कर रहे हो?'
उस शेर ने उत्तर दिया– 'मैं तुम्हारे साथ कुछ नहीं कर रहा हूं। बस पानी में देखो, उस शेर के बच्चा
पानी में देखा और पूछा— 'ठीक है, मैं पानी में देख रहा हूं।' उस शेर ने तब पूछा– 'पानी में तुम क्या देख पा रहे हो? क्या तुमको दो रूप दिखते हैं?' उस शेर के बच्चे ने उत्तर दिया– 'हां'।
उस शेर ने कहा – 'ठीक है, एक शेर मैं हूं और दूसरा तुम हो ।'
वह शेर का बच्चा दोहराया, 'दो परछाईयां— एक मेरा और दूसरा तुम्हारा'। फिर अचानक उसे आभारस हुआ कि वह वह क्या कह रहा है, उसे उस पर विश्वास नहीं हो पा रहा था और वह चिल्लाने लगा— नहीं भी हो सकता है! 'नहीं! नहीं! नहीं! पानी में दोनों परछाईयां तुम्हारी ही होगी।'
वह शेर चिल्लाया, 'मूर्ख! देखो ! ये अपना हाथ उठा रहा हूं । देखो कौन सी परछाईं अपनी हाथ उठा रहा है।' उस शेर के बच्चे ने पानी में परछाई की ओर इंगित किया और बोला, 'सिर्फ वही परछाई अपना हाथ उठा रहा रहा है।' उस शेर ने तब कहा, 'ठीक है, अब तुम अपना उठाओ।'
उस शेर के बच्चे ने अपना हाथ उठायी, नदी में परछाई को देखा और चिल्ला उठा, 'हां! हां! हां! मैं देख रहा हूं। मैं देख रहा हूं।' फिर एक छोटे भ्रमित आवाज में पूछा— 'किंतु …. मैं एक शेर कैसे हो सकता हूं? क्या मैं एक बकरी नहीं हूं?'
वह शेर बस उसकी ओर देखा और बोला, 'मैं यहां तुम्हारे साथ चाल चलने नहीं आया हूं।' उस समय उस शेर के बच्चे के अंदर एक उमंग की भावना उठनी शुरू हो गई। वह वहां कुछ विश्वसनीय घटना घटित होने वाला था, महसूस कर सकता था।
किंतु फिर एक बार उसके मन ने हस्तक्षेप किया
और उसका भाव निराशावादी होने लगा और वह अपने मन में संदेह करने लगा, मुझे लगता है कि मैं सम्मोहित कर दिया गया हूं। यह मेरा असली चरित्र नहीं है। मुझे कुछ हो गया है। यह मैं नहीं हूं। मैंने कभी इतना आनंद, इतनी खुशी महसूस नहीं की है। यह मैं नहीं हूं। वह मेरे साथ कुछ कर रहा है। उसने पहले ही मेरे साथ कुछ कर दिया हैं ।'
वह शेर का बच्चा अब भी विरोध कर रहा था। वह बचने के लिए संघर्ष कर रहा था, किंतु वास्तव में वह एक अनमना प्रयास था, क्योंकि वास्तव में उसे बचने का कोई मन नहीं था।
वह शेर का बच्चा विरोध प्रकट करने लगा, नहीं! नहीं! नहीं! मुझे जाने दो। मुझे जाने दो। मैं जानता हूं कि तुम एक शेर हो। एक भेंट के रूप में तुम्हारे लिए मैं घास लेकर आऊँगा जो हर रोज मैं खाता हूं। मैं तुम्हारे लिए दूध लाउंगा जो मैं रोज पीता हूं। मैं तुम्हारी सेवा में अपना समय समर्पित करूंगा।
अंत में वह शेर सोचा, 'मुझे अभी ऐसे छोड़ देना चाहिए। अभी यह इतना ही समझ सकता है।' इसलिए उसने उससे कहा, ठीक है, किंतु एकदम स्पष्ट रहो, हम कल एक बार फिर मिलेंगे। मैं तुम्हें यहां लाने के लिए जंगल के छोर पर नहीं आऊँगा। मैं अपने घर में रहूंगा। अगर तुम्हें मुझसे मिलने का मन होगा, मैं जहां रहता हूं, खोज लेना वहां मुझसे मिलने अपने आप आना। मेरे पास, तुम्हें यहां लाने के लिए इतना चलकर तुम्हारे पास आकर बर्बाद करने का समय नहीं है। अगर तुम अपने परिश्रम से मेरे पास नहीं आना चाहते हो, तो ऐसा ही सही।' वह शेर वह शेर उससे यह कहकर चला गया।
इस बार वह शेर का बच्चा वैसे नहीं भाग गया जैसे
गुरूः - जीवंतमुक्त
वह किया करता था। वह बहुत बहुत धीरे धीरे लौटा। वह जाना नहीं चाहता था, किंतु वहीं दूसरी तरफ उसका मन उससे उन बकरियों के पास जाने का जोर दे रहा था। उस शेर के बच्चे के तीन पैर नहीं हिल रहे थे। उसका सिर्फ एक पैर चल पा रहा था। उस विदाई के सोच पर उसकी नन्हीं आंखों से आंसू की बड़ी बड़ी बूंदे गिरने लगी। अगले दिन वह शेर अपने घर में वह राजा की तरह बैठा हुआ था। धीरे धीरे, एक दम धीरे, वह शेर का बच्चा ताजे कटे घासों के साथ यह सोचते हुए बढ़ा, 'यह कहीं उपलब्ध सबसे अच्छी घास है' और उस शेर के सामने यह कहते हुए उसे बिछाया, कुपया यह मेरी भेंट स्वीकार करें जो मैं लाया हूं। उस शेर ने गौर किया और अपने मन में सोचा, 'ठीक है, अगर में यह घास स्वीकार कर लेता हूं तो यह मुझे अपना समझेगा। हो सकता है यह इस संबंध को और गहरा होने दें। इसके द्वारा वह मुझसे और जुड़ा हुआ अनुभव करेगा।' यह सोचते हुए, इसके बावजूद भी शेर घास नहीं खाता है, उसने वह घास उठाया, उसे अपने मुंह में डाला और खाने लगा। उसने उस शेर के बच्चे का यह कहते हुए तारीफ की, 'यह घास जो तुम मेरे लिए लाये हो, सचमुच बहुत स्वादिष्ट है।' वह शेर का बच्चा अपने आप से बहुत खुश था। उनके बीच वह संबंध, जब वह शेर घास खाना शुरू कर दिया तो और प्रगाढ़ होने लगा।
समझिए, वह शेर अपने और उस शेर के बच्चे के संबंध की दूरी को कम करने के लिए नीचे उतर कर घास खाने लगा। इसके बावजूद भी वह कभी घास नहीं खाता था, उसने ऐसा दर्शाया कि वह घास खाकर आनंद की अनुभूति कर रहा है।
क्रमशः उस शेर और उस शेर के बच्चे के बीच एक
संबंध विकसित हो गया। कभी-कभी-कभी घास खाकर वह शेर उस शेर के बच्चे पर चिल्लाता भी था, 'मूर्ख! क्या तुम नहीं जानते हो कि तुम्हें मेरे लिए कैसा घास लाना चाहिए? यह किस तरह का घास है? अब तक तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मैं क्या खाता हूं। अगली बार मेरे लिए सही घास लाना।'
वह शेर का बच्चा सोचने लगा, 'वह गुरूसा हो रहा है। मुझे भी कभी कभी कभी गुरूसा आता है। इसलिए वह मेरी भाषा बोलता है और मैं इसकी भाषा बोल सकता हूं। वह बिल्कुल मेरी तरह है।'
जब वह शेर घास खाता है, वह अपने स्तर, अपनी जमीन, अपनी चेतना से उतरता है उस शेर के बच्चे से जुड़ने के लिए।
वह शेर का बच्चा अचानक बहुत सहज अनुभव करने लगा। अब वह उस शेर से जुड़ सकता था। अब उस शेर बच्चे ने निर्णय लिया, 'अगली बार निश्चित रूप से मैं सही धास और ताजा दूध लाऊँगा। मैं निश्चित रूप से सही तरीके से काम करूंगा। संभवतः घास को सही रूप से बाधूंगा।' उस शेर के बच्चे ने योजनाएं बनाई, यह सोचकर कि ठीक से काम नहीं करने के कारण वह उस शेर से डांट सुना था। इस तरह उस शेर और उस शेर के बच्चे के बीच संबंध विकसित होने लगा। अब वह शेर का बच्चा अपने आप को स्वतंत्र महसूस करने लगा और वह उस शेर से मिलने जब कभी उसे मन हो आने लगा। उस शेर के बच्चे को उस शेर के पास बहुत सहज, बहुत निश्चिंतता अनुभव होने लगी, वह नहीं जानता था कि 'गुरू शेर की यह गुरू गुरू योजना थी।
एक दिन जब वह शेर का बच्चा सदा की तरह घास और दूध लेकर आया, उसने देखा वह
गुरूः - जीवंतम्त्र
शेर अपने आगे एक बड़ा सा मांस का टुकड़ा लेकर बैठा था। ज्योंही उस शेर के बच्चे ने उस मांस को देखा, वह डर गया और चिल्लाने लगा, 'आपने अपनी थाली में मांस क्यों रखा है? यह क्या है? क्या आप मांसाहारी हैं? मैं नहीं जानता था कि आप मांसाहारी हैं? आप इतने प्यारे और चमत्कारी व्यक्ति हैं। आप मांसाहारी नहीं हो सकते हैं। आप यह सब घिनौना चीज खाते हैं। मैं एक शाकाहारी हूं। मैं इसे पचा नहीं सकता।'
इस बार उस शेर ने कोई समय और ऊर्जा गंवाये, उसने उस शेर की बच्चे की गर्दन पकड़ी, कुछ मांस उठाया और उसे शेर के बच्चे के मुंह में
टूंस दिया। ज्योंही वह मांस उसके मुंह मे गया, उस शेर के बच्चे ने उस मांस में खून के स्वाद को चखा कि उसके अंदर अचानक कुछ होने लगा। वह शेर का बच्चा नहीं समझ पाया कि क्या हो रहा है। उस शेर के बच्चे ने पहली बार मांस खाया था। वह उस अनुभव से अभिभूत हो गया जो उसके अंदर जागृत हुआ था। यहीं आपकी सतोरी के प्रथम अनुभव में होता है — परमानंद । जब आप उसे अनुभव करेंगे, आप समझेंगे।
जीवन-मुक्ति
मांस का स्वाद चखने पर वह शेर का बच्चा शेर की तरह दहाड़ा। उसने दहाड़कर अपने प्राकृतिक रूप
को प्रकट किया। अब वह शेर उस शेर के बच्चे की आंखों में सीधे देखा
| समझिये, आप नन | और कहा, |
|---|---|
| त्वमं असि' यूर्यह | |
| ही मनुष्य हैं, न ही तुम हो — तुम वही | |
| वह परिचय जो जो व हो।' दीक्षा घटित | |
| आप सोचते हैं, कि | हुई। वह शेर एक |
| शेर हो गया। यही | |
| आप है हैं । | |
| शेर जो अपने आप |
था, वह एक शेर हो गया।
आप एक शेर हैं, बकरी नहीं।
समझिये, आप न ही मनुष्य हैं, न ही वह पहचान जो आप सोचते हैं, कि आप हैं।
आप बहुत हद तक उस बकरी की तरह
को बकरी समझता
हैं। असल में, आप वह बकरी ही हैं। मेरी ओर देखिए और समझिए। मैंने भी सोचा था कि मैं एक बकरी हूं, किंतु बस उस मार्ग को देखें जिससे मैं एक शेर बन गया। बस मेरे जीवन पर गौर करें। तब आप समझेंगे कि कैसे आप एक मूर्ख हैं, अपने आप को बकरी समझकर, और आप स्वतः शेर बन जायेंगे ।
भगवान् श्री कृष्ण का आशय यही था जब उन्होंने कहा, 'जब तुम मेरे जीवन को जान जाआगे तो तुम्हें मोक्ष मिल जाएगा।' एक मोक्ष प्राप्त व्यक्ति का जीवन आपको भी मोक्ष प्रदान करता है, क्योंकि यह दिखाता है कि वस्तुतः आप कहां खड़े हैं। एक मोक्ष प्राप्त व्यक्ति भी कभी अज्ञानी था और उसी जगह खड़ा था जहां तुम हो। यह आपको वह अपार साहस देता है जिससे कि आप कच्चे मांस को खाकर अपने अंतः प्रकृति का स्वाद चखते हैं। यही परमानंद है, आप मिमियाने के बजाय दहाड़ने लगते हैं। जब इसका अनुभव होता है तो आप मिमियाने के बजाय दहाड़ते हैं।
| उस शेर के बच्चे को यह समझने में कि | |
|---|---|
| वह एक शेर है, कितना समय लगा? मुश्किल से | |
| एक सेकंड। ज्योहीं वह | |
| मांस और वह रक्त उसके | |
| गुरू एक | मुंह के अंदर गया, वह |
| धर्मग्रंथ है जो | दहाड़ना शुरू कर दिया। |
| किंतु याद कीजिए उस | |
| शेर के बच्चे के मुंह में |
बस उस मास क टुकड़ का जान म ाकतना समय लगा? गुरू की गुफा में जाने में देर लगती है। उससे पहले एक संबंध, एक संधि, एक पुल का निर्माण का होना जरूरी है। इसलिए यह कुछ समय लेता है।
परम ज्ञान अपने आप में कोई समय नहीं लेता है। वह सेतु, उस अनुभव को संचारित करने के लिये श्रद्धा में समय लगता है।
गुरू का महत्वः
गुरू की जरूरत को समझना खासकर आधुनिक मन के लिए, बहुत कठिन है।
गुरू वह व्यक्ति है जो आपको सत्य की झलक देता है, इसकी सत्यता कि तुम कौन हो? वह यहां बस शिक्षा देने के लिए नहीं है। वह यहां आपको जागृत करने के लिए है।
गुरू एक मात्र धर्मग्रंथ है जो जीवित है।
ईश्वर के प्रति समर्पण कठिन है, क्योंकि तुम नहीं जानते हो कि वह कहां हैं, या कौन हैं? ईश्वर तुम्हारे लिए एक परिकल्पना है। किंतु गुरू अस्तित्व से एकाकार है। उसने चरमोत्कर्ष को पा लिया है। उसके लिए ईश्वर सत्य है। वह ईश्वर के साथ या सृष्टि के साथ या जो कुछ भी आप उसे कहें, उसके साथ रहता है। गुरू आपके लिए प्रत्यक्ष है। वह अनुभवातीत हैं। इसलिए ईश्वर तक पहुंचने में वह आपका प्रवेश द्वार हो सकता है। उसके द्वारा आप ईश्वर की बांहों में एक लंबी छलांग ले सकते हैं।
एक मात्र चीज जो आपके और आपके आनंद की, सत्य प्रकृति या ईश्वर के बीच खड़ा है, वह है आपका अहम्। एक शिष्य बनने की प्रक्रिया अपने अहम् को परित्यागने की प्रक्रिया है। अहम् को गिराना बहुत मुश्किल है। अपने अहम् को त्यागने का अर्थ है अपने उस टोस पहचान को त्यागना है जिसे आप इतने वर्षों से ढो रहे हैं, यह सोचकर जीने के लिये इसकी जरूरत है। अहम्
गुरूः - जीवंत मुक्त
को परित्याग करना मृत्यु की तरह लगता है जबकि असल में यह आपका अहम है जो आपके और आपके जीवन के बीच में खड़ा है।
अहम का त्याग केवल गुरू के साथ गहरी श्रद्धा प्रेम और आदर के संबंध में ही संभव है। आप क्रमशः साहस को समेटते हैं और फिर उस एक चीज जिससे आप आजीवन चिपके हुए हैं, आपका अहम् उसको परित्याग करने का जोखिम उठाते हैं। आप अपने अहम् को परित्याग तभी करते हैं जब आप पूर्ण रूप रूप से जानते हैं कि आप यदि गिरेंगे भी तो आप अस्तित्व के उस अनंत प्रेम और करूणा के जाल में, जो गुरू रूप में साकार है।
अब तक ज्यादातर वे अनुभव जो आपने अपने व्यक्तित्व में जोड़े है वे ज्यादा से ज्यादा भय या लोभ लाते हैं। बजाए इसके कि अनुभव आपके अस्तित्व में शक्ति और सजगता भी जोड़ सकता है। यही प्रज्ञा परिवर्तन है, वह मनोवैज्ञानिक क्रांति जो गुरू आपमें लाते हैं, उसका परिणाम आपका संपूर्ण रूपांतरण है।
गुरू से सीखनाः
आप पूछ सकते हैं, 'मुझे गुरू की क्या आवश्यकता है? मैं जीवन से सीख लूंगा।' गुरू से सीखना एक मधुर अनुभव है, एक बहुत ही आनंददायक अनुभव। गुरू पहले तुम्हें अपनी गोद में लेते हैं और फिर प्रेम का एनेस्थेसिया देते हैं उससे पहले कि वह तुम्हारे अहम रूपी ट्यूमर (घाव) की शल्य चिकित्सा करते हैं। क्योंकि वह अपना प्रेम बरसाते हैं, यहां तक कि आप उस रूपांतरण के दर्द को अनुभव नहीं करेंगे। इसके बावजूद कि यह घटना पीड़ादायक है, आप बस गुरू के साथ होने की खुशी और चेतना के सहारे
उसे बर्दाश्त करेंगे।
गुरू एक प्रगाढ़ जीवन है। न केवल वह आपको शिक्षा देते हैं, बल्कि वह यह भी देखते हैं कि आप उस रूपांतरण से आनंदपूर्वक जायें।
एक लघु कथा:
एक छोटे बच्चे के पिता अपने नन्हें बेटे से एक पत्थर को हटाने के लिए कह रहे थे। उस बच्चे ने अपनी अंतिम शक्ति लगा दी, किंतु वह उसे नहीं हिला पाया। वह पूरी तरह से थक चुका था। उसके पिता ने कहा, 'तुमने अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग नहीं किया, अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग करो।'
वह पुत्र पूरी तरह से थका था। वह अपने पिता से चिल्लाया, 'आप क्या बात कर रहे हैं? आप कह रहे हैं मैंने अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग नहीं किया। मैं थका हूं। क्या आप नहीं देख पा रहे हैं?'
उस पिता ने कहा, 'क्यों, तुमने मुझसे पूछा होता। मैं भी तुम्हारी शक्ति हूं!' इसी तरह आप अपने गुरू की उपस्थिति का उपयोग कर सकते हैं। कृपया समझिए, आप मुझसे पूछ सकते हैं। आप गुरू की मदद ले सकते हैं। आपने ऐसा कभी नहीं किया है। आपने कभी अपने गुरू को अपनी क्षमता के रूप में नहीं देखा है। कितनी मदद उपलब्ध है, आप कितना पा सकते हैं, किंतु आपने कभी मांगा नहीं या आपने कभी लिया नहीं।
जीवन भी आपका गुरू हो सकता है। किंतु तब यह जानना मुश्किल हो जाएगा कि कहां से सीखें। दत्तात्रोय (सनातन धर्म के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सम्मिलित एक अवतार), एक महान गुरू कहते हैं, मेरे कोई गुरू नहीं हुए हैं,
गुरूः - जीवंत मुक्त
न सिर्फ वह आपको पढ़ाते हैं, बल्कि वह यह भी देखते हैं कि आप उस परिवर्तन में आनंदपूर्वक जायें।
क्योंकि जीवन ही सदा मेरा गुरू रहा। मैंने शिकारियों से ध्यान केंद्रित करना सी खा है है जो जो चिडियों (पक्षियों) पर ध्यान केंद्रित करते हैं । मैं ने चींटियों से भविष्य
के लिए पैसा संचित (बचाना) करना सीखा है।' जीवन गुरू हो सकता है अगर आपके पास उसमें से सही चीजें चुनने की मेध हो। किंतु बहुत बार, आप गलत चीजें चुन लेते हैं।
एक लघु कथाः
राजा हरिश्चंद्र (इच्क्ष्वाकु वंश के किवदंती राजा राम के पूर्वज जो अपने वचन पालन के लिए प्रसिद्ध थे) ने सत्य के मार्ग पर ही अपना संपूर्ण जीवन बिताया। राजा हरिश्चंद्र की कहानी कहती है कि वे सत्य के लिए ही जीवित रहे और एक बार उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को भी सत्य के खातिर बेच दिया।
एक बार एक गाँव में एक उपदेशक राजा हरिश्चंद्र की कहानी सुना रहे थे। कहानी सुनाने के बाद उन्होंने एक व्यक्ति से पूछा, 'आपने इस कहानी से क्या सीखा?' उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, 'मैंने सीखा कि मुझे सदा सत्य बोलना चाहिए, चाहे जीवन में जो हो।' वह उपदेशक खुश हुआ। फिर उसने दूसरे व्यक्ति से पूछा, 'आपने क्या सीखा?'
उस दूसरे व्यक्ति ने कहा, 'मैंने दूसरी महत्वपूर्ण सीख सीखी। आपात स्थिति में, आप अपनी पत्नी को भी बेच सकते हैं, इसमें कोई गलती नहीं है।'
समझिए: आप ही एक कथा से दो विभिन्न चीजें सीख सकते हैं।
आपके पास हो सकता है वह मेधा न हो जिससे आप जीवन से सदा सही ही सीखें, इसीलिए जीवन में आपके लिए गुरू होते हैं। वह आपको रास्ता दिखाते हैं, क्योंकि उन्होंने उस पर चलने की कोशिश की और सफल हुए।
देखिए, कोई दवा देकर भी, ट्यूमर को निकाला जा सकता है। किंतु इसमें वर्षों वर्ष लगेंगे। गुरू बस क्षण में उस ट्यूमर को निकाल देते हैं। एक और बात, ट्यूमर के साथ जीने का दर्द उससे ज्यादा होता है जो गुरू के ट्यूमर निकालने के
| गुरू जीवन के | |
|---|---|
| मधुरतम अनुभवों के | |
| द्वार खोल देते हैं, | |
| आपके अपने | |
| अनोखेपन का | |
| अनुभव। |
करते हैं। वह दर्द जो गुरू के ट्यूमर निकालने के समय होता है वह नगण्य है। किंतु ट्यूमर के साथ जी ना खतरनाक और कटिन है। इसलिए
समय आप अनुभव
गुरू के पास जाना बेहतर है।
जीवन एक गहरा रहस्य है जिसे इच्छाओं के द्वारा नहीं पाया जा सकता है। हमारी इच्छाएँ
दत्तात्रेय - ब्रम्हा विष्णू और महेश तीनों को प्रतिनिधित्व करने वाले एक हिन्दू अवतार।
हरिश्चन्द्र - पौराणिक हिन्दू शासक जिसने अपने वचन को महत्व देने के लिये बहुत कष्ट सहें। वे इस बात के लिये प्रसिद्ध भी हये।
हमें अपनी संपूर्ण जीवन से बड़ी और महत्वपूर्ण लग सकती हैं। क्योंकि हम अपने जीवन के संकीर्ण विचारों के कारण हम कई महत्वहीन चीजों से जुड़ जाते हैं जबकि कई महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण अनुभव हमारे दरवाजे पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। किंतु समस्या है कि हम उनकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं क्योंकि हमने उन जैसी चीजों को नहीं देखा है।
यही वह स्थान है जहाँ गुरू जीवन में आते हैं। उन्होंने जीवन की संपूर्णता को देखा है। वह उन चीजों को देख सकते हैं जिसे आप सोच भी नहीं सकते हैं, इच्छाओं को अकेला छोड़कर। वह वहाँ इसलिये है कि आप भी जीवन में पूर्ण परितृप्ति प्राप्त करें, उसमें आपकी मदद के लिए हैं।
आपको उनके साथ चलने के लिये श्रद्धा विश्वास की जरूरत है। फिर ज्यों ज्यों वे चीजें घटित होती हैं, आप उस सत्य के प्रति विश्वस्त होते जाते हैं। तब आप उस सुचक्र में प्रवेश करते हैं। ज्यादा श्रद्धा ज्यादा अनुभव की ओर ले जाता है जो
आगे और अधिक श्रद्धा की ओर ले जाता है।
गुरू आप पर कुछ भी थोपते नहीं हैं। वह सरलता से अनावश्यक चीजों को हटाते हैं और जो आप पर थोप दिया गया है, और आपको नूतन और ताजा करते हैं। आप एक सुंदर रिक्त कैनवास हो जाते हैं जिस पर आप अपना एक अनोखा चित्र बना सकते हैं। आप अपना गीत रच सकते हैं और आप अपना नृत्य कर सकते हैं। गुरू जीवन के मधुरतम अनुभवों के द्वार खोल देते हैं, आपके अपने अनूठेपन का अनुभव।
तकनीक और प्रक्रिया के अंतर को समझिए। तकनीक बार-बार किया जा सकता है और प्रभाव वही होगा। किंतु प्रक्रिया के साथ आप हर समय एक ही प्रभाव नहीं पा सकते हैं और आप उसे स्वतः भी नहीं कर सकते हैं।
गुरू के साथ किये गए तकनीक ही प्रक्रिया है। गुरू के बिना किया गया प्रक्रिया ही तकनीक हैं ।
परम संबंधः या (शाशवत संबंध)
संबंध क्या है?
संबंध वह है जो आपके अंदर उन आयामों को खोल सके जिसे आप जानते तक नहीं हैं कि वह आपके अंदर विद्यमान है। यह आपको अनुभव देता है और प्रमाणित करता है कि आप भी किसी को प्रेम करने में सक्षम हैं। यह दर्शाता है कि आप भी किसी के लिए एक आश्चर्यजनक हद तक प्रेम कर सकते हैं और त्याग कर सकते हैं।
जब हम जन्म लेते हैं तो हम संपूर्णता के साथ जन्म लेते हैं। किंतु हमें अपने बहुत आयामों के बारे में पता नहीं होता है और जब हम सजग नहीं होते हैं, तो बाह्य संसार भी इसके बारे में भी नहीं जानता है। संबंधों में वह शक्ति होती है कि वह हमारे अज्ञात आयामों को जागृत करता है, और हमें उसका अनुभव कराता है और उसे बाह्य संसार को भी दिखाता है।
संबंध आपके अंदर अज्ञात आयामों को जागृत करता है। किसी भी व्यक्ति या वस्तु के साथ संबंध चाहे जो भी हो वह, आपको गुरू के साथ परम संबंध की ओर ले जाएगा।
जब आप प्रेम में पड़ते हैं, चाहे वह पुरूष हो, स्त्री हो या बच्चा, देवी या गुरू, आप अपने उन आयामों को देखेंगे जो आप कभी नहीं जानते थे
गुरूः - जीवंतम्क्त
कि आपके अंदर विद्यमान है। ऐसे प्रेम के प्रस्फुटित होने पर, आप ज्यादा जिम्मेदार हो जाते हैं। आप जीवन के उस रस रस का अनुभव करते हैं।
गुरू जो सृष्टि के साथ एक हैं, के साथ संबंध अन्य संबंध से गहरा होता है। यह अस्तित्व के तल का संबंध है।
सामान्यतः अन्य सभी संबंध बंधन का निर्माण करते हैं किंतु गुरू के साथ संबंध में आपको मुक्ति की ओर ले जाने की शक्ति होती है और अंततः परमानंद की ओर। इसके बावजूद भी आप इस संबध में बंधन के निर्माण की कोशिश करते हैं, यह बस आपको केवल परमानंद की ओर ले जाएगा! इस संबंध में बंधन का निर्माण कभी नहीं होता है।
गुरू का साकार रूप आपके और परमेश्वर के बीच एक सेतु है। क्योंकि यह उस परमेश्वर का प्रति रूप है, इसमें दोनों आयाम होते हैं, मानव और ईश्वर। जब आप न सिर्फ रूप के साथ संबंधित होते हैं बल्कि उस सत्य के साथ जिसका कि वह प्रतिरूप है, आप परमज्ञान तक पहुंचते हैं।
गुरू सर्व आकार है और निराकार भी हैं। वह रूपों में नहीं आते हैं, न ही पत्थरों की मूर्ति रूप में या किसी चीज के रूप में। गुरू रूपों, आकारों से परे हैं, आयामों से परे हैं। उनका अनंत आयाम है— अनंतायाम।
एक रूप में जमा देना चाहे वह माँ का रूप में हो या प्रेमी का आपके लिए आसान है उसे रखना। उसका आपके लिए व्यवसाय करना आसान है। किंतु गुरू को अपने लिए व्यापार करने में रूचि नहीं है। वह आपको भ्रमित चाहता है ताकि आप अपने भीतर झांक सकें और परम ज्ञान प्राप्त कर
| सके। वह चाहता है | |
|---|---|
| कि आप मर जाएं | संबंध आपके |
| ताकि आप जागृत | अंदर अज्ञात |
| हो जायें । | आयामों को |
| अपनी अज्ञानता | जाग्रत करती है। |
| के साथ गुरू के |
पास आएं। वह आपको मार्ग दिखाएंगे। उनकी बाँहों में प्रेम से गिरने में हिचकिचाएं नहीं। आप उनके साथ परम आनंद में डूब जाऐंगे।
गुरू आपके साथ बहुगुणित सांचों और तलों से जुड़ते हैं, जिसमें से हर एक उस विलक्षण संबंध के सौंदर्य और प्रगाढ़ता को अनावृत्त करता है, जिसके साथ वह उससे जुड़े हैं जिसका सौभाग्य है उस आयाम से जुड़ने का।
सत्य की खोज में गुरू के साथ हर कोई एक विलक्षण रूप से सुंदर पथ को पार करता है जब वह अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। यह बहुत ही नाजुक प्रेम संबंध है। यह दो आत्माओं का गहरी श्रद्धा और एक होकर विलय होना है जिसमें गुरू की ज्योति सीधे शिष्य में चली जाती है। इस तरह प्रज्ञा की ज्योति जल उठती है।
विभिन्न संबंध आप में विभिन्न आयामों को खोलते है। एक प्रेमी आपमें प्रेम को खोलता है। मित्र आपमें मित्रता को भाव उत्पन्न करता है। आपके बच्चे आपमें ममत्व को उजागर करते हैं। आपके अभिभावक, पितामह आपमें बाल बोध के आयाम को उजागर करते हैं। किंतु गुरू ही आपमें सभी आयामों को उजागर करते हैं। गुरू वह व्यक्ति है जो आपमें अज्ञात परमज्ञान के आयाम को उजागर करते हैं। आप उस रूपांतरण की
गुरूः - जीवंतम्क्त
गुरू वह व्यवित है जो आपमें अज्ञान परमज्ञान के आयाम को उजागर करते हैं।
गणना नहीं कर सकते हैं जो गुरू—शिष्य संबंध आपके अंदर उत्पन्न करता है। गुरू अपने आपको विभिन्न आयामों में प्रकट करते हैं और आपको उनसे परे ले जाते हैं और आपसे उस संबंध के द्वारा परम ज्ञान का अनुभव कराते हैं।
ईश्वर और गुरू:
रहस्यवादी कवि कबीर ने सुंदर ढंग से गाया है, 'गुरू गोविन्द दोनों खड़े, काके लागु पाय?
बलिहारी गुरू आपनो
जिनि गोविन्द दियो बताय
विवेकानंद, ने रामकृष्ण परमहंस के एक और शिष्य के साथ अपनी बातचीत में रामकृष्ण परमहंस को ईश्वर कहकर सम्बोधित किया है। उस शिष्य ने यह कहते हुए हैं कि यह अति है, मैं सहमत हूं कि गुरू जी परमज्ञानी हैं किंतु वह ईश्वर कैसे हो सकते हैं?' आपत्ति जताई।
विवेकानंद उनसे पूछा, 'तुम ईश्वर के बारे
विवेकानन्द - प्रबुद्ध गुरू रामकृष्ण परमहंस के शिष्य।
रामकृष्ण परमहंस - जीवन मुक्त गुरू
में क्या जानते हो?' उस शिष्य ने कहा, 'वह ईश्वर सर्वव्यापी हैं, सर्वज्ञानी हैं और सर्वत्र हैं।
विवेकानंद ने पूछा, 'सर्वव्यापी कहने से तुम्हारा क्या तात्पर्य है?' उस शिष्य ने कहा, 'ईश्वर हर जगह हैं।' विवेकानंद ने कहा, 'निश्चित रूप से, तब तुम उन्हें अभी भी देख सकते हो।' वह शिष्य भ्रमित था और नहीं जानता था आगे क्यो कहें।
विवेकानंद ने उसे कहा, ' तुम्हारे लिए ईश्वर एक विचार हैं जिन्हें तुम नहीं देख सकते हो, एक भाव हैं जो तुम न जानते हो न समझते हो। किंतु यहां गुरू तुम्हारे सामने हैं जो यथार्थ में ईश्वर हैं।
किसी ने मुझसे पूछा, 'गुरू और ईश्वर के बीच क्या अंतर है?'
मैंने उससे पूछा, 'तुम ईश्वर के बारे में क्या जानते हो? जो तुम जानते हो वह बस शब्दों का, विचारों का एक समूह है। तुम्हे इसका भान नहीं है कि तुम जब ईश्वर के बारे में बात करते हो तो तुम क्या कह रहे हो। तुम्हारे लिए वह बस एक विचार हैं, एक कल्पना हैं परम ऊर्जा का और परम चेतना हैं, या फिर जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं है उसे कुछ भी नाम देने का जरिया है।'
ब्रह्मांड पुराण कहता है—
गुरू अपने तीनों नेत्रों के सिवा शिव हैं,
कबीर - भारतीय रहस्यवादी भक्ति कवि।
ब्रम्हानंद पुराण - 12 हजार पदों का संग्रह, जो कि आखिरी व अठारहवाँ पुराण है, जिसमें इस ब्रम्हाण्ड के रचयिता भगवान् ब्रम्हा की कहानी बतायी गई है।
शिव - त्रिदेव भगवान में, जिनको संहारक के रूप में हिन्दू मानते हैं।
विष्णु - त्रिदेव भगवान में, जिनको पालनहार के रूप में हिन्दू मानते हैं।
ब्रम्हा - त्रिदेव भगवान में जिनको रचयिता के रूप में हिन्दू मानते हैं।
सोचे बिना बस आप उसमें पूरी तरह से डूब जाएँ।
अगर आप उसमें पूरी तरह से डूब जाते हैं तो वह सरलता से भावनाओं को परिपूर्ण कर देगी और आपको परमानंद के चरम स्थिति की ओर ले जाएगा। अगर आप इस सत्य को गहराई से समझते हैं और इसका अभ्यास पूरी निष्ठा से करते हैं कि 'मैं अपनी भावनाओं पर केंद्रित करूंगा और गुरू शिष्य संबंध में पूरी
तरह से डूब जाऊँगा, मैं यहाँ यह 'तो यह आपको उस प्रमाणित करने के अवस्था तक पहूंचा लिए नहीं हूँ कि देगा। ऐसा मत सोचिए मैं ईश्वर हूँ। मैं कि आप नहीं जानते हैं यहाँ यह प्रमाणित कि उसमें कैसे डूबा जाए। बस एक परम करने के लिए हूं प्रतिज्ञा ही काफी है। कि आप ईश्वर यह आपमें स्वतः हो हैं। जाएगा। गृरू और शिष्य के बीच की कोई
बाधा बस उस प्रतिज्ञा पर, जो गुरू और शिष्य के संबंध पर केंद्रित करने से खत्म स्थापित हो जाएगी।
गुरू के साथ संबंधित होने के पांच तरीके:
गुरू के साथ संबंधित होने के पांच भाव हैं। हर भाव के साथ एक अलग मार्ग खुलता है (प्रशस्त होता है) जो आपको स्वयं के समीप लाता है।
एक मार्ग है माँ का अपने बच्चे के साथ का भाव, गुरू की ओर अपने बच्चे की ओर देखने का भाव। यह वात्सल्य भाव कहलाता है— जिस तरह
गुरूः - जीवंतम्क्त
विष्णु हैं अपने चारो भुजाओं के सिवा ब्रह्मा हैं, अपने चारो मुखों के सिवा, वह परम शिव हैं मनुष्य रूप में।
गुरू यथार्थ हैं। वह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के यथार्थ हैं। वह यहां और अभी हैं। वह वर्तमान में हैं, वह वर्तमान हैं। वह तुम्हारे और ईश्वर की धारणा के सेतु हैं। इस रूप में वह ईश्वर से बड़े हैं। लोग मुझसे पूछते हैं, 'क्या आप ईश्वर हैं?' मैं उससे पूछा कहता हूँ, अगर आप नहीं जानते हैं कि ईश्वर कौन और क्या हैं, तेा आप मुझसे कैसे पूछते हैं कि क्या मैं ईश्वर हूँ? ईश्वर को परिभाषित नहीं किया जा सकता है। वह बस अनुभव किए जा सकते हैं।
एक बात में आपको स्पष्ट रूप से कह दूँ, मैं यहाँ यह प्रमाणित करने के लिए नहीं हूँ कि मैं ईश्वर हूँ। मैं यहाँ यह प्रमामिण करने के लिए हूं कि आप ईश्वर हैं। मैं यहाँ अपने दैविक रूप प्रमाणित करने के लिए नहीं हूँ मैं यहाँ आपके दैविक रूप को प्रमाणित करने के लिए हूँ।
गुरू नदी के एक छोर पर स्थित एक जंगल की आग की तरह होते हैं। शिष्य नदी के दूसरे छोर पर है। संसार नदी है, जन्म और पुनर्जन्म का नदी (की सरिता)। गुरू और शिष्य के बीच, अगर किसी पदार्थ का सेतु बनाया जाए तो वह आगे उससे अग्रसर होकर सेतु को पार कर वह शिष्य तक पहुँचती है, वह वस्तु जिससे वह सेतु बना है महत्वपूर्ण है। वह लकड़ी का भी हो सकती है या सीमेंट का किंतु उस दावानल की क्षमता उस सेतु को पार कर शिष्य तक पहुँचने की होती है। उसी तरह, आपका गुरू के साथ क्या संबंध है उसे
से यशोदा कृष्ण की मुंह बोली माँ उससे संबंधित थीं।
दसरा भाव है बच्चे का अपने माँ के प्रति का। यह मातृभाव कहलाता है। जिस भाव से रामकृष्ण परमहंस देवी काली से जुड़े हुए थे, गुरू की ओर माँ की तरह देखना।
तृतीय भाव है मित्र का, गुरू की ओर अपने मित्र की तरह देखना। यह सखा भाव कहलाता है। जिस तरह से अर्जुन कृष्ण के साथ जुड़े थे।
अगला भाव है दास का। यह दास भाव कहलाता है। यह गुरू शिष्य के बीच वैसे संबंध का द्योतक है जिसमें शिष्य गुरू के प्रति एक स्वामीभक्त दास की तरह का भाव रखता है। यह वह भाव है जिस भाव से रामायण के कपिदेव हनुमान भगवान् राम के प्रति जुड़े थे।
अंतिम भाव है प्रेमी का। यह माधुर्य भाव कहलाता है। जिस भाव से गोपी राधा कृष्ण को देखती थी। जो भाव राधा रखती थी, यह प्रेमिका का भाव था। एक प्रेमिका का भाव किसी रूप में इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि आप पुरूष है या स्त्री। यह किसी रूप में शरीर से जुड़ी बात नहीं है। यह पूर्ण रूप से शरीर से परे की बात है। यह आत्मा की बात है।
अगर गुरू पुरूष हैं और आप भी, तब भी माधुर्य भाव हो सकता है। या अगर आप स्त्री है और गूरू भी स्त्री हैं तब भी माधुर्य भाव हो सकता है। माध्यूर्य भाव किसी रूप में लिंग से संबंधित नहीं
है। यह लिंग अभिज्ञा से परे है। यह एक गहरा आत्मिक संबंध का भाव है।
अंतिम है महाभाव। यह सभी पांचो भाव का सम्मिलित रूप है और कुछ उससे ज्यादा! यही गुरू संबंध के बारे में सब कुछ है। कभी आपको गूरू के साथ अनुभव होगा वह आपके पुत्र है। कभी आपको अनुभव होगा वह आपकी माँ की तरह है। कभी आपको अनुभव होगा वह आपके मालिक है। दूसरे समय आपको अनुभव होगा वह आपके मित्र की तरह है। कभी आपको अनुभव होगा वह आपको राहत देने वाली प्रेमिका है। गुरू के साथ संबंध इन पांचो भाव का सम्मिलित भाव है और उससे कुछ अधिक ।
आप गुरू के साथ इनमें से किसी एक भाव के साथ जुड़ सकते हैं, या इन पांचों के सम्मिलित भाव के साथ ।
गुरू शिष्य संबंध की अवस्थाएँ—
गूरू शिष्य संबंध के कई स्तर हैं। प्रथम शुद्ध रूप से बुद्धि स्तर पर होता है, जो किसी भी चीज से ज्यादा संदेह पर आधारित होता है। अनेकों संदेह सभी समय आते रहते हैं। आप सोचते हैं 'ओह! वह मुश्किल से तीस वर्ष के लगते हैं, वह गुरू कैसे हो सकते हैं? वह उच्च स्तरीय शिक्षित या योग्य नहीं लगते हैं। वह कैसे हजारों व्यक्तियों को संबोधित पाते हैं? आपके पास आपका संदेह है। आप शंकालु हैं। शुद्ध बुद्धि के क्षेत्र से संबंध कभी नहीं घटते है।
कूचेला - भगवान श्रीकृष्ण के बचपन का मित्र जो गूरू व शिष्य के संबंध के लिये उदाहरण बने है।
रामायण - हिन्दू इतिहास या धर्मग्रंथ जो कि राजाराम के बारे में है। इसको प्रथम रूप में कवि साधू बालमीकि जी ने लिखा है। राधा - गोपियों में प्रमुख महिला भक्तिन जो भगवान् श्रीकृष्ण से जुड़ी थी।
किंतु इस पल में उनका अनुकरण नहीं कर पाऊंगा। मैं क्या करूं?' तब वह आपकी मदद मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी करते हैं। आप अनुभव करते हैं कि आपको ज्यादा मदद की आवश्यकता है। तब आप उनकी ओर हाथ बढ़ाते हैं और उनकी मदद से आप फिर सीधे चलने लगते हैं। जब आप उनका हाथ पकड़ते हैं। उनके प्रति आपकी श्रद्धा बढ़ती जाती है। अगर आपके पास बस छडी हो. तब यह मित्र भाव है, एक मेधा स्वरूप भावना। अगर आप उनका हाथ पकड़ना शुरू करते हैं, वह आपको उठाना शुरू कर देंगे, फिर धीरे धीरे वह भावनात्मक मेधा हो जाता है। इसी भाव को मैं माता या पिता की तरह अनुभव करना कहता हूँ।
एक मित्र से वह पिता या माता हो जाते हैं फिर धीरे धीरे, एकदम मंद गति से, वह संबंध गहरा होता जाता है। फिर अगर आप स्थिर होते हैं और सोचते हैं, 'वह बस मित्र नहीं हैं। वह बस वह व्यक्ति नहीं है। जो बस सलाह और विचार देते हैं। वह मुझे मेरी समस्याओं से भी उबारते हैं।
फिर धीरे धीरे, बार बार जब आप अपनी अपेक्षाओं से परे हर पल सहायता पाते हैं, उनके प्रति भाव ज्यादा भावनात्मक हो जाता है। वह आपको परिपूर्ण करते हैं। वह आपके हृदय को भर देते है। आपको उन्हें भूलने में समस्या होती है। यही वह पल है जब आपको एक दास की तरह नतमस्तक होने की आवश्यकता उनके समक्ष महसुस होती है, किसी लज्जा के साथ नहीं किंतु एक आदरणीय श्रद्धा के साथ उनके प्रति जिनके सामने आप अपनी संपूर्ण समस्याओं को रखने का भाव
गुरूः - जीवंतम्क्त
अगला चरण है बुद्धि से मेधा का। संदेह के ऋणात्मक भाव से आप इस भाव की ओर अग्रसर होते हैं कि क्यों न इस प्रोग्राम को सम्मिलित हुआ जाए और देखा जाए कि असल में यह व्यक्ति क्या कर रहा है?' सिवाय इसके साथ कि 'वह क्या कर सकते हैं?' आप इस ओर बढते हैं कि 'मुझे लगता है इसका कुछ अर्थ है। किंतु न मैं इन पर विश्वास करता हूँ न हि अविश्वास, ठीक है, चलो मैं देखता हूँ।' विचार मेधा बनना शुरू हो जाता है।
फिर भी अगर आप भीतर देखना जारी रखते हैं, तो आप मेघा से भावनात्मक मेघा, जिसमें 60 प्रतिशत मेघा और 40 प्रतिशत भावना मेघा होती हैं। तब आपको अनुभव होगा कि गुरू एक अच्छे मित्र हैं। तब आप सोचते हैं, 'वह हमें कुछ, यहां वहाँ जब मुझे जरूरत होती है वह मार्गदर्शन कर सकते हैं। मुझे इसका भान है कि मेरा जीवन कैसा होना चाहिए, इसीलिए उन्हें मुझे सब कुछ शिक्षित करने की जरूरत नहीं है, किंतु जहाँ कहीं कहीं मुझे किसी निर्णय लेने की आवश्यकता का अनुभव होगा, मैं उनकी मदद ले लूंगा।' यह गुरू के प्रति मित्र की तरह देखने जैसा है। इसी को हम सखा भाव कहते हैं ।
यह किसी छड़ी के सहारे लेकर चलने जैसा है। आप छड़ी का प्रयोग वहां करते हैं जहां सतह ऊँचा या नीचा होता है। उसके बाद, धीर-धीरे, जब आप किसी गंभीर समस्या से गृजरते हैं जैसे अवसाद या मन हास होना, जब आप स्वयं की उनके शब्दों के सहारे कोई मदद नहीं कर पाते हैं, आप उनसे पूछते हैं, 'आपकी शिक्षा महान है,
रामायण - हिन्दू इतिहास या धर्मग्रंथ जो कि राजाराम के बारे में है। इसको प्रथम रूप में कवि साधू बालमीकि जी ने लिखा है।
गुरूः - जीवंतम्क्त
पाते हैं। यही वह भाव है जिस भाव से प्रसिद्ध हिन्दू ग्रंथ रामायण में हनुमान अपने गुरू राम के प्रति समर्पित होते हैं। वह राम के प्रति पूरी तरह से समर्पित थे। इस तरह के संबंध में एक गहरा भावनात्मक संबंध स्थापित होता है। यह भाव पहले वाले भाव से ज्यादा भावनात्मक होता है। यह 60 प्रतिशत भावनात्मक और 40 प्रतिशत मेधात्मक होता है।
फिर धीरे धीरे, आप भावनात्मक रूप से और गहरे होते जाते हैं और आप गुरू के कवच होते जाते हैं। उनका ध्यान आकर्षित करने, उनसे सहायता लेने के बजाय् आप उनका समर्थन करना चाहते हैं। उन्हें प्रेम करना चाहते हैं और उनको सुनना चाहते हैं। आपका स्वभाव एक परिपालन करने वाली माँ का हो जाता है। यह पूर्ण भावना की अवस्था होती है। एक माँ का यह प्राथमिक दायित्व होता है कि वह अपने बच्चे का पूरा ख्याल रखे ।
इन चारो मेधात्मक भावना, भावनात्मक मेधा और शुद्ध भावना मेधा अवरश्याओं, बुद्धि में आपका जीवन गुरू के जीवन से अलग और स्वतंत्र है। आप अपने जीवन के लिए, अपने जीवन को परिपूर्ण करने के लिए बस गुरू से मदद लेते हैं, बस।
जब भावनात्मक भाव पकता है तो आप अनुभव करने लगते हैं कि आपका जीवन गुरू के जीवन से अलग नहीं है। तब आप भावनात्मक स्तर से अस्तित्व स्तर की ओर अग्रसर होते हैं। आप उनका ख्याल रखने के लिए अपने आप को उनके लिए समर्पित करते हुए अनुभव करते हैं और अपने जीवन को उनके लिए समर्पित करते हैं। यह अस्तित्व स्तर पर घुलना होता है, यह माँ और बेटे के भावनात्मक संबंध से भी ज्यादा मजबूत होता है। यह गहरे प्रेम का संबंध है, बिना किसी लिंग बोध के। यही माधुर्य भाव कहलाता है, एक भावनात्मक और अस्तित्व स्तरीय भाव का मिश्रण।
जब माधुर्य भाव गहरा होता है, अचानक आप अनुभव करते हैं कि वहाँ अब कुछ भी 'वह' और 'तुम' नहीं है। वहाँ अब कोई दो भिन्न व्यक्तित्व नहीं है। आप और वह एक और समान हैं। आप महा भाव का अनुभव करने लगते हैं। अपने आप को आप गुरू की तरह अनुभव करने लगते हैं। आप परम अवस्था का अनुभव करते हैं— तत् त्वम् असी—तुम वही हो।
प्रथम बुद्धि, फिर मेधा, फिर 60 प्रतिशत और 40 प्रतिशत भावना, फिर 60 प्रतिशत भावना और 40 प्र तिशत मेधा, फिर शित् प्रतिशत भावना, फिर
जब आप खुले होते हैं, तो गुरू एक ऐसी जीवंत ऊर्जा हैं कि आप परिवर्तित होंगे। आप एक नई ऊर्जा होंगे ।
60 प्रतिशत भावना और 40 प्रतिशत अस्तित्व, फिर शत प्रतिशत अस्तित्व ।
इस तरह चरणबद्ध ढंग से आप गुरू शिष्य संबंध में विकसित होने लगते हैं और उसे अनुभव करने लगते हैं। किंतु किसी समय पर, कोई एक भाव किसी दूसरे से प्रबल हो सकता है।
हर एक कोई ऊर्जा में सामूहिक रूप से विकसित होता हैं फिर भी गुरू के साथ हर किसी का संबंध एक अलग होता है। यही इसकी सुंदरता है। चाहे वह दास भाव हो, मालिक और नौकर की
तरह का संबंध जैसा कि राम और हनुमान के बीच था, या वात्सल्य भाव हो, माँ का प्रेम, जैसा कि कृष्ण और यशोदा के बीच था, या सखा भाव मित्रता का, जैसा कि कृष्ण और अजुन के बीच का, या मातृ भाव हो बच्चे का माँ के प्रति भाव, जैसा का रामकृष्ण परमहंस का देवी काली के प्रति, या माध गुर्य भाव हो, प्रेमिका का प्रेम, जैसा कि कृष्ण और राधा के प्रति, हर भाव, वह भावना, उस संबंध के लिए खास है, गुरू और शिष्य के बीच। हर शिष्य गूरू के साथ सत्य की खोज में उस पथ पर विकसित होता है जो उसके विकास को विकास को लिए सर्वोत्तम है।
गुरू के साथ कैसे रहें- पुरा खुला-
जब आप गुरू के साथ होते हैं, तो पूरी तरह से खुलकर रहें। जमें न रहें। समझिए की जीवन तर्क से कहीं ज्यादा है। तर्क से परे हैं और पूरी तरह से खुले और सचेत रहें।
जब आप लेट गो करते हैं और खुले हैं, तो गुरू एक ऐसी जीवंत ऊर्जा होते हैं कि आप रूपान्तरित होंगे। आप एक नए जीव होंगे। आप एक नई ऊर्जा होंगे और आप एक नई चेतना होंगे।
मैं बस एक वक्तत्व में कह सकता हूँ : आप नवीन होंगे। आप 'नवीन' और स्पष्ट होंगे, आप एक 'नाभिक' (न्यूक्लीयर) होंगे।
आप हल्का महसूस करेंगे। आपने ट्यूमर का भार खो दिया होगा जो आप लेकर चल रहे हैं किंतु वह आपका अंग नहीं था, वह आपकी एक बाधा थी। वैसा कुछ जो आपका अभिन्न अंग है वह कभी आपके लिए कोई बाधा नहीं होगा। अगर वह बाधा है तो वह कभी आपका अंग नहीं हो सकता है। इसीलिए बस खुल जाइए जिससे कि गुरू शल्यक उस ट्यूमर को जो आप जीवन दर जीवन ढो रहे हैं, हटा सकें।
जब आप गुरू को साथ होते हैं तो पूरी तरह से रहें। यह इस बात का प्रश्न नहीं है कि आप गुरू जो कहते हैं उससे सहमत या असहमत हैं। आपको सहमति और असहमति से परे जाना है। जब आप सूर्योदय देखते हैं, तो क्या आप कह सकते हैं कि आप उससे सहमत या असहमत हैं? नहीं। यह बस यही बात है। इसी तरह, गुरू भी बस है, यही बात हैं। एक बार जब वह भावना आपका अंग हो जाती है, तो आपकी ओर से कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। तब आपने गुरू को अपने आप को उजागर करने की सहमति दे दी हैं ।
एक शिष्य होने का अर्थ है गुरू के प्रति पूरी तरह से खुले रहें, किसी भी रूप में भयभीत न रहें, अपने आप को किसी रूप से छुपावें नहीं, बल्कि पूरी आरथा से मन की गहराई से पूरी तरह से प्रमाणिक रहें ।
तब गुरू अपना कार्य आप पर कर एक शिष्य होने का पायेंगे। वह आपको अर्थ है गुरू के प्रति उस दिशा में पूरी आस्था से मन अ ग्र सर र करें गे की गहराई से पूरी जिसके बारे में आपने सोचा भी तरह से प्रामाणिक नहीं होगा कि आप रहें। उस कार्य को
करने में सक्षम हैं।
वह आपको उन क्षणों और परिस्थितियों को लिए प्रेरित करेंगे जिनसे आप अन्यथा डरते। वह आपकी गुरूः - जीवंत मृक्त
सीमाओं को सतत् बढ़ाऐंगे जब तक कि आप अंत में यह अनुभव कर लेते हैं कि वहाँ अब कोई सीमा नहीं है, वहाँ कोई अंत नहीं है। तब आप भी उनकी तरह हो जाऐंगे। तब आप भी पूर्ण रूप से मुक्त हो जाते हैं, सीमारहित परमहंस!
आपको बस यही करना है कि आप गुरू के प्रति, सुष्टि के प्रति पूरी तरह से खुले रहें। जब आप खुले होते हैं, तो आप गुरू के प्रति श्रद्धा रखते हैं। यही श्रद्धा सब कुछ है जिसकी जरूरत है आपके और सुष्टि के बीच की सुंदर सेतु के निर्माण के लिए ।
एक लघु कथाः—
एक शिष्य गंगा नदी में गिर गया। उसके गुरू गंगा के तट पर बैठे हुए थे। उनको देखने पर वह शिष्य चिल्लाया, 'मुझे बचाइए! मुझे बचाइए! ईश्वर, मुझे बचाइए! गुरू, मुझे बचाइए!
गुरू ने उत्तर दिया, 'मूर्ख! खड़े हो जाओ!' अपने आप को बचाओ।' वह शिष्य प्रति उत्तर में चिल्लाया, 'मुझे अपना दर्शन बाद में पढ़ाइयेगा। पहले मुझे बचाइये। मेरा जीवन खतरे में है। बस मुझे बचाइये!'
वह गुरू हिले भी नहीं। उन्होंने दोहराया, 'मूर्ख! अपने आपको बचाओ! खड़े हो जाओ।' वह शिष्य चिल्लाया, 'मैंने सोचा' आप' मेरे गुरू हैं। मुझे बचाइये, मुझे बचाइये!' अब वह गुरू गुरू जोरों की आवाज में चिल्लाये, 'मूर्ख खड़े हो जाओ!' वह शिष्य डर गया और खड़ा हो गया...... और देखा कि वह पानी कमर तक ही था!।
आप भी संघर्ष करते हैं क्योंकि आपभी 'पानी में गिर गए हैं' किंतु नहीं समझ पाते हैं कि वह आपके कमर तक ही है! यह तभी हो पाता है जब आप
गुरू की बात सुनते हैं और खड़े हो जाते हैं, तभी आप समझ पाते हैं कि पानी आपके कमर तक ही है और आप बस निश्चिंत हो पाते हैं। वह सभी चिंताएं जिसके बारे में आप सोचते हैं कि वह आपके जीवन को बर्बाद कर रही हैं, वह असल में कहीं होती नहीं हैं। वह ज्यादातर बस आपकी कल्पनाओं में होती हैं। वह कभी सत्य नहीं होती हैं।
इसीलिए समझिए, जब मैं कहता हूँ 'मैं ख्याल रखूंगा।' असल में मैं आपको वह छड़ी दे रहा हूँ जिसके सहारे खड़े होना है। जब गुरू कहते हैं, 'मैं ख्याल रखुँगा, 'अगर आप संदेह करते हैं, आप बस खड़े होने का अवसर चूक जाते हैं।
गुरू के उपस्थिति में अपने संस्कारों को जलायें:
इसीलिए मैं सदा कहता हूँ, जब आप संचित स्मृति में फंसते हैं। बस गुरू की छन्रुछाया में रहें। आप पूरी तरह से ठीक हो जाएंगे
परमज्ञानी गु रू रमण महर्षि के जीवन से एक सुंदर दृष्टांतः
एक शिष्य था जो रमण पुराण लिख रहा था, रमण महर्षि की गुणगान गाथा। किंतु उसे 'लेखकीय रोड़ा' का 'सामना
करना पड़ा और एक जगह वह रूक गया। जब आप अहम के साथ लिखते हैं तो लेखकीय रोड़ा का सामना करना पड़ता है। किसी तरह वह शिष्य रमण महर्षि के पास आया और बोला, 'भगवान, मैं आगे नहीं लिख पा रहा हूँ, कृपया मेरी मदद करें।'
गुरूः - जीवंत मुक्त
भगवान ने कहा, 'वह पन्ना रख दो और जाओ, मैं तुमसे बाद में बातें करूंगा।'
उस शिष्य ने कागज रख दिया और बाहर चला गया। अगले दिन जब वह आया, उसने देखा कि सारा पद पूरा हो चुका था! रमण महर्षि ने खुद 300 पंक्तियां लिखी थी। जब वह पुस्तक छपी, उस लेखक ने उक्तियों को बीच उन 300 पंक्तियों को लगा दिया और उसके नीचे एक पंक्ति लिखी, 'ये तीन सौ पंक्ति भगवान् के द्वारा खुद लिखी हुई हैं।'
भगवान् ने उस पुस्तक को देखा और पूछा, 'ओह! तो अन्य पंक्तियाँ आपके द्वारा लिखी गयी हैं? ठीक है!'
उस शिष्य ने बाद मैं कहा, 'मेरे अंदर कुछ फूट पडा। जब उन्होनें ये बात कहीं। आँसू बहने लगे, और मैं बस भगवान के पैरों पर गिर पड़ा और फिर कभी नहीं उठा।'
बस एक व्यंग्य शिष्य मुरूगनार के परमज्ञानी बनने के लिए काफी थीं।
समझिए, मुरूगनार, की लेखक के अहम की एक संचित स्मृति की तरह आप भी बहुत सी संचित स्मृतियों को लेकर चलते हैं। जब आप गुरू की उपस्थिति में संचित स्मृति में फंसते हैं तो आप उसमें पूरी तरह मुक्त हो जायेंगे।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह संचित स्मति आपको यह भी स्वीकार नहीं करने देगी कि आपके पास संचित स्मृति भी है। वह अपने आपको सत्यापित करने की कोशिश करेगी क्योंकि वह जीवन-मुक्ति
उसके अस्तित्व का प्रश्न है।
इसीलिए मैं सदा कहता हूँ, जब आप संचित स्मृति में फंसते हैं, जब आप क्रोध, लालसा, लोभ, भ्रम, अवसाद या जलन के इस शक्तिशाली प्रज्ञाहीनकर्ता के प्रभाव में आते हैं तो कभी कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लें। बस गुरू की छत्रछाया में रहें। उस विलक्षण अवसर को चुकिए नहीं। आप पूरी तरह से ठीक हो जाएंगे और आप उससे उबरने में सफल हो जाएंगे। गुरू से कभी बचिए नहीं जब कि आप संचित स्मृति के बंधन में फंसे हुए हैं ।
जब कभी कोई अवसाद से घिरा होता है और वो मुझे छोड कर जाता है तो मुझे उस पर दया आती है। इसलिए नहीं कि मेरे मिशन में एक व्यक्ति कम हो जाएगा। नहीं, कतई नहीं! ऐसा इसलिए क्योंकि वह मुझे अवसाद की अवस्था में छोड़ता है। अगर यही व्यक्ति जब खुश है तब अगर मुझे छोड़ता है, तो ठीक है। यह सामान्य संबंध है। वह मुझे अपने साथ ले जाएगा जहां कहीं वह जाएगा। किंतु अगर वह अवसाद की अवरथा में है, न सिर्फ वह उसे विकीण करेगा, बल्कि वह कभी उस संचित स्मृति से भी नहीं उबर पाएगा। वह उसके लिए एक गंभीर घाव का रूप ले लेगा जैसे कि गर्म दूध से जली हई कोई बिल्ली। वह कभी दूध के नजदीक नहीं जाएगी।
कभी किसी चीज का निर्णय नहीं लीजिए जब आप उदास हों। उदास मनःस्थिति स्वभाविक रूप से आपके लिए दृश्य को विकृत कर देगी। वह
रमण पुराण - जीवन मुक्त गुरू रमण महर्षि के बारे में लिखी कहानियाँ।
भगवान् - एक गुरू के लिये उपयोगी सम्मानजनक शब्द इसका सामान्य अर्थ, मंगलमय है।
गुरूगनार - जीवन मूक्त गूरू महर्षि रमण के शिष्य जो कि तमिल कवि हुये है। उन्होंने रमण पर बहुत से पद लिखे हैं।
मैं सदा लोंगो से कहता हूँ, तब मत जाओ जब तुम अवसाद की अवस्था में होते हैं। अगर तुम अवसाद में हो, तो वह मेरे इर्द गिर्द रहने का उचित समय है। जब तुम संचित स्मृति की अवस्था में होते हो तब अगर मुझसे दूर जाने की कोशिश करते हो तो वह उसी तरह है जैसे तुम बीमार हो और डाक्टर के पास नहीं जाना चाहते हो! वह वास्तव
गुरू और अपने जीवन के उद्देश्य के प्रति जागृत होनाः
में डाक्टर के साथ रहने का उचित समय होता है।
समझिए, शिष्य अपनी अज्ञानता के बारे में कभी नही जान पाएगा क्योंकि वह अंधकार में है। उस व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है जो प्रकाश में, उजाले में है, न कि उसकी जो अंधकार में है।
एक लघुकथाः
एक जन्मजात अंधा आदमी हिमालय में विचरण कर रहा था। वह अपने आप को रास्ता दिखाने के लिए छड़ी खोज रहा था, वह एक ठण्ड से जमे हुए सांप पर गिरा। उसने सोचा कि वह एक छड़ी है और उसका प्रयोग करने लगा।
एक परमज्ञानी गुरू ने यह देखा और वह चिल्लाने लगे, 'मूर्ख! यह एक सांप है, इसे छोड़ दो, 'वह अंध आदमी चिल्लाने लगा, 'नहीं! मुझे लगता है आपके पास छड़ी नहीं है, इसीलिए आप मुझे इसे छोड़ने के लिए कह रहे हैं जिससे कि आप इसे उठा सकें!'
गुरू ने कहा, 'मूर्ख, मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है। तुम जो लिये हुए हो वह छड़ी नहीं है, यह एक सांप है। जल्दी ही सूर्य उगेगा, और यह सांप जीवंत हो जाएगा और यह तुम्हें डंस लेगा।' वह
गुरूः - जीवंत मुक्त
सही अवस्था नहीं होती है किसी निर्णय लेने की। आपको अच्छे मनोभाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए जब चीजें और स्पष्ट हो जाएगी। कभी भी जब आप प्रफुल्लित मनोभाव में होते हैं तभी कोई बड़ा निर्णय लीजिए। जब आप सकारात्मक मनःस्थिति में होते हैं। उसी तरह जैसे आप कोई भी निर्णय दिन के उजाले में लेते हैं जब आप जगे होते हैं, और न कि रात के अध्रे में जब आप सोये होते हैं, उसी तरह इसका भी उसी समय निर्णय लीजिए जब आप सजग हैं और तब नहीं जब आप विपत्ति में हैं।
एक दम स्पष्ट रहें, हास मन:स्थिति भी उसी तरह खत्म हो जाएगी जैसे कि उत्साहित मनःस्थिति।
| यह मन का स्वभाव है, | |
|---|---|
| यह मन क्रिका क स्वभाव एक | यह एक पहिये के समान हैं। जो नीचे है, उसे ऊपर आना है। |
| न ही एक दूसरे से ज्यादा सही कहा जा सकता है। वे | |
| सकारात्मकता पर ज्यादा |
विश्वास एक चुनाव है जो आपके पास है।
जब कोई अवसाद की अवस्था में या हास मनःस्थिति में, छोड़ने का निर्णय लेता है, तो समस्या यह है कि जब उसका मन उच्च, उत्साहित मन:स्थिति को पाएगा और जब वह होगा तो वह अपने निर्णय पर पछताएगा। तब उसके लिए लौटना मुश्किल होगा क्योंकि तब वह अपराध बोध से ग्रस्त हो जाएगा और फिर लौटने के लिए अपने आप को योग्य नहीं समझेगा।
गुरू: - जीवंत मुक्त
अपने जीवन में एक गुरू के लिए जागना और क्ष्ठ नहीं बल्कि अपने जीवन में इस गहरे लालसा और उद्देश्य के लिए जागना है।
अंध आदमी उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। तब उस गुरू ने कहा, 'इसके बावजूद कि तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है, त म्हें बचाना मे री जिम्मेदारी है।' इसीलिए उसने उसके हाथ से सांप छीन लिया और उसे बाहर करने की कोशिश करने लगा। वह अंध व्यक्ति उसी छडी से गुरू
को पीटने लगा।
किंतु गुरू ने कहा, 'उसके बावजूद कि तुम मुझे मार रहे हो, यह ठीक है। तुम्हें बचाना मेरी जिम्मेदारी है क्योंकि तुम अज्ञानी हो।' उसने सांप ले लिया और उसे फेंक दिया।
आप नहीं जानते हैं कि आपने क्रितने जन्मों संघर्ष और प्रार्थना की है एक गुरू को पाने के लिये। आप अपनी सच्ची कामना के बारे में भी सजग नहीं हैं। एक गुरू का आपके जीवन में होना कोई मजाक नहीं है। आप खुद स्वयं नहीं जानते हैं कि आपने जीवन में कितना संघर्ष किया है और गहन प्रार्थना की है एक परमज्ञानी जीवित गुरू के लिए। अपने जीवन में एक गुरू के लिए जागना और कुछ नहीं बल्कि अपने जीवन में इस गहरी अभीष्सा और उद्देश्य के लिए जागना है।
जीवन के मनोवैज्ञानिक नाट्य का अंतः
आपके सभी संबंध मात्र चरित्र हैं और जीवन बस एक नाटक है। कृपया स्पष्ट रूप से समझें, जो कुछ भी संबंधों के रूप में होता है वह एक मनोवैज्ञानिक नाट्य है।
आपको यह सत्य समझना चाहिए कि आप एक परिवार में जन्म लेते हैं जहाँ कोई आपका माता, पिता, भाई और बहन है और आप उनको साथ एक पारिवारिक संबंध का नाटक खेलते हैं। आपने बच्चों को गुड़िया के साथ खेलते देखा होगा। बच्चे के पास कुछ गुड़िया होगी वह एक को पिता बना देगा, दूसरे को माता, उसी तरह दो और को भाई और बहन बना देगा। फिर वह उनके जीवन का एक दिन खेल पाएगा।
वह फिर ऐसे बोलेगा जैसे कि पिता काम पर जाता है, ऐसा दर्शाएगा कि माँ रसोई में कोई पकवान बना रही है। दिखाएगा कि भाई स्कूल जा रहा है और बहन स्कूल जाने से मना कर रही है। वह बच्चा यह सब भूमिका खुद निभाएगा और पूरे खेल का आनंद जनाएगा।
अब बस अपने जीवन को देखिए। आप ज्यादा से ज्यादा परिग्रह करना चाहते हैं, चाहे वह संबंध के रूप में हो या फिर भौतिक चीजों का। आप चल या अचल संपत्तियों को बढ़ाने की कोशिश करते हैं और अचानक फिर वह नाटक आपके मृत्यु के साथ खत्म हो जाता है।
फिर से आप किसी दूसरे परिवार में दूसरे माता, पिता, भाई और बहन के साथ जन्म लेते हैं और फिर एक बार वही खेल खेलते हैं। हमारा संपूर्ण जीवन उस बच्चे के गुड़िये के खेल से अलग नहीं है। यही जीवन का मनोवैज्ञानिक नाटक है। वह जिसने पूरे गुरू शिष्य संबंध का अनुभव किया है, उसके जीवन में यह मनोवैज्ञानिक नाटक फिर नहीं होगा।
गुरूः - जीवंतमुक्त
समर्पण - परम विधिः
भगवत गीता में, अर्जुन पूरी तरह भ्रमित हैं कि उसे कौन से मार्ग का अनुकरण करना चाहिए। कृष्ण के द्वारा अंतिम अध्याय में दिया गया परम ज्ञान ही परम सत्य को पाने की सर्वोत्तम विधि है। विभिन्न विधियों जैसे ध्यान, भक्ति और ज्ञान का ज्ञान देने के बाद अंत में कृष्ण सीधे, निश्चित और परमविधि का खुलासा करते हैं, वह है समर्पण का।
बहुत ही स्पष्ट रहें, जब आप एक परम ज्ञानी गुरू के समक्ष समर्पण करते हैं तो असल में आप उसके समक्ष समक्ष करते हैं जिसके पास अहम नहीं हैं, पहचान नहीं है, इसीलिए उसका कोई निजी स्वार्थ नहीं है। वह सुष्टि के साथ एक और तरंगित है। उसके हाथ को पकड़कर आप उनसे उस आनंद के सागर में जाने की बात करते हैं जिसमें वह खुद हैं।
चिंता और तनाव तब आता है जब आप सोचते हैं कि आप कर्त्ता हैं। आप जल्द ही थक जाते हैं। किंतु जब आप दायित्व बोध को उस परम ऊर्जा पर सौंप देते हैं ओर अपना कार्य आनंद पूर्वक करते हैं, तो आप असीम निश्चिंतता का अनुभव करते हैं।
एक लघुकथाः
एक बैंक मैनेजर था जो हर रोज कैश अपने साथ घर ले जाता था और फिर अगले दिन उसे अपने साथ लाता था। वह ऐसा एक महीना तक करता रहा और फिर आगे नहीं कर पाया।
उसने अपने आप को घर लौटते समय सारे रास्ते में कांपता हुआ पाया और अपने जिम्मे में सारे पैसे पाकर सो नहीं पाया। अंत में उसने अपने बॉस से कहा कि उसे इस काम से छुटकारा दिया जाए क्योंकि अब और ज्यादा वह इस चिंता को ढो नहीं सकता है।
उसके बॉस ने उससे कहा कि रकम खो भी जाती है तो भी उस पर जिम्मेदारी नहीं आएगी और उसकी नौकरी रहेगी। वह मैनेजर उस दिन से चैन का नींद सोया।
| उसमें क्या अंतर आया? वह वही कार्य करता रहा, किंतु अब | |
|---|---|
| भगवान् कृष्ण द्वारा | वहाँ चिंता और तनाव क्यों नहीं था? क्योंकि अब जिम्मेदारी |
| अंतिम अध्याय में दिया | उच्च अधिकारी पर थी, बस। वह वह करता रहा जो वह कर रहा |
| गया परम ज्ञान ही | था। |
| परम सत्य को | |
| पाने की सर्वोत्तम विधि | |
| है। |
जब आप उच्च
ऊर्जा के समक्ष समर्पण करते हैं, आप कभी थके और ऊजाहीन अनुभव नहीं करेंगे क्योंकि आप सीधे उससे जुड़े हुए हैं जो अनंत ऊर्जा के साक्षात् रूप है। समर्पण की यही सौगात है।
समर्पण के तीन स्तरः
अब मैं आपको समर्पण के तीन प्रकारों के बारे में बताता हूँ। बुद्धि का समर्पण, भावनाओं का समर्पण और आपकी इन्द्रियों का समर्पण।
प्रथम है बुद्धि का समर्पण जिसका अर्थ है गुरू की बुद्धि पर अपनी बुद्धि से ज्यादा श्रद्धा होना। यही बौद्धिक समर्पण है। इस चरण में, आप उस जीवन पद्धति का अनुकरण करते हैं जो गुरू आपको दिखाते हैं।
दूसरा है गुरू की भावनाओं पर अपनी भावनाओं से ज्यादा विश्वास करना। इसका अर्थ है यह विश्वास करना कि गुरू के साथ संबंध परम संबंध हैं, अन्य किसी संबंध से अधिक। अगर भगवान आपके समक्ष प्रकट होते हैं और आपसे इस ग्रह पुथ्वी पर आपके सिवा किसी अन्य व्यक्ति के जीवित रहने का चयन करने को कहते हैं, आप किस का चयन करेंगे? अगर आप गुरू का चयन करते हैं, तो भावनात्मक समर्पण आप में हो चुका है।
निश्चित रूप से गुरू कभी खत्म नहीं हो सकते हैं, किंतु यह अलग बात है! कभी नहीं सोचिए कि आपने उन्हें चुना है, इसलिए वे जीवित है। वो जीवित रहेंगे चाहे आप उन्हें चुनिये या नहीं।
अगर आप अनुभव करते हैं कि गूरू के प्रति आपकी भावना किसी भी भावना से ज्यादा प्रबल है तो आपके अंदर भावनात्मक समर्पण हो चुका है। बिल्कुल स्पष्ट रहें, 99 प्रतिशत व्यक्ति प्रथम चरण में ही रहते हैं। सिर्फ कुछ ही व्यक्ति गहरे दूसरे (द्वितीय) चरण में बढ़ पाते हैं। बाकी वहीं खड़े रहते हैं जहॉ हैं।
तीसरे तरह का समर्पण हैं इन्द्रियों का समर्पण।
भगवान श्री कृष्ण के जीवन में एक सुंदर घटना घटी।
महाभारत के युद्ध के बाद, जब श्री कृष्ण और अर्जुन आराम कर रहे थे, श्री कृष्ण जी ने कहा, 'हे अर्जुन, वहॉ देखो, वहॉ एक हरा कौआ है!'
अर्जुन ने कहा, 'सुंदर! एक हरा कौआ!'
कृष्ण ने कहा, 'मूर्ख! यह काला है, हरा नहीं।' अर्जुन ने कहा "हां कृष्ण! काला है, हरा जीवन-मुक्ति
नहीं श्री कृष्ण ने पूछा, 'तुम्हें क्या हो गया है? जब मैंने कहा हरा, तुमने कहा हरा। जब मैंने कहा काला, तुमने कहा काला, तुम्हारे साथ क्या हो रहा हैं?'
अर्जुन ने कहा, 'श्री कृष्ण, मैं ईमानदारी से कहता हूँ। मैं नहीं जानता हूँ कि उस कौए का रंग क्या है? किंतु जब आपने कहा हरा, मैंने उसे हरा देखा। जब आपने कहा काला, मैंने उसे काले रूप में देखा। मैं और कुछ नहीं जानता हूँ।'
अर्जुन की इन्द्रियां श्री कृष्ण पर विश्वास करती थीं। उन्हें गुरू की इन्द्रियों पर अपनी इन्द्रियों से ज्यादा विश्वास था।
प्लेसबो प्रभाव या अधिक?:
चिकित्सकीय रूप में, हमारे पास एक युक्ति है 'प्लेसबो प्रभाव।' मरीज उसमें नकली दवा लेता है किंत् उसे कहा जाता है कि वह असली दवा है, और वह बीमारी उसकी टीक हो जाती है। किंतु हाल के शोधें ने दर्शाया है कि प्लेसबो प्रभाव ज्यादा प्रभावी है।
मैंने इटली के ट्यूरीन विश्वविद्यालय में हुए एक रोचक शोध के बारे में पढ़ा। उन्होंने एक प्रयोग किया जिसमें उन्होंने एक इलेक्ट्रोड को एक व्यक्ति से जोड़ा और उसे नियंत्रित विद्युत आघात दिया। पहले उन्होंने व्यक्ति के लिए दर्द के पैमाने को स्थापित किया न्यूनतम विद्युत करेंट जो वह महसूस कर सकता था और फिर उच्चतम करेंट जो वह बदश्ति कर सकता था इस आधार पर।
अब, विद्युत आघात देने से पहले, व्यक्ति के सामने एक लाल और हरी बत्ती जलती थी। हरे बत्ती का अर्थ था आघात हल्का है। लाल बत्ती का
मतलब था आघात प्रबल होगा। अब उस व्यक्ति को 1 से 10 पैमाने पर अपने दर्द को महसूस कर दर्ज करना था, हल्के से तीव्र पर।
प्रतिभागी व्यक्ति को यह पंद्रह मिनट तक किया गया। अंत में उसने अनुभव किया कि शुरू में आघात तीव्र या जबकि अंत में आघात हल्का था।
किंतु आश्चर्य की बात थी कि असल में यह उसके विपरीत था। अंतिम श्रृंखला के सभी आघात तीव्र थे। तब कैसे उन आघातों को उससे हल्का महसूस किया? हल्के आघात को देने से ठीक पहले, वह प्रकाश जो उसे दिखाया गया था वह हरा था जो दर्शाता था कि वह आधात जो दिया जायेगा वह हल्का होगा।
इसीलिए उस व्यक्ति का मस्तिष्क पहले से तैयार था, पहले से वह व्यवस्थित था कि जो आघात पड़ने वाला है वह हल्का है। जब असल में वह आघात दिया गया, इसके बावजूद कि वह प्रबल था, क्योंकि उसका मस्तिष्क एक हल्के आघात की आशा कर रहा था उसके शरीर ने हल्के आघात का अनुभव किया।
इसीलिए शोधकर्त्ता अब कह रहे हैं कि प्लेसबो प्रभाव उससे ज्यादा गहरा है और उसका महत्व उससे ज्यादा है जितना कि पहले सोचा गया था।
उन्होंने पाया कि दवाओं का प्रभाव भी सदा प्रत्यक्ष नहीं होता है। उनका परिणाम अपेक्षाओं से प्रभावित होता है। डाक्टरों ने पाया है कि अगर रोगी को नहीं बताया जाय कि उसे दर्द निवारक सुई दी जा रही है, जो उसे दर्द मिटाने के लिए दवा की ज्यादा मात्रा देनी पड़ेगी। जबकि अगर वह जानता है कि उसे दर्द निवारक दिया जा रहा है, तो बहुत कम मात्रा की उतना ही प्रभाव डालता हैं ।
मन इतना शक्तिशाली होता है कि वह आपमें सीधे शारीरिक परिवर्तन ला सकता है। जिस प्रकार कि इन्द्रियों मन के प्रति समर्पित हो सकती है, उसी तरह इन्द्रियों दैविक चेतना के प्रति भी समर्पित हो सकती है। यही श्री कृष्ण और अर्जुन के दृष्टांत में हुआ। अर्जुन ने एक हरा कौआ देखा जब श्री कृष्ण ने उसे हरा कौओ देखने को कहा। आपकी इन्द्रियों आपसे कहती हैं कि आप मनुष्य हैं। किंतु मैं आपसे कहता हूँ कि आप एक आध्यात्मिक व्यक्ति हैं। जब तक आप अपनी इन्द्रियों पर विश्वास करते हैं, आप मनुष्य हैं। जब आप अपने गुरू पर विश्वास करते हैं, आप अनुभव करेंगे कि आप एक आध्यात्मिक व्यक्ति हैं। इसी परिवर्तन को मैं 'संज्ञान परिवर्तन' कहता हूँ ।
गुरू - परम आनंदः
गुरू आपके जीवन में अंतिम विलास हैं। जब गुरू आपके जीवन में आते हैं, किसी दूसरे चीज की आपको जरूरत
जब गुरू आपके जीवन में आते हैं, किसी दूसरी चीज की आपको जरूरत नहीं है।
नहीं है। अगर वह नहीं आते हैं, तो कोई भी दूसरी वस्तु का उपयोग नहीं है। वह हमारे जीवन में हमारी आवश्यकतानुसार ज्ञान लाने और उसे परिमार्जित करने का माध्यम हैं।
जीवन ऊर्जा और गुरू दो भिन्न चीज नहीं हैं। गुरू बार बार यह सुंदर धारणा कि गुरू को अपने अंदर अनुभव करने पर जोर देते हैं। जब तक
गुरू: - जीवंतम्क
कि आप गुरू को अपने अंदर अनुभव नहीं करते हैं, आपको प्रतीत होता है कि आपको बाह्य संसार से गुरू की जरूरत है। एक बार ज्योंहि आप गुरू को अंदर महसूस करते हैं, आपको बाह्य संसार से गुरू की आवश्यकता नहीं होती है।
गुरू की उपस्थितिः
देखो, जब गुरू के साथ ध्यान विधि की जाती है, यह रसायन विधि हो जाता है। अगर आप इसे अकेले करते हैं तो यह ध्यान कहलाता है। जब इसको गुरू के साथ करते हैं, गुरू की उपस्थिति में, गुरू के मार्गदर्शन में, यह स्वर्ण रसायन हो जाता है। यह आपको उबालने जैसा है। यह प्रक्रिया इतनी जीवंत और प्रबल हो जाती है।
एक लघुकथा
एक नवयुवती थी जो खाना बनाना नहीं जानती थी। किंतु वह एक potluck dinner के लिए कुछ बनाना चाहती थीं जिसमें वह जा रही थी।
उसे पाक शास्त्र की एक पुस्तक मिली और डेजर्ट बनाने की कोशिश करने लगी। वह एक हाथ में किताब पकड़े हुई थीं। निर्देश कह रहा था, 'बर्तन को चुल्हे पर रखीये, 'उसने किया। फिर उसमें लिखा था, 'उसमें आधे कप मैदा दीजिए। उसने वैसा किया, फिर उसमें आधे लीटर पानी मिलायें, उसमें थोड़ा चीनी दें और उसे बीस मिनट तक मिलायें। उसने सभी निर्देशों को शब्दतः अनुकरण किया, किंतु बीस मिनट बाद भी कुछ नहीं हुआ।
क्यों? क्योंकि पुस्तक ने आग जलाने को नहीं कहा था।
जीवन-मुक्ति
इसी तरह जब आप स्वयं ध्यान करते हैं, कभी कभी आग जलाना भूल जाते हैं। गुरू की उपस्थिति ही अग्नि है। यह परिणाम की सुनिश्चितता को तय करता है, रसायन घटित होता है।
लोग मुझसे पूछते हैं, 'स्वामीजी, आप गुरू की उपस्थिति पर क्यों जोर देते हैं?' निश्चित रूप से CD या DVD पर आप मेरी बात सुन सकते हैं। किंतु जब आप यहाँ बैठते हैं, वह ईमानदारी (सत्यनिष्ठा) जो मेरी आँखों से प्रवाहित होती हैं, वह सत्य जो मेरी दैहिक भाषा व्यक्त करती है, वह आपको घेरेगा। आपको मिलेगा। आप उसे पकड़ पाएंगे, आप कौंध (क्लिक) महसूस करेगें एक संबंध, 'हाँ, वे सत्य कह रहे हैं।'
इसके बावजूद कि आप संदेह करते हैं, अचानक आप अनुभव करेंगे कि आपके तर्कों का आपके ऊपर कोई प्रभाव नहीं है। यह शब्द आपके अंदर तर्कों से परे होकर प्रवेश कर रहे हैं। ये तभी होगा जब आप गुरू की उपस्थिति में बैठते हैं। हम उसे उपनिषद् कहते हैं – बस गुरू के पास बैठना और उनके प्रति खुलना।
अपने आप को श्रद्धा के साथ खोलिये और अपने आपको श्रद्धा में डुबा दीजिये। आप पाएंगे कि गुरू वहाँ आपको संभालने के लिए खड़े हैं। अपने आपको बस मंस्तिष्क से उतारिए और हृदय की खाई में गिर जाने दीजिये। गुरू वहाँ आपको संभालने, आपको परमज्ञानी बनाने के लिए होंगे।
उपनिषदः
उपनिषद् का अर्थ है 'बैठना'। जब कोई शिष्य गुरू की उपस्थिति में बैठता है तो वही अनुभव जो गुरू में हुआ है शिष्य में भी पुनः उत्पन्न
गुरूः - जीवंतम्क्त
होता है।
वह शिष्य जिसने गुरू को अनुभव किया है और जिसके अंदर गुरू पुनः जीवित हुए हैं, उन्होंने अपने अनुभवों को कि किस तरह यह प्रक्रिया उनके अंदर हुई, को लिखा है। शिष्य या गुरू किसी और ने उस बात को लिखा है कि कैसे यह अनुभव शिष्य के अंदर पुनः जीवित हुआ, क्या हुआ जब यह प्रक्रिया शुरू हुई, कैसे इसका अंत हुआ और क्या हुआ जब इसका अंत हुआ। यही रिपोर्ट उपनिषद् कहलाती है।
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कैसे उपनिषद् घटित हुआ-कारण और परिणाम से परे:
हमने कारण और परिणाम के नियम के बारे में सुना है। अगर आप किसी गेंद को गिराते हैं, तो वह नीचे गिरती है। अगर आप पानी को गर्म करते हैं, तो वह 100 डिग्री सेल्सियस पर भाप बन जाता है। अगर आप पानी में नमक डालते हैं, वह उसमें घुल जाता है। यह कारण – परिणाम कहलाता है। किसी भी कार्य का कोई खास परिणाम होता है। विज्ञान की नींव इसी कारण — परिणाम नियम पर है।
किंतु सृष्टि में बस यही एक नियम है। एक महत्वपूर्ण नियम जो हर समय कार्यरत रहता है वह है अंतः प्रज्ञा का नियम या जैसा कि दार्शनिक कार्ल जुंग ने कहा है, समस्वरता का नियम। यहाँ, ऐसा नहीं है कि कुछ होता है और उसके परिणाम स्वरूप कुछ और होता है। कुछ होता है और उसके संगत कुछ घटित होता है।
हम इस कारण— परिणाम के स्वरूप चीजों को देखने के अभ्यस्त हैं। हम कारण और उसके परिणामस्वरूप तत्काल प्रभाव के बीच संबंध देख सकते हैं। किंतु जीवन दृष्टांतों से भरा हुआ है जहाँ परिणाम कारण के इतने समय बाद घटित होता है कि हम उसे उसके असली कारण से संबंधित नहीं कर पाते हैं। यह ऐसा ही है जब आप पानी में पत्थर फेंकते हैं, आप त्वरित तरंगों को देख सकते हैं जो उस पत्थर के कारण होता है। किंतु अगर आप कुछ मिनट बाद आते हैं, तो आप बाद के तरंगों को देखते हैं, किंतु आप निश्चित रूप से नहीं कह सकते हैं कि उसका कारण क्या है।
आपने अपने जीवन में ऐसे दृष्टांतों का अनुभव किया होगा। आप अपने दोस्त को अपने प्रिय पकवान बनाने के बारे में कहने को सोचते हैं और आप उसके घर पहुँचते हैं और उसने वही बनाये होती है। वह बस अनुभव करती है कि उसे उस दिन वही पकवान बनाना चाहिए। यही एकलयता की शक्ति है।
यही होता है गुरू और शिष्य के बीच, मित्रों, प्रेमियों या दंपत्तियों के नजदीकी संबंधों से भी ज्यादा। क्योंकि गुरू - शिष्य संबंध सृष्टि में संभव सबसे गहरा संबंध है, यही परम प्रेम प्रसंग हैं ।
यह सबसे ज्यादा रहस्यमय है क्योंकि यह तर्कों के संकीर्ण दायरों से परे हैं। असल में, जीवन तभी शुरू होता है जब आप किसी ऐसी चीज को स्पर्श करते हैं जो तर्कों से परे है, जो मन के द्वारा किसी सांचे में ढाला नहीं जा सकता हैं, किंतु जो आपके हृदय के तारों को झंकृत कर देता है। यह मन के तर्को को अलग हटा देता है, जो सदा आलोचना किया करता है।
सही शिष्य वह नहीं है जो गुरू के कथनों के कारण शिष्य बना है, बल्कि गुरू जो है वह उससे शिष्य है। इसीलिए, सिर्फ गुरू के साथ बैठने से ही वह गुरू की धुन में रम जाता है। यही उपनिषद् है। यही सच्चा शिष्यत्व है। यह गुरू के प्रति खुलकर रहना है जिससे कि गुरू अपना प्रेम आप पर बरसा सकें और आप इसकी शान और दिव्यता के साथ इसे ग्रहण कर सकें और विकास कर सकें।
हार्ड वे यर और सॉफ़टवे यर (शारीरिक और कार्यशैली परिवर्तन):
मन का अचेतन क्षेत्र सॉफ़टवेयर की तरह है जिसे ध्यान से स्वच्छ किया जा सकता है। हार्डवेयर, मस्तिष्क खुद, इस नये सॉफ़टवेयर को धारण करने के लिए दर्शन के द्वारा या गूरू के आशीर्वाद के द्वारा उस रूप में ढल जाएगा।
जब आप चेतन व अचेतन मन को ध्यान को द्वारा साफ करते हैं और अपने अंदर परिवर्तन लाते हैं, तो वह हार्डवेयर हो सकता है कि प्रथम दिन से उसे धारण और उसका प्रभाव कायम न रख सकें, अगर गुरू का दर्शन या आशीर्वाद होता है, तो वह हार्डवेयर भी उस प्रभाव को रखने के लिए बदल जाता है। अगर आप वह आशीर्वाद नहीं पाते हैं, सतत् ध्यान और शिक्षा क्रमशः उस हार्डवेयर के परिवर्तन में मदद करता है।
अगर वह हार्डवेयर पुराना है, तो ज्योही वह नया सॉफ्रटवेयर उससे डाला जाता है, तो वह हार्डवेयर भी क्रमशः नये रूप में परिमार्जित होने लगता है। फिर भी, अगर आप उस हार्डवेयर में त्वरित एक परिवर्तन (बदलाव) चाहते हैं तो दर्शन
एक सही चीज है। वह सीधे हार्डवेयर को बदल देता है।
कभी कभी, नये सॉफ़टवेयर को डाले बिना भी हार्डवेयर बदला जा सकता है और व्यक्ति सीधे नये सॉफ़टवेयर का गूण दर्शाने लगता है। वह हो सकता है जब कोई शिष्य पूरी तरह से गुरू से खूला हुआ है। कभी कभी कोई शिष्य अकारण भी गुरू से प्रेम करने लगता है। वह शिक्षा से आकर्षित या उससे परिचित नहीं भी हो सकता है, वह ध्यान विधि से आकर्षित या उससे परिचित नहीं भी हो सकता है, किंतु वह बस प्रेम करने लगता है। अगर वह गुरू से अकारण ही प्रेम करता है, तो गुरू सीधे हार्डवेयर के साथ-साथ सॉफ्टवेयर को भी बदल सकता है। वे शिष्य किसी तरह की शिक्षा और ध्यान के बिना सीखे भी उसके गुण को दर्शाने लगेंगे ।
जैसा कि अब हार्डवेयर और सॉफ़टवेयर दोंनो बाह्य संसार पदार्थीय संसार की ओर निर्देशित हैं। सॉफ़टवेयर का चेतन स्वरूप शिक्षा को सुनकर अंतः संसार की ओर मुड़ना शुरू हो जाता है, और सॉफ़टवेयर का अचेतन स्वरूप ध्यान की ओर मुड़ना शुरू कर देता है। किंतु इसके बावजूद कि सॉफ़टवेयर अंतः संसार की ओर मुडता है, हार्डवेयर उसे नहीं संभाल पाएगा। तब स्वभाविक ही हार्डवेयर अपने असली स्वभाव को क्वायम रखने के लिए अपना पूरा प्रयास करेगा। अगर सॉफ़टवेयर अत्यधिक प्रबल है और उसी रूप में रहता है तो हार्डवेयर बदल जाएगा। किंतु शिक्षा और ध्यान को पाने के तुरंत बाद, अगर दर्शन और आशीर्वाद भी लिया गया है, तो हार्डवेयर भी बदल जाएगा और
कार्ल जंग - बीसवीं शताब्दी के जाने माने मनौवैज्ञानिक व सिग्मण्ड फ्रेड के समकक्ष "संग्रहित अचेतन" पर कार्य के लिये इनको सराहा गया है।
गुरूः - जीवंतम्क्त
वह परिवर्तन को कायम रखने लगेगा। वह उसी अनुभव को कायम रखने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाएगा।
Dna फैण्टम प्रभाव:
यह एक रोचक शोध है जो हर्टमैथ इन्स्टीच्युट, USA (अमेरिका) के द्वारा किया गया था। इस प्रयोग में. प्रकाश फोटोन के गणों को एक प्रकाश विकिरण चैम्बर में प्रयोग कर उसका अध्ययन किया गया था। वह रेखाचित्र एक खास प्लॉट की तरह दिखता था जो फोटोन के अनियमित गति को दर्शाता था।
अगला प्रयोग में एक DNA के नमूने को एक विकिरण कक्षा में रखा गया। अब वह बदला हुआ रेखाचित्र DNA और प्रकाश के फोटोन के बीच के अंतःक्रिया को दर्शा रहा था।
फिर उस DNA को को उस कक्ष से हटा लिया गया। जब उस DNA को हटा लिया गया, आप सोचेंगे कि वह रेखाचित्र वही होगा जो DNA के रखने से पहले था, आश्चर्यजनकरूप से, DNA के हटाने के बाद का रेखाचित्र उससे पूर्णतः भिन्न था जो उस कक्ष में DNA के रखने से पहले था।
DNA के हटाने के बावजूद, उसने प्रकाश फोटोन के स्वभाव को प्रभावित कर दिया था। न सिर्फ उसके हटाने के तुरंत बाद बल्कि कुछ और दिनों तक, DNA का क्रमिक प्रभाव उस प्रकाश फोटोन पर पडता था।
एक दिलचस्प अवलोकन यह है कि यह प्रभाव चेतना के निम्न रूप के DNA के साथ नहीं देखा गया। इसीलिए इससे कोई भी निष्कर्ष निकाल सकता है कि किसी खास तरह की चेतना या किसी खास व्यक्ति की चेतना का प्रभाव सदा प्रवाहित होता रहता है और वह अपना खास प्रभाव छोड़ता है। हम यहाँ यह भी गौर कर सकते हैं कि प्रकृति में, उच्च अवस्था की चेतना, अपनी उपस्थिति मात्र से, अपने से द्वितीयक रूप की चेतना पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं ।
अब आप सोच सकते हैं कि कैसे अति प्रज्ञाशील ऊर्जा, जैसे किसी परमज्ञानी चेतना अपने से द्वितीयक रूपी चेतना पर जो उसके चारो तरफ उपस्थित है, प्रभाव डालती है।
परिवर्तन को कायम रखने की ऊर्जाः
किसी परमज्ञानी चेतना की उपस्थिति में रहना सीधे हार्डवेयर को बदल देता है, क्योंकि वह परिवर्तित सॉफ्रटवेयर और संपूर्ण प्रक्रिया को कायम रखता है।
समझिए, परमज्ञान के साथ आपका शारीरिक अंतः स्वरूप भी बदलता है। जब कोई गुरू स्पर्श करते हैं, तो उन परमज्ञानी के शारीरिक अंतःस्वरूप का सॉफ़टवेयर भी आपमें अंतःनिहित हो जाता है आपके शारीरिक अंतः स्वरूप को बदलते हुए। जब आप स्पर्श के समय पूरी तरह से खुले होते हैं, तो उस परमज्ञानी अंतः शरीर का सॉफ़टवेयर भी आपमें अंतःनिहित हो हो जाता है। आपका शरीर समझता है कि वह अब जो है उससे अच्छा हो सकता है। आपकी जैविक स्मृति इस सीख को समझती है कि अच्छे अस्तित्व की संभावना वहाँ है।
डी.एन.ए. - डीऑक्सी रिबोनिकलिक एसिड जीवित प्राणियों में अनुवांशिक कोड को संग्रहित करने वाली रचना।
गुरू: - जीवंतम्क
वसुधैव कुटुम्बकम्:
गुरू के प्रेम के साथ उनके शिष्यों को प्रति भी प्रेम आता है। वह अब और ज्यादा 'मैं' नहीं
होता है, बल्कि मेरी जिम्मेदारियों 'हम' हो जाता है। उन शिष्यों के साथ का अनुभव कीजिए, एक सघन बंधन का जो सृष्टि की विकास होता है, जो जिम्मेदारी है। जैविक पारिवारिक बंधन से भी ज्यादा
सबल होता है। यह कोई शर्त नहीं होती है सिवाय गुरू के लिए घनिष्ट प्रेम के परिधि पर प्रेम स्वतः पनपने लगता है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' श्री कृष्ण की दृष्टि कि संपूर्ण सृष्टि हमारा परिवार है, सत्य हो जाता है।
आप ऊर्जा में सामूहिक रूप से विकसित होने लगते हैं, फिर भी गुरू के साथ हर शिष्य का संबंध अलग होता है। यह संबंध हृदय या बुद्धि के साथ शुरू हो हो सकता है। शीघ्र ही वह अस्तित्व स्तर का प्रसंग हो जाता है। जब दो चेतना एक दूसरे में घुलते हैं, शिष्य का गुरू के साथ, विलय यही मुक्ति है, सदा रहने वाला आनंद।
जीवन मुक्ति गुरू के साथ रहना है....... यह इतना ही आसान है।
क्या गुरू शिष्य को चुनते हैं या शिष्य गुरू को:
प्रथम तथ्य, असल में वह शिष्य होता है जो गुरू को चुनता है, क्योंकि गुरू कभी चुनते ही नहीं है। गुरू बस बारिश करते हैं। वह पवित्र नदी गंगा की तरह हैं। वह बस प्रवाहित होते हैं। अगर आप चाहें, आप उस सरिता में प्रवेश करें, अपने आपको डुबाए या उसे पीयें या उसके साथ खेलें। आप जो चाहे वह कर सकते हैं। किंतु गंगा बस बहती है, वह चयन नहीं करती है। गुरू के साथ भी ऐसा ही है। गुरू एक चुनावरहित ऊर्जा हैं, चुनावरहित आनंद ।
इसीलिए मैं कह सकता हूँ कि यह संबंध शिष्य के द्वारा स्थापित होता है। शिष्य के पास वह परम स्वतंत्रता है, गुरू शिष्य संबंध स्थापित करने की वह अंतिम स्वतंत्रता। स्थापित करने के बाद, उसके पास जो कोई स्वतंत्रता है वह खत्म हो जाएगी क्योंकि वह परमज्ञानी हो जाएगा। वह अंतिम कार्य जो तुम कर सकते हो, वह अंतिम चयन जो आप अपने जीवन में कर सकते हैं वह है अपने गुरू का चयन करना, बस। ज्योंही आप गुरू को चयन करते हैं, आप अपने स्वरूप में विलीन हो जाते हैं। तब आप एक व्यक्ति के रूप में और ज्यादा नहीं होते हैं। आप गुरू हो जाते हैं।
मैं कैसे आपका शिष्य बन सकता हूँ?:
असल में, अगर आप अनक्लच हैं, आप हमारे समुदाय में आ सकते हैं। अनक्लच होना आपको सीधे मुझसे जोड़ता है। एक अपार ऊर्जा आपके द्वारा प्रवाहित होने लगती है। अनक्लच होने से मेरा अभिप्राय क्या है? बिना किसी चीज या विचार या व्यक्ति में लिप्त हुये विश्रामपूर्ण रहना।
मैं सदा लोंगों से कहता हूँ कि वह व्यक्ति जो सिर्फ अपनी पीड़ा, दर्द का अनुभव करता है और मेरे पास उपचार के लिए आता है, एक भक्त है। वह व्यक्ति जिसे सिर्फ अपनी समस्याओं की गुरूः - जीवंतमुक्त
शिकायत है, एक भक्त है।
वह व्यक्ति जो मेरे दर्द का अनुभव करता है और वह जिम्मेदारी लेता है जो मैंने ली है जैसे कि यह पूरा मिशन, एक शिष्य है।
वह व्यक्ति जो मेरी जिम्मेदारी लेने के बाद यह अनुभव करता है, 'किसी परमज्ञानी गुरू को दर्द कैसे हो सकता है? जिस किसी चीज को इस जिम्मेदारी को उठाने से पहले मैं दर्द के रूप में सोचता था वह दर्द नहीं है, यह नित्यानंद या परम आनंद है, 'तब आप पारिवारिक हैं। हमारे अंदर के लोग ।
इसीलिए अब आप जानते हैं कि शिष्य कैसे बना जाता है। मेरी जिम्मेदारियों का अनुभव कीजिए, जो सृष्टि की जिम्मेदारी है। तब आप एक शिष्य बन जाऐंगे।
कैसे कोई खोजने वाला जानता है कि वह अपने गुरू के पास पहुँच गया है, या उसे बहुत से गुरू की आवश्यकत्ता हो सकती है?
जब आप किसी गुरू के पास पहुँचते हैं, यह प्रश्न कि, 'क्या यह मेरे गुरू हैं या नहीं?' खत्म हो जाएगा। लोग मुझसे पूछते हैं, 'क्या हमें आपको गुरू स्वीकार करना चाहिए?' मैं उन्हें कहता हूँ, कभी यह गलती नहीं करो। नहीं मैं कभी अपना प्रचार नहीं करता हूँ। मैं कभी आपको गुरू स्वीकार करने के लिए नहीं कह सकता।'
अगर मैं आपका गुरू हूँ तो आप में अपनी बुद्धि से परे कुछ होगा और आप कभी मुझे भूल नहीं पाएंगे। अब मैं चुनौती देता हूँ, अगर आप मुझे भूल सकते हैं, तो भूल जाइये। तो मैं आपका गुरू नहीं हूँ। आराम करें और अपनी जिज्ञासा को जारी रखें। आपको उचित गुरू मिल जाऐंगे। चिंता नहीं कीजिए ।
अगर आप मुझे नहीं भूल सकते हैं, तभी मैं आपका गुरू हूँ।
मैं सदा लोगों से कहता हूँ, मुझे कभी गुरू के रूप में स्वीकार नहीं करें। अगर मैं आपका गुरू हूँ, तो मैं सारा दिन सारी रात आपके मन में रहुँगा। मैं आपके स्वप्नों में भी रहुँगा। अगर मेरे विचार आपको दिन रात आते हैं तो मैं आपका गुरू हूँ।
लोग मुझसे पूछते हैं, स्वामी जी, क्या मुझे आपका स्मरण करना चाहिए? क्या मुझे आपका ध्यान करना चाहिए?' मैं उन्हें कहता हूँ, 'नहीं, मुझे भूलना आपके लिए समस्या होगा। मुझे याद करना समस्या नहीं होगी। तभी मैं आपका गुरू हुँ। अगर आप मुझे भूल सकते हैं, तो भूल जाइये और अपनी यात्रा जारी रखिए। वह आपके लिए अच्छा होगा।
अगर आप मुझे नहीं भूल पाते हैं तभी मैं
आपका गुरू हूँ। अगर आप मुझे यदि आपके मन के नहीं भूल सकते हैं, कोने में कहीं भी तभी मैं आपका एक संदेह है, तो यह एक टोस प्रमाण गुरू हूँ। है कि मैं आपका गुरू नहीं हूँ। आराम
कीजिए। संघर्ष नहीं कीजिए। पीड़ित मत हो। अपने आपको प्रताड़ित न करें। बस एक सुंदर विदाई लीजिए और जारी रखिए, चले जाइये। मेरा प्रेम, आदर और मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ है कि आप अपने गुरू तक पहुँच जाए, उस गुरू के पास जो आपके लिए हैं। खोज शुरू करें, आपको
गुरूः - जीवंतम्क्त
सही गुरू मिलेंगे। मैंने खुद बहुत से शिष्यों को बहुत से गुरूओं के पास भेजा है। मैंने बहुत से लोगों को उस तरह से मार्गदर्शन किया है। यह दुकान की तरह नहीं है। यह ऐसा नहीं है, आप मेरे दुकान में आए हैं तो आप किसी और दुकान में नहीं जा सकते हैं। यह व्यापार नहीं है।
मैं सदा लोगों से कहता हूँ कि इसके बावजूद कि आप मेरे शिष्य हैं, तब भी किसी और गूरू से सीखना न छोड दीजिए। सभी फूलवारियों से फूल चुनिए और अपने लिए एक सुंदर गुलदस्ता बनाइये। अंत में, जीवन को बेहतर बनाना है।
सर्वप्रथम यही प्रश्न कि आप मेरे शिष्य हैं कि नहीं, आपके अंदर नहीं आएगा अगर मैं आपका गुरू हँ। अगर आपके अंदर यह संदेह है, तो एक दम स्पष्ट रहें, मैं आपका गुरू नहीं हूँ। अपनी खोज जारी रखें।
दुसरी चीज इसके बावजूद भी यदि आपका संदेह पूरी तरह से खत्म हो गया है और सोचते हैं कि मैं आपका गुरू हूँ और आपको लगता है कि आप पूरी तरह से जुड़े हुए हैं, तब भी विभिन्न स्रोतों से विभिन्न गुरूओं से सीखना मत छोड़िये। सभी संभव स्रोतों से सीखिये ।
जीवन-मुक्ति
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स्थिर ध्यान
तीसरा नेत्र ध्यानः— 1.
संपूर्ण दुनिया को स्वप्नवत देखो और अपने भीतर उच्चतम् अंतः प्रज्ञा के प्रति जागृत होओ ।
समय:-समय सीमा आवश्यक नहीं।
इस ध्यान को सोने के पूर्व करना है।
अपने बिस्तर पर सीधे बैठ जाइये। अपनी आंखों को बंद करके तीसरे नेत्र पर ध्यान लगाये, जो कि आज्ञा चक्र है, सूक्ष्म ऊर्जा चक्र जो आपके दोनों भौहों के मध्य में स्थित है।
आपको आज्ञा चक्र पर ध्यान रखना है, और अपने श्वांसों के आवागमन को देखियें कैसे प्राणवायु आपके पूरे शरीर के भीतर बह रही है। कैसे आने वाले प्राण के द्वारा जादा ऊर्जा आपके अंदर प्रवेश करती है, और श्वांस को छोड़ने से कैसे पूरा शरीर विश्राम की अनुभूति करता है। उसको महसूस करें ।
एकाग्र न होयें तनाव न लें, विश्रामपूर्ण
तरीके से पूर्णतया सजग रहें। सिर्फ आज्ञा चक्र और आती जाती श्वांस के प्रति विश्रामपूर्ण सजगता में रहें। सिर्फ जागत आवस्था में रहें, और पूर्ण आरामदायक अवरश्या में आज्ञाचक्र में ध्यान को रखते हुए आती व जाती श्वांस को देखें।
अब लेट जायें और जब नींद आने लग तब भी तीसरे नेत्र के प्रति सजग रहें। अब आप सोने के लिये जा रहें है, ऐसा निश्चित करें कि अब मैं सोने के लिये जा रहा हूँ और आपको यह सजगता भी रखनी है कि कब आपकी चेतना सुप्त हो रही है। कब आप पूर्ण अंधकार में प्रवेश कर जाते हैं, फिर और गहरी निंद्रा में।
निंद्रा में जाने से यदि पहले आप तीसरे नेत्र के प्रति सजग हैं, इतना ही पर्याप्त है, क्योंकि आपके प्राण जागृत अवस्था में वहीं भ्रमण कर रहे हैं। जैसे ही आप निंद्रा में प्रवेश करते हैं प्राण तीसरे नेत्र से नीचे की ओर गति करना प्रारंभ कर देते हैं।
आगे आपको पूरे दिन जब भी यह याद आये सोचिए कि यह पूरा संसार वास्तविक नहीं है, आप सिर्फ स्वप्न देख रहें है, और आप जो भी देख रहें है, वह एक स्वप्न है। सजगतापूर्वक याद रखिये कि आप जो कुछ भी कर रहें है, जैसे कि खाना, सोना, चलना, पानी पीना, गाड़ी चलना और कार्यालय में बैठना, मात्र एक स्वप्न है।
तुरन्त, आप स्वयं से कहेंगें कि मैं कैसे यह सोचूं कि पूरा संसार एक स्वप्न है। यह संसार का तथ्य एक वास्तविकता है। कृपया बहुत स्पष्ट रहें कि तथ्य और सत्य में अन्तर है। सम्पूर्ण संसार स्पप्न हैं, आपके लिये तथ्य नहीं हो सकता क्योंकि जिस पैमाने से आप इस तथ्य को माप रहे हैं वह सटीक नहीं है।
जब आप इस तकनीक का अभ्यास करेंगे कुछ ही दिनों में आपको इन शब्दों के पीछे क्या सत्य छिपा है, आप उसको समझ जायेगें। यह आपको सत्य की ओर ले जायेगा। यह आपके विश्लेषक मस्तिष्क के लिये तथ्य नही है, लेकिन यह तथ्य है, और गहरे स्तर पर सत्य है।
इसलिये पूरे दिन भर जब भी याद आये स्वयं से कहें कि यह संसार स्वप्न है। जो भी मैं प्रत्यक्ष जान रहा हूँ वह सपना है। और धीरे-धीरे आप देखेंगे कि यह पूरा प्रक्षेपण बस विलुप्त हो जायेगा। तब आप वह परदा देखें कि जिस पर यह सपना चल रहा था। अगले ग्यारह दिन इसका अभ्यास करें।
जो कुछ भी आपके सामने घटित हो रहा है, जो कुछ भी आपको अनुभव हो रहा है। यह सब बदलता हुआ सपना है। केवल इसे याद रखें। बस इतना ही ।
एक महत्वपूर्ण बात जो आपको जाननी है कि कोई विचार जो आप लगातार पूरे ग्यारह दिन तक याद करते रहेंगे वह आपके स्वप्नावस्था में प्रवेश कर जायेगा। जब भी आप स्वप्न देख रहे होयेंगे आपको पता रहेगा कि आप स्वप्न में है और अगर आप यह जान गये कि आप स्वप्न देख रहे
ग्यारह दिनों के लिये लगातार यदि आप स्वयं से कहें कि आप डॉक्टर है, परन्तु वास्तव में आपका पेशा वकील का है, अपने सपने में आप स्वयं को डॉक्टर देखेंगे। यदि आप अपनी पहचान बदलना चाहते हैं, तो मात्र ग्यारह दिन पर्याप्त हैं, आप उस नई पहचान को व्यक्त करना प्रारंभ कर देंगे ।
हैं। यह बात सपने में याद रख पायें कि आप सपना
देख रहे हैं, आप जागृत हो जाएंगे।
यदि यह विचार आपके अस्तित्व को, स्वप्नावरश्था को भेद जाता है, आप अपने सम्पूर्ण अस्तित्व में अत्याधिक उपचारक प्रभाव का अनुभव करेंगे। मात्र एक यही अनुभव पर्याप्त है। आप अपनी रोजमर्रा के जीवन में बहुत अधिक संतुलित हो जाओगे। केवल इतना ही नहीं, अचानक आप देखेंगे कि जो भी आप सत्य समझते है, उसके लिये आप मैं उर्जा है। ऐसी परिस्थितियों जो आप सोचते थे कि आप उन्हें नहीं बदल सकते, बदलनी शुरू हो जायेंगी। इस परदे को जिस पर कि आप पूरा सपना प्रक्षेपित कर, देखते हैं, को मैं चेतना या प्राण कहता हूँ। जब आप यह परदा, जिस पर आप पूरा सपना प्रक्षेपित कर रहे हैं, देखना प्रारंभ कर देते है, आप उसी परदे को सपना देखते हये भी सजगता से देख सकते हैं।
अगला प्रश्न जो मन पूछ सकता है, यदि मैं सपना ही देख रहा हूँ तब में लगातार कुछ क्यों करता रहूं? यद्यपि यह सपना है आप फिर भी कार्य कर सकते हैं। इसमें कोई गलती नहीं है। आप जीवन मुक्ति के लिये ध्यान तकनीकें
इसलिये नहीं करना चाहते हो कि आप स्वयं को गंभीरता से लेते हो। यदि आप यह याद रखें कि आप सपना देख रहे हैं, तब आपका करना या न करना किसी भी प्रकार से किसी चीज को नहीं बदलता है। तब आप विश्राम में होंगे और जीवन घटित होगा। आप जीवन के प्रवाह के साथ होंगे।
अचानक आपकी प्रज्ञा जागृत होगी। आप इस सत्य के प्रति जागरूक होंगे कि सब कुछ आपका प्रक्षेपण है। तब आप वही व्यक्ति नहीं रह जायेंगे क्योंकि आपने सत्य को जान लिया है।
अपनी चेतना को विस्तृत करें-
समयः— 21 मिनट
पहला चरण- 2 मिनट
सीधे बैठिये! अब अपने शरीर की सीमा के पूर्णतः महसूस करें, स्पष्ट उस कमरे को देखें जिसमें आप बैठे हये हैं ।
दूसरी चरण- 5मिनट
अब आंखों को बंद करके कमरे को अपने भीतर अपने एक भाग की तरह महसूस करें। आपका अंत आकाश आपके शरीर की सीमा के पार विस्तुत होकर कमरे को शामिल कर लिया है।
तीसरा चरण – 2मिनट
अपनी आंखें खोलियें बाहर जाइये और अपने आस—पास के इमारतों और वृक्षों को देखिये।
चतुर्थ चरण – 5मिनट
अब आंखों को बंद करें और अपने आपको को सभी
इमारतों और वृक्षों तक फैला हुआ महसूस करें।
पांचवां चरण- 2मिनट
अपनी आंखों को खोले और खुले हुये आसमान को देखें।
छटवीं चरण —5 मिनट
अब आंखों को बंद करें और संपूर्ण आसमान को अपने अंदर महसूस करें।
यह एक बहुत ही शक्तिशाली ध्यान विधि है सभी कुछ और सब को शामिल करने की, आपके एक हिस्से की तरह। यह आपके दैनिक जीवन का हिस्सा बन सकता है।
उदाहरण के लिये कार्य के समय उपयोग में आने वाले उपकरणों को भी अपना ही हिस्सा समझ कर अपनी सजगता का दायरा विस्तुत करिये। अपने काम करने, उसमें काम आने वाले उपकरण में अपने शरीर के दायरे को पूर्ण जागरूकता के साथ उसमें विस्तारित करें। कहें कि आप कम्प्यूटर में काम कर रहें है, आप कुर्सी में बैठे है, कम्प्यूटर टेबल पर हैं। कम्प्यूटर, कुर्सी, मेज और कार्यालय के स्थान को अपने ही हिस्से के रूप में शामिल करें। आंखें बंद कर इन सबको अपने हिस्से के रूप में महसूस करें।
अपने चारों ओर काम करने वाले सहयोगियों, कार्यकर्ताओं और लोगों के समूह को भी अपने में महसूस करिये, आप अपनी स्वयं की चेतना को पूरे समुह की चेतना में फैलता महसुस करिये। अगर आपका पूरा समूह इस ध्यान विधि को करता है. तब व्यक्तिगत अहंकार बड़े ही सुदंर ढंग से आपका पिघल जायेगा।
3. अपने स्रोत को जानिये:
अपने अंदर उठने वाले विचारों को स्रोत को खोजने का प्रयास करिये, और परम स्रोत जो कि अस्तित्व है के प्रतिजागरूक हो जाइये ।
समय:— यहां पर लागू नहीं होता है।
जब आप केवल बैठते हैं, कुछ विचार आने लगते हैं, आप देखिये कहां से विचार उठ रहें है, और शरीर के कौन से अंग पर उस विचार द्वारा गति या अनुभूति हो रही है।
आप देखेंगे कि प्रत्येक विचार आपके शरीर के आंतरिक अंगों पर संवेदन उत्पन्न करते है। आप यह देखने का प्रयत्न करिये कि कौन सा विचार शरीर में क्या संवेदन उत्पन्न करने से संबंधित है। आप अपने आंतरिक अंगों पर होने वाले संवेदना पर ध्यान दीजिये, और अंग के वजह से मस्तिष्क से विचार उत्पन्न हो रहें है। ऐसा आपको प्रत्येक विचार के साथ करना है।
यदि आप इस तकनीक का प्रयोग करते हैं और आपको चौबिस घण्टे के भीतर क्लिक कर पाती है, तो यह तकनीक आपके लिये है, अन्यथा दूसरी तकनीक को अपनायें। यह तकनीक आपको प्रत्यक्ष जीवन मुक्ति का अनुभव दें सकती है।
4. पंख के जैसे अपनी पलकों का स्पर्श करिये
इस शक्तिशाली तकनीक के द्वारा कुण्डलनीशाक्ति (संभावित शक्ति) जागृत होती है, जो कि आपके अंदर पहले से ही है। यह एक सुंदर तकनीक है, जिसके द्वारा
शरीर की संवेदनाशीलता विकसित की जाती हैं ।
समयसीमाः—३० मिनट
अपनी आंखे बंद करे और अपनी तर्जनी उगली से पलकों को कोमलता से छुए जैसे कि पंखों को छू रहे है। उगर आप चाहे तो असली पंख का भी उपयोग कर सकते है। आँख को छूने से पंख मुडना नही चाहिए अगर यह मुड जाता है तो मतलब कि आपने आखों पर अधिक दबाव दिया है। अधिक दबाव इस विधि में काम नही करता है। आपको केवल एक पंख स्पर्श देना है।
यह ऐसा है कि आप
स्पर्श करते हये भी स्पर्श नहीं कर रहे हैं। उसी तरह से अपनी अगुली से अपनी आंखों को दबाये नहीं। अपने हाथ को संतुलित करें। और अपनी तर्जनी उंगली से आंख के कपोलों को स्पर्श करें। हो सकता है कि शुरू में आपका हाथ हिल—डुल सकता है। हो सकता है बहुत तेज या बहुत हलके से स्पर्श करें। या तो आप आंख के कपोलों को छ ही नही पा रहे है।
जब आप अपनी आंख को पंख के जैसे
Part 5: Living Enlightenment (Gospel of THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM) - Abridged Edition_Hindi_part_5.md
जीवन-मुक्ति
जीवन मुक्ति के लिये ध्यान तकनीकें
छूने में सफल हो जायेगे। तब आप देखें कि यह ऐसा है कि आपकी अंगुलियां पलकों पर है पर उन्हें दबा नहीं रही हैं। अपने हाथों को सही संतुलित रखते हुये, तर्जनी से पलकों का स्पर्श करें। आपके हाथ शुरू में कांप सकते हैं और आप बहुत भारी या हल्के से छू सकते हैं, या आप अपनी पलकों को बिल्कुल भी नहीं छू रहे हैं। आपकी उंगलियाँ और आंखों के मध्य एक मजबूत ऊर्जा संबंध स्थापित हो जाती है। धीरे—धीरे आप महसूस करेगें की आपकी ऊंगली और हाथ आपकी आंखों का हिस्सा हैं।
अब जब आप आंखें बंद करते है, तो आप महसूस करेंगे कि आपकी सीमा पलकों के भीतर खत्म होती है। लेकिन पंख स्पर्श के साथ आपकी आंखे विस्तृत महसूस करेंगी कि यदि आपने सही दबाव दिया है तो तब ही आपको यह अनुभव प्राप्त होगा आपकी आंखें वही संवेदनशीलता बाहर अनुभव करेंगी जो आप भीतर करते हैं।
जब एक बार आप इस तकनीक को गहनता से करना, प्रारम्भ कर देगें, तब आप देखेगें कि उर्जा आपके अंदर वृत्ताकार घूम रही है। बजाये आंखों के द्वारा बाहर निकलने के जैसा सामान्य रूप से आप महसूस करते है। जब आप नेत्र बंद कर लेते है, तो ब्राहृय दृश्य बंद हो जाते हैं और बाहर जाती हई ऊर्जा भी रूक जाती है। किन्तु तब भी आपके अंदर कुछ दृश्य चलते रहेगें उस वजह से भी ऊर्जा लगातार नष्ट होती रहेगी। जब आप ब्राह्मय और अंदर के दृश्य देखना बंद कर देगे तभी जीवन मुक्ति संभव होगी।
यह तकनीक आधा घंटा संतुलन के लिये लेती हैं। इस तरह लगभग एक माह तक रोज अभ्यास करने से आप पंख स्पर्श विधि में संतुलन प्राप्त कर लेगें।
सक्रिय ध्यानः—
-
- आनन्द नृत्यू- अपने भीतर की आत्याधिक उर्जा के साथ पुनः जीवंतता प्राप्त करें। अपने भीतर गहरी शांति के साथ विश्राम करें।
स म य स ी मा : — 31मिनट
म् क्त नृत्य का अर्थ है बिना किसी निर्धारित चरणों या नियमों को नृत्य करना। शरीर जैसी गति करना चाहे वैसी, करने देना, खेलपूर्ण आनंदित होते हये और र शक्तिशाली उर्जा का
हिस्सा बनते हुये। बिना पूर्व नियोजित तरीके से नृत्य करना, जैसा आप चाहे वैसा गति परिवर्तन को होने देना है। अपने आपको खेलते हुये आनन्द उठाते हुये, व नृत्य करते हुये, आश्चर्यजनक ऊर्जा का एक हिस्सा बनना है।
मुक्त नृत्य के दो आयाम हैं, नृत्य और विश्राम:
- समय सीमा—21मिनट
अपनी आंखें बंद करें और नृत्य करना प्रारंभ करें। आप नुत्य के कदमों की चिंता न करें। आपका शरीर जैसी गति करना चाहे उसे करने दें। आप कैसे दिखते है, आपके कपड़े केसे दिखते हैं,
इस बात की चिंता न करें। आपकों कोई नहीं देख रहा है, और न ही आप कोई मंच कार्यक्रम कर रहे हैं ।
जैसे आप इस तरह से लगातार नृत्य करते रहे अधिक से अधिक ऊर्जा आपके अंदर से निकलेगी, और आप नाचते ही जाओगे। जितना अधिक आप नृत्य करेगें उतना ही अधिक ऊर्जावान आप होगें। आप बिल्कुल भी थकावट का अनुभव नही करेंगें। आप नृत्य में और गहरे जाते जाइये, जितना तेज गति से आप नृत्य कर सकते हैं करिये, जितना उन्मुक्त आप नृत्य कर सकते हैं, और उतना करें, अपने आपको पूर्णतः भूल जाये और सिर्फ नृत्य बन जायें।
प्रथम चरण : समयसीमा—10मिनट
21मिनट के नृत्य के उपरांत आप जहां कहीं भी हैं, जैसी भी रिथति में हैं, उसी जगह जमीन पर गिर जायें। बिल्कुल शांत और स्थिर।
क्योंकि आप एक गतिक क्रिया के बाद अचानक स्थिर हो जाते हैं, तो आप शून्यता का क्षण महस्स्स करेंगें। आपके अंदर कोई विचार नहीं होगा, किन्तु गहरी शांति का अनुभव होगा।
कुछ क्षणों बाद पुनः विचार आना शुरू हो जायेगें। आप शांतिपूर्वक विचारों को देखते रहें उनसे लड़े नहीं, उनमें खो न जाएं, सिर्फ जागरूक रहें। आप अपने भीतर को शांति के प्रति जागरूक होंगे, ऐसी महान शांति जो विचारों के लौटने पर भी बनी रहती है। दिन भर इस शांति और मौन को लिये रहें। अपनी निद्रां में भी मौन को ले जाए। आप नये अहसास और ताजेपन से उठेंगे। जो पुन: विचार के आने पर भी कायम रहेगी। आप पूरे दिन शांति और चुप्पी को अपने अंदर पायेगें, और इस चुप्पी को अपनी नींद में भी पायेगें, और दूसरे दिन भी स्वयं को तरोताजा पायेगें।
द्वितीय चरण : एक ही जगह पर घूमना
आपके अंदर के अचलित भाग को खोजिये और संपूर्ण प्रकृति से एकाकार कर लीजिये।
समयसीमा—21मिनट
अपने अपने को प्राकृतिक रूप से केन्द्रित करने की बहुत ही सुदंर ध्यान क्रियाविधि ।
ध्यान करने के तीन घण्टे पूर्व कुछ न खाये न पियें ।
इस ध्यान के दो आयाम हैं, एक ही जगह पर
घूमना तथा आराम।
धूमाव
सामान्यतः घड़ी के कांटों की दिशा के विपरीत घूमना होता है। दायी भुजा ऊंची हथेली उपर, और बायीं भुजा नीचे, हथेली नीचे की ओर एक स्थान पर घूमना। आप घड़ी की दिशा में या विपरीत दिशा में भी कर सकते हैं। अपने दाहिने हाथ को ऊपर उठाइये, और हथेली को ऊपर की ओर रखें और बांये हाथ को नीचे की ओर रखें,
जीवन-मुक्ति
जीवन-मुक्ति
जीवन मृत्ति के लिये ध्यान तकनीकें
और हथेली नीचे की ओर रहें।
अगर आप घडी की विपरीत दिशा में घुमने में असमर्थ होते हैं, तो घडी की दिशा में भी घुम सकते हैं।
11 11:1
पहले धीरे—धीरे घूमना शुरू करें अपने पूरे शरीर को मुलायम और प्रतिरोध रहित बना लें। जब आप एक स्थान पर घूमना प्रारम्भ करेगें तो सामने से गूजरती हुई चित्र धुधंले दिखना महसूस होगें और आप ऐसा ही होने दीजिये अपने आपके किसी भी चीज पर केन्द्रित होने का प्रयास न करने दें। नहीं तो आप चक्कर या उल्टी जैसा लगेगा।
धीरे-धीरे गति को बढ़ायें क्रिया और गति वृत्त की परिधि में होंगी। आप एक वृत्त की परिधि में ही गति और क्रिया को महसूस करेगें। किन्तु केन्द्र में आप स्थिरता को महसूस करेगें। आप अपने को घूमने का साक्षी देखेंगे।
आराम-
जब आप एक बहुत ही तेज गति से घूम रहे होंगे तब आप रिश्वर नहीं रह पायेगें, और आपका शरीर अपने आप ही जमीन पर गिर जायेगा। आप स्वयं गिरने की तैयारी न करें।
गिरने के बाद जितनी जल्दी हो सके आप पेट के बल लेट जायें जिससे कि आपकी नाभि पृथ्वी के संपर्क में रहें, यह पूरी पृथ्वी ही आपका शरीर हो गया है ऐसा महसूस करें। अपनी आंखें बंद रखे व उसी अवस्था में रहें (निष्क्रिय) व शांत लगभग 15 मिनट।
इस ध्यान विधि के उपरांत कुछ घंटों तक मौन और ध्यानस्थ रहें।
श्वांस से संबंधित तकनीकें -
आती व जाती इन श्वांसों लगातार देखना एक बहुत ही शक्तिशाली व प्रभावशाली ध्यान क्रियाविधि है इस विधि द्वारा बहुत लोगों की जीवन मुक्ति मिली है, अन्य किसी विधि की अपेक्षा।, अपने श्वांसों को देखना सजगता में आत्याधिक वृद्धि करता है। जैसे सजगता बढ़ती है, भीतरी जागरण घटित होता है और आनंद प्रवाहित होता है।
1. आने वाली और बाहर जाने वाली सांसों को और उनके बीच के अंतराल के प्रति सजगता।
समय सीमाः 35मिनट
पूर्णतः विश्रामपूर्ण स्थिति में रीढ़ सीधी रखकर बैठे, अपने शरीर को तनावरहित रहने दें।
चरण 1. समय सीमाः 5मिनट
अपनी सांसों को देखना शुरू करें सांसों के साक्षी रहें। सांसों की लम्बाई को घटाये या बढ़ाये नही सहज श्वांसों का आना जाना देखते रहें या उनके साक्षी बने रहें।
चरण 2. समय सीमाः 5मिनट
अब सिर्फ अन्दर जाती हुई सांसों को देखें बाहर जाने वाली सांस पर ध्यान न दे अन्दर जाने वाली सांस को महसूस करें।
चरण 3. समय सीमाः 5मिनट
अब बाहर जाने वाली सांसों को देखे अन्दर आने वाली सांसों पर ध्यान न दे बाहर जाने वाली सांस पर पूरी सजगता रखे।
चरण 4. समय सीमाः 5मिनट
अब सभी चीजों को छोड दें सांसों के बीच के अन्तराल को देखें। श्वांस कब लौटती है इस पर सजगता रखें। आती हुई श्वांस और जाती हुई श्वांस के अन्तराल के प्रति सजग होईये।
चरण 5. समय सीमाः 5मिनट
अब आती हुई श्वांस, जाती हुई श्वांस और उनके बीच का अन्तराल तीनों प्रति सजग होईये। महसूस करिये कि आपका सम्पूर्ण शरीर पुनः नया और जीवित है आप एक मौन में हैं जो जीवित और उर्जावान है। आप उच्च उर्जा के साथ स्पंदित हैं।
चरण 6. समय सीमा : 5मिनट
अब अन्दर आने वाली सांस और बाहर जाने वाली सांस के अन्तराल के साक्षी हो। अन्तराल के प्रति सजग हों, आप महसूस करेगें कि आप सांस नही ले रहे हैं। आप इस अनुभव के भी साक्षी हों।
चरण 7. समय सीमाः 5मिनट
अपनी आखें बन्द करे और आराम से रहे और कोई ध्यान नही सिर्फ विश्राम में रहे किसी भी चीज को सक्रियता से न सोचें अपना मन को शान्त होने दें उच्च ऊर्जा क्षेत्र से धीरे धीरे बाहर आये ओर विश्राम में रहे पांच मिनट बाद अपनी आखें बहुत धीरे से खोले ।
2. विपश्यना
विपश्यना का अर्थ है चरणबद्ध तरीके से सत्य को जानना। यहां तीन तरीके बताये गये हैं जिनसे आप विपश्यना कर सकते हैं।
समय सीमाः किसी भी समय कही भी
जब आप चलते हैं अपने हाथों को गति देते हैं जब आप मुस्कुराते है तो इन सबको पूर्ण सजगता से करें। अच्छी तरह से जाने कि यह आप हैं जो वह कर्म कर रहे हैं। एक भी क्षण या गति असजग स्थिति नहीं गुजरनी चाहिये। आप की जानकारी के बगैर शरीर के अन्दर एक भी क्रिया नही होनी चाहिए। अपने शरीर के साथ-साथ हद्रय और मन को देखें अपने हद्रय से उठने वाली भावनाओं के प्रति सजग रहे, अपने मन में आने जाने वाले विचारों पर सजगता रखें। कोई राय न रखें, कोई आकंलन न करें। साक्षी भाव से रहे।
अपनी सांसों को देखें
समयसीमाः किसी भी समय कहीं पर भी
श्वांस लेते और छोड़ते हुये अपने पेट को उठता व अंदर होता हुये देखें। नाभि जो आपकी जीवन उर्जा का स्त्रोत है वह पेट के ही क्षेत्र में ही है। इसलिये जब आप नाभि पर अवधान देते है तब आप अपने शरीर में उर्जा के प्रवाह के प्रति सजग होते हैं। आप जितनी अधिक सजगता अपने पेट पर रखेगें आप अपने हदय और मस्तिष्क को उतना ही शांत होता महसूस करेगें।
अपनी श्वांस को देखिये जहां पर वह नासापुटों द्वारा आपके शरीर में प्रवेश करती है—
समयसीमा- किसी भी समय कोई भी जगह
अपने नासापुटों पर ठंडी हवा के प्रति सजग हों, महसूस करें कि किस आसानी से श्वांस नासापुटों के भीतर और बाहर जाती है।
जीवन-मुक्ति
जीवन मुक्ति के लिये ध्यान तकनीकें
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विपासना का अभ्यास बैठकर और चलते हये दोनो प्रकार से किया जा सकता हैं ।
बैठकर—
समय सीमा— 60 मिनट
एक आरामदायक स्थित पर बैठ जाये
आपकी रीढ़ और सिर एक सीध मे रहे। अपनी आंखें बंद रखें और सामान्य रूप से श्वांस लें व अपने शरीर की स्थिति को न बदलते हुये रिश्थर बैठें ।
श्वांस भीतर और बाहर छोड़ते हुये अपने पेट को उठते और नीचे होते हये देखें अपनी श्वांस पर एकाग्र न होकर बस चुपचाप उसे देखते रहें। यदि आप अन्य विचार, भाव या शरीरिक संवेदना पाते हैं उन्हें होने दें। क्षण भर के लिये उनके साक्षी होकर पुनःश्वांस को देखें।
यह महत्वपूर्ण देखने की प्रक्रिया है न कि आप क्या देख रहें। सभी चीजों के साक्षी हों। इसे पैतालिस मिनट तक करें और फिर 15 मिनट के लिये विश्राम करें ।
चलते हये—
स म य सी मा –
यहां पर आपको पूरी सजगता अपने पैरो पर रखनी है। जैसे ही वे जमीन को स्पर्श करते हैं। इस ध्यान विधि का प्रयोग आप एक वुत्त में या सीधी रेखा में पन्द्रह कदम आगे पीछे चलकर कर सकते हैं। इस विधि का प्रयोग एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते हये सरलता से या फिर अपने बगीचे में कर सकते हैं।
आपकी आंखे नीचे आपके पैर के पास केन्द्रित होनी चाहिये जैसे कि पहले प्रयोग में बैठे हये आपने अपने पेट को देखा है। उसी तरह अब यहां अपने पैर के द्वारा जमीन पर होते सम्पर्क को देखना और उसके प्रति सजग होना है। अगर कोई विचार आता है, या कोई संवेदना होती है तो उसको होने दीजिये यह आपको बाधा पहुंचाने के लिये नहीं है। जब आप विचार और संवेदना को देख लें तो पुनः अपने पैरों की ओर ध्यान से देखने
लगे ।
इस प्रक्रिया को 20मिनट तक करे और
जीवन-मुक्ति
जीवन-मुक्ति
जीवन मृक्ति के लिये ध्यान तकनीकें
10मिनट तक आराम करे।
अचानक रूक जाना-1.
यह एक बहुत ही शक्तिशाली विधि है जिसके द्वारा आपकी सजगता वर्तमान क्षण में तुरंत आ जाती है।
समयावधि- किसी भी समय किसी भी जगह-
अचानक रूकना, इस विधि का प्रयोग आत्मज्ञानी सद्गुरू जार्ज गुरजिएफ द्वारा बहुत किया गया था।
जैसे ही आप में कुछ आवेग हो रूके! आपकी चालाकी भी एक आवेग है, यह आपके जीवित रहने का एक आवेग है, आप सोचते है कि आप तभी बच सकते है जब आप चालक हो और लगभग सुरक्षा में रहे अब चालाकी छोड़िये और निर्दोष और विश्वास पात्र बनिये।
दूसरे चरण में जब भी कोई आवेग जैसे कि भूख, प्यास, क्रोध, छींक या कोई अन्य उत्पन्न हों, जैसे ही घटने को हों या जैसे ही आप करने को हो, बस रूक जायें करने के क्षेत्र से अपने होने की और गति कर जाएँ।
लगातार अपने आपको कर्जायुक्त एवं जीवन्त बनायें
समयाविधि—10मिनट — पूरी लंबाई के दर्पण के सामने खड़े होकर स्वयं को देखें, बाहर से स्वयं को अच्छी तरह देखें आप देखने वाले हैं और दर्पण में प्रतिबिंब आपके अवधान का विषय है। आप स्वयं की उर्जा को प्रतिबिंब की ओर बहता करेंगे। आप देख रहे हैं और आपका प्रतिबिंब देखा जा रहा है।
कल्पना करे कि दोनों भूमिकाओं की अदला—बदली हो गई है। कल्पना करे कि प्रतिबिम्ब आपको देख रहा है, यह पहले तो डरावना लगेगा। आप अपने प्रतिबिम्ब के बारे में ऐसा सोचने के आदी नहीं है। आपको भी देखने वाला कोई है।
यदि यह अनुभव आपको अजीव और डरावना लगता हैं, तो भी इसे जारी रखें। कुछ ही क्षणों में आप एक बड़ा परिवर्तन अनुभव करेगें कि प्रतिबिम्ब से उर्जा आपकी ओर आ रही है व आपने परिपथ पूरा कर दिया है उर्जा परिपथ पूरा होने पर उर्जा व्यर्थ न होकर आप पर ही लोट रही है। आप अपनी स्वयं की उर्जा का संरक्षण अपने लिये कर रहे हैं।
कुछ दिनों तक इस तकनीक का अभ्यास करें आप निश्चित बदलाव का अनुभव करेगें। आप देखेंगे कि आप अधिक जर्जावान अधिक केन्द्रित और दूसरों और स्वयं के साथ अधिक शांत रहेगें।
आप दिन भर इसका अभ्यास कर सकते हैं, केवल दर्पण और प्रतिबंब पर ही नही बल्कि जिस किसी व्यक्ति या वस्तु पर अवधान कोन्द्रित करके, जब आप अपनी ऊर्जा उस की ओर पहुंचा चुके हों तो कल्पना करें कि ऊर्जा आपकी ओर वापस लौट रही है। यदि वह कोई निर्जीव वस्तु है तो भी फर्क नहीं, आप महसूस करेगें कि ऊर्जा वापस आपकी और वह रही है, आपको पुनः युवा और सजीव करती हुई। यौवन लौटाती हुई, आप इसे अपने कम्प्यूटर पर सारे दिन कार्य करते हुये भी कर सकते हैं।
जीवन मुक्ति के लिये ध्यान तकनीकें
3. अंगों को शिथिल करना—
यह तत्काल विश्राम पाने की तीव्रतम विधि है। समयाविधि— कम से कम 2मिनट अथवा जितना आप कर सकते है।
यदि कोई निजी स्थान उपलब्ध हो तो इस तकनीक का अभ्यास लेटकर करें, अन्यथा अपने को जितना संभव हो उतना विश्राम में ले आयें ।
आंखें बंद करें-
एक गहरी सांस भीतर भरें। आप अपनी सांस रोकने जा रहें है। इसलिये जितनी ग्रहरी सांस
स अपने ो क क र रके अपने शरीर के अंगों को जकडना ना प्रारंभ करें।
ो से प्रारंभ करे, पंजों को जितना तनाव को ढीला न करें। पैरों से ऊपर की ओर नों से होते हये घुटने और फिर नितम्ब रें। जैसे ही आप उपर अंगों को तनाव हैं. नीचे के अंगों को ढीला न करें।
अब कमर से होते हये पेट तक जायें। पेट की मांसपेशियों को जितनी मजबूती के साथ संभंव तनाव दें। अपने आप ही मांसपेशियां तन जायेंगी।
ऊपर की ओर छाती और पीठ तक आये।
जीवन-मुक्ति
पीट के साथ रीढ की हड़डी के खण्ड को भी तनाव दें हाथों को ताने-ऊंगलियों से लेकर भुजा के उपरी भाग तक। कंधें, गरदन और गले की मांसपेशियों को ताने। विशेष रूप से कोशिश करे कि गरदन की मांसपेशियों पर खिंचाव बना रहे।
चेहरे तक जायें— आपके चेहरे पर इतनी मांसपेशियां है कि इसकी जानकारी आपको भी नहीं है. मख नथुना, आंखें, भौंहें, माथा, और गाल की मांसपेशियां को ताने। पलकों को दबाकर बंद करे। दांतों को मरोडे। चेहरे को एक सख्त गेंद की तरह कस दें। याद रखे इस अवधि के दौरान अपने बाकी शरीर को शिथिल नहीं करना है।
तनाव की इस अवस्था में आप जितना देर
तक रह सकते हैं रहें। जब अपनी सांस को और नहीं रोक पायेगें तो एकाएक जोर से उसे निकाल दें। साथ ही साथ हाथ, पैर और चेहरे को पूरी तरह से विश्राम की स्थित में ले जायें इस शारीरिक और मानसिक विश्राम की रिश्यति में एक मिनट तक रहें।
यह तकनीक शरीर और दिमाग दोनों को विश्राम देता है और दो मिनट में आपको ताजा कर देता है। यदि आपके पास समय हो तो इस प्रक्रिया को 3 बार दोहरायें।
जीवन-मुक्ति
आपका मन ही वहां सफल होता है इसलिये आगे और आगे सोचते जाए जो आप सोच सकते हैं, यदि आप यह सोच रहे हैं कि आप क्या नहीं सोच सकते है, इसे भी छोड़ दें। मन हर चीज को समझ कर अपने भंडार में रख देगा, ताकि वह इसे धीरे धीरे खा कर बैल की तरह जुगाली कर सकें। इसलिये जो चीजें आप समझ चुके हैं। उसे अपने मन में न लाये और उसे लगातार छोड़ते जाएं।
आपने अपने जीवन में अंतिम या परे जो कुछ भी सोचा है छोड़ दें। इससे और कुछ बड़ी चीज के लिये अपनी सोच का विस्तार करिये तब फिर तम्हारा मन स्वतः कुछ और समझेगा। लेकिन उस विचार को भी अपने मन द्वारा न पकड़े, छोड़ें। लगातार तुम्हारा मन कहेगा, यदि हर क्षण में छोड़ रहा हूँ तो मेरा क्या होगा? यह कहां खत्म होगा? और अपने आप को बड़ा बनाकर देखें। उस समय मन पुनः कुछ विचार एकत्रित करना शुरू कर देगा उसको रोकें। जब यह आप लगातार करते रहेगें तो तब आपका मन कहेगा की अगर हर क्षण छोड़ता जाउंगा तो मेरा क्या होगा?
इस समाप्ति की चिंता न करें तुम्हारा मन यह कह कर कुछ समझने का प्रयत्न करेगा। तुम्हारा मन परिणाम को सिद्ध करने के लिये कह रहा है, प्रयोग को प्रारंभ करने के पहले ही इसे यह अनुमति न दो। यहीं पर तुम धोखा खाते हो। लगातार प्रत्येक सीमा प्रत्येक विचार, को छोड़ते जाओ और परे जाकर विस्तृत हो जाओ।
उसके खत्म हो जाने के बारे में आप परेशान मत होइये, आपके मन इस प्रक्रिया के द्वारा कुछ एकत्र करने की कोशिश कर रहा है, बस आपका मन इस बात को जानना चाहता है कि इस
जीवन मृक्ति के लिये ध्यान तकनीकें
4. प्रत्यक्ष ज्ञान के पार मनन करना-
अमन के आनंद का अनुभव
समयाविधि— 10 मिनट
जिस क्षण में किसी वस्तु का ज्ञान होता है, जिस क्षण आप उसके बारे में सोचने में समर्थ होते हैं, यह अतीत बन जाता है।
उदाहरण के लिये शुरूआत में यदि आपको किसी ऐसी चीज के बारे में सोचने के लिये कहा जाय, जो आपके समझ से बाहर है, तो आप सौर मण्डल के बारें में
सोच सकते हैं। परन्तु जिस क्षण आप पूरे सौर मण्डल के बारे में सोचते हैं, आपने उसे एक और विचार बना दिया हैं । हो ता इसलिये अब उसे छोड़ दें, अब उ स के पार सोचने का प्रयत्न
करें। आप, सौर मण्डल से परे आकाश गंगा के बारे में सोच सकते हैं, इस विचार को भी छोड़ें। आकाश गंगा के परे जाएं। जब आप अपने मन को परे जाने के लिये विस्तार देत हैं, आप वर्तमान क्षण में होते हैं ।
समझिये, जिस क्षण किसी चीज को आप समझते हैं आपने इसे अतीत (अपनी जानकारी) बना दिया होता है।
प्रक्रिया का परिणाम क्या होगा? जब कि अभी प्रक्रिया शुरू भी नही हुई है। आप ऐसा नही होने दें। आप अपने आप को इस धोखे में न आने दें। लगातार आप इन परिस्थितीयों को छोड़ते है। प्रत्येक विचार और अपने को विस्तारित करते रहें और आगे जाते रहें।
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वास्तविक गुरू पर ध्यान करें, या वास्तविक ब्रम्हाड या वास्तविक भगवान पर आप सोच सकते है कि आपने भगवान के सार को समझ लिया है, लेकिन यह नहीं हो सकता, क्योंकि आपका मन कभी भी वास्तविक भगवान को नहीं समझ सकता। यदि आपका मन भगवान को समझ सकता है इसका अर्थ हुआ कि आपका मन भगवान से महान है। इसलिये आपने जो समझा है वह भगवान नहीं है वह केवल आपके भगवान का विचार है। इस विचार को छोड़े और फिर प्रयत्न करें इससे भी बड़ी चीज को समझें लगातार अंतिम सत्य को समझने का प्रयत्न करें। समझिए जब आप एक विशेष विचार अपने मन से फेंक देते है तब न केवल आप विचार फेंकते है बल्कि आप अपने मन से हड़डी की संरचना का एक भाग उठाते है, और उसे फेंकते हैं। हर एक समय जब आप कुछ विचार अपने मन से फेकतें है तब न केवल विचार छोड़े जाते है बल्कि हड़डी की एक संरचना का एक भाग भी फेंक कर हटा दिया जाता है। इस प्रकार फेंक कर हटाने और हटाने से अंततः वहां कोई भी हड़डी की संरचना नहीं बचेगी। अचानक आप देखेंगे कि आपका सारा मन फेंक दिया जा चुका है। और आप अमन के आनंद का अनुभव करेगें।
ध्वनि — (अपने भीतर सभी ध्वनियों को केन्द्र को पाइयें और सब ध्वनियों के पार होइये)
- ध्वनि के तूफान का केन्द्र -
मौन बिन्दु – यह सुनने वाला ध्यान है, सुनने वाला यह ध्यान निष्क्रिय ध्यान है आपको सुनने के अलावा और कुछ नहीं करना है, परन्तु केवल सुनने से ही बहुत कुछ घट सकता है।
हम हमेशा ध्वनि के तूफान में जीते है ध्वनि लगातार हमारी और आ रही है, हमें कुचल रहीं है, हमें निगल रही है, परन्तु तूफान के मध्य एक खामोशी होती है, जिसे हमनें नहीं सुना है। यह ध्यान विधि हमें ध्वनि के तुफान के केन्द्र में उपस्थित मौन के प्रति सजग कराता है।
निर्देश
किसी स्थान पर बैठ जाये इतना शोरगुल युक्त स्थान हो उतना ही उपयुक्त है, ऐसे ही स्थान की तलाश करें जहां लगातार आवाज होती हो, या प्राकृतिक आवाज भी हो सकती है जैसे नदी का बहाव, जैसे झरना या समुद्र तट से लहरों का टकराना रेलवे स्टेशन या बाजार।
खामोशी से बैठें। हर दिशा से लहरों की भांति अपनी ओर आती हुई ध्वनियों को सुनें जब हर दिशा से ध्वनि आपकी ओर आने लगेगी तो अपने आपको ध्वनि के तूफान के केन्द्र में महसूस करें। आप केन्द्र में है ध्वनियां आपकी ओर बह रही हैं ।
स्पष्ट महसूस करें कि केन्द्र में जहां आप हैं वहां पर कोई ध्वनि नहीं है, केन्द्र में पूर्ण खामोशी है। यदि केन्द्र बिन्दू में भी ध्वनि होती है तो आप बाहर की ध्वनियां को नहीं सुन सकते है। ध्वनियां आपके भीतर प्रवेश कर रही है, आपको भेद रही है, पर वह केन्द्र में जाकर रूक जाती है।
आपके भीतर एक ऐसा बिन्दु है जहां सब ध्वनिया रूक जाती है, यह वह बिन्दू है जहां से सब ध्वनियां सुनाई देती है, उस केन्द्र का पता करने का प्रयत्न करें।
जब अचानक आप उस केन्द्र का पता लगा लेगें, आपकी सजगता बाहरी दुनियों के संसार से भीतर की ओर मुड़ जायेगी।
आप उस केन्द्र में होगें जहां पर खामोशी है एक बिन्दू जहां ध्वनि प्रवेश नहीं कर सकता। वह बिन्दु आपका केन्द्र है। एक बार खामोशी को सुन लेगें तो कभी भी ध्वनि से आपको बाधा नहीं होगी। ध्वनि आपको प्रभावित नहीं कर पायेगी।
हम हमेशा सोचते है कि ध्वनियां हम कानो से सुनते है परन्तु विधि से हम जान पाते हैं कि न हम कानों से सुनते है न ही मस्तिष्क से हम नाभि बिन्दु से सुनते है। ध्वनि सदैव नाभि बिन्दु से सुनी जाती है। यही ध्वनि का केन्द्र है।
गानों पर आप इस तकनीकी का प्रयोग नहीं कर सकते है क्योंकि उसके शब्दों का अर्थ होता है और आप अर्थ पर केन्द्रित हो जायेंगे। इसलिये सिर्फ शोर की आवश्यकता है।
1. प्रकाश का कमल स्तंभ -
अपने भीतर बुद्धिमत्ता, उर्जा और जीवन मुक्ति को जागृत होने दीजिये।
समय सीमा — 21 मिनट
अपने मेरूदण्ड को मानसिक रूप से महसूस करें।
ताकि आप इसका ध्यान विधि में सही तरीके से मनोचित्रण कर सकें।
रीढ़ के मध्य में एक पतले धागे की तरह उर्जा के प्रवाह और उसी को हम सुषुम्ना नाड़ी कहते हैं। इसका अवलोकन करें ताकि सुषुम्ना नाड़ी का मनोचित्रण करने में आसानी हो। यह रीढ़ के आधार से लेकर शीर्ष तक जाती है। और हमारे शरीर के सात जीवंत उर्जा केन्द्रों से गुजरती है जिसे चक्र कहते है। इड़ा नाड़ी एक दूसरे पतले धागे की तरह सुषुम्ना नाड़ी के बायीं ओर आरंभ और अंत होती है और पिंगला नाड़ी एक तीसरे पतले धागे की तरह सुषुम्ना नाड़ी के दायी ओर आरंभ और अंत होती है। इड़ा और पिंगला नाड़ी सुषम्ना को घेरे प्रत्येक उर्जा केन्द्रों में काटती हुयी ये तीनों, भौंओं के मध्य में मिलती है।
जब कभी भी आपकी उजी बुद्धि द्वारा अवशोषित होती है तो इड़ा नाड़ी सक्रिय होती है और तब आपके शरीर की सूक्ष्म ऊर्जा ऊपर की ओर प्रवाहित होती है, और जब ऊर्जा काम केन्द्र से ग्रसित होती है तब पिंगला नाड़ी सक्रिय होती है। और उर्जा अधोगामी होती है। जब जीवनमुक्ति का आप में सक्रिय होती है तब मध्य नाड़ी सुषुम्ना नाड़ी सक्रिय होती है, और विवेक जागृत होता है।
आपके सभी ज्ञान से संबंधित विचार उर्जा को ऊपर की ओर ले जाते है सुखों की चाह वाले, और आराम वाले विचार उर्जा को नीचे की ओर ले जाते है, अब आप अपनी उर्जा की सुषुम्ना में प्रवेश करवा दीजिये जिससे जीवन मुक्ति या विवेक जागृत होगा।
सीधे बैठिये और अपनी आंखे बंद कर लें।
. जीवन मुक्ति के लिये ध्यान तकनीकें
अपनी रीढ़ को सीधा रखें मनोचित्रण करें कि आपकी रीढ़ कमल के धागे के समान है एक पतला धागा जो रीढ़ के आधार से सिर के शीर्ष सहस्त्रसार क्षेत्र तक है मनोचित्रण करें प्रकाश का पतला धागा रीढ के मध्य में रीढ़ के आधार से शीर्ष तक जा रहा है। अपना अवधान इस प्रकाश के धागे पर रखें बस उर्जा को मुलाधार से सहस्त्रसार तक संषम्ना नाडी द्वारा प्रवाहित होता देखें अपनी पूरी सजगता सुषुम्ना नाडी पर कोन्द्रित करें।
इस विधि को 21 मिनट तक लगातार 10 दिनों के लिये करें 10 दिनों के बाद आप अपने अंदर एक उर्जा, विवेक और जीवन मुक्ति को जागृत होता महसूस करेगें।
2. आकाशीय सम्पर्क
अपनी चेतनता को विस्तृत कर भावनाओं पर विजय पाइयें।
समयावधि : 21 मिनट
मनोचित्रण करें कि आप प्रकाश का विशाल शरीर हैं। ऐसा भी मनोचित्रण करें कि आपके सभी भावनात्मक संबंध जो कि आप से लगाव रखते है, और जो आपसे लगाव नहीं रखते है वो सभी आपके प्रकाश शरीर के हिस्से है यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे देश में रहता है तब आप अपने प्रकाश शरीर को इतना विस्तृत कर लीजिये कि वह देश और व्यक्ति आपके शरीर के प्रकाश के अंदर समा जायें ।
आपके सभी प्रेम युक्त व घुणायुक्त संबंध आपके अपने आकाशीय शरीर के भीतर आने दीजिये।
दसरी बात, अपने आकाशीय शरीर के
जीवन-मुक्ति
मनोचित्रण के साथ अपने केन्द्र की सजगता को भी जोड दें। इस मनोचित्रण को दस दिनों तक करते रहें ।
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नित्य आध्यात्मिक उपचार:
नित्य आध्यात्मिक उपचार एक वरदान है जो मुझे मेरे परमज्ञान के साथ मिला, जो मैं आप तक पहुँचाता हूँ। यह कोई ध्यान कार्यक्रम नहीं है। यह एक दीक्षा है जो कोई गुरू आपको देता है। दीक्षा आपको सुष्टि की ऊर्जा की लय पर लाती है और आपको उपचार की ऊर्जा देती है।
उपचार क्या है?
परमज्ञानी गुरू महात्मा बुद्ध ने उपचार शब्द के लिए एक अति सुंदर व्याख्या या परिभाषा दी थी। उन्होंने कहा था उपचार दूसरे के प्रति उनके स्वास्थ्य को पुनः स्थापित करने के हमारी करूणा हमारे देखभाल करने का तरीका है।
उपचार और कुछ नहीं बल्कि एक व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को पुनः स्थापित करना है।
स्वास्थ्यः
अच्छा स्वास्थ्य केवल बीमारी का न होना
नहीं है। यह आराम की उपस्थिति, एक स्वस्थ होने के बोध है। हम वो मनुष्य हैं जो बीमार पडते हैं और फिर ठीक हो जाते हैं। हम आनंद के प्रारूप हैं। हमारा (सुजन) हर समय चेतना स्तर पर आनंदपूर्वक अनुभव के साथ जीने के लिए हुआ है। यही उचित स्वास्थ्य का अर्थ है।
उपचार का विज्ञान और चक्र :
पतंजलि एक परमज्ञानी गुरू और योग के पिता के अनुसार सात मुख्य चक्रें हैं या हमारे शरीर के सुक्ष्म ऊर्जा केन्द्र हैं।
ये सात ऊर्जा केंद्र हमारे शारीरिक, मानसिक और चेतना स्तर के क्रियाकलापों को प्रभावित करते हैं। वो हमारे अंदर अभौतिक स्तर पर रहते हैं और हमारे भौतिक शरीर के सात मुख्य ग्रंथियों से जुड़े होते हैं। वे प्रबल रूप से अपने अनुरूप शारीरिक ग्रंथियों को प्रभावित करते हैं। जब कभी हमारे चक्र प्रभावित होते हैं तो हमारे शरीर में बीमारियां होती हैं। अगर हमारा शरीर और मस्तिष्क एक दूसरे के साथ आराम की रिथति में है, तभी हम स्वस्थ होने के आराम का अनुभव करते हैं। अगर हमारा शरीर मेधा है। यद्यपि वह ब्रहमांडीय ऊर्जा का अकसर ही विद्युतीय करंट के साथ तुलना किया जाता है, किंतु यह सर्वथा भिन्न है उससे। यह कभी कुछ गलत नहीं कर सकती क्योंकि इसके पास अपनी स्वतंत्र मेधा होती है।
कौन ऊर्जा (ग्रहण) प्राप्त कर सकता है? वही व्यक्ति जो खुले मन और हृदय का है:
कौन ऊर्जा ग्रहण कर सकता है? कोई भी जो जरूरत में है वह ऊर्जा ग्रहण कर सकता है। यह किसी रूप में प्रतिबंधित नहीं है। किंतु कुछ सलाह है जो किसी व्यक्ति को एक ऊर्जा ग्रहण करने में मदद करती है। खुले मन, हृदय, का व्यक्ति उस व्यक्ति से ज्यादा आसानी से ऊर्जा ग्रहण करता है और ज्यादा तेजी से जो अपने तर्को के द्वारा उस ऊर्जा पर प्रश्न उठाते हैं।
इन परिकल्पनाओं को समझने की कोशिश करें और इसमें पूरी निष्ठा के साथ प्रवेश करें। बस वह साहस और खुलापन रखें प्रयोग करने का। प्रयोग से पहले ही उसके अनुभव का साक्ष्य न मांगे। अपने विचारों, मेधा, भावनाओं और आत्मा को एक करें और उसे उस परिकल्पना की ओर जोड़ें।
नित्य आध्यात्मिक उपचारकर्त्ता की दीक्षाः
नित्य आध्यात्मिक उपचार की दीक्षा सीधे परमज्ञान से जुडी हुआ है। दुसरे का उपचार करना बस एक अन्य प्रभाव है या उस प्रक्रिया का बस एक द्वितीयक उत्पाद। उसका मुख्य प्रभाव है कि जब आप एक उपचार का रूप में सेवा देते हैं तो वास्तव में आप अपने व्यक्तित्व के सबसे गहरे स्तर के संपर्क में होते हैं।
जब आप एक और मन एक दूसरे उपचार का रूप में के साथ आराम की सेवा देते हैं तो स्थिति में नहीं है, हमें आराम—हीनता वास्तव में आप अपने का अनुभव होता है। व्यक्तित्व के सबसे हमारे अंदर आराम गहरे स्तर के संपर्क या आरामहीनता की में होते हैं। स्थिति को ये चक्र में दर्शाते हैं।
शरीर के ऊपर मन :
यह शरीर हार्डवेयर की तरह है और मस्तिष्क सॉफ़टवेयर की तरह। हम हार्डवेयर को टीक करने की कोशिश करते हैं कि जब कि सॉफ़टवेयर जो उस रोग का कारण है वह खराब हो जाता है। इसीलिए यह सतत हार्डवेयर (शरीर) को गलत निर्देश देता है। कृपया इसे समझिए यह हमारी मानसिक (संरचना) है जो मूल कारण है रोगों का और हमारे शरीर–मन संरचना में असंतुलन का ।
नित्य आध्यात्मिक उपचार क्या है?
नित्य आध्यात्मिक उपचार ब्रहमांडीय ऊर्जा के द्वारा उपचार करना है। ब्रह्मांडीय ऊर्जा उन सभी ऊर्जाओं जैसे कि विद्युतीय ऊर्जा आदि से भिन्न है। विद्युतीय ऊर्जा के पास अपनी मेधा नहीं होती है। अगर आप किसी प्रकाश के बल्व को एक विद्युत सॉकेट में डालते हैं तो विद्युत प्रवाहित होगी और बल्ब जलेगा। अगर आप अपनी ऊंगली को उस सॉकेट में डालते हैं तो वही विद्युत प्रवाहित होगी किंतु आपको विद्युत आघात लगेगा! उस विद्युत में वह मेधा नहीं है कि वह प्रवाहित होने के साथ क्या करें। किंतु ब्रह्मांडीय ऊर्जा एक शुद्ध
नित्य आध्यात्मिक उपचारक की दीक्षा में, गुरू आनंद गंध चक्र ऊर्जा के द्वार को खोलता हैं ।
आनंद गंध चक्र:
आनंद गंध चक्र हमारे अंदर एक ऊर्जा केंद्र है जहां हमारे सातों चक्र, हमारे सातों ऊर्जा शरीर, और हमारे पाँच कोशाएँ सभी खत्म हो जाती हैं। यह हमारी सारी ऊर्जाओं का स्रोत हैं, और सार्वभौमिक ब्रहमांडीय ऊर्जा के साथ सीधे संबंध है। आनंद गंध भौतिक शरीर में नहीं होता है। इसका एक पराभौतिक महत्व है।
जब कोई व्यक्ति परमज्ञान चेतना सहित किसी उपचारक को दीक्षित करता है, वह आनंद गंध चक्र के द्वार को खोलता है, जिससे कि वहां हर पल दैविक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। जब आप आनंद गंध में होते हैं, आप परमज्ञानी हैं क्योंकि आप ब्रहमांडीय ऊर्जा के साथ एक हैं।
गुरू आनंद गंध में रहते हैं। जब हम आनंद गंध में होते हैं तो उसी ऊर्जा स्रोत के साथ संबंध स्थापित होता है। इसीलिए उपचारीय ऊर्जा नया जीवन, नयी ऊर्जा दे पाता है और हमारे रोगों का उपचार करता है।
आनंद गंध ध्यान के कुछ फायदे:
जब आप नित्य आनंद गंध ध्यान करते हैं, सतत्, तो कोई भी बाह्य संसार का आपको भीतर से हिला नहीं सकता है। इसके बावजूद कि आपने चारो ओर सब कुछ असफल हो रहा है, तो भी आप स्थिर और मजबूत रहेंगे। आप जल्द ही उस अवस्था में पहुँच जाऐंगे जहां यह ध्यान आपकी स्वभाविक व्यक्तिगत नित्य आध्यात्मिक अवस्था हो जाएगा। उपचारक की दीक्षा आप आनंद गंध की में, गुरू आनंद गंध अवरथा में सदा रहेंगे। चक्र ऊर्जा के द्वार यह ध्यान आपको को खोलता है। देता है:
सत्: सभी चीजों में स्पष्टता
आपमें स्पष्टता होगी क्योंकि आप चीजों को वस्तुनिष्ठ रूप में देख पाऐंगे बिना लोभ और भय से संचालित हये।
चितः चेतना
आप जो कुछ भी करेंगे उसमें उत्साह रहेगा। आपका रोम रोम, कोशिका कोशिका ऊर्जा और उत्साह प्रकट करेगी। आप बस बिना थकान अनुभव किये एक के बाद दूसरा निर्णय लेंगे और सबसे महत्वपूर्ण, उसी उत्साह और मेध के साथ।
आनंदः अकारण ही आनंद
आप आनंदित रहेंगे, बाह्य संसार में चाहे जो हो।
आनंद गंध में सदा रहने से, आप सदा न सिर्फ अच्छे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में होंगे बल्कि आपमें बाह्य संसार में जो हो रहा है उसको संभालने की स्पष्टता होगी।
नित्य आध्यात्मिक उपचार (टू इन वन) (एक में दो) विधि है। उपचारक के रूप में, आप आनंद का अनुभव करेंगे और व्यक्ति जो उपचार पा रहा है वह टीक हो जाएगा। इसीलिए यह परम विधि है ।
जीवन-मुक्ति
नित्य आध्यात्मिक उपचार-आप भी उपचार कर सकते हैं
नित्य आध्यात्मिक उपचार को स्वास्थ लाभः
- विभिन्न शारीरिक व्याधियों जैसे कैंसर, पुराना दमा, डाइबिटिज (मधुमेह), हर्निया, उच्च रक्तचाप,
| उपचारक के रूपमें, आप आनंदका अनुभव करेंगेउपचार पा रहाहै वह वह ठीक हो | समस्या, एलर्जी, माइग्रेनव्हीजिंग, चर्मरोग, अनिद्राआदि से मुक्ति।और व्यक्ति जो 2. मनोरोग की समस्याजैसे—चिंता, अवसाद,डर आदि से मुक्ति। |
| जाएगा | |
| जलना, दर्द, मोड़ आदि |
में शीघ्र उपचार।
- स्त्री रोग विषयों, बांझपन आदि का निदान।
से वाएँ:
नित्य आध्यात्मिक उपचार एक सेवा है जो निःशुल्क संपूर्ण संसार में हजारों उपचार केंद्रों पर दी जा रही है, इसके साथ निःशुल्क उपचार कैम्पों का नियमित आयोजन किया जाता है।
यह विलक्षण ब्रहमांडीय उपचार एक ध्यान है उपचारक के लिए और उपचार है जो ऊर्जा प्राप्त करते हैं, इस सुरक्षा के साथ कि इसका कोई क्रप्रभाव नहीं है।
Appendix:
THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM और ध्यान और उपचार पर शोधः
परमहंस नित्यानंद cutting edge शोध
प्रयोगों के विषय रहे हैं जिसमें यह समझने का प्रयास किया गया था कि उनके मस्तिष्क में क्या हुआ था जब वे ध्यान करते थे। उसका उददेश्य था यह समझना, मापना, और रहस्यों को उजागर करना जो परमज्ञानी चेतना के साथ उस रहस्यमय प्रक्रिया में होती है। अनुभवी चिकित्सक, मनोविश्लेषक, और जिन थोर्पे रिहैबिलीटेशन केन्द्र (सेंटर), न्यरोसॉकोलोजी डिपार्टमेंट (विभाग) के शोधकर्त्ता. और ओकलाहोमा Pet centre , USA ने इस शोध को किया ।
Pet Scan अध्ययनः
पोजीट्रॉन एमीशन (विकिरण) टोमोग्राफी (PET) शारीरिक संरचनात्मक रूप से क्रियाशील मस्तिष्क के चित्र का किसी नियत समय में संपूर्ण प्रारूप रूप परिचित्रित करती है। THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM के PET परिचित्र (Scan) से दिखाया कि उनके मस्तिष्क का अग्र (Frontal lobes) खास रूप से उभरा हुआ था, ध्यान के प्रारंभिक अवस्था में। क्रिया कलापों का स्तर किसी भी समरूप अवरथा औसत मानवीय मस्तिष्क से कई गुणा ज्यादा था। अग्र lobes मेधा के कार्य, सतर्कता ध्यान, बुद्धि और निर्णय से जुडे होते हैं ।
उन्होंने THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM के मस्तिष्क का अध्ययन तब किया जब वह सबसे गहन ध्यान अवस्था में थे। दो और खास चीज पता चला। पहला मस्तिष्क का प्रभावी प्रभाव लगभग 90 प्रतिशत बंद था। दूसरा, उनके medial अग्र प्रमाण निचला क्षेत्र बहत ही महत्वपूर्ण रूप से जग गया था। यह (क्षेत्र) प्रभाग खासकर के रहस्यमय तीसरे 'नेत्र' से जुडा होता है।
नित्य आध्यात्मिक उपचार-आप भी उपचार कर सकते हैं
Qeeg अध्ययनः
क्वानटेटिव इलेक्ट्रो इनसेफे लोग्राफी या QEEG मरितिष्क में विद्युतीय पैटर्न को मापता है, पैटर्न जिन्हें सामान्यतः मस्तिष्क तरंगें कहा जाता है। यह पैटर्न सामान्यतः मस्तिष्कीय तरंगों की विभिन्न बैंडडिथ है, प्रत्येक की आवृति अलग है, और प्रत्येक मस्तिष्क के अलग अलग अवस्थाओं से जूडा है। जैसे कि बीटा मस्तिष्कीय तरंग छोटे और तेज है और मस्तिष्क की जागत, सतर्क अवस्था से जडा है। अल्फा मस्तिष्कीय तरंग धीमा है और बड़ा है और वह स्वास्थ्य बोध से जुड़ा हुआ है। थीटा तरंगे चेतना की वह अवस्था है जो नींद के करीब हैं, एक ऐसी स्थिति जहाँ निर्विचार शांत अवस्था है। वह अवस्था जहां शांति का बोध, क्रियाशील विचार नहीं होते हैं।
THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM के QEEG से हम देख सकते हैं कि उनकी अपनी मस्तिष्कीय तरंगों पर पूर्ण नियंत्रण है। जब वे गहरा ध्यान में होते हैं, तो उनका मस्तिष्क आराम से एक अवस्था से दूसरे अवस्था में चला जाता है, जैसे कि कोई योग्य पियानोवादक अपनी लय के साथ हो।
नित्य आध्यात्मिक उपचार
जब वे दुसरे व्यक्ति को उपचार दे रहे थे तो THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM के मस्तिष्कीय तरंगों के प्रारूप, हृदय गति के (HRV) के दर प्रारूपों, और (SCL) चर्म व्यवहार स्तर पर शोध किया गया। अध्ययनों ने शक्ति स्पेक्ट्रम में परिवर्तन दर्शाया जिसने THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM के ह्रदय की ऊर्जा से मेल खाता हुआ हल्का उभार दिखाया, यह इंगित करता है कि विषय (व्यक्ति) जीवन-मुक्ति
के हृदय की लय उपचार सत्र के दौरान THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM की हदय, लय, के समान, थी।
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यह सम्पूर्ण अस्तित्व एक जीवंत सत्ता है, जो आपके हर शब्द भावना एवं प्रार्थना का प्रत्युत्तर देता है हर क्षण यह आपके चेतना के प्रतिदायित्वपूर्ण भाव से पेश आता है, जिस तरह से आप सुन सकें, देख सकें और समझ सकें। यह समय समय पर आत्मज्ञानी गुरु का रुप लेकर होता है। विश्व के हजारों जिज्ञासूओं की प्रार्थना, आत्याधिक रिवंचाव पैदा करती है जिससे आत्मज्ञानी गूरु को धरती पुष्ठ पर आना पड़ता है, जिस प्रकार से कम दबाव का क्षेत्र या निर्वात के कारण तूफान का आ जाता है।
यह पूरा ब्रम्हाण्ड स्वयं को प्रत्येक शब्द, चाहत व प्रार्थना के द्वारा प्रतिसंवेदित करता है। हर क्षण यह आपकी चेतना को, आप कैसे देखते है, कैसे सुनते है, कैसे समझते है, इसको बताने के लिये समय समय पर प्रबुद्ध गुरू का रूप लेता हैं। विश्व में करोड़ों लोगों की खोज और प्रार्थना एक खिंचाव उत्पन्न करती है जिससे प्रबुद्ध गुरू को धरती पर आना पड़ता है।
जिस प्रकार से कम दबाव का क्षेत्र या निर्वात के कारण तुफान आ जाता है।
एक गूरू का दर्शन का मतलब इस अस्तित्व रूपी समुद्र में कोई बहुत बड़ी तरंग उठ रही है। यह तरंग अपने स्रोत से जुड़ी हुई है। लेकिन आश्चर्यजनक ऊर्जा उसके साथ होती है। नदियां भी समुद्र से जुड़ी रहती है लेकिन उनमें समुद्र की तरंग की जितनी गतिज ऊर्जा नहीं होती, वह शांत होती है, जब कि यह आनंद दर्शन एक गतिज तरंग है जो अस्तित्व रूपी समुद्र में आनंदपूर्वक उठती है जिससे आपके अंदर एक मंथन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। जिससे कि आपके अंदर रूपान्तरण आता है।
अब आप ऐसा चित्रण करें कि उस तरंग में कुछ बालू के कण भी है, क्या उनको अशुद्धता कहेगें? नहीं! यह पूर्ण रूप से शुद्ध है, क्योंकि यह उस गतिज ऊर्जा के अंदर है। इसी प्रकार जब आप दर्शन के लिये जाते है तब आपका अंतर व बाह्य एकदम साफ हो जाता है, जो
कि दर्शन के समय अस्तित्व ऊर्जा के स्रोत के साथ रहते है। जिस प्रकार से सूर्य के उदय होने से कमल का फूल खिल उठता है, उसी तरह से गुरू की उपस्थिति में आपकी
चेतना खिलने लगती है। आपको सिर्फ सहायक रहना है दरअसल आप सहायक नहीं रहते है तो भी ऊर्जा आपके अंदर प्रवेश कर जायेगी। यह ऐसे होता है कि जैसे कोई सीप समुद्र की लहरों के लिये सहायक रहता है या सहायक नहीं रहता, लहरें उन दोनों ही अवस्था में इसे ले जाती हैं, यदि आप सहायक है या नहीं है तब भी ऊर्जा आपको घेर ही लेगी और वह आपको वही देगी जो आपको जरूरी है इस प्रकार से जो सीपी तरंग के साथ सहायक भाव से रहेगा वह तरंग के साथ खेलते हुये नृत्य करते हये आनंद के साथ अपने को शुद्ध करते हुये अंत में उसमें खो जाती है वही अगर सीपी यह कहती है कि मैं इतनी आसानी से विश्वास नहीं कर सकता हूँ और कुछ धारणायें बना लेता है और अपने आप को बचाने के लिये सूरक्षित करने के प्रयास में तकलीफ सहती है, लेकिन फिर भी अस्तित्व की वह ऊर्जा रूपी धारा उसको अपनी ओर प्रेम के साथ खींचती रहती है जिससे कि वह भी आनंददायक हो जाये।
इसी प्रकार से जो व्यक्ति अपने आपको आनंदपुर्वक लहर के साथ स्वयं को समर्पित कर देता है उसका जीवन आनंद दर्शन हो जाता है। केवल उन विशेष क्षण में ही नहीं, जब कभी भी आप स्वयं को गुरू के चेतना के साथ जोड़ेगें और आनंद दर्शन को महसूस करेगें। आपको गुरू के नजदीक रहने की आवश्यकता भी नहीं है। अगर आप लगातार उस चेतना में विश्राम करते है तो आपका पुरा जीवन ही एक आनंददर्शन हो जायेगा और जो लोग प्रतिरोध करते है वे जीवन के उन आनंददायक क्षणों का उस ऊर्जा के साथ मिलकर उत्सव नहीं मना पाते। लेकिन अन्ततोगत्वा उनको भी यह सब कुछ मिलना ही है।
दर्शन के दौरान गुरू के द्वारा असाधारण रूप से ऊर्जा बहती है उस बहने वाली ऊर्जा को हम कैसे ग्रहण कर पाते है। अपने आपको एक छोटे से बच्चे के समान बनाकर आइये। एक गहरा समर्पण, पूरी कृतज्ञता के साथ अपने हृदय को पूरी तरह से पिघलाकर बस इतना ही पर्याप्त है। समाज ने प्रार्थना की शक्ति को नष्ट कर दिया है। प्रार्थना में वह ताकत है कि जैसा आप अपने को चाहते है आप पूर्णतया आपने आपको रूपान्तरित कर सकते है।
प्रार्थना क्या है? जब आप कुछ प्राप्त करना चाहते है आपकी इच्छा के साथ, आपकी प्रेरणा व एकाग्रता भी रहती है। उसको ही आपका संकल्प कहते है। कुछ समय में आप महसूस करेगें कि आपकी वह इच्छा पूरी करने के लिये, आपको किसी ऊँची ऊर्जा की मदद चाहिये। जब यह समझ आ जाती है, तब आपका संकल्प प्रार्थना बन जाती है। और आप ऊर्जा से प्रार्थना प्रारंभ कर देते है। मैं उसको पूरा कर सकता हूँ क्योंकि यह मेरा संकल्प है। मुझे इस ऊर्जा का एक आशीर्वाद चाहिये। जो कि मुझसे परे है प्रार्थना जन्म लेती है। इस प्रकार गहन प्रार्थना की मनःस्थिति में आइये।
जब आप अपनी भावनाओं को प्रबुद्ध गुरू के सामने रखेगें तो यह उस तरह से होगा जैसे कि प्रोजेक्टर में कोई फिल्म की स्लाइड लगायी गयी है। जैसा भी उस स्लाइड में होगा वह प्रोजेक्टर वैसा ही उसे पर्दे पर दिखला देगा। इसी तरह से आपकी इच्छाएं जिन्हें पूरा होने की आवश्यकता है आपके अपने और दूसरों के शुभ के लिये वे पूर्ण हो जायेंगी। या तो इच्छा का बीज अंकुरित होगा या जल जायेगा। दोनों ही तरह से आप परितृप्ति का अनुभव करेंगे। जिन इच्छाओं की आपको आवश्यकता नहीं होगी, वे या तो नष्ट हो जायेगी, या आपके दिमाग से ही हट जायेगी।
आप ऐसी बहुत सी इच्छाओं के साथ रहते है जिनको पूरा करना आवश्यक नहीं है। गुरू की ऊर्जा अपने विवेक से इसे संभालती है।
एक छोटी कथा :
एक बार एक थके हुये राहगीर ने पेड़ के नीचे विश्राम करने का निर्णय लिया। यह एक इच्छा परिपूर्ण करने वाला पेड़ था। जब वह आराम कर रहा था तब उसे एक विचार आया कि कितना अच्छा होता कि थोड़ा अच्छा सा खाना भी मिल जाता, दूसरे ही क्षण स्वादिष्ट भोजन आ गया। वह हृदय से बहुत खुश हुआ और भोजन भी कर लिया।
अपना मन पसंद भोजन से संतुष्ट होने के बाद उसको विचार आया कि कितना अच्छा होता कि एक आरामदायक बिस्तर मिल गया होता। बिना समय गवायें उसके सामने राजा के आकार का पूर्ण आरामदायक बिस्तर आ गया। वह आश्चर्यचकित हुआ और वह उस पर लेट गया। जैसे ही उसके सिर ने तकिये को छुआ उसको पुनः विचार आया कि कोई उसको सोते समय पंखा कर दें। तभी अचानक एक लड़की आई जो पंखा लिये थे वह पंखा करने लगी। अचानक उसके मन में विचार आया कि मैं इस जंगल के बीच में हँ, कहीं से कोई शेर न आ जाये। जैसे ही यह विचार उसके अंदर आया तभी शेर उसके सामने आ गया और उसको दबोच कर खा गया।
इसी प्रकार अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने से पहले आप में इच्छाओं के लिये स्पष्टता होनी चाहिये। जब आप गरु के सामने अपनी इच्छा बोलते है तब आप इच्छा, स्वतः स्पष्टता पा लेगी। इसलिये मैं कल्पतरू कार्यक्रम में मैं आपको इच्छा को बोलने के लिये कहता हूँ। जब आप बोलेगें तब मैं समझ जाऊँगा कि आपकी कौन सी इच्छा पूरी करने लायक है और कौन सी नहीं। यह व्यक्त उर्जा की बुद्धिमत्ता है।
यह कल्पतरूदर्शन आपके अंदर जिन बीजों को बोता है, वे हैं-
शक्ति - जिन चीजों को बदलने की आवश्यकता है उनको बदलने के लिये शक्ति।
कह देते है जो इसको अराजक एक प्रयास या एक
घटना मानता है उसको भौतिकवादी कह देते हैं। इस पूरे अस्तित्व को आप या तो आश्चर्य के रूप में देखते है या फिर श्राप के रूप में अगर आप इसको अकारण मंगलमय समझते है तब यह एक आश्चर्य है और लगातार आश्चर्य है नहीं तो यह एक श्राप है।
दर्शन के समय आपकी आत्मा जीवन्त हो उठती है और अस्तित्व की ऊर्जा तरंगों के साथ उत्सव मनाती है उस समय जैसे मन गायब ही हो जाता है। दर्शन के समय का पूरा चित्र आपकी चेतना पर पूर्ण असर करता है।
मैं आपको केवल एक चीज कहना चाहगां कि प्रकृति की यह ऊर्जा आपके लिये पिता के धन के समान है इसका आनंद उठाने से चूंकिये मत सिर्फ अस्तित्व को हाँ कहिये और एक बच्चे के समान बनकर इसमें प्रवेश करिये।
जिस प्रकार से आपको पैसा निकालने के लिये भले ही वह आपका अपना बैंक का खाता हो तब भी चेक पर हस्ताक्षर करने पड़ते है उसी तरह से अस्तित्व की ऊर्जा को प्राप्त करने के लिये आपको खुले रहने की आवश्यकता है, बस इतना ही।
ध्यान रखिये केवल सीपी ही बारिश की बूंदों को अपने अंदर धारण करती है और उसको मोती बना देती है जब आप गुरू के सामने खुलते है तो उनका एक शब्द ही पर्याप्त है जिस प्रकार वर्षा का जल सीपी के अंदर प्रवेश करता है तो मोती बनता है, गुरू की उपस्थिति में जो कुछ भी घट रहा हो होने दें कोई तनाव न लें, कोई परेशानी अनुभव न करें, न ही कोई प्रतिक्रिया करें और न ही कुछ पाने की आशा करें जो कुछ हो रहा है होने दें, जिस प्रकार से तैराक, ऊर्जा की धाराओं पर नृत्य करते है उसी तरह से आनंद में बहें।
बद्धि - जिन चीजों को नहीं बदला जा सकता उनके स्वीकार करने की बुद्धिमत्ता।
युक्ति - यह समझ कि जो बदल सकता है, अस्तित्व स्वयं एक सदा परिवर्तित होने वाला स्वप्न है।
भक्ति - आप इन चारों को अपने जीवन में उतारेंगें तब आपकी मुक्ति या स्वतंत्रता का एहसास होगा।
आप अपनी ऊर्जा का उपयोग अपने आपको बदलने में उपयोग करना शुरू कर दीजिये। पहले साधारण चीजों को बदलिये, पहले केवल दो आदतों को ही बदलें पूरे दस के बारे में न सोचे जिसको बदला जा सकता है। पहले उसको बदलें फिर बाद में देखें कि किसको नहीं बदल पा रहे है। तब जो आप नहीं बदल पा रहे हैं, उसे स्वीकार करें जब आप अपनी ऊर्जा को व्यक्त करना शूरू कर देगें तो आपकी बुद्धि जिसे बदला नहीं जा सकता उसे ग्रहण करने की बुद्धि स्वयं प्रवाहित होगी।
बुद्धि उसे स्वीकार करने में है जिस चीज को नहीं बदला जा सकता है। लेकिन जब तक आप उन चीजों को बदलने के लिये ऊर्जा प्रकट नहीं करेगें, जिन्हें की बदला जा सकता है, तब तक जो चीजें बदली न जा सकती है, उन्हें स्वीकार करने की बुद्धिमत्ता आपके पास नहीं होगी। पहले जो बदला जा सकता है, उसे बदलने की कोशिश करें। तब आप देखेंगे कि आप में आत्याधिक क्षमता आ गयी है उसे स्वीकार करने की जिसे नहीं बदला जा सकता।
तीसरा बीज है स्पष्टता आप कितना ही चीजों को बदलें, कैसे और क्या बदलें तब भी सारा संसार स्वयं में एक बदलती हुई वास्तविकता है, एक बदलता हुआ स्वप्न बिना किसी कारण के। यह एक स्वप्न है बिना किसी कारण के लगातार बदलता रहता है। यह अकारण ही बिना कारण के है। आप समझें यह सब अकारण ही घटित होता है क्योंकि यह अकारण है आप इसको कारण रहित मंगलमय ऊर्जा है या तो अकारण मंगलमय ऊर्जा मानता है उसे संत या खोजी
जीवन-मुक्ति
उपचार अनुभवः
उपचारः 1. मुझे हेपेटाइटिस—बी हो गया था और मैं सिरोसिस से पीडित था, एक पुरानी यकृत की बीमारी जिसे सामान्यतः अपरिवर्तनीय माना जाता है। सभी अस्पतालों ने आशा छोड दी थी। मैं छः वर्ष से तरल पदार्थों पर जीवित था और जानता था कि मृत्यू मेरे नजदीक है।
अपने मित्रों के सलाह पर, मैं THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी के पास पहुंचा जो उस समय तमिलनाडु के इरोड में थे जो उनके पास पहुंचता था उसका उपचार करते थे। उन्होंने मुझे थोडा सा दैविक विभृति दिया और कहा कि इसे हर उस चीज में मिला दीजिए जो मैं तीन दिनों तक खाता, पीता हूँ। मैंने उनके निर्देश का पालन किया और फिर तीसरे दिन अपने आप मैंने अनुभव किया मेरा पेट ठीक हो गया। छः वर्षों के लम्बे समय के बाद! अचानक, उनके निर्देशानुसार, मैंने छः वर्ष में पहली बार पुरा मसालेदार खाना खाया। तब से मैं एक स्वस्थ और आनंदपूर्ण जीवन जी रहा हूँ, और सदा दिव्य दैविक गुरू की सेवा करने को तत्पर हूँ।
श्री नित्य सदानंद, THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM पंथ के वरीय स्वामी
- मुझे बताया गया कि मुझे पॉलीसिस्टक (PCOS) ओवेरियन सिण्ड्रॉम हो गया है, जिससे कई हार्मोन समस्याएं हो गयीं। यह अल्ट्रासाउण्ड से पता चला जिसमें दिखाया कि मेरा ओवरीज बडे बड़े शिस्टों से ढक गया है। THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी का एक ध्यान कार्यक्रम में भाग लिया जिस दौरान उन्होंने कहा कि मैं टीक हो जाऊंगा, बिना अपनी बीमारी के बतायें ।
एक महीने बाद, मैंने अनुभव किया मेरा वजन तीस पाउण्ड कम हो गया है, जिससे मैं लम्बे समय से संघर्ष कर रहा था, मेरा वजन लगभग दो सौ पाउण्ड हो गया था और खाने और व्यायाम से भी वह कम नहीं हो रहा था। तभी मैंने अनुभव किया कि कैसे भावनात्मक रूप से मेरा वजन जुडा हुआ था। मैंने अनुभव किया कैसे कोई आदत एक परिपूर्णता की पुकार होती है जिसे हम बाहय रूप से पूरा करने का प्रयास करते हैं किंतु कभी नहीं कर सकते। लगभग एक वर्ष बाद, जब मैं अल्ट्रासाउंड
आनंदपुर्ण सहभागिता
के चेकअप के लिए गया, तो डॉक्टर लोग आश्चर्यचकित थे यह पाकर कि वह सिस्ट पूरी तरह से जा चुका था।
— गेाशनी नांबीयर, ध्यान शिक्षक, ओकलाहा यू0एस0ए0.
- जब मेरे चाचा और चाची हमसे मिलने सिंगापुर आए, तो उन्होंने तीओमन द्वीप, मलेशिया का एक छोटा सा दौरा किया। जब वे घर लौटे तो दोनों बुरी स्थिति में थे। स्पष्टतः उन्हें समुद्र का बुरा अनुभव हुआ था, जिसने उन्हें स्नोरकिलिंग के दौरान लगभग डुबा दिया था। उन्होंने ढेर सारा समुद्र का पानी भी पी लिया था। वे लोग लौटने के बाद भी पूरे संदर्भ की रिशति में थे। मेरे चाचा थरथराने के दौरों से ग्रस्त और उच्च ज्वर से पीड़ित थे।
मैंने उन्हें बस लेट जाने को कहा और आराम करने को कहा और उन्हे नित्य आध्यात्मिक उपचार देने लगा। लगभग दस मिनट के बाद वे गहरी नींद में चले गए। अगली सुबह जब वह उढे वह पूरी तरह से सामान्य थे जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं था।
— श्री नित्यानंद अर्पणा, नित्य आध्यात्मिक उपचारक, मलेशिया
- मेरे एक अमेरिका के मित्र मुझे कह रही थीं कि वह पुराने अवसाद से गुजर रही थीं और बार बार अवसाद के दौरे से गुजर रही थीं। उसे आश्चर्य हुआ कि 'नित्य आध्यात्मिक उपचार' मानसिक समस्याओं पर भी काम करता था। मैंने उसे बताया कि कैसे उपचार ऊर्जा शुद्ध मेधा है और यह सभी स्तर पर कार्य करता है। फिर मैंने उसका 15
मिनट तक उपचार किया। वो मुझे अगले दिन बुलाई यह कहते हुए कि उसने एक गहरी शांति और आराम का अनुभव किया, उपचार के दौरान भी उसके बाद भी और यह कि वह चार वर्षों के बाद उस रात असाधारण रूप से अच्छी नींद में सोई, जब उसके जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना उसकी सारी चिंताओं का स्रोत बन गया था।
—परमेश्वरी, नित्य आध्यात्मिक उपचारक, मिशीगन यू०एस०ए०
- मैं एक कार्यरत गाइनकोलोजिस्ट हूँ। मेरे बहुत से मरीजों को THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM के स्पर्श से असाधारण अनुभव हुये हैं। हाल में मेरे पास एक महिला का मामला है जिसे यक्ष्मा था। उसके गर्भाशय की रेखा काफी पतली हो गयी थी और उसका इंडोमेट्रियम बुरी तरह से उससे ग्रस्त था। हमने बहुत से ईलाज के तरीके अपनाये लेकिन कुछ भी काम नहीं किया। हम (सरोगेट) माता के बारे में सोचने लगे जब मैंने उसे परमहंस जी से उपचार लेने की सलाह दी। वो परमहंस जी के पास उपचार के लिए गई जिन्होनें उसे दैविक संतान का आशीर्वाद दिया। यह एक सचमुच का आश्चर्य था कि वह गर्भधारण कर सकी और उसे सामान्य प्रसव हुआ।
– डॉ० निर्मला, गाइनकोलोजिस्ट, एडवांस्टड फर्टिलिटि सेंटर, बेंगलोर।
ध्यान कार्यक्रम (सत्र) :
- पाँच वर्ष- पूर्व मैं एक फॉर्चन 500 कंपनी में से एक सप्लाई चेन में उपाध्यक्ष था। मुझे 32 वर्ष की आयु में मधुमेह हो गया। मेरे मातृक और पैतृक
पक्षों में मधुमेह का लम्बा इतिहास रहा है। जब मैं परमहंस जी से एक अवसर पर मिला, मैंने उन्हें अपनी समस्याओं के बारे में बताया। लगभग साढे चार साल उसके बाद बीत चुके हैं और आज तक, मेरी चीनी का मात्रा सामान्य है बिना किसी खान पान के परहेज के और रोग के लक्षणों के बिना।
मैंने परमहंस जी के साथ विकसित ध्यान कार्यक्रम किया है। उसमें से एक विधि थी जो बातें जो हमें हमेशा आनंद में रहने से रोकती है उन्हें सदा शब्द रूप देना। हममें से हर कोई उन बातों को शब्द रूप देते थे जहां हमें लगता था कि हम रूक गये हैं जिस पल हम इसे शब्द रूप देते हैं, वह हर चीज जो हमें रोकता था स्वर्ण रसायन नष्ट हो जाती थी। मैं बस इतना कह सकता हूँ कि यहाँ कुछ गहन था जो अभौतिक सतह पर चलता था। ये ऐसा था जैसे परमहंस एक आग जलाते थे और जो कुछ हम शब्द रूप देते थे वह हमारे मंत्र में जल कर राख हो जाते थे, सदा के लिए। अब मुझे लगता है कि मेरे अंदर कोई भावनात्मक उतार चढ़ाव नहीं होता है और मैं जीवन के हर क्षण में अपनी परम क्षमता और आनंद से कार्य करता हूँ। मैं बस इतना कह सकता हूं कि उन्होनें हमारे ऊपर अपनी करूणा और प्रेम की वर्षा की है और हम एक नए रूप में आ गये हैं।
– श्री नित्य सचितानंद, अन्तर्राष्ट्रीय समन्वयक और THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM पंथ के वरीय स्वामी, लॉस एंजल्स, यू०एस०ए०
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प्रयास रहित कार्य कुछ ऐसा था जो मैंने कभी नहीं सोचा था कि संभव है। मैंने परमहंसजी के ध्यान कार्यक्रम के द्वारा सीखा कि कैसे कार्य का आनंद उठाया जाए और स्वतः मैं प्रयास रहित होकर परिणाम देने लगा बहुत सुजनता के साथ और कार्य संतुष्टि के साथ भी। -अपूर्व सेट, मार्केटिंग डायरेक्टर, सिंगापुर
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मेरे अंदर आश्चर्यजनक ऊर्जा स्तर के प्रवाह के साथ मेरा व्यापार कई गुणा बढ़ गया जब से मैंने THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM का स्पर्श मुझे पहली बार हुआ। व्यापारिक निर्णय लेने की मेरी मेधा को एक अलग आराम मिल गया। और मेरे संबंध घर और बाहर बहुत परिपक्व हो गए। मेरा बच्चा THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM गुरूकुल बैंगलोर आश्रम में है और मैं सचमुच देख रही हँ कि वह एक विश्वासी, तेज और परिपूर्ण व्यक्ति को रूप में विकसित हो रहा है।
-चारणप्रिया, व्यापारी, पांडिचेरी,
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आत्म ज्ञान | - स्वयं को जानना। आत्म शरणागति | - आत्मा की शरण या आत्मा को समर्पण। आत्मा | = चेतना | आत्मनो मोक्षथ म् जगत हिताय च - स्वयं की मुक्ति और संसार के कल्याण के लिये यह स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित रामकृष्ण आर्डर का आदर्श वाक्य है। आयुवैद्य | - हिन्दू चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद के चिकित्सक। आर्युवैदिक | - आयुर्वेद से संबंधित पारंपरिक हिन्दू चिकित्सा प्रणाली। | बार दो - शब्दिक अर्थ - दो चीजों के मध्य अंतराल, जैसा कि तिब्बतियों की मृत्यु की पुस्तक में है जिसका संबंध आत्मा के गमन के विभिन्न पहलू से है। बायजीद | नवीं शताब्दी का पारसी सूफी संत भगवद गीता | प्राचीन हिन्दू ग्रंथ, जो संबृद्ध सदगुरू कुष्ण द्वारा दिया गया और जो उपनिषद या ग्रंथों का सारतत्व माना जाता है। भगवान | महान सदगुरूओं के प्रति सम्मानपूर्वक पदवी, शाब्दिक अर्थ है ऐश्वर्य पूर्ण। भगवान महावीर | वर्धमान महावीर चौबीसवें और अंतिम जैन तीर्थकर या संबृद्ध थे, जिन्होंने जैन धर्म का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसे Bharat में स्थापित किया और अब संसार भर में लाखों लोगों द्वारा व्यवहार में लाया जाता है। भागवत | विष्णु के अवतारों में विशेषकर कृष्ण अवतार का वर्णन करने वाला हिन्दू धर्म का प्रमुख महावाक्य। | यह ब्यास द्वारा रचित है जो इतिहास या महाकाव्य महाभारत के भी रचियता है। भजगोविन्दम | संबूद्ध सदगुरू आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 32 (कभी-कभी 34) भक्ति गीतों का संकलन। यह वेदान्त या अद्भैत का सारतत्व माना जाता है। भक्ति | = अनन्य ईश्वर अनुराग भक्ति योगी | वह, व्यक्ति जो भक्ति मार्ग का अनुसरण भक्ति योग साधन करता है, आत्मज्ञान जो प्राप्त करने के लिये नृत्य। Bharat-नाट्यम | दक्षिण हिन्दू शास्त्रीय संगीत
भाव | = आवेग स्थिति,तात्पर्य यहां पाँच भावावेग से है जिनसे शिष्य अपने सद्गुरू से जुड़ता है। भुजंगासन | योग की कोबरा (सर्प) की मुद्रा, जिसमें पेट के बल लेटकर सिर को ऊँचा किया जाता है। विडदी आश्रम | विडदी शहर में THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM का अध्यात्मिक मुख्यालय, बैग लोर से तीस किलोमीटर दूर। बिग बैंग अवस्था | विश्व का ब्रम्हाडीय माडल की उत्पत्ति, अतीत में एक आत्याधिक घनत्व की से आरंभ होकर लगातार अब तक विस्तृत होती अवस्था है। बीज मंत्र | उर्जा दिया गया यंत्र, जो किसी देवता की मूर्ति या सदगुरू विशेष के लिये होता है। बीरबल | मुगल शासक अकबर का सलाहकार ब्लैक होल | काला छिद्र-आकाश में एक सैद्धांतिक क्षेत्र, जहां गुरुत्वाकर्षण अत्याधिक शक्तिशाली होने के कारण उसमें से कोई भी वस्तु, यहां तक कि प्रकाश भी नहीं वापस आ सकता है। बोधि धर्म | बुद्ध का शिष्य जिसने बौद्ध धर्म का प्रसार जैन बौद्ध की भांति किया। ब्रह्मा | ईश्वर की हिन्दु ब्रह्मचारी | एक वैदिक विद्यार्थी, सामान्यतः युवा ब्रह्मचारी साधू के संदर्भ में। ब्रह्मचारिनी | एक स्त्री वैदिक विद्यार्थी सामान्यतः युवा ब्रह्मचारी साधू के संदर्भ में। ब्रह्मज्ञान | परम का ज्ञान ब्रह्म | परम ब्रम्हाडीय चेतना, निराकार ईश्वर आदि, सभी वैश्विक उर्जा के लिये हैं, आत्मा की वैयक्तिक ऊर्जा एक होलोग्राफिक अंश है। ब्रह्म पुराण | 12000 काव्यों का संकलन सामान्यतः अंतिम और अठारहवां हिन्दू पुराण या महाकाव्य। यह पुराण ब्रम्ह द्वारा विश्व की उत्पत्ति की कथा है। बुद्ध | बौद्ध धर्म के संस्थापक और संब्रद्ध सदगूरू ब्रान्द्रद्र | = मेधा बौद्ध | संबृद्ध सदगुरु बुद्ध द्वारा स्थापित धर्म कार्लजुंग | सिगमंड फ्रायड का समकालीन स्वीडन का बीसवी सदी का प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वह अपने कार्य सामूहिक अचेतन के लिये प्रख्यात है।
चैतन्य महाप्रभु | - बंगाल Bharat के 15वीं सदी के कृष्ण भक्त रहस्यवादी संत। जिनके अनुयायी गौडी वैष्णव जाने जाते हैं। चक्र | - शरीर के उर्जा केन्द्र। शाब्दिक अर्थ पहिया, रहस्यवादी संतों के अनुभव के आधार पर जिन्होंने इन ऊर्जा केन्द्रों को ऊर्जा के भंवर के रूप में देखा। रीढ़ में मुख्यतः सात चक्र हैं - मूलाधार स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्त्रार। चक्ष् | देखने की क्षमता के पीछे ऊर्जा। छांदोग्य उपनिषद | = बहुत पुराने उपनिषदों में से एक ग्रंथ। चार्ल्स लीडबीटर | = थ्योसोफिस्ट चिद्मबरम् | दक्षिण Bharat का एक स्थान जो संबृद्ध सदगुरू शिव की नृत्यमुद्रा नटराज को समर्पित अपने प्राचीन मंदिर के लिये विख्यात है और जहां उन्हें आकाश उर्जा की भांति दिखाया गया है। चिनमुद्रा | - हथेलियां ऊपर की ओर, अंगूठा और तर्जनी (अंगूठे के पास वाली उंगली) को मिलाकर वृत्ता बनाना और बाकी तीन अंगुलियां सीधी। चित्त | स्मृति ईसाइयत | जीसस क्राइस्ट के उपदेशों पर आधारित धर्म। क्लीव बैंक स्टर | एक पोलीग्राफ का कुशल व्यक्ति जिसने पौधों को धमकी और स्नेह दिये जाने पर उनके व्यवहार की झूठ जाँचने वाले यंत्र द्वारा अध्ययन किया। | दक्षिणामूर्ति स्वामींगल - दक्षिण Bharat के संबृद्ध सदगुरू दर्श्नन | शब्दतः 'देखना' किसी दिव्य, देवता या सद्गुरू को देखना। दास भाव | = सदगुरू और शिष्य के मध्य पाँच प्रकार के संबंधों में एक संबंध शिष्य का सदगुरू के प्रति सेवक की भावना, दासभाव है। उदाहरण हनुमान का राम से संबंध। दासोहम् | - तात्पर्य मैं सेवक हूँ, सदगुरू के प्रति समर्पण दर्शाता है। दत्तात्रेय | = ब्रम्हा, विष्णु और शिव की हिन्दू त्रिपुटी का एक अवतार में दर्शाना। दीपक चोपड़ा | एक चिकित्सक जो यू.एस.ए. में अध्यात्म के लेखक और शिक्षा देते हैं। बैलेन्स पर उनका कार्य शरीर मन के सम्मिलन से संबंधित है, बेस्ट सेलर रहा है।
देवी | - हिन्दूओं की परम ब्रम्हांडीय माँ। धम्य | संबृद्ध सदगुरू के उपदेश। बुद्ध ने अपने संघ के तीन तत्व (कारक) बताये। बुद्ध सदगुरू, धम्म उनका उपदेश और संघ उनका समुदाय। वम्मणुद | - बुद्ध के उपदेशों की ग्रन्थ। धर्म | बुद्ध द्वारा प्रयुक्त पाली शब्द 'धम्म' का संस्कृत में पर्यायवॉची, जिसका अनुवाद सम्यक व्यवहार है। धर्मो रक्षिति रक्षितः | - वैदिक ग्रंथ का कथन जिसका अर्थ है, धर्म उनकी रक्षा करता है, जो धर्म की रक्षा करते हैं। धौति | - आँतों को स्वच्छ करने के लिये एक यौगिक अभ्यास। धीर | - साहसी व्यक्ति स्वामी विवेकानंद द्वारा उनके अनुयायियों की प्रशंसा में दी गयी पद्धी। ध्यान | सजगता, पातंजलि अष्टांग योग का सातवां अंग डी.एन.ए. | डी ऑक्सी राइबोन्यूक्लिक एसिड, सभी जीवित वाली ईटें प्राणियों का मूल निर्माण करने। डॉ. चार्ल्स टाउनस | - भौतिक शास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता, जिन्होंने मेसर ओर लेसर पर कार्य किया। डॉ. ब्रूस लिप्टन | - आणविक कोष जीव विज्ञानी और (विश्वास का जीव विज्ञान) 'बायलॉजी ऑफ बिलीफ' के लेखक जो उत्पत्ति विषयक शास्त्र और संस्कार के संबंध के बारे में आरंभिक कार्य के लिये विख्यात हैं। डॉ. मसारू इमोटो | जापानी वैज्ञानिक और हिडन मैसेज ऑफ वाटर (पानी के गुप्त संदेश) जिन्होंने किसी के विचार और शब्दों का पानी में प्रभाव दर्शाकर और इस प्रकार जीवित प्राणियों पर इसका प्रभाव बताया। द्रौपदी | महाभारत महाकाव्य की राजकुमारी, जिसका विवाह पांडव परिवार के पाँचों योद्धा भाईयों से हुआ। दुखातीत | दुख दर्द के पार दुख हरण | 'दुख दूर करना' यह THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM लाइफ ब्लिस कार्यक्रम का ध्यान है। यह मूलाधार
उर्जा चक्र से संबंधित है।
दिज | दोबारा पैदा होना, यह चेतना के जागरण के संबंध में है। | इलैक्ट्रोएन्सिफैलोग्राफ - यंत्र जो सिर से इलेक्ट्रोडों को जोड़कर मस्तिष्क तरंगों की क्रियाशीलता का मापन करता है। फ्रायडियन | आस्ट्रियन मनोवैज्ञानिक और आधुनिक मनोचिकित्सा के जन्मदाता सिगमंड फ्रायड के उपदेशों के संदर्भ में गणनाथ | हिन्दू भगवान गणेश गण | = संबृद्ध सदगुरू शिव के भक्त गंगा | = Bharat की पवित्र नदी गायत्री मंत्र | वैदिक परम्परा में बहुत शक्तिशाली माना जाने वाला मंत्र। युवा विद्यार्थियों का दीक्षा मंत्र। | शामान्यतः व्यग्रता, उद्धिग्नता - मन की अवस्था जिसमें लगातार चिंता करने से तनाव की अव्यवस्था थकान उत्पन्न होती है। | | George Gurdjieff - ग्रीस के आरमोनिया का रहस्यवादी और अध्यात्मिक सदगूरू अपने चौथे मार्ग के सिद्धांत के लिये प्रसित्र जो वैदिक परम्परा में तुरीय अवस्था के समान है। ज्ञान | बोध ज्ञानशाक्ति | = बोध की शक्ति ज्ञान योगी | वह व्यक्ति जो आत्मज्ञान हेतु बोध के मार्ग का अनुसरण करता है। सरस्वती देवी | = ज्ञान की देवी गोमुख | गंगा नदी का स्त्रोत गोपियां | स्त्रियां जो गाय की देखरेख करती हैं और संबृद्ध सदगुरू कृष्ण की भक्त हैं। गुरू | = आध्यात्मिक शिक्षक , गुरू ग्रंथ साहिब | = सिख धर्म का ग्रंथ।
गुरुनानक | सिख धर्म के संस्थापक गुरू पूजा | सदगुरू की कर्मकाण्ड पूजा गुरू कुल | वैदिक शिक्षा संस्थान हास्य ध्यान | ध्यान का प्रकार जिसमें हंसा जाता है। हमसा यंत्र | - 'सोहम' मंत्र भी कहा जाता है। श्वांस लेते समय 'हम' का उच्चारण और छोड़ते समय 'सा' का उच्चारण। हनुमान | हिन्दुओं के भगवान बंदर के रूप में और राम के शिष्य। हारा | जापानी परंपरा में आत्मा का निवास। स्वाधिष्ठान चक्र या भय से संबंधित सूक्ष्म उर्जा चक्र का स्थान। हठ योग | - योगी स्वात्माराम द्वारा विकसित योग का प्रकार, जो पातंजलि अष्टांग के भौतिक आयाम पर केन्द्रित है। हिमालय | पर्वतमाला जो हिन्दू प्राय द्वीप को तिब्बती पठार से अलग करती है और माउंट एवरेस्ट, सबसे ऊँचा शिखर जिसमें स्थित है। संस्कृत में अर्थ है बर्फ का मंदिर। हिन्दुत्व | - अधिकांश भारतीयों का धर्म। सनातन धर्म के वैदिक सिद्धांत से विकसित, जिससे अन्य धर्म जैसे कि बौद्ध, जैन और सिख उत्पन्न हुये। होम | अग्नि उर्जा से संबंधित होने का वैदिक कर्मकाण्ड हूकार | 'हू' की ध्वनि जो श्वास छोड़ते समय मुंह से निकाली जाती है। हीम | स्त्री उर्जा से संबंधित बीज मंत्र इच्छा शक्ति | कामना की उर्जा, अन्य दो हैं क्रियाशक्ति, कार्य की उर्जा और ज्ञान शक्ति बोध की उर्जा। इड़ा नाड़ी | इड़ा, तीन मुख्य नाड़ियों में से एक है, शरीर में उर्जा के प्रवाह का मार्ग। मूलाधार (मूल उर्जा चक्र) से उठती इड़ा बायीं नाड़ी है जो नाक के बायें स्वर में जाकर समाप्त होती है यह स्त्रैण, शीतल है और चंद्र को प्रदर्शित करती है। इडली | = दक्षिण हिन्दू व्यंजन, चावल को भाप में पकाकर तैयार किया जता है। आइनक न्यूटन | भौतिक शास्त्री और गणितज्ञ, क्लासिकल भौतिकी के प्रणेता।
| हार्टमेथ का संस्थान - संस्थान जिसमें लाभ नहीं कमाया जाता है और हृदय संबंधित जीवन को बढ़ावा दिया जाता है। ईशावास्या उपनिषद् - प्रमुख और प्राचीन वैदिक ग्रंथों में से एक । ईश्वर | परम जे.कृष्णमूर्ति | - जाने माने हिन्दू संबृद्ध दार्शनिक जगत | = विश्व जैन | जैन धर्म के अनुयायी जैन सूत्र | - जैन धर्म का ग्रंथ, मुख्यतः महावीर के उपदेश जलालुद्दीन रूमी | तेरहवीं सदी का पारसी सूफी कवि जन्ममरण चक्र | - जन्म मरण बार-बार होना। ज्ञप | - मंत्र या पवित्र शब्द को बार-बार दोहराना, धीमे या जोर से जठराग्नि | - भीतरी अग्नि जो जीवन बनाये रखती है। जीव | सामान्यतः अमर आत्मा जो सभी जीवित प्राणियों में रहती है। जीवनमुक्त | वह व्यक्ति जो अपने जीवनकाल में ही जन्म मरण के चक्र से मुक्ति पा लेता है। जीसस क्राइस्ट | - ईसाइयत के संस्थापक जॉन सी मैक्सवेल | नेतृत्व के विशेषज्ञ और लेखक जॉन गार्डनर | - 'नेतृत्व' घर आधारित पुस्तकों के लेखक जूलियट | = अंग्रेजी कवि सेक्सपियर के नाटक 'रोमियो और जूलियट' का प्रमुख स्त्री पात्र। जुनेद | नवीं शताब्दी का सूफी सदगुरू कारण शरीर | - कारण पर्त, हमारे भीतर पाँचवी उर्जा की परत, गहरी निद्रा से संबंधित। संस्कारित स्मृतियाँ और संस्कार का स्त्रोत। कबीर | Bharat के रहस्यवादी भक्ति कवि। कल्पतरू दर्शन | = THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM का ध्यान दर्शन कार्यक्रम। कमडल | = हिन्दू साधुओं द्वारा लिया जाने वाला पानी का पात्र।
कफ या बलगम | आर्युवेद में शरीर के तीन दोषों में से एक। जल और पृथ्वी तत्वों से संबंधित उर्जा। कफ संरचना और चिकिनाहट है। कापल वस्तु | राज्य जहां संबृद्ध सदगुरू बुद्ध का जन्म हुआ। कर्म निश्चित | वैदिक मान्यता कि किसी की स्वतंत्र इच्छा से किया गया कार्य नियति को करता है। कर्मबंध | - कार्य से बंधा कोई व्यक्ति क्योंकि वे कार्य न्यस्त स्वार्थों के द्वारा किये जाते हैं। कर्म युक्त | कार्य से बंधा न होना क्योंकि वे बिना मोह के किये जाते हैं। कर्म योग | = आत्म ज्ञान का मार्ग जिसमें कोई अपनी जिम्मेदारी बिना मोह के करता है। कार्मिक | - कर्म के संदर्भ में करूर | - दक्षिण Bharat के रहस्यवादी संत जिनके अस्थीअवशेषों पर तनभुर का मंदिर बना हुआ माना जाता है। कठोपनिषद | मुख्य उपनिषद या ग्रंथों में एक, जिसमें हिन्दुओं के मृत्यु के भगवान यम और युवक नचिकेता का संवाद है। कायाकल्प | - आयूर्वेद (परम्परागत हिन्दू चिकित्सा पद्धति) की शरीर को युवा बनाने और बुढ़ापा रोकने की तकनीक। कीर्तन | भक्ति गीत खलिल जिब्रान | बीसवीं सदी के लेवनानी अमरीकी कवि, अपनी रचना 'द प्रोफेट' के लिये जाने जाते हैं। राजा हरिश्चन्द्र | - एैतिहासिक हिन्दू राजा जो किसी भी कीमत पर अपने वचन पालन के लिये विख्यात हैं। राजा जनक | राजधानी मिथिला के राज्य विदेह के हिन्दू राजा जो अपनी, आध्यमिकता के लिये जाने जाते है। | किरलियन फोटोग्राफी - ऊँचे विभव का फोटो ग्राम जो जीवित व्यक्तियों का आभा मंण्डल दर्ज करता है। कोंगानावर | = हिन्दू संत और बोगर का शिष्य जिनके अमर अवशेष पर, तिरूपति मंदिर बना हुआ माना गया है।
| कोष | = | भौतिक शरीर के गिर्द पाँच ऊर्जा के स्तर जिनका विस्तार से वर्णन वैदिक ग्रंथ तैतरीय उपनिषद में किया गया है। |
|---|---|---|
| कुष्ण | भारत के संबृद्ध सदगुरू जिन्होंने भगवद गीता के सत्य को दिया। | |
| किया | कार्य | |
| क्रियाशक्ति | कार्य की उर्जा, अन्य दो उर्जाएँ है - कामना या उर्जा और ज्ञान की उर्जा। | |
| क्षण | दो विचारों के मध्य अन्तराल। | |
| क्रूचला | संबृद्ध सदगुरू कृष्ण के बचपन का मित्र जो सदगुरू और शिष्य के बीच मित्रता का उदाहरण है। | |
| कुलारनव तंत्र | = | प्राचीन साहित्य जिसके लेखक संबृद्ध सदगुरू शिव कहे जाते हैं। |
| कुंभ मेला | तीन वर्ष में एक बार भारत में चार स्थलों प्रयाग, उज्जैन, हरिद्वार और नासिक में से किसी एक में पवित्र नदियों के किनारे लगने वाला लोगों का आध्यात्मिक जम घट। | |
| कुंडलिनी शक्ति | = | असामान्य संभाव्य उर्जा जो प्रत्येक मनुष्य शरीर में छिपी है। यदि इसे जागृत किया जाय, तो यह चेतना या अस्तित्व के भिन्न भिन्न तलों में आपको ले जायेगी। |
| कुंती | हिन्दू ग्रंथ महाभारत में, पाँच पाण्डव भाईयों की माता। | |
| लाया | बौद्ध साधु | |
| लीला | दिव्य खेल, विशेष रूप से कृष्ण का | |
| राम | हिन्दू ग्रंथ रामायण में अयोध्या के राज्य का राजकुमार। | |
| मधुरभाव | सदगुरू और शिष्य के बीच प्रेम संबंध। | |
| मध्यपंथ | 'मध्यम मार्ग' संबृद्ध सदगुरू बुद्ध द्वारा प्रस्तावित किया गया। यह साक्षी की शक्ति को दर्शाता है जो किसी को भी भावना की अतियों के धक्के और खिंचाव के बिना मध्य में ठहराता है। | |
| मदुराई | । | दक्षिण भारत का मंदिरों का शहर। एक मुख्य तीर्थ मीनाक्षी और उनके प्रिय सुंदरेश्वर जो संबूद्ध सदगुरू शिव के रूप है का मंदिर है। |
| महाभाव | । | सदगुरू शिष्य संबंध की परम अभिव्यक्ति, सभी साधारण संबंधों के पार। |
| महाभारत | = | हिन्दू इतिहास या ग्रंथ जिसके केन्द्रीय पात्र पाँच पांडव राजकुमार, उनके सौ चचेरे भाई और संबृद्ध सदगुरू कृष्ण हैं। |
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| महाकाश | = | अनन्त के पार तीसरा आकाश |
| महामंत्रा | = | हमिंग ध्यान (भौंर की आवाज जैसी गुंजार) जो अनाहत चक्र को उर्जावान करती है, नित्यानंद लाइफ प्रोग्राम में इसे सिखाया जाता है। |
| महर्षि महेश योगी - | बीसवीं सदी के हिन्दू आध्यात्मिक शिक्षक और भावातीत ध्यान (टी.ए.) के प्रोत्साहक। | |
| महावाक्य | = | उपनिषद् के महान कथन। ये चार हैं, अह्य ब्रहास्मि, तत् त्वंअसि, अयं आत्मा ब्रम्हा और प्रज्ञानम् ब्रम्हा। सभी का तात्पर्य है कि आप दिव्य हैं। |
| महावीर | = | वर्धमान महावीर चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर या संबृद्ध थे और भारत में जैन धर्म के मत को प्रतिष्ठित और स्थापित किया, जो अब विश्व भर में लाखों लोगों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। |
| ममकार | = | भीतरी अहंकार जो सदा कहती है, आप जो अपने बारे में सोचते हैं उससे कम हैं। |
| मनस | = | मन |
| मनस शरीर | = | उर्जा की मानसिक पर्त |
| मणिकवास | = | तिरसठ नयनमार में एक, तमिलनाडु में, संबुद्ध सदगुरू शिव के भक्त। |
| मनोमय कोष | = | उर्जा के पाँच कोसों में से तीसरा मानसिक उर्जा का कोषा |
| मंत्र | = | शाब्दिक अर्थ ''वह जो मार्ग दिखाता है''। पवित्र शब्द जिनके कंपन का प्रभाव शक्तिशाली सकारात्मक होता है। |
| मार | " | बुद्ध परम्परा में (बुराई का देवता) शैतान। |
| मासलो | = | अमरीकी मनोवैज्ञानिक जो आवश्यकता की श्रेणी की पाँच पर्तो की धारणा के लिये प्रसिद्ध है। |
| मातृभाव | = | सदगुरू शिष्य के संदर्भ में बच्चे का माँ से संबंध। |
| माया | = | शाब्दिक अर्थ ''जो नहीं है'' यह धारणा कि जीवन एक सपना है, चाहे यह अनुभव करते समय कितना भी वास्तविक क्यों न लगे। |
| मीनाक्षी | = | दक्षिण भारत में मदुराई में देवी, उन्हें संत कहा जाता है, जिनके अमर अवशेषों पर मंदिर बना है। |
| मीराबाई | चित्तौड़ की राजकुमारी, कृष्ण की भक्त, रहस्यवादी कवियित्री और गायिका। कृष्ण की भक्ति के कारण उसके पति ने उससे बुरा व्यवहार किया था। | |
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| मिलारेपा | तिब्बतीयोगी और तिब्बती बौद्ध मारपा के शिष्य। | |
| मिथ्या | अनित्य, नित्य का विरोधी शब्द जिसका अर्थ है शाशवत | |
| मिथ्यानंद | जो अनित्य खुशी को दर्शाता है और उसकी शिक्षा देता है। | |
| मोक्ष | आत्मज्ञान द्वारा मुक्ति। | |
| मृत्युजय | मृत्यु पर विजय का मंत्र। | |
| मुद्रा | योग का अभ्यास करते समय हाथों को किसी आकृति में बनाना, विशेषकर ध्यान में उर्जा को शरीर में वितरित और शरीर के भीतर ही बना रहने दिया जाये। | |
| मुक्ति | आत्मज्ञान के द्वारा स्वतंत्रता | |
| मूलाधार चक्र | = | रीढ़ के निचले भाग है उर्जा का सूक्ष्म केन्द्र, लोभ और वासना से संबंधित। |
| मुरुगनार | = | संबृद्ध सदगुरू रमण महर्षि का शिष्य और तमिल कवि जिन्होंने रमण के लिये बहुत काव्यों की रचना की। |
| नमः | ''मैं नहीं हूँ'' या मैं समर्पण करता हूँ, अधिकांश हिन्दुओं के कर्मकाण्ड में उपयुक्त मंत्र के अंत में आता है। | |
| नालंदा | बौद्धों का एक महान शिक्षण केन्द्र, जो भारत में बिहार में है इसमें विश्वविद्यालय और पुस्तकालय है। | |
| नमस्कार | स्वागत करने की हिन्दु प्रथा, अर्थ मैं तुम्हारे सामने झुकता हूँ। | |
| नमो | पूजा, सदगुरूओं और देवताओं के संदर्भ में, जैसा कि 'ओम नमो नारायण है' विष्णु के लिये। | |
| नमो अहिरंत | मैं अरिहंतों को प्रणाम करता हूँ, जैन सदगुरू और देवता। | |
| नर्मदा | = | हिन्दू नदियों में पाँचवी सबसे बड़ी नदी जो मध्य भारत के विन्ध्य पर्वत से आरंभ होकर पूर्व से पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर से मिलती है। |
| नटराज | = | दक्षिण भारत में चिदम्बरनम के मंदिर में संबुद्ध सदगुरू शिव का नटराज स्वरुप। |
| नवाब | = | मुगल शासन का राजा |
| नयनयार | संबुद्ध सदगुरू शिव के तिरसठ तमिल भक्त, जिनकी जीवन गाथा पुस्तक पेरिया पुराण में है। | |
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| नेति | योग में नाक को साफ करने की तकनीक। | |
| निद्रा देवी | नींद की देवी | |
| निर्वाण | आत्मज्ञान द्वारा मुक्ति | |
| निर्वाण शतक | संबुद्ध सदगुरू आदिशंकराचार्य द्वारा आठ वर्ष की आयु में अपने गुरू गोविन्दपाद को अपना परिचय देते समय छः गीत गाये, उनका संकलन। | |
| निर्वाणिक | निर्वाण से संबंधित। निर्वाणिक पर्त हमारे शरीर मन की सातवीं और अंतिम परत है। | |
| नित्य आनंद | शाश्वत् आनंद | |
| नित्य ध्यान | THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM द्वारा अपने अनुयायिओं के लिये प्रतिदिन किया जाने वाला ध्यान। | |
| नित्ययुक्त | मोक्ष प्राप्त व्यक्ति। | |
| नित्य सूर्य नमस्कार - | नित्य योग में सिखायी जाने वाली एक तकनीक, जो THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM आर्डर के प्रशिक्षणकर्ताओं द्वारा सिखायी जाती है। | |
| नित्य योग | THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM का योग का उपदेश पतंजलि की शारीरिक भाषा पर आधारित, उनके प्रशिक्षणकर्ताओं द्वारा सिखाया जाता है। | |
| नित्य | शाश्वत | |
| नित्यानंद स्फुरण - | आनंद की शाशवत खिलावट | |
| नियम | आचरण से संबंधित पातंजलि के अष्टांग योग का दूसरा अंग ओडीपस और इलैक्ट्रा काम्पलेक्स-फ़ायड द्वारा पारिभाषित, पिता की पुत्री के लिये और माता की पुत्र के लिये यौनिच्छा। | |
| ओम | पवित्र अक्षर और चिन्ह जो हिन्दुओं में उत्पत्ति दर्शाता है। | |
| ओंकार | - | ओम की ध्वनि |
| पंच-क्रिया | भगवान की पाँच क्रियाएँ, उत्पत्ति, पालन, पुनः निर्माण, माया उत्पन्न करना माया दूर करना। | |
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| पाडव | हिन्दू ग्रंथ महाभारत में पाँच राजकुमार, उनके पिता पांडु थे। | |
| परब्रह्म | परमात्मा, परमेश्वर | |
| परम शिव | परम या श्रेष्ठ। | |
| परमहस | परम या श्रेष्ठ से, यह पदवी संबुंद्ध व्यक्तिओं को दी जाती है। | |
| परमहंस योगानंद - | एक संबुद्ध सदगुरु जो अपनी पुस्तक योगी कथामूत के लिये जाने जाते है। उन्होंने यू.एस.ए. में सन् उन्नीस सौ बीस में आत्मज्ञान संबंधी छात्रवृत्ति आंदोलन की स्थापना की। | |
| परमस्थिति | श्रेष्ठ स्थिति | |
| पातंजलि | - प्राचीन भारत के संत और योग सूत्र के लेखक, जिसे योग की नींव माना जाता है। | |
| पेरिया पुराण | प्राचीन भारत के संत और योग सूत्र के लेखक, जिसे योग की नींव माना जाता है। | |
| पेरिया पुराण | सेकीझर द्वारा उच्च कोटि की शास्त्रीय रचना, जिसमें तिरसठ नयनमार की जीवनी है जो संबृद्ध सदगुरु शिव के भक्त संत है। | |
| पीटर ड्रूकर | आधुनिक प्रबंध शास्त्र के जनक माने जाने वाले प्रबंधशास्त्र | |
| पिण्ड | सूक्ष्म व्यक्ति जिसका विलोम ब्रम्हाण्ड या विश्व है। | |
| पिंगला नाड़ी | तीन मुख्य नाड़ियों में से एक, शरीर में उर्जा प्रवाह का मार्ग, पिंगला नाक के दायें स्वर में समाप्त होती है, यह उष्ण, पौरुषत्व है, सूर्य को दर्शाती है। | |
| पित्त | आयुर्वेद के अनुसार, शरीर के तीन दोषों में से एक दोष। जल और अग्नि के गतिज खेल द्वारा उत्पन्न उर्जा। वे परस्पर एक दूसरे में परिवर्तित नहीं हो सकते परन्तु एक दूसरे पर नियंत्रण और न्यूनाधिक करते है और जीवन प्रक्रिया होने के लिये परम आवश्यक है। | |
| प्लेसवो | = | बिना सत्यापित रोग हरण प्रभाव के किसी पदार्थ को दवा रूप में देना। |
| प्लेसवो प्रभाव | = | लोगों को रोग दूर करने का प्लेसबो का प्रभाव। |
| पॉलीग्राफ | = | असत्य परखने की मशीन |
| पान्डिचेरी | = | तमिलनाडु के नजदीक दक्षिण भारत में राज्य। |
| पूर्णिमा | = | चांद पूर्ण होता है, पूनम। |
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| प्राण | = | जीवन उर्जा या ताकत |
| प्राण श्रारीर | = | शरीर में सात उर्जा पर्तो में दूसरी पर्त। |
| प्राणमय कोष | = | पाँच पर्व कोष पद्धति में दूसरा कोषा |
| प्राणायाम | = | श्वास पर नियंत्रण, पातंजलि अष्टांग योग के आठ अंगों में एक। |
| प्राणम्य | = | प्राण या जीवन उर्जा से संबंधित |
| प्रारब्ध | = | मन और इच्छाएँ जो पैदा होने के समय इस संसार में हम लेकर आये। |
| प्रत्याहार | = | पातंजलि अष्टंग योग का आठवां अंग विषयों से वापस लौटना। |
| पूजा | = | हिन्दुओं का प्रार्थना करने का कर्मकाण्ड |
| पुरशचरनम | = | मंत्र को दोहराना। |
| पुरुष | = | संस्कृत दर्शन में यह निर सिद्धांत, शुद्ध निष्क्रिय चेतना, सक्रिय स्वैण सिद्धांत से प्रकृति से भिन्न। |
| राधा | = | संबूद्ध सदगुरू कृष्ण की गोपियों या गायों की देखरेख करने वाली स्त्रियों में प्रमुख भक्त। |
| राजा सन्यासी | ' | साधुओं में राजा |
| रजस | = | प्रकृति के तीन गुणों में एक क्रोध के लिये उत्तरदायी। |
| साम | l | हिन्दू ग्रंथ रामायण में, अयोध्या साम्राज्य के राजकुमार। |
| रामकृष्ण परमहंस - | पश्चिम बंगाल के संबृद्ध सदगुरू, उनके प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद थे। | |
| रमण महर्षि | दक्षिण भारत के संबृद्ध सदगुरू उन्होंने आत्म ज्ञान के लिये स्वयं से पूछताछ का तरीका सिखाया जिसमें स्वयं से पूछते हैं मैं कौन हूँ। | |
| रमण पुराण | = | संबृद्ध सदगुरू रमण महर्षि के बारे में कहानियाँ। |
| रामानुज | = | विशिष्ट अद्वैत या परिष्कृत अद्वैत सिद्धांत के संस्थाक को आदि शंकराचार्य और माधव के साथ साथ हिन्दू दर्शन के तीन महान शिक्षकों में से एक माने जाते हैं। |
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| रामायण | = | हिन्दू इतिहास या राजकुमार राम के बारे में ग्रंथ। मूल ग्रंथ संत कवि बाल्मिकी ने लिखा था। |
| रासलीला | संबुद्ध सदगुरू कृष्ण भी गोपिया गौन्पालन करने वाली स्त्रियों के साथ आध्यात्मिक मिलन। | |
| त्रदृषि | वैदिक संत | |
| रुद्राक्ष | एक वृक्ष के बीज जो हिन्दुओं के कर्मकाण्ड में उपयुक्त होते हैं, और पहना जाता है, जो ध्यान की उर्जा को ग्रहण करते हैं। | |
| सदाशिव ब्रम्हमेन्द्र - | अठारवीं सदी के तमिल संत और संगीतकार | |
| सदा सोहम | में सदा ब्रह्म हूँ, मैं सदा चैतन्य हूँ। | |
| साधना | आध्यात्मिक अभ्यास। | |
| सहज | = | स्वःस्फूर्ति दिव्य आल्हाद। |
| सहस्रारः चक्र | - | सातवां और अंतिम उर्जाचक्र सिर के शीर्श पर, उर्जा चक्र से अधिक द्वार माना जाता है। |
| सखाः भाव | = | सदगुरू और शिष्य के बीच मैत्री का संबंध जैसा कि कृष्ण का अर्जुन और कुचला के संग था। |
| साक्षी | " | स्वयं का गवाह |
| सेलम | " | तमिलनाडू का शहर |
| समाधि | l | अष्टांग योग का आठवां और अंतिम अंग, वैयक्तिक चेतना का वैश्विक चेतना में मिलन के संदर्भ में, मोक्ष, युक्ति, निर्वाण आदि। |
| सहार | " | मृत्यु |
| ससार | " | जन्म-मरण का चक्र |
| ससार सागर | = | जन्म मरण का सागर |
| संसारी | = | जो संसार या जन्म मरण के चक्र से घिरा है। |
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| संस्कार | = | गहरी खुदी स्मृतियां |
| संचित | = | जोड़े दूये कर्मो का संग्रह - जिसमें से हम कुछ इस जन्म में लेकर आते हैं, प्रारब्ध कर्म के रूप में। |
| संघ | = | समुदाय |
| संकल्प | = | शपथ या प्रतिज्ञा |
| सन्यास | = | त्याग |
| सन्यासी | = | जिसने घर-संसार त्याग दिया एक साधू। |
| सारी | = | हिन्दू स्त्रियों द्वारा पहना जाने वाला वस्त्र। |
| शैतान | = | बुराई को प्रदर्शित करने वाला। |
| सतोरी | = | चेतना की उच्च स्थिति |
| सत्संग | = | प्रार्थना, ध्यान और आध्यात्मिक लक्ष्य के लिये जुड़ना। |
| सत्व | = | प्रकृति के तीन गुणों में से एक। निष्क्रिय कार्य के लिये। |
| आत्मा | = | शरीर और मन के समाप्त होने पर जो समाप्त नहीं होता। |
| आत्म ज्ञान | = | यह सजगता की हर एक ब्रम्हांडीय उर्जा है। |
| शास्त्र | = | ग्रंथ |
| शास्त्र-शस्त्र | = | शास्त्र उपकरण की भांति |
| शन्मुखी मुद्रा | = | एक मुद्रा जिसमें ध्यान करते समय आंख, कान, नाक और मुँह को ढके (बंद कर) लिया जाता है। |
| शास्त्र | = | ग्रन्थ |
| शिरडी सांई बाबा - | एक संबृद्ध सदगुरू जो हिन्दुओं और मुसलमानों द्वारा एक समान पूजे जाते हैं। भारत में नासिक के समीप शिरडी में रहते थे। | |
| शिव | = | भारत के संबृद्ध सदगुरू शब्द 'शिव' का अर्थ है 'अकारण भव्यता' |
आनंदपुर्ण सहभागिता (Part 2)
| श्शिवलिंग | संबुद्ध शिव का प्रति रूप, पुरूष और स्त्री सिद्धांत को संयुक्त करता हुआ पुनःउत्पत्ति का प्रतीक। | |
|---|---|---|
| शिवसूत्र | शिव के उपदेशों का लघु काव्य तकनीक के रूप में। जिसमें विज्ञान भैरव, तंत्र, गुरू गीता, तिरूमंदिरम् आदि है। | |
| श्रद्धाः सबुरी | वचनबद्धता और धैर्य। शिरडी सांई बाबा के उपदेशों का सारतत्व | |
| सिद्ध | वह जो आध्यात्मिक मार्ग में आईं यौगिक शक्तियां | |
| भगिनी निवेदिता | = | स्वामी विवेकानंद की अंग्रेज, आयरिश शिष्या। |
| सुकरात | प्लेटो के समकालीन ग्रीक दार्शनिक | |
| सोहम् | 'हमसा' के समान। | |
| सूफी | इस्लाम के रहस्यमय आयाम (सूफीवाद) को मानने वाला। | |
| सूफी लोग | सूफीवाद के अनुयायी, इस्लाम का रहस्यमय आयाम | |
| सूफीवाद | इस्लाम का रहस्यमय आयाम | |
| सुषुम्ना नाड़ी | = | शरीर में उर्जा प्रवाह की मुख्य तीन नाड़ियों में से एक सुषुम्ना है जो मूलाधार उर्जा चक्र से उठती है। सुषुम्ना, कुंडलिनी उर्जा का मध्य का मार्ग है, जो सहस्त्रार, सिर के शीर्ष में जाकर समाप्त होता है। |
| सुषुप्ति | गहरी निद्रा। | |
| ણુશ્ | आध्यात्मिक तकनीक जो लघु काव्य के रूप में होती हैं। | |
| स्वधर्म | किसी व्यक्ति का उसके लिये सम्यक मार्ग। | |
| स्वाधिष्ठान चक्र - | रीढ़ के आधार और नाभि के बीच में प्लीहा ऊर्जा चक्र जो भय से बाधित होता है। | |
| स्वामी | सन्यासी, साधु के लिये सम्मानीय शब्द प्रयुक्त किया जाता है। | |
| स्वामी श्री युक्तेश्वरगिरि - संबृद्ध सदगुरू परमहंस योगानंद के गुरू। | ||
| स्वप्न | " | सपना |
| नैत्रीय उपनिषद् | = | उपनिषदों मुख्य या ग्रंथ जो पाँच तत्वों की और पाँच उर्जा तलों की धारणा की व्याख्या करता है। |
| तक्षशिला | = | शिक्षा का केन्द्र जिसका उल्लेख हिन्दू ग्रंथ रामायण और महाभारत में किया गया है, अब उत्तरपूर्वी पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र की विश्व विरासत है। | ||
|---|---|---|---|---|
| तमस | प्रकृति के तीन गुण या विशिष्टााओं में एक। अक्रिया की विशिष्टता | |||
| तंजौर की चित्रकला - दक्षिण भारतीय भक्ति चित्रकला, जिसमें आभूषण के लिये आधे कीमती पत्थर और स्वर्ण का प्रयोग किया जाता है। | ||||
| तंत्र | तकनीक, वेदों से भी प्राचीन आध्यत्मिक उपदेश का एक प्रकार। | |||
| तंत्र | प्राचीन वैदिक परम्परा में आध्यात्मिक तकनीकों । अभ्यासों, ध्यान और कर्मकाण्ड पूजा द्वारा संबोधि प्राप्त करना। | |||
| तपस | आध्यात्मिक तपस्या। | |||
| तत्त्वमः असि | महान सत्यों में से एक तात्पर्य 'तुम वहीं हो' । | |||
| तथाता | जैसा है, वैसा | |||
| तंजावर | दक्षिण भारत का शहर अपने विशाल मंदिर और शिक्षा और सांस्कृतिक विरासत के लिये प्रसिद्ध। | |||
| प्रत्येकात्मा चैतन्य जाग्रत - चेतना और अन्तरात्मा का जागरण। | ||||
| तिरूपति | विष्णु, वैकटेश्वर या बालाजी का प्रसिद्ध मंदिर आंध्रप्रदेश, दक्षिण भारत में। | |||
| तिरूवन्नामलाई | ||||
| भावातीत ध्यान सिद्धि - उच्च स्तरीय भावतीत ध्यान तकनीक का अभ्यास करने पर प्राप्त यौगिक शक्तियाँ। | ||||
| भावातीत ध्यान (टी.एम.) - महेश योगी द्वारा लोकप्रिय ध्यान तकनीक। | ||||
| तुरीय | । | चेतना की चौथी अवस्था जिसमें कोई विचार नहीं मात्र जागरण होता है। | ||
| त्यागराज | । | अठारहवीं सदी का दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीतकार | ||
| उपनिषद | = | ग्रंथ जो प्राचीन वेदों का सार है। शाब्दिक अर्थ है सदगुरू के साथ बैठना मुख्य उपनिषद ग्यारह है जिनकी व्याख्या संबृद्ध अदिशंकराचार्य ने की है। | ||
| वास्तुशास्त्र | स्थान को वैदिक विज्ञान कि हम अपने चारों ओर के स्थान से किस प्रकार व्यवहार करते हैं। |
| वज्रासन | = | एक यौगिक आसन जिसमें घुटने मोड़कर एड़ियों पर बैठते हैं। |
|---|---|---|
| वाक | वाणी के पीछे ऊर्जा | |
| वाक्य | कथन | |
| वाली | हिन्दू ग्रंथ रामायण में बंदरों का राजा जो राजकुमार राम द्वारा मारा गया। | |
| वानप्रस्थ सन्यास - | वैदिक परम्परा द्वारा जीवन की तृतीय अवस्था जहाँ पति और पत्नी अपना बचा हुआ दाम्पत्य जीवन परम सत्य पाने के लिये आध्यात्मिक कार्यकलाणों में व्यतीत करते हैं। | |
| वासना | ||
| वसुदैव कुटुम्ब | कृष्ण का कथन कि 'विश्व मेरा परिवार है'। | |
| बात | आयुर्वेद के अनुसार शरीर के प्रमुख तीन दोषों में से एक ईथर तत्व और वायु से बनी उर्जा। और वायु का अनुपात यह तय करता है कि बात कितनी सक्रिय है। | |
| वात्सल्य भाव | सदगुरू शिष्य संबंध जिसमें शिष्य, सदगुरू को बच्चे की भांति देखता है जैसे कि माँ यशोदा और बाल कृष्ण। | |
| वेद | प्राचीन ग्रंथशास्त्र जो गहन आध्यात्मिक सत्यों को समझाते हैं। प्रमुख वेद चार है, ऋग्वेद, आयुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये ग्रंथ बलिदान को करने की विधि और कथाएं और मंत्रोच्चार की व्याख्या करते है। रहस्यवादियों और दृष्टाओं को घटित सत्यों को वेदों ने उद्घाटित किया है। | |
| वैदिक | प्राचीन ग्रंथ और वेदों से संबंधित। | |
| वीर | साहसी | |
| विज्ञानमय कोष | मानसिक चित्रण की परत, चौथा कोष या उर्जापरत | |
| विपस्सना | संबृद्ध सदगुरू बुद्ध का उपदेश श्वांस के अवलोकन द्वारा भीतर देखना। | |
| विष्णु | ईश्वर की हिन्दु त्रिपुटी में पालनकर्ता | |
| विश्चुद्धिचक्र | गले के क्षेत्र में सूक्ष्म उर्जा केन्द्र या चक्र। यह स्वयं को दूसरे तुलना करने पर बाधित होता है। | |
| विवेक चूड़ामणि - | संबृद्ध सदगुरू आदिशंकराचार्य का दर्शन शास्त्रीय कार्य। |
| विवेकानद | । | रामकृष्ण परमहंस के प्राथमिक शिष्य और राम कृष्ण आर्डर के संस्थापक। |
|---|---|---|
| उन्नीसवीं सदी के पूर्वीय रहस्यवादी जिन्होंने हिन्दुत्व और योग की जागरूकता यूरोप और अमेरिका में फैलाने में अहम कुंजी से भूमिका निभाई। | ||
| बारेन बेनिस | = | प्रबंधशास्त्र और नेतृत्व के सलाहका |
| यम | हिन्दुओं का मृत्यु और न्याय का ईश्वर। | |
| याम | अष्टांग योग का प्रथम अंग, जिसमें पाँच सिद्धांतों का पालन करना है-सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। | |
| यमूना | एक पवित्र हिन्दू नदी जो संबृद्ध सदगुरू कृष्ण से संबंधित है। | |
| यंत्र | एक उपाय, सामान्यतः धातु की प्लेट जिसे आध्यात्मिक अभ्यास में उपयोग के लिये उर्जावान बनाया जाता है। | |
| यशोदा | - संबृद्ध सद्गुरू पातंजलि द्वारा योग पर रचित पुस्तक। | |
| योगःचित्त वृत्ति निरोधः - योग सूत्र का दूसरा श्लोक, योग यन का रूकना है। | ||
| युधिष्ठिर | पांडव परिवार के पाँच राजकुमारों में सबसे बड़े, हिन्दू ग्रंथ महाभारत में। | |
| युक्ति | यह जानने की स्पष्टता की क्या बदलने की आवश्यकता है और क्या स्वीकार करने की आवश्यकता है। | |
| झाझेन | जेन में बैठने का ध्यान। | |
| जेन | जापानियों का बौद्ध अभ्यास, ध्यान का रूप। | |
| जेन कोआन | " | आत्मज्ञान होने के लिये जेन में पहेली एक तकनीक के रूप में दी जाती है। |
असीमित संभावना का वास्तविक हो जाना और जीवन को प्रत्येक नूतन क्षण में परम का अनुभव करना जीवन मुक्ति है। इस दिव्य स्थान में जीना, जीवन को सर्वोत्तम ढंग से जीना है और यही समाज की महानतम सेवा है।
जीवन मुक्ति
आप आपकी भावनायें हैं L.
| प्रेम में बहना 1 | |
|---|---|
| प्रेम क्या है ? | |
| प्रेम को निर्मित नहीं किया जा सकता | |
| प्रेम महान साहस लाता है | |
| खुले बनो-दर्शनशास्त्री नहीं | |
| अंहकार तोड़ता है-प्रेम जोड़ता है 5 | |
| हर क्षण प्रेमी बनें | |
| सर्वप्रथम स्वयं से प्रेम कीजिए | |
| अस्तित्व से प्रेम करो और इसके प्रेम को अनुभव करो 9 | |
| प्रेम सन्मान से भिज्ञ है | |
| प्रेम समस्त धर्मों का मूल है | |
| प्रेम के तीन प्रकार और उनका एकीकरण | |
| अकारण प्रेम में प्रवेश करें | |
| प्रेम, घूणा और ध्यानाकर्षण-आवश्यकता | |
| प्रेम और स्वतंत्रता दीजिये, अधिकार नहीं जमाइये | |
| संबंधों में प्रेम | |
| ध्यान-अपने भीतर प्रेम के प्रवाह की अनुभूति कीजिये | |
जीवन मुक्ति
| अपने भय का सामना करें और मुक्त हो ……………………………………………………………………………………………………………… 46 भय क्या है ? बिग बैंग और ब्लैक होल आपके अंदर आपकी संभावना और आपकी नकारात्मकता के बीच का संघर्ष ……………………………. 47 | |
|---|---|
| आत्म ज्ञान के लिये बढ़ती हुई संभावना | |
| निर्भिकता भय का सामना करने का साहस है | |
| पहचान खोने का भय | |
| मृत्यु का भय | |
| क्रोध-भय का क्रियाशील रूप 51 | |
| भयाघात 51 | |
| भय को कैसे दूर करें 51 | |
| ध्यान विधि 54 | |
| दर्द एक महान शिक्षक है ……………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………… 56 | |
| दर्द क्या है ? | |
| समय बनाम समझ 56 | |
| दर्द और खुशी-एक ही सिक्के के दो पहलू | |
| स्वयं को सूख और दूख से मुक्त कीजिये | |
| पीड़ा की समझ | |
| दर्द-एक मन की घटना | |
| वो नई समझ | |
| ध्यान तकनीकी |
Part 6: Living Enlightenment (Gospel of THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM) - Abridged Edition_Hindi_part_6.md
| सीढ़ी के ऊपर और नीचे | |
|---|---|
| करना, एकत्रित करना और होना | |
| आप अनूठे हैं | |
| समकक्षों का दबाव-ईर्ष्या की छड़ी | |
| ईर्ष्या पर विजय कैसे प्राप्त करें | |
| आप वह नहीं है जो आप सोचते हैं ……………………………………………………………………………………… 92 | |
| गंभीरता बनाम लगनशीलता | |
| सर्वश्रेष्ठता | |
| जीवन आपके तर्क से परे है | |
| अहम् क्या है ? …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………… | |
| 'न' कि ठोस अनुभूति ………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………… 95 | |
| साधारण बनाम असाधारण | |
| उचित मुखौटे का उपयोग | |
| अहम् की उत्पत्ति असंतोष से होती है | |
| पीड़ा अहम् का मार्ग प्रशस्त्र करती है | |
| दोहरी पहचान | |
| निकृष्ट अहम | |
| अहम् के प्रकार | |
| अहम बनाम गुरू | |
| ध्यान तकनीक | |
| क्रतज्ञ रहना पर्याप्त है …………………………………………………………………………………………………… 101 | |
| कृतज्ञता क्या है? | |
| अपने अस्तित्व के लिये कृतज्ञ अनुभव करें | |
| कार्मिक चक्र भंग किया जा सकता है………………………………………………… 130 | |
|---|---|
| कर्म क्या है ? | |
| वर्तमान अतीत के सम्पूर्ण निर्णयों का योग है…………………………………… 131 | |
| कर्म और टी.पी.एस. (T.P.S.) 133 | |
| कर्म-सचेतन चुनावों का कुल जोड़ | |
| वासना, संस्कार और कर्म | |
| तीन तरह के कर्म हैं………………………………………………………………………………………………… 137 | |
| दैनिक चिड़चिड़ाहट से निकलने का रास्ता अपने प्रारब्ध कर्म को जीना 138 | |
| कर्म चक्र से निकलने का मार्ग | |
| केवल इरादा महत्व रखता है | |
| गुरु की उपस्थिति उद्देश्य को प्रभावित करती है | |
| क्रियायें बिना उद्देश्य के कर्ममुक्त है | |
| उद्देश्य और क्रियायें | |
| दैनिक उद्देश्य की शक्ति | |
| मिशन अथवा मशीन? | |
| उसी तलवार को भीतर स्वयं की ओर प्रदर्शित करें | |
| कर्म और अगली देह | |
| आत्मज्ञान -घर लौटना | |
| कर्म को समाप्त करने की तकनीक | |
| देवी-देवताएँ और गूरुजन-कर्म को निर्गत करने का आपका मार्ग | |
| नित्यम् - ध्यानम् -आनन्दम् | |
| कर्म से संबंधित भ्रम | |
| मृत्यु एक उत्सव है …………………………………………………………………………………………………… 157 | |
| ययाति की कहानी | |
| हम मृत्यु से क्यों डरते है | |
| मस्तिष्क के परे प्रेम पूर्ण प्रज्ञा का द्वार है………………………………………… 192 | |
|---|---|
| समझना, न कि विचार करना | |
| शरीर प्रज्ञा | |
| आपके अपने जीवन को चलाने के लिये आपकी आवश्यकता नहीं है…………. 196 | |
| ब्रम्हाण्डीय प्रज्ञा हमें प्रतिसंवेदित करती है | |
| स्थान का कोई बंधन नहीं है | |
| बुद्धि बनाम प्रज्ञा | |
| उत्तरदायित्व आपको उन्नत करता बनाता है……………………………………………… 201 | |
| करुणा, उत्तरदायित्व और ऊर्जा है | |
| एक संज्ञानात्मक परिवर्तन | |
| अहम् बनाम उत्तरदायित्व | |
| विश्वास और धीरज | |
| आत्मज्ञान का उत्तरदायित्व | |
| स्थिति, पद नहीं | |
| लीडर एक अवस्था पद नहीं | |
| पृष्ठभूमि | |
| नेतृत्व क्या है ? | |
| क्या लीडर का 'सूजन' किया जा सकता है या क्या आप | |
| जन्मजात लीडर होते हैं ? | |
| एक सफल लीडर बनने के लिये मुख्य घटक क्या है ? | |
| लीडर सचेतना | |
| एक लीडर की स्थिति बनाम एक लीडर का पद | |
| उत्पादकता | |
| अंतर्ज्ञान एवं नवप्रवर्तन पर संस्कार का प्रभाव | |
| ध्यान तकनीकी |
| आध्यात्मिकता-निःछलता का अभिवादन | |
|---|---|
| चतूरता को त्याग दें और स्वाभाविक बनें | |
| निःछलता, पूर्णता, परिपक्वता | |
| आप साम्महिक चेतना के अंग है | |
| पदार्थ, ऊर्जा और उससे परें | |
| पदार्थ, कंपनशील ऊर्जा है | |
| अनन्त संभावनाओं का संसार | |
| वास्तविक प्रकृति | |
| स्थान और काल का प्रत्यक्ष ज्ञान | |
| सत्य ग्यारह आयामों का है | |
| अव्यवस्था व्यवस्था है-व्यवस्था अव्यवस्था है | |
| अव्यवस्था व्यवस्था है | |
| नियमितता अव्यवस्था है | |
| द्रष्टा-दृश्य-देखना | |
| सामूहिक चेतना | |
| विश्व शान्ति आप से शुरू होती है ………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………… | |
| विश्वशान्ति-वैयक्तिक आनंद का एक उपफल | |
| संसार की पीड़ाओं से कैसे निपटें | |
| ध्यान के प्रभावों के अध्ययन का शांति पर प्रभाव | |
| वैश्विक शान्ति ध्यान | |
| आत्मज्ञानी व्यक्ति का अपरिहार्य प्रेम स्पर्श | |
| नित्यानंद मिशन | |
| वैश्विक शांति के लिये ध्यान विधि |
आनन्दमय जीवन के पथ ==
| ध्यान क्यों ? | 345 |
|---|---|
| जीवन का असली उद्देश्य क्या है ? | |
| आनन्द क्या है ? | |
| ध्यान क्या है ? | |
| ध्यान की ओर पहुंचने का उचित तरीका क्या है | |
| ध्यान क्यों ? | |
| ध्यान के लाभ | |
| ध्यान कब करें ? | |
| ध्यान के प्रकार | |
| ध्यान के लाभ | |
| स्वप्न के रूप में सत्य | |
| ध्यान पर वैज्ञानिक अनुसंधान की झलकें | |
| विकसित मानसिक शक्ति | |
| ध्यान बनाम निद्रा | |
| एकाग्रता में सुधार और प्रत्युत्तर की रफ्तार | |
| नित्य ध्यान - आनन्द जीवन ध्यान | 361 |
| परम विधि | |
| नित्य ध्यान का जन्म | |
| चक्र सजगता | |
| नित्य ध्यान, ध्यान विधि | |
| नित्य ध्यान के लाभ | |
| नित्य योग-शरीर मन और उसके परे के लिये | 370 |
| योग क्या हैं ? | |
| गरू के साथ संबंधित होने के पाँच तरीके | |
|---|---|
| ग्रू शिष्य संबंध की अवस्थाऐं | |
| गुरू के साथ कैसे रहे-पूरा खुला | |
| गुरु की उपस्थिति में अपने संस्कारों को जलायें | |
| गुरू और अपने जीवन के उद्देश्य के प्रति जागृत होना | |
| जीवन के मनोवैज्ञानिक नाट्य का अन्त | |
| समर्पण-परमविधि | |
| समर्पण के तीन स्तर | |
| प्लेसबो प्रशाव या अधिक ? | |
| गुरू - परम आनन्द | |
| गुरू की उपस्थिति | |
| उपनिषद् | |
| कैसे उपनिषद घटित हुआ-कारण और परिणाम से परे | |
| हार्डवेयर और साफ्टवेयर परिवर्तन | |
| DNA फैण्टम प्रभाव | |
| परिवर्तन को कायम रखने की ऊर्जा | |
| वसुधैव कुटुम्बकम्: | |
| प्रश्न एवं उत्तर | |
| जीवनमूक्ति के लिये ध्यान तकनीकें | |
| ■ जीवनम्मुक्ति के लिये ध्यान तकनीर्के | 423 |
| स्थिर ध्यान | |
| सक्रिय ध्यान | |
| श्वांस से संबंधित तकनीकें | |
| शक्तिशाली तूरंत ध्यान विधियाँ | |
| ध्वनि | |
v.
प्राक्कथन
यदि आप यहाँ हैं, इसका अर्थ है अस्तित्व आपको यहां इस रूप में चाहता हैं। आप एक दुर्घटना नहीं हैं, आप एक घटना हैं। आप अस्तित्व का चेतन चमत्कार हैं। इसे सकारात्मक सोच न समझें, यह सीधा, स्पष्ट सत्य है। यदि आपकी इस सत्य पर श्रद्धा हो तब आप जीवन को उसके चरमोत्कर्ष में अनुभव करना आरंभ कर देंगे।
समझिये, अस्तित्व स्वयं को आपके द्वारा व्यक्त करने का प्रयत्न कर रहा है। जब आप इसे स्वतंत्रतापूर्वक व्यक्त होने देते हैं, तब आप अपनी अनंत संभावनाओं को अनुभव करना प्रारंभ कर देते हैं। जब आप अस्तित्व की परितृप्ति बनना प्रारंभ कर देते हैं, तब आप प्रवाहित उर्जा होते हैं, जिसको मैं जीवन मुक्ति कहता हूँ। अस्तित्व की बहती उर्जा के साथ जीना, इसकी चमत्कारिक घटनाओं के साथ समस्वरता, जीवन मुक्ति है।
जब आप इस ढंग से जीते है, आप जान पाते है, न कहीं कोई व्यक्तिगत बाधा है, न भावनात्मक बोझ। कुछ भी तो ऐसा नहीं है, जो जीवन में पीछे पकड़कर रख सकें। जीवन एक सरिता की भांति प्रतिपल आनन्दित और परितृप्त होकर बहता है।
इस पुस्तक में आप व्यक्तिगत बाधाओं पर विजय और भावनात्मक द्वन्दों को सुलझाने के लिये गहन सत्यों को और शक्तिशाली विधियों को पायेंगे। आप ऐसे सत्यों को पायेंगे जो इस विस्तृत ब्रम्हांड में आपकी प्रासंगिकता के रहस्यों को खोलेंगे, ताकि आप चेतना के उच्च स्तरों पर गति करना प्रारंभ कर सकें।
प्रस्तावना
बहुत से प्रख्यात बुद्धिमान व्यक्तियों ने जिनमें वैज्ञानिक भी सम्मिलित हैं, यह दर्ज किया है कि आधुनिक समय में मानवीय चेतना का स्तर ऊँचा उठा है। इसका संबंध चल चर युग से है, जैसा कि रॉक ग्रप्स में देखा या संसार का नाटकीय अंत जैसा कि मायन सभ्यतावालों ने भविष्यवाणी की, इस बात का यहां कोई प्रश्न नहीं है।
प्रश्न यह है कि हम चेतना की परिभाषा कैसे करते हैं, सामाजिक प्राणियों जो कि अपना सारा जीवन नैतिक और न्यायायिक आज़ाओं द्वारा निर्देशित होकर जीए हों, के रूप में हमारे व्यवहार का आधार सदैव अंतःकरण ही रहा है। लेकिन अंतःकरण चेतना नहीं है। चेतना, यह सजगता है कि हमारा जीवन भौतिक सुख जिसे हम खोजते हैं उससे अधिक कुछ और भी है। चेतना हमारे भीतर वह तनाव है जो हमें बताता है कि जो हम देखते हैं उससे कुछ ऊँचा भी है। यह हमारे भीतर सजगता का एक प्रकाश स्तंभ है, जो हमें हमारे होने का मार्ग प्रदर्शित करता है, जहाँ हम यह जानते हैं कि हम उससे अधिक हैं जो हम स्वयं को समझते हैं।
मनुष्य केवल जैविक यंत्र ही नहीं उससे कहीं कुछ अधिक है। इसी कारण बहुत शक्तिशाली कम्प्यूटर भी मनुष्य की जगह नहीं ले सकता है। यह मन और शरीर का स्थान तो ले सकता है लेकिन मनुष्य की ऊर्जा का नहीं। यह एक तथ्य हो सकता है कि हमारा विकास पशु से हुआ है, किन्तु यह सत्य है कि हम आगे विकसित हो सकते हैं।
प्राचीनकाल से सभी संस्कृतियों के प्रज्ञावान व्यक्तियों ने इस सरल परन्तु अस्पर्शित विषय पर गहन विचार किया है कि हमारे भीतर क्या है "मैं कौन हूं" बहुत से संतों द्वारा दोहराया गया (टेक) है। बहुतों को इसका उत्तर मिला है। उनके उत्तर अनुभवजन्य थे। सभी महान धर्मों की पवित्र पुस्तकें इन प्रज्ञावान गुरूओं के अनुभवों की अभिव्यक्तियाँ हैं। जब वे जीवित होते हैं, तब वे गुरू स्वयं वे अनुभव होते हैं, जिनके हम सहभागी बन सकते हैं।