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1. Bhagavad Gita demystified - Vol 3 Chapters 13-18

भगवद-गीता की पृष्ठभमि

भगवद्-गीता वैदिक संस्कृति का एक पवित्र शास्त्र है। जैसा कि सभी शास्त्रों के साथ हुआ. यह ज्ञान भी मौखिक रूप से प्रसारित होता रहा है, इसलिए संस्कृत में इसे 'श्रृति' कहते हैं जिसका शाब्दिक अर्थ है 'सुना हुआ'।

भगवद्-गीता प्राय: 'गीता' कही जाती है। जिसका संस्कृत में निहित अर्थ है 'पवित्र गीत'।

जहां वेद और उपनिषद अपने आप में पूरे ग्रन्थ हैं, 'गीता' प्रसिद्ध हिन्दू ग्रन्थ 'महाभारत' का ही एक अंग है। 'महाभारत' को भी एक पुराण की संज्ञा दी जाती है। अत: गीता महाभारत की कहानी का एक हिस्सा ही है।

शास्त्र के रूप में गीता प्राचीन ज्ञान की वैदिक परम्परा का आधार है जो महान ऋषियों के अनुभवों की अभिव्यक्ति है।

'श्रुति साहित्य' को वेद व उपनिषद आधार-स्तंभ. हैं जो महान ऋषियों की दीर्घ समाधि में प्राप्त गहन अन्तर्दृष्टि और जागरूकता से प्राप्त ज्ञान को स्पष्ट करते हैं। ये उतने ही प्राचीन हैं जितनी मानव-संस्कृति है और मनुष्य की

सत्य-अन्वेषण हित की गई यात्रा को प्रथम और सभी अभिव्यक्तियां हैं। वेद महान ऋषियों के सन्मुख प्रकट ज्ञान के स्रोत हैं और उपनिषद् इन महान संतों की अपनी व्याख्या है। परन्तु गीता, एक महान संत व्यास ऋषि द्वारा सुनाई गई कथा का एक अंश है जो ईश्वरीय सत्ता की सीधी अभिव्यक्ति मानी जाती है।

किसी भी अन्य पवित्र ग्रन्थ या उसके किसी अंग को वह विशिष्ट पद प्राप्त नहीं है जो 'गीता' को है। बल्कि गीता के कारण ही महाभारत ग्रन्थ को इतना पावन माना जाता है। 'गीता' परम देव, भगवान कृष्ण की महाचेतना की अभिव्यक्ति है इसलिए इसे एक शास्त्र माना जाता है। 'महाभारत' का शब्दिक अर्थ तो 'वृहत् भारत' है, परन्तु इसमें एक देश और सभ्यता-भारतीय सभ्यता-के बारे में बताया गया है जब इस भूमि खण्ड पर राजा भरत के वंशजों का राज था।

भगवद्-गीता कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में हुए भगवान कृष्ण और अर्जुन के मध्य संवाद पर आधारित है। कृष्ण ने अर्जून को प्रेरित किया था कि शस्त्र उठाकर तो इंगित कर सकते हैं पर अंतत: ज्ञान बोध जागृत नहीं करवा सकते। इनका प्रभाव भी आसानी से छूटता नहीं, क्योंकि उनके प्रति कृतज़ता का भाव तो रहता ही है। कर्ण प्रतीक है सारे सुकत्यों का, परन्तु यही सुकृत्य उसके बोध मार्ग में बाधा बनको खडे होते हैं। फलस्वरूप कृष्ण को स्वयं कर्ण का पुण्य भार कम करना पड़ता है, क्योंकि इस भार के रहते उसकी मुक्ति संभव ही नहीं थी। जो प्रबुद्ध गुरु या स्वामी है वह आपने शिष्य को सुकत्यों से सम्बद्ध फलों से अनुराग भी त्यागने को कहता है, परन्तु यह त्याग होता नहीं क्योंकि शिष्य उन्हें सुकृत्य समझता है, उसका अपना अनुभव कहता है कि दसरों के प्रति करुणा दिखाना या दीनों को दान देना बुरा हो ही नहीं सकता! कर्ण का चरित्र यह भी दिखाता है कि प्रबोधन का अनुभव ही व्यक्ति की अंतिम साधना है और यही वह करुणा की अमूल्य भेंट है जो कोई प्रबुद्ध आत्मा विश्व को प्रदान कर सकती है। दुर्योधन व्यक्ति का अहंकार दिखाता है, जिसको जीतना बेहद मुश्किल होता है। इसमें यदि स्वामी या ईश्वर सहायक न हो तो इससे मुक्ति संभव ही नहीं होती। अहंकार की गति बड़ी सुक्ष्म होती है और कभी-कभी तो गुरु भी सहायक नहीं होते, क्योंकि अपने अभिमान में अहंकार अपने गुरु या उद्धारक से भी नाता तोड़ लेता है।

महाभारत का विशाल युद्ध 18 अक्षौहिणी सेनाओं के मध्य हुआ था-11 अक्षौहिणी कौरवों को सेना, अर्थात् ऋणात्मक संस्कारों की और सात अक्षौहिणी पाण्डवों या धनात्मक संस्कारों की सेना। इन अठारह अक्षौहिणी सेनाओं के मध्य 18 दिन-रात ही चला था। संख्या 18 का बड़ा गूढ़ महत्त्व है। यह प्रतीक है मनुष्य की दस इंद्रियों का-5 ज्ञानेन्द्रियों : स्वाद, दृष्टि, घ्राण, श्रवण और स्पर्श का बोध कराने वालों; 5 कर्मेन्द्रियों : अर्थात् करना यथा चलना-फिरना बोलना इत्यादि कर्मकाण्ड कराने वाली इन्द्रियों-और 8 प्रकार के विचारों-लालच वासना इत्यादि-का। इन सभी 18 बन्धनों को तोड़ कर आत्मदर्शन हो सकता है। अत: महाभारत कोई महान युद्ध गाथा नहीं है। यह भाग अच्छाई और बुराई का द्वंद्ध भी नहीं है। यह तो दोनों-धनात्मक एवम् ऋणात्मक-संस्कारों को अपने शरीर-मन तंत्र से पूर्ण तिरोभाव का यूद्ध है जिसके बिना पूर्ण मुक्ति संभव नहीं

होती। दूसरे शब्दों में यह ज्ञान बोध प्राप्त करने के संघर्ष की कथा है। महाभारत एक सजीव कथा है जो हमेशा जारी रहती है। भगवद्-गीता ज्ञान-बोध पाने की संदर्शिका है।

जिस प्रकार हजारों वर्ष पूर्व अर्जून मोहग्रस्त हो गया था उसी प्रकार हम सब भी होते हैं और इस पुस्तक से हम प्रबद्ध स्वामी के निर्देश ग्रहण करते हैं। गीता हमें एक महती सविधा प्रदान करती है अपने स्वामी के निर्देशों द्वारा अपने सारे शक और संशयों को दूर कर सही मार्ग पर चलने की!

या विक गात प्रस्तावना

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इस शुंखला में प्रबुद्ध स्वामी THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM भगवद्-गीता पर अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करते हैं।

गीता पर सैकडों टीकाएं उपलब्ध हैं, जिनमें प्रारंभिक टीकाएं तो महान आध्यात्मिक संतों-स्वामियों यथा आदि शंकराचार्य, रामानज, माधवाचार्य-द्वारा सहस्त्रों वर्ष पूर्व की गई थी। प्रस्तृत काल में महान संतों रामकष्ण परमहंस, रमण महर्षि सदश विद्वानों ने गीता पर अपनी टीकाएं विशद रूप से की हैं। कई अन्य लोगों ने भी इस महान शास्त्र-ग्रन्थ पर कई ग्रन्थ लिखे हैं।

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी की टीका भगवद-गीता पर मात्र शाब्दिक अनुवाद या उसकी सरल व्याख्या भर नहीं है। वे तो पाठक को हर श्लोक की व्याख्या में मानों सारी दनिया घुमाते हैं। यह माना जाता है कि गीता के हर श्लोक का अर्थ सात स्तरो पर चलता है। साधारण रूप से जो अर्थ दिया जाता है वह प्रथम स्तर का अर्थ ही होता है। परन्त इस टीका में प्रबद्ध स्वामी साधारण से असाधारण अर्थों को तहें बड़ी सरलता एवम सहजता के साथ खोलने लगते हैं।

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी की गीता पर टिप्पणी पढ़ना एक दुर्लभ अन्तर-निहित दुष्टि पाना है। यह मात्र ग्रन्थ का पारायण ही नहीं एक ध्यान सदुश गहन अनुभव होता है। महान स्वामी और दार्शनिक शंकर का कथन है : "थोडा गीता का अध्ययन, पीने को गंगाजल की एक बूंद, कभी कृष्ण का ध्यान करना, यह सुनिश्चित करता है कि तुम्हें मृत्यु के देवता यम के साथ किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।"

भगवद्-गीता पर लिखी इस शुंखला के अंतर्गत संपादकों ने श्री THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी द्वारा दिए गए अर्थों का विशद् विवेचन किया है जो उनके साथ लम्बे विमर्श के पश्चात उन्होंने प्राप्त किया है। विशेष तौर पर अंग्रेजी के पाठकों की सुविधा हेतु और सभी पाठकों की अकादमिक जिज्ञासा शांत करने के लिए अंत में संस्कृत मूल पाठ के साथ उनका अनुवाद भी दिया गया है।

इस सटीक व्याख्या का उद्देश्य हर व्यक्ति के न सिर्फ रोजमर्रा के जीवन में उभरती समस्याओं का समाधान सुझाना है वरने उनकी अंतिम सत्य को प्राप्त करने के प्रयासों में भी सहारा देना है जिससे उन्हें भी नित्यानन्द या शाश्वत आनन्द प्राप्त हो सको

आधुनिक युग के वैदिक गुरु THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM ज

धर्म-अध्यात्मक एवं योग और ध्यान की दुनिया में 'परम हंस THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी' एक बहत ही लोकप्रिय एवं चर्चित नाम बनता जा रहा है। इतनी कम आयु में THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने अध्यात्मक की जिन ऊंचाइयों, शक्तियों एवं उपलब्धियों को छुआ है शायद ही किसी और संत या गुरु ने छूआ होगा। युवाओं पर खासा प्रभाव डाल रहे हैं। अपनी आध्यात्मिक शक्ति के चलते आज THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी पूरे विश्व में एक लोगों के साथ जुड़े हुए हैं और उन्हें अपनी साधना एवं योग से 'जीवन मुक्ति' की कला सिखा रहे हैं।

जितने यह वैदिक व सुसंस्कृत हैं उतने ही व्यावहारिक एवं आधुनिक हैं। आज की टेक्नोलॉजी से भली-भांति परिचित हैं। हर बात का मात्र धार्मिक पक्ष ही नहीं वैज्ञानिक पक्ष भी प्रकट करना जानते हैं। कर्मकांड और मनोविज्ञान का पूरा-पूरा तालमेल हैं। आप एक साधक होने के साथ-साथ इंजीनियरिंग में भी शिक्षा प्राप्त है। आपकी वाणी आपके ज्ञान से मिलकर सुनने वाले के लिए एक औषधि की तरह बन जाती है जो सुनने वाले को आरोग्यता प्रदान करती है। यही कारण है कि आज आप इंटरनेट के जरिए यू-ट्यूब पर

सबसे अधिक देखे जाने वाले 'आध्यात्मिक गुरू' के रूप में उभरकर सामने आए हैं। इतना ही नहीं आज पूरे विश्व में आपके मिलियन से अधिक अनुयायी हैं। विश्व के 150 से अधिक देशों में आपके लगभग केंद्र हैं। आपकी अब तक 26 भाषाओं से 200 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपके छूने भर से बहुतों ने नए जीवन व आरोग्यता को पाया है। लोग जिसके जरिये एवं असाध्य रोगों से मुक्त हुए हैं। आज आप पूरे विश्व में आत्म-रूपांतरण को गुण सिखा रहे हैं। प्रबंधन हो या ध्यान, धर्म हो या संबंध, संसार हो या संन्यास, इन सबके बीच व साथ खुद को कैसे स्थापित व संतुलित रखें यह सब वह अपने ज्ञान व ध्यान की विधियों को माध्यम से बड़ी ही सरलता एवं सहजता से कर रहे हैं। का 10 कि

  • आपके स्पर्श मात्र से आज हजारों लोग जटिल एवं असाध्य रोगों से मुक्ति पा चुके हैं। इतना ही नहीं बेंगलूरू में बसा आपका 'नित्यानंद ध्यानपीठ आश्रम'

अपने ही कस्बे तिरुवनमलाई अनेक गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की जिसमें से स्वामी अन्नामलाई योगी रामसरत कमार तथा माता श्री क्रप्पामल विशेष उल्लेखनीय हैं। "योगी रघुपति जी' का THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM

जी के जीवन में विशेष योगदान रहा है। यहां तक कि THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी का पहला प्रवचन जिसे उन्होंने अपनी दस वर्ष की

आय में तिरुवन्नामलाई में पंतजलि योग सूत्र पर दिया था उसका श्रेय भी योगी रघुपति जी को ही जाता है कहते हैं इस प्रवचन को सुनने वालों की संख्या एक हजार थी।

भगवान श्री रमण महर्षि के समकालीन योगी 'रामसुरत कुमार' के साथ THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी का विशेष आध्यात्मिक लगाव था। आप उनके नियमित दर्शनार्थियों में से एक थे। देवी माताजी 'कृप्पामल' जी का भी आपके आध्यात्मिक उत्थान में विशेष सहयोग रहा। अरुणाचल की प्रारंभिक आध्यात्मिक यात्रा में वह आपकी आध्यात्मिक मार्गदर्शिका रहीं। साथ ही साथ आपके रख-रखाव पर भी उन्होंने विशेष ध्यान दिया। बारह वर्ष की आयु में जब THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी को आध्यात्मिक ज्ञान का अनुभव होना शुरू हुआ था उस समय भी माता जी कुप्पामल जी ने उन्हें आध्यात्मिक प्रशिक्षण देने में तथा विभिन्न साधनाओं को साधने में उनकी मदद की थी।

आप जब 12 वर्ष के थे तब पवित्र अरूणाचल पर्वत तिरुवन्नामलाई में ध्यान करने के दौरान आपको बुद्धत्व का ज्ञान प्राप्त हुआ। इस आध्यात्मिक ज्ञान के बाद आप आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हो गए। आपने ध्यान के माध्यम अपने अंतर्मन को जाना तथा उसे महसूस किया।

आध्यात्मिक संकल्प एवं प्रयास

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी आध्यात्मिकता को आम लोगों की जिंदगी तक पहुंचाना चाहते हैं। उपासना, अराधना, संस्कार तथा कीर्तनों के माध्यम से मध्यवर्ग के लोग इनके प्रवचनों को सुनकर इनकी ओर उन्मुख हो जाते हैं। उन्हें अपनी समस्याओं का समाधान THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी के पास मिलता है। इनके प्रवचन तथा भाषण भारत ही नहीं बल्कि विदेशी लोगों को भी अपनी शिक्षाओं से अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने वैदिक संस्कृति तथा आध्यात्मिक ज्ञान को घर-घर पहुंचाने का संकल्प लिया है जिसके तहत वे 2006 से निरंतर यात्रा में हैं। जिसमें

आज अपनी वैदिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों के चलते कई ऐसे व्यापक प्रकल्पों में जटा है जिसके इतने कम समय में इतने अच्छे परिणाम हैरत में डालते हैं। जिसका श्रेय स्वामी THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी को ही जाता है। यह सब विलक्षण क्षमताएं व उपलब्धियां आपको अतुलनीय व अदुभुत संतों व गुरुओं की श्रेणी में ला खडा करती हैं।

आपका आज कोई साल-दो साल का परिणाम नहीं बरसों की तपस का फल है। आप बचपन से ही धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले थे। सदियों से योगियों का आकर्षण केंद्र रही अरूणाचल को पवित्र पहाडि़यां, जहां भगवान 'रमण महर्षि' जैसे सिद्ध पुरुषों को ज्ञान प्राप्त हुआ वह आपको भी अपनी ध्यान साधनों लिए मूक निमंत्रण देती थी। आपकी बचपन से आज तक की यात्रा अपने आपमें जितनी रोचक है, उतनी ही, अदुभुत, भी। -

जन्म और बचपन

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी का जन्म 1 जनवरी 1978 में तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु में हुआ। आपके बचपन का नाम 'राजशेकरन' था। आप अपने पिताजी स्व. श्री अरूणाचलनम तथा माता जी श्रीमती लोकनयकी देवी की दूसरी संतान है। आपने एक समुद्ध तथा परोपकारी परिवार में जन्म लिया जो 'सैवा वेलालर संप्रदाय' से ताल्लूक रखता है। आपके दादा एक धर्मपरायण व्यक्तित्व थे जो विभिन्न मंदिरों तथा आध्यात्मिक संस्थानों को अपना सहयोग दिया करते थे। स्वामी THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी के दादा वो पहले परामर्श दाता थे जिन्होंने आपको आध्यात्मिक

रीति-रिवाज और हिन्दू संस्कृति से अवगत कराया।

आध्यात्मिक झुकाव

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी का अध्यात्मक की ओर झुकाव बहुत ही कम आयु से हो गया था। आप छोटी सी आयु से ही पूजा-पाठ, योग तथा ध्यान की तरफ आकर्षित हो गए थे आप घंटों अपनी स्कूली शिक्षा के अलावा प्रभु की पूजा-पाठ में गुजारा करते थे।

आपने योग तिरूवनमलाई को जाने-माने गुरु रघुपति योगी जी से योग सीखा तथा योग की पूरी शिक्षा ग्रहण को। साथ ही साथ अपने वैदिक धर्मग्रंथों की शिक्षा लेनी आरंभ की जैसे पुराणा तथा उपनिषद् आदि आपने

पदयात्रों के साथ-साथ रथ यात्रा आदि भी शामिल है। वह हर वर्ग के लोगों तक भारत की वैदिक आध्यात्मिक धरोहर को पहुंचाना चाहते हैं। दक्षिण भारत के मंदिरों. आश्रमों तथा मठों आदि में THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी की यात्राओं द्वारा प्रचार-प्रसार का कार्यक्रम नियमित देखा जा सकता है। जिसके चलते वहां के लोग परंपरागत अराधना एवं धार्मिकता की ओर उन्मुख हो रहे हैं।

युवाओं एवं बच्चों से जुड़ाव

खुद युवा THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी युवा पीढ़ी को व्यवहारिक सोच को समझना चाहते हैं। स्वामी जी के पास ऐसा कौशल है जिससे वो आध्यात्मिकता को युवाओं तक ले जाते हैं युवाओं की मानसिक समस्या, कार्य प्रबंधन, तनाव तथा संबंधों की समस्याओं का समाधान वो बड़े ही सरल तरीके से करते हैं। सभी तरह की आधुनिक तकनीक अपनाते हुए वो सभी के दिलों पर राज कर रहे हैं जो अपने आधुनिक माध्यम से वेदांत जैसे गढ़ विषयों की शिक्षा भी देते हैं।

बच्चों में हिन्दू परंपरागत मुल्यों को अंतर्निविष्ट करने का प्रयास स्वामी जी निरंतर कर रहे हैं इन्होंने एक गुरुकल की स्थापना की है जहां सभी छात्रों की खासी देखरेख की जाती है तथा उस स्तर की शिक्षा दी जाती है जिससे वह अपने पैरों पर खड़े हो सकते।

इसके अलावा स्कूलों तथा कॉलेजों में भी समय-समय पर ध्यान शिविरों का आयोजन किया जाता है तथा ऐसे ही शिविर लगाकर कैदियों को भी ध्यान की विधियों से रू-ब-रू कराया जाता है। THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी इन-क्रिया को माध्यम से ध्यान को एक आम आदमी की जीवन शैली बनाने में प्रयासरत हैं।

इन आठ सालों में जब से स्वामी जी ने विदेशों में यात्राएं तथा प्रवचन देना प्रारंभ किया, आपने विश्वभर में एक आध्यात्मिक छाप छोडी है। आपने शिक्षित लोगों तथा अनुयायियों को वैदिक सत्य की ओर उन्मुख किया है। पश्चिमी भक्तों के लिए आपकी शिक्षा बहुत शांत प्रदायक साबित हुई है।

2006 में THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने पहले 'विश्व शांति संगम' को आरंभ किया जो एक आध्यात्मिक कार्यक्रम है जिसमें लगभग 5000 लोग उपस्थित हुए तथा जिसमें 20 विश्वकृत संस्थाओं (आध्यात्मिक) तथा सामाजिक संस्थाओं ने भाग लिया।

मिशन

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी उन कुछ एक आध्यात्मिक गुरुओं में से एक हैं जिन्होंने ध्यान को लोगों की एक बड़ी संख्या तक पहुंचाया है। जी के नि:शल्क सत्संग कार्यक्रमों में लाखों लोग आते हैं जी लोगों की ध्यान की आसान विधियों से अवगत कराते

है। सबसे पहले तनाव तथा संबंध के बारे में जी बताते हैं तथा ध्यान को इतना आसान बना देते हैं, जिससे सभी लोग ध्यान की ओर अकर्षित हो सकें। THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी के अलावा उनके सभी आश्रमों में विभिन्न ध्यान के प्रशिक्षित शिक्षकों के द्वारा ध्यान की विभिन्न विधियों को आम लोगों को सिखाया जाता है।

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने एक ऐसे समाज की परिकल्पना की है जहां समानता हो तथ्य लोग एक दूसरे को उत्थान में उनका साथ दें। सभी दूसरों की सहायता करें और अध्यात्म के बताए रास्ते पर अपने कदम रख सकें। THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने लोगों के खुद के रूपांतरण की बात तो कही ही है साथ ही समाज को रूपांतरण को भी महत्व दिया है।

ऑनलाइन आध्यात्मिक क्रांति

अन्य आध्यात्मिक गुरुओं से भिन्न THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने शिक्षा तथा उपदेशों के विशेष नियमों को हर वर्ग तक पहुंचाने के लिए इंटरनेट का सहारा लिया, जिसके माध्यम से वे युवाओं में सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरू के तौर पर उभकर कर सामने आए।

पूरे विश्व में सत्संग को फैलाने को लिए 2009 सितंबर में THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने एक इंटरनेट सत्संग सेवा भी शुरू की। इसके बाद में नित्यानंद ध्यानपीठ में ऑनलाइन प्रोग्राम्स का आयोजन हर सुबह किया जाता है जिसमें 35 देश से भी अधिक देश नि:शुल्क ज्ञानवर्द्धक सत्संग में भाग लेते हैं।

ध्यान तथा जी का प्रात: काल का संदेश सभी तक ऑनलाइन के माध्यम से पहुंचाया जाता है।

100 से अधिक संस्थान तथा शिक्षक भी इसी तरह के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं जिसमें योग तथा ध्यान की विधियों को भक्तों तक इंटरनेट के माध्यम से विश्वभर में पहुंचाया जाता है।

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने जीवन मुक्ति को चार सूत्रों को प्रतिपादित किया है। इन सुत्रों को अपनाकर आप अपनी बाह्य और आंतरिक दशा को बदल सकते हैं तथा परमात्मा से साक्षात्कार कर सकते हैं।

शक्ति : ऐसी ऊर्जा जो सब कुछ बदल सके।

बुद्धि : ऐसा ज्ञान जो न परिवर्तित होने वाली चीजों को स्वीकार करे। युक्ति : बदलाव के लिए स्पष्टता और समझ तथा जिसे आप सच्चाई कहते हैं वो निरंतर बदलता सपना है। बाहरी है।

भक्ति : अपरिवर्तनीय ऊर्जा की दिशा में भक्ति

इनर अवेकनिंग

'इनर अवेकनिंग' कार्यक्रम आपको अध्यात्मक के परलौकिक आनंद से भर देता है। 21 दिन के इस कार्यक्रम में ध्यान, योग, आरोग्यता आदि के माध्यम से आंतरिक रूपांतरण को संभव किया जाता है जिससे आप प्राकृतिक और सुरक्षित माध्यम से कुण्डलिनी जागरण तक को उपलब्ध हो जाते हैं और एक स्वस्थ ऊर्जावान जीवन व्यतीत करते हैं।

कल्पतरू, भीतरी इच्छाओं और वासनाओं को जानने और प्रकट करने का, एक दिन का यह बहुत ही उपयोगी कार्यक्रम है। जिससे आप अपने सोचने समझने की शक्ति को दुरुस्त करते हैं। इतना ही नहीं इस कार्यक्रम से कई हजारों लोगों ने अपने असाध्य लोगों में चमत्कारिक परिवर्तन पाया है तो बहुतों ने अपनी आर्थिक स्थिति संबंधों में सुधार पाया है।

आत्मरूपातरण का प्राकृतिक ऊर्जा स्थल, नित्यानंद ध्यानपीठ

इस पृथ्वी पर युं तो आश्रम कई हैं परंतु बेंगलुरू के बिदाडी में बसा नित्यानंद ध्यानपीठ आश्रम अपने आप में अद्भुत है। यहां की आध्यात्मिक ऊर्जा व वैदिक वातावरण इंसान को आकर्षित ही नहीं करता बल्कि आंतरिक यात्रा के लिए भी प्रेरित करता है।

नित्यानंद ध्यानपीठ स्वामी जी द्वारा स्थापित आश्रम है जो बेंगलरू (बेंगलरु) से कुछ ही कि.मी. दूर बिदाडी में स्थित है। यह आश्रम एक प्राकृतिक शक्ति का केंद्र लगता है। बेंगलरू जो आज भारत की आई.टी. क्रांति का सबसे बडा शहर बनता जा रहा है। वहीं यह आश्रम अपनी ऊर्जा शक्ति से पूरे विश्व को जीवन मुक्ति के गुण सीखने की कला सिखा रहा है।

इसका निर्माण पूर्व वैज्ञानिक पद्धतियों द्वारा किया गया है। एक अदभुत प्रबंधन द्वारा निर्मित यह क्षेत्र सभी के लिए एकता तथा समानता की नींव रखता है। आश्रम के भीतर विभिन्न स्थल एवं केंद्रों का निर्माण भी पूरी तरह वैज्ञानिक तौर-तरीको से किया गया है। आश्रम का आध्यात्मिक वातावरण व स्पंदन हर कोई महसूस करता है आश्रम में कई वैदिक मंदिर हैं जो आध्यात्मिक ऊर्जा को फैलाने के लिए बनाए गए हैं। इस क्षेत्र को सकारात्मक ऊर्जा का मुख्य ग्रह कहा जा सकता है जहां आने वाले सभी भक्तों तथा अनुयायियों में ये ऊर्जा देखी जा सकती है।

यहां प्रशिक्षित शिक्षकों के द्वारा नए लोगों को अध्यात्म की शिक्षा दी जाती है तथा वह उनके जीवन को रूपांतरित करने में उनकी मदद भी करते हैं।

इच्छापूर्ति करने वाला वट वृक्ष

आश्रम में एक प्राचीन बरगद का वृक्ष है जो 'कल्पतरू' के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध है। इसे इच्छाओं को पूर्ण करने वाला वृक्ष भी कहते हैं। ये वृक्ष THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी की पवित्र दूरदर्शिता एवं व्यापकता को दर्शाता है। इस वृक्ष के आस-पास भी एक सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह अनुभव किया

आनन्देश्वरा - आनंदेश्वरी मंदिर

कल्पतरू वृक्ष से कुछ कदम को दूरी पर यह मंदिर बना है जिसमें भगवान शिव और पार्वती को संलग्न मूर्ति स्थापित है जो धर्म और अध्यात्मक के समन्वय एवं संतुलन की प्रतीक है।

मूर्तियों को पांच तरह की धातुओं से गढ़ा गया है जिनकी प्राण प्रतिष्ठा स्वयं THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने अपने हाथों से की है। मंदिर में मंत्रोच्चारण से इर्द-गिर्द एक कवच तैयार हो जाता है। जिससे भक्तों को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है पवित्र आरती हिन्दू संस्कृति वैदिक चलन को तथा लोगों में श्रद्धा एवं आस्था को प्रवाहित करती है। त्यौहारों को दिनों में बिदाड़ी आश्रम में लगभग 50 हजार भक्त तथा सैलानी आते हैं।

समकालीन वैदिक मठ

आश्रम का मुख्य केंद्र वैदिक मठ है यह परम ज्ञान को सीखने व उपलब्ध होने का विशेष केंद्र है। यहां विश्व भर से सैकड़ों आध्यात्मिक जिज्ञासू अपनी आध्यात्मिक यात्रा को सुदृढ़ करने में जुटे हैं इतना ही नहीं यह विश्व में आरोग्य ऊर्जा एवं आत्म-रूपांतरण के सूत्रों का भी प्रचार-प्रचार कर रहे हैं।

इसके अलावा यहां पर आने वाले दर्शनार्थी स्वयं सेवी तथा आश्रम को गतिविधियों में भाग लेने वाले लोग आश्रम को वैदिक माहौल में स्वयं को आसानी से ढाल पाते हैं। विभिन्न धर्म, जाति, वर्ग और स्थान के लोग यहां बिना

जा सकता है जो कई सदियो से लोगों में भक्ति की जडे बुनता आ रहा है। इस प्राचीन कल्पतरू वृक्ष को आज पूरा विश्व जानता है। THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने इस वक्ष को अपनी आध्यात्मिक यात्रा को दौरान सभी के सामने ला दिया।

पिछले कई सालों से ये वृक्ष मनोकामना पूरी करने वाला, श्रद्धा का पात्र तथा आध्यात्मिक जागरूकता का प्रतीक बन गया है। वृक्ष को नीचे एक प्राकृतिक शिवलिंग निकला था जिसे THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने आज निर्माण करवाकर 'आनंदेश्वर मंदिर' को स्थापना की है।

आनंद लिंग

आश्रम की दूसरी पवित्र जगह है 'आनंद लिंग' जिसकी विशेषता है वहां का 21 फूट ऊंचा शिवलिंग जिसे आनंद लिंग कहा जाता है। इस पवित्र लिंग का

निर्माण पवित्र नवपाषाण तथा 1008 पवित्र एक दुर्लभ जडी-बूटियों को द्वारा किया गया है। पानी के फव्वारे आनंद लिंग को स्नान कराकर ' वैद्य सरोवर' में जा गिरते हैं। इस पानी में लगाई गई एक डुबकी शरीर को विशेष ऊर्जा प्रदान करती है। इस सरोवर में स्नान करने से दिमाग फिर से नया व ताजा हो जाता है। स्नान के बाद जातक को स्वयं में एक रूपांतरण दिखाई देने लगता है। इस सरोवर में वो सभी ऊर्जाएं जो गुरुओं के द्वारा इसमें प्रवाहित की गई हैं, मौजूद हैं। ये सरोवर पवित्रता का अनोखा रूप हमारे सामने रखता है।

किसी भेदभाव को एक वैदिक सुत्र में बंध कर आत्म-रूपांतरण के गुण सीखते हैं और स्वयं को रूपांतरित करते हैं। भीतरी विकास के लिए यह स्थान एक अच्छा अवसर व वातावरण उपलब्ध कराता है तथा स्वयं को प्रस्तुत कर विश्व में अपनी सेवाओं को देने के लिए तैयार भी करता है।

घर से परे एक और घर

आश्रम का वातावरण बहुत ही अपना एवं घर की तरह सरक्षित है यहां आकर ऐसा नहीं लगता कि आप किसी अनजान जगह पर हैं। हजारों लोगों के लिए जो तीन महीने या उससे अधिक के लिए आवासीय कार्यक्रम में शामिल होते हैं उनके लिए यह घर से परे एक और घर ही है।

साधारण सहभागी प्रतियोगियों को लिए सुख-साधनों के साथ यहां सब कुछ उपलब्ध है।

आश्रम में शुद्ध शाकाहारी एवं सात्विक भोजन के लिए रेस्तरां की भी सुविधा है जहां नॉर्थ हिन्दू, साउथ हिन्दू तथा कॉटिनेन्टल भोजन मुख्य रूप से उपलब्ध है।

यहां पर इंटरनेट की सुविधा पूरे दिन सुचारु रूप से उपलब्ध रहती है जिससे आश्रम में रहने वाले तथा उसकी गतिविधियों में भाग लेने वाले नए लोग एक दूसरे को संपर्क में सरलता से रहते हैं।

नैमीशारण्या

नैमीशारण्या पहला आध्यात्मिक विश्वविद्यालय था जो जिजनासओं को आध्यात्मिक शिक्षा बिना किसी बाध्यता के देता है। यहां दूसरों को जगाने वाले अर्थात अध्यात्मक का पाठ पढाने वाले आध्यात्मिक शिक्षक स्वयं जाग्रत अवस्था को उपलब्ध है इसलिए वह दूसरों के आत्म-जागरण में सहायक सिद्ध होते हैं। एक सच्ची विचारधारा के आध्यात्मिक विश्वविद्यालय का आश्रम कैंपस हमेशा एक ऊर्जा से भरपुर नजर आता है।

स्वागत केंद्र पहला द्वार है सैलानियों को स्वागत का, इसके बाद वो आश्रम प्रांगण में अपने पांव रखते हैं। इसके बाद मिशन का कार्यालय है जहां पब्लिकशन एवं वेब डेवलपमेंट की टीम स्वामी जी के संदेश को विश्वभर में पहचाने के लिए जोर-शोर से अपना काम निरंतर करती रहती है। इसके अलावा अन्नालय (रेस्तरां) में सभी को निःशल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता है।

हिन्दू संस्कृति को विश्वभर में विख्यात करना

नित्यानंद ध्यानपीठ का पश्चिमी मुख्यालय लांस एंजिल्स, कैलिफोर्निया यु. एस.ए. में है। इस संस्थान के द्वारा लगभग 30 वैदिक मंदिरों का संचालन हो रहा है जिसमें हजारों देवी-देवताओं की मर्तियां स्थापित है। जहां भक्तों द्वारा निरंतर उपासना, धार्मिक समारोह, ध्यान, संस्कृत कक्षा, वैदिक मंत्रों का उच्चारण और सत्संग होते हैं जहां हिन्दू तथा विदेशी भक्त एक साथ पूजा पाठ तथा इन समारोह में शरीक होते हैं। इन मंदिरों में रोजाना श्रद्धालु आते हैं। इसके अलावा श्रद्धालुओं ने लगभग 400 पादुका मंदिर तथा लगभग 1000 गृह मंदिरों का निर्माण भी करवाया है।

यह 'महान क्यों?

भगवत गीता का प्रारंभ ही इस 'महान क्यों?' को प्रश्न से होता है जो प्रतिबिम्बित करता है उस व्यक्तिगत संकट काल को जिसका हम सब भी जीवन के किसी न किसी बिन्दू पर सामना करते हैं।

हम सब भी इसके प्रमुख पात्र अर्जुन के जीवन के एक बेहद संकट की घडी की ओर खिंचते हैं जब निमित्त रूप में यह प्रसिद्ध राजकुमार एक खूनी संघर्ष के लिए तैयार होता है और पाता है कि उसके अपने परिवारजन, निकट-सम्बन्धी एवम गुरुजन शत्रु की सेना में उसके विरुद्ध युद्ध को लिए तैयार हैं तब अपने मन के भावों, कर्तव्य बोध की गलत समझ तथा एक जागृत चेतनता के साथ यह राजकुमार स्वयं को एक बेहद दुविधा में संलिप्त पाता है। आज पांच हज़ार वर्षों के बाद भी यह दुविधा मानवजीवन के अनुभव में अभी भी जी रही है। हमारे प्रश्न भी अर्जुन के प्रश्नों से ज्यादा फर्क नहीं हैं

    • हम यहां क्यों हैं?
    • हम अपने जीवन में जो कुछ भी करते हैं, वह क्यों करते हैं?
    • इस विश्व में वर्षों को प्रयत्नों के बाद भी हमें संतुष्टि क्यों नहीं मिलती?
  • असंख्य चुनौतियों का हल टूटने या उनसे पार पाने के बाद भी क्यों ये चुनौतियां, हमारे, सामने, आती, रहती, है?
      • हम किस प्रकार आध्यात्मिक रूप से परिपक्व और संपूर्ण व्यक्ति बन सकते हैं? इस मार्ग पर चलने की जरूरत भी क्यों पड़ती है?

इस 'क्यों?' का उत्तर एक सीधे सादे ढंग से दिया जा सकता है-आप यहां इसलिए हैं कि आपको अपनी चरम संभावना को प्रकट करना है।

परन्तु आप में से हर एक को इस 'महान क्यों?' से खुद ही निवटना है। आप इसे जाने या न जानें पर आपकी इस 'क्यों' को बारे में गहनतम आशकित। अपने उद्देश्य को बारे में चरम स्पष्टता ही आपके यहां होने के उद्देश्य को प्रकट कर आपको जीवन का सामना करने के लिए प्रेरणा, ऊर्जा और साहस प्रदान कर सकती है।

यह 'महान क्यों' ही ईश्वर के बीच की उपस्थिति बताता है। जब आपको पृथ्वी ग्रह पर भेजा जाता है तो यह बीज आप में स्थापित कर दिया जाता है जिससे कि आप तब तक विश्रान्त न हो जब तक कि इस बीज को पल्लवित कर एक फलदार वृक्ष न बना दें। यह समझ लें कि हर बीज में 'वीर्य' रूप में एक ऊर्जा विद्यमान रहती है जो तब तक शान्त नहीं होती जब तक कि यह और बीज न पैदा कर दे। यदि आप इस बीज का भक्षण भी करलें तब भी आप इसे नष्ट नहीं कर सकते क्योंकि वह वीर्य आपके शरीर में प्रविष्ट होकर अपना काम किसी दूसरी तरह से करने लगता है।

यह 'क्यों' का प्रश्न आपके 'डी एम ए' के ढांचे में प्रविष्ट हो कर आपको स्वयम् को पहिचानने में सहायता करता है।

अर्जुन की तरह आप भी चैन से नहीं बैठ पाएंगे जब तक इस 'महान क्यों' का अपने लिए अर्थ न स्पष्ट कर लें।

जिस प्रकार कृष्ण ने अर्जुन के प्रश्नों को सुना-समझा, वैसे ही THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी पाठकों के प्रश्नों और संशयों पर ध्यान एकाग्र कर, बदलाव के पथ पर उनका मार्ग-दर्शन करते हुए तब तक प्रयास नहीं छोड़ते जब तक कि वे या हम सब अपनी पूरी संभावनाओं को पहिचान लें और पृथ्वी पर देवताओं की भांति रहने लगें। जैसे-जैसे आप इस पुस्तक को पढ़ते जाएंगे. आपको जी की उपस्थिति महसूस ही होगी जो आपको आपको आपके अद्वितीय किन्तु आत्म-साक्षात्कार को वैश्विक पथ का मार्ग दर्शन करते प्रतीत होंगे।

सुनने की कला

गीता के पहले अध्याय में तो अर्जुन ही लगातार बोलता है और कृष्ण उसको सुनते ही रहते हैं।

कोई बुद्धिमान व्यक्ति ही दूसरे व्यक्ति को बोलने दे सकता है। वैसे तो हम सब आपस में बात करते हैं परन्तु 'वास्तविक' बातचीत नहीं हो पाती। हम तो एक दूसरे से मात्र एक के बाद एक 'एकालापों' का ही विनिमय करते रहते हैं। हम अपनी सौम्यता में यह दिखाते हैं कि दूसरे को हम सुन रहे हैं जिससे कि जब हमारी बारी आए तो हमें भी सुना जाए। दूसरे को बोलने का अवसर देना बुद्धिमानता की निशानी है और सुनने को भी बुद्धिमानता की ही दरकार होती है।

क्योंकि जब आप दूसरों को सुनते हैं तो आप स्वयं को भी सुनते हैं और दूसरों को न सुनने के दौरान आप स्वयं को भी नहीं सुनते! आप बात समझे न! जब आप स्वयं को सुनना सीख जाते हैं तभी आप दूसरों को सुन पाते हैं। और दूसरों को सुनने के दौरान ही आप स्वयं को भी सुनते हैं। क्योंकि कोई भी श्रवण

तभी संभव होता है जब सम्पूर्णता के अंतराल में हो। आप समझ लीजिए! जब आप सम्पूर्ण होंगे तभी सून पाएंगे। यदि आप में किसी प्रकार का अध्यूरापन है तो आप सुनने के काबिल नहीं रहेंगे।

यह असम्पूर्णता या अधूरापन क्या है? उदाहरण के लिए आप अभी यहां बैठे मुझे सुन रहे हैं। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं कर रहे क्योंकि आप सोच रहे हैं : " अरे मैं यह नहीं कर पाया-वह नहीं कर पाया-यह नहीं हुआ-वह नहीं हुआ-"मैं परेशान हूं-इत्यादि। यह व्यग्रता आपका अधूरापन दिखाती है। यदि आप में ऐसे अधूरेपन हैं तो स्पष्ट समझ लें कि आप मुझे नहीं सून रहे। आप यहां किसी मजबूरी या अन्य कारण से बैठे जरूर हैं पर आप मुझे सून नहीं रहे और जब आप सुनते नहीं तो आप के अन्दर ज्यादा से ज्यादा अधूरापन आता जाएगा। यह एक विषम-चक्र है।

यदि आप सूनते हैं किसी प्रबुद्ध ज्ञानी की सम्पूर्णता से पैदा हुए शब्द, तो अचानक आप पाते हैं कि इन शब्दों से नि:सुत ऊर्जा आपके आंतरिक अंतराल में प्रवेश कर उसे बदल रही है। देखिए! जब आप यहां आए और मुझे अपनी समस्याओं के बारे में बताया तो मैंने पूरी श्रद्धा से उनको सूना। इसी वजह से आपको एक हल्कापन महसूस हुआ और आपको लगा कि आपकी समस्याएं कोई बड़ी समस्याएं नहीं रह गई हैं। यह सही रूप से सुनने की ताकत का प्रताप है जो आपकी अन्तर्रप्रजा को चेतन करता है। सही प्रकार का श्रवण आपकी आंतरिक बुद्धिमता को जागृत करता है। सुनना ईश्वर है। यह कार्य का विभ

मात्र सुनने से ही (अर्जुन की समस्याएं) कृष्ण अर्जुन की भय को अशांति दूर कर सके, अर्जुन के अधूरेपन को भर सके। कृष्ण हमें इस प्रकार अपनी पूर्णता का दिग्दर्शन कराते हैं, अपने श्रवण-शक्ति की महिमा का प्रताप दिखाते हैं। वह सिर्फ सुनते हैं और अर्जुन अपने दिल का पूरा गुबार निकाल देता है। और तब ही असली गीता शुरु हो सकती है।

अर्जून का मूल विचारविन्यास ( रूट पैटर्न )

यह समझ लें कि जब कृष्ण अर्जुन को सुन रहे हैं तो वह उसमें दिलचस्पी नहीं ले रहे जो अर्जुन शिकवे कर रहा है वरन उसमें उनकी अधिक दिलचस्पी है जो उसकी मूक समस्या है। कृष्ण यह भी नहीं चाहते कि जो उन्हें मालूम है वह सारा कुछ व्यक्त कर दें। वह अर्जुन को खुलकर बोलने को अनुमति देते हैं जिससे वह (कृष्ण) उसकी समस्या की तह तक जा कर उसके समाधान पर ध्यान केन्द्रित कर सकें। क्योंकि वह जानते हैं कि एक बार अर्जुन अपनी सारी समस्याएं व्यक्त कर सकें. तो वह स्वयं ही उनका हल पा सकता है। जैसे-जैसे

अर्जन लगातार बोलता जाता है वह अपनी समस्या की जड तक पहुंचता है-यानी उसका मूल विचार विन्यास!

मैं अब मल विचार विन्यास (या सोचने का सहज तरीका) को परिभाषित करना चाहता हूं। जीवन में प्राप्त होने वाला वह पहला शक्तिशाली संज्ञान-बोध जो आपको इनका प्रभावित करता है कि आप वैसा ही संज्ञान लेने के अभ्यस्त हो जाते हैं जैसा आपका मूल विचार विन्यास (रूट थॉर पैटर्न) है।

जब किसी शक्तिशाली भाव का प्रथम आक्रमण आपके सोच-संज्ञान पर होता है तो यह आपके जीवन के पूर्ण संज्ञान क्रम को विचलित कर उसे असंतुलित कर देता है। ठीक उस क्षण में जो सोचने का तरीका आप चुनते है वही आपका मूल विचार विन्यास बन जाता है। जब आप जीवन में पहली बार शक्तिहीन और असहाय महसूस करते हैं तो यह पैटर्न स्वत: विकास पाने लगता है। यानी जब आपका विशुद्ध संज्ञान असंतुलित होता है तब आपके मस्तिष्क का जन्म होता है।

आप जैसे प्रतिसाद देते हैं, बर्ताव करते हैं, या कोई बात महसूस करते हैं, उसका मल तरीका इसी थॉट रूट पैटर्न (मुल विचार विन्यास) से ही आता है। यह एक सीमित करने वाला संज्ञान प्राप्त करने का तरीका है जो आपमें बचपन से ही होना प्रारंभ हो जाता है और आप पर हावी होता रहता है। कभी. यह भय के रूप में. कभी लालच. ईर्ष्या या स्वयं को सही सिद्ध करने के निर्णय के रूप में प्रकट होता रहता है। कभी-कभी तो सिर्फ संशय या चिन्ता के भी रूप से उभरता है।

गीता को प्रारंभिक अध्यायों में अर्जुन अपने इसी मूल विचार, विन्या अनुसार ही काम करता है जो उसे मां-बाप द्वारा सिखाए गए पाठों या सामाजिक अनुकूलन के जरिए प्राप्त शिक्षा से प्राप्त हुआ है-अर्थात क्या करना चाहिए और क्या नहीं। पर जैसे ही उसके सामने उसके विस्तृत परिवार के लोग शात्रु बन कर सामने आते हैं वह शक्तिहीन महसूस कर युद्ध करना नहीं चाहता और मेरे अपने लोग मेरे अपन लोग' कह कर विलाप करने लगता है। अपने इस परिवार से जुडाव के तन्तु उसकी अस्मिता बनाते हैं और अर्जुन के लिए इन नातों को तोड़ना स्वयं को नष्ट करने के समान लगने लगता है! यही अर्जुन की मूल दुविधा है।

और इसी क्षण 'गीता' प्रारंभ होती है; कृष्ण अंतत: बोलने लगते हैं। गीता के बाद के अध्यायों में कृष्ण करुणाद्र हो कर अर्जुन का मार्ग-निर्देशित करने लगते हैं तथा उसे अपने मूल विचार विन्यास की जकड़न से छुड़ाते हैं। वे उसे सम्पूर्णता की ओर ले जाते हैं- परम ज्ञान एवम् प्रबोधन की तरफ अग्रसर करते हैं। अर्जन जीवन-मुक्ति में पुर्नस्थापित होता है और एक सजीव प्रबोधन प्राप्त करता है।

चार तत्वों द्वारा कृष्ण के उपदेशों के सार की समझ प्राप्त करना

'गीता' में कृष्ण के उपदेशों का सार चार साधारण किन्तु शक्तिवान सार्वभौमिक सिद्धान्तों के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है : सम्पति, श्रद्धा उपायनम एवं आपायनम्! अब मैं इन चार सिद्धान्तों को परिभाषित करूँगा।

    1. सम्पति ( इन्येग्रिटी ) : का अर्थ है मनस: वाचा कर्मणा स्वयं को सम्पर्ण करना और दसरों को भी ऐसा ही अनुभव-पूर्णत्व प्रदान करना। - - - - - - - -यानी स्वयं को और अपने जीवन को सम्पूर्ण करना।
    1. श्रृद्धा ( ऑथोर्टिसिटी ) : स्वयं को अपनी योग्यता के शिखर तक ले जाकर स्थापित करना, जीवन में वही बनना जो हम चाहते हैं कि हम हों या जैसा हमें दसरा समझें और उनकी अपेक्षा पर खरे उतरना।
    1. उपायनम ( टिस्फॉन्सेविलिटी ) : जीवन में जो सत्य हमें मिलता उसका सही प्रतिसाद देते हुए उसको जीना और इसलिए अपने चारों ओर घटित होने वाली गतिविधियों के लिए स्वयं को उत्तरदायी समझना!
    1. साथ समझना कि हम प्रतिबद्ध हैं सदा समृद्ध होने के लिए अर्थात जीवन में तब अपने चारों ओर अपना विस्तार पाने के लिए।

इन चारों सिद्धान्तों के द्वारा जीवन की हर समस्या का समाधान व्यवहारिक रूप से पूरी दक्षता और योग्यता के साथ प्राप्त किया जा सकता है। मैं अपने समुचे व्यक्तिगत अनुभव द्वारा यह कह सकता हूं कि इन चार सिद्धान्तों में समस्त आध्यात्मिक शास्त्रों का सार निहित है, वस्तुत: इनमें जीवन का निचोड है। अब मैं इन्हीं चार तत्वों को माध्यम से कृष्ण को उपदेशों का सारांश दुंगा।

सम्पूर्ति सफलता के लिए रणनीति

सुनिए! हम सभी सच्चाई या ईमानदारी से वाकिफ हैं। इसका अर्थ लगभग परी तरह नैतिक और सदाचारी होना होता है। परन्तु सम्पूर्ति के तत्व के साथ हम सच्चाई से भी एक कदम आगे जाते हैं। सच्चाई में तो आपको दूसरों को दिए गए अपने वचन निभाने हैं जबकि सम्पूर्ति में आपको स्वयं को दिए वचनों का भी परी तरह निर्वाह करना होता है। सच्चाई का अर्थ सम्पूर्ति नहीं यद्यपि सम्मूर्ति में सच्चाई का तत्व निहित होता है।

यह दर्भाग्य ही है कि समाज हमें दूसरों को दिए अपने वचनों को निभाने की तो सीख देता है परन्तु स्वयं को दिए गए वचनों को निभाने के बारे में कछ नहीं कहता। वस्तुत: स्वयं को दिए गये वचनों को निबाहना भी उतना ही बल्कि ज्यादा जरूरी है। क्योंकि जीवन में आपकी हर चीज प्रवाह, संतोष, सम्मति, चैन के अनुभव इत्यादि-सब इसी पर निर्भर करते हैं कि आपने स्वयं को दिए गए वचनों को कितना निभाया है।

यह समझ लें कि आपके स्वयं को दिए गए वादे आपके जीवन को आधार-ढाॅचा बनाते हैं। यदि आपने स्वयं में वादा किया कि आप डाक्टर बनेंगे और न ही आपने उसे पूरा किया न पूरा करने का कोई प्रयत्न किया तो यह ट्रटे वादे की तरह सदैव आपके हृदय में चुभता रहेगा। सम्पूर्ति से ही स्पष्ट होता है कि आप स्वयं को प्रति कितने ईमानदार रहे हैं या दूसरों को प्रति अपने अपने वचन निभाने का पूरा प्रयत्न किया है।

क्योंकि जब आप स्वयं को दिए गए अपने वादों को भंग करते हैं तब आपका आत्म-विश्वास जाता रहता है। जितनी ज्यादा आप देने के बाद अपनी कसमें तोड़ते रहेंगे उतना ही आपका आत्म-विश्वास घटता जाएगा। इसी प्रकार जब आप दूसरों के प्रति ईमानदार नहीं रहेंगे तो वे भी आपके प्रति ईमानदार नहीं रहेंगे। उनका भी आपके प्रति विश्वास खोता जाएगा। मसलन बात अपना वचन निभाने को है; वचन स्वयं से दें या दूसरों को। उनको न निभाने या निभाने का प्रयत्न भी न करने की स्थिति में आपका आत्म-विश्वास और दूसरों का आपको प्रति विश्वास तो खत्म होता ही जाएगा। अर्जून के साथ रण-क्षेत्र में यही होता है।

जन्म से क्षत्रिय अर्जून एक योद्धा है और पाण्डु का राजकुमार पुत्र है। जब पाण्डवों ने अपने चचेरे भाइयों कौरवों से युद्ध करने का अपना निर्णय लिया तो अर्जन को अच्छी तरह मालूम था कि इस शत्रु समूह में कई लोग उसके विस्तृत परिवार के भी शामिल हैं लेकिन बतौर क्षत्रिय के युद्ध करना उसका धर्म था। परन्तु जब रण क्षेत्र में अपने मित्रों 'गूरुओं चाचा-ताऊओं सम्बन्धियों आदि को शत्रु सेना के शीर्ष पर देखता है, जो उसे उसके व शत्रू नहीं लगते जो उसका राज्य हड़पने का मन्तव्य रखते हैं या जिन्होंने उसके भाईयों और पत्नी से सबके सामने अपमानित किया हो-तो वह विचलित होता है। क्योंकि ऐसा समझना उसके मां-बाप, समाज इत्यादि द्वारा किए अनुकूलन का प्रतिफल है। इसलिए

वह स्वयं को कमजोर समझ कर रण क्षेत्र से पलायन करना चाहता है। इस यूद्ध से पलायन को निर्णय के साथ ही उसकी सम्पूर्ति का भाव खंडित हो जाता है क्योंकि वह अपने क्षत्रिय धर्म का निर्वाह नहीं कर रहा। वह अपने धर्म से च्युत हो जाता है। क्योंकि क्षत्रिय के रूप में तो कौरवों के विरुद्ध युद्ध

समझते हैं - आपका मम्कार भाव वह सदा आपकी वास्तविकता से कम ही होता है और आपका वह भाव जो आप दूसरों को बनाते हैं – अहंकार-सदा आपको वास्तविकता से अधिक ही होता है। दूसरों और आपके लिए आपका

अहंकार जो वास्तविक रूप है उससे सदैव ज्यादा ही रहता है। उदाहरण के लिए आप भले ही स्वयं को डरपोक समझते हों पर आप सदा स्वयं को मजबूत और शक्तिशाली दिखाने का प्रयास करेंगे। जो लोग ममकार का उच्च भाव होते हुए भी अपना अहंकार भाव निम्न स्तर पर दिखाएं, ऐसे दर्लभ हैं। और कई बार आपका अन्यकार भाव - यानी दूसरों को मन में आपके प्रति

भाव - सदा ममकार और अहंकार दोनों से बिल्कूल फर्क होता है।

श्रद्ध (ऑथेन्टिसिटी) का मतलब सिर्फ अपने हिसाब में अपने शिखर पर ही नहीं रहना या अपने अनुसार अपने उस शिखर स्थिति को दूसरों को ही नहीं दिखाता है, पर दूसरों के आकलन के अनुसार भी आपको शीर्षस्थ या अपने शिर पर कायम रहता है। जब आप अपनी पूरी योग्यता को फैलाकर दूसरों की छवि या अपेक्षाओं को अनुरूप स्वयम को ढाल लेते हैं। तब आप अपने अंदर निहित असाधारण योग्यताएं

और क्षमताओं का या चमत्कारों को दिखा देने में सफल होते हैं।

हर बार जब आप स्वयं को उठाकर या पूरी खींचतान कर दूसरों को अन्यकार के अनुरूप स्वयं को ले आते हैं तो आप पूर्णल्व प्राप्त करते हैं। तब आप एकात्मता प्राप्त करते हैं। जब आप दूसरों को अन्यकार भाव तक स्वयं को ले आते हैं तभी आपको अपनी व्यक्तिगत अधिकता या पहिचान से मुक्ति मिलती है। दूसरों के अन्यकार तक स्वयं को ले आने में अहंकार और भयंकर दोनों से मुक्ति मिलती है।

आप सोच सकते हैं : "मैं तो उसके लिए जिम्मेदार हूं जो मैं महसूस करता हूं य जो मैं अपनी पहिचान दूसरों तक प्रक्षिप्त करता हूं। पर दूसरों की मुझ से अपेक्षााओं को प्रति मैं क्यों जिम्मेदारी लूं?"

जब तक आप समझते हैं कि दूसरों की अपेक्षाओं को अनुरूप खरे उतरने के लिए आप अपनी पहिचान या आस्मिता में इतनी खींच तान कर रहे हैं, तब तक आप झुंझलाहट, विक्षोभ एवमं भारीपन महसूस करते रहेंगे। इस महत्वपूर्ण सत्य को स्पष्ट समझ लीजिए। यह आप ही हैं जो दूसरों की अंर्तचेतना में प्रविष्ट हो कर उनके मन में आपके प्रति अपेक्षाए पैदा कर रहे हैं और इसलिए वे आपसे आशा करते हैं कि यह सब कुछ आप में मिलेगा। इसके लिए आपके शहर और चेहरा या शरीर भाषा जिम्मेदार है कि उनके मन में आपके लिए यह अपेक्षाएं पैदा हुई। इसलिए चाहे आप मानें या न मानें, जाने या न जानें दूसरे को आपको प्रति अन्यकार को लिए भी आप ही जिम्मेदार हैं।

करने के अपने निर्णय को उसे निभाना चाहिए था। नहीं तो उसे युद्ध करने का निर्णय लेने की ही क्या जरूरत थी? स्वयं को कमजोर समझते हुए युद्ध क्षेत्र को त्यागने का निर्णय उसकी अपनी धर्म सम्पूर्ति से च्युत होना दर्शाता है।

जब हम अपने मूल विचार विन्यास के अनुरूप काम करते हैं तो ऐसा ही होता है। आप अपनी सम्पूर्ति के भाव से गिरते हैं क्योंकि आप अपने वचनों का निर्वाह नहीं कर पाए। इसके बदले आपका मूल विचार विन्यास प्रतिसाद देने लगता है। इस ऊहापोह से मुक्ति तो तभी मिलेगी जब आप में पुन: सम्पूर्णता आए। अपने 'सांख्य-योग' एवम कर्मयोग को स्पष्ट करने वाले संबंधों के माध्यम से कृष्ण अर्जुन से जीवन को प्रकृति और कर्म का उद्देश्य समझाते हुए उसको सहायता करते हैं जिससे वह अपने मूल विचार विन्यास द्वारा सीमित संज्ञेय-बोध की कमी का निवारण कर पुन: पूर्णता पाने के लिए सही समय प्राप्त कर सके। कृष्ण अर्जुन को दो मुख्य अवधारणाएं समझाते हैं : 'नित्यम' (अर्थात शाश्वत प्रकृति) और 'न त्वम् शोचि तुमहिमि' (शोक करने की व्यर्थता)। अपने शाश्वत रूप को स्पष्ट करते हुए कृष्ण अर्जुन को सारे तर्कों से परे ले जाकर सही समझ दिखवाते हैं जिससे कि उसके मूल विचार विन्यास में पूर्णता पा सम्पूर्ति का भाव फिर आ सके।

अब अर्जुन दूसरा पाठा सीखने को तैयार है-श्रद्ध का!

श्रद्धा के माध्यम में अपनी सर्वोच्च क्षमता ( या योग्यता ) की खोज यहाँ मैं आपके साथ एक महत्वपूर्ण अवधारणा का साझा करना चाहता हूं; सुनिए!

आप समझते हैं आपकी एक आस्मिता या पहिचान है। पर वास्वत में आपकी चाह पहिचान के सूत्र हैं। आप अपने को एक आयामी समझते हैं पर आपने चार आजम हैं।

  1. ममकार - जो आपके अनुसार आप हैं।

  2. अहंकार जो आपके अनुसार आप औरों को दिखाना चाहते हैं।

  3. अन्यकार जो दूसरे समझते हैं कि आप हैं।

  4. स्व-अन्यकार जो आप समझते हैं कि जीवन आपके लिए होना प्रारीक चाहिए।

यह चारों अन्मिताएं आप में निहित रहती है

श्रद्धा ( औथेन्टिसिटी) का काम है इन चारों अन्मिताओं को सूसंगत रखना और इन चारों में आपकी सर्वोच्चता कायम रखना। प्राय: आप जैसा खुद को

सनिए : जब आप अपने दिल की सूनने को तैयार ही नहीं है और अपनी काबिलियत को पूर्ण विस्तार देने को राजी ही नहीं हैं, तो ईश्वर आपको मदद के लिए दूसरों के मन आपके प्रति ऐसी अपेक्षाएं जलता है कि आप अपनी क्षमताओं का विस्तार दें। यानी यह आपका वह प्रच्छन्न भाग है जो आपके द्वारा दबाया गया है है और जो अपनी पूर्ण विमोचन चाहता है। जब आप नहीं सुनते तो वह दूसरों को हृदय में भाव रूप से जाकर उनकी आपके प्रति अपेक्षा बनता है जिससे आपका वह दस हिस्सा भी पूरी तरह उजागर हो सके और अपनी पूर्णता पाए!

ममकार की जड़ में आपका जीव है-यानी आपकी आत्मा जो हम सबको एकात्मता पैदा करती है क्योंकि उसके लिहाज से तो हम सब एक ही हैं। यदि आपने इसे एक शरीर में दक्ष था तो यह दूसरे शरीर में उभर आती है। जब आप अपनी आशाओं को अपने शरीर में दक्ष-छिपा रहे हैं-यानी आप जब ममकार की अपेक्षाएं दबा रहे हैं-तो यह सीधे-साधे दूसरों के आपके प्रति अल्पकार में उभर आती है। इसमें आपको कोई भी बाध्य नहीं कर रहा। यह तो आपको अपनी स्वयं को बारे में उम्मीदें हैं जिन्हें आप एक मौका और देना चाहते हैं। अब यह किसी और के अन्यकार का हिस्सा नहीं रहा। अब तो आप अपने ममकार और अहंकार को विस्तृत कर उनको पूर्णत्व दिला रहे हैं।

दूसरों की आपके प्रति अपेक्षाएं वस्तुत: ईश्वर की ओर से आपको याद दिलाने को प्रक्रिया का भाग है कि ईश्वर या भगवान चाहता है कि आप स्वयं को एक और मौका देकर अपने को पूरी तरह पहिचानें। जब आप पहिचानेंगे कि यह भी तो आपकी ही अपने बारे में उम्मीद या अपेक्षा है तो आप पूर्णत्व प्राप्त कर लेंगे। भगवत गीता अर्जून को अपने बारे में दबी हुई कामनाओं का प्रकटीकरण है जिससे कि वह अपने भीतर के दैवत्व को समझ ले।

इसके प्रारंभिक अध्यायों में कृष्ण अर्जुन को प्रति अपने अन्धकार का उसके साथ साधा करते हैं। वह अर्जुन को उदबोधित करते हैं कि वह अपने शाश्वत आनन्द पूर्ण आत्म तत्व को पहिचानें। वह इस सत्यक के बारे में उससे बौद्धिक समझ भी प्रदान करते हैं। 'ज्ञानकर्म सन्यास योग एवम सन्यास योग अध्यायों को माध्यम से कृष्ण इसको प्राप्त करने का अर्जुन को मार्ग दिखाते हैं। फिर कृष्ण अर्जून की समझ को और गहराई देते हुए मृत्यू वैराग्य और सन्यास के गहन सत्य स्पष्ट करते हैं।

जैसे ही एक बार अर्जुन के मन में यह समझ बैठी कि कृष्ण उसे अगले तत्व उत्तरदायित्व (जिम्मेदारी) की ओर ले चलते हैं।

उत्तरदायित्व-स्वयं में स्वयं की उच्चतम संभावना की जागृति अगले अध्याय 'ध्यान योग में दिए गए कृष्ण के उपदेशों का सार इन शब्दों

में स्पष्ट किया जा सकता: "अपने अन्दर देखें; और "स्वयम के उत्कर्ष का उत्कर्ष का उत्तरदायित्व स्वीकार करो!"

यहां कृष्ण अर्जन को वे तकनीकें बताते हैं जिनके द्वारा वह अपने मन और इन्द्रियों से परे जाकर मुक्त हो सके। वह अर्जून को निर्देश देते हैं कि कैसे वह स्वयं को 'ईश्वरत्व' स्तर तक उठाए (अर्थात नेतृत्व की चेतना पैदा करे) और स्वयं उन (कृष्ण) जैसा बन सके।

इसीलिए कृष्ण कहते हैं:

उद्धरेदात्यनात्मानं नात्मानभवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्यनो वन्धरात्मैव रिपुरात्मन:॥

अनुवाद: तू स्वयम ही अपना मित्र है और स्वयम ही अपना शत्रु है। दैवत्व की और स्वयम को विकसित कर और स्वयम को नीचे मत ले जा!

इसमें कृष्ण का तात्पर्य है कि यदि तुझे स्वयम को स्वयम के द्वारा उठाने की तकनीक ज्ञात है तो तू अपने अन्दर निहित ईश्वरीय तत्व का मित्र है। यदि तू स्वयम् को नीचे ले जाता है तो तू उस दैवत्व का शत्रु है।

जिम्मेदारी का अर्थ है सोचना, महसूस करना और कर्म करना जीवन का संज्ञान उस सत्य से लेते हुए कि हम स्वयम ही हर चीज का स्रोत है और इसलिए हमारे आस-पास, भीतर-बाहर जो भी घटित हो रहा है उसकी जिम्मेदारी हमारी ही है।

मैं समझ सकता हूं कि एक बड़ा प्रश्न आपके मन में उठ रहा होगा! आप सोच रहे होंगे : मेरे आस पास जो भी घटित हो रहा है उस सबकी जिम्मेदारी मेरी ही क्यों है? मैं तो अधिक से अधिक उसके लिए ही जिम्मेदार हो सकता हं जो मेरे अन्दर घटित हो रहा है। मेरे बाहर होने वाली घटनाओं की जिम्मेदारी मेरी क्यों हो? उदाहरणार्थ. यदि मेरे जीवन में कोई दुर्घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी मेरी कैसे हो सकती है?'

यही सवाल हर कोई करता है।

अब मैं इसका उत्तर देता हूं : मानव!

यदि कोई अपनी करनी की जिम्मेदारी नहीं समझता तो वह एक पशु है। उसकी चेतना का स्तर बहुत ही नीचा है।

जो अपनी करनी की जिम्मेदारी खुद ही लेता है वह एक मनुष्य है। उसकी चेतना का स्तर मध्यवती है।

जो दूसरों की भी करनी की जिम्मेदारी खुद उठा लेता है वह ईश्वर होता है। वह सदा नेतृत्व को चेतना में निवास करता है, अर्थात ईश्वरत्व में।

यह समझ लें कि जब आप अपने चारों ओर घटित होने वाली हर घटना की जिम्मेदारी महसूस करने लगते हैं तब ही आप सत्य की खोज करते हैं या सत्यान्वेसक होते हैं। आपको किसी भी समस्या के समाधान की संभावनाएं दिखाई पड़ने लगती हैं। जब आप यह जिम्मेदारी स्वयं उठाने लगते हैं तो आप उसका हल भी प्राप्त कर लेते हैं।

सुनिए! जब आप कोई उत्तरदायित्व (जिम्मेदारी) उठाते हैं तो आपके माध्यम से उच्च ऊर्जाएं अभिव्यक्त होने लगती हैं। यदि आप जिम्मेदारी की तरफ एक कदम उठाते हैं तो ब्रह्माण्ड एक हजार कदम उठाकर आपको जिम्मेदारी देने को अग्रसर होता हे। जब आप जिम्मेदारी को क्षेत्र या अन्तराल में पहुंचते हे। तो आपके अन्दर और बाहर के अन्तराल भी आपको सहारा देने को आगे आते हैं। वस्तुत: सारा ब्रहमाण्ड आपको सहारा देने को तत्पर रहता है क्योंकि जिम्मेदारी लेने वाले लोगों के संज्ञान के द्वारा उसे स्वयं भी सम्पूण्रता को अनुभूति होने लती हे।

हर स्थिति में अपनी जिम्मेदारी लें। जब आप जिम्मेदारी महसूस नहीं करते तो आप समुद्र में एक बूंद की भांति रहते हैं और जब महसूस करते हैं तो उस बुंद में सारा समुद्र समा लेते हैं। आपके जिम्मेदारी लेते ही ईश्वरत्व-नेतृत्व चेतना-आपमें जागृत होने लगती है।

  • जिम्मेदारी के साथ ही जीवन घटित होता है। फिर तो आप जो देखते या महसूस करते हैं, या वह भी जो अदृश्य है और महसूस नहीं हो पा रहा-वह सब कुछ आपकी जिम्मेदारी बन जाता है जब आप विश्व की और इसमें ईश्वर को व्यस्त प्रभाव की जिम्मेदारी लेते हैं तो ईश्वर का अव्यक्त भाग और समूचा विश्व आपकी जिम्मेदारी लेने लगता हे। जब ईश्वर आपकी जिम्मेदारी लेता है तो आप स्वयं ही ईश्वर हो जाते हैं, आप एक अवतार बनके उतरते हैं विश्व में!

कृष्ण अर्जून का मार्गदर्शन कर इसी जिम्मेदारी के तत्व को माध्यम में उसको कृष्ण चेतना का ज्ञान कराते हें। कृष्ण की मार्गदर्शन की जिम्मेदारी उनके विश्वरूप दर्शन से पूरी होती है जिसमें वह अर्जुन पर अपना ब्रहमाण्डीय आयाम दिखाकर कृपा करते हैं- और अर्जुन को इस दिग्दर्शन से अपने प्रबोधन की पूर्वाभास हो जाता है।

प्रबोधन के साथ आपायनम (एनरिचिंग )

अब हम चतुर्थ तत्व-आपायनम (समृद्धिशीलता) पर चर्चा करेंगे' पहले मैं आपायनम् को परिभाषित करना चाहूंगा।

(एन रिचिंग) आपायनम् का अर्थ है सम्पूर्ति और श्रद्धा का समन्वय! यानी आप लगातार प्रतिबद्ध है कि समृद्धिशील रहेंगे और अपने जीवन में स्वयं को तथा आस-पास के माहौल को विस्तार देकर समृद्ध करते रहेंगे'

आपायनम् अर्थात अपने मित्रों और आसपास के माहोल में प्रथम उपरोक्त तीन तत्वों का लगातर संचार करते रहेंगे।

आप पूछ सकते हैं : "स्वयम् को समृद्धिशील रखना तो समझ में आता है

परन्तु दूसरों की प्रगति या बेहबूदी के लिए मैं क्यों प्रयत्न करूं?

देखिए! जीवन आपको और औरों को मिला है। यदि दूसरे है तभी तो जीवन

होता है।

यह समझ लें कि आपको द्वारा अनुभूत हर सम्बन्ध आपका एक ही आयाम प्रकट करता है। यह आपका पुत्र ही है जो आपको पितृत्व प्रदान करता है; आपकी पत्नी आपको पति बनती है। आपके अनुयायी आपको नेता बनाते हैं। जीवन का हर प्रमुख सम्बन्ध आपका एक ही आयाम प्रकट करता है। और जब तक आपका हर आयाम पूर्ण न हो, तो आप सम्पूर्ण कैसे ही पाएंगे?

बार-बार यह अहम भाव या अहंकार आपको भुलवा देता है कि जीवन आनन्द तब ही प्राप्त होता है जब इसका विस्तार दूसरों के अन्धकार तक हो जाए-और तब नहीं जब इसकी भिड़ंत अहंकार से होती है। हम सब आराम से महत्वपूर्ण तत्व बिसरा देते हैं और अपने जीवन में सभी का संयोग एक सहज घटना मान लेते हैं। हम सोचते हैं : "भाई को भाई जैसा, पिता को पिता जैसा और शिक्षक को शिक्षक की तरह व्यवहार करना चाहिए।" पर यह नहीं सोचते कि आपको अपनी भूमिका कैसे निभानी चाहिए? क्यों एक शिक्षक एक विद्यार्थी को पढ़ाए और उसका ज्ञान समृद्ध करे, अगर विद्यार्थी अपनी ओर से शिक्षक को समुद्ध बनाने की जिम्मेदारी नहीं उठाता?

भगवतगीता बड़ी सुन्दरता से यह बात स्पष्ट करती है : "यदि तू यज्ञ नहीं करता और ईश्वर को उसके द्वारा दिए गए दान का कुछ भी वापस उसे नहीं देता, तो तू चोर है!" इसका अर्थ है जो कुछ भी हम संसार से पाते हैं उसको बिना बढ़ाए हम वापस करते हैं तो यह चोरी है। यह समझ ले कि आयात्यनम का अर्थ है सबकी जिम्मेदारी लेना। मैं आपको बताता हूं कि जब आप दूसरों की जिम्मेदारी खुद लेते हैं तो आप में से असाधारण शक्तियां प्रवाहित होने लगती हें। जब आप दूसरों के आयायनम में तत्तचित्त रहते हैं तब सारा संसार आपके माध्यम से स्वयम् को व्यक्त करने लगता है। आपके अंदर से एक कॉस्मिक इनर्जी प्रवाहित होती है। यदि आप इस ऊर्जा का आस्वाद या अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं तो दूसरों का खयाल करना शुरू कर दीजिए। आपके अंदर एक उत्तेजना, ताजगी, तत्परता, हर्षो-याद की अनुभूति जागती है; आपको एक प्रेरणा शकित मिलती है। यह सब शुद्ध कामिक इनजी का संचार होने के कारण ही तो महसूस होता है।

जरा देखें- भगवान श्री कृष्ण को-आपायनम का चरम रूप। उनकी उपस्थिति मात्र सम्मद्भि प्रदायक होती है। पूरी गीता में वह स्वयम अर्जुन की संशय से पैदा अश्रद्धा का उत्तरदायित्व लेते हैं और उसे छोड़ते नहीं। सम्पूर्ण गीता उनके आयायनम की अभिव्यक्ति है। भगवतगीता भागवान कृष्ण की विश्व को एक ऐसी देन है जो अपने कालातीत सत्यों से अनन्त पीढियों को आयायनम प्रदान करती रही है। भगवान अर्जन को और समस्त मानवता को अन्तमुखी होकर अपने अन्दर विद्यमान करती रही है। भगवान अर्जून को और समस्त मानवता को अर्न्तमुखी होकर अपने अन्दर विद्यमान इश्वरीय चेतना के उद्धुत करने का वरदान देते हैं और इस चेतना को प्राप्त करने के अमाघ सूत्र बनाते हैं।

बारम्बार कृष्ण कहते हैं : "अपने अन्दर के ईश्वररीय तत्व को जानना ईश्वर को जानना है।" जो कृष्ण कहते हैं वह सभी के लिए सत्य है। चाहे आप मानें या न मानें, यह विचार कि आप ईश्वर के अलावा कुछ और हैं, अपने आत्म-सम्मान को गिराता है! आप में जो कमी है वह सिर्फ यही है कि आपको सत्य का ज्ञान नहीं है। एक बार यदि आपकी समझ में आ गया कि आप ही ईश्वर हैं तो आप में और भगवान कृष्ण में कुछ फर्क नहीं रह जाएगा।

आप स्वत: प्रबुद्ध हो जाएंगे।

कृष्ण इतने करुणाशील हैं कि यही बात सिद्ध करने के लिए वह पूरी भगवत गीता अभिव्यक्त करते हैं। कृष्ण यही साबित करने के लिए धरा पर आए थे। उन्हें यह साबित करने को कोई आवश्यकता नहीं थी कि वह स्वयं ईश्वर है।। उनका तो चरम लक्ष्य था यह सिद्ध करना कि 'तुम (हम सब) इश्वर ही!' उनका परम उद्देश्य या अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवता को प्रबद्ध करना।

कृष्ण की अभिव्यक्ति आपायनम का चरम प्रकटीकरण है क्योंकि यह उनका उत्तरदायित्व है आपको (हम सबको) प्रबोधन दिलाना।

इसीलिए वह भगवतगीता का समापन हम सबका अपने मुल विचार विन्यास को सम्पूर्ण करने और हर्षपुर्व के जीवन को समर्पित करने से करते हैं। वह केवल यह कहते हैं : "हर चीज छोडकर मेरी शरण में आ जाओ! एक प्रबुद्ध स्वामी एक सम्पूर्ण एकाग्र जीवन में अधिक और क्या दे सकता है! जब आप अपने ऊहापोहों को छोड़कर उनकी शरण में जाते हैं तो वह आपको मुक्त कर देते हैं। यही चरम आपायनम् है।

तत्व-जीवन का सहज प्रवाह

यह समझ लें कि ये चार तत्व आध्यात्मिकता के अमृत-कुण्ड हैं।

ये हमारे डीएमए में विद्यमान हैं। ये हमारे जीवन के सहज प्रवाह में है। और ये किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं।

जब आप इन तत्वों को जीते हैं तो आप पाएंगे कि .

सम्पति से आपकी निहित बुद्धिमता विस्तार पाकर सीधी हो जाती है और आपके अन्दर एक धनात्मकता का अंतरा जागत होता है।

श्रद्धा से आप लगातार जीवन्त रहते हैं। आप समस्त संभावना के अंतराल को अनुभत करते हैं।

उपपनम (उत्तरदायित्व निर्वहन) से आपकी असली प्रकृति जागत होती हे: ईश्वरत्व-या नेतृत्व चेतना आप में पल्लवित होती है।

आपायनम से आप हर चीज में अपनी उपस्थिति या अस्तित्व स्थापित करते हैं और अंतत: आप अपने आप में ब्रहमान्यम बहुपत्रताम,' अर्थात 'संसार को प्रिय वारिस की अनुभूति प्राप्त करते हैं।

यह चार सार्वभौतिक सिद्धांत आपको हमेशा प्रेरित करते रहेंगे। प्रोत्साहन देंगे और आप अपनी चरम संभावना भी अनुभव करेंगे। जब आप इन तत्वों को जिएंगे तो आपका लगातार विस्तार होगा और आप उस उददेश्य की पूर्ति करेंगे जिसके लिए यह गीता कही गई थी।

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विज्ञान योग ( क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग

तुम आस्तिक के सागर की एक लहर हो। जब लहर की समझ में आता है कि वह सागर से अलग नहीं है, तो उसका सागर के प्रति प्रतिरोध शेष हो जाता है और वह सागर में विलीन हो जाती है।

ही नहीं हैं। यदि आप कार को रोकना नहीं जानते, तो आप कार को नहीं, कार आपको चला रही है।

इसी प्रकार हम इस मन और बुद्धि के द्वारा जीते हैं। अचानक, किसी क्षण हमें यह समझ में आता है कि हम इस शरीर या मन को रोक नहीं सकते। यह

अपनी धून में चलते जाते हैं और नियंत्रित करने योग्य नहीं रह पाते। अपने मन और शरीर को अपनी चैतन्य जागरूकता में लाइए। मन और शरीर अच्छे सेवक तो हो सकते हैं पर अच्छे स्वामी नहीं। सेवक के रूप में वे श्रेष्ठ हैं। बेशक, बिना शरीर और मन के आप जी ही नहीं सकते, न जीवन का आनन्द ले सकते हैं। उनकी जरूरत तो है ही। लेकिन जब तक आपका उन पर नियंत्रण नहीं होता, वे आपके स्वामी बन जाते हैं।

इस संदर्भ में दो ही विकल्प हैं : या आप उनको भोगें या वे आपको भोगें। आपने जब सिगरेट पीना शुरू किया तो पहले आप धूम्रपान का मज़ा लेते हैं। कुछ समय पश्चात् आप धुम्रपान का मजा नहीं उठाते, धूम्रपान आपका मज़ा उठाने लगता है। यही हाल शराब (एल्कोहल) पीने में होता है। कुछ समय बाद एल्कोहल आपको ही पीने लगता है। अर्थात् शुरुआत में तो कोई आदत आपकी चेरी रहती है पर कछ समय बीतने के पश्चात् वही आपकी स्वामिन हो जाती है। फिर तो वह आदत, न कि आप, आपके जीवन को भोगती है। उस स्थिति में आपके पास कोई विकल्प रह ही नहीं जाता। आप स्वयं आदतों के एक समूह बन जाते हैं जिनकी

पुनरावृत्ति बगैर आपके किसी नियंत्रण के अंतर्गत होती रहती है। जब हम कार के 'ओनर्स मैनुअल' को बिना पढे-समझे कार चलाने लगते हैं, तो अचानक हमारी समझ में आता है कि हैण्ड ब्रेक की स्थिति का तो हमें ज्ञान ही नहीं है। हमें यह भी नहीं मालूम पड़ता कि बाएं या दाएं कैसे मुड़ें। इसी प्रकार जब हम मन और शरीर में प्रवेश करते हैं बिना उनके नियंत्रण के ज्ञान के, तो हमारी भी यही गति होती है। इसलिए पहले मन और शरीर पर नियंत्रण करना सीखें, तब उनके नियंत्रण में जाने की चेष्टा करें।

चाहे हम पदार्थवादी जीवन को बात करें या आध्यात्मिक जीवन की, जब तक मन और शरीर हमारे नियंत्रण में नहीं होंगे, हमारा कुछ भी सोचना या करना बेमानी है; निरर्थक है। मान लीजिए, सुबह-सुबह ही हम दिन भर के अपने क्रिया-कलाप का लेखा-जोखा बना लें : "मुझे यह करना चाहिए" या "यह पूरा करना है" इत्यादि। परन्तु जब दिन खत्म होता है, तब हम असहाय से अपने पीने की या सोने की आदत में मुब्तिका होकर दूसरे काम करने लगते हैं। तो ऐसे में पूरे दिन की रूप-रेखा बनाने की क्या सार्थकता रह जाती है? कुछ भी नहीं। हम अपने दिमाग में कुछ भी सोचते रहें, पर दिन के अन्त में अनियंत्रित शरीर तो

क्षेत्र और क्षेत्रज

इस अध्याय में कृष्ण अर्जन को क्षेत्र एवम् क्षेत्रज्ञ के बारे में बताते हैं। इसलिए इसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग भी कहते हैं। इसमें वह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की परिभाषा स्पष्ट करते हैं।

कृष्ण स्पष्ट रूप में उस भौतिक पदार्थ के बारे में बात करते हैं जिसमें हम जीते हैं और उस चेतना का हवाला देते हैं जो पदार्थ में रहती है। किसी न किसी रूप में हम सब इस ब्रह्मांड से जुड़े हैं, चाहे हमारी यह बात समझ में या अनुभव में आए या नहीं आए। इसका मूल कारण चेतना ही है। यह चेतना न सिर्फ इस ब्रह्मांड का उदुगम है वरन इसका कारण भी है। यही वह स्रोत है जहां हमारा आविर्भाव होता है और जहां हम रहते हैं। यह समस्त ब्रह्माण्डीय चेतना वह अंतराल या स्पेस है जिसमें हम घटित होते हैं या होते रहते हैं।

इस बात को स्पष्ट करने के लिए कृष्ण सागर का रूपक बांधते हैं। सागर अर्थात् ब्रह्माण्डीय चेतना या ईश्वर, आत्मा या जो भी हम इसे संज्ञा दें। कृष्ण यह रहस्य खोलते हैं कि हम सभी सागर में उठी लहर के समान हैं जो समग्र सागर में निवास करती है। वह बताते हैं कि कैसे लहर सागर से या हम ईश्वर से एकात्म भाव महसूस कर सकते हैं।

जीवन में समस्या यही है कि हमने भूला दिया है कि हम समग्र सागर के एक अंश-लहर हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हम क्षेत्रज्ञ के ही भाग हैं। क्षेत्रज्ञ का अर्थ है चेतना जिसमें क्षेत्र का कारण पनपता है। क्षेत्र का अर्थ है यह शरीर और क्षेत्रज्ञ का अर्थ है वह चेतना जो जानती है कि उसके पास एक शरीर है। कृष्ण जहां क्षेत्रज्ञ एवम क्षेत्र का रहस्य स्पष्ट करते हैं। यदि हमें क्षेत्रज्ञ का ज्ञान न हो, तो हम समझते हैं कि क्षेत्र ही अपना स्वामी है।

शरीर और हम

एक उदाहरण : आपने एक कार खरीदी और उसे चलाने लगे। कार चलाने के दस मिनट पश्चात् आपकी समझ में आया कि आप इसे बन्द करना तो जानते

तात्पर्य यह है कि हमारे प्राचीन प्रबुद्ध गण या ऋषि लोग चाहते थे कि सबसे पहले हम अपने शरीर व मन को निर्यंत्रित करना सीखें। गायत्री मंत्र इस संदर्भ में हमारा मन शरीर को नियंत्रित करने का एक 'ओनर्स मैनुअल' है। जैसे यदि हमारे पास एक कार हो तो पहली मूलभूत ज़रूरत है हमारे पास 'ओनर्स मैनुअल' होना! यदि हम बिना इस मैनुअल को पढ़े कार चलाने लगेंगे, तो यह किसकी गलती होगी? लगभग सारी ही सवारियों में एयरबैग पर स्पष्ट निर्देश या चेतावनियां दी रहती हैं 'एयरबैग गंभीर दुर्घटना करवा सकते हैं,' या 'बारह वर्ष से कम के बच्चे आगे की सीट पर न बैठें'; 'ओनर्स मैनुअल' द्वारा एयर बैग के बारे में और जानकारी प्राप्त करें।' इसी प्रकार सात वर्ष की आयु में हमें शरीर मन की समझ आती है। इसके पूर्व तो हम सहज वृत्ति (इन्सटिक्ट) के स्तर पर काम करते हैं। सात वर्ष के उपरान्त ही यह सहज वृत्ति बुद्धिमता से संचालित होने लगती है और हम अपने निर्णय भी लेने लगते हैं। जब हममें यह क्षमता पैदा होती है, तब यह जरूरी है कि हम यह जानें कि शरीर-मन को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए वैदिक गुरुओं ने यह गायत्री मंत्र को तकनीक सिखाई जिससे हम अपनी चेतना को जागृत कर सकें। यह बिलकल 'ओनर्स मैनअल' पढ़ने के समान ही है कार चलाने को पूर्व।

इसलिए जब तक हमें क्षेत्रज्ञ का सही ज्ञान न हो-यानी क्षेत्र को जानने वाले का तब तक सही अर्थों में जीवन तो शुरू ही नहीं हो पाएगा। इसलिए वैदिक पद्धति में किसी व्यक्ति का सही जन्म तब माना जाता है जब उसकी व्यक्तिगत चेतना जागत हो जाए। तब तक उसका भौतिक जन्म तो स्वीकार्य होता है पर उसे मनुष्य भी नहीं माना जाता। वेदों के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की आन्तरिक चेतना जागृत हो पाती है, तभी उसे मनुष्य रूप में पैदा माना जाता है। इसके पूर्व तो वह एक पशू के समान है।

संस्कृत में 'मनुष्य' शब्द के दो अर्थ हैं : एक है 'मनु' के वंशज और दूसरा : 'वह जो मन को संभाल सके या वह जो मन के परे भी जा सके!' मन तो हमारे आदिपूर्वक माने जाते हैं। जब हम अपने मन पर नियंत्रण साध सकें, तभी हम मनुष्य होते हैं। संस्कृत की उक्ति है : 'प्रत्यागात्या चैतन्य जागतम' अर्थ वही व्यक्ति (या मनुष्य) है जिसकी व्यक्तिगत चेतना जागत है।

हिन्दू वैदिक पद्धति में जब बच्चा सात वर्ष का हो जाता है, तब उसे पवित्र गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है। यहां एक बात स्पष्ट समझ लें : वैदिक धर्म या हिन्दू-सनातन धर्म एक मात्र ऐसा धर्म है जिसमें बप्तिज्मा या दीक्षा का कोई नियम नहीं है। आपको न कोई आस्था बताई जाती है, न कोई ऐसी अवधारणा या दर्शन समझाया जाता है। आपसे यह भी नहीं कहा जाता कि किसी खास विचार को ग्रहण करें। यहां सिर्फ वह तकनीक बनाई जाती है जिससे आप मन और शरीर को नियंत्रित कर सकें। बस! गायत्री मंत्र एक ऐसी ही तकनीक है-जिसमें किसी देवता का हवाला नहीं होता। 6 या सात वर्ष के बच्चे को इसी मंत्र या तकनीक से दीक्षित किया जाता है। गायत्री मंत्र का मूल भाव है : "मुझे ऊर्जा पर ध्यान देना है, जो मेरी चेतना को जागृत कर मुझे ध्यान करने में सहायक हो। "-बस!

॥ ॐ भूर् भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

इस मंत्र का और कोई अर्थ नहीं होता। इसमें गायत्री देवी (एक हिन्दु देवी) या किसी पंचमुखी देवता या ऐसे किसी देव का अर्थ नहीं है। इस मंत्र का सिर्फ यही मतलब है : "मुझे उस चेतना पर ध्यान लगाने दो जो मेरी 'धी' (विवेक ब्रिद्ध) को जागृत कर मुझे ध्यान लगाने में सहायक हो! " बस इतना ही अर्थ है।

श्रीमदभगवत गीता

कभी मैंने एक पंक्ति की उक्ति सुनी थी : "एक आदमी, अपने मित्र से कह रहा था–'मेरी राशि पुथ्वी तत्त्व की है और मेरी पत्नी की जल तत्व की। हम मिल के कीचड बनाते हैं।" जल और पृथ्वी अलग-अलग बहुत अच्छे हैं-लेकिन जैसे ही दोनों मिले कि कीचड़ बना। इसी प्रकार चेतना भी बहुत अच्छी है और शरीर भी। लेकिन उनके मिलने से समस्या पैदा हो जाती है। इसलिए हमें यह समझना है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ क्या है -अर्थात् क्या हम हैं और क्या हम नहीं है। हमारे जीवन में समस्या तब पैदा होती है जब हम स्वयं का किसी से तादात्मय स्थापित कर उसे ही अपनी अस्मिता समझने लगते हैं। हम समझते हैं कि हम भी वही है बजाय यह समझने के कि हमारे पास दिमाग है, हम स्वयं को दिमाग ही समझने

लगते हैं और इस प्रकार हमारा दिमाग हमारी 'अहम्मता' बन जाता है। जब तक हम ये समझते हैं कि यह मेज हमारी है, तब तक कोई समस्या नहीं

होती। पर जैसे ही मैं इस मेज को स्वयं ही समझने लगता हूं, समस्या शुरू हो जाती है। इसी प्रकार जब तक हम समझते हैं कि हमारे पास मन और शरीर है, समस्या नहीं होती। लेकिन जैसे ही हम उन दोनों से अपनी अस्मिता को पहचान करने लगते हैं, परेशानी पैदा होने लगती है। कृष्ण कहते हैं : "हमें समझना चाहिए कि हम जो समझते हैं वह हम नहीं हैं।" और इस प्रकार धीरे-धीरे वह हमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का फर्क समझाते हैं।

एक और बात समझ लें। जब हम समझते हैं कि कोई चीज हमसे अलग है, तो हम कभी यह महसूस नहीं करते कि हम इसको त्याग दें। वस्तुत: हमें वह विचार त्यागना चाहिए कि हम स्वयं वही वस्तु हैं। बस! सत्य तो यह है कि हमें किसी जीज को त्यागने की जरूरत भी नहीं। हमें तो बस यही समझना चाहिए कि त्यागने को कछ है ही नहीं! हमें तो बस यही समझना चाहिए कि हमारा मन और शरीर कैसे काम करते हैं। वे लोग जो इस शरीर और मन से त्रस्त होते हैं, इस विश्व की उलझनों में फंसते हैं। लोगों का अन्य वर्ग वह है जो 'तप' के नाम पर अपने शरीर और मन को यंत्रणा देते हैं। मैंने भारत में ऐसे लोगों को भी देखा है जो पांच-पांच वर्ष तक योगाभ्यास के नाम पर बैठे या खड़े रहते हैं। ऐसे भी हैं जो एक पैर पर ही खडे रहते हैं, जमीन पर लोट लगाते रहते हैं या आग पर चलते हैं। इस तरह शरीर को यंत्रणा देने की कोई आवश्यकता भी नहीं होती। वस्तुत: हम शरीर को त्रास इसलिए देते हैं कि हम समझते हैं यही हमें यंत्रणा दे रहा है। इस प्रकार हम उससे बदला लेते हैं। दूसरे छोर पर ऐसे लोग हैं जो विषय भोगों में डूबकर स्वयं का हनन ही करते रहते हैं और इस छोर पर वे हैं जो तपस्या के नाम पर अपने शरीर को यंत्रणा देते रहते हैं। पर इनमें से किसी को नहीं मालुम कि मन और शरीर को कैसे संभाला जाए।

जिसे तुम जानते हो वह तुम नहीं है

  • अर्जन ने कहा : "हे कृष्ण! मैं प्रकृति व पुरुष, अकर्मक एवम 13.1 सकर्मक ऊर्जाओं, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञान की अंतिम सीमा के बारे में जानना चाहता हूं।"
  • 13.2 भगवान कृष्ण ने यह कहते हुए अर्जन को उत्तर दिया : "हे कौन्तेय! यह शरीर 'क्षेत्र' नाम से जाना जाता है। इसको तत्वत: जानने वाले को ज्ञानीजन 'क्षेत्रज' कहते हैं।"
  • " हे भारत (अर्जून)! तु सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ-जीवात्मा मझे ही जान। 13.3 क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को. विकार सहित प्रकृति को और पुरुष को, जो तत्वत: जानना है वह ज्ञान है-ऐसा मेरा मत है।"

कृष्ण (अर्जन को) समझाते हैं : "हे कौन्तेय (कृन्ती पुत्र) अर्जून! इस शरीर को क्षेत्र कहते हैं और जो इस शरीर को जानते हैं, उन्हें क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। "

जिसे आप जानते हैं वह 'आप' नहीं है। यदि आप कुछ जानते हैं, तो वह आप नहीं है। उदाहरणार्थ आप इस पुस्तक को पढ़ सकते हैं क्योंकि यह आपसे अलग है - एक स्वतंत्र वस्तु है। इसी प्रकार यदि आप अपने शरीर को जानते हैं, तो वह जानने वाला आपका हिस्सा नहीं है। यदि आप अपने दिमाग को जानते हैं तथा वह आपका अंश नहीं है। यदि आप अपने विचारों से वाकिफ है, तो वह भी आपका हिस्सा नहीं है। यानी जिसको आप अलग से जान सकते हैं, वह आपका अंश नहीं होता। आप उससे अलग हैं या परे हैं- तभी तो आप उसे जान पाते हैं। वह चाहे शरीर हो या विचार या भावनाएं- यदि आप उसे जानते हैं, तो वह आपका अंश नहीं हो सकता।

अब हमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को अलग करना है-तभी इन्हें समझ सकते हैं। जैसे ही इन्हें अलग किया कि शरीर हर्ष और आनन्द से भर उठेगा-चेतना मुक्त हो जाएगी। जब इन दोनों को एक ही समझा जाता है, समस्या तभी पैदा होती है।

श्रीमदुभगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

समीकरण यह है : ईश्वर + शरीर/मन = मनुष्य मनुष्य - शरीर/मन = ईश्वर!

आप स्वयं चेतना हो : हम चाहे माने या न मानें, हम चेतना हैं। आइए देखें कि कैसे हम इसको नहीं देख पाते और अपने जीवन को गड़दड़धावा बना देते हैं।

नीचे एक सुन्दर कथा दी गई है शरीर-मन को समझने के लिए और कैसे हम स्वयं चेतना न समझने की भूल कर बैठते हैं।

एक गर्भवती शेरनी अपने शिकार की तलाश में जंगल में घूम रही थी कि उसे एक भेड़ों का झुण्ड मिला। उसने उस समूह पर आक्रमण करना चाहा पर भेड़ों का झुण्ड ज्यादा शक्तिशाली निकला। शेरनी वहीं जमीन पर गिर गई और वहीं उसने एक सिंह शावक को जन्म दिया-पुथ्वी पर गिरने के दबाव के कारण और उसी दबाव के कारण वह मर गई।

भेड़ों के झुण्ड ने वह सद्यजात सिंह शावक को देखा। वे भेड़ें उसके साथ खेलने लगीं। उनको लगा कि उन्हें उस बच्चे का ख्याल रखना चाहिए। उस पर तरस खा कर उन्होंने उस बच्चे को अपना लिया और उसका वैसे ही पालन-पोषण करने लगी, जैसे वे अपने बच्चे का करतीं। उसको अपना दूध पिलातीं और नरम घास खिलातीं।

वह सिंह शावक भी भेड़ की तरह बर्ताव करने लगा और उन्हीं की तरह बड़ा होने लगा। वह उन भेडों के साथ मज़े में था। उसे यह नहीं ज्ञात था कि

वह भेडों की जाति का नहीं है। उनसे फर्क योनि का जीव है। कुछ समय बाद समस्या पैदा होने लगी। भेड़ों की जो प्रमुख माता (रानी) थी, उसको शिकायतें मिलने लगीं उस शावक के बर्ताव के बारे में : यह तो बहुत घमण्डी है! यह हमारे साथ ठीक से नहीं खेलता। फलस्वरूप, उस शावक को सबसे अलग कर दिया गया। जब भी कोई झगड़ा होता, तो उसी शावक को दण्डित किया जाता।

कुछ दिन बाद वह सिंह शावक सोचने लगा : "ऐसा क्यों होता है? मुझे तो

लगता है मानो में जीवित ही नहीं हूं। क्या यही जीवन है कि घास खाते रहो, इधर-उधर मिमियाते हुए कूदते रहो इन्हीं मैदानों में मुझे तो लगता नहीं कि मैं सही प्रकार से जीवन जी रहा हूं।" अब उसे लगने लगा था कि वह दूसरों-सा नहीं है-फर्क है। उसे लगता ही नहीं था कि वह एक भेड़ है।

जब उसे जंगल दिखाई पड़ा, तो उसमें घुस कर देखने को उसकी इच्छा हुई, परन्तु उसकी पालक भेड़ मां उसको चेतावनी देती रही कि ऐसा कभी मत करना। उसे मशविरा भी दिया कि अपने समूह (भेड़ों) से कभी अलग न होना।

श्रीमदभगवत गीता

वह जो शरीर और मन को सही प्रकार संभालना जानता है असली आनन्द प्राप्त करता है। वह अपने मन और शरीर को नितान्त चैन की अवस्था में रखता है। वह सारे सुख-आराम पूरी शिद्दत से प्राप्त करता है और शरीर का कभी दुरुपयोग नहीं करता।

आनन्द लेना और दुरुपयोग करना दो अलग चीज़ें हैं। आनन्द तब आता है जब शरीर और मन एक दूसरे से पूरे मिले हुए रहते हैं। तब हमें आराम मिलता है और एक गहरा चैन भी! तब हम सबसे ज्यादा सहज रहते हैं।

और एक वर्ग ऐसे लोगों का है जो मन के लिए शरीर को यंत्रणा देते हैं जिसे वह तपस्या या तप कहते हैं। ये लोग शांति की खोज में रहते हैं। अपने शरीर को पूरी तरह नकार कर उसको कष्ट देते हैं; महीनों बगैर भोजन के रहते हैं, एक पैर पर खड़े रहते हैं या कीलों पर लेटते और आग पर चलते रहते हैं। ये लोग अपने मन और शरीर को किसी न किसी तरह सदा कष्ट में रखते हैं। पर पीडक सदा दूसरे को कष्ट देकर ही यौनानन्द प्राप्त करते हैं तथा ऐसे यौनानन्द प्राप्त करने वाले सदा परपीड़क होते हैं। हम दूसरों को यंत्रणा तब ही देते हैं जब हमें स्वयं को यंत्रणा देने में मज़ा आता है। हम दूसरों को कष्ट तब ही देते हैं जब हम अपने अस्तित्व में सहज नहीं हो पाते तथा अवसाद ग्रसित या मनस्ताप से पूर्ण होते हैं। दूसरों को यंत्रणा देने का सीधा संबंध स्वयं को यंत्रणा देने से है।

जब हम समझते हैं कि हम मन हैं, तो हम शरीर को कष्ट देते हैं और जब स्वयं की मात्र शरीर समझते हैं, तो हम मन को कष्ट देते हैं। लेकिन जिसको शरीर और मन की सही समझ है, वह कभी न अपने शरीर या मन का दुरुपयोग करता है, न उन्हें कष्ट देता है। वह जानता है कि दोनों को कैसे संभाला जाए और दोनों के साथ आनन्द पाता है। कृष्ण यहां वह रहस्य उद्घाटित करते हैं कि कैसे मन और शरीर को सुन्दर एवम् ऊर्जा-आनन्द प्रदायक स्थिति में रखा जाए जिसमें अंतमन भी आनंद भरी चेतना से भरा-पूरा रहे।

कृष्ण आगे कहते हैं : "हे भारत! मैं सभी शरीरों का जानने वाला हूं, जो इस शरीर और मन को जानता है, उसे ही ज्ञान कहा जाता है।"

क्या सुन्दर बात है! यहां कृष्ण कहते हैं कि क्षेत्र या शरीर-मन की समझ और चेतना को समझना ही असली ज्ञान है। वह कहते हैं : "मैं चेतना को रूप में सारे जीवों में वास करता हूं।"

वस्तुत: हमारी चेतना ही ईश्वर है, ईश्वर जैसी कोई अलग सत्ता नहीं है। जब हम मन या शरीर से स्वयं को जोड़ने लगते हैं, तो समस्या पैदा हो जाती है। परन्तु जो समझता है कि वह स्वयं ही चेतना है स्वयं को मुक्त कर लेता है। वही प्रबुद्ध ज्ञानी होता है; बुद्ध बन जाता है। चेतना ही ईश्वर है।

वह मां तो उसे एक भेड़ ही मानती थी न! उसने बताया कि यदि वह शावक जंगल में अंदर गया तो तो वहां शेर उसे मार डालेंगे।

वस्तुत: यह पूरी कथा आध्यात्मिक साधक की है कि कैसे कोई जन्म लेने के पश्चात् अपनी खोज प्रारंभ कर अपना लक्ष्य प्राप्त कर संतुष्ट होता है। यह एक बढ़िया कथा है - मुझे बहुत पसन्द है। इसलिए इसको जहां संभव हो, मैं सुनाता रहता हूं।

भेड़-मां ने आदेश दिया : "तुम वहां कतई नहीं जा सकते! वहां पर शेर हैं।" उस शावक ने किसी प्रकार अपनी इच्छा दबायी, यद्यपि उसका मन जंगल में जाने को बहुत हो रहा था। पर कुछ समय पश्चात् उसने तय कर लिया : "यह जीवन मेरे लिए है ही नहीं!" लेकिन उस भेड़-मां ने उस पर दबाव डालकर उसे रोक रखा। वह उसके सामने तरह-तरह के नाटक करती थी-कभी रोती-कभी हंसती, कभी धमकाती! अन्तत: उसने उस सिंह शावक को शादी करवा दी।

इस कथा में एक अंतर्कथा है :

जंगल में एक बड़ा विवाहोत्सव मनाया जा रहा था। राजा शेर की शादी एक शेरनी से हो रही थी। जंगल के सारे जानवर वहां एकत्रित थे और उत्सव मना रहे थे। वहां मध्य में एक नृत्य-मंच बना था, लेकिन उस मंच पर केवल शेर और शेरनी ही नाच सकते थे। बाकी सारे जानवरों को वहां जाने में डर लगता था-इसलिए वह उस मंच के बाहर खड़े तमाशा देख रहे थे। अचानक उस धमाचौकड़ी में मंच पर एक चूहा उछलकर पहुंच गया और नाचने लगा।

एक शेर ने उसे पकड़ लिया और गरज कर पूछा : "तुम्हारी इस नृत्य मंच पर आने की हिम्मत कैसे हुई? क्या दिखाई नहीं पड़ रहा था कि बाको सब जानवर बाहर हैं - यहां सिर्फ शेर -शेरनी नाच सकते हैं।

उस चूहे ने तुरन्त उत्तर दिया : " चुप रहो। शादी के पूर्व में भी शेर था।"

हां तो उस सिंह-शावक और भेड़ों की कहानी पर लौटें! उस सिंह शावक की शादी हुई और कई वर्ष बीत गए। एक दिन सिंह शावक सोचने लगा : "यहां क्या हो रहा है? मैं तो पुरानी जिन्दगी ही जी रहा हूं-वही खाना-पीना, मिमियाना और मैदान में उछलकूद मचाना। मुझे वास्तव में महसूस होता है कि मैं कुछ प्राप्य नहीं कर पा रहा हूं। अब मुझे सब कुछ तो मिल गया - एक श्रेष्ठ मां, सुन्दर पत्नी - एक भरा-पूरा जीवन! पर मेरे अन्दर अभी भी एक प्रकार का खालीपन है। मैं संतुष्ट महसूस नहीं कर पाता? पता नहीं क्या बात है?"

और फिर उसने सोचना शुरू किया। उसकी खोज फिर शुरू हुई। अचानक एक दिन पड़ोस के जंगल से वहां एक शेर आ गया और उसने भेड़ों पर आक्रमण कर दिया - सारी भेड़ें भागने लगीं। इस सिंह शावक की अजीब हालत

श्रीमदुभगवत गीता

थी। वह न ही भागना चाह रहा था, न ही उसकी हिम्मत हो रही थी उस शेर का सामना करने की। उसको मालूम था कि वह शेर आक्रमण करने वाला है -पर वह सिंह शावक सोचने लगा : "यह लगता कितना शानदार है। एक अलग ही छटा है।" उसने इतना गरिमामय जानवर अभी तक देखा ही नहीं था। सो, जाने-अनजाने, वह शावक धीरे-धीरे उस शेर की तरफ आकर्षित होने लगा। इस आकर्षण को मारे न वह शावक भाग सका और न हो उसकी हिम्मत शेर के सामने जाने को पड़ी - आखिर तो वह एक 'भेड़' ही था शेर के आक्रमण को झेलता हुआ।

यद्यपि वह पीछे तो हटता रहा, पर उसकी निगाह उसी शेर पर जमी रही। वह शेर सीधा उसके पास आया और उस सिंह शावक को पकड़ लिया। वह सिंह शावक जो भेड़ों में पला था, मिमियाने लगा : "अरे… कृपया मुझे छोड़ दें ... मुझे मारें नहीं।" वह शेर बोला : "मूख! मैं तुझे मारने नहीं आया। तू तो एक शेर का बच्चा है। इस तरह मिमिया क्यों रहा है? तुझे यह कैसे लगा कि मैं तुझे मार डालूंगा?"

"क्या .... मैं... शेर का बच्चा।" उस सिंह शावक को शक हुआ कि शेर उसे बहुका के जंगल में ले जाने की कोशिश कर रहा है। वह भयभीत हो गया और जोर से चिल्लाया : "नहीं…नहीं! मुझे छोड़ दो!" उस शेर ने कहा : "मूर्ख! तू शेर है, यह बात समझता क्यों नहीं?" सिंह शावक ने उसकी बात नहीं मानी। वह तुरन्त निकल भागा।

यद्यपि वह सिंह शावक वहां से भाग के तो आ गया पर उस शेर को भूल नहीं पाया। एक हफ़्ते तक उसका भय कायम रहा। प्रथम दर्शन या प्रथम भेंट में प्राय: भय उभरता है। पहला अनुभव यही होता है। सिंह शावक ने पहली बार एक शेर को देखा था। इसी भय का अनुभव अर्जुन ने भी किया था, जब उसने कृष्ण का पहली बार विश्वरूप देखा था। उसे देखकर भय तो लगा पर उसके

प्रति एक रहस्यमय आकर्षण भी महसूस हुआ।

एक हफ्ते पश्चात् उस सिंह शावक का भय शान्त पड़ने लगा। उसे शेर का आकर्षण पुन: खींचने लगा। उसका शेर से मिलने को मन होने लगा : " एक बार उस शेर से और मिलना चाहिए," उसने सोचा। पर उसके दिमाग का एक भाग कह रहा था : "नहीं-नहीं! वह खा जाएगा उसके पास मत जाना।" पर दूसरा भागने की जिद कर रहा था : "ऐसा कुछ नहीं होगा। उसके साथ क्या शानदार अनुभव हुआ था। कितना महिमामय लग रहा था। मैं उससे फिर मिलूंगा।" कृपया यह स्पष्ट समझ लें कि जब तक आपके अन्दर प्रबोधन नहीं होता आप किसी प्रबुद्ध स्वामी से मिलना भी नहीं चाहेंगे। यदि हम इतने परिपक्व या प्रबुद्ध

श्रीमद्भगवत गोता

नहीं हैं कि अपने भीतर प्रबोधन महसूस कर सकें, तो हम प्रबुद्ध व्यक्तियों से कतई भी संपर्क रखना नहीं चाहेंगे।

इस शहर में लाखों लोग रहते हैं - उनमें से कृछ सौ ही लोग यहां बैठे यह भाषण सनने क्यों आए हैं? कृछ हजार तो एक बार सनने यहां आए थे फिर लौटके नहीं आए। सिर्फ कुछ सौ ही यहां नियमित रूप से क्यों आते हैं? जब आपके मन में किसी प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए आकर्षण पैदा हो, तो समझ लीजिए कि आपके अन्दर प्रबोधन जागृत होकर विकसित होने लगा है।

यही कारण था कि वह सिंह शावक उस शेर के प्रति आकर्षण महसूस करने लगा था। उसके अन्दर एक अदम्य इच्छा पैदा हुई उस शेर से मिलने की। अंतत: उसने तय किया कि वह उस शेर से जरूर मिलेगा? पर कैसे जाए और कहां जाए? उस शेर ने कोई संदेश तो नहीं भेजा था कि फलां-फलां जगह पर फलां समय मिलना - वहीं मेरा कार्यक्रम है!" वह सिंह शावक जो भेड़ रूप में पला बढ़ा था जंगल के किनारे तक पहुंचा और बड़ी उम्मीद से वहां प्रतीक्षा करने लगा कि वह शेर दिखाई पड़े।

कुछ महीनों बाद वह शेर वहां आया। जैसे ही उस सिंह शावक ने उस शेर को देखा. तो उसका भय फिर जागत हो गया और वह फिर दुविधा में पड़ गया-यद्यपि वह महीनों से उस शेर का इन्तज़ार कर रहा था। इस बार वह शेर स्वयं उस सिंह शावक के पास आया और कहा : "कहो? कैसे हो?" वह सिंह शावक घबडा गया : "मैं…मैं…मैं… !"

वह उत्तर तो नहीं दे पाया पर पहले की तरह वापस भागा भी नहीं। शेर ने कहा : "चिन्ता न कर। यदि तुझे मुझ से डर लगता है, तो मैं चला जाता हूं। मैं तुझे खाऊंगा नहीं, इसलिए मारूंगा भी नहीं। यहां रहके भी क्या करूंगा।" यह कहकर वह वापस जाने लगा।

तभी उस सिंह शावक ने प्रार्थना की कि वह थोड़ी देर और उसके साथ रहे। साथ में यह भी कह दिया : "आप यहीं रहें पर मेरे पास न आएं। दूर खड़े होकर बात कर सकते हैं। कम से कम दस फीट दूर रहें और बात करें- मेरे साथ कुछ समय तक रहें।" सिंह शावक न उस शेर से दूर जाना चाहता था, न उसकी उसके पास खड़े होने की हिम्मत थी।

यह दुविधा उस आध्यात्मिक साधक की थी जिसमें ज्ञान वृद्धि शुरू हो चुकी हो। इस प्रकार वे 10-15 फीट दूर खड़े रहकर बात करने लगे। वह शेर बार-बार उस शावक को समझा रहा था : "अरे तू तो शेर है। यदि तू स्वयं को भेड़ समझता है, तो तू बड़ा मूर्ख है। तू वैसा कतई नहीं है जिनके साथ तू रहता है। अरे! तुझे ऐसे तो रहना नहीं चाहिए।"

श्रीमद्भगवत गीता

अब वह सिंह शावक उस शेर की बात पर विचार करने को बाध्य हो गया। धीरे-धीरे उसके मन का भय खत्म होने लगा कि वह उसे जंगल में ले जाकर खाना चाहता है। उसको लगा कि शेर का कोई बुरा मंतव्य नहीं है। यह भी समझ में आया कि इस कोशिश में उस शेर का कोई स्वार्थ निहित नहीं है। " मैं उसको क्या दे सकता हूं-मेरे पास होने से उसे तो कुछ नहीं मिलने वाला।"

जिस समय साधक के मन में यह विश्वास जागने लगता है, वह अपने

स्वामी की बात पर भरोसा करने लगता है। इसलिए वैदिक पद्धति में आध्यात्मिक ज्ञान पर कोई बन्धन नहीं है। इसे कोई भी पाप्त कर सकता है, बशर्त कि वह साधक अपने स्वामी को कोई व्यक्तिगत लाभ देने की स्थिति में न हो। उसे लगे कि उसके साथ में स्वामी को कोई लाभ नहीं होगा. यदि होगा तो उसे ही लाभ मिलेगा। यह भरोसा तब ही शुरू होता है, जब साधक स्वामी के नि:स्वार्थ भाव से ज्ञान देने की संभावना के प्रति आश्वस्त हो जाता है। स्वामी उसे ज्ञान देना चाहता है क्योंकि उसके मन में करुणा का अथाह सागर है-यह उफन रहा है। उसका ऐसा करना हमारे ही भले के लिए है, स्वामी

का कोई प्रयोजन इससे सिद्ध नहीं होगा। जब यह भाव साधक के मन में आ जाता है, तो वह अपने स्वामी के शब्दों पर भरोसा करने लगता है।

यह विश्वास उस सिंह शावक के मन में उस शेर के लिए अंकूरित होने लगा था। "यह न मुझे मारेगा न खाएगा। यदि ऐसा करना इसकी मंशा होती तो यह कभी का कर चुका होता-बहुत मौके थे। तो यह बात स्पष्ट है कि इसे मुझसे कोई निजी लाभ तो पहुंचेगा नहीं। तब यह बार-बार यही क्यों कहे जा रहा है कि मैं एक शेर हूं, शेर का बच्चा हूं।"

तब वह सिंह शावक उस शेर की बात पर गहराई से विचार करने लगा। जब हम आश्वस्त हो जाते हैं कि स्वामी हमसे कुछ स्वार्थ के वशीभूत होकर नहीं कह रहा, वह तो अपने आनन्द में यह ज्ञान हमें देना चाहता है, हम ज्यादा गहराई से उस अनजान पथ पर चलने को उत्सुक होने लगते हैं तथा कई प्रायोगिक अनुभव प्राप्त करने को आतूर होने लगते हैं। जब तक हमें अपने भले होने की आश्वस्ति न हो, हम ऐसा कोई जोखिम उठाना भी नहीं चाहते।

सिंह शावक सोचने लगा : "यह कितना साहसी, शानदार और बहादुर प्रतीत होता है, कितना आत्मविश्वास से परिपूर्ण है। यह तो कतई नहीं लगता कि यह झूठ बोल रहा है या फरेब कर रहा है।" कोई व्यक्ति झूठ बोल रहा है, यह हम उसकी आंखों में देखकर पता लगा सकते हैं। वह सिंह शावक भी मानने लगा : "यह झुठ तो नहीं बोल रहा है। पर यह बार-बार क्यों कह रहा है कि मैं शेर हूं-शेर का बच्चा हूं जबकि हूं तो मैं एक भेड़ ही।"

श्रीमद्भगवत गीता

शेर ने तब कहा : "शायद तुम मेरा विश्वास नहीं करना चाहते। खैर! मैं अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहता। मैं जा रहा हूं।" लेकिन वह सिंह शावक रूपी भेड निहोरे करने, लगा-"न ... नहीं ... नहीं ... नहीं! कपया कम से कम आगे मिलने का समय (अपॉइन्टमैन्ट) तो तय कर लीजिए! "

तब शेर ने झंझलावो कहा : "मलाकात? किसलिए?" सिंह शावक बोला "मैं घर जाकर आपने जो मेरे बारे में कहा है, उस पर विचार करूंगा। फिर H अपने संदेहों के निवारण हेतु आपके पास आऊंगा।" वह शेर मान गया। "ठीक है. एक महीने बाद यहीं और इसी समय हमारी मुलाकात हो सकती है।"

उधर वह सिंह शावक विचार करने लगा : "मैं शेर कैसे हो सकता हूं? में जानता हूं कि मैं भेड हूं। मैं घास खाता हूं। मिमिया भी सकता हूं और भेड़ों क्षे साथ रह सकता हूं। तो मैं शेर कैसे हो सकता हं?" वह ऐसे विचार करता रहा।

इस प्रक्रिया में उन सब दार्शनिक विचारों एवम दविधाओं को भी मथता रहा. जिनका इन दिनों मैं उत्तर देने का प्रयास कर रहा हूं।

मेरे विचार से 'भेड-दर्शन' पर भी कोई पुस्तक प्रकाशित होनी चाहिए ... या ' भेड़ बाइबिल!' .... ' भेड़-गीता!' हो सकता है तब रही हो और उस भेड़ रूपी सिंह शावक ने उनका गहन अध्ययन किया हो। उसके दिमाग में कई प्रश्न उभरे जिनकी उसने एक लिस्ट बना ली।

महीना बीतते-बीतते यह लिस्ट काफी बड़ी हो गई। जिसमें ऐसे कई सवाल थे, जिनका उसके (पालने-वाले) मां-बाप उत्तर नहीं दे सके थे। हां- इस बीच में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी था कि उसने अपनी भेड-मां को कभी इस शेर से मलाकात के बारे में कोई जिक्र नहीं किया था। उसे मालूम था कि यदि उसकी मां को मालूम हो गया तो वह शेर से मिलने नहीं देगी। वह तो फिर जंगल के सिरे तक ही न जाने देगी। "कभी उधर न जाना, इधर ही रहना। जंगल में घुसने की तो सोचना भी मत।" यही वह कहती!

मां-बाप सदा अपने बच्चों की सरक्षा के बारे में चिंतित रहते हैं। वे अपने बच्चों को मंदिर तो जाने देते हैं, पर किसी स्वामी के पास कभी नहीं जाने देते-आध्यात्मिक क्षेत्र में तो उनका प्रवेश वर्जित ही रखते हैं। उनको सदा यह क्षेत्र खतरनाक लगता है। देखिए, स्वामी विवेकानन्द तभी तक महान है जब वह पड़ोसी के घर पैदा हो. अपने घर में नहीं।

खैर! एक महीना बीता और मूलाकात की घड़ी करीब आने लगी। उस भेड़ रूपी सिंह शावक ने बढ़िया हरी घास एकत्रित की, उस शेर को भेंट करने के लिए। मिलने पर यह भेंट देते हुए उसने कहा : "कुपया इसे स्वीकार करें - यह मैंने ख़ास तौर पर आपके लिए तैयार की है।" सिंह शावक का यह प्रेम भाव देखकर उस शेर ने भी ऐसा नाटक किया मानों वह उस घास को खाने में बड़ा आनन्द प्राप्त कर रहा है। उसका यह प्रयास सिंह शावक से भावनात्मक रूप से गहराई से जुड़ने के लिए था। धीरे-धीरे वह आपस का फर्क मिटाना चाहता था। वह चाहता था कि सिंह शावक उसके साथ पूरी तरह सहज और सुरक्षित महसुस करें। तब ही तो बदलाव की संभावना बनेगी। स्वाभाविक था कि सिंह शावक उस शेर से पूछता : "आपको यह घास

अच्छी लगी? क्या यह स्वादिष्ट है?" शेर ने कहा : "बेहद! तुमने इसे बढिया तरह तैयार किया है। वाह!" सिंह शावक तारीफ सुनकर खुश हो गया। घास की भेंट स्वीकार करने के पश्चात् धीरे-धीरे शेर सिंह शावक से वही बातें कहने लगा, जो उसने पहले कही थीं : "मैं तुम से बार-बार कहता हूं -

पर तम समझ ही नहीं रहे। तुम शेर हो-भेड़ नहीं।"

अब तक सिंह शावक को भी समझ में आने लगा था कि उसका अपने बारे में विचार सही नहीं था। पर शेर की बात वह सहज रूप से स्वीकार अब भी नहीं कर पा रहा था। मैं शेर कैसे हो सकता हूं? क्या वाकई मैं भेड नहीं हूं?" अब उसने तर्क से काम लिया :"मेरा रंग भी भेडों से अलग है। यदि मैं भेड जैसा होता, तो उनके जैसा ही होना चाहिए था। वैसे भी मैं इस जीवन से संतुष्ट नहीं हूं। इसका स्पष्ट संकेत है कि मैं कुछ और हूं। पर यह समझना मुश्किल है कि मैं भी शेर हूं।" पर अभी भी उसे अपने तर्क-विश्लेषण पर भरोसा नहीं हो पा रहा था। एक दिन शेर ने उसको सुझाव दिया : "चलो ... हम पास वाली झील तक चलें और वहां पिकनिक मनाएं।" अब तक वह सिंह शावक उस शेर से काफी हिलमिल गया था। वह राजी हो गया, जैसे ही वह झील के पास पहुंचे, शेर ने उस सिंह शावक की गर्दन पकडी और उसे पानी की तरफ घसीटने लगा। "पानी पर अपने प्रतिबिम्ब को देखा।"

"देख तु बिलकल शेर जैसा ही लग रहा है न।"

सिंह शावक ने उत्तर दिया : "हां मैं तो आपका प्रतिबिम्ब देख रहा हूं।" शेर ने कहा : "दुसरा प्रतिबिम्ब नजर नहीं आ रहा।"

सिंह शावक ने कहा : "हां है, तो एक छोटे से शेर का-आपका बच्चा होगा। परन्तु वह है कहां? वह दिखाई तो नहीं पड़ता, लेकिन उसका प्रतिबिम्ब तो स्पष्ट है। कहीं वह पानी में तो नहीं छिपा है?"

में वह शेर दहाड़ा : "मुखे! वह तु है।"

सिंह शावक इस बात को मानने को राजी नहीं हुआ। बोला : "नहीं-नहीं! यह तुम्हारा बच्चा है -पानी में छिपा है कहीं। उसे बाहर बुलाओ।"

शेर फिर दहाड़ा : "अरे मूख! यह तू ही हे! मेरा बच्चा नहीं!"

श्रीमद्भगवत गीता

श्रीमदुभगवत गाता

फिर बोला : "देख! मैं जा रहा हूं-अब इसमें सिर्फ तु ही दिखाई पडेगा में नहीं।" नहीं है ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ?

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अब उस सिंह शावक ने पानी की सतह पर देखा। उसे पहला झटका लगा : "अरे शायद शेर की बात ही सच है।"

पर वह फिर भयग्रस्त हो गया : "अगर मैं शेर हूं, तो मुझे जंगल में ही रहना चाहिए। पर यह में कैसे करूं? मैं तो भेड़ हूं… यहीं हूं, आराम से हूं, मैं अपने सब भेड मित्रों से परिचित हूं। मुझे नियमित भोजन मिलता है। यहां खाने-पीने इल्यादि की पूरी सुविधा है-मुझे मालूम है कि क्या कहां करना है। मैं अपना घर भी पहचानता हूं - अपनी पत्नी को भी। यही मेरा असली जीवन-क्षेत्र है। मुझे यहां की सारी स्थितियां मालूम है। मैं इसी जीवनयापन का अभ्यस्त हो चुका हूं। भेड़ के जीवन में मैं काफी सहज हूं। लेकिन यदि मैं स्वयं को शेर समझुं, तो यह सब छोड़ना पडेगा। मुझे यहां से लम्बी छलांग लगानी पड़ेगी। काफी मश्किलों का सामना करना पड़ेगा।" फिर भय हावी हो गया और वह सिंह शावक भाग खडा हुआ। एक बार फिर भाग गया।

प्रथम अनुभव

कुछ महीनों बाद वह शेर फिर उसी भेड़ रूपी सिंह शावक की खोज में आया। इस बार सिंह शावक ने उसे मुलायम हरी घास का तोहफा नहीं दिया। पर वह शेर उस सिंह शावक के लिए एक ताजा मांस का टुकडा लाया था। उसने सिंह शावक को देखकर कोई बात नहीं की। इस बार उनके मध्य न कोई शास्त्रीय विचार-विमर्श हुआ, न कोई दार्शनिक वाद-विवाद। शेर ने सीधे-सीधे उस सिंह शावक का मुंह खोला और मांस का टुकड़ा अन्दर रख दिया।

जैसे ही सिंह शावक को मांस और खून का स्वाद मिला, उसके अंतर में एक उथल-पुथल मच गई। उसके पूरे अस्तित्व को एक झटका लगा। उसकी चेतना मानो जागृत हो गई और वह चुपचाप मांस को गटकने लगा। मांस निगलकर वह अचानक दहाडने लगा।

यह दहाड़ ही वह है जिसे हम प्रबोधन कहते हैं। सिंह शावक को समझ में आ गया कि वह तो पैदाइशी एक शेर ही है - पहले दिन से ही। भएर ।।

यही सब हमारे जीवन में भी घटित होता है। बार-बार हम सब यही समझते हैं कि हम एक भेड़ हैं। कभी-कभी हमें शक होता है : "मैं जीवन में संतुष्ट क्यों नहीं हूं? क्या हो रहा है?" कुछ समय पश्चात् हम एक शेर को देखते हैं, जो हमें बताता है : "तुम महामहिम ईश्वर स्वयं ही हो। तुम ऊर्जा हो, चेतना हो।" परन्तु हम डरकर भाग जाते हैं। घर जाकर फिर उस पर विचार करते हैं

श्रीमद्भगवत गीता

जरूर इस शेर की कोई चाल है। शायद यह एक आश्रम बनाना चाहता और इस राय के लिए मुझे घेर रहा है। इसलिए यह मेरी तारीफ करता रहता है।" पर कुछ समय बाद हमें मालूम होता है कि उसके पास तो एक आश्रम पहले मे ही है। आश्रम को बनाने के लिए उसे कोई जरूरत नहीं-हमारी या किसी और की। उसके पास वो सब कुछ है। उसे कोई सहायता नहीं चाहिए। फिर हम धीरे-धीरे तर्क-विश्लेषण में पड़ जाते हैं : "यह रोज आकर यही बात क्यों कहता है। रोज दो-तीन घंटे पूरे ज़ोर से यही बात बनता रहता है।" कुछ देर सब हम सोचने लगते हैं : "एक चीज़ तो निश्चित है। मैं अपने बारे में जो कुछ भी समझता हूं, वह सही नहीं है। पर यह भरोसा नहीं होता कि जो कुछ वह बार-बार दहराता है, वह सही है कि नहीं। पता नहीं क्या सच है।"

ध्यान लगाने पर चेतना की आपसी समझ मिलती है। पर जब वह आकर मिलती है, तो हम डरकर भाग खड़े होते हैं। "नहीं-नहीं! यह सब मेरे लिए नहीं है।" पर वह सत्य बार-बार चमकता है, तो मन होता है कि सब कुछ छोड़कर उसके पीछे जाऊं।" यह वह स्थिति है जब हमारे प्रबुद्ध स्वामी की नजर हम पर पड़ती है और वह ठोस अध्यात्मक सत्य का एक (मांस का) टुकड़ा हमारे अनुभव (मुंह) में डाल देते हैं। तब हमारी चेतना में एक गहन विवोड़न होता है। हमारा अस्तित्व चेतन होता है। हमारी आंखें चमकने लगती हैं और हम उस अनुभव में दहाड़ने लगते हैं। तब हमें भासित होता है कि हम तो शुरू से ही शेर थे और ऐसे ही सदा रहे हैं। यानी वह भेड रूपी सिंह शावक सदैव ही एक सिंह था।

परन्तु इस अनुभव को प्राप्त करने के लिए हर सिंह शावक को एक शेर का सानिध्य चाहिए।

अस्तित्व में आने के प्रथम दिन से ही हम 'क्षेत्रज्ञ या 'क्षेत्र के जानकार' होते हैं, अर्थात् चेतना की मूर्ति। परन्तु अपनी गलतफहमी के कारण हम स्वयं को शरीर-मन ही समझते रहते हैं। अचानक एक व्यक्ति जो समझ चुका है कि वह चेतना है; क्षेत्रज्ञ है-तथा इसका अनुभव उसे हो चुका है-यह कहते हुए हमारा मार्गदर्शन करता है, "यह चेतना है और यह शरीर-मन! यह समझो कि तुम चेतना हो।"

यही कहानी यहां कृष्ण और अर्जुन के मध्य दुहराई जा रही है। कृष्ण बताते हैं कि क्या क्षेत्र है और कौन क्षेत्रज्ञ है। वह अर्जुन को बताते हैं कि वह भेड़ नहीं वरन शेर है: वह मात्र क्षेत्र नहीं वरन क्षेत्रज्ञ है।

चेतना और अंत:करण

  • वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जैसे प्रभाव वाला है-वह सब संक्षेप में मुझ से सुन।
  • यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्त्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेद मंत्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभांति निश्चय किए गए युक्ति युत ब्रह्म सूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।
  • 13.6,7 पंच महाभूत (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर) अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी; तथा दस इन्द्रियां, एक मन और पांच इन्द्रियों के विषय-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध तथा इच्छा, द्वेष, सुख-दु:ख स्थूल देह का पिण्ड, चेतना और धुति-इस प्रकार विकारों के साथ यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया है।

कृष्ण अर्जून से कहते हैं, वह ध्यान से उनका स्पष्टीकरण सुने कि क्या मिलकर क्षेत्र बनता है तथा शरीर-मन तथा इसकी गतिविधियों, इनमें परिवर्तन (विकार) कैसे पैदा होते हैं। इन सत्यों को कई बार ऋषियों द्वारा समय-समय पर उद्दघाटित किया जाता रहा है। वेद शास्त्र, उदाहरणार्थ, ब्रह्म सूत्र, इनको बड़ी स्पष्टता और तर्क से स्पष्ट करते हैं। इन श्लोकों में कृष्ण चरणबद्ध तरीके से अर्जुन को बताते हैं कि यह गतिविधियां कैसे पैदा होती हैं और कैसे आपस में अंतंक्रिया करती हैं। -

कृष्ण यहां बात करते हैं पंचमहाभूत (तत्त्वों), छद्म-अभिमान, बुद्धिमता या मन की जो निर्णय लेते हैं तथा दस इन्द्रियों का भी हवाला देते हैं। यहां वह दस इन्द्रियों की बात करते हैं : "इन्द्रियाणि दशैकंच"। हम समझते हैं हमारे पांच इन्द्रियां होती हैं। नहीं! हमारे पास पांच कर्मेन्द्रियां और पांच ज्ञानेन्द्रियां होती हैं। कर्मेन्द्रियां वह इन्द्रियां होती हैं, जिनके द्वारा हम बोलते-चालते हैं; अर्थात्, मुंह, हाथ-पैर, जननांग और मल त्याग के अंग। ज्ञानेन्द्रियां वे पांच इन्द्रियां हैं, जिनसे

हम शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध प्राप्त करते हैं- अर्थात् नाक, जिहवा, नेत्र, त्वचा और कान। इस प्रकार ये दस इन्द्रियां, राग-विराग, हर्ष-शोक, शरीर, आपसी आकर्षण एवम् चेतना मिलकर इन गतिविधियों का क्षेत्र बनाती हैं।

वस्तत: यहां 'चेतना' का प्रयोग प्रभावित अर्थों में नहीं हो सकता। जब हमारी चेतना जड़ हो जाती है तब वह अंत:करण का रूप होती है। चेतना और अंत:करण में फर्क होता है।

उदाहरणार्थ हम अपने अंत:करण के अनुसार सही-गलत का निर्णय कर

अपने काम करते हैं। यदि हम यही सीख अगली पीढ़ी को दें, तो काम नहीं चलेगा क्योंकि उनके लिए सही-गलत कुछ और हो सकता है। यदि हम उन्हें अपनी दी हुई सीख स्वीकार करने को बाध्य करते हैं, तो यह नैतिकता पाठ हो सकता है जो अंत:करण की मान्यता हो सकती है।

अर्थात हम जो उन्हें दे रहे हैं, वह बिना निहित भावनां समझाए एक नियम

या कानन का रूप हो सकता है। लेकिन जब हम नई पीढ़ी को अपनी जीवन की समझ को स्पष्ट करते हुए नैतिकता को सीख देते हैं, तो वह उनको चेतना देना या चेतन करना समझना चाहिए।

अंत:करण कष्ट देता है

यह स्पष्ट समझ लें कि जिस व्यक्ति का केवल अंत:करण कार्यरत होता है, वह सदा कष्ट पाता है। वह चाहे भोग करें या त्याग, कभी सुखी नहीं हो सकता। भोग करते समय उसके अंदर एक अपराध भाव रहेगा और जब त्याग करेगा तो उस भोग की कमी महसूस करता रहेगा। यानी दोनों स्थितियों में कष्ट ही मिलेगा। इसलिए अगली पीढ़ी का मात्र अंत:करण जागृत करना कभी सही नहीं रहेगा, उन्हें सदैव जीवन के बारे में सही समझ बताएं, जिसे मैं चेतना कहता हूं। फिर उनको स्वयं अनुभव और ज्ञान प्राप्त करने दें।

मैं नैतिकता में विश्वास करता हूं - यानी चैतन्यता पूर्ण अनुभव में। अंत:करण की शुचिता ही बहुत नहीं, चेतना होनी चाहिए - यही मेरा विश्वास है।

अंत:करणीय मान्यताएं हमें समाज से मिलती हैं, जबकि चेतना हमें ईश्वर

देता है। अंत:करणीय मान्यताएं सामाजिक शर्तों पर आधारित होती है, जबकि चेतना का भाव निसर्ग-प्रदत्त होता है।

अंत:करणीय मान्यता स्वाभाविक रूप से हमारे पूरे जीवन को एक कर्मकांड बना देता है। परंतु हमें कृछ भी करने के पूर्व मालूम होना चाहिए कि हम क्या कर रहे हैं, तभी हम पूरी शिद्दत से वह काम कर पाएंगे। जब तक काम

डायोजेनीज ने तब कहा - "अरे मूखों! यह बंधन क्या बांध रहे हो? क्या मझ पर भरोसा नहीं है? मैंने तो स्वयं ही हथकड़ी लगाने को कहा था न! अब चलो – जहां तुम मुझे ले जाना चाहते हो और बेचना चाहते हो। लेकिन एक बात याद रखना, मुझको छोड़कर भाग मत जाना।''

अब उस ऋषि को पकड़ने वाले थोड़े भयभीत होने लगे। उनकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। वे अपने आपको बहुत हीन और असहाय महसूस करने लगे। डायोजेनीज ने कहा - "अरे मूखों! मुझे मुक्ति की तरकीब आती है। स्वतंत्रता के मूल नियमों से भी मैं वाकिफ हूं। मैं लगातार अनन्त रूप से आंतरिक स्वतंत्रता भोगता रहता हूं। मुझे कोई बांध नहीं

सकता। अपनी पूरी कोशिश करके देख लो - देखें क्या होता है।'' यह कहकर वह एक शाहना शान के साथ सड़क पर टहलने लगा। उसको

गिरफ्तार करने वाले उसके पीछे ऐसे चलने लगे मानों वे उसके दास हों। उस ऋषि ने सड़क पर रोचकता से यह तमाशा देखने वालों को बताया - "ये सब मेरे दास हैं क्योंकि यह मुझे छोडकर नहीं जा सकते।" पर वे लोग गरजकर बोले - "दास तो यह ऋषि डायोजेनीज है।"

ऋषि ने उत्तर दिया - "देखो! यदि तुम मुझे छोड़कर गए, तो मैं भाग जाऊंगा। इसलिए मैं स्वयं तुम से जाने की कह रहा हूं। क्या तुम भाग सकते हो? मैं तुम्हें इस बंधन से स्वतंत्र करता हूं - भाग जाओ।'' वह बोलता रहा - "पर तम लोग नहीं जाओंगे - क्योंकि तुम्हें मुझसे कुछ चाहिए, इसलिए तुम मेरे दास बन गए हो। पर मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए - इसलिए मैं स्वामी हूं - पूर्णत: मुक्त! तुम्हारे हथकड़ियां लगी नहीं हैं, पर तुम्हारी मानसिकता दास वाली है। दासता का संबंध तुम्हारे होने के ढंग से है, तुम्हारे शरीर से नहीं।''

वे उसे बाज़ार ले आए - वह ऋषि पूरी ठसक से उस चबूतरे पर चढ़ गया, जहां बिकने वाले दास रखे जाते हैं। नीलामी शुरू हुई। नीलामी करने वाले ने कहा - "यहां एक दास है बिकने को - जो सबसे अधिक दाम लगाएगा, वह उसे खरीद लेगा।''

डायोजेनीज ने तुरंत रोका - "चुप रहो! यह मत कहो यहां एक दास है बिकने को। कहो यहां एक स्वामी है - यदि किसी में ताकत हो तो वह इस स्वामी को खरीद ले।'' अब स्वामी को खरीदने की किसी की हिम्मत ही नहीं हुई। उस ऋषि को कोई खरीद ही नहीं सका। तीन दिन बीत गए। उस ऋषि को गिरफ्तार करने वालों पर उसको खाने-पिलाने का बोझ भी हावी रहा। उन्हें लगा कि इस स्वामी को तो कोई खरीदेगा ही नहीं। " लेकिन यदि हम यहीं बैठे रहें, तो कहीं ये ही हमें न बेच दे। इसका कोई

श्रीमद्भगवत गीता

का औचित्य हमारे सामने स्पष्ट न हो, न हम पूर्णता से कोई काम कर पाएंगे न परी एकाग्रता या निष्ठा से उसको अंजाम देंगे।

कृष्ण कहते हैं कि अंत:करण का जड रूप सारे नियम बनाते हैं, जो क्षेत्र कहे जाते हैं। वे पदार्थ की बात करते हैं, ऊर्जा की नहीं। वे आपके अस्तित्व का हिस्सा नहीं होते - वे आप ही होते हैं। यहां जिसका उल्लेख किया जा रहा है, वह आपके बारे में नहीं। जिस समय हमारी समझ में यह आ जाता है कि हम क्या नहीं हैं, हमारी मुक्ति का द्वार खुलने लगता है। यदि हम अपने शरीर-मन के अनुसार जीते हैं, तो हमें जान लेना चाहिए कि हम शरीर-मन नहीं हैं। यह ज्ञान हमें शरीर-मन की दासता से मुक्ति प्रदान करता है।

दासता का मूल अर्थ है वह काम करने को बाध्य होना, जो आप कतई करना नहीं चाहते। वह जो आपकी रुचि को विरुद्ध है। परंतु (चेतना की) जागरूकता में यदि आप मन-शरीर के साथ जीते हैं, तब भी आप दास नहीं रहते।

अब में आपको एक यूनानी ऋषि डायोजेनीज के बारे में एक लघु कथा सुनाता हूं :

डायोजेनीज एक प्रबुद्ध स्वामी थे। कुछ लोगों ने उनके विरुद्ध षड्यंत्र करके उन पर आक्रमण कर दिया। परंतु जैसा उन लोगों ने सोचा था, डायोजेनीज ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वे लोग तो इसके लिए भी तैयार थे कि उन्हें पकड़ लेंगे। फिर भी ऋषि ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। डायोजेनीज की शून्य प्रतिक्रिया पर लोगों को बड़ा ताज्जब हुआ।

डायोजेनीज ने बडे सहज भाव से उन आक्रमणकारियों से पूछा - '' तुम लोग क्या चाहते हो?'' उन्होंने प्रश्न एक स्वामी की भांति ही पूछा।

आक्रमणकारी सकते में थे। अंतत: उनमें से एक ने बताया - "हम आपको पकड़कर ले जाते और गुलामों को बाज़ार में बेच देना चाहते थे।''

डायोजेनीज ने कहा - " अरे! मुझे यह बात पहले ही बता देते। फालतू इस काम के लिए योजना बनाने और चर्चा करने में तुम लोगों ने समय बर्बाद किया। आओ! मेरे हाथों पर हथकड़ी लगा दो। लाओ उन्हें! कहां हैं हथकड़ियां?''

अब तो आक्रमणकारी बिलकूल अवाक रह गए। पहली बार उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति स्वयं को हथकडि़यों में जकड़ने को स्वयं ही आदेश दे रहा है। डायोजेनीज का कहना बिलकुल मालिकाना हो रहा - तब भी जब स्वयं को हथकड़ी लगाने को कह रहा था।

कुछ समय बाद वे आक्रमणकारी हथकड़ी लेकर आए - एक ओर से उस ऋषि की कलाइयों को जकड़कर दूसरी ओर ताले को बंद कर दिया और रस्सी अपने हाथ में रखी।

भरोसा नहीं – यह कुछ भी कर सकता है।'' अंतत: उन्हें डायोजेनीज को मुक्त करने को बाध्य होना पड़ा।

यह एक कहानी तो है, पर एक सत्य प्रकट करती है कि यदि हम यह समझ लें कि हम शरीर-मन ही नहीं हैं, तो हम किसी के गुलाम नहीं हो सकते। गलामी चाहे कैसी भी हो. हमें नहीं जकड सकती। दासत्व तभी प्रभावी होगा जब हम उसकी सत्ता मानें। हम दासता के साथ कोई समझौता ही नहीं करेंगे। यह बारीक सत्य समझ लें। जब हम समझते हैं कि हम शरीर-मन के परे हैं। तो दासत्व में न बंधने के लिए हमें कोई प्रयास करने की आवश्यकता ही नहीं होती, क्योंकि हमें मालूम होता है कि हम अबंधनीय हैं, सर्वदा मुक्त हैं।

इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए शरीर-मन का भेद बताकर चेतना, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का अंतर स्पष्ट बताना चाहते हैं। प्राचीन काल में मनुष्य को शारीरिक रूप से ही दास बनाने का विधान था। परंतु आधुनिक युग में व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से दास बनाया जाता है। यह समझ लें कि अपने माहौल से प्राप्त करने वाले कई आकर्षणों को हम गुलाम होते हैं। यह वह चाहते होते हैं। जो हम - जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं - दूसरों से उधार लेते हैं। वे वह कामनाएं नहीं होती, जिनके साथ हम पैदा होते हैं।

जब कोई उत्पाद टीवी पर विज्ञापित किया जाता है, तो वह हमारे दिमाग में जम जाता है और कुछ ही दिनों में किसी-न-किसी बहाने से हम वह वस्तु खरीद लाते हैं। यह हमारा मनोवैज्ञानिक दासता का विश्व है। लेकिन जब हम यह समझ जाएं कि हम शरीर-मन के परे हैं, हम हर प्रकार की शारीरिक या मानसिक, मनोवैज्ञानिक दासता से अछूते रहेंगे।

जब हम किसी वस्तु को प्राप्त करने या किसी घटना के घटित होने के लिए अतीव लालायित रहते हैं, तो हम उस वस्तु या घटना के कब्जे में अपनी प्रसन्नता कैद कर देते हैं। जब हमारी इच्छापूर्ति नहीं होती, तो हम अवसाद में डूबने लगते हैं। हमें लगता है मानो सारी दुनिया हमारे विरुद्ध हो गई है। कई लोग मुझसे पूछते हैं - ''ईश्वर हमारे प्रति इतना अन्यायी क्यों है? केवल मैं ही क्यों इतनी समस्याएं झेलता रहता हूं?'' पर जैसे ही हमने अपनी प्रसन्नता किसी वस्तु या व्यक्ति के हाथों में बंद की, हम उनके गुलाम हो जाते हैं। वे दोनों आपका मनचाहा शोषण कर सकते हैं।

एक बात और - स्वतंत्र रहने की चाह का विचार मात्र भी हमारा शोषण कर सकते हैं, यदि हम उसे छूट दें। कई बार हम आध्यात्मिक खोज़ के आवरण में स्वतंत्रता को दूंढते रहते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता हमें तभी मिलेगी, जब हम यह महसूस कर सकें कि हमें ऐसी किसी खोज की दरकार

श्रीमद्भगवत गीता

नहीं है। स्वतंत्रता की चाह को हमें वैसे ही त्यागना चाहिए और मुक्ति कामना पर भरोसा रखना चाहिए, तभी हम इसके (मुक्ति या स्वतंत्रता को) प्राप्त कर सकते हैं। नहीं तो स्वतंत्रता की चाह मात्र भी हमें गुलाम बना सकती है। जब हमें लगने लगेगा कि हम तो मुक्त हैं, तब इस प्रकार के संघर्ष की कर्मता हमारे मामने स्वयं सिद्ध होने लगेगी।

जिस क्षण हम अपनी प्राप्ति से संतुष्ट होने लगते हैं, हम एक सहज प्रवाह में पड़ जाते हैं और फिर कोई प्रतिरोध नहीं करते। फिर हम किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना को अपने पर हावी नहीं होने देते। तब हमें कोई गुलाम नहीं बना सकता। तभी हमें मुक्ति की चेतना का अनुभव होगा।

and the main and andy mode to the first for the may of THE CHAN THE DELECT THE FARE RE THE PERFELLENT FOR PERFE and the first of the first for the lists of the आंतरिक विज्ञान-प्रौद्योगिकी

13.8-12 श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार न सताना, क्षमा भाव तथा मन-वाणी की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु को सेवा, बाहर-भीतर शुद्धि, अंत:करण की स्थिरता, मन और इंद्रिय सहित शरीर का निग्रह; इस लोक और परलोक के संपूर्ण भोगों के आसक्ति का और अहंकार का अभाव; जन्म-मृत्यू, जरा और रोगादि में दु:ख-दोषों का बार-बार विचार करना, आसक्ति का अभाव; पुत्र-स्त्री -घर-धन आदि में समता न होना, प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा चित्त का सम रहना; मुझ (परमेश्वर) में एकीभाव से स्थित रूप ध्यान योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (जो केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानती है) तथा एकांत और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना; अध्यात्म में नित्य स्थिति और तत्त्व ज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा को ही देखना - यह सब ज्ञान है और जो उसके विपरीत है वह अज्ञान है - ऐसा कहा गया है (या मैं कहता हूं)।

ा इन पांच श्लोकों में कृष्ण एक श्रेष्ठ युक्ति बताते हैं। अभी तक तो वह हमें बौद्धिक समझ प्रदान कर रहे थे, पर अब वह युक्ति और उसका ढंग समझाते हैं, जिससे हम वह अनुभव महसूस कर सकें, जो वे हमें बताना चाहते हैं। मैं इन श्लोकों को आंतरिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उद्घाटन कहता हूं, जिससे हमारा आंतरिक अवकाश भी मुक्त हो सके। यह विशेष तौर पर वह विशिष्ट युक्ति है, जिससे हम 'क्षेत्र' से मुक्त कर सकते हैं। इसके द्वारा हम मन-शरीर के बंधन से मुक्त होकर उन्हें अपने नियंत्रण में ला सकते हैं।

पहली बात, जिस क्षण हम यह समझ लें कि हम शरीर-मन से अधिक शक्तिवान हैं, हम शरीर-मन को कैद से स्वतंत्र होने लगते हैं। यहां कृष्ण इस युक्ति को स्पष्ट कर बताते हैं कि कैसे हम शरीर-मन से मुक्त होकर चेतना का सही अनुभव कर सकते हैं।

पहले मैं इन श्लोकों का सरल अनुवाद प्रस्तुत करता हूं -

श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार से भी न सताना, क्षमा भाव तथा मन-वाणी की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर शुद्ध अंत:करण की स्थिरता, मन और इंद्रिय सहित शरीर का निग्रह, इस लोक और परलोक के संपूर्ण भोगों में आसक्ति का और अहंकार का अभाव; जन्म-मृत्यू, जरा और रोगादि में दु:ख-दोषों का बार-बार विचार करना, आसक्ति का अभाव; पुत्र-स्त्री-कर-धन आदि में समता न होना; प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा चित्त का सम रहना, मुझ (परमेश्वर) में एकीभाव से स्थित रूप ध्यान योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (जो केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानती हो) तथा एकांत और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना; अध्यात्म में नित्य स्थिति और तत्त्व ज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा को ही देखना - यह सब ज्ञान है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है - ऐसा कहा गया है (या मैं कहता हूं)।

कृष्ण इन श्लोकों में कई वस्तुओं की एक लंबी सूची बनाते हैं और कई निर्देश भी देते हैं। लेकिन मैं आपको स्पष्ट बता दूं कि यदि इन निर्देशों का हम सीधे-सीधे पालन करने लगें, तो हम पागल हो जाएंगे। इन वस्तुओं पर एकदम अभ्यास करना संभव नहीं है। हम तो यही चाहते हैं कि किसी प्रकार हमें वह चेतना प्राप्त हो जो इन गुणों की चमक हम में पैदा करें। हम चाहते हैं कि यह गण हम में सहज रूप में विकसित हो।

उदाहरण के लिए, इस प्रक्रिया की एक तालाब से गंदगी निकालने को क्रिया से तुलना करें। यदि हम सीधे ही हाथ डालकर तालाब से गंदगी या कोचड़ा निकालने का प्रयास करेंगे, तो हमें क्या मिलेगा - हम उस तालाब को और गंदा कर देंगे। वह गंदगी तो तलहट में बैठी है, सतह तक आ जाएगी, लेकिन अगर हम थोड़ा चूने का पाउडर तालाब पर छिड़क दें, तो यह चूना गंदगी को जज्ब कर लेगा और तालाब का पानी स्वच्छ हो जाएगा।

हमारा दिमाग भी गंदले तालाब की तरह ही होता है। यदि हम इसे दबाकर इससे जबरदस्ती करेंगे, तो समस्या बढ़ जाएगी। हमें थोड़ा ध्यान मिला दें -अर्थात् चूने का पाउडर छिड़क दें और चैन से बैठें, थोड़ी-सी जागरूकता पैदा कर दें और शांत रहें। सारी गंदगी स्वत: नीचे बैठने लगेगी। जैसे ही हम जागरूक हों और चेतना को कर्मशील होते देखें, तो गंदगी नीचे बैठेगी। चेतना को साक्षी

भाव से निहारना वह प्रक्रिया है, जो हमारे अस्तित्व को शुद्ध करती है। प्राय: जब हम शास्त्र या पवित्र ग्रंथ पढ़ते हैं, तो उनके निर्देशों को

सीधे-सीधे जीवन में उतारने का प्रयत्न करने लगते हैं। उदाहरणार्थ, एक निर्देश

विगत को निर्णयों का पुनर्निरीक्षण आज की बुद्धिमत्ता द्वारा। जब भी हम अपनी आज के बुद्धि को स्तर से विगत को निर्णयों की समालोचना करेंगे, तो 'अपराध बोध' तो पैदा होगा ही। हम क्षण-प्रति-क्षण अपनी बुद्धिमत्ता को सुधारते रहते हैं। अतः जब हम आज की अक्ल से अपने पिछले निर्णयों को जांचेंगे, तो निश्चित ही हम पाएंगे कि कुछ काम हमने सही नहीं किए थे। उनको करना ही नहीं चाहिए था। समस्या तब गहरा जाती है, जब हम यह समझते हैं कि हर वस्तु के लिए हम ही जिम्मेदार हैं। यदि हम यह समझ सकें कि यह समस्त ब्रह्मांड विशद्ध बुद्धिमत्ता से निर्देशित होता है, जो जानती है कि हमारे जीवन का कैसे ध्यान रखें, तो हम चैन से बैठ सकते हैं। जब हम इस ब्रह्मांडीय चेतना को निर्बाध रूप में अपना काम करने देते हैं, तो हम में स्वत: वे गुण जागृत हो जाते हैं. जिनको कृष्ण यहां गिनवाते हैं। कृष्ण पहले जिक्र करते हैं अपने को ऊंचा न समझने को अर्थात् 'अमानित्वय्' को। यानी विनम्रता की। विनम्रता प्रयास से नहीं आती। यदि प्रयास द्वारा इसको प्राप्त करने की कोशिश की जाएगी तो यह भौंडी लगेगी। इसका उदय तो तब होता है, जब हम महसूस करते हैं कि हर जीव अपनी जगह अद्वितीय है। जब यह बात हम पूरी गहराई से समझते और स्वीकारते हैं, तो हम स्वाभाविक तौर पर हर एक का सम्मान करने लगेंगे। यह विनम्रता तब नहीं पैदा होगी. जब हम सबको बराबर मानेंगे। एक बात और समझ लें कि हमारे दुश्मन भी हमारी वृद्धि में योगदान देते हैं - चाहे परीक्षा रूप से ही सही। यहां सुष्टि में हमारी उपस्थिति अपना किसी-न-किसी रूप में योगदान देती ही है।

प्राय: हम मन-ही-मन जांच-पड़ताल करते हैं कि कोई हमसे सम्मान पाने

के योग्य भी है कि नहीं। इसके लिए हमारा एक अपना पैमाना होता है। हम देखेंगे कि वह व्यक्ति क्या विशेषताएं रखता है और समाज उसका कितना सम्मान करता है। फिर हम तय करते हैं - ''ठीक है… यह हमारे थोड़े सम्मान का तो हकदार है।'' तब हम समझते हैं कि हर जीव इस ब्रह्मांड में एक अद्वितीय अस्तित्व है तथा उसमें भी वही ईश्वर है जो हमारे भीतर है। यह विचार आते ही हमारे मन में उसके लिए विनम्र होने का भाव आता है और गर्व की ठसक

दूर होने लगती है। यही कृष्ण स्पष्ट करते हैं। दसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न : किसी सच्चे आध्यात्मिक गुरु के पास कैसे

पहुंचा जाए या कैसे 'आचार्योपासना' की जाए। इस बारे में वह (कृष्ण) एक अन्य श्लोक में भी कहते हैं : 'तद विदिद्ध प्राणी पातेन परीप्रास्नेना सेवाया'। इसका अर्थ है कि हमें स्वामी को निकट कुछ प्रश्नों को साथ पहुंचना चाहिए और

श्रीमदभगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

है : "अपने पडोसी को वैसे ही प्यार करो. जैसे तम स्वयं से करते हो।" इसका पुरा भाव समझे बिना यदि हम इसका पालन करना पारंभ कर दें, तो क्या होगा? पहली समस्या है हम यह नहीं समझते कि हम स्वयं को प्यार नहीं करते और हम यह भी नहीं समझते कि जब तक हम स्वयं को प्यार नहीं करेंगे, हम किसी और को प्यार कर ही नहीं सकते। फिर हमारी मानसिकता या चेतना ऐसी होनी चाहिए, जिससे प्यार स्वत: रूप से स्फूर्त हो सके। फिर तो प्यार स्वत: ही प्रस्फुटित होगा।

लेकिन जब हम किसी पर अपना प्यार थोपते हैं, तो वह एक व्यापार का रूप ले लेता है। वास्तव में हमें प्रेम का शद्ध रूप ज़ान ही नहीं होता; हम जो जानते हैं वह प्यार का विकत रूप होता है। प्रेम का अर्थ सरक्षा पाना या प्रतिदान में कुछ प्राप्त करना नहीं होता। शब्द रूप तो आपके अस्तित्व की असली अभिव्यक्ति है। यह तो अपने आप प्रकट होता है। यदि हम अपने प्रति सच्चे हैं

ईमानदार हैं, इतना ही बहुत है। हम इस भाव से सीधे मूक्ति पा सकते हैं। रामकृष्ण कहते हैं कि आंतरिक ईमानदारी आपके मुंह और दिमाग को जोड देती है और आप मक्त हो जाते हैं। हम अपने को धोखा देते हैं. जब हम कोई काम इसलिए करते हैं कि समाज में हमारी बड़ाई होगी. इसलिए नहीं कि हमारे अंतमन से हमें उस काम को करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। समस्या तब शरू होती है जब हमारे आंतरिक मन और बाहरी वातावरण में लगातार संघर्ष जारी रहता है। जब हम अंदर से कछ और सोचते हैं तथा बाहर से कुछ और करते हैं, तो संघर्ष तो रहेगा ही।

इस प्रकार बज़ाय हम अपनी चेतना जागत करें, हम गतिविधियों को क्रियाशील करने लगते हैं। बज़ाय अपने अस्तित्व पर काम करें, हम अपने क्रियाकलापों को जागत कर देते हैं। हमारा क्रियाकलाप इस क्षेत्र में कतई काम नहीं आएगा। हमारी चेतना या अस्तित्व ही काम आएगा। तो अपने 'होने' पर काम करें, अपनी 'करनी' के लिए नहीं। जो काम पर काम करता है, वह चाहे लगातार तराशता रहे कोई छवि नहीं उभरेगी और उसके अंतर्मन को कोई चैन नहीं मिलेगा, बल्कि संघर्ष, कष्ट एवं दबाव ही बढ़ते रहेंगे। लेकिन जब हम अपने अस्तित्व या 'होने' पर काम करेंगे, तो हम प्रफुल्लित होकर सही ऊर्जा और सही चेतना का प्रस्फुटन कर सकेंगे।

तम अद्भितीय हो

प्राय: हम अपने बारे में दूसरों को मन पर अधिक विश्वास करते हैं। हम मापने के उनके मापदंड को ही सही मानते हैं और इस प्रकार समस्या पैदा करते हैं। इसे मैं 'अपराध बोध' या 'गिल्ट' की संज्ञा देता हूं। अपराध बोध यानी अपने

उनसे उनका उत्तर पाने को प्रार्थना करनी चाहिए। क्यों? कृष्ण ऐसा क्यों कहते हैं? आवश्यकता क्या है? बार-बार आध्यात्मिक ग्रंथ गरु के होने पर बल देते हैं। यह बात भगवत गीता तक ही सीमित नहीं: जैन-बद्ध धर्म, जैन धर्म, यहदी धर्म, इस्लाम धर्म और ईसाई धर्म में भी स्वामी या गुरु को महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी गई है। क्यों? विशेष तौर पर 'वेदांत' में - वैदिक परंपरा में तो गुरु का बहत महत्त्व है। क्यों है ऐसा?

े जब तक कि हम लगातार किसी को चेतनावस्था में रहते हुए, उसी चेतना को अभिव्यक्त करते हुए न देखते रहें, हमारी (सुप्त) चेतना यह मानने को तैयार ही नहीं होती कि ऐसा संभव है। इसी कारण हमारे हृदय और मस्तिष्क में एक अजस्त्र संघर्ष चलता रहता है। हमारी बुद्धि कहती है : ''नहीं-नहीं-नहीं! यह सब सत्य है।'' तार्किक रूप से तो हम आश्वस्त होते हैं, पर भावनात्मक रूप से इसको अनुभव करने की क्षमता नहीं होती।

जब हम किसी सजीव गुरु को देखते हैं, हमारी भावनाएं स्वत: उनकी चेतना को अनुभव करने लगती है। पुस्तकों द्वारा यही बात हम शाब्दिक भाषा द्वारा सीखते हैं, जबकि गुरु के साथ हम उनकी शरीर-भाषा से इसे समझते हैं। वह इस सत्य को स्थापित करने का एक जीता-जागता उदाहरण है। वह सिद्ध करते हैं कि ये बातें हमारे जीवन में भी एक वास्तविकता बनकर उभर सकती हैं। वस्तृत: जब हम किसी प्रबुद्ध गुरु से मिलते हैं, तो तीन बातें एक साथ होती हैं - पहली, हम अपनी आंखों से देख सकते हैं कि शाश्वत आनंद या आनंदपूर्ण चेतना में चौबीसों घंटे रहा जाना संभव है, इससे हमें एक आश्वस्ति मिलती है और प्रेरणा भी प्राप्त होती है। यह प्राप्त करना हमें संभव लगने लगता है। लेकिन हम मन-ही-मन स्वयं से पूछते हैं : ''ठीक है - गुरु के लिए यह संभव है, पर क्या यह मेरे लिए भी संभव हो सकता है?'' इसकी आश्वस्ति हमें गुरु के पास पहुंच कर होती है।

उधर, गुरु हमारे अंदर, यह दिखाकर कि "यदि मेरे लिए संभव है, तो तुम्हारे लिए क्यों नहीं'', एक विश्वास पैदा करवाता है। बीज के अंदर का पेड़ बीज के अंकुरित होने को लिए समर्पित है कि वह बाहर आए, उधर बीज इस प्रतीक्षा में बैठा है कि पहले पेड़ उगे तो। बीज सोचता है : '' क्या पता कब पेड़ उगेगा?'' पेड़ कहता है : ''अरे! अंकुरित तो हो बीज, तब ही तो मैं उगूंगा।'' परंतु बीज पेड़ से कहता है : ''पहले देख तो लूं कि तुम उग सकते हो कि नहीं तभी मैं फुटुंगा।''

हम सदा असुरक्षा और अनिश्चिता के कारण भयभीत रहते हैं। लेकिन गुरु से हमें यह आश्वासन मिलता है कि हम चैतन्य हो जाएंगे।

एक लघु कथा

एक पत्रकार एक अध्यक्ष को चुनाव लंडने वाले प्रत्याशी से साक्षात्कार लेने गया। अपने भाषण में वह प्रत्याशी कह चुका था कि वह देख रहा है कि उसका भविष्य शानदार है। इस साक्षात्कार के दौरानं पत्रकार ने उससे पछा : "जब धविष्य शानदार है, तो आप इतने चिंतित क्यों लग रहे हैं।'' प्रत्याशी का उत्तर था : ''मेरी निश्चितता की कोई वारंटी नहीं है; मैं आशावादी तो हं. पर यह कोई गारंटी नहीं है।''

हम सब इन्हीं ऊहापोहों में फंसे रहते हैं। आशा तो रहती है कि हमें यह दिव्य अनुभव मिल जाएगा, पर साथ-ही-साथ इस जोखिम को उठाने में हमें डर भी लगता रहता है।

गरु तो पेड हो चुका है। वह शिष्य को आत्मविश्वास देता है। वह कहता है : ''चिंता मत कर। तेरी तरह मैंने भी बहुत संघर्ष किया है। अब देख - मैं प्रफल्लित हूं - मैं मरा नहीं। मैं अब पेड़ हो चुका हूं। यदि तू भी खूल सके (या तेरा बीज फूट सके) तो तू भी पेड बन जाएगा।'' वह उसके साथ बैठकर उसका आत्मविश्वास दुढ़ करता है। वह उसमें ऊर्जा भरता है और पेड होने की क्षमता का विश्वास जगाता है। वह बार-बार कहता है : "जब मैं प्राप्त कर सकता हूं, तो तू क्यों नहीं प्राप्त कर सकता?''

तीसरी बात, गुरु सही जगह और विधि (तकनीक) बताता है, जिसमें बीज के अंदर का पेड प्रस्फूटित हो सके। वह सही भुमि, स्थितियां, पानी-मिट्टी तैयार करवाता है। हमें तो मात्र गुरु पर भरोसा रखकर अपने प्रस्फ़ूटन का मार्ग खोलना है। इसलिए गुरुगण आश्रम बनाते हैं। आश्रम वह जगह हैं, जहां यह प्रस्फुटन होता है। आश्रम एक आँपरेशन थियेटर की भांति होता है, जहां बीज पेड बनता है और अपना अनुभव प्रकाशित करता है। आश्रम में स्थितियां नियंत्रण में रहती हैं - वह एकं सुरक्षित एवं

पक्की जगह होती है, जहां हम अपनी चेतना को जागृत कर सकते हैं।

गुरु हमें सत्य का अनुभव कराता है - वह सत्य जो हमारे अस्तित्व में शुरू से हमारे साथ रहता है। पहले वह हमें अपनी शरीर-भाषा से आश्वस्त करता है फिर वह हमें विश्वास दिलाता है कि यह हमारे लिए भी संभव है। फिर वह जगह बनाता है, जहां यह सब हो सके। चौथी स्थिति, वह सुनिश्चित करता है कि हम उस चेतना में प्रतिष्ठित रह सकें। यह सब गुरु को उत्तरदायित्व होते हैं। इसलिए वैदिक पद्धति में यह बार-बार कहा जाता है कि हम किसी सजीव गुरु के पास जाएं। इसे ही कृष्ण आचार्योपासना कहते हैं। वह हमें आवश्यक

मार्ग-निर्देश देते हैं, जिससे हम इस प्रौद्योगिकी के साथ कार्य कर सकें।

श्रीमदुभगवत गीता

चेतना शाश्वत है

  • वह जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानंद को प्राप्त होता है. उसको (मैं) भलीभांति कहुंगा। वह अनादि परब्रह्म न सत् ही कहा जाता है. न असतो
  • वह सब ओर हाथ-पैर वाला और सब ओर नेत्र और सिर वाला एवं कान वाला है क्योंकि वही स्वयं संसार में सबको व्याप्त ि कर स्थित है। व कि
  • 13.15 वह संपूर्ण इंद्रियों को विषयों को जानने वाला है, परंतु वास्तव में सब इंद्रियों से रहित है; तथा आसक्ति और निर्गण होने पर भी अपनी योगमाया से सबको धारण करने वाला और गुणों को भोगने वाला है।
  • 13.16 वह (परमात्मा) चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर रूप भी वही है। वह सुक्ष्म होने से अविज्ञेय (न जाने जा सकने योग्य) तथा अति समीप और दर भी वही स्थित है।
    • वह विभाग रहित एक रूप से आकाश सदुश परिपूर्ण होने पर भी चराचर संपूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है। वह जानने योग्य परमात्मा (विष्णु रूप से), भूतों को धारण करने वाला (रुद्र रूप से), संहार करने वाला तथा (ब्रह्मा रूप से) सबको उत्पन्न करने वाला है। मि
  • 13.18 वह ब्रह्म ज्योतियों की भी ज्योति एवम् माया से अत्यंत परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोध स्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्त्व ज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।

कृष्ण कहते हैं : "अब मैं उस जानने योग्य के बारे में बताऊंगा, जिसको जानकर तुम्हें शाश्वत सत्ता (परमात्मा) को अनुभूति होगी, जो एक अनादि चेतना है तथा इस भौतिक जगत् के कारण और प्रभाव से परे है।'' पिछले श्लोकों में कृष्ण उन गुणों की चर्चा करते हैं, जो अंतर्मन में दिव्य चेतना के प्रफल्लित होते ही प्रकट होने लगते हैं। अब वे अर्जुन को बताते हैं कि यह चेतना शाश्वत है।

हमारा मन किसी घटना के होने पर उनको देशकाल के परिप्रेक्ष्य में ही देखता है। हमारा मस्तिष्क एक निश्चित समयक्रम के अनुसार ही सोच सकता है। यह ऐसा है मानो कोई आंतरिक संदर्भ चार्ट है, जिस पर देशकाल क्रम में ममस्त घटनाएं रख दी जाएं। आधुनिक विज्ञान तो प्रश्न पूछता है : "यह कैसे इआ? कब हुआ? इसके पहले क्या स्थिति थी? इसके बाद क्या हुआ? किसने ऐसा करने की पहल की?'' जब इस ब्रह्मांड के उद्भव की बात होती है, तो यह विज्ञान 'बिग बैंग थ्योरी' द्वारा इसको स्पष्ट करता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि एक छोटी चिंगारी ने फटकर इस ब्रह्मांड का सजन किया, पर वे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाते कि "इसके पूर्व क्या था?" कृष्ण कहते हैं कि यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा, परम चेतना है और सदैव विद्यमान रहती है। यह कई रूपों में यथा ग्रह-नक्षत्र, मनुष्य इत्यादि के माध्यम से स्वयं को प्रकट करती है, परंतु यह है शाश्वत। यह सदैव इसी प्रकार प्रकट होती रहेगी और अपने स्रोत में लौट जाएगी, पर यह सदा रहेगी। हमारे मन में देश-काल की अवधारणा मन और इंद्रियों की समझ के आधार पर बनती है। हमें जो प्रतीत होता है, वह हमारे मन के विचारों का ही प्रतिक्षेपण होता है। लेकिन समय को यह समझ उस समझ से भिन्न है, जो हमारे गूरु या स्वामी की होती है। वे लोग तो समय को क्षणों के माप से मापते हैं। क्षण वह अंतराल है जो दो विचारों को मध्य रहता है। यूं समझें कि क्षण दो विचारों के बीच का सामाजिक अंतराल है। बुद्ध ने इस देश-काल को शून्य कहा था। शंकराचार्य उसे ही 'पूर्ण' कहते हैं। यह मस्तिष्क से परे (नो-माइंड) क्षेत्र है तथा मस्तिष्क-क्षेत्र वह होता है जिसके आधार को हम छूते हैं। यह वर्तमान क्षण ही होता है, जिसमें हम अपनी आंतरिक दिव्यता से साक्षात्कार करते हैं और उस ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को पहचानते हैं, जो हमारी मूल प्रकृति है।

जब हम एक पादार्थिक सूख को बाद दूसरे को पीछे पड़े रहते हैं, तो हम बहुत दबाव, चिंता एवं तनाव से गुज़रते हैं, जो हमारे सिर पर हर सेकेंड गोलाबारी-सी करते रहते हैं। हमारा क्षण अति लघु होता है क्योंकि हमारे अंदर विचार बड़ी संख्या में उठते ही रहते हैं। इसी कारण हमें एक घबराहट भरी घूटन की अनुभूति होती रहती है। हम तो मानो एक चूहा दौड़ में फंसे हैं। हमें हमेशा यह लगता है मानो समय हमारे हाथ से फिसलता जा रहा है। हम चाहते हैं कि

श्रीमद्भगवत गीता

शरीर छूटने से पूर्व हम अधिक-से-अधिक कमा लें तथा खूब सुख के अनुभव प्राप्त करें। हमें सदा यही लगता रहता है कि हम यहां जो पाना चाहते हैं वह हम खो देंगे, यदि शोघ्रता नहीं करेंगे।

हम इस प्रकार अनुभव इसलिए करते हैं क्योंकि हम स्वयं को क्षेत्र अर्थात अस्थाई रूप से मन और शरीर से जोड़ते हैं। यह समझ लें कि मन और शरीर तो पंचभूत से बने हैं और जब उनका काम समाप्त हो गया, तो वे वापस अपने मूल स्त्रोत की ओर लौट जाएंगे।

दूसरी ओर, एक प्रबुद्ध स्वामी जानता है कि वह क्षेत्रज्ञ है। उसे मालूम है कि वह शरीर-मन तंत्र नहीं है। उसको महसूस हो चुका है कि वह परम चेतना है। इसलिए उसे कोई भड़भड़ी नहीं कि वह इस चूहा-दौड में फंसे, क्योंकि उसे ज्ञात है कि इस शरीर के नाश होने के बाद भी जीवन चलता रहता है। वह तो स्वयं अपने मन का साक्षी हो जाता है। उसके मन में जो भी विचार उठेगा वह कर्म-जागृत करने वाला होगा और कभी भी अकर्मण्यता पैदा करने वाला अनुत्पादक विचार नहीं होगा। जैसे ही वह विचार आया कि वह स्वयं को किसी कार्य के रूप में व्यस्त कर देगा। प्रबुद्ध ज्ञानी के मन में कभी विचार एक नहीं होते। उसे अनन्तता की अनुभूति होती है क्योंकि वह विचार से परे क्षेत्र में स्थायी रूप से रहता है। यही उस परम चेतना की 'आनंदिता' है, जिसे कृष्ण यहां बताते हैं।

गुरु की सहायता

जब हम प्रबुद्ध गुरु के सामने होते हैं - वह जो मस्तिष्क से परे क्षेत्र ( नो माइंड्स जोन) में रहते हैं, तो हमारे अंदर भी विचारों के उदय की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो जाती है। इस प्रकार बिना प्रयास के हम अधिक शांत और जागरूक स्वत: ही होने लगते हैं।

ऋणात्मकता और धनात्मकता या विनाश और विकास हमारे चारों ओर घटित होने वाले विश्व के स्वाभाविक गुण हैं। यही गुण क्षेत्र के भी हो जाते हैं। जब हमें अनुभूति होती है कि हम इस परिवर्तनशील क्षेत्र का अंश नहीं, वरन् स्थायी और शाश्वत क्षेत्रज्ञ है (अर्थात् उस चेतना के जो इस क्षेत्र को संचालित करती है), तो हम मुक्त होने लगते हैं।

कृष्ण कहते हैं कि यह शाश्वत आनंद ज्ञेय है - अर्थात् जाना या महसूस किया जा सकता है। जब यह ज्ञान आता है, तो ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान सबका संगम हो जाता है। इस अनुभव में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय एक ही हो जाते हैं। फिर तो अनुभव, अनुभवकर्ता एवं वह जिसका अनुभव किया जा रहा है, एक हो जाते हैं। इस अवस्था को 'त्रिपूटी' कहते हैं, जिसमें तीनों में कोई अंतर ही नहीं रहता।

इसको यूं समझ लें : कल्पना करें कि आपको ड्राइव करना पसंद है और आप एक नई, उम्दा कार में बैठे हैं, जिसमें सारे स्वत: चलने वाले यंत्र लगे हैं। आप पूरी गति से एक हाईवे पर जा रहे हैं। कार चलाने में आप इतने आनंद में डूब जाते हैं कि आप स्वयं को भूल जाते हैं। कुछ समय पश्चात आपको अचानक लगता है कि कार आप ड्राइव नहीं कर रहे, यह स्वयं हो रहा है। आप स्वयं ड्राइविंग का एक अनुभव बन जाते हैं और आपको यह नहीं लगता कि आप स्वयं ड्राइव कर रहे हैं। कार अपने आप आगे भाग रही है - आप तो मात्र इस अनुभव को ग्रहण कर रहे हैं। इसी प्रकार यदि आप अपने किसी मन के काम में डूबे होते हैं, तो अनुभव, अनुभव करने वाला एवं अनुभव का साध्य एक शाश्वत चेतना में समाहित होकर एक रूप हो जाते हैं। इसे कहा जाता है ' क्षेत्र में होना'।

कृष्ण ने स्पष्ट किया था कि उनकी शाश्वत प्रकृति, शाश्वत सत्ता समय के आयाम से बंधी नहीं है। अब वह कहते हैं कि वह देश (स्पेस) से भी नहीं बंधे हैं। प्राय: हम किसी व्यक्ति या वस्तु की उपस्थिति या अनुपस्थिति उसको भौतिक आयामों या गुणों से प्राप्त करते हैं। (अर्थात कोई वस्तु या व्यक्ति है या नहीं है. इसको हम भौतिक आयामों से सिद्ध करते हैं)। हम अपना जीवन-यापन अपने दृश्य, गंध, स्पर्श, स्वाद और श्रवण द्वारा प्राप्त सूचनाओं के अनुरूप करते हैं। यदि हमारी ये पंचेंद्रियां किसी वस्तु की अनुभूति न कर पाएं, तो हम समझेंगे कि हमारे चारों और कुछ नहीं है।

प्रबुद्ध गुरु के साथ एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी होती है कि वे अपनी भौतिक उपस्थिति से अधिक अपनी अनुपस्थिति में उपलब्ध रहते हैं। उनकी ऊर्जा देशकाल के बंधन नहीं मानती और इसलिए हर जगह, हर समय उपलब्ध रहती है।

जब आप अपने प्रबुद्ध गुरु के ऊर्जा क्षेत्र में होते हैं, जो इस समय अपने शरीर में नहीं होते, वरन् 'जीव समाधि' में होते हैं - अर्थात् स्वामी के विश्राम की अंतिम अवस्था - तो बिना किसी विशेष प्रयास के आप चैन में आ जाते हैं और अंदर शांति की अनुभूति स्वत: ही होने लगती है। भारत को विभिन्न प्रसिद्ध मंदिर - यथा तिरुपति, तिरुवन्नमलाई, मंत्रालय और पालनी अधिकतर प्रबुद्ध स्वामियों को अंतिम समाधि स्थलों को निकट ही बने हैं। इसलिए ये मंदिर एक शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र का काम करते हैं और लाखों श्रद्धालुओं को हर वर्ष खींचकर लाते हैं।

भौतिक रूप से प्रबुद्ध स्वामी अपने शरीर में न भी हो, तब भी हमें उसकी उपस्थिति महसूस होती है। क्यों? इसलिए कि वह शरीर को बंधन में नहीं होता।

वह उस ब्रह्माण्डीय ऊर्जा होता है जो अपने प्राकट्य में देशकाल के बंधन से रहती है। हमें तो मात्र भौतिक सीमाओं की ही समझ होती है। यहां कृष्ण 'सर्वत्र आंखें' कहकर यह बात स्पष्ट करते हैं।

जब कृष्ण कहते हैं : "हर जगह हाथ और पैर, सिर, कान और मुंह हर ओर'' तो उनका क्या अभिप्राय है?

कृष्ण के समय में जो महिलाएं-स्त्रियां गायों की देखभाल करती थीं, उन्हें ' गोपी' कहा जाता था। वे सब ही कृष्ण को परम भक्त थीं। घर के दूसरे कार्यों में बंधी हुईं. हर समय वे कृष्ण की भक्ति में ही सराबोर रहती थीं। कहा जाता है रासलीला के समय - जब कृष्ण अपनी ब्रह्माण्डीय चेतना का आभास कर गोपी को देते थे - कृष्ण उन सैकडों गोपियों के साथ नाचते थे। वृंदावन में हर गोपी को लगता था मानो कृष्ण उनके ही साथ है। हर गोपी के साथ कृष्ण का एक रूप प्रकट होता था। कृष्ण का वह एक ही रूप होता था, पर सैकडों-लाखों गोपियों के साथ एक साथ प्रकट होता था।

इसका गहन अर्थ समझें : हर गोपी कृष्ण की दिव्य चेतना के साथ जुड़ी थी और हर एक उनकी उपस्थिति का अनुभव करती थी। जब हम अपने भीतर गहरे उतरते हैं, तो हर वस्तु में हम दैवी चेतना का अनुभव करते हैं। यह सर्वव्याप्त चेतना भौतिक सीमा-बंधन से परे होती है। इसलिए कृष्ण कहते हैं कि वे 'सर्वव्याप्त' हैं। वे सब में छाए हैं और हर जगह मौजूद हैं।

इसलिए मैं कहता हूं कि जो भी निरोगकर्ता हैं वे मेरे हाथ हैं: मेरे सारे आचार्य मेरी वाणी हैं और व्यवस्थापक मेरे मस्तिष्क हैं। अपने दो भौतिक हाथों से तो मैं सीमित संख्या में ही लोगों को निरोग कर सकता हुं; एक मुंह से तो मैं सीमित लोगों के सामने अपना प्रवचन कर सकता हूं और कार्यक्रम संचालित कर सकता हूं और एक मस्तिष्क से तो मैं सीमित संख्या में आयोजन कर सकता हूं। इसलिए में अपने निरोगकर्ताओं, शिक्षकों और व्यवस्थापकों को साथ कार्यशील करता हूं। 'ब्रह्माण्डीय THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM' इन सबके माध्यम से कार्य करता है

एक देश से दुसरे देश तक फोन से बात करने के लिए आधारभूत ढांचा होना आवश्यक है; समुद्र की सतह के नीचे से तार डाले जाते हैं, कनेक्शन कायम किया जाता है। परंतु ब्रह्माण्डीय कनेक्शन के लिए कुछ भी नहीं चाहिए। उसमें तो संबंध भीतर से जुड़ता है, जिसकी कोई सीमा ही नहीं होती और हम समग्र से जुड़ जाते हैं।

यहां कृष्ण इस ईश्वरीय तत्त्व के गुणों का बखान करते हैं। पर यह समझ लें कि यह सब हमें इस अनुभव को प्राप्त करने की प्रेरणा देने के लिए कहा गया है, जिससे हम स्वयं भी इसको प्राप्त कर सकें। यदि किसी को जिसे चीनी

का स्वाद मालूम ही नहीं है, वह आपसे पूछे कि चीनी का स्वाद कैसा है. तो आप उसे कैसे समझाएंगे? आप कह सकते हैं कि यह सफेद घनाकार टुकडों में मिलती है, जो पारदर्शक और बेहद मीठे होते हैं। पर यदि वह आपसे पूछे : "मीठा क्या होता है?" तब आप क्या कहेंगे। आप भले ही कहते रहें कि चीनी मीठी होती है, वह गन्ने से निकाली जाती है, शीरा से सुखाकर बनाई जाती है - पर उसका कोई लाभ नहीं होगा।

पर यदि एक चम्मच चीनी उसके मुंह में डाल दी जाए, तो उसकी समझ में तुरंत आ जाएगा : "ओह! चीनी ऐसी होती है। चीनी की मिठास ऐसी होती है।'' यानी जब तक उसे मीठेपन का स्वयं ही अनुभव न हो जाए. 'मिठास' उसके लिए एक काल्पनिक अवधारणा रहेगी, क्योंकि उसके पास इसका कोई अनुभव नहीं है, यद्यपि उसकी कल्पना वह करने लगेगा।

लेकिन बौद्धिक जनों के साथ एक परेशानी यह रहती है कि वे शक-ओ-सुबहा से घिरे रहते हैं। इसलिए सैद्धांतिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता होती है और यह महत्त्वपूर्ण भी है। हम हर वस्तु को नाप-तोल करना चाहते हैं, जो भी हमें ज्ञात हो। कृष्ण इस संदर्भ में बहुत कृपालू हैं और धैर्यवान भी हैं। एकादश अध्याय में उन्होंने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाया था। परंतु

उसे देखकर अर्जुन भयभीत हो गया था और उस ऊर्जा विस्फोट से घबरा गया था। उसने कृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहा था : "हे कृष्ण! मैं आपको समझ नहीं पा रहा हूं - न आपकी महिमा मेरी समझ में आ रही है।'' लेकिन अर्जुन वह जानने को उत्सुक अवश्य था, जो कृष्ण कह रहे थे। इसलिए कृष्ण ने उसको सामने हर तरह का वर्णन प्रस्तुत किया था, जिससे वह अर्जुन को भय और संदेह का निवारण कर सकें।

प्रबुद्ध स्वामी की करुणा बहुत महान होती है। भले ही शिष्य कितने भी संदेह या शक प्रकट करें, वे शांति से धैर्यपूर्वक उसके साथ बैठकर एक-एक कर उसके शक और संदेहों को निर्मुल करते हैं। हमारे शक और संदेह का जनक हमारा मन (दिमाग) ही होता है, जो हमारी समझ पर एक आवरण-सा

डाल देता है। स्वामी का तेज़ और महिमा उस आवरण को गला देती है। इस श्लोक में वे कहते हैं कि सारी इंद्रियों के संचालन की जिम्मेदारी यद्यपि उन्हीं की है, पर वे उनसे परे रहते हैं। वह, हर जीवन जो प्रकट होता है, को लिए उत्तरदायी हैं, पर स्वयं उनसे परे हैं। उन्हीं के संचालन से आक्रामकता (राजस),

आलस्य (तमस) और भलाई (साल्विकता) आती है, पर वे इन सबसे परे हैं। कृष्ण का कहना है जीवन का उत्स ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को एक सिरे से होता

है, जो उनसे गुज़रता है। पर आप देखते हैं कि हमारे चारों ओर कई वस्तुएं हमारी

तो हम अपने वर्तमान क्षण को गंवा बैठेंगे। इस प्रकार न केवल हम अनन्तता के दर्शन से वंचित रहेंगे, वरन् अपनी अंतर्चेतना के प्रति भी विमुख हो जाएंगे। विमुख हो जाएंगे। अंतर्चेतना को प्रति भी विमुख हो जाएंगे।

भीतर का अंतराल

हम अपने अंदर के विश्व को विभिन्न गुणवत्ता वाली वस्तुओं से परिपूर्ण इसलिए देखते हैं क्योंकि हम स्वयं को एक अचल सत्ता के साथ जोडते हैं. उसे ही हम अपने संदर्भों का मूल बिन्दु मानते हैं। हम जो भी कार्य करते हैं, उसको उसी मूल संदर्भ के साथ ही जोड़ते रहते हैं। इस प्रकार हम एक बंद अंतराल. जो हमारी भौतिक सीमा – घटाकाश – द्वारा निर्धारित होती है, में जीते रहते हैं। वस्तत: हम तीन प्रकार के धरातलों या स्पेस में जी सकते हैं : वह धरातल जो हमारे शरीर द्वारा आच्छादित है; वह जो हमारे मन या मस्तिष्क द्वारा आच्छादित है और वह धरातल जो इन दोनों (शरीर-मन) की सीमा से परे है। प्रथम को 'घटाकाश' कहते हैं - यानी शरीर द्वारा आच्छादित अंतराल। यह अंतराल हमारे भौतिक शरीर का होता है। हम में से अधिकतर लोग लगभग सारे समय इसी में निवास करते हैं। दूसरा है 'चिदाकाश' अर्थात वह धरातल जिससे आप परिचित हैं, तो यही आपका 'चिदाकाश' है। यह मन-मस्तिष्क या विचारों का अंतराल है। तृतीय अंतराल है 'महाकाश' जो संपूर्ण धरातल, ब्रह्माण्ड तथा उसमें स्थित हर वस्तु को समेटे हुए है।

'घटाकाश' पंच तत्त्वों : पृथ्वी, जल, अग्नि, वायू एवं ईथर से बनता है।

यह तत्त्व सुक्ष्मतर होते जाते हैं जब हम उनके क्रम में ऊपर चढ़ते हैं, यथा -पृथ्वी से जल, जल से अग्नि, अग्नि से हवा और हवा से ईथर। पहले चार तत्त्व हमारी चेतना से नहीं जुड़ते हैं। ईथर, जो सर्वाधिक सुक्ष्म तत्त्व है. हमारी चेतना से जुड़ता है व उसका प्रतिबिम्बन करता है और इसी कारण हम जीवित रहते हैं। परंतु समस्या यह है कि हम समझते हैं कि हमारी चेतना 'घटाकाश' से बंधी है। दूसरे शब्दों में हम उसे शरीर मात्र से ही बंधा समझते हैं।

इसी कारण हम इस शरीर को ही अपना संदर्भ बिन्दु मानते हैं, जब हम बाहरी विश्व को देखते हैं। हम समझते हैं कि यह शरीर ही हमारा 'मैं' है, जो समस्त विश्व को देखता है। आप गौर से देखें तो समझेंगे कि समस्त विज्ञान का यह मूल आधार है : हम अलग-अलग भौतिक सीमाओं द्वारा परिभाषित अलग भिन्न-भिन्न सत्ताएं या इकाइयां हैं, लेकिन वह प्रबुद्ध स्वामीगण जो 'घटाकाश' से 'महाकाश' में प्रवेश कर चुके हैं, जानते हैं कि अंतरालों (स्पेस) का यह अलगाव हमारे अज्ञान के कारण है।

जागरूकता से परे. अपने आप हो रही हैं। हम जब रोटी का टुकडा अपने मुंह में रखते हैं, तो हम उसे चबाकर निगल जाते हैं। इसके पश्चात इससे ऊर्जा कैसे प्राप्त की जाए. यह परी प्रक्रिया बिना हमारे किसी निर्देश के चलती रहती है निर्देश देना तो दूर, हमें मालूम ही नहीं होता कि हमारे अंदर क्या हो रहा है। आज वैज्ञानिक रसायनिक प्रतिक्रिया तो समझ लेते हैं. पर यह अभी भी नही मालूम कि एक जीवित और मरे कोश या कोशिकाओं में क्या अंतर है। इस विशाल ब्रह्माण्ड और अरबों ग्रह-नक्षत्र-निर्हारिकाओं में आपसी सामंजस्य क्या किसी की समझ में आ सकता है? क्या अंतरिक्ष में कोई पुलिस वाला बैठा है जो इन सबको पूरी तरह व्यवस्थित करता रहता है? नहीं!

यह समझ लें कि हमारी वह प्राण-शक्ति - जो यह सारा खेल चलाती है जो हमारी हर सांस पर नियंत्रण रखती है - भी वही शक्ति है जो इस ब्रह्मांड की व्यवस्था को कभी अराजक नहीं होने देती - विशुद्ध बुद्धिमत्ता है। संस्कृत में एक कहावत है जिसके अनुसार समस्त ब्रह्मांड में घास का एक पत्ता भी नही हिल सकता, जब तक दैवी शक्ति (ईश्वर) की ऐसी इच्छा न हो। कृष्ण हमे एक स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि हम कितना उन पर निर्भर हैं, जो ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के स्रोत हैं। उनकी इच्छा के बगैर कहीं भी कुछ नहीं हो सकता। साथ-ही-साथ बिना इस पूरी प्रक्रिया में शामिल हुए यह अनन्त ऊर्जा संसार में घटित होने वाली हर घटना या जीवन रूप को मात्र साक्षी भाव से देखती है।

यदि हम थोड़ी गहराई से सोचें. तो हम पाएंगे कि हम जो भी देखते-समझते हैं, वह सब हमारे मन और इंद्रियों द्वारा बनाया गया रूप होता है। हम अपनी दुनिया स्वयं ही बनाते हैं। हमारे भीतर बहुत गहरे में पैठा हुआ ईश्वर पूरी प्रक्रिया को देखता रहता है. परंतु उसमें शामिल कतई नहीं होता। किसी विशेष परिस्थिति में हमारा मन अपनी प्रतिक्रिया के अनुसार सुखी या दु:खी होता है। हमारा मन या दिमाग कुछ लोगों को अच्छा बताता है, तो कुछ को बुरा; कोई घटना कष्टकारक लगती है. तो कोई हर्ष देने वाली और इन्हीं प्रतिक्रियाओं के आधार पर वह लोगों या अनुभव के पास जाना चाहता है या दूर भागता है।

पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध प्रबुद्ध स्वामी, श्री रामकृष्ण परमहंस एक परा रूपक बांधकर इस प्रक्रिया को बड़ी सुंदरता से स्पष्ट करते हैं। जब हम किसी घाटी पर खड़े होकर नीचे देखें, तो हमें गड्ढे और उतार दिखाई पड़ते हैं और यदि ऊपर देखें तो पहाड़ और चोटियां। पर हम जब चोटी पर पहुंच जाते हैं, तो हमें लगता है कि यह सब ऊंचाईयां और नीचाईयां फालतू की बात है। जमीनी धरातल पर दिखने वाले भेद चोटी पर कोई मायने नहीं रखते। यदि हम अपने दिमाग या अतीत से ही चिपके रहे - अपने पुराने सुख और दु:खों में घिरे रहें

एक लघु कथा

एक बार एक बच्चे ने एक ट्रक की दूसरे ट्रक से एक रस्सी के सहारे खींचा जाना देखा। दोनों समान गति से चल रहे थे। लड़का यह दृश्य देखकर हंसने लगा। ट्रक चालक ने उस लड़के से पूछा : " अरे! इसमें हंसने की क्या बात है?'' लड़का बोला : "वाह! एक रस्सी को उठाने ले जाने के लिए दो ट्रकों का प्रयोग! कितनी मज़ेदार बात है।''

जब हम पानी को विभिन्न आकारों के बर्तन में डालते हैं, तो पानी उन बर्तनों का आकार ही ग्रहण कर लेता है और हर बर्तन में पानी दूसरे बर्तनों के पानी से अलग लगने लगता है। लेकिन यदि हम हर बर्तन को पानी को अलग-अलग लेकर गौर से जांचें तो जल एक-सा ही लगेगा। इसी प्रकार विभिन्न रूपों-आकारों, रंगों, योनियों वाला यह विश्व यद्यपि विविधता से भरा-पुरा लगता है, परंतु इसमें एक ही चेतना है - प्राण शक्ति है। यदि हम यह साधारण सिद्धांत समझ लें कि हमारा उद्गम और अंत का एक ही स्रोत है, तो हमारी समझ में आ जाएगा कि हम किसी महान सत्ता से जुड़े हैं, जो हमारी व्यक्तिगत सत्ता से बहुत विशाल और महान है।

कृष्ण कहते हैं कि परम सत्य हमारे तथा अन्य सभी जीव-वस्तुओं के बाहर और भीतर स्थित है। इसी सूक्ष्म सत्य के कारण हम चर या अचर रहते हैं। यह अंतराल 'महाकांश' का है, जो समस्त अंतरिक्ष तक व्याप्त होता है। यहां तो कुछ भी 'द्वैत' है ही नहीं, तो हम किसी को किसी से तुलना कैसे कर सकते हैं? जो हर जगह व्याप्त है वह किसी से दूर या पास कैसे हो सकती है। सत्य तो एक ही है और संपूर्ण है।

यह स्पष्ट समझ लें कि अंतराल या स्पेस अविभाज्य है। यह कभी भी बांटा या अलग नहीं किया जा सकता, परंतु हम अपनी सीमित समझ के कारण स्पेस को कई सीमाओं में बांट देते हैं। यही हमारे कष्टों का मूल कारण है। हम चाहे किसी भी अंतराल में हों, हम में से हरेक को उच्चतर अंतराल में जाने का मौका उपलब्ध रहता है। मनुष्य, जैसा कि वह है, एक संभावित विभव प्राप्त करने की सक्षमता प्रकट करता है। वह उस वास्तविकता को प्राप्त नहीं करता, वरन् उसकी संभावना प्रकट करता है। वह मात्र वही नहीं जो लगता है। अभी तक तो हम लोग एक बीज रूप में ही हैं और हमने अभी अपनी पूरी संभावनाएं या सक्षमताएं व्यक्त नहीं की हैं। अभी हम पेड नहीं हो पाए हैं, पर हमारा मतलब यह नहीं कि हम आगे बढ़कर पेड नहीं बन सकते। जब हम इन तुलनात्मक सीमाओं से परे पहुंच जाएंगे, तब हमारा अनुभव हमें कृष्ण को इस कथन का अर्थ स्पष्ट करवाएगा।

हमारे जीवन का भी यही हाल है। जब हम अज्ञान से घिरे रहते हैं, तो हमें दुनिया में कोई भी मूर्ख बना सकता है, क्योंकि हम वास्तविकता देख नहीं पाते। वह वैश्विक चेतना स्वयं को कई रूपों में प्रकट करती है तथा कई वस्तुओं का विनाश भी इसके कारण ही होता है। जब यह वैश्विक चेतना अव्यक्त रहती है, तो केवल संभावनाएं प्रकट करती है। इसको शास्त्रों में 'पुरुष' कहा गया है। लेकिन जब यह विभिन्न रूपों में स्वयं को व्यक्त कर देती है, तो यह 'प्रकृति' कहलाती है। प्रकृति वस्तुत: पुरुष की सजनात्मक अभिव्यक्ति होती है। यूं समझें कि सागर का पानी तो पुरुष है, पर उसमें उठने वाली गतिमान लहर प्रकृति होती है। कृष्ण अर्जुन को याद दिलाते हैं कि परमात्मा प्रकृति और पुरुष में बंटा प्रतीत हो सकता है, क्योंकि प्रकृति विभिन्न रूपों में व्यक्त होती है, पर वह

कृष्ण कहते हैं कि वह परमात्मा है, वह साक्षी चेतना है, जो समस्त प्रकाश

यह वैश्विक चेतना सूर्य-चंद्र, तारे तथा आज को विश्व के कृत्रिम प्रकाश

स्रोतों को प्रकाशित करती है। कृष्ण इस आत्मतत्त्व को परम प्रकाश स्रोत कहते

हैं। यह आत्मतत्व या ईश्वरीय तत्व विशुद्ध बुद्धिमत्ता है, जिसका ज्ञान समस्त

अज्ञान को मिटा देता है। प्रबुद्ध स्वामी हर वस्तु को उसकी स्पष्टता में देखता है।

वह सत्य को वैसे ही देखता है, जैसा वह है। यदि आप किसी अंधेरे कमरे में

अधिकतर इन सबसे परे और अविभाज्य है। वह बंट नहीं सकता।

स्रोतों का मूल उद्गम है।

हैं, तो आपको उस कमरे में अन्य उपस्थितियों को बारे में ज्ञान नहीं होता, पर जैसे ही कमरे में बत्ती जली कि आप सब कुछ देख लेते हैं। एक प्रबुद्ध स्वामी चेतना को चिराग से सत्य को उसके सही रूप में देखता है, बिना किसी आवरण या फिल्टर को। इस चिराग के माध्यम से वह अपने पूरे माहौल का सही अनुभव प्राप्त करता है। यह चिराग दूसरे चिरागों-सा नहीं होता, पर अज्ञान की सारी परतें हटा देता है, चाहे वे कितनी भी गहरी हों। इसलिए प्रबुद्ध स्वामी अपनी स्थिति से पूरे 3600 क्षेत्र में सभी को देख लेता है। वह कोई आवरण प्रयोग में नहीं लाता; हमारी तरह वह वही नहीं देखता जो हम चाहते हैं। वह तो वही देखता है जो जैसा सत्य रूप में है। यह समझ लें कि हम जो आवरण या फिल्टर लगाकर हर वस्तु को देखना चाहते हैं, यही हमारी समस्याओं की जड़ है। हम कोई वस्तु या व्यक्ति वैसे नहीं देख पाते, जैसे वह है। हम अपने अहम् भाव या पूर्व-स्मृति के आग्रहों के कारण वही देखते हैं, जो हम देखना चाहते हैं। इस अहम् को भुला दें, जो हमारी दृष्टि पर अंधकार डालती है। अज्ञान के इस अंधकार को हटाने को लिए चेतना का चिराग अपने अंदर जलाएं। जब आपको सारी पूर्व-चेतना जल जाएगी, तब अहम् भाव भी समाप्त हो जाएगा।

श्रीमद्भगवत गीता

नहीं आएगा, तो घोड़े बेकाबू होकर रथ को अलग-अलग दिशाओं में खींचने लगेंगे।

ये घोडे हमारी इंद्रियों और मन के प्रतीक हैं, जो अपनी रुचि के अनुसार हमें विभिन्न दिशाओं में खींचते हैं, इसलिए हम अपनी हर करनी में संशयग्रस्त रहते हैं। यदि हमने इन घोड़ों को नियंत्रित नहीं किया, तो वे हम पर हावी हो जाएंगे। हमारे जीवन में यही सब होता है। चुकि हमें अपना रथ चलाना नहीं

आता, हम बड़ी सुविधापूर्वक घोड़ों को अपने आपको सुपर्द कर देते हैं। क्षेत्र का ज्ञान - अर्थात् सारी पार्थिक दुनिया जो हमारे चारों ओर पसरी है - ही हमें बताता है कि कैसे अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करें। जैसे ही हमें क्षेत्र का ज्ञान होता है, हमारी समझ में आ जाता है कि हम मात्र शरीर-मन या क्षेत्र ही नहीं हैं। यदि हम क्षेत्र में होते तो हम इसको कैसे (अलग से) समझ पाते? देखिए हम यह पुस्तक इसलिए पढ़ सकते हैं क्योंकि हम पुस्तक नहीं हैं - हम दोनों अलग-अलग सत्ता हैं। इसलिए जब हम क्षेत्र को जान जाते हैं, तभी तो हम कह सकते हैं कि हम क्षेत्र नहीं हैं। यह समझें कि हम क्षेत्र नहीं हैं, साथ में कर्ता हैं, यह ज्ञान भी कि हम क्षेत्रज्ञ हैं। जब हमारी समझ में आ जाता है कि हम क्षेत्रज्ञ हैं, हम क्षेत्र के परे पहुंच जाते हैं।

जीवन एक स्वप्न है

वस्तुत: वास्तव में क्षेत्र नाम का कुछ भी नहीं होता है। यह सब तो हमारे मन या मस्तिष्क का प्रतिक्षेपण है - जैसे कि स्वप्न हो। जब हम बिस्तर पर जाते हैं, तो हमें मालुम रहता है कि हम फलां-फलां हैं - फलाने की पत्नी या फलाने के पति, फलां कंपनी में कार्यरत हैं - इत्यादि। हमें अपनी अस्मिता की पूरी पहचान रहती है - पूरी ठोस वास्तविकता के साथ, जब हम सोने जाते हैं। हम जानते हैं कि सपने जो आएंगे वह वास्तविक या हकीकत नहीं होंगे। दूसरे दिन हम नींद से जागने के बाद स्वाभाविक रूप से अपने काम निबटाते हैं, कार्यालय जाते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं - इत्यादि।

लेकिन जैसे ही हम स्वप्नावस्था में पहुंचते हैं, हम सपने को सत्य मानने लगते हैं। जैसे-जैसे हम स्वप्न में घुसते जाते हैं हमारी अस्मिता, हमारी स्वप्न में भूमिका के साथ परिवर्तित होती जाती है। जो सपने में घट रहा हो, वह हो सकता है हमारे अपने जीवन से संबंधित न हो, पर हम उसे सही समझने लगते हैं। यदि सपने में कोई शेर हम पर आक्रमण करता है, तो हम भय के मारे वाकई में पसीने-पसीने हो जाते हैं। तब हमें यही लगता है मानो एक शेर हमें वाकई में खाने वाला है।

श्रीमद्भगवत गीता

  • इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और ज्ञेय परमात्मा का स्वरूप संक्षेप में (मेरे द्वारा) कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्त्व रूप में जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
  • प्रकृति और पुरुष, इन दोनों को ही तू अनादि जान। राग-द्वेष आदि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक संपूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से उत्पन्न जान।
  • कार्य और कारण की उत्पत्ति में हेतु (उद्देश्य) प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोगने में हेतु कहा जाता है।
  • प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनि में जन्म लेने का कारण है।
  • वास्तव में यह पुरुष इस देह में स्थित होने पर भी (अर्थात् आप या दूसरा अर्थात् त्रिगुणमयी माया से) सर्वदा अतीत ही है। मात्र साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता, सबको धारण-पोषण करने वाला होने से भर्ता, जीवन रूप से भोक्ता, ब्रह्म आदि का स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध ( सच्चिदानंद धन) होने से परमात्मा होता है - ऐसा कहा गया है। इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्त्वत: जानता है, वह सब प्रकार से कर्त्तव्य-कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता।

कृष्ण ने यह भगवत् गीता उपदेश अर्जुन को कुरुक्षेत्र की रणभूमि के मध्य रथ में दिया था। यदि इस दृश्य को गहराई से देखें - यह एक सुंदर दृश्य है, हम सबके लिए। कृष्ण प्रतिनिधि हैं ईश्वरीय तत्त्व के - सारथी, जो क्षेत्रज्ञ है; वह जो सारा खेल कर रहा है। यदि सारथी को रथ चलाना

श्रीमद्भगवत गीता

इसी प्रकार हम इस जीवन को सत्य और असली समझते हैं। यदि मैं अभी आपसे कहूं कि आप जो जीवन जी रहे हैं, वह आपके मन का प्रतिक्षेपित रूप है, तो क्या आप मेरा विश्वास करेंगे? नहीं न! क्योंकि आप इस सपने में इस कदर डूबे हैं कि आप इसे सच ही मान रहे हैं।

लेकिन जब आप सपने से जागते हैं, तो अचानक आप कैसे विश्वास करते हैं कि वह सपना था - सत्य नहीं? क्योंकि अचानक हमें सपने और अपने अस्तित्व में एक अलगाव दिखाई देता है। यह समझ कि वह एक सपना था, हमें वास्तविकता में लाकर खड़ा कर देती है। इसी प्रकार यह समझ कि जो हम देख रहे हैं - यह विश्व बस हमारे मन का प्रतिक्षेपित रूप है; कि यह हमारी सही अस्मिता नहीं है - हमें वास्तविकता में स्थापित कर देती है।

एक लघु कथा

एक जैन स्वामी एक सुबह रोते हुए उठे। उनके शिष्य उनके पास गए और पूछा : "स्वामी! क्या हुआ?" "मैंने रात को सपने में देखा कि मैं एक तितली हूं।'' स्वामी ने कहा। शिष्यों की कुछ समझ में नहीं आया। वे फिर बोले : ''तो क्या हुआ स्वामी! वह तो एक सपना था, जो समाप्त हो गया। अब क्या परेशानी है?"

स्वामी ने कहा : " तुम लोग मेरी समस्या नहीं समझ रहे। मेरे समझ में नहीं आ रहा कि मैं एक जैन स्वामी हूं, जिसने सपना देखा कि वह एक तितली है या मैं वास्तव में एक तितली हूं जो सपना देख रही है कि मैं एक जैन स्वामी हूं। ''

मान लीजिए हमने एक सपना देखा कि हजारों लोगों के सामने हम कोई पुरस्कार जीतते हैं। मस्तिष्क हमारा इतना शक्तिशाली हो सकता है कि यह पूरी तस्वीर आपके सामने बना सकता है - वह सभागार, हज़ारों लोग, तालियां, भाषण या वह सब कुछ जो ऐसे समारोहों में होता है, हमारा मस्तिष्क उस पूरे दृश्य को इतना जीवंत कर देता है कि वह सच लगने लगता है, मात्र हमारी अस्मिता या पहचान ही सपने में वास्तविक नहीं लगती।

यही हमारा मस्तिष्क तथाकथित हमारे वास्तविक जीवन में करता है। अंतर मात्र इतना है कि हम रात के उस स्वप्न से शीघ्र बाहर आ जाते हैं। पर हमारी यह समझ में नहीं आता कि इस बड़े दिवास्वप्न से कैसे बाहर आएं, जो हमें वास्तविक लग रहा है। जब तक हम इस विश्व को सत्य समझेंगे, हम कष्ट पाते रहेंगे। जिस क्षण हमें यह लगने लगे कि यह विश्व वास्तविक नहीं है, हम अपने

कष्टों और अपने बीच में एक दूरी बनाने लगते हैं। अत: मात्र एक प्रबुद्ध स्वामी जिसको सत्य का अनुभव हो चुका है, हमें वास्तव में जागत कर सकता है। अपनी सहज करुणा भावना के कारण यह महानुभाव इस धरा पर उतरते हैं, हमें यह बताने को कि जो कुछ हम सच समझते हैं, वह हमारे मन का प्रतिक्षेपित रूप ही है, सत्य नहीं।

यदि एक बच्चे को हर समय अपने अंदर के ईश्वरीय तत्त्व की याद निरंतर दिलाई जाए, तो वह एक जीवन मुक्त व्यक्ति - अर्थात शरीर में रहते हुए ही मुक्त हो जाने वाला इंसान बनकर उभरेगा। वैदिक परंपरा में बच्चों को इसी प्रकार पाला जाता था। इसी कारण तब चेतना का स्तर इतना ऊंचा था (आज की तुलना में)।

यह पादार्थिक जगत् या 'प्रकृति' अनादि है। 'पुरुष' या परम चेतना भी अनादि है। सारे परिवर्तन या बदलाव प्रकृति ही करती है।

सारे बदलाव जो हम देखते हैं - यथा मौसमों का बदलना, देश-काल की अवधारणाओं में परिवर्तन, हमारे शरीर-मन के परिवर्तन या हर परिवर्तनशील क्रिया प्रकृति के ही विभिन्न रूप हैं। यह परिवर्तन तो सागर में आए ज्वार-भाटा के समान होते हैं। इनके रूप बनते-बिगड़ते रहते हैं। इन परिवर्तनों का देश-काल पर पूरी तरह सापेक्ष होता है। इन उतार-चढ़ावों की अवधि भी पूरी तरह तुलनात्मक ही होती है क्योंकि यह अवधारणाएं तो हमारी इंद्रियों द्वारा सृजित की जाती हैं। हमारी इंद्रियां समय को गतिशील मानती हैं; वे समय की गति को पादार्थिक विश्व के परिप्रेक्ष्य में आंकती हैं - विशेष तौर पर ग्रह-नक्षत्र की गति के आधार पर। हमने समय की यह अवधारणा अपने इंद्रियलब्ध ज्ञान के आधार पर खोजी है। हम देश या अंतराल (स्पेस) में किसी वस्तु की स्थिति की तुलना वास्तविकता के आधार पर ही करते हैं।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए हम अपने किसी प्रिय के साथ बैठे हैं, तो चाहे हम कितना भी समय गुजारें, हमें लगेगा कि साथ कम देर का रहा। हमें समय के बीतने का अहसास ही नहीं होगा। इसके विपरीत हम किसी उबाऊ या परेशान करने वाले व्यक्ति को साथ बैठे हैं, तो हम अपनी घड़ी ही देखते रहेंगे। लगेगा मानो समय बीत ही नहीं रहा।

समय मानो हमारे मस्तिष्क के अनुसार चलता है। गहराई से सोचें, तो हम पाएंगे कि हमारा मन या मस्तिष्क हर समय विगत और आगत के बीच में दौड़ता रहता है। यह सदा दुविधा में रहता है और विगत का पुनर्निरीक्षण एवं आगत की योजना बनाता है। इस कारण हम सदैव विगत या आगत में घूमते रहते हैं और कभी वर्तमान में स्थित नहीं हो पाते।

लेकिन यदि हम वर्तमान में कायम रह सकें, तो हम अनन्त शाश्वत में स्थित होते हैं, जो विगत, वर्तमान और आगत का एक समेकित रूप है। इसमें कोई भेदभाव नहीं होता कि क्या बीता या क्या होगा। इस अवस्था में आकर हम देश-काल के परिप्रेक्ष्य में घटने वाली सारी घटनाओं को साक्षी हो जाते हैं। हम साक्षी चेतना बन जाते हैं।

तब हम क्षेत्रज्ञ हो जाते हैं और क्षेत्र में घटने वाली घटनाओं को निरासक्त भाव से निहारते रहते हैं। हमें महसूस होता है कि बाहरी विश्व में जो कुछ भी घटित हो रहा है वह या तो एक नाटक है या स्वप्न और हमारा अपने जीवन में कुछ भी करने का प्रयास मानो इस स्वप्न में 'घर-चलने' का कारनामा भर है।

भौतिक विश्व का ज्ञान तो आवश्यक है ही। इसी से तो हमें समझ आती है कि हम स्वप्न से कैसे बचें और यह कि हम बिना कारण क्षेत्र से आसक्ति रखते हैं। क्षेत्र में घटित सारी घटनाएं देश-काल के सापेक्ष होती हैं और जिसका अपरोक्ष संबंध हमारे मस्तिष्क या मन से रहता है। हम जितने भी परिवर्तन या बदलाव यहां देखते हैं, वह सब प्रकृति या क्षेत्र के कारण होते हैं। हमारा मन भी इसी प्रकृति का एक हिस्सा है।

जैसे ही हमने इस पर अपना ध्यान आकर्षित किया कि मन रुक जाता है क्योंकि तब तक इससे अलग होकर मात्र दृष्टा या साक्षी बन जाते हैं। तब यह इस पर निर्भर रहता है कि कब हम विशुद्ध साक्षी भाव में दृष्टा रह सकते हैं बिना उसमें उलझे जो हम देख रहे हैं। इसका हम जितना अभ्यास करेंगे, उतनी ही अवधि बढती जाएगी। हमें अनुभव होगा कि हम 'पुरुष' हैं (प्रकृति नहीं)। 'प्रकृति समस्त भौतिक कारणों एवं प्रभावों की स्रोत है और जीवित सत्ता (जीव) हमारे सुख-दु:ख और इस विश्व की अन्य अनुभूतियों का उद्गम है।' इन शब्दों के माध्यम से कृष्ण हमें पुन: चेतन कर देते हैं। उनका यह कथन उनके पिछले श्लोकों में बताई गई बातों का सार है। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जो हम देखते हैं, वह हम हैं नहीं।

वह कहते हैं : " सबके परे जाओ .... जब शरीर देखो तो इसके परे जाओ। यदि अपने विचारों को देख लिया, तो इसके भी परे जाओ ... अपनी मन:स्थितियां देख लीं तो उनके भी परे जाओ ... अपने भावों को देखकर उनके भी परे जाओ क्योंकि तुम यह भी नहीं हो।''

अपने चारों ओर ऐसे निरासक्त भाव से निहारो जैसे तुम आकाश में भ्रमण करते बादलों को देखते हो। बिना उनके भ्रमण में संलिष्ट हुए उन्हें गुजरने दो। यदि कोई ऐसा भाव आता है कि तुम सबकुछ साक्षी भाव से देख रहे हो, तो इस विचार को भी निहारो। अपने साक्षी भाव पर तब तक गौर करो, जब तक

यह भाव कि तुम इसे देख रहे हो, गायब हो जाए। इस प्रकार सबसे परे जाकर अपने होने की गहराई में प्रवेश करो।

यह अंतिम विचार कि तुम सब साक्षी भाव से निहार रहे हो, तुम्हारे और ईश्वर के मध्य का पूल है या तुम्हारे और तुम्हारे विचार-हीन क्षेत्र का अंतिम जुड़ाव। शुरू में जब अपने विचार और कर्म को साक्षी भाव से देखोगे, तो स्वाभाविक ही है कि तुम सोचो कि तुम एक दृष्टा हो। यह रहो पर इसके परे जाने की चेष्टा करते रहो। यहां रुकना नहीं है। इस भाव को कि तुम साक्षी भाव से देख रहे हो, साक्षी भाव से ही देखो। और तब विशुद्ध अभ्रष्टित एवं अस्पृश्य आंतरिक अंतराल (या स्पेस) तुम्हारे सामने खुलेगा। यही वह जगह है जहां ईश्वर प्रकट होता है और दिव्य चेतना की अनुभूति होती है। यही रहस्य या असली अर्थ है वर्जिन मेरी की कथा का, जिसने क्राईस्ट को जन्म दिया था। यूं समझें कि जब हमारा अंतर्मन वर्जन की तरह विशुद्ध और विकार रहित होता है, तब ही हम क्राईस्ट या क्राईस्ट चेतना को जन्म दे सकते हैं। तब हम स्वयं भी दैवी प्रभाविष्ट हो जाते हैं।

श्रीमद्भगवत गीता

सिपाही को तो वह टेस्ट करना ही था, चाहे वह कार का चालक कुछ भी कहता।

इसी प्रकार आप मेरी बात आंख बंद करके न मानो। आप स्वयं भी अपने रेस्ट करो - अपने ऊपर परीक्षण करो; अपने 'होने' पर करो। पढ़ने या प्रवचन सुनने से कोई बदलाव नहीं आने वाला। यह पढ़ाई या सुनना तो ऐसा है जैसे आप रेस्तरां में गए और मेन्यू पढ़कर बगैर कुछ खाए-पिए चले आए। यदि बिना आत्मपरीक्षण के आप मेरी बात सुनकर विश्वास करते हैं, तो यह रेस्तरां से मेन्यू पढ़कर बाहर आ जाने के समकक्ष ही है।

अब चूंकि हमने मेन्यू कार्ड पढ़ लिया है, तो समय आ गया है कि हम कुछ वस्तुएं चखें भी।

कृष्ण अब एक पग आगे जाते हैं। अभी तक उन्होंने हमें बताया था कि कैसे हम अपना अंतर्मन शुद्ध कर दैवी चेतना की आंतरिक अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं। अब अंतिम श्लोक में वह कहते हैं कि जो ऐसा करता है, वह चाहे वर्तमान स्थिति में कुछ भी हो, मुक्ति प्राप्त करता है।

हर जीव दिव्य चेतना की ओर जा रहा है, चाहे वह स्वयं इससे अभिज्ञ हो या नहीं हो। हम अपनी कुछ इच्छाओं की पूर्ति के लिए शरीर को रगड़ते हैं। यदि हम अपनी ऊर्जा इन इच्छाओं को गलाने में खर्च कर दें, तो हमें इसकी पूर्ति के लिए दूसरा जन्म लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। समस्या तब पैदा होती है, जब हम दूसरे की थोपी हुई इच्छाएं अपने जीवन में पूरी करने का प्रयत्न करते हैं, यह भूलते हुए कि हम यहां अपनी इच्छाएं पूरी करने आए हैं, दूसरों की नहीं। हम दूसरों से इच्छाएं उधार लेते रहते हैं और अपने ऊपर उनका बोझ बढ़ाते हैं।

फिर, अपनी मूल प्रकृति के पहचानने से पूर्व ही हमारा इस शरीर को त्यागने का समय आ जाता है। हम इन्हीं अपूरित इच्छाओं का बोझ लेकर दूसरा जन्म लेते हैं। यह विश्व हमारी मदद करना चाहता है कि हम अपनी इच्छाओं को विगलित कर दें, जिससे हम मुक्त हो सकें। पर हम इसका प्रतिरोध करते हैं, हमारे अंदर और बाहर जो घट रहा है, उसे अस्वीकार करके।

कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि क्षेत्र या प्रकृति की समझ हमें सीधे-सीधे मुक्त करती है। जब तक हम इस शरीर (क्षेत्र) से अपनी पहचान करते हैं तब तक विषय भोगों में लिप्त रहते हुए हम इच्छाओं को एकत्रित करते रहते हैं। जिस क्षण हमारी समझ में आता है कि हम इस शरीर व मन के परे भी कुछ हैं, हमें अचानक यह लगता है : "इस चूहा-दौड़ में लिप्त रहना तो बिलकुल मूर्खता है।''

श्रीमद्भगवत गीता

असली कंजी है साक्षी भाव से निहारना

यहां कृष्ण हमें एक तकनीक बताते हैं। अभी तक मानों हम 18 कैरट स्वर्ण हैं, जिसमें थोड़ा तांबा भी मिला है। जब हम बार-बार इस 18 कैरट स्वर्ण को चेतन साक्षी भाव से निहारने की अग्नि में डालते हैं, तो यह 22 कैरट का शुद्ध स्वर्ण बनकर निखरता है। यदि इस स्वर्ण को इस आग में लगातार पकाते रहे, तो परमशुद्ध 24 कैरट स्वर्ण हो जाएगा। इसी तरह हमारा भी चेतन साक्षी भाव में रहने से परिमार्जन एवं शुद्धिकरण होता रहता है। हम यदि बार-बार ऐसा करते रहे, तो अंतत: हम भी परम शुद्ध 24 कैरट स्वर्ण बनकर चमकेंगे।

वस्तुत: समस्त धर्मों और आध्यात्मिक साधना का सार इस एक श्लोक में है जो कृष्ण यहां कहते हैं। कृष्ण यहां इस अध्याय में हमें वह 'मास्टर-की' देते हैं जो हर ताले को खोल सकती है : अपने शरीर-मन अपने समूचे अस्तित्व को साक्षी भाव से निहारो। साक्षी भाव से निहारना ही 'मास्टर-की' है।

आधी रात को एक व्यक्ति हाईवे पर कार से जा रहा था। सिपाही ने उसे रोका और कहा : "महाशय - आप पिए हुए हैं - शायद लगातार पी रहे थे।" उस व्यक्ति ने कहा : '' हां - मैंने 6 डि्रंक्स ली है। यदि चाहो तो मैं उनके नाम भी गिनवा सकता हूं : कुछ बीयर को कैनस - कुछ ब्रांडी के जाम ... 1" वह व्यक्ति डिंक्स गिनवाने लगा।

सिपाही ने कहा : "नहीं - रुको - मुझे आपका 'ब्रेथ एनलाईज़र टेस्ट' ( सांस की जांच से पता लगाना कि कितनी शराब पी है) करना है। कृपया कार के बाहर आएं।"

उस व्यक्ति ने कहा : "यह टेस्ट क्यूं? मैं तो स्वयं ही मान रहा हूं कि मैं पिए हूं। क्या तुम्हें मेरी बात का विश्वास नहीं।''

उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सुक्ष्म बुद्धि से ध्यान द्वारा हृदय में देखते हैं; अन्य कितने ही ज्ञान-योग द्वारा और दूसरे कितने ही कर्म-योग द्वारा देखते हैं। परंतु इनसे दूसरे स्वयं इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से सुनकर तदनुसार ही उपासना करते हैं और वे श्रवण पारायण पुरुष भी मृत्यु रूपी संसार से नि:संदेह तर जाते हैं। हे भरत वंशियों में श्रेष्ठ (अर्जुन)! जितने भी स्थावर-जंगम ( जड़ चेतन) प्राणी उत्पन्न होते हैं, सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न जान।

इस श्लोक में कृष्ण आत्म (ईश्वरीय) साक्षात्कार के लिए विविध तकनीक बताते हैं। वह कहते हैं कई योजनाएं एवं पंथ का प्रयोग किया जा सकता है, अपने सच्चे आत्म को पहचानने के लिए। लोग कहते हैं : ''जितने स्वामी - उतने पथ।'' परंतु ज्यादा सही हैं : "'जितने शिष्य - उतने पथ्थ।'' हर शिष्य अपना एक पंथ चला सकता है। कृष्ण कहते हैं कि परम चेतना तक हम विभिन्न पथों के माध्यम से पहुंच सकते हैं।

कृष्ण कहते हैं कि योग, ध्यान, ज्ञान योग, ईश्वर में समर्पण इत्यादि द्वारा मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। ये विभिन्न पंथ एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। भगवत्-गीता का हर अध्याय आत्म-साक्षात्कार को लिए एक नई और अंतर विधि देता है।

हमारे द्वितीय-स्तर के मेडीटेशन कार्यक्रम, नित्यानंद स्पुरण कार्यक्रम के पश्चात् जो चाहते हैं, मैं उनको आध्यात्मिक नाम देता हूं। यह नाम भक्तों में ऊर्जा के आधार पर दिए जाते हैं। यह नाम बताते हैं कि वे लोग ब्रह्माण्डीय नित्यानंद से किस प्रकार जुड़ पाते हैं। यही आधार है इन नामों को देने का। यदि मैं देखता हूं कि साधक भावनात्मक स्तर पर - यथा भक्ति के मार्ग में कार्यरत

श्रीमदुभगवत गीता

यह स्थिति का संज्ञान लेते हुए बदलाव किसी में कभी भी हो सकता है और जब यह होता है, तो हमारा चेतना का स्तर अचानक बहत बढ जाता है। यह धीरे-धीरे नहीं होता। यह तो एकदम होता है - मानो स्विच ऑन की और एक बार में ही कमरा जगमगाने लगा।

इसलिए हमारा कोई भी व्यवसाय हो. हम अध्यात्म को किसी भी स्तर पर हों. अस्‍तित्‍व के खेल की पूरी समझ हमें सब कष्‍टों से छूटकारा दे देगी। यह समझ कि हम भौतिक क्रियाकलापों से परे हैं, हमें मुक्त करने को पर्याप्त है।

श्रीमदुभगवत गीता

सत्य तक पहुंचने को विभिन्न मार्ग होते हैं, लेकिन हमें मालुम होना चाहिए कि हमारा रास्ता कौन-सा है। यहां एक सच्चा प्रबुद्ध स्वामी आपकी सही सहायता कर सकता है। उसे मालूम होता है कि आपके लिए सही पथ कौन-सा है। यदि आप किसी गलत पथ पर हैं, तो वह आपको सुधार कर सही पथ पर भी ला सकता है। हमारे 'एडवा-सड हीलर्स प्रोग्राम' में शिष्यगण मंच पर बैठकर श्रोताओं के प्रश्नों को उत्तर देते हैं। वे जब उत्तर देते हैं, तो मैं उन्हें सही करता रहता हूं - जब कभी वे कोई गलती करते हैं।

इस श्लोक में कृष्ण विभिन्न विधियां बताते हैं : ध्यान, योग, ज्ञान मार्ग इल्यादि। कई व्यक्ति हैं, जो यह सब करते रहते हैं। कुछ व्यक्ति पूछते हैं . . "स्वामी जी! मैं प्रतिदिन 21 मिनट तथा ध्यान लगाता हूं पर अभी तक कुछ भी अनुभव नहीं हुआ। ऐसा क्यों?'' मैं उनसे पूछता हूं : ''ईमानदारी से बताओं कि क्या तुम पूरी एकाग्रता और पूरी जागरूकता को साथ ध्यान लगाते हो? जब ध्यान में होते हो तब तुम्हारा मन शरीर के साथ होता है या तुम अपने कार्यालय के बारे में सोचते रहते हो।'' ज़ाहिर है कि इस प्रश्न के बाद वे मौन रह जाते हैं।

इस श्लोक में कृष्ण 'साख्य' की बात करते हैं, ज्ञान मार्ग या दार्शनिक चर्चा के माध्यम से। एक बात यहां स्पष्ट समझ लें। ज्ञान प्राप्ति और दार्शनिक चर्चा के दो रास्ते हैं : कई व्यक्ति विभिन्न पुस्तकों का अध्ययन करते हैं। ये व्यक्ति बौद्धिक श्रेणी को होते हैं। पर यदि गौर से देखा जाए, तो ज्ञान प्राप्ति को ये रास्ते उनके अहम् भाव को ही दर्शाते हैं। वे अपना ज्ञान दिखाना चाहते हैं। यदि हम इस क्रिया को अंतर्मुखी कर दें, तो हम बदलाव प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम दार्शनिक चर्चा अपना पांडित्य और अहम् दिखाने के लिए करते हैं, तो हमें कभी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। हम अपने ज्ञान से कोई लाभ नहीं पा सकते।

श्लोक को अंत में कृष्ण एक अद्भुत तकनीक बताते हैं - वह तकनीक चरम तकनीक है - संपूर्ण समर्पण को विधि। वह कहते हैं : " अपने कमों का फल मुझे समर्पित कर दो।'' यह तकनीक सर्वाधिक प्रभावशाली तकनीक है। इसके बारे में वह पूरी गीता में बार-बार उल्लेख करते हैं।

यानी इस वैश्विक चेतना - ईश्वर या कृष्ण को - अपने कर्मों का फल समर्पित कर दो। प्राय: हम अपने कर्म की ज़िम्मेदारी स्वयं ही उठाना चाहते हैं। इसी के कारण सारे तनाव और समस्याएं सिर उठाती हैं। कृष्ण की परम चेतना में सब कुछ समर्पण कर दो - बस। एक बार यदि हम ऐसा कर सकें, तो हम मुक्ति का अनुभव करेंगे। निर्बंधित महसूस करेंगे। सत्य तक पहुंचने का यह सबसे आसान रास्ता है।

श्रीमद्भगवत गीता

है. तो मैं उन्हें वही नाम देता हूं जो उस विशिष्ट ऊर्जा के लिए सही है। दूसरा वर्ग है बौद्धिक जनों के लिए। बौद्धिक व्यक्ति प्राय: मानसिक स्तर पर जुड़ पाते हैं। उन्हें हर पाठ का एक तर्क-सम्मत स्पष्टीकरण चाहिए होता है। तीसरा वर्ग उनका होता है, जो अस्‍तित्‍व के (या मात्र 'होने' के) स्‍तर पर जुड़ते हैं।

मैं जब उनके नाम तय करता हूं, तो मैं उनकी ऊर्जाओं पर ध्यान लगाकर उनको आध्यात्मिक नाम देता हूं। यह आध्यात्मिक नाम उन्हें एक रास्ता या पथ दिखाते हैं, जो हर एक के लिए भिन्न होता है। नाम का अपना महत्त्व होता है। यह नाम उन्हें अपना पथ बताते हैं। प्राय: हम नाम के साथ स्वयं को जोड़ते हैं। अत: जब आप अपना नाम लेते हैं या कोई आपको आपको आध्यात्मिक नाम से पुकारता है, तो इससे आपके मस्तिष्क में एक घंटी बजती है और आपको अपने गंतव्य का मार्ग याद आ जाता है।

कृष्ण अर्जुन को इन पथों को बारे में बताते हैं। वह इसके विकल्प भी सुझाते हैं, यथा - ध्यान, योग, मंत्र जाप, ज्ञान मार्ग और महान सत्ता को संपूर्ण समर्पण का भाव (या भक्ति)।

महत्त्वपूर्ण यह है कि आपको मालूम होना चाहिए कि आपके लिए कौन-सा पथ अच्छा रहेगा। कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो मात्र दूसरों की नकल करते हैं और अपना भला-बुरा नहीं सोचते।

एक लघु कथा

एक अंधेरी रात में एक व्यक्ति को मालूम पड़ा कि उसको कार को हैडलाइट्स खराब हो गई है। उसने तय किया कि जो कार उसके आगे होगी, उसके पीछे ही वह चलता रहेगा। बाहर बिलकुल अंधेरा था और वह कुछ भी देख नहीं पा रहा था। यदि आगे की कार मुड़ती तो वह भी अपनी कार मोड़ लेता था। आगे की कार के सहारे चलते हुए वह बहुत दूर निकल आया।

कुछ समय बाद आगे की कार की बत्तियां बंद हो गईं और वह अचानक रुक गई। पीछे वाले ने अपनी कार आगे वाले से टकरा दी और बाहर निकलकर पहली कार वाले से चिल्लाकर बोला : "तुम रुक क्यों गए?"

" अरे! मेरा घर आ गया इसलिए! और मैं कहां जाता?" उस चालक ने कहा।

यदि आप किसी का अंधानुसरण करेंगे, तो कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे। आपको अपना पथ स्पष्ट रूप से ज्ञात होना चाहिए।

श्रीमद्भगवत गीता

अपने विशिष्ट पथ पर चलने के लिए किसी विशेष आध्यात्मिक ज्ञान की भी आवश्यकता नहीं होती। भले ही आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई नया व्यक्ति आया हो, वह भी इस पथ पर चल सकता है। परंतु एक संज्ञानिक बदलाव होना आवश्यक है। कई ऐसे प्रबुद्ध स्वामी हुए हैं, जिन्हें आध्यात्मिकता के बारे में कोई पूर्व ज्ञान नहीं था।

एक बात और समझ लें। यदि किसी को कोई आध्यात्मिक ज्ञान है, तब भी यह आवश्यक नहीं कि वह कोई सच्चा साधक हो। मैंने कई लोगों को बहुत-सी पुस्तकें पढ़ते हुए देखा है और वे आध्यात्मिकता का भी बार-बार उल्लेख करते रहते हैं जबकि इसकी कोई आवश्यकता भी नहीं होती। वे समझते हैं कि वे बहुत बड़े आध्यात्मिक ज्ञानी हैं।

लेकिन जब कोई प्रबुद्ध स्वामी आध्यात्मिकता को बारे में बात करता है। तो वह अपने सत्य के अनुभव के पश्चात् ऐसा करता है। जब कोई साधारण व्यक्ति यह बात करता है, तो वह नहीं उसका अहम् बोलता है। उसका आध्यात्मिक ज्ञान उसकी बौद्धिकता का प्रतीक है, जिसमें उसका अहम् भाव प्रमुख होता है।

लोग प्राय: मूझसे पूछते हैं : "स्वामी जी! क्या मुझे यह कोर्स अटेंड करना चाहिए? क्या मैं इसको पूरा करने में सक्षम रहंगा?'' मैं उनसे कहता हूं - ''यदि तुम स्थायी रूप से इसके लिए उपलब्ध रहोगे, तो मैं तुम्हें निश्चित ही सक्षम बना दुंगा।'' मात्र एक यही पूर्व-शर्त है इस कोर्स के लिए कि अटेंड करने वाला स्थायी रूप से उपलब्ध होना चाहिए। यदि ऐसा है, तो आप अपना चरम लक्ष्य प्राप्त करने में सक्षम रहेंगे ही।

यही कृष्ण यहां हम सबसे कहते हैं। आध्यात्मिकता की ओर बढने के लिए कोई पूर्व ज्ञान नहीं चाहिए। अगर कोई इसके बारे में बात करता है और आप इस पथ पर चलने लगते हैं, तब भी पर्याप्त है। परंतु आपको यह मालूम होना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं। कभी अंधानुकरण न करें - बस। जो भी आप देखते हैं वह पदार्थ और ऊर्जा का मिलाजुला रूप है। पूरा ब्रह्मांड ही क्षेत्र और क्षेत्रश; माया और आत्मा, प्रकृति और पुरुष, शरीर-मन और चेतना से मिलकर बना है। अस्तित्व इनमें से किसी एक तत्त्व द्वारा प्रकट नहीं हो सकता। यदि हम समझते हैं कि हम मात्र पदार्थ हैं, तो हम 'माया' के भ्रम में हैं।

'क्षेत्र' शरीर है जिससे हम अपने को जोड़कर देखते हैं और क्षेत्रज्ञ हैं, वह चेतना जो हमें जीवंत रखती है। मानव शरीर वस्तुत: दोनों के संगम से बनता है। यदि चेतना नहीं तो शरीर बेकार है। पदार्थ जिसे हम शरीर कहते हैं, जीवंत इसी चेतना के कारण होता है। दोनों का होना अति आवश्यक है।

'प्रकृति' प्रकट रूप है और 'पुरुष' अप्रकट रूप। 'क्षेत्र' प्रकृति है, जो पकट है और हम जिसे देख सकते हैं। जो कुछ दूश्य है, उसके पीछे कुछ अदृश्य भी होता है, जो 'पुरुष' कहा जाता है। यह अप्रकट रहता है। पदार्थ को पीछे ऊर्जा साधारणतया दुष्ट नहीं होती।

हम पिछले श्लोकों में चर्चा कर चुके हैं कि संसार में लाखों-करोड़ों गह-नक्षत्र-तारे हैं, जो संपूर्ण सामंजस्य के साथ गतिज रहते हैं। कई तो निहारिकाएं हैं, जो उस अंतरिक्ष में विचरण करती हैं, जिसकी कोई सीमा नहीं होती। यह सब उतने बंधे क्रम में कैसे चलते हैं? अपने ही 'सोलर-सिस्टम' को देखिए। हर ग्रह एक निश्चित कक्षा में घूमता है। चाहे उनको चट्टानों, मिट्टी या बर्फ का बना मानें या मात्र पदार्थ कहें, ब्रह्मांड में यह व्यवस्थित क्रम किस प्रकार कार्य करता है?

वस्तुत: ये सब मात्र पदार्थ ही नहीं हैं। पदार्थ को पीछे भी कोई वस्तु अस्‍तित्‍व में है। इतनी आपाधापी में हर वस्‍तु कितनी व्‍यवस्‍थित रूप से चलती रहती है। यह क्रम व्यवस्थित 'क्षेत्रज्ञ' के कारण होता है। यदि मात्र पदार्थ या 'क्षेत्र' होता, तो उसमें कोई बुद्धिमता न होती। पर इन पदार्थों में ब्रद्धिमता भी समाहित है। यही वह चेतना है, जो अस्तित्व को प्रकट कर उसे व्यवस्था प्रदान करती है। अत: क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ का मिलन आवश्यक है।

आधुनिक विज्ञान यह दिखा चुका है कि पदार्थ और ऊर्जा एक ही हैं। बाह्य-विज्ञान के साधकों ने यह हाल ही में सिद्ध किया है। पर अंतर-विज्ञान के साधक इसे हज़ारों वर्ष पूर्व सिद्ध कर चुके थे। पदार्थ और ऊर्जा का साथ ही अस्तित्व पैदा करता है। विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि हमारे शरीर तंत्र के हर कोश में बुद्धिमत्ता छिपी है। हर कोश मात्र कुछ रसायनों को सम्मिश्रण से नहीं बना है। हर कोश में ऊर्जा है और बुद्धिमत्ता है। इसी का संयोग शरीर-मन तंत्र बनाता है।

हमें समझना चाहिए कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, यदि गहराई से देखें, तो अलग-अलग सत्ता नहीं हैं। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ में एक ही तत्त्व होता है। क्षेत्र ऊर्जा का स्थूल रूप है और क्षेत्रज्ञ उसका सुक्ष्म रूप। अस्तित्व के प्रकट होने के लिए सक्ष्म एवं स्थूल, दोनों का होना आवश्यक है।

म हम ब्राह्मण हैं ।

जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाश रहित और समभाव से स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता है। क्योंकि वह पुरुष सब में समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता वरन् इस प्रकार के दर्शन से वह परमगति को प्राप्त होता है। जो पुरुष संपूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा हो किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्त्ता ( जो कर्म में लिप्त नहीं है) देखता है, वही यथार्थ देखता है। जिस क्षण वह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही संपूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह (सच्चिदानंद धन) ब्रह्म प्राप्त हो जाता है।

कृष्ण कहते हैं : "वह जो आत्म-साक्षात्कार या परम चेतना प्राप्त कर चुका है, सभी जड-चेतन अस्‍तित्‍वों में परमात्‍मा को उपस्‍थित देखता है। वह परमात्‍मा को अविनाशी, अनादि और परम साक्षी चेतना मानता है। अस्तित्व जो हमें दिखाई पड़ता है, वह छोटे-छोटे अलग खंडों से मिलकर नहीं बनता, जैसा हम समझते हैं। हम समझते हैं कि हम अपने चारों ओर उपस्थित तत्त्वों से भिन्न हैं। वास्तव में हम सब एक ही हैं। कृष्ण जिस परमात्मा की उपस्थिति के बारे में कहते हैं, वह हम सब में और चारों ओर की हर वस्तु में समान रूप से व्याप्त है।

मैं तो हर एक से कहता हूं : "मैं यहां स्वयं को ईश्वर सिद्ध करने के लिए नहीं हूं; मैं तो यह सिद्ध करने के लिए हूं कि तुम ईश्वर हो।''

यह सत्य है। जब मैं यह कहता हूं कि लोग कहते हैं : "नहीं-नहीं, स्वामी जी! हम ईश्वर कैसे हो सकते हैं। हमने तो कई पाप किए हैं। पर हम यह मानते हैं कि आप ईश्वर हो क्योंकि आप में लोगों को स्वस्थ बना देने की शक्ति है।

हम तो ईश्वर हो ही नहीं सकते।'' एक बात समझ लें। यह नहीं है कि चुंकि आपने पाप किए हैं, आप ईश्वर नहीं हो सकते। यह भी समझ लें कि आप श्रौतान नहीं हो सकते, क्योंकि आपने पाप किया है। आप तब भी ईश्वर हो सकते हो। पाप करने या न करने से आपके ईश्वर बनने की क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ईश्वरत्व आपकी प्रकृति में है। वैसे भी पाप-पुण्य की अवधारणा तो समाज ने बनाई है, क्योंकि वह लोगों को नियंत्रित करना चाहता है। एक चोर-डकैत की आत्मा में वही सत्य तक पहुंचने की वही पवित्रता होती है, जो किसी मंदिर के पुजारी या संत को पास होती है।

हम स्वयं ही अपने और ईश्वर को मध्य रुकावटें पैदा कर लेते हैं। हम यह भी नहीं मानते कि हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही है। हम किसी और को तो अपने सामने ईश्वर को रूप में खुशी से स्वीकार कर लेते हैं, पर ईश्वर के अपने अंत:करण में स्वीकार नहीं करते।

बात यह है कि यदि हमने अपने को ही ईश्वर कहना शुरू कर दिया, तो समाज फिर हमें कैसे नियंत्रित कर पाएगा?

ईश्वर सर्वव्याप्त है। दिव्य ऊर्जा हर कण में समाहित है। हमारी समस्या है कि हम इसे देख नहीं पाते, क्योंकि एक बार में हम एक ही वस्तु देख पाते हैं। हम समझते हैं कि ईश्वर कोई भिन्न सत्ता है, जो बेहद शक्तिशाली है। हम अपने और ईश्वर के मध्य बहुत अंतराल रखते हैं।

पश्चिमी लोग हिन्दुओं को 'मूर्तिपूजन' कहते हैं और उनका परिहास उडाते हैं। भारत में भी कुछ लोग 'मूर्तिपूजक' को उपहास का पात्र समझते हैं। तथाकथित बौद्धिक लोग व वैज्ञानिक भी मूर्ति पूजा करने वालों को हेय दृष्टि से देखते हैं। कृछ तथाकथित नव-वेदांतवादी भी वेदांत की शिक्षा तो देते हैं, परंतु मूर्ति पूजा को अवैज्ञानिक मानते हैं। यही सब अन्य कर्मकांड यथा 'होम' और 'अभिषेक' के बारे में कहा जाता है।

हमें समझना चाहिए कि जब हम पूजा करते हैं, तो उस मूर्ति के अलावा भी बहुत कुछ हमारे सामने होता है। हम जब पूजा करते हैं, तो उस मूर्ति को माध्यम से पूजा करते हैं, मात्र उस मूर्ति को ही नहीं पूजते। जब हम उस मूर्ति के पीछे ऊर्जा देखते हैं और उसकी आराधना करते हैं, तो हमारी पूजा अधिक मूल्यवान हो जाती है। यही विज्ञान है। यदि हम पत्थर की पूजा करते हैं और उसके पीछे निहित ऊर्जा की कोई अनुभूति नहीं करते, तो यह पूजा निरर्थक है। मैं आपसे पूछता हूं : पूरी भावना व निष्ठा से पूजा करने के पश्चात्

आपको एक बड़े चैन की अनुभूति क्यों होती है? मंदिर से अपनी प्रार्थनाएं कहने के बाद बाहर आने पर एक संतोष का भाव क्यों महसूस होता है? हमें इतना

श्रीमदभगवत गोता

चरम लक्ष्य तक पहुंचने में हमारा मन ही सबसे बड़ी बाधा है। पिछले श्लोकों में कृष्ण ने बताया कि हम कैसे सत्य समझ सकते हैं। यहां कृष्ण उन रुकावटों के बारे में बताते हैं, जो हमें पार करनी हैं। वह कहते हैं कि जब हम अपने मन के प्रभाव के कारण स्वयं को निम्न स्तर का समझते हैं, हम ईश्वर या परमात्मा को सर्वव्याप्त नहीं देख पाते। जब हम अपने मन के प्रभाव से बाहर

निकल आएं, तब ही हम अपने चरम लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। हम अपने मन को अपने से अलग सत्ता के रूप में देखते हैं। हम कहते हैं . "यह सोचता बहुत है।'' हम इसके बारे में बोलने लगते हैं, बिना समझे कि यह मन है क्या? यह ईश्वर प्रदत्त एक व्यवस्थित यंत्र है, जो ईश्वर हमें प्रदान करता है। मन वस्तुत: मनुष्य का सेवक है, जो इसकी आवश्यकताएं और कमजोरियां दूर

कर उसे सुखी जीवन बिताने में सहायता करता है। हमारी समस्याओं का मूल कारण यह है कि यह मन जो मनुष्य के

नियंत्रण में होना चाहिए, वह ढांचा बन गया है, जो मनुष्य पर नियंत्रण रखता है। जब गलत समझ और जानकारियों के आधार पर हम निर्णय लेते हैं, तो वह गलत और निम्न स्तरीय होते हैं। अपने 'फर्स्ट-लेवल मेडीटेशन प्रोग्राम' में हम मन की कार्य-प्रणाली पर चर्चा करते हैं। हम कोई वस्तु निरखते हैं और उस पर प्रतिक्रिया देखते हैं। हमारी प्रतिक्रिया प्राय: विगत के अनुभव या 'संस्कारों' पर ही आधारित होती है। यदि पुराना अनुभव अच्छा है, तो हमारा मन कहता है "यह ठीक है, मैं चालू रह सकता हूं (इस क्रिया में)'', अन्यथा उसको निरस्त कर देगा।

कृष्ण कहते हैं कि हमारे सत्य के दिग्दर्शन के मध्य दिमाग या मन एक रुकावट बनकर आ जाता है, जिसके कारण हमारे निर्णय गलत सूचनाओं को आधार पर लिए जाते हैं। जब मन का प्रभाव हम पर पड़ता है, तो हम परमात्मा को हर वस्तु में व्याप्त देख नहीं पाते। हालांकि हमारी आत्मा इस सत्य को जानती है कि परमात्मा सर्वव्याप्त है और सर्वत्र है। पर हमारा मन उसके ऊपर एक आवरण चढ़ा देता है और हमारे ऊपर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है। मन पर तो पूर्ण स्मृतियों ( संस्कारों) आदि का लेप रहता है, जो एक दृष्टि भ्रम पैदा कर हमारी समझ को गलत कर देता है। यह मन ही है, जो यह निर्णय लेता है कि जीवन को भोगने के लिए इंद्रियों और शरीर का होना आवश्यक है। जब हम बच्चे थे, तब हमारे मन के पास इतनी शक्ति नहीं थी। बचपन में हमने नए संस्कार भी कायम नहीं किए थे। यह तो बाद में समाज की शर्तें हमारे मन पर संस्कारों को गहरे लेप चढ़ा देती हैं और मन को शक्तिशाली बना देती हैं। वास्तव में जब लोग कहते हैं कि बच्चा बड़ा हो रहा है, तो असल में उसका परिद्रश्य

श्रीमदभगवत गीता

हल्कापन क्यों लगता है? जब हम किसी मूर्ति के पीछे ऊर्जा की अनुभूति कर रहे हैं, तो हम उस ऊर्जा से जुड़ जाते हैं।

उस ऊर्जा से जुड़ना मतलब एक चैनल बनाना, जिसके माध्यम से हम आत्मा परमात्मा से जुडाव महसूस कर सकें। इस थोड़ी अवधि के जुड़ाव में हमें बहुत कुछ सांसारिक जिम्मेदारियों से मुक्ति महसूस होती है। हम उस मुर्ति में परमात्मा के दर्शन प्राप्त करते हैं और अपनी समस्याएं अपनी प्रार्थनाओं द्वारा उनके सामने प्रकट कर देते हैं।

हमें चैन और सुकून पूजा के बाद इसलिए महसूस होता है, क्योंकि हमारा ईश्वर में पूरी निष्ठा एवं विश्वास होता है। हमें भरोसा होता है कि वह ईश्वर हमारी समस्याओं को दूर कर देगा। हम परमात्मा में तो विश्वास कर लेते हैं, उस आत्मा में नहीं, जो हमारे अंदर उसी का अंश है। इस सत्य को हम पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाते।

हर पदार्थ परमात्मा

कृष्ण कहते हैं कि हमारे अंदर की आत्मा और दूसरों की आत्मा वस्तुत: परमात्मा का ही रूप या अंश है। पर हम क्या करते हैं? हम अपनी आत्मा को सबसे अलग कर देते हैं। हम अपनी आत्मा की सीमाएं खींच देते हैं और इस प्रकार परमात्मा से विलगाव पैदा करने की कोशिश करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को यूं समझें : पानी भरे दस बर्तन रखे हों, तो सूर्य का प्रतिबिम्ब उन दसों में प्रतीत होगा। हर बर्तन यही समझेगा कि सूर्य मात्र उसी के बर्तन में है। और यही सब बर्तन सोचेंगे - हर एक के पास एक सूर्य है; जबकि सूर्य तो एक ही है। इसी प्रकार हम समझते हैं कि हमारे अंदर जो आत्मा है, वह दूसरों की आत्मा में अंतर है। जब हम उन आकारों को भंग कर देते हैं, तो वही आत्मा जो सर्वव्याप्त है, परमात्मा को रूप में हमारे सामने आती है।

कृष्ण कहते हैं : "जब हम देखते हैं कि हमारे अंदर की आत्मा और सर्वव्याप्त आत्मा अविनाशी है, तब हम सत्य देखते हैं।'' वह जो सदा रहती है आत्मा ही है। हमें यह समझ लेना चाहिए, शेष हर वस्तु मर्त्य है, विनाशशील है और विनष्ट होगी ही। जब हम यह सत्य समझ लेते हैं कि आत्मा अजर है और यही सर्वदा विद्यमान रहेगी (शरीर नहीं) तो अधिक-से-अधिक धन-संपदा इकट्ठा करने की चूहा-दौड अपने आप बेमानी लगने लगती है। हमारी समझ में आने लगता है : " क्या लाभ इन विषय-सुखों के पीछे पड़ने से जब यह सब सदा रहने वाला तो है ही नहीं।'' जब हम इस सत्य को आत्मसात करते हैं, तो वास्तविकता देखते हैं।

श्रीमद्भगवत गोता

तो छोटा होता जा रहा है, मात्र मन ही बढ़ता जा रहा है। यह शक्तिवान हुआ मन आत्मा को तो एक कोने में ढकेल देता है और स्वयं फैलकर समझ पर अपना अधिकार जमा लेता है।

यह मन हमें सत्य नहीं देखने देता; यह ईश्वर को सर्वव्याप्त नहीं देखने देता। जब हम इसके चंगूल से बाहर होते हैं, तब ही असलियत देख पाते हैं। हम तब तक अपने सुरक्षित क्षेत्र में होते हैं, जब तक कि हम अपने अंदर ईश्वर को और शरीर को अलग-अलग देखते हैं और शरीर का विषय में लिप्त होना निष्पक्ष भाव से देखते रहते हैं। जब तक हम आश्वस्त हैं कि शरीर तो सांसारिक इच्छापूर्ति का एक साधन मात्र है और आत्मा शक्तिवान है, हम सुरक्षित रहते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं। पर जब हम आत्मा पर शरीर थोप देते हैं, तो समस्याएं पैदा हो जाती हैं।

हम लोग शरीर को महत्त्व तो बहुत देते हैं, पर वास्तव में हम उसका सम्मान नहीं करते। हम तो इसका उपयोग भर करते हैं; हम शरीर का दुरुपयोग भी करते हैं। देर तक रात को टीवी देखते रहते हैं। आंखें थक जाती हैं, पर हमें कार्यक्रम देखने में आनंद आता है। पेट भर गया है, पर हम तब तक खाते रहते हैं जब तक खाना सामने है। स्वाद में आनंद है, इसलिए हम खाते ही चले हैं। हम खाते-खाते अपने शरीर को क्षति पहुंचाते हैं, क्योंकि अधिक खाया-पिया शरीर निरस्त कर देता है।

आजकल लोग ब्यूटी पार्लरों और 'स्पा' में बहुत जाने लगे हैं। महिलाएं अपने मेकअप को लिए ब्यूटी पार्लर जाती हैं, जहां कृत्रिम अवशेषों की उनको चेहरे पर चढ़ाई जाती है, जिससे वह अधिक सुंदर लगे।

एक लघु कथा

एक नवविवाहित दुल्हन पहली बार पति के गांव गई। बीवी शहर की थी और पहले कभी गांव में नहीं रही थी। सुबह सात बजे उन दोनों ने मंदिर जाने का निर्णय किया। भारत में प्राय: लोग सुबह भगवान के दर्शन करने जाते हैं। वे दोनों सात बजे मंदिर पहुंचे। पत्नी ने सुबह पांच बजे से हो मेकअप करना प्रारंभ कर दिया था। जैसे-तैसे वह समाप्त हुआ और वे दोनों मंदिर पहुंचे।

भारत में हर गांव में मंदिर में प्राय: मोर, खरगोश तथा अन्य सौम्य जानवर रहते ही हैं। पत्नी ने तो ऐसा मंदिर पहली बार देखा था। उसे जानवरों को देखकर बहुत आनंद आया। उसने पति को बताया तो पति ने मुस्कुराकर कहा : " हां! मुझे भी। एक बड़ी बंदरिया तो मेरे साथ ही है।'' महिलाएं तो बहुत मेकअप करवाती हैं। वे समझती हैं कि ब्यूटी पार्लर और 'स्पा' में जाकर वे अपने सौंदर्य

का वर्धन कर रही हैं; परंतु वास्तव में वे अपने शरीर का दुरुपयोग ही करती हैं।

वे कई प्रकार के रसायनिक पदार्थ वे अपने चेहरे पर लगवा लेती हैं। बाद में इस तरह से हम अपने शरीर का दुरुपयोग क्यों करते हैं? इसलिए क्योंकि अपनी इंद्रियों द्वारा हम एक प्रकार का आनंद प्राप्त करते हैं। यही इंद्रिय सुख है, जो हमें प्रसन्न करते हैं - इसलिए हम उनसे चिपके रहते हैं और इंद्रिय-सुख भोगते हैं। पर हम यह नहीं समझते कि वे सब क्षण स्थायी होते हैं। वस्तुत: हर प्रकार का इंद्रिय सुख क्षणिक या थोड़ी देर तक ही आनंद दे सकते हैं। यही द्रदियां आज हमें सुख देती हैं, तो कल दु:ख में ढकेल देती हैं। यह तो उन घूमने वाले दरवाज़ों की तरह है कि एक ओर से अंदर गए, तो दूसरी ओर से बाहर आ गए। यदि हम अधिक देर दरवाज़े को पास खड़े रहें, तो दरवाज़ा अपने आप

घूमकर हमें अंदर या दूसरी ओर ढकेल देगा।

हम अपने शरीर को इंद्रिय सुख भोगने का एक उपकरण समझते हैं। हम

इसका प्रयोग बाहरी विश्व से सुख प्राप्त करने को करते हैं। हम उन सुखों को बार-बार पाना चाहते हैं। इसलिए हम अपने शरीर का इतना ध्यान रखते हैं। हम चाहते हैं इसकी सुरक्षा जिससे हम लगातार आनंद प्राप्त करते रहें। हम चाहते हैं कि यह हर समय अच्छी हालत में रहे।

हमें यह समझना चाहिए कि क्यों हम यह शरीर धारण कर इस पृथ्वी ग्रह पर आए हैं। तभी हम इस शरीर का सही उपयोग करना सीख पाएंगे। पहले हमें यह समझना चाहिए कि वर्तमान शरीर हमारी आत्मा को कई शरीर धारणों में से एक स्थिति है। यह चाहे हम स्वीकार करें या न मानें - सत्य तो यही है। इस जीवन के पूर्व हम कई जीवन जी चुके हैं। कई शरीरों में से होते हुए हम इस शरीर तक पहुंचे हैं। अब हमें कौन-सा जीवन मिलेगा या हम कौन-सा शरीर धारण करेंगे, निर्भर करता है कि हम अपने वर्तमान जीवन को किस प्रकार बिताते हैं।

हमने यह जन्म पिछले जन्मों में एकत्रित कई इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए किया है। इन इच्छाओं को 'प्रारब्ध कर्म' भी कहते हैं। हमारी आत्मा ने यह शरीर कई बचे हुए प्रारब्ध कर्म पूरे करने के लिए धारण किया है। जब हम मरते हैं, तो हमारे विचार तय करते हैं कि हमारा अगला जीवन कैसा होगा। हमारी आत्मा वह शरीर चुनती है, जिससे बचे हुए प्रारब्ध कर्म पूर्ण हो सकें, यह एक अटल सत्य है।

पिछले जीवन की बची हुई अधूरी इच्छाओं की पूर्ति को लिए हम यह शरीर प्राप्त करते हैं। परंतु इस जन्म में भी हम कई नई इच्छाएं एकत्रित कर लेते हैं। हम अपने शरीर के विभिन्न अनुभवों द्वारा नई कामनाएं पैदा कर लेते हैं। इसी

कारण हम जन्म-मृत्यु को चक्र में फंसे रहते हैं। यदि एक बार हमें यह समझ आ जाए कि हमने यह शरीर एक विशिष्ट उद्देश्य या 'मिशन' पाने के लिए किया है, जो पिछले जन्म में अधूरा रह गया था, तो हमारा पूरे शरीर या भौतिक जीवन के प्रति व्यवहार में बड़ा परिवर्तन आ जाएगा।

हमारा शरीर एक कपडे की भांति है। जब हम सुबह उठते हैं, तो पुराने कपडे उतार फेंकते हैं और नए कपड़े धारण करते हैं। ऐसा ही करते हैं न? इसी प्रकार जब हम मरते हैं, तो अपना पुराना शरीर हटाकर नया शरीर धारण कर लेते हैं जिससे हमारी बची हुई अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति हो जाए - बस यही कारण लोग मुझसे प्राय: पूछते हैं : "स्वामी जी! प्रबुद्ध स्वामीगण मानव जीवन ही क्यों ग्रहण करते हैं? जब वे प्रबुद्ध हो चुके हैं, तो उन्हें शरीर की आवश्यकता होती है। उनकी तो सारी इच्छाएं पूरी हो ही चुकी होंगी?''

रामकृष्ण परमहंस के जीवन की एक सुंदर घटना मैं यहां बताना चाहता हूं। रामकृष्ण एक प्रबुद्ध स्वामी थे। उन्होंने अपने शिष्यों को बताया था : "एक बार मैं एक बैलगाडी में अपने गांव से वापस आ रहा था, तो रास्ते में कुछ चोर मिल गए। उन्होंने गाडी रोक दी। मैंने तुरंत सारे देवताओं का नाम जपना शुरू कर दिया, यह सोचकर कि उनमें से कम-से-कम एक तो मुझे बचाएगा ही।"

तब उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रबुद्ध स्वामीगण क्यों अपना शरीर धारण करते हैं। वह बड़ी सुंदरता से कहते हैं : "मेरे मन का एक छोटा हिस्सा मेरे शरीर से जुड़ा रहता है, जिससे मैं ईश्वर प्रेम को भोग सकूं तथा भक्तों की संगति का आनंद उठा सकूं।"

यह समझ लें कि एक प्रबुद्ध स्वामी अपना शरीर दूसरों को प्रति असीम करुणा के कारण धारण करता है। वह दूसरों में भी यह परिवर्तन लाना चाहता है और शरीर धारण के बाद औरों से जुड़ने में आसानी रहती है। तब स्पष्ट प्रभाव दिखाया जा सकता है। उनकी कोई इच्छा शेष नहीं रहती। वह तो यह शरीर कभी भी त्याग कर सकते हैं। दूसरों को कल्याण के लिए वे इस शरीर को एक पतले अहम् के धागे से बांधे रहते हैं।

हम सदा इस शरीर से अधिक-से-अधिक फल प्राप्त करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारी आंखें अधिक-से-अधिक टेलीविजन देखें; पेट अधिक-से-अधिक स्वादिष्ट भोजन भर ले; कान अधिक-से-अधिक संगीत सुनते रहें। यह सब हम एक व्यसन के कारण ही करते रहते हैं। हम चाहते हैं कि अधिक-से-अधिक इंद्रिय सुख हम भोगें।

हमारा शरीर हमारी आत्मा का मंदिर है। हमें अपने शरीर का सम्मान करना चाहिए। हमें अपने शरीर के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, न कि लालची। हमें इसका

धन्यवाद करना चाहिए कि इसने हमारी आत्मा को एक आधार दिया है। यदि हम ऐसा सोचेंगे, तो हम अपने शरीर का एक नया आयाम देख सकेंगे।

यहां कृष्ण कहते हैं कि जो भी हम आनंद भोगना चाहते हैं, वह हमारे शरीर तक ही सीमित रहता है। शरीर ही इस आनंद को भोगता है। हमारी आत्मा को इसकी कोई आवश्यकता नहीं। वह तो इनके बगैर भी रह सकती है। हमारी आत्मा तो विशुद्ध बुद्धिमत्ता या चेतना है। इसे अपनी प्रसन्नता के लिए कोई बाहरी सहायता नहीं चाहिए।

समस्या तब शुरू होती है, जब हम समझते हैं कि हमारी आत्मा को यह विषय सुख चाहिए। हम प्रसन्नता को बाहय उपादानों से जोड़ते हैं और उन्हें आत्मा की आवश्यकता समझते हैं। यहीं से समस्या प्रारंभ हो जाती है। हम समझते हैं कि भौतिक विषयक सुख-भोग हमारी आत्मा की प्रसन्नता के लिए आवश्यक है। जब हम इन भौतिक सुख-भोगों को अपने आराम के लिए अधिक एकत्र करते हैं, तो हम इनके पीछे पडने लगते हैं।

कष्ण हमें यहां एक योजना बताते हैं। वह कहते हैं कि जब हम अपने शरीर की निष्पक्ष रूप से इन विषय-भोगों का आनंद भोगते हुए देखते हैं और समझते हैं कि यह शरीर ही इनसे जुड़ा है - इन बाहरी सुखों से - आत्मा नहीं, तब हम सत्य देखते हैं। शरीर को निष्पक्ष रूप से साक्षी भाव से इन भोगों को भोगते देखें। अपने शरीर के प्रति पूरी तरह जागरूक रहें। जब हम बाहरी उपादानों से अंतर्क्रिया करते हैं, तो उसे एक अलगाव से देखें। आपके मन में शरीर के अलग होने का एक संतोष उत्पन्न होगा। आप तब स्पष्ट समझ पाएंगे कि शरीर क्या है। आपको स्पष्ट समझ में आ जाएगा कि आत्मा का इन शरीर भोगों से कोई संबंध नहीं। यह शरीर सुख है, जो हम भोग रहे हैं।

कृष्ण इस श्लोक में एक महान सत्य उद्घाटित करते हैं। वह यहां सामूहिक चेतना की बात करते हैं। वह कहते हैं, जब हम परमात्मा को सभी में व्याप्त समझने लगते हैं, तो हमारे अंदर का अलगाव का भाव स्वयं ही तिरोहित होने लगता है। हमें तब सब कुछ एक ही सत्ता का प्रतिरूप लगता है; समस्त ब्रह्मांड पर सत्ता से व्याप्त लगता है - एक ही महान् सत्ता, एक ही सत्य को उदघाटित करती हुई।

यह स्पष्ट समझ लें कि हम सब जुड़े हैं। हर जीव दूसरे से जुड़ा है। आपके विचार और आपके निकट बैठे व्यक्ति को विचार में कोई अलगाव नहीं है। आप चाहे माने या न मानें, यह सत्य है।

हम समझते हैं कि हम व्यक्तिगत चेतना हैं। हम मानो अलग-अलग बिखरे द्वीप समूह हैं। हमारे विचार मानो हमीं तक सीमित हैं और हमारे विचार

Part 2: Bhagavad Gita demystified - Vol 3 Chapters 13-18

पर किसी का ध्यान नहीं है। पर यह सही नहीं है, क्योंकि समग्र ब्रह्मांड हमारे विचारों का प्रतिसाद देता है। यह समूचा जगत एक ही वैश्विक चेतना से परिपूर्ण है।

वस्तुत: यहां और कुछ है ही नहीं, सिवाय एक वैश्विक चेतना व्यक्तिगत चेतना तो सामूहिक चेतना का मात्र एक होलोग्रामनुमा अंश है। क्या आपने होलोग्राम देखा है? क्या होता है, जब आप एक होलोग्राम को पांच हिस्सों में बांट देते हैं? हर भाग पुन: एक पूर्ण होलोग्राम बन जाता है और हर हिस्सा वही सब दिखाता है, जो एक पूर्ण होलोग्राम पहले दिखा रहा था।

हमारी व्यक्तिगत चेतना एक होलोग्राम की तरह ही है। वैश्विक चेतना का होलोग्राम कई छोटे-छोटे होलोग्रामों में बिखर जाता है या व्यक्तिगत चेतनाओं में। परंतु हर एक में वही चेतना है - वही वैश्विक चेतना।

वस्तुत: हमारी व्यक्तिगत चेतना एक प्याज की तरह है। हम में से सब प्याज की तरह ही हैं। एक प्याज में आपको क्या मिलता है? वहां तो मात्र परतें-ही-परतें हैं; उनकी परतों को हटाते रहें, तो अंदर क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं। यही हाल हमारी व्यक्तिगत चेतना का है। बाहर से तो आपको भी प्याज ठोस लगती है। वह तो जब उसकी परतें हटाएं, तब मालूम पड़ता है कि अंदर कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार आप अपने व्यक्तिगत शरीर चेतना की परतें हटाते चले जाएं, तो अंतत: आपको मालूम पड़ेगा कि आप भी एक सामूहिक चेतना ही है। एक बार सारी परतें उतार कर देखें तो मालूम पड़ेगा कि आपके पास हर जीव या सत्ता में एक ही चेतना है। आपको शुरुआत से, आपके जन्म से ही समाज आपको इन परतों में आवृत्त करने लगता है। इस प्रक्रिया में हमारी बाल-प्रकृति, जो हर जगह परमात्मा का एक ही रूप देखती थी, वह हमसे दूर चली जाती है। हम उस प्रकृति को खो देते हैं। बच्चे को रूप में आप कई ऐसे काम करते हैं, जिसके द्वारा आप अपने परमात्मा को देखते हैं; उससे जुडते हैं। आपको यह नहीं मालूम होता, कि आप मिट्टी या पुथ्वी से अलग हैं। इसलिए आप मिट्टी से (बच्चे को रूप में) खेलते हैं। पर मां-बाप क्या करते हैं? वे आपको डांटते हैं; " मिट्टी से मत खेलो - तुम्हारे कपड़े गंदे हो जाएंगे।"

हम बच्चे पर विभिन्न सामाजिक शर्तें थोपते रहते हैं। बच्चे को क्या मालूम कि क्या गंदा है और क्या स्वच्छ है। वह तो मिट्टी को अपने फर्श का ही हिस्सा समझता है। वह चाहे स्वच्छ घर में खेले या गंदी सड़क पर, वह एक ही ऊर्जा से अपने को जोड़ता है। यह तो बड़े हैं, जो बच्चे को भेदभाव करना सिखाते हैं।

जब हम शरीर-मन के जुड़ाव की वे शर्तें हटा देते हैं, तो हम विशद्ध चेतना के दर्शन करते हैं। तभी हम समझते हैं कि सब कुछ एक ही रूप है। यही यहां कृष्ण बताते हैं। जब सब में हम एक ही परमात्मा व्याप्त देखते हैं. तो म्वाभाविक है कि हम सबसे जुड़े रहेंगे और जब हमारी दृष्टि ऐसी होगी, तब वह सत्य-दृष्टि होगी। हम तब देखते हैं कि समस्त ब्रह्मांड एक ही चेतना का विस्तार है और पूरा विश्व एक ही सत्य की अभिव्यक्ति है।

श्रीमद्भगवत गोता

आत्मा और शरीर

PARTY PLAN FOR D

  • हे कौन्तेय! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी 13.32 परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न कुछ करता है और न लिप्त ही होता है।
  • जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने को कारण लिप्त 13.33 नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह से लिप्त नहीं होती।
  • हे भारत! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस संपूर्ण लोक (विश्व) 13.34 को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा संपूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करती है।
  • इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को भेद को कार्य सहित प्रकृति के 13.35 अभाव को (विकार सहित प्रकृति से छूटने के उपाय को) जो पुरुष ज्ञान-नेत्रों द्वारा तत्त्वत: जानते हैं, वे महात्माजन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं।

कृष्ण फिर (जीवन में स्थित) परमात्मा की असलो प्रकृति के बारे में बार-बार कहते हैं। वह अर्जुन को बताते हैं कि आत्मा समस्त फंसावों से मुक्त रहती है। वह सबसे परे एवं शाश्वत है। कृष्ण कहते हैं कि यद्यपि आत्मा भौतिक शरीर के संपर्क में निरंतर रहती है, तब भी वह मुक्त रहती है।

पिछले श्लोकों को संदर्भ में हमने कहा था कि शरीर आत्मा का एक मंदिर होता है। किस प्रकार आत्मा शरीर को धारण कर उसका प्रयोग पिछले जन्मों को आकांक्षाएं / इच्छाएं पूर्ण करने के लिए करती है। वास्तव में आत्मा कुछ नहीं करती - वह लालच और भय को फंसावों में फंसती हो नहीं, मुक्त रहती है। यह तो मन ही है जो लगातार नई इच्छाओं को जोड़ता जाता है और जन्म-जन्मों तक शरीर को व्यस्त रखता है। अंतर में स्थित आत्मा सर्वदा मुक्त रहती है। इसका कोई बंधन नहीं होता।

यह तो जल में कमल की भांति निर्लिप्त रहती है। कमल दलों पर पानी की कितनी भी बूंदें पड़ें, वह उनसे निष्प्रभावी रहते हैं। वे उन्हें वापस लूढ़का देते हैं, जो पुन: पानी में पड़ जाती हैं।

इसी प्रकार आत्मा शरीर में रहती है; सांसारिक सुख-दु:खों से बिलकुल यक्त एवं अलग रहती है। ये सांसारिक सुख-दु:ख क्रमबदल आत्मा के लिए पानी की बूंदों को समान होते हैं। आत्मा तो मात्र परमात्मा में ही विलीन हो सकती है। सांसारिक घटनाओं का मात्र शरीर पर ही प्रभाव पड़ता है। आत्मा इससे सदैव निर्लिप्त रहती है।

कष्ण यहां 'निर्गुण' शब्द का उपयोग करते हैं, जिसका अर्थ होता है तीनों मल गुणों से परे। यह तीन गुण सात्विक, राजस और तमस का प्रभाव केवल मन और शरीर पर ही होता है। आत्मा गुणातीत होती है - इस पर न राजस का प्रभाव होता है, न सात्विकता का और न तमस का। यह पूरी तरह शुद्ध होती है। वस्तुत: यह तो पवित्रता की अवधारण के भी परे होती है, क्योंकि जब हम 'शुद्ध' कहते हैं, तो इसका संबंध संपूर्ण शांति से भी हो सकता है। पर यह किसी भी शांति-चैन की अवस्था से भी परे होती है। इसलिए यह शुद्धता की कल्पना के भी परे है। यह कभी दूषित नहीं हो सकती।

एक बात और स्पष्ट समझ लें। जब मन किसी को देखता है, तो शब्द हमारे मन में पैदा होते हैं (उसको वर्णित करने के लिए)। शब्द मस्तिष्क में चलने वाली बातचीत के प्रतिफल होते हैं। यदि मन न हो, तो शब्द भी नहीं होंगे। जब आप हिमालय क्षेत्र में जाते हैं, तो श्रद्धापूर्ण विस्मय का भाव सबसे पहले आपके मन में उदय होता है। उस समय शब्द भी बाहर नहीं आते, हम अवाक, रहकर वह महानता देखते हैं, हम अपने समूचे अस्तित्व के साथ उस महानता को अनुभूत करते हैं। उस समय हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं होते। मस्तिष्क में कोई शब्द नहीं आता, उसको वर्णित करने का। कुछ क्षणों बाद ही 'वाह' मात्र निकलती है और कोई अभिव्यक्ति नहीं होती।

इसी प्रकार प्रबोधन का भाव शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकता। ऐसा कोई प्रबुद्ध स्वामी नहीं जो संपूर्णता के साथ इस महान भाव को अभिव्यक्त कर सके।

वस्तुत: शांति से भी आत्मा को जोड़ने के लिए मन या मस्तिष्क की आवश्यकता पड़ती है, जो शब्द देता है अभिव्यक्ति को लिए। परंतु आत्मा तो इनके भी परे है। शब्द उसको व्यक्त करने में सक्षम ही नहीं हैं। वह तो बस 'है'। सब प्रबुद्ध स्वामीगण 'त्रिर्गुण रहित' होते हैं अर्थात् तीनों गुणों के भी परे। वे जानते हैं कि आत्मा सबसे मुक्त है, शरीर आत्मा का मंदिर है और शरीर का आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

श्रीमद्भगवत गीता

करता है। यह हमारा अज्ञान ही है, जो आत्मा को परमात्मा से विलग करता है। सही बात तो यह है कि परमात्मा और आत्मा के लिए दो अलग शब्दों का पयोग भी ग़लत है। परमात्मा और आत्मा अलग-अलग नहीं हैं। एक ही आत्मा या तत्त्व है - समग्र विश्व में एक ही परमात्मा है। हम तो वस्तुत: यह भी नहीं कह सकते कि हर एक में वही परमात्मा है क्योंकि जब हम शब्द 'वही' का प्रयोग करते हैं, तो लगता है मानो एक ही परमात्मा की प्रतिलिपियां हमारे अंदर हैं।

ऐसा कतई नहीं है। यहां केवल परमात्मा है और कुछ नहीं है। इस समग्र विश्व में एक ही परमात्मा है। यह तो हमारा मन है, जो बिना कारण सीमाएं बनाता है - चाहे देशों को मध्य हो या दो व्यक्तियों के। इसलिए देशों में यूद्ध

होते हैं। हर समय उनके मध्य की सीमाएं बनती और मिटती रहती हैं। हम समझते हैं कि हम परमात्मा और आत्मा के मध्य सीमाएं बांध सकते

हैं। हम अपनी आत्मा को लालच और भय के डिब्बों में बंद करके रखना चाहते हैं। इन डिब्बों का हम ढक्कन बंद कर देते हैं और उन्हें खोलते हुए भी डरते हैं। हमें लगता है कि यदि ऐसा किया तो हम अपनी पहचान से हाथ धो बैठेंगे। हम व्यक्तिगत अहम् से अपने आपको जोड़कर रखते हैं। हम दूसरों को दिखाना चाहते हैं कि हम अनोखे हैं।

हमारा मन (दिमाग) यह जानता है कि हमने जैसे ही डिब्बे का ढक्कन खोला कि आत्मा-परमात्मा एक रूप हो जाएंगे। हमारा मन यह जानता है कि शरीर में आत्मा और संसार में परमात्मा एक ही अस्तित्व है। इन दोनों में कतई कोई अंतर नहीं है। इसलिए मन को भय लगता है कि ढक्कन खोलते ही उसकी अस्मिता विलुप्त हो जाएगी और वह औरों जैसा ही हो जाएगा। यह हमारा मन नहीं होने देना चाहता।

इसलिए हम अपने व्यक्तिगत अहम् से जुड़े रहते हैं। लेकिन जब हम यह डिब्बा खोल देंगे और समझेंगे कि इस पूरे ब्रह्मांड में एक ही सत्ता है, तो हम भी परमात्मा में लीन हो सकते हैं।

यहां अंत में कृष्ण कहते हैं : "यदि हम विश्रद्ध साक्षी भाव से रहें, तो हम शरीर-मन की इस कैद से निकलकर शाश्वत चेतना प्राप्त कर सकते हैं।'' कृष्ण इस शाश्वत चेतना को पाने की विधि भी बताते हैं।

साक्षी रहो और मुक्त हो जाओ

यह समझ लें कि आप शरीर-मन के बंधनों से परे जाकर ही क्षेत्र साक्षी बन सकते हैं। हमें क्षेत्रज्ञ की तरह देखना चाहिए। जब हमं ऐसा करेंगे, तब ही परमात्मा और आत्मा में अलगाव की फालतु रेखा को पहचान पाएंगे।

कष्ण एक उदाहरण द्वारा अपनी बात स्पष्ट करते हैं। वह कहते हैं आकाश सर्वव्याप्त होते हुए भी आकाश में स्थित किसी वस्तु से कतई प्रभावित नहीं होता। वह आकाश, सुक्ष्म ऊर्जा या ईश्वर सर्वव्याप्त है। कण-कण में यह सक्ष्म ऊर्जा है। यद्यपि यह हर अणू-परमाण में है; पर जिसमें वह है उसका कोह प्रभाव इस पर नहीं पड़ता। फूल में भी रहते हुए उसकी गंध से भी अप्रभावित रहती है।

इसी प्रकार आत्मा अपने आवास-क्षेत्र से अप्रभावित रहती है। लोग समझने हैं. यदि वे पाप करेंगे तो उसकी आत्मा नरक में जाएगी और यदि पुण्य किए हैं. तो स्वर्ग में। वे समझते हैं कि उनकी जीवन में करनी का प्रभाव उनको आत्मा पर पड़ता है। पर यह समझ लें कि हमारे कर्मों के फल आत्मा पर प्रभाव नहीं डालते। इसकी प्रकृति अछूती रहती हैं, जब हम अपनी करनी के बारे में जागरूक हो जाते हैं, तो हमें समझ में आता है कि यह तो मात्र शरीर ही है कर्म करता है। आत्मा इन सबसे मुक्त रहती है। कृष्ण कहते हैं कि जिस प्रकार एक सूर्य समस्त संसार को आलोकित करता है - अर्थात एक परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है, उसी तरह एक क्षेत्रज्ञ समस्त चर और अचर जीवों में रहता है। सबमें एक ही चेतना का प्रकाश है। हमें आश्चर्य हो सकता है कि कृष्ण बार-बार एक ही वस्तु क्यों कहते हैं। वह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दोनों की अवधारणाएं पुरी तरह स्पष्ट करना चाहते हैं अर्जुन को समझाने के लिए। वह जानते हैं कि अर्जन इस भेद को पूरी तरह समझ सके। यह अति आवश्यक है।

यहां कुष्ण एक नई बात भी कहते हैं। वह कहते हैं कि जिस प्रकार एक सूर्य समस्त जगत को प्रकाशित करता है. शरीर में स्थित आत्मा न केवल शरीर को प्रकाशित (जीवंत) रखती है, वरन शरीर के चारों ओर ही नहीं, समस्त विश्व को प्रकाशित (या जीवंत) रखती है। वह कहते ਵੈੱ

यदा नाहम् मो था सो यदा हम बंधनम् तया।। 13.3411

क्षेत्री स्वयं ईश्वर है। यह आत्मतत्त्व (ईश्वर) पूरे क्षेत्र को प्रकाशित रखता है। अर्थात् न केवल हमारा शरीर वरन समग्र क्षेत्र प्रकाशित होता है। हम सबके अंदर उपस्थित चेतना परमात्मा का होलोग्राम है। अत: शरीर में उपस्थित चेतना और समग्र में उपस्थित चेतना में कोई अंतर नहीं होता। हर एक के पास एक ही ऊर्जा होती है।

सर्य अपने चारों ओर के क्षेत्र को नित्य प्रकाशित रखता है। इसमें वह कोई पक्षपात नहीं करता। जो उसके रास्ते में आता है, प्रकाशित हो जाता है; अंधकार दर हो जाता है। इसी प्रकार ईश्वर जो हमारे भीतर है, समग्र विश्व को प्रकाशित श्रीमदुभगवत गीता

हमारे सारे क्रियाकलाप, प्रतिक्रियाएं, भावनाएं, शरीर-मन-तंत्र से ही जुड़ी रहती है। हमारी चाल-ढाल; गुस्से या प्रसन्नता का भाव, शोक-हर्ष सब हमारे मन की ही प्रतिक्रियाएं हैं। इनका संचालन शरीर-मन-तंत्र से ही होता है।

जब हम इन सब क्रिया-प्रतिक्रिया-भावनाओं को एक निष्पक्ष साक्षी के रूप से होता देख लेते हैं, तो हम स्वयं को इस शरीर-मन-तंत्र से अलग करते हैं। हम सत्य का तब ही दिग्दर्शन कर पाते हैं, जब हम इनको ऐसे देखें, जैसे आसमान में तैरते बादुल या सामने चलता कोई चलचित्र (सिनेमा)।

परंत अपने मन में उठते विचारों को साक्षी भाव से देखें, यह विचार भी तो हमारे मन से ही निकलता हैं यानी इस विचार का पैदा होना मन की सक्रियता बताता है। जब हमें इस विचार की भी अनुभूति न हो, तब ही हम शाश्वत चेतना तक पहुंच सकते हैं। मैं आपको इसकी विधि समझाता हूं - इसमें कम-से-कम दस मिनट तो लगेंगे ही।

अब आप अपने शरीर की हर हरकत, श्वासों का आवागमन, मन में उठते विचार इत्यादि को साक्षी भाव से देखने का प्रयत्न करेंगे। आप पूछ सकते हैं-शरीर में कैसी-कैसी हरकतें होती हैं। जब आप सांस लेते या छोड़ते हैं, तो आपका पेट निरंतर चलता रहता है। श्वास के आवागमन के समय यह पेट की एक हल्की-सी हरकत है, जो चलती रहती है। इस हरकत को साक्षी भावी से देखें।

अब अपनी श्वासों के आवागमन को निहारिए, बिना उनमें कोई व्यवधान डाले या नियंत्रित करने की चेष्टा करते हुए।

तीसरी बात, अपने मन को देखिए। विचार-प्रवाह तो चल ही रहा होगा। हम शरीर-मन-तंत्र से कभी त्राण नहीं पा सकते, यदि हम इनसे लड़ते रहेंगे। कुछ देर को अपने मन के पास एक घनिष्ठ मित्र की तरह बैठे बिना विश्लेषण करें कि उसमें उठते विचार सही हैं या गलत। इस मन को सब कुछ कहने दीजिए, जो यह चाहता है - बिना रोके-टोके या कोई व्यवधान उपस्थित किए।

इन सबको निरासक्त होकर साक्षी भाव से निहारें - न कुछ रोकों, न श्लेषित करें. न रोकों।

हम अपने मन शरीर से निरंतर लड़ते रहते हैं - ऐसे तो इनसे त्राण हम कभी नहीं पा सकते। हम उनसे पार मित्रवत व्यवहार द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम शरीर मन की सब हरकतों को एक घनिष्ठ मित्र की भांति देखें तो हम उनके परे भी जा सकते हैं। यदि मन-शरीर को प्रति एक ऋणात्मक घटित हो सकता है। मित्र भाव से साक्षी रहें और अंदर की बातें बाहर आने दें। उसमें कोई खराबी नहीं है। न कुछ दबाएं, न हटाएं, न साथ रहें, न विमुख रहें। यदि

इस तंत्र को सहायता दी, तो हम गंदगी के पीछे जाते हैं और यदि इसका विश्लेषण किया तो इसको और खंड-खंड कर गंदगी बढ़ा देंगे। अत: बीच में पड़े ही नहीं - मात्र साक्षी बने रहें।

साक्षी भाव एक अग्नि की तरह होता है जो विचारों को जलाकर समाप्त कर देता है। मात्र यही भाव कारगर रहेगा, दबाना या रोकना नहीं। जैसा मन कहे, उसे कहने दीजिए।

जब हम अपने अंत:करण में गहरे उतरते हैं, हमारी साक्षी भाव प्रदत चेतना स्वत: एक बुद्धिमत्ता का सृजन कर देती है। यह समझ लें कि प्रतिदिन चौबीसों घंटे इस मानसिकता में रहने की आवश्यकता नहीं है। यदि हमें एकाध झलक मिलने लगी है, तो यह भी बहुत है। इन झलकों से प्राप्त ऊर्जा हमारे जीवनभर के मार्ग-निर्देशन को काफ़ी है। यदि इस साक्षी भाव की अवस्था को दौरान मौन की अनुभति हुई - चाहे कुछ क्षणों को ही - तो हमें उसका 'स्वाद' लग जाएगा और हम इसके लिए निरंतर प्रयत्न जारी रखने लगेंगे। इन्हीं कुछ क्षणों में हमें महान ऊर्जा की उपलब्धि होती है।

हर बड़े सिद्धांत या सत्य की खोज इसी चेतना या अंतर्र्रज्ञा से प्राप्त होती है, जो शरीर-मन तंत्र से परे होती है, फिर चाहे वह आइंस्टीन का प्रसिद्ध सापेक्षतावाद का सिद्धांत हो या कोई अन्य वैज्ञानिक महानू खोज। ये सब साक्षी चेतना के प्रतिफल हैं। यह सत्य न केवल वैज्ञानिक क्षेत्र में लागू होता है, वरन् हर क्षेत्र में, जिनमें शामिल है आध्यात्मिकता का क्षेत्र भी। जब हम शरीर-मन तंत्र के परे जाते हैं, तो हम अपने अस्तित्व का अधिकतम लाभ प्राप्त करते हैं। जब हम हर तरह से संपूर्ण होते हैं, तब ही हमारा अस्‍तित्‍व अपनी चरम अभिव्यक्‍ति दे पाता है। हम पूर्ण पवित्र होते हैं, जब संपूर्ण होते हैं। यह समझ लें कि यह साक्षी भाव ही एकमात्र रास्ता है संपूर्ण पवित्रता या ईश्वर से साक्षात्कार का।

आइये हम परब्रह्म परमात्मा, भगवान कृष्ण - चरम साक्षी चेतना - से प्रार्थना करें कि हमें एक ऐसा आंतरिक अंतरिक्ष प्रदान करें जहां विशुद्ध साक्षी चेतना रह सके, जिससे हम THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM का चरम अनुभव और शाश्वत आनंद प्राप्त कर सकें।

इस प्रकार - संपन्न हुआ उपनिषद भगवत् गीता का ' क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग मे शीर्षक वाला 13वां अध्याय जिसमें परमात्मा के स्वरूप पर कृष्ण-अर्जून संवाद को रूप में योग-शास्त्र विज्ञान पर चर्चा की गई है।

श्रीमद्भगवत गौता

अपने अनुकूलन ( वृत्ति ) को त्यागो

एक लघु कथा

एक स्कूल के संत्र के अंतिम दिन विद्यार्थीगण अपनी एक महिला शिक्षक के लिए भेंट लेकर आए। पहले विद्यार्थी ने अपनी शिक्षिका को एक खूबसूरत बंधा हुआ बंडल दिया। उस बच्चे के पिता एक बेकरी चलाते थे। उस शिक्षिका ने उस पैकिट को हिलाकर देखा और कहा-''क्या इसमें पेस्ट्रियां हैं?'' बच्चे ने कहा-" हां।"

दूसरे बच्चे ने भी एक सजा-सजाया बंडल दिया और शिक्षिका ने उसे भी हिलाकर देखा और कहा-''क्या इसमें मेरे लिए कोई पोशाक है?'' उस बच्चे ने कहा-"हां।"

तीसरा बच्चा एक लड़की थी, उसके हाथ में भी एक सजा-सजाया डिब्बा था। उसके पिता की शराब को दुकान थी। शिक्षिका ने वह डिब्बा ले लिया, पर उसमें से कोई द्रव बाहर निकल रहा था। शिक्षिका ने कहा-''क्या इसमें बियर रखी है?'' बच्ची ने कहा-"नहीं।''

शिक्षिका ने पुन: अपनी उंगली पर वह द्रव लेकर चखा और कहा-''यह तो बड़ा स्वादिष्ट पेय है? क्या यह कोई उम्दा वाइन है?''

उस बच्ची ने उत्तर दिया-"नहीं।"

अब शिक्षिका ने हारकर कहा-''अच्छा तो मैं हारी! तुम ही बताओ यह क्या है?'''

बच्ची ने थोडे चिंतित स्वर में कहा-''इसमें एक छोटा-सा पिल्ला (कुत्ते का बच्चा ) है।''

जब हम अपने निर्णय, अपने पूर्व संस्कार या जमी हुई स्मृतियों के आधार पर लेते हैं तो समस्याएं पैदा हो जाती हैं। उस शिक्षिका को पहले दो अनुमान सही थे। पहले बच्चे को पिता की बेकरी की दुकान थी तो उसने पेस्ट्री भेजी। दूसरे के पिता की कपड़े की दुकान थी तो वह उसके लिए पोशाक लाया। इसी क्रम में जब वह लड़की, जिसके पिता की शराब की दुकान थी, बंडल में भेंट लाई श्रीमदभगवत गीता

अध्याय-14

मनुष्यों को पास विकल्प है : कि वे अज्ञानी रहें या प्रब्बुद्ध हो जाए; परंतु अपनी स्वच्छंद वृत्ति अपनाकर ्रम हम अज्ञानी ही बने रहते हैं; मूल कि कुष्ण हमें बताते हैं का था मार कि कैसे हम प्रबृद्ध हो सकते हैं।

तो स्वाभाविक था कि शिक्षिका समझती कि वह कोई उम्दा वाइन इत्यादि लेकर आई है।

ये जमी हुई स्मृतियां ही, जो हमारे अचेतन मस्तिष्क में जमी रहती है हमारे क्रिया-कलाप का निर्धारण करती हैं। यद्यपि हम उन्हों के आधार फ अपना काम करते हैं, पर हमारी समझ में नहीं आता कि हमारे निर्णयों का वाय कहां रहता है। हम समझते हैं कि हमारे क्रिया-कलाप हमारे विचारों की तार्किञ् परिणीति पर आधारित होते हैं, परंतु सत्य यह है कि अधिकतर हमारे क्रिया-कलाज न तर्क पर आधारित होते हैं, न हमारी जागरूक जानकारी पर।

एक वास्तविक घटना

हमारा बिडाडी आश्रम बंगलौर से एक घंटे की मोटर यात्रा के फासले पर है। हमारे आश्रम के प्रारंभिक दिनों में मैं प्रतिदिन बिडाडी से बंगलौर जाया करता था। एक दिन मैंने ड्राइवर से कहा कि मस्जिद के पास एक ख़ास जगह होते हुए कार ले चले। ड्राइवर थोड़ा संशयग्रस्त हो गया। उसने ज़िद्द की कि उस रास्ते में कोई मस्जिद ही नहीं, जिससे हम प्रतिदिन गुजरते थे। मैंने कहा कि एक मस्जिद है, पर वह मानने को तैयार ही नहीं था। तब मैंने एक दूसरी निशानदेही कर कहा कि वहां एक हनुमान मंदिर है। वह तुरंत समझ गया और खुशी से वहां ले चला-और बोला-''स्वामी जी! आपने पहले ऐसा क्यों नहीं कहा था। यह मेरी समझ में आ गया कि आपको कहां जाना है।''

यह हिन्दू मंदिर उस मस्ज़िद की तुलना में एक बहुत छोटी-सी इमारत थी। हम दोनों से होकर प्रतिदिन ही गुजरते थे, पर उस ड्राइवर को वह मस्जिद नहीं दिखाई पड़ी, क्योंकि उसकी व्यक्तिगत श्रद्धा उस मंदिर में ही थी। इस प्रकार हमारे मन के अचेतन भाग में कई अनुभव इकट्ठे होते रहते हैं, भले ही हमें उनको अनुभूति न हो। सत्य तो यह है कि हमारी कई शक्तिशाली स्मृतियां सीधी अचेतन में उतर जाती हैं, जिनको हम याद भी नहीं करते (या कर सकते), पर वे हमारे ऊपर जबरदस्त प्रभाव डालती हैं तथा हमारे निर्णयों एवं क्रिया-कलापों क पर उनका गहरा असर पड़ता है, क्योंकि यह प्रभाव हमारी उस भावनात्मक समझ पर आधारित होता है जो हमारे अंदर उस अनुभव के समय होती है। वस्तुत: हमारी समझ हमारा अनुभव नहीं होता क्योंकि हमारी समझ हमारी ऐंद्रिक अनुभूति से बनती है। हमारा उस अनुभव के प्रति भावनात्मक प्रतिसाद हमारी समझ बनाता है और यह प्रतिसाद या प्रतिक्रिया हमारे, अपने अनुकूलन के आधार पर निश्चित होता है।

कष्ण ( स्वयं को ) दोहराते क्यों हैं?

भगवान (कृष्ण) बोले-''ज्ञानों में अति उत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहुंगा जिसको जानकर सब मुनिजन, इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो जाते हैं।

14.1 इस ज्ञान का आश्रय पाकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुन: उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते। हे भारत! मेरी महत् ब्रह्म रूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया -

14.2 संपूर्ण भूतों की योनि है और मैं उस योनि में चेतन समुदाय रूप गर्भ का स्थापन करता हूं।

14.3 तथा हे कौन्तेय! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियां अर्थात् शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी त्रिगूणमयी माया महत् ब्रह्म रूप प्रकृति तो गर्भ धारण करने वाली माता है और मैं बीज स्थापित करने वाला पिता हूं।

14.4 एक सत्य को बार-बार दोहराकर कृष्ण इस सत्य को बारे में अर्जुन के मानस में इस स्मृति को गहरे जमाना चाहते हैं। यह पहले समझ लें कि कृष्ण क्यों स्वयं को दोहराते हैं-वे लगभग वही शब्द बार-बार कहते हैं। क्यों? क्यों कृष्ण स्वयं को बार-बार दोहराते हैं? कृष्ण एक स्वामी (मालिक) हैं जो परिणाम चाहते हैं। वे जो चाहते हैं उसके बारे में बार-बार कहते हैं। वे किसी भी समझौते पर सहमत नहीं होते। वे इस बर्ताव से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं। वे ऐसे नहीं हैं कि मैंने तो कह दिया जो मैं चाहता था-अब यह सुनने वाले पर निर्भर है कि वह माने या न माने। नहीं! वे ऐसा नहीं चाहते। वे बार-बार अर्जुन को बताते हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि वे अपने ज्ञापन की एक अमिट स्मृति-रेखा अर्जुन के मन में बना दें। वे बार-बार ऐसा करते हैं कि अर्जुन यदि पहली बार में न समझ पाया हो तो शायद अब समझ जाए। वे अर्जून के मन में अपने उपदेश की एक अमिट

स्मृति गहराई से गढना चाहते हैं, जिससे अर्जून उसका पालन करने लगे, इसलिए वे सत्य को बार-बार दोहराते हैं।

वे स्वयं कहते हैं-"मैं तुझे एक बार और बताऊंगा वह सत्य, वह ज्ञान जिसका पालन कर सारे ऋषि-मुनि परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं।''

" मैं यह शब्द और जुमले इसलिए नहीं दोहराता हूं कि मेरे पास कुछ और कहने को नहीं है। इन शब्दों और वाक्यों में वह शक्ति है जो तेरे (अर्जुन के) मानस में पैठ सकते हैं। यदि तू ऐसा करने की अनुमति देगा तो वे तुझे बदलने में सहायता करेंगे।'' यही मैं कहता हूं। इन शब्दों और वाक्यों को अपने अंदर उतरने दो। ये शब्द सुनो तो उन्हें अपने मानस में धंसने दो क्योंकि इनमें वह शक्ति या ऊर्जा है कि वे तुम्हारे अंदर एक इन्कलाब ला सकते हैं, तुम्हें बदल सकते हैं।

क्या ईश्वर है? (विद्यमान है? )

कई धार्मिक कर्मकांड ऐसे हैं जिनका उद्देश्य हमारे मन में अच्छे संस्कार पैदा करना होता है - यथा मंदिर-मस्जिद-चर्च जाना, प्रार्थना समूहों में भाग लेना, रात्संग में प्रतिभागी होना, जिसमें हमारी आध्यात्मिकता को बल मिले। ये सब गतिविधियां एक माहौल बनाती हैं, सही निर्णय करने के लिए एक सही मानसिकता का निर्माण करती हैं, परंतु मात्र यह क्रिया-कलाप ही हमें युक्त या प्रबुद्ध नहीं बना सकता, पर हमारे अचेतन को एक दिशा देकर नियंत्रित करने का प्रयास कर सकता है कि हम एक निश्चित मार्ग पर चलें। यह हमारा पुनर्गठन कर सकता है। कुछ लोगों का मत है - यह सारे कर्मकांड तर्कहीन और अवैज्ञानिक हैं। विज्ञान तो उन तथ्यों को लिए है जो रिकॉर्ड किए जा सकते हैं जबकि आध्यात्मिकता का संबंध उस सत्य से होता है जिसका अनुभव करना आवश्यक है। इसी कारण हमारे शास्त्र-ग्रंथों ने ऐतिहासिक रूप से सही सत्य और तथ्यात्मक विवरण प्राप्त करने की कभी परवाह नहीं की। वे तो उन मुद्दों पर केंद्रित रहे जो हमारी चेतना पर प्रभावी होते हैं। अपने शास्त्र-ग्रंथों को समझने के लिए हमें तर्क को नहीं, ध्यान की आवश्यकता है। सत्य का हमारी बौद्धिक चेतना या दिमाग से कोई सरोकार नहीं, वह तो हमारे समूचे अस्तित्व से जुड़ा होता है। प्राय: लोग मुझसे पूछते हैं-"क्या आप ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध कर सकते हैं?''

प्रबुद्ध होने के पूर्व स्वामी विवेकानंद ने भी अपने गुरु रामकृष्ण से पूछा था कि क्या वे उन्हें ईश्वर का दर्शन करा सकते हैं। विवेकानंद ने यह प्रश्न अपने गुरु को परेशान करने के लिए नहीं पूछा था-वे तो अपने गुरु से बेहद प्रभावित

थे और उस सत्य को जानना चाहते थे, जो उनकी समझ में नहीं आ रहा था। एक युवा व्यक्ति, जिसने विवेकानंद के बारे में पढ रखा था, मेरा एक

प्रवचन सुनने भारत आया था। मैंने पूछा-''तो तुमने विवेकानंद के बारे में पढ़ा है?'' पर विवेकानंद की तरह इस व्यक्ति को सत्य जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह तो यह बताना चाहता था कि स्वयं कितना 'स्मार्ट' है।

उसने गर्व से कहा-''हां, और मैं भी आपसे यही प्रश्न पूछता हूं।'' वह समझ रहा था कि मैं भी रामकृष्ण की तरह विनम्र और विनीत रहूंगा।

मैंने उसकी कमीज का कॉलर पकडकर कहा-"मैंने न केवल ईश्वर को देखा है, वरन् मैं तुम्हें भी दिखा सकता हूं। विवेकानंद रामकृष्ण का अनुसरण करने को तैयार थे। तुम भी तैयार हो जाओ मेरे अनुयायी होने के लिए और मैं तम्हें ईश्वर का दर्शन कराऊंगा।''

उसने स्वयं को मुझसे छुड़ाने का संघर्ष किया और भाग गया। वह इतना डर गया था कि पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।

ईश्वर का अनुभव तब ही हो सकता है जब दिमाग को इस प्रक्रिया से अलग कर दें. क्योंकि वह हमारे दिमाग से परे है। हम तर्क या बुद्धि द्वारा कैसे उसके अस्तित्व को सिद्ध कर सकते हैं? जो दिमाग या इसकी सारी ताकतों की पहुंच से ही बाहर हो, उसे हम कैसे 'समझ' सकते हैं क्योंकि यदि हम उसे समझ सकते हैं तो वह हमसे श्रेष्ठ कैसे है? हमसे बेहतर कैसे है या वह फिर हमारा ईश्वर कैसे हो सकता है?

जब हम ईश्वर की दिव्यता की बात करते हैं तो हम एक अवधारणा से ज़झते हैं तथा अपनी सीमित मानस शक्ति के द्वारा एक सिद्धांत बनाना चाहते हैं। इससे ज्यादा हम कुछ कर भी नहीं सकते, क्योंकि यदि वह मात्र एक अवधारणा है तो हम उसे सिद्ध कर सकते हैं या नहीं कर सकते। इन्हीं अवस्थाओं में हम उसके भक्त या उसको न मानने वाले नास्तिक बन सकते हैं।

नास्तिक होने को लिए साहस चाहिए। नास्तिक शायद ईश्वर के बारे में परम आस्तिकों से भी ज्यादा सोचता रहता है। जब हम पूरी सक्रियता से किसी बात या अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते तो हमें ज्यादा जागरूक और चाक-चौबंद होना पड़ता है, इसलिए किसी भी आस्तिक से, नास्तिक ईश्वर को बारे में ज्यादा जागरूक रहता है।

ईश्वर का सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। यही कृष्ण चाहते हैं कि अर्जुन करे। वस्तुत: वे अर्जुन को उस अवस्था तक स्वयं ले गए थे जब उन्होंने अपना विश्वरूप अर्जून को दिखाया था। अब कृष्ण चाहते हैं कि बाको सारो मानवता को उस स्तर तक ले जाएं। इसलिए बार-बार वे उन तरकीबों का जिक्र

श्रीमदुभगवत गोता

करते हैं जिससे हम सब इस दिव्यता की अनुभूति कर सकें। अपनी गहन करण में वे हमें उस जीवन-रेखा को दिखाते हैं जिसके द्वारा हम सभी का उद्धार हो सके।

यहां पहली बार कृष्ण कहते हैं कि हम सब उसकी अवस्था तक पहुंच सकते हैं। अभी तक उन्होंने कहा था-"मेरी पूजा करो; मुझ में अपना समर्पण कर दो'', परंतु अब वे कहते हैं-''तुम भी मेरी अवस्था तक पहुंच सकते हो कोई भी मेरी भावातीत प्रकृति प्राप्त कर सकता है।''

अर्थात् हम भी उनकी अवस्था तक पहुंच सकते हैं, जिसमें वे हैं। कृष्ण वे पहले स्वामी हैं जो इतने साहसी और निर्भीक हैं, जो कहते हैं कि प्रबोधन सबके लिए संभव है और इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है। प्रबोधन अचानक नहीं होता। यह वह संभावना है जो हम सब प्राप्त कर सकते हैं।

कृष्ण से पूर्व पहले के सभी उपनिषद, ब्रह्मसूत्र एवं शास्त्रादि कहते थे कि प्रबोधन एक अचानक होने वाली घटना है। कुछ लोग प्रबुद्ध ज़रूर हुए, पर यह किसी को नहीं मालूम कि कैसे हुए या क्यों हुए? यह भी किसी को नहीं ज्ञात हो पाया कि बाकी सब प्रबुद्ध क्यों नहीं हो पाए या अगर हो सकते हैं तो कैसे हों? किसी को इसका ज्ञान नहीं। सिर्फ यही मालूम था कि कुछ प्रबुद्ध हो गए-मानो ईश्वर सभी के प्रार्थना-पत्रों पर विचार कर रहा हो और कुछ को स्वीकार कर उसने कहा-''तुम प्रबुद्ध हो गए'' और तूरंत ही वे लोग प्रबुद्ध हो गए।

कृष्ण वे पहले स्वामी हैं जिन्होंने बताया कि कैसे अपना प्रार्थना-पत्र या 'रिज्यूमी' लिखना चाहिए प्रबोधन के लिए। उन्होंने हो बताया कि प्रबोधन अचानक नहीं होता, उसके लिए यत्न करना पड़ता है और कैसे इसे प्राप्त किया जा सकता है। इसका अनुभव हम अपने जागृत निर्णय द्वारा प्राप्त करते हैं। वे कहते हैं कि यह ज्ञान होने पर 'हम वह अवस्था प्राप्त कर सकते हैं'। वे यह नहीं कहते-"अर्जुन! सिर्फ तू ही इसे प्राप्त कर सकता है।" उनका कहना है कि प्रयल्न करे तो इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है।

अपने अर्जून को विश्वरूप दर्शन को पश्चात् जो कुछ कृष्ण अर्जून से कहते हैं वह सारे विश्व के लिए बताया जाता है। अर्जुन को तो जो प्राप्त करना था वह प्राप्त हो ही चुका था। उसके बाद तो कहने को कुछ बचता ही नहीं था। अर्जून ने कृष्ण का 'विश्व-रूप' देखा था। दशम अध्याय में विश्व-रूप उसको दिखाया गया है और 12वें अध्याय से आगे जो कुछ कृष्ण कहते हैं या जो उनका उपदेश है-वह समग्र मानवता के हित के लिए है।

जैसे एक वैज्ञानिक चीज़ों को बनाने के लिए बाहरी विश्व में अपना फार्मूला (सूत्र) बनाता है, उसी प्रकार एक आध्यात्मिक गुरु एक सूत्र बनाता है जिससे आंतरिक विश्व की अनुभूति होती है। कृष्ण कहते हैं-"अपने आपको इस ज्ञान में प्रतिष्ठित कर तुम भी यह अनुभव प्राप्त कर सकते हो या तुम भी उस अवस्था में आ सकते हो जिसमें मैं रहता हूं।" यहां 'मम' शब्द का इस्तेमाल हुआ है जिसका अर्थ है 'मेरी अपनी' (अवस्था)। "इस सत्य का अनुभव तम्हें भी उस अवस्था में ले जाएगा जो मेरी है।''

कष्ण यहां उस सत्य की बात करते हैं जो शाश्वत है और जीवन-मुत्यू के बंधन से परे है। यह शाश्वत अवस्था सृजन और विनाश के परे है; यह विगत या आगत से नहीं बांधी जा सकती। शाश्वत का अर्थ है यहां सदा रहने वाला अर्थात शाश्वत यानी वह वर्तमान क्षण जो हमेशा रहता है।

कुष्ण उन दार्शनिक प्रश्नों का यहां उत्तर दे रहे हैं जिनका उत्तर वास्तव में कभी दिया ही नहीं जा सकता-कैसे यह समस्त ब्रह्मांड बना? यदि सब कुछ ईश्वर ही है तो यह ब्रह्मांड बना ही क्यों? हम कैसे पैदा होते हैं? इन प्रश्नों का जिसने भी उत्तर देने का प्रयास किया, उसने अपना एक नया दर्शन खड़ा कर दिया।

एक बार किसी ने अपनी हताशा में मुझसे भी यही प्रश्न पूछे थे-हम क्यों पैदा हए? हमें जन्म लेने की आवश्यकता ही क्यों है? यह पूरा नाटक क्यों होता है कि जन्म लेना, ध्यान लगाना और प्रबोधन प्राप्त करना? क्यों? यह नाटक किसके लिए होता है? यदि हमें कर्मानुसार फल भुगतने पडते हैं तो हम कर्म करते

ही क्यों हैं? इसका उद्देश्य क्या है? क्यों यह अनंत चक्र चलता ही रहता है? कषण इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करते हैं, परंतु यह उत्तर अंतिम

सत्य नहीं बताता। वे कहते हैं-"अभी रुको! यह उपदेश पूरा हो जाने दो।" साधारणतया जब हमें अपने दार्शनिक प्रशनिक प्रश्नों का उत्तर नहीं सूझता तो हम उन प्रश्नों में इतने उलझ जाते हैं कि ध्यान कर ही नहीं पाते, क्योंकि बार-बार या हर समय यही प्रश्न हमारे मन में घूमते रहते हैं। हम बार-बार उसी या उन्ही प्रश्नों पर लौटकर आ जाते हैं। यहां अर्जुन भी बार-बार एक ही प्रश्न पर लौटकर आता है और वहीं उलझ जाता है।

उसको ध्यान करने की सहूलियत देने के लिए और उसे एक विशाद्ध समझ देने के लिए कृष्ण यहां उसको एक उत्तर सुझाते हैं।

एक दिन मैं भी ऐसे ही एक उदाहरण से गणित सूत्र में उलझ रहा था। मान लीजिए वह सूत्र है : x+2 = 4 । प्रारंभ में शिक्षक एक कल्पना कर कहेगा-''मान लो कि 'x = 2' को है। फिर x को दो से प्रतिस्थापित कर दो और 2+2=4 हो जाएगा। यानी प्रश्न हल हो गया। फिर शिक्षक कहेगा-" चूकि प्रश्न हल हो गया है, हम मानेंगे कि हमारी कल्पना 'x=2' सही है, लेकिन जब तक हम इस हल तक पहुंचे, हम तो यही मानेंगे कि x=2 को।

श्रीमद्भगवत गीता

परंतु यदि हम अपनी कल्पना पर ही प्रश्न उठाकर कहें कि-"x-2 के ही क्यों, 3 के या 4 के क्यों नहीं?" तो हम इस प्रश्न को हल नहीं कर पाएंगे। एक बार प्रश्न हल हो जाए तो हम मान लेंगे कि X-2। यह हम तार्किक रूप से पाते हैं, पर जब इस प्रश्न को हल करना है तो हमें एक चीज तो मानना ही पडेगा-यथा x=2। हर समस्या का हल इसी प्रकार प्राप्त किया जाता है। कुछ तो पहले मानना ही पडेगा।

कृष्ण भी एक छोटी-सी कल्पना करते हैं (या मानते हैं) और समस्या का हल ढूंढने का प्रयत्न करते हैं। एक बार यदि वह समस्या हल कर दें तो हम भी समझ लेंगे कि जो उन्होंने माना था वह सत्य ही था, जैसे शिक्षक ने जो माना था वह गलत तो नहीं था, परंतु थी एक कल्पना ही। इसी प्रकार कृष्ण एक सुझाव देते हैं जो अंतिम सत्य तो नहीं है, परंतु एक तुलनात्मक वास्तविकता जरूर है, यानी एक तुलनात्मक सत्य। वे कहते हैं कि "मैं ही जनक हूं, पिता हूं और हर चीज़ का उत्स मैं ही हूं।"

लेकिन कृष्ण की यह बात तब पूरी तरह समझ में आएगी जब हम कृष्ण की चेतना में पहुंच सकें। जब तक कृष्ण-चेतना में नहीं पहुंचते, तब तक तो यह एक मानना ही है; एक कल्पना ही है।

यदि ऐसा मान भी लें तो भी ठीक है। इस माने हुए सत्य को लेकर हम आगे के श्लोक और आगे के अध्यायों का अध्ययन करेंगे और अचानक हम परिणिति से पाएंगे कि जो हमने माना था वह सत्य ही था। एक बार यदि समस्या का समाधान हो गया तो जो कुछ हमने माना था वह स्वयंमेव ही सत्य सिद्ध हो जाएगा। कृष्ण भी यही एक सत्य मानते हैं जिससे हम उस सत्य को समझ सकें।

में प्राकृतिक गुण

  • हे महाबाहो! सत्वगण, रजोगण और तमोगण-ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं।

  • हे निष्पाप! इन तीनों गूणों में सत्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश वाला और विकार रहित है-वह सुख को संबंध से और ज्ञान के अभिमान से बांधता है।

  • तथा हे कौन्तेय! रागरूप रजोगुण को, कामना और आसक्ति से उत्पन्न हुआ जान। वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फलों की आसक्ति से बांधता है।

  • और हे भारत! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य में निद्रा द्वारा बांधता है।

      1. इंद्रियों और अंत:करण की व्यर्थ चेष्टाओं का नाम 'प्रमाद' है।
      1. कर्त्तव्य कर्म में अप्रवृत्ति रूप निरुद्यमता का नाम 'आलस्य' है।

हम तीन प्रकार को जमी हुई विभिन्न स्मृतियों को द्वारा अपना क्रिया-कलाप संपन्न करते हैं। प्रथम है सत्त्व, दूसरा है राजस और तीसरा है तमस। इसको शुभता, वासनात्मकता और अज्ञान के क्रमश: प्रतीक मान सकते हैं। सत्त्व उन संस्कारों से जुड़ा है जिनसे हमें आनंद की प्राप्ति होती है। राजस का संबंध उन गहरी स्मृतियों से होता है जो हमें बेचैन करती हैं और हमें पूरी शिद्दत से काम करने को प्रेरित करती हैं-ये हमें पादार्थिक रूप से उत्पादनशील बनाती हैं। तीसरा गुण है तमस, जिसका संबंध उन गहरी स्मृतियों से होता है जो हमें अवसाद देती हैं और आलसी बनाती हैं।

अपने संस्कारों से परे जाएं

यह तीन प्रकार की जमी और गहरी स्मृतियां या संस्कार हमारे संपूर्ण में किसी आदत के गुलाम बनाने के पीछे यही तथ्य काम करता है। यही हमें किसी चीज़ का आदी बनाता है।

कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि कैसे हम इन तीन स्तर वाली स्मृतियों में फंसते रहते हैं और कैसे वे हमें खींचती रहती हैं। यह तो वैसा ही है जैसे मानो हमारी तीन पत्नियां हों। जब एक पत्नी हो तो प्रबोधन हमारे लिए एक विलास (लग्जरी) है। यदि दो पत्नियां हों तो प्रबोधन हमारे लिए एक विकल्प बनकर उभरता है, लेकिन जब तीन पत्नियां हों तो प्रबोधन हमारे लिए अत्यावश्यक हो जाता है। यदि किसी के पास तीन पत्नी या तीन पति हों तो बिना प्रबोधन प्राप्ति के विस्तार संभव नहीं होता। तब प्रबोधन अपरिहार्य हो जाता है।

यहां कृष्ण बताते हैं कि कैसे इन जमी गहरी स्मृतियों या संस्कारों को साथ जीवन-यापन किया जाना चाहिए। एक अत्य महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि चूंकि ये जमी स्मृतियां जीवन्त ऊर्जा का रूप होती हैं, इनका प्रयोग हम शुभ या अशुभ कार्यों को लिए समान रूप से कर सकते हैं।

यदि किसी को पास ऊर्जा है बुरे काम को करने के लिए तो हम उस ऊर्जा को अच्छे कार्यों की ओर मोड भी सकते हैं। मैं कारागारों में जाकर ध्यान पद्धति सिखाने के अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि किसी कैदी से ज्यादा ध्यान करवाने के लिए कोई प्रयत्न या चेष्टा नहीं करता। हम प्राय: अपने ध्यान के प्रोग्राम जेलों में करते हैं। कैदी लोग इस प्रक्रिया में इतने संलिप्त हो जाते हैं कि साधारण जनों की तुलना में वे गहरा ध्यान लगाने में ज्यादा सक्षम रहते हैं। जब कैदी ध्यान से उठते हैं तो वे इसका प्रभाव ज्यादा दिखाते हैं। वे पूरी शिद्दत से ध्यान करते हैं। वे कोई काम आधे मन से शायद करते भी नहीं हैं, इसलिए

जब वे बदलते या सुधरते हैं तो उनका जीवन पूरी तरह से बदल जाता है। जब हम महान हिंदू ऋषि वाल्मीकि या एक अन्य महान संत अरुण गिरिनातर के जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि उनमें से ज्यादातर बड़े पापी थे, परंत उनके जीवन में एक आमूल-चूल या संपूर्ण परिवर्तन आ गया था। उनका पूरा जीवन ही नहीं, अस्तित्व ही बदल गया था। यह बदलाव उसी शिद्दत से आता है जिस शिद्दत से हमारा मस्तिष्क या मन प्राप्त सूचनाएं-आंकडे (या भाव) ग्रहण कर उनको संस्कारित कर उनकी परिणति दिखाता है। जब यह संज्ञानित बदलाव होता है तो हमें जो आंकडे मिलते हैं, उनको हम प्रक्रिया में डालकर उसकी दिशा निर्धारित करते हैं। बदलाव को अवस्था में यह प्रक्रिया अंदर से बाहर नहीं, वरनू बाहर से अंदर की ओर होने लगती है। जब तक प्रतिक्रिया बहिर्मुखी रहती है, हम अवसाद की ओर जाते रहते हैं, पर जैसे ही यह अंतर्मुखी होती है, हम आनंद की अनुभूति पाने लगते हैं।

जीवन के नियंता होते हैं। इनका ज्ञान ही वह मूलभूत ज्ञान है जो सफल जीवन-यापन की कामना करने वाले के पास अवश्य ही होना चाहिए। आयुर्वेद की पूरी पद्धति इन्हीं तीन गुणों के आधार पर चलती है, जो हमारे शरीर-मन तंत्र को प्रभावित करती है। यह एक तरह का 'ऑनर्स मैनुअल' (प्रयोगकर्त्ता के लिए निर्देश पुस्तिका) है मन के परिप्रेक्ष्य में (अर्थात् इन गुणों के प्रभाव में हर व्यक्ति अपने मन को किस प्रकार संचालित करता है)। किसी भी उत्पाद (वस्तु) का यदि हमें 'ऑनर्स मैनुअल' प्राप्त नहीं होगा तो, या तो हम उस उत्पाद की उपादेयता से वंचित रहेंगे या उस उत्पाद का प्रयोग सही रूप में नहीं कर पाएंगे।

कंप्यूटर के आजकल असंख्य उपयोग एवं फीचर्स प्रचलित हैं। एक सादा कैलक्लेटर के ऐसे सैकड़ों उपयोग हो सकते हैं जिनका हमें ज्ञान नहीं होता। हम तो सिर्फ उसे सादा जोड-बाकी-गुणा-भाग का ही प्रयोग करते हैं और इसको अन्य उपयोगों से वंचित रह जाते हैं। इसी प्रकार हम अपने मस्तिष्क की क्षमता या उसकी योग्यताओं से परिचित नहीं रहते, क्योंकि हमारे पास भी 'ऑनर्स मैनुअल' नहीं होता। इन तीन प्रकार की जमी हुई गहरी स्मृतियों या संस्कारों से हमारे दिमाग के सोचने-समझने का तरीका या 'ऑनर्स मैनुअल' बनता है। चूंकि हम इन मूलभूत गुणों से पूरी तरह वाकिफ़ नहीं होते, जीवन में संभाव्य क्षमताओं के बारे में हम बिल्कुल आंशिक रूप से अवगत हो पाते हैं; यदि हमारे पास 'ऑनर्स मैनुअल' हो, हम जीवन के विविध सौंदर्य और क्षमताओं को अच्छी प्रकार जान सकते हैं। इसके अभाव में हम इस ज्ञान से वंचित ही रह जाते हैं।

सतही तौर पर यदि देखें तो संस्कार एक गहरी जमी हुई स्मृति है, जिसके प्रभाव से हम बाधित रहते हैं चले-चलाए पथ पर दोबारा चलने के लिए और इस प्रकार हम एक बंधे चक्र में ही घूमते रहते हैं और बार-बार उस पथ पर चलते हुए हम उन जमी हुई स्मृतियों को उत्तरोत्तर गहरा करते रहते हैं। आधुनिक विज्ञान इस प्रक्रिया को समझाता है-प्रयोगों से सिद्ध हो चुका है कि एक से ही भावनात्मक अनुभव मस्तिष्क में उस भाव को ग्रहण करने के कई स्वीकार-तंतु (रिसैप्टर्स) पैदा करता रहता है। शरीर शास्त्र विज्ञान यह बताता है कि हम जितना क्रोध दिखाएंगे, उतने ही उस क्रोध के स्वीकार-तंतु दिमाग में ज़्यादा विकसित होते रहेंगे। हमारे महान ऋषिगण हज़ारों वर्ष से इस तथ्य को समझते रहे हैं। यदि हम कुछ मनोभावों की अभिव्यक्ति नहीं करें तो धीरे-धीरे उस भाव-बोध को ग्रहण करने वाले स्वीकार-तंतु स्वयं ही मस्तिष्क से निरोहित होते चले जाएंगे अर्थात् हम जितना ऋणात्मक भाव बोध से बचेंगे, उतना ही वे हमें कम परेशान करेंगे। इसके विपरीत जितना अधिक हम उसको अभिव्यक्त करेंगे, उतने ज्यादा वे हमें उनको अभिव्यक्त करने के लिए आदी बनाते जाएंगे।

उदाहरण के लिए जब हमारे किसी घनिष्ठ साथी या संबंधी की मृत्यू होती है तो हम या तो आध्यात्मिक होने लगते हैं या हताशा हम पर हावी होने लगती है। हम सोच सकते हैं-''खैर! मरना तो मुझे भी है तो मैं क्यों न वह करूं जो मैं चाहता हूं।'' या हम निर्णय कर सकते हैं-''मैं भी तो एक दिन मरूंगा तो मैं जो सीख सकता हूं, सीख लूं और अपनी वृद्धि सुनिश्चित कर लूं।''

एक लघु कथा

एक आदमी को फांसी दी जाने वाली थी। वहां का (जेल का) अधिकारी आया और उसने उस व्यक्ति से पूछा कि क्या उसको कोई अंतिम इच्छा है? उस कैदी ने कहा-"नहीं।" तो उस अधिकारी ने कहा-"फिर तुम ईश्वर से प्रार्थना कर लो और उससे क्षमा मांग लो तथा कृपा की याचना कर लो। हम एक पुरोहित को भी इसके लिए यहां ला सकते हैं।"

उस कैदी ने कहा-''मैं ईश्वर को याद तो करना चाहता हूं, पर वैसे नहीं जैसे तुम कह रहे हो। यदि मुझे मालूम होता कि मुझे अपने अपराधों के लिए यह सजा मिलेगी तो मैं कुछ और भी अपराध कर लेता।''

वह फिर बोला-"यदि मालूम होता कि फांसी मिलेगी तो कुछ और अपराध भी कर लेता, जो मैं करना चाहता था। इसलिए मैं यदि ईश्वर को याद करूंगा तो उससे कहुंगा कि उसने पहले मुझे क्यों नहीं आगाह किया कि मैं फांसी पर लटकाया जाऊंगा। इसके लिए मुझे पुरोहित की क्या जरूरत होगी?'' जब लोग समझ लेते हैं कि मृत्यू तो अवश्यंभावी है तो वे सोचते हैं-''यदि मृत्यू ही चरम अंत है तो क्यों न मैं ईश्वर की ओर ध्यान लगाकर आत्मलीन हो जाऊं और ईश्वरत्व को प्राप्त कर लूं, परंतू कुछ लोगों की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग होती है। वे सोचते हैं-''मरना तो है ही तो क्यों न मैं अपने मन की इच्छा पूरी कर लूं जो मैं हमेशा करना चाहता था।'' इनमें प्रथम प्रतिक्रिया वाले लोग ध्यान की ओर आकर्षित होते हैं और दूसरी प्रतिक्रिया वाले बाहर के विश्व में दूने जोर से लिप्त हो जाते हैं। यानी हम जो पथ चुनते हैं वह हमारी अपनी रुचि को अनुसार होता है।

कृष्ण बताते हैं कि कैसे गहन स्मृतियां हमारे मन की प्रतिक्रिया पर प्रभाव डालती हैं और यह समझ ही वह रास्ता है जो हमारे अस्तित्व को पूरी तरह बदल सकती है।

इन श्लोकों को समझाने के पूर्व मैं आपको एक छोटे से रेखाचित्र (डायाग्राम) को माध्यम से यह दिखाना चाहता हूं कि कैसे 'एन्ग्राम' हमारे निर्णयों को प्रभावित करते हैं और कैसे हम इनके प्रभाव क्षेत्र से बाहर आ सकते हैं।

पहले यह समझ लें कि कैसे हमें सूचना मिलती है (या कैसे आंकडे प्राप्त होते हैं) और पहले हम कैसे इन्हें प्रक्रिया में डालकर अपने निर्णय लेते हैं। पहले हम अपनी आंखों के माध्यम से कुछ देखते हैं। मैं यहां दृष्टि का उदाहरण ले रहा हूं, आप चाहें तो आप इसको किसी अन्य इंद्रिय से प्राप्त बोध द्वारा प्रतिस्थापित कर सकते हैं-यथा श्रवण, घ्राण-शक्ति, स्वाद लेना या स्पर्श। इन पांचों ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त कोई भी बोध यहां प्रयुक्त किया जा सकता है।

  • बाहरी विश्व और हमारे बीच ज्ञान बोध प्रदान करने वाली पांच ज्ञानेन्द्रियां और पांच कर्मोन्द्रियां होती हैं जिनसे हमारा संप्रेषण कायम होता है। ज्ञानेन्द्रियां यानी पांच बोध प्रदायक स्रोत जो गंध, स्वाद, दृश्य, स्पर्श और श्रवण द्वारा हमें बाहरी विश्व का परिचय देती हैं। पांच कर्मेन्द्रियां हैं जो हमारे नकारने संतानोत्पत्ति, चलने-फिरने, किसी चीज़ को पकड़ने और बोलने के काम को करती हैं। हर इंद्रिय एक ऊर्जा केंद्र (चक्र) से संबंधित होती है, जो हमारे मन-शरीर तंत्र में स्थापित रहते हैं। उदाहरणार्थ, चलना-फिरना 'मणि-पूरक चक्र' से संबंधित रहता है ( अर्थात् इस चक्र से जो हमारे पेट के क्षेत्र में स्थापित रहता है) तथा जिसकी ऊर्जा अग्नि रूप में मिलती है।

ऊपर दिए गए चित्र में हम आंखू की जगह किसी अन्य ज्ञानेन्द्रिय को स्थापित कर सकते हैं। आंखों को द्वारा हम दुश्य देखते हैं। मान लीजिए हम अपनी आंख द्वारा इस प्रवचन को देख रहे हैं। आप इसमें मुझे प्रवचन देते हुए देख सकते हैं। सबसे पहले आंख इस पूरे दुश्य को एक चित्र रूप में देखती है जो फिर चक्षु में जाता है (अर्थात् उस ऊर्जा क्षेत्र में जो आंख के पीछे होता है) यह समझ लें कि हम आंख से नहीं वरन आंख के माध्यम से देखते हैं। इसी प्रकार एक ऊर्जा क्षेत्र कान के पीछे होता है जिससे हम सुनते हैं। कान अपने आप तो नहीं सुन सकते। इसलिए जब हम कोई रोचक पुस्तक पढ़ रहे हों तो हम न अलार्म सुन पाते हैं, न दरवाजे की घंटी। जब हम पढ़ने में दत्तचित्त हो तो हम अपनी पत्नी का कमरे में आना भी नहीं सुन पाते। बेशक, जब रात को देर हो जाए तो सारी पत्नियां जान जाती हैं कि उनके पति कब चोरी से घर मे प्रविष्ट हुए! वह बात अलग है।

एक आदमी उस चोर से मिलने को पुलिस चौकी गया, जिसने पिछली रात घर में चुपचाप घसकर सारा नकद और सामान चुराया था। पुलिस अधिकारी ने कहा-''तुम उससे यहां नहीं मिल सकते, चाहो तो कल कोर्ट में मिलना।'' उस आदमी ने अननय करते हुए कहा-''अरे! मैं तो उसे बिल्कुल परेशान नहीं करना चाहता। मैं तो केवल यह पूछना चाहता हूं कि वह बिना मेरी बीवी को जगाए घर में कैसे घूसा। मैं तो बरसों से यह प्रयत्न करता आ रहा हूं, पर सफल नहीं हो पाया। उसने यह किया कैसे?''

तो आंख में एक ऊर्जा होती है जो देखने की शक्ति प्रदान करती है। इस ऊर्जा को ही हम चक्ष कहते हैं। वस्तृत: यह पूरा दुश्य एक फाइल में तबदील हो जाता है जैसे कि डिजिटल सिग्नल प्रोसेसर में (कंप्यूटर में) होता है, जिससे मस्तिष्क उन आंकडों या सूचना को प्रोसेस कर सके।

च चक्षु बिल्कुल इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स के डी.एस.पी. या डिजिटल सिग्नल प्रोसेसर की तरह काम करते हैं। यदि हमें किसी ध्वनि या प्रकाश या फोटोग्राफ पर काम करना है तो पहले उसे डिजिटल फाइल में बदलना होगा। कंप्युटरों में चाहे कोई ध्वनि की या दुश्य की फाइल हो, उसे सर्वप्रथम डिजिटल फाइल में बदला जाएगा। इसी प्रकार हमारे शरीर-मन तंत्र में जो भी हम देखते या सुनते हैं, सर्वप्रथम एक जैव-संकेत (बायो सिग्नल) फाइल में बदला जाता है, जैसे

इजिटल फाइल कंप्यूटर में बनती है। यह प्रसंस्करण या प्रोसेसिंग चक्ष् के क्षेत्र में होता है। फिर वह फाइल कदम-दर-कदम ऊपर उठती जाती है। यह फाइल मस्तिष्क के उस क्षेत्र में जाती है जिसे चित्र (स्मृति) कहा जाता है। यदि हम यह समझ लें तो हमारा सारा जीवन बदल सकता है। तब हम समझ लेंगे कि हमें कब और कहां अपनी प्रतिक्रिया दिखानी चाहिए। तभी हमारी समझ में आएगा कि हम अपने कितने निर्णय सिर्फ एक अनुमान पर लेते हैं और बाद में कष्ट पाते हैं।

पहले बताई गई लघु कथा (जिसमें विद्यार्थी शिक्षिका को भेंट देते हैं) में यही हुआ था-वह शिक्षिका डिब्बे से बाहर बहकर आ रहे द्रव को एल्कोहल ममझी थी, बिना सोचे कि यह क्या है। हम पीछे दिए गए चित्र में पूरी प्रक्रिया समझकर पता कर सकते हैं कि क्यों हम ऐसी गलतियां कर बैठते हैं। फिर यह फाइल 'चित्त' में जाती है जहां विगत की स्मृतियां एकत्रित रहती हैं। यही वह जगह है जहां 'छंटनी' की प्रक्रिया होती है-'न इति - न इति - न इति ... (अर्थात् 'यह नहीं ... 'यह नहीं')। यह प्रक्रिया यहां चलती रहती है। यहां पर चित्त उन चीज़ों या दुश्यों या स्मृतियों को न करता है।

आप उपलब्ध दुश्य का ही उदाहरण ले लें। यह पूरा दुश्य एक चित्र (फोटोग्राफ) में बंधता है। यहां से यह चक्षु-क्षेत्र में जाता है और एक 'जैव-संकेत' ( बायो सिग्नल) फाइल बनता है। चित्त कहता है-''यह न कोई पेड है न जानवर; न कोई पौधा है। यह वह चीज नहीं है।'' यह छंटनी यहीं चक्षु में होती रहती है।

यह वैसा ही है मानो शब्दकोश में हम 'गाय' शब्द को ढूंढें। पहले हम सारे शब्दों को त्यागकर 'ग' शब्द पर ध्यान कोंद्रित करते हैं-फिर 'गा' पर केंद्रित करते हैं और अंतत: 'य' शब्द को 'गा' के साथ ढूंढते हैं। इस प्रकार हम 'गाय' शब्द को छांट लेते हैं। ऐसे ही 'चित्त' क्षेत्र में काम होता है।

इसके पश्चात् फाइल 'मानस' यानी मस्तिष्क के दूसरे हिस्से में जाती है।

मानस धनात्मक रूप से पहचान करता है-''यह एक मनुष्य है, यह भगवा वस्त्र धारण किए है और एक 'स्टेज' पर खड़ा है।'' यानी यह पहचान को प्रक्रिया-''इति-इति (अर्थात् यही है - यही है) मानस में आरंभ होती है। चित्त में 'नेति-नेति' होती है और यहां 'इति-इति'। इस प्रकार सही पहचान की प्रक्रिया आरंभ रहती है।

जब पक्की पहचान हो जाए तब यह फाइल मस्तिष्क को तीसरे हिस्से 'बुद्धि' में जाती है। सारी समस्या यहीं प्रारंभ होती है। यहां विश्लेषण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है-''मैं इस फाइल से कैसे संबंधित हूं? इस दृश्य से मेरा क्या जुड़ार है? यह मेरे लिए क्यों 'प्रासंगिक' है? इस दृश्य पर मेरी क्या प्रतिक्रिया होन चाहिए?'' यदि मेरे बारे में आपकी स्मृतियां सुखद और अच्छी हैं या आपको बौद्धिक चेतना उन्हें 'भला' बनाती हैं तो आपकी प्रतिक्रिया धनात्मक ही रहेगी आप अपनी सारी विगत स्मृतियों को देखकर कहते हैं-"कल के प्रवचन में तो यह अच्छा लगा था।'' आपकी बुद्धि विगत स्मृतियों में इसको छांटती है तथा अपने पूर्व अनुभव के आधार पर अपना निर्णय लेती है। यदि विगत का आपका मेरे बारे में अनुभव धनात्मक रहा है तो आपकी बुद्धि कहती है कि यहीं रुको और (मुझे) सुनो! यदि आपका पिछला अनुभव बताता है कि आप 'बोर' हुए थे तो आपकी बुद्धि कहती है कि यहां रुकना नहीं है। यहां से निकल लो। यह आपकी चेतना के निर्णय होते हैं, जो मन की विगत स्मृतियों के आधार पर लिए जाते हैं।

इस बिंदू तक तो संप्रेषण तुलनात्मक रूप से सीधी-सीधा होता है-अर्थात जो दुश्य आपने देखा और जो मस्तिष्क ने रजिस्टर किया। ये एक चेतन-प्रक्रिय है। मैं चेतन और अचेतन मस्तिष्क के बारे में पहले बता चुका हूं। मनोवैज्ञानिक एक अवचेतन मस्तिष्क की भी बात करते हैं। वस्तुत: इसका कोई अस्तित्व नहीं होता। इसका प्रयोग तो आपको संशय में डालने के लिए किया जाता है।

यदि इंद्रिय बोध के द्वारा प्राप्त 'डाटा' ( आंकड़े ) की 'प्रोसेसिंग' इस चेतना स्तर पर रोक दी जाती है-अर्थात् बुद्धि को स्तर पर-तो हमारे निर्णय चेतना-स्तर पर बुद्धि के द्वारा लिए जा सकते हैं। यह ठीक है, पर यह हमें सीमित करती है क्योंकि हमारा चेतन मस्तिष्क, पूरे मस्तिष्क सामर्थ्य का मात्र 10 प्रतिशत ही होता है। इसको हम कहते हैं बुद्धि के आधार पर निर्णय लेना. यानी यह सारे निर्णय विश्रू तर्क या हमारी समझ के आधार पर बनी 'तुक' से संचालित होते हैं। हमें इस उपलब्धि पर गर्व भी होता है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक डेकर्ज का कहना था-''मैं सोचता हूं कि मैं हूं, इसलिए हूं।'' पर यह कहते हुए उसने यह नहीं समझा कि इस प्रकार हम अपने कुल सामर्थ्य का मात्र 10 प्रतिशत ही प्रयोग में ला रहे हैं। है न अफसोस की बात!

चूंकि हमारे चेतन-मानस मस्तिष्क की सामर्थ्य सीमित होती है, इसलिए प्रकृति हमें प्रेरित करती है कि हम अपने अचेतन मस्तिष्क को भी प्रयोग में लाएं, जिसके द्वारा हम कई निर्णय लेते हैं, परंतु यह अचेतन मस्तिष्क पूर्व अनुकूलित या 'कंडीशन्ड माइंड' होता है। इसमें पुरानी जमी स्मृतियों का अम्बार लगा रहता है, जिसमें शामिल होते हैं-हमारे पूर्वाग्रह, धारणा, विश्वास, मूल्यों का आकलन जो बचपन से हमारे बोध में ठूंसे जाते रहे हैं, यानी वह सब कुछ

जो हमारे मां-बाप, बुजुर्गों या गुरुओं ने हमें बताया है या जो हमारी धार्मिक ... आस्था ने हमें दिया है या कच्ची आयु से जो हमारी सामाजिक मान्यताओं ने हमें सिखाया है-उन स्मृतियों को तिजोरी में भरा रहता है, जो हमारे सामने पूरी कभी नहीं खुलती। यह तो अपनी मर्जी से खुलती है-ख़ासतौर पर जब हम किसी सदमे या आघात से गुज़र रहे होते हैं। जिस प्रकार जब हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति के क्षीण होने पर वायरल और बैक्टीरिया हम पर आक्रमण करने लगते हैं, वैसे ही इन एन्ग्राम और संस्कार को वायरस हम पर प्रभावी होते हैं जब भावनात्मक रूप से हम कमज़ोर हो जाते हैं। भारत

अहम् निर्णय लेता है

संस्कार सिर्फ एक जीवनकाल में ही इकट्ठे नहीं होते। ये मानसिक प्रवृत्तियां तो पिछले कई जन्मों से इकट्ठी होती रहती हैं। स्नायू तंत्र के विशेषज्ञ हमें बताते हैं कि हमारे मस्तिष्क का एक भाग होता है 'रैप्टीलियन ब्रेन' जिसमें हमारे जलचर अस्तित्व और जल-थलचर धरास्तित्व से लेकर आज तक हुए विकास-क्रम की सारी स्मृतियां एकत्रित रहती हैं। एक विमान मिशा भारत

चेतन मस्तिष्क से सूचना अचेतन मस्तिष्क को हिस्से में भेजी जाती हैं, जो हमारी 'ईगो' या 'अहम्' का क्षेत्र है। शिक्ष्म मान्य कि मान्य कि माणि एक

मैं इस अचेतन क्षेत्र को अहम् का क्षेत्र इसलिए मानता हूं कि न सिर्फ़ यह घमंड देता है. वरन हमारी अस्मिता को पहचान भी उजागर करता है। वस्तुत: यह शब्द 'ईगो', एक ग्रीक शब्द से बनाया गया है जिसका मतलब होता है 'एक मखौटा'। अत: आपकी अस्मिता आपके द्वारा ओढ़ा हुआ एक मुखौटा-भर है-वह आपकी सही पहचान नहीं है।

अर्थात् आपकी पहचान का स्रोत है आपका अचेतन मस्तिष्क। आप स्वयं को उस रूप में प्रक्षेपित करते हैं, जो आप चाहते हैं कि आप हों, उसमें नहीं जो वास्तव में आपका सही रूप है, पर आपको सही रूप में यह भी नहीं मालूम होता कि आप क्या हैं। आपका असली रूप तो आपके अचेतन में गहरा दबा हुआ है। आपको जीवन के सारे महत्वपूर्ण निर्णय, जिनसे आपकी ज़िंदगी की पहचान होती है, इसी अचेतन क्षेत्र से निकलते हैं। यही वह क्षेत्र है जिसमें आपकी सारी भावपूर्ण स्मृतियां, स्वयं को बारे में विश्वास और अवधारणाएं एकत्र करती रहती हैं; जो आपको आपकी पहचान देती हैं; आपकी अस्मिता बनकर उभरती हैं। इसी को मैं 'ईगो' (या अहम्) कहता हूं।

आपका चेतन मस्तिष्क महत्त्वपूर्ण निर्णय नहीं लेता। यह तो वह थोड़े निर्णय लेता है जो आपको सीमित बुद्धि सोच सकती है। जहां कोई महत्वपूर्ण निर्णय की बात आई तो यह फाइल अचेतन में 'अहम्' (ईगो) की ओर चल जाती है। हमारा अचेतन सारे जीवन को ख़तरा पैदा करने वाले अवसर या 'लड़ो या भागो' वाले निर्णय का नियंता होता है, क्योंकि हमारा चेतन मस्तिष्क इतन धीरे काम करता है कि वह इन्हें निपटा ही नहीं सकता।

आइए, हम पुन: आपके द्वारा यहां मुझे निहारने के उदाहरण को ंगेंद समस्या तब प्रारंभ होती है जब आपका चेतन मस्तिष्क सीधे-सीधे निर्णय नहीं ले पाता। यदि आपका भगवाधारियों के साथ विगत का अनुभव अच्छा नहीं है तो आपके मन में ऐसे ही एन्ग्राम (संस्कार या उस समय की समझ) भी वैसे ही बनेंगे। आप यह देखने का प्रयास भी नहीं करेंगे कि देखें तो यह व्यक्ति कौन है, कैसा है? उसी स्मृति के आधार पर आपका त्वरित निर्णय होगा-''नहीं-नहीं-इस स्वामी के साथ तो मैंने कष्ट पाया था ... उसके साथ तकलीफ रही थी।'' इस प्रकार आपकी भगवा वस्त्रधारियों के प्रति एक आम धारणा इसी प्रकार को बन जाएगी। आपका यह निर्णय विगत के कई अनुभवों के निचोड़ या संस्कारों के आधार पर बन जाएगा।

और यहीं समस्या उठ खड़ी होती है। जब निर्णय सीधी समझ के आधार पर लिए जाते हैं तो कोई बड़ी समस्या पैदा नहीं होती, पर ज्यादातर समय हमारे ज्यादा निर्णय उन्हीं एन्ग्राम या संस्कारों के आधार पर लिए जाते हैं जिनका आपस में कोई संबंध नहीं होता।

उदाहरण को लिए आपने किसी को श्वेत पोशाक में देखा। यदि विगत में किसी श्वेत पोशाकधारी ने आपको चोट पहुंचाई है तो श्वेत पोशाक को देखते ही वह स्मृति आपके मन में कौंध जाएगी, भले ही आप ऐसा करना न चाहें।

इसी प्रकार यदि किसी घर में हमें कभी बेइज्जत किया गया है तो अगली बार जब हम उस घर में जाएंगे तो वही स्मृति सबसे पहले कौंधेगी, चाहे वहां का वर्तमान स्वामी कोई और व्यक्ति ही क्यों न हो। हम वहां पहुंचते ही एक आहत भाव में आ जाएंगे और हमारा मन खटूटा हो जाएगा।

। हम अपना संबंध चीजों और जगहों से भी जोड़ लेते हैं। वहां कुछ ऐसे ख़ास बिन्दु होते हैं जो हमारी स्मृति-शुंखला को जागृत कर देते हैं। वहां स्मृति और गहरी होती है और हम स्फूर्त रूप में तुरंत अपना काम नहीं कर पाते। इसके लिए हमें ऐसा कुछ करना पड़ेगा कि किसी भी तरह से हमारा 'प्रोसेसिंग' का कार्यकाल कम हो जाए। इसके लिए हम अपनी स्मृति में ही कोई व्यवस्था करना चाहेंगे और इस प्रकार हम वास्तविक जीवन से कट जाएंगे और उतनी देर को वास्तविकता से वंचित रहेंगे। राजधान के देश के काम कि कि कि

शादी के प्रारंभिक कुछ दिनों में ही हमारा अपनी पत्नी के प्रति बर्ताव सहज स्फूर्त होता है। कुछ महीनों बाद हमारा एक स्पष्ट विचार बनने लगता है उसके व्यक्तित्व के प्रति। उसके बाद तो हम अपने जीवनसाथी को साथ सही रूप में नहीं रहते हैं। फिर तो हम उसके साथ हमारी बनाई हई कल्पना या अनुमान को साथ रहते हैं, सही रूप में उसके साथ नहीं। यानी हमने उसका एक रूप अपने अनुभव और कल्पना के आधार पर बना लिया और उसी के साथ. रहने लगे और तब जो भी हमारा जीवनसाथी करता है वह हमें गलत ही लगता है, क्योंकि हमारा एक पूर्वाग्रह बन जाता है और हमें उसका हर काम गलत ही लगने लगता है। यदि कभी सही लगा भी तो हम कहते हैं यह गलती से हो गया होगा।

इसी प्रकार जीवन में अन्य व्यक्तियों के साथ भी हम अपनी धारणा बना लेते हैं। अपने निर्धारण के आंधार पर लोगों के बारे में एक एन्ग्राम बना लेते हैं और उन लोगों का हर क्रिया-कलाप हम उसी एन्ग्राम की छलनी से छानकर ही देखते हैं। कभी-कभी तो हम ऐसे एन्ग्राम या जमी स्मृतियों को दूसरों को अनुभव और मीडिया को प्रभाव के अनुसार भी ढाल लेते हैं या दूसरों की राय के आधार पर अपनी धारणा बनाने लगते हैं।

एक लघु कथा

एक बार एक आदमी दो कुत्तों (बुल डॉग) को साथ एक शव यात्रा के आगे-आगे चल रहा था, पीछे काफी लोगों का हुजूम था। एक राहगीर को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह आदमी कृत्तों के साथ और शव यात्रा में इतने लोग! उसने उस आदमी, जो कुत्तों को पकड़े हुए था, से पूछा-''यह लाश किसकी है?''

"मेरी सास की" उत्तर मिला।

"क्या वह बहत लोकप्रिय थीं?"

"पता नहीं।'' जवाब मिला।

" और ये कुत्ते क्या उनके पालतू थे ?''

"नहीं! यही वे कुत्ते हैं जिन्होंने आक्रमण कर मेरी सास को मार डाला।''

िया ''मार डाला?''

" हां।'' हां।'

राहगीर ने कुछ सोचकर फिर पूछा-''क्या दो दिन को ये कुत्ते मुझे उधार दे सकते हो?''

आदमी ने कहा-''भीड़ के पीछे कतार में आओ। यह भीड़ भी उन्हीं को है जो इन कत्तों को पाना चाहते हैं।''

जब हम अपने संबंधों में पूर्वाग्रहों के साथ जीते हैं तो ऐसा ही होता हम कई स्मृतियां ऐसी भी इकट्ठी कर लेते हैं जैसे हमारे संबंधी नहीं होते, फ हम उनके साथ उन स्मृतियों को जोड़ देते हैं। हम सदा दूसरों को अपने पूर्वग्रह के लेंस से ही देखते हैं यानी पहले से निर्णय लिए विचारों के आधार पर हम उनका आकलन करते हैं।

लोग मूझसे पूछते हैं-"स्वामी जी क्या हमारा जीवन स्वच्छंद इच्छाशानित पर आधारित होता है या पहले से नियत रहता है?'' यह समझ लें कि जितने एन्याम (पूर्व धारणा या संस्कार) हमारे साथ रहेंगे, उतनी ही हमारी जिंदर्भ पूर्व-नियत हो जाएगी। वह इसलिए कि हम एक घिसे-पिटे ढरें पर ही चलते रहेंगे। जितने कम संस्कार या एन्य्राम होंगे, उतनी ही हमारी जिंदगी स्वतंत्र और स्वच्छंद होगी।

अर्थात संस्कारों की संख्या निश्चित करती है कि हमारी जिंदगी स्वतंत्र है या पूर्व-निर्धारित। उदाहरण को लिए हमारी फाइल ईगो (अहम्) के पास जाती है और अहम् ही निर्णायक होता है तथा उसका निर्णय ही हम मानते हैं। यदि ज्यादा एन्ग्राम होंगे तो फाइल हर मेज तक जाएगी, जैसा अमूमन नौकरशाही कार्यालयों में होता है। हर संस्कार अपनी मूहर लगाएगा, अपने हस्ताक्षर करेगा और अपनी राय देगा।

जिसके पास ऐसे एन्ग्राम ज़्यादा होते हैं, वे कभी चैन से नहीं बैठ सकते वे कभी शांत नहीं रहते। बाहरी रूप से इतनी बेचैनी का मुख्य कारण है उनके अचेतन मस्तिष्क में लगातार चलने वाली संस्कारों की उठा-पटक।

आप सिगरेट पीने का उदाहरण ही लें। चेतन मस्तिष्क के स्तर पर प्राप्त सुचना के अनुसार सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, यानी सीधी-सादी बात है। सिगरेट पीने से ख़तरा है, पर जब तलब लगती है तो हम फिर सिगरेट सुलगा ही लेते हैं।

पर फाइल इतनी जबरदस्त छलांग (क्वान्टमलीय) कैसे लेती है? कैसे निर्णय बिल्कल बदल दिया जाता है? जब वह फाइल अचेतन के क्षेत्र में आती है तो एन्‍ग्राम कह उठते हैं-''नहीं,-नहीं, पिछली बार तो जब मैंने सिगरेट पी थी तब बहुत अच्छा महसूस किया था। मुझे लगा था कि मेरे ऊपर से सारा दबाव हट गया।"

यदि आप दबाव से मुक्ति पाना चाहते हैं तो बजाय सिगरेट पीने के, एक कस के पहने जाने वाले जूते की जोड़ी धारण कर लें, क्योंकि जब जूता कार्टेगा तो सारी अन्य चिंताएं गायब हो जाएंगी। एक बड़ी समस्या जब सामने आती है तो छोटी अपने आप गायब हो जाती हैं, काटने वाला जूता सारी छोटी समस्याओं की छूट्टी कर देगा।

यहां अचेतन क्षेत्र में सारी विगत को स्मृतियां रहती हैं-''मैंने सिगरेट पी. बहुत अच्छा महसूस किया, चैन मिला। सारा दबाव गायब हो गया।'' हम अचानक ऐसे निर्णय लेते हैं जो हम नहीं लेना चाहते थे। यह सब इन्हीं अचेतन

स्मृतियों द्वारा ही होता है। हम इन्हीं गहरी जमी स्मृतियों को प्रभाव में असंख्य निर्णय लेते रहते हैं। अचानक हम चिल्लाते हैं और दस मिनट बाद ही अफसोस करते हैं-''मैं क्यों चिल्लाया था? मैं तो सदा हंसता हुआ चेहरा ही रखना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि लोग मुझे हंसमुख समझें। तब मैं क्यों चिल्लाया?'' इस प्रकार हम अफसोस करते रहते हैं। हम अचानक एक निर्णय ले लेते हैं। इन्हीं एन्ग्राम या संस्कार

(जमी हुई पूर्व स्मृतियों) के कारण अचानक हम ऐसे निर्णय लेते हैं। कष्ण यहां सत्त्वगुण संस्कारों की बात करते हैं, जो हमें शक्ति और आनंद की ओर ले जाते हैं; राजसिक गुण संस्कार जो हमें व्याकुलता और हिंसा देते हैं तथा उन तामसिक संस्कारों की, जो हमें अवसादग्रस्त करते हैं। वह आगे बताते हैं कि कैसे ये संस्कार हमारी निर्णय लेने को प्रक्रिया पर प्रभाव डालते हैं। युं समझें कि मानो हमारे रेडियो ने अचानक ठीक से काम करना बंद कर

दिया है और उसका संबंध तीन अलग-अलग चैनलों की आवृत्तियों (फ्रीक्वेंसीज़) से हो जाता है। एक चैनल किसी शृंगार प्रसाधन का विज्ञापन कर रहा है; दूसरा किसानों को कुछ निर्देश प्रसारित कर रहा है तथा तीसरा चैनल कोई मज़ेदार नाटक चला रहा है। इन सबका परिणाम हमें इस प्रकार सुनाई पड़ेगा-'' थोड़ा-सा पेस्टीसाइड छिड़ककर ... अपना चेहरा पोंछ लें। फिर अपने दांत ठीक प्रकार ब्रश करके... थोड़ा पेस्टीसाइड और मल लें...फिर अपने हाथ-पैर हिलाते हुए जोर से कदने-फांदने लगें।''

यदि हम इन तीनों संस्कारों को निर्देशों का मिला-जुला पालन करेंगे तो. सोचिए हमारा क्या हाल हो जाएगा, यानी हम तीनों अलग-अलग एन्ग्रामों-सत्त्व, रज और तम का एक साथ प्रयोग करेंगे तो हमारा जीवन तो नरक हो जाएगा। यह समझ लें कि बुद्धिमान व्यक्ति तो तर्क ढूंढते हैं कोई ताज़ा नतीज़ा प्राप्त करने के लिए, जबकि हम में से ज़्यादातर लोग अपने तर्क ढूंढते हैं अपने पूर्व निर्धारित निर्णयों को मजबूत करने के लिए।

यदि हम अपने जीवन पर ही निहार कर देखें कि कितनी बार हमने अपनी गलती स्वीकार की है। बेशक, अपने जीवन पर दृष्टि डालकर यह पता करना कि कब-कब हमने गलती को है, काफी बुद्धिमत्ता की मांग करना है। प्राय: हम अपने घमंड या अपराध भावना को कारण ही ऐसी प्रतिक्रियाएं करते हैं। हम कहेंगे-''तो क्या हुआ यदि हमने कोई गलती की?'' हम इसे एक ओर हटा देते

हैं। यह उसी बर्ताव का द्योतक है जो कहता है कि ताक़तवर सदैव सही रह है। दसरा बर्ताव होता है हमारे अंदर निहित एक अपराध भाव के कारण।

यह समझ लें कि एक निर्बुद्धि व्यक्ति कभी अपराध भाव नहीं महस्य करता। बेशक मैं आपसे कहता हूं कि इस भाव से भी मुक्ति पाओ-पर वह फ दसरे संदर्भ की बात है। केवल बुद्धिमान व्यक्ति, जो धर्म की बात जानता है ही अपराध भाव से ग्रसित होता है। वह व्यक्ति जो अपनी सहज प्रवृत्ति क प्रतिक्रिया (इन्सटिंक्ट) के अनुसार काम करता है, कभी अपराध भाव से ग्रीक नहीं होगा। अर्जुन और यूधिष्ठिर को अपराध भाव महसूस हो सकता है, दुर्यांध्य को नहीं। ऐसे लोग कभी स्वयं को अपराधी नहीं समझेंगे।

तो वह व्यक्ति जो बौद्धिक स्तर पर काम करता है, स्वयं को अपराधी महसूस कर सकता है और जो अपने अंदर की आवाज़ (सहज-अंतर्प्रज्ञा) के अनुसार कार्य करता है. वह तो इस अपराध भाव से भी परे चला जाता है क्योंकि वह जानता है कि सत्य क्या है और किस रूप में है। कृष्ण इन तीने सहज गणों (सत्त्व, रज, तम) को सही प्रकारं से संभालने की बात करते हैं औ बताते हैं कि कैसे उनका अधिकतम प्रयोग किया जा सकता है। इन गुणों मे अपने हिंत के लिए अधिकतम प्रभाव प्राप्त कर लेना ही बौद्धिक क्रिया का द्योतक है। हाल है।

एक लघु कथा - बा

एक छोटे बच्चे ने एक बार एक सिक्का निगल लिया। उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया। डॉक्टर ने बहुत प्रयास किया पर सिक्का बाहर नहीं आया। फिर नर्स ने भी प्रयत्न किया; पास खड़े उसके एक दोस्त ने भी बहत प्रयास किया, पर सिक्का नहीं निकला। तभी वहां से गुजरने वाले एक राहगीर ने कहा कि मैं निकाल दूंगा यह सिक्का। डॉक्टर ने कहा-''तुम कैसे निकालोगे!'' उसने कहा-''एक मिनट रुको!'' और उसने बच्चे से बात को, तुरंत ही वह मुस्कूराता हुआ आया और सिक्का डॉक्टर को दे दिया। डॉक्टर ने कहा-''अरे! मैं तो डॉक्टर होते हुए यह सिक्का नहीं निकाल पाया ... तमने कैसे निकलवाया ? ''

िक "अरे! मैं तो पैसा निकलवाने में पुराना उस्ताद हूं। मैं किसी से भी पैसा निकलवा सकता हूं।"

कृष्ण यहां तरक़ीब एवं युक्ति बताते हैं कि कैसे इन तीनों गुणों का सही और अधिकतम उपयोग किया जा सकता है। इससे पहले कि इन एन्य्म्मामों को स्तरों में अर्थात् तीनों संस्कारों-सत्त्व, रज, तम में हम प्रवेश करें, मैं आपको

बताना चाहता हूं कि हम इनमें कैसे फंसते हैं और ये कैसे काम करते हैं। फिर इम एक-एक कर इसकी तकनीकों को बारे में बात करेंगे।

शरीर में ऊर्जा की सात सतहें

हमारे शरीर मन-तंत्र में ऊर्जा की सात सतहें होती हैं। ये हमारे अस्तित्व के सात भागों की द्योतक हैं -

  1. भौतिक शरीर 2. प्राणिक शरीर 3. मानसिक शरीर 4. ईथरिक शरीर 5. कॉजल (कारणात्मक) शरीर
    1. कॉस्मिक शरीर
    1. निर्वाणिक (निर्वाणात्मक) शरीर

प्रथम है भौतिक शरीर यानी हमारा मांस-मन्जा वाला शरीर। उसके बाद प्राणिक शरीर, जिसमें होती हैं पांच प्रकार की ऊर्जाएं-प्राण, व्यान, उदान, अयान, समान या पांच प्रकार की वायु जो हमारे शरीर में घूमती रहती हैं। तीसरी सतह होती है मानसिक शरीर की, जहां हमारा मानसिक आंतरिक क्रिया-कलाप चलता रहता है। इसका रिकॉर्ड बनता रहता है, चाहे हम कुछ भी कर रहे हों, खड़े हों, बैठे हों या लेटे हों या कुछ भी नहीं कर रहे हों। कभी-कभी हम मूंह

श्रीमदुभगंवत गोता

खोलकर बातें करते हैं और कभी मुंह बंद करके भी वार्तालाप चालू रहता है अर्थात चाहे हम मुंह खोलं या नहीं खोलें-वार्तालाप तो चलता ही रहेगा। यह आंतरिक वार्तालाप मानासिक शरीर की सतह पर होता है-इसे 'चंचल' भी कह सकते हैं, जिसका अर्थ आंतरिक चलन-कलम होता है।

चतुर्थ सतह होती है ईथर वाले शरीर की। इस सतह में हमारे गहन भाव और कष्टदायक अनुभव इकट्ठे रहते हैं। प्राय: गहन भावों में पीड़ा और कष्ट के ही अनुभव होते हैं। इनके अलावा हम किसी गहन भाव से वाकिफ़ नहीं होते। यदि हम ऐसा कोई अन्य गहन भाव रखते हैं तो हम वाकई में एक आध्यात्मिक जीव हैं।

जब हम जीवन पर नज़र डालते हैं तो मालूम पड़ता है कि पीड़ा ही हमें गहन भाव दे सकती है। जब हम पीड़ा में हों या अवसाद ग्रसित हों तो हमारी भावना में शिद्दत आ जाती है और हमारा मन या मस्तिष्क केंद्रित हो जाता है। फिर हमारा ध्यान कहीं और नहीं जाता।

क्या आपने आनंद या कभी इतनी शिद्दत से महसूस किया है जितनी पीड़ा की अनुभूति में गहराई थी? नहीं न! यानी हम पीडा को ही गहराई से महसूस कर पाते हैं।

बौद्धिक रूप से हम ईथरीय शरीर के परे तीन शरीरों को नहीं समझ सकते। उनका अनुभव तो आध्यात्मिक रूप से ध्यान के माध्यम से ही हो सकता है।

प्राणिक सतह तो इच्छाओं-कामनाओं से भरी रहती है। मानसिक शरीर में " मुझे यह करना चाहिए था" सद्रश अपराध भाव ही रहता है। ईश्वरीय शरीर पीडा से पूर्ण रहता है। यह समझें कि ये तीनों भाव - कामना, अपराध बोध और पीड़ा के अनुभव - इन्हीं तीन सतह में भरे रहते हैं।

जब इन तीनों सतहों से उठने वाले भाव या कामनाएं पीडाएं विशुद्ध ही होती हैं तो वे सत्त्व, रज और तम का बोध करती हैं, जो भाव की गुणवत्ता पर मुख्यत: निर्भर रहता है। प्राय: ये विशुद्ध नहीं होतीं। वे आपस में मिली-जुली रहती हैं। हमें जानना चाहिए कि कैसे उनको शुद्ध करें। यदि हम अपनी कामनाओं को शुद्ध कर सकें तो हम मुक्त हो सकते हैं। हम इन्हें शुद्ध और पवित्र बनाकर सही मार्ग पर संचालित कर सकते हैं। यदि कामनाएं न हों तो हमारे लिए सांस लेना भी मुश्किल हो सकता है। बिना कामना या इच्छा के न हम सांस भर सकते हैं, न निकाल सकते हैं। वस्तुत: हम तो बिना कामना के जी भी नहीं सकते, इनको सही प्रकार संभाला जाना चाहिए। इनको सीधा या सरल करना जरूरी है। यदि हम ऐसा करेंगे तो हम सत्त्व की ओर बढ़ेंगे।

इसके बाद आता है राजस, जिसमें हमारे मन का अपराध भाव रहता है। "मुझे यह करना चाहिए था'' या "मुझे ऐसा कर लेना था'', "मैं यह तब नहीं कर पाया तो अब करूं'' जैसे विचार मन में उठकर हमारी व्याकुलता को और बढ़ा देते हैं। हम यही सोचते रहते हैं-''मुझे तब वैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी पर तब इतनी समझ नहीं थी।'' ''मुझे उसे एक सबक सिखाना चाहिए। अब मुझे मालम है कि मैं क्या कर सकता हूं।'' राजस गुण में इसी प्रकार के भावों विचारों का बाहल्य रहता है।

तीसरा वर्ग है पीड़ा का! चाहे हम सही करें या गलत, हमें यह मालूम होता है कि कैसे इसे पीड़ा पूर्ण बनाया जा सकता है। जो भी स्थिति हो उसमें पीडा का संचार कर देना, तमस की ओर जाना है।

हमारे शरीर-मन तंत्र की प्रथम चार सतहें इन तीनों गूणों से प्रभावित रहती हैं। कभी तीन सतहों को यानी इन चार सतहों के बाद - मन महसूस ही नहीं कर सकता। उनकी अनुभूति तो ध्यान में ही हो सकती है। पांचवीं सतह -कॉजल बॉडी (कारणात्मक शरीर) में हम राहत, स्वप्न विहीन निद्रा प्राप्त करते हैं। इसे शास्त्रों में 'कारण-शरीर' कहा जाता है। इसको अनुभूति गहन निद्रा में होती है। छठवीं सतह कॉस्मिक सतह होती है, जिसमें हर्षदायक या सुखद स्मतियां रहती हैं। अंतिम सतह होती है निर्वाणिक सतह, यानी वह सतह जो हमें निर्वाण को अनुभूति देती है।

फिलहाल तो प्रथम चार सतहों को ही याद रखें-भौतिक, प्राणिक, मानसिक और प्राणिक ऊर्जा वाली सतहें, क्योंकि अभी तो हम इन्हीं सतहों या स्तरों पर काम करेंगे।

कृष्ण भौतिक सतह की तो बात कर ही चुके हैं। अब वे बता रहे हैं सात्त्विक राजस और तामसिक गुणों के बारे में। सत्त्व का सीधा संबंध द्वितीय सतह यानी प्राणिक सतह से होता है; राजस का तीसरी सतह अर्थात् मानसिक शरीर से होता है और चौथी सतह-ईश्वरीय सतह तमस से जुड़ी रहती है। मैं बता चका हं सत्त्व का संबंध इच्छाओं या कामनाओं से होता है अर्थात् प्राण शरीर से। जब हमारी कामनाओं में परिवर्तन आता है तो हमारे प्राणों का बहाव या वायु घूमने की दिशा बदल जाती है। प्राण वह जीवन शक्ति है जो हम हवा के साथ श्वसन द्वारा प्राप्त करते हैं। हवा तो एक माध्यम है प्राण शक्ति प्राप्त करने का। यह प्राण शक्ति ही है जो हमारे अंदर जीवन कायम रखती है। इस प्राण में परिवर्तन तब आता है जब हमारी कामना परिवर्तित हो जाती है। उदाहरण के लिए यदि कभी हम वासना से उत्तेजित होते हैं तो हमारी सांस तेज़ी से आने-जाने लगती है। प्राण का शरीर में आना-जाना भी बढ़ जाता है, यानी किसी

ननकर कायम होते हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि हमारे पास शब्दों को ताकत हेने की क्षमता है। वे शब्द जो हमारे मन में गूंजते रहते हैं 'मंत्र' हो जाते हैं। जब दन्हें एक साथ कहा जाए तो वे सारे शब्द सम्मिलित रूप से हमारे जीवन में एक म्बरूप अख्तियार कर लेते हैं-ख़ासतौर पर जब वे एक साथ दोहराए जाएं। एक शब्द भी हमें वह करने को बाध्य कर सकता है, जो हम चाहते हैं।

शब्द जो हमारे मन में उभरते हैं वे काफी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, उदाहरण के लिए जब हम सुबह अपने दांतों पर ब्रश फेरते हैं तो हमारा मन कहीं और होता है. जब नहा रहे होते हैं तब भी मन वहां नहीं होता। कभी-कभी जब हम ठंडे पानी का शॉवर लेते हैं तो हम अपने मन को बहकाने के लिए कुछ गाने गनगुनाने लगते हैं। ठंडे पानी में नहाने और गुनगुनाने में एक घनिष्ठ संबंध मालुम पड़ता है। चूंकि बाथरूम में हमें कोई नहीं देखता, हम मुक्त होकर गाते हैं। कुछ

लोग तो मक्त भाव से स्वयं से ही जोर-जोर से बहस भी करने लगते हैं। एक व्यक्ति बाथरूम के पास ही खड़ा था, जब उसकी पत्नी बाथरूम से बाहर आई। व्यक्ति ने पूछा-''तुम बाथरूम में किससे बहस कर रही थीं?''

उसकी पत्नी ने कहा-''मैं स्वयं से ही बात कर रही थी।'' उस आदमी ने फिर पूछा-''पर बहस किस बात पर हो रही थी?'' पत्नी बोली-'' मुझे मालूम है कि मैं क्या कर रही थी। तुमसे क्या मतलब ? अलग रहो इससे।"

वह आदमी चालू रहा-''मैं समझ गया कि तुम स्वयं से बात कर रही थीं. .. पर अपने आपसे बहस का क्या मुद्दा था?''

वह बीवी-'' तुम तो मुझे जानते हो ही ... मैं मुखता के तर्क बर्दाश्त नहीं कर सकती, इसीलिए तो मैं स्वयं से ही बात कर रही थी।''

हम ऐसे खेल सदा खेलते रहते हैं। बिना हकीकत को समझे, हम सदा बात करते ही रहते हैं। हम ब्रश करते समय वही शब्द लगातार हफ्तों तक दोहराते रहते हैं, जैसे ही ब्रश हमारे हाथ में आया कि हमारे अंदर एक विचार शुंखला प्रारंभ हो जाती है, जो स्वयं को रोज दोहराती है। शॉवर लेते हुए भी एक से ही विचार उभरते हैं। यदि हम थोड़ा ध्यान दें तो हमें यह प्रवृत्ति स्पष्ट समझ में आ जाएगी।

जो शब्द हम अनजाने में दोहराते हैं. वे उन शब्दों से ज्यादा शक्तिशाली होते हैं, जो हम पूरे होश-ओ-हवास में कहते हैं। हम कई विचार और संस्कार अपने आप कहते हैं जो स्पष्टतया एक-दूसरे की काट करते हैं। वस्तुत :- ' मूज़े इस सिरदर्द से मुक्ति मिले'' भी एक स्वयं काट करने वाला विचार है। जब हम यह शब्द दोहराते हैं तो हम सिरदर्द से भी बखुबी वाकिफ होते हैं। 'सिरदर्द' शब्द

यह प्राणिक सतह इच्छाओं से भरी रहती है तो सत्त्व के बारे में हम प्राणिक सतह से क्या जान सकते हैं. मैं स्पष्ट करता हूं।

आप विशद्ध चेतना

हम चाहे विश्वास करें या न करें, हम ईश्वर हैं, विशाद्ध चेतना हैं। विश्वद्ध चेतना में हम जो विचार पैदा करते हैं, वे शक्तिवान हो जाते हैं। हमार सबके अंदर एक अंतराल होता है जिसे हम ईश्वरीय सत्ता, आत्मा या आंतरिक दिव्यता कहते हैं। इस अंतराल में हम जो विचार पैदा करते हैं, वे जितने गह होते हैं, उतना ही वे इस चेतना से शक्ति ग्रहण करते हैं। यह तो ऐसा ही है जैसे स्लाइड प्रोजेक्टर में हम बल्व के सामने एक स्लाइड रख दें। यही स्लाइड स्क्री-पर एक वास्तविकता बनकर उभरती है। हमारे अंदर की ईश्वरीय सत्ता 'आत्मा भी एक प्रकाश स्रोत है और इस क्षेत्र में हम जो स्लाइड पैदा करते हैं वह बाह विश्व को लिए एक वास्तविकता बन जाती है।

परंतु समस्या यह है कि हम अपने अंदर आपस में एक-दूसरे को निरस करने वाली इच्छाएं पैदा करते रहते हैं। इसलिए हम इस आपसी प्रतिरोध क कारण अपनी कामनाओं या इच्छाओं से कष्ट पाते हैं। हमारी कामनाएं पुरी हो या नहीं. इनके परिणाम से पैदा होने वाला कष्ट अपरिहाय है। यदि इच्छाएं पुरी हो जाती हैं तो मन में एक खालीपन आ जाता है और यदि नहीं तो एक व्याकलता हमें परेशान करती है। इन दोनों हो हालातों में हम 'तमस' कौ ही चलते हैं। ऐसा क्यों होता है?

अपनी इच्छाओं के कारण हमें कष्ट क्यों पाना पड़ता है? पहली बात, आपस में प्रतिरोधी, अपनी इच्छाओं को बारे में समझना पड़ेगा। मसलन, यदि हमें अपने सिरदर्द से छूटकारा पाना है तो हम एक एन्ग्राम बनाते हैं, जो लगातार कहता रहत है-"मुझे इस सिरदर्द से मुक्ति पानी है…इससे मुक्ति पानी है।" हम यही शब्द बार-बार दोहराते हैं अपने अचेतन मस्तिष्क में, लेकिन लगातार ऐसा कहने से तो हम सिरदर्द से मुक्ति नहीं पा सकते, क्योंकि जब हम 'सिरदर्द' शब्द दोहराते हैं तो हम इसे शक्ति प्रदान करते हैं और सिरदर्द बजाय दूर होने के और तेज़ हो जाता है। यह समझ बहुत सुक्ष्म समझ की अपेक्षा रखती है। जो शब्द हम बिना सोचे हुए दोहराते रहते हैं, वे हमारे शरीर-मन के लिए हमारे विश्व में एक हकीकत

कभी विरोधाभासी एन्य्राम प्रयोग में न लाएं। जितने विरोधाभासी शब्द पयोग करेंगे, उतने ही आप उस रोग की पकड़ अपने आंतरिक अंतराल में दढ़तर करते जाएंगे। अपने अंदर की इस इच्छा शक्ति का गलत उपयोग न करें। हमारी दच्छाशकित का आधार प्राणिक सतह है। इसमें वह ऊर्जा होती है जो चाह की वास्तविकता में बदल सकती है। यही वह शक्ति है जो कामनाओं की पूर्ति करती है, स्वप्न को वास्तविकता बनाती है। इस इच्छा शक्ति को विरोधाभासी विचारों या एन्ग्रामों में जाया न करें।

यह विरोधाभासी विचार हमारे सत्त्व तत्त्व के अंतराल को भ्रष्ट कर देते हैं। आज जब आप घर वापिस जाएं तो दस मिनट के लिए यह अभ्यास करें। दस मिनट चुपचाप बैठ जाएं एकांत में और उन विचारों को लिख लें जो आपके दिमाग में नियमित रूप से आते हैं। तब आप देखें कि कहीं आप आपस में विरोधाभासी एन्याम स्वयं ही तो नहीं बनाते जा रहे हैं। यदि ऐसा है तो उन्हें संपादित कर शूद्ध करें। अपने दिमाग में विरोधाभासी शब्दों या विचारों को आने ही न दें।

हम जो कुछ देखते या सुनते हैं, उसके द्वारा अपना शोषण करने की छट स्वयं ही प्रदान करते रहते हैं। जिन लोगों को मन के सत्य या चेतना की वास्तविकता की पहचान भी नहीं होती, वे हमें प्रभावित करते रहते हैं। ये सारी समस्याएं इसलिए पैदा होती हैं, क्योंकि हमें यह ज्ञात नहीं कि हमारे आंतरिक अवकाश में विशुद्ध आनंद सुजित किया जा सकता है।

मैं यह खुला सत्य यहां पूरे साहस से रेखांकित करना चाहता हूं कि कोई भी दवा या रासायनिक पदार्थ हमारे मन के लिए सहायक नहीं हो सकता। सारी चिंता मक्त करने वाली दवाइयां या अवसाद दूर करने वाली औषधियां मन को सांत्वना देने का एक छलावा मात्र हैं। पहले हम मन की आंख से देखते हैं कि हम अवसाद ग्रसित हैं और फिर हम दवाइयां लेकर समझते हैं कि हम ठीक हो जाएंगे - बस। यही खेल चलता रहता है।

एक और महत्वपूर्ण सत्य मैं आप लोगों के साथ साझा करना चाहता हूं। यह तो एक व्यापार का रहस्य है। कई लोग मुझसे कहते हैं-"स्वामी जी! फलाने व्यक्ति ने मुझ पर काला जादू करवा दिया है। उसने मुझ पर मूंठ चलवाई है। किसी ने मुझ पर भूत-प्रेत का साया आरोपित करवा दिया है। मैं किसी दुष्टात्मा की कैद में हूं।'' कई लोग ऐसा भाव कुछ लोगों में व्याप्त करवा देते हैं और फिर इस भय का लाभ उठाते हैं। यह समझ लें कि ये सारे ऋणात्मक चेटक इसलिए शक्तिवान प्रतीत होते हैं क्योंकि हमारा विश्वास इनमें होता है। वही इनको शक्ति देता है।

का बार-बार ख्याल हमें हर बार यह याद दिलाता रहता है कि हमारे सिर चे हो रहा है। तब फिर हम इस सिरदर्द से मुक्ति कैसे पा सकते हैं?''

  • हर बार यह कहना-"इस सिरदर्द से मुक्ति मिले" हमें इसकी बार-बार दिलाता है। यानी हम हर बार इस पूरी फाइल को दिमाग में ताजा क देते हैं। तब सिरदर्द से मुक्ति भला कैसे संभव है, इसलिए बार-बार 'सिरदर्{' र नाम लेने के बज़ाय यदि हम यह कहें-''मैं पूर्ण स्वस्थ हो जाऊं'' तो ज्यादा के मिलेगा, क्योंकि तब हमारे मन में अपने निरोग होने की चाह हावी रहेगी।

हम अपने ध्यान में जो मंत्र या शब्दों का उच्चारण करते हैं, वे स्वत: हमो अचेतन में सजग हो जाते हैं। यदि हम बार-बार सिरदर्द का उच्चारण करेंगे ने हमारे ध्यान का केंद्र हमारा 'सिरदर्द' ही हो जाएगा, न कि इससे मुक्ति और जन हम स्वस्थ होने की बात करेंगे तो हमारे ध्यान का केंद्र हमारा स्वास्थ्य ही रहेगा इसलिए जब हम ईश्वर पर ध्यान लगाते हैं तो हम शुरूआत एक 'ध्यान श्लोक से करते हैं। ध्यान प्रारंभ करने से पूर्व हम एक ध्यान श्लोक कहते हैं। यानी सही शब्दों के साथ ईश्वर के आह्वान की शुरुआत करना। इन श्लोकों में हम उन चीज़ों को शब्द देते हैं जो हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में घटित हों।"

मानस-दर्शन की शक्ति

ध्यान श्लोक का अर्थ है शब्दों का मानस-दर्शन या मन की आंख से देख लेना। यदि हम बार-बार शब्द सिरदर्द-सिरदर्द-सिरदर्द कहते रहेंगे तो मन की आंख से हम क्या देखेंगे? वही व्यक्ति जो हमारे सिरदर्द का मूल कारण है य अपनी वह स्थिति जब हमें सिरदर्द महसुस होता है। यानी लगातार हम सिरदर्द के कारण या स्थिति को ही मन की आंख से देखते रहेंगे।

जिसका हम लगातार मानस-दर्शन करते रहेंगे, वह हमारे स्मृति-पटल पर अंकित हो जाएगा। हमारा आंतरिक अवकाश उससे ओत-प्रोत रहेगा। यदि हमें कोई रोग है तो कभी उस रोग का जिक्र न करें, न उसे दोहराएं या उन शब्दों को न कहें, जिनसे उस रोग की स्मृति गहरी होती हो। उदाहरण के लिए कभी यह न कहें-" इस हृदय रोग से मुक्ति मिले, मधुमेह से मुक्ति मिले या इस उच्च रक्तचाप से त्राण मिले।'' आप स्पष्ट अपनी चाह को शब्द दें, विरोधाभासी शब्द न प्रयुक्त करें। यदि दर्द है या कोई बीमारी है तो आप सीधे-सीधे कहें-''मुझे पूर्ण स्वस्थ होना है।'' शब्द से मानस-दर्शन की सिर्शति बनती है और उसके सत्य होने के लिए ऊर्जा भी हम ही देते हैं।''

हमेशा यही शब्द कहें-"मुझे स्वस्थ होना है।" बजाय इसके कि इस दर्द से त्राण मिले।''

जब हम विरोधाभासी विचार पैदा करते हैं तो हम उन्हें मानने भी लगते हैं। मनश्चिकित्सा के क्षेत्र में यह एक बीमारी है, जैसे फैशन का व्यापार। फैशन ल्यापार में तो हर रोज़ एक नई पोशाक निकाली जाती है। इसी प्रकार इस मामले में हर महीने एक नया रोग पैदा किया जाता है तो एक ऋणात्मक विचार को द्वाहराकर, उसके लक्षण पर ध्यान लगाकर हम वैसे ही लक्षण अपने अंदर पैदा करते रहते हैं। यह एक ख़तरनाक खेल है। इसमें फंसने से बचना चाहिए। हम अपने अंदर में निहित सत्त्व के पवित्र अंतराल को भंग कर देते हैं, ऐसे ही ऋणात्मक विचार बनाकर। यह विचार प्राय: स्वयं ही एक-दूसरे की काट करने वाले होते हैं। इसलिए पहले अपने प्रमुख विचार और इच्छाएं लिख लें और फिर उनका विश्लेषण करें। यह पहला कदम होगा। फिर देखें कि कैसे आपकी इच्छाएं एक-दूसरे का विरोध करती हैं। उदाहरण के लिए देखें-हम शांतिपूर्ण जीवन भी जीना चाहते हैं पर हमें धन और ऐश्वर्य की कामना भी रहती है। या तो तय करें कि कोई मनचाही जिम्मेदारी लेकर उसके साथ प्रसन्न रहेंगे या तय

कर लें कि हम तो चैन से रहेंगे और जो होगा उसे स्वीकार करते रहेंगे। जब भी कभी दो इच्छाओं में संघर्ष दिखाई दे तो एक ही पर जोर दें और दसरी को छोड दें, क्योंकि यदि दोनों पर जोर देंगे तो मानसिक संघर्ष की स्थिति बनती रहेगी।

जब हम सात्त्विक, विशुद्ध अंतराल में विरोधाभासी इच्छाओं और विचारों को एक साथ रखते हैं तो हमारी जमी गहरी स्मृतियों के कारण उनमें संघर्ष पैदा होता है और हम स्वत: ही सात्त्विक से राजस की ओर ढकोल दिए जाते हैं। यह वासना का क्षेत्र असोमित कामनाओं एवं चाहों के आधार पर बनता है। यहां यह श्लोक बहुत संदरता से अपनी बात स्पष्ट करता है। कृष्ण कहते हैं कि प्रत्येक जीवधारी परिणाम, कोंद्रित कर्म करने को बाध्य होता है।

वे भी चाहों और कामनाओं के बारे में बात करते हैं, दोनों में अंतर क्या है? कामनाएं और इच्छाएं-'राग' का अर्थ है कामना और तुष्णा का अर्थ है चाह होना या किसी को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होना। दोनों में अंतर यही है कि 'राग' की उत्पत्ति उन स्मृतियों से होती है, जिसको हमारी भावनाओं का सहारा मिला है जबकि तुष्णा की उत्पत्ति का कारण बाहर से ठूंसे गए विज्ञापनों का प्रभाव होता है।

आपस में काट करने वाली इच्छाएं

विज्ञापन केवल टेलीविजन या सिनेमाघर में ही नहीं दिखाए जाते। यदि हमारे पिताजी कोई बात बार-बार दोहराते हैं तो वह भी एक विज्ञापन का रूप

ये सारे काले जादू, भूत-प्रेत का भय और शैतानी क्रियाओं के एकमात्र शक्ति वही होती है-इनमें हमारा विश्वास। चूँकि हम इन सबको मानते हैं हम इनसे स्वयं को जोड़ लेते हैं और अपने लिए परेशानी खड़ी कर लेते है तथा फिर हम अपने आपको इनसे मुक्त करने का प्रयास करते हैं।

जब लोग ऐसे भय लेकर मेरे पास आते हैं तो मैं उनसे कहता हूं-'ऐसा कुछ नहीं होता। चिंता मत करो। यह कोई समस्या नहीं है।" तब वे सोचते हैं-"यह स्वामी तो लड़का है। इसे कुछ मालूम नहीं। किसी सयाने आदमी के पास चलना चाहिए जो इन परेशानियों को काट बताएगा-कुछ ताबीज देगा भूत-प्रेत भगाएगा तथा इन बंधनों और ऋणात्मकताओं से निजात दिलवाएगा।"

वे समझते हैं कि मुझे कुछ मालूम नहीं तो मैं उनकी सहायता कैसे कर सकता हूं। मैं उन्हें कुछ ताबीज जैसी चीजें देता हूं और कहता हूं-"इसकी कीमत आपको नहीं देनी। बस इसे अपने तकिए के नीचे रख लें और सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। आप ठीक हो जाओगे।" वस्तुतः इन ताबीजों-यंत्रों में कुछ भी नहीं होता। कम-से-कम मैं तो यही समझता हूं। इस आदमी (परेशान व्यक्ति) ने यह समस्या स्वयं ही पैदा की है। उसके अंदर ऋणात्मकता है। मैं जब उसे यंत्रादि देता हूं तो वे उसके मन में यह विश्वास जमा देते हैं कि तुम्हारे अंदर की ऋणात्मकता समाप्त हो गई। यह तो ऐसा ही है जैसे एक कांटे से दूसरा कांटा निकाला जाए और इसमें कुछ नहीं होता।

मैं लोगों को बताता हूं-"यह न समझना कि इन यंत्रों को रखने से कोई तुम्हारी छत से टपकेगा। तुम्हारे घर में कुछ नहीं टपकता सिवाय चूहों को।" वस्तुतः ये यंत्रादि तो ऋणात्मक विश्वास को हटाने के काट हैं। ऐसे लोगों में यह गलत विश्वास पैदा हो जाता है कि उनके अंदर कुछ परेशानियां हैं। मैं तो उनसे स्पष्ट कहता हूं-''यह समस्या तुमने स्वयं ही उत्पन्न की है और मैं तुम्हारी मदद कर रहा हूं, इससे निजात दिलाने में।'' तो यह स्पष्ट समझ लें कि सारी ऋणात्मकता के पास एक ही ताकत होती है-उनमें हमारा विश्वास।

यदि इनको फैलाने वाला आदमी सिर्फ पैसा ऐंठने के कारण ऐसा करता है तो कोई बात नहीं। पैसा तो हम फिर पैदा कर सकते हैं। खतरा यह होता है कि इसके द्वारा वह हमारे मन में एक ऋणात्मक एन्ग्राम पैदा कर देता है। वह एक ऐसा संस्कार पैदा कर देता है जो हमें सदा डराता रहता है। फिर तो चाहे कुछ भी हो हम उसी व्यक्ति को पास भागे जाते हैं, मानो हम उसके गुलाम हों। अगर भूत हमें पकड़ ले, वह ज्यादा अच्छा है बनिस्बत इन ओझाओं के चक्कर में पड़ने के। भूत तो कभी-कभी परेशान करेगा पर यह ओझा तो हमें कभी चैन से नहीं रहने देगा।

श्रीमद्भगवत गीता

ले लेता है। कुछ इच्छाओं को हमारे दिमाग का सहारा मिलता है। हम समझते हैं कि उनसे हमें एक प्रकार की संपूर्ति प्राप्त होगी। हम समझते हैं कि ये हमारी वास्तविक जरूरतें हैं, पर कुछ इच्छाएं तो हमें किसी ने बेची हैं। कामनाओं और तृष्णा में यही अंतर है।

कामना हमारी होती है जबकि तृष्णा तो समाज ने हम पर थोपी है। वह हमारे सामाजिक अनुकूलन का एक हिस्सा है। कामना अंदर ही उत्पन्न होती है। वह हमारी प्रकृति का हिस्सा है। यदि हम अपनी कामना पूर्ण कर सकें तो हमे बड़ी तप्ति और संपूर्णता का अनुभव होता है, परंतु तृष्णा की पूर्ति होते ही हमारे अंदर एक खालीपन का अहसास जागता है अर्थात् असली कामना वह है जिससे हमें चैन और संपूर्णता का अनुभव हो जबकि तृष्णा की पूर्ति हमारे अंदर एक खालीपन का अहसास जगाती है।

कृष्ण बताते हैं कि किस प्रकार आपस में काट करने वाली इच्छाएं हमें राजस की ओर ढकेलती हैं। जब कामनाएं एक-दूसरे की काट करती हैं, तब हम संशय में पड़ जाते हैं, बेचैन हो उठते हैं। जब हमारे शरीर-मन तंत्र में कोई सूचना आती है किसी चीज़ के बारे में तो यह चक्षु, चित्त, बुद्धि से होती हुई अहम् के क्षेत्र में पहुंचती है। इस रास्ते पर चलते हुए, अहम् तक पहुंचने के पूर्व यह अचेतन के क्षेत्र से गुजरती है-यानी उस एन्ग्राम को अंतराल से, जो इस फाइल के बारे में अपनी राय कायम करता है।

मान लीजिए 10 एन्ग्राम एक निर्णय लेते हैं, यह कहते हुए-''मैं तो इस प्रवचन को सुनुंगा'' और 10 एन्ग्राम कहते हैं-"नहीं…नहीं! चलो, सिनेमा चलते हैं। अरे, यह सप्ताहांत काल है।'' यानी 10 एन्ग्राम एक बात कहते हैं और 10 उसके विपरीत अपना निर्णय देते हैं और जब तक वह फाइल ईगो के निकट पहुंचती है, हम गहरे संशय में पड़ जाते हैं। इन एन्ग्रामों के आपसी काट करने वाले निर्णयों को कारण हम एक आंतरिक बेचैनी अनुभव करते हैं।

जितने ज्यादा एन्ग्राम होंगे उतना ही ज्यादा निर्णय लेने में समय लगेगा। हम एक अनिश्चय और द्विविधा में डूबते-उतरते रहेंगे। मानव स्वयं ही द्विविधा है। हम लगातार सोचते हैं-''मुझे यह करना चाहिए था-वह करना चाहिए था। यह द्विविधा होती ही ज्यादा एन्ग्रामों (या जमी स्मृतियों या संस्कारों) के कारण है।

इसी द्विविधा को कृष्ण राजस या व्याकुलता की स्थिति कहते हैं। राजस में हम बेहद क्रोधवंत, हिंसक और आंतरिक रूप से व्याकुल होते हैं। एक राजस प्रकृति वाला आदमी दूसरों पर चिल्लाता रहता है और सदा चिड़चिड़ा रहता है वह इंतजार करता है कि कब वह अपना गुस्सा दूसरों पर उतार सके।

एक बार हम इन एन्ग्रामों को मिटा सकें तो हम बिना किसी दबाव के हजारों निर्णय ले सकते हैं। तब फाइल बिना किसी व्यवधान के सीधी ईगो के पास जाएगी। फिर निर्णय लेने के लिए हमें तीन सौ मेजों (i) से होते हुए नहीं गुजरना पड़ेगा, जैसा कि भारत सरकार को कार्यालयों में होता है। फिर तो बस एक या दो मेजों का अस्तित्व ही रह जाएगा। एक कहेगी-"हां।" तो दूसरी कहेगी-''ठीक है।'' और जब वह ईगो (अहम्) क्षेत्र में पहुंचेगी तो ज्यादा भिन्न मन होंगे ही नहीं। तब अहम् आसानी से निर्णय लेकर फाइल को कार्य करने को लिए तुरंत वापिस भेज सकता है। पूरी प्रक्रिया आसान हो जाएगी। निर्णय आसानी से होंगे और हमारा समय व पैसा भी बर्बाद नहीं होगा।

इसलिए कृष्ण कहते हैं कि जब हम कर्म फल के बारे में नहीं सोचते तो हम कर्म काफी शिद्दत और कुशलता से कर सकते हैं। तब एन्ग्राम बहुत कम होंगे और हम उनके द्वारा ग्रस्त भी नहीं होंगे।

अगले श्लोक में कृष्ण तमस के बारे में कहते हैं। वे अर्जन से कहते है-''हे भारत! तमो गुण या तमस अज्ञान से पैदा होता है, जिसका फल अकर्मण्यता और आलस्य है तथा निद्रा है जो इस अनुकूलित आत्मा को बंधन में डालते हैं।'' तमस की इससे सुंदर परिभाषा क्या होगी?

यदि ज्यादा संस्कार या एन्ग्राम होंगे तो फाइल अहम् तक आसानी से पहुंच ही नहीं सकती। वस्तुतः पूरी फाइल तो अहम् तक पहुंचेगी ही नहीं। कोई शक्तिशाली एन्ग्राम रास्ते में ही उस पर अपना निर्णय थोप देगा। बौद्धिक शब्दावली में इसको कहें-"दिमाग का न लगाना।" यानी पूरी प्रक्रिया से ही वंचित कर देना।

ऐसा क्यों होता है? क्यों हम अनजाने में निर्णय लेकर बाद में पछताते हैं?

यह अचेतन क्षेत्र ऋणात्मक स्मृतियों से ओत-प्रोत रहता है और इसीलिए व्याकुलता भी बहुत रहती है। हमारी सारी स्मृतियां, विगत के विचार-प्रवाह, संस्कार या एन्ग्राम इसी क्षेत्र में फाइल के रूप में संकलित रहते हैं। इस क्षेत्र में इतनी सारी फाइलें रहती हैं, पर उनमें आपस में कोई तार्किक संबंध नहीं होता। तो फिर यह होता है-जब कोई फाइल यहां क्वान्टम लीप (बड़ी उछाल)

लेती है तो वह ईगो (अहम्) तक सही रूप में नहीं पहुंच पाती, क्योंकि इस क्षेत्र में सारे वे आंकड़े भरे रहते हैं, जो सबसे ज़्यादा बेचैनी पैदा करते हैं। यूं समझें मानो आपके कंप्यूटर की 'हार्ड-डिस्क' हाई रिजोल्यूशन फोटोग्राफ से इतनी भरी हो कि उसके काम करने की भी कोई जगह न बच्ची हो, जैसे आपके अवचेतन में विगत के विचार प्रवाह और स्मृतियों का अंबार लगा हो, जिसके कारण वह अयोग्य होकर बेतुको निर्णय लेने लगे।

गण किसमें लिप्त हैं, लेकिन ये तीनों स्थितियां प्रबोधन की स्थितियां नहीं होतीं। प्रबोधन की स्थिति तो इन तीनों से परे है। यदि हम तमोगुण में लिप्त हैं तो हमें राजस की ओर चलना है। यदि राजस में लिप्त हैं तो हमें सत्त्व की ओर चलना होगा, लेकिन जब हम सत्त्व गुण में लिप्त हैं तो हम प्रबोधन की ओर जा सकते हैं। सत्त्व गुण में संलिप्ति स्वतः हमें प्रबोधन की ओर ले जाएगी।

तमस में हम ज्यादा जिम्मेदारी लेना भी नहीं चाहेंगे। उदाहरण को लिए यदि

हम तमोगुण में लिप्त हैं और हमने डॉक्टरी (मेडीकल) विद्या पढ़ी है तो हम अपने अंदर निहित एक आलस्य के कारण अपने पेशे में ठीक से काम नहीं कर पाएंगे। यदि हम प्रैक्टिस किसी और कारण से नहीं करते, तो ठीक है, पर तमस के कारण किसी जिम्मेदारी से मुंह चुराना, सही नहीं होगा। यदि हम अपने काम से मुंह किसी आध्यात्मिक कारण से मोड़ रहे हैं तो यह एक अलग बात है। कुछ लोग (डॉक्टर) ध्यान करने, तीर्थाटन करने या कोई अन्य आध्यात्मिक काम को लिए अपनी प्रैक्टिस नहीं कर पाते। इसमें कोई बुराई नहीं है, पर यदि हम तमस में लिप्त आलस्य के कारण अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं तो यह सही नहीं है।

तमस के कारण अपने कर्त्तव्य से भागने का अर्थ है कि हम पर्याप्त ऊर्जा न होने को कारण कोई जिम्मेदारी भरा निर्णय नहीं ले पा रहे, क्यों? इसलिए कि कई एन्ग्रामों के कारण हमारी निर्णय क्षमता बाधित हो जाती है। जब तक हम एक भी निर्णय की स्थिति तक पहुंचते हैं तो हम थक जाते हैं और सोना चाहते हैं। इसी कारण हम जीवन से पलायन करना चाहते हैं और अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ते हैं। जो पलायनवादी हैं वे सब तामसिक लोग होते हैं।

श्रीमद्भगवत गीता

इस उदाहरण को देखें-आपको द्वारा उपलब्ध आंकडों को अनुसार सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, अर्थात आपको शरीर-मन के लिए सहो नहीं। यह निर्णय आप तब तक चला सकते हैं जब तक आप चेतन मस्तिष्क से काम कर रहे हैं. पर जैसे ही दिमाग उछलकर ईगो (अहम) तक पहुंचा कि वहाँ एन्ग्राम आपको निर्देश देता है कि सिगरेट पी लो और आप सिगरेट पीने लगते हैं। चेतन प्रक्रिया आपको आगाह करती है कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य को लिए हानिकारक है, पर अचेतन उस पर हावी होकर निर्णय लेता है और वह निर्णय आप मान लेते हैं। यह विशुद्ध सहज-वृत्ति (या इंस्टिक्ट) वाला निर्णय होता है। जब ज्यादा एन्ग्राम इकट्ठे होते हैं तो हमें भी मालूम नहीं होता कि हम क्या निर्णय लेंगे। यह तो 'पैंडोरा बॉक्स' खोलने के समान है, अंदर इतने एन्ग्राम या संस्कार ठूंसे हुए हैं कि क्या पता क्या निर्णय हो। इस हालत में जानवरों के समान हम अपनी सहज-वृत्ति (इंस्टिक्ट) पर ही काम करते हैं। "

जब एन्ग्राम गिने-चुने हों तो फाइल को कई मेजों से होकर गुजरने की कोई जरूरत नहीं होती, कुछ गिने-चुने ही पड़ाव होते हैं, जैसा कि निजी कॉरपोरेशनों में होता है। यहां मानव स्तर या बौद्धिक स्तर पर काम होता है।

जहां ज्यादा एन्ग्राम नहीं होते, वहां फाइल को अचेतन क्षेत्र में जाने की दरकार ही नहीं होती। सीधी वह फाइल बुद्धि क्षेत्र में जाती है और मस्तिष्क के ईगो (अहम्) क्षेत्र में पहुंचती है, कोई रुकावट नहीं होती। चेतन प्रक्रिया में समय, अचेतन प्रक्रिया की तुलना में बहुत कम लगता है। तब सहज प्रज्ञा काम में आती है और स्तर ईश्वरीय भी हो जाता है। " " " "

जहां जानवरों का स्तर सहज-वृत्ति का होता है, वहीं मानव का स्तर बौद्धिक होता है। ईश्वरीय स्तर सहज प्रज्ञा का स्तर होता है। सहज वृद्धि का स्तर तमस का स्तर होता है, बौद्धिक स्तर राजस का स्तर होता है और सहज प्रज्ञा का स्तर सत्त्व का स्तर होता है।

सत्त्व में हमारा दिमाग निरंतर कार्यशील रहता है और हम शीघ्र निर्णय लेते हैं। इस स्तर पर काम करने में हम चौबीसों घंटे कार्य करके भी शांत रह सकते हैं इसे ही मैं 'कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म' कहता हूं। कृष्ण कहते हैं कि जब हम सत्त्व गण में काम करते हैं तब हम ध्यान को केंद्रित रखते हैं। तब निरंतर गतिविधियों में लिप्त रहने के बावजूद हम पूरी तरह विश्रांत और सहज रहते हैं। जब 10 को

अतः यह पूरी प्रक्रिया हमारे एन्ग्रामों और जमी हुई स्मृतियों पर आधारित होती है। एन्ग्रामों की संख्या हमें बताती है कि हम सत्त्व गुण, रजो गुण या तमो

  • 14,9 हे भारत! सत्त्व गुण सुख में लगाता है, रजो गृण कर्म में तथा तमोगण तो ज्ञान को ढककर प्रमाद में भी लगाता है।
  • 14.10 हे भारत! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगूण, सत्त्वगूण, और तमोगण को दबाकर रजोगूण, वैसे ही सत्त्वगूण और रजोगुण को दबाकर तमोगण स्थित होता है।
  • 14.11 इसलिए जिस काल में इस देह में तथा अंत:करण और इंद्रियों में चेतनता और बोध शक्ति उत्पन्न होती है, उस काल में समझना चाहिए कि सत्त्वगण बढ़ा है।
  • 14.12 हे भारत वंशियों में श्रेष्ठ! रजोगुण के बढने पर लोभ प्रवृत्ति, सब प्रकार के कर्मों का सकाम भाव से आरंभ और विषय-भोगों को लालसा-ये सब उत्पन्न होते हैं।

कृष्ण आगे इन तीनों गुणों की व्याख्या करते हैं। "हे भारत! कभी-कभी सात्त्विकता प्रदायक सतोगुण वर्चस्व प्राप्त करता है राजस और तामसिक वृत्ति को दबाकर, तो कभी तमोगुण सात्त्विकता और राजस वृत्ति को दबाकर प्रमुखता प्राप्त करता है और कभी राजस वृत्ति रजोगुण प्रबल होता है।'' इस प्रकार वर्चस्व को लिए इन गुणों में प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।

हम सभी कभी भी पूरी तरह से सतोगुण, रजोगुण या तमोगुण के अधीन नहीं होते। इन तीनों गुणों के बीच झूलते रहते हैं-एक से दूसरे पर और दूसरे से तीसरे या तीसरे से पहले पर। इस प्रकार हम पर तीनों का प्रभाव रहता है।

कभी-कभी जब हम सुबह सोकर उठते हैं तो काफी तरोताज़ा महसूस करते हैं। हमें लगता है मानो हमारे सभी प्रश्नों का उत्तर मिल गया हो। हम तरोताजा, जीवंत और लगभग प्रबुद्ध महसूस करने लगते हैं। हर काम शाम तक बड़े आराम से पूरा होता है। अचानक हम व्याकुल हो जाते हैं और दूसरे दिन हम तमस में घिरे रहते हैं। हमारा कुछ भी करने का मन ही नहीं होता। इस प्रकार हमारा मूड इन तीनों गुणों के झूले में झूलता ही रहता है।

मड़ या मन की चंचलता और मोटापे में घनिष्ठ संबंध होता है। जब हम मन को इतना चंचल होने देते हैं तो हम स्वयं को ही त्रास देते हैं। हम कभी व्याकुल, कभी शांत और कभी आलस्य (तमोगुण) में लिप्त रहते हैं। तमस गुण की प्रधानता में हम कुछ भी करना ही नहीं चाहते, हम सभी से पलायन करना चाहते हैं-हर काम को छोड़कर भागना चाहते हैं। प्रकृति के इन तीन मूलभूत गणों में हम भटकते रहते हैं-कभी सहज वृत्ति (इंस्टिक्ट) में, कभी बौद्धिकता में और कभी विवेकशीलता में।

द्रमारी मन:स्थिति क्यों झूले-सा झूलती रहती है?

ऐसा क्यों होता है? इसलिए कि हमने कई संस्कार कुछ चीजों के संदर्भ में एकत्रित कर रखे हैं, उदाहरण के लिए शराब पीने से संबंधित एन्ग्रामों को ही देखें। अपनी युवावस्था से लगातार हमें आगाह किया जाता है कि इस तरह शराब पीना बूरी बात है-यह एक पाप है। यह सुनकर हमारी जिज्ञासा भड़कती है और हम कम-से-कम एक बार एल्कोहल का स्वाद लेने को लालायित हो जाते हैं। बच्चों को कायदे-कानून नहीं सिखाओं, उनमें समझ पैदा करों और इन कायदे-कानुनों के पीछे स्थित उनका औचित्य समझाओ।"

तो यदि हम अपने बच्चों का सूखपूर्वक पालन-पोषण करना चाहते हैं हमें ऐसा उनमें बिना किसी अपराध भाव पैदा किए, करना पड़ेगा। यदि बिना औचित्य समझाए हम उन्हें अपने कायदे-कानून का पालन करने को कहेंगे तो वे उनको भंग करने के लिए प्रलोभित होते रहेंगे। बेशक, कानून भंग करना अपराध भाव देता है और अपराध भाव होना शायद सबसे बड़े पाप का प्रतिफल है, परंतु इसके बजाय उनमें समझ पैदा करनी चाहिए. जिसके लिए दो चीजों की आवश्यकता होती है। पहली जरूरत है हमारे अंदर इतनी बद्धिमत्ता होने की कि नियमों और कानूनों को पीछे छिपा औचित्य हमारी समझ में आ जाए, तभी हम उन कानूनों का पालन कर सकेंगे। दूसरी चीज़ हमारे अंदर इतना धैर्य होना चाहिए कि यह सबको समझा सकें, भले ही इसमें समय और ऊर्जा लगे, पर हमारा ध्यान सभी में यह समझ पैदा करने पर ही होना चाहिए।

यदि आप चाहते हैं कि लोग आपके नियमों को मानें तो कभी उन्हें थोपें नहीं। यह स्वाभाविक है कि हम उन्हें जो नियम बताएंगे वे उसका विरोध ही करेंगे, बल्कि यह भी निश्चित नहीं कि वे विरोध ही करेंगे। यह भी कहना मुश्किल है कि वे क्या करेंगे। यद्यपि इसमें काफी समय और ऊर्जा लगती है

श्रीमद्भगवत गोता

श्रीमद्भगवत गीता

पर नियमों का पालन करवाना बच्चों का पालन-पोषण करना ही है. इसमें काफी धीरज और समझ की दरकार होती है।

लोग प्राय: मुझसे शिकायत करते हैं-"स्वामी जी! आज के युग में समय ही नहीं मिलता। मेरी लड़की स्कूल जाती है। मैं भी काम करता हूं। इतना समय ही नहीं होता कि मैं अपनी बेटी को कुछ समझा सकुं।"

मैं कहता हूं-''यदि तुम्हारे पास अपनी बेटी का सही ढंग से पालन-पोषण करने का समय नहीं था तो तुमने उसे पैदा ही क्यों किया? तुम्हें तो मेरी तरह से संन्यासी हो जाना चाहिए था। यह निर्णय तुम्हें पहले ही ले लेना चाहिए था।" एक मां अपने बच्चे के साथ मेरे पास आई और बोली-''स्वामी जी! जरा इसे समझाओं कि यह मेरी आज्ञा माना करे।''

पर मैं यह राय देना नहीं चाहता था, क्योंकि जब मैं बच्चा था तब मैं भी अपनी मां का कहना नहीं मानता था। अब मैं वही राय उसको कैसे दे सकता था, पर मैं उस महिला से मना भी तो नहीं कर सकता था तो मैंने उस महिला को खुश करने के लिए उसके बच्चे को यही मशविरा देने का निर्णय किया।

उधर वह महिला कहती रही-''स्वामी जी! इसे कुछ समझाइए न।''

दो-तीन बार मैंने टालने का प्रयत्न किया, पर बात बनी नहीं। अंतत: मैंने उस बच्चे को बुलाकर कहा-''तुम अपनी मां का कहना क्यों नहीं मानते। देखों। मैं स्वयं भी उसकी बात मान रहा हूं। तुम्हें भी उनको बात माननी चाहिए।''

बच्चे का उत्तर सूनकर आप सब लोगों को भी आश्चर्य होगा। वह बोला-" स्वामी जी! वह खुश नहीं है। यदि मैं उसका कहना मानुंगा तो मैं खुश नहीं रहंगा। आप क्यों जोर दे रहे हैं कि मैं उसका कहा मानूं।''

मैं तो हैरत में पड़ गया, पर बात वह सच कह रहा था।

मैंने किसी प्रकार उसे समझाया और उससे पिंड छूड़ाया, पर मैं स्वयं आश्वस्त नहीं था कि मैंने सही किया है। बच्चे ने सत्य कहा था। यदि उसकी मां दु:खी है तो वह उसकी बात कैसे मान सकता था।

निकट भविष्य में बच्चे मां-बाप पर मुकदमा कर देंगे, यदि उनका पालन-पोषण सही नहीं किया गया। कुछ ने तो इसकी शुरुआत भी कर दी है। जो बच्चे अवसाद ग्रस्त (डिप्रेशन में) हैं या जेल में हैं, उनका कहना है कि उनकी सारी समस्याओं की जड़ उनके मां-बाप ही हैं, क्योंकि उन्होंने सही ढंग से उन्हें नहीं पाला है; बजाय उनकी सही देखभाल के, उनको बिगाड़ा गया है। इसलिए बच्चों के प्राप्ति करने का निर्णय करने को पूर्व आपको प्रबुद्ध होना चाहिए। भावी मां-बाप को लिए यही अर्हता होनी चाहिए। यदि हमें यह स्पष्ट ज्ञात न हो कि कैसे उनका मार्गदर्शन करना है, हमें उनको पैदा करने की योजना नहीं बनानी चाहिए। संसार में वैसे ही काफी जनसंख्या है। इस पथ्वी ग्रह पर अरबों लोग वैसे ही मौजूद हैं। यदि जो हैं उनको सही ठिकाना, शिक्षा या दवा इत्यादि की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवा सकते तो और लोगों को संसार में लाने की क्या जरूरत है?

अतः यदि बच्चे चाहिए तो उनके सही पालन-पोषण की अक्ल भी हम चें होनी चाहिए। उनको सही समझ प्रदान करना भी हमारी जिम्मेदारी होती है। हम जो समझ उनको प्रदान करते हैं, वह सत्त्व की सतह पर रिकॉर्ड होती है उनकी चेतना में। यही समझ बुद्धिमत्ता का रूप लेकर उभरती है, पर जो आप नियम या आदेश देते हैं. वह राजस और तमस की सतह में अंकित होते रहते हैं। अगर आपको कोई सही राय देनी भी है तो उसे किसी नियम या कानन के रूप में न दें, क्योंकि नियम के रूप में दी गई सही समझ भी बच्चों के अंदर एक वितरणा बनकर उभरती है।

जब मां-बाप अपने बच्चों को मेरे पास लाते हैं तो वे उन्हें बाध्य करते हैं मेरे चरण स्पर्श करने के लिए। मैं उनसे कहता हूं-"ऐसा कतई न करें। इससे आपका लालच प्रकट होता है।'' ये मां-बाप सोचते हैं अपने बच्चों से मेरे पैर छवाकर उन्हें या उनके बच्चों को पुण्य मिलेगा। यही विचार वे अपने बच्चों पर थोपते हैं; यानी वह विचार जो एक तरह के लालच से पैदा होता है।

वस्तुत: अपने बच्चों पर यह जबरदस्ती कर वे उन बच्चों के अंदर मेरे प्रति एक नफरत का भाव पैदा करवाते हैं। कभी-कभी तो कुछ मां-बाप अपने बच्चों का सिर मेरे चरणों पर रखवाने की जिद करते हैं-मानो मेरे चरण से एक धनात्मक लहर निकल रही हो। मैं इन मां-बापों को कहता हूं कि कोई काम जबरदस्ती न करवाओ। बस 'नमस्कार' करना ही काफी है, अन्यथा उनकी जबरदस्ती बच्चों के मन में मेरे प्रति एक नफरत पैदा करवा देते हैं। इस अनुभव के बाद यदि वे किसी भगवा वस्त्रधारी को देखेंगे तो वे बडबडाएंगे-" अरे! अब फिर वही एक्सरसाइज करनी पडेगी।" मानव को

बच्चों पर कभी कोई नियम थोपा नहीं जाना चाहिए। अपने मां-बाप के थोपे गए निर्देश अभी तक हमें कष्ट दे रहे हैं, क्योंकि इस तरह मा-बाप के दिए हए निर्देश राजस और तमस की सतहों पर एकत्रित होते हैं, जो हमारे अंदर व्याकुलता और गहरा अवसाद लगातार पैदा करते रहते हैं और हमारी समस्याओं को बढ़ाते रहते हैं।

इच्छा और अपराध बोध

इच्छा और अपराध बोध एक ही ऊर्जा के दो पहलू हैं। एक का संबंध

भविष्य से होता है तथा दूसरा विगत से जुड़ता है। इच्छा भविष्य से और अपराध बोध विगत से जुड़ता है। ''मुझे ऐसा कर लेना चाहिए था'' का भाव (अपराध बोध), "मुझे यह करना चाहिए" भाव में प्रमुख भूमिका निभाता है। " मुझे यह करना चाहिए" का निर्धारण "मुझे ऐसा कर लेना चाहिए" भाव से होता है। अपराधबोध जो हमारे बड़े-बुजुर्गों को थोपे गए नियमों को कारण पैदा होता है, हमारे जीवन को नरक बना देता है और हमें तमस की ओर ले जाता है। कृष्ण कहते हैं कि यह हमें अंत की ओर ले जाता है। हम अंतत: अज्ञान में पहुंचकर खत्म हो जाते हैं।

कृष्ण कहते हैं कि शुभ गुणों का प्राकट्य तभी अनुभूत होता है जब शरीर के सारे द्वार ज्ञानालोकित हों। यही तकनीक कारगर रहती है। शरीर के द्वार यानी आंख, नाक, कान, जिह्वा और स्पर्श की अनुभूति। ये वे माध्यम हैं जिनके ज़रिए शरीर को बाहरी विश्व का अनुभव प्राप्त होता है। यही वह फाइल्स (सूचनाएं) हैं जो हमें बाहर का हाल बताती हैं। कृष्ण कहते हैं कि यदि हम यही द्वार ज्ञान के प्रकाश से आलोकित रखेंगे तो हमारा सात्विक भाव उदय होगा, इसलिए इन द्वारों को सुरक्षित रखना चाहिए। यह सुरक्षा ज्ञान से प्राप्त होती है।

अर्थात हमें यह ज्ञान होना चाहिए कि क्या हमें अंदर जाने देना है और क्या नहीं। इसका सही ज्ञान हमें संदैव सत्त्व भाव में रखेगा या आनंद देता रहेगा। कृष्ण कहते हैं हमें इन द्वारों को लिए एक सजग पहरेदार रखना चाहिए। हमारे शरीर में ऐसा कोई सुरक्षा तंत्र नहीं है। प्राय: हम अपने घर के लिए सुरक्षा गार्ड रखते हैं। लोग ज्यादा-से-ज्यादा 12 घंटे घर पर बिताते हैं और शेष 12 घंटे बाहर व्यतीत करते हैं, पर हम 24 घंटे इस शरीरनुमा घर में बिताते हैं, पर इसके लिए, सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं करते।

Curre - रमण महर्षि ने पवित्र अरुणाचल हिल, तिरवन्नमलाई के लिए एक सुंदर श्रद्धांजलि में अपने प्रसिद्ध गीत 'अरुणाचल अक्षरमनामलाई' में गाया है-''जब ये पांच चोर - शरीर की पांचों इंद्रियां - घर में घुसे, तब ओह अरुणाचल, तुम क्या घर पर नहीं थे? वे घुसे कैसे अंदर?'' वह शिव से पूछते हैं-''जब ये पांच चोर घर (शरीर) के अंदर घुसे तब तुम वहां नहीं थे?'' तुमने इन चोरों को घुसने कैसे दिया?''

कृष्ण भी कहते हैं कि हमारे इन पांच द्वारों की रक्षा हेतु कोई सुरक्षा तंत्र होना चाहिए; ज्ञान से बचाव होना चाहिए, तभी हम निरंतर आनंद में रह सकते हैं।

इसका स्पष्ट अर्थ है कि हमें उन विचारों को पैदा नहीं होने देना चाहिए जो अंदर घुसकर हमारी आंख व अन्य इंद्रियों को कष्ट पहुंचाते हैं। क्या इसका

अर्थ नहीं है-टेलीविज़न से दूर रहो या कम-से-कम वे प्रोग्राम मत देखो जो मन में अवसाद पैदा करते हों। सिर्फ वही देखो जिनको देखकर मन प्रफल्लित एवं इर्षित रहे। जो प्रोग्राम हमें चालाक बनाएं या हिंसा दें या जो दु:ख दें, उन प्रोग्रामो को कभी देखना नहीं चाहिए।

जब हम अपनी इंद्रियों को सत्त्व तत्त्व को सरक्षित रखेंगे तो हम ऋणात्मक गन्यामों ( संस्कारों) को अंदर आने ही नहीं देंगे। लोग मझसे पुछते हैं-" यदि हमें समाज में होने वाली घटनाओं-गतिविधियों का ज्ञान ही नहीं होगा तो हम समाज में कैसे रहेंगे?''

इसकी आप चिंता न करें। यदि कोई महत्त्व का समाचार है तो किसी-न-किसी रूप में वह हमारे पास आ ही जाएगा। हम कोई एकांत द्वीप में तो नहीं निवास कर रहे। फिर, मीडिया के द्वारा यदि हमें ज्यादा आपराधिक गतिविधियों को बारे में मालम हो भी जाएगा तो ही हम क्या कर लेंगे-वही खबरें तो अखबार भी छापते हैं-हत्या, बलात्कार, चोरी एवं दुर्घटनाओं के बारे में-बाकी क्या अंतर है सिवाय इसके कि देश या शहर का नाम बदल जाता है। वस्तृत: हम बजाय रोज अखबार पढने के स्वयं ही बता सकते हैं कि कहां और कब क्या वारदात होगी। हम यही खबरें क्यों पढना और प्रमाणिक सिद्ध करना चाहते हैं। सिर्फ जगह संख्या इत्यादि का ही परिवर्तन होता है, हादसों का नहीं।

हमारे जीवन में इनसे क्या परिवर्तन आ सकता है? यदि जो इनको संभालने के लिए जिम्मेदार हैं, इनके बारे में जानते हैं तो यह काफी है। जब हम ऐसी सचनाएं लगातार अपने दिमाग में डालते रहते हैं तो हम इनके एन्ग्राम बना देते हैं। इनसे हम अपने अंदर भय और कष्ट के आघात पैदा करते हैं। यदि लगातार अपहरणों के बारे में हम पढ़ते-सुनते रहेंगे तो कभी भी अगर हमारे अपने लोगों-पति-पत्नी या बच्चे को लौटने में थोड़ी भी देर होगी तो हम चिंता करने लगेंगे, व्याकुल हो जाएंगे। इसके बरअक्स यदि भगवान न करे कुछ गडबड होनी भी है तो वह उसी दिन तो होगी। यहां तो यह भय हमें रोज ही सालता रहेगा-क्योंकि हमने इसके एन्ग्राम बना लिए हैं। क्या हम इनका होना रोक सकते हैं? यदि संभव है तो कैसे?

यदि हम इन्हें रोक दें तो कोई समस्या नहीं। तब तो यह काम हमारी बुद्धिमत्ता का ही है अर्थात् जो बुद्धि-कौशल इन समस्याओं को होने से रोक सके, वही बुद्धिमत्ता है, परंतु ज्यादातर समय हम इन एन्ग्रामों को इकट्ठा करते रहते हैं, जिन्हें न हम रोक सकते हैं या उनमें कुछ भी अंतर ला सकते हैं। नतीजतन, हम केवल कष्ट ही पाते रहते हैं। यानी बार-बार हम स्वयं को राजस और तमस में डालते रहते हैं।

इसलिए आप कृपया उन विचारों से परहेज करें, जो आपको कष्ट देते हैं। सिर्फ उन्हीं विचारों से सरोकार रखें जो आपको शांति और आनंद की अनुभति देते हों। हमें यह सब थोडा अव्यावहारिक भी प्रतीत हो सकता है। हम सोच सकते हैं-" जब तक दुनिया में घटित होने वाली घटनाओं का हमें ज्ञान नहीं होगा. हम अपने समाज में कैसे रह सकते हैं?'' यहां यह भी समझ लें कि समय यह जानना कि दनिया में क्या हो रहा है, एक तरह का रोग ही होता है फालतू में सूचनाएं एकत्रित करते रहना भी एक बीमारी है। कुछ दिन पूर्व एक सज्जन ने मुझसे कहा-"स्वामी जी! अपनी संस्कृति. के बारे में जागरूक रहने के लिए आवश्यक है कि हम टेलीविजन देखते रहें।'' "पर ये टीवी प्रोग्राम बकवास और निरर्थक होते हैं, जितना हम इनको देखते हैं उतनी ही ऋणात्मकता हमारे अंदर बढ़ती जाती है।''

लगातार ऐसे टीवी प्रोग्रामों को देखने से हमारे अचेतन मस्तिष्क में मानव-जीवन के बारे में एन्याम बनते जाते हैं। यदि हम इन प्रोग्रामों को लगातार देखते और सुनते. रहें तो हम इससे प्राप्त सारी ऋणात्मकता को अपने जीवन में उडेल देते हैं. फलस्वरूप हम अपने लिए कुछ असंभव एन्ग्राम बनाते हैं. इन्हीं देखे-सुने हालात के आधार पर।

जीवन बहुत मुल्यवान और क्षणस्थायी है. इसे ऐसी फालत चिंताओं को लिए बर्बाद नहीं किया जा सकता। अवसाद, थकी-हारी मन:स्थिति और तष्णा पैदा करने वाले ऐसे विचारों से स्वयं को मुक्त रखें, खासतौर पर संध्या के समय जब दिन और रात मिलते हों, यह समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह हमारे प्राचीन स्वामियों को ज्ञात था। यह संध्या, दिन में दो बार आती है-उषाकाल और गोधूलि बेला में। हमारे प्राचीन ऋषियों को ज्ञात था कि जो विचार-बीज इस समय हमारी समझ में बोया जाएगा वह पूरा पेड बनकर उभरेगा। इसलिए प्राचीन मनीषियों ने कहा था कि संध्याकाल पवित्र माहौल में बिताया जाना चाहिए-पूजा-अर्चना में, प्रार्थना में, भगवत भक्ति संबंधी साहित्य पढते हुए, मंदिरों में या ध्यान में। इस समय के आध्यात्मिक विचार बीज रूप में हमारे अंदर प्रविष्ट होकर हमारे जीवन के लिए छायादार वृक्ष बनकर उभरते हैं, पर आजकल हम संध्याकाल में ही टीवी देखते हैं और सारा कबाड़ अपने अंदर भर लेते वी और दूसरे दिन इसकी दुर्गध हमें मालूम पड़ने लगती है। इस पवित्र काल में कभी भी अपने अंदर ऋणात्मक संस्कार नहीं स्थापित करने चाहिए।

हमें अपनी इंद्रियों की चौबीसों घंटे सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि पूरे समय नहीं तो कम-से-कम संध्याकाल में तो स्वयं को ऋणात्मक विचारों से बचाना ही चाहिए। संध्या काल एक परीक्षा-दर्शन काल होता है, जो डेढ घंटे का होता है, जब दिन और रात मिलते हैं। भारत में यह समय सुबह-शाम 6 से 7:30 बजे तक का होता है, अर्थात् सूर्योदय और सूर्यास्त के समय के आस-पास का समया यह विभिन्न देशों में अलग-अलग समय उभरता है। संध्याकाल में ऋणात्मक संस्कारों-विचारों से हमें स्वयं को बचाना चाहिए, क्योंकि इस समय के संस्कार हमारे पूरे जीवन को प्रभावित करते हैं। कृष्ण इस सलाह द्वारा हमें यह विधि बताते हैं जिसके द्वारा हम इसका क्रम भी बदल सकते हैं। इस विधि दारा हम संपूर्ण बदलाव ला सकते हैं, एक प्रकार का समूल परिवर्तन प्राप्त कर सकते हैं।

अभी यह संज्ञेयता हमारे मस्तिष्क में ऋणात्मक एन्ग्रामों के आधार पर होती है। यदि हम 'इनपुट' को परिवर्तित कर सकते हैं या अपनी मानसिक प्रवति को भिन्न स्पंदन या भिन्न ऊर्जा क्षेत्र में ले जा सकते हैं तो संज्ञेय परिवर्तन घटित होने लगता है। तब हम प्राप्त आंकड़ों को धनात्मक या सकारात्मक एन्य्रामों से बरतने लगते हैं, जिसका आधार पूरी तरह धनात्मक होता है।

कुष्ण हमें यही सुझाव देते हैं; यह विधि सुझाते हैं-अपने इंद्रिय-लब्ध ज्ञान को ऋणात्मक विचारों से बचाओं और उनको धनात्मक विचारों से भर दो। इस समय जो विचार हमें मिलेंगे वही हमारे अस्तित्व के संचालक हो जाएंगे और हम वही ऊर्जा विकीर्ण करेंगे। संध्या समय को शुभ कार्यों में बिताओं। यदि घर पर हो तो ध्यान करो। यदि ध्यान का अभ्यास नहीं है तो सुबह-शाम किसी पवित्र धार्मिक स्थल मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च इत्यादि में जाओ या किसी आध्यात्मिक क्रिया में लिप्त रहो। प्रार्थना करो, कोई शुभ कार्य करो, परंतु ऋणात्मक एन्ग्रामों से स्वयं को बचाते रहो, क्योंकि जितने ऋणात्मक एन्य्राम अंदर जाएंगे उतने ज्यादा हम अवसाद ग्रसित होते जाएंगे।

हम बैंक में जितना धन डालेंगे उतना ही हमारे खाते में धन बढ़ेगा। जितना हम ऋणात्मक एन्ग्रामों से जूझेंगे उतना ही हम अवसाद में डबते जाएंगे। हमारे प्राचीन स्वामीगण (ऋषि-मनिगण) जानते थे कि कहां धनात्मक एन्ग्राम इकट्ठे होते हैं और कहां ऋणात्मक एन्य्रामों का जखीरा रहता है। उन्होंने इसके लिए कई जगह सुनिश्चित कों जहां से धनात्मक एन्ग्राम लेकर हम अपनी सुरक्षा कर सकते हैं। यह कृष्ण का सुझाव हमारे अस्तित्व को सुरक्षित रखकर विशुद्ध सारिवक सुरक्षा देता है और आनंद की अनुभूति कराता है।

कृष्ण ने पहले भी बताया था कि जब कोई जागरूक रहता है तो वह सत्त्व भाव में रहता है। अब वे बता रहे हैं कि राजस भाव में क्या होता है।

वे बताते हैं कि रागात्मकता, लालच, तुष्णा एवं ध्याकुलता राजसिक बर्ताव के द्योतक होते हैं। वैसे तो यह अवस्था ज्यादातर लोगों की होती है

पर व्यापारीगणों और कॉरपोरेट जगत के लोगों पर यह ज्यादा लागू होती है।

लालच एक कॉरपोरेट लालसा का लक्षण है। लोग जो अपने कार्यकर्ताओं को भर्ती कर उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करते हैं. प्राय: अंत:प्रेरणा को एक औजार की तरह प्रयोग करते हैं। यह अंतःप्रेरणा या किसी लक्ष्य प्राप्ति हित प्रलोभन क्या होता है?

वस्तृत: किसी को किसी खास उद्देश्य के लिए उकसाना गलत है। किसी को प्रलोभित करने के लिए उसके सामने कोई बडा आकर्षण रखा जाता है। फिर वही आकर्षण उसका लक्ष्य बन जाता है। यदि हम गधे हैं तो हम 'गाजर (प्रलोभन या आकर्षण) के पीछे जाएंगे. लेकिन यदि हम में बद्धिमत्ता है तो हमारी समझ में आ जाएगा कि यह 'गाजर' सदैव हमारी पहुंच सीमा के ठीक बाहर ही लटकाई जाएगी।

गधा तो गाजर के पीछे भागेगा ही, वह तो रुक ही नहीं सकता। गाजर इतने समीप, पर कितनी दर है तो वह (गधा) शांत कैसे रह सकता है? यही कहानी कॉरपोरेट लोगों की भी है। ये व्यापारीगण मझसे शिकायत करते हैं-" स्वामी जी! व्यापार करना बडा टेढ़ा काम है। आजकल ईमानदारी तो रह ही नहीं गई। हर आदमी बेईमान है। किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। आजकल तो खूब घाटा हो रहा है, पता नहीं कब तक टिक पाऊंगा? मुझे सही परामर्श दीजिए।''

ये लोग बडे चतुर होते हैं। कभी यह नहीं कहते-"मेरी सहायता करें।" सदा यही कहते हैं-" अपनी राय दीजिए।" इस शब्दजाल में मैं पकडा जाता हूं। यदि मैं इन्हें कुछ करने की राय देता हूं तो वे मुझी पर बाद में जिम्मेदारी थोप सकते हैं। बाद में वे हमेशा कह सकते हैं-" स्वामी जी! मैंने आपका कहा ही किया था, वह काम नहीं आया। अब मेरी सहायता कीजिए।"

मैं उन्हें कहता हूं-''यदि व्यापार करना टेढा काम है, तुम्हें किसी पर भरोसा नहीं रहा है और कुछ धन भी नहीं कमा पा रहे तो व्यापार बंद क्यों नहीं कर देते? व्यापारी दंद-फंद से मुक्ति पाओं और आराम करो।''

तो वे फट पड़ते हैं-''वाह स्वामी जी! खूब कही। तो मैं करूंगा क्या? जिऊंगा कैसे?''

यानी एक तरफ उनका कहना है कि वे धन गंवा रहे हैं और जब मैं ऐसे व्यापार को बंद करने के लिए कहता हूं तो वे कहते हैं कि वे जिएंगे कैसे? पता नहीं ये कैसा नाटक चालू है। हम अभी भले ही हंस लें, पर हममें से हर एक यह

नाटक करता रहता है-एक मनोवैज्ञानिक नाटक, जो हम स्वयं ही दिखाते हैं। असल में हम लोग तो चाबी भरे खिलौने की तरह हैं। हमारी चाबी इतनी कसी है कि जब भी हमारे अंदर की कोई स्प्रिंग ढीली होने का प्रयास करती है तो हमारे अंदर का कोई और हिस्सा कस जाता है। हम तो टीवी में दिखाए गए विज्ञापन 'बैट्री बनी' की तरह हैं। हम हमेशा चलते रहते हैं, आराम कर ही नहीं सकते। हम समझते हैं कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य चलते ही रहना है। हमारा जीवन उद्देश्यहीन होता है। जीवन का कोई लक्ष्य नहीं होता। हम

बस इसी चिंता में डूबे रहते हैं कि हम कब पहुंचेंगे, कहां पहुंचेंगे। वस्तुत: जीते रहना ही हमारा पंथ है और वही गंतव्य है। यदि हम जागरूक हैं, सत्व में हैं तो हमें पथ पर चलने में मज़ा आता है और यात्रा आनंदपूर्ण लगती है। जब तक हमें पथ पर चलने में आनंद आता है, हमारा रास्ता सही होता है और गंतव्य भी सही रहेगी, पर बज़ाय पथ का आनंद लेने के हम लक्ष्य की चिंता करने लगते हैं कि कब पहुंचेंगे, कहां पहुंचेंगे और इस उधेड़बुन में हम यह नहीं देखते कि कैसे हम चल चल रहे हैं। यात्रा का आनंद हम गंवाते रहते हैं।

यदि हमें पथ पर चलने का आनंद मिल रहा है तो हमें काम में भी आनंद आता है। तब ही हमारा पथ सही रहता है और हम सही ठिकाने पर पहुंचते हैं।

इसी कारण जो सफल व्यक्ति होते हैं, वे अपने काम के बारे में एक जनन पालते हैं। उन्हें इसकी चिंता कतई नहीं होती कि वे कहां पहुंचेंगे जब तक उन्हें काम में आनंद आता है। जब हमें अपने काम के बारे में जनन हो तो हमें काम करने में मजा आता रहेगा और हम जो काम करेंगे वह सफल ही नहीं, अद्भुत भी होगा लेकिन यदि काम में हमें कोई मजा नहीं आता और हम संघर्ष करते रहते हैं तो हम कष्‍ट ही पाते हैं, चाहे भले ही हम थोड़ा पैसा कमा लें। हमारा लक्ष्य सदैव एक मुगतृष्णा जैसा लगेगा-पानी एक दृष्टिभ्रम ही रहेगा और जैसे ही हम अपने लक्ष्य तक पहुंचते हैं तो हम फिर दूसरे लक्ष्य की ओर चलने लगते हैं। एक मिनट को भी हम न रुकना चाहते हैं, न आनंद लेना चाहते हैं, न चैन पाना चाहते हैं। अपनी उपलब्धि का संतोष भी हमें नहीं पाना आता। हमारा लक्ष्य कछ भी प्राप्त करना होता है. आनंद नहीं।

राजस में हम कभी सुखी नहीं रह सकते। यह हमें गधे की तरह तब तक जोते रखता है, जब तक कि हम थककर गिर ही न जाएं। हमें यह तय करने की जरूरत है कि इस ढंग से हमें जीना चाहिए या नहीं। स्वयं से पूछें-" क्या मैं एक गधे की तरह जीवनभर सामने लटकी हुई 'गाजर' के पीछे भागना चाहता हूं?'' जब हम तय करते हैं-'' नहीं! यह तो वह ढंग नहीं जिसमें मैं जीना चाहता हूं" तो यही वह क्षण होता है जब हम राजस से हटकर आनंद की ओर जाने लगते हैं।

िकाय सफलता का अवसाद

  • 14.13 हे कुरु नंदन! तमोगुण के बढ़ने पर अंत:करण और इंद्रियों में अंधेरा एवं कर्त्तव्य कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि की अंत:करण की मोहिनी प्रवृत्तियां-ये सब उत्पन्न होते हैं।
  • 14.14 जब यह जीवात्मा सत्त्वगुण की वृद्धि में देह छोड़ता है तो उत्तम कर्म करने वालों को निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों की प्राप्ति होती
  • 14.15 रजोगुण के समय मृत्यु को प्राप्त करने वाला मनुष्य कर्मा को आसक्ति वाले मनुष्यों में (दोबारा) उत्पन्न होता है; तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ पुरुष कीट, पशु आदि मूढ़ योनियों में उत्पन्न होता है।
  • 14.16 सार्त्विक कर्म का तो सात्त्विक-सुख, ज्ञान और वैराग्य आदि देने वाला निर्मल-फल कहा गया है; राजस कर्म का फल दु:ख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा गया है।
  • 14.17 सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगण से नि:संदेह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी (उत्पन्न) होता है।

राजस गुण से जब हम अभिभूत होते हैं तो हम एक चाबी भरे खिलौने की तरह बर्ताव करते हैं और तमस वृत्ति में हम बैट्री चालित उस खिलौने की तरह व्यवहार करते हैं, जिसकी बैट्री ख़त्म हो चुकी हो। कृष्ण यहां अपनी बात समझाने के लिए शक्तिशाली शब्दों का प्रयोग करते हैं और कहते हैं कि उस स्थिति में हम कितने हताश और कामुक हो जाते हैं-अपने अज्ञान, पागलपन, भ्रम अंधकार और आलस्यपूर्ण स्थिति के कारण।

आश्चर्य होता है कि राजस से तामस की ओर व्यक्ति कितनी जल्दी फिसलता है। व्याकुलतापूर्ण गतिविधियों से निष्क्रियता में या आलस्यपूर्ण जडता में फिसलना स्वाभाविक है। व्यर्थ की गतिविधियां, तनाव से बोझल गतिविधियां तथा इंद्रिय सुख पर केंद्रित दबाव युक्त गतिविधियां प्राय: गहरी थकावट देती हैं। तमस की निर्श्यक गतिविधियों की सक्रियता सत्त्व की सक्रिया से बिल्कूल फर्क होती हैं। उनमें जाहिर तो कोई उद्देश्य नहीं लगता, पर उनका लक्ष्य बहुत गृढ होता है। इन दोनों को एक ही समझने की गलती न करें।

जीवन का उद्देश्य

जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं कि राजस में असली खतरा होता है, हमारा लक्ष्य पर ही ध्यान केंद्रित रखना और रास्ते के आनंद से स्वयं को लगातार वंचित रखना, क्योंकि कोई उद्देश्य नहीं होता। हम बेमतलब आगे बढते रहते हैं। जीवन का कोई उद्देश्य होता भी.नहीं है। जीवन का अर्थ है जागरूक रहना, चेतन रहना और आंतरिक दिव्यता को महसूस करना, इसलिए तो मैंने कहा था कि मैं यहां अपनी दिव्यता नहीं, आपकी दिव्यता सिद्ध करने आया हूं।

जीवन का चरम उद्देश्य है अपनी आंतरिक दिव्यता को महसूस करना। इससे कम कुछ भी निर्श्यक है। लगातार आक्रामक होना, बेचैनी से काम करते रहना, चलते रहना इस दिव्यता को कभी महसूस नहीं करने देंगे। हम ऐसे तो एक के पीछे पडते रहेंगे. फिर दूसरों को पीछे पड़ेंगे और इस अंतहीन चक्र में उलझे रहेंगे। इस हालत में तो हम सिर्फ अपना लालचीपन दिखाएंगे। रमण महर्षि कहते हैं कि जब उसके लिए बेचैन हो रहे हो तो एक राई भी पहाड जैसी प्रतीत होती है, पर जैसे ही उसे पाया कि पहाड जैसी चीज एक नगण्य राई के दाने जैसी लगने लगती है।

जब हम अपनी संग्रहकामी इच्छा से संचालित होते हैं तो हम कभी न कभी तो इस चाह में थकेंगे ही। आक्रामकता की परिणति गहरा अवसाद होता है। इसे ही मैं कहता हूं 'सफलता का अवसाद'। अमेरिका जैसे देशों में यह व्यापकता से दिखाई पडता है। लोग पागल रहते हैं अपनी धन-संपत्ति बढाने को और सब कुछ भूलकर इसी में जुटे रहते हैं। वहां लोग हर साल कार, हर तीसरे साल मकान और हर पांचवें साल अपना जीवनसाथी बदल लेते हैं।

बिना जाने कि धन-संपत्ति संबंधी संग्रह या उनकी निशानियां एकत्रित करने से क्या होगा, लोग उनके पीछे पागलों की तरह जुटे रहते हैं। एक दिन आता है कि उनको अपनी मर्जी की चीजें मिल जाएं या वह प्राप्त कर लें

लेकिन द:ख उनका तब भी नहीं जाता, न बेचैनी दूर होती है, न चित्त में धीरज आता है। वे सब फिर सोचते हैं कि हम इन चीजों को इकट्ठा क्यों करना चाहते थे, क्योंकि उनके लिए इतनी मेहनत की और तवालत मोल ली। तब एक असंतोष पैदा होता है जो उन्हें गहरे अवसाद में उतार देता है, जिसे हम तमस कहते हैं।

भारत जैसे गरीब देशों में लोगों के पास ज्यादा कुछ तो होता नहीं इसलिए वे कम-से-कम मूलभूत सुख प्राप्त करने को लालायित रहते हैं। दिन में तीन बार भोजन कर लेना, जूते पहनकर चलना-फिरना और कॉलेज जाने के लिए सक्षम होना ही उनके लिए बड़ी ऐश है, परंतु जिनके पास ज़रूरी सुविधाएं भी नहीं होतीं, उनकी पीड़ा का उत्स होता है असफलता का अवसाद, परंतु इसको तुलनात्मक आसानी से ठीक किया जा सकता है क्योंकि वांछित सफलता की प्राप्ति ही उनको खुश कर देती है, परंत सफलता का अवसाद ठीक करना काफी मुश्किल होता है। सदा सफल रहने के बाद असफल होना, जबकि पूरी मेहनत से काम किया हो-आसानी से स्वीकार्य नहीं होता। फलस्वरूप अवसाद पैदा होता है, तमस गुण छाता है।

तमस की शूरुआत होती है अपने सही रूप की न समझ पाने या अज्ञान से। यही मूल (ओरिजिनल) पाप है। आदम और हव्वा का ओरिजिनल पाप (प्रथम पाप) न तो उस सांप की बात न सुनना था और न ही यौन क्रिया में लिप्त होना था बल्कि असली पाप था अपने अंदर को दिक्कत को न समझ पाने की क्षमता का।

कभी-कभी इस अज्ञान से बाहर आने के प्रयास भी तमस पैदा करते हैं। आध्यात्मिक पथ का राही, एक राजस में डूबा हुआ व्यक्ति जो बडे आक्रामक रूप से पादार्थिक उपलब्धियों को पीछे पड़ा रहता है, भी राजस से तमस में कुछ देर को प्रवेश कर जाता है। मैं अपने आश्रम में यह सब देखता रहता हूं। जब कोई व्यक्ति जो अभी तक निर्र्थक गतिविधियों में डूबा रहता हो, ध्यान को केंद्रित करता है तो उसका शरीर-मन तंत्र उस गतिविधि को स्वीकार ही नहीं करता और पूरी तरह निष्क्रिय होकर तमस में चला जाता है।

कुछ लोग दिन-रात सोते रहते हैं और कुछ करना ही नहीं चाहते, पर यह स्थिति ज़्यादा दिन तक नहीं चल सकती। धीरे-धीरे उसके मन की सारी ऋणात्मक प्रवृत्तियां थककर सात्त्विक क्षेत्र में आकर सार्थक गतिविधियों में जुट जाती हैं, अर्थात् उन गतिविधियों में जिनका कोई स्पष्ट लक्ष्य या उद्देश्य नहीं होता-कम-से-कम तात्कालिक रूप में।

तमस अंधकार है। ऋणात्मक है। हम इस अंधकार को प्रकाश लाकर ही दूर कर सकते हैं। इसी प्रकार हम अज्ञान को जागरुकता लाकर दूर कर सकते हैं। उपनिषद कहते हैं-''तमसो मा ज्योर्ति गम्य'' अर्थात् ''अंधकार को प्रकाश लाकर दूर करो।''

कृष्ण जगतगुरु की बुद्धिमत्ता हमारी ज़िंदगी में प्रकाश और ज्ञान लाकर हमारे अंदर का अंधकार और तमस दूर करे।

इन श्लोकों में कृष्ण हमें कहते हैं कि इन गुणों में-'सत्व, रज, तम' में ड्बा व्यक्ति मृत्यु को पश्चात् कहां जाता है। सारिवक व्यक्ति दिव्यता को प्राप्त करता है, तामसिक व्यक्ति एक निम्न सारीय जीवन चुनता है और राजसिक व्यक्ति अपने लालच के कारण निरंतर कष्ट पाता रहता है।

'गीता' को एक अन्य श्लोक में कृष्ण अर्जून को बताते हैं कि व्यक्ति जिस भाव या विचार से मृत्यु को पूर्व भावित रहता है, वह उसी में दोबारा जन्म लेता है। यहां कृष्ण बताते हैं कि अंतिम विचार कोई तुक्के से नहीं आता। इसका आधार व्यक्ति का प्राकृतिक 'गुण' ही होता है।

लोग मुझसे कहते हैं-''स्वामी जी! अभी से मैं इन आध्यात्मिक बातों की चिंत्ता क्यों करूं। यह तो मज़ा लेने का समय है। जब बुढे होंगे तब आध्यात्मिकता के बारे में सोचेंगे। वैसे भी कृष्ण ने कहा है कि हमारा अंतिम विचार (मृत्यु पूर्व) ही हमारा उद्धार कर सकता है। यानी अपनी अंतिम सांस में राम या कृष्ण का नाम ही तो लेना है, बस।''

अगर यह सब इंतना ही आसान होता तो हम सबका पुनर्जन्म होता ही नहीं। यदि जिंदगी-भर तो आप धन-सुविधा को पीछे भागते रहे हैं तो क्या समझते हैं कि आपका अंतिम विचार धन-सूविधा पर ही केंद्रित नहीं होता। यदि जीवन-भर शबाब, शराब और गाने-बजाने का फितूर रहा हो तो अंत में भी सिर्फ इन्हीं का विचार आएगा। यही विचार लेकर आप मरेंगे। वस्तूत: हमारे जीवन-भर का क्रिया-कलाप ही निश्चित करता है कि हमारा अगला जन्म कैसा होगा।

कृष्ण हमें बताते हैं कि सत्त्व गुण वाला व्यक्ति ऋषिगणों द्वारा प्राप्त उच्च लोकों में जाता है। वहां जाकर वह दिव्यता को प्राप्त होता है। जब हम सत्व गुण में रहते हैं तो हम जागरुकता पूर्ण जीवन जीते हैं। हम वर्तमान क्षण में जीते हैं। हम राग-द्वेष से मुक्त रहते हैं और अपने कार्य के फल के लिए भी व्याकृल नहीं होते, हमें तब भय या लालच नहीं सताता। इनका कोई प्रभाव हमारे मन पर नहीं होता। तब हम सिर्फ अपने बारे में नहीं, दूसरों को बारे में भी सोचते हैं। सिर्फ 'मैं और मेरा' ही हमारा विचार नहीं होता, 'तू और तेरा' भी हम सोचते हैं। तब 'तम' में 'मैं' भी शामिल रहता है और सारे क्रिया-कलाप बिना शर्तों के चालू रहते हैं।

वर्तमान स्थिति शाश्वत होती है। यह उच्च लोकों या उस स्वर्ग की होती है जिसके बारे में हम कल्पना करते हैं। तब तो हम इसी जीवन में स्वर्ग का आनंद भोग सकते हैं। जब आत्मा शरीर से परे जाने को सक्षम होती है तो यह संस्कारों के परे भी जा सकती है और अपनी सत्य-स्थिति: आत्मानुभति, प्राप्त कर सकती है।

जब कोई व्यक्ति तमस में डूबा हो अर्थात गहन अज्ञान के अंधकार में तो अगले जन्म में वह और निम्न स्थिति को प्राप्त होता है। कृष्ण के अनुसार ऐसा व्यक्ति जानवर को रूप में दूसरा जन्म पाता है। मानव शरीर में निम्नतम ऊर्जा क केंद्र 'मूलाधार चक्र' में होता है जो रीढ की हड़डी को मूल में स्थित रहता है और जो मौन भाव का भी केंद्र है। जानवरों को लिए यह उद्यतम केंद्र है, जहां से ऊर्जा विसर्जित होती है। सारे जानवर अपनी जिजीविषा की सहज वृत्ति पर काम करते हैं यानी सिर्फ जीते रहने की इच्छा को कायम रखने की सहज वृत्ति। उनकी प्रकृति का अनुकूलन भी इसी तरह होता है। इसमें कोई निम्नतम या नीयता की बात नहीं होती, यह तो उनकी प्रकृति ही होती है, लेकिन मानवों में बुद्धिमत्ता होती है, जो उन्हें चेतना के उच्चतर स्तर पर ले जा सकती है। हमारे पास गलतियां करने की भी स्वतंत्रता है और हम गलतियां करते भी रहते हैं। जब कृष्ण कहते हैं कि अज्ञान वृत्ति के कारण जानवरों में जन्म होता है तो वे कोई जानवरों को योनि को नीचा दिखाने की बात नहीं कर रहे। वे तो यह कह रहे हैं कि जो मानव अपनी सहज वृत्ति से काम करते हैं, चूंकि मूलाधार चक्र रुका रहता है, वे जानवरों को तरह बर्ताव करते हैं क्योंकि उनको यह नहीं मालूम रहता कि मानव को रूप में उनकी क्या क्षमताएं हैं।

हम लोग वह मानव नहीं जो आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं वरन् वह आध्यात्मिक जीव हैं जो मानव-अनुभव से गुजर रहे हैं। यह सत्य है लेकिन हम इस स्थिति में तभी तक रह सकते हैं जब हम सत्त्व गुण में रहें क्योंकि तमस में जाते ही हम अपनी आध्यात्मिक प्रकृति से विमुख हो जाते हैं। जब हम राजस में होते हैं, तब हम एक धुंधला-सा विचार ही होता है, पर वह आध्यात्मिकता का विचार, वह अनुभव हमारे अंदर एक आसक्ति पैदा करता है जिसमें एक लक्ष्य और उसके प्राप्ति को इच्छा पनपने लगती है। तब हम एक ऐसी रागात्मकता में पड़ जाते हैं जो वस्तुत: आसक्ति से परे होती है। कृष्ण कहते हैं कि हम इस मानव-स्वरूप में दोबारा जन्म लेते हैं और पुन: जन्म-मृत्यु को चक्र में पड़ जाते हैं, यानी इस संसार में पुन: इसके कष्ट भोगने को।

तो यह हमारी रुचि पर निर्भर है कि हम सहज वृत्ति अपनाकर चेतना से विमुख रहें, गहरे तमस में रहें-एक जानवर की तरह या तार्किक बुद्धि का प्रयोग कर विषय भोगों के पीछे पडे रहें राजस गण के प्रभाव में। तीसरा विकल्प है मारे राग-द्रेषों से परे जाकर एक अति चेतन स्थिति में रहना और सत्त्व गण में अंतर्र्यजा के साथ रहना। हमारी यही रुचि या विकल्प का चुनाव निर्धारित करता है हमारा अगला जीवन कैसा होगा बल्कि यह भी कि अगला जन्म होगा भी या नहीं।

क्ष्ण एक निष्णात् मनश्चिकित्सक की तरह बिल्कुल सही बात कहते हैं-सत्त्व द्वारा ज्ञान प्राप्ति और पवित्रीकरण; त्रास और लालच राजस से तथा मर्खता, विमृठता और भ्रांत हरना, तमस में प्राप्त होता है। अज्ञान से ब्रद्धिमत्ता की ओर जाना और लालच में कृतज्ञ भाव की ओर जाना, द्योतक है सत्त्व गुण के चालक का - यानी केंद्रस्थ होने की स्थिति का।

हमारा केंद्रीय भाव हमारी मूल प्रकृति बनाता है। वस्तुत: हमारी असली प्रकृति दैवी होती है। हम वह हैं जो ईश्वर, पराशक्ति या जो भी सार्वभौमिक सत्ता को हम नाम दें, के साथ पैदा होते हैं। यह सत्ता वर्णनातीत है; इसका केवल अनुभव किया जा सकता है। हम आनंद का अनुभव करते हैं जब हमारा ध्यान उस मध्यस्थ केंद्र की ओर होता है. हमारे व्यक्तित्व की बाहरी सतह पर नहीं। सारी जिंदगी हम इसी केंद्रस्थ स्थिति से भागते रहते हैं. जहां हमारे आनंद का उद्गम होता है। हमारी इंद्रियां बार-बार हमें बाहरी सतह पर ले आती हैं जहां विषय-भोग के साधन उपलब्ध रहते हैं. तब हमारा आंतरिक भाव खाली रहता है, शून्य रहता है परंतु पूर्ण रहता है, क्योंकि यह स्वत: संपूर्ण होता है और इसको आनंदानुभृति के लिए किसी बाहरी सहारे की जरूरत नहीं होती, लेकिन बाहरी सतह सर्वदा परिवर्तनशील रहती है। यहां कुछ भी शाश्वत नहीं होता, क्योंकि भले ही विषय-वस्तु न बदले, पर उनके बारे में हमारी समझ बदल जाती है। यही बाहरी सतह 'माया' है, भ्रम है, तमस है और अज्ञान है।

हमारी राजसिक प्रवृत्ति अर्थात् वह व्याकुलतापूर्ण गतिविधि, जो किसी निरर्थक काम में कोई उद्देश्य डालने का असफल प्रयास करती है, हमें बार-बार केंद्र से बाहरी सतह पर लाने का प्रयास करती रहती है उस क्षेत्र में, जो तमस के अंधकार और 'माया' से भरा है। राजस सदैव हमें तमस की ओर ढकोलता है। आक्रामकता, वासना, रागात्मकता और अंतत: विरक्ति का भाव हमें विभूम और अज्ञान में ही ले जाता है, पर कभी-कभी हम में बुद्धिमत्ता की चिंगारी फूटती रहती है जो हम से कहती है कि जीवन इस प्रकार नहीं जिया जाना चाहिए। जीवन मात्र कपोल कल्पना ही नहीं, इसके गहरे अर्थ भी हैं और वह हम खोजने लगते हैं। जब हम अपनी मूल या सही प्रकृति को खोज लेते हैं, तब हम केंद्रस्थ होने लगते हैं, वह मूल बिन्दु जहां आनंद का स्रोत है। तभी बाहरी विश्व की कोई चीज हमें पुन: आकर्षित करती है और हम फिर सतह पर आने लगते हैं। इस प्रकार इस केंद्र से परिधि और परिधि से केंद्र की ओर आते-जाते रहते हैं।

। इसीलिए मैं कहता हूं कि मानव स्वभावत: सनकी होते हैं क्योंकि वे न केंद्रस्थ रहते हैं, न परिधिस्थ। वे इन दोनों के बीच झूला-सा झूलते रहते हैं। इसलिए वे सदा 'खिसके' हुए रहते हैं-न पूरी तरह विमुढ, न पूरी तरह दिव्य चेतना में आसीन।

जब हम अपने मूल केंद्र की तरफ बढ़ते हैं यानी अपनी असलियत की ओर तो हम सत्त्व द्वारा संचालित होते हैं। बाहर की ओर खींचने वाला गुण राजस प्रकृति से आता है और जब हम सतह पर ही पूरी तरह स्थित होते हैं तो हमारा संचालक तमस होता है। तब तो हम मनुष्य भी नहीं रह पाते, जब हम केंद्रस्थ होते हैं यानी अपनी मुल प्रकृति से एकात्म रहते हैं तो हम इन तीनों गुणों को परे चले जाते हैं, त्रिगुण-रहित या त्रिगुणातीत हो जाते हैं यानी उस दिव्य सत्ता में जो इन तीनों गुणों की पहुंच से परे होती है।

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14.18 सत्त्वगूण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं और रण रिली रजोगण में स्थित पुरुष मध्य में अर्थात् मनुष्य लोक में ही रहते किसी ( F 1 8 हैं एवं तमोगुणी पुरुष कार्यरूप निद्रा, प्रमाद, आलस्यादि में दिन मिल स्थान स्थित हुए अद्योगति (अर्थात् कीट, पशु आदि नीच योनियों निष्ट में Bharat तथा नरकादि) को प्राप्त होते हैं। को प्राप्त होते हैं। को क्या न 14.19 जिस समय दुष्टा तीनों के अतिरिक्त अन्य किसी कर्त्ता को क कराई कि महीं देखता और तीनों गुणों को अत्यंत परे (सच्चिदानंद स्वीन स्वरूप) मुझ परमात्मा को तत्त्वत: जानता है तो उस समय वह क्त पैसु मार को मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। के शिक्ष्ठ मिश्र मिश्र मिश्र मिश्र मिश्र में ही है। हा 14.20 वह पुरुष स्थूल शरीर की उत्पत्ति को कारण स्वरूप इन तीनों गुणों का उल्लंघन (षाद) कर जन्म, वृद्धावस्था और सब ा कि मनाव प्रकार के दु:खों से मुक्त होकर परमानंद को प्राप्त होता है।

कृष्ण यहां मुक्ति द्वार की कुंजी प्रदान करते हैं। जो त्रिगुणातीत हो जाते हैं, वे सर्व बंधनों से मुक्त होकर इसी विश्व में आनंद प्राप्त करते हैं। ये श्रीकृष्ण यहां आश्वस्ति प्रदान करते हैं। कोर्मा मिल्कूल किस्कारिक का है कि है।

ा इसका प्रथम चरण वह है जब हम समझ लेते हैं कि हमारी सारी गतिविधियां तीनों गुणों-संत्व, रज या तमस से ही पैदा होती हैं (अर्थात् किसी-न-किसी गुण में उनका उत्स होता है)। दूसरा चरण यह समझ लेना कि कौन-सा गुण इनका उत्स है और वह गुण हमें कैसे प्रभावित कर रहा है। तीसरा चरण है उस गूण से निकलकर सत्त्व गुण की ओर चलना। अंतत: हम सत्व गुण से भी परे जाकर निर्गुण स्थिति में स्थापित हो जाते हैं अर्थात् जो कुछ भी हम करते हैं, हमें उसका ज्ञान होना चाहिए कि यह क्रिया किस गुण द्वारा संचालित है। यदि यह मात्र एक कपोल-कल्पना है तो उसका उत्स तमस में ही होता है। यदि भय और लालच इसका संचालन करता है तो यह राजस का प्रभाव है और . FIFTE EIFFER TIS FIP FEET BE The FA FOR FAT THE FEBS BEA

यदि हम सबसे विरक्त हैं और अपने चारों ओर होने वाली किसी भी गतिविधि से अक्षब्ध रहते हैं तो हम सत्त्व गुण द्वारा संचालित हैं।

कल्पना या लालच से परे जाने के लिए संस्कारों में प्रतिकूलन या मुक्ति आवश्यक है. यानी उन स्मृतियों से जो हमारी चेतना में गहरी घुसी हैं। चेतना के स्तर पर तो ऐसा करना आसान नहीं और अचेतन के स्तर पर ऐसा करना खतरनाक भी है। यह तो महाचेतना के स्तर पर ही किया जा सकता है, जिसके लिए ध्यानादि के अभ्यास जरूरी हैं, जो हमारे 'एनएसपी कोर्सेज़' में बताए जाते हैं।

इस सबसे मेरा तात्पर्य आप समझे? हमने उन संस्कारों की बात की जो गहन स्मृतियों के रूप में हमारे अचेतन में 'खुदे' रहते हैं। यही हमें तीनों गुणों के माध्यम से संचालित करते हैं। हम इन्हीं तीनों गुणों के एकल या मिश्रित प्रभाव में अपना कर्म करते रहते हैं। यही विचार या कर्म दोहराए जाते हैं जो संस्कारों को या हमारे सुक्ष्म मानस, वासना इत्यादि से गूजर कर हमारी मूलवृत्ति निर्धारित करते हैं। चेतन, तार्किक या विश्लेषणात्मक प्रक्रियाएं इनको ठीक से पहचान भी नहीं पातीं-इनका परिशोधन करना या विलीन कर पाना तो बहुत दूर की बात है। इसलिए तथाकथित कैथेरीसिस (भाव-विरेचन या भाव-शांति) इत्यादि से हमें क्षण स्थायी चैन ही मिलता है, क्योंकि ऋणात्मक भाव पूरी तरह निकल ही नहीं पाते, क्योंकि हमारे मन की मूल ऋणात्मकता तो गहरे रूप से दबी ही रहती है।

इसलिए सर्वप्रथम हमें अपने विचारों और कर्म के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। पहले उन्हें पहचानें कि वे किस गृण से उत्पन्न होकर आपके मन में आ रहे हैं। यदि विश्वद्ध कल्पना है तो तमस से आएंगे, यदि ऐसा है तो तुरंत कल्पना को छोड़कर वर्तमान वास्तविकता की ओर अपना ध्यान मोडें, पर ज्यादातर लोगों में समस्या यह रहती है कि कल्पना वास्तविकता से ज्यादा रोचक लगती है। हम वर्तमान से ज्यादा कल्पना में आनंद लेते हैं। आपको समझना चाहिए कि यह प्रक्रिया विशुद्ध अज्ञान का प्रतिफल है और इससे आपको कोई सहायता नहीं मिल सकती। यह समझ आपको एक काल्पनिक दुनिया से निकाल सकती है जो ध्यान पद्धति के द्वारा संभव हो सकता है क्योंकि ध्यान आपको आत्म-ज्ञान देता है। व क

इसी प्रकार जब हम राजस गुण से संचालित होते हैं तो हम विषय-भोगों के प्रति आकर्षित होते हैं और उससे दूर भागते हैं, जो हमें क्षुब्ध करता है। हमें समझना है कि यह एक विषय चक्र होता है-राग-विराग का अर्थात् लालच और भय का। जितनी ज्यादा हमारी कामना होगी उतनी ही कम हमें प्रसन्नता मिलेगी। जब तक हम भयाक्रांत करने वाली चीज़ के प्रति मुड़कर उसका सामना नहीं करेंगे, उतना ही भय बढ़ता रहेगा। इस सबसे मुक्ति पाने का एकमात्र साधन है 160 श्रीमद्भगवत गीता

ध्यान करना। ध्यान हमें इस विषय चक्र के बारे में जागरूक करता है और इस परी प्रक्रिया को प्रति तटस्थ या विरक्त बनाता है।

यदि हम बार-बार ध्यान करते रहेंगे तो हम अपने संस्कारों से भी मक्ति पा सकते हैं और यह मुक्ति हमें उस गण के प्रभाव से भी रिहा करेगी जिसमें हम अभी फंसे पड़े हैं, तभी हम निरासक्त हो सकते हैं और अपनी स्मतियों के भावात्मक भार से मुक्ति पा सकते हैं। हम अपनी ऋणात्मकता से भी त्राण पा सकते हैं और अपने चक्रों की फंसी ऊर्जा को भी ध्यान को द्वारा मुक्त कर सकते हैं। यही इस मुक्ति की कुंजी है।

मुझे किसी ने हॉलीवुड में बताया था कि सारे चलचित्रों (सिनेमा) के प्लाट (कथानक) इन्हीं चक्रों के भावनात्मक अवरोधों पर आधारित होते हैं। यही हम अपने प्रथम स्तर के 'लाइफ बिलस प्रोग्रामों' में सिखाते हैं। इन चक्रो के प्रभाव से हमारा वास्तविक जीवन ही नहीं, वरन कल्पना भी प्रभावित होती रहती है अर्थात इन चक्रों और इनके भावात्मक अवरोधों का ज्ञान हमें अपने नैसर्गिक गणों की भी समझ देता है और यदि गुणों के बारे में सही समझ आ जाए तो हमारे आनंद का द्वार खोलने वाली राह हमें प्राप्त हो जाएगी।

Top, Fire Tim man IF P = 1 W 1 Join > Fire - जो गुणातीत होता है वह इन गुणों को खेलों से प्रभावित नहीं होता। वह भावनाओं को प्रभाव से भी अछूता रहता है। उसके लिए तो जो कुछ भी होता है वह सही ही है। सफलता और असफलता उसके लिए एक-सी है: मित्र और शत्र में कोई अंतर नहीं रहता। धन और दरिद्रता भी उसके लिए समान अवस्थाए ही हैं। ar r

ऐसा परम निरासक्त भाव तभी आ सकता है जब हमें (भगवान पर) परा भरोसा हो। जब हमें भरोसा होता है कि जो भी हो रहा है वही होना चाहिए और जो भी होता है वह उसी प्रकार हमको ग्राह्य है, तब हम पुरी तरह राग-द्वेषों को परे, निरासक्त हो सकते हैं। तब हमें हर 'होनी' सही लगेगी। यह भरोसा तो तभी आता है जब हम पुरी तरह समर्पण कर देते हैं।

मैं अपने शिष्यों से कहता हूं कि चूंकि मेरा कोई घर नहीं है, इसलिए मैं जिस घर में पहुंचता हूं वही मेरा घर हो जाता है-चाहे वह किसी पेड की छांव हो या किसी का महल। दीवारों-दरवाजों पर ताला मारने से मेरा घर नहीं बनता। लोग पुछते हैं कि मैं ऐसे जेवरात और पोशाकें क्यों धारण करता हूं? इससे क्या . फर्क पैदा होता है? यह शरीर भी मेरा नहीं है-यह त्वचा भी मेरी नहीं है तो क्या फर्क पड़ता है कि इस पर मैं क्या धारण करता हैं।

यहां कोई न आकर्षण है, न वितृष्णा। जैसे लोग पुतले-पुर्तलियों को बाज़ारों में वस्त्र और जेवरात धारण किए देखते हैं, वैसे ही मैं इस शरीर पर धारण किए वस्त्रों और जेवरात को देखता हूं। मेरा उनसे कोई जुडाव नहीं बंधता।

मेरी हर गतिविधि अस्तित्व का आदेश मानती है। बिना उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा की अनुमति के मैं तो अपनी अंगूली भी हरकत में नहीं ला सकता। प्राय: जब लोग ईश्वर का हवाला देते हैं तो ईश्वर उनके लिए मात्र एक विचार या अवधारणा के और कुछ नहीं होता-जिसको सिद्ध करना है या नहीं करना है, पर प्रबुद्ध समाज के लिए ईश्वर एक वास्तविकता है-उतनी ही वास्तविकता जितना उनका अपना अस्तित्व है-हर क्षण। जब लोग अपनी ओर निहारते हैं तो उनका मैं या पहचान उनको संचालित करता है। प्रबुद्ध लोगों के लिए वह पहचान वास्तविक नहीं होती। उनके लिए तो 'मैं' का भाव होता ही नहीं।

जब हम प्रकृति या अपने अस्तित्व के साथ एकात्म हो जाते हैं तो हमें कछ भी प्रभावित नहीं करता। मैं Bharat में लाखों मील पैदल भ्रमण कर चुका हूं। लोग पूछते हैं-" आपके पांव अभी तक इतने नरम कैसे हैं-उनमें बिवाई क्यों नहीं पड़ीं, वे फटे क्यों नहीं? हमारे तो दस मील चलने से ही ऐसे हो जाते हैं।'' मैं उनसे कहता हूं-''यदि प्रकृति या ईश्वर पर पूरा भरोसा करोगे तो प्रकृति या ईश्वर तुम्हारा पूरा ख्याल रखेगा।''

श्रीमद्भगवत गीता

गुणों के परे जाना

14.23.

श्री भगवान बोले-''हे पाण्डव (अर्जून)! जो पुरुष (सत्वगुण के कार्यरूप) प्रकाश को और (रजोगुण के कार्यरूप) प्रवृत्ति तथा (तमोगण के कार्यरूप) मोह को भी न प्रवृत्त होने पर बरा समझता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है: 24, 25 जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता (या किया जा सकता हो) और 'गुण-गुण में बरतते हैं'-ऐसा समझता हुए जो परमात्मा में एकीभाव में स्थित रहता है एवं उस स्थिति से कभी विचलित नहीं होता; और जो निरंतर आत्मभाव में स्थित, दु:ख-सुख को समान समझने वाला, पत्थर और स्वर्ण में भेद न करने वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला एवं अपनी निंदा या स्तृति में भी समान भाव वाला है; जो मान-अपमान में समभाव से रहता है और मित्र तथा दुश्मन के साथ समान व्यवहार करता है, वह संपूर्ण पहलों (क्रिया कलापों) में

अर्जुन ने पूछा-इन तीनों गुणों से अतीत परुष किन लक्षणों से

युक्त होता है और उसका आचरण कैसा होता है तथा हे

प्रभो! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है?

कर्त्तापन के अभिमान रहित पुरुष गुणातीत कहा जाता है।

श्रीमदुभगवत गीता

काफी स्पष्टता के साथ यहां कृष्ण हमें बताते हैं कि हमें क्या करना चाहिए। वह इतने खास शब्दों से बात समझाते हैं कि जिसको न गलत समझा जा सकता है, न उनकी गलत व्याख्या ही हो सकती है। कृष्ण यहां गुणातीत व्यक्ति की पहचान बताते हैं यानी जो इन गुणों की पहुंच से परे है। वे कहते हैं कि हमें त्रिगुण रहित होना चाहिए तभी हम इन गुणों के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो सकते हैं।

दिव्यता की अभिव्यक्ति

14.26 और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग द्वारा निरंतर मुझको भजता वह इन तीनों गुणों को भलीभांति लांघकर (सच्चिदानंद) ब्रह्म का दिया। एकीभाव से लीन होने को योग्य बन जाता है। बाद पर ह 14.27 क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म और अमृत तथा नित्यधर्म का और ि । अखंड एकरस आनंद का आश्रय में हैं।

कृष्ण इस अध्याय का समापन यह कहकर करते हैं कि भावातीत स्थिति इन तीनों गुणों की प्रकृति से परे होती है और वही ब्रह्म के समस्त ब्रह्मांड की परम चेतना है। वे कहते हैं कि इसको भक्ति द्वारा भी पाया जा सकता है। यह भी कहते हैं कि वही वे ब्रह्म हैं-अखंड आनंद के शाश्वत स्रोत हैं।

कृष्ण यहां परब्रह्म कृष्ण के रूप में बोलते हैं अर्थात् उस चरम सत्ता के रूप में, न कि वासुदेव कृष्ण के रूप में अर्थात् वे एक व्यक्ति के रूप में नहीं बोलते। परब्रह्म कृष्ण और वासुदेव कृष्ण में अंतर क्या है? साधारण व्यक्ति के मामले में यह कहा जा सकता है कि उसमें दिव्यता की संभावना छिपी तो रहती है, पर वह उसे समझ नहीं पाता। इसलिए वह अलग लगता है। यही अंतर है आप में और एक प्रबुद्ध स्वामी में, दोनों में दिव्यता होती है-पर आप उसे पहचान नहीं पाते जबकि प्रबुद्ध स्वामी इसके बारे में पूरी तरह से अवगत होता है। जान

कृष्ण तो स्वयं ही एक स्वामी हैं (जगत स्वामी) तो फिर उनके व्यक्ति रूप और परब्रह्म रूप में क्या अंतर रह सकता है। असल में इस अंतर की अनुभूति तो हमें होती है, उनको नहीं। क्योंकि परब्रह्म कृष्ण जिस आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) पर संचार करते हैं वह मर्त्य लोगों के द्वारा न देखी जा सकती है, न पहुंचाई जा सकती है। इसलिए अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की गई थी जिससे वे कृष्ण का 'विश्व-रूप' देख सकें। यानी अर्जुन कृष्ण का घनिष्ठतम मत्य साथी, उनका मानव रूपी दार्पणिक प्रतिबिम्ब भी उनका वह रूप नहीं देख सकता था जब तक कि उसको ऐसी शक्ति न मिले। प्रकाश

श्रीमद्भगवत गीता

वस्तत: सख और दु:ख भी हमारे अनुकूलन (पालन-पोषण में प्राप्त किए गए संस्कार) का हिस्सा हैं। अपने परिव्राजक दिनों (जब मैं घुमता रहता था) में एक बार मैं मध्य Bharat के एक गांव में पहुंचा। वहां मैंने गर्भवती महिलाओं में एक खास बात देखी-प्रसव में उन्हें कोई भी पीड़ा नहीं होती थी। ऐसी महिलाएं, उनके लिए बनाई गईं ख़ास झोपडि़यों में प्रसव के लिए चली जाती थीं। उन झोपडि़यों से कभी कोई चीख-पुकार की आवाज नहीं आती थी। वे उनमें अकेले ही जाती थीं और मुस्कुराते हुए अपने सद्य प्रसवित शिशु के साथ बाहर आती थीं। मुझे बड़ा आश्चर्य होता था। मैंने एक बड़े-बुजुर्ग से पूछा कि कैसे उनको कोई पीडा नहीं होती और कैसे वे बिना किसी धाय या 'मिड-वाइफ के या डॉक्टर के प्रसव करती हैं? उनको मेरी बात समझ में नहीं आई-"पीडा?" उन्होंने कहा-''कैसी पीड़ा? बच्चा जनने में महिला को क्यों पीड़ा होनी चाहिए? यह तो जश्न मनाने का समय होता है।''

अर्थात् हम सुख-दु:ख या पीड़ा और हर्ष भी अपनी संगति के कारण उत्पन्न करते हैं जो हमारे अनुकूलन का फल होता है। इसी प्रकार हम लालच और भय का सुजन भी अपनी संगति या अनुकूलन के कारण करते हैं-हमारे संस्कार ऐसे होते हैं जो हमारी अनुकूलित स्मृतियों को कारण हमें सुख या दु:ख की अनुभृति कराते हैं।

वस्तुत: हमारा अनुकूलन या 'अप-ब्रिंगिंग' का नाम 'डाउन-ब्रिंगिंग' होना चाहिए, क्योंकि ऐसा पालन-पोषण हमें ऊपर नहीं, नीचे की ओर ले जाता है। यह हमारा अनुकूलन ही है जो हमारे अंदर ऋणात्मकता भरता है। यह समाज का वह तरीका है जिससे वह सुनिश्चित करता है कि वह हमें भय या लालच के माध्यम से नियंत्रित करता है।

हमारे 'एनएसपी मेडीटेशन्स' इस प्रकार तैयार किए गए हैं कि वे हमारे इसी अनुकूलन, संस्कारों या जमी स्मृतियों को गला दें। भारत के इस चार दिवसीय कार्यक्रम (विदेशों में दो दिवसीय) के अंत में लोग एक-दूसरे को पैरों पर पड़ते हैं, बिना किसी आयु, लिंग, धन या वर्ग का ख़्याल किए। उनकी सारी ऋणात्मकता तिरोहित हो जाती है। उस उच्च स्तरीय ऊर्जा क्षेत्र में पहुंचकर और फिर वे साधक सभी में एक ही दैवी तत्त्व का दर्शन करने लगते हैं। मैंने स्वयं इस प्रोग्राम के अंत में कई ससुरों को अपनी पुत्रवधुओं के पैरों पड़ते देखा है। शायद हिंदू सांस्कृतिक पद्धति में तो इसका कोई विश्वास भी नहीं कर सकता।

इसलिए यदि साधारण मानवों तक उनकी बात पहुंचे, उनसे अंतर-क्रिया हो सके. इसके लिए आवश्यक था कि परब्रह्म वासुदेव कृष्ण के रूप में ही संचारण करें। यानी कुछ हद तक उनको भी इन गुणों के खेल में आना आवश्यक था।

वस्तत: हर प्रबुद्ध स्वामी की दिव्यता उसके अपने अनुभव की अपनी अभिव्यक्ति अद्वितीय और अनूठी होती है। हमारे शास्त्र तो कहते हैं कि यदि दो प्रबुद्ध स्वामी एक-सा ही अनुभव बताएं तो ज़रूर उनमें से एक झूठा है। अनुभव एक-सा हो भी सकता है, पर अभिव्यक्ति तो अलग रहेगी ही। कृष्ण अलग हैं और बुद्ध या क्राईस्ट बिल्कुल अलग। यद्यपि इनमें हर एक का अनुभव आधार करुणा है, पर हर एक इसकी अभिव्यक्ति अलग रूप में करता है। बुद्ध ने इसको 'ध्यान' के रूप में अभिव्यक्त किया और कृष्ण इसे 'मुक्त आनंद' के रूप में व्यक्त करते हैं तो हम एक ऐसे स्वामी का चुनाव करें जिसके चुनने का आधार उसकी अभिव्यक्ति द्वारा हमारे मन को स्पंदित करने का ढंग हो। यदि हमारा मार्ग भक्ति का है तो हम कृष्ण को ओर जाएंगे, क्योंकि वह प्यार करने योग्य हैं-प्रिय हैं। यदि हम ध्यान मार्गी हैं तो हम शिव की ओर जाएंगे जो सारा ज्ञान मौन के माध्यम से देते हैं। हर ना जिसमें कहत

वैसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारा स्वामी कौन है-असली बात है हमारे विश्वास की, उस पर हमारे भरोसे की और उसके सन्मुख हमारे समर्पण के तरीके की। हमारा स्वामी अप्रबुद्ध व्यक्ति भी हो सकता है, लेकिन यदि हम उस पर भी पूरा भरोसा करें तो भी हम प्रबुद्ध हो सकते हैं, चाहे वह स्वय अप्रबुद्ध ही रहे। अत: सारी बात हमारे व्यवहार, तरीके या हमारे 'गुण' की है-स्वामी की अवस्था से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि हम पत्थर को भी पूरी श्रद्धा से पूजते रहें-उसे अपना उद्धारक समझते रहें तो भी हम मुक्त हो सकते हैं, यह बिल्कुल सत्य है। बाद HPPP के अन्य करता हिस्क किस क्रमित

तो आइए, हम उस उस परम चेतना ब्रह्मांडीय ऊर्जा, परबह्म कृष्ण की प्रार्थना करें कि वे हमें जीवन में ऐसी ही समझ दें जिससे हम उनके बताए हुए सत्य को आत्मसात कर उस अवस्था में पहुंच जाएं जहां हम स्वयं भी शाश्वत आनंद-'नित्यानंद' को प्रकाशित करने लगें। - करने जा

इस प्रकार योग के एक शास्त्र 'उपनिषद भगवत् गीता' का चौदहवा अध्याय-'गुणत्रय विभाग योग' संपन्न होता है, जिसमें कृष्ण और अर्जुन के मध्य सवाद द्वारा परमात्मा पर चर्चा को गई है। । कि

कोई प्रश्न नहीं, कवल संश्राय प्रकर्षात्रयं यागा

जब हम प्रश्न करते हैं तो हम अपना अज्ञान एव आक्रामकता प्रकट करते हैं; जब हम संशय हैं तो हम अपना अज्ञान दिखाकर स्पष्टितता प्राप्त करना चाहते हैं।

श्रीमदभगवत गीता

हैं। सब महान स्वामीगण यथा बुद्ध और लाओत्से को सदा प्रश्नों से वितृष्णा ही रही है। बाद पार्

संशय जरूरी है

गुरु हम लोगों तक अपने अनुभव पहुंचाते हैं जिसमें एक तरह की ऊर्जा का संचारण होता है। शब्दों के माध्यम से इस अनुभव को बताना संभव नहीं होता. क्योंकि शब्द-बंधन उस अनुभव को झूठलाने लगता है। शब्दों में बंधकर वह अनुभव अपना अर्थ खो देता है। लाओल्से कहता है-"यदि सही रूप में सत्य का अनुभव किया गया है तो वह बयान किया ही नहीं जा सकता और यदि वह बयां हो सकता है तो वह सत्य नहीं है।''

अर्जुन के प्रश्न उसके मन में उठे संशय से उत्पन्न हुए थे। वह एक क्षत्रिय था और मरने-मारने का उसे अभ्यास था। उसका कुरुक्षेत्र की रणभूमि में उठा संशय केवल मरने-मारने के बारे में नहीं था। उसका संशय था अपने रिश्तेदारों, हितैषियों और प्रियजनों को मारने के बारे में। उनके संशय का उत्स अहिंसा के सिद्धांत की देन नहीं था, क्योंकि यदि ऐसा होता तो कृष्ण का उसको युद्ध करने के बारे में कहना, संदेहास्पद हो जाता। -

वस्तुत: अर्जून का संशय, अवसाद, शक और इनसे उत्पन्न हुए प्रश्न उसके 'अहम्' या 'मैं और मेरे' को भाव से उत्पन्न हुए थे। उसके सामने युयुत्स योद्धा इकट्ठे थे, उनसे उसे युद्ध करना था-मारना था या उनके द्वारा मरना था। वे कोई आम लोग नहीं थे। यह उसके मन की अपनों के प्रति संग्रहशीलता का भाव था, न कि अहिंसा के प्रति भक्ति, जिसने उसके मन में संशय उत्पन्न किया था। 'संग्रह-शीलता' कि वे मेरे 'अपने' हैं। -- एक र दि काफ शास्त्र में काफ शास्त्र में

यही भ्रम था जो उसके मन में संशय उत्पन्न कर रहा था। उसका मानना था कि उसके सामने जो योद्धागण उपस्थित थे वे उसके अपने रिश्तेदार, गुरुजन या मित्रगण थे, जिनसे लड़ने का उनका समाज उसे कोई अधिकार नहीं देता। बतौर एक योद्धा के अर्जुन के मन में कोई दुविधा या नैतिक अड़चन नहीं थी लोगों को मारने में। इसलिए उसके अपने अहमु से उत्पन्न आक्रामकता या अपने संग्रह-शीलता (कि ये सब मेरे हैं) भाव से उत्पन्न हिंसा ही उसका मुख्य अवरोध बनकर खड़ी थी। इससे नैतिकता या अहिंसा का कोई संबंध नहीं था।

अर्जुन को मन में सिर्फ वे ही प्रश्न नहीं थे जो उसके व्यक्तिगत भाव से संबंधित थे, वे संशय भी थे जो वह समस्त मानवता को हित के लिए दूर करवाना चाहता था। अब इन प्रश्नों का मूल बिन्दु बिल्कुल दूर हो गया। इनका सिर्फ 'करना या न करना' या 'करना चाहिए या नहीं' से संबंध नहीं रह गया

कोई प्रश्न नहीं : केवल संशय

भगवत् गीता के पंद्रहवें अध्याय में सिर्फ कृष्ण ही बोलते हैं, अर्जुन एक शब्द नहीं बोलता। अर्जुन का आंतरिक द्वंद्व अब शांत हो चुका है, फलस्वरूप उसके मन से प्रश्न लप्त हो जाते हैं।

कृष्ण यहां बताते हैं कि वे कौन हैं और क्या हैं। पारंपरिक रूप से इस अध्याय का शीर्षक 'पुरुषोत्तम योग' है अर्थात् परम ब्रह्म का योग। कृष्ण बताते हैं वह कारण जिससे वे पुरुषोत्तम हैं अर्थात् सब जीवों में सर्वश्रेष्ठ और स्पष्ट करते हैं कि जो उन्होंने अर्जुन को बताया है वह एक गूढ़तम रहस्य का उद्घाटन है। अब कृष्ण आश्वस्त हैं कि अर्जुन सत्य ग्रहण करने को तैयार है।

अर्जुन अब आत्म-निष्ठ हो चुके हैं। उनके संशय विलीन हो चुके हैं। वे संशय जो विश्व-रूप दर्शन की अनुभूति में विगलित हो चुके हैं, जिसमें उन्होंने कृष्ण का विराट रूप देखा था। अब वह दर्शन अर्जुन का अपना आध्यात्मिक अनुभव बन चुका है। अब उसे वह ज्ञान पूरी गहराई को साथ प्राप्त हो चुका है, उसकी समझ भी स्पष्ट है जिसके द्वारा कृष्ण को दिए हुए संपूर्ण ज्ञान को वह आत्मसात कर सके। उसे आध्यात्मक अनुभूति पूरी तीव्रता के साथ प्राप्त हो चकी है। अब तो वह एक नया जीव बन चुका है। यह बनाए

इसके बाद अर्जुन के मन में कोई बौद्धिक संशय पैदा नहीं होता। इसलिए वह प्रश्न भी नहीं करता। वह उस स्थिति में आ चुका है जब वह कृष्ण (को दिए ज्ञान) को संपूर्णता से ग्रहण कर सके। अर्जुन अब विचारपूर्णता को अवस्था, जिसमें वह प्रश्नों से ओत-प्रोत था, आगे बढ़कर विचारहोनता या मस्तिष्कहीनता की स्थिति को प्राप्त हो चुका है जिसमें कोई प्रश्न नहीं उठता। सब प्रश्न तिरोहित हो चुके हैं। बाहरी के

जब तक हमारे मन में प्रश्न घुमड़ते रहते हैं, हमें उत्तर नहीं मिलता, चूंकि ये प्रश्न हमारे पूर्वाग्रहों को कायम रखने और समझ की सीमितता को चालू रखने के उद्देश्य से होते हैं। यही प्रश्न होते हैं जो हमारे ज्ञान और हमारी समझ के मध्य अवरोध बनते हैं या यूं कहें कि हमारे गुरु और हमारे बीच एक बाधा बने रहते

था। कृष्ण का 'विश्व-रूप' देखने को पश्चात् उसके प्रश्नों का आधार था कि कष्ण को प्रकृति और किस प्रकार उनके निकट पहुंचा जाए। अब कृष्ण उसे अपने बारे में बताते हैं कि वे क्या हैं और कैसे उन तक पहुंचा जा सकता है। कष्ण की समझ में आ गया है कि अर्जून के मन के सारे बौद्धिक प्रश्न अब समाप्त हो गए हैं। अब जो कुछ उसके मन में शेष है वह कुछ संशय ही है। जब ऐसा संशय मात्र रह जाए तो इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति अब अपने

गुरु की बताई सीख को आत्मसात करने को तत्पर है या गुरु-ज्ञान प्राप्त कर उसे पचाने को तैयार है। फिर तो उसके गुरु के मुख से जो कुछ भी बाहर आएगा, वह उसका संशय मिटाता जाएगा। यही संशय है जो गुरु को बाध्य करता है कि वह अपने आपको खुलकर अभिव्यक्त करे। प्रश्न तो गुरु ज्ञान का द्वार बंद कर देते हैं क्योंकि प्रश्न हिंसा को प्रतीक होते हैं। एक बात

शब्दों को दो श्रेणी में विभाजित किया जा सकता है-एक श्रेणी है प्रश्नों की और दूसरी है संशयों की। प्रश्न का अर्थ है हिंसा का प्रस्फूटन यानी उस घमंड का कि 'मैं भी कुछ जानता हूं और उस सत्य की सुरक्षा को लिए मैं ये प्रश्नों के तीर फेंक रहा हूं।' प्राय: हमारे प्रश्नों का उद्देश्य अपना ज्ञान बघारना होता है। मुझसे भी लोग बड़े-बड़े प्रश्न पूछते हैं।

एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा-"स्वामी जी! ब्रह्मसूत्र कहता है कि ब्रह्म समझ से परे होता है, बुद्धि उसे समझ ही नहीं सकती। यह मुझसे परे है। क्या यह सही है?'' उसका इस प्रश्न को पूछने का उद्देश्य यह बताना था कि उसने ब्रह्म सूत्र पढ़ा है। यह तो कोई प्रश्न नहीं था; कोई जिज्ञासा भी नहीं थी।

प्रश्न होता है वह संशय, जिसमें कोई जिज्ञासा नहीं हो। जिज्ञासा के साथ प्रश्न संशय होता है। प्रश्न सत्य नहीं पाना चाहते, पर संशय पाना चाहता है। ज्यादा सत्य आदमी पर संभलता नहीं। वह अर्ध सत्यों को ज्यादा अच्छी

तरह संभाल सकता है, क्योंकि ज्यादा सत्य तो स्वयं उसको ही कायाकल्प करने लगता है। उसे लगता है कि उसका तो आधार ही खिसकने लगा है। इसलिए हम में से कोई सत्य नहीं जानना चाहता। यदि ईमानदारी से सत्य बताया जाए तो बहत कम प्रवचन को सूनने को तैयार होंगे। असली सत्य जानकर लोग भयभीत होने लगते हैं, सत्य उन्हें डराता है, इसलिए वे सत्य पर ही प्रश्न खड़े करने लगते हैं। । हम लोग सत्य को कई प्रकार से छिपाते हैं। इतना सामाजिक शिष्टाचार हम लोग क्यों निभाते हैं? हम एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। सामाजिक शिष्टाचार निभाने के लिए हम कई औपचारिकताएं निभाते हैं। बचपन से हमें सिखाया जाता है कि 'प्लीज़' या 'थैंक यू' कहना सीखो, चाहे भले ही हमारा मतलब ऐसा करने का न हो या भले ही स्थिति में इनकी दरकार न हो, पर कहते

रहो क्योंकि यही सामाजिक शिष्टाचार का कायदा है। जब भी हम किसी से मिलते हैं तो हम कहते हैं-''आपसे मिलकर खुशी हुई'' चाहे ऐसा कुछ भी महसूस न हुआ हो।

कभी-कभी तो मुझे भी यही खेल खेलना पडता है। जब लोग मझसे पहली बार मिलते हैं तो वे मुझसे भली प्रकार वाकिफ नहीं होते, इसलिए मैं भी औपचारिक शिष्टता ही निभाता हूं, नहीं तो वे आहत महसूस करते हैं, क्योंकि इस समय वे सत्य स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होते। वे मुझ से कुछ भी कहें पर उनका मन सत्य स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि वह काफ़ी कट्टू होगा। तो मैं भी उन्हें खुश ही रखता हूं, क्यों उनकी सामाजिक रूप से आरामदेह स्थिति को क्षुब्ध किया जाए, जब वे तैयार ही नहीं हैं सत्य स्वीकाने को?

क्योंकि यदि हम वाकई में 'खूश' होते हैं तो यह खुशी हमारे शरीर से टपकती है। क्या यह कहना आवश्यक है कि 'आप से मिलकर खूशी हुई जिससे अगला समझ सके कि हम वाकई में खुश हैं? हमारा पूरा शरीर, हमारी स्थिति, हमारा व्यक्त आनंद क्या यही बात ज़ाहिर नहीं करता होगा? क्या शब्दों द्वारा यह बताना जरूरी है?

हमें भी मालूम होता है कि सत्य कुछ और ही है, पर हम भी उसका सामना करने का साहस नहीं कर सकते। हम समझते हैं कि हम अपनी शारीरिक चेष्टा और शाब्दिक भाषा-दोनों को द्वारा सत्य कभी उद्घाटित नहीं कर सकते, क्योंकि सत्यानुभूति हमें सीधे-सीधे प्रबुद्धता प्रदान करती है; हमारे अंदर एक समुचा बदलाव लाती है।

जिस क्षण कोई भी सत्य को आत्मसात करता है या सत्य का उसके सामने

एक भी आयाम उद्घाटित होता है तो उस क्षण चमत्कार हो जाता है।

विवेकानंद यही बात बड़े सुंदर ढंग से कहते हैं-"यदि आप संसारभर में उपलब्ध हर पुस्तक का हर शब्द याद कर लें तो सिवाय आपके अहम् में इजाफा के, आपको और कुछ भी नहीं मिलेगा। आपको सिर्फ घमंड हो जाएगा अपने किताबी ज्ञान पर। इसके बजाय कोई एक विचार पूरी तरह अपने में आत्मसात कर उसको जीने लगें। वह एकमात्र विचार ही आपके जीवन में एक महान परिवर्तन ला सकता है। सिर्फ एक ही विचार।'' शाह और शार प्रदर्श

" तमिलनाडु (दक्षिण भारत) में एक किताब है-'परिया पुराणनम' या 'महाग्रंथ' जिसमें तिरसट प्रबुद्ध स्वामियों को जीवनियों का वर्णन है।

यदि हम इस पुस्तक को पढ़ें तो हमें ऐसे कई स्वामियों को बारे में पता चलेगा जिन्होंने जाहिरी तौर पर कुछ किया ही नहीं। उनके जीवन में तो कुछ भी उल्लेखनीय नहीं हुआ। कुछ स्वामियों ने तो कुछ फूल इकट्ठे किए और

उन्हें ईश्वर को समर्पित कर दिया-बस! परंतु उनको प्रबोधन प्राप्त हो गया। हम क्या करते हैं इसका महत्त्व नहीं है, असली बात है हमारा अपने कर्म के प्रति परी तरह से ईमानदार होना।

हम भी तो ईश्वर को फूल चढ़ाते हैं रोज ही, पर हम तो प्रबुद्ध नहीं होते बल्कि हमें तो बगीचा कायम रखने या रोज फूल प्राप्त करने को लिए अतिरिक्त खर्चा ही करना पडता है। समस्या यह है कि अपने कर्म में हम ईमानदार नहीं रहते। जब यह प्रबुद्ध स्वामीगण ईश्वर के लिए फूल इकट्ठे करते हैं तो उनका ध्यान अपने इष्ट देव में ही लगा रहता है वे उसी में लीन रहते हैं और उसी का ध्यान करते रहते हैं। किसी और वस्तु से उनका ध्यान नहीं बंटता।

लेकिन जब हम फूल इकट्ठे करते हैं तो हम कुछ और या किसी और के बारे में सोचते रहते हैं। मैंने कई लोगों को देखा है जो कर्म-कांड तो नित्य करते हैं पर उनके ध्यान में ऑफिस की बातें या कोई और छाया रहता है।

जब पूजा में हमारा मन न लगे तो वह एक उबाऊ काम-सा लगने लगता ह है, लेकिन जब मन लगे तो कठिन-से-कठिन काम भी एक हर्ष प्रदायक पूजा लगने लगता है।

यदि हम अपनी पूरी दिनचर्या-सुबह बिस्तर से उठने से रात को सोने तक-पर दृष्टि डालें तो यह झूठ से ओत-प्रोत ही लगेगी। हमारी मुस्कानें नकली होती हैं। जब हम मुस्कुराते हैं तो हम कतई नहीं चाहते कि सामने वाला व्यक्ति समझ ले कि हमारे मन में क्या है। इसलिए हम आंख चुराकर मुस्कूराते हैं। क्यों? कहीं वह समझ न ले कि हम उससे मिलते समय क्या सोच रहे हैं। दिल में नफरत उबल रही हो, पर अपने होंठों पर हम बड़ी मुस्कान दिखाएंगे, किन्तु हमारी आंखें तो सब कुछ बयान कर ही देती हैं।

जरा अपने को खोलकर देखें और जो घटता है उसका वैसे ही अनुभव करें, उदाहरणार्थ-जब कोई हमारा नाम पूछता है तो क्या हम कोई तैयारी करते हैं? क्या उसके लिए सुराग ढूंढने पडते हैं? बिल्कुल नहीं। यह तो हमारा स्वाभाविक अनुभव है। यानी जब तक कोई वस्तु हमारे अनुभव का हिस्सा न बन जाए, उसके लिए हमें तैयारी करनी पड़ती है-मानो किसी लेक्चर देने के पूर्व की तैयारी हो। यदि कोई लेक्चर देना है तो तैयारी करनी पड़ेगी, लेकिन यदि हम लोगों के सामने बोलने से डरते हैं तो हमें अपने अंदर झूठ भरना पड़ेगा। हमारा पूरा अस्तित्व ही झूठा लगता है-जीवन ही एक झूठ लगने लगता है।

लोगों के सामने बोलने से डर क्यों लगता है? इसलिए कि साधारणतया हम जो सोचते हैं वही बोलते हैं और इसी का डर रहता है कि कहीं लोगों को हमारे मन को बात न मालूम पड़ जाए। हम जानते हैं कि मन में कितना 'कोना' भरा है-कहीं उसमें से कुछ बाहर आ गया तो? इसी का तो हमें डर रहता है। इसीलिए हम तैयारी करते हैं यह तथ करने के लिए कि क्या हम लोगों के सामने बोलें।

हम झूठ क्यों बोलते हैं?

हमें सनिश्चित करना होता है कि हम वही बोलें जो हम जानते हैं। इसलिए हम एक-एक प्वाइंट याद रखते हैं। यदि कोई प्वाइंट भूल जाएं तो हमें डर लगता है कि कहीं वह मुंह से न निकल जाए जो वाकई हमारे मन में हैं इसी की तैयारी करनी पड़ती है कि कहीं और कुछ न बाहर आ जाए। अर्थात् तैयारी का मतलब है हम अपने मन का असली भाव छिपाए रखें; अंतर्द्वंद्र कहीं बाहर न आ जाए। यदि कोई पेशेवर वक्ता अपने सारे भाषण तैयार करता है तो वह जो

कहेगा. वह सब झूठ ही होगा, क्योंकि यह (भाव-शुंखला) अभी उसका अनुभव नहीं बन पाया: अभी उसके अस्तित्व का हिस्सा नहीं बना। अभी तो यह भाव सिर्फ रटकर उगल दिया गया है; याद करके बोल दिया गया है।

सिर्फ सार्वजनिक भाषणों में ही या प्रवचनों में ही नहीं, जब हम अपने दोस्तों से मिलते हैं या पत्नी से भी वार्तालाप करने वाले होते हैं तो हम शब्दों के चुनाव का पूर्व अभ्यास (रिहर्सल) कर लेते हैं। हम तय करते हैं कि कैसे बातचीत शरू करेंगे और कैसे उसे जारी रखेंगे। हम पूरी मानसिक तैयारी जरूर करते हैं। यदि दसरा व्यक्ति किसी ऐसे विषय पर वार्तालाप शरू कर देता जिसके लिए हम तैयार नहीं हैं तो एकाएक हमारी समझ में नहीं आता कि क्या बोलें, क्योंकि हमने रिहर्सल तो किसी और विषय को लिए की थी।

यदि अपने बॉस के सामने बोलने की जरूरत हो तो ऐसी रिहर्सल करना ठीक भी है। हमें पूरी शालीनता दिखानी पडेगी, नहीं तो नौकरी से हाथ धो सकते हैं। कम-से-कम हमारे सामाजिक खेल का यह एक अनिवार्य हिस्सा है। इसको ऐसे ही स्वीकार कर आगे बढना चाहिए. बिना ज्यादा मीन-मेख निकाले हए. पर स्थिति तो बहत खराब है। हम अपने जीवनसाथी एवं मित्रों से बातचीत करने को पर्व भी ऐसे ही तैयारी करते हैं और जब हम तैयारों करके बोलते हैं तो वह झठ ही होता है। भले ही हम उसे तथ्य कहें, वह होता मुषा ही है। यह कहना कि यह एक तथ्य है. असल्य बोलना ही है।

वास्तविक जीवन में हम क्यों इतना झूठ बोलते हैं? क्यों एक पति को बार-बार अपनी पत्नी से कहने की जरूरत पड़ती है कि वह उसे प्यार करता है? यदि ऐसा है तो उसके शरीर की भाषा अपने आप ही इसको प्रकट कर देगी। असल में जब वह इन शब्दों का प्रयोग करता है तो वह स्वयं को इस बात की याद दिलाता है कि उसे अपनी पत्नी को प्यार करना चाहिए। जब हम ज्यादा

शब्द प्रयोग में लाते हैं तब हम झूठ ही बोलते हैं, सत्य नहीं। हम झूठ को शब्दों के श्रृंगार से दबाने का प्रयास करते हैं।

सत्य बोलना, वस्तुत: ख़तरनाक होता है। जब हम सत्य बोलते हैं तो प्रबुद्ध जनों के बीच तो हम सुने जाते हैं, पर अन्य लोगों को मध्य नहीं, क्योंकि सबको खतरा लगता है। यह विश्व कि जिला अनुक्त हो

मान सत्य तर्कपूर्ण प्रश्नों एवं दलीलों को बर्दाश्त कर लेता है। वह विश्लेषण की परीक्षा से भी गुजर जाता है। अगर सोने की शुद्धता की परीक्षा करनी है तो है उसे आग से गुजारना ही पड़ेगा। इसी प्रकार जब सत्य की परीक्षा करनी है तो उसका भी 'एसिड टेस्ट' हमें लेना पड़ेगा अर्थात् उसका तार्किक विश्लेषण करना पड़ेगा और हमारी तर्क पद्धति निश्चित हो असफल रहेगी अर्थात् जब उसके सामने हमारी तर्क पद्धति असफल रहे तो आप निश्चित हो सकते हैं कि यह सत्य ही है क्योंकि सत्य ही तर्क को ध्वस्त कर सकता है, या यों कहें कि सत्य के सामने तर्क इतना थककर बेदम हो जाता है कि स्वयं ही बैठ जाता है। इसलिए यदि कोई बात चरम सत्य है तो उसे तार्किक-विश्लेषण को ध्वस्त करना ही पड़ेगा। सत्य हर तर्क के सामने कायम रहेगा; न झुकेगा न टूटेगा।

यदि कोई शिष्य प्रश्न करने की मानसिकता बनाए हुए है तो गुरु को सत्य उद्घाटित करना ही चाहिए। उसे सत्य को शब्दों से ढकना नहीं चाहिए। तब शब्दों को खिलवाड़ की कोई ज़रूरत नहीं होती। नग्न सत्य सीधे-सीधे कह दिया जाना चाहिए। यदि किसी को मन में कोई शक़ है तो उसके सामने सत्य स्पष्ट किया जाना चाहिए क्योंकि प्रश्नकर्त्ता की मानसिकता और किसी तरीके द्वारा शांत ही नहीं होगी। या कि कानका देखि

ा पर यह तो शिष्य की मानसिकता पर ही निर्भर है कि गुरु के शब्द मात्र सलाह हैं या उनमें एक समूचा परिवर्तन लाने की तकनीक भी है। यदि शिष्य पूरी तरह से गुरु के साथ समावृत्ति पर है (या 'ट्यून्ड' है) गुरू उसकी निश्चित ही सहायता ह कर सकता है। मास्टर या गुरु को ऐसे में प्रबुद्ध होना भी ज़रूरी नहीं है। बहुत

एक लघु कथा

एक विद्वान यमुना किनारे रहते थे और कृष्ण की पूजा करते थे। उनको एक दुध वाली रोज़ दूध लाकर देती थी। एक दिन वह नहीं आई क्योंकि पिछली रात पानी इतनी ज़ोर से बरसा कि नदी में बाढ़ आ गई थी।

अगले दिन जब वह आई तो उस विद्वान ने पूछा-''कल क्यों नहीं आई?'' वह बोली-''बारिश के कारण नदी चढ़ आई थी। मैं उसे पार ही नहीं कर सको।''

श्रीमद्भगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

विद्रान बोला-" क्या बात करती है। कृष्ण का नाम लेकर लोग भव सागर पार कर लेते हैं और तू एक नदी भी पार नहीं कर सकी। बस उनका नाम ले और नदी पार कर।''

किसी किताबी विद्वान की तरह उसने उस अबोध दुध वाली को अपना सरवा ज्ञान दिखाया तथा एक दिन नागा करने के लिए उसे डांट भी लगाई। वह अबोध स्त्री उस विद्वान की बातों को सच समझी। उसके बाद उसने कभी नागा नहीं किया। एक दिन फिर नदी में बाढ़ आ गई, पर वह दूध समय पर ही लेकर आई। अब विद्वान ने उससे पूछा-''अरे! नदी में तो इतनी बाढ़ थी, तूने कैसे नदी पार की?'' बार

" महाराज! आपने ही तो मूझे रास्ता बताया था न! '' कृष्ण का नाम लो और नदी पार कर लो। वही मैंने किया और आराम से आ गई।''

विद्वान को ताज्जुब हुआ। उसने कहा कि वह ऐसा उसे करके दिखाए। वह दध वाली भाग गई। वे दोनों नदी के किनारे गए। उस दुध वाली ने कृष्ण का नाम लिया और पानी पर चलती हुई पार उतर गई, ऊपर-ही-ऊपर तैरती हई। वह विद्वान सकते में आ गया। यह तो अदुभूत था। उसने सोचा कि जब यह साधारण स्त्री कृष्ण नाम लेकर नदी पार कर सकती है तो वह क्यों नहीं कर सकता। वह तो इतना पढ़ा-लिखा विद्वान है।

उस विद्वान ने भी कृष्ण का नाम जपना प्रारंभ किया, पर नदी के पास पहुंचने पर उसने अपनी धोती ऊपर की और पानी पर चलने का प्रयत्न किया, जिससे कि वह गीली न हो। उसने जैसे ही नदी में पांव रखा, वह डूब गया।

यह इसलिए हुआ कि उस विद्वान को अपनी बात पर विश्वास नहीं था। उसके ज्ञान पर उस अबोध दूध वाली ने पूरा विश्वास किया और वह पार उतर गई, पर वह विद्वान तो उसे अपनी विद्वता दिखाना चाहता था, उसे कृष्ण नाम पर इतनी आस्था थी ही नहीं। इसलिए उसे तो डूबना ही था, लेकिन यदि कोई शिष्य ज्ञान-ग्रहण की पूरी मानसिकता लिए गुरु के निकट आता है तो गुरु साधारण या हल्के शब्द या तकनीक भी उसकी वृद्धि में सहायता कर सकती है। यानी उसको गुरु के साधारण शब्द भी लाभावित कर सकते हैं। चाहे गुरु स्वयं भी प्रबुद्ध या अपने ज्ञान पर आस्था रखने वाला न हो, पर यदि शिष्य में उसके ज्ञान के प्रति विश्वास है तो वह हर रुकावट पार कर ज्ञानी हो सकता है।

वस्तुत: श्रद्धा (विश्वास) या संदेह एक ही सिक्को के दो पहलू हैं। जब तक हमारे मन में संशय नहीं होगा, हम श्रद्धालु नहीं हो सकते, इसलिए चाहे लोग कितना भी गुरु के शब्दों पर विश्वास करें, उनके मन में थोड़ा-बहुत संशय तो रहता ही है। मैं तो स्वयं लोगों से कहता हूं कि संशय करना गलत नहीं।

इसकी मौजूदगी बताती है कि वे उस प्रक्रिया में आ गए हैं, जिसमें संशय और श्रद्धा का चक्र चलता रहता है, क्योंकि जब संशय दूर होता जाएगा, श्रद्धा या विश्वास दुढ़तर होता जाएगा। फिर दूसरे स्तर का संशय पैदा होगा और समझ की एक और तह खुलती जाएगी। इस प्रकार श्रद्धा मजबूत होती जाएगी।

अंतत: वह स्थिति आएगी जब शिष्य या जिज्ञासु के मन में कोई संशय या श्रद्धा भी नहीं रहेगी। वह उसका अनुभव बनकर सत्य तक उसे पहुंचा देगी। इस अवस्था तक आने तक संशय और श्रद्धा का दौर तो क्रमश: चालू ही रहेगा। अब अर्जुन को एक समझ प्राप्त हो चुकी है। चूकि उसे स्वयं एक आध्यात्मिक अनुभव हो चुका है तो उसके मन में संशय का एक स्तर अभी भी है, पर प्रश्न अब नहीं हैं उसके मन में। अब वह यह भी नहीं पूछता कि उसके लिए क्या लाभकारी है। अपने बारे में सारे गुणा-भाग अब अतीत की बात हो चुको हैं। कोई सवाल नहीं यथा 'किम् तद ब्रह्मा किम् अध्यात्याम किम् कर्मा पुरुषोत्तमः?' काल के हा क्या बाहरी के कार

तब तो वह शब्दों से खिलवाड़ कर रहा था। अब वह सब कुछ गायब है। प्रथम अध्याय में कृष्ण पूरी तरह मौन थे और अर्जुन ही बोलता रहा था। उसने शास्त्रों के हवाले से धर्मादि पर उद्धरण भी दिए थे, पर इस अध्याय में अर्जून पूरी तरह मौन है।

यह समस्या पुथ्वी पर अवतरित होने वाले हर गुरु या स्वामी को झेलनी पड़ती है। एक अबोध, शिष्य एक अज्ञानी शिष्य से कहीं अच्छा होता है।

सीखने को लिए पहले ( प्राने पाठ ) भूलो

एक संगीत शास्त्री को पास एक आदमी आया-" शास्त्री जी! मैंने चार वर्ष तक संगीत का अध्ययन किया है। अब मैं आप से संगीत सीखना चाहता हूं। कितना समय लगेगा?''

शास्त्री जी ने कहा-''लगभग 6 वर्ष का समय लग सकता है।'' । फिर एक दूसरा आदमी आया और बोला-''शास्त्री जी! मैंने 2 वर्ष संगीत का अध्ययन किया है। अब आपके पास और सीखने में कितना समय लगेगा?''

शास्त्री जी ने कहा-"दो वर्ष।"

कुछ दिन बाद एक तीसरा साधक आया और बोला-''शास्त्री जी! मुझे संगीत के बारे में कुछ भी नहीं आता। मैं आपसे सीखना चाहता हूं। कितना समय लगेगा?''

शास्त्री जी ने कहा-''बिल्कुल भी नहीं लगेगा। तुम सारा ज्ञान मुझसे तरंत प्राप्त कर लोगे।''

एक नया-नया अबोध शिष्य अपने गुरु की बात तुरंत ग्रहण कर लेता है। वह अपने गुरु की सीख अपने में समाहित कर लेता है, परंतु वे लोग जो आंशिक ज्ञान रखते हैं, उनको लिए गुरु को कुछ ऐसा करना पडेगा जिसमें अपना पिछला पाठ भूल जाएं।

वैसे तो जितने महान गुरु संसार में अवतरित होते हैं, वे वही शास्त्र ज्ञान लेकर आते हैं जो लिखित रूप में भी उपलब्ध होता है, पर साथ में उनके आता है उस ज्ञान को जीता हुआ जीवन। किताबों में तो हम मात्र शब्द पढते हैं। उससे पाठकों में कोई परिवर्तन नहीं आता क्योंकि कोई भी पुस्तक सत्य उद्घाटित नहीं करती: उनको इसके लिए लिखा ही नहीं जाता।

एक लघु घटना

रामकृष्ण परमहंस ने अपने शिष्य द्वारा एक किताब बोलकर लिखाई थी। वे बोलते रहते थे और उनका शिष्य लिखता रहता था। एक बार शिष्य एक जगह अटक गया और बोला-''गूरु जी! जरा उसे फिर दोहराएं।'' गुरु ने वही बात फिर दोहराई।

शिष्य ने लिखना बंद कर कहा-" गूरु जी! आपका यह वक्तव्य पिछले अध्याय को वक्तव्य का खंडन करता है। इससे संशय पैदा होता है।''

रामकृष्ण ने कहा-"तू चिंता मत कर। जो मैं बोलता हूं तू बस लिखता रह। ''

पर वह शिष्य आश्वस्त नहीं हुआ। तब रामकृष्ण ने स्पष्ट किया-" इस किताब का उद्देश्य, तथ्य उपस्थित करना नहीं है, वरन सत्य उद्घाटित कर बदलाव लाना है। इसके द्वारा लोगों को प्रेरणा मिलनी चाहिए कि वे आगे बढकर जीते-जागते गुरु के पास जाएं।''

अर्थात् गुरु के शब्द तथ्य नहीं, सत्य बताते हैं। तथ्य तो रिकॉर्ड होते हैं, सत्य गंजता है।

यह एक सत्य है सभी शास्त्रों और किताबों के संदर्भ में। कोई पुस्तक चरम सत्य नहीं बता सकती। पर समस्या यह है कि कुछ लोग पुस्तकों को ही चरम सत्य उद्घाटक-सत्ता मान लेते हैं। वे उनकी बौद्धिकता को ही चरम सत्ता समझने लगते हैं, बज़ाय उस सत्य का स्वयं जिए, वे किताबों को ही सत्ता मान लेते हैं। वे चाहते हैं गुरु के शब्दों को पढ़ी हुई किताबों और शास्त्रों से प्रमाणिक सिद्ध करना; उनकी सत्यता स्थापित करना।

मख्य समस्या शब्दों के अर्थ को कारण भी पैदा होती है, उदाहरण के लिए यदि कोई गुरु शब्द आत्मा का प्रयोग करता है तो वह संस्कृत कोश से लिया गया होता है, पर हम 'आत्मा' शब्द का अर्थ अपनी 'ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी' द्वारा समझना चाहते हैं तो समस्या शुरू हो जाती है।

जब हम किसी जीवित गुरु के सान्निध्य में होते हैं तो हम तरंत उनसे स्मष्टीकरण प्राप्त कर सकते हैं और इस प्रकार अपने संशय का तुरंत निवारण कर सकते हैं। गूरु तो हमारे चेहरों को देखकर समझ जाता है कि बात हमारी समझ में नहीं आई। वह हमें तब तक समझाता है जब तक कि बात पूरी तरह समझ में नहीं आ जाती।

जब हम किताब पढ़ते हैं तो हम अपने मन के साथ खेल करते होते हैं। इसलिए कई लोग किताबों के सान्निध्य में ज्यादा रहना पसंद करते हैं, बज़ाय गुरु के पास रहने के। वस्तत: असली साधक और नकली जिज्ञासुओं में यही अंतर होता है। गूरु के पास खेल की कोई गूंजाइश नहीं होती।

यदि हमारी साध असली है; हमें आंतरिक कामना होती है, तभी हम जीते-जागते गुरु की तलाश करते हैं, लेकिन जब हमारी कामना मन बहलाव को या समय बिताने की होती है तो हम किताबों का साथ ढूंढते हैं और पुराने गुरुओं के चित्र रखकर उनको पढ़ते हैं।

यदि यह साध पूरी शिद्दत के साथ होती है तो हम किसी जीते-जागते गुरु के साथ ज़ड़ते हैं क्योंकि हमें वही सत्य लगता है।

सत्य वस्तुत: आकाशीय विद्युत के समान होता है, तुरंत और तत्काल प्रकट होता है। यह कोई विकसित होने वाली प्रक्रिया नहीं है, जबकि कदम-दर-कदम तार्किक रूप से इकट्ठे होते हैं और धीरे-धीरे विकसित होते हैं। इसमें आवश्यक है कि पहला हिस्सा स्पष्ट समझ लो, तब ही दूसरा हिस्सा समझ में आएगा. पर सत्य बिजली की तरह चमकता है और एक बार में ही पूरा उद्घाटित होता है। इसीलिए बौद्धिक रूप से सत्य की समझ मुश्किल लगती है। वह तार्किक भी नहीं होगा और कभी-कभी बेतुका भी लग सकता है।

शताब्दियों से लोगों ने कष्ट इसलिए झेला है क्योंकि उन्हें आंतरिक रूप से समझ में आने वाले सत्य की उस सत्य से संगति नहीं बैठ पाती, जो समाज या व्यवस्थित धर्म द्वारा उसे बताया जाता है। समाज और धर्म ने कई ऐसे नियम और कानून बनाए हैं जिनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता, क्योंकि सत्य की व्याख्या कर उसे निर्यांत्रित नहीं किया जा सकता जबकि नियम-कानून केवल तथ्य आधारित होते हैं।

श्रीमद्भगवत गीता

इसीलिए सत्य और तथ्य सदा साथ-साथ नहीं चल पाते। तथ्य एक-आयामी ही होते हैं, जो केवल समयबद्ध रहते हैं जबकि देश-काल में व्याप्त रहता है और इसलिए बह-आयामी होता है।

यहां अब अर्जन परिपक्वता की उस स्तर पर आ चुके हैं कि मात्र तथ्यात्मक मचना से उन्हें संतुष्टि नहीं होती। अब उन्हें सत्य की तलाश है। अब तक उनके सारे भ्रम तिरोहित हो चुके हैं। मन में अब कोई प्रश्न भी नहीं उठ रहा. सिर्फ संशय रह गए हैं - बड़े संशय। यह उसकी उस स्थिति के द्योतक हैं जो बताती है कि यह शिष्य अब गुरु को संपूर्णता में ग्रहण करने (अर्थात् उसका संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करने) को तैयार है। ये संशय उस हरी बत्ती के प्रतीक हैं जो रास्ता साफ होने की सचना देते हैं जबकि प्रश्न लाल बत्ती का इशारा करते हैं।

प्रश्न गुरु को अपना सब कुछ प्रकट करने से वंचित करते हैं। वे गुरु के लिए व्यवधान हैं क्योंकि वे एक मांग करते हैं कि उसके शब्दों का उत्तर दिया जाए। वस्तुत: जब हम पूरी तरह गुरु का अनुसरण नहीं करते तो हम अपने जीते-जागते गुरु की सत्ता को ही चुनौती देने लगते हैं यानी उसके अंदर विद्यमान ऊर्जा को ही नकारने लगते हैं, क्योंकि हम गुरु को अपनी सीमित समझ को पैमाने से आंकते हैं। अपनी सीमित समझ द्वारा अपनी बौद्धिकता से उसे भी सीमित करना चाहते हैं क्योंकि हमारा पैमाना हमारी बौद्धिकता ही प्रदान करती है।

एक लघु कथा

एक युवा पेड के नीचे बैठे एक वुद्ध व्यक्ति के निकट पहुंचा और बोला कि उसे एक गरु की तलाश है। वह वृद्ध बोला कि वह एक गरु को जानता है। उसने उसका पूरा वर्णन किया कि वह कैसा लगता है और कहां मिल सकता है, इत्यादि। उस युवा ने उस व्यक्ति को धन्यवाद दिया और आगे बढ़ गया। तीस वर्षों तक वह उस गूरु को ढूंढता रहा, पर वह मिला नहीं। अंत में थककर वह फिर अपने मूल निवास की तरफ लौट आया।

पर घर घर पहुंचने के पूर्व उसे एक वृद्ध दिखाई पडा, जो गुरु के बताये सारे लक्षणों से संपन्न था, पास आकर उसने देखा-अरे! यह तो वही व्यक्ति है जिसने तीस वर्ष पूर्व मुझे गुरु के लक्षण बताए थे और जिसकी तलाश में वह तीस वर्षों तक भटकता रहा था। वह युवा फिर उसके पास गया और बोला-''आपने पहले ही क्यों नहीं बताया कि वह गुरु आप ही हैं। आपने व्यर्थ में मेरे तीस वर्ष बर्बाद करवा दिए।''

" बेटे! यह समय बर्बाद नहीं हुआ है, इस समय में तुम्हारा मानसिक ढ़ांचा शुद्ध हुआ है। जब तुम तीस वर्ष पूर्व मेरे पास आए थे तो मैंने अपना पूरा वर्णन

तमसे किया था-बताया था कि वह किस पेड़ के नीचे मिलेगा और कैसा लगता है, पर तुम मुझे पहचान ही नहीं पाए। तुम्हें यात्रा करने की जल्दी थी, भटकने की और अपने अहम् को संतुष्ट करने की भी। इसलिए तुम्हारा भटकना जरूरी था, जिससे तुम्हारे मन के प्रश्नों का समाधान हो जाए, वे गल जाएं और साथ ही तुम्हारा अहम् भी दूर हो जाए। अब तुम परिपक्व होकर पूर्व की तरह तैयार हो मुझे स्वीकार करने के लिए।''

अर्जन ने भी ऐसा ही किया। द्वितीय अध्याय में 'आत्मा' के बारे में बताया गया-" नैयन् छिदति शस्त्रादि नैनम् दहति पावक: (द्वितीय अध्याय 23वाँ श्लोक) (आत्मा न शास्त्रों से घायल होती है, न आग उसे जला सकती है... ) लेकिन अर्जून ने तब तूरंत कहा था-''तो प्रबुद्ध व्यक्ति बोलता कैसे है?

क्यों ऐसा कहा? क्यों यह प्रश्न उठा? यह विशुद्ध अहम् के कारण-वह चाहता था कि कृष्ण को आंक सके। यह जान सके कि कृष्ण वाकई में प्रबुद्ध व्यक्ति है कि नहीं? यानी अर्जून अपने गुरु की सत्ता की परख करना चाहता था। तो सवाल करने लगा जो एक हिंसा से उत्पन्न हुए थे।

धीरे-धीरे नौवें अध्याय में कृष्ण ने जब राज विद्या, राज गुह्यम् (राज जान एवं राज रहस्य) उद्घाटित कर बताया कि अस्तित्व, ब्रह्मांड की ऊर्जा इत्यादि में अपनी समझ या बुद्धिमत्ता होती है तो अर्जुन के प्रश्न धीरे-धीरे हटने लगे और जब उसने कृष्ण की महिमा सूनी तो उसके मन में उनके प्रति प्रेम पल्लवित होने लगा। जब कृष्ण ने अपना विश्वरूप अर्जून को दिखाया तो अर्जुन ने चरम चेतना का अनभव किया।

नीवें अध्याय में वर्णित दैवी ज्ञान और अन्य रहस्यों को उद्घाटन के पश्चात उसमें समझ प्रकट होने लगी। दसवें अध्याय में विभूति योग द्वारा बताए दैव प्राकटय के साथ उसके मन में भक्ति का संचार होने लगा। 11वें अध्याय मे विश्वरूप दर्शन इत्यादि के अनुभव के साथ अर्जून को ज्ञान उत्पन्न होने लगा अब उसके सारे प्रश्न तिरोहित हो चुके थे।

रामकृष्ण इस पूरी प्रक्रिया को एक उदाहरण के साथ बड़ी सुंदरता से समझाते हैं-"पार्टी इत्यादि में जब तक खाना न परोसा जाए, आपसी बातचीत की आवाजें आती रहती हैं पर जैसे ही एक बार खाना परसा गया कि सिवाय भोजन चबाने के और खाना परोसने में उठी आवाजों को सारी आवाजें आना बंद हो जाती हैं, अर्थात जब तक कि चरम अनुभव न हो, सवाल उठते रहते हैं, पर उसके बस सिर्फ उस अनुभव की अभिव्यक्ति मात्र ही रह जाती है। तब कोई आवाज या शोर नहीं उठता।'' '

अर्जून ने पहले कृष्ण को सत्ता को ही चुनौती दी और फिर अपने लाभ की गणना में जुट गया। अब उसकी मानसिकता पूर्ण स्वीकार्यता की है अर्थात पहले प्रतिरोध, फिर विमुखता और अंतत: स्वीकार्यता।

वैसे भी सुजनात्मक ऊर्जा और सारा लेखाजोखा करना, दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएं होती हैं। सिर्फ ईश्वर सृजन करता है जब भी कोई किसी चीज का सजन करता है तो उस क्षण उसे एक दैवी अनुभूति होती है। यही कारण है कि वैदिक काल से गर्भवती महिलाएं ज़्यादा पूजा-पाठ में लिप्त रहती हैं। पुरानी एक मान्यता यह भी थी कि उनके स्पर्श मात्र से लोग चंगे हो जाते थे। वस्तुत: आर्किटेक्ट या भवन निर्माण करने वाले सृजनशील होते हैं। बेशक इंजीनियर लोग ज्यादा पैसा भले ही लगाते हों, पर कर्म का संतोष तो आर्किटेक्टों को मिलता है। चूंकि वे सृजनशील होते हैं। यदि सृजन ही न हो तो जीवन की जीवंतता कहां रहेगी?

यहां अर्जून सब कुछ ख़त्म कर चुका है। उसकी सारी गणनाएं समाप्त हो चकी हैं। अब तो वह संशय को स्तर पर आ चुका है। सवालों के साथ तो सहज फर्क रहता है क्योंकि सवाल तो गुरु से जवाब मांगते हैं। संशय ऐसे नहीं होते वे तो कुछ सूत्र मात्र चाहते हैं (उनको दूर करने को)। अब अर्जून गरु को संपर्णता से स्वीकार करने को तत्पर हैं। इसलिए इस पूरे अध्याय में अर्जन मौन ही रहता है। वह गुरु (का ज्ञान) संपूर्णता से समाहित करने को तैयार है। अब जो भी उसे मिलेगा व पूरी संपूर्णता से उसे स्वीकार कर लेगा।

हमारी इच्छाओं की उत्पत्ति हमारी वासना से होती है। इनमें ऊर्जा समाहित होती है जो उनकी पूर्ति के लिए सक्षम रहती है क्योंकि मूलभूत आवश्यकताएं प्रकट होती हैं और वह उद्देश्य बताती है जिसके लिए हम जन्मे हैं।

यह समस्त संसार हमें वह शक्ति प्रदान करता है, जिससे हम अपनी सारी इच्छाओं की पूर्ति कर सकें, पर इस स्थिति में पहुंचकर हम कुछ अन्य इच्छाओं को इकट्ठा करने लगते हैं। वस्तुत: वे इच्छाएं नहीं, हमारे थोपे हुए अभाव होते हैं जो हम औरों से अपनी तूलना कर, नकल कर या ईर्ष्या कर दूसरों से उधार लेते हैं।

रमण महर्षि का कथन है-"यह संसार अपने सब निवासियों की इच्छाएं परी कर सकता है, पर अभाव एक का भी पूरा नहीं कर सकता।" कितनी सच बात है।

जब हम इच्छाएं दूसरों से उधार लेते हैं तो उनकी उत्पत्ति दूसरों की वस्तुओं को पाने के आकर्षण से पैदा होती है। इस कारण हमारी मूल इच्छाओं या मांगों से वे गंभीर रूप से विरोधाभासी लगती हैं क्योंकि वे हमने अपने ऊपर थोपी हैं। जब हमारी अपनी इच्छाओं की पूर्ति होती है तो हमें हर्ष होता है, आनंद मिलता है। इसलिए एक गरीब आदमी अपना साधारण भोजन भी पूरे भाव से करता है।

हमारी ये उधार ली हुई इच्छाएं हमें अपने अभावों के पीछे दौड़ाती हैं और दु:ख देती हैं। क्या आपने कभी किसी धनी व्यक्ति को सच्ची प्रसन्नता के साथ भोजन करते देखा है? उसकी इकट्ठा की हुई संपत्ति उसे बीमारियां देती है। उसे कई भोजन शास्त्री (डाइटीशियन) और व्यक्तिगत सहायक रखने पड़ते हैं, तब कहीं वह स्वस्थ और चंगा रह पाता है।

इच्छाएं संस्कारों को उत्पाद होती हैं और संस्कार हमारे अचेतन मन की सतहों में गुंथे पड़े रहते हैं। हमारे मन को बाकी बचे 10 प्रतिशत (90 प्रतिशत तो अचेतन ही रहता है) प्राप्त इंद्रिय लब्ध जानकारी से भी जूझना कठिन लगता है जो लगातार हमारे चेतन मस्तिष्क में आती रहती है।

ये जमी स्मृतियां या संस्कार हमारे कर्मों के संचालक बनकर उभरते हैं। हमें यह भी नहीं मालूम रहता कि ये इच्छाएं हमारी वास्तविक इच्छाएं नहीं, जिनकी पूर्ति के लिए हमारे पास ऊर्जा रहती है। ये तो दूसरों से प्राप्त या उधार ली हुई इच्छाएं हैं, जिनका उद्भव ईर्ष्या और दूसरों से स्वरूप की तुलना के कारण होता है, पर हमारे समूचे अस्तित्व को परिभाषित यही संस्कार करते हैं

श्रीमद्भगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

कारणात्मक ( कॉजल ) शरीर में यात्रा

15.1 श्री भगवान बोले-आदि स्वरूप परमेशवर रूप मूल वाले और ब्रह्मस्वरूप मुख्य शाख वाले जिस संसार रूप बरगद (पीपल) को अविनाशी कहते हैं तथा वेद जिसके पत्ते कहे गए हैं-उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूल सहित तत्त्वत: जानता है वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है।

15.2 इस संसार वृक्ष की तीनों गुण रूप द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय भोग रूप कोंपलों वाली, देव, मनुष्य और तिर्यक आदि योनि रूप शाखाएं नीचे से ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य योनि में क्यों के अनुसार बांधने वाली अहम्ता, ममता और वासना सभी जड़ें, नीचे से ऊपर सभी लोगों में व्याप्त हो रही हैं।

कृष्ण इस कारणात्मक शरीर को एक बरगद (पीपल) को पेड़ के संदर्भ में देखते हैं। यह बात पिछले अध्याय से शुरू हुई है और अभी चालू है। वस्तुत: अध्याय 14 से 17 आपस में जुडे हुए हैं। इनके ऊपर प्रवचन भी इसलिए जुड़े रहते हैं। इस अध्याय में (पुरुषोत्तम योग में) कृष्ण अब पांचवीं सतह का हवाला देते हैं।

पंचम सतह कारणात्मक शरीर की होती है, जहां सारे संस्कार जमा रहते हैं बीज रूप में। हम इस सतह में गहरी निद्रा में प्रविष्ट होते हैं। हम इसी सतह से अपने संस्कार ग्रहण कर अपनी दुनिया बनाते हैं।

वस्तुत: इच्छाएं एक प्रकार की ऊर्जा होती हैं। विरोधाभासी या एक-दूसरे को काटने वाली इच्छाएं, जब हम पैदा करते हैं तो इस ऊर्जा का गलत प्रयोग करते हैं। यही विरोधाभासी इच्छाएं हमें व्याकुल बनाती हैं, परंतु हम कभी उनको ठीक करने का प्रयत्न नहीं करते, इसी कारण हम अवसादग्रस्त हो जाते हैं। यहा कृष्ण हमें बताते हैं वह तरकीब जिसके द्वारा इन विरोधाभासी इच्छाओं को स्पष्ट कर सही कर सकते हैं।

अब कुष्ण आगे की सतह तक पहुंचते हैं, जहां बीज रूप में संस्कार दबे रहते हैं। यदि हम इन तीन सतहों से आगे भी बढ जाएं-इच्छा, व्याकुलता और अवसाद की सतहों से-तब भी ये संस्कार अपना प्रभाव बीज रूप में दिखाते रहते हैं। इनको दूर करना बहुत जरूरी होता है।

कुष्ण यहां उन तरकीबों का जिक्र करते हैं जिनमें ये संस्कार नष्ट किए जा सकते हैं। वे चाहे अभी स्वयं को अभिव्यक्त न करें, पर चुंकि वे बीज रूप में विद्यमान रहते हैं, अतः कभी-न-कभी तो वे हमारा शोषण करेंगे ही।

दफ़्तरों में कुछ फाइलें मेज पर रहती हैं, कुछ संग्रहालयों में, तो कुछ तिजोरी में भी रखी जाती हैं। पहले बताई गई तीन सतहें मेज पर या संग्रहालयों में उपलब्ध फाइलों की तरह होती हैं। कॉजल (कारणात्मक सतह) मानो दफ्तर की सरक्षित तिजोरी। आगे की दो सतहें बाहरी तिजोरी के रूप में समझें। पिछले अध्याय में कृष्ण ने तरकीब बताई थी कि कैसे अपनी 'टेबिल' को साफ करें इन फाइलों से। अब वह बता रहे हैं वे तरकीबें जिनसे 'तिजोरी' की फाइलों से मुक्ति पाई जा सकती है।

  • कृष्ण कहते हैं कि-"इस पेड़ की जड़ें बाहर की ओर होती हैं और शाखाएं अंदर की ओर होती हैं।'' यदि कारणात्मक शक्ति से जडें अंदर की ओर लाई जाएं तो वे उन सतहों में होंगी जिनसे भौतिक शरीर सतह सीमा का अंत होता है। किसी भी पेड को गिजा जड से मिलती है-पानी और खनिज भी पेड जड़ों से ही प्राप्त करता है। वस्तुत: जड़ को स्थिति ही यह बताती है कि पेड कैसा होगा। इसलिए कृष्ण कहते हैं कि इस पेड़ की जड़ भौतिक शरीर में रहती है। यहां संस्कारों के इस पेड को पानी पंचेंद्रियों को बोध से प्राप्त होता है जिससे हम मर्म करते हैं। फिर धारणात्मक शरीर के बीज रूपी संस्कारों को गिजा भौतिक शरीर की पंचेंद्रियों से मिलती है।

क्षण आगे कहते हैं कि इस पेड़ के पत्ते वैदिक ऋचाओं जैसे होते हैं और जिसको इस पेड का ज्ञान होता है वह वेदों को भी जानता है। वे कहते हैं कि यहां संस्कार वैदिक ऋचाओं के समान हैं अर्थात हमारे मंत्र हैं। मंत्रों की परिभाषा है-'मन साफ स्थितर: अर्थात् वह जो मन को स्थित करे। एक अन्य परिभाषा है "मन: गायते इति मंत्र:'' अर्थात् जो मन को त्राण दे या जो मानव के मन को स्थिर करे या उसका उद्धार करे।

वस्तुत: वे शब्द जो हमारे अंतर में बस जाते हैं, हमारे लिए मार्ग बनाते हैं। जब हम नितांत अकेले हों, तब जो शब्द हमारे मन से निकलते हैं संस्कार रूप होते हैं। जो हमारे कारणात्मक शरीर पर छपे रहते हैं। हमारा सारा जीवन उनको आसपास ही घूमता है।

वस्तृत: वे शब्द दुधारी तलवार जैसे होते हैं। हम जिन शब्दों का प्रयोग दसरों को आहत करने को करते हैं, वे हमारे अंतर्मन में बस जाते हैं और वे तभी ब्राहर आते हैं जब हम अपने आंतरिक मन या भावों को बाहर लाना चाहते हैं-तब वे शब्द प्रकट होते हैं। कोई व्यक्ति भी इतना अक्लमंद नहीं होता कि तीखे शब्द दूसरों के लिए इस्तेमाल करे और कोमल शब्द अंदर रखे रहे। यह एक अचेतन कर्म होता है। इसलिए प्राचीन हिन्दू समाज में विभिन्न रिवाजों द्वारा तीखे शब्दों को नियंत्रित किया जाता था।

हमारा मन अपने आंतरिक संकाय में सदा व्यस्त रहता है। कभी-कभी हम अपने शब्दों द्वारा इनकी झलक दिखा देते हैं और ज्यादातर अपने मन का अंतर्द्वन्द्व मामाजिक प्रतिरोध के डर से अपने अंदर ही छिपाकर रखते हैं। हम यह स्पष्ट नहीं करते इस डर से कि कहीं वह दूसरों को चोट न पहुंचाए या उनको अस्वीकार्य करे। ऐसे सारे शब्द हमारे अंदर 'मर्जपूरक चक्र में बस जाते हैं। यह चक नाभि के निकट होता है और शब्दों की मुख्य पीठ (या स्रोत) होता है। ये वे शब्द होते हैं जो हमें अपनी स्थिति के अनुसार श्रोता को सुनाने के

लिए हमें सहूलियत भरे लगते हैं। हम तीख़े शब्द अपने मातहत, जीवनसाथी, बच्चों या उनके लिए प्रयुक्त करते हैं जिन्हें हम समझते हैं कि वे हमारे नियंत्रण में हैं, पर ये शब्द हम कभी अपने से वरिष्ठों या अजनबियों को लिए प्रयुक्त करने की सोच भी नहीं सकते। तीखे शब्द, जो चाहे बाहर व्यक्त करें या अपने अंदर ही रखें, हमारे अंदर बस जाते हैं। वैसे तो जो बाहर जाता है वह अंदर भी आता है। ये सब हमारे नाभि के निकट वाले चक्र में बसते रहते हैं। चाहे व्यक्त

हो या अव्यक्त रहें, ये शब्द हमारे संस्कारों को विकसित करते हैं। हर शब्द जो हम बोलते हैं, उन पर प्रभाव डालते हैं जो उनको सुनते हैं या जिनको संबोधित किया जाता है। यह प्रभाव हमारे विचारों का भी होता है। जिसको यह बात मालूम होती है वह अपने विचारों या शब्दों द्वारा दूसरों पर प्रभाव डालता है। विचारों या शब्दों का प्रभाव शायद कर्म से भी ज़्यादा प्रभावशाली होता है। भले हमें यह न मालूम हो कि किस प्रकार हमारे विचार या शब्द दूसरों को प्रभावित करते हैं। हो सकता है कि सुनने वाले इतना ध्यान न दे रहे हों, पर इनका प्रभाव पड़ता अवश्य है, कहने वाले और सुनने वाले दोनों पर।

इस क्षेत्र में हमारे पास एक अच्छी ख़बर भी है और एक बुरी ख़बर भी। अच्छी ख़बर यह कि हम किसी भी समय अपने कारणात्मक शरीर (कॉज़ल बॉडी) का पुनर्गठन कर सकते हैं। बुरी ख़बर यह कि हमारे अंदर अभी विद्यमान ऋणात्मकता ही उस कष्ट के लिए जिम्मेदार होती है जो हमें भोगना पड़ता है।

एक औरत ने अपने पति को उसके दफ़्तर में फोन किया। पति बोला कि वह इस समय व्यस्त है। उस औरत ने कहा-"ज्यादा लंबी बात नहीं करनी है। दो खबरें हैं एक अच्छी और एक बुरी।''

पति ने कहा-''पहले अच्छी वाली बताओं, बरी वाली बाद में सुनी जा सकती है।

औरत ने कहा-''मुझे अभी-अभी मालूम पड़ा है कि हमारी गाड़ी का एयर बैग अच्छी तरह काम कर रहा है।''

बुरी ख़बर, ज़ाहिर ही था कि उसकी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई है-इसीलिए तो गाडी का एयरबैग ठीक काम कर रहा था यानी फल गया था।

. वस्तुत: हर अच्छी ख़बर में कोई-न-कोई बुरी ख़बर तो छिपी होती ही है तो हमारे कारणात्मक शरीर के बारे में भी ऐसा ही है।

कृष्ण आगे कहते हैं कि जो इस पेड़ को जानता है वह वेदों को भी जानता है अर्थात वे यह कहते हैं कि जिसे ज्ञात है कि संस्कार, जो कारणात्मक शरीर बनाते हैं, पंचेन्द्रियों से प्राप्त बोध का प्रतिफल है, वेदों को जानता है या वह जानता है कि जीवन को संचालित करने वाला बल कौन-सा है।

क्षण स्थायी और स्थायी न को बाद | एक मारी में कर प्रशास

अपनी जडों द्वारा प्राप्त जल ही तय करता है कि वृक्ष की स्थिति कैसी रहेगी। यदि अच्छा पानी और जरूरी खाद उपलब्ध है तो पेड हरा-भरा रहेगा, पत्ते भी घने होंगे, यदि पेड पर जहर डाल दिया जाए तो वह धीरे-धीरे मर जाएगा। यह संस्कार का वृक्ष, जो कारणात्मक शरीर में फलता है, पंचेंद्रिय के कारण ही जीवित रहता है। कृष्ण यहां 'अश्वस्थ' शब्द का प्रयोग करते हैं जिसका एक अर्थ है कि जो क्षण स्थायी है; जो आज वैसा नहीं जैसा कल था या कल वैसा नहीं रहेगा जैसा आज है। यह पादार्थिक जीवन के संदर्भ में कहा गया है. जहां कोई चीज वैसी नहीं लगती जैसी वह है। जैसा कि बुद्ध ने कहा था-हर चीज़ क्षणस्थायी है 'अनिच्य है' (अनित्य है) और इसलिए स्थायी नहीं है।

जीवन, जैसा कि लोग कहते हैं, असत्य नहीं है। क्योंकि यदि जीवन वाकई में असल्य या अवास्तविक होता तो हम उसका अनुभव ही नहीं कर पाते। सच तो यह है कि हम पादार्थिक जीवन जीते ही नहीं, उसका आनंद भले ही क्षणिक रूप में लेते हैं, स्पष्ट बताता है कि यह वास्तविक या सत्य है। यह उसी हद तक असल्य है कि जो हमारा अनुभव होता है वह क्षण-स्थायी ही रहता है, स्थायी नहीं रहता।

अवास्तविक का अर्थ मौजूद न होना. नहीं होता क्योंकि जब कोई चीज मौजद ही न हो तो हमें उसका भान ही नहीं होगा. न उसका अनुभव होगा। चाहे क्षण मात्र को ही, अनुभव तो होता ही है। सपने अवास्तविक जरूर होते हैं पर हम यह नहीं कह सकते कि हमें सपनों का अनुभव ही नहीं होता। कई लोगों को तो अपने कई सपने याद रहते हैं। सपने अवास्तविक कैसे हो सकते हैं? पर यह सत्य है कि जब हम सपने देखते हैं तो हमें अपनी अनुभति की जागरुकता नहीं होती, क्योंकि जैसे ही हमें अपना ज्ञान होता है, हम उठ बैठते हैं। ऐसा कभी नहीं होता कि सपने में हमारे पीछे पडा हुआ कोई शेर या व्यक्ति हमें पकड ले या खा ही जाए या मार डाले। ऐसा चलचित्रों में भले ही हो जाए. वास्तविक जीवन में नहीं होता। जैसे ही कोई खतरा (सपने में) सामने आया कि हमारी अपने बारे में जागरुकता जागत हो जाती है: हम उठ बैठते हैं और स्वप्न शेष हो जाता है।

सपने असत्य नहीं होते क्योंकि उनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता। वे उतने ही असत्य हैं जितनी हमारी उनके बारे में जागरुकता न होना। इसी तरह हमारे ऋषि-मूनि कहते हैं कि हम तो जागते हुए जागत नहीं होते, पूरी तरह जागरुकता नहीं होती। वे बार-बार कहते हैं-" जागत-जागत!" वे हमसे नींद से जागने का आह्वान नहीं करते: वे कहते हैं कि हम अपनी जागरण में सुष्पित से उठकर जागरण में पूरी तरह जागत हों।

"अश्वस्थ' इसी सुष्प्तावस्था (बेजागरुकता) का प्रतीक है। इस बेजागरुकता-जो हमारी इंद्रियों को प्रभाव का प्रतिफल है और हमारे संस्कारो द्वारा संचालित है-को समझना ही ज्ञान प्राप्त करना है या वेदों को समझना है। वेद का अर्थ जागत अवस्था में प्राप्त सही जान है। कृष्ण इस बेजागरुकता की स्थिति को आगे भी स्पष्ट करते हैं।

करण कहते हैं कि जडें ऊपर भी जाती हैं और नीचे भी। वे कहते हैं कि इस वक्ष के पत्तों का निर्णय हमारी पंचेंद्रियों की बनाई छवि से बनता है और इसी के कारण भान व अपना करता है। ये जड़ें सिर्फ भौतिक शरीर में ही नहीं, वरन हमारे कर्म में भी निहित रहती हैं। कृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष की जड़ें बहत गहरे तक जाती हैं क्योंकि सभी मानवों का कर्म सदा फल से प्रेरित होता है। फलस्वरूप भय और लालच इसके संचालक हो जाते हैं।

'अश्वस्थ' वृक्ष मानव शरीर जैसा ही होता है। इसकी जडें ऊपर होती है जैसे कि हमारे शरीर की जडें-बाल ऊपर होते हैं। कहा जाता है कि बाल वे चैनल होते हैं जिनसे हम ब्रह्मांडीय ऊर्जा ग्रहण करते हैं। हमारे हाथ-पांव पेड़ की शाखा की तरह हैं। वस्तत: मानव शरीर तंत्र भी उल्टा ही बनाया गया है।

ख्याल करें, न रुपयों का, न किसी सुविधा का और न किसी को प्रभावित करने का प्रयत्न करें। अपनी उपस्थिति की पहचान भी दिखाने का प्रयास न करें। काम (सेवा) करें सिर्फ काम को लिए, पूरे निष्काम भाव से।

जब हम कोई तथाकथित दान-पुण्य का काम करते हैं तो हमें तब भी यह सनिश्चित करना चाहिए कि हम किसी फल के बंधन में स्वयं को न डालें। लोग पछते हैं-''क्या फायदा ध्यान लगाने से जब सारा जग कष्ट भोग रहा है?'' यह ठीक है कि हम दुनिया के दु:ख को महसूस करते हैं और मानवता को परी शिद्दत से इससे निज़ात दिलाना चाहते हैं, पर हमारे अंदर विस्तुत चेतना का वह भाव भी होना चाहिए जिसमें हम सभी के प्रति सहानुभूति महसूस कर सकें।

प्राय: हम दान-पुण्य भी इसी भाव से करते हैं कि मृत्यू के बाद हमारी गति सुधर जाए, यदि हम पुनर्जन्म में विश्वास करें या न करें या हम चाहते हैं कि मीडिया में हमारा काम दिखाया जाए, जिससे लोग हमारी सहायता को बखानें या यह कहें कि देखो यह व्यक्ति कितना धर्म-प्राण है कि यह इस जन्म में ही नहीं मृत्यू के बाद को जीवन के बारे में भी सोचता है।

आध्यात्मिक क्षेत्र में तो पाप-पुण्य की कोई अवधारणा ही नहीं होती। न यहां चित्रगुप्त या सेंट पीटर 'पर्ली गेट्स' पर खड़े होकर यह पूछने आते हैं कि तमने अपने हिस्से का दया-दान-पुण्य संबंधी काम पूरा कर लिया है कि नहीं। आप चाहे किसी के लिए भी काम करें-दान-पण्य करें या वित्तीय क्षेत्र या सामाजिक क्षेत्र में काम करें-यदि आपके मन में काम को प्रतिफल की ओर कोई अपेक्षा नहीं है तो वह निष्काम कर्म ही माना जाएगा, क्योंकि ऐसे कामों का संचालन लालच या भय से नहीं होता। इन कामों में संस्कारों का कोई आक्षेप नहीं होगा।

बौद्धिक रूप से इसे स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि जब कोई कॉरपोरेट ऑफिस या व्यक्ति कोई भी दानार्थ काम भी हाथ में लेता है तो वह हिसाब जरूर लगाता है कि लागत के हिसाब से प्राप्ति-धन या किसी और रूप में-कितनी होगी अर्थात कितना लगेगा और कितना मिलेगा। इसी के अनुसार अपना लक्ष्य निर्धारित किया जाता है, बजट बनता है और प्राप्त फलों का गहन विश्लेषण होता रहता है तथा अपने कार्य की दिशा निश्चित की जाती है।

पर एक रास्ता ऐसा है जिसमें प्रक्रिया का क्रम परिभाषित किया जाता है फल की प्राप्ति का मापदंड नहीं। जब पूरी तरह परिभाषित प्रक्रिया अपनाई जाती है तो फल भी स्वाभाविक तौर पर प्राप्त होते हैं। यदि हमारा रास्ता सही है तो हमें सही मंजिल मिलेगी। इसके लिए साहस चाहिए कि विचार को कर्म में उतारा जाए। साहस यह कहने के लिए भी होना चाहिए कि हम बिना किसी

श्रीमदुभगवत गीता

श्रीमदुभगवत गीता

कृष्ण यहां एक अनुठी तरकीब बताते हैं संस्कारों से पिंड छुड़ाने को। यदि हम लालच या भय द्वारा संचालित नहीं होंगे: यदि हमारे कर्म फलोन्मुख नहीं होंगे तो कोई संस्कार पैदा नहीं हो पाएगा। यदि आप निष्काम भाव से रोज आधा घंटे भी कोई काम कर सकें तो आपका निश्चय ही बहुत भला होगा।

इस काम या सेवा को करते हुए कोई योजना न बनाएं। यह भी योजना न बनाएं कि किसी स्वयं सेवा को लिए कितने स्वयंसेवक होने चाहिए। सिर्फ काम करें जितना आप कर सकते हों। बेशक आपको यह मूर्खतापूर्ण प्रतीत हो सकता है-फालतू, वक्त की बर्बादी भी लग सकता है, परंतु कुछ समय बाद इस समय (आधा घंटे) का महत्त्व आप पर उजागर होगा। यदि आपकी सेवा लालच या भय से संचालित है तो आप सब कुछ गुड़-गोबर कर देंगे और दूसरों के लिए भी कष्टकारी प्रतीत होंगे। हम कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकते, जब हमारी स्वार्थी इच्छाओं की पूर्ति होगी। वे तो हमारे अहम् को और गिजा देंगी। उनसे कोई सार्वभौमिक या संसार-भर के कल्याण का उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा।

एक लघु कथा

एक स्कूल में स्काउट लड़कों को लिए यह आवश्यक था कि वे रोज कोई सामाजिक सेवा का काम करें और स्कूल में आकर उसकी रिपोर्ट दें अपने मास्टर को। एक दिन तीन लडके आए और बताया कि उन लोगों ने एक वृद्ध महिला को सड़क पार करवाई है। उनके मास्टर ने कहा-"किसी वृद्ध महिला को सड़क पार करने में मदद करना वाकई सामाजिक सेवा है, पर इसमें तीन स्काउटों को क्या जरूरत थी? एक ही काफी था।''

लड़के ने जवाब दिया-" अरे नहीं सर! तीन भी बड़ी मुश्किल से उसको सड़क के इस पार ला पाए। वह महिला तो सड़क पार करना ही नहीं चाहती थी।''

सिस्टेमिटाईज़्ड सेवा इसी प्रकार के गुल खिलाती है, इसलिए कुछ भी प्लान मत करो। कहीं भी जाकर कोई सेवा करो। वह सेवा धीरे-धीरे तुम्हारे अस्तित्व में असीम शक्ति का संचार कर देगी, तो कम-से-कम आधा घंटे रोज निष्काम भाव से कोई सेवा करो। मैं अपने भक्तों से कहता हूं कि कम-से-कम आधा घंटा रोज हमारे मिशन में आकर सेवा करो। यह सेवा ही ध्यान लगाना हो जाएगा। इससे सामूहिक चेतना का भाव जगेगा और सेवा में निहित दिव्यता की अनुभूति सबको होगी।

भगवान कहते हैं-''कर्मानुबन्धीनी मनुष्य कोरे' अर्थात् हमारे सारे कर्म फल के बंधन में रहते हैं। तो (ऊपर सुझाई गई) इस सेवा में न डॉलरों का

प्रतिफल की कामना को काम करेंगे। एक आत्मविश्वास से परिपूर्ण व्यक्ति हो यह स्वीकार कर सकता है कि महत्वपूर्ण 'काम करना है' 'कर्त्ता होना नहीं' और काम की दशा ज्यादा महत्वपूर्ण है, वरन् कर्त्ता की दशा या दिशा से।

इसलिए जरूरत है कि हम सदैव अपने वर्तमान पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखें तथा अपना मार्ग निर्धारित करें और देखें कि हम इस प्रक्रिया में कितने आगे बढ़ पाए या कहां तक यह प्रक्रिया हमने अपनाई। यदि ऐसा पूरी जागरुकता को साथ किया जाएगा तो फल अपने आप मिलेगा।

इस वृक्ष को काटना

इस संसार का जैसा रूप कहा गया है वैसा विचार में प्रकट नहीं होता, क्योंकि इसका न आदि है, न अंत और न ही यह भली प्रकार स्थित है। इसलिए इस अहम्ता, ममता और वासना रूपी अति दृढ़ मूल वाले संसार वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र से काट कर:

(परम पद रूप) परमेश्वर को भलीभांति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए लोग फिर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से यह पुरातन संसार-वृक्ष को प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है "उसी आदि पुरुष नारायण की मैं शरण में हूं''-ऐसा दृढ़ निश्चय कर परमेश्वर का मनन करना चाहिए।

कृष्ण उस कारणात्मक शरीर के बारे में आगे बोलते हैं जहां संस्कार जमा रहते हैं। कृष्ण एक असाधारण वैज्ञानिक प्रतीत होते हैं, क्योंकि एक वैज्ञानिक ही ईमानदारी से सत्य की खोज करता है। वह इस खोज को लिए अपने मत या धर्म की भी कुर्बानी दे सकता है। उसी में इतना साहस होता है कि वह पग-पग पर प्रकट होने वाले रहस्यों का मर्म स्पष्ट करता रहे।

कृष्ण में ये सारे गुण मौजूद हैं-अभिव्यक्ति और अपनी खोज के बारे में पूरी तरह बेबाक। बड़े सत्य को लिए वे अपने लघु समय का परित्याग कर सकते हैं; कल के सत्य को त्यागकर आज तक को आद्यतन समझ पर कायम हो सकते हैं।

हम पिछले वर्ष के टाइम-टेबिल से आज ट्रेन का इंतज़ार नहीं कर सकते। कृष्ण लगातार स्वयं को आद्यतन करते रहते हैं और उनमें इतनी हिम्मत भी है कि गुप्त रहस्यों को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर दें। उन्हें कॉपीराइट (सर्वाधिकार) या बौद्धिक अधिकार की कोई परवाह नहीं होती।

श्रीमदुभगवत गीता

वह अंतरात्मा जो शरीर छोड़ती है, सम्मूर्छित अवस्था में होती है, जब वह इस कारणात्मक सतह से गुज़रती है। जब तक यह अंतरात्मा इस सतह को पार नहीं करती, यह शरीर में लौट सकती है। यह संस्कारों की शक्ति के कारण होता है। यह जमी हुई स्मृतियों या इच्छाओं का जमावड़ा, इस अंर्तात्मा को वापिस भी खींच सकती है। इसलिए कई वर्षों तक मूच्छा में पड़े रहने के बावजूद कुछ लोग वापिस चेतना में आ जाते हैं। उनको वापिस लाने वाली यही अपूर्ण इच्छाएं होती हैं. पर जब अंतरात्मा कारणात्मक सतह पार कर लेती है तो इसका वापिस आना असंभव हो जाता है। यह शरीर में फिर नहीं जा सकती। तब इसके लिए अगली

सतह - कॉस्मिक (ब्रह्मांडीय) सतह-तक पहुंचना लाजमी हो जाता है। जब हम कारणात्मक सतह को पार कर कॉस्मिक सतह तक पहुंच जाते हैं और संस्कारों का तिरोभाव हो जाता है, तब हम अपनी जमा की गई स्मृतियों के निर्देश से संचालित अपने अचेतन से निर्देशित नहीं होते। फिर तो हमारे प्रज्ञा-चक्षु खुल जाते हैं। पहले हमारे काम या प्रतिक्रिया हमारी सहजवृत्ति (इंसटिंक्ट) के आधार पर होती थी, अब उसकी निर्णायक हमारी अंतर्प्रज्ञा हो जाती है। फिर हम अज्ञानपुर्ण जागरण स्थिति में नहीं वरन सही रूप में जागृत चेतना में रहते हैं।

इकटठे हुए संस्कारों को गलाने या खत्म करने का सबसे सही तरीका है महा चेतनाशील ध्यानात्मक मार्ग द्वारा अचेतन को जागरूक करना, अपनी जागरूकता द्वारा अचेतन को चेतना देना।

प्राचीन वैदिक सामाजिक मान्यता थी कि ज्ञान सर्वथा मुक्त होता है। तब सर्वाधिकार की अवधारणा भी नहीं थी। कृष्ण पूरे साहस से सारे गुप्त रहस्यों का उदघाटन करते हैं।

वे बड़ी सुंदरता से कहते हैं-''न रूपमस्येह तथोपलभ्यते'' अर्थात् कोई भी इस वक्ष को अपने विचारों में सही रूप से समझ नहीं सकता, क्योंकि न इसका आदि ज्ञान है. न अंत और न ही इसका मूल आधार, लेकिन दृढ़ निश्चय कर इस वृक्ष की मजबूत इच्छाशक्ति एवं वैराग्य या अनासक्ति से काट देना चाहिए कारणात्मक शरीर में क्या इकट्ठा है यह कोई नहीं देख सकता। वह तो भानमति के पिटारे के जैसा होता है। कारणात्मक शरीर में एकत्रित संस्कार अपने आपको एक-एक कर प्रकट करते हैं, पर यदि हमने उनमें से चार को हटाया तो वहां 10 पैदा हो जाएंगे। अंदर क्या है यह किसी को ज्ञात नहीं होता। सिर्फ एक ही संभावना है कि दूढ़ निश्चय एवं पूर्ण निरासक्त भाव की कल्हाड़ी से इसको काट दिया जाए। यानी बुद्धि और दुढ़ इच्छाशक्ति की सहायता से इस पुरी कारणात्मक सतह से मुक्ति पाना संभव है।

लोग अपने गुरुजनों से पूछते हैं कि इन संस्कारों से कैसे मुक्ति पाई जाए। सिर्फ दढ़ इच्छाशक्ति और बुद्धिमत्ता ही ऐसा कर सकती है। यदि आग में हमारे हाथ चले जाएं तो क्या हम अपने गुरु को सहायता को लिए गुहार लगाते हैं? नहीं। हम जानते हैं कि आग जला डालेगी, इसलिए तुरंत हाथ आग में से निकाल लेते हैं। हम जब गुरुजन से किसी सहायता की गुहार लगाते हैं तो वह इसलिए क्योंकि हमारे अंदर वह समझ नहीं है।

यदि समझ हो तो सही कर्म भी होगा। यदि कर्म सही नहीं है तो यह समझ लें कि जरूरी समझ की कमी वहां रही है। इसी प्रकार संस्कार भी खतरनाक होते हैं (आग की तरह)। इनसे मुक्ति पाने को लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और बुद्धिमत्ता की दरकार होती है।

कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि इस संस्कार वृक्ष को काटकर शाश्वत मौन में अपना आत्म समर्पण कर दो, जहां से वापसी संभव नहीं होती। यह वह अंतराल है जिसमें हमारा समुचा अस्तित्व समाहित रहता है।

मन में संस्कारों का इकट्ठा होना ही तो हमारी अस्मितता या पहचान बनाता है। पुरानी स्मृतियां और इच्छाएं अचेतन मन में दबी रहती हैं, यानी हमारी ऊर्जा की कारणात्मक सतह में। गहन समाधि और केंद्रित ध्यान के माध्यम से इस अचेतन कारणात्मक सतह का भेदन कर वहां इकट्ठे संस्कारों को खत्म कर सकते हैं, पर ऐसा करने के पश्चात् हम वह व्यक्ति नहीं रह जाते, जो हम ऐसा करने के पूर्व थे। अब हम संस्कार-विहीन और मुक्त होंगे।

श्रीमद्भगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

  1. 5 जिसका मान और मोह नष्ट हो गया है; जिन्होंने आसक्ति रूपी दोष को जीत लिया है; जिसकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएं पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं वे सुख-दु:ख नामक द्वंद्वों से विमुक्त ज्ञानी जन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।

  2. 6 जिसको प्राप्त कर मनुष्य संसार में लौटकर नहीं आते। वही में मरुक पिता पिरम धाम है, उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा, न अग्नि ही।

कृष्ण वही सत्य अब एक ज्यादा गहरी सतह पर समझाते हैं। यही विचार उन्होंने पहले अध्यायों में भी व्यक्त किया है, लेकिन तब अर्जन उसे समझ नहीं पाया था। अर्जन तब प्रश्न पुछने की मानसिकता में था। प्रश्नाकुल मानसिकता में हम बजाय विषय में लिप्त होने के अपने प्रश्न तैयार करते रहते हैं। अब अर्जन की वह मानसिकता नहीं है, अब उसके मन में केवल संशय बाकी है. प्रश्न नहीं।

संशय में पड़ने वाला शिष्य अपने मन को खोलता है; वह चाहता है कि गुरु उसके मन में उतरकर देखें. वह प्रतीक्षा में रहता है। अब अर्जन कृष्ण के उपदेश पुरी तरह से आत्मसात करना चाहता है; वह अपने गुरु के शब्दों की प्रतीक्षा में है। अब उसका अंतर्द्वंद्व शांत हो चुका है, अत: मन में कोई प्रश्न नहीं उठ रहा। अब उसका अंतर्मन कृष्ण को ग्रहण करने को तत्पर है, इसलिए अब उसकी समझ खुल चुकी है।

जेन बुद्धवाद में इस स्थिति को 'कोडन' अर्थात् एक तरह की पहेली कहा जाता है। यह स्थिति एक ही शब्द में बताई जाती है। एक प्रसिद्ध ज़ेन 'कोडन इस प्रकार का है-''एक हाथ से बजती ताली की ध्वनि कैसी होती है?'' एक अन्य ' कोडन' है-" तुम्हारे मां-बाप के जन्म से पूर्व तुम्हारा चेहरा कैसा था?" शिष्य लोग इन्हीं 'कोडनों' पर मनन करते हैं और अपने उत्तर लेकर गुरु के पास जाया करते हैं। गुरु उनकी पीठ पर एक धौल जमाकर उन्हें अपने रास्ते भेज दिया करते थे। अनात: उन्हें एक हाथ से बजी ताली को ध्वनि का अनुभव हो जाता है।

आसक्ति से परे ( होना )

यहां कृष्ण कहते हैं—''जिसका मन-मोह नष्ट हो गया है, जो आसक्ति को जीत चुके हैं; जिनकी परमात्मा को स्वरूप में नित्य स्थिति है; जिनकी कामनाएं नष्ट हो चुकी हैं और जो सुख-दु:ख को द्वंद्वों से परे हैं; जो संशय मुक्त हैं और आत्म-समर्पण करना जानते हैं, शाश्वत पद को प्राप्त करते हैं।''

शब्दों का कितना सही प्रयोग है?

वह यह नहीं कहते कि जिन्होंने वासना का 'परित्याग' कर दिया है, क्योंकि केवल परित्याग करने से काम नहीं चलेगा। वैराग्य का अर्थ है राग-विराग से भी परे जाना। निरासक्त एवं राग रहित होना। विषयों के आकर्षण और विकर्षण से परे जाना।

लगभग सात वर्ष की आयु तक हम अपने खिलौनों में आसक्त रहते हैं। आठ-नौ वर्ष की अवस्था से हम इनसे परे जा पाते हैं। बीस वर्ष के होते-होते बच्चों के इन खिलौनों से हमें पूर्णत: निरासक्ति और वितृष्णा प्राप्त हो जाती है. परंतु बाहरी त्याग से हम इनसे पूरी तरह विमुख नहीं हो पाते, आंतरिक चाह तो बनी रहती है।

इसीलिए कृष्ण समुचित शब्द प्रयुक्त करते हैं-वे जो इस स्थिति से परे जा चुके हैं। यह वह स्थिति है जिसमें हम कुछ कर सकते हैं। हमें उस विषय-वस्तु का भान तो रहता है। हम ज़रूरत के अनुसार इसको प्रयुक्त कर सकते हैं या दूर हटा सकते हैं। जीवन भी एक खिलौने के समान ही तो है। यदि आप यह सत्य समझ सकें तो आप एक राजा के समान रहेंगे-वह राजा नहीं जो पादार्थिक चीज़ों का स्वामी है, वरन् वह राजा जो प्रबुद्ध भी है अर्थात् एक राजर्षि।

यह भी एक जेन 'कोडन' के समान ही है। इसको समझना नहीं होता, इस पर ध्यान लगाना पड़ता है। इन विधियों पर ध्यान लगाने से यह आपके मन में

पल्लवित होकर आपको कारणात्मक शरीर का स्पष्ट रूप बता देंगी। पहले कृष्ण ने संस्कारों को मिटाने की विधियां बताई थीं। अब वह एक सही सतह निर्माण का तरीका बता रहे हैं, जिसे हम कारणात्मक सतह को पुन: व्यवस्थित करना या रीप्रोग्रामिंग भी कह सकते हैं।

कृष्ण इस कारणात्मक शरीर के पुनर्निर्माण की विधियां बताते हैं।

श्रीमद्भगवत गीता

कृष्ण के शब्द जेन 'कोडनों' के समान हैं। वस्तृत: कृष्ण वही शब्द बार-बार इस्तेमाल करते हैं. न सिर्फ शब्द वरन अभिव्यक्तियां भी वही रहती हैं। अक्षर भी वही रहते हैं। पहले वे इन शब्दों को सलाह के रूप में जाहिर करते हैं और अब प्रोग्रमिंग तकनीक के लिए प्रयुक्त करते हैं। इस अध्याय में कारणात्मक सतह को व्यवस्थित करने के बारे में बताया गया है, अर्थात संस्कारों को प्रोग्राम में ढालने के लिए। यह कार्यक्रम हमारे कारणात्मक सतह में धनात्मक संस्कार उत्पन्न करेगा। जब तक अर्जन प्रश्नाकुलन मानसिकता में था, यही शब्द उसके लिए एक परामर्श या सलाह के रूप में थे, लेकिन जब वह प्रश्नों से उत्तर कर संशय को मानसिकता में आ जाता है तो यही शब्द उसकी विधियां बताते हैं। जब शिष्य प्रश्नाकुल 'मुड' में होता है तो का ज्ञान उसके लिए परामर्श है, पर जब वह संशय की स्थिति में आ जाता है, प्रश्नो से मक्त हो जाता है और सनना चाहता है तो यही शब्द उसको कारणात्मक शरीर के संस्कारों को धनात्मक बनाने की विधियां बताने लगते हैं।

सलाह के साथ आपको कुंजी भी चाहिए (ज्ञान का) दरवाजा खोलने को लिए। ये विधियां वही कुंजियां हैं। वे दरवाजा खोलने को तैयार हैं।

अर्जन अब पिछले अध्यायों का सार प्राप्त करता है। इस अध्याय में उसे सबका निचोड मिलता है। उत्तर-भारत को मठों में हर भोजन के पूर्व इसी अध्याय का पाठ किया जाता है। हर भोजन के पूर्व इस पंद्रहवें अध्याय का जाप किया जाना चाहिए, क्योंकि यह अध्याय आंतरिक अंतरात्मा के सही प्रोग्रामिंग का एक अमोघ औजार है। खाली शब्द ही चमत्कार पैदा कर सकते हैं आपकी कारणात्मक सतह की 'री-प्रोग्रामिंग' में।

इस पाठ में पांच मिनट से भी कम का ही समय लगता है। इसे कोई भी कर सकता है। अर्थ की चिंता न करें। यदि अर्थ समझ में आता है तो अच्छा है, लेकिन बिना समझे भी इनका पाठ या जाप आपके लिए बेहद फायदेमंद रहेगा। इन शब्दों के दोहराने मात्र से आप अपनी कारणात्मक सतह की 'री-प्रोग्रामिंग' कर सकते हैं। जब आप पूर्ण समर्पण भाव से अपने गुरु के प्रति अति श्रद्धापूर्ण वातावरण में इस अध्याय का जाप करते हैं तो यह जाप सीधे आपकी कारणात्मक सतह तक पहुंचता है।

इस समय अर्जून पुरी तरह स्वीकार करने को मानसिकता में है। उसकी मानसिक आवृत्ति अपने गुरु कृष्ण से जुड़ी है। गुरु की कृपा से वह अस्तित्व का पुरा लाभ ले रहा है। अब उसे न कोई तर्क चाहिए न दलील, वह अपने गुरु का ज्ञान आत्मसात करने को तत्पर है।

इसलिए कृष्ण निम्नलिखित शब्द उच्चारित करते हैं, उसकी कारणात्मक सतह की प्रोग्रामिंग करने के लिए। वह बताते हैं वे विधियां जो धनात्मक संस्कार पैदा करती हैं।

वे कहते हैं-''जिसका मान और मोह नष्ट हो गया है; जिन्होंने आसक्ति रूपी दोष को जीत लिया है; जिसकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिसकी कामनाएं पूरी तरह से नष्ट हो चुकी हैं-वे सुख-दु:ख नामक द्वंद्वों से विमुक्त ज्ञानी जन इस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।"

मोह या वासना का संपूर्ण त्याग आदमी के लिए बहुत मुश्किल है। बडे-से-बड़े ऋषि-मुनि भी इसी वासना या मोह से स्वयं को नहीं बचा सके। यह मोह या वासना शरीर का गुण है और जब तक यह शरीर है, यह वासना भी रहेगी ही। जब तक शरीर से परे न जाया जाए, वासना से छुटकारा मुश्किल है।

एक लघु कथा को प्रतिक बैठक मात्रा बन्ध

एक बच्चा अपने मां-बाप के साथ बच्चों की एक फिल्म देखने गया। वह फिल्म एक जंगल के कुछ जानवरों और एक शेर के बच्चे के बारे में थी। बच्चा उस फिल्म को बड़े मजे से देख रहा था कि उस फिल्म में एक सीन आया जिसमें सिंह शावक एक शिकारी द्वारा फंसा लिया गया था। बच्चा भयाक्रांत हो गया। उससे बर्दाश्त नहीं हुआ तो वह भागकर स्क्रीन के पास चला गया और वहां इस प्रकार वह हाथ-पैर फेंकने लगा, मानों वह उस शिकारी से सिंह शावक को पिंजड़े में न डालने के लिए यूद्ध कर रहा हो। जल्द ही उस सीन में जंगल के अन्य जानवर सहायतार्थ आ गए और उन्होंने मिलकर उस शिकारी को भगा दिया।

बच्चा अब वापिस अपनी सीट पर आया और बड़े गर्व से अपने मां-बाप को बताया-''देखा! मैं सबसे पहले उस शेर के बच्चे की मदद को लिए पहुंचा था, बाकी जानवर तो बाद में ही आ पाए थे और हमने उस सिंह शावक को बचा लिया।''

जैसे कि वह बच्चा उस फिल्म को सत्य समझा था, हम भी समझते हैं कि इंद्रियों से जो हमें जानकारी मिलती है वह सत्य होती है और हम उस माया में पड जाते हैं जो हमारी इंद्रियां हमारे सामने ही रचती हैं। सबसे बड़ी माया या दुष्टिभ्रम हमारी अंतर्निहित वासना के कारण पैदा होता है।

एक प्रबुद्ध ज्ञानी यौन भाव एवं वासना से परे होता है। उसको लिंग भेद में भी नहीं बांधा जा सकता। वह तो 'अर्धनारीश्वर' होता है यानी जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों के भाव रहते हैं। अत: प्रबुद्ध ज्ञानी को एक खासियत यह भी होती है कि वह लिंग भेद से परे होता है।

कृष्ण यहां सीधी बात करते हैं। अब वह कोई 'प्रलोभन' या मोहित करने

वाली क्रीम कैंडी नहीं देते मन खुश करने को। वे निर्ममतापर्वक सीधी बात करते हैं। वे साफ कहते हैं-जिसने वासना पर विजय प्राप्त कर ली हो। वासना एक आदिम भाव है जिसके द्वारा प्रकृति विभिन्न योनियों का क्रम जारी रखती है। महा चेतनता को प्राप्त करने का पहला सोपान है, इस वासना को जीत लेना, इसके परे चले जाना।

मनुष्य सदैव से प्रेम और वासना में संशयग्रस्त रहता है। वह समझता है कि सिर्फ जानवरों में ही वासना का जोर होता है। सत्य तो यह है कि जब समागम करते हैं तो मात्र जानवर ही विशुद्ध वासना दिखा पाते हैं। मनुष्य अपनी सदैव उपस्थित तर्कशीलता के कारण न कभी पूरा वासना से भरा होता है, न प्रेम से। सदैव दविधाग्रस्त रहने वाला आदमी कभी न संतुष्ट होता है न पूर्णकाम।

वैदिक विवाह पद्धति में एक रिवाज होता है 'सप्त पदी का'-जिसमे विवाह के बंधन में बंधने वाला जोड़ा अग्नि के चारों ओर फेरे लेता है, तब मंत्रोच्चारण होता है और अग्नि को साक्षी मानकर वे दोनों स्त्री-पुरुष विवाह बंधन में बंध जाते हैं। उसमें एक मंत्र में पति से पत्नी कहती है-"तुम मेरे ग्यारहवें पुत्र हो जाओं" और पति पत्नी से कहता है "तुम मेरी ग्यारहवीं पुत्री हो जाओ।" इसका अर्थ है कि उनकी शादी के ग्यारहवें वर्ष में उनकी आत्मीयता इतनी घनिष्ठ हो जाएगी कि वे दोनों एक-दूसरे की संतान जैसे लगने लगेंगे। घनिष्ठता द्योतक है बेहद आत्मीय संबंध की। वस्तृत: यह शब्द काव्य के अंश नहीं वरन उनके जीवन-यापन के लिए मार्गदर्शक हैं।

इस घनिष्ठता में प्रेम भी जोड दो। अभी तक हमारा प्रेम और वासना हिंसा से बहुत गहरे जुडा रहता है-दूसरे व्यक्ति पर कब्जा जमा लो और उसके प्रतिरोध को परी तरह समाप्त कर उसको जीत लो। प्रारंभ में तो यह युद्ध ही लगता है। अब बजाय झगडे के रिश्ते में दोस्ती या घनिष्ठता का संचार करो। अपने जीवनसाथी का स्वागत करो, चाहे वह कैसा भी हो-सिर्फ स्वीकार करने से ही काम नहीं चलने वाला। स्वागत करो अपने साथी का-उसके शरीर, मन और अस्तित्व का-वह जैसा भी हो।

पर क्या हम अपने शरीर के भी दोस्त होते हैं? नहीं-हम नहीं होते। यदि हम गौर से देखें तो हम अपने शरीर का सम्मान नहीं करते-उसका दुरुपयोग करते हैं। हम देर तक जागकर टीवी देखते रहते हैं, चाहे हमारा शरीर सो जाने को चील्कार करता हो। पेट भरा हो तब भी हम उसमें भोजन ठंसते रहते हैं। हमारे फेफडे छलनी हो गए हों फिर भी हम सिगरेट पीना नहीं छोड़ते। शराब पी-पीकर स्वयं को बेसुध कर लेते हैं। हम अपने शरीर को कूडे का डिब्बा समझते हैं। हम उस सअर के समान हैं जो कचरे में नाक गडाकर सोचता है कि

वह उसकी दुर्गंध से बच सकेगा। हम अपने शरीर को निरंतर त्रास देते हैं और समझते हैं। कि हम इसका मनोरंजन, कर रहे हैं। इसी रहे हैं। इसी रहे हालांकी काम हठ ब सम्मू-हम संसार-भर, में, फैले, आतंकवाद, को तो, चिंता, करते हैं, पर, अपने, घर

की. अपने शरीर के प्रति हिंसा से विमुख रहते हैं। परपीडित करने वाली कामकता और वहशीपन हमें परेशान नहीं करता, बाहर का आतंकवाद करता है। हम स्वयं को अपराध बोध द्वारा त्रास देते रहते हैं और दूसरों को अपनी 'परफैक्शनिज्म' (संपूर्ण सिद्धता) से परेशान करते रहते हैं। यह भी तो एक प्रकार की हिंसा है; आतंकवाद का ही एक सुक्ष्म रूप है।

  • एक आदमी ने मुझसे कहा-''मेरी पत्नी एक वकील है।'' मैंने पुछा-''क्या वह कोर्ट जाती है?'' उसने कहा-''नहीं, वह घर में ही दलीलें देती रहती है।'' - अपनी कल्पनाशीलता और सपनों से मुक्ति पाओ। दूसरों को प्रति अपने व्यवहार में दोस्तानापन जोड दो। उनको संपूर्ण अस्तित्व, मन और शरीर से मित्रता रखो। ऐसे शब्द बोलो जो दूसरों को भले लगें। दूसरों को चंगा रखने के लिए ही अपने शरीर का उपयोग करो। अपना बर्ताव, हर एक से सदा दोस्ताना रखों। यह भी एक आध्यात्मिक प्रक्रिया ही है। लक्ष्मी मैया को महिमा एवं करुणा सब तक पहुंचाओ, बजाय उसकी पूजा करने या व्रत-दान करने को।

कृष्ण बताते हैं कि 'परम चेतना ही उनका शाश्वत धाम है। इसमें प्रकाश न चंद्रमा से होता है, न सूर्य, न अग्नि से। इसमें जो एक बार प्रविष्ट हो जाता है वह पदार्थिक संसार में वापिस नहीं आता।'

ये शब्द कोई परामर्श नहीं हैं ये मनन के लिए कहे गए हैं। वस्तृत: सलाह एक ऐसी चीज है जो सब कोई देता है. पर कोई स्वीकारता नहीं। कृष्ण ये शब्द हमारी कारणात्मक सतह को प्रोग्रामिंग करने के लिए कहते हैं इन शब्दों पर मनन करो, ध्यान करो। यह तो पवित्र मंत्र है जिस पर निरंतर ध्यान होना चाहिए।

ऊर्जा की कारणात्मक सतह वह रास्ता है जिससे अंतरात्मा अपने अंतिम पडाव से गजरती है और अंतत: इस पादार्थिक विश्व को त्याग देती है। जब अंतरात्मा कारणात्मक सतह पर फंसी रहती है तब वह व्यक्ति 'कोमा' (मृत्यू से पूर्व की स्थिति) में रहता है। इसमें तो वह लंबे समय तक फंसी रह सकती है।

जो इस कारणात्मक सतह को पार कर जाते हैं, उनके लिए यह सतह एक ऊर्जापूर्ण अंधकार का प्रतीक है, जहां न सूर्य चमकता है, न चंद्र, न अग्नि गर्मी देती है। यहां से जीव कॉस्मिक सतह की ओर बढता है और अंतत: निर्णायक सतह की ओर, जो संपूर्ण मूक्ति की द्योतक है।

इन तकनीकों पर ध्यान किया जाता है और उस सत्य को ग्रहण किया जाता है जो कृष्ण यहां स्थापित कर रहे हैं। यहां ध्यान अंधकार में होता है, जिसके बारे में हमारे प्रोग्रामों के शिक्षक बताते रहते हैं हमारे मेड़ीटेशन प्रोग्रामों में। यह ध्यान जिसका केंद्र बिन्दू अंधकार होता है, हमें मृत्यु भय से मुक्त करता है तथा उस भय से भी निवृत्त करता है जो हमें अस्मिता खो जाने की संभावना या मृत्यु से उत्पन्न होती है।

मृत्यु कोई विकल्प नहीं है। शरीर की मृत्यु अवश्यंभावी है, पर शरीर मन से आत्मा का जुदा होना. एक कष्टकारी स्थिति है। विवेकानंद कहते हैं कि यह स्थिति वैसी ही है जैसी हजारों बिच्छुओं के दंश देने पर महसूस होती है।

मृत्यु के समय आत्मा शरीर के उस खोल से मुक्त होकर असीम ऊर्जा में समा जाती है, फिर यह एक अन्य खोल में प्रकट होती है, किसी दूसरे शरीर, व्यक्ति में और परमात्मा की असीम सत्ता में विलीन हो जाती है। जब यह आत्मा राग-द्वेष, आसक्ति-निरासक्ति से, मोह, माया से परे रहकर लगातार परमात्मा को ध्यान में केंद्रित रहती है तो फिर यह किसी दूसरे शरीर-मन तंत्र में वापिस नही आती और जो ऐसी नहीं होती, उनका पुनर्जन्म होता है।

कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि शरीर की मृत्यू अवश्यंभावी है, यद्यपि आत्मा अमर है। आत्मा सदा रहती है। जब यह पूरी तरह विकसित हो जाती है तो वह उस मानसिक व्यवस्था में नहीं आती और सारे पुनर्जन्मों से परे पहुंच जाती है। बस यही कुल हाल है।

  • 15.7 इस देह में यह जीवात्मा ही मेरा सनातन अंश है और वही इस त्रिगुणमयी माया में स्थित मन और पांचों इंद्रियों को आकर्षित करता है।
  • 15.8 जैसे वायु गंध के स्थान से गंध को ग्रहण करके ले जाती है, वैसे ही देहादि का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर को त्याग करता है, उससे मन सहित इंद्रियों को ग्रहण कर जिस शरीर को प्राप्त होता है उसमें जाता है।

कृष्ण यहां एक नए भाव (शब्द) का प्रयोग करते हैं-'कंडीशनिंग (अनुकूलन) का। आधुनिक शोध बताते हैं कि आदमी दो पैरों पर अनुकूलन के कारण ही चलता है। वैज्ञानिकों को एक समूह ने हाल ही में एक 17 वर्षीय लडके को एक जंगल में देखा। उसका पालन-पोषण भेड़ियों ने किया था। वैज्ञानिकों ने उसको दो पैरों पर चलना सिखाने को बहुत कोशिश की और कुछ शब्द भी बोलना सिखाने का प्रयत्न किया, पर वे सफल नहीं हुए और एक वर्ष में ही वह लड़का मर गया।

  • अपने अनुकूलन (आदत) को कारण आदमी दो पैरों पर चलता है। वस्तुत: मानव प्रकृति की हर आदत का आधार यही अनुकूलन है।

  • ज़ेन बौद्धों को पास एक सुंदर विधि है 'अनुकूलन' (डी-कंडीशनिंग) को लिए। इसमें साधक को 21 दिनों तक एक कक्ष में ही रहना पड़ता है। वह वहीं खाता और सोता है, पर इस दौरान उसे हर उस वस्तु का प्रभाव अपने दिमाग से दूर हटाना पड़ता है, जो भी उसने देखी या सुनी हों। उन लोगों का दावा है कि ऐसा साधक 21 दिनों में प्रबुद्ध हो सकता है। यह एक बड़ा मुश्किल काम है। 21 मिनट के लिए भी इस हालत में रहना मुश्किल है।

यहां कृष्ण 'अनुकूलित विश्व' की बात करते हैं। हर चीज़ अनुकूलित है। सही या गलत, सम्मान या असम्मान सब कुछ अनुकूलन के अनुसार होता है।

हम सही-गलत, सम्मान या असम्मान को अपने अनुकूलन के अनुसार ही समझते हैं।

हम सब अनुकूलित हैं। यदि लोग हमें एक प्रमाणपत्र देते हुए तालियां बजाते हैं तो उसे हम सम्मान समझते हैं। यही हमें सिखाया गया है पर हम कभी दूसरों की इस तारीफ को अपने हिसाब से विश्लेषित नहीं करते। यह सम्मान का विचार कई लोगों को पागल कर देता है, भीड़ का निर्णय कभी स्वीकार नहीं करना चाहिए।

एक लघु कथा - हम, तौर कर को के लिए मिमिटी

एक बार विसटन चर्चिल एक भाषण दे रहे थे। लगभग 10 हजार लोग उन्हें सुन रहे थे। एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि इतने ज्यादा श्रोताओं को देखकर उनको कैसा लगा। चर्चिल ने कहा-''मेरा महत्त्व कभी श्रोताओं की भीड़ से मत आंकना। आज यहां 10 हजार लोग हैं। यदि घोषणा कर दी जाए कि कल मुझे सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया जाएगा तो आपको लाखों लोग यहां इकट्ठे मिल सकते हैं। वह तो एक बड़ा तमाशा होगा।''

अत: भीड़ यह तय नहीं कर सकती कि सही-गलत क्या है या सम्मान और असम्मान क्या है। आपकी अपनी ईमानदारी, चारित्रिक संपूर्णता, आपकी आत्म-जागरुकता ही आपकी असली कीमत तय करती है।

यहां कृष्ण ध्यानार्थ प्रार्थनाएं बताते हैं जिससे आप अपनी कारणात्मक सतह, आपके संस्कार को पुनर्व्यस्थित कर सकें। जो लोग स्वयं को अच्छी तरह नहीं जानते, वही दूसरों द्वारा उनकी जान लेने से डरते हैं। प्रथम तीन सतहों को पार कर और कारणात्मक सतह से भी परे जाकर आप एक ऐसे अंतराल में पहुंचते हैं जो अनुकूलन से मुक्त है। काश! आप सब भी इस अनुकूलन के कब्जे से स्वतंत्र रहें।

कृष्ण कहते हैं-"वे छह इंद्रियों द्वारा (मन मिलाकर) आकर्षित होते हैं अर्थात् पांच तो ज्ञानेन्द्रियां हैं ही, छठवीं इंद्रिय मन है, परंतु मेरे हिसाब से इंद्रिय तो अकेला मन ही है, बाकी पांचों भौतिक इंद्रियां तो उसकी गुलाम होती हैं। यदि मन संभल गया तो पांचों इंद्रियां स्वत: ही संभल जाती हैं।

एक लघु कथा। ? मन मेंस करता है करण मा मि कही के आधी 10 ? रानी मदालसा ने सात संतानों को जन्म दिया। हर बच्चा सात वर्ष का होते ही प्रबुद्ध हो गया और राज्य से बाहर चला गया। उनका पिता, जो राजा था, भारी

आश्चर्य में था। एक साथ उसकी सातों संतानें प्रबुद्ध हो गईं! कैसे? उसने जब इस विषय में खोजबीन की तो पाया कि मदालसा ने उन सभी को एक मंत्र दिया था-'तत्त्वम असि:' (तुम वही हो)। इस भाव को अपने अंदर आत्मसात करते ही उन सबकी मानसिकता बदल गई। उनके संस्कारों का जाल हट गया, उनकी कारणात्मक सतह से-और वे सब प्रबुद्ध हो गए।

वस्तत: संस्कारों का हट जाना और अनुकूलन का दुर हो जाना ही प्रबोधन पाप्त कर लेना है। तब हम अपनी शुद्ध मौलिक प्रकृति को वापिस पहुंचते हैं। इसलिए प्रबोधन को समाधि भी कहा जाता है। समाधि का अर्थ है 'अपनी मूल अवस्था में वापिस पहुंचना'।

इस विषय-योग के विश्व में रहते हुए आत्मा जब एक शरीर त्यागकर दसरे में पहुंचती है तो इन संस्कारों को भी अपने साथ ऐसे ही ले जाती है, जैसे वाय गंध के स्थान से गंध को ले जाती है। वे संस्कार एक शरीर से हटकर दुसरे शरीर में अपना ठिकाना बनाते हैं। संस्कारों का यह अंतहीन विषय-चक्क चलता ही रहता है, इसी को कृष्ण 'संसार' कहते हैं, जहां आवागमन का चक्र अनवरत चलता रहता है।

कृष्ण कहते हैं-'इनको लेकर'! इसमें 'इनको' का अभिप्राय किससे है? पिछले श्लोक में कृष्ण ने छह इंद्रियों का जिक्र किया था-पंचेंद्रिय और मन का। उन्हीं का हवाला वे यहां देते हैं। जब आत्मा एक शरीर से दसरे शरीर में जाती है तो अपने साथ यह छह इंद्रियां (भौतिक ज्ञान बोध) भी ले जाती है-पांच भौतिक इंद्रियां और एक मन। वैसे ही जैसे वायु गंध को एक स्थान से दूसरे स्थान में ले जाती है, हमारी चेतना संस्कारों को ले जाती है, भय कारणात्मक शरीर के अंकित भावों सहित-एक शरीर से दूसरे शरीर में।

कृष्ण यहां पाप के बारे में प्राय: पूछे जाने वाले एक प्रश्न का उत्तर देते हैं। लोग पूछते हैं कि क्या एक जन्म के पाप दूसरे जन्म तक साथ जाते हैं। पाप कभी साथ नहीं जाते, उनके करने के समय हमारे संस्कार या स्मृतियों पर अंकित भाव ही साथ जाते हैं। उदाहरण के लिए अगर किसी ने एक जन्म में 100 हत्याएं की हैं तो अगले जन्म तक यह संख्या नहीं बल्कि वह मानसिकता जिसके अंतर्गत उसने यह जघन्य अपराध किया है, साथ जाएगी और उसे त्रास देती रहेगी। यानी घटना नहीं उसका प्रभाव बताने वाली मानसिकता अगले जन्म तक पीछा नहीं छोडेगी।

कर्मवाद का सिद्धांत प्राय: कर्म के औचित्य को सिद्धू करने के लिए उद्धत किया जाता है। लोग प्राय: कहते मिलते हैं-'यह तो हमारा कर्म ही है; हमारी नियति है। इससे क्या बचाव है? या जो होना था वह तो होना ही है।'' यह अपने

आप स्वयं ही आपके संस्कार हैं

  • 15.9 और उस शरीर में स्थित हुआ, यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्ष और त्वचा को तथा रसना. घ्राण और मन का आश्रय करके (इनके सहारे) ही विषयों का सेवन करता है।

  • 15.10 परंतु, शरीर छोडकर जाते हुए (जीवात्मा) को अथवा शरीर में स्थित हुए को और विषयों को भोगते हुए को अथवा तीनों गुणों से मुक्त हुए को भी अज्ञानी जन नहीं जानते-मात्र ज्ञान रूप नेत्रों वाले ज्ञानी जन ही तत्त्वत: (असली रूप में) जानते हैं। 'जीवात्मा एक शरीर छोड़ दूसरा शरीर धारण करती है तथा नई आंखें कान, नाक, जिह्वा एवं शरीर बोध प्राप्त करती हैं। वह उन संस्कारों को अनुसार काम करते हैं जो इसके कारणात्मक सतह पर नई मानसिकता से संचालित होते हैं।

यहां कृष्ण एक नया रहस्य उद्घाटित करते हैं। वे कहते हैं-" कारणात्मक सतह में उपस्थित संस्कारों के अनुसार नया शरीर बनता है।'''

एक प्राचीन हिन्दू शास्त्र है 'सामुद्रिक लक्षण शास्त्र', जो शरीर के लक्षणों के अनुसार व्यक्ति की मानसिकता स्पष्ट करते हैं। इसके अनुसार शरीर और मन में एक सीधा संबंध होता है। कृष्ण का कहना है कि जीवात्मा पांच इंद्रियों को मन और मानसिकता के अनुसार ढाल देती है। यह सिर्फ तभी नहीं होता जब नया शरीर धारण किया जाता है। हर रोज़ जब हम गहन निद्रा से उठते हैं तो हमारा इंद्रिय बोध पुन: सुजित होता है। यदि थोडी देर को भी हम अपनी मानसिकता परिवर्तित करते हैं, जागरुकता तो हमारे चेहरे पर परिवर्तन आ जाता है।

आप स्वयं को सुजित करते हैं

हमारा 'मन' वह बुद्धिमत्ता है जो समस्त शरीर पर व्याप्त रहता है। यह ही है जो हमारे विभिन्न कोशों में उपस्थित रहता है। दो वर्ष से कम के भी समय में हमारे शरीर का हर हिस्सा, हर कोश नया होता रहता है। सालभर पूर्व जो श्रीमद्भगवत गीता

ऋणात्मक कृत्यों के लिए हमारा चलाया एक ढकोसला है, जो अपनी गलतियों का औचित्य ढूंढने को लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह कतई सत्य नहीं है। हमारे पास पूर्ण स्वतंत्रता होती है अपना कर्म करने की; पूर्ण स्वतंत्रता यह

तय करने की कि हम क्या करें। विडम्बना यही है कि हमारे प्रबुद्ध जनों को यह स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती, चूंकि उनका क्रिया-कलाप पराशक्ति की इच्छा द्वारा संचालित होता है यानी वह ब्रह्मांडीय परम शक्ति जो समस्त ब्रह्मांड को संचालित करती है, वही तय करती है कि यह प्रबुद्ध जन क्या करें। यह समझ लें कि मैं एक कदम भी अपनी मर्जी से नहीं उठा सकता हूं। मेरा अंग-प्रत्यंग उसी पराशक्ति के नियंत्रण में रहता है और उसी की मर्जी से काम करता है।

रामकृष्ण बड़ी सुंदरता से इस आवागमन प्रक्रिया को बताते हुए कहते हैं कि आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में ऐसे जाती है जैसे हम एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते हैं। जब परमहंस ने अपना भौतिक शरीर छोड़ा तो उनकी पत्नी शारदा देवी अपने सब गहने उतारने लगीं (पारंपरिक हिन्दू परिवारों में विधवा कोई गहने नहीं पहनती-विशेषकर मंगलसुत्र और कडे)। एम पर

जब वह मंगलसूत्र उतारने लगीं तो रामकृष्ण वहां पुन: प्रकट हो गए और शारदा जी से गहने उतारने को मना किया। उन्होंने कहा-''मैं गया कहां हूं? सिर्फ एक कमरे से दूसरे कमरे में। अपने गहने मत उतारों।'' शारदा जी ने उनकी बात मानी और जब तक जीवित रहीं, मंगलसूत्र धारण किए रहीं। आज यह भले ही आसान लगे पर उन दिनों गांव की एक पारंपरिक परिवार की स्त्री को यह करना बहुत कठिन था, पर शारदा जी में साहस था। वह व्यक्ति या जीव जो अपनी कारणात्मक सतह के संस्कार और अनुकूलन त्याग कर एक शरीर से दूसरे शरीर में जाता है, वाकई में इतनी आसानी से यह परिवर्तन लाता है, जैसे हम एक कमरे से दूसरे कमरे में चले जाएं।

हम बड़ी-बड़ी-बड़ी इमारतें बनाते हैं, बैंक में बहुत-साधन जोड़ते हैं। हमारे कई मित्र होते हैं। जब हम जीवन का आनंद लेते हैं तो अचानक हमारे सामने मृत्यु आ खड़ी होती है। हम मृत्यु से इसलिए डरते हैं कि वह हमारा सब कुछ ले जाती है, लेकिन यदि हम पूरी तरह निरासक्त हैं; जब हमारा कारणात्मक शरीर संस्कारों से भरा नहीं है और सामाजिक अनुकूलन ने हमें जकड़ा नहीं है तो हमें ऐसा ही लगेगा मानो हम एक कमरा छोड़कर दूसरे कमरे में आ गए। म कृष्ण ने पहले भी कहा है-''यह तो ऐसा ही है जैसे हम पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण कर लें।''

कर इस जन्म के संस्कार हमारे प्रारब्ध कर्मों का प्रतिफल होते हैं, जो हमारी मानसिकता बनाते हैं; पिछले जन्म की वासनाएं हमारे इस जन्म तक आती हैं। यह सदा सुख-दु:ख से भरे-पूरे रहते हैं; मिश्रित प्रभाव देते हैं।

हमारा शरीर था वह आज नहीं है, न यह वही रहेगा सालभर बाद। यह कोई कपोल कल्पना नहीं, एक वैज्ञानिक तथ्य है।

तो हम एक ही तरह से क्यों बर्ताव सालों तक करते रहते हैं तो क्यों हमें बीमारी आदि वर्षों परेशान करती हैं जबकि कोशादि तो वही नहीं रहते हैं?

हर कोश मरणोपरांत एक स्मति छोड जाता है, जो नए कोश को संचालित करती है। यही संस्कारों के साथ भी होता है। संस्कार यह सुनिश्चित करते कि हमारे शरीर का एक-सा पैटर्न (कार्यशैली) चलता रहे, चाहे शरीर-मन तंत्र में परिवर्तन आते रहें, क्योंकि संस्कार बाकी शरीर-मन तंत्र से ज्यादा प्रभावशील और शक्तिशाली होते हैं। वही निर्णय लेते हैं और शरीर-मन संचालित करते हैं। वस्तुत: रोजमर्रा में जो हम गहन निद्रा लेते हैं, वह हमारी मृत्यु-प्रक्रिया का एक हल्का-सा पूर्वाभास होता है। हम रोज़ मरते और जीते हैं। हमारा सूक्ष्म शरीर स्थल शरीर को रोज त्यागता है और पुन: ऊर्जावित होकर वापिस आता है, यदि हम इसे अनुमति दें तो! यह हमारे हाथों में है कि हम इस पुनर्जीवन प्रक्रिया का महत्तम विस्तार कर दें। यह प्रक्रिया तो रोज ही होती है।

ध्यान लगाकर-मेडीटेशन के द्वारा-हम अपने संस्कारों को दूर कर अपना नया जन्म पा सकते हैं। इस प्रकार हम अपने नाक-नक्श, चरित्र या व्यवहार मे भी परिवर्तन ला सकते हैं। संस्कारों को री-प्रोग्राम (पुनर्व्यवस्थित) करको।

इसलिए ध्यान या मेडीटेशन प्रारंभ करने वालों के चेहरे से तेज़ टपकता लगता है जहां मेकअप (प्रसाधन) द्वारा चेहरे का सौंदर्य बढाया जा सकता है वही तेज मेडीटेशन द्वारा लाया जा सकता है। इस तेज़ में साधक सहज महसूस करने लगता है। उसे वातावरण बडा सुकुन देने वाला लगता है। सौंदर्य तो उत्तेजना भरता है, वह दुष्टा में राजस (व्याकुलता) की अनुभूति पैदा करता है जबकि तेज़ शांति देता है, सत्त्व गुण बढ़ाता है। तेज़ से दूसरे (देखने वाले) को ऊर्जा प्राप्त होती है।

लोग पुराने गुरुओं-रामकृष्ण परमहंस इत्यादि को याद कर कहते हैं कि वे तो मौन द्वारा भी विवेक-बुद्धि प्रदान करते थे। यह प्रबुद्ध गुरुओं का तेज़ ही है

जो अन्य व्यक्ति की ऊर्जा को भेदकर उसके संस्कार बदल सकता है। अपने प्रबुद्ध गुरुओं की उपस्थिति में हमें सिर्फ अपने आपको मानसिक रूप से खुला हुआ मुक्त और मौन रखना होता है और गुरु का तेज़ हमारे अंदर पहुंच जाता है। हमें तब कुछ भी करना थोड़े ही होता है, फिर तो जो कुछ करत है वह गुरु का तेज़ हो करता है। वह कि है किस्त्री है किस्त्री हूं हा 'FP' DIFF

मारत के प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ 'रामायण' का एक संस्करण कहता है कि जब इस काव्य की नायिका सीता, जनक के दरबार में पहुंची तो सारे राजा लोग

ऋषि और मूनि स्वागत में स्वतः खड़े हो गए। उनको ऐसा करना जरूरी नहीं था, पर उसके चेहरे से जो तेज़ प्रकाशित हो रहा था, उसने उन्हें बाध्य किया, ऐसा स्वागत करने के लिए। सौंदर्य तो दूसरे के मन में एक चाह भरी उत्तेजना ही उत्पन्न कर सकती है। यह तो तेज़ ही है जो दृष्टा के मन में सम्मान पैदा करता है। सीता के चेहरे से नि:सृत होने वाले तेज ने सबको बाध्य कर दिया सम्मान में खडे होने के लिए।

जेन बौद्ध मत का कहना है कि यदि हम किसी लॉन (घास के मैदान) पर अपने कदमों द्वारा बिना घास को आहत किए कोई पथ बना सकते हैं तो द्रम संन्यास लेने के अधिकारी हो जाते हैं। मुझे इस दावे पर शक था। मैं सोचता था कि ऐसा करना असंभव है। आखिर शरीर के पूरे भार से घास कैसे बच मकती है? इतना भारी बोझ तो उस नाजुक घास पर आहत करने का कोई-न-कोई निशान छोड़ेगा ही। ही। 110 के ब्रृहुला दि। 11 1

िसा कि मैं पहले भी जिक्र कर चुका हूं, मैं दक्षिण भारत में एक सफारी पर गया था। मैं वहां एक हाथी पर बैठा, मेरे साथ एक रखवाला भी था। शाम का समय था और अंधेरा होने लगा था। उस रखवाले के पास न कोई टॉर्च थी न प्रकाश का कोई अन्य स्रोत। मैंने उससे पूछा-" हम लोग वापसी का रास्ता कैसे पहचानेंगे?'' उसने कहा-''मैंने अपने रोज के भ्रमण में एक पगडंडी-सी बना दी है, उस पर तो मैं अंधेरे में भी चल सकता हांशी लाइ में शिव का

में मैंने फिर हाथी के बारे में पूछा, क्योंकि हाथी भी उसके साथ रोज ही चलता था। उसका जवाब था-''हाथी के पांव कोई रास्ता नहीं बनाते। हाथी और अन्य जानवर अपने चलने से घास को नष्ट नहीं करते।'' मैं मन-ही-मन उस भार का हिसाब लगाने लगा कि हाथी जब एक पैर उस घास पर डालता होगा। यह भार मनुष्य के पैर के भार से चार गणा से भी ज्यादा होगा पर हाथी के पैर से घास पर कोई निशान नहीं पड़ता, घास की एक भी पत्ती घायल नहीं होती। इतना ज्यादा भार होने के बावजूद पर्यावरण को दृष्टि से कोई हानि नहीं होती। । में शायद इसी कारण जेन बौद्ध मत का विचार है कि हम संन्यास के अधिकारी तब ही होते हैं, जब हम लॉन पर बिना घास को आहत किए चल सकें। हमारे मन की ऋणात्मकता, घमंड, हिंसा इत्यादि नकारात्मक संस्कार जो हमारी कारणात्मक सतह पर रहते हैं, पृथ्वी पर भार बढ़ाते हैं। यदि नाभि-क्षेत्र िके निकट भारीपन रहता है तो इसका स्पष्ट मतलब है कि हमारे संस्कार ऋणात्मक हैं। इस भारीपन का हमारे वजन से कोई संबंध नहीं। यह तो अंतर्मन पर पड़ी स्मृतियों की छापों को कारण होता है, जो व्यक्ति हल्का महसूस करता है वह एक प्रकाश अपने अस्तित्व से नि:सूत करता है और घास पर कोई निशान श्रीमद्भगवत गीता

नहीं डालता: न घास को किसी पत्ती को आहत करता है अपनी चाल से। जेन मत कहता है कि जो आध्यात्मिक रूप से समुन्नत आत्माएं होती हैं वे अपने पैरों से कोई पथ नहीं बनातीं. क्योंकि वे वस्तुत: तैरती-सी चलती है और कभी प्रकृति के विरुद्ध नहीं जातीं। यह तो मनुष्य ही ऐसा पशु है जो प्रकृति के विरुद्ध जाता है।

एक लघु कथा

एक आदमी अपनी पालत बिल्ली और अपनी पत्नी से छटकारा पाना चाहता था। भारत में तलाक देने का कोई रिवाज नहीं है. इसलिए उसने सोचा कि चलो कैसे भी बिल्ली से ही छटकारा पाया जाए। वह बिल्ली को कार में बैठाकर दस मील दर छोड आया. पर जैसे ही वह घर वापिस पहुंचा, बिल्ली भी लौटकर आ गई। उसे बड़ा ताज्जब हुआ। ।।

। दसरे दिन वह बिल्ली को कार में बिठाकर चालीस मिनट तक डाइव करता रहा और एक घने जंगल में पहुंचा, जो उसने पहले कभी नहीं देखा था। वहां उसने बिल्ली को छोडा और तरंत वापिस आ गया।

परंतु जब वह वापिस घर पहुंचा तो देखा बिल्ली उसके घर के दरवाजे पर ही उपस्थित है। तीसरे दिन उसने बिल्ली की आंखों पर पटटी बांधकर उसे एक बोरे में डाल दिया और एक घुमावदार रास्ते से दूर ले जाकर उसे वहां फेंक दिया। इस बार उसने कार लगभग एक घंटे तक चलाई थी। उसी जगह से उसने पत्नी को फोन कर पूछा-"बिल्ली घर पर तो नहीं है?'' पत्नी ने बताया-''बिल्ली कुछ देर पूर्व वापिस आ गई है।'' तब उस आदमी ने कहा-" अरे! अब तम मुझे वापसी का रास्ता बताओ। उसको भटकाने को चक्कर में मैं खुद ही भटक गया हूं।''

जनवर सदा प्रकृति के संसर्ग में रहते हैं। यह तो सिर्फ मानव ही है जो प्रकृति के विरुद्ध जाते हैं और अपना रास्ता भूल जाते हैं। । हमार-

यहां कृष्ण कहते हैं कि हम अपने संस्कारों अनुसार हम अपना इंद्रिय बोध विकसित करते हैं। यह सिर्फ तभी नहीं होता जब हम जन्मते या मत्य को प्राप्त होते हैं: हम अपने संस्कारों के अनुसार अपना इंद्रिय बोध रोज व्यवस्थित करते रहते हैं। यदि हम सही मानसिकता के साथ सोकर उठेंगे तो हमारी इंद्रियां भी सही काम करेंगी और पूरे दिन हम प्रफुल्लित रहेंगे पर जब हम ऋणात्मकता के साथ उठेंगे तो हम कष्ट पाएंगे। हर मान

वस्तुत: हमारे उठने के बाद के कुछ मिनट ही बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। जो हम इस समय महसूस करेंगे, वह हमारी पूरी दिन की गतिवधियों में

श्रीमद्भगवत गीता

परिलक्षित होगा। यदि हम हर्षपूर्ण हैं तो हमारा पूरा दिन खुशी में बीतेगा। इसके विपरीत यदि चिड़चिड़े हैं तो दिनभर झगडा-फसाद होता रहेगा।

कष्ण आगे कहते हैं कि हम जिस प्रकार का इंद्रिय बोध विकसित करेंगे वही हमें उन विषय-भोगों में आनंद देगा। यदि यह धनात्मक रहेगा तो हम धनात्मक जीवन जीएंगे। यदि यह ऋणात्मक रहेगा तो हमें ऋणात्मक चीजों में ही आनंद प्राप्त होगा। इसी के अनुसार हमें इंद्रिय बोध का अनुभव भी होगा।

हमारी इंद्रियां, बुद्धिमत्ता, शरीर-मन तंत्र हमारे चारों ओर एक प्रकार का ऊर्जा क्षेत्र विकसित करते हैं। यह ऊर्जा क्षेत्र अपने अनुकल ऊर्जा क्षेत्रों को आकर्षित करते हैं। यदि हमारी प्रवत्ति ऋणात्मक है तो हमारी समझ भी वैसी ही रहेगी और उसी मानसिकता के लोग हमारे इर्द-गिर्द इकट़ठे होंगे और इस प्रकार एक विषय-चक्र में बंधते रहेंगे. लेकिन यदि यही ऋणात्मकता धनात्मकता में परिवर्तित हो सके तो हमारी लोगों को आकर्षित करने की प्रवृत्ति में ही बदलाव

आ जाएगा। हम फिर धनात्मक प्रवृत्ति के लोगों को साथ जुड़ते रहेंगे। आध्यात्मिक विकास में यह बहत महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। यदि गुरु हमारे साथ हों तो हम ज्यादा अच्छी तरह विकास प्राप्त कर सकते हैं। इस दौरान यदि हम कुछ लोगों के साथ भी आ जाते हैं, जो इस राह के राही नहीं हैं तो उनसे भी त्राण पाना आसान रहता है।

इसलिए मैं उत्सुक हूं ऐसे आश्रम या समुदाय केंद्र विकसित करना चाहता हूं, जहां एक-सी मानसिकता के लोग साथ रह सकें और सामूहिक रूप से आध्यात्मिक विकास प्राप्त कर सकें। इस प्रक्रिया में जो ऊर्जा विकसित होगी वह बाह्य विश्व में कभी पैदा नहीं हो सकती। हम अपनी आदर्शवादी धुन में भले ही यह कह दें कि हम ध्यान तो कहीं भी लगा सकते हैं, पर सत्य यह है कि यदि अनुकल वातावरण और संगीत हो. तभी आध्यात्मिक विकास भी फलित होता है. या सही साथ रहे या बिल्कुल एकांत हो-आध्यात्मिक विकास हित यही दो विकल्प होते हैं। समान ऊर्जाएं एक-दूसरे को आकर्षित करती हैं और एक-दूसरे की संपृष्टि भी करती हैं।

कष्ण एक जोरदार बात इस अध्याय के मध्य में कहते हैं। कृष्ण कहते हैं-'मूढ़' या मूर्ख कभी समझ नहीं सकते कि कैसे एक जीवात्मा अपना शरीर त्यागकर दसरा ग्रहण कर सकती है और कैसे गणाधीन होकर वह शरीर उसी प्रकार की प्रकृति का बन सकता है। सिर्फ वही इन बातों को समझ सकते जो तत्त्वत: ज्ञान हैं, अर्थात् जिन्हें सही ज्ञान प्राप्त है। | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | |

जीवन-दैव की एक देन! का दिन का किस बार शाम आप 1 11

जिस विचार को साथ हम सुबह सोकर उठते हैं, उसकी दिनभर के आनंद में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारा प्रथम विचार प्राय: क्या होता है? पहले हम जागृत अनुभव करते हैं। हमें अपने शरीर का भान होता है, फिर पैदा होता है भय कि हमें दफ़्तर जाना है या लालच कि फलां-फलां काम पूरा करना है। जैसे ही यह लालच और भय के विचार कौंधते हैं हम अपने बिस्तर से उठ जाते हैं। असल में हम अपने आप से, अपने शरीर से भय और लालच के कारण ही जुड़ते हैं। ।

क कृष्ण कहते हैं कि यदि हम अपने शरीर को भय और लालच से जितना जोड़कर रखेंगे, उतना ही भय और लालच हम दिनभर अपने पास आकर्षित करते रहेंगे।

ा वैसे शरीर में घुसने को कई द्वार होते हैं, पर हमें शरीर के अंदर लालच और भय के विचारों से नहीं घुसना चाहिए। हमें आध्यात्मिक विचार के साथ उठना चाहिए। उस समय अपने इष्ट देव या गुरु का स्मरण करना चाहिए। इसका पूरी चेतना के साथ कुछ दिन अभ्यास करके देखें। फिर यह आपकी आदत में शमार हो जाएगा। शरीर को भय और लालच के साथ जोड़ना बंद कर दें, नहीं तो और ज्यादा भय और लालच ही आपको मिलता रहेगा। हर भारत प्रणा

अपना प्रथम विचार आध्यात्मिक रखें। ईश्वर या गुरु को याद करते हुए उठें और उनको धन्यवाद दें; कृतज्ञता दिखाएं कि उन्होंने आपका जीवन जारी रखा है। हर रोज़ जब आप सोकर उठते हैं तो इस पृथ्वी ग्रह पर आपका जीवन एक दिन और बढ़ जाता है। ईश्वर को धन्यवाद दें इसके लिए; उसकी महिमा को सराहें। मण्ड पर के लिए मान (ब

ा के वैसे बिस्तर से सोकर उठना आपका जन्मसिद्ध अधिकार तो नहीं है। सच कहें तो जन्म भी अपना अधिकार नहीं है यह तो ईश्वर की कृपा है-इसके लिए आपको ईश्वर को प्रति अनुगृहित होना चाहिए। नाम 15 संत

यदि हम बिस्तर से आध्यात्मिक विचार को साथ उठते हैं तो यह चेतना पूरे दिन हमारे साथ जुड़ी रहती है। यदि विषय-भोग या पादार्थिक विचारों के साथ सोकर उठेंगे तो दिनभर एक चिड़चिडापन मन में रहेगा।

जब हम गहन निद्रा में सोते हैं तो हम कारणात्मक सतह के संपर्क में रहते हैं। जब हम सोकर उठते हैं तो हम तीनों प्रथम सतहों से गुजर कर भौतिक शरीर तक पहुंचते हैं। ये तीनों सतहें 'शॉपिंग माल्स' की तरह होती हैं जहां विभिन्न संस्कार प्रदर्शित रहते हैं। अपनी कारणात्मक सतह के अनुरूप हम संबद्ध संस्कार से शरीर को जोड़ते हैं और इंद्रियों को इन्हीं के अनुरूप 'डिज़ाइन' करते हैं।

सिर्फ 21 दिनों तक आप आध्यात्मिक विचार के साथ उठने का प्रयुल करें और अपने चेहरे को निहारें। इसमें निश्चित परिवर्तन आप पाएंगे। आपकी आंखों में एक नई दुष्टि प्रतीत होगी।

मैं यहां कोई नया सिद्धांत प्रतिपादित नहीं कर रहा। यह मेरा अनुभव रहा है। इस विश्व में लाखों लोग ऐसा करते हैं। मैं इस जीवन अनुभव के साथ दावा करता हूं कि यह एक अमोघ तरकीब है।

अपने शरीर को तमस (अवसाद) और राजस (व्याकुलता) गुणों के साथ संचालित न करें। लालच और भय के साथ उठेंगे तो आप अपने शरीर को इन्हीं को प्रकट करने वाला बनाएंगे जो यही ऋणात्मकता आकर्षित करेगा।

जब भी हम कारणात्मक सतह से भौतिक सतह की ओर चलें तो सत्त्व तत्त्व के संस्कारों को ग्रहण करते चलें। आध्यात्मिक विचारों से अपना दिन शुरू करें। इस ईश्वर को धन्यवाद दें जो आपको आध्यात्मिक स्मृति प्रदान करता है। इसीलिए भारत को प्राचीन मनीषीगण सदा सुबह-सुबह ध्यान लगाने पर जोर देते थे। कम-से-कम कुछ क्षणों तक तो जीवन तरोताज़ा एवं आनंदपूर्ण रहेगा।

कृष्ण कहते हैं कि जिनके नेत्रों को ज्ञान का प्रशिक्षण प्राप्त हो चुका है, वही इस प्रक्रिया को सत्य को ग्रहण कर सकते हैं। अब आपके सामने पूरी प्रक्रिया है। वे कहते हैं कि मूढ़ लोग इसे समझ ही नहीं सकते। सिर्फ वे जिनकी आंखों में ज्ञान का प्रकाश है इसको देख सकते हैं तो यह चुनाव अब आपको करना है कि आप मूढ़ रहना चाहते हैं या ज्ञानवान नेत्रों से पूर्ण अध्येता। यह मर्जी पूरी तरह आपकी ही है। बाज

उपलब्धि नहीं जागरुकता

एकछ日 六 四月六日 四月二十八日

  • 15.11 यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को । तत्त्वत: ही जानते हैं, किन्तु जिन्होंने अपने अंत:करण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानी जन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते।
  • 15.12 सूर्य में स्थित जो तेज संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चंद्रमा और अग्नि में है, उसको तू मेरा ही तेज जान।

15.13 और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों (जीवों) को धारण करता हूं और रसस्वरूप-अमृतमय चंद्रमा होकर संपूर्ण औषधियों (वनस्पतियों) को मैं ही पुष्ट करता हूं। 15.14 मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर (जीवागिन) अग्निरूप होकर चार प्रकार (भक्ष्य, भोज्य, लेह और पेय) का अन्न पचाता हूं।

कृष्ण 'योगिन:' शब्द का प्रयोग करते हैं इस श्लोक में। योग आजकल बड़ा प्रचलित शब्द हो गया है 'कूल' लोगों के लिए। अभी हाल में ही मैंने एक विज्ञापन में पढ़ा था एक सुपर-डीलक्स कृंडलिनी योग के बारे में, जो तुरंत 'लिबरेशन' (मुक्ति) प्रदान करता है। मैंने ऐसे योग के बारे में आज तक किसी शास्त्र में कभी नहीं पढ़ा है।

योग तो वह जुड़ने की कड़ी है जीवात्मा और महाचेतन परमात्मा के मध्य। इस कडी में जागरुकता वही है जो परमात्मा के संदर्भ में बताई गई है जिससे मुक्ति मिलती है। प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध योग-वैज्ञानिक पतंजलि ने इस योग के लिए आठ विधियां बताई हैं, जिसमें शामिल हैं मुक्ति और यह भाव कि हम में भी दैवी चेतना है। परंतु मेरे विचार से आज के युग में आध्यात्मिक प्रगति और स्वयं में दैवी चेतना की अनुभूति के लिए सबसे सही मार्ग है ध्यान का, जो उन आठ पद्धतियों में से एक है।

कृष्ण कहते हैं कि जब तक यह चेतना प्राप्त न हो, तब तक कुछ भी प्रयत्न किया जाए, ईश्वर तक नहीं पहुंचा जा सकता।

यहां यह स्पष्ट समझ लें कि बात जागरुकता या चेतना की हो रही है उपलब्धि की नहीं। सत्य तो यह है कि जीवात्मा वैश्वीय चेतना का एक अटूट हिस्सा है, यानी परमात्मा का अभिन्न अंग है। यह सत्य वह नहीं कि जिसकी प्राप्ति को लिए कोई प्रयत्न ज़रूरी हो। वह तो है ही, सदा विद्यमान है। हम अपने व्यक्तिगत अहम् के कारण माया द्वारा अंधे हो जाते हैं और अपने को अलग समझने लगते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हम सर्वदा उसी सामूहिक परम चेतना का अटूट अंग हैं।

आध्यात्मिक साधक इस 'माया' के पर्दे को हटाते हैं और दृष्टि भ्रम दूर करते हैं और यह देखते हैं कि हम इसी दैवी सत्ता से सदैव जुड़े रहते हैं। ध्यान लगाना भी उसी पद्धति की एक तरकीब है, जो इस पर्दे को हटाता है। ध्यान से साधक स्वयं में गहराई से उतरता है। ध्यान लगाने या 'मैडीटेशन' से सत्य की जागरुकता पैदा होती है।

गुरु-जो अंधकार तिरोहित करता है

जागरुकता यानी प्रकाश। प्रकाश ही जीवन को कायम रखता है। बाइबिल कहती है-''प्रकाश हो और प्रकाश हो गया।'' सृष्टि में दैवी चेतना का प्रथम आभास प्रकाश से ही होता है। सूर्य से मिलने वाले प्रकाश और ऊष्मा के बगैर जीवन संभव ही नहीं हो सकता था। सूर्य से प्राप्त ऊष्मा और प्रकाश द्वारा प्राप्त ऊर्जा को ही चारों तरफ यह पूरी दुनिया घूमती रहती है।

सूर्य ही अंधकार को दूर करता है। कृष्ण सिर्फ़ यही स्थापित नहीं करते कि वही इस समस्त संसार को सृष्टा हैं, वरन् सूर्य, चंद्र एवं अग्नि से प्राप्त तेज़ के भी उत्स वही हैं। वही परम गुरु हैं जो हमारे मन से अंधकार हटाकर हमें चेतना या जागरुकता देते हैं।

कृष्ण ही हमारे संस्कारों को नष्ट करते हैं। ये संस्कार हमारे अज्ञान, अचेतनता या अंधकार के कारण बनते हैं। अंधकार कोई सकारात्मक सत्ता है नहीं है। इसे एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित नहीं किया जा सकता, पर यह प्रकाश द्वारा नष्ट किया जा सकता है। प्रकाश का होना ही अंधकार को मिटा देता है। उसी प्रकार जागरुकता का होना संस्कारों को मिटाता है। अंधकार का कोई अपना अस्तित्व नहीं होता। यह तो तब होता है जब प्रकाश नहीं होता। हम अंधकार का सृजन नहीं कर सकते। यह तो प्रकाश की अनुपस्थिति की स्थिति है।

लेकिन यदि कोई देख नहीं सकता तो उसे अंधकार से क्या डर! उसे तो कोई परेशानी नहीं होगी। एक अंधे व्यक्ति को लिए अंधकार उसकी सहज स्थिति है। अंधा कभी यह नहीं कहेगा कि अंधेरे में उसे भूत-प्रेत दिखाई पड़ते हैं क्योंकि वह तो सदा अंधकार में ही रहता है।

जो सही मायने में साहसी होता है वह भी अंधकार से विचलित नहीं होता। जिसे किसी बात का डर न हो, उसे न अहम हानि की परवाह होती है, न अस्मिता खोने की या मृत्यू की। उसे अंधकार कतई भयभीत नहीं करता। वह बिना किसी भय या आकर्षण के प्रकाश और अंधकार को समान रूप से संभाल सकता है। सिवाय इन दो वर्गों के लोगों के, अंधकार बाकी सबको भयभीत करता है और सबके लिए समस्याएं पैदा करता है।

कृष्ण सिर्फ प्रकाश को स्वामी ही नहीं, अंधकार के भी मालिक हैं। कृष्ण पुन: अपनी सर्व व्यापकता स्पष्ट करते हैं-प्रकाश और ऊष्मा के द्वारा वे ही समस्त जीवों को जीवन देते हैं और जीवित रखते हैं। जैसा कि हम कह चुके हैं; वही अंधकार दूर करने वाले हैं और संस्कारों को नष्ट करने वाले हैं।

कृष्ण पुष्टि करते हैं कि वही ब्रह्म हैं तथा अपने रूप प्राकट्य द्वारा नैसर्गिक तत्त्वों-आकाश, हवा, अग्नि एवं पृथ्वी को जीवित रखते हैं। वही समस्त वनस्पतियों के प्राण हैं तथा मानवों के भी जीवनदाता और जीवन संरक्षक है।

यदि पेड-पौधे न हों तो भोजन नहीं प्राप्त हो सकता। भोजन के बिना शरीर और मन तंत्र कैसे काम कर सकता है? मृत्यु के पश्चात् शरीर और मन दूसरों के लिए खुराक बन जाते हैं। भोजन भी दैवी सत्ता की ही अभिव्यक्ति है। भोजन को देने वाली ऊर्जा ही संस्कारों की सृजन और विनाशकर्त्ता होती है।

हममें से ज्यादातर भोजन को एक मूलभूत जरूरत या विषय-भोग की चीज समझते हैं। इसलिए हम उसके आदी हो जाते हैं या उसको नगण्य समझते हैं, लेकिन हमें सोच-समझकर ही खाना चाहिए जो भी हम खाते हैं।

एक जेन शिष्य ने अपने गुरु से पूछा-"जब आप प्रबुद्ध हुए तो आपमें क्या परिवर्तन महसूस हुआ?''

गुरु ने उत्तर दिया-''अब चूंकि मैं प्रबुद्ध हो गया हूं तो मैं जब खाता हूं तो पूरे ध्यान से खाता हूं और सोता हूं तो पूरी तबीयत से सोता हूं।''

यह बात कुछ अजीब-सी जरूर लग सकती है। हम में से कितने जब खाते हैं तो पूरे ध्यान से खाते हैं? कितने लोग सिर्फ भोजन पर ही अपना ध्यान एकाग्र रखते हैं? खाते समय हमारा ध्यान बजाय भोजन के सब चीजों पर रहता है। हम बातचीत करते हैं, पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं और लड़ते-झगड़ते भी हैं-गर्ज ये कि हम खाने के अलावा सब ओर ध्यान रखते हैं।

चूंकि हम भोजन को बेकार कचरे के समान समझते हैं, वह हमारे अंदर जाकर वाकई में कचरा ही हो जाता है। जब हम भोजन को ऊर्जा का रूप समझेंगे, उस ऊर्जा का जो हमें प्राण शक्ति देती है तो हम अपने अंदर भी एक बड़ा बदलाव महसूस करेंगे। भोजन के पूर्व ईश्वर की पार्थना करना और भोजन के लिए धन्यवाद देना, ईसाइयों की एक श्रेष्ठ परंपरा है।

खाना प्रारंभ करने के पूर्व संसार के प्रति कृतज्ञ होना कि उसने इतना कुछ खाने को दिया है और भोजन पर ध्यान लगाना ज़रूरी है। पारंपरिक रूप से हिन्दू लोग भोजन के पूर्व ईश्वर को प्रसाद चढ़ाते हैं और प्रार्थना करते हैं। जब इन शुद्ध रिवाजों का पालन किया जाता है तो बड़े बदलाव अपने अंदर महसूस किए जाते हैं।

वह व्यक्ति जो अपने वर्तमान में स्थित रह सकता है, जानता है कि वह कृष्ण के साथ है। ऊष्मा और प्रकाश ऊर्जा प्रदायक के रूप में सूर्य की भूमिका स्पष्ट ही है। यह भी ज़ाहिर है कि सूर्य के बिना जीवन किसी भी रूप में अस्तित्ववान नहीं रह सकता पर चंद्रमा का समस्त वनस्पतियों एवं मानव का ऊर्जा प्रदायक होना इतना स्पष्ट नहीं लगता और इसलिए लोग इसकी कदर ज्यादा नहीं कर पाते।

चंद्रमा हमारे व्यवहार, मानसिकता और मन का नियंत्रक होता है। सोम जो चंद्रमा का एक पर्यायवाची है, इसकी तरलता को बताता है तथा इसकी बढ़ने और घटने की प्रवृत्ति का भी द्योतक होता है।

फिर, कृष्ण वैश्वानर, प्राण एवं अपान की बात करते हैं।

वृहदारण्यक उपनिषद कहता है-"मनुष्य के अंदर की अग्नि जो उसके द्वारा खाया हुआ भोजन पचाती है, वैश्वानर अग्नि कही जाती है। इसी वैश्वानर अग्नि के प्रज्ज्वलन की ध्वनि हम सुनते हैं जब हम अपने कान बंद कर लेते हैं, लेकिन जब आत्मा शरीर को छोड़ने वाली हो तब यह ध्वनि सुनाई नहीं पडती।''

यह उपनिषद आगे कहता है कि न आहार, न प्राण अकेले काम कर सकता है; क्योंकि एक-दूसरे पर यह आश्रित होते हैं। भोजन सड़ने लगेगा बिना प्राण-वायु के और बिना भोजन के प्राण-वायु सूख जाएगी। जब ये दोनों एक साथ कार्यरत रहते हैं तो जागरुकता आती है और असली चेतना उदय होती है।

यहां कृष्ण का तात्पर्य है कि भोजन भी दैवी होता है क्योंकि इस पर ईश्वर का प्रभाव होता है। हम भोजन आसानी से उपलब्ध समझते हैं। इसकी महत्ता तब ही समझ में आती है जब इसकी कमी हो जाए।

एक शिक्षक नर्सरी स्कूल में बच्चे को सही प्रकार से भोजन करना सिखा। रहा था-कि कैसे बैठना चाहिए, कैसे नैपकिन फोल्ड कर रखना चाहिए, कैसे कांटे-छूरी से भोजन करना चाहिए, इत्यादि। जब बच्चा अपना भोजन ग्रहण करना शुरू ही कर रहा था तो उस टीचर ने कहा-"क्या तुम कुछ भूल तो नहीं रहे हो?''

बच्चे ने कहा-''क्या?''

अध्यापक ने पूछा-" क्या तुम ईश्वर से प्रार्थना नहीं करते भोजन करने के पर्व?

"नहीं" बच्चे ने जवाब दिया-"क्योंकि मेरी मां एक उम्दा रसोईया है।''

हमारा दिमाग ( मन ) ऐसे काम करता है

15.15 और मैं ही सब प्राणियों के शरीर में अंतर्यामी रूप में स्थित हूं तथा मेरे द्वारा ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (विचार और बुद्धि में पड़ने वाले संशय, विपर्यय आदि दोष हटाने की प्रक्रिया) होती है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूं तथा वेदांत का कर्त्ता और वेदों को जानने वाला मैं ही हैं।

15.16 इस संसार में नाशवान और अविनाशी ये दो प्रकार के पुरुष हैं। इसमें संपूर्ण भूत प्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है।

कृष्ण कहते हैं कि वही स्मृति और ज्ञान है। इसका मतलब क्या है? हमारा मन कैसे काम करता है? यह कैसे अपनी धारणाएं स्थापित करता है? हमें यह भी नहीं मालुम होता कि हमारा मन कहां अवस्थित होता है। यदि मैं आपसे पूछूं कि यह कहां होता है तो आप अपने सिर की ओर इशारा करेंगे पर वह आपको मन की स्थिति नहीं होती।

हमारे शरीर के हर कोश में एक अंतर्निहित बुद्धिमत्ता होती है। ये कोश सदा अपना पुनर्सृजन करते रहते हैं। यही कोश हमारे शरीर-मन तंत्र को सम्मिलित रूप में बनाते हैं, इसलिए हमारे मन की कोई एक स्थिति नहीं होती-कम-से-कम सिर में तो कतई नहीं।

बुद्धिमत्ता और अंतर्प्रज्ञा

हमारे सारे निर्णयों पर हमारे पुराने अनुभवों का प्रभाव रहता है जो हमारे अचेतन मस्तिष्क के संस्कारों में निहित रहते हैं। यह अचेतन क्षेत्र बहुत शक्तिशाली होता है। इसका इस्तेमाल तीन विधियों में होता है-सहज वृत्ति के स्तर पर, बुद्धिमत्ता के स्तर पर और अंतर्प्रज्ञा के स्तर पर। जब हमारा अचेतन ऋणात्मक स्मृतियों से बोझिल रहता है और व्याकुलता छायी रहती है तब यह

सहजवृत्ति (इंसटिंक्ट) के स्तर पर काम करता है। तब हम सहजवृत्ति से ही काम करते हैं और हमारी प्रतिक्रिया या निर्णय जानवरों जैसे ही होते हैं, जिन पर बाद में हम अफसोस भी करते हैं और पश्चाताप भी।

दूसरा स्तर होता है बुद्धिमत्ता का। यहां हम चेतनता से काम करते हैं और तार्किक निर्णय लेते हैं, पर हमारे मन में कोई अतिरिक्त उत्साह या ऊर्जा नहीं रहती। इस स्तर पर न हम सृजनशील रहते हैं, न कुछ नया सोच सकते हैं। इस स्तर पर हमारी वृद्धि नहीं होती।

बौद्धिक स्तर पर काम करने से हम थकते तो नहीं हैं, पर हम ऊर्जावान भी नहीं रहते। इसमें तो सब काम बराबर होता है, यानी 'ब्रेक-ईवन' स्थिति रहती है। इस स्तर पर हम अपनी छिपी संभावनाओं या क्षमताओं का अधिकतम इस्तेमाल भी नहीं कर पाते।

वह स्तर जहां हम अपनी पूरी क्षमता दिखा सकते हैं, अंतर्प्रज्ञा स्तर ही होता है। यदि हम अपने मस्तिष्क के अचेतन मन में गहन मौन और संपूर्ण जागरुकता को भरकर जमी हुई स्मृतियों या फाइलों को शांत और पूरी तरह जागरुक कर दें तो हम अंतर्प्रज्ञा स्तर पर काम कर सकते हैं।

इसलिए हमारी सबसे महान संपत्ति हमारे अंदर ही निवास करती है, बाहर नहीं। सबसे बड़ा हर्ष का स्त्रोत भी हमारे अंदर ही होता है, बाहर नहीं। बाहरी विश्व में हर्षयुक्त हर अनुभव के बाद शोक का अनुभव होता ही है, क्योंकि हर्ष उम्मीद जगाता है और जब वह उम्मीद पूरी नहीं हो पाती तो वह शोक प्रदान करती है, लेकिन जब अंदर की खोज प्रारंभ होती है तो उम्मीदें हट जाती हैं, आसक्ति दूर हो जाती है और एक नया हर्ष पैदा होता हैं यह हर्ष शाश्वत होता है जो कभी खत्म नहीं होता। यही आनंद है या नित्यानंद है।

चूंकि हमें इसकी जानकारी नहीं होती, हम खुशी को बाहर ही तलाश करते रहते हैं क्योंकि हमें और कोई तरीका मालूम नहीं होता।

एक लघु कथा

एक लड़का अपने कॉलेज के अतिथियों को लेक्चरों को दौरान सदैव सोया करता था। एक दिन उसके मित्र ने उससे कहा–" तू इन लेक्चरों को सुनने आता ही क्यों है, जबकि तू यहां सोता ही रहता है?''

उसने जवाब दिया-''यार! मुझे नींद न आने की बीमारी है और यहीं आकर मुझे नींद आती है।''

जैसे यह लड़का अतिथियों के लेक्चरों को सुनकर सोने के लिए आता था, हम लोग भी इसी प्रकार खुशी की तलाश में बाहर भटकते रहते हैं। हम सही

श्रीमद्भगवत गीता

चीज को गलत जगहों पर तलाश करते हैं, क्योंकि हमारा अनुकूलन इसी तरह किया गया है। हमें चाहिए कि हम अंतर्मुखी हो जाएं।

'गीता' पर अपने भाष्य में शंकराचार्य कहते हैं कि कृष्ण से स्मृति और ज्ञान उन लोगों को प्राप्त होता है जो अच्छे काम करते हैं। जो बूरे काम करते हैं उनकी स्मृति और ज्ञान का हास होता है। यहां स्मृति और ज्ञान का अर्थ है अपनी मूल प्रकृति को समझना और महसूस करना कि हम इसी दैवी सत्ता के करण से सदैव जुड़े रहते हैं, जो हमारे हृदय में निवास करते हैं।

कृष्ण यहां अर्जुन को और गहरी समझ में उतारते हैं। यहां वे 'पुरुष' की बात करते हैं, यानी उस ऊर्जा सिद्धांत की जो हमारे अस्तित्व का आधार है। 'सांख्य-दर्शन' पुरुष और प्रकृति की बात करता है। एक तरह से पुरुष यहां ऊर्जा और प्रकृति पदार्थ का द्योतक है। पुरुष अचल अकर्मक ऊर्जा का प्रतीक है जबकि प्रकृति सकर्मक पदार्थ के सिद्धांत की। पुरुष एक नर है और प्रकृति मादा। दूसरे शब्दों में कहें तो पुरुष शिव है और प्रकृति शक्ति!

कृष्ण तो इस दर्शन के भी परे जाते हैं। वे कहते हैं कि पुरुष के भी दो रूप हैं-एक अविनाशी और दूसरा नाशवान। वे कहते हैं कि सारे जीव नाशवान पुरुष के वर्ग में आते हैं जो अविनाशी ऊर्जा में स्थित रहते हैं।

पहले अध्यायों में भी कृष्ण ने काफी विशदता में प्रकृति के कई पहलुओं की चर्चा की है जो मन, इंद्रिय और तीन गुणों के माध्यम से अपना काम करते हैं। यहां वह 'पुरुष' तत्त्व पर विस्तार से चर्चा करते हैं। 'पुरुष' वह मूल ऊर्जा है जो सबका उत्स है। 'ईशावास्यम् इदम् सर्वम्' कथन है ईशावास्य उपनिषद का-'' जो अस्तित्वहीन है वह ऊर्जा है।''

महान वैज्ञानिक आइंसटीन उस समय अवसादग्रस्त हो गए जब उसके सापेक्षवाद के सिद्धांत द्वारा व्यक्त संभावना कि 'पदार्थ से ऊर्जा नि:सृत होती है' का प्रयोग न्युक्लीयर बम बनाने के लिए किया गया। उसको बड़ा सदमा लगा कि उसकी खोज इतने बड़े विनाश का कारण बन सकती है। इसके बाद वे भी आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गए थे।

जब आइंसटीन ने यह उपनिषद का सूक्त पढ़ा जो शायद पांच से दस हजार वर्ष पूर्व लिखा गया था तो वे बोले-" मूझे इसका गर्व है कि मैंने खोजा कि पदार्थ ऊर्जा का ही रूप है। कई हजारों वर्ष से इन ऋषियों को यह मालुम था कि पदार्थ से ऊर्जा निकलती है। असल में विज्ञान का आखिरो कदम आध्यात्मिकता का प्रथम कदम है।

यह आदि ऊर्जा का सिद्धांत 'पुरुष' द्वारा व्यक्त है जो एक विभवीय ऊर्जा (संभावित ऊर्जा) का स्रोत है। यानी यह ऊर्जा तो है पर अकर्मक है। समस्त श्रीमदुभगवत गीता ब्रह्मांड को पीछे काम करने वाला यही सिद्धांत है। इस ऊर्जा के अभाव में कुछ भी अस्तित्व में नहीं आ सकता, कुछ भी जीवित नहीं रह सकता।

हम कृष्ण कहते हैं कि 'पुरुष' दो प्रकार को होते हैं-एक शाश्वत और दूसरा नाशवान! वह पुरुष जो नाशवान है, वह शरीर मन-तंत्र है जो हर एक जीवात्मा मय मानवों के पास होता है। इस ऊर्जा का एक निश्चित और सीमित जीवनकाल होता है। यह हर समय परिवर्तनशील रहती है। इसमें कुछ भी स्थायी या सनातन नहीं होता। इसका प्रोग्राम ही इस प्रकार बना होता है कि इसे ज़रा ग्रस्त होकर विनष्ट होना ही है।

वह पुरुष जो 'कुटस्थ' है ऊर्जा का अविनाशी रूप है। यह आत्मा का वह रूप है जो कभी विनष्ट नहीं हो सकता। यही आत्मा है जो शाश्वत है और अविनाशी है।

कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यह आदि ऊर्जा विभिन्न रूप में प्रकट होती है-नाशवान और अविनाशी। आदि ऊर्जा के ही यह दोनों रूप हैं। एक नष्ट होती है, दूसरी सदा रहती है। जो इस फर्क को समझ लेता है, वही पुरुष की मूल प्रकृति समझता है और मुक्त होता है।

रामकृष्ण परमहंस कहते हैं-एक घमंडी विद्वान को अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था। वह एक महान अद्वैतिक ज्ञानी था और ईश्वर के कई रूपों को नहीं मानता था। एक बार ईश्वर उसके पास आए। देवी मां उसके सामने प्रकट हुईं अपनी पूरी दिव्य छटा में। वह 'पराशक्ति' के रूप में उसके सामने आईं थीं। वह घमंडी ज्ञानी तो उनके प्रभाव में काफ़ी देर तक डूबा रहा। फिर वह होश में आया तो चिल्लाने लगाँ–''क…क…क….क…! वह पूरा शब्द 'काली' भी नहीं कह पा रहा था, जिसे उसने देखा था, शब्द कभी उस दिव्यता का बख़ान नहीं कर सकते।

1 - सामुहिक चेतना - 1 - अप्रैण

  • 15.17 इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है जो तीनों लोकों में प्रवेश कर सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।
    • 15.18 क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग क्षेत्र में तो सर्वथा अतीत हूं और माया में स्थित अविनाशी जीवात्मा से उत्तम हूं इसलिए लोक में और वेदों में भी पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूं।
  • 15.19 भारत! इस प्रकार तत्त्व से जो ज्ञानी पुरुष मुझको पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरंतर मुझ (वासुदेव) परमेश्वर को ही भजता है।
  • 15.20 हे निष्पाप भारत! इस प्रकार यह अति रहस्य युक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। इसको तत्त्वत: (पूरी तरह से) जानकर मनुष्य मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है।

कृष्ण कहते हैं कि वे पूरुष के इन दोनों प्रकारों से परे हैं, अर्थात नाशवान शरीर-मन तंत्र की ऊर्जा एवं अविनाशी ऊर्जा से तथा वे उसके रूप है जो एक अन्य ऊर्जा का वह स्वर है जिसे परमेशवर या परमात्मा कहा जाता है। पुरुष ही वह ऊर्जा है जो हम सबमें व्याप्त है। पुरुषोत्तम वह ऊर्जा जो समस्या ब्रह्मांड में व्याप्त है। इस प्रकार पुरुषोत्तम एक प्रकार से पराशक्ति-बह्मांडीय ऊर्जा का ही रूप है। यह तो चरम कॉस्मिक चेतना को स्पष्ट करने के लिए पुरुष को नर और शक्ति को मादा बनाया गया है, वस्तुत दोनों का एक ही मूल है।

जीवन को संचालित करने वाली ऊर्जा

यह वह ऊर्जा है जो जीवन को पीछे कार्यरत रहती है। गौतम बुद्ध का कहना है-" संसार (या ब्रह्मांड) स्वयं को सृजित करता है। ऐसा कोई समय

कभी नहीं था जब यह ब्रह्मांड न रहा हो और ऐसा कोई समय कभी नहीं होगा जब यह ब्रह्मांड न रहे।"

यह जगत अविनाशी है, चुंकि उसके पीछे जो ऊर्जा है वह अविनाशी है। कृष्ण कहते हैं कि वे ही वह ऊर्जा हैं, वह पुरुषोत्तम जो इस ब्रह्मांड को सदा संचालित करते हैं।

उपनिषद का एक सुंदर सूक्त है जो हर कर्मकांड को पूर्व आह्वान के लिए उच्चारित किया जाता है -

ं ॐ पर्णमद: पर्णमिदाम पर्णात् पर्णमुद्वच्यते।

पूर्णास्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा अवशिष्यवे:।

" सब पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण बनता है। जब पूर्ण को पूर्ण में से निकाला जाता है तब भी पूर्ण ही बचता है।''

इसमें भी वही बात कही गई है जो कृष्ण कह रहे हैं। अनंत से ही यह ब्रह्मांड तथा कई अन्य ब्रह्मांड प्रकट हुए हैं।

अभी तक कोई प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है जो यह बताए कि यह ब्रह्मांड कैसे बना था। बाइबिल में दी गई जगत-निर्माण को कथा या ब्रह्मा और प्रलय की सनातन धर्म की कथाएं तो पौराणिक गल्प कथाएं हैं, जो मात्र यह इंगित करती हैं कि एक महा ऊर्जा से इस ब्रह्मांड का निर्माण हुआ था, पर सत्य यह है कि यह ब्रह्मांड सदैव अस्तित्व में रहा है। (वैज्ञानिक) बिग-बैंग सिद्धांत यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि अभी भी वे 'बिग-बैंग' कैसे चालू हैं, यदि वे ब्रह्मांड का कारण थे। क्योंकि हर बिग-बैंग (जोर का धमाका) नए सितारे एवं मंदाकिनियां सुजित करते हैं, पर कहीं ब्लैक होल्स भी होते हैं जिनमें बड़े सितारे व मंदाकिनियां विलीन भी हो जाती हैं। यानी हर एक जन्म के साथ एक मृत्यु भी जुड़ी है तो मूल जन्म कैसे हुआ था? असल में ऐसा कभी हुआ ही नहीं था। ब्रह्मांड सदैव विद्यमान रहा है।

कृष्ण कहते हैं-"नाशवान एवं अविनाशी तत्त्वों से परे मैं हूं, पुरुषोत्तम!" इस समय वे यादव राजा कृष्ण का हवाला नहीं दे रहे, यानी उस कृष्ण का जो वसुदेव और देवकी के पुत्र हैं। वे बात कर रहे हैं परब्रह्म कृष्ण की-ईश्वर की। वही सगुण ब्रह्म और निर्गूण ब्रह्म दोनों प्रकार की ऊर्जाओं का केंद्र हैं। वे वही ब्रह्म हैं-परमात्मा हैं, जिसमें जीवात्मा समाहित होती है और नाशवान ऊर्जा विलीन होती है।

वे वही ब्रह्म हैं जिसमें 6 अरब मानव, असंख्य जीव जो इस पृथ्वी ग्रह पर मौजूद हैं तथा लाखों-लाख जीव-जन्तु अंतत: स्वयं को विलीन करते हैं। वे ही पुरुष हैं, ऊर्जा हैं, प्रकृति हैं और पदार्थ हैं। बिना उनके कुछ भी नहीं हो सकता।

हम पुरुषोत्तम को अपने पालन-पोषण एवं प्रशिक्षण के कारण विभिन्न रूपों में देखते हैं। कभी हम उनको ही सदानन कर्तिकेय को रूप में देखते हैं या दादशानन 'पुरुगा' को रूप में; चतुर्भुजा बालाजो के रूप में या मोर मकटधारी दो पांव वाले बंसी वादक कृष्ण को रूप में। यानी हम उनको उसी रूप में देखते हैं जिसमें हमको सहूलियत रहती है, जिससे कि हम उनके साथ जुड सकें या उन तक पहुंच सकें।

एक लघु कथा

एक बड़ा ज्ञानी भक्त था। उसने वर्षों शिव की मूर्ति के सामने आराधना की, परंतु शिव उसके सामने प्रकट नहीं हुए। अंतत: उसने सोचा कि चलो विष्णू की आराधना की जाए। विष्णू ज्यादा सदय माने जाते हैं। उसने शिव की मूर्ति हटाकर वहां एक खूबसरत विष्णू का विग्रह रख दिया. परंतु हृदय से वह शिव भक्त ही था अत: उसने शिव की मूर्ति एक कोने में जरूर रख दी, पर फेंकी नहीं। दूसरे दिन उसने विष्णू की आराधना धुप-दीप-फल से प्रारंभ की, पर उसे यह देखकर गस्सा आया कि धुप का धआं बार-बार कोने में रखी शिव मूर्ति की ओर ही जा रहा था। जब वह धूएं की दिशा कैसे भी रोक नहीं पाया तो वह आगे बैठा और शिव मूर्ति की नाक दबाकर बोला-" भोलानाथ! यह धूप वंदन आपके लिए नहीं है। अब मैं आपकी आराधना कतई नहीं कर रहा हैं।''

तभी उसे लगा कि उसके पास कोई है-देखा तो सामने मूस्कूराते शिव खड़े थे। वह तरंत उनके पैरों पर लोट गया और कातर स्वर में बोला-" भोलेनाथ! जब मैंने वर्षों आपकी पुजा की तब तो आप प्रकट नहीं हुए और अब जब मैंने आपकी आराधना भी नहीं को तथा आपको नाक दबाकर आपकी बेइज्जती कर दी, तब आप तरंत प्रकट हो गए। यह क्या माया है प्रभु?''

शिव जी ने मुस्कुराते हुए कहा-"वत्स! पहले तुम मेरी पूजा करते थे लेकिन मैं तम्हारे लिए एक विचार मात्र था-एक धारणा था, परंतु इस समय जब तुमने मेरी नाक दबाई तो तुमने मुझे एक जीता-जागता अस्तित्व, एक वास्तविकता समझा तो मैं तम्हारे सामने प्रकट हो गया।"

हम में से ज्यादातर के लिए ईश्वर एक विचार, एक अवधारणा से ज्यादा कुछ नहीं हैं। हम तरह-तरह की कथाएं गढ़ते हैं अपनी सुविधा को लिए और अपने भय और चिंताओं को ढांकने के लिए तथा विभिन्न जटिल दार्शनिक सिद्धांत बनाकर मात्र अपना ज्ञान प्रदर्शित करते रहते हैं-उसे एक जीता-जागता अस्तित्व नहीं समझते।

श्रीमद्भगवत गीता

क्या फर्क पडेगा यदि हम कृष्ण को. परब्रह्म. पराशक्ति इत्यादि के नाम से संबोधित करें. उसे पुरुषोत्तम मानें? अरे! उसे हम चाहे किसी भी नाम से पकारें वह तो हमारे लिए अविनाशी सत्ता ही रहेगा, जिससे हम जीवन प्राप्त करते हैं, और जीते-जागते हैं।

यह कृष्ण की अनिर्बन्धित सत्ता है जो कहती है कि वही पुरुषोत्तम है जो 'गीता' को एक आध्यात्मिक प्रमाणिकता प्रदान करती है। गीता की महत्ता इसलिए ही नहीं कि इसमें महत्ती ज्ञान दिया है या यह शाश्वत सत्य दिन्दर्शित कराती है वरन इसलिए है कि इसमें एक साहसी व्यक्ति की उक्ति है कि वही त्रिगुणातीत परमेश्वर है जो इस कृति (गीता) को एक शाश्वत सत्य उद्घाटित करने का आधार बनाता है। वह पुरुषोत्तम, वह परब्रह्म कृष्ण हम पर भी कुपा करें।

अब कृष्ण महान सत्य उद्घाटित करते हैं, उनको सामूहिक चेतना के शाश्वत प्रतीक होने को। यह आपको आश्चर्यचकित भी कर सकता है या आपको इसकी जानकारी या जागरुकता पहले से ही हो सकती है। चाहे यह धारणा नई हो या पुरानी, आप इस सत्य को निष्पक्षतापूर्वक विश्लेषित करें; इसे जितना कर सकते हैं उतना आत्मसात करें और इस पर प्रश्न तब तक उठाते रहे जब तक आपका तर्क थककर बेदम होकर बैठ न जाए।

प्रथम् सत्य

हमारे सबके मन (या मस्तिष्क) इस ब्रह्यांड के अलग-अलग टुकड़े नहीं हैं। वे सभी एक हैं और एक से ही हैं।

वस्तुत: हम सभी के मन आपस में जुडे रहते हैं। सिर्फ जुडे ही नहीं रहते वे एक-दूसरे पर अपना प्रभाव भी डालते हैं, सीधा-सीधा असर डालते हैं। इसे ही में सामूहिक चेतना का नाम देता हूं। हमारे विचार ऐसे फैलते हैं जैसे सर्दी का संक्रमण हो। लोग एक-दूसरे के सर्दी प्रकोप से बच सकते हैं, पर हमारे विचारों से नहीं। हर एक पर इनका असर होता ही है। चाहे सर्दी के प्रकोप से बचाव हो जाए पर सामूहिक चेतना के विचार से बचना असंभव है।

यदि किसी का सर्दी का प्रकोप हमें भी बीमार करता है तो हम शारीरिक रूप से कछ दिन उसका कष्ट झेलेंगे, फिर ठीक हो जाएंगे, पर जब हम दूसरों के विचारों से आक्रांत होते हैं तो न सिर्फ हम मानसिक रूप से भी क्षुळ्य होते हैं, बल्कि यह असर बहुत दिनों तक कायम रहता है। हमारा सोचा हुआ हर विचार हमारे आसपास के लोगों को प्रभावित करता है। हमारे पास के लोग ही नहीं, धीरे-धीरे बढ़ता हुआ

असर पुथ्वी पर विद्यमान हर व्यक्ति पर अपना प्रभाव छोड़ने लगता है।

यह समझ लें कि हमारी बौद्धिक चेतना तो इसका प्रतिरोध करेगी ही. पर इस पर हम बाद में विश्लेषण करेंगे। पर यह सत्य कैसे हो सकता है? हम इस पर विचार प्रश्नोत्तर सत्र में करेंगे-एक-एक करके-इंच-दर-इंच।

मैंने प्रथम संत्र की घोषणा कर दी है। हम सब कोई अलग-अलग जीव नहीं हैं. अलग-अलग मय (दिमाग) वाले नहीं हैं। हम सब आपस में घने तौर पर जुड़े हुए हैं। यह एक घनिष्ठ नेटवर्क है। मेरा कोई विचार भी आप में बदलाव ला सकता है, आपका कोई विचार मुझे भी गहराई से स्पर्श कर सकता है। हम लोग अलग-अलग व्यक्ति नहीं हैं।

हम लोग कोई कटे-फटे नहीं हैं, जिन पर एक-दूसरे का कोई प्रभाव न हो। एक सत्य जिसे हम सामूहिक चेतना कहते हैं, हम सबको जोड़ता है।

दसरा सत्य

न सिर्फ मानसिक स्तर पर, परंतु गहरी चेतना स्तर पर हम जुडे हैं। जितने हम गहन चेतना में जाएंगे उतना ही यह जुडाव स्पष्ट होता जाएगा।

यह समझ लें कि जब तक हम अपनी निज की चेतना की अवधारणा मानते रहेंगे. हम लगातार कष्ट हो पाते रहेंगे-चाहे मानसिक या शारीरिक स्तर पर या अस्तित्व के स्तर पर भी। आखिर हम प्रकृति का लगातार इतना प्रतिरोध क्यों करते हैं? जो भी प्रकृति हमें प्रदान करती है हम उसका प्रतिरोध ही करते हैं।

आप भी समग्र के अंश हैं

हां! हम समग्र के अंश हैं। यदि हम समग्र से अपनी आवृत्ति जोड़ते हैं तो समग्र हमारे मित्र के रूप में उभरता है, लेकिन जब हम इसको अलग समझते हैं, इससे भेदभाव करते हैं या इसका विरोध करते हैं, यह हमारा दुश्मन बन जाता है। यह समझ लें कि यह समग्र यहां हमें मारने के लिए नहीं है; यह हमें नष्ट नहीं करेगा।

यह समग्र, समूचा ब्रह्मांड एक होलोग्राम है जिसके हम हिस्से हैं। जैसे होलोग्राम का हर हिस्सा चाहे भले ही टूटकर अलग हो होलोग्राम की संपूर्णता ही दिखाता रहता है, उसी प्रकार हम भी कितने ही अलग हों, समग्र या ब्रह्मांड की संपर्णता दिखाते हैं।

एक उदाहरण लें-क्या होता है जब कोई व्यक्ति डूबकर मरता है। उसका मृत शरीर ऊपर आकर तैरने लगता है। मृत शरीर पानी से भरा होता है, पर यह पानी पर तैरता है। दूसरी ओर जीवित शरीर पानी से हल्का होता है, लेकिन वह

उतराता नहीं; डूब जाता है। ऐसा क्यों होता है, क्योंकि जब तक हम जीवित हैं हम पानी से जुडते नहीं हैं हमारा अहम् आड़े आता है, हमारा मन हमें रोकता है, पर मरे शरीर में न कोई मन होता है, न अहम्। वस्तुत: यह मन और अहम होता है जो हमारे शरीर को भारी बनाता है।

अभी हाल ही में मैंने नियाग्रा फॉल्स में कूदकर भी बच जाने वाले व्यक्ति का इंटरव्यू पढ़ा था। कल्पना करें कि कोई नियाग्रा फॉल्स में कुदकर भी बच जाए। यदि आप कभी नियाग्रा फॉल्स गए हों तो आप समझ सकते हैं कि वहां पानी का कितना जोर और परिणाम होता है। उस व्यक्ति से हर तरह के पत्रकारों ने उसके इस असाधारण छलांग के बारे में लगातार प्रश्न पूछे। उस आदमी ने बड़ी सहजता से कहा-''जब मैं नियाग्रा फॉल्स में कुदा तो मैं उसी का हिस्सा हो गया। मुझे लगा कि मैं उन फॉल्स का एक अंश हूं।''

जब हम एक सामूहिक चेतना के अंश होते हैं, तो हम स्वयं को सामूहिक चेतना ही समझने लगते हैं और प्रकृति के साथ होते हैं। फिर प्रकृति हमारी मित्र होती है और वही हमें बचाती है। प्रकृति कभी हमें क्षति नहीं पहुंचाती, लेकिन जब हम अपनी प्रतिस्व अस्मिता में स्वयं को प्रकृति से अलग समझते हैं तो प्रकृति प्रतिवाद करती है। यदि हम सामूहिक चेतना से जुड़े रहेंगे तो प्रकृति कभी हमारे खिलाफ नहीं जाएगी। वह सदैव हमारा संरक्षण करेगी।

जब कभी हम कोई सामाजिक या आर्थिक मुहिम में सफलता पाना चाहते हैं तो हमें हमारा लक्ष्य तब ही मिल पाता है, जब हम पूरे एक समूह से जुड़े रहें। यानी कि सामूहिक चेतना से स्वयं को जोड़े रखें। जब तक हमें अपने निजीपन का भाव रहेगा और हम अपने विचारों को मौलिक रूप से दूसरों पर थोपना चाहेंगे तो हम सबके साथ जुड़ नहीं पाएंगे। हमारी अपनी अलग अस्मिता रहेगी। फिर चाहे वह घर हो या दफ्तर, कार्यशाला हो या फैक्ट्री, हम में अलगाव का यह भाव रहेगा।

परंतु यदि हम (व्यष्टि) स्वयं को समूह (समष्टि) में तिरोहित कर दें तो समर्ष्टि हमारा बचाव करती रहेगी। हम तब सामाजिक रूप से या आर्थिक रूप से सबके साथ जुड़ेंगे तो हम सफल भी होंगे और हमारा अनुभव भी समुद्ध होगा। सबके साथ सफल होने में एक संतुष्टि का भाव जागृत होगा। यह संपूर्णत: शब्दों में बयान नहीं हो सकती, लेकिन जैसे ही हमने समष्टि से प्रतिरोध किया कि हमारा कष्ट भोगना शुरू हो जाता है।

एक लघु कथा

दो चींटियां एक बार एक कप की सतह पर चल रही थीं। उस कप में अमत भरा था। अचानक एक चींटी फिसली और लगा कि वह कप में गिर जाएगी, पर उसने स्वयं को संभाल लिया। इस पर दूसरी चींटी बोली-''अरे! तम इस कप में गिरीं क्यों नहीं। यह तो अमृत का कप है। इसमें डूब भी जातीं तो अमर हो जातीं।''

इस पर पहली चींटी बोली-''मैं स्वयं को डुबाना नहीं चाहती।''

हम यह समझ नहीं पाते कि सामूहिक चेतना में स्वयं को विलीन करने से हम संपूर्णता से मुक्ति पाते हैं। हम प्रतिरोध करते रहते हैं और अपनी अस्मिता कायम रखते हैं। जब तक हम सामूहिक चेतना में अपना विलय नहीं करते, हम अपने और दूसरों को लिए नर्क पैदा करते रहते हैं।

टाओवाद-जो चीन का एक प्राचीन दार्शनिक स्कूल है, में भी यही सीख दी जाती हैं टाओ का अर्थ ही है प्रकृति का अनुसरण करना। इस प्राकृतिक बहाव का सबसे ज्वलंत उदाहरण है पानी का बहना। पानी भूमितल के ढलान पर बहता है। यह अपने प्रतिरोधों के चारों ओर एकत्रित हो जाता है। टाओ उस घास की बात करता है जो बहाव के साथ जुड़ जाती है और बहाव गुजरते ही सीधी हो जाती है। यदि हम ऐसा कर सकें तो हम अपने माहौल के प्रतिकूल होने की कल्पना भी नहीं कर सकते।

तीसरा सत्य

अपने चरम स्तर अर्थात् आध्यात्मिक स्तर पर हम समझ सकें कि हम बहुत गहराई से सबसे जुड़े हैं, संपूर्णता से जुड़े हैं अपने पूरे समूह से-पूरे ब्रह्मांड से, तो हम न सिर्फ आनंद प्राप्त करते हैं वरन् हम सही मायनों में जीते हैं क्योंकि तब हमारे सामने कई नए आयाम उद्घाटित हो जाते हैं।

इस समय हम दबाव ग्रस्त महसूस कर रहे हैं और लगातार विक्षुब्ध रहते हैं तथा बहुत सोच-विचार में उलझे रहते हैं। जब हम अपने शरीर-मन तंत्र को सबसे अलग मानते हैं तो हमें बहुत सोच-विचार करना पड़ता है। हमें जीवन का आनंद लेने के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

लेकिन यदि सामूहिक चेतना में हम स्वयं को विलीन कर दें तो हमारे सामने कई नई संभावनाएं व आयाम खुल जाते हैं। कल्पना करें कि हम यदि इस एक शरीर से इतना आनंद उठाते हैं तो हमारे पास दो शरीर हो तो आनंद दोगुना नहीं हो जाएगा? और यदि हमारे पास कई शरीर हों … तो कहना ही क्या है।

जैसे-जैसे शरीर की संख्या बढ़ती है, हमारा आनंद या खुशी भी उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है. यही हमें अनुभव होता है जब हम सामूहिक चेतना के एक अंश बन जाते हैं।

वैसे भी हम कोई व्यक्तिगत निजी चेतना नहीं, जैसा हम समझते हैं। जब स्तर-दर-स्तर हम गहराई में उतरते हैं तो हम पाते हैं कि हम तो सभी एक ही हैं। फलस्वरूप मन की व्याधियां अपने आप गायब हो जाती हैं। तब हमें मानसिक, प्राणिक, ईथरीय, भौतिक तथा सारी सतहों पर भी एक सुखद अनुभृति होने लगती है।

जब यह अनुभूति हो कि हम सीमा-रहित चेतना हैं तो यह एक अनिवर्यनीय आनंद प्रदायक अनुभूति होती हैं इसकी तो कल्पना करना भी मुश्किल है। मैंने देखा है कि हमारे प्रोग्रामों के अंत में कुछ साधक इतने अभिभूत हो जाते हैं कि वे अपना नाम, पता, पद, प्रतिष्ठता, शिक्षा, अहर्ता, धन-संपदा-हर चीज को बारे में भूल जाते हैं। यानी उनकी जो व्यक्तिगत पहचान है वह तिरोहित हो जाती है। वे दुसरों का सम्मान बिना किसी भेदभाव के करने लगते हैं और आपस में एक-दूसरे के पांवों पर गिरकर अभिवादन करते हैं।

मैंने श्वसुरों को भी अपनी पुत्रवधुओं के सामने साष्टांग दंडवत होते देखा है। भारत में तो यह होना असंभव ही है। यह प्रोग्रामों को अंत में देखा गया है क्योंकि श्वसुर भी अपनी पुत्रवधु के अंदर छिपी बैठी चेतना को देखता है; सास अपने दामाद को भगवान जैसा समझकर उसके पैर छूतो हैं। दादा-दादी अपने पोता-पोतियों के पैर छूते हैं। अफसर अपने मातहतों के सामने साष्टांग दंडवत होकर अभिवादन करने लगते हैं।

अनुभव और अनुभूति प्राप्त करना

जब हम सामुहिक चेतना में एकात्मता का भाव महसूस करने लगते हैं तो हमें एक आनंदानभूति होती है और हम सारे भेदभाव, नाम, सामाजिक स्तर, प्रतिष्ठा, धन-वैभव आदि को भूल जाते हैं। जो कुछ भी अपनी पहचान के सूत्र हैं वे तिरोहित हो जाते हैं। हमारे अंदर का सच बाहर आता है और हम समझने लगते हैं कि हम कौन हैं।

मैंने स्वयं देखा है कि लोग अपने जानी दुश्मन को पांव छूने लगते हैं; अपने से बहुत छोटे या आर्थिक रूप से बहुत कमजोर लोगों के पांव पडते और अपनी पहचान ही भूल जाते हैं, क्योंकि आध्यात्मिक रूप से प्रगतिशील रहते हैं। उनको इतनी शिद्दत से चेतना की अनुभूति होती है; आनंद का इतना सघन अनुभव होता है कि उनका अहम् भाव गायब हो जाता है। वे सभी में ईश्वर-दर्शन करते हैं जब वे आनंद-ओ-उन्माद में सामूहिक चेतना में आते हैं।

वे कुछ कल्पना से नहीं देखते। जब वह अनुभव होता है तो पूरा समूह ही सभी को एक-सा और एक ही समझने लगता है। उनकी समझ में आ जाता है कि वे अलग जीव-सत्ता नहीं हैं। कृष्ण कहते हैं कि जो माया के भ्रम में पड़े रहते हैं वे ही परमात्मा और आत्मा में फर्क समझते हैं तथा अविनाशी और विनाशी तत्त्वों में भेद करते हैं। एक बार जैसे ही सामूहिक चेतना की अनुभूति हुई कि कोई फर्क या भेदभाव नहीं रहता। हर एक सामूहिक चेतना में विलीन हो जाता है।

लहर समझती है कि वह समुद्र से अलग है, फर्क है। वह यह नहीं समझ पाती कि वह समुद्र से ही पैदा होती है और समुद्र में ही विलीन हो जाती है। उसको यह भान नहीं होता कि वह स्वयं ही समुद्र है। जिस प्रकार लहर समुद्र का अभिन्न अंग है, इसी प्रकार जीवात्मा परमात्मा का अटूट भाग है। जब हम स्वयं 'पुरुषोत्तम' के भाग हैं तो हम 'पुरुषोत्तम' तक क्यों पहुंचेंगे। हम तो वही हैं: उन्हीं के अंग हैं।

यही कृष्ण का प्रमुख ज्ञान है। इस अध्याय में कृष्ण एक परम गुरु की तरह बात करते हैं। अर्जुन इसमें पूरी तरह मौन रहता है जो अपने गुरु को समझने का सर्वोत्तम तरीका है।

यह गुरु ही है जो हमारे अस्तित्व से जुड़ा कैंसरनुमा हिस्सा 'अहम्' को पूरी तरह खत्म कर सकता है।

हमारा गुरु एक तरह को शिल्य चिकित्सा कर, इस ट्यूमर या कैंसर को निकाल फेंकता है। वह कभी यह अनुमति नहीं देगा कि प्रबुद्ध स्थिति से कम किसी स्थिति में हम रहें। वैसे जब हम आध्यात्मिक रूप से भी उन्नति करते हैं तब भी किन्हीं सतहों में हम फंसे रह जाते हैं, लेकिन हमें यह मालूम भी नहीं रहता कि हम फंस गए हैं और कोई प्रगति नहीं कर रहे। ऐसी हालत में गुरु हमें बार-बार धक्का देकर आगे बढ़ाता है। वह हमारे समग्र जीवन में परिवर्तन ले आता है।

जब हम शल्य चिकित्सा का छुरा या चाकू देखते हैं तो हमें लगता है कि यह हमें आधात पहुंचाएगा, पर सर्जन का चाकू मारने को लिए नहीं होता, यह तो हमें निरोग करने के लिए काम करता है। भारत में देवों या भगवानों के हाथ में हथियार दिखाए जाते हैं। वह वास्तव में शल्य क्रिया में प्रयोग में आने वाले औज़ारों के रूप होते हैं, जो हमारे अहम् को निकालकर बाहर फेंकते हैं। देवी काली के हाथ में एक बड़ा छूरा (या तलवार) और दूसरे हाथ में एक कटा हुआ सिर होता है। यह कटा सिर अहम् का प्रतीक होता है और चाकू या तलवार उस जान या विवेक का प्रतीक होता है जो हमारे अहमू भाव का नाश करता है।

हमारा गुरु ही यह सुनिश्चित करता है कि हम कहीं फंसे न रह जाएं और परम स्थिति तक पहुंचें। इसलिए पूर्व में गुरु को इतनी महत्ता दी जाती है। पश्चिम में तो सिर्फ शिक्षक का ज्ञान होता है; वहां आध्यात्मिक गुरु की कोई अवधारणा नहीं होती, परंतु पूर्व में, उन गुरुकुलों में भी जहां आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान की जाती है, गैर आध्यात्मिक शिक्षा देने वाले भी आध्यात्मिक गुरु ही कहलाते हैं—शिक्षक नहीं।

तो गुरु और शिक्षक में अंतर क्या है? शिक्षक बौद्धिक रूप से जानकार होता है, पर गुरु अनुभव में अधिक समृद्ध होता है। गुरु जब ज्ञान देता है तो अपने अनुभव के आधार पर बोलता है, जिसे वह सत्य सिद्ध कर चुका है। यदि प्राचीन भारत में राजाओं को धनुर्विद्या का भी ज्ञान लेना होता था तो वे गुरु के पास ही जाते थे। आपको ताज्जुब होगा कि आखिर ये प्रबुद्ध गुरु कृषि, धनविंद्या या व्यापार इत्यादि के बारे में क्या जानते थे, परंतु यह स्पष्ट है कि हर कला या विज्ञान को सीखने की एक विधि होती है। गुरुकुलों में सात वर्ष की आयु से बच्चों को ध्यान करना सिखाया जाता है जो तब तक चालू रहता है जब तक वे 14 वर्ष के न हो जाएं। यदि उस समय तक उनको अपना प्रथम आध्यात्मिक अनुभव हो गया हो तो उन्हें फिर 'ब्रह्म सूत्र' पढ़ाया जाता है, जो उन्नत आध्यात्मिक सत्यों के बारे में ज्ञान देता है। ऐसे लोग संन्यासी होते हैं जो समस्त विश्व का परित्याग कर देते हैं, नहीं तो वे जीवन की जटिलताओं का ज्ञान प्राप्त करते हैं, काम सूत्र पढ़ते हैं और वैवाहिक जीवन में प्रवेश करते हैं।

तब हर एक प्रसन्न था क्योंकि सभी को प्रबुद्ध गुरुओं द्वारा सही ज्ञान मिलता था और वे वह जीवन जीते थे जो उनके लिए सर्वोत्तम समझा जाता था। एक शिक्षक जहां शब्द द्वारा शिक्षित करता है, वहीं एक गुरु अपनी चेष्टा या शरीर भाषा द्वारा अपने शिष्य को ज्ञान देता है। अब यह सिद्ध हो चुका है कि हमारा आपसी वार्तालाप 90 प्रतिशत शब्दहीन संचारण या शरीर भाषा द्वारा होता है। गुरु का सीधा सान्निध्य और स्पर्श शिष्य को जागरूक कर उसमें बड़ा परिवर्तन लाता है उसके मन में इस ज्ञान के लिए जगह बनाकर, उसकी भौतिक उपस्थिति यह जगह बनाती है और शरीर भाषा उसमें शिष्य के मन में ज्ञान भर देती है।

जैसे ही हम अपने गुरु के सामने गए कि वह हमें बताएगा कि हम वह नहीं, जो हम समझते हैं कि हम हैं। वह हमें आगाह करेगा कि हम वह मानव नहीं जो आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं, वरन् वे आध्यात्मिक जीव हैं जिन्हें मानव अनुभव प्राप्त हो रहा है, यह सुनकर न सिर्फ़ हम इसको स्वीकार नहीं कर पाते, वरन् थोड़े बेचैन भी हो उठते हैं। हम समझते हैं कि वह (गुरु) अपने विचारों को हममें डालकर हमें परिवर्तित करना चाहता है। यह सोचते ही हम डर जाते हैं और भाग खड़े होते हैं।

असल में हम अपने 'भेड़-चाल' वाले जीवन से खुश रहते हैं कि बीवी-बच्चे प्राप्त किए, काम किया और मज़े करें, पर यदि हमारा गुरु हमें यही बात लगातार बताता है तो फिर हम उसका प्रतिरोध करना बंद कर देते हैं, यद्यपि आश्वस्त हम अभी भी नहीं होते। कुछ समय और बीतने के पश्चात् हमारे गुरु की ऊर्जा हमें आकृष्ट करती है और हम उनको याद करने लगते हैं। धीरे-धीरे वह हमारे अस्तित्व का एक हिस्सा बनने लगते हैं। अभी भी हम वह स्वीकार करने को तैयार नहीं जो वह कह रहे हैं। यह 'आंख-मिचौली' का खेल बहरहाल जारी रहता है।

फिर किसी बिन्दु पर जाकर हमें गुरु पर भरोसा होता है। तब वे बताते हैं कि हम भी उन्हों जैसे हैं बिल्कुल। वे कहते हैं कि हम भी सत्य समझकर अंतत: उन जैसे ही हो सकते हैं, पर हमें फिर डर लगता है और भेड़ की तरह बर्ताव करने लगते हैं। तब हमारा गुरु भी भेड़-सा बनकर हमें सहज करता है जिससे लगे कि वह भी हमारे जैसा ही है। एक बार जब हम उनसे जुड़कर उन पर पूरा भरोसा करने लगें तो वह हमारे मन में अनुभव उतारते हैं और कहते हैं कि हम शेर हैं ( भेड़ नहीं)। इसी स्थिति को मैं 'दीक्षारंभ' कहता हूं या प्रथम अनुभव। फिर वह हमें 'शेर' होने का अनुभव कराते हैं, पर उस अनुभव को प्राप्त करने के पश्चात् भी हम इसके होने को झुठलाते रहते हैं।

फिर काफी समय पश्चात् गुरु हमें अपनी सत्य प्रकृति से साक्षात्कार करने का अनुभव प्रदान करते हैं और हमें अंतिम स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। तभी, सिर्फ तभी हमें अनुभव होता है कि हम तो हमेशा से 'शेर' ही थे।

हमें कुछ नया नहीं होता है, हमें तो जागरूक होकर वह महसूस करना है जो हम वाकई में हैं। गुरु एक बार शुरुआत होने के बाद कभी हमें फिसलने नहीं देगा और साथ रहेगा, जब तक कि हम पूरी तरह पल्लवित न हो जाएं। वह बार-बार हमें चेतन अनुभव की उच्च श्रेणियों तक ले जाएगा और तब तक यह प्रयत्न जारी रहेगा जब तक कि हम महसूस न करने लगें कि हम शाश्वत चेतना हैं, कि हमारी सारी छिपी संभावनाएं और क्षमताएं प्रकट हो चुकी हैं या हम चरम सत्य को ग्रहण करने लगे हैं।

जितनी ज्यादा हम अपने गुरु को इन शल्य क्रियाओं को करने देंगे उतने ही हम सत्य को समग्रता से महसूस कर पाएंगे। कुछ लोग तो शल्य क्रिया की टेबल से भी भाग खड़े होते हैं। यह ख़तरनाक है। आत्म समर्पण को पूर्व ही हमें सारी बातें 'चैक' कर लेनी चाहिए। पूरी समझ-बूझ के साथ गुरु के निकट आना चाहिए, लेकिन एक बार यदि समर्पण कर दिया जाए तो फिर गुरु को अपने ऊपर काम करने देना चाहिए।

आइए, हम भगवान कृष्ण-वह चरम ऊर्जा, ब्रह्मांडीय चेतना, वैश्वीय बुद्धिमत्ता को प्रतीक-से प्रार्थना करें कि वह हमें शाश्वत चेतना का ज्ञान चक्षु द्वारा अनुभव कराएं और हमें 'नित्यानंद' या शाश्वत आनंद में स्थापित कर दें। धन्यवाद!

इस प्रकार संपन्न हुआ उपनिषद भगवत गीता का पंद्रहवां अध्याय 'पुरुषोत्तम योग', जिसमें श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य परमात्य के स्वरूप को संवादों द्वारा समझाया गया है।

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मानव एक अंतनिर्हित दैवी प्रकृति के किसी को क्वर लोग पहा। ब्रियुवे वरीय विवाने साथ जन्म लेते हैं; रू समाह से मुंबालिव वे पापी नहीं हैं; ता मैं मिली के मा लेकिन वैश्विक अनुकूलन उन्हें विभिन्न । कि मुमान लगाता कर आसुरी वृत्ति देता है। यूनि मिश्री में बना दिया गय िक कि का का किष्ण बताते हैं कि वे कैसे के कैसे के बाद में ब लि के अनुसार सिर्फ डिंगर्मित व्यावासा - 8 धारिया पुन: दैवी हो सकते हैं। कर और थे कि

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तम और मैं

इस अध्याय को पारंपरिक रूप से दैवासुर सपद द्विभाग योग कहा जाता है अर्थात वह योग जो दैवी और आसूरी प्रकृति की व्याख्या करता है। इसमें कृष्ण संस्कार या (गहरी जमी स्मृतियों) को और गहरे स्तर पर ले जाकर समझाते हैं। वे मन-शरीर तंत्र की गहरी ऊर्जा सतहों में जाकर हमें कॉस्मिक सतह तक पहुंचाते हैं। वह ऊर्जा जो इस पूरे अंतराल में व्याप्त रहती है; इस ब्रह्मांड को घेरे रहती है, 'ईथर' की ऊर्जा है - आकाश की ऊर्जा है।

दैवी या आसूरी?

कृष्ण यहां दैवी और आसूरी प्रवृत्तियों पर बात करते हैं। मज़ा यह है कि इन दोनों शब्दों की (अंग्रेजी में 'डिवाइन' और 'डैमोनिक) की मूल धातु एक ही है यह कोई तुक्के से नहीं है, क्योंकि दोनों प्रवृत्तियों का आधार एक ही ऊर्जा है। यह एक साधारण चुनाव है-जब हम शब्द 'तुम' चुनते हैं तो हम दैवी हो जाते हैं और जब 'मैं' का चुनाव करते हैं तो आसुरी हो जाते हैं-बस!

श्री रामकृष्ण परमहंस-प्राचीन भारत को एक प्रबुद्ध स्वामी-इस ऊर्जा के बारे में एक बड़ी सुंदर बात करते हैं। वे कहते हैं-" कोई ऊर्जा विनष्ट नहीं हो सकती; आपका प्रेम कभी नष्ट नहीं हो सकता। इसमें तो सिर्फ बदलाव ही हो सकता है। वे कहते हैं कि जब बछड़ा 'मैं-मैं' करता है ('अहम्'-' अहम्' करता है) उसे काम करना पड़ता है, कष्ट पाना होता है, मार पड़ती है और त्रास मिलता है, पर जब यह मार दिया जाता है और इसकी खाल (तांत) से संगीत वाद्य बनते हैं तब यह उसी वाद्य के माध्यम से 'तुमी ... तुमी' ('तुम'-' तुम') कहता है। यानी मैं-मैं कहने में कष्ट पाता है और 'तुम-तुम' कहकर यह संगीत की रस-वृष्टि करता है और ईश्वर की महिमा गाता है।"

यह बंगाली भाषा में बनाया हुआ एक मनोहारी रूपक है। तात्पर्य, परमहंस का, यही है कि जब तक 'अमी-अमी' (मैं-मैं) का उच्चारण होगा हम औरों तथा स्वयं के लिए भी असूर रूप रहेंगे, लेकिन जैसे ही संज़ीय परिवर्तन हम में

घटित होता है और हम 'तुमी-तुमी' कहते हैं तो हम अपने लिए और सभी के लिए एक दैवी रूप अख्तियार कर लेते हैं।

जैसा कहा जा चुका है, जमी हुई स्मृतियां या संस्कार कारणात्मक सतह (कॉजल लेयर) में गुंथे रहते हैं। वे अनियंत्रित ढंग से काम करते हैं। इनके निर्णय बिना हमारे संज्ञान के लिए जाते हैं, पर चेतना की गहनता सतह -कॉस्मिक सतह पर हर निर्णय अपनी संज्ञेयता के अनुसार लेते हैं-'तुम' या 'मैं या 'दैवी' या 'आसुरी' वृत्ति से संचालित होकर।

जब हम 'तुम' के निर्णय लेते हैं तो हम दैवी गुणों को फैलाते हैं और जब ' मैं' के निर्णय लेते हैं तो आसुरी गुण फैलते हैं। वस्तुत: ज्यादातर लोग यहां इसलिए बैठते हैं कि उनके 'अहम्' भाव को पुष्टि मिले। आख़िर प्रवचन के पश्चात् उनका ज्ञान और से अधिक हो जाएगा न? वे औरों पर अपना ज्ञान 'झाड' सकते हैं। कई बार हम सिर्फ अपना अहम् भाव बढ़ाने को लिए प्रवचन सुनते हैं। ऐसी मन:स्थिति वाले चाहे भले ही 'गीता' पर प्रवचन सूनें, उनको या किसी को कोई लाभ नहीं मिलेगा, उल्टे परेशानी ही बढ़ेगी।

अपने और बिराने अर्थात् 'मेरे' और 'तुम्हारे' संबंधी सारे निर्णय कॉस्मिक सतह से संचालित होते हैं। यदि 'मेरे' के बर्ताव से लिए जाएंगे तो पूरी प्रक्रिया आसुरी हो जाएगी। इसके बरअक्स यदि 'तुम्हारे' के बर्ताव से निर्णय लिए गए तो पूरे माहौल में दैवी गुणों का संचार होगा। 'चित्त' अपने आप कभी ऋणात्मक या धनात्मक नहीं होता। न गुणों (सत्त्व, रज, तम) में कुछ धनात्मक या ऋणात्मक होता है। तामसिक गुण यथा आलस्य भी ऋणात्मक या धनात्मक नहीं होता। ऐसे कई प्रबुद्ध स्वामी हुए हैं जो सदैव अकर्मक ही रहे और कुछ भी करते नहीं दिखाई पड़े। वस्तुत: उनके बर्ताव में और किसी आलसी की गतिविधियों में कोई अंतर नहीं लगता था, उदाहरणार्थ भगवान रमण महर्षि पूरे जीवन एक छोटे से शहर तिरुवंतमलाई में ही रहे, कभी वहां से बाहर ही नहीं गए। ज्यादातर वे चुपचाप ही रहते थे, परंतु यह फिर भी नहीं कहा जा सकता कि वे तमस में लिप्त थे क्योंकि उन्होंने कोई निर्णय 'मेरी-मेरा' को मानसिकता से नहीं लिया था। उनकी सारी गतिविधियों का संचालन 'तुम या तुम्हारी' मानसिकता से होता था-'मेरी' इत्यादि से नहीं।

इसी प्रकार हम चित्त को, मन को या संस्कार को अच्छा या बुरा नहीं कह सकते। ऊपर की अतिरिक्त सतहों में तो ऐसा कुछ नहीं होता। यह तो गहरी सतह, कॉस्मिक सतह से मालूम पड़ता है कि वे अच्छे हैं या बुरे हैं। वस्तुत: वासना या करुणा के पीछे काम करने वाली ऊर्जा तो एक ही होती है। जब हम

'मैं और मेरा' करते हैं तब वह वासना होती है, जब 'तू और तेरा' करते हैं तो वही करुणा हो जाती है।

एक चीज़ और स्पष्ट समझ लें। यदि हम अपने अंदर वासना की शिद्दत ज्यादा महसूस करते हैं और करुणा की कम, तब यह हमारी करुणा की नकली अभिव्यक्ति है. शायद कुछ नाम या ख्याति के लिए बनाई हुई, असली नहीं। यदि हमारी करुणा वासना की तरह की तीव्रानुभूति वाली नहीं होगी तो हमारी सारी गतिविधियों का केंद्र हमारा अहमु भाव ही होगा। यह 'गीता' पर प्रवचन भी हमारी अहमता के लिए ही एक गिजा का काम करेगा, यदि हम 'मैं' और 'मेरे' के बारे में ही सोचते रहे। यदि हमारे निर्णय का आधार 'तुम और तेरा' है तो हमारी रोजमर्रा की गतिविधियां भी देवी हो जाएंगी. सिर्फ यह गीता का प्रवचन ही नहीं।

हमें 'करने' पर इतना जोर नहीं देना है जितना 'होने' पर देना है। ' करने से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं। यदि हम समझते हैं कि 'करने' से हम चरम पद तक पहुंच सकते हैं तो वह हमारा कर्म है। ऐसे को 'पूर्व मीमांसी' (मीमांसी अर्थात् वैदिक कर्मकांड की शाब्दिक व्याख्या) कहते हैं।

जब हम समझते हैं कि हमारा मात्र 'होना' हमें चरम पद तक ले जा सकता है तो हम 'उत्तर मीमांसी' (वह जो वैदिक क्रियाओं की व्याख्या 'वेदांत दर्शन के आधार पर करते हैं) हैं।

वेदों के अनुसार लोगों के प्राय: दो वर्ग होते हैं-वे जो कुछ 'करने' में विश्वास रखते हैं और वे जो मात्र 'होने' में विश्वास रखते हैं। जो 'होने' में बदलाव ला सकते हैं, 'वेदांती' कहे जाते हैं और जो 'करने' से बदलाव की संभावना बताते हैं वे कर्मकांडी कहे जाते हैं, परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि चरम पद 'होने' से भी मिलता है, 'करने' से नहीं, क्योंकि जब हम 'करते' हैं तो या ज्यादा कर जाते हैं या कम करते हैं। इस कारण हमारा स्वयं से झगडा चलता रहता है और कुछ हाथ नहीं आ पाता। वही जो अपने 'होने' से अपने आपको बदल सके, चरम पद इसलिए पा सकता है।

यह एक क्षण या बिन्दू आता है तब हमें तय करना होता है कि हम आसरी प्रवृत्ति चाहते हैं या देवी। जब हमें आंकडे (सूचनाएं) प्राप्त होते हैं और हम एक प्रक्रिया को पश्चात् उसका नतीजा या आदेश देते हैं तो यह कैसे दिया जाता है? वह कौन-सा केंद्र है, जहां से यह आदेश या नतीजा दिया जाता है? यदि यह आदेश इस विचार के साथ आता है "इसमें मेरे लिए क्या है ... मुझे क्या मिलेगा?'' तब हम जो भी करते हैं, भय ध्यान लगाने के तो वह मात्र हमारे अहम् की तुष्टि करता है।

कई लोग मुझसे कहते हैं-"स्वामी जी! एक क्षण ध्यान में ऐसा आता है जब उन्मादित आनंद की पराकाष्ठा मुझे महसूस होती है, पर अचानक ही

श्रीमद्भगवत गीता

दो-एक घंटे के पश्चात् वह अनुभूति तिरोहित हो जाती है और कभी दोबारा महसूस नहीं होती। ऐसा क्यों होता है? क्या यह अनुभृति कभी वापिस नहीं आ सकती ?''।

यह समझ लें कि आनंदानुभूति का अर्थ है विकल्प रहित महसूस करना। इसमें किसी चुनाव की कतई गुंजाइश नहीं। जब हमारा 'मैं' अनुपस्थित होता है: जब हमारी अस्मिता, पहचान गायब हो जाती है तब ही हमें आनंदानुभति होती है। जिस क्षण हमने वह आनंद वापिस चाहा, उस क्षण हमारी एक रुचि पैदा होती है और इस विकल्प के लिए करना, कष्ट को न्यौता देना है। सारी चाहतें क्टदायी होती हैं, क्योंकि उनका आधार हमारा मन (या दिमाग) होता है। यह स्वयं द्वैत भाव पर आधारित होता है, पर आनंद तो विकल्प रहित स्थिति में मिलता है। यह तो द्वैत भाव से परे है, यहां कुछ चुनना नहीं है। यह तो मन और चाह की सीमा से भी परे है, परंतु जैसे ही हमने आनंद को पकड़ने की चाह की कि आनंद हमारी पकड़ से छूटा, क्योंकि हमारी चाह का आधार मन है, जो तुलना करने लगता है और द्वैत भाव में पड़ जाता है। इस रास्ते से तो आनंद कभी मिल ही नहीं सकता।

जब हम आनंद मग्न होते हैं तो हम आनंद को स्वयं पर हावी होने देते हैं, पर जैसे ही आनंद पर हम स्वयं 'छाना' चाहते हैं कि हम मन के स्तर पर आ जाते हैं और आनंद छूट जाता है। जब हम आनंद को पकडना चाहते हैं तो हमारे अंदर 'मैं और मेरे' के भाव का वर्चस्व होता है, जिससे हमारा अहम् ही और तुष्ट होता है। 'मैं और मेरा' यह भाव ही आनंद- घातक होता है। तब हम देवी हो ही नहीं सकते। जब आनंदपूर्ण होते हैं तो 'मैं और मेरे' का भाव नहीं रह सकता। तब तो हम 'तुम या तुम्हारे' के भाव से ओत-प्रोत रहते हैं। आनंद की चाह करना इसी 'मैं और मेरे' भाव को अपनी बागडोर सौंप देना है।

तम' और 'मैं

हमें 'तुम' और 'मैं' का फर्क समझना जरूरी है। 'मैं' शब्द का अर्थ है अहम् भाव जागरण और 'तुम' का अर्थ है ईश्वर या परमात्मा। जब हमारी पहचान तिरोहित होती है, अहम् विगलित होता है तो जो बाकी बचता है वह है परमात्मा अर्थात दैव तत्व! यह तो हमीं हैं जो 'मेरे' भाव द्वारा असूर को पैदा करते हैं। यदि हम में 'मैं' का भाव है तो हम चाहे कुछ भी करें-ध्यान लगाएं, पूजा-पाठ या अर्चना करें, ज्ञान प्राप्त करना चाहें-हमारे सारे कार्य-कलाप केवल हमारे अहम् को ही तुष्ट करेंगे और स्वाभाविक है कि अहम् भाव हमें केवल कष्ट और अज्ञान ही देगा। इसके विपरीत हमारा कोई कर्म 'तू और तेरा' के भाव से संचालित होगा तो वह हमें दैवत्व देगा और विशाद्ध आनंदप्रदायी होगा।

संस्कृत में दो शब्द हैं-'नि:वृत्ति' और 'प्रवृत्ति'। नि:वृत्ति का मूलार्थ है अपने अंदर झांकना यानी मुक्त होना। यह 'तेरे या तुम्हारे' भाव पर केंद्रित रहता है। प्रवृत्ति का अर्थ है बाहर देखना या बंधन में बंधना। यह 'मैं और मेरे' पर केंद्रित रहता है अर्थात जो 'तुम या तेरे' से किया जाए वह मुक्ति प्रदायी होता है और जो 'मैं या मेरे' भाव से किया जाए वह बंधन में डालता है और कष्ट देता है। बाद

तो जब तक हम स्वयं पर केंद्रित हैं, हम बंधनग्रस्त हैं-राग-विराग आकर्षण-विकर्षण को बंधन में और इसीलिए भय व लालच से संचालित रहते हैं। ये दोनों भाव हमें बांधते हैं, मुक्ति के बंधन में डालते हैं और इस विषय-भाग को संसार में बंदी रखते हैं। ये सब हमारे अहम् भाव या अस्मिता के 'उत्पाद' हैं।

लेकिन जब हम अपने अहम् को विगलित कर देते हैं। हम सीमा-रहित हो जाते हैं। फिर हम अपने स्वार्थी विचार 'मैं या मेरे' द्वारा सीमित नहीं होते हैं-अपने संकीर्ण संबंधों में बंध नहीं पाते हैं। हम पूरे विश्व को हो जाते हैं। कृष्ण इसी को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की संज्ञा देते हैं। यदि हम अपने मन-शरीर तंत्र को अपनी सीमा मानते हैं तो हम शेष विश्व से कटे-कटे रहते हैं। तब हमारा परमात्मा से द्वैत भाव रहता है-हम प्रकृति से जूझते हैं और समग्र से सदैव संघर्ष करते रहते हैं और यह तो स्पष्ट ही है कि 'अंश' कभी 'अखिल' से जीत नहीं सकता।

  • हम जब भी कोई काम, कोई गतिविधि 'मैं और मेरे' भाव से संचालित होकर करते हैं तो हम जीवन की जटिलता और कष्ट को ही आकर्षित करते हैं अपनी ओर आने को। सारी जटिलताएं और कष्ट हमारे इर्द-गिर्द इकट्ठे हो जाते हैं।

यहां कृष्ण बड़ी सुंदरता से दैवी और आसूरी वृत्तियों का विश्लेषण करते हैं। प्रारंभिक अध्यायों में अर्जुन ही मुखर था। वह अपनी अहमन्यता व्यक्त कर रहा था तथा उसका भाव-चेतन (या कैथेरिसिस) हो रहा था। धीरे-धीरे वह दूसरे स्तर पर आया; उसने कृष्ण को भी बोलने दिया और संवाद प्रारंभ हुआ; पर इन 15वें और 16वें अध्यायों में तो अर्जुन लगभग चुप ही रहता है। वह सिर्फ़ सुनता है। कोई प्रश्न नहीं; सिर्फ कुछ संशय। वह अपने गुरु से ज़्यादा-से-ज़्यादा स्पष्टीकरण प्राप्त कर अपनी समझ बढ़ाना चाहता है। कर शाम । बार

श्रीमद्भगवत गीता

दिव्यता के लिए अहतोए

16.1, .2, .3 श्री भगवान बोले-भय का सर्वथा अभाव. अंत:करण की पर्ण निर्मलता. तत्त्व ज्ञान के लिए ध्यान योग में निरंतर दुढ स्थिति और सार्त्तिक दान, इंद्रियों का निरंतर दमन, भगवत पुजा और अग्नि होमादि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान के नाम-गुणों का कीर्तन और स्वधर्म पालन के लिए कष्ट सहना, इंद्रियो सहित अंत:करण की सरलता (शब्द्धता); अहिंसा, सत्य (यथार्थ) और प्रिय भाषण. क्रोध का सर्वथा त्याग: कर्मों में कर्त्तापन के अभिमान का त्याग: चित्त में चंचलता का अभाव; किसी की निंदादि न करना तथा सब प्राणियों हेतु दया; इंद्रियों का विषयों को साथ संयोग होने पर भी आसक्ति का न होना: कोमलता तथा लोक शास्त्र के विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव: तेज, क्षमा, धैर्य, बाहर-भीतर की शब्द्ध एवं किसी के लिए भी शत्र का भाव न होना और न अपने से पुज्यता के अभिमान का अभाव-हे भारत! ये सब तो दैवी सम्पदा प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।

यहां कृष्ण उन सभी गुणों का उल्लेख करते हैं जो हमें चेतना के उच्चतर स्तर पर ले जाकर हममें दिव्यता का समावेश करते हैं।

व्यवहार फ़के डालता है

जब हम गुणों की इस फेहरिस्त के बारे में 'मेरे' भाव में सुनते हैं तो प्राय: हम क्या करते हैं? हम इन सबको अपने व्यवहार में लाने का अभ्यास प्रारंभ कर देते हैं, पर एक बात स्पष्ट है-यदि हम इन सभी गुणों को अपने अंदर लाने का

अभ्यास करेंगे तो हम पागल हो जाएंगे। हम कछ भी नहीं कर पाएंगे. क्योंकि हम अपने से लड़ते रहेंगे। हम अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने के प्रयास में अपने अहम भाव को दुढतर कर देंगे। जब हम इन गणों की अपनी अहमन्यता के साथ ग्रहण करने का प्रयास करते हैं तो हमारा 'मैं-मेरे' का भाव और मजबूत होता जाएगा और हम समझेंगे कि हम बेहतर जीव होते जा रहे हैं. परंत हमारे गरु जन. स्वामी गण सदा यही कहते रहे हैं कि वे बेहतर नहीं, पूरी तरह से बदले हुए जीव हैं। बेहतर जीव और बदले हुए जीव में अंतर होता है।

कुछ दिन पूर्व मैंने आपको स्वामी विवेकानंद द्वारा बताई शेर और 'भेड-शेर' की कहानी सुनाई थी। वह एक उम्दा कथा है, वह भेड-शेर यह समझना ही नहीं चाहता कि वह एक शेर ही है। वह तो चाहता है कि वह एक दमदार, मजबूत भेड हो जाए। वह शेर से यही कहता है कि वह उसे तरकीब बताए जिससे वह एक मजबूत भेड हो जाए।

इसी प्रकार यदि हम उन गुणों को आत्मसात करने का प्रयत्न करेंगे जो कृष्ण ने यहां बताए हैं तो हमारा अहम् भाव भी पुष्ट होगा। इसी कारण तथाकथित तपस्वी (तप करने वाले लोग) लोगों का अहम् भाव बढ़ जाता है क्योंकि वे अपने आपको दबाते हैं, उसका दमन करते हैं। जो स्वयं का दमन करेगा उसका अहम भाव बढता जाएगा। यह हम स्पष्ट देख सकते हैं कि उनमें ऐंठ बढ जाती है।

लेकिन जब हम सहज भाव से, चैनपूर्वक अपना जीवन-यापन करते हैं तो वैराग्य का भाव स्वत: ही आता है। मैंने कई संन्यासियों को खासतौर से भारत में देखा है, जो गृहस्थ लोगों को आलोचना करते रहते हैं कि वे पवित्र नहीं ਵੇਂ और पापी हैं। जब हम तपस्या या वैराग्य को अपने ऊपर जबरदस्ती थोपते हैं तो हम अंदर-ही-अंदर जलते भी हैं और इसके साइड इफेक्ट के रूप में हमारे मन में कई बार अपने रास्ते के बारे में शक भी पैदा होते रहते हैं। यह शाक हमसे कुछ-न-कुछ ऐसा ही करवाता रहता है और हम दूसरों को, उनके अपने चुने हए पथ के बारे में अपराध-बोध से ग्रसित कर देते हैं।

हम दुसरों में यह अपराध बोध पैदा करते हैं कि उनका रास्ता गलत है क्योंकि हम समझते हैं कि हमारा रास्ता ही सही है। यह खासतौर पर तब होता है जब लोग हमारे पास आकर अपनी गलतियों को कबूल करते हैं।

दूसरों के कबूलनामों को सुनकर भी हमारा अहम् दुढ होता है। श्रोता सुनकर स्वयं को मजबूत महसूस करता है। जब दूसरे स्वयं को गलत कहते हैं तो अपरोक्ष रूप में वह स्वयं को सही समझता है, ज्यादा पवित्र समझता है। जब हम अहम् भाव द्वारा संचालित होकर कोई तप करते हैं तो हम चाहते हैं कि दसरे स्वयं को

गलत समझें और हमारे सामने आकर यह बात कबुलें। हमें ताकत मिलती है दसरों की गलतियां सुनकर और हम मजबूती से दूसरों को पापी कहते हैं।

स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि एकमात्र पाप है किसी अन्य को पापी कहना। तप तो सहज भाव से स्वयं होने वाला परिवर्तन है, जो हर्ष व आनंद के कारण घटित होता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। कोई भी काम बलपर्वक किया जाएगा तो उससे न हमारा कोई भला होगा. न समाज का।

समाज भी हमें बताता रहता है कि हम पापी हैं। पहली बात, यह सत्य नहीं है। कोई भी प्रबुद्ध स्वामी जिसने द्विव्यता का अनुभव किया है यह कहने के योग्य नहीं होता। दूसरी बात सबको पापी बताने में किसका लाभ होता है?

  • यदि कोई धार्मिक संगठन लीगों को आश्वस्त करता है कि वे पापी हैं तो वह संगठन कभी उन लोगों को नियंत्रित नहीं कर सकता और जब तक कोई संगठन लोगों को नियंत्रित नहीं करेगा, वह चल ही नहीं सकता। केवल दो ही तरीके हैं जिनके द्वारा कोई संगठन जीवित रह सकता है और वृद्धि को पाप्त हो सकता है-भय और लालच द्वारा। या तो वह लोगों में लालच भरकर उन्हें अपनी ओर खींच सकता है या उनमें भय डालकर उन्हें भयभीत कर सकता है।

कृष्ण कहते हैं कि न लालची बनो, न भयभीत हो। वे कहते हैं कि क्रोध भी छोड दो, सत्यवाची रहो, साधारण, सौम्य और विनम्र रहो, अहिंसक रहो निष्काम भाव से काम करो और त्यागी बनो-यही गुण हैं दिव्यता के। यही वे गण हैं जो आपके व्यवहार में आते हैं जब आपका ध्यान अपने पर नहीं वरन् दूसरों पर केंद्रित रहता है। ये सारे गुण हृदय से प्रकट होते हैं मस्तिष्क से नहीं ये प्रेम की उत्पत्ति है वासना या कामना की नहीं।

ईश्वर के विचार मात्र को आप में प्रेम का संचार करना चाहिए, भय का नहीं। ईश्वर हर धर्म में करुणामय माना गया है। किसी भी प्रबुद्ध स्वामी ने इसको अतिरिक्त न कोई अनुभव किया है, न कभी अभिव्यक्त ही किया है। भय एवं प्रतिहिंसा संचार करने वाले ईश्वर की छवि मानव की अपनी रची भ्रांति है। यह तो आदमी की करनी है, एक को दूसरे से लड़वाकर फूट डालो और उन्हे नियंत्रित कर उन पर विजय पा लो।

ईश्वर आप और मुझ में, सबमें निवास करते हैं। हम जो भी करते हैं उसका हमें ज्ञान रहता है। यदि हम कोई गलती करते हैं तो हमें उसका भी पता रहता है। किसी को बताने को जरूरत नहीं है, वहीं हमारा पाप बन जाता है। यही अपराध बोध हमारा जीवन नरक बना देता है।

ईश्वर तो हमारे अंतर्मन की ऊर्जा है जो हमें शद्ध ब्रद्धि प्रदान करती है। यही वह ऊर्जा है जिससे रह समूचा ब्रह्मांड संचालित होता है। इसी ऊर्जा से सर्य में तेज आता है। इस ऊजा में कोई भेद नहीं है। इस में मिमी ही है। मैं मि

मनुष्य रूप में हमें एक अवसर मिलता है, इस ऊर्जा का विस्तार करने का और उसे उच्चतर बुद्धि बना देने का। जानवरों को यह सुविधा नहीं है, यह मानव को ही प्राप्त है। इस महती सुविधा, उच्चतर चेतना की अनदेखी करना ही हमारा मल पाप है। हमारे जीवन का एक मात्र उद्देश्य है-इस सत्य को समझना और दिव्यता प्राप्त करना। इसलिए यदि इस महती सत्य को बिना महसूस किए, हम मरते हैं तो हमें पूनर्जन्म लेना पडता है। कि । किन का

हम फिर इसी आवागमन के चक्र में उलझे रहते हैं, क्योंकि हम समझ ही नहीं पाते कि हम क्या हैं। जैसा बुद्ध ने कहा था, यही कारण है हमारे कष्टों का जब हम स्वयं में परमात्मा की अनुभृति कर लेते हैं यानी अपनी दिव्य क्षमता से साक्षात्कार कर लेते हैं तो हमें जीवन का सही अर्थ प्राप्त हो जाता है। फिर तो पुनर्जन्म की कोई ज़रूरत नहीं रहती। हम मुक्त हो जाते हैं।

श्रीमदुभगवत गीता

तम एक असर हो यदि ...

16.4 हे पार्थ! दम्भ, घमंड, अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी, ये सब आसुरी संपदा लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं। 16.5 (इन दोनों प्रकार की संपदाओं में) दैवी संपदा मुक्ति के लिए और आसुरी संपदा बांधने के लिए मानी गई है। इसलिए हे पाण्डव (अर्जुन)! तू शोक न कर क्योंकि तुझे दैवी संपदा प्राप्त है।

16.6 पार्थ! इस लोक में मनुष्य समुदाय दो प्रकार का है-एक दैवी पूर प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। दैवी प्रकृति को बारे में तो विस्तार से बताया गया है। अब तू आसुरी प्रकृति के बारे में मानी की विस्तार से सुन।

16.7 आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति-इन दोनों को ही जानते। इसलिए न तो उनमें बाहर-भीतर शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण

आसुरी वृत्ति या प्रकृति क्या है? कृष्ण कहते हैं कि हर वह कर्म जो घमंड, दर्प, अहम्, नाम और प्रसिद्ध या शक्ति प्राप्ति के उद्देश्य से किया गया है, आसुरी प्रकृति बताता है जैसा कि रावण के मामले में हुआ। वे न उस व्यक्ति को लाभ पहुंचाते हैं, न दूसरों को। ये सब कर्म अज्ञान के कारण होते हैं और अंतत: पतन की ओर ले जाते हैं।

मैंने कई लोगों को रावण की तरह तप करते देखा है, परंतु रावण जैसे तप से न उसका ही भला हूआ, न दूसरों को कोई लाभ पहुंचा। वह तो स्वयं के लिए और दूसरों को लिए असूर ही बन गया। उसने पहले दूसरों को मारा और अंतत: स्वयं को ही मार दिया। उसकी पूरी कथा 'मैं और मेरे' भाव को ही मजबूत करने की दास्तान है। यह समझ लें कि जो भी कृत्य-चाहे शास्त्र-अध्ययन दान-पुण्य, परोपकार, पूजा-पाठ, ध्यानादि, यदि 'मैं और मेरे' भाव को दृढ़ता देते हैं तो वह कष्ट का कारण होता है।

'मैं' पर ध्यान देना तो सहज वृत्ति सभी को होती है। यह तो जिजीविषा की मांग है जो हमारे सामाजिक अनुकूलन एवं असुरक्षा भाव द्वारा संचालित होती है। 'मैं' का मल अर्थ ही है जीते रहने की अदम्य कामना। इस मांग के कारण 'मेरा-मेरी' का भाव पैदा होता है जो व्यक्ति जानता है कि यह अज्ञान और भ्रम की उत्पत्ति है। यह व्यक्ति जानता है कि यह जीने की सहज वृत्ति कोई खास सहायता नहीं करती और भले ही यह जिजीविषा कितनी तीव्र हो, कोई सदा जीवित तो नहीं ही रह सकता।

यह सहज वृत्ति की जिजीविषा एक विशुद्ध भ्रम ही है। ज्यादा-से-ज्यादा हम 70 से 80 वर्ष तक जीवित रहते हैं, कभी-कभी 90 और 100 साल तक की भी किसी की उम्र हो सकती है, परंतु यह जिजीविषा इसे निरंतर बढ़ाना चाहती है और स्वयं को शाश्वत करना चाहती है, क्योंकि मरना तो कोई नहीं चाहता। स्वाभाविक है कि हम कष्टों की ओर ही चलते रहेंगे। जब तक यह सहज वृत्ति वाली जिजीविषा रहेगी हम स्वयं को आहत ही करते रहेंगे।

"आज सुबह ही एक आश्रमवासिनी महिला ने शिकायत की कि वह दूसरों के द्वारा उसके भले के लिए की गई आलोचना से आहत हुई है। वह बोली कि वह बहुत संवेदनशील है। मैंने उससे कहा कि इस शब्द का प्रयोग न करें। मैंने कहा-''तुम संवेदनशील नहीं हो। संवेदनशील व्यक्ति तो ऐसे व्यक्तित्व का मालिक होता है जिससे शब्द आर-पार हो जाते हैं। सिर्फ घमंडी लोग ही आहत होते हैं तो यदि हम आहत होते हैं (किसी की आलोचना से) तो हम घमंडी हैं। हम पत्थर की भांति अभेद्य हो जाते हैं तभी तो किसी के शब्द हम से टकराकर हमें आहत करते हैं तो यह न कहे कि मैं संवेदनशील हूं।"

संवेदनशील व्यक्ति शब्दों को उससे होकर गुजरने देता है। वह कभी उनसे कष्ट नहीं पाता। हमें शब्द तब आहत करते हैं जब हम उन्हें रोकते हैं, जब हम उनका प्रतिरोध करते हैं और अपने हिसाब से उनका अर्थ गढ़ते हैं। जब हम शब्दों से अपना अर्थ नहीं गढ़ते तो एक कष्ट नहीं पाते। यह तो शब्दों से खेल करना होता है। हम वे शब्द अच्छे समझते हैं और उन्हें ही चुभते हैं जो हमारे अहम भाव को सहारा देते हैं। हम कभी नहीं कहते-"मैं आहत हुआ हूं क्योंकि मैं घमंडी हूं।'' हम शब्दों पर पॉलिस मारकर कहते हैं-"मैं आहत हुआ ह क्योंकि मैं संवेदनशील हूं।''

आप कृपया शब्दों से स्वयं को धोखा न दें। सीधे-सीधे शब्दों का प्रयोग करें। मैं ऐसे पॉलिश्ड शब्द अपने चारों ओर सुनता रहता हूं। इनके प्रयोग से लोग स्वयं को आसानी से छल लेते हैं। ऐसे शब्दों से स्वयं को छलना बंद करें, बात स्पष्ट व सीधी करें। हम पॉलिश्ड शब्दों से दूसरों को छल सकते हैं, पर उनका प्रयोग स्वयं को छलने को न करें।

एक ठेकेदार स्पोर्ट्स कार एक अफसर को भेंट करना चाहता था।

उस अफसर ने भेंट लेने से इंकार करते हुए कहा-''मैं एक ईमानदार व्यक्ति हूं और यह कार लेने की सोच भी नहीं सकता।"

तब ठेकेदार ने कहा-" तो ऐसा करें यह कार मुझसे आप 10 डॉलर्स में खरीद लें?''

उस अफसर ने कहा-''तब तो मैं ऐसी दो कार खरीद लुंगा।''

तो शब्दों के साथ न खेलें। स्वयं को शब्दों से न छलें।

हमें अपना आशय स्पष्ट रखना चाहिए। हमें ईमानदारी से अपना आशय स्पष्ट करना चाहिए और बताना चाहिए कि हम क्या चाहते हैं, गोल-मोल बात नहीं करनी चाहिए। रामकृष्ण कहते हैं-"दिमाग और शब्दों को सीधा रखो।" जो भी बात करो, स्पष्ट कहो। कम-से-कम तब तो हमारी समझ में आएगा कि हम किसी समस्या में फंसे हैं। जब रंग-बिरंगे और पॉलिश्ड शब्दों का प्रयोग होगा तो धीरे-धीरे हम अपने उलझाव में अपनी समस्या के प्रति भी विमुख से हो जाएंगे। हम यही भूला देंगे कि हम किसी समस्या से जुझ रहे हैं और यह स्थिति बेहद खतरनाक होती है।

यह समझ लें कि जब हम जानते हैं कि हम नहीं जानते तो कम-से-कम हम सत्य तो समझते हैं, लेकिन जब नहीं जानते कि हम नहीं जानते तो वाकई हम नहीं जानते कि हम नहीं जानते। तब समस्या खड़ी होती है। यह स्पष्ट समझ लें कि हम अपनी समस्या को शब्दों को आड में झुठलाएं नहीं।

शब्दों का सदैव सीधा प्रयोग करें। दो बिन्दुओं को मध्य एक सरल रेखा कम-से-कम दूरी की द्योतक होती है। किसी भी चीज़ को रास्ता सदैव सीधा, स्पष्ट और बेबाको पूर्ण ही होता है और किसी से कॉम नहीं चलेगा।

दिव्यता को जीना

यहां कृष्ण सारे दिव्य गुणों को एक-एक करके बताते हैं। सारे गुणीं की व्याख्या करना ज़रूरी नहीं है। हम यहां कुछ को ही स्पष्ट करेंगे, उदाहरणार्थ निर्भयता को लेते हैं।

जब तक हमारे अंदर जिजीविषा का भाव रहेगा, हम भयाक्रांत तो रहेंगे ही। यानी जब तक हमारे जीने की इच्छा है, तब तक भय हमारे मन में रहेगा ही। यह तो निर्भयता प्राप्त करने के लिए ईश्वर को, मृत्यु को अपना आत्मसमर्पण करना ही एकमात्र रास्ता है।

श्रीमद्भगवत गीता

हिन्दू शास्त्र-उपनिषदों में एक सुंदर उपनिषद है-'कथोपनिषद'। इसे आप लोग जरूर पढ़ें। यह वेदों के सार और उपनिषदों से लिया जान है जिनके रचियता प्राचीन ऋषिगण थे। इन लोगों ने मृत्यू की प्रक्रिया का गहन अध्ययन किया है। जहां पश्चिम में सारी ऊर्जा जीवन के अध्ययन में लगा दी है, वहीं पर्व के मनीषियों ने अपनी ऊर्जा मृत्यु के अध्ययन में लगाई है। इसलिए शायद मत्योपरांत भी ऋषिगण जीवित रहते हैं। वे अस्तित्ववान रहते हैं क्योंकि उन्होंने मत्य के पश्चात भी जीवित रहने की कला खोजी है, लेकिन जो लोग इस विषय-वस्तुओं वाले संसार में उलझे रहते हैं, वे तो मानो जीवन में ही हर क्षण मरते रहते हैं। कथोपनिषद मृत्यू का विज्ञान बताती है।

इसमें एक बालक नचिकेता की कथा है जो यम को लोक जाता है। यम मृत्यू के देवता हैं, लेकिन जब नचिकेता उनसे मिलने उनके लोक पहुंचा तब वे वहां नहीं थे। उनके नौकरों (दासों) ने ही नचिकेता का स्वागत किया, पर नचिकेता ने कहा कि मैं यम के आने तक वहीं रहंगा। उसके आने को तीन दिन बाद यम से उसकी मुलाकात हो पाती है। यम उसका स्वागत करते हैं। यहां यह स्पष्ट समझ लें कि मृत्यू के लोक में कोई नहीं (जीवित) जा सकता। यम तो स्वयं हमारे लोक में आता है। सदा वही आता है (जब हमारी मृत्यू होती है)। जब हम उससे भागने का प्रयास करते हैं तो वह चूंकि मृत्यु का स्वरूप होता है, वह हमारा 'मैं और मेरे' का भाव और इस तरह से हमारे सारे संबंध और चीजें हर लेता है। फिर तो न हम अपने 'चैकों' पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, न अपनी कार चला सकते हैं। फिर तो सारे संबंध शेष हो जाते हैं। यानी जो कुछ भी हमारा है वह हमसे दूर हो जाता है-धन, संबंध, वैभव-संपदा इत्यादि। यानी हमारा कुछ भी नहीं रहता। हमारे 'ममत्व' का ज्वलंत प्रतीक हमारा शरीर भी हमसे छिन जाता है। मृत्यू से हम 'अपना' सब कुछ गंवा देते हैं, पर हम जब मुत्यू लोक में जाते हैं, जैसा नचिकेता ने किया तो हम निर्णय करते हैं और मृत्यु हमारा स्वागत करती है। तब यम हमारा मेजबान होता है।

इस कथा में यम नचिकेता का स्वागत बड़े प्रेम और सम्मान से करता है और तरंत ही एक बेहद सदय मेजबान हो जाता है। यम नचिकेता को तीन वर भी देता है। पहले वर के रूप में नचिकेता अच्छे संबंध मांगता है। वह कहता है-"जब मैं अपने परिवार में वापिस जाऊं तो मेरे पिता मुझे सहर्ष अपना लें।" यम यह वर उसे देता है। फिर यम उसे धन-संपत्ति का वरदान देता है और बताता है कि कैसे धन-संपदा अर्जित की जाए तथा अनन्य सुख और आराम प्राप्त किया जाए। यम यहां एक करुणापूर्ण ईश्वर के जैसे व्यवहार करता है। अंतत: यम नचिकेता को आत्म-ज़ान प्रदान करता है अर्थात् पहले यम एक सदय

श्रीमद्भगवत गीता

मेजबान की तरह बर्ताव करता है, फिर एक करुणापूर्ण ईश्वर की तरह। आखिर में वह उसे अपने असली तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए सक्षम करता है। यह तीसरा वरदान नचिकेता को इसलिए दिया जाता है क्योंकि उसने मृत्यू का रहस्य जानने की इच्छा जताई थी। उस बालक (नचिकेता) की सदाशयता, ईमानदारी और साहस से प्रभावित होकर यम उसे प्रबोधन भी प्रदान कर देते हैं।

जरा जीवन को इस विरोधाभास पर नजर डालें, जब हम मृत्यू से भयभीत होकर भागते हैं तो यम हमारा पीछा करता है, चाहे हम कहीं भी हों। मृत्यू हमारा सब कुछ छीन लेती है, हमारी पहचान, धन-संपदा, संबंध अर्थात् ' मैं और मेरे' का भाव, पर यहां नचिकेता के मामले में सब कुछ उल्टा हो रहा है। जब हम यम के सामने अपना आत्म-समर्पण कर देते हैं तो यम एक सदय मेजबान की तरह बर्ताव करता है। वह ऐसा भयावह देव लगता ही नहीं, जैसी हमारी कल्पना होती है। हम यमराज की कल्पना एक ऐसे देव की तरह करते हैं जो काला है, हाथ में पाश (बंधन की रस्सियां) पकड़े है, भैंसे पर बैठा है, बड़ी-बड़ी मूंछें हैं तथा बेहद घमंडी एवं आक्रामक बर्ताव वाला लगता है।

पर यहां तो दृश्य बिल्कुल दूसरा ही है। यम कहता है-''स्वागत है! तुम तो अग्नि-देव के रूप हो।'' एक अतिथि को भगवान अग्नि की तरह समझना, पुरानी परंपरा है जिसकी हम आराधना करते हैं।

वैदिक संस्कृति की उक्ति है-"अतिथि देवो भव!" अर्थात अतिथि भगवतरूप होता है। अतिथि का मूल अर्थ है वह व्यक्ति, जो बगैर तिथि (तारीख) निर्धारित किए आपके दरवाजे पर आता है-न कोई ई-मेल, न फोन, न फैक्स, पर वह हमसे अपेक्षा करता है कि हम एयरपोर्ट पर उसे लेने पहुंच जाएं। जो व्यक्ति पूर्व सूचना देकर आता है वह अ-तिथि नहीं होता। वह तो हमारा संबंधी है, उसका तो हम ख्याल करेंगे ही। उसका मामला अलग है, वह तो आपसी संबंध व्यापार का हिस्सा है, पर एक अतिथि एकदम अलग बात है।

पहले यह समझ लें कि हमारे सारे संबंध किसी-न-किसी रूप में व्यापार-संबंध ही हैं, जबकि अतिथि वह व्यक्ति होता है जो अचानक हमारे जीवन में सीधा प्रविष्ट होता है और मुक्त भाव से रहने लगता है। आज की समस्या यह है कि अतिथि को यह अवधारणा अब है ही नहीं। लोगों को विश्वास करना मुश्किल है कि आज भी हिन्दू गांवों में सारे घरों के दरवाजे दिनभर खुले रहते हैं। कम-से-कम जिस गांव में मेरा पालन-पोषण हुआ था, उसमें तो ऐसा ही था। मैं किसी भी घर में आराम से जा सकता था और कुछ भी खा सकता था। कोई भी बालक ऐसा करने को स्वतंत्र था, पर अब अतिथि का यह भाव ज्यादातर जगहों से तिरोहित हो चुका है। जब लोग कहते श्रीमदुभगवत गीता

है-" भारत एक गरीब देश है" तो मैं जवाब देता हूं-"नहीं! तुम लोग हिन्दू संस्कृति की कदर ही नहीं कर पाते।"

उदाहरणार्थ जब हम किसी विकसित देश में भ्रमण करते हैं और किसी नए शहर में व्यापार के काम से जाते हैं तो हम कितना धन होटलों में रहने और खाने पर व्यय कर सकते हैं? पर भारत का तरीका अलग है। यदि कहीं एक भी मित्र है तो हमें बस उसको फोन करना है-सारी सुख-सुविधाएं हमारे लिए तुरंत उपलब्ध हो जाएंगी, पर भारत में भी अब सांस्कृतिक हमलों के कारण यह खातिरदारी की भावना विलुप्त होती जा रही है, पर गांवों में यह मूल वैदिक संस्कृति अभी भी जीवित है। इसलिए अतिथि-परंपरा भी आज तक जीवंत है। वहां तो अभी भी 'अतिथि देवो भव:' अर्थात् मेहमान भगवान है, को भावना अभी भी कायम है।

यम नचिकेता से कहते हैं-" तुम मेरे अतिथि हो और तुम मेरे लोक में वैश्वानराग्नि (पूजा की अग्नि) को रूप में पधारे हो।'' पुजारी को ही अग्नि का रूप माना जाता है यानी अग्नि का दिव्य रूप। पुजारी वह जो पूजा करवाता है। यम कहते हैं कि तुम मेरे लोक में एक दिव्य रूप में पधारे हो। मुझे तुम्हें सम्मानित करना है। मुझे क्षमा कर दो कि जब तुम यहां आए, मैं तुम्हारा स्वागत करने को

यहां नहीं था। मेरी तीन दिन की अनुपस्थिति के लिए मैं माफी मांगता हूं। वैसे तो हम प्राय: यम को (मृत्यू को) टालना ही चाहते हैं, इससे बचना ही चाहते हैं, पर जब हम स्वयं उसकी खोज में जाते हैं तो वह वहां नहीं मिलता

जहां उससे मिलने का हमें डर रहता है, इस पूरी कहानी का यही मर्म है। प्राय: यम हमारा पीछा करता है। वह हमारे पीछे रहता है और हम भागते फिरते हैं, पर जब हम मुडकर उसके पास स्वयं ही जाते हैं तो वह नहीं मिलता। तीन दिनों तक यम नचिकेता को नहीं मिला था। यह महत्वपूर्ण बिन्दु है, इसको समझ लें। इस कथा का यह मर्म है जो महती सत्य उद्घाटित करता है, जब नचिकेता मत्यू के निकट गया तो उसे मृत्यू नहीं मिली। यानी जब हम मृत्यु के पास स्वयं जाते हैं, मृत्यु हमें नहीं मिलती। हमारी कल्पना सच नहीं होती अर्थात मल्य के बारे में हमारी कोई कल्पना सच नहीं होती। जब हम स्वयं उसके सामने आत्मसमर्पण करते हैं तो जब हम भयभीत होकर भागते हैं, मृत्यु हमारे पीछे होती है। वह हमारा इसलिए पीछा करती है क्योंकि हम उससे भागना चाहते हैं यह एक विषय चक्र बन जाता है। हमें इसे समझना चाहिए। समर्पण के

समय यम वहां नहीं होगा, जहां हम सोचते हैं कि वह होगा। उसको वहां न पाकर हमारा साहस बहुत बढ़ जाएगा। यह साहस हमें उसका सामना बहादुरी से करने को प्रोत्साहित करेगा। जब उसका सामना हम हिम्मत से करते हैं तो हमारा

साहस और बढ़ता है। यह तो एक गुण पूर्ण चक्र (वर्चुअस सर्किल) बनता जाता है, लेकिन जो हम डरकर करते हैं वह एक विषय चक्र में फंसता है। हमें इस विषय चक्र को गुणपूर्ण चक्र में बदलना जरूरी है।

यदि हम कथोपनिषद की इस कथा का मर्म समझ सकें तो मृत्यू को बारे में हमारी सारी धारणा ही बदल जाएगी। पहले हम उसको खोजते हैं वह नहीं मिलता। दूसरी बात जब वह मिलता है तो वह वैसा नहीं लगता जैसी हमारी कल्पना होती है। वह बजाय एक भयावह घमंडी देव के, जो हमसे 'हमारा सब कछ' छीनने वाला है, वह हमें एक सदय मेजबान की तरह लगता है, जो हमें गरिमापूर्ण अभिवादन प्रदान करता है। तब वह एक करुणापूर्ण ईश्वर की भांति प्रतीत होता है, जो हमें न सिर्फ धन-संपदा, अच्छे संबंधों का वरदान देता है वरन् आत्मज्ञान भी कराता है। हमें प्रबुद्ध कर देता है।

तो हम पूछ सकते हैं कि मृत्यु की ओर कैसे जाएं उदाहरणार्थ-" क्या आत्म-हत्या कर लें?'' पर यह समझ लें कि आत्म-हत्या मृत्यु का सामना करना नहीं है। आत्महत्या करने वाले लोग निर्भय नहीं होते। वस्तुत: वे तो बेहद कायर होते हैं। वे आत्महत्या इसलिए करते हैं क्योंकि वे जीवन जीने के योग्य नहीं रह जाते। वे तो आत्महत्या की आड़ में जीवन से पलायन कर जाते हैं। आत्महत्या जीवन से भागना है, मृत्यु से साक्षात्कार नहीं है। जीवन से पलायन करना एक बात है और मृत्यु का सामना करना बिल्कुल दूसरी बात, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।

जब हमारे शरीर-मन तंत्र में भय पैदा होता है या हम भयाक्रांत होते हैं तो एक मात्र रास्ता है इसको गुजरने देना। इसको स्वयं पर हावी मत होने दो। कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें भय के भाव से बड़ा डर लगता है अरे, भय ही काफी है। इसमें डर क्यों जोड़ते हो? भय को स्वयं पर हावी मत होने दो, अपना आप पहचानो, इसको समझो। भय से कितना बच सकते हो या भय से कितना भाग सकते हो? इसे सतह पर आने दो, बाहर निकलने दो। हो सकता है आपका पूरा अस्‍तित्‍व हिल जाए; आंखों से आंसू निकलने लगें और अवसाद आपको जकड़ ले। जो होता है उसे होने दें। चाहे आप चेतन रूप से भय को हावी होने दें या न होने दें, भयावह घटनाएं तो होती ही रहेंगी। इसलिए बेहतर यही है कि उसका सामना पूरी स्पष्टता और साहस से किया जाए।

  • हम अपने भय को पांच वर्गों में बांट सकते हैं। पहला भय है-धन, सुख-सुविधा का खोना। दूसरा है-किसी बीमारी या दुर्घटना को कारण शरीर का कोई अंग खोना; तीसरा अपने निकटतम संबंधियों या घनिष्ठों की मृत्यु का भय; चतुर्थ-अपनी समझ या मानसिक क्षमता खोने का भय और पंचम है अज्ञान का

भय अर्थात मृत्यू का भय या भूतप्रेत इत्यादि का भय। यही पांच मुख्य भय होते हैं जो हमें आक्रांत करते रहते हैं। हमारे समस्त भय इन्हीं पांच वर्गों में आ सकते हैं।

इन्हें सतह पर आने दें। हर भय को बाहर आने दें। अपने मन को इन भयों का सामना करने दें। इन्हें दबाएं नहीं, उभरने दें। देखें क्या होता है। यही तो होगा कि अवसाद हमें घेरेगा, आंख से आंसू टपकेंगे। सारा शरीर कांपने लगेगा। होने दीजिए। आप कर भी क्या सकते हैं? जो कर सकते थे वह तो आपने अभी तक कर ही लिया होगा। साफ बात है कि आपका होना यह सिद्ध करता है कि आप इस बारे में कुछ भी नहीं कर पाए। इसलिए तो आप चुप बैठे हैं। इन भयों को प्रकट होने दीजिए। यह भय सामने लाइये।

इस भय को अपने चेतन सतह तक, बिना दबाए बाहर आने दें। यह स्वीकार कर लें कि ये सारे भय सच साबित होंगे। यथा आपकी धन-संपत्ति की चोरी हो जाएगी; आप दुर्घटनाग्रस्त हो जाएंगे; किसी निकट एवं घनिष्ठ संबंधी की मृत्यू हो जाएगी या आप स्वयं भी मर जाएंगे। ये सारी संभावनाएं सच हो सकती हैं। हां, तो? क्या हो सकता है? यही तो जीवन है। इसे ही कहते हैं सच्चाई का सामना करना।

यह तो सिर्फ नन्हे-नन्हे बच्चों को जरूरत होती है कपोल-कल्पनाओं की वास्तविकताओं का सामना करने के लिए, पर हमें तो सत्य को वैसे ही समझना चाहिए जैसा वह है। हम सच्चाई से भाग तो नहीं सकते। सत्य से पलायन नहीं कर सकते, क्योंकि हम इससे जितना दूर भागना चाहेंगे, यह उतना ही हमें भयाक्रांत करेगा, हमारे पीछे पड़ा रहेगा, पर जब हम इन भयों का सामना करते हैं; इन्हें बाहर आने देते हैं तो अचानक हमें लगेगा कि यह हमसे दूर जा रहे हैं। तब हम ज़्यादा जिम्मेदार और शिद्दत पूर्ण महसूस करने लगते हैं।

अकृतज्ञता से कृतज्ञता की ओर

जब हमें लगता है कि हमारा स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहेगा तो हम इसकी ओर से लापरवाह नहीं होते। तब हम ज्यादा समझदारी से जीवन जीने लगते हैं। जब हमें लगता है कि हम जीवित ही नहीं रहेंगे, जब मृत्यु का भय हमारे मन में घुस जाता है तब हम जीवन की कदर पूरी जिम्मेदारी से करने लगते हैं। तब हमारी समझ में आता है कि यह परमात्मा की कितनी बड़ी देन है।

श्रीमद्भगवत गीता

चीजों को लापरवाही से लेने को रेखांकित करने वाली एक लघुकथा

एक राजा था जो 45 वर्ष तक अपने जीवन को संपूर्ण सुख-सुविधा से बिताने से ऊब चुका था। उसके पास सभी कुछ था-धन-संपदा, सुख-सुविधा एवं अन्य ऐश-ओ-आराम के साधन। जो कुछ भी सुख वह उनसे भोग सकता था, भोग चुका था। अब उसके पास उत्तेजित या जीवंत होने के लिए कुछ भी बचा नहीं था। वह बहुत 'बोर' होता रहता था।

यह समझ लें कि जब सारे विषय-भोग, सुख-साधन आपके पास उपलब्ध हों तो आप में एक गहरी ऊब की भावना भरने लगती है।

अभाव में कम-से-कम कुछ और पाने की इच्छा तो रहती है। इससे प्रेरित होकर हम वह प्राप्त करने को काम करते हैं। तब जीवन में एक निरंतरता का भाव आता है। जीने की इच्छा जागृत होती है, सामने कोई लक्ष्य रहता है। जब सब कुछ ही उपलब्ध हो तो फिर किसके लिए जिया जाए? कुछ भी नहीं होता। इसलिए यह कभी न सोचें कि हमारे पास जब सब कुछ होगा तो हम खुश रहेंगे।

तो वह राजा भी महसूस करता था कि मानों वह नरक में है। अवसाद और बोरियत उसका जीवन नर्क बना रहे थे। उसका अपने कमरे से बाहर जाने का भी मन नहीं होता था। रातों-दिन, वर्षों तक वह ऐसे ही लेटा रहता था। उसके मंत्रीगण चाहते थे कि कैसे भी राजा को बाहर लाया जाए, जीवन में कुछ उत्साह पैदा किया जाए। वे उसके लिए देश-विदेश से हर उत्तम सूख-सुविधा मुहैया करते रहते थे, पर कोई फर्क नहीं पडता था। राजा का एक स्थायी जवाब था-"मुझे कुछ नहीं चाहिए, मुझे कुछ मत दो।"

अंत में उन्होंने एक काम करने का निर्णय किया। कहा-" हे राजन! यहां जंगल में एक प्रबुद्ध स्वामी आए हुए हैं। शायद वे आपकी सहायता कर सकें आप उनसे एक बार मिल तो लें। हो सकता है आपके मन का अवसाद और बोरियत खत्म हो जाए। उस स्वामी ने कई लोगों को ठीक कर दिया है।''

पर राजा बोला-"मुझे कहीं नहीं जाना है।" मंत्रीगण ने कहा-" महाराज! एक बार कोशिश करके तो देखिए।''

जब मंत्रीगणों ने बहुत कहा तो राजा मान गया-" अगर तुम लोग कहते हो तो एक बार प्रयास करके देखता हूं।"

राजा के मन में बहुत-से संशय और प्रश्न थे। उसे उस स्वामी पर ज्यादा विश्वास भी जम नहीं पा रहा था। वह सोच रहा था-" क्या पता यह स्वामी

प्रबुद्ध भी हैं कि नहीं।" उसके आश्रम में पहुंचते ही उसने सीधा प्रश्न पूछा-''क्या आप इस अवसाद से उबरने में मेरी सहायता कर सकते हैं?''

प्राय: यही प्रश्न मुझसे पूछते हैं जब वे मेरे पास मेरी परीक्षा लेने आते हैं। वे कुछ सीखने नहीं आते, वरन मुझे 'प्रमाणिक' सिद्ध करने के लिए ही आते हैं। कई लोग मुझसे पूछते हैं-''क्या आप हमें ईश्वर-दर्शन का रास्ता बता सकते हैं?'' मैं कहता हूं-"मैं कोशिश कर सकता हूं, पहले आप स्थान तो ग्रहण कीजिए?'' उनकी मुद्रा ऐसी ही होती है मानों वे मेरे ज्ञान की परीक्षा लेना चाह रहे हों।

इसी प्रकार वह राजा भी उस स्वामी की परीक्षा लेना चाह रहा था, पूछा-" क्या आप मुझे इस अवसाद से राहत दिला सकते हैं?"

उस स्वामी ने कहा कि यदि वह (राजा) अपनी सारी संपदा एक थैले में लेकर आ सकता है तो वह उस तक पहुंच सकता है-कुछ सहायता कर सकता है।

तुरंत उस राजा ने निर्णय लिया कि वह कतई प्रबुद्ध ज्ञानी नहीं, वरन् एक धोखेबाज़ ढोंगी है। "यह तो बड़ा ढोंगी है। मुझसे मेरा सारा धन लेना चाहता है।

लोग मुझसे भी पूछते हैं कि कैसे पता करें कि कौन प्रबुद्ध है और कौन नहीं। इसका पता खाली बुद्धिमत्ता के प्रयोग से तो नहीं चल सकता। सदा हर व्यक्ति के बारे में शक रखो। यदि वह वास्तव में प्रबुद्ध है तो उसका स्वरूप उसका व्यक्तित्व हमें निश्चय रूप से प्रभावित करेगा। हम उसे भुला नहीं पाएंगे। कोई व्यक्ति प्रबुद्ध है कि नहीं, उसकी यह आसान-सी आजमाइश है। लोग पूछते हैं-" स्वामी जी! क्या हम सदैव आपका स्मरण करते रहें?'' मैं कहता हूं-''नहीं! पूरी कोशिश करो मुझे भूल जाने की, मुझ पर शक करने की। यदि मेरा तुम पर तनिक भी प्रभाव है तो तुम ऐसा नहीं कर पाओगे। अगर तुम्हें मुझसे सहायता पानी है तो धीरे-धीरे तुम्हारी मेरे साथ ट्यूनिंग बैठने लगेगी।''

मैं तो सीधी-सीधी बात करता हूं-" तब तुम्हारी और मेरी ट्यूनिंग बैठ जाएगी! बुद्धि से तो यह विश्लेषण या समझ पैदा नहीं हो सकती। अपनी बुद्धि से तो तुम सदा 'नहीं-नहीं' कहते रहो। यदि सदा 'नहीं-नहीं' कहते रहोगे तो कभी धोखा नहीं खाओगे। सबसे आसान तरीका है 'नहीं' करना। यदि (मैं) वह व्यक्ति वाकई में प्रबुद्ध है तो वह तुम्हारे बौद्धिक स्तर से परे जाएगा। वह तुम्हारे अस्‍तित्‍व में प्रवेश कर जाएगा, उसके पार जाएगा। दिन में तुम्‍हारे मन में घुमता रहेगा और रात को सपनों में आएगा। वह तुम्हारा पीछा करता रहेगा। उससे बच नहीं पाओगे।

इस राजा को भी लगा, मानो वह स्वामी उस पर छा गया है। रातभर करवटें बदल-बदलकर वह सोचता रहा-''तो मैं प्रयत्न करके देखूं। अगर उसने मेरी सारी संपदा ले भी ली तो मैं उसे आसानी से पकड़ सकता हूं। आखिर वह है तो मेरे ही राज्य में, जाएगा कहां?'' इस प्रकार वह राजा रातभर अपना हिसाब लगाता रहा। ''फिर यदि मैं अपनी धन-संपत्ति से खुश नहीं हूं तो उसे वह ले भी जाए तो क्या फर्क पड़ेगा। वह धन-संपत्ति तो वैसे भी मुझे बेकार लगती है, ले ले वह उसको।''

अंत में राजा ने यह जोखिम उठाने का निर्णय किया। अगले दिन उसने अपनी सारी संपत्ति को हीरे-जवाहरात में बदल दिया और उन सारे हीरों को एक थैले में डाल लिया। फिर वह थैला लेकर उसी स्वामी को निकट पहुंचा। उस स्वामी ने तुरंत वह बैग उसके हाथ से छीना और भाग खडा हुआ। अब राजा की समझ में आ गया कि वह स्वामी वाकई में एक ढोंगी था। वह उस स्वामी के पीछे भागा, पर हम जंगल में रहने वाले किसी आदमी का आसानी से पीछा नहीं कर सकते। उसे तो जंगल के कई रास्ते मालूम होते हैं। इसलिए शायद व्यवसाय में फंसे लोग कभी चोर-डकैतों का पीछा नहीं करते। हमारे देश में ही नहीं, विश्व में कहीं भी व्यावसायिक पुलिस कभी डकैतों-चोरों को पकड़ने में सफल नहीं हो पाती क्योंकि उनको रास्ते के ही भूल-भुलय्यों का वह ज्ञान नहीं होता जो चोर-डकैतों को होता है।

तो वह स्वामी जंगल में इधर-उधर भागता रहा। राजा तो जंगल में नया था, उसे रास्तों का ज्ञान था भी नहीं। फिर भी उसने अपना पूरा प्रयत्न किया उस स्वामी को पकड़ने का और यह पीछा करता रहा। अब राजा को पछतावा हो रहा था। वह क्यों इस भागमभाग में पड़ा। वह खुद को ही कोस रहा था, अपने कष्टों के लिए-''अब जब मैं वापिस अपने राज्य में पहुंचुंगा तो मेरे पास तो कुछ भी नहीं बचा होगा। अब तो भोजन के लिए भी भीख ही मांगनी पडेगी।'' वह अपनी दीनावस्था की कल्पना करने लगा और मानसिक रूप से गरीबी उसे अभी से सताने लगी। पहले जब उसके पास सब कुछ था, तब भी दु:खी था और अब भी दु:खी था, जब उसके पास कुछ भी नहीं बचा था। यह धन-संपदा का विरोधाभास रहता है-जब धन होता है तब भी कष्ट मिलता है और जब नहीं होता तब भी कष्ट मिलता ही रहता है।

शाम होने को आई थी। राजा ने पीछा करना छोड़ दिया। वह सोचने लगा-''मैं तो अब कुछ कर नहीं सकता। वह स्वामी उस जंगल से बखूबी वाकिफ़ है। राजा को रुकता देख वह स्वामी भी रुक गया। राजा ने देखा कि वह भी रुक गया है तो तुरंत उसके पास पहुंचा और अपना थैला छीनकर वापिस ले लिया।

वह स्वामी हंसने लगा। राजा को समझ में हो नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। उस स्वामी ने कहा-''यह ले मूख! और ऐश कर।''

अचानक राजा को समझ में आया कि वह तो फिर धनवान हो गया है। एक दिन उसके पास धन नहीं रहा। अब उसे लगा कि वह फिर धन संपन्न है। स्वामी ने कहा-''मूर्ख! तुझे अवसाद इसलिए महसूस होता था क्योंकि हर चीज को तू पहले से अपना समझता था। अब अपनी सारी दौलत तूने एक दिन को जब खो दी तो इसका महत्त्व समझ में आया। जा ... ले जा इसे और ऐश कर।'' एक दिन को लिए जब उस राजा ने अपनी धन-संपत्ति गंवाई तो उसका अवसाद दूर हो गया।

हम अपने जीवन में भी इसी प्रक्रिया से गुजरते रहते हैं, क्योंकि हम 'असुरक्षा की चेतना' को अपने ऊपर हावी होने देना चाहते हैं। यहां ख्याल रहे कि मैं शब्द 'चेतना' का ही प्रयोग कर रहा हूं। असुरक्षा को भावना एक चेतना ही है। यह भी सत्य है। यदि हम चीज़ों को पहले से ही अपना नहीं समझेंगे तो हममें यह असुरक्षा की भावना नहीं आएगी। तब हम जीवन का आनंद पूरी शिद्दत से प्राप्त करेंगे। इसी प्रकार जब हम जीवन पर पहले से अपना हक नहीं समझेंगे तब ही उसकी कदर समझ में आएगी। यदि अपने पास सहज उपलब्ध चीज़ एक दिन के लिए हमसे छिन जाए तो फिर हमें जीवन में उसका महत्त्व समझ में आ जाएगा।

उदाहरण को लिए कोशिश करके देखें कि हम 12 घंटे तक अपनी आंखें रोज़ नहीं खोलेंगे। उन्हें बंद रखेंगे तो अपनी आंखों की कदर आपको स्पष्ट होगी। इसी प्रकार यदि हम में यह भय रहे कि जीवन हमसे छिन जाएगा तो हम इसका महत्त्व समझेंगे। समस्या यही है कि हम हर चीज़ को 'टेकिन फॉर ग्रान्टेड' मानते हैं। जिस क्षण हमें अनुभव हो कि यह हमसे छिन जाएगी, हम जीवन का पूरी शिद्दत से मज़ा लेने लगते हैं। यदि हम अवसादग्रस्त या ऊबे हुए हैं और हमें यह आभास हो कि हम 12 घंटे में सब कुछ गंवा देंगे तो हमारी समझ में यह सत्य आ जाएगा। फिर हम जीवन को 'टेकिन फॉर ग्रान्टेड' नहीं मानेंगे।

उस राजा को भी बोरियत का अहसास इसीलिए होता था क्योंकि वह भी अपने जीवन को सहज उपलब्ध मानता था। जब हम असुरक्षा को भाव या मृत्यु भय से आक्रांत होते हैं तो हमारी तुरंत समझ में आ जाता है कि हम जीवन को 'टेकिन फॉर ग्रान्टेड' मान रहे थे। जैसे ही मन में असुरक्षा आई कि हम जीवन का मज़ा लेने लगते हैं। यही इस कथा का मूल मर्म है।

यमराज ने नचिकेता को धन-संपत्ति, अच्छा संबंध एवं प्रबोधन सब कुछ दिया। जब लोग हमारे प्रोग्राम के मृत्यू या आधार में ध्यान प्रोग्राम से

श्रीमद्भगवत गीता

बाहर आते हैं तो वे कहते हैं कि उन्हें संबंधों का असली अर्थ समझ में आ गया। इसका अर्थ यही हुआ कि यमराज ने उन्हें भी यह वरदान दिया। तभी उन्हें धन की कदर समझ आती है अर्थात् यमराज ने उन्हें भी धन-संपत्ति प्रदान की। उनको जीवन में उत्साह मालूम पड़ता है। उनकी समझ में आता है कि जीवन कितनी महान देन है ईशवर की। यह भी समझ में आता है कि यह शरीर भले ही छूट जाए पर उसके परे भी कुछ है जो अक्षत् रहता है; अमर होता है। इसी जान को मैं 'आत्मज्ञान' कहता हूं।

अर्थात जब मृत्यू भय सामने हो तभी हमारी समझ में धन-संपदा, संबंधों और प्रबोधन की कदर स्पष्ट होती है। यहां कृष्ण निर्भयता की बात करते हैं। वे कहते हैं-" भय का सामना करो तभी निर्भय हो पाओगे।" अर्थात जब हम अपनी जिजीविषा से दो-चार होते हैं, अपनी उपलब्धियों को संग्रहशीलता का सामना करते हैं तभी हम निर्भयता के क्षेत्र में प्रवेश पाते हैं।

तब तक तो कुछ नहीं होता। जब आपके विचार और निर्णय 'तुम्हारे' भाव पर आधारित होते हैं तब ही इस जिजीविषा और संग्रहशीलता से परे जाकर हम निर्भय हो पाते हैं। यदि 'अपना-अपना' या 'मेरा-मेरी' का भाव रहेगा तो निर्भयता नहीं आ सकती।

तो जब तक 'मैं और मेरा' भाव से सोची, आप आसुरी वृत्तियों में रहेंगे: लेकिन जब 'तू और तेरा' भाव से सोचने लगेंगे तब आपके मन में दिव्यता (देव भाव) का उदय होने लगेगा और हम एक तेज, एक नई ऊर्जा प्रकाशित करने लगेंगे।

एक और सादा-सा प्रयोग करके देखिए-मात्र एक सप्ताह तक दूसरों के लिए जीवन जीकर देखिए। इसमें मैं यह नहीं कह रहा कि दूसरों को अपनी संपदा-धन प्रदान करें, केवल उनके लिए जी कर देखें।

प्राय: लोग कहते हैं-''इसमें मेरे लिए क्या है?'' उदाहरण के लिए आपकी पत्नी ने आपको फोन करके कहा कि सिनेमा चलो! पर आप कहेंगे-"नहीं! आज तो मैं समुद्र तट की सैर को जाना चाहता हूं।" यानी हर समय आप अपनी रुचि के अनुसार ही चलना चाहते हैं। इसके बरअक्स आप एक सप्ताह के लिए चाहे अपने दफ्तर में हों या घर में-दूसरों की बात मानकर देखें। दूसरों पर अपनी रुचि न थोपें, उनकी रुचि के अनुसार जीवन जिएं। अपना व्यवहार 'मैं और मेरा' केंद्रित न रखकर 'तू और तेरे' पर केंद्रित करें। केवल व्यवहार में ऐसा करें, किसी को कुछ धन-संपदा प्रदान न करें, पर आपका दिमाग सोचेगा-"यदि मैं 'तू और तेरे' के अनुसार सोचने लगूंगा तो लोग मुझे 'टेकिन फॉर ग्रान्टेड' मानने लगेंगे तथा मेरा शोषण भी कर सकते हैं। वे मुझे धोखा भी दे सकते हैं।''

मैं यहां केवल नैतिकता की दृष्टि से बात नहीं कर रहा। यह न समझें कि में आपको बता रहा हूं कि कैसे खुश रहें। ऐसे कई लोग हैं जो ऐसी किताबें लिख चुके हैं यथा-'चिंता छोड़ो और सुख से जियो।' मैं वह नहीं जो यह सब बताऊं। मैं आपको नैतिकता का पाठ नहीं पढ़ा रहा, वरन् आपकी आध्यात्मिक उन्नति का रास्ता दिखा रहा हूं। यदि आप कोई 'पेशेवर' साधक हैं तो कृपया इस अभ्यास को अपनाकर देखें। मैं 'व्यावसायिक साधक' इसलिए कह रहा ह क्योंकि सदा हर जगह ऐसे ही लोगों का समूह ज़रूर रहता है। जब भी कोई स्वामी महाराज आते हैं प्रवचन के लिए तो ऐसा समूह ज़रूर उनका प्रवचन सुनने को आता है। चाहे कोई स्वामी महाराज आएं या कोई आध्यात्मिक समारोह हो-वे लोग जरूर आते हैं। कई लोग आकर कहते हैं-"स्वामी जी! पिछले तीस साल से मैं साधना कर रहा हूं।'' इसमें कोई गर्व करने की बात नहीं है।

इसमें गर्व के लायक कुछ भी नहीं है कि आप तीस वर्ष से एक पेशेवर साधक हैं। यह समझ लें कि यदि आपने कई प्रवचनों को सुना है, आप कई स्वामियों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं या आपने कई आध्यात्मिक प्रोग्रामों में भाग लिया है तो ज़रूरी नहीं कि आप सही आध्यात्मिक पथ पर ही हैं। यह तो मात्र बाहर से बाज़ार निरखना या 'विंडो शॉपिंग' है। इससे ज्यादा कुछ नहीं है। यदि आप वाकई में सच्चे आध्यात्मिक साधक हैं और आध्यात्मिक विकास चाहते हैं तो एक आध्यात्मिक अभ्यास करना शुरू करें। कोई मात्र एक आध्यात्मिक अभ्यास एक सप्ताह तक करें। यदि आप सोचते हैं कि मैं आपकी सहायता कर सकता हूं तो मेरी एक बात सुनें। बाकी सबको भूल जाएं। मात्र यह करें कि बजाय 'मैं-मेरा-मेरी' के भाव पर निर्णय के, 'तूम-तेरा-तुम्हारी' के आधार पर लेना प्रारंभ कर दें।

मैं आपसे कुछ देने को नहीं कह रहा, मात्र इस प्रकार अपने रोज़मर्रा के निर्णयों को आधार रखें-'मैं' पर नहीं 'तुम' पर केंद्रित। आप देखेंगे कि आपके जीवन में परिवर्तन आने लगा है। आपके अंदर जमा ठोस तनाव धीरे-धीरे पिघलने लगेगा-आप अंदर से स्वयं को काफी हल्का महसूस करने लगेंगे और एक सुखद, शीतल समीर के स्पर्श का अनुभव होने लगेगा। जब आपको इस प्रकार के मूड का अनुभव होगा तो आप स्वयं एक कृतज्ञ भाव से भर उठेंगे और हर लम्हे, हर समय, हर रोज़ आपका यही बर्ताव हो जाएगा।

प्राय: हमारे सारे क्रिया-कलाप 'मैं' पर ही आधारित रहते हैं। जब कभी हम किसी पर चिल्लाते भी हैं तो यही कहते हैं-"यह तो मैं इसके ( उस व्यक्ति के) भले के लिए कह रहा हूं।'' जब कोई अन्य क्रोध दिखाता है तो हम कहते हैं-''देखो तो! कैसा राक्षसों की तरह चिल्ला रहा है।'' जब कोई चिल्लाता है

श्रीमद्भगवत गीता

चलिए माना कि यही होगा, पर अभी तो कोई धोखाधड़ी नहीं कर रहा। आप तो अपना विचार स्वयं पर 'मैं और मेरे' पर ही केंद्रित रख रहे हैं। आप स्वयं को पूरा सुरक्षित रखना चाहते हैं तो क्या आप सुखी हैं; खुश हैं? अपनी बात खुलकर बताएं-क्या वाकई में आप सुखी हैं। नहीं न! तो क्यों नहीं कुछ दिन 'तु और तेरे' पर दिमाग केंद्रस्थ कर जीवन-यापन करने के प्रयत्न करते। हम सभी इस 'आसूरी संपत्ति' के साथ अपना पूरा जीवन बिताते हैं। इसे ही कृष्ण आसुरी वृत्ति कहते हैं, यानी यह व्यवहार जो सदा 'मैं और मेरा' पर केंद्रित रहता है।

तो मात्र एक सप्ताह को लिए क्यों न इस प्रयोग को करके देखें? आश्रम की कार्यशालाएं और समय आपको ऐसा करने का बेहतरीन मौका उपलब्ध कराते हैं। अभी भी, जब आप इस कक्ष में वापिस आए अगले सत्र के लिए तो आप क्या करते हैं-अपनी सीट पर बैठते हैं और कहीं जाते हैं तो अपनी सीट पर अपना रूमाल रख जाते हैं जिससे कि सीट पर आपका ही कब्ज़ा रहे। यानी पहले आपने अपनी सीट पकड़ी और जब प्रसाद वितरण हुआ तो आपने सबसे पहले अपनी प्लेट प्राप्त की। अब एक सप्ताह के लिए पहले प्लेट दूसरों को लेने दीजिए, फिर स्वयं ग्रहण करें। यह भी देखिए कि दूसरों को आरामदेह सीट मिल गई है कि नहीं। उनसे पूछिए-''आप ठीक से, आराम से तो बैठे हैं?'' जब बाथरूम प्रयोग की आवश्यकता हो तो पहले दूसरों को जाने का न्यौता दें। ज्यादातर तो हम यही कहते हैं-''पहले मैं हो आऊं फिर आप जाना। मुझे जरूरी काम पर जाना है।'' तो बज्वाय इस बर्ताव के इस व्यवहार को प्रयोग में लाइए और पहले दूसरों को जाने दें। उनसे कहें-''नहीं पहले आप जाएं। मैं तो आपके बाद चला जाऊंगा। या "आप लगातार काम कर रहे हैं... लाइए मैं आपकी सहायता कर बोझ हल्का कर दूं।"

तो एक सप्ताह तक अपने बर्ताव में 'तुम' को पहला स्थान दें। आपको मालूम भी नहीं पड़ेगा कि कहां से एक आनंद का उत्स फूट रहा है। अचानक आपको लगेगा मानो आपका पूरा अस्तित्व चैन में आ गया है। जब आप 'मैं और मेरे' को प्रश्रय नहीं देते तो आप कभी तनाव महसूस नहीं करते, पर यदि आप मात्र 'अपना' ख़्याल रखते हैं तो इस तनाव से कभी निजात भी नहीं पाते।

क्योंकि जब आप 'मैं' को 'तुम' से विस्थापित कर देते हैं तो आंतरिक आरोग्य का भाव चालू हो जाता है और आप बेहतर महसूस करने लगते हैं।

(क्रोध में) तो हम उसे राक्षस कहते हैं, पर जब हम क्रोध में चीख़ते हैं तो हम 'उसके' भले के लिए यह सब करते हैं और कहते हैं-"यदि मैं इसे सही पाठ नहीं सिखाऊंगा तो कौन सिखाएगा? यह सब तो मैं उसी को भले के लिए कर रहा हूं।''

आप शब्दों से खिलवाड़ बंद करें और सीधी-सीधी अपनी बात कहना सीखें। इस प्रयोग को एक सप्ताह तक ही करें-ज्यादा नहीं। उसके बाद आप चाहें तो अपने पूर्व रूप को फिर ग्रहण कर सकते हैं। यदि आप पुराने रूप में नहीं पहुंच सकते तो यह एक अलग मुद्रा है। सीधा-सरल भाव अख्तियार करें। अपने निर्णयों का आधार 'मैं' नहीं 'तुम' रखें। आप देखेंगे कि आपके मन से चिड़चिड़ापन गायब हो जाएगा। स्वयं को प्रति गहरी जिजीविषा का भाव ग्रहणशीलता की सहजवृत्ति भी गायब हो जाएगी। आप एक खाली मनुष्य हो जाएंगे।

खाली ऐसे जैसे कि बांस होता है। जब आप भीतर से खाली होंगे तो आप दैव की बांसुरी बन जाएंगे। फिर तो जो भी होगा वह दिव्य होगा और आपकी दैवी वृत्ति हो जाएगी।

कृष्ण आगे कदम-दर-कदम इस दिव्य प्रकृति को अपनाने का रास्ता दिखाते हैं कि कैसे अपने सूक्ष्म स्तर पर आप इस दिव्य प्रकृति को धारण कर सकते हैं।

यह समझ लें कि सत्त्व, रज और तमस के स्तर पर काम करना मुश्किल है। यह तो ऐसे ही है जैसे स्वामी को परिवर्तित करने के लिए हम सारे नौकरों को बदल दें। यह तो हो ही नहीं सकता। आप स्वामी को बदलेंगे तो नौकर अपने आप बदल जाएंगे।

कृष्ण यहां स्वामी-परिवर्तन की तरकीब सुझाते हैं-यानी अहम् के भाव को बदलने की, जो सारे निर्णयों का जिम्मेदार होता है। वह यहां एक संक्षेप परिवर्तन की राह बताते हैं। अभी तक आपकी संज्ञा का आधार 'अहम्' या 'मैं' का भाव केंद्र में था। वह एक सरल तरकीब बताते हैं जिससे 'मैं' 'तुम' में बदल जाए। यही व्यवस्था है जो हमारे अंदर दैवी भाव या वृत्ति को लाती है। हिन्दू महाकाव्य 'रामायण' में राम और रावण दोनों ऊर्जास्थित बताए गए हैं, दोनों के पास ब्रह्मास्त्र हैं, अंतर केवल उसके केंद्रस्थ होने का है, राम में यह 'तुम' पर केंद्रित है और रावण में 'मैं' पर। इसलिए राम देवी वृत्ति को द्योतक हैं और रावण 'आसुरी वृत्ति' के।

कृष्ण आगे सूक्ष्म विधियां बताते हैं 'तुम' आधारित चेतना के अनुभव को

यानी उस चेतना की जो चरम चेतना है, समग्र की चेतना है, 'दैविक सम्मूत' है जो इस प्रकार के संज्ञेय परिवर्तन से संभव हो सकती है।

कदम-दर-कदम कृष्ण इन दैवी गुणों को एक-एक कर समझाते हैं। जैसा चैने पहले कहा है इन गुणों को समाविष्ट करने के लिए अलग से कोई प्रयत्न करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जितना ज्यादा हम इसके लिए अलग से प्रयत्न करेंगे, उतना ही हमारा व्यक्तिगत यत्न या खंडित होता जाएगा। फिर तो हम अपने से ही लड़ने लगेंगे। कुछ ऐसा करें कि यह परिवर्तन सहज रूप में आपके जीवन में आ जाए। आप स्वत: आनंद-निमगन, क्रोधादि दोषों से मुक्त और धार्मिक गुणों से संपन्न हो जाएंगे।

जब हम सामाजिक अनुकूलन या किसी अन्य सीख द्वारा कोई काम करते हैं-मय परोपकार या दान-पुण्य को-यह समझ कर कि ऐसा करने से हमें स्वर्ग मिलेगा-तो हम समस्या पैदा कर लेते हैं। वह दान कभी न करें यदि आपको लगे कि आपका कुछ भाग आपसे छूट रहा है। वस्तुत: 'दान' या देना शब्द ही भ्रमात्मक हैं। यह होना चाहिए 'साझा करना'। यानी हमारे पास जो कुछ फालतू है, अतिरिक्त है हम उससे मुक्त हो रहे हैं। 'दान' के भाव में 'अहम् भाव निहित रहता है। यह भाव आपको बताता है कि आप 'किसी से ऊंचे हो, दान प्राप्त करने वाला आपसे नीचे स्तर पर है' परंतु 'साझा' करने में यह भाव नहीं होता। उसमें तो किसी ऊंच-नीच का प्रश्न ही नहीं रहता। उसमें तो 'मिलकर बांटने का भाव' रहता है। जो कुछ हम पर फालतू था हमने दे दिया-साझा कर लिया।

साझा करना ही सही व्यवहार है, क्योंकि जब हम 'दान-पुण्य' करते हैं तो हम इस बात के लिए बहुत चौंकन्ने रहते हैं कि हमारा नाम आया कि नहीं उस 'दान-पुण्य' पर। हमारे नाम की वर्तनी में कोई ग़लती तो नहीं है? 'दान-पात्र का आकार सही है। कहीं हमारा नाम दूसरे को नाम के मुक़ाबले छोटे अक्षरों में तो नहीं उकरा गया है। भारत में तो यदि कोई एक ट्यूब लाइट भी देता है तो भी उस पर अपना नाम ज़रूर खुदवाता या लिखवाता है यथा-" सोमनाथन के पुत्र रामनाथन ने यह दान अपनी माता सौंदर्य लक्ष्मी को पुण्य स्मृति में दिया है। जिनका देहावसान फलां तारीख को फलां जगह हुआ था।'' काले बड़े-बड़े अक्षरों में यह छपा रहता है। जब हम वह ट्यूब लाइट जलाते हैं तो यह काली रेखा उभर आती है और प्रकाश को कम कर देती है।

रमण महर्षि यही बात बड़ी सुंदरता से कहते हैं-"जब हम मांगते नहीं तो हम स्वत: प्राप्त कर लेते हैं।'' मैं तो लोगों से कहता हूं-'' जब आप अपने मुख

से अपने गुण नहीं बखानते तो उनका बखान मैं करता हूं।'' जब लोग हमारे आश्रम के लिए कुछ करते हैं और चुप रहते हैं तो मैं उनकी करनी सारे संसार को बताता हूं।'' पर जब वे स्वयं ही अपने मुख से कहते हैं तो मैं चुप रहता हूं। जब आप कोई काम 'मैं' से विमुख रहकर करते हैं तो आपको यह नहीं लगता कि आप से कोई चीज़ ली जा रही है, साथ ही आपको एक महती संतोष का आभास होता है। जब आप कुछ भी 'तुम' भाव पर केंद्रस्थ होकर करते हैं तो आप से दैवी गुण स्वत: प्रकाशित होते हैं और आप तेज़ोमय हो जाते हैं।

सेवा सदा भक्ति नहीं होती

यशोदा (जिन्होंने मां के रूप में कृष्ण को पाला था) में भी 'मैं' का भाव था।

  • अब मैं आपको एक सुंदर कथा सुनाता हूं। यह एक महान भक्तिन तरंगिनी का किस्सा है। यह प्रेम की एक अन्यतम अभिव्यक्ति को कथा है, जिसमें 'मैं और 'तुम' का भाव स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है।

यह कथा कृष्ण के पैदा होने के 12 घंटे भीतर ही शुरू होती है। पैदा होने के बाद ही कृष्ण यशोदा को दे दिए गए थे। कृष्ण जन्म अर्धरात्रि को हुआ था और सूर्योदय के बहुत पहले ही वह यशोदा को सौंप दिए गए थे, क्योंकि एक दैववाणी को अनुसार उनका मामा कंस उन्हें मारने को सूर्योदय होने पर आने वाला था। यशोदा ने उनका तब तक पालन-पोषण किया जब तक कि वे वुंदावन नहीं चले गए, यशोदा द्वारा पालित होने पर भी उन्होंने यशोदा के कहने पर कभी बांसुरी बजाकर नहीं सुनाई।

लेकिन जब नीची जाति को एक कृष्ण भक्तिन तरंगिणी ने कहा तो उन्होंने बांसुरी वादन किया। वह कोने में छिपकर दूर खड़ी हो जाती और उनकी उपस्थिति और बांसुरी वादन का आनंद दूर से ही प्राप्त करती। एक बार जब कृष्ण वहां नहीं थे तो तरंगिणी जाकर उस धूलि को स्पर्श करती जिस जमीन पर कृष्ण होते थे।

एक बार कृष्ण बांसुरी साथ ले जाना भूल गए। बेशक, वह भूल नहीं होंगे, जानबूझकर भूलने का नाटक किया होगा। क्या कृष्ण कुछ भूल सकते हैं? वे तो दूसरों को भूलाने वाले थे। स्वयं तो कभी भूल ही नहीं सकते थे, पर उन्होंने ऐसा ही दिखाया मानो वे बांसुरी साथ ले जाना भूल गए हों। तरंगिणी ने बांसुरी वहां पड़ी देखी और बड़े प्रेम और श्रद्धा से उसे उठाकर अपने घर ले आई कि बाद में वह कृष्ण को दे देगी।

दसरे दिन कृष्ण ने कहा-"कोई मेरी बांसुरी ले गया है?" और उन्होंने उसको ढूंढने का नाटक भी किया। जब मालूम पड़ा कि तरंगिणी के पास है तो कृष्ण उसके घर गए, पर चूंकि कृष्ण ऊंची जाति के थे, नीची जाति वालों की बस्ती में जाने के लिए उन्हें कोई कारण चाहिए था। नहीं तो यशोदा उनको डांटतीं कि तू क्यों नीची जाति की बस्ती में गया। कृष्ण उस बस्ती में गए-वहां गंदी कीचड़ भरी सड़क थी। एक ऐसी झोपड़ी थी जिसमें हजारों सूर्य चमकते थे (अर्थात् हजारों छेद थे)। कृष्ण उस कोठरी में पहुंचे और अपनी बांसुरी मांगी। कृष्ण को अपनी कोठरी में देखकर तरंगिणी सकते में आग गई। भावातिरेक में उसके मुंह से आवाज ही नहीं फूटी। वह चुपचाप रह गई और बांसुरी ले आई। कृष्ण ने अपना नाटक चालू रखा और पूछा कि मैं बांसुरी बजाऊं। जब कृष्ण स्वयं कहें तो कौन मना कर सकता था।

उसने कहा-"मेरे प्रभु! आपकी बांसुरी सनने को तो देवता और ऋषिगण व्याकुल रहते हैं। मैं भला कैसे मना कर सकती हूं।''

कृष्ण वहीं सीढ़ियों पर बैठकर बांसुरी बजाने लगे। तरंगिणी एक कौने में बैठकर आहूलादित होकर सुनने लगी। तभी वहां यशोदा माई आ गईं। यशोदा को बहुत बुरा लगा क्योंकि उनके कहने पर कृष्ण ने अपनी बांसूरी कभी नहीं बजाई थी-"इस नीच जाति की लड़की के लिए तू बांसुरी बजा रहा है जबकि मेरे लिए तो कभी नहीं बजाई।''

यहां समझ लें तरंगिणी का बर्ताव 'तुम' केंद्रित है जबकि यशोदा का 'मैं' केंद्रित। इस कारण यशोदा की सेवा का कोई धनात्मक परिणाम नहीं मिल सका। उधर, यशोदा ने चूंकि कृष्ण का ध्यान हटा दिया था, अत: उन्होंने बांसुरी बजाना बंद कर दिया। कृष्ण द्वारा तरंगिणी के लिए बांसुरी बजाने का किस्सा 'पुन्नागबरली' में दिया हुआ है, जिसका अर्थ है-'धून-मंत्र'।

कृष्ण ने यशोदा को उत्तर दिया-" तुमने मेरी बेशक बड़ी सेवा की, परंतु 'मैं' के भाव के साथ। तरंगिणी मेरी अनन्य भक्त है जबकि तुम सिर्फ़ अपनी भक्त हो। जब तक मैं 'तुम्हारा' कृष्ण हूं तुम मेरा ख्याल रखती हो। इसका अर्थ तो यही हुआ कि तुम अपनी ही भक्त हो। तुम्हारा ध्यान आत्म-केंद्रित है, मुझ पर नहीं। इसलिए तुम मुझसे पांच मिनट का अलगाव भी बर्दाश्त नहीं कर पातीं।''

यही है अपनी ग्रहणशीलता या 'पसौसिवनैस' का भाव। कृष्ण बोलते रहे-" तुम इतनी दूर तक यहां चलकर आ गईं! तुम मुझे पांच मिनट की भी छूट नहीं देना चाहतीं। जबकि तरंगिणी ने कभी मुझे अपने घर आने को लिए नहीं कहा। उसने कभी इच्छा भी नहीं की कि मैं उसके लिए बांसुरी बजाऊं। चूंकि

वह मुझ में पूरी तरह समर्पित है। उसके अंदर केवल 'तुम या तुम्हार' का भाव का वर्चस्व है।

तब कृष्ण ने तरंगिणी को वरदान देते हुए कहा-"तुम सदा सामीप्य मुक्त रहोगी तथा एक 'शनढग' फूल बनोगी जो सदा मेरी माला का हिस्सा रहेगा। तुम मेरे पास सदा रहोगी।''

चार प्रकार की मुक्ति कही गई है-'सालोक्य' मुक्ति, 'सारूप्य' मुक्ति ' सामीप्य' मुक्ति और ' सायुज्य' मुक्ति। ' सालोक्य' अर्थात् ' उसी जगह'- यानी ऐसा मुक्त विष्णु के लोक बैकुंठ में निवास करेगा; उसका निवास स्वर्ग में रहेगा। सारूप्य का अर्थ है प्रभू के समान ही रूप रखने वाला, उदारहणार्थ स्वर्ग (या बैक्ट) के रखवाले जय-विजय का रूप प्रभु के समान ही बताया गया है; वे भी विष्णू (प्रभु) को समान शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किए रहते हैं।

सामीप्य अर्थात् समीप रहना-यानी आंतरिक क्षेत्र में ही निवास करना। विष्णु के साथ जो चक्र रहता है वह सामीप्य मुक्त है। प्रबोधन प्राप्त करना यानी सायज्य मक्ति पा लेना! सामीप्य मुक्ति है सर्वोत्तम प्रबोधन क्योंकि हम सदैव प्रभु के समीप ही रहते हैं। यह तो ऐसा ही है जैसे एक चींटी को चीनी में निवास मिल जाए।

सायुज्य मुक्ति यानी स्वयं चीनी (शुगर कैण्डी) ही हो जाना। यह स्थिति सारे ऋषियों की होती है। भक्तों को लिए वे चरम अवस्था है सामीप्य मुक्ति प्राप्त कर लेना। कृष्ण ने तरंगिणी को इसी सामीप्य मुक्ति का वरदान दिया था।

उन्होंने कहा-''तुम सदा मेरी माला का फूल बनकर रहोगी; निरंतर मेरे शरीर के स्पर्श में रहोगी। (अर्थात्) तुम मुझ में रहोगी।'' फिर यशोदा की ओर मुड़कर बोले-''क्योंकि तुम सदा 'मैं-मैं-मैं' के ही भाव से भावित रहीं, इसलिए पृथ्वी पर तुम्हारा कभी कोई मंदिर नहीं होगा।''

यशोदा ने कृष्ण का इतने प्रेम से पालन-पोषण किया; उनकी सेवा की पर पृथ्वी पर कहीं उनका मंदिर नहीं है जबकि राधा के मंदिर हर जगह मिल जाते हैं। वुंदावन में तो कृष्ण से ज्यादा राधा की आराधना होती है। वहां तो हर कोई दूधवाला या कोई और सदा 'राधे-राधे' ही कहता रहता है, कृष्ण-कृष्ण नहीं, तो अपनी सारी सेवा और प्रेम भाव के बावजूद यशोदा को प्रबोधन प्राप्त नहीं हो पाया।

दूसरी ओर, तरंगिणी जो कि नीची जाति की स्त्री थी और जो कृष्ण की निकटता से भी सदा वंचित रही, परंतु चूंकि वह 'तुम-तुम-तुम-तुम' के भाव से भावित रही: इसलिए कृष्ण स्वयं उसके घर गए और उसे सामीप्य मुक्ति देकर 'मुक्त' कर दिया।

हम चाहे दैवी भाव से ही भावित रहें पर यदि हमारा अहम् ('मै' का भाव) साथ है, कभी दिव्यता को प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि दैवी गण हमसे दूर भागते रहेंगे, लेकिन यदि 'तुम' का भाव हमारा निर्णायक विचार है तो चाहे हमारे झोपड़े में हज़ारों छिद्र हों, कृष्ण हमारे द्वार पर स्वयं आएंगे। ऐसी कई कथाएं हैं जो रेखांकित करती हैं कि 'मैं' भाव से भावित कभी दैवी गण प्राप्त नहीं कर सकता। 'तुम' भाव से भावित व्यक्ति दिव्यता को आकर्षित करता है अर्थात व्यवहार में एक मात्र संज्ञेय परिवर्तन पूरे जीवन को बदल सकता है। मैं अब आपको एक और कथा सुनाता हूं। यह विष्णू की चार प्रिय

वस्तुएं-शंख, चक्र, गदा, पद और उसकी पादुकाओं को मध्य आपसी झगड़े से संबंधित है।

एक बार विष्णू बैकुंठ से बाहर गए। साथ में उनके शंख, चक्र, पद्म, गदा और पादुकाएं थीं, पर जब वह वापिस आए तो उन्होंने पादुकाएं बाहर रख दीं तथा शंख, चक्र, गदा और पद्म के साथ वापिस अंदर आ गए और 'आदिशेष'-अपनी शोषशैय्या (शोषनाग द्वारा बनाई गई शैय्या) पर लेट गए। तब शंख और चक्र ने बाहर रखी पादुकाओं पर व्यंग्य करते हुए कहा-" तुम भले ही विष्णू का भार वहन कर उन्हें कहीं भी ले जाओ, पर जब वह वापिस आते हैं तो तुम उनके साथ नहीं आ सकतीं। अंदर तो केवल हम ही आ सकते हैं। तुम्हें अभी तक सामीप्य मुक्ति नहीं प्राप्त हो पाई हैं पर हम उनके साथ हर समय रह सकते हैं। तुम रात में तो बाहर ही रहती हो। अतः तुम्हारी सामीप्य मुक्ति आधी है जबकि हमारी पूरी है।''

दुःखी होकर पादुकाओं ने कहा-''हम क्या कर सकते हैं, यदि यही विष्णू की इच्छा है।'' पर दूसरे दिन सुबह उन्होंने अपने प्रभु (विष्णू) से कहा-''प्रभू! शांख और चक्र हमारा मजाक उड़ा रहे थे। क्या सच में आप हमसे अप्रसन्न हैं? क्या यह सही है कि हमें मात्र आधी सामीप्य मुक्ति प्राप्त है? प्रभु! हमारा क्या दोष है? क्या हमारा कोई महत्त्व नहीं है?''

विष्णू ने मुस्कुरा कर पादुकाओं को जवाब दिया-"व्यवहार और समय की बात है। कोई अमहत्त्वपूर्ण या महत्वपूर्ण नहीं होता। समय और व्यवहार में कोई पक्षपात भी संभव नहीं है। न मैं कोई भेदभाव करता हूं। तुम सभी की अपने समय और जरूरत के अनुसार महत्ता होती है।'' फिर उन्होंने आगे समझाया-''पर उनसे यह कह दो कि शंख-चक्र की पूजा कर कोई मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता जबकि तुम्हारी (पादुकाओं की) पूजा मुक्ति प्रदायक होती है। कई लोगों ने पादुकाओं की पूजा कर मुक्ति पाई है। चक्र तो हथियार है, मारता है। शंख भी युद्ध क्षेत्र में ही गूंजता है। तुम्हारा काम अलग है, महत्व अलग है। तुम्हें तो कोई

हाथ में भी पकड़े रखे तो मुक्ति मिल सकती है, पर चूंकि उन्होंने तुम्हारा उपहास किया है इसलिए उन्हें 14 वर्षों तक पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा करनी पड़ेगी। शुंख भरत के रूप में और चक्र शत्रुघ्न (भगवान राम के भाई) के रूप में पृथ्वी पर पैदा होंगे और तुम्हारी (राम की पादुका के रूप में) 14 वर्षों तक पूजा करनी पड़ेगी। तब ही उनकी समझ में तुम्हारी महत्ता आएगी।''

हमें यह समझना चाहिए कि प्रबुद्ध स्वामियों को अनुचरों को कई कर्तव्य होते हैं। हर एक की अपनी ज़रूरत है, महत्ता है। यदि हम भेदभाव से उन्हें देखेंगे तो समस्या पैदा हो जाएगी, क्योंकि कभी ज़ाहिरी रूप से महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को किसी अमहत्त्वपूर्ण व्यक्ति को सामने झुकना पड़ सकता है।

वैसे इस कहानी का मर्म है-चूंकि शंख और चक्र ने 'मैं-मैं' के आधार पर बात की, उन्हें नीचा दिखना पड़ा और चूंकि पादुकाओं ने 'तुम-तुम-तुम' का भाव रखा, उनकी पूजा हुई। विष्णु ने पादुकाओं को वरदान देते हुए कहा-''अब शंख और चक्र तुम्हारी आराधना करके ही मुक्ति पाएंगे। इसके बाद वे इस तरह तुम्हारा उपहास नहीं कर पाएंगे।''

हमारा निर्णात्मक भाव ही तय करता है कि हम कब दैवी और कब आसुरी वृत्ति के होते हैं। इसको तय करने को एक कसौटी है-'मैं-मैं' करने वाला आसुरी वृत्ति वाला और 'तुम-तुम' करने वाला दैवी वृत्ति का होता है।

तुम दैवी हो या आसुरी ( वृत्ति ) के?

अब एक और महत्वपूर्ण बिन्दु आ गया है। इतना कुछ 'तुम' और 'मेरे' भावों के बारे में सूनकर, स्वाभाविक है कि आपके मन में प्रश्न आए-''स्वामी जी! मैं नहीं जानता कि मेरे निर्णय 'मैं' पर आधारित होते हैं या 'तुम' पर? मैं स्वयं भी जानना चाहता हूं कि मैं 'असुर' हूं या 'देव' (वृत्ति के अनुसार)? कृपया मेरा मार्गदर्शन करें। मेरे काम करने का ढंग कौन-सी वृत्ति प्रकट करता है?''

मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि आपके मन में जैसे ही यह प्रश्न उठते हैं तो आप समझ लीजिए कि आपको दैवी वृत्ति है। वह व्यक्ति जो अपने मन के भीतर देखने का साहस कर सकता है, सदा सही ढंग से ही जीवन जीता है। मात्र वही व्यक्ति आसुरी वृत्ति वाला होता है जो घमंडी होता है क्योंकि उसे परवाह ही नहीं होती, यह जानने को कि वह गलत है या सही। वह तो सदा अपने को सही ही समझता है।

अर्जुन को भी यही भय था-''भगवान! मैं दैवी वृत्ति में जी रहा हूं या आसरी वृत्ति में?'' यद्यपि वह यह संशय व्यक्त नहीं कर रहा, उसके चेहरे से यह स्पष्ट है।

अब भगवान कृष्ण उसे समझाते हैं कि गुणातीत रूप में जीना सीखो अर्थात् 'तुम' भाव से प्रेरित रहो-तभी मुक्ति या प्रबोधन प्राप्त होगा. जिसे नि:वति भी कहते हैं। 'मैं' भाव में जीने पर हम काफ़ी बंधन पैदा कर लेते हैं आसरी गुण बंधन पैदा करते हैं जिन्हें प्रवृत्ति भी कहते हैं।

भगवान अर्जन को आश्वस्त करते हैं कि वह (अर्जन) दैवी गणों के साथ पैदा हुआ है। ये गुण उसमें जन्मजात हैं।

यदि कभी हमारे अंदर यह जानने की चाह उठे कि हम 'मैं' भाव से प्रेरित काम करते हैं या 'तुम' भाव से; यदि हमें मानसिक कष्ट मिला हो किसी भय या अपराध बोध के कारण तो यह स्पष्ट समझ लें कि हम दैवी वृत्ति के साथ पैदा हुए हैं, लेकिन इसके बरअक्स यदि हम समझते हैं कि हम सही प्रकार से जीवन-यापन कर रहे हैं और हम यहां (इस प्रवचन में) इसलिए आए हैं क्योंकि कोई मन बहलाव का साधन उपलब्ध नहीं था और हमने सोचा-" चलो देख लें ये भी क्या कहते हैं"-यदि यही हमारा व्यवहार था तो हमारी स्पष्ट समझ आ जाएगा कि हमारी वृत्ति कैसी है।

जब हम अपनी प्रकृति का बार-बार आकलन करना चाहते हैं और स्वयं से पछते हैं-" क्या मेरी आसूरी वृत्ति है? क्या यही मेरी प्रकृति है?" क्या हम अपनी वृत्ति विश्लेषण बार-बार करना चाहते हैं तो समझ लें कि अर्जुन भी इसी दौर से गुजर रहा है। हम सभी दैवी गुणों के साथ ही पैदा होते हैं। यदि इन गुणों के बारे में सुनकर आपको अपनी वृत्ति के बारे में कोई शक पैदा होता है तो निश्चित समझ लें कि आपकी दैवी वृत्ति ही है। फिर आपको आगे सोचने या चिंतित होने की जरूरत नहीं रह जाती।

जब कोई धर्म-प्राण व्यक्ति इन बातों को सुनता है तो वह अपनी प्रकृति भी जानने को उत्सुक होगा, लेकिन अधर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति सोचेगा-''यह स्वामी बार-बार इन्हीं गुणों का जिक्र करता है-मानो यह सब गुण इसमें हैं ही। देखें यह कैसे रहता है; क्या यह अपनी कथनी के अनुसार ही करनी भी करता है?'' यह समझ लें कि जो स्वयं में सुधार लाने का प्रयल करता है वह देवी वृत्ति का होता है क्योंकि आसुरी वृत्ति वाला कभी अपना नहीं वरन् दूसरों में सुधार लाने का प्रयत्न करता रहता है। आसुरी वृत्ति वाला 'छैनी-हथौड़ी' सदा दूसरों पर ही केंद्रित रखेगा, स्वयं पर नहीं, वह तो दैवी वृत्ति वाला करता है।

जब हम अपने में सुधार करते हैं तब हम ईश्वर हो जाते हैं। अपने मन के अंदर झांकना हमारी दैवी प्रकृति बताता है। अब अर्जुन परिपक्व हो चुका है; जब वह इन सत्यों को समझता है तो अपने अंदर झांकता है। तब भगवान श्रीमद्भगवत गीता

कृष्ण उसे आश्वस्त करते हैं कि वह दैवी वृत्ति के साथ जन्मा है।

कृष्ण उनं गुणों का जिक्र करते हैं जो 'मै-मैं-मैं-मैं' भाव के साथ जीवन बिताता है। मेरे विचार से इन्हें समझाने की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि यह गुण तो हममें होते ही हैं। इसी कारण तो हम कष्ट भोगते हैं। यह तो हमें प्रचुरता से उपलब्ध हैं-इन्हें क्या जानने की जरूरत है? हमें तो यह सीखने की दरकार है कि कैसे हम 'तुम-तुम-तुम' वाला भाव-व्यवहार विकसित करें।

जब हम 'तुम-तुम-तुम' भाव वाले व्यवहार के साथ जीवन-यापन करते हैं तो हम अपने को पूरी तरह भूल जाते हैं, क्योंकि हम परमात्मा में लीन और आनंद निर्माण रहते हैं।

मैं यहां आपको एक महत्त्वपूर्ण तरीका बताना चाहता हूं जिसका कृष्ण यहां जिक्र करते हैं। मात्र तीन दिन के लिए समझ लें कि आप स्वयं नहीं, कोई और हो। यह कुछ अजीब या बेतुका सुझाव लग रहा है न। यदि आप डॉक्टर हो तो समझ लो कि तीन दिन के लिए आप एक समुद्र तट पर घूमने वाले एक घुमक्कड़ व्यक्ति हैं। मतलब डॉक्टर के अलावा (जो आप हो) अपने को कुछ और ही तसव्वर कर लो। जैसे ही आप अपने बारे में ऐसे मूल परिवर्तन की कल्पना करते हो, आपके अंदर महती स्वतंत्रता का भाव उभरता है और आपका तनाव गायब हो जाता है।

जो साधक लोग संन्यास लेना चाहते हैं, उन्हें एक ध्यान प्रक्रिया से गुज़रना पडता है, जिसे 'भूत शरीर वास' कहते हैं। यानी अपने अतीत को पूरी तरह त्याग देते हैं। वे अपने मां-बाप का विधि-विधान से श्राद्ध करते हैं-भले ही उनको मां-बाप जीवित हों। यह इसलिए होता है कि यदि उस साधक के मां-बाप को मृत्यू उसके संन्यास लेने के बाद होती है तो उनका क्रिया-कर्म कौन करेगा? इसलिए वह साधक पहले ही उनका श्राद्ध कर लेता है। ये साधक अपना श्राद्ध भी कर लेते हैं क्योंकि उनके बाल-बच्चे तो होंगे नहीं तो उनका श्राद्ध कौन करेगा ?

श्राद्धोपरांत उन्हें अपनी सारी पहचान-अस्मिता गंवानी पड़ती है, वे अब डॉक्टर-इंजीनियर या वकील (या जो भी कुछ पहले रहे हों) नहीं रहते। अपनी पूर्व पहचान मिटाने को वे अपने पूरे शरीर पर पवित्र भस्म मल लेते हैं और भूत के समान गले में एक रुद्राक्ष माला डाल लेते हैं। फिर अपनी पहचान खोने का उत्सव मनाते हैं। जब पहचान पूरी तरह मिट जाती है तब दे भिक्षा मांगने जाते हैं। फिर अपनी पहचान को पूरी तरह मिटाने के पश्चात् वे अपनी नई पहचान (साधक या तपस्वी) को रूप में तीन दिन तक ध्यान करते हैं। जब ये इस ध्यान प्रक्रिया से अपनी पहचान को पूरी तरह तिरोहित कर गुजर जाते हैं, तब ही वे संन्यास के अधिकारी हो पाते हैं। यही पूरी प्रक्रिया 'भूत शरीर वास' कहलाती

आप भी तीन दिन तक यही ध्यान करें, अपने को कुछ और समझें. वह नहीं जो आप हैं। अपनी धन-संपत्ति समस्याओं, व्यावसायिक उलझनों, सबसे विमख हो जाओ। अपने बारे में कुछ सोचो ही मत। जो तीन दिन तक रूप रखो उसके बारे में ही ध्यान कोंद्रित रखो।

आप पाएंगे कि आप में एक नई चेतना का उद्भव हो रहा है। अपने 'मैं' भाव को निकालकर 'तुम' भाव को प्रश्रय दो। आपको असीमित आनंद का अनुभव होगा। जब 'मैं' भाव को अंदर से निकाल फेंकोंगे, तब आप शांति महसुस करोगे। जब 'तुम' भाव को प्रश्रय दोगे तब मन में आनंद की सुष्टि होगी। शांति और आनंद पाने का यह एक सीधा रास्ता है।

अपने ग्रह को कैसे बचाएं?

म 16.8 वे (आसुरी वृत्ति, वाले मनुष्य), कहा, करते, हैं, कि जगत, आश्रय, िका मार्ग बार । रहिती, सर्वथा असत्य और ईश्वर को बिना योगदान के, अपने आप ा कि में में केवल स्त्री-पुरुष को संयोग से उत्पन्न हुआ है, अतः केवल भोगों में से है। को लिए ही है।

न का 16.9 को इस प्रकार मिथ्या ज्ञान का आधार बनाकर जिनका स्वभाव नए हो मानवादी को जाता है तथा जिनको बुद्धि भी मंद है, वे सबका उपकार करने वाले क्रूर कर्मी मनुष्य केवल जगत का विनाश करने के लिए ही उत्पन्न होते हैं।

हमारे अंदर जो ऊर्जा हमें संचालित करती है वही ऊर्जा पूरे ब्रह्मांड को गतिज रखती है, इस सौर मंडल को भी तथा हमारे ग्रह पृथ्वी को भी।

कृष्ण कहते हैं कि जब हम इस ऊर्जा को पहचान नहीं पाते तो हम आसुरी वृत्ति को हो जाते हैं। हम यह विश्वास नहीं कर पाते कि यही ऊर्जा हर चीज को संचालित करती है और समझते हैं कि हमारे लालच (चाहत), वासना (कामना) और इच्छाओं के कारण सब कुछ घटित होता है। हमें गलतफहमी रहती है कि हम अपनी तुच्छ बुद्धि से, जिसे हम पाप बुद्धिमत्ता कहते हैं, सारी दुनिया को चलाते हैं।

जो लोग इस जगत को स्वत: घटित होने वाली रासायनिक क्रियाओं से संचालित समझते हैं, वे वास्तव में आसुरी वृत्ति के होते हैं। जब हम स्वाभाविक तौर पर यह समझते हैं कि यह पूरा विश्व एक अक्रियाशील पदार्थ से बना है, हम ज्यादा-से-ज्यादा इसको अपने कब्ज़े में रखना चाहते हैं, चाहे सही या गलत मार्ग से या किसी तरह भी। जब हम समझते हैं कि यह समस्त ब्रह्मांड में एक बुद्धिमत्ता (पूर्ण ऊर्जा) व्याप्त है, जो हमारे विचारों / क्रियाओं पर प्रतिसाद देती, है और हमारी क्रिया पर प्रतिक्रिया देती है, तब ही हम इसमें सही प्रकार से निवास कर पाते हैं।

एक लघु कथा है

वैज्ञानिकों को एक समूह को घमंड हो गया कि वे सब कुछ कर सकते हैं। उन्होंने ईश्वर को चुनौती दी-''अब आप फालतू हो गए हो, आपका कोई ही उन्हों है दुनिया में, क्योंकि आप जो भी कर सकते हो, वह हम भी कर सकते हैं। पृथ्वी पर आपकी बनाई हर चीज़, हम बना सकते हैं, एक मानव का पतिरूप भी। इसलिए अब आप तो जाओ और आराम करो।''

ईश्वर ने जब उन वैज्ञानिकों की कृतियां देखीं तो उन्हें ताज्जुब हुआ, बिल्कुल वैसी ही जैसी ईश्वर ने बनाई थी।

उन घमंडी वैज्ञानिकों ने ईश्वर से एक प्रतिस्पर्धा करने की ठानी-" आओ हमारा मुकाबला करो। जो तुम बनाओंगे उससे बेहतर वही चीज हम बनाएंगे।'' और प्रतियोगिता चालू हो गई। जो ईश्वर बनाए वही वैज्ञानिक बना दे, उससे भी बेहतर। अचानक ईश्वर ने थोड़ी धूल हाथ में ली और मनुष्य बना दिया।

वैज्ञानिक बोले-''यह तो कोई बड़ी बात नहीं, हमारे पास इसका 'कलोन' (प्रतिरूप) बनाने की योग्यता है।'' उन्होंने वही धूल ली और मानव प्रतिरूप बनाने ही वाले थे कि ईश्वर ने ऐतराज़ किया-"यह धूल मेरी है। इससे नहीं, अपनी धूल लेकर आओं, तब बनाओं।''

हम कुछ भी करें; विज्ञान भी उपलब्धि प्राप्त करे, उसमें दिव्यता ही उजागर होती है। यह ईश्वर और उसकी वैश्विक चेतना ही है जो समस्त ब्रह्मांड में गति प्रदान करती है। हम मनुष्य को धूल से बनाकर खड़ा तो कर सकते हैं, पर यह धूल कहां से आएगी? धूल तो हम नहीं बना सकते। यह तो ईश्वर की कृति ही होगी। यह ईश्वर और उसकी बुद्धिमान चेतना ही है जो समस्त ब्रह्मांड को आधार देती है।

जब कोई व्यक्ति अपनी बुद्धि और 'मैं' के मध्य रहता है, तब वह समग्रता का अनुभव नहीं कर सकता। उसे तो तर्क और गणित का ही ज्ञान होगा तथा अपने घमंड में डूबा यही समझता रहेगा कि वह सर्वज्ञ है।

कई युवा मेरे पास अपने मां-बाप के साथ आते हैं, जिन्हें उनके दुर्गुण मेरे पैरों पर साष्टांग होने के लिए जबरदस्ती करते हैं। मुझे कतई अच्छा नहीं लगता, जब कोई मेरे चरण-स्पर्श के लिए बाध्य किया जाता है। यदि ये युवा लोग चाहें तो वापिस जा भी सकते हैं, पर वे वहीं खड़े रहते हैं और ऐसे प्रश्न पूछते है-''मैं आपके चरणों पर क्यों झुकूं? मैं कहता हूं-''मैंने तो कहा नहीं ऐसा करने को। तुम क्यों यहां खडे हो और तर्क-वितर्क कर रहे हो?'' पर वे वहीं खड़े रहते हैं और दर्प में मुझसे तर्क करते हैं। मैं तो मन-ही-मन कहता हूं-''इनकी तो शादी हो जाती है।'' और सालभर के पश्चात् वे फिर आते हैं शादीशदा होकर, और अपने आप मेरे पैरों पर साष्टांग नमस्कार करते हैं, शायद एक ही साल में उन्हें समर्पण करना आ गया।

मानो दस वर्ष में जो सीखा जाना चाहिए वह शादी का एक वर्ष ही सिखा देता है। वे ही लोग जमीन पर साष्टांग हो जाते हैं और ध्यान से सुनते हैं प्रवचन को। अब वे विनम्र हो जाते हैं, कहते हैं-"हां स्वामी जी!" यानी वे 'हां' करने के मंत्र से भी वाकिफ हो चुके होते हैं।

आसूरी वृत्ति के लोगों को साथ यही होना चाहिए, इनकी शादी कर दो और आसुरी, गुण दुरुस्त तिरोहित हो जाएंगे। शायद इसीलिए भगवान ने शादी को प्रथा चलवाई है।

आसूरी गुण वाले लोग तो यही कहते हैं कि विश्व की उत्पत्ति काम-वासना एवं यौन-भाव के कारण होती है। पूरा ब्रह्मांड भी इन्हीं कारणों से उत्पत्ति में आता है।

वासना कभी कोई कारण नहीं बन सकती। बुद्धिमत्ता एवं दैवी ऊर्जा इस समस्त ब्रह्मांड के कारण और फल है, यही वह कारण और फल है जिससे यह ब्रह्मांड दैवी रहता है, लेकिन जब हम काम-वासना को इसकी उत्पत्ति का मूल कारण समझते हैं तो हम 'मैं-मैं-मैं' के प्रभाव में ही रहते हैं।

कृष्ण दृढता से कहते हैं कि जब हम इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति का मूल हम में (हमारी काम-वासनाएं) समझते हैं तो हम इतने उद्भ्रांत हो जाते हैं तथा अपनी अस्मिता के प्रभाव में इतने जकड़े रहते हैं कि हम स्वयं ही इस विश्व को नष्ट करने लगते हैं।

हमारे प्राचीन ऋषिगण कोई मूर्ख नहीं थे। वे जंगलों में इसलिए नहीं गए थे कि उनके पास जाने को और कोई जगह नहीं थी। कई तो उनमें से बडे राजा थे, इस ग्रह के शासक पर उन्होंने स्वयं हो सब कूछ त्याग दिया था, इसलिए, कि वे अपने होने का मूल कारण जानना चाहते थे। दुसरों की कही-लिखी बातें सुनना या उनके अनुभव समझना उनके लिए यथेष्ट नहीं था। वे स्वयं उस सत्य का अनुभव करना चाहते थे।

इसी प्रक्रिया में उन्होंने स्वयं को समझा और मुक्ति पाई। जो उन्होंने महसूस किया, वह एक अर्थ में बहत आसान था। जैसा कि कई हजार वर्षों में कई लोगों ने पाया, वही उन्होंने पाया था कि वे इस ब्रह्मांडीय सत्ता का एक अंश मात्र हैं। यानी उन्होंने पाया कि वे भी ईश्वर हैं, क्योंकि उनकी खोज़ थी कि जो ऊर्जा समस्त ब्रह्मांड का आधार है, वही उनकी प्रेरणा शक्ति है। उनका अनुभव था कि हर जीव का उत्स किसी-न-किसी ऊर्जा के स्रोत में है।

द्रम जिस वातावरण में रहते हैं, जो ऑक्सीजन हम खोंचते हैं या जो खाना-पीना हम इस धरती से प्राप्त करते हैं, उसका भी स्रोत वही ऊर्जा है। इसी को संस्कत में 'पंचभूत' कहा जाता है, यानी पांच मुल तत्वों की ऊर्जा जो हमें जीवंत रखती है। जब हम इस ऊर्जा को अपनी निम्न स्तरीय बद्धिमता द्वारा अपने म्वार्थ द्वारा नष्ट कर देते हैं तो यह जगत भी नष्ट हो जाता है।

श्रीमद्भगवत गीता

वस्तुत: जब हम पदार्थ पर ध्यान केंद्रित रखते हैं तो उसमें निहित ऊर्जा क की अनदेखी करने लगते हैं। जब आकार पर दृष्टि रहती है तो उस निराकार से ध्यान हट जाता है जो आकार का कारण बनता है। इन दोनों में जो स्थायी रहती है. वह तो निराकार ऊर्जा ही होती है और वही आकार और पदार्थ का भी उत्स होती है।

विज्ञान अब उस प्रश्न द्वारा बनाए आकार और पदार्थ आधारित उस सांचे से बहुत आगे बढ़ चुका है। अब यह सांचा प्रासंगिक भी नहीं रहा है। आइंस्टीन के जमाने से, जब पदार्थ और ऊर्जा में अनन्य संबंध खोजा गया था, विज्ञान की धारणाओं में काफ़ी परिवर्तन आ चुका है। आज तो विज्ञान हर तरह से स्वीकार करता है कि पदार्थ एवं ऊर्जा न सिर्फ एक साथ विद्यमान रह सकते हैं, वरन एक ही वस्तु को दृष्टा पदार्थ या ऊर्जा का अलग-अलग रूप या दोनों को एक ही समझ सकता है।

तो इस प्रकार हम लौटकर आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित उसी सिद्धांत पर आ गए हैं, जो कहता है कि दुष्टा तय करता है क्या चीज दुष्ट की जा रही है। हमें यह एक बेतूकी कल्पना लग सकती है, पर आज साइंस के सबसे उन्नत क्षेत्र 'क्वांटम फिजिक्स' में यह एक स्वीकृत सिद्धांत बन चुका है। मूलभूत सब एटोमिक पार्टिकल्स एक सी ही स्थिति में अलग-अलग दुष्टाओं को अलग-अलग रूप में दिख सकते हैं, पर अभी तक इसका कोई तार्किक स्पष्टीकरण नहीं प्राप्त हो पाया है।

पर हमारे प्राचीन ऋषियों ने स्पष्ट किया है कि ऐसा हमारे अनुकूलन के प्रभाव द्वारा घटित होता है, जो हमारी समझ को निर्धारित करता है। जब विज्ञान भी समुन्नत हो जाएगा तो वह भी यही सत्य स्वीकार करने लगेगा।

हमारे चारों ओर जो कुछ घटता है जो घटनाएं या वस्तुएं हमें दिखाई पड़ती हैं, उनको अलग-अलग रूप से देखा जा सकता है। यह देखने की समझ या प्रतीति हमारे संस्कार द्वारा निर्धारित अनुकूलन के कारण पैदा होती है।

एक पति-पत्नी का जोड़ा अपने बच्चों के साथ समुद्र तट की ओर जा रहे थे। मौसम काफी गर्म था तथा शाम हो रही थी। आगे खुली कार में एक युवा महिला थी। उसने उनकी ओर हाथ हिलाया – अभिवादन करने को।

पति-पत्नी को कुछ भी अजीब-सा नहीं लगा, पर पीछे की सीट से एक बच्चा बोला-''मॉम, डैड-होशियार रहें। इस महिला ने सीट-बेल्ट नहीं पहनी हुई है।''

हमारे अनुभवों के आधार पर हमारी समझ बदल जाती है। एक बच्चे की समझ निष्पाप और ऋणात्मकता विहीन होती है। वह पूरी तरह वस्तु परक रहती है।

श्रीमद्भगवत गीता

हम स्वयं को कैसे बचाएं?

16.10 वे देय, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी भी प्रकार से पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण कर और भ्रष्ट आचरणों को धारण कर संसार में विचरते हैं।

16.11, .12 तथा वे मृत्युपर्यंत रहने वाली असंख्य चिंताओं का आश्रय लिए सदा भोगों को भोगने में तत्पर रहते हैं और 'इतना ही आनंद है', इस मत को मानने वाले होते हैं। वे आशा की सैकडों फांसियों (मजबूत बंधनों) से बंधे हुए मनुष्य, काम-क्रोध को परायण होकर विषय-भोगों को लिए अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थों के संग्रह की चेष्टा में लिप्त रहते हैं।

कृष्ण जो यहां कहते हैं वह आज भी ज़्यादातर लोगों पर लागू होता है। अब वह वैदिककाल की शिक्षा-पद्धति तो नहीं है जिसमें बचपन से ही बालकों को आत्म-ज्ञान के लिए जागरूक किया जाता था। आज की विद्या तर्क, विज्ञान एवं कतिपय नियमों पर आधारित होती है, जिसमें आत्म-ज्ञान, धर्म इत्यादि पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।

जब हम 'मैं' या 'मेरी' भावना से सदा भावित रहते हैं तो हम 'मूलाधार' एवं 'स्वाधिष्ठान' चक्रों में ही फंसे रहते हैं। लालच और भय से संचालित हम सदा राग-विरागों से आक्रांत रहते हैं। हमारा हर काम स्वार्थ एवं अपवित्र भावों से संचालित होता है, जिसके परिणाम प्राय: हमें भ्रमित करने वाले ही होते हैं।

पिछले श्लोक में कृष्ण ने हमें स्पष्ट किया था कि कैसे आसुरी वृत्ति वाले लोग इस विश्व का विनाश कर सकते हैं। यहां वे बताते हैं कैसे ऐसा व्यक्ति स्वयं का ही नाश कर सकता है। अपने दर्प, घमंड और पाखंड के कारण ऐसा व्यक्ति अपने स्वार्थों और विषय-भोगों को लक्ष्यों को प्राप्त करने में उलझा रहता है, फलस्वरूप कष्ट पाता है।

है, पर जैसे-जैसे समय गुजरता जाता है, हमारे मन में अपराध-बोध, भय, घमंड, ढोंग, लालच, चिड़चिड़ापन इत्यादि भरने लगते हैं। फिर हमारी समझ इन ऋणात्मक भावों के कारण परिवर्तित होती जाती है।

जैसा कि मैंने पहले बताया, ज्यादातर मानव 'मूलाधार' चक्र द्वारा संचालित रहते हैं, इसलिए वे मूल जीवित रहने की जरूरतों से ऊपर नहीं उठ पाते। उनका सारा ध्यान जीवित रहने की प्रबल कामना या जिजीविषा पर ही केंद्रित रहता है. जिनके संचालक, क्रोध, लालच एवं भय आदि के भाव रहते हैं। इनके लिए तो हर चीज का अस्तित्व केवल भौतिक स्तर, पादार्थिक स्तर और स्वार्थ तक ही सीमित रहता है। यह तो पूरा व्यापार है उनके लिए।

कुछ लोग 'स्वाधिष्ठान चक्र' से संचालित रहते हैं तथा अपनी असुरक्षा भाव से ही बंधे रहते हैं। प्राय: आदमी 'मूलाधार' चक्र एवं औरतें 'स्वाधिष्ठान चक्र से संचालित रहती हैं, पर दोनों ही असंतोष से प्रदायक होते हैं, क्योंकि आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य से दोनों स्थितियां अवास्तविक रहती हैं। 'मूलाधार' चक्र बंधित कर्णल कल्पना में ही रहते हैं। हमारा जीवन मानो इसी चाह पर रहता ह है-'काश! ऐसा होता।' इस पर नहीं कि जो जैसा है उसका आनंद लिया जाए। यही कारण है कि हम सदा कष्ट भोगते हैं। यह ।

एक बार हम यह समझ लें कि जीवन कैसे बगैर कल्पनाओं को जिया जाता है तो हमें मृत्यु का भय नहीं रहेगा। तब सारे कष्ट और दयनीयता का भाव तिरोहित हो जाएगा और हम आसूरी वृत्ति से दैवी वृत्ति की ओर चलने लगेंगे। यहां भगवान कृष्ण इसी भाव को गहराई से समझाते हैं और एक बड़ी सारगर्भित बात कहते हैं।

कई लोग सुख-दु:ख में ही डूबे रहते हैं, जिसका अंत केवल मृत्यु के साथ ही होता है। कुछ लोगों के लिए तो इसका समापन तब भी नहीं होता। वे उस समय भी 'बीमा की रकम', 'चंदनी ताबूत' और 'संगमरमर की कब्र' को कल्पना करते रहते हैं, क्योंकि उनके लिए कामनाओं को पूर्ति ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य रहा है।

कई लोग मुझसे पूछते हैं-''स्वामी जी! कृष्ण गीता में कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व का अंतिम विचार अगले जन्म में हमारी योनि तय करता है। क्या हम कोई ऐसा तरीका अख्तियार कर सकते हैं कि मृत्यु पूर्व हमारे मन में कोई श्रेष्ठ विचार ही आए?"

में मानता हूं कि यह एक बड़ा व्यावहारिक प्रश्न है, पर दुर्भाग्यवश इसका कोई व्यावहारिक उत्तर नहीं है। संस्कृत में एक शब्द होता है 'वासना', जिसका संबंध हमारे मानसिक व्यवहार से होता है। यह वासना हमारे बचपन, कुछ को तो

जन्म से ही बनती रहती है और पूरे जीवन यह प्रक्रिया जारी रहती है। यह हमारे दिमाग का एकत्रित 'सॉफ्टवेयर' होता है, जो हमें संचालित करता है। यही हमारा 'ऑपरेशन सिस्टम' है-'माइक्रोसॉफ्ट-विस्ता' के समकक्ष है, यह हमारे मन के 'सॉफ्टवेयर' में।

'वासना' हमारे सारे मूल्यों और धारणाओं के आधार पर हमारा मानसिक व्यवहार तय करती है, जो हमारे सारे कर्मों का संचालनकर्ता है परंतु दुर्भाग्य से हमारी ये 'वासनाएं' और इनके प्रतिरूप हमारे 'संस्कार' हमारे अचेतन मस्तिष्क में छिपे रहते हैं, जिन तक हमारी सीधी पहुंच भी नहीं होती, इसलिए हम उनको निर्यात्रित भी नहीं कर सकते। यह समझें कि हमारी वासनाएं और संस्कार एक आँटो-पायलट प्लेन की तरह हमारे कर्मों को संचालित करते रहते हैं। जीवनभर, मृत्यू-पर्यंत वही हमारे नियंता रहते हैं।

अचेतन मन की स्वाभाविक वृत्ति है इंद्रियों के बोध पर सहज प्रतिक्रिया प्रदान करना। प्राय: हम चेतन रूप में ही अपना प्रतिसाद देते हैं, पर ज्यादातर समय हमारी प्रतिक्रिया, सहज वृत्ति पर आधारित होती है जो वासनाओं और संस्कारों द्वारा संचालित रहती है। इसमें हमारे चेतन और तर्कशील मन का कोई योगदान नहीं होता। इसलिए कृष्ण इस वृत्ति को आसुरी वृत्ति कहते हैं क्योंकि असुरों को वृत्ति इसी तरह काम करती है, वे प्रकृति के साथ ही बहते हैं पर मानवों की प्रकृति सहज-वृत्ति नहीं है। मानव चेतना तो अंतर्प्रज्ञा के स्तर तक उठ सकती है, जिसमें जागरुकता को कारण कर्म-बहलता रहती हैं यही दैवी चेतना का संभावित स्तर है जो हम सब में निहित रहती है, लेकिन ज़्यादातर लोगों को अंतर्प्रज्ञा के या महाचेतना के स्तर तक उठने के बजाय अचेतन की सहज वृत्ति के स्तर पर ढुलकना ज्यादा आसान लगता है, नीचे गिरना आसान होता है बजाय ऊपर उठने के।

इसलिए ही हम सुख की ओर भागते हैं और दु:ख-पीड़ा से दूर भागना चाहते हैं। हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति करना चाहते हैं और धन सुविधा एकत्रित करने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं या कोई काम कर सकते हैं भले ही वह निम्नतम स्तर से भी संदिग्ध हो। कृष्ण कहते हैं कि हमारे मृत्युपर्यंत यह प्रक्रिया चालू रहती है। यदि हम समझते हैं कि सारी ज़िंदगी तो हम सुख-सुविधा को पीछे भागते रहे हैं और अंत में हमारे मन में कोई दिव्य विचार आ जाएगा तो यह हमारी सबसे मूर्खतापूर्ण कपोल-कल्पना होगी।

श्रीमदुभगवत गीता

इंद्रियों का जाल

  • 16.13 वे सोचा करते हैं कि " आज मैंने यह प्राप्त कर लिया और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूंगा; (या) मेरे पास इतना धन है और (फिर) इतना हो जाएगा।''
  • 16.14 "वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और अब मैं दूसरे शत्रुओं को भी मार डालूंगा। मैं (स्वयं) ईश्वर हूं और ऐश्वर्य भोगने वाला हूं। मैं सब सिद्धियों से युक्त हूं तथा बलवान और सुखी हूं।
  • 16.15 "मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूं। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूंगा, दान दूंगा और खूब आमोद-प्रमोद करूंगा''-इस प्रकार अज्ञान से मोहित होने वाले (ये लोग) कड़वे रहते हैं। 16.16 अनेक प्रकार से भ्रमित हुए चित्त वाले वे अज्ञानीजन, मोहजाल में फंसे हुए एवं विषय-भोगों में अत्यंत आसक्त हुए यहां अपवित्र नरक में गिरते हैं।

कृष्ण आसानी ने छोड़ने वाले नहीं हैं। वे अर्जन को व उसके माध्यम से समस्त मानवता को यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि अहमन्यता का भाव कितनी गहराई से मानव के मन को आहत करता है।

अपने एक भाष्य में शंकराचार्य ने 'आहार' को समस्त इंद्रियों से प्राप्त बोध बताया है जबकि पारंपरिक तौर पर आहार का अर्थ भोजन होता है। भोजन का अर्थ यानी मुंह द्वारा भक्षण की जाने वाली चीज। इसी के आधार पर भौतिक शरीर जीवंत और वृद्धिशील रहता है। अधिकतर लोग केवल खाने के लिए ही जीते हैं जबकि बहुत कम लोग यह समझते हैं कि उतना ही खाया जाए, जिससे जीवन चलता रहे या जीते रहने के लिए जो जरूरी है।

हर इंद्रिय का अपना 'आहार' होता है, जिसके दम पर वह जीती रहती है। इसी इंद्रिय बोध-आंख, कान, जिह्वा, नाक और त्वचा को स्पर्श द्वारा हमारी कामनाएं उत्पन्न होती हैं जो इनको हमारे शरीर-मन तंत्र तक ले जाकर बताती हैं कि हमें क्या चाहिए। ऋषि पतंजलि अपने 'अष्टांग योग' में यही बताते हैं कि

कैसे इन इंद्रियों का नियंत्रण कर अपनी इच्छाओं पर काबू पाया जाए, जिसे वे 'प्रत्याहार' की संज्ञा देते हैं।

'प्रत्याहार' का अर्थ इंद्रियों का दमन नहीं है; इसमें इंद्रियों को भरवा नहीं मारा जाता. जैसे कि हमें उतना ही खाना चाहिए कि हम जीते रहें. उसी प्रकार इन इंद्रियों को उतना ही आहार मिले कि वे कुशलता से काम करती रहें. पर इस इंद्रिय-बोध पर इतना नियंत्रण तो किया ही जा सकता है कि वे हमारी कपोल-कल्पनाओं पर एक अंकुश लगा सकें।

एक औसत आदमी अपनी इंद्रियों को बोध द्वारा ही संचालित होता है, वह अपनी इंद्रियों का स्वयं मार्गदर्शन नहीं करता। उसकी कामेंद्रियां जो उसके चलने-फिरने का काम करती हैं. इन्हीं जान-इंद्रियों द्वारा नियंत्रित होती हैं. पर इनमें चेतन मस्तिष्क से कोई संदेश नहीं लिया जाता। अपनी सहज वृत्ति द्वारा वे द :ख-पीडा से बचती रहती हैं और सुख का स्वागत करती हैं।

एक लघु कथा

दो मित्र रास्ते में मिले। एक इतना दू:खी लग रहा था कि रोने ही वाला हो। दूसरे ने उससे पुछा-"क्या बात है मित्र! इतने दु:खी क्यों हो?"

"मेरे चाचा की तीन सप्ताह पहले मृत्यू हो गई। वे मेरे लिए 50,000 डॉलर्स छोड़कर गए हैं।''

" अच्छा तो है।" दुसरा बोला

पहला मित्र फिर बोला-''दो सप्ताह पहले मेरे एक रिश्तेदार मरे, वे मेरे लिए 90.000 डॉलर्स छोडकर गए।"

" अरे वाह! बढिया ... बहुत अच्छा" दुसरा बोला।

पहला मित्र-''पिछले सप्ताह ही मेरे दादा जी गुजर गए। वे तो मेरे लिए 10 लाख डॉलर्स छोड गए हैं।''

दूसरा मित्र-''अरे वाह! तो फिर तु इतना दु:खी क्यों है?''

पहला मित्र-"पर इस सप्ताह कोई नहीं मरा।"

यह समझ लें कि एक बार हम अपने मन को यदि इंद्रियों द्वारा संचालित होने देंगे तो यह सिलसिला कभी रुकने वाला नहीं है। इसलिए हम अपनी कपोल-कल्पनाएं चलाते रहते हैं। हम कल्पना करते हैं बड़ी सारी दौलत इकट्ठी करने की। दुर्भाग्यवश धन-दौलत को इकट्ठे करने का उद्देश्य कभी इनका भोग नहीं हो पाता। ज्यादातर मामलों में इनको एकत्रित करने का जोश ही एकमात्र उद्देश्य बनकर रह जाता है, इनको भोगने या आनंद उठाने का उद्देश्य रहता ही नहीं है। एकमात्र लक्ष्य होता है कि हमारे पास इतनी दौलत हो, जितनी किसी और के पास न हो। जैसे

कष्ट में डालना

16.17 वे अपने आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमंडी पुरुष धन और मान के मद से युक्त, शास्त्र विधि से रहित केवल नाम मात्र को यज्ञों द्वारा पाखंड से भजन करते हैं। वे अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोधादि के परायण और 16.18 दूसरों की निंदा करने वाले पूरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अंतर्यामी से (भी) द्वेष करने वाले होते हैं। ऐसे (उन) द्वेष करने वाले पापाचारियों और क्रूरकर्मी नराधमों को 16.19 बार-बार मैं संसार में आसरी योनियों में ही गिराता हूं ( अर्थात शुकर-कुक्र जैसे नीच योनियों में ही उत्पन्न करता हूं)। हे कौन्तेय! इसलिए वे मूढ़ पुरुष जन्म-जन्मांतर तक आसुरी योनि 16.20 को प्राप्त, मुझको न प्राप्त होकर उससे भी (अर्थात पहले वाली योनि से भी) अति नीच गति को प्राप्त होते हैं और घोर नरकों में पडते हैं।

कृष्ण ने कई पहले के श्लोकों में कहा था कि वह सभी का करुणापूर्वक स्वागत करते हैं और उनका उद्धार करते हैं। यहां वे कहते हैं कि मैं उन्हें पीड़ा-कष्ट या नरक में डाल देता हूं। ये दोनों उक्तियां विरोधाभासी हैं. इनमें सामंजस्य कैसे बिठाया जाए? पर हैं दोनों ही स्थितियां सत्य। प्रबुद्ध स्वामी के मुंह से निकला हुआ हर शब्द सत्य होता है। यह तो हमारी समझ ही है जिसे कछ संधारना पडेगा।

कृष्ण तो करुणावतार है। जो उनके सामने आत्म-समर्पण करता है, उनका उद्धार हो जाता है; वह मुक्त हो जाता है। यह एक पूर्ण एवं अखंड सत्य है। समस्या तो यह है कि हम सब समर्पण का ढोंग करते हैं। जो हम कहते हैं वह मात्र शब्द से ज्यादा कुछ नहीं होता। हमारे विचारों और शब्दों में कोई साक्य नहीं होता; हमारी करनी और शब्द असंगत ही रहते हैं।

ही हमारे पड़ोसी ने नया एयरकंडीशनर खरीदा कि हमारे घर का पारा बढ़ जाता है. जैसे ही हमारे दोस्त ने नई कार खरीदी कि हमारी अच्छी-खासी चलती हुई कार 'खटारा' हो जाती है। यदि हमारी सहेली ने नए काट के जते पहने कि हमारे जते जो कल तक आरामदेह थे. हमें काटने लगते हैं।

वस्तत: हमारे संचालक, हमारी तलनात्मक दुष्टि और ईर्ष्या होती है। हम अपनी जरूरतें पूरी नहीं करना चाहते, वरन दूसरों द्वारा प्रदत्त अपने अभावों और कामनाओं की पूर्ति चाहते हैं। बचपन से हमें सिखाया गया है कि चीजों को हथिया लो, क्योंकि जो हमारे पास है वह कभी काफी नहीं होता। हमारी किसी से 'पूर' नहीं पड़ती। मुत्यू तक लालच हमें घसीटता रहता है।

उधर, ईश्वर हमारी सारी जरूरतें पूरी करने के लिए आतर बैठा है. पर समस्या यही है कि हम समझ ही नहीं पाते कि हमारी क्या जरूरत है। हम सदा अपनी इंद्रियों द्वारा प्रदत्त कल्पनाओं के जाल में उलझे रहते हैं और दूसरों की चीजों पर लालच की दृष्टि से देखते रहते हैं। हम जान ही नहीं पाते कि हमें क्या चाहिए। यानी हमारी इंद्रिया हमें लगातार संचालित करती रहती हैं। हमारे कई प्रोग्रामों को करने के पश्चात और मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होने के बाद ये लोग लगातार ध्यान लगाकर यही जागरुकता प्राप्त करते हैं कि वे आखिर कौन हैं। उन्हें क्या चाहिए? तब उनकी कछ समझ में आता है कि उनकी असली जरूरत क्या है। वे समझते हैं कि खाली आमादों के पीछे भागने से कुछ नहीं मिलने वाला। उनकी जो जरूरत है वह उनके पास स्वय आएगी। उनकी जरूरतें उनका अनुसरण करती हैं।

हमारे शरीर-मन तंत्र में वह ऊर्जा होती है जो इन डच्छाओं/कामनाओं की पति कर सके. जिनके साथ हम उत्पन्न हुए थे। महावीर और अन्य बड़े स्वामीगणों का कहना है कि प्रकृति जब हमें दनिया में लाती है तो पहले ही यह सनिश्चित कर लेती है कि जो हमें चाहिए वह उपलब्ध हो, हमारी वास्तविक जरूरतें परी हो जाएं. पर हम अलग से अपनी इच्छाएं और अभाव पैदा करते रहते हैं जो हम दूसरों से उधार लेते हैं. वे हमारी असली जरूरतें होती ही नहीं।

एक बार हम 'मैं' के भाव यानी आसरी वृत्ति से 'तुम' के भाव यानी देवी वृत्ति की ओर बढ़ जाएं तो फिर हम धन-दौलत एकत्रित करने के चक्कर मे पडेंगे ही नहीं। न हम अपने को एक शक्तिशाली आधार देने का प्रयास करेंगे या संबंधों को स्थापित करने की जद्दोजहद करेंगे। हम उन सब परेशानियों से दर हो जाएंगे जो अभी तक हमारे ध्यान का केंद्र रही थीं। ईश्वर स्वयं उनका ख्याल करेगा जो हमारी वास्तविक जरूरतें हैं।

लेकिन यदि हम स्वार्थ पर 'मैं' पर केंद्रित रहेंगे तो हम तो और नीचे गिरते जाएंगे. यानी वहां गिरेंगे जिसे कष्ण 'नरक' कहते हैं।

लोग मेरे पास आकर प्राय: कहते हैं-"स्वामी जी! मैं स्वयं को आपको समर्पित करना चाहता हूं। मेरी सहायता करें और कष्टों से त्राण दें।'' लेकिन जब मैं उनसे मेडीटेशन प्रोग्राम में भाग लेने के लिए कहता हूं तो वे कहते हैं कि वह अपनी 'एपाइंटमेंट बुक' में देखकर बताएंगे। तब भी उन्हें गलतफहमी रहती है। कि उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है।

लोग यह भी कहते हैं-''स्वामी जी! आप कहते हैं कि विज़ुअलाईजेशन (मानसिक दृश्यावलोकन) से काफी सुकून मिलता है। कई बार हमने प्रयल किया पर कुछ नहीं हुआ।''

कुछ नहीं हो पाता क्योंकि हम स्वयं विरोधाभासों से पूर्ण रहते हैं। यदि हमें कमर के दर्द से छूटकारा पाना है तो हमारा बार-बार कहना-"कमर का दर्द। गायब हो जा।'' से कुछ नहीं होगा, क्योंकि जब-जब भी हम 'कमर दर्द' का उच्चारण करते हैं तो हमारा मन इससे और जकड़ता जाता है। यदि हमें कमर दर्द से मुक्ति पानी है तो हमें अच्छे स्वास्थ्य का दुश्यावलोकन करना चाहिए, कमर-दर्द का नहीं। यह महसूस करें कि हम पूरे स्वस्थ हैं।

जब हम कृष्ण को स्वयं को समर्पित करें तो हमारा समर्पण संपूर्ण होना चाहिए। हमारे और उनके बीच में कोई आड़ या व्यवधान नहीं होना चाहिए। हमें स्वयं को कृष्ण चेतना में लीन कर देना चाहिए।

यहां वे उन लोगों के बारे में जिक्र करते हैं जिन्हें उनको आत्म-समर्पण करने की कोई जरूरत नहीं होती। ये लोग तो इतने अहमवादी होते हैं कि वे स्वयं भगवान को ही अपना प्रतिस्पर्धी मान लेते हैं। वे (कृष्ण) कहते हैं कि वे उन्हें विषय-भोग वाले विश्व में डाल देंगे। इस पादार्थिक विश्व में वे अपनी इंद्रियों को गुलाम होकर तब तक विषय-रस भोग सकते हैं जब तक कि मौत न आ जाए। जैसा मैंने पहले कहा, यह निर्णय तो हमारा होता है। कृष्ण भी इसमें कोई परिवर्तन नहीं ला सकते, क्योंकि उन्होंने इसके परिवर्तन का काम हमारी ब्रद्धिमत्ता को प्रदान कर रखा है। यह निर्णय कि हम 'मैं' भाव से या 'तुम' भाव से प्रेरित रहें, दैवी या आसुरी भाव से भरे रहें, उन्होंने हमें ही दे रखा है।

यदि भक्ति और समर्पण का भाव रहेगा तो हमारी (चेतना में) वृद्धि होगी। हम अपने गुरु या स्वामी (ईश्वर) को प्रति प्रेम में वृद्धि प्राप्त करते रहेंगे। हम में से ज्यादातर ईश्वर को एक व्यक्ति रूप ही समझते हैं, जब हम उनकी प्रार्थना या पूजा करते हैं। हम समझते हैं कि ईश्वर एक तीसरा व्यक्ति है, लेकिन वह 'हम' नहीं हैं। प्रार्थना और आराधना तो उन तक पहुंचने का एक माध्यम है, पर

जैसे ही हम उनके व्यक्ति रूप को त्याग देते हैं, प्रार्थना का भाव विलप्त हो जाता है। तब ध्यान लगाना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।

प्रार्थना में हम ईश्वर की आराधना करते हैं जबकि ध्यान में हम स्वयं ही ईश्वर हो जाते हैं। आराधना करना ज़्यादा आसान है क्योंकि यह बाहरी अभिव्यक्ति है, बाहर को ओर ध्यान केंद्रित करना हमारे लिए आदत का काम है। इसके हम अभ्यस्त होते हैं, पर अंतर्मुखी होना मुश्किल होता है, खासतौर पर उनके लिए जिनकी शिक्षा तर्कपूर्ण माध्यम से हुई है। इसी कारण पश्चिम में ध्यान करना कभी धर्म का मुख्य आधार नहीं हो पाया, पर पूर्व में सारे ही बड़े स्वामी गणों या ऋषियों ने अपनी सीख का आधार ध्यान लगाना ही रखा। वे सदा अपने शिष्यों से यही कहते रहे कि अंतर्मुखी बनो, अर्थात् उन्होंने अपने शिष्यों को बताया कि ईश्वर की प्रार्थना ही मत करो. स्वयं ईश्वर बनो।

यह ध्यान करना हो है जो हमें पूर्ण समर्पण तक पहुंचा सकता है। ध्यान लगाना अर्थात जागरुकता प्राप्त करना। जागरुकता यानी यह समझना कि हम और विश्व एक ही हैं। इसलिए यह 'तुम' पर केंद्रित है बजाय 'मुझ' पर। 'तुम का भाव 'मैं' की अस्मिता को तो गायब कर देता है। जब 'मैं' विलीन हो जाए, वही तो असली समर्पण है।

कृष्ण इस अध्याय में यही सब बताते हैं। 'मैं' के भाव से 'तुम' के भाव तक पहुंचना साहस की दरकार मांगता है. क्योंकि इसी साहस से हम दसरे (ईश्वर) के सामने परे भरोसे और प्रेम से संपर्ण समर्पण कर देते हैं और जब ऐसा होता है तो सिवाय 'उसके' (ईश्वर के) कुछ नहीं रहता। तब हम स्वयं कृष्ण बन जाते हैं जब हम समस्त विश्व के साथ, कृष्ण के साथ एकात्म हो जाते हैं तो फिर कुछ और करने का रहता ही नहीं है। तब तो हम "THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM" प्राप्त कर लेते हैं. शाश्वत आनंद में लीन हो जाते हैं।

जब हम काम, क्रोध और लोभ त्याग देंगे तो मुक्त हो जाएंगे। रामकृष्ण बार-बार कहते हैं कि कंचन कामिनी को प्रति आकर्षण को त्याग दें तो हम मक्त हो सकते हैं। स्त्री के प्रति मोह और स्वर्ण को प्रति लालच ऐसी दो कामनाएं हैं जो सारे कष्टों का मूल हैं।

कष्ट से क्रोध की उत्पत्ति होती है, हमें गुस्सा आता है और यह चक्र चलता रहता है। जब ये तीनों-काम, क्रोध, लोभ जुड़ जाते हैं तो मोह पैदा होता है। कंचन व कामिनी में कोई स्थायित्व का सुख नहीं होता, क्योंकि इनसे कोई अजस्त आनंद नहीं मिल सकता। थोड़ी-बहुत देर तक तो मज़ा आ सकता है, उसके बाद तो हमें उनसे विष्णता प्राप्त होने लगती है।

एक स्तर पर तो ये तीनों इच्छा को समरूप हैं, काम, क्रोध, लोभ का ही रूप हैं। इच्छाएं तो ऊर्जा रूप होती हैं। काम भाव तो ज़रूरी है क्योंकि इसी से प्रजनन संभव होता है और योनि-जीव आदि की शुंखला चालू रहती है। लोभ तो हमारी जिजीविषा की एक बड़ी अभिव्यक्ति है। क्रोध से हम ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। इस प्रकार इन तीनों के धनात्मक परिणाम भी प्राप्त हो सकते हैं, परंतु कृष्ण इन तीनों भावाभिव्यक्तियों को आत्म-तुष्टि के संदर्भ में व्यक्त करते हैं। वे मानते हैं कि यह मूल संवेगों को तुष्टि है। असल में संवेगों की उच्चता या नीचता का सीधा संबंध उसके पीछे मंशा से होता है। यदि इन तीनों की अभिव्यक्ति 'मैं' भाव से है तो यह निम्न कोटि की ओर और आसूरी वृत्ति से भावित है। इसमें कोई उद्धार की गुंजाइश ही नहीं रहती।

कामना (जो काम का मूल भाव है) यदि नि:स्वार्थ संदर्भ में व्यक्त को जाए अर्थात् पूरी अनासक्ति के साथ तो इसका मूल भाव बदल भी सकता है। तब उसमें से वासनात्मक भाव तिरोहित हो जाता है तथा उसकी जगह करुणा और दूसरों का ख्याल आ सकता है। स्वामी रामकृष्ण को लिए हर स्त्री - मय उनकी पत्नी सहित 'माता' रूप ही थी। उनकी पवित्रता और भक्ति इस दर्जे की हो चुकी थी। बेशक, ऐसे लोग अपवाद हो हैं और नितांत दुल्लभ हैं।

कामनाओं का एक रूप वासना में स्पष्ट होता है। अनंत इच्छा लालच देती है। जब कोई कामना पूरी तरह संतुष्ट हो जाती है तो फिर वह हम से दूर हो जाती है। कर्म में उन अपूर्ण कामनाओं का जमावड़ा होता है जो हमें करने के लिए प्रेरित करती हैं, पर हम अपनी सारी इच्छाएं पूरी नहीं कर सकते क्योंकि इनमें से कई हमारी अपनी इच्छाएं नहीं होतीं। ये तो हमने दूसरों से उधार ली हैं यथा-और बड़ा घर, और महंगी कार या और युवा पत्नी, हमारे अन्य रिश्तेदारों की कार, घर, पत्नी की तुलना में प्राप्त ये दूसरों की इच्छाएं हैं जो हम 'उधार' ले लेते हैं।

स्वर्ण और स्त्री (कंचन और कामिनी)

16.21 काम, क्रोध तथा लोभ ये आत्मा का नाश करने वाले हैं; उसको अधोगति में ले जाने वाले तीन प्रकार को नरक को द्वार हैं; इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

16.22 हे कौन्तेय! इन तीनों नरकों को द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है, इससे वह परमगति को जाता है अर्थात् मुझको प्राप्त होता है।

16.23 किन्तु जो पुरुष शास्त्र को विधि त्यागकर मनमाने स्वभाव से बर्ताव करता है, उसे न सिद्धि, न सुख और न परमगति ही प्राप्त होती है।

16.24 इस कारण तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य को व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म हो करने के योग्य है (अर्थात् तुझे शास्त्र सम्मत कर्म हो करना चाहिए)।

कृष्ण इस अध्याय का समापन एक मशविरे से करते हैं। क्रोध, काम (वासना) और लोभ (लालच) को त्याग दें तो हम सभी सुरक्षित हो जाएंगे। वे कहते हैं कि ये तीनों नरक के द्वार हैं।

यही वे गुण या भाव हैं जो मूलाधार चक्र में बंधे रहते हैं। यही वे भाव हैं जो हमें 'मैं' और 'मेरे' से बांधते हैं। हम भ्रांति में यह समझते हैं कि इस पृथ्वी पर रहने को लिए हममें हमारे परम आवश्यक गुण हैं। इससे ज़्यादा बड़ी भ्रांति

जब तक हम काम, क्रोध और लोभ से बंधे रहेंगे, जिन्हें कृष्ण नरक के द्वार बताते हैं, हम सदैव बंधन में पड़े रहेंगे, अर्थात् कष्ट पाते रहेंगे। तब मरने के बाद हमें नरक में जाने की क्या ज़रूरत है, जब यहीं हम हर दिन नरक की

श्रद्धात्रय विभाग योग डेमानदारी : मक्कि का सीधा रास्ता

जीना अर्थात सत्य के साथ प्रयोग करना; सत्य के साथ प्रयोग के लिए साहस रखना; यह समझना कि श्रवण और मनन से सत्य समझा जा सकता है - निर्श्यक है; सत्य की समझ को साहस के साथ जीवन में उतारना च

यदि इन्हें हम पा भी लें तो संतोष मात्र क्षण-स्थायी ही रहेगा। कभी पूर्ण-संतोष मिल ही नहीं सकता। हर ऐसी इच्छा कष्ट का बीज बोती है। इसलिए कृष्ण इनको नरक का द्वार कहते हैं, पर इन इच्छाओं से पिंड कैसे छुड़ाया जाए? यही हम अपने प्रोग्राम 'लाइफ़ बिल्स प्रोग्राम' के द्वितीय स्तर पर सिखाते हैं। इसे 'एनएसपी या "THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM" स्फुरण प्रोग्राम' कहते हैं। इसमें हम साधक को सहायता करते हैं कि वह अपनी मूल या असली इच्छाएं पहचानें, यानी उनको जिनसे हमारा प्राख्य कर्म बंधा है और जिनको पूरा करने को हम इस विश्व में आते हैं। वे हमारी असली ज़रूरतें बनाती हैं, उधार मांगी इच्छाएं नहीं। हमारे पास यथोचित ऊर्जा है उसकी प्रति कर उनसे मुक्त होने की, जिनके करने के बाद हमारा कर्म विगलित हो जाता है।

िया यह 'एनएसपी कोर्स' हमें ऋणात्मताओं से मुक्त करता है। इस प्रोग्राम को करने वाले बाद में न किसी से नफ़रत करते हैं, न किसी को नापसंद करते हैं। इनमें 'मैं' पल्लवित होकर 'तुम' को रूप में आ जाता है, बिना किसी प्रयास को।

। इस स्थिति में हम क्रोध का भी त्याग कर देते हैं। वस्तुत: क्रोध और अपराध-बोध तो कामनाओं के 'बाई प्रोडक्ट्स' ही हैं। जब हमें मनचाही चीज़ नहीं मिलती तो हम क्रोधित हो जाते हैं। क्रोध से अपराध-बोध जागृत होता है। किसी व्यक्ति पर अपना क्रोध केंद्रित करना बेमानी है, क्योंकि उस व्यक्ति को ओर भेजी गई अधिकतर ऋणात्मकता वापिस हमारे पा ही आ जाती है। यह हमारे क्रोध को खाली कर देती है। वस्तुत: क्रोध और अपराध-बोध अपनी अकर्मण्यता या कुछ न कर पाने के कारण ही पैदा होता है। यह आत्म-केंद्रित भाव है जो व्यक्ति की कमजोरी या अक्षमता दर्शाती है।

इन मामलों में क्रोध को दबाना कारगर सिद्ध नहीं होता। यह वमन तरह-तरह को रोग पैदा कर सकता है, दोर्घकालीन रोग यथा कैंसर, लेकिन यदि हम क्रोध के भाव को बज़ाय किसी व्यक्ति के, किसी मुद्दे पर केंद्रित करते हैं तो वह कोई कमज़ोरी न रहकर एक प्रकार की ऊर्जा बन जाता है। क्रोध को िकर्म हित एक धनात्मक ऊर्जा बनाना जरूरी है, बज़ाय इसके दमन के। तब यह ऋणात्मकता धनात्मकता का रूप ले लेती है।

कृष्ण यहां यही बताते हैं कि काम, क्रोध व लोभ जैसे ऋणात्मक भावों को कैसे धनात्मक ऊर्जाओं में परिवर्तित किया जा सकता है। वे कहते हैं कि जब तक हम 'मैं' को भाव से भावित रहेंगे, तब तक ये तीनों हमारे लिए नरक के द्वार हैं। जब इन्हें हम 'तुम' के भाव में परिवर्तित कर देते हैं तो यही भाव हमारे लिए स्वर्ग के द्वार खोल देते हैं। इस प्रकार एक योग-शास्त्र 'भगवत् गीता' नामक उपनिषद का षोडश अध्याय, 'दैवासुर सम्पद्विविभाग योग:' संपन्न होता है, जिसमें परमात्मा के विषय पर श्रीकृष्ण और अर्जून को मध्य संवाद होता है।

श्रीमद्भगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

यहां कृष्ण अपना सारा ज़ोर श्रद्धा पर ही लगाते हैं। अपनी सीख के 16 अध्याय देने के बाद उनको पास कुछ नया जोड़ने को तो बचा ही नहीं है। जो कुछ भी उन्हें कहना था, वह वे कह चुके हैं। उन्होंने ऊर्जा की सातों सतहों को विस्तार से समझा दिया है। अब तो वह सिर्फ़ श्रद्धा या ईमानदारी पर ही ज़ोर देते हैं

श्रद्धा का अर्थ है वह विश्वास जिसके साथ साहस भी होता है-सत्य के साथ प्रयोग करने का अर्थात् श्रद्धा वह विश्वास है जो साहस के साथ अपनी मान्यताओं का भी प्रयोग कर सके। श्रद्धा से हम कभी असफल नहीं होते। यह समझ लें कि केवल विश्वास रखने से हम असफल भी हो सकते हैं। यदि विश्वास को साथ अपनी मान्यताओं को प्रयोग करने का साहस भी हो तो हम कभी असफल नहीं होते। बिना साहस के विश्वास तो ऐसे ही है जैसे किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी किसी ्रेस्तरां में जाना और खाली 'मेन्यू' कार्ड पढ़कर वापिस लौट आना। भोजन तो हो हो नहीं पाएगा, खाना खाने का स्वाद मिल ही नहीं पाएगा, लेकिन जब श्रद्धा क में ईमानदारी का तत्व मिल जाए तभी हम में प्रयोग करने का साहस प्राप्त होता है। और जब ईमानदारी हो तो हम सत्य प्राप्त करने से कभी नहीं चूक सकते। इस सकते। हो तो हम सत्य प्राप्त करने से कभी नहीं चूक सकते। ह श्रद्धा सच्ची हो तो कभी विफलता नहीं मिलती।

हैं। उसको पूर्व भूमिका ही था। यहां कृष्ण ईमानदारी को बारे में बताते हैं। इ पहले मैं आपको स्पष्ट कर दूं कि श्रद्धा का सही अर्थ क्या है। 'श्रद्धा' का अनुवाद प्राय: 'विश्वास' किया जाता है, पर यह सही नहीं है। बदलने की शक्ति शक्ति क

इस सप्तदश अध्याय में कृष्ण सीधे-सीधे वह तरीका या तरकीब बताते हैं। जिसके द्वारा इस श्रद्धात्रय विभाग योग में बताई गई उनकी सीख को ग्रहण किया है। जा सकता है। यह योग 'त्रि–आयामी श्रद्धा' को पहचानने का योग है। इसमें कोई नई सीख तो नहीं दी गई है क्योंकि उन्होंने सारी व्याख्याएं पहले अध्यायों में कर दी हैं। अभी तक जो कृष्ण ने कहा है या बताया है, वह अब जो बताने वाले

ईमानदारी : मुक्ति का सीधा रास्ता

हैं। यदि सच्ची श्रद्धा है तो कुछ भी असंभव नहीं होता। जब पुरा पेट भरा हो तो खाने को तो 'डाईजीन' जैसा 'एंटामिड' ही चाहिए और कुछ नहीं। अर्जन को भी 'एंटामिड' ही चाहिए, जिससे सारा कुछ जो खाया (या सीखा) है वह सही पकार से पच सके और आनंद दे सके। अत: यह अध्याय 'डाईजीन' जैसा ही है। इसमें पूरा जोर श्रद्धा पर ही है। श्रद्धा यानी ईमानदारी, सत्य-प्रियता और बेबाकी।

हम प्रश्न कर सकते हैं कि पूरा अध्याय मात्र श्रद्धा पर क्यों? यह समझ लें कि इसी श्रद्धा को अधरी समझ के कारण हम प्रबद्ध नहीं हो पाते। मैं आपको स्पष्ट बताता हूं कि ऐसा नहीं है कि कृष्ण ने जो यहां बताया है वह हमें मालूम नहीं है। सब मालूम है पर हम कुष्ण क्यों नहीं हो पाए? मान में पर

इसलिए कि हमारी श्रद्धा कम थी। यही हमें पूरी चाहिए थी। हमारी समस्या है कि हम नहीं जानते या हम इतना कुछ जान लेते हैं कि हम उसे पचाकर अपने जीवन में उतार नहीं पाते।

विवेकानंद यही बात बड़ी खूबसूरती से कहते हैं कि बजाय सारी लाइब्रेरी की किताबों का ज्ञान समेटने के यदि हम केवल पांच अवधारणाएं स्पष्ट समझ लें तो ज्यादा अच्छा होगा। इन्हीं पांच अवधारणाओं का श्रद्धा (विश्वास भी ईमानदारी) के साथ प्रयोग करना कहीं ज्यादा श्रेयस्कर है। इन पांच अवधारणाओं को जीवन में अच्छी तरह उतारना चाहिए, बाकी और कुछ करने की जरूरत नहीं है। यही पांच अवधारणाएं अपने दिमाग में स्पष्ट रखें, पूरी लाइब्रेरी की पुस्तकों का इल्म नहीं। इन्हें अपने हृदय में स्थापित कर रखें। कृष्ण यहां श्रद्धा पर ही जोर देते हैं और बताते हैं कि मात्र श्रद्धा आपके जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन ला सकती है। यदि आपके अंदर सच्ची श्रद्धा होगी तो आप अपना परम लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे। भले ही आप नास्तिक हों, उससे कोई फर्क नहीं पडता।

कई नास्तिक लोगों ने भी सत्य और ईश्वर को प्राप्त किया है। बुद्ध ने तो कभी ईश्वर की बात भी नहीं की पर वे प्रबुद्ध ज़ानी हो गए और हजारों को उन्होंने प्रबोधन प्राप्त करवाया। आधुनिक समय की बात करें तो जिन कृष्णमूर्ति ने अपने दर्शन में कभी ईश्वर का जिक्र भी नहीं किया. वह एक प्रबुद्ध स्वामी थे। प्रबोधन उनके व्यक्तित्व से झलकता था। जॉर्ज गुरुजीफ भी प्रबुद्ध जानी हुए जबकि उन्होंने कभी ईश्वर की बात भी नहीं की। आपका किसमें विश्वास है यह महत्वपूर्ण नहीं. आप कितनी श्रद्धा से उस विश्वास से अभिभत हैं. यह जरूरी है।

लोग 'महात्मा' का प्रत्यय गांधी जी के नाम के साथ इसलिए लगाते हैं क्योंकि उनकी अपनी मान्यताओं में दुढ आस्था थी। वह पूरी तरह ईमानदारी से अपने विश्वास को मानते थे और जिसमें उन्हें विश्वास हो उसके साथ प्रयोग करने

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में उन्हें कोई हिचक नहीं होती थी। उनकी आत्मकथा का शीर्षक है 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' (माई एक्सपेरीमेंट्स विद टूथ')। उन्होंने अपने मान्य सत्यों के साथ प्रयोग किया था, सत्य को अपने ऊपर लागू किया था। उसके साथ पूरी ईमानदारी से काम किया था। पूरे सत्य के साथ अपने प्रयोग करने को ही मैं ईमानदारी की संज्ञा देता हूं। ईमानदारी का मतलब सिर्फ़ सत्य को सुनना, पढ़ना और विश्वास करना हो नहीं है। ईमानदारी का मतलब पूरी सच्चाई के साथ अपना काम करना। उनके साथ पूरी शिद्दत से प्रयोग करने का साहस होना ही ईमानदारी है।

चाहे चाहे ध्यान लगाना (मेडीटेशन करना) या जुआ खेलना हो, साहस तो दोनों में ही चाहिए। साहस के बगैर आप जुआ भी नहीं खेल सकते। यही सत्य ध्यान लगाने पर भी लागू होता है। वस्तुत: मेडीटेशन जुए को चरम स्थिति का द्योतक है। साधारण जुए में हम पैसे का जुआ खेलते हैं। ध्यान लगाने में हम अपने अहम् के साथ जुआ खेलते हैं; अपने अस्तित्व को दांव पर लगाते हैं। मेडीटेशन की जुएबाज़ी में एक ही बात निश्चित है – यदि हम हारे तो ही हमारी विजय होती है। इस है। इसमें सिर्फ हारने वाला ही जीतता है।

में साधारण जुए में जितना हम जीतते हैं उतना ही प्राप्त करते जाते हैं, पर मेडीटेशन के जुए में जहां हम अपने अहम् भाव को दांव पर लगाते हैं, हम जीते तो पूरी बाज़ी एक बार में ही जीत जाते हैं, क्योंकि दांव पर हमारा अहम् होता है है। आध्यात्मिक जीवन में भी साहस को बहुत ज़रूरत होती है, इसलिए स्वामी विवेकानंद अपने आध्यात्मिक शिष्यों को 'धीर' कहते थे। धीर का मतलब धैर्यवान, और साहस का प्रतिरूप।

हम पूछ सकते हैं - ''आध्यात्मिक' लोगों को साहस क्यों चाहिए? आध्यात्मिक जीवन में तो हमें शांत और मौन ही रहना पड़ता है?'' नहीं, यहां साहस की बड़ी दरकार होती है। इसके सत्यों को साथ प्रयोग के लिए हमारे पास साहस होना चाहिए। पिछले 16 अध्यायों में हमने कई सीखों, पाठों और विभिन्न समझों को बारे में अनेक विधियां देखी हैं। हमने सब कुछ सुना है, ये सब हमारे जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन ला सकते हैं अगर हमारे पास उनके साथ प्रयोग करने का साहस हो। नहीं तो यह सब ज्ञान केवल हमारा सिर ही भारी करेगा और कुछ नहीं होगा अर्थात् यदि इस ज्ञान को हम अपने सिर में रखे रहें तो सिर्फ़ हमारा सिर ही भारी होगा। अब हम कह सकते हैं कि हम 'गीता' जानते हैं, लेकिन अभी हमें इसके साथ प्रयोग करना है, इसमें बताए ज्ञान को अनुभूत करना है तब ही हम 'गीता' समझ पाएंगे।

उदाहरण के लिए यदि हमने बहुत-सा खाना खा लिया और वह पच नहीं पाए तो क्या होगा? हमारे पेट में दर्द होगा तथा 'वमन' भी हो सकता है। इसी

श्रीमद्भगवत गीता

प्रकार इन सब बातों को सुनकर हमने आपने प्रयोग नहीं किए तो सिर्फ हमारे मिर में दर्द ही होगा और कुछ नहीं। या हम लोगों को पकड़-पकड़कर उन पर अपने 'ज्ञान' की 'उल्टी' करते रहेंगे। यह समझ लें कि यदि हमारे मन में ईमानदारी नहीं और इसमें बताए गए ज्ञान के साथ प्रयोग करने का हौसला नहीं तो इसको मात्र सुनना तो खतरनाक भी हो सकता है।

अब मैं आपको एक और कदम आगे बढ़ाता हूं - "यदि आपने इन सुनी हुई बातों या सत्यों पर अभ्यास अपने आप नहीं किया तो खतरा हो सकता है।'' आप पूछ सकते हैं - "क्यों?'' क्योंकि इतने दिनों तक इन प्रवचनों और सत्यों को सुनने के बाद हमारे मन में यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि हम इन्हें जानते हैं पर वस्तुत: हम इन्हें जानते नहीं हैं। बिना जाने स्वयं को जानकर समझना, बेहद खतरनाक स्थिति है।

ऐसे चक्कर से सदा बचें।

आध्यात्मिक जीवन में साहस, ईमानदारी और धैर्य का होना बहुत जरूरी

एक लघु कथा

महान संत - दक्षिण मूर्ति स्वामीगण, दक्षिणी भारत के तमिलनाड में रहते थे, एक जगह तिरुवरुर के निकट। मैं आपको उनके जीवन की एक ऐतिहासिक घटना सुनाता है।

राज दरबार का एक कवि एक बार उनके पास आया और उनकी उपस्थिति से उसे बड़ी प्रेरणा मिली। फलस्वरूप उस कवि ने 'भरणी छंद' में उस महान संत की प्रशंसा में एक हजार गीत लिखे। भरणी एक प्रकार की काव्य शैली है जिसमें 1000 छंदों की कविता लिखी जाती है। इसका नियम यह है कि जिसके पास इतनी शक्ति और साहस हो कि युद्ध में वह 1000 हाथियों को मार सके, वही इस काव्य शैली में प्रशंसा पाने का हकदार होता है पर यह कवि उन संत से इतना प्रभावित हुआ कि उसने वहां 1000 गीत उस संत पर लिख दिए। उधर राजा भी स्वयं को इस भरणी काव्य का एक नायक समझता। मुझे नहीं मालूम कि उस राजा ने 1000 हाथी मारे थे कि नहीं। हो सकता है कि उस राजा ने एक हजार गीत लिखने के लिए उस कवि को कुछ धन चुपचाप पहले ही दे दिया हो।

बहरहाल, अचानक एक दिन दरबार में अपनी अहमन्यता या दर्प के कारण राजा ने घोषणा की - "इस पूरे देश में मैं ही अकेला हूं जिस पर 'भरणी काव्य' लिखा जा सकता है।'' तभी वहां उपस्थित कवियों में से एक खड़ा हो गया और बोला – ''नहीं राजन! दक्षिणामूर्ति स्वामीगण भी भरणी को योग्य हैं। आपके दरबार को एक कवि ने तो उन पर 1000 गीतों का एक भरणी काव्य लिख भी दिया है।''

राजा के अहम् को चोट लगी। वह बोला – ''क्या? कौन है वह आदमी जो 'भरणी काव्य' का हक़दार है? उसे यहां लेकर आओ।'' वह कवि बोला – ''नहीं राजन! वह तो भिखारी है, वह यहां नहीं आएगा।'' भिखारियों पर कोई जबरदस्ती तो नहीं कर सकता, बेघर लोगों पर क्या ज़बरदस्ती हो सकती है। जिसका घर-बार हो उस पर तो बल का इस्तेमाल कर अपना हुक्म चलाया जा सकता है, बेघर भिखारी तो कहीं भी चला जाएगा। उसे क्या फर्क पड़ता है कि यहां जाए या वहां जाए, क्योंकि उसकी तो कोई इच्छा ही नहीं होती। जब हमारे अंदर कोई कामना होती है तभी तो हम समाज के नियमों का पालन करते हैं, पर बेघर भिखारी को किसी की क्या परवाह! उसे न नाम चाहिए, न शोहरत, न सुरक्षा। उसको बंधन में लेना बहुत मुश्किल है। इस मामले में तो वह स्वामी एक संत भी था और भिखारी भी! उसे जबरदस्ती राजा के पास लाना असंभव था।

पर राजा को इस बात से अपनी बहुत बेइज्जती महसूस हुई। ''क्या! एक भिखारी और उस पर भरणी? वह कौन मूर्ख था जिसने ऐसा किया था। उसे यहां बुलाकर लाओ... तुरंत। ''

भरणी लिखने वाले कवि को तुरंत दरबार में हाज़िर किया गया। राजा ने कहा – ''अरे मूर्ख! तुमने एक भिखारी पर भरणी काव्य लिखा है।'' उस कवि ने उत्तर दिया - ''हे राजन्! मुझे क्षमा कर दें, पर इससे पहले कि आप उस स्वामी को लिए अपशब्द प्रयोग करें, मैं आपसे विनती करता हूं कि आप उससे एक बार मिल जरूर लें।''

राजा बोला – "ठीक है! मैं उस भिखारी स्वामी से मिलूंगा। यदि वह वास्तव में भरणी के योग्य नहीं लगा तो हम उसको भी मार डालेंगे।''

राजा उस स्वामी को मिलने के लिए तैयारी करने लगा, अपने 'लवाजमा' के साथ – पैदल सिपाही, रथ, घोड़े-हाथी, सेना एवं योद्धाओं लेकर वह चला। राजा लोग सदा अपने लाव-लश्कर के साथ ही चलते अकेले चलेंगे तो उनकी पहचान कैसे होगी? दक्षिणमूर्ति स्वामीगण तो परम हंस थे, एक प्रबुद्ध ज्ञानी। ऐसे लोग तो स्वतंत्र विचरण करते हैं। उन्हें किसी लाव-लश्कर की आवश्यकता ही नहीं होती। यह स्वामी तो 'अवधूत' भी अर्थात् सदा निर्वस्त्र रहने वाला। बिना किसी आडम्बर को वह एक वट वृक्ष के नीचे आराम से विराजमान था। राजा की पूरा सेना ने उसे पूर्ण शांति से बैठे देखा।

राजा अपने रथ से उतरकर उस स्वामी की ओर बढ़ा। वह स्वामी वैसे ही बैठा रहा। वह राजा व इतनी फौज़ को देखकर तनिक भी विचलित नहीं हुआ। उसने आंखें खोलकर सीधे राजा की आंखों में झांका। यह शायद पहली बार था कि किसी ने राजा को आंखों में सीधा देखने की जुर्रत की थी। राजा तो सदा दूसरों की आंखों में सीधा घूरता था और वे लोग अपनी आंखें झुका लेते थे। पहली बार किसी ने राजा की आंखों में देखा। कुछ क्षणों पश्चात् राजा ने ही अपनी आंखें झुका लीं। राजा को खुद महसूस हुआ मानों उसके अस्तित्व में कुछ हलचल हो रही है, उसे लगा कि उस स्वामी के सामने तो वह स्वयं एक भिखारी है। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें, क्या प्रतिक्रिया दे? एक अज़ीब-सी हालत हो गई थी। वह किंकर्तव्यविमूढ़-सा खड़ा रहा, समझ में ही नहीं आया कि वह क्या कहे।

दक्षिणमूर्ति स्वामीगण ने इशारा किया कि राजा स्थान ग्रहण कर लें। कोई शब्द नहीं निकले उसके मुंह से, बस राजा को बैठने का इशारा मात्र किया। राजा के साथ आई सेना और योद्धाओं ने भी अपने अस्त्र-शस्त्र उतारकर वहीं शांति से बैठना ठीक समझा। दस मिनट में सारी सेना-योद्धा चुपचाप सामने बैठ गए। वैसे किसी सेना का चुपचाप बैठना असंभव ही होता है इसलिए हम शैतान को लगातार काम में जोते रखना चाहते हैं न? यदि उसे काम में व्यस्त न रखा तो वह हमें खा जाएगा। इसी तरह किसी सेना को शांत रखना असंभव ही है पर यहां पूरी सेना चुपचाप शांत बैठी रही।

एक घंटा गुजर गया, फिर दो घंटे गुज़रे, तीन घंटे... और शाम भी हो गई, एक पूरा दिन गुज़र गया। राजा, उसकी सेना और वह स्वामी शांत बैठे रहे, एक शब्द भी न बोला गया। कोई आदेश नहीं दिया किसी ने, न कोई अभिवादन ही हुआ। वे सब सिर्फ़ बैठे रहे। दो दिन बीत गए, फिर तीन दिन बीते। अब स्वामी

राजा ने कहा – ''तुम जानते हो कि तुम मुझे क्या सलाह दे रहे हो। कल सुबह तुम्हारा सिर कलम कर दिया जाएगा।''

उस राजा का ऐसा ही स्वभाव था – सीधा और क्रूर हिंसात्मक। वस्तुत: मूर्ख लोग अपने मन की हिंसा का तुरंत इज़हार कर देते हैं। जब उनके पास अपने से बुद्धिमान को आश्वस्त करने का कोई चारा नहीं होता, जो कि सच्चाई को स्पष्ट कर सके तो वे मारपीट पर उतर आते हैं, लाठी-तलवार की बात करने लगते हैं। उदाहरण के लिए आप हिन्दू धर्म या बुद्ध धर्म को इतिहास पर नज़र डालें। इन दोनों धर्मों में किसी को तलवार के दम पर अपने धर्म में शामिल नहीं किया गया क्योंकि इन दोनों के पास दूसरे को आश्वस्त करने की बुद्धिमत्ता थी। उनके पास तर्क-बुद्धि थी, विश्लेषण की शक्ति थी कि अपनी बात से दूसरे को राजी कर सकें।

दो महान स्वामियों का उदाहरण देखें - "आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र का।'' एक विषय पर उनके मत सर्वथा भिन्न थे पर उनमें आपस में कभी युद्ध थोड़े ही हुआ। शंकराचार्य ने कभी यह नहीं कहा - "यदि तुम वेदांत-दर्शन को नहीं मानोगे तो मैं तुम्हें मार डालूंगा।'' वे आपस में मिलकर बैठे और अपने-अपने मत का विश्लेषण किया व शास्त्रार्थ किया। इस शास्त्रार्थ की जो निर्णायक थीं - वे थीं मंडन मिश्र जी की स्त्री। क्या सुंदर प्रबंध था? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि प्रतिस्पर्धा में एक प्रतिस्पर्धी की पत्नी ही निर्णायक की भूमिका निभा रही थी और जो शंकराचार्य के कहने पर ही निर्णायक चुनी गई थी। उनका नाम था भारती। उन्होंने पूरा शास्त्रार्थ सूना और अंतत: अपना निर्णय शंकराचार्य के पक्ष में ही सुनाया। शंकराचार्य को उन्होंने शास्त्रार्थ में विजयी घोषित किया था। पूरा प्रकरण प्रेमपुर्वक संचालित हुआ, न कोई गाली-गलौज न मार-काट, न झगड़ा, आराम से बहस हुई।

वस्तुत: पूर्व के सारे धर्म-संप्रदायों में कभी कोई मार-काट की नौबत ही नहीं आई। उन्होंने तलवार के दम पर किसी का मन नहीं बदला, वरन अपनी बुद्धिमत्ता से अपने तर्क रखे। एक बात और, जो हारता था वह स्वत: ही उस पक्ष का साथ देने लगता था जिसने अपना मत अधिक सच्चाई से प्रस्तुत किया हो।

जब शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को अपने पक्ष द्वारा जीता तो मंडन मिश्र सब कुछ छोडकर शंकराचार्य को समर्पित हो गए तथा उनके शिष्य बन गए, तब उनका नाम हुआ सरेशाचार्य। वह शंकराचार्य के मत को ही प्रसारित करते रहे। असल में जब लोग तलवार के दम पर अपनी बात मनवाने की चेष्टा करते हैं तब वे मूर्ख दिखते हैं, क्योंकि उनमें बुद्धिमत्ता नहीं होती इसलिए वे आक्रमण करने लगते हैं। जो तलवार के दम पर ऐसा करते हैं वस्तुत: अपनी भ्रांति और सत्य समझने की बुद्धिहीनता ही दिखाते हैं। तलवार के जोर से कुछ नहीं होता। तलवार विनाश तो कर सकती है, निर्माण कभी नहीं कर सकती।

तो वह राजा तो मूर्ख था और सीधा कह दिया - "मार दो इस कवि को। कल सूबह सुर्योदय होते ही।'' उस कवि ने कहा - "मुझे कोई समस्या नहीं। मैंने THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM की कृपा से पूर्ण सत्य जान लिया है। मैं मरने को तैयार हूं पर हे राजन! यदि आप में थोडी भी अक्ल है तो THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM से जरूर मुलाकात कर लें। मेरी प्रार्थना है कि जब तक आप उनसे मिल न लें, मुझे मृत्यू दंड न दें। फिर में मरने को तैयार रहंगा।''

ने सोचा - "यह तो बहुत ज्यादा ही हो गया। तीन दिन हो गए यह राजा अपनी परी सेना के साथ भूखा-प्यासा बैठा है - 'हाजत रवां' करने भी कोई नहीं गया। इन्हें वापिस अपनी राजधानी और महलों को जाना चाहिए। राजा को तो परे राज्य का ख्याल रखना होता है। वह भी तीन दिन से यहां चुपचाप बैठा है।" तो उस स्वामी ने अपनी आंखें खोलीं और कहा - "अब तुम लोग वापिस जाओ।'' राजा स्वामी के चरणों पर गिर पड़ा, नमस्कार किया और जंगल से बाहर आ गया।

तब राजा ने उस कवि को बुलाया और कहा - "हज़ार हाथी की बात छोडो, इस स्वामी की महिमा में तो तुम दस सहस्र हाथियों को मारने वाले को समान प्रशंसा में भरणी रच सकते हो।''

तब कवि ने एक सुंदर बात कही - "दस हज़ार हाथियों को मारना कठिन नहीं है। यह कोई बड़ा काम नहीं है। हथियार हाथ में लेकर उनको मारा जा सकता है पर अपने मन को मारना बेहद मुश्किल काम है। यही वास्तविक उपलब्धि होती है।''

उस स्वामी ने राजा के मन को ही मार दिया था। दक्षिणमुखी स्वामीगण सिर्फ अपने ही नहीं, वह किसी को भी मन को मार सकते थे, यदि कोई उनके सामने आता। दस सहस्र हाथियों को मारने में साहस नहीं चाहिए, परंतु अपने मन को मारने में बड़ा साहस चाहिए।

साहस और ईमानदारी की ही असली दरकार होती है ।

सत्य के साथ प्रयोग करने के लिए आध्यात्मिक जीवन में दो चीज़ों की ही दरकार होती है - साहस और ईमानदारी। यही दो गण हमारे अंदर नापैद होते हैं। हम सब सुनते तो बहुत हैं - किसी भी प्रवचन में वक्ता को पूरे ध्यान से सुनते हैं। ग्रंथों का भी पारायण करते रहते हैं पर जब वास्तविकता का सामना करने का समय आता है, यानी इस ज्ञान को परखने का तो हम कुछ नहीं कर पाते। तब आप लोग कहते हैं - "स्वामी जी! व्यावहारिक कारणों से कुछ तो हमारे पास होना ही चाहिए न! नहीं तो हम इस दुनिया में जी कैसे पाएंगे?'' और आप लोग बड़ी चतुराई से समझौता करने लगते हैं। समझौता करना कायरता की निशानी है। समझौता करने वाले को इस जीवन में कभी कोई वास्तविक अनुभव प्राप्त नहीं हो सकता, न सिर्फ आध्यात्मिक जीवन में वरन् बाह्य जगत से भी। अनुभव की ईमानदारी के रूप में एक ही सत्य काफी है। यह सब कुछ

समेट लेता है, फिर कुछ भी जरूरी नहीं रह जाता। हमें कोई बड़ी-बड़ी चीज़ें

नहीं चाहिए। यदि कोई आदमी कोई 'बड़ा काम' करता है तो इस कारण उसे 'बड़ा आदमी' नहीं कहने लगते। वह क्या करता है यह महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि 'कैसे' उस काम को करता है, असली महत्व की बात होती है।

उदाहरण के लिए महान संत नाम्भावलर का पूरा जीवन वृत्त देखें। वे तमिलनाडु में रहते थे और भगवान विष्णु के लिए मालाएं (फूलों के हार) बनाया करते थे और कुछ नहीं करते थे। रोज़ ही वह बगीचे में जाकर फूल इकट्ठा करते, उनकी मालाएं बनाते और भगवान पर चढ़ा देते थे। सिवाय माला बनाने के, उन्होंने कुछ भी नहीं किया, परंतु वह प्रबुद्ध ज्ञानी हो गए। कई ऐसे प्रबुद्ध ज्ञानी हुए हैं जो कभी कोई बड़ा काम नहीं करते थे पर वे छोटा-छोटा काम 'बड़ी तरह' से करते रहते थे। उनको मन में गहरी आस्था थी।

एक अन्य प्रबुद्ध स्वामी ने तो ऐसा भी कुछ नहीं किया। उन्होंने तो ईश्वर को लिए मालाएं भी नहीं बनाईं। वह तो दिन-भर शिवलिंग पर एक पत्थर फेंका करते थे। उनका नाम था साक्य नयनार ('साक्य' अर्थात् बुद्ध के कबीले के सदस्य और 'नयनार' यानी शिव भक्तों का एक नाम)। पता नहीं कैसे वह एक बौद्ध भिक्षु बन गए थे। चूंकि वे बौद्ध भिक्षु हो गए थे, इसलिए वे सार्वजनिक रूप से शिवलिंग की पूजा नहीं कर सकते थे, पर उनको मन में शिव के लिए

गहरी आस्था थी। बौद्धों में कायदा होता है कि हर परिवार से एक पुत्र बचपन में ही मत को दे दिया जाता है। वहीं उसका लालन-पालन होता है और विधिवत् बौद्ध भिक्षु बनाया जाता है। इसी प्रकार साक्यनार को भी एक बौद्ध मठ को दे दिया गया था, पर उनके मन में शिव के लिए गहरी भक्ति थी। वह रोज़ एक पेड़ के नीचे रखे शिवलिंग के पास जाते, एक पत्थर उठाकर उसको फूल का रूप समझकर शिवलिंग पर फेंक देते थे। किसी ने उन्हें जब ऐसे करते हुए देखा तो पूछा – "अरे! तुम यह क्या करते हो?'' वे बोले – " कुछ नहीं! मैं तो शिवलिंग पर पत्थर फेंकता हूं।'' और पत्थर फेंककर वह वहां से चल देते। एक बार एक वृद्ध आदमी ने अचानक उनको पत्थर फेंकते हुए पकड़ लिया – ''ऐ! क्या करते हो?'' ज़वाब मिला – ''शिवलिंग पर पत्थर फेंक रहा हूं।'' वह वृद्ध फिर बोला – ''पर जिस तरह से तुम पत्थर फेंकते हो उससे तुम्हारी भक्ति प्रकट होती है। भले ही पत्थर फेंक रहे हो, पर ऐसा तुम करते बड़े भक्ति-भाव से हो। मुझे सच-संच बताओं कि तुम कौन हो?''

साक्य नयनार बोले – "वैसे तो मैं बौद्धों के एक परिवार में जन्मा हूं पर मुझे शिव के प्रति असीम भक्ति है। रोज़ मैं यहां आकर अपने पूरे अस्तित्व के रूप में एक पत्थर फेंकता हूं (अपनी जान निछावर करता हूं)।'' तुरंत वह वृद्ध

श्रीमद्भगवत गीता

शिव के रूप में प्रकट हुआ, साक्य नयनार को दर्शन दिया और प्रबुद्ध होने का वरदान देकर अंतर्थ्यान हो गया।

तो यह समझ लें कि हम क्या करते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है। चाहे भले ही हम अपने घर में झाडू लगाएं या सफ़ाई करें, पर यदि हम ऐसा पूरे ध्यान और ईमानदारी को साथ, उस पल में यदि डूबकर करते हैं तो यह सही है और एक तरह की साधना है।

क्षण में जीना

आध्यात्मिक साधना का अर्थ यह कतई नहीं है कि गहन जंगल में जाकर नौ बार नाक पकडकर श्वसन व्यायाम करते रहो। ऐसे तो तुम सिर्फ स्वयं को त्रास ही दोगे। इसका अर्थ है जो कुछ भी करो पूरी ईमानदारी और शिद्दत के साथ करो। अपनी आस्था को प्रकट करने का आप में साहस होना चाहिए। अपनी आस्था को दुढता देने के लिए अपनी मान्यताओं को निरंतर परखते रहना चाहिए। जो भी आप मानते हो, उसके साथ प्रयोग करने का साहस आप में होना ही चाहिए।

आप इसकी परवाह न करें कि जो आप सत्य मानते हैं वह चरम सत्य है कि नहीं; वह चरम है कि नहीं, आप कभी नहीं जान पाएंगे, यदि आपके पास उनके साथ प्रयोग-परीक्षण करने का साहस नहीं है। बिना स्वयं परीक्षण के आप कभी अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाल सकते, क्योंकि बिना परीक्षण के यदि आपने कोई निष्कर्ष निकाला तो वह पूर्वाग्रह ही होगा। अपने माने हुए सत्य को परीक्षित करने का साहस आप में होना ही चाहिए।

तमिल में 'सत्य' के लिए तीन शब्द हैं; एक 'वाइमाई' जिसका मतलब मुंह से सिर्फ सत्य निकालना। दूसरा शब्द है 'उन्माई' जिसका अर्थ है दिल-ओ-दिमाग से सत्य कहना और तीसरा सुंदर शब्द है 'मेईमाई' जिसका मूलार्थ है शरीर द्वारा सत्य जीना।

तमिल में 'माई' का अर्थ 'शरीर' होता है। यानी सत्य ही शरीर से, मन से, दिल-ओ-दिमाग या मुंह से कहना या जीना। सत्य बोलना और दिल-ओ-दिमाग द्वारा सत्य भाषण करना तो सब समझते हैं, पर 'शरीर से सत्य जीने' का क्या तात्पर्य है, यह कभी अन्यत्र सुना भी नहीं गया।

यही वह तत्त्व है जो हम देखने से चूक जाते हैं। हम सत्य के बारे में दिन-रात सोचते रहते हैं। हम जो सत्य समझते हैं वही कहते हैं, पर हम एक बात भूल जाते हैं, सत्य को जीवन में उतारने को। हम सत्य को अपने जीवन में जी नहीं पाते। सत्य को जीवन में जीना ही सार तत्त्व है।

प्रतिज्ञ अपने 'अष्टांग' योग' में पहला अंग सत्य मानते हैं। यदि तमिल में कहा जाए तो इसमें तीनों शब्द 'वाईमाई', 'उन्माई' और 'मेईमाई' में यही अर्थ

यदि पूरी निष्ठा से अभ्यास किया जाए तो इस अष्टांग योग का एक ही योग हमें प्रबुद्ध ज्ञानी बना सकता है। वास्तव में जब हम प्रबुद्ध हो जाते हैं तभी हम चरम सत्य को बारे में जागरूक हो पाते हैं, पहले नहीं।

इसलिए मैंने पहले भी कहा है और बार-बार कहा है कि ज़रूरी नहीं कि आपको प्रबोधन तब हो प्राप्त हो जब आपका गुरु भी प्रबुद्ध हो। यदि हम अपने किसी भी गुरु का पूरी ईमानदारी से अनुसरण और आज्ञा-पालन करेंगे तभी हम प्रबुद्ध हो सकते हैं। यदि किसी पत्थर को मूर्ति के प्रति भी सच्चा अनुराग रखेंगे तो भी हम मुक्त हो सकते हैं।

हमारा जमा हुआ अखण्ड विश्वास, हमारी पूर्ण आश्वासी, हमारा साहस और भरोसा वे तत्त्व हैं जो हमें ऊपर उठाते हैं, हमारी सोच के धरातल को उच्चता प्रदान करते हैं।

श्रद्धा का मूल अर्थ यही है – जो हम कर रहे हैं उसमें हमें पूर्ण भरोसा है। अपने पक्ष के बारे में संदेह का कोई अणु मात्र भी हमारे मन में नहीं होता है जब हम श्रद्धावान होते हैं। हम तब यह भी नहीं पूछते कि हम क्यों क्या कर रहे हैं। सारे प्रबुद्ध स्वामियों का संपूर्ण एवं अखंडित ध्यान उसी पर लगा रहता ह था जो भी वह करते थे। अपने चुने हुए पथ से वे कभी विचलित नहीं होते थे चाहे कुछ भी प्रलोभन, चुनौती या समस्या उनके सामने आए; भले हो उनका जीवन भी खतरे में पड़ जाए।

श्रद्धा हमें वह सब देती है जो हम चाहते हैं - सांसारिक उपलब्धियां भी। यहां कृष्ण आध्यात्मिक उत्थान को बात करते हैं। हम उनके बताए गए तरीके से जो भी चाहते हैं वह प्राप्त कर सकते हैं। श्रद्धा सांसारिक उपलब्धियां प्रदान करने में भी कारगर रहती है। इसलिए इसे मैं 'क्वांटम आध्यात्मिकता' भी कहता हूं। आध्यात्मिकता और सांसारिक उपलब्धियां अलग नहीं होतीं। आध्यात्मिक प्रसन्नता भौतिक प्रसन्नता से कोई फ़र्क नहीं होती। वस्तुत: भौतिक सुख–चैन आध्यात्मिक सुख-चैन का एक हिस्सा ही होता है और यही मैं 'क्वांटम आध्यात्मिकता' कहता हूं, अर्थात् संपूर्ण आध्यात्मिक उपलब्धि, जिसमें भौतिक या सांसारिक चैन भी निहित होता है।

यह समझ लें कि आध्यात्मिकता का अर्थ जंगलों में चले जाना या पहाड़ों की कंदरा में रहना नहीं है। यदि हमारा मन शुद्ध नहीं है तो हम कहीं भी चले जाएं, जंगलों या पहाड़ों पर, हमें कुछ नहीं मिलने वाला, सिवाय अपनी जंगल या पहाड़ के बारे में कपोल कल्पनाओं के। आध्यात्मिक होने के लिए हमें कहीं भी जाने की जरूरत नहीं है। हम वहीं रह सकते हैं जहां हम हैं और बिना किसी अपराध बोध या खेद के हम जीवन सुखपूर्वक जी सकते हैं, पर हमें उन सब कल्पनाओं-चाहतों से मुक्ति पानी होगी जो हम अपने अभाव के कारण पालते हैं।

इस अवस्था को प्राप्त करने को लिए उस पर ध्यान केंद्रित करें जो हमारे पास है, उसी को भोगें जो उपलब्ध है बिना किसी लालच या कामना के। इसके लिए हमारे पास साहस, दृढ़ इच्छाशक्ति एवं अनुशासन और संपूर्ण एकाग्रता होनी चाहिए। यही श्रद्धा का अर्थ है।

समझ लें कि हमारा चरम कदम या सीधा मार्ग हमें प्रबोधन की ओर ले जाएगा, जब हम पूरी सच्चाई और ईमानदारी से अपने विश्वास का पालन करेंगे। हम क्या मानते हैं यह मुद्दा नहीं है। हमें अपने विश्वास पर दृढ़ रहने के लिए इतना साहस होना चाहिए कि हम अपनी आस्था को निरंतर परख सकें; उसके साथ प्रयोग कर सकें।

Part 4: Bhagavad Gita demystified - Vol 3 Chapters 13-18_Hindi_part_4.md

े आराधना का पथ प

17.1 अर्जुन बोले – "कृष्ण! जो श्रद्धायुक्त पुरुष शास्त्र-विधि को त्याग कर देवादि का पूजन करते हैं, उनको फिर कौन-सी स्थिति है - सत्त्विकी

अर्जुन यहां पर सुंदर प्रश्न करते हैं, वे पूछते हैं – ''जो लोग शास्त्र विधि को त्यागकर देवताओं की उपासना पूरी ईमानदारी से करते हैं, वे सारिवकी माने जाएं या राजसी या तामसी? अर्थात् उन लोगों को क्या प्रवृत्ति मानी जाए जो अपनी आस्था के अनुसार अपने इष्ट की आराधना करते हैं और वैसे नहीं करते जैसा कि शास्त्रों में बताया गया है। वे साल्विकी हैं या राजसी या तामसी अर्थात् क्या हैं वे, शांतिपूर्ण या व्याकूल या अज्ञानी?''

पूजा-आराधना तो कई प्रकार से की जा सकती है। अर्जुन का यह प्रश्न गुण आधारित आस्था पर है। आराधना का तरीका भी ऊर्जा के स्तरों पर ही निर्भर करता है। कुछ लोग भौतिक स्तर पर पूजा करने में चैन पाते हैं अर्थात् स्थूल रूप से पूजा करना, यथा मंदिरों में जाना, देवताओं को उपासना करना और पवित्र नदियों में स्नान करना। ऊर्जा स्रोत को रूप में यदि इसे वर्गीकृत किया जाए तो इस प्रकार की पूजा का संबंध पृथ्वी या

पूजा का दूसरा तरीका है – यज्ञ करना, जिसका संबंध सीधे-सीधे अग्नि में – कर्जा से होता है। इसमें अग्नि की ऊर्जा यज्ञ कुंड के चारों और रखे पानी को बर्तनों में चली जाती है। यह जल जो इस कर्म-कांड द्वारा ऊर्जास्वित हो जाता है, पास रखी मूर्तियों ( भगवान को) पर उड़ेल दिया जाता है या लोगों पर और पृथ्वी पर छिड़का जाता है, जिससे वे भी ऊर्जास्वित हो जाते हैं। वायु को ऊर्जा प्राणायाम करने या मंत्र जाप द्वारा जोड़ी जाती है। 'शिव

सूत्र' के प्रथम नौ श्लोकों में शिवजी देवी (उनकी शिष्या) को इन्हीं विधियों) को इन्हीं विधियाँ में शिवजी देवी (उनकी शिष्या) को इन्हीं विधियों में र

ईश्वर की ऊर्जा मेडीटेशन या ध्यान लगाकर जोड़ी जा सकती है, यद्यपि इसमें समझ और जागरुकता होना बहुत आवश्यक है।

हर तरह की पूजा का संबंध भी व्यक्ति को सहज-प्रवृत्ति से होता है। हर एक विधि को लिए शास्त्र मार्ग-निर्देशन उपलब्ध है कि कौन-सी पूजा कहां, कब और कैसे की जा सकती है।

अर्जून का प्रश्न है - "इन निर्देशों को पालन करना कितना महत्वपूर्ण है? क्या होता है जब कोई व्यक्ति अपने रुझान और स्वभाव के अनुसार पूजा करता 言?"

यह एक दिलचस्प प्रश्न है। तमिलनाडू को एक संत ने शिव की पूजा इतनी शिद्दत से को कि अपनी आंखें ही निकालकर शिवलिंग पर रख दीं। अन्य स्वामियों ने तरह -तरह की वस्तुओं को अपने इष्टों को अर्पित किया था. यहां तक कि कच्चा मांस भी। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने तो भोग लगाने के पूर्व अपनी इष्ट मां काली की नाक पर एक धागा रखकर यह सनिश्चित करने को कोशिश की कि वे सांस ले रही हैं कि नहीं।

ऐसे कई प्रबद्ध स्वामियों ने अपनी रुचि और रुझान के अनुसार ही अपने इष्ट देव की आराधना की है। शास्त्र निर्देश उनकी आराधना में कभी आडे नहीं आए, पर ये सभी स्वामी गण अपनी करनी में पर्ण एकाग्र एवं परे रहे थे। उन सभी में श्रद्धा थी। यही असली महत्व की बात है।

अर्जून का प्रश्न इसी संबंध में है।

हमारे सारे समाज, धर्म, मत, जाति, पंथ का आधार इन्हीं तीन गणों के अनुसार होता है जो हमारा मानसिक अनुकूलन कर, हमारी प्रकृति या सहज वृत्ति निर्धारित करते हैं। इस ग्रह पर जन्म लेने को पश्चात् हम उसी प्रकृति में ढल जाते हैं, जो हमारे पूर्व जन्म की मानसिकता रही होती है। हमारे नए जन्म में, हमारा वही धर्म हो जाता है जो हमारी पुरानी सहज वृत्ति रही होती है अर्थात् पूर्व संस्कार हमारे स्वभाव को बनाते हैं। । का प्रकाश

पर हम यह नहीं समझ पाते कि हम समग्र के अंश हैं; परमात्मा या चरम चेतना 'अखिल' के हिस्से हैं। हम नहीं समझते कि हमारी मूल प्रकृति सारे पादार्थिक अनुकूलों और यूतियों से परे होती है। जब परमात्मा के साथ हम अपना यह मूल संबंध भुला देते हैं तो हम इन सांसारिक संबंधों को वही ऊर्जा प्रदान कर देते हैं। हम फिर किसी धर्म-संप्रदाय के अंधे नियमों से स्वयं को जोड़ देते हैं। वस्तुत: ये सारे संबंध भंगुर होते हैं क्योंकि पादार्थिक होते हैं और इनसे यूति भी कृत्रिम रहती है, सहज नहीं।

इन बंधनों को तोड़कर ही हम आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर हो सकते हैं। श्रद्धा का यहां अर्थ है उस विश्वास से जो किसी नेक काम से जुड़ने से पैदा होता है, पर जो विशुद्ध नेकी है वह इन सारे सांसारिक बंधनों को परे होती है। यह 'गुणातीत' होती है, इसलिए सांसारिक जीवन में न कुछ पूर्ण शुभ होता है न पूर्ण अशुभ। विश्व वाय करनात प्रत्यास एक्स विन्दी मिळ

यह समझ लें कि वह व्यक्ति जो स्वभावत: विशुद्ध शुभता वाला है, वही परमात्मा या दिव्यता से जुड़ सकता है।

इसीलिए एक प्रबुद्ध स्वामी इन तीनों गुणों को परे होता है - इसलिए कि वह अपनी पूर्व-वासना, संस्कार और कर्मों को जला चुका होता है। कामना, लालच, भय, राग-विराग से परे वह सांसारिक अस्तित्व की भ्रांति से कतई नहीं बंधता। जब वह अपने शरीर को त्यागना चाहता है तो उसकी आत्मा असीम कॉस्मिक ऊर्जा में विलीन हो जाती है।

जब किसी प्रबुद्ध ज्ञानी की आत्मा इस ग्रह पर पुनर्जन्म लेती है और मानव रूप में अवतरित होती है तो वह सत्त्व गुण से भरी होती है, क्योंकि हर शरीर धारी का कोई-न-कोई सहज 'गुण' तो होना ही चाहिए।

ऐसे ही जीव 'अवतार' कहे जाते हैं। जब जीव को अपनी प्रबुद्ध चेतना का भान होता है - उस अवतार को रूप में तो वह गुणातीत अवस्था की ओर आकर्षित होता है। कुछ मामलों में अवतार का एक स्पष्ट उद्देश्य होता है इस ग्रह पर आने का, जो परमात्मा निर्धारित करता है। दूसरे मामलों में जैसे ही उस अवतारी जीव को अपनी मूल प्रकृति का भान हुआ, वह अपनी मूल कॉस्मिक अवस्था में लौट जाता है।

श्रीमद्भगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

वाले हैं, उन अज्ञानियों को तू आसुरी स्वभाव वाला जान। कृष्ण समझाते हैं कि हम अपने स्वभाव के अनुसार अर्थात् उस 'गुण' को

अनुरूप जिसके साथ हम पैदा हुए हैं, ही पूजा करते हैं।

वाला है, वह स्वयं भी वही है।

जब हम पैदा होते हैं तो पूर्व जन्मों की मानसिकता को अनुसार हमारे अंदर एक स्वाभाविक 'वासना' होती है। इसका कारण हमारे प्रारब्ध कर्म और संस्कार (गहरी जमी स्मृतियों को सार) द्वारा बनाई गई हमारी मानसिक वृत्ति होती है जो है । जो प हमारे कर्मों को इस जन्म में संचालित करती है। इसी को अनुसार हमारे के अनुसार हमारे ह ा सहज-स्वाभाविक गुणों का निर्धारण होता है अर्थात् हम एक सहज वृत्ति को साथ पैदा होते हैं जो हमारे पिछले जन्मों की वासना के अनुरूप बनती है। इसी पर निर्भर होती है हमारे सहज 'गुण' की वृत्ति कि हमारी प्रकृति का संचालन कौन-सा गुण करेगा – सात्त्विकी, राजसी या तामसी या तामसी गुण।

प्रक्ष्ठ । इस होती रहित, केवल, स्वभाव, से उत्पन्न, श्रद्धा, सात्त्विकी, राजसी, और

17.3

17.4

17.5

मुझे त्रास मत दो का 17.2 रिस का श्री श्री भगवान, बोले – ''मनुष्यों' को वह शास्त्रीय, संस्कारों से

हैं। तामसी – ऐसी तीनों प्रकार की होती है। उसको (उसको (उसको बारे

भारत! सभी मनुष्यों में श्रद्धा उनके अंत:करण के अनुरूप

होती है। पुरुष स्वयं श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा

सारिवक पुरुष देवों को पूजते हैं, राक्षस पुरुष यक्ष और राक्षसों को

तथा अन्य जो तामसी मनुष्य हैं वे प्रेत और भूतों को पूजते हैं।

जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मन कल्पित और घोर तप को तपते हैं तथा दंभ एवं कामना, आसक्ति और बल को

अभिमान से युक्त हैं, जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को

और अंत:करण में स्थित मुझ अंतर्यामी को भी कुश करने

कृष्ण स्वयं कहते हैं कि ऐसा कुछ भी करने की कोई ज़रूरत नहीं। जो लोग ऐसा करते हैं वे अपने दर्प और अहम् को मारे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि मैं यह सब कर सकता हूं। विशुद्ध अहम् या दर्ष का भाव इनका संचालक है। कुछ लोग बरसों कीलों को बिस्तर पर पड़े रहते हैं या अपना एक हाथ लगातार ऊंचा रखते हैं। यह सब मूर्खतापूर्ण कृत्य हैं जो शरीर को कष्ट देने के लिए किए जाते हैं। ऐसे लोग अपने शरीर में विद्यमान परमात्मा को भी कष्ट देते हैं। कृष्ण बड़ी स्पष्टता से कहते हैं – ''शरीर में विद्यमान अपनी आत्मा को

कष्ट मत दो। शरीर का दुरुपयोग मत करो। यह शरीर प्रभु का मंदिर है।'' अपने को त्रास देकर हम उस चरम चेतना को भी कष्ट देते हैं। कृष्ण कहते हैं जो इस चरम चेतना– जो हमारे शरीर में विराजमान है को त्रस्त करते हैं, वे राक्षस हैं। रावण ने भी तय किया था और अपने शरीर व उसमें विराजमान चरम चेतना को भी कष्ट दिया था। यह सब करना कतई बेमानी है। कृष्ण कहते हैं- "स्वयं को कष्ट मत दो।'' ईश्वर ने कभी नहीं कहा कि शरीर को कष्ट दो। ऐसे तो कुछ ही लोग हैं जो हर समय किसी का नाश करना चाहते हैं, इसलिए जब कुछ नहीं मिला तो स्वयं का नाश करने पर उतारू हो गए। इस तरह के त्रास का एकमात्र संचालक भाव है अहमन्यता जिससे उनकी शक्ति का लोहा माना जा सके।

किसी भी शास्त्र में यह नहीं सिखाया जाता कि कैसे दूसरे को मारों या किसी पर काला जादू चलाओ। कुछ दिन पूर्व मेरी किसी से 'यंत्र' (एक उपचार) के बारे में बात हो रही थी। यंत्र एक धातु की प्लेट होती है, कई मंत्रों का सचित्र अंकन होता है तथा जिसे कुछ क्रियाओं द्वारा 'प्राणवान' कर दिया

जाता है। मेरे भाषण के बाद एक सज्जन ने मुझे बताया – "मैंने एक ऐसा यंत्र ख़रीदा था, पर जब मैंने उसी को वापिस करने की बात उस व्यक्ति से की जिससे मैंने यह खरीदा था तो उसने मुझे धमकी दी कि वह मुझे श्राप दे देगा।''

यह समझ लें कि केवल प्रबुद्ध ज्ञानी जन ही किसी को श्राप दे सकते हैं। सिर्फ़ उनके पास ही यह शक्ति होती है, पर प्रबुद्ध ज्ञानी कभी श्राप नहीं देता। वही है जो वाकई अपने श्राप को असरदार बना सकता है। दूसरों को पास यह ताक़त नहीं होती। किसी अन्य का श्राप असरदार नहीं हो सकता तो आपको कोई श्राप नहीं दे सकता। यदि किसी ने ऐसी धमकी दी है तो परवाह न करें। कुछ भी नहीं होगा, क्योंकि श्राप सत्य-संकल्प अर्थात् सत्य द्वारा तभी असरदार

होगा जब कोई प्रबुद्ध ज्ञानी देगा और वह कभी श्राप देता नहीं है।

श्रीमद्भगवत गीता

यदि कोई तामसी वृत्ति वाला व्यक्ति प्रबुद्ध होता है तो वह राजस और सात्त्विक गुणों से गुजरता है, तभी उसे सही ज्ञान प्राप्त होता है। यह परिवर्तन होगा जरूर चाहे बहुत शीघ्रता से हो। वाल्मीकि तो एक डकैत थे जो लोगों को लूटते और मारते थे। उनकी मूल मानसिकता तामसी थी जिस पर राजसी की एक परत चढ़ी थी। उन्होंने एक बार नारद को पकड़कर उनसे धन मांगा। नारद ने कहा कि तुम 'नारायण' का जाप करो, जैसे ही उन्होंने प्रभु (नारायण) का नाम लिया कि उनकी वृत्ति बदल गई। वह सत्त्व की ओर चलने लगे और प्रबुद्ध ज्ञानी होकर 'रामायण' जैसे महाकाव्य की रचना को।

कृष्ण कहते हैं कि हमारी आराधना का ढंग हमारी मूल प्रवृत्ति पर निर्भर रहता है। सात्त्विक देवताओं की पूजा करता है, वह सदा शांतिप्रिय रहता है। राजसी प्रवृत्ति वाला प्राणी यक्षों तथा राक्षसों (अति प्राकृतिक ताकतों) की पूजा करता है तथा जो तामसी प्रवृत्ति का होता है, वह भूत-प्रेतों की आराधना करता है। व

जैसी आपकी मूल प्रवृत्ति होती है उसी को अनुसार आप अपने आदर्श, इष्ट देव इत्यादि चुनते हैं और उसी के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। आपकी गुणवत्ता आपकी मूल प्रवृत्ति से प्रकट होती है। यदि सत्त्व गुण वाले हम हैं तो हमारा आदर्श कोई शुद्ध पुरुष या देवता होगा। जैसे यदि हमारे कक्ष में विवेकानंद की तस्वीर लगी है तो हमारा सात्त्विक भाव है। यदि किसी अभिनेता का चित्र हमारे कमरे में है तो हमारी वृत्ति राजसिक है। यदि हम मारधाड़ वाली पिक्चरों के अभिनेता को पसंद करते हैं तो हम राजसी के साथ-साथ थोड़े तामसी भी हैं। विशुद्ध तामसी वृत्ति वाले को हिंसात्मक दर्शन में आनंद मिलता है। यदि आप लगातार टीवी के सामने बैठकर मारधाड़ वाली फिल्में या दूश्य देखना पसंद करते हैं, तो आप तमस में लिप्त हैं। हम मेर पर पर पर पर एमए गए हम

कृष्ण कहते हैं कि हमारे आदर्श-इष्ट से हमारे गुण की पहचान हो सकती है। अंतिम श्लोक में तो वह स्पष्ट कहते हैं - "शरीर को त्रास मत दो क्योंकि जब तुम शरीर को त्रास देते हो तो उसमें बैठा मैं (परमात्मा) भी कष्ट पाता हूं।''

अपने शरीर का दुरुपयोग मत करो

| हमारे शास्त्र हमसे कभी नहीं कहते कि शरीर को विभिन्न तपों और पीड़ाओं से त्रास करो। आग पर चलना, बरसों खड़े रहना फालतू क्रियाएं हैं। जब कभी मैं आपकी ऐसी किसी त्रासदायी स्थिति से गुज़रता हूं तो मेरा उद्देश्य मात्र आपको वह बंधी-बंधाई जीवनशैली को भंग करने का होता है। आपको ऐसे किसी कृत्य में लिप्त होने की कोई ज़रूरत नहीं यथा – ''रोज़ सवेरे उठकर मैं दस फुट आग भरे स्थल से गुजरूंगा।'' नहीं… कोई ज़रूरत नहीं।' में इस म

श्रीमद्भगवत गीता

विश्वास और अभ्यास दिए

भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार 17.7 का प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके पृथक-पृथक भेद तू मुझसे सुन :-

अब कृष्ण भोजन की बात करते हैं। विभिन्न प्रकार के लोगों को तीन प्रकार का भोजन ही प्रिय होता है, पर इस पर चर्चा करने के पूर्व मैं यह चाहता हूं कि तीन प्रकार की श्रद्धा की चर्चा कर ली जाए, जो हमारा आधार बनती है।

एक प्रकार के लोग होते हैं जो सदैव ऋणात्मक रहते हैं। वे सदा शक करते रहते हैं, हर चीज़ पर। वे कभी कोई विश्वास नहीं करते। ऐसे लोग कभी उठना ही नहीं चाहते; सदा गूंगे-बहरे से बने रहते हैं। उनका हम कुछ नहीं कर सकते। यह एक समूह है।

दूसरा समूह उनका होता है जो विश्वास तो करते हैं पर उसको अमल में नहीं लाते अर्थात अभ्यास नहीं करते।

तीसरा समूह उनका होता है जो विश्वास भी करते हैं और पूरी सच्चाई से उसको अभ्यास में लाते हैं।

यही तीन समूह होते हैं सब लोगों के। पहला शक्की लोगों का; वे सदा शक ही करते हैं, पूर्वाग्रहों से ग्रसित रहते हैं। यह समूह तमस में ही पड़ा रहता है। दूसरा समूह जो विश्वास तो करता है पर अभ्यास नहीं करता, राजस वृत्ति के लोगों का होता है। तीसरा समूह विश्वास को ईमानदारी से अभ्यास में लाने वालों का होता है – ये सात्त्विक गुण वाले होते हैं। कृष्ण इन तीनों समूह का अंतर स्पष्ट करते हैं – शक्तियों का, 'विश्वासियों' का और 'ईमानदारों' का। फिर वे बताते हैं उनके जीवन-यापन का ढंग, उनका चरित्र और कैसे हम ईमानदारी द्वारा सत्त्व गुण प्राप्त कर 'गीता' में दिए सत्यों को पूरी तरह समझ सकते हैं।

श्रीमद्भगवत गीता

वस्तुत: वही व्यक्ति जो स्वयं ऊर्जा स्वरूप हो चुका है, अपने शब्दों को वास्तविक रूप से सत्य बना सकता है। मैं यह बात फिर दोहराता हूं कि सिर्फ प्रबुद्ध व्यक्ति का ही श्राप असरदार हो सकता है और ऐसे ज्ञानी कभी श्राप देते ही नहीं हैं। प्रबुद्ध ज्ञानी तो वैश्विक चेतना में रहते हैं - उनके लिए तो किसी और को श्राप देना, मतलब स्वयं को श्राप देना होता है।

कोई श्रापों से कभी डरना नहीं, चाहिए। कोई श्राप नहीं दे सकता। एक बात निश्चित है - अगर कोई अप्रबुद्ध व्यक्ति श्राप देता है तो वह दूसरे को बजाय स्वयं को ज्यादा आहत करता है, इसलिए कभी श्राप से मत डरो।

आध्यात्मिक संबंध तो भय या लालच के कारण बन ही नहीं सकते। भय को कारण किसी को आज्ञाकारी होने की ज़रूरत नहीं है। यदि कोई ऐसी ज़बरदस्ती करता है तो उसकी परवाह कतई न करें। हमें कभी किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है।

यहां कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि कोई तप इत्यादि करना आवश्यक नहीं है। आप ऐसे शरीर को कष्ट देने वाले तप, सिर्फ अपनी ऐंठ या अहमन्यता के कारण ही करते हैं दूसरों पर प्रभाव दिखाने को पर उससे आपको मिलता कुछ भी नहीं है। अपने दर्प या अभिमान को वशीभूत होकर जो ऐसा करता है वह वास्तव में राक्षस होता है।

दिन राक्षस तो तमस या अज्ञान में ही गहरे रूप से पड़े रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों का कर्म संचालन सिर्फ अहम् द्वारा होता है। उन्हें न दूसरों की परवाह होती है और न अपनी। ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से शून्य होता है।

श्रीमद्भगवत गीता

वह कदम-दर-कदम समझाते हैं कि कैसे पूर्वाग्रह युक्त शक्की लोग, विश्वासियों के स्तर तक आ सकते हैं और कैसे वे आगे बढ़कर ईमानदारी के सात्त्विक स्तर तक आ सकते हैं। यहां जितने बैठे हैं वे सब विश्वास स्तर वाले हैं।

क्योंकि यदि आप पूर्वाग्रह युक्त होते तो यहां नहीं होते। यदि आते भी तो एकाध बात सुनकर चले जाते। कुछ लोग तो यहां सिर्फ यह देखने को आते हैं कि यहां हो क्या रहा है। दो-तीन मिनट यहां रुके, फिर अपनी घड़ी देखने लगे। दो-तीन मिनट के समय में भी वे सदा चलते-फिरते ही रहते हैं और यह कहकर - ''अरे बहुत हो गया! यह स्वामी तो एक लड़का ही है। इसे ऐसा क्या मालूम होगा, जिसे मैं पहले से नहीं जानता होऊं?''

तो आप यहां तभी टिकेंगे जब आप कम-से-कम विश्वासी स्तर के होंगे। आपका यहां रोज़ आना और प्रवचनों को सुनना कम-से-कम यह दिखाता है कि आप विश्वास करने वाले तो हैं।

बस, आपको तो एक स्तर ऊपर छलांग लगानी है, ईमानदारी को स्तर पर पहुंचने को लिए, जैसे ही हम उस स्तर तक पहुंचे कि हमें सत्यानुभूति हो जाएगी, हम कृष्ण हो जाएंगे, कृष्ण चेतना की अनुभूति करने लगेंगे।

अब हम सच्चाई को अनुभूति को प्राप्त करने की विधि में प्रवेश करेंगे अर्थात् उस तरीको में जो हमें कृष्ण चेतना तक ले जाएगा।

यहां एक चुनाव आपको ज़रूर करना पड़ेगा या तो आपको यह पूरी ईमानदारी से मानना पड़ेगा कि जो मैं कह रहा हूं वह पूर्ण सत्य है या वह पूरी तरह से झूठ है। यदि जो मैं आपको बता रहा हूं वह आप अपने अभ्यास में उतार नहीं सकते तो वह पूरा झूठ है, क्योंकि यदि वह आपके अभ्यास में नहीं आया तो उस सत्य से क्या लाभ? तो मैं जो कह रहा हूं वह सत्य है या झूठ, इसका निर्णय आपको ही करना है, क्योंकि वह सिर्फ आप ही कर सकते हैं। यदि मेरा मेरा कहा आप अपने जीवन में, अभ्यास में उतार सके तो मैं सच कह रहा हूं। यदि नहीं तो फिर सुनने से भी क्या लाभ है? कुछ नहीं! कोई फायदा नहीं। लगातार 18 दिनों तक रोज़ तीन घंटे आपके और मेरे बर्बाद ही हुए हैं...और क्या! यानी अगर आपके जीवन में यह सत्य नहीं उतरे तो यह सब झूठ है। यदि आपके जीवन में बदलाव नहीं आया तो यह प्रवचन इत्यादि समय की बर्बादी से ज़्यादा कुछ नहीं है। तब तो जो कुछ यहां हुआ वह सब झूठा है, असत्य है।

प्रयोग करने के लिए साहस करना ही यथेष्ट है

मेरे शब्दों का प्रभाव आपकी चेतना पर यह तय करता है कि जो कुछ मैंने कहा वह सत्य है या झूठ है। एक बात और समझ लें कि

श्रीमद्भगवत गीता

आपको यहां जो करना है उसे पूरी संपूर्णता या महारत के साथ करने की जरूरत नहीं है।

प्रयोग करने का साहस करना ही यथेष्ट है (अपने विश्वास के साथ)। इतने दिनों तक मेरा आपसे इतना कहने के बाद आप कहना चाहेंगे - " तो फिर दो-तीन दिन तक हम लोग ऐसा ही क्यों न करें?'' यदि आप में ऐसा साहस है तो काफी है।

यदि ऐसा नहीं है तो मेरा यहां यह सब कहना और चीख़ना-पूकारना तो ऐसा ही है मानों कोई हिंदु राजनीतिज्ञ अपनी सार्वजनिक सभा में बोल रहा हो। यदि आप दक्षिण भारत में हैं तो आप हर महीने किसी-न-किसी नेता के भाषण सुनने से बच नहीं सकते। वे लाउडस्पीकर पर बोलते हैं सारे शहर-भर में। उनका भाषण सुनने से कोई वंचित नहीं रह सकता।

अब मैं आपको एक वास्तविक घटना का हवाला सुनाता हूं जो कुछ समय पहले हुई थी। मैं पाड़ुकोट्टाई (तमिलनाडु) से अपने बैंगलोर स्थित आश्रम के लिए वापिस आ रहा था। अचानक लाउडस्पीकर पर एक आवाज आने लगी। वह व्यक्ति देसी भाषा प्रयोग कर रहा था, एक भी सभ्य शब्द का इस्तेमाल नहीं था उसकी भाषा में। एकाध बार 'हमम्-हमम्' की आवाज जरूर आती। कोई शराफत के अल्फाज नहीं थे। दस किलोमीटर तक वे शब्द हमारे पीछे ही लगे रहे यानी लगभग आधा घंटे तक। सडकों की हालत तो खराब थी ही। आधा घंटे तक यही 'भांय-भांय' कानों में पड़ती रही। दुर्भाग्यवश हमें उस मंच के सामने से भी गुजरना पडा, जहां वह सज्जन बोल रहे थे। उस मंच पर सामने केवल चार महिलाएं ही बैठी थीं, बाकी बहुत और भी मंच पर थे। सूनने वाले कम थे, बोलने वाले ज्यादा।

मैंने एक युवा बटुक (एक अविवाहित युवक जो संन्यास में दीक्षा लेने आया था) ब्रह्मचारी से पूछा- "यह हो क्या रहा है? यह आदमी ऐसे 'देसी खांटी' शब्द क्यों प्रयोग कर रहा है?''

ब्रह्मचारी बोला - "स्वामी जी! यह क्या? वह तो शालीनता से बोल रहा है। आप क्यों उसको दोष दे रहे हैं?''

मैंने कहा - "शालीनता से?"

वह बोला - "स्वामी जी! आपने कभी इन मीटिंगों में भाग नहीं लिया है, इसलिए आपको भाषा अटपटी और असभ्य लग रही है। यहां को हिसाब से तो यह शालीन ही है।''

मैंने पूछा - "तो वहां केवल चार महिलाएं ही क्यों बैठी थीं श्रोताओं में?''

वह बोला - "लाउडस्पीकरों को कारण दस किलोमीटर के क्षेत्र में उम नेता की आवाज लोग घर बैठे ही सुन लेते हैं। वे उसे सुनने उस नेता के पास क्यों जाएं?'

उधर, उस मीटिंग में वह वक्ता भीड़ से कह रहा था - "प्यारे भाइयो। आप यहां एक समुद्र की तरह इकट्ठे हो...।'' जबकि वहां सिर्फ चार महिलाएं ही थीं जिन्हें वह श्रोताओं का समुद्र कह रहा था और वे चारों महिलाएं पान चबा रही थीं और जमीन पर लगातार पीक करती जा रही थीं।

ये चारों वृद्ध महिलाएं थीं। लगता था मानों वे अपनी बहुओं से लड़कर आईं थीं। फिर वे जाती भी कहां? यहां कुछ मजा भी था, इसलिए इधर ही आ गई थीं।

उन महिलाओं ने सोचा होगा – "चलो यहां चलकर बैठते हैं। शायद भाषण आदि के बाद कुछ कपडे या अन्य भेंट प्राप्त हो। यदि कुछ नहीं मिला तो कम-से-कम कुछ झंडे ही हम उखाडकर ले जाएंगे घर में पोंछा लगाने के काम आएंगे।'' शायद इसी कारण वे वहां मीटिंग में आई थीं।

यह समझ लें कि यदि हम में अपने सत्य और विश्वास के साथ प्रयोग करने का साहस नहीं है तो यह प्रवचन मीटिंग भी वैसे ही सिद्ध हो सकती है। यदि हम सत्य को अभ्यास में नहीं उतारेंगे तो हम कृष्ण के शब्दों को अपने ऊपर असर दिखाने से रोकेंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह प्रवचन भी वैसे ही एक राजनीतिक जनसभा होकर रह जाएंगे। उसे ऐसा न बनाएं। इन शब्दों को अपनी समझ को बांधने दीजिए। सत्य के साथ अपना प्रयोग करें, क्योंकि यदि आपने यह परख नहीं की तो मानसिक रूप से आप यही समझेंगे कि यह सत्य नहीं है।

हो सकता है आप सोचें - ''यह स्वामी इसलिए ऐसा करने को कह रहा है क्योंकि इसने यह कहीं पढ़ लिया है।'' पर यदि आप इसे सत्य समझते हैं तो आप यहीं टिके रहेंगे नहीं तो आप यहां से चले जाएंगे। यदि आप इसे सत्य नहीं समझते तो क्या इतने दिनों तक रोज़ तीन घंटे यहां आकर बैठते? आप कुछ और करते – टीवी देखते या कहीं और जाते पर आपको यहां पर उपस्थिति यह बताती है कि आप इसे सत्य समझते हैं (जो मैं कह रहा हूं)। यदि आप इसे सत्य समझते हैं तो फिर इसे परखने में, इसके साथ प्रयोग करने में हिचकिए मत।

साहस रखिए इस प्रयोग को लिए। कोई एक विचार चून लीजिए- पूरी गीता के बताए सत्यों का प्रयोग करना जरूरी नहीं है। सिर्फ एक विचार ही चुन लें और उसे अपने अंतर्मन में उतारने का प्रयास पूरी ईमानदारी से करें। अपने पूरे अस्तित्व में वही विचार व्याप्त होने दें।

स्वामी विवेकानंद कहते हैं- "जब आप एक ही विचार से बंधते हैं तो वह विचार आपके खून में उबाल पैदा करता है। आपके सिर के बाल भी रोमांचित होते हैं। आपका समुचा शरीर, सारी सोच, दिमाग उसी विचार से अभिभूत रहते हैं। आपका समचा अस्तित्व उसी विचार को समर्पित हो जाता है।''

तो एक कोई विचार या सत्य या अवधारणा को चून लें और अपनी परख पारंभ कर दें। यदि असफल भी रहते हैं तो कोई हर्ज नहीं, पर उसके साथ काम करने का साहस रखें। यदि सफल हुए तो आप उस सत्य को आत्मसात् कर लेंगे और मुक्ति पाएंगे... आनंद मग्न होंगे। यदि असफल रहे तो आपको मालूम पड़ेगा कि यह बात सत्य नहीं है, आपका मत स्पष्ट हो जाएगा। फिर आप अपनी खोज अन्यत्र जारी रख सकते हैं तो आप मन में पक्का विचार कर लें। कृष्ण यह एक मूल सत्य बता रहे हैं आपको पूरी तरह ईमानदारी से इसे ग्रहण करना चाहिए।

जैसा पहले बताया था. लोगों के तीन समूह होते हैं - तामसिक लोग पूर्वाग्रह-संशय युक्त रहते हैं. यानी सदैव ऋणात्मक रहते हैं। राजसी लोग बौद्धिक रूप से विश्वास करते हैं. पर सात्त्विक लोग पूरी ईमानदारी से विश्वास करते हैं। वे सिर्फ भरोसा नहीं करते अपने विश्वास को परख करने का भी हौसला रखते हैं। इस साहस से स्वयं को वंचित न करें। इन शब्दों को स्वयं को बेधने दीजिए।

श्रीमद्भगवत गीता

महान राजा हरिश्चंद्र ने अपना राज्य लुटा दिया, पत्नी को बेच दिया और अपने बच्चे और स्वयं पर भी मौत का ख़तरा आने दिया, पर अपना वचन निभाया। हमें शब्द की समझ उसके मूल भाव को संदर्भ में ग्रहण करनी चाहिए।

शब्द बड़ी आसानी से गलत समझे जा सकते हैं, पर शब्दों का मूल भाव समझ से चूकना नहीं चाहिए। शब्दों का मूल भाव आसानी से गलत समझा जा सकता है। उसका गलत अर्थ भी निकाला जा सकता है। यदि आप साहस के साथ, अपने सत्य के साथ प्रयोग कर उसे परखते रहेंगे तो ऐसी गलती नहीं होगी। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो समझ लीजिए आपके लिए यह सत्य नहीं है - उसे भूल जाएं। तब कम-से-कम अन्यत्र खोज करने के लिए तो आप स्वतंत्र रहेंगे।

अनुभव के साथ प्रयोग ( परखना )

यदि आप समझते हैं कि कोई सत्य अपने जीवन में उतारने और पालन करने के लिए नहीं है तो उसे छोड दीजिए, क्योंकि फिर आपकी यह आदत हो जाएगी कि सत्य को सुना और उस पर अभ्यास नहीं किया। यह आपको मानसिकता ही हो जाएगी, जो बहुत खतरनाक मानसिक स्थिति होती है। लोग प्राय: मुझसे पछते हैं- "स्वामी जी! क्या मैं प्रबुद्ध होने के लिए सब कुछ त्याग दूं? क्या संन्यासी हो जाऊं?"

मैं उनसे कहता हूं- "नहीं! इसकी कोई जरूरत नहीं। सिर्फ एक काम करो - ऐसी मानसिकता मत रखों कि किसी सत्य के बारे में सुनो और उसको अपने आप न आजमाओ। बस! क्योंकि यह किसी भी प्राप्ति के लिए एक बेहद ख़तरनाक स्थिति है। किसी सत्य को पाना और स्वयं उसकी आज़माइश करने का साहस न रखना, सबसे भयावह मानसिकता होती है। यह वह भयंकर राक्षस है जिसके चंगुल में आप पड़ सकते हैं। इसलिए कम-से-कम इतना साहस तो रखों कि यह तय कर सको- "यह मेरे लिए नहीं है क्योंकि यह सत्य नहीं है।" यदि आप उस तथ्य को सत्य समझते हैं तो उसको आजमाने का साहस भी आप में होना ही चाहिए।

अभी तक आपने कई बातें सुनीं। कृष्ण इस अध्याय में नया कुछ भी नहीं कहते। सिर्फ़ एक ही बात वे कहते हैं- "ईमानदार (या सच्चे) रहो।'' ईमानदारी सीधा रास्ता है। मैं लोगों से कहता हूं- "सच्चाई मूल आध्यात्मिक गुण है। यही सब गुणों का सार है।'' अर्थात् पहले एक भले-सच्चे आदमी बनो। जिसमें विश्वास रखते हो उसके लिए पूरी तरह सच्चे रहो। यदि किसी सत्य के बारे में स्पष्टता नहीं है तो उसे मत मानो। यदि कुछ भी तुम्हारे लिए सत्य है तो उसको

श्रीमद्भगवत गीता

हम जो खाते हैं वही होते हैं

17.8 - आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति बढ़ाने वाले रसयुक्त चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय - ऐसे आहार सात्त्विक लोगों को प्रिय होते हैं।

17.9 कड़वे, खट्टे, लवण युक्त, बहुत गर्म, तीखे, रूखे, दाहकारक और दु:ख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुषों को प्रिय होते हैं। 17.10 तथा जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गधयुक्त, बासी और उच्चिष्ट है तथा जो अपवित्र है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है।

कृष्ण अब उन भोजनों की बात करते हैं जो सात्त्विक, राजस और तामसी लोगों को प्रिय होते हैं। वे बताते हैं कि इन लोगों को स्वभावत: कौन-सा भोजन पसंद आता है; वे कैसे जीवन-यापन करते हैं और किस प्रकार के अनुभव उनको प्राप्त होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण है कि किस प्रकार की समझ इन लोगों की होती है। शब्द चाहे वही हों, पर समझ का फ़र्क होने से उनका अर्थ अलग-अलग समझा जा सकता है।

कुछ दिन पहले मैंने एक विद्वान को एक कथा सुनाई, जिसने मुझे राजा हरिश्चंद्र की कथा सुनाई। राजा हरिश्चंद्र वह राजा था जिसने अपना वचन निभाने के लिए अपनी पत्नी और बच्चे तक को बलिदान कर दिया था। कथा ख़त्म करने के बाद उस व्यक्ति ने दो लोगों से पूछा- "आपको इस कथा से क्या समझ में आया?''

पहला बोला – "चाहे भले ही मौत हो जाए, पर सदा सत्य बोलना चाहिए।''

दूसरा बोला – ''यदि आपातकाल हो तो अपनी पत्नी तक को बेचा जा सकता है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।''

यानी एक ही कथा को दो अलग-अलग समझ पैदा हुईं। इस कथा में

श्रीमद्भगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

मैं आपको अपने व्यक्तिगत अनुभव से बता सकता हूं कि यदि आप खड़े होकर देखें तो ख़तरा आपके घुटनों तक भी नहीं पहुंच पाएंगा, जिसे आप संसार-सागर समझते हैं, वह तो बहुत उथला है। यह आपको कोई हानि नहीं पहुंचा सकता, लेकिन खड़े होने को लिए साहस तो दिखाना ही पड़ेगा। उदाहरण को लिए इसी लघुकथा में यदि शिष्य यह सोचने लगता – ''अरे! मैं तो डूब रहा

जब आप खड़े हो जाते हैं तो आप संपूर्ण 'संसार सागर' या 'भव सागर' को पूरा देख पाते हैं। तब आपको मालूम पड़ता है कि आपके लिए जो एक भयंकर चिंता का विषय है वह आपके घुटने तक भी नहीं पहुंच पाता है (अर्थात् ख़तरनाक बिल्कुल नहीं है)। चूंकि आप लेटे हुए हैं, खड़े होकर नहीं देख रहे आपको लगता है, आप डूबने वाले हैं – मरने वाले हैं।

अब शिष्य भयभीत हो गया। भय के मारे वह खड़ा हो गया और उसने देखा कि नदी का पानी सिर्फ उसके घुटनों तक ही पहुंच पाता था।

स्वामी ने कहा – "खड़ा हो जा और स्वयं को बचा ले।" शिष्य बोला - "नहीं-नहीं स्वामी! मुझे बचाएं। फिर आप अपने पाठ सिखाएं। "

स्वामी चिल्लाकर बोला '_ ''मूख! मैं कहता हूं,खड़ा हो, जा।''

खुद ही परमात्मा का अंश हो। बचाओ अपने आपको।'' शिष्य ने व्याकुल होकर कहा – ''स्वामी! पहले मुझे बचा लें, फिर अपने दर्शन का पाठ सिखाएं, तब आप ध्यान करवाएं – पर पहले बचा तो लें।''

"स्वामी! मुझे बचाइए! मुझे बचाइए।'' ज़ेन स्वामी ने कहा – "तुम तो एक आत्मा हो। बचाओ स्वयं को। तुम

एक प्रबुद्ध ज़ेन स्वामी और उनका शिष्य स्नान करने के लिए एक नदी के तट पर गए। अचानक वह शिष्य नदी में गिर गया और चिल्लाने लगा

एक लघु कथा

इसी प्रकार आप अपने अंतर्मन के वैज्ञानिक बन जाओ – एक आध्यात्मिक वैज्ञानिक। आप में इतना साहस होना चाहिए कि अपने अनुभव को स्पष्ट शब्दों में व्यक्त कर सको। तुम में उसके साथ खेल करने का माद्दा होना चाहिए। यदि सत्य है तो वह हर तरह से सत्य रहेगा।

निरंतर आज़माते रहो। सत्य तभी मानो जब उसका प्रयोग कर, आज़माइश कर तुम स्वयं संतुष्ट हो जाओ।'' वैज्ञानिक यह साहस रखते हैं। वे जिसे सत्य समझते हैं, उसके साथ निरंतर प्रयोग कर उसकी आज़माइश करते रहते हैं। फिर जी उनका शोध परिणाम देता है उसे वे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।

हं और मुझे बचाने को बज़ाय गुरु जी मुझे अव्यावहारिक बातों का ज्ञान दे रहे हैं। यह कैसे गुरुजी हैं?'' यदि वह अपने गुरुजी पर ही दोषारोपण करता रहता नो निश्चित ही उस नदी में डूब जाता, पर उसने इतना साहस दिखाया कि अपने गरू की बात पर भरोसा कर उसे मानने के लिए खडा हो गया। यानी उसने अपने विश्वास के साथ साहस दिखाया और उसकी आजमाइश की। वह बच गया। सत्य जानने के लिए आपको स्वयं यत्न करना चाहिए यानी साहस दिखाना चाहिए अपने विश्वास को परखने को लिए। इसमें आप कुछ खोते नहीं हैं, पाते ही हैं। वैसे भी यदि कोई चीज गंवाने योग्य है तो उसको जल्दी-से-जल्दी गंवाना ही श्रेयस्कर है। आप उसको गंवाने से हल्के ही होंगे। सत्य प्राप्त करने में क् फालतू चीजों से मुक्ति मिलती है तो अच्छा ही है। जितनी जल्दी ऐसा हो उतना ही बेहतर। इससे आपका भला ही होगा।

ईश्वर करे आप सदैव सत्य से ओत-प्रोत रहें। जो नहीं टिक सकता, जो झूठ है, असत्य है - उससे मुक्ति पाना ही बेहतर है - वह भी शीघ्राति-शीघ्र।

कृष्ण यहां बताते हैं कि विभिन्न प्रकार के भोजन कैसी ऊर्जा प्रदान करते हैं। साधारणतया भोजन तो वनस्पति से प्राप्त नहीं किया जाता, कुछ पशुओं के माध्यम से प्राप्त होता है (मांस) जो ऋणात्मक ऊर्जा देता है। गर्म और मसालेदार भोजन कामनाओं को बढ़ाता है। आध्यात्मिक अभ्यास को लिए तो निरामिष भोजन श्रेष्ठ है जो ताजा और बेमसालेदार होता है।

हमारे नित्य स्पिरीचुअल हीलिंग सिस्टम में यह जरूरी है कि निरोग करने वाले पहले स्वयं निरामिष हो जाएं तथा एल्कोहल, तम्बाकू एवं नशे के पदार्थों से मुक्त हों। मैं मांस और एल्कोहल के खिलाफ नहीं हूं, न मेरी कोई पशुओं को प्रति क्रूरता न दिखाने के विभिन्न सिद्धांतों में मान्यता है। पेड-पौधों में भी जीवन होता है, यद्यपि उनकी आवृत्ति फर्क होती है। इसलिए यदि सामिष लोग पशुओं के प्रति क्रूर होते हैं तो निरामिष पेड-पौधों के प्रति वह निर्ममता दिखाते हैं।

हमारा THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM 'स्पिरीचुअल हीलिंग सिस्टम' गहन ध्यान की विधियों पर आधारित है। ध्यान से प्राप्त ऊर्जा के असरदार होने के लिए आवश्यक है कि ऋणात्मक ऊर्जा देने वाले भोज्य पदार्थ प्रयोग में न लाए जाएं। मैंने स्वयं देखा है कि ध्यान में एल्कोहल, मांस और नशे की चीज़ें रोड़ा बनकर उभरती हैं। इसलिए यदि साधक इन चीज़ों का प्रयोग करते हैं तो शारीरिक और मानसिक रूप से इनका बरा असर पड़ता है।

कई लोग शिकायत करते हैं कि यह शर्त बंधनकारी है पर मैं क्या करूं? उन साधकों के लिए जो हीलर्स बनना चाहते हैं, मैंने इन शर्तों में थोडा परिवर्तन किया है। जो स्वयं हीलिंग वाले हैं उन्हें मांस खाने, डिंक करने या सिगरेट पीने को छूट है, पर दिलचस्प सत्य यह है कि इनमें से कई सामिष भोजी, शयु है आदी और सिगरेट पीने वाले स्वयं ही इन चीज़ों को त्याग देते हैं। थोड़े सम बाद मानो शरीर मन-तंत्र स्वयं ही इन निम्न ऊर्जा प्रदायक खाद्य पदार्थों को त्य-देता है। नाम

में किसी भी ध्यान को गंभीर तकनीक की मांग होती है साधक को ऊबं के क्षेत्र में लाना। कृष्ण द्वारा प्रयुक्त 'आहार' शब्द समस्त इंद्रियों को सिर्फ़ बिह्य को ही नहीं- गिज़ा देने वाले पदार्थों को रूप में भी समझाया जा सकता है। इंद्रियों से प्राप्त समस्त बोध का वर्णन इसी संदर्भ में किया जाता है कि जो आयु गुणवत्ता, ताक़त, स्वस्थ, प्रसन्नता और हर्ष में इज़ाफ़ा करें वह आहार है, जो आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति प्रदान करे वह सात्त्विक आहार है।

ष्काम भाव से दान-पुण्य करना

  • 17.11 'शास्त्र विधि से नियत यज्ञ करना ही कर्त्तव्य है'– जो इस प्रकार मन का समाधान कर, फल की कामना न करने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है वह सात्त्विक यज्ञ है। 17.12 हे भारतश्रेष्ठ! जो यज्ञ केवल दम्भाचरण के लिए ही (दिखाने के लिए ही) अथवा फल के भी उद्देश्य से किया जाता है, उसको तू

राजसी समझ।

  • 17.13 शास्त्रविधि से हीन, अन्न दान से रहित, बिना मंत्रों के, बिना दक्षिणा को और बिना श्रद्धा को किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं। अब कृष्ण बताते हैं कि कैसे दान दिया जाए, यज्ञ किया जाए या दूसरों को सेवा को जाए। वैदिक कर्मकांड में अग्नि द्वारा यज्ञ, होम, हवन करना कवल देवताओं की आराधना करने का ही माध्यम नहीं था। इनका बहुत गहरा अर्थ था जिससे जीवधारियों एवं दीन-हीनों का भला हो सकता है। इस प्रकार की कर्मकांडीय गतिविधियों का प्रमुख तत्त्व था - किसी सुयोग्य गरीब को दान या भेंट देना। जो भी इन यज्ञों में आता था वह कभी. खाली हाथ नहीं जाता था। जब महान ऋषिगण, प्रबुद्ध स्वामी इन यज्ञों को करते थ तो उनकी अपनी कोई चाह नहीं होती थी। वे तो इन्हें अपने अनुभूत सत्य के अनुसार करते थे जो उन्होंने अपनी शास्त्र प्रदत्त समझ द्वारा प्राप्त किया था। उनकी कोई कामना नहीं होती थी। वह तो यह यज्ञादि नित्य करते थे अपनी जीवन्ता को व्यक्त करने के लिए। यज्ञ इस प्रकार किए जाते थे जिससे देवी-देवता और प्रकृति खुश रहकर मानवों का कल्याण करे। यह सब सात्त्विक

भाव द्वारा की गई निष्काम साधना का अंग था। राजा लोग भी ऐसे दान-पुण्य किया करते थे। उनके यज्ञ उनकी शक्ति प्रदर्शित करते थे और अन्य लोगों पर अपना वर्चस्व दिखाते थे। ये सारे कृत्य

उनकी अहमन्यता दिखाते थे। युधिष्ठिर जैसा राजा अश्वमेघ यज्ञ और राजस्थ यज्ञ कर अपनी श्रेष्ठता अन्य राजाओं पर दिखाते थे। वैसे इन अवसरों च राजागण अपनी संपत्ति भी दान आदि में लुटाते थे, पर इनको राजस भाव से हो

राक्षस लोग भी भयंकर यज्ञ करते थे जिसमें सिवाय अपनी कूर शक्ति प्रदर्शन के और कोई भाव नहीं होता था। इसमें कोई दान-पुण्य या शुभ कल शामिल नहीं होता था। इनकी कोई शास्त्रोक्त मान्यता थी नहीं होती थी और विशुद्ध स्वार्थी भाव से किए जाते थे। । ।

जब बालक नचिकेता के पिता ने उन बेकार गायों को, जो दूध नहीं देती थीं, यज्ञ में देने को लिए तप किया तो इस बालक ने प्रतिरोध किया- "आप क्या कर रहे हैं? आप यज्ञ में इन बेकार गायों को क्यों दे रहे हैं? यज्ञ में तो श्रेष्ठ चीज़ें दी जाती हैं। अगर आपके पास ऐसा कुछ नहीं है तो मुझे ही दान में दे दीजिए।'' और फिर अपने गहन अज्ञान और क्रोध में उसके पिता ने अपने इस पुत्र को ही मृत्यु के देवता यम को भेंट कर दिया।

दान या पुण्य को लिए दी जाने वाली चीज़ों की मात्रा महत्वपूर्ण नहीं होती, महत्वपूर्ण होता है उस चीज़ को देना, जो हम देना गंवारा ही नहीं कर सकते। यानी कुछ ऐसी चीज़ दी जाए जिसको देना हमें आहत करता हो, चोट पहुंचाता, हो। वह भी बिना किसी बदले की भावना के। ऐसा दान सीधा मुक्ति प्रदायक

कई लोग बड़ी शुभ भावना से दान करते हैं, पर. वह दान नहीं होता कि आपने अपनी वसुधा-संपत्ति में से कुछ ऐसी चीज़ दे दों जो आपके जीवन-यापन में कोई फ़र्क न्न डाले। यह कोई दान नहीं होता। मुझसे कई लोग कहते हैं – ''स्वामी जी! मैंने वसीयत कर दी है कि मेरा सब कुछ मेरी मृत्यु के बाद इस आश्रम, मंदिर या आपके मिशन को दे दिया जाए।'' मृत्यु के पश्चात् देने से क्या क े लाभ? आप तो वैसे भी उस धन-संपत्ति को साथ नहीं ले जा सकते।

दान वही है जिसको देने से आपको कष्ट हो, चोट पहुंचे, आपको परेशानी हो पर आप सहर्ष उस चीज़ को बिना किसी बदले को कामना से दे दें। यही दान का मूल भाव है। ऐसा दान जिसमें आपको कष्ट तो हो पर आप खुशी से बगैर किसी बदले की कामना से दे दें – वही असली दान है।

मैं उस दान की भर्त्सना नहीं कर रहा जो धनी लोग बिना किसी इश्तहार या फोटो सेशन के देते हैं। उनका भाव बड़ा शुभ होता है – वे किसी परेशान व्यक्ति को सहायता देने के लिए ही करते हैं। देने में वह मानसिकता होनी ही चाहिए,' जिससे किसी ज़रूरतमंद का काम बने। उस सदाशयता का भाव

श्रीमद्भगवत गीता

श्रीमदुभगवत गीता

दान के साथ ही रहता है। इस बारे में कोई संदेह नहीं है, पर वह दान राजस भाव का दान ही माना जाएगा। वह सात्त्विक दान नहीं होता। जब लोग इस राजस भाव से साल्विक भाव से दान करने की श्रेणी में पहुंचते हैं तो धन-संपदा स्वयं उनके पीछे आती है। ऐसे लोगों को पास बिना उनकी कामना को लक्ष्मी को कृपा पहुंचती है, क्योंकि लक्ष्मी देवी को मालूम होता है कि यही लोग मानवता का कल्याण करते हैं।

धन-शक्ति को कभी कमतर प्रभाव देने वाली के रूप में नहीं आंकना चाहिए। वह बड़ी ऊर्जा की खान होती है। सभी बड़ी ऊर्जाओं की तरह समस्या वही रहती है – इनका मद हमारे दिमाग को प्रभावित न करे। उदाहरण के लिए रावण और जनक का फ़र्क देखें। जनक एक राजर्षि थे अर्थात् राजा होते हुए भी ऋषि के समान। वे भी एक राज्य को स्वामी थे, पर उस पूरे राज्य-पाट को सत्ता इस तरह भोगते थे मानों वह किसी दूसरे के स्वामित्त्व में हों। वह तो सिर्फ़ उसके संरक्षक थे- एक साक्षी मात्र। इसके बरअक्स एक बड़ा तपस्वी और बड़ी तपस्याएं करने वाला महाज्ञानी रावण अपने अहम् भाव से राजसत्ता भोगता था; उनका आनंद लेता था। इसी से उसकी बर्बादी हुई।

यह सारा जगत समस्त सुख-सुविधाओं से भरा-पूरा है। यहां किसी बात की कोई कमी नहीं है। जो हमें चाहिए, हमें मिलता है पर समस्या यही है कि जो हमें मिलता है उससे हम संतुष्ट नहीं होते। हमारी कामनाएं अनन्त हैं। महान स्वामियों ने बार-बार कहा है कि विश्व में सभी की ज़रूरतें पूर्ण करने को बहुत कुछ उपलब्ध है पर एक भी आदमी का लालच पूरा करने को कुछ नहीं है। हमारे लालच की कोई सीमा नहीं होती।

ईश्वर करे आपकी दान देने की इच्छा असीम हो - पर आपकी संग्रह करने की वृत्ति शून्य हो। तब आप देखना, आपको ताज़्नुब होगा कि कैसे धन-संपत्ति आपको पास दौड़ी चली आती है।

मनसा, वाचा, कमणा - सब दस

  • 17.14 - देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा – यह शरीर संबंधी तप कहा जाता है।

  • 17.15 जो उद्घेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो बड़े शास्त्रों को पठन-पाठन एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है – वही वाणी संबंधी तप कहा जाता है।

  • 17.16 मन की प्रसन्नता, शांत भाव, भगवत् चिंतन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अंत:करण की पवित्रता - मन संबंधी तप कहा जाता है।

    • 17.17 फल को न चाहने वाले योगी, पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए गए पूर्वोक्त तीन प्रकार को तप को सात्त्विक तप कहते हैं।
    • 17.18 जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए अथवा पाखंड के लिए ही किया जाता है, वह अनिश्चित और क्षणिक फल वाला तप यहां राजस कहा गया है।
    • 17.19 जो तप मूर्खतापूर्वक हठ से मन, वाणी, शरीर और शरीर की पीड़ा सहित दूसरों को अनिष्ट को लिए किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।

कृष्ण अब मनसा-वाचा-कर्मणा तपों के बारे में बताते हैं। तप करना अर्थात् साधारण रूप से नियम पालन करते हुए जीवन-यापन करना, एक प्रकार से अपरिग्रह की श्रेणी. में ही आता है। इसका आधार होता है आपकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति, न कि उसकी जो आपकी कामना हो। जो इसका पूर्ण रूप से पालन करता है, तपस्वी कहलाता है।

कृष्ण पहले भी कह चुके हैं और यहां पुन: दोहराते हैं कि तपस्या का मतलब स्वयं को, दूसरों को कष्ट देना या पीड़ा देना नहीं होता। इसमें सिर्फ़ शारीरिक पीड़ा या वेदना ही नहीं, मानसिक या वैचारिक वेदना प्रदान करना भी

शामिल है। ऐसे तप का कोई प्रयोजन नहीं, जो शरीर मन-तत्र को कष्ट दे तथा उसमें विद्यमान ईश्वर को भी पीड़ा दे। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि शरीर ही र्दश्वर का मंदिर होता है।

जो तप मूर्खतापूर्ण हठ के कारण स्वयं को त्रास देता है या दूसरे को परेशान करता है, वह वस्तुत: तप नहीं त्रास है। ज़्यादातर ऐसे तथाकथित तप अज्ञान के कारण ही किए जाते हैं। इसी बात को मैं काले जादू को संदर्भ में समझा चुका हूं। कोई काला जादू चलाया नहीं जा सकता, न कोई प्रेतात्मा आपके पास भेजी जा सकती है, सिर्फ प्रबुद्ध ज्ञानियों को कोई श्राप नहीं दे सकता और जो प्रबुद्ध ज्ञानी है वह कभी श्राप नहीं देता, वह तो केवल वरदान ही देता है। जमी कि है

इन ऋणात्मक चीज़ों की परवाह न करें। ये सब तमस की क्रियाएं जो कभी कारगर नहीं होतीं। वे प्राय: उसी को परेशान करती हैं जो इनको चलाता है। ये दूसरों को तो कष्ट दे ही नहीं सकतीं। जान में मिश्र के बाद कर 12 11

भगवान कृष्ण कहते हैं कि राजस गुण वाले व्यक्ति तप सम्मान, प्रतिष्ठा या पूजनीय होने के उद्देश्य से करते हैं। जब वह इस उद्देश्य से दान-यज्ञ या तप करते हैं तो वह स्थायी नहीं होता, और जब उन्हें लोगों का सम्मान नहीं मिलता, वे यज्ञादि करना बंद कर देते हैं। तब तक ही वे ऐसा करना चाहते हैं जब तक जनता उनके चरणों में गिरती रहे। यदि आदर नहीं मिला तो यज्ञ भी नहीं करेंगे। तपस्या भी नहीं करेंगे। जो भी तप किसी बदले को भावना से (चाहे भले ही प्रबोधन प्राप्ति को उद्देश्य से) किया जाता है, वह राजस श्रेणी में आता है, लेकिन जब संपूर्ण समर्पण के भाव से किया जाता है- निष्काम भाव से - तब ही वह सांत्त्विक तप कहा जाएगा और तब हो उसका कोई आध्यात्मिक मूल्य होगा। में अब अपनी तपस्या को बात करता हूं। मैंने बताया कि उस दौरान मैंने

काफ़ी भ्रमण किया। भारत-भर में भटका, कई मुश्किल काम भी किए। अब मैं समझता हूं कि कई ऐसे काम थे जो नहीं किए जाने थे।

मैंने कुंजियों का प्रयोग किया होगा प्रबोधन द्वार खोलने को। तब एक ऐसी मिली जिससे यह द्वार खुल पाया। मैं अपने शिष्यों से कहता हूं कि उन्हें वैसी यंत्रणा से गुजरने की कोई ज़रूरत नहीं, क्योंकि एक आसान, तीव्रगामी और सहज तरीका भी है।

जब तक मैं प्रबोधन प्राप्त करने के लिए ज़द्दोज़हद में उलझा रहा, यह मुझे नहीं मिला। मैं स्वयं को पूरी तरह महसूस तब ही कर पाया, जब मैंने वह माला भी त्याग दी जिससे मैं जाप करता था और रामकृष्ण परमहंस की वह तस्वीर भी, जो वर्षों से मेरे साथ थी। मैं चुपचाप ध्यान लगाकर संपूर्ण भावना से बैठ गया कि- अब जो हो सो हो। बन दिन

श्रीमदुभगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

े यही कृष्ण 'साभ्यत्व' शब्द का प्रयांग करते हैं। अंग्रेज़ी में इस 'सौष्य को लिए कोई सही शब्द नहीं है। 'सौभ्यत्व' का अर्थ है संतोष के साथ आ से स्थिर होना। यह उस स्थिति का भान कराता है जब आप ध्यान को कंद्र कर संपूर्ण चैन से बैठते हो। आध्यात्मिक लोगों को लिए तो यह एक आवृद्ध

कुछ लोग प्रबुद्ध तो हो जाते हैं, पर दूसरों की सहायता फिर भी र करते, उदाहरण को लिए मैंने एक प्रबुद्ध स्वामी को हिमालय पर देखा था. ज दिन-भर गांजा पीते रहते थे। उनके प्रबुद्ध होने में कोई संदेह नहीं था। वह अलं गांजे को चिलम में एक तांबे का सिक्का भी रख लेते थे और जब वह चिल्म पीकर उसे लौटाते थे तो उसमें से एक सोने का सिक्का निकलता था। ऐसा मैं स्वयं कई बार देखा था। वह उस सोने को सिक्के को बेचकर और गांजा खुरी लेते थे। वह उत्तरकाशी (उत्तराखंड) में रहते थे। बेशक, मेरे मन में उनके लिए बहुत श्रद्धा थी क्योंकि वे एक तपस्वी थे। वे कभी वस्त्र धारण नहीं करते थे। वे नागा साधू थे। वह प्रति

का 'नागा' का अर्थ ही होता है वह संन्यासी जो कभी वस्त्र नहीं पहनता। कड़ाके को सर्दियों में भी कभी कोई वस्त्र उनके तन पर नहीं होता है। उन्हें परमहंस भी कहा जाता है। हां, जब ये लोग शहरों में अपना दिव्य उद्देश्य ( डिवाइन मिशन) फैलाने को जाते हैं तो ये वस्त्र धारण कर लेते हैं, इसके अलावा वे वस्त्र नहीं पहनते। बाह

परमहंस बच्चों की तरह रहते हैं तो यह परमहंस स्वामी जब अपनी चिलम खाली करता था तो उसमें से एक सोने का सिक्का निकलता था। मैंने उनसे पूछा — 1 बाबा! आप एक महान तपस्वी हो, आत्म ज्ञानी हो, ब्रह्म ज्ञानी हो — तब आप गांजा क्यों पीते हो?''

वे बोले - "एक बड़ा हाथी कभी एक छोटी कुटिया में नहीं बंध सकता, इसलिए उसे थोड़ा ढीला और शांत करना पड़ता है। तभी वह विशाल हाथी एक कुटी में निवास कर सकता है। प्रबोधन के पश्चात् आत्मा इस छोटे से शरीर में नहीं रह सकती। मुझे इसे ढीला और धीमा करना ही पड़ता है। इसको ढीला करने को लिए ही मैं यह सब काम करता हूं।'' बेशक , उनकी धूम्रपान की आदत है। साधारण धूम्रपान से फ़र्क होती है। हालान

किसी ने मुझसे, पूछा – ''स्वामी जी! स्वामी, विवेकानंद, और रामकृष्ण परमहंस तो धूम्रपान करते थे। मैं क्यों नहीं कर सकता?''

में में मैंने उसे समझाया – ''स्वामी विवेकानंद प्रबुद्ध हो चुकों थे, तब उन्होंने धूम्रपान क शुरू किया था तो पहले प्रबुद्ध हो जाओ तब धूम्रपान क्या, जो मर्ज़ी करना। पहले

श्रीमदुभगवत गीता

श्रीमदुभगवत गीता

जो उन्होंने पाया वह तो पा लो, तब उनकी बराबरी की बात करना।'' जो प्रबुद्ध स्वामीगण करते हैं वही आपको करना चाहिए, यह बिल्कुल अलग बात है। वस्तत: वे तो सब कुछ उल्टा ही करते हैं उसका, जो आपको करना चाहिए। वे ऐसा काम इसलिए करते हैं जिससे वे कुछ नीचे स्तर पर आ सकें।

उत्तरकाशी वाला वह नागा साधू प्रबुद्ध तो था, पर किसी की मदद नहीं करता था। ऐसे लोगों से जनता का कोई भला नहीं होता। वह तो रहस्यमय व्यक्तित्व होते हैं। वह न किसी को कुछ ज्ञान दे सकते हैं, न किसी को प्रबुद्ध कर सकते हैं। वह लोगों के साथ कोई काम नहीं कर सकते। ऐसे लोग समाज के लिए नहीं होते।

दसरी ओर, ऐसे भी लोग होते हैं जो सत्य प्राप्त कर विश्व के साथ उसको सांझा करते हैं। स्वामी विवेकानंद व रामकृष्ण परमहंस मंहान आत्माएं थीं और दूसरों के भले के लिए अपने अनुभव बताते थे। वही उनका उद्देश्य था। 'भागवतम्' के अनुसार जो लोगों को सत्य बताते या समझाते हैं - यथा कृष्ण - वे अवतारी पुरुष होते हैं।

शुक-ब्रह्म ऋषि व्यास के पुत्र थे। व्यास जी ने ही वेदों को संकलित किया था तथा 'भागवत' और 'महाभारत' की रचना को थो। शुक-ब्रह्म एक प्रबुद्ध स्वामी थे जो निरावरण रहते थे।

उनसे एक बार पूछा गया - "प्रबुद्ध ज्ञानी एवं अवतारी पुरुष में क्या अंतर है?"

उन्होंने बड़ी सुंदरता से उत्तर दिया - "सौंदर्यत्व, तेजस्तत्त्व और सारस्वत्य तथा लक्षमित्व! सौंदर्यत्व का अर्थ है जब हम उनको देखें तो हमारा स्वत: ही मन होगा कि उनके पास बैठकर उनको सुनें। हम बार-बार उनके पास लौटकर जाना चाहेंगे, उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए। वह तत्त्व जो सहज रूप से हमारा मन आकर्षित करता है, सौंदर्यत्व होता है।

दूसरी बात है तेज़स्तत्त्व की, अर्थात् बड़ी स्पष्टता से फैलती हुई ऊर्जा ( जो उनके व्यक्तित्व से निःसुत होती है )। तीसरी विशेषता है सारस्वत्व अर्थात् चाहे कोई विचार या अवधारणा कितनी भी क्लिष्ट हो, वे उसे बड़ी आसानी से समझ सकते हैं। उनकी जिह्वा पर सरस्वती का वास होता है।

सबसे ऊपर है लक्षमित्व अर्थात् उनके विचार मात्र से धन-संपदा और कार्य तुरंत संपन्न हो जाएगा (यानी सोचा और काम हुआ)। हर चीज़ उसी प्रकार होगी जैसे वे चाहते हैं। जो कोई इन चारों तेज़ों से अपने गुण प्रकाशित करता है वह अवतार होता है।

प्रबोधन को प्रकाशित करना

यहां कुष्ण यही बात 'सौम्यत्व' के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। अवतारों के लिए भी सौंदर्य और र सौम्यत्व आवश्यक गुण है। हमें भी अपने जीवन में गुणों को समाविष्ट करने का प्रयास करना चाहिए।

वाणी की तपस्या है सत्य भाषण एवं प्रिय भाषण- 'प्रियहितम् च यत'। वाणी के द्वारा किसी का कष्ट निवारण करना अत्यावश्यक है। आध्यात्मिक साधक के लिए सौम्य एवं आरोग्यकारक शब्दों का उच्चारण आवश्यक है। ऐसी भाषा न बोली जाए जो किसी को आहत करे। हमारी उपस्थिति से ही दूसरे को आराम मिलना चाहिए। सदैव मीठे शब्द बोलने चाहिए; कटु एवं विचलित करने वाले शब्दों से परहेज करें।

एक बात और- कभी-कभी हम समझ ही नहीं पाते कि हमारे शब्द किस प्रकार दूसरे को विचलित कर सकते हैं कि कैसे हमारे शब्द दूसरे को लिए असम्मानजनक एवं भावनात्मक रूप से चोट पहुंचा सकते हैं।

जब कभी हम किसी के साथ बैठें तो उस व्यक्ति को महसूस होना चाहिए _ "'क्या कुछ देर और इनके साथ नहीं बैठूं? थोड़ा समय इनके साथ और बिता लूं। क्या कल भी इनसे मुलाकात हो सकती है? क्या फिर मिलना होगा?'' यानी दूसरों के अंदर ऐसे प्रिय भाव उत्प्रेरक भावना उठनी चाहिए। सुख या आराम को अनुभूति दूसरे को हमारे सान्निध्य से स्वत: होनी चाहिए। लोग हमारी प्रतीक्षा करें, न कि हमारा आगमन सुनकर भाग जाएं। प्राय: हम लोग ऋणात्मक प्रभाव ही डालते हैं। लोग थोड़ा असहज होते हैं और भागने की योजना बनाने लगते हैं। एक भी गलत शब्द या सही शब्द गलत ढंग से अगर बोला जाएगा तो वह सारे

भगवान कृष्ण भी यही कहते हैं। एक आध्यात्मिक व्यक्ति को सदैव प्रिय भाषण करना चाहिए। दूसरे को क्षुब्ध नहीं करना चाहिए। जब हम दूसरे को विचलित नहीं करेंगे तो हम भी विनम्र ही रहेंगे, घमंडी नहीं। यह कोई सामाजिक नैतिकता को बात नहीं, आध्यात्मिक अभ्यास में भी जरूरी है।

जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है, वे शब्द जो हम दूसरों को आहत करने के लिए बोलते हैं, हमें भी चुभते हैं। वही शब्द हम अपने बारे में भी बोलने लगते हैं। विज्ञान में ऊर्जा और स्पंदन की प्रक्रिया में यह सत्य स्पष्ट होता है है, इसलिए हमें शब्दों को चयन में बहुत सतर्क रहना चाहिए। कृष्ण कहते हैं कि हमें आध्यात्मिक साहित्य का नियमित रूप से अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने से कई शुभ विचार हमारे मस्तिष्क में प्रविष्ट होते रहते हैं। इससे हमें सत्य के

माथ अपने प्रयोग करने के लिए साहस भी मिलता है। हमारा हौसला बढ़ता है मत्य की आजमाइश को लिए।

मैं तो आपसे कहता हूं कि कोई एक सत्य का नित्य अभ्यास को साथ परीक्षण करो। मैंने पहले भी आपसे कहा है कि 'मैं-मैं-मैं' भाव से मुक्त होकर 'तम-तम-तुम' भाव द्वारा अपना जीवन संचालित करना सीखो। ऐसा कम-से-कम दम बार तो करें ही। फिर देखें अपने जीवन पर इस बदलाव का प्रभाव। यदि आपको संतुष्टि नहीं हो तो उसे छोड़कर कुछ और अपना सकते हैं, पर कम-से-कम दस दस बार परीक्षण जरूर करें, तभी आपको कृष्ण द्वारा बताए गए इस सत्य की स्पष्ट झलक मिलेगी।

बौद्धिक लोगों को दो हथियार होते हैं - शब्द और तर्क। यदि इनका सही प्रयोग किया जाए तो इनके द्वारा बहुत कुछ सीखा जा सकता है, पर इसका गलत प्रयोग इन्हें एक भयावह हथियार बना सकता है। यह हमारे ऊपर है कि हम इनका कैसे प्रयोग करें।

हमारे शब्द और विचार पानी को प्रभावित कर सकते हैं। हम लोग भी लगभग पानी से ही बने रूप हैं। इसीलिए शब्दों से हम आहत भी जल्दी होते हैं और आराम भी जल्दी पाते हैं। इन्हीं शब्दों से हम चमत्कार भी कर सकते हैं। कृष्ण कर्म के तप की भी बात करते हैं। वे भी पंचानुशासन की बात करते हैं जो पतंजलि योग में भी बताया गया है। ये पांच अनुशासन यम को हैं - सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य। यानी हम मन, कर्म और वचन से अहिंसा, अपरिग्रह (चीजों को समेटने का लालच) साधारण व सहज रूप वास्तविकता में रहना और ध्यान सदा परमात्मा पर केंद्रस्थ रखना। यह किसी भी तपश्चर्या का चरण रूप है।

कुछ लोगों का विचार है कि सत्य चाहे कितना भी कट् हो, उसको कह देना चाहिए। यह समझ लें कि यदि वह किसी को भी आहत करता है तो वह सत्य नहीं हो सकता। यह तो हमारी उस तथाकथित सत्य के बारे में समझ है। यह हमारी अहमन्यता का प्रतिफलन है. जो हमारा दिमाग सत्य रूप में दिखा रहा है। हम तब सत्य में स्थित नहीं हैं, यदि अपने इंद्रिय बोध द्वारा अपनी सीमित बुद्धि को निर्णय को सत्य समझ रहे हैं जिसको व्यक्त करने से कोई आहत महसूस कर रहा है। यदि हम ऐसा करते हैं तो हम आक्रामक भी हैं और अज्ञानी भों। हम सत्य में स्थित नहीं हैं, तब हम शुभता से भी दूर हैं।

सत्य तो करुणा का प्रतिफल होता है; उसी की अभिव्यक्ति होता है। सत्य और करुणा का चोली-दामन का साथ है। इस कारण सत्य कभी आहत नहीं कर सकता; यह तो आहत को आराम देता है।

श्रीमद्भगवत गीता

दान भी तीन तरह का होता है। 'अन्नदान' का अर्थ है भोजन-वस्त्र या वे मभी चीजें जो किसी व्यक्ति की भौतिक आवश्यकताएं पूर्ण करती हैं। दसरा दान है 'विद्यादान' अर्थात् किसी को शिक्षा देना या दिलवाना, जिसमें उसकी मानसिक बुद्धि सुनिश्चित हो, उदाहरणार्थ कोई परेशान हो और उस समय आप उसको धैर्य, सांत्वना व ढांढस देकर उसे प्रसन्नचित्त कर सकें तो वह भी 'विद्यादान' की श्रेणी में आता है। यदि किसी को अपने कमरे की सफाई करनी नहीं आती और आप उसे सिखा सकें, वह भी विद्यादान है। यदि किसी को घास खोदनी भी नहीं आती और आपने उसे सिखाया है तो यह भी विद्यादान में ही शामिल माना जाएगा।

परम दान - ज्ञान दान

तीसरा दान है- ज्ञान दान अर्थात् किसी को आध्यात्मिक ज्ञान देना। अन्नदान देकर आप किसी को कुछ घंटों तक - तीन या चार - संतुष्ट कर सकते हैं। तीन घंटे के पश्चात् तो उसे फिर भूख लगेगी। यदि हम किसी को विद्यादान देते हैं- शिक्षा या ज्ञान का साधारण दान तो आप उसको एक जीवन तक सुखी कर सकते हैं। शिक्षा द्वारा वह अपनी रोटी कमा सकता है पर यदि हमने किसी को ज्ञानदान दिया है तो कई जन्मों तक उसका उद्धार हो सकता है अर्थात् 'अन्नदान' तीन घंटों तक, विद्यादान एक जीवनकाल तक संतुष्टि दे सकता है पर ज्ञानदान तो कई जन्मों तक उसके अभावों को पूर्ति कर सकता है। फिर वह कभी अवसादग्रस्त नहीं होगा, जब तक इस भवसागर में आता रहेगा।

इसलिए 'ज्ञानदान' परम दान है।

साधारण भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि यदि किसी को मछली को चाह है और हमने उसे मछली प्रदान कर दी तो उसका एक भोजन तो संतुष्टि प्रदायक हो गया। यह अन्नदान है। यदि हम किसी को मछली पकडना ही सिखा दें तो वह पूरे जीवन भूखा नहीं मरेगा। वह विद्यादान है, पर यहां यह रूपक रुक जाता है।

हम अपने 'हीलर्स इनीशियेशन प्रोग्राम' में उस व्यक्ति को सिखाते हैं कि वह मछली खाना ही छोड दे। यह सुझाव उसकी समस्या जन्म-जन्मान्तर तक सुलझा सकता है। यह 'ज्ञानदान' है।

यदि आप यहां अचानक आएं और मेरी तस्वीरें देखकर यह सोचें - '' मैंने एक कटआउट या पोस्टर देखा था। यह तो काफी युवा है। पोस्टर कहता है कि यह 'भगवत् गीता' पर बोल रहा है। देखें - यह क्या कहता है।'' यदि आप ऐसे

कैसे (दान) दें?

दान देना ही कर्त्तव्य है - ऐसे भाव से जो दान देश, काल

और पात्र से प्राप्त होने पर उपकार न करने वालों के प्रति

दिया जाता है, वह दान सांत्त्विक कहा गया है (अर्थात् जिस

पर जिस वस्तु का अभाव हो उसी की हितकर पूर्ति बिना किसी बदले की भावना से दिया दान सांत्त्विक दान है)।

किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार को प्रयोजन से

अथवा फल को दृष्टि में रखकर दिया जाता है, वह दान

जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश काल में क्रपात्र के प्रति किया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।

कृष्ण यहां दान की अवधारणा स्पष्ट करते हैं। इस बारे में पहले ही बता चुका हूं। दान का अर्थ है दूसरों से साझा करना। इसमें देने का भाव नहीं होना चाहिए तथा किसी शुभ परिणाम को कामना से भी नहीं होना चाहिए कि उससे स्वर्ग का रास्ता हो जाएगा। दान को पीछे प्रेम और कृतज़ता का भाव रहता है। में में हे ईश्वर! तूने मुझे इतना कुछ दिया है... अब मैं इसका साझा समाज और विश्व के साथ करना चाहता हूं।'' दान में आपसदारी का, साझा करने का भाव रहना चाहिए। यह तो निष्काम रूप से कर्त्तव्य को तरह किया गया कर्म है। इससे आपके समग्र को प्रति अपने जुड़त्व, ईश्वर से संबंध की अभिव्यक्ति, होती है यह तो इस भाव से करें – ''यही मेरा सहज गुण है और मुझे करना ही है'' (बगैर किसी पर अहसान जताए)। तभी वह असली अर्थ में दान होता। है। शुभता से किया गया निष्काम भाव प्रेरित कर्म जो सही पात्र को सही देशकाल अनुसार भेंट किया जाए, दान का असली रूप होता है।

राजस कहा गया है। अब बा

भी आए सिर्फ देखने को लिए और यहां बैठे, गीता पर प्रवचन सुना तो जी आपको सहायता मिलेगी। कभी-न-कभी यही बातें आपके मन में घुमड़ेंगी बे सत्य गुंजेंगे और आप उन पर अमल करेंगे। फिर स्वाभाविक है कि आप बढ़ी व्यक्ति तो नहीं रह जाएंगे। हो सकता है कभी-कभार आप कोई गलती करें ले यह सत्य आपको मन में प्रकाशित हो उठेंगे। यह विचार आपके अंदर पहुंच चुकी होंगे। यह आपको सुधार करने की प्रेरणा देंगे तो यह भी 'ज्ञानदान' है।

अभी प्राप्त ज्ञान आपके जीवन को निश्चित ही सुधारेगा, भले ही आप उस पर अभ्यास न करें। ये शब्द इतने शक्तिशाली होते हैं कि वे आप पर जरूर ही प्रभाव डालने लगेंगे। आप वहीं व्यक्ति रह ही नहीं सकते जो (यहां आने से) पहले थे। आपके अवसाद की गहराई ज़रूर घट जाएगी। आपको लगेगा मानो आपके सामने एक नया जीवन खुल रहा है। आप में साहस बढ़ेगा और नए विश्वास को साथ आप जीवन जिएंगे। यह 'ज्ञानदान' ही है। ज्ञानदान पुण्य की चरम स्थिति होती है। आध्यात्मिक ज्ञानदान से बड़ा कोई शुभ कृत्य नहीं हो सकता।

खाना देना या विद्यादान करना तो तीन घंटे तक या एक जीवन-भर ही संतुष्ट कर सकते हैं। आध्यात्मिक ज्ञानदान तो जन्म-जन्मान्तर के अभाव मिटा सकता है। कृष्ण कहते हैं कि जब कोई दान साझा भाव से दिया जाता है तो यह सात्त्विक होता है अर्थात् परम शुचिवान एवं शुभ।

एक और बात है। ज्ञानदान में दान देने वाले व्यक्ति का कुछ नहीं जाता, बाकी दानों में तो दान देने वाला कुछ-न-कुछ भौतिक रूप से भी खोता है और पाने वाला उसे प्राप्त करता है। वैसे विद्यादान में भी दानकर्त्ता को कोई हानि नहीं होती। उसके अपने ज्ञान का स्तर घटता नहीं है, पर 'ज्ञानदान' में कुछ और ही होता है। मैं आपको एक रहस्य बताता हूं – यह जितना दिया जाता है उससे ज़्यादा ही आपको प्राप्त होता है। यह तो हर तरह से जीत का ही सौदा है। यहां आपकी प्राप्ति स्वत: ही होती है। कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। जो ज्ञान बांटता है वह और ज्ञानी बनता जाता है।

मैं आपके साथ एक और रहस्य साझा करना चाहता हूं - यह न समझें कि यहां बैठकर मुझे सुनकर केवल आप ही लाभावित हो रहे हैं। इन्हें बताकर मुझे भी बहुत लाभ मिल रहा है।

एक सादा-सी उपमा से आपको यह पूरी प्रक्रिया समझ में आ जाएगी। जब कोई स्त्री किसी बच्चे को जन्म देती है तो सिर्फ वह बच्चा ही नहीं पैदा है होता, वह स्त्री भी 'मां' के रूप में अस्तित्व में आती है। इसके पूर्व तो वह मात्र एक स्त्री ही थी, जैसे ही उसने बच्चे को जन्म दिया कि वह 'मां' हो गई।

श्रीमद्भगवत गीता

इसलिए इस प्रक्रिया में दो जन्म होते हैं- बच्चे का और उस महिला का 'मां' के रूप में। पहले वह 'मां' कहां थी, एक स्त्री हो तो थी। बच्चे को पैदा किया कि उसका पद भी 'मां' का हो गया।

इसी प्रकार जब आप मुझसे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं तो मैं भी वद्धि को प्राप्त होता हूं। इसीलिए वैदिक पद्धति में आध्यात्मिक पाठ देने को पूर्व निम्नलिखित मंत्र बोला जाता है -

"ॐ सहनाभवतु सहनउ भुनम्तु सह वीयम् करवादहि। तेजस्वी, नावधितपस्तु, मा, विद्विश्वावर्हि॥ का प्रणारी कि

उँ शांति-शांति-शांति।''

इस शांति मंत्र का अभिप्राय है - हम दोनों (गुरु और शिष्य) संपूर्णता प्राप्त करें; हम दोनों बुद्धि को प्राप्त हों। हम दोनों एक-दूसरे के सहायक रहें; हम दोनों में एक-दूसरे को प्रति वैमनस्य का भाव न हो। 2 मी में बिल्ली उच

देखें, यह मंत्र यह नहीं कहता - "तुम सीखो।" यह कहता है - " हम दोनों सीखें (वृद्धि को प्राप्त हों)।'' वैदिक पद्धति कितनी विनम्र है। सत्य कहूं तो जब मैं आपको सत्य बताता हूं तो मैं स्वयं भी सीखता हूं। शूम का का

किसी ने मुझसे पूछा - "स्वामी जी! आज आप क्या बोलने वाले हैं?"

मैंने कहा - "पता नहीं? मैं भी आपकी तरह बैठुंगा और सूनुंगा।'' यहां मेरे सामने कई संस्कृत के श्लोक रखे हैं। मैं किसी श्लोक को उठाता हूं और बोलने लगता हूं। बस! आप लोगों की तरह मैं भी बैठकर सुनता रहता है। जैसे आपको लाभ मिलता है, वैसे ही मैं भी लाभान्वित होता हूं, दोनों वृद्धि पाते हैं। यह तो सिर्फ घमंडियों का सोचना होता है कि केवल शिष्य को फायदा होता है, नहीं गुरु को भी लाभ मिलता है। गुरु तो गुरु तभी बनता है जब शिष्य हो। इसी प्रकार बच्चा होने के पश्चात् एक स्त्री मां बनती है। जब शिष्य प्रबद्ध हो जाता है तब गुरु सही मायनों में स्वामी बनता है, नहीं तो वह स्वामी नहीं है, जैसे बिना बच्चे को जन्म दिए स्त्री 'मां' नहीं हो सकती, वैसे ही बगैर शिष्य को प्रबुद्ध बनाए गरु स्वामी नहीं हो सकता। यानी जब तक आप में से किसी को प्रबोधन प्राप्त नहीं होता, मैं स्वयं को स्वामी नहीं कह सकता। यह समझ लें 1 जब ज्ञान का साझा में करता रहंगा तभी मैं भी वृद्धि को प्राप्त होता रहंगा। वह जो विनम्रता और सरलता के साथ स्पष्ट रूप से और पूरी सफाई से सत्य का साझा करता है तथा अपने अहम् भाव में लिप्त नहीं होता, तभी उसका ज्ञानदान सारित्तिक होता है और सत्त्व गुण वाला होता है जो शुभता का परम लक्षण होता है।

जब आप लोग प्रश्न करते हैं और मुझे उनका उत्तर ज्ञात नहीं होता, मैं आपसे स्पष्ट कह देता हूं कि मुझे उत्तर नहीं मालूम। लोग मुझसे कहते हैं-INF THE PEGA IDE FOR THE IT श्रीमद्भगवत गीता

यह तो उनका दान नहीं, कर (टैक्स) बचाने की तरकीब ही होती है। किसलिए?

प्राय: मेरे शिष्य मुझसे पूछते हैं कि मैं उन धनी लोगों से दान स्वीकार क्यों नहीं करता, जो आश्रम में आकर सहायता मांगते हैं और दान देने की पेशकश करते हैं? मेरे लिए हर आदमी से दान स्वीकार करना मुश्किल होता है। जब तक कि कोई यहां आकर सालभर मेरे साथ न रहे और अपनी सच्ची सदाशयता मेरे मिशन की ओर न दिखाए, मैं दान स्वीकार नहीं करता। मैं ऐसे आदमियों के चक्कर में क्यों पड़ं जिनकी मंशा न सिर्फ स्वार्थ प्रेरित है, वरन उनको स्वयं भी हराने वाली है। मेरे आश्रम का मार्ग-निर्देशन तो पराशक्ति ( परमात्मा) करती है और वही इसकी देखभाल करती है। जो वह नहीं दे सकती वह कोई नहीं दे सकता। जब उनका निर्णय न देने का हो तो कौन उस चीज़ को देने का साहस कर सकता है?

''यह क्या स्वामी जी! आप तो प्रबुद्ध ज्ञानी हैं और आप यह कह देते हैं कि मुवे

कर मैं उन्हें बताता हूं – ''केवल प्रबुद्ध स्वामी ही कह सकता है – ''मैं नहीं जानता'', क्योंकि उसके पास ही यह साहस होता है।'' यदि किसी साधारण व्यक्ति को उत्तर ज्ञात न हो तो वह शब्दों की हेरा-फेरी करता है। सीधा जबाब न देकर वह अपने श्रोतागणों को विभ्रमित करने का प्रयत्न करता है।

श्रोताओं को विभ्रमित करना कोई जटिल काम नहीं होता। यह आसान है क्योंकि श्रोतागण तो पहले से ही विभ्रमित रहते हैं। ज्यादा कुछ करने को होता ही नहीं, बस कुछ शब्दों का हेर-फ़ेर करना होता है। कोई बड़ा काम नहीं होता। यह तो केवल प्रबुद्ध स्वामी ही होते हैं जो साहसपूर्वक अपनी अनभिज्ञता प्रदर्शन कर सकते हैं और कहते हैं – ''मैं नहीं जानता।'' जब वह किसी प्रश्न का उत्तर

बिना ज्ञान को किसी प्रश्न का उत्तर देने में प्रबुद्ध होने की क्या ज़रूरत है? यह तो मुर्खतापूर्ण ढोंग दिखाने का काम है, परंतु बेबाक़, सच्चे लोग सत्य को ओर वैसे ही बढ़ते हैं, जैसा कृष्ण कहते हैं – यानी सात्त्विक दान के माध्यम् से। बाहर सितंब

े यहां में अपना सारा अनुभूत सत्य बेबाक़ी से अभिव्यक्त करता हूं – बिना किसी संकोच या आवरण को कृष्ण के अनुसार यही सारिवक दान है। फिर आगे वह राजसिक और तामसिक दान भी स्पष्ट करते हैं।

म कई बार ऐसा दान स्वेच्छा से भी नहीं दिया जाता, नहीं तो इसका भी एक बंधा-बंधाया रिवाज़-सा हो जाता, उदाहरण के लिए हिन्दू विवाह पद्धति में शादी में 'कन्यादान' करने का एक रिवाज है।

मैंने पहले वसीयत के द्वारा सारी संपत्ति दान दिए जाने की भी चर्चा की थी। ऐसे लोगों के पास विकल्प भी क्या होता है। वे इस संपदा को अपने साथ नहीं ले जा सकते। कई मामलों में ऐसे लोगों को अपनी संतानों के साथ लड़ाई हो जाती है और वे उन्हें वसीयत में कुछ भी नहीं देते। हो सकता है उनके लडके या लड़की ने उनकी मर्जी से शादी करने से इंकार कर दिया हो और अपना प्रेम-विवाह कर लिया हो और इसलिए पिताश्री बज़ाय उनको वसीयत में कुछ भी देने के अपना सारा धन दान में दे गए हों, पर यह कोई सही मायनों में दान नहीं होता, क्योंकि इसको देने का उद्देश्य कुछ और ही होता है, शुभ नहीं होता।

ऐसे भी कई लोग कहते हैं जिनका दान स्वीकार न करना है बेहतर रहता है। कृष्ण कहते हैं यह दान अज्ञान में दिया हुआ दान है। कई लोग अपनी टैक्स की चोरी से बचाया धन और आमदनी, यहां आश्रम को देने का प्रयास करते हैं।

श्रीमद्भगवत गीता

तू भी वही है

17.23 ॐ तत् सत् - ऐसे यह तीन प्रकार का (सच्चिदानंद धन) का नाम कहा गया है; उसी से सुष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण तथा यज्ञादि रचे गए हैं ('ॐ तत् सत् ' यह पृथक-पृथक रूप से ब्रह्म को महिमा (ॐ), विश्व की व्यापकता (तत्) और यथार्थना

17.24 इसलिए वेद मंत्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र में कि वार्ष विधि से नियत यज्ञ, दान और तप रूप क्रियाएं सदा 'ॐ' में बात होती (परमात्मा को इस नाम का उच्चारण करके ही) से आरंभ होती हैं। 17.25 'तत्' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार की यज्ञ-तपरूप क्रियाण और दानरूप क्रियाएं कल्याण को इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती

17.26 और 'सत्' – यह परमात्मा का नाम – सत्य भाव में और श्रेष्ठ भाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कार्य करते समय भी 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है।

17.27 तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्' इस प्रकार कही जाती है; और उस परमात्मा को लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक 'सत्' है – ऐसे कहा जाता है।

17.28 पार्थ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी (इस प्रकार) किया गया कर्म है, वह समस्त 'असत्' है – इस प्रकार कहा जाता है। इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न ही मृत्यु के पश्चात् ही (लाभ

समापन करते हुए कृष्ण एक विकल्प फर्क स्तर पर चले जाते हैं। अभी तक उन्होंने यज्ञ, तप एवं दान के बारे में बताया था और स्पष्ट किया था कि इसमें किसको कैसे करना चाहिए। लोगों की अपनी सहज प्रवृत्ति द्वारा संचालित इन यज्ञ, तप और दान की क्या विधियां हैं, इसका पूरा हवाला दिया था।

हर प्रकार का आहार, तप, यज्ञ एवं दान कृष्ण द्वारा बताए तीन वर्गों में मापा जाते हैं - सात्विक, राजसिक और तामसिक, जिन्हें क्रमश: शुभ, भावोत्दीपक और अज्ञान का क्षेत्र भी कह सकते हैं।

पर महत्व की बात यह है कि जब ये सब सांसारिक लाभ के लिए किए जाते हैं तो ये सभी कुछ शर्तों से बंधे रहते हैं। जब ये ईश्वर को प्रति करनना-ज़ापन रूप में किए जाते हैं, तब ही आप आध्यात्मिक विकास या प्रगति प्राप्त कर पाते हैं। हमारे शास्त्रों का कथन है कि जब यह राजस या तामस गुण के साथ किए जाते हैं तो परम उपलब्धि प्राप्त नहीं हो सकती। यह तो तभी प्राप्त होती है जब विशुद्ध सात्त्विक एवं शुभता के भाव में इनको किया जाए। अनजाने में जब यह कृत्य किए जाते हैं तो भी परिणाम अस्थायी ही प्राप्त होते हैं, चरम परिणाम की उपलब्ध नहीं हो पाती।

महाभारत काल में यज्ञ-विधान रोजमर्रा के जीवन का अंग बन चुके थे। आज तो ऐसा नहीं है। ब्राह्मणों को पवित्र ज्ञान का संरक्षक माना जाता है जो इन भौतिक कर्मकांडों से प्राप्त होता है। इससे जो ऋषि-मुनियों को दार्शनिक सत्य समझ में आया, उनका रक्षक भी ब्राह्मण ही माना जाता है। वही उस 'ज्ञानागिन' के संरक्षक माने जाते हैं जो इन वैदिक कर्मकांडों के द्वारा कायम रखी जाती है। इन सारे कर्मकांडों की ऊर्जा अग्नि को ही समर्पित की जाती थी। यज्ञों का उद्देश्य देवी-देवताओं एवं मूलभूत पंचतत्त्वों को संतुष्ट और प्रसन्न रखना था, परंतु तप का उद्देश्य स्वयं की ओर रहता था तथा दान का लक्ष्य होता था आपके चारों ओर मौजद लोग और वस्तुएं।

इस प्रकार अपने पवित्र पेशे के अनुरूप ब्राह्मणों से यह अपेक्षा रहती थी कि वे तपस्वियों का जीवन बिताएंगे तथा दानादि करते रहेंगे। इस अध्याय में कृष्ण इन्हीं अवधारणाओं पर प्रकाश डालते हैं, जिससे हर कोई मुक्ति को ओर बढ़ सके। यह निर्देश सिर्फ ब्राह्मणों के लिए नहीं थे, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के लिए भी दिए गए थे। हर वर्ण का व्यक्ति मुक्ति प्राप्त कर सकता है, यदि वह इन सिद्धांतों का पालन करता हो। मुक्ति का जन्म-जाति से कोई सरोकार नहीं होता।

आख़िरी तीन श्लोकों में कृष्ण वह विधि बताते हैं जिससे सभी लोग अपना लक्ष्य 'स्व' – से परम 'स्व' (आत्मा से परमात्मा) की ओर कर सकें।

वह तरीका बताते हैं, कि कैसे हर व्यक्ति अपनी करनी का फल ईश्वर क समर्पित होकर इस बंधन से मुक्त हो सके। वह इसके लिए एक आह्वान सूत्र हैं। ये तीन शब्द - 'ॐ तत् सत् ' दिव्य शब्द माने जाते हैं - ''ॐ इति इत्यन

ब्राह्मणो नेदिस्याम नमः।'' यानी प्रथम लक्ष्य, प्रारंभ या शुरुआत पर केंद्रित है।

' तत् त्वम् असि' दिखाता है दूसरा लक्ष्य अर्थात् सतनता या जारी रहना। 'सत् एव

सौम्य' अर्थात् तीसरा व अंतिम लक्ष्य। इन तीनों अभिव्यक्तियों का समेकित रूप

' ॐ तत् सत्' को मानसिकता से दान-पुण्य करता है तो उसे परमात्मा से

इन तीनों शब्दों का तात्पर्य है - '' मैं सब कुछ सत्य को समर्पित करता हूं। मैं यह सारा समर्पण ईश्वर को करता हूं। वही सत्य हो।'' यह एक महा वाक्य है जो जगत गुरु श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया है, यह बताने को कि किस प्रकार हर दान, तप और यज्ञ में सच्चाई का समावेश रहे। यानी जो कुछ भी है

इसी कारण से इन तीनों शब्दों की इतनी महत्ता है। कोई भी व्यक्ति

है - ' ॐ तत् सत्।'

निकटता या दिव्य चेतना प्राप्त होती है।

आइए, हम सब परमब्रह्म कृष्ण सं पूरी सच्चाई के साथ प्रार्थना करें कि हमें इस अध्याय में बताई गई समझ की अनुभूति दें जिससे हम भी "THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM" हम सब ही पूरी ईमानदारी के साथ परमब्रह्म कृष्ण के बताए इन सत्यों को

या शाश्वत चेतना प्राप्त कर सकें।

अपनी अनुभूति में उतार सकें। हम उस परमब्रह्म से प्रार्थना करें कि 'गीता' में बताए गए सत्य-अनुभूति को साथ हम पर प्रकट हो सकें और हम सब अपने

आपको "THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM" में स्थापित कर सकें। इस प्रकार उपनिषद, भगवत् गीता का सप्तदश अध्याय ' श्रद्धात्रय विभाग योग' संपन्न होता है जिसमें श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य संवाद द्वारा परम ब्रह्म ईश्वर पर चर्चा को गई है।

वह ईश्वर को समर्पित है; वही सत्य है। वही मं यह समझ लें कि हर कर्म का उद्देश्य ईश्वर को समर्पित कर उसकी कृष प्राप्त करना है चाहे हम कोई-सा दान, तन, यज्ञ कैसे भी करें।

समस्त वेदों का भी एकमात्र उद्देश्य है – कृष्ण चेतना या परम चेतना की प्राप्ति। जब तक यह सिद्धांत या तरीका नहीं अपनाया जाएगा तब तक कोई सिद्धि, संतुष्टि या प्रसन्नता संभव हो नहीं होगी।

आपका गुरु या आध्यात्मिक गुरु ही संसार में एकमात्र जीव है, जो आपकी ज़िंदगी को सार्थक, संतुष्ट या प्रसन्न बनाने में मदद कर सकता है। वही सही दिशा-निर्देश दे सकता है।

यह समझें कि लोग चाहे अपने बचपन से अनुकूलन के अनुरूप किसी भी देवता, अर्ध-देवता, आत्मा इत्यादि की पूजा करें, वे करेंगे अपने 'गुण' को अनुसार ही, परंतु परम चेतना, कृष्ण चेतना प्राप्त करने का मार्ग इन तीनों गुणों को परिसर से परे होता है।

इसी स्थिति में गुरु या आध्यात्मिक स्वामी को भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वही आपको सही दिशा-निर्देश देकर सही समझ की ओर ले जाता है और तभी आप परम चेतना की अनुभूति प्राप्त कर पाते हैं। यही समझ आप में श्रद्धा उत्पन्न करती है और आप परमात्मा से प्रेम करने लगते हैं। यही जीवन का चरम उद्देश्य और अंतिम लक्ष्य है।

सब कुछ छोड़कर समर्पण कर

'सब कुछ छोड़कर समर्पण कर दो', यह केवल इस अंतिम अध्याय का

सार नहीं वरन् पूरी भगवत् गीता का निचोड़ है। - जो कुछ भी तुम जीवन या धर्म को रूप में समझते हो, जो कुछ भी तुम्हारी समझ है उसको त्याग दो, क्योंकि जो तुम जानते हो वह तुम्हारे अनुसार तुम्हारा ज्ञान है पर वह वास्तविकता नहीं है।

ज्ञान अस्तित्व का प्रमाण नहीं देता

वास्तव में बुद्धि और सत्य हमें बताते हैं कि क्या हम नहीं जानते। हमारे मन का ज्ञान जिसके बारे में हम इतना गर्व करते हैं, हमारा वह आवरण है जो अस्तित्व का सत्य हम से छिपाता है। फ्रांसीसी दार्शनिक रेने डेकार्ट्स का कथन था – ''मैं हूं चूंकि मैं ऐसा सोचता हूं।'' हमारा दिमाग अस्तित्व को मापने का पैमाना नहीं होता।

हम जो हैं उसका हमारे विचारों से कोई सरोकार नहीं होता। यदि हमारे विचार ही हमें पूरा नाप सकते, जो भी हम हैं तो हम एक जैविक-यांत्रिक मशीन से ज़्यादा कुछ भी नहीं होते।

सहज निहित बुद्धि जानवरों में मनुष्यों से ज़्यादा होती है। जानवर अपने दिमाग को कल्पना में लिप्त नहीं करते, जैसे मनुष्य कर लेता है। वे तो कुदरत के साथ ही बहुते हैं।

शेर या चीता तभी भोजन को तलाश करते हैं, जब उन्हें भूख लगती है। वे तब ही खाते हैं जब खाना ज़रूरी हो और तब ही सोते हैं जब थक जाते हैं। सिवाय कुछ दुर्लभ अवसरों के कोई जानवर अपने भोजन को बचाकर नहीं

रखता, इसीलिए कोई जंगली जानवर मोटा नहीं होता।

पर मनुष्य तो सोच सकता है और यही समस्या बन जाती है। हमारे महान ऋषियों, प्राचीन मनीषियों को घोषणा डेकार्ट्स की घोषणा के एकदम विपरीत थी– ''अपना मन-मस्तिष्क त्याग दो और तुम जागरूक हो जाओगे।

श्रीमदुभगवत गीता

माक्ष सन्याम सब के छाड़

में और मेरे के अतिरिक्त कुछ भी समर्पण के लिए नहीं होता कृष्ण बताते हैं कि कैसे समेपण चरम मुक्ति-प्रबोधन देता है

विश्लेष मेतार को पित्त के तुम अपना पूरा यांग्यता-संभावना को समझ पाओंगे महान हिन्दू दार्शनिक, विचारक आदि शंकराचार्य अपने 'आत्म-शब्दुश' को शलोकों में यही बात बड़ी सुंदरता से कहते हैं। अपनी आतरिकता की स्व परिभाषा देते समय शंकराचार्य अपने शरीर को ही नकारते हैं – शरीर-मन-इंद्रब

यह समझ लें कि हम मानव रूप में आध्यात्मिक जीव हैं न कि मानव जो आध्यात्मिक होने का प्रयास कर रहे हैं। हमारी बुद्धिमत्ता असीम है परंतु बुद्ध की समझ सीमित है। ज्ञान तीन प्रकार का होता है। पहला जो सबसे कम प्रासंगिक होता है, वह ज्ञान है जो मन या बुद्धि से प्राप्त किया जाता है। समस्त वैज्ञानिक ज्ञान- यथा भौतिक शास्त्र, गणित, चिकित्सा शास्त्र इत्यादि इसी वर्ग में आता है। हम समझते हैं कि यह ज्ञान हमारे जीवन की गुणवत्ता सुधारता है। पर जितना हम इस प्रथम वर्ग का ज्ञान प्राप्त करते रहेंगे, उतने ही हम ज्यादा विचलित रहेंगे।

दूसरे प्रकार का ज्ञान बौद्धिक ज्ञान के रूप में सिखाया नहीं जा सकता, यह तो स्वयं ही सीखा जा सकता है। सृजनात्मक कला का ज्ञान इसी वर्ग का होता है। हम गाना, नाचना या कविता आदि लिखना किसी किताब को पढ़कर नहीं सीख सकते। इसे हमको पहले अपने अंदर उतारना पड़ेगा; आत्मसात करना पड़ेगा, तब ही हम इसे अभिव्यक्त कर सकते हैं। इसमें दिमाग और बुद्धि के अलावा हृदय व उसके भावों का भी काफ़ी योगदान रहता है। हृदय आधारित ज्ञान वस्तुत: बुद्धि पर तथा किन्हीं अन्य साधनों पर आधारित होता है।

तीसरे प्रकार का ज्ञान उच्चतम होता है, जो आपको 'होने' (अस्तित्व) से मिलता है। यह अस्तित्व से अस्तित्व तक जाता रहता है। यह ज्ञान वह 'अहा!' का अनुभव है जो दुर्लभता से प्राप्त होता है। इसी ज्ञान के ज़रिए संसार को बड़ी-बड़ी खोज़ें और आविष्कार किए गए हैं। इसमें बौद्धिक सतह एव सहयोगिता को भाव स्तर पर संपर्क नहीं, सहानुभूति का संचारण होता है। इस स्तर का ज्ञान दिल-ओ-दिमाग के अलावा किसी और साधन से भी जुड़ता है। वस्तुत: ईश्वर को बारे में ज्ञान भी बाध्यकारी होता है, जब यह केवल बौद्धिक स्तर से प्राप्त हो, क्योंकि तब हम ईश्वर के बारे में ही जान पाते हैं, 'ईश्वर' को नहीं। ईश्वर को बारे में जानना ईश्वर को जानना नहीं होता। जब हम संपूर्ण समर्पण कर देते हैं तब हमें यह भी आभास नहीं होता कि हम ईश्वर को जानते हैं। जब यह विचार हो हमारे अंदर न हो, तभी हम ईश्वर को जान पाते हैं।

शब्द ईश्वर को व्यक्त नहीं कर सकते। जब अभिव्यक्ति ख़त्म हो जाती है तब ईश्वर प्रकट होता है। ज़ेन स्वामियों का कथन है कि चंद्रमा की ओर इंगित करने वाली उंगली चंद्रमा नहीं होती। ईश्वर के बारे में कहे गए शब्द चाहे कितनी भी ईमानदारी से व्यक्त किए गए हों, सिर्फ इशारे या 'पॉइन्टर्स' होते हैं,

ईश्वर नहीं। धर्मों के साथ यही दिक्कत है कि वे ईश्वर को 'बारे' में बताते हैं। वे यह नहीं बताते कि कैसे ईश्वर को जानें। ज्यादातर धर्म ईश्वर के बारे में कुछ बातें बताकर हमारे अंदर लालच और भय भर देते हैं।

आजकल कितने धर्मों ने लोगों को प्रबुद्ध किया है? लाखों लोग धर्म की रक्षा और प्रसार के चक्कर में मार डाले गए हैं। धर्मों ने तो संहार और मृत्यु ही दी है, प्रबोधन किसी को नहीं दिया।

आध्यात्मिक स्वामियों ने यह कभी नहीं सिखाया कि किसी को मारो, तोड़ो या फोड़ो - अपने धर्म में उन्हें लाने को लिए। कोई आध्यात्मिक गुरु कभी हिंसा नहीं पढ़ाता। यदि उसने ऐसा किया तो वह स्वामी या गुरु रहे ही नहीं सकता।

महान आध्यात्मिक स्वामी तो व्यक्ति की चेतना जागृत करने का प्रयास करते रहे हैं, जिससे हम सब यह समझ सकें कि हम सभी एक सामूहिक चेतना के अंश हैं जो विश्व व्यापी हैं। उनका संहार में आने का उद्देश्य ही होता है हमें

यह समझाना कि हम 'मैं' को भाव से 'हम' के भाव तक पहुंचें। महान स्वामियों के जो अज्ञानी शिष्य या अनुयायी होते हैं वे ही अपनी सीमित समझ के आधार पर धार्मिक संस्थान स्थापित करते हैं, जिनका आधार उन स्वामियों द्वारा बताए सत्य की उन अज्ञानियों की सीमित समझ होती है। आध्यात्मिकता, जो लोगों में प्रेम प्रसारित करती है, के बरअक्स धर्म तो हिंसा को बढाते हैं।

प्रबोधन तो एक भेंट हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसके लिए हमने कितना प्रयास किया है। चाहे हम सैकड़ों वर्ष एक पांव पर खड़े रहे हों या कुछ ऐसा ही तप किया हो - इससे उस भेंट पर कोई असर नहीं होता, बल्कि ऐसा करना तो एक डॉलर का लॉटरी टिकट खरीदने जैसा है। इसके बदले में हमें जो मिलता है, वह एक विशुद्ध भेंट है। हम जो करते हैं वह हमारे सपने में ही होता है।

उस स्वप्न के परे हम कैसे जा सकते हैं?

कृष्ण कहते हैं - "'हर चीज़ भुलाकर समर्पण कर दो।'' असल में लोग 'समर्पण' शब्द को सुनकर भयभीत हो जाते हैं। हमें यह समझना श्रीमदुभगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

चाहिए कि समर्पण में हम कुछ भी खोने वाले नहीं हैं, उल्टे इससे तो हमे

समर्पण करो और समझो

पहले यह समझ लें कि हमारे पास ऐसी कौन-सी मूल्यवान वस्तु है जो हम समर्पण में देंगे। हम ऐसा समझते ही हैं कि हम पर बहुत कुछ है। इस जरा आंखें खोलकर देखें कि हर चीज तो दिव्यता (ईश्वर) की ही देन है। 'मैं' और 'मेरा' कुछ नहीं है, यह तो मूषा भाव है। जैसे ही हमारी यह बात समझ में आ जाती है कि हमारा समर्पण हो जाता है और जैसे ही समर्पण हुआ कि हमारी समझ में 'सत्य' आया।

जब हम किसी चीज को 'मेरा' कहते हैं तो कानूनी रूप से वह चीज़ हमारी हो सकती है पर अस्तित्व के रूप में वह हमारी कतई नहीं होती। कानूनी रूप से तो हम एक जमीन के टुकड़े पर बाड़ लगवाकर उसे 'अपना' कह सकते हैं पर प्रकृति या अस्तित्व (ईश्वर) को तो मालूम नहीं होता कि यह हमारा है। जब एक चक्रवात उठकर संपत्ति उड़ा देता है तो उसे क्या मालूम रहता है कि वह किसकी संपत्ति नष्ट कर रहा है। अस्तित्व का तो कोई कानून नहीं होता; यह किसी कानून को नहीं मानता।

वस्तुत: हमारा 'मेरे' का भाव समाज के नियमों द्वारा संरक्षण प्राप्त करता है। हम सही प्रकार से इसे हमारा जमीन का कानून नहीं कह सकते। 'ज़मीन' का तो कोई कानून नहीं होता। यह तो समाज ही है जो कानून स्थापित करता है। जमीन पर तो भूकंप कभी भी आ सकता है। क्या हम कुदरत को अपने कानूनों से नियंत्रित कर सकते हैं? नहीं न। जब तक आप 'मैं और मेरे' के भावों से घिरे रहेंगे, आप अस्तित्व का सच समझ ही नहीं सकते।

जब कृष्ण कहते हैं कि सब कुछ समर्पित कर दो तो वह हमसे कह रहे हैं कि आंखें खोलकर देखों अपनी मुर्खता को जो हमसे अपने परिग्रह और अपेक्षाओं का नाटक खिलवा रही है। खेल में दूसरे के साथ धोखा करना और बात है, कम-से-कम अपने साथ तो धोखा न करो।

क्या आपकी कोई भी चीज़ जिसे आप 'अपनी' समझते हैं: 'मेरी' कहते हैं, बगैर हवा को चल सकती है; जी सकती है? क्या आप कह सकते हैं कि हवा बस 'आपकी' ही है। यदि गौर से देखें तो शरीर में नित्य आने-जाने वाला 'प्राण' भी आपका नहीं है। यदि प्राण न हो तो जो तुम 'अपना' समझते हो क्या

यह तो ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि नींव तो मेरी नहीं, पर मकान की

पहली मंजिल मेरी है। कानूनी तौर पर आप कह भी लें, पर अस्तित्व के रूप में तो ऐसा होना असंभव ही है। पृथ्वी जिस पर आप रहते हैं, आपकी नहीं है। पृथ्वी का एक झटका आया और जो आप अपना कहते थे, क्षण मात्र में 'गायब' हो गया अर्थात् आपकी सोच के अनुसार जो आप 'अपना' सोचते हो, का आधार ही आपका नहीं है। आपका 'मूल आधार' ही आपका नहीं होता। यह तो प्रकृति का है, किसी और का नहीं।

हम अपने 'श्वसन' को तो मानते हैं कि यह तो चलता ही रहेगा। मान लीजिए यदि ईश्वर ने वैसी ही हड़ताल की जैसी श्रमिक लोग आजकल करते हैं तो हमारी समझ में आ जाएगा कि यह सांस कितनी जरूरी है, पर ईश्वर तो करुणामुर्ति है। यह उसकी करुणा ही है जो उसे कभी हडताल पर नहीं जाने देती। इसीलिए हम जीवन को इतना महत्व नहीं देते - उसको अपना चेला ही समझते हैं। चूंकि थोडी-बहुत चीजें कानूनन आपको मानी जा सकती हैं, इसलिए

हम समझते हैं कि 'मेरे' की अवधारणा एक ठोस तथ्य पर आधारित है। लेकिन कोई भी, जिसमें जरा-सी अक्ल है, आंखें खोलकर देखे तो समझ जाएगा कि 'मैं' और 'मेरा' तो एक नाटक है। एक भी सांस न आई तो खेल ख़त्म। 'मैं' गायब! तुरंत आपको नाम आपके घर पर लगी प्लेट से मिटा दिया जाएगा और आपकी कब्र पर लग जाएगा, तब आप तो वहां जाएंगे जहां अनन्त विश्राम किया जाता है।

कभी-कभी तो वह भूमि का टुकडा जिसे हम अपना समझते थे, कागजों को देखने पर अपना नहीं निकलता। हमारा तो यहां सब कुछ कागजी है। जैसे ही हमारे मन में यह अक्ल कौंधी और हमने यह पहचाना कि हमारा कुछ भी वास्तविक नहीं है, हम समर्पण के भाव में आ जाते हैं और तभी बड़ा सुकून मालूम पडता है कि चलो स्वयं को बचाने या सुरक्षित रखने के अनवरत झंझट से तो अब छुट्टी मिली।

दो सहज वृत्तियां, जो 'मैं' और 'मेरे' पर कायम रहती हैं, ही असली कारण हैं हमारी सारी मानसिक और शारीरिक समस्याओं की- वे हैं हमारी जिजीविषा और सभी कुछ समेटने-परिग्रह करने की इच्छा। दूसरी ओर जब हमारी समझ में आ जाता है कि 'मैं' और 'मेरे' के भाव छलावा हैं, हकीकत नहीं हैं तो हमें अफ़सोस होता है कि सारी जिंदगी ही इन्हीं रेत के महलों को बनाने में काट दी।

एक लघु जेन कथा

कुछ बच्चे समुद्र तट पर अपने रेत के महल (घरौंदे) बना रहे थे। वे दिन-भर उन्हें बनाते और शाम को उन्हीं पर कुद-फांदकर उन्हें तोड़ देते और

ऐसा करने में उन्हें मज़ा भी आ रहा था, पास ही एक ज़ेन स्वामी बैठे थे। उन्होंने दिन-भर बच्चों की गतिविधियां देखीं और कहा- "यही तो जीवन है।"

एक राजा भी वहां पास बैठा यह सब देख रहा था। तभी एक बच्चा रोने लगा क्योंकि उसका रेत का महल दूसरे बच्चे ने तोड़ डाला था। राजा हंसकर बोला- ''कितना मूर्ख है कि रेत का महल टूटने पर रो रहा है।''

यह सुनकर वह ज़ेन स्वामी राजा की ओर देखकर हंसा। राजा ने गुस्से से पूछा- "क्यों हंसता है, स्वामी?"

स्वामी ने कहा – "जब ये बच्चे रेत के महल बनाते या बिगाड़ते हैं तब कम-से-कम इन्हें मालूम तो रहता है कि ये रेत को महल हैं पर जब तू अपने पत्थर को महल बनाता या बिगाड़ता है तो तू समझता है कि तेरा महल असली है। सच पूछे तो बच्चे तुझसे ज्यादा समझदार और जागरूक हैं और उन्हें ही तु मूर्ख कह रहा है, इसलिए मुझे हंसी आ गई।''

वास्तव में हमारा जीवन भी एक छद्म जीवन है। जैसे बच्चे रहते हैं वही असली जीवन है। वे जानते हैं कि असल में इसका कोई मूल्य नहीं है। आज बनेगा, कल उजड़ेगा, पर वे बच्चे भावनात्मक रूप से कतई विचलित नहीं होते, लेकिन जब हमारे महल टूटते हैं तो हम समस्याग्रस्त हो जाते हैं। यह सब कुछ एक खेल है। हमें यह समझ लेना चाहिए कि जो कुछ भी हम बनाते-बिगाड़ते हैं, वह हमारा नहीं है। यदि इन बाहरी घटनाओं को हम अपने अंदर, दिनभर न ले जाएं और-उनको प्रति उतने ही विमुख रहें जितना हमें इनके प्रति होना चाहिए, तो हमारे मेन में स्वत: ही समर्पण को चाह उठने लगेगी।

इन इंद्रियू-लब्धः भावों को अपने अंदर न प्रवेश करने दें और घटनाओं को बहुत गंभीरता से न लें। जब आप इन्हें गंभीरता से लेते हैं तो आप एक ही चीज़ पाते हैं - बीमारी। जैसे ही आपने अपने अस्तित्व में 'ममत्व' या 'मैं' को स्थान दिया कि आप असली जीवन में हटने लगते हैं।

यह विचार मन में रखें कि आपका 'अपना' होने का कोई आधार नहीं है - चाहे आप स्वयं को कुछ भी समझें। कभी-कभी आप स्वयं को शरीर मात्र समझते हैं, कभी मन और कभी अपनी इंद्रियों को ही अपना सही रूप समझते हैं। आप किसी को भी अपना समझें, पर असुल में तो आपका कुछ भी नहीं है। आपके अपने होने का कोई आधार ही नहीं है।

आप अपने जिस पहलू को 'स्वयं का रूप' समझते हो, वह कभी नहीं वृद्धि को प्राप्त होगा। जैसे ही आपने अपने को शरीर समझा कि आपके शरीर का विकास रुक जाएगा, क्योंकि फिर आप इसमें किसी बदलाव को स्वीकार नहीं करेंगे। इसी प्रकार जब स्वयं को आप अपने मन के साथ जोड़ते हैं तो मन

या मस्तिष्क का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। यही वज़ह है कि अहमुवादी लोग कभी न किसी नए विचार को बारे में सुन या पढ़ सकते हैं, न उसे स्वीकार करते हैं, क्योंकि उनको तो लगता है कि जो जानने योग्य है वह वे पहले से ही जानते हैं। जैसे ही आपने अपने मन को 'स्वयं' समझा तो पढ़ने का चाव ही, जो पारंभकर्ता की पहली पहचान है, गायब हो जाता है।

यदि आप स्वयं को शरीर समझते हैं तो आप शरीर को तरोताज़ा होने से रोक देते हैं। आप शरीर को उसका सहज कर्म नहीं करने देते। यदि मन को खुद समझते हैं तो आप इसे कुछ भी नया नहीं सीखने देते। आप फिर इसमें नया कोई तत्व

घसने ही नहीं देंगे और इस प्रकार इसको निश्चित रूप से ध्वस्त करने लगेंगे। यही हाल आपके 'मेरे' भाव के साथ होता है। इसका आधार तो समाज के बनाए नियम-कानून होते हैं, जिनका अस्तित्व को नियमों से कोई नियम या सरोकार नहीं होता।

आप वह नहीं हैं जो आप सोचते हो कि आप हैं!

विज्ञान पूरी तरह मानता है कि हमारे शरीर मन-तंत्र में अरबों कोश ( सैल ) रोज़ मरते और बनते रहते हैं। कुछ वर्षों बाद हमारे शरीर का कोई भी कोश ऐसा नहीं होता जो दो साल पहले भी रहा हो। इस शरीर की हर एकल सत्ता एक नई सत्ता होती है अर्थात् जो स्थायी 'मैं' का भाव हम समझते हैं इस शरीर का, वह तो अस्तित्व में रहता ही नहीं है। फिर भी हम इसी गलतफहमी में जीते रहते हैं कि हम वही हैं। हम गर्व करते हैं अपने 'मैं' के भाव पर।

हम तो कुछ स्मृतियों को संग्रह, मूल्यों एवं विश्वासों के जमावड़े से ज्यादा कुछ नहीं, जिनको संस्कार कहते हैं। हम हमारे संस्कार ही हैं। यही संस्कार हमारे निर्णय लेते हैं। यही है पूरा 'मैं' का तंत्र।

हम लोग अपने आश्रम में मेडीटेशन पर 'लाइफ बिल्स प्रोग्राम' आयोजित करते हैं - इन्हीं संस्कारों से मुक्ति पाने को, क्योंकि यही संस्कार हमारे संचालक रहते हैं। इन्हीं के प्रभाव में हम अनजाने रूप से अपने निर्णय लेते रहते हैं। हम अनजाने रूप से अपनी सहज वृत्ति के अनुसार जीते हैं पूरी जानकारी के साथ अंतर्प्रज्ञा जागृत कर हम जी ही नहीं पाते। जब हम 'मैं'- पर केंद्रित रहते हैं तो हमारा प्रतिसाद अनजाने में और सहज वृत्ति द्वारा दिया जाता है। वह सदा सुरक्षात्मक एवं अपने बचाव के उद्देश्य से दिया जाता है। शोध कार्यों से स्पष्ट हो चुका है कि जब हमारे कोश सुरक्षात्मक भाव से संचालित होते हैं, उनकी वृद्धि रुक जाती है। यदि हम अपने 'मैं' पर ही केंद्रित रहेंगे तो हम कभी वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकते।

यह 'मैं' का भाव 'स्वाधिष्ठान चक्र' से उठता है, जो तिल्ली (स्प्लीन) को निकट ऊर्जा केंद्र में स्थित रहता है। वहां परमात्मा का भाव भी प्रतिष्ठापित रहता है। यह असरक्षा के भाव की पीठ होती है। जब तक हम इस चक्र को ऊर्जास्वित कर अपने भयों से मुक्त नहीं होंगे, हम अपने 'मैं' भाव की सरक्षा के लिए व्याकूलता से प्रयासरत रहेंगे।

वस्तुत: 'मैं' भाव से ज्यादा आदिम है 'मेरे' का भाव। 'मेरे' का भाव अर्थात् जिजीविषा और परिग्रह की भावना, 'मैं' के भाव से पहले आती है। यह भाव 'मूलाधार' चक्र से उठता है, जो मूल ऊर्जा केंद्र पर स्थापित रहता है। सारे भावनात्मक अवरोध यथा वासना, लालच, क्रोध इसी परिग्रह के भाव से उत्पन होते हैं।

अपनी पहचान (अस्मिता) और संग्रह करने की प्रवृत्ति को त्यागना इसलिए मुश्किल होता है, क्योंकि समाज ने हमारा अनुकूलन इसी प्रकार किया होता है, परंतु यह असंभव तो नहीं है। हमारे "THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM आर्डर" में सारे शिक्षक जो मिशन का कार्य और 'लाइफ बिल्स प्रोग्राम' चलाते हैं, अपने मूल नाम बदलकर आध्यात्मिक नाम अपना लेते हैं, जो मैं उन्हें देता हूं।

वे नाम क्यों बदलते हैं? कोई-कोई तो 60 वर्ष पर ऐसा करते हैं? वे लोग आपको बताएंगे कि पहली बार अपने जीवन में उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता का अहसास होता है - मानो उनका नया जन्म हो, जिसे वह उत्सव के रूप में मनाना चाहते हैं। शुरू-शुरू में तो लोगों ने मुझे हतोत्साहित करते हुए कहा था कि नाम बदलने को स्वीकार करने वाले शिक्षक मुश्किल से ही मिल पाएंगे, क्योंकि ज्यादातर लोग अपना विगत भूलना नहीं चाहते। वे अपनी पहचान गंवाना नहीं चाहते, पर सत्य यह है कि जब आपको भली प्रकार यह सत्य समझ में आ जाता है तो आप ईमानदारी से अपनी पुरानी पहचान भूल जाना चाहते हैं।

इसी प्रकार जब आप अपनी परिग्रह और चीज़ों को प्रति मोह से त्राण पाते हैं तो भी आपको मुक्ति का अहसास होता है। आप अपना साधारण जीवन आराम से जीते रहते हैं- सिर्फ मोह, कपोल कल्पनाएं, तुक्के, भय और लालच की प्रवृत्ति से त्राण पा लेते हैं। जब मैं अपना घर त्यागकर आध्यात्मिक खोज में निकला तो मुझे कुछ खोने के भाव ने कतई प्रभावित नहीं किया, तब तो यह लगा कि सारा जगत मेरा घर है।

इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आपको कोई भिक्षु या संन्यासी होना पड़ेगा। सिर्फ मोहादि, भय-लालच से छुटकारा पाना पड़ेगा।

बाकी जो कुछ आपके पास है आप रख सकते हैं। आपको केवल प्रसन्नता प्राप्त करनी है सिर्फ वह त्यागकर जो आपका है ही नहीं।

यह एक वाक्य हजारों लोगों के लिए एक आह्वान का काम करता रहा पहली बार उन्होंने अपनी गलतियों को समझा और भविष्य के बारे में कलाबे मिलाना छोडा; उसके बारे में सोचना छोडा जो आपका है ही नहीं। विगत खेद और अपराध बोध से त्राण पाया, जिसके बारे में वैसे भी आप कुछ नहीं कर सकते और यूं पूरी तरह मुक्त होकर वह प्रसन्नता पाई जो अभी तक आपके हाथ नहीं आती थी।

संन्यास या सर्वत्याग का अर्थ पद्मासन लगाकर तथा आंखें बंदकर बैठ जाना नहीं होता। यह तो आपको एक मानसिक स्थिति है, शरीर की नहीं। यह वह स्थिति है जिसमें आप 'होते' हैं। हम सांसारिक जीवन-निर्वाह करते हुए भी अपने मोहों और संबंधों तथा परिग्रह के प्रति उदासीन रह सकते हैं। दूसरी ओर, भले ही आप संन्यास लेकर हिमालय की कंदराओं में चले जाएं, आप जब भी अपनी आंखें बंद करेंगे आपका भीतरी टीवी चलने लगेगा। सारे मोह और तुष्णाएं सामने आ जाएंगी।

ी जिस समर्पण की कृष्ण बात करते हैं उसका अर्थ है सारी कल्पनाएं-कुलाबों से त्राण पाना और वास्तविकता को सामने नतमस्तक होना, उस सच्चाई के सामने जो एकमात्र सत्य है कि हम एक सामूहिक-विशद-चेतना के अंश हैं। जब हमारे अंदर यह जागरुकता रहेगी तो फिर हमारे अपने 'मैं' और 'मेरे' के भाव के लिए कोई जगह ही नहीं होगी।

कृष्ण बार-बार संन्यास की बात करते हैं - हम अपने कर्म के फलों को कैसे उनको समर्पित कर दें बिना कर्म को छोडे? कैसे अपना ज्ञान और कर्म उनके चरणों पर समर्पित कर दिया जाए? वह अर्जून को इस अंतिम क्षण के लिए तैयार करते हैं, जब वे उससे कहते हैं कि उसे सब कुछ उनको ही समर्पित करना है और कुछ नहीं करना।

समर्पण भी तीन तरह का होता है - पहला समर्पण अपनी बौद्धिकता का। ज़्यादातर लोगों को लिए - ख़ासतौर पर बौद्धिक लोगों को लिए - यह सबसे आसान काम है। आपकी अहमन्यता जब पूरी 'पक' जाएगी तब ही गिरेगी। इसका जितना कचरा आप खोपडी में भर लोगे उतनी ही वह ज्यादा फूलेगी। जब कोई दूश्य उभरकर सिद्ध करता है कि सारा बौद्धिक ज्ञान कचरे का ढेर ही है, वह व्यक्ति जिसका अहम् भाव पूरी तरह पक चुका है, वही इसे समझकर इस सत्य को स्वीकार कर सकता है। जब ऐसा होता है तो यह व्यक्ति अपनी बौद्धिकता अपने स्वामी को समर्पित कर देता है, जो उसका मार्ग-निर्देशन करता है, लेकिन वह जिनका अधपका ज्ञान होता है, जिन्हें अपने बौद्धिक स्तर के बारे में मुगालता है, वही इस सत्य को समझ नहीं पाते। कई बौद्धिक साधक और

का काम करने और कष्ट पाने के बाद आप कहेंगे कि यह तो होना ही था । स्योंकि यह हमारा नियति है, पर इसके विपरीत यहां में जो शब्द भी उच्चारित करता हूं, पराशक्ति के आदेशानुसार हैं – उसी कॉस्मिक ऊर्जा को आदेश से मैं स

कुष्ण की अर्जुन को क्या, हम सभी जीवों को यह सलाह है कि सब कुछ छोड़कर उनकी शरण में आ जाओ; संपूर्ण समर्पण कर दो। यही हर समस्या का

अंतिम हल है।

'आध्यात्मिक बाज़ार में घूमने वाले' मेरे पास अपने प्रश्नों के ढेर के साथ आने रहते हैं, पर मेरे साथ कुछ समय बिताने के पश्चात् उनमें से ज्यादातर मने आश्चर्य में डालकर कहते हैं कि अब उनके पास कोई प्रश्न नहीं बचा है। मै उनको प्रश्नों का उत्तर देने की ज़हमत भी नहीं उठाता। मैं तो सिर्फ उनके प्रश्नों में कुछ शब्द और जोड़ देता हूं। वे उन शब्दों से जूझते हैं और अंत में अपने प्रश्नों का उत्तर स्वयं ही पा लेते हैं।

समर्पण का दूसरा क़दम है हृदय का समर्पण। लोग मूझसे पूछते हैं कि आश्रम से जाने के बाद वे मुझे कैसे याद रखें। मैं कहता हूं कि यदि मैं वाकई आपका स्वामी हूं तो आपको मुझे भुलाने में बड़ी मशिकल होगी। स्वामी के प्रति विचार ही आपके हृदय को पिघला देगा। आप भावुक हो जाओगे। आपको अपने स्वामी की भौतिक उपस्थिति की अब कोई जरूरत नहीं। सिर्फ उनके बारे में सोचना ही काफी रहेगा। आपकी आंखों से आंसू बहेंगे। रामकृष्ण कहते हैं – ''यह पक्की बात है कि आपके इष्ट देवता या स्वामी का विचार मात्र आपको आंसुओं में डूबा देगा। ऐसा लगेगा मानो आपका अंतिम जन्म हो रहा है।''

जो एक प्रबद्ध स्वामी कहता है वह सदा सत्य होता है। यह समर्पण इतना शक्तिशाली होता है कि यह आपको मुक्त कर सकता है, प्रबृद्ध बना सकता है। यही भक्ति का बल होता है। कृष्ण यह बार-बार कहते हैं कि भक्ति मार्ग उनको पाने का सबसे आसान मार्ग है। वे कहते हैं – "सिर्फ मुझमें और केवल मुझमें अपनी भक्ति रखो और मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।''

तीसरा और अंतिम प्रकार का समर्पण होता है इंद्रियों (या इंद्रिय बोध) का समर्पण। जब इंद्रियों का समर्पण होता है तब प्रबोधन होता है और जब प्रबोधन होता है तब इंद्रियों का समर्पण स्वत: ही हो जाता है।

महाभारत के युद्ध के बाद कृष्ण ने साथ चलते अर्जन को एक पेड़ पर ं बैठा पक्षी दिखाया और कहा – "अर्जुन! उस हरे कौवे को देखो।"

अर्जून ने कहा – "हां कृष्ण! मैं उस हरे कौवे को देख रहा हूं।''

कृष्ण ने कहा - "कैसे मूर्ख हो तुम! कौवा हरा कैसे हो सकता है?" अर्जून ने सहजता से कहा – "कृष्ण जब आपने मुझसे हरा कौवा देखने

को कहा तो वाकई वह मुझे हरा कौवा ही लगा था।''

अर्जुन का कृष्ण के प्रति समर्पण इतना संपूर्ण था कि जो कृष्ण कहते वही अर्जुन को दिखाई पड़ता था। यह समर्पण को अंतिम अवस्था होती है।

आप लोगों को यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि एक प्रबुद्ध स्वामी को कुछ भी करने की स्वतंत्रता नहीं होती। साधारण लोग तो अपनी मर्जी का काम कर सकते हैं। आप में से हर एक जो चाहे करने को स्वतंत्र हैं। अपने मन

उसी सचिव ने कहा – "दस मिनट पहले मैंने आपको बताया था न!

उनकी मृत्यु हो चुकी है, कल रात।'' और लाइन काट दी। फिर दूस मिनट बाद इस आदमी ने फिर उसी नंबर पर कॉल लगाई और फ़र उसी वकील (अपनी पूर्व पत्नी के वकील) से बात करने की इच्छा

नाहिर की। अब तो वह (महिला) सचिव झल्ला के बोली - ''मैं आपको बता चुकी हूं कि वे कल रात गुजर गए। आप उनसे बात नहीं कर सकते। आई

बात समझ में।'' वह आदमी बोला – "बिल्कुल मैडम! असल में यह खबर इतनी अच्छी लगती है कि मैं इसे बार-बार सुनना चाहता हूं।"

अर्जून भी वही बातें बार-बार सुनना चाहता है।

भारत में प्राय: एक संन्यासी और एक भिखारी में फर्क करना मुश्किल होता है, दोनों ही भीख-सी ही मांगते हैं, कृपा चाहते हैं। दोनों के पास कुछ होता नहीं - फटेहाल से लगते हैं, बेघर - मारे-मारे घूमते हैं। ज्यादातर लोग एक भिखारी और एक संन्यासी के साथ अपनी सुविधानुसार एक-सा ही बर्ताव करते हैं, उन्हें भगा देते हैं। या भार

मैं अपने शिष्यों से कहता हूं – "यदि दोनों की पहचान में संदेह हो तो भिखारी को भी संन्यासी या भिक्ष ही समझना।'' पर वे कहते हैं – ''स्वामी जी! वे तो धोखेबाज़ होते हैं, हमें ठग लेते हैं।''

"तो ठगे जाओ! और क्या? जब भी किसी को कुछ दो तो बिना किसी शर्त के दो या मत दो। यदि तुम समझते हो कि संन्यासी को कुछ देने से वह आशीर्वाद देगा तो भिखारी भी तो आशीष ही देकर जाएगा, दोनों के आशीर्वाद में एक-सा प्रभाव क्यों नहीं हो सकता?"

प्राय: लोग भगवा बाना धारण किए संन्यासियों को जरूर कुछ देते हैं क्योंकि उनको सिखाया गया है कि उनको यदि न दिया तो उनका ( लोगों का) अहित भी हो सकता है, इसलिए लोग उन्हें ना देने से डरते हैं- कहीं संन्यासी क्रोध में आकर शाप न दे दे और समस्याएं पैदा हो जाएं। इसलिए संन्यासी को कुछ देना अपना बीमा करवाने जैसा ही है। 'नरक में न जाएं इससे बचने को कुछ दे ही दें', लोग सोचते हैं।

मैं पहले भी कह चुका हूं कि नरक या स्वर्ग जैसी कोई चीज़ नहीं होती। यह तो धर्मों को फैलाई हुई भ्रांति है जिससे नरक का भय दिखाकर और स्वर्ग का लालच देकर वे हमें अपने बस में रखे रहें। सच बात तो यह है कि किसी के पास आपके पाप-पुण्य का कोई हिसाब नहीं होता। ईश्वर इस सूची के आधार पर अपना न्याय नहीं करता।

अर्जुन बोले – "हे महाबाहो! हे अंतर्यामिन! हे कोशीसूदन! ह 18.1 संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक-पृथक जानना चाहता हूं।

काफ़ी समय तक मौन रहने को बाद अर्जुन अब बोलते हैं, पर शीघ्र ही फिर वह बोलना बंद कर देंगे। अब वह प्रश्न नहीं कर रहे, सिर्फ़ अपने कुछ संदेह व्यक्त कर रहे हैं। अर्जुन के अंदर की सारी हिंसा और घमंड अब गायब हो चुका है। वह कृष्ण को कृपा से उनके विश्व रूप दर्शन करने के अनुभव के पश्चात् पूरी तरह पल्लवित हो चुके हैं; खिल चुके हैं।

कभी-कभी मेरा पूरा प्रवचन सुनने के बाद, शिष्यगंण मुझसे कोई जोक (चुटकुला) या कहानी सुनाने का अनुरोध करते हैं। वह उनका सुना हूआ होता है, पर वे उसे दोबारा सुनना चाहते हैं। खासतौर पर अपने स्वामी से यह सब सुनना दूना मज़ा देता है।

क्योंकि स्वामी के शब्दों में ऊर्जा होती है। ये शब्द आपका गहरा भेदन करते हैं और आपको समूचा बदल भी सकते हैं, सुनने के समय शायद आप इसका पूरा प्रभाव समझ न पाएं। अर्जुन भी बार-बार वही प्रश्न पूछता है जिससे वह कृष्ण को बार-बार सून सके।

अर्जुन कहता है – "हे महाबहो! मैं त्याग और संन्यास का उद्देश्य जानना चाहता हूं। मुझे सत्य बताएं।

एक लघु कथा

एक आदमी ने अपनी पूर्व पत्नी के वकील को टेलीफोन किया और उससे बात करना चाही, पर उस वकील के सचिव ने ज़वाब दिया – ''माफ़ कोजिए ज़नाब! कल ही उनकी मृत्यु हो गई।'' उस आदमी ने औपचारिक सांत्वना दी और लाइन काट दी। दस मिनट बाद ही उसने दोबारा फोन लगाया और उस वकील से बात करने की इच्छा जाहिर की।

मैं लोगों से कहता हूं कि वे चाहें तो मेरे मिशन और आश्रम को कोई दान दें या ना दें, पर इससे उन्हें स्वर्ग में स्थान मिलने की गारंटी नहीं फिल्म वाली। ''यहां कोई THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM नहीं जो आपको स्वर्गिक सुइटों में मरने के प्रश्न आपको ले जाएगा। जब आप शुभ कृत्य करते हैं तो स्वर्ग आपको यहीं मिल है। जब आप लोगों को कष्ट देते हैं तो नरक का दु:ख भी यहीं भोगते हैं।'

आप जो भी देना चाहें, बिना शर्त के दें। दें कुछ तब भी, चाहे आपको सामर्थ्य भी न हो, तभी दान का पुण्य होता है। यदि वह कुर्बानी की, जिसके आपको कष्ट हुआ तो वही असली कुर्बानी है। ऐसा दान करने से ही आप स्वा-

अर्जुन को कर्त्ता और कर्म के बारे में थोड़ा संशय है। महत्वपूर्ण है कमी कर्त्ता तो कोई भी हो सकता है।

दान सदैव निष्काम भाव के किया जाए

18.2 श्री भगवान बोले – "कितने ही पंडितजन तो काम्य कर्मों को भी संन्यास ही समझते हैं तथा दूसरे विचार-कुशल पुरुष सब कर्मों के फल को त्याग कहते हैं।

18.3 तथा कई विद्वान कहते हैं कि सभी कर्म दोषयुक्त हैं, इसलिए त्याज्य हैं किन्तु अन्य विद्वानों का कथन है कि यज्ञ, दान और तप रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।

परंतु हे भारतों में उत्तम (अर्जुन)! उस त्याग को विषय में तू मेरे 18.4 निश्चय को सुन। हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग (सारिवक, राजस और तामस) तीन प्रकार का कहा गया है।

यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने योग्य नहीं हैं - उनको 18.5 करना नि:संदेह कर्त्तव्य है क्योंकि ये तीनों ही बुद्धिमान पुरुष को पवित्र करने वाले हैं।

18.6 इसलिए पार्थ! इन (यज्ञ, दान और तप रूप कर्मों को तथा और भी) संपूर्ण कर्मों की आसक्ति और फलों (कामना) को त्यागकर अवश्य करना चाहिए - यह मेरा सुनिश्चित, उत्तम मत है।

कृष्ण उत्तर देते हुए कहते हैं – ''भारत (भारतवंशी)! अब तू संन्यास के बारे में मेरा निर्णय सुन। संन्यास कई प्रकार का होता है। मैं तुझे सत्य बताता हूं। - भगवान कहते हैं कि कुछ विद्वान ज्ञानियों का मत है कि सांसारिक लाभ के लिए किए गए कर्मों को त्याग देना ही संन्यास है। कुछ लोग कहते हैं कि फलों का (कामना का) त्याग ही असली त्याग है।

कृष्ण जैसा करुणामय और कोई गुरु या स्वामी नहीं है। बार-बार वे अपने स्तर से नीचे उतरकर अर्जुनंको सत्य हर कदम पर स्पष्ट करते हैं।

कुछ पंडित कहते हैं कि कर्मकांडी कर्म यथा किसी पशू का मेध (बलि) करना सही है। कुछ दूसरे विद्वान इस कृत्य की भर्त्सना करते हैं। कृष्ण इन मतों को स्पष्ट करते हैं।

को समर्पित कर देता है, बाहरी और आंतरिक रूप से तृष्टि पाता है। में आपको स्पष्ट करना चाहता हूं कि शब्द समर्पण से मेरा क्या तात्पर्य है। दो एक-दूसरे को काटने वाली मूल रेखाओं या अक्षों (एक्सिस) की कल्पना कीजिए :

सीधी खड़ी रेखा आध्यात्मिक जीवन का प्रतीक है, क्षैतिज रेखा सांसारिक जीवन की। जहां ये रेखाएं एक-दूसरे को काटती हैं वह जीव की स्थिति है। यह लक्ष्य आपको सामने है। एक सांसारिक जीवन का लक्ष्य और एक आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य। सांसारिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आप लगातार काम करते हैं, संघर्षरत रहते हैं। आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आप पूरी शिद्दत से योग, प्राणायाम, प्रत्याहार इत्यादि का अभ्यास करते हैं। जब आप सांसारिक लक्ष्य प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं तो आपकी प्रगति क्षैतिज रहती है, लेकिन जब आप आध्यात्मिक लक्ष्य पाने का प्रयल्न करते हैं तो आप उर्ध्व रेखा में प्रगति करते हैं।

जब तक आपका संघर्ष सांसारिक लक्ष्य प्राप्ति को लिए होता है तो आप आध्यात्मिक जीवन से बचते हैं। इसी प्रकार आध्यात्मिक प्रगति के लिए आप सांसारिक जीवन से अलग रहना चाहते हैं। दोनों में संघर्ष तो करना ही पडता है। कृष्ण कहते हैं - "दोनों से विश्राम लो।" आप सोचेंगे कि यह कैसा विचित्र निर्देश है? आप कहेंगे कि यदि ऐसा किया तो दोनों से ही हाथ धो बैठेंगे, पर सत्य यही है। जब आप दोनों से विश्राम लेते हैं तो आप स्वाभाविक रूप में आंतरिक चेतना में डूब जाते हैं - अपने अस्तित्व के आंतरिक क्षेत्र में चले जाते हैं। जब आंतरिक चेतना में आप होते हैं तो अचानक आपको लगता है कि आप किसी भी दिशा में फूट पड़ सकते हैं। तब आपको यह चनने की जरूरत नहीं होती कि क्षैतिज दिशा में जाएं या ऊर्ध्व दिशा में। तब तो आप किसी भी दिशा में एक ही साथ प्रगति कर सकते हैं।

बलि दान ( यज्ञ या पशु मेध ) की परिभाषा

कृष्ण तो स्वयं ही परम ईश्वर हैं, जिन्होंने सारे शास्त्र एवं नियम बनाए थे इसलिए उनके द्वारा दिया स्पष्टीकरण अंतिम सत्य माना जा सकता है। वे कहते हैं कि संन्यास की किसी भी प्रक्रिया को उसी संदर्भ में समझना चाहिए जिसमे वह की जा रही है। संन्यास के तीन रूप होते हैं – बलिदान (यज्ञ) दान या तुष ये उनको भी पवित्र कर देते हैं जो पहले से ही पूर्ण विकसित और पवित्र हैं।

यह समझ लें कि किसी यज्ञ या बलि दान का मूल उद्देश्य पवित्रीकरण या मानव का आध्यात्मिक पथ पर क्रमिक विकास होता है। कृष्ण कहते हैं कि कोई भी यज्ञ जो मानव हित के लिए किया जाए, कभी त्याज्य नहीं होता। यून का उद्देश्य ही परमात्मा की कृपा पाना होता है। दान से हृदय का विकार दूर होता है है, पवित्रता प्राप्त होती है और साधक को आध्यात्मिक प्रशति होती है।

यज्ञ को सदा ऐसे बलिदान का रूप समझा जाता है जिसमें होम, हवन आदि हो। यह वैदिक साहित्य में बताए गए अग्नि संबंधी कर्मकांड हैं जिनसे देबों को संतुष्ट या प्रसन्न किया जाता था। जब इनको पूरी जागरुकता के साथ किया है। जाएं तो ये शक्तिशाली विधियां हमें कॉस्मिक ऊर्जा को साथ जोड़ देती हैं।

दूसरों को भले के लिए निष्काम भाव से किया गया कर्म ही यज्ञ या बलि दान है। दान का अर्थ है निष्काम भाव से, बगैर बदले की कामना के कुछ देना। इसीलिए जो सही मायनों में परोपकार करना चाहते हैं, वे दूसरों को बताते भी नहीं कि वे क्या कर रहे हैं। वे दान गुप्त ही रखते हैं, तभी दान का उद्देश्य सिद्ध होता है। " (Fela ) ha

दान में दानकर्त्ता को कुछ पीड़ा या तकलीफ़ तो होनी ही चाहिए। जो आपकी देने की हैसियत भी न हो, वह यदि आप देने का साहस करते हैं तो यह सही दान है। दान में स्वयं तप भोगने या थोड़ा कष्ट की अनुभूति तो होनी ही चाहिए, तभी वह असली दान है। जिस देन प्रत

ी तपस्या का अर्थ इंद्रिय को भोगों से स्वयं को वंचित करना। तपस्या में साधक अंतर्मुखी होता है जबकि यज्ञ-बलिदान या दान में बहिर्मुखी रहता है। ये सारे कर्म बिना किसी आसंक्ति के या फल की कामना से करने चाहिए। ''यह तो कर्त्तव्य सम्बाकर किए जाने चाहिए।'' कथन है जगत गुरु का :- "यही मेरा उत्तम मत है।" -- प्रार जिस कि

इसको काफी गहराई से समझने की जरूरत है। चाहे कोई आध्यात्मिक कर्म हो या सांसारिक कर्म, यदि आपको अपना उद्देश्य या लक्ष्य स्पष्ट नहीं है तो आप कभी चैन से नहीं बैठ सकते। वह व्यक्ति जो जीवन के प्रवाह में स्वयं

श्रीमदुभगवत गीता

सांसारिक क्षेत्र में – उस क्षेत्र में जहां 'मेरे' का भाव रहता है, आफू लक्ष्य होता है आपकी धन-संपत्ति, आध्यात्मिक क्षेत्र में भी आपके कुछ लख रहते हैं - यथा प्रबुद्ध होना! वस्तुत: आध्यात्मिक लक्ष्य सांसारिक लक्ष्यों को तुलना में ज्यादा अहमन्यता बढ़ाते हैं। सांसारिक लक्ष्य प्राप्ति के संघर्ष में एक अवस्था आपको महसूस होती है कि उनके पीछे पड़कर आप असली प्रसनब प्राप्त नहीं कर सकते, पर आध्यात्मिक क्षेत्र में तो आपको मालूम ही नहीं रहबा कि आप क्या कर रहे हैं लेकिन दोनों प्रकार के लक्ष्य आपको अपने वास्तविक अस्‍तित्‍व से दूर कर देते हैं। जब आप संपूर्ण समर्पण करते हैं तो आपके अस्‍तित्‍ को चैन मिलता है और आपकी समझ में आता है कि हम न तो शरीर तक सीमित हैं, न मन तक।

जब तक आप अपने मन से नियंत्रित रहते हैं, आपको इस क्षैतिज या उर्ध्व रेखाओं में से किसी को तो चुनना ही पड़ेगा। आप दुविधा में पड़ जाएंगे क्योंकि चुनाव तो आपका मन या मस्तिष्क ही करेगा। जब तक मन रहेगा तब तक दुविधा तो रहेगी ही। जैसे ही मस्तिष्क का लोप हुआ कि दुविधा भी दूर हुई, नहीं तो यह दुविधा रहती ही है कि यह चुनें या वह।

एक लघु कथा

एक आदमी अपने घर पर बैठा रो रहा था। प्राय: आदमी लोग रोते नहीं, और वह भी जोर-जोर से। उसकी पत्नी ने पूछा – "रो क्यों रहे हो?'' तो उसने कहा - "तुम्हें याद है बीस वर्ष पूर्व जब हम दोनों साथ-साथ थे तो तुम्हारे पिता ने हमें रंगे हाथों पकड़ा था। उन्होंने तब धमकी भी दी थी कि यदि मैंने तुमसे शादी नहीं की तो वह मुझे जेल भिजवा देंगे।''

पत्नी ने कहा - ''हां, बिल्कुल याद है पर उसके लिए अब क्यों रो रहे हो?'' आदमी ने कहा - "यदि मैंने वह न किया होता जो उसने कहा था तो आज मैं एक स्वतंत्र आदमी होता।''

आप जो भी चुनें, कभी-न-कभी यह ताज़ुब ज़रूर होगा कि आपने यही क्यों चुना था। जो सांसारिक लक्ष्य चुनेंगे वे दु:खी होंगे कि उन्होंने आध्यात्मिक जीवन नहीं पाया, और जो आध्यात्मिक लक्ष्य चुनेंगे वे कहेंगे कि उन्होंने सांसारिक सुखों से स्वयं को वंचित कर दिया, पर कृष्ण यहां एक परम विधि बताते हैं, 'क्वान्टम स्पिरीचुएलिटी' को लिए। शायद आंतरिक विश्व को वे प्रथम क्वान्टम वैज्ञानिक थे। वे कहते हैं पूर्ण समर्पण करो और चैन से रहो – तब ही आपको आंतरिक चेतना की पूरी शिद्दत से अनुभूति होगी। आपको तब मालूम पड़ेगा कि ऊपर या क्षैतिज रूप से प्रगति प्राप्त करने के लिए कुछ भी चुनने

की जरूरत ही नहीं। आप तो 360° को क्षेत्र में कहीं भी घुस सकते हैं। आपको एक चुनाव विहीनता का नया अनुभव होगा। चुनाव विहीनता का अर्थ यह नहीं कि आप कुछ नहीं चुनते। जब आप दोनों में से कुछ भी नहीं चुनते तो वह भी तो एक चुनाव ही है। यानी आपका निर्णय यह है कि कुछ नहीं चुनेंगे। जब यह

चुनना बंद हो जाएगा तो आप वस्तुत: सब कुछ चुनने योग्य हो जाएंगे। इसी प्रकार समर्पण का यह अर्थ नहीं कि पूरी तरह निष्क्रिय हो जाओ -सब कुछ छोड़ने का नाटक करो। कई लोग मुझसे कहते हैं - "स्वामी जी! मैंने तो सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर दिया है। मुझे आशीर्वाद दें कि एक ज्यादा वेतन वाली नौकरी मिल जाए।''

एक महिला ने मुझसे कहा - "स्वामी जी! मैंने तो अपना सब कुछ आपको समर्पित कर दिया है। अब आपको मेरा ख्याल रखना है। मुझे मानसिक शांति दिलवाएं। ' II

मैंने कहा - "ठीक है! पहले हमारा मेडीटेशन का प्रोग्राम अटैंड कर लो। फिर देखते हैं।''

तुरंत उसने कहा – "मेरे पास दो दिन फालतू नहीं हैं।'' और अभी उसने मुझसे कहा था कि वह सब कुछ मुझे समर्पित कर चुकी है।

कोई बात कहने के दूर्व स्थिति समझ लेनी चाहिए - नहीं तो आपको परेशानी होगी। जब वास्तव में समर्पण की बात करें तो उसमें सब क़ुछ शामिल कर लें। कुछ भी न छोड़ें। आपको उर्ध्व या क्षैतिज रेखाओं के लक्ष्य चुनने को कोई जरूरत नहीं। आपको दोनों का अनुभव ही नहीं मिलेगा, बल्कि उससे कुछ और भी ज्यादा मिलेगा। आप अपने अस्तित्व का प्रस्फुटन विभिन्न आयामों में पूरी शिद्दत के साथ कर सकते हैं।

जब मैं समर्पण की बात करता हूं तो आपको यह समर्पण किसी गुरु या देवता के आगे नहीं करना है। अपने 'स्व' को प्रति, अपने अस्तित्व के प्रति आपका यह समर्पण होना चाहिए। आपको समर्पण अपने अंतर को करना オ अपनी चेतना के आगे सब कुछ निछावर करना है पर समस्या यह है कि आप अपने अंतर का कतई सम्मान नहीं करते। इसीलिए शुरुआत में आपको सहारे के लिए किसी गुरु या देवता की सत्ता की दरकार होती है।

किसी ने मुझसे कहा - ''स्वामी जी! मैंने तो स्वयं को आपको समर्पित कर दिया है। अब मुझे क्या करना चाहिए?''

मैंने उत्तर दिया - "यदि तुम्हारा समर्पण असली होता तो तुम यह प्रश्न ही नहीं पूछते। तुम्हें निर्देश अपने अंतर से मिलेगा, लेकिन जब तक तुम्हारे मन में संशय है, तुमने समर्पण नहीं किया है।''

श्रीमद्भगवत गीता

(संन्यासी) से अलग-अलग होते हैं। हर एक को ज्ञान होता है कि क्या उसे करना है और क्या नहीं करना है।

कई बार अपनी जिम्मेदारियों को छोडकर दूसरे की भूमिका अपनाना अपनी जागरुकता बढ़ाने से ज्यादा आकर्षक प्रतीत होता है, जिससे हम अपने कर्तव्य कर्म बिना किसी आसक्ति के कर सकें। यह स्पष्ट समझ लें कि सही बर्ताव और

जागरुकता के हम कोई भी भूमिका अपना लें, वह कारगर सिद्ध नहीं होगी। हमारे आश्रम को नियम के अनुसार हर एक को सूबह 6 बजे गुरु पूजा में

शामिल होना जरूरी है। यह नियम उनके लिए भी है जो स्थायी निवासी हैं, ब्रह्मचारी हैं तथा उनको लिए भी जो कोर्स करने या आरोग्य पाने के लिए यहां हहरते हैं। कुछ बाहरी लोग जितनी अनिच्छा से इस पूजा में शामिल होते हैं -वह बहुत स्पष्ट होती है। कुछ तो सुबह 6 बजे नींद में ही रहते हैं। हमारे पास कोई पुलिस बल तो नहीं है कि उन्हें ढूंढ-दूंढकर जगाया जाए।

वह जरूरी काम छोड़ देना क्योंकि वह आरामदेह नहीं है, संन्यास का भाव नहीं प्रकट करता है। यह सुविधा या निष्क्रियता भी राजस तत्त्व की देन होती है। कोर्स में भाग लेने के बाद भी कुछ लोग पूछते हैं कि वे कितनी तरह से ध्यान कर सकते हैं। मैं उनसे कहता हूं – "कम-से-कम एक तो सही रूप से करो।'' एक हफ़्ते के बाद जब उनका जोश थोड़ा ठंडा हो जाता है, वे बड़े संकोच से कहते हैं - "स्वामी जी! अब तो एक बार भी ध्यान करने का समय नहीं है मेरे पास।" यानी सिवाय ध्यान करने के उनके पास हर चीज के लिए समय है। हम सभी

को मिलने का समय दे देते हैं, पर खुद को नहीं देते। हानि किसकी होती है? कृष्ण कहते हैं कि जो बताए गए हैं उन जरूरी कर्मों को बिना किसी आसक्ति भाव या कामना को करना ही सारिवक कर्म की आदर्श स्थिति है। कृष्ण ने यह बात गीता में इतनी बार कही है कि बात पूरी दिल में उतर गई है-अपने समाज, धर्म द्वारा बताया हुआ कर्त्तव्य कर्म करो बिना किसी आसक्ति या कामना को

यानी इन कर्मों में कोई 'मैं' और 'मेरे' का भाव नहीं होना चाहिए। प्राय: पारंपरिक घरों में लोग मंत्रादि बिल्कूल रटे-रटाए रूप में बोलते हैं। वे एकाग्र होने का प्रयत्न तो करते हैं पर घर की हर गतिविधि से वह विचलित हो जाते हैं। ये लोग 'अपना' काम ठीक ढंग से करने में इतने आसक्त होते कि हर गतिविधि उन्हें विचलित कर देती है। इसके बरअक्स जब कोई बच्चा

मंत्र जपता है तो आराम से और मजा लेकर पूरा जाप कर लेता है। में जब दस वर्ष का भी नहीं हो पाया था, तब अन्नामलाई स्वामीगण ने

तिरुवंनमलाई में मुझे ध्यान लगाने की विधि में दीक्षित किया था। दो साल तक तो मैं उस विधि से खिलवाड-सा करता रहा। दो वर्ष लगे उस पद्धति को मुझ पर असर डालने में।

भ्रांति विहीन कर्त्तव्य ( पालन

18.7 नियत कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए (क्योंकि निषिद्ध और काम्य कर्मों को स्वरूप से ही त्याग देना उचित है)। इसलिए मोह रूधीना. मान के कारण कर्मों का त्याग करना तमस त्याग है। कार पर

  • 18.8 जो कुछ कर्म है वह सब द:ख-स्वरूप ही है ऐसा समझकर 11 कोई राष्ट्र यदि कोई शारीरिक क्लेश को भय से कर्त्तव्य कर्मों का त्याग कर दे तो ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी निकी गिरफ़ नहीं पाता है।
  • 18.9 अर्जुन! 'शास्त्र विहित (कर्म) करना कर्त्तव्य है' इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया गया कर्म सात्त्विक ल्मोंगिड़ है त्याग माना गया है। हा एक्सप्र में ब
  • 18.10 जो मनुष्य अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता वह शुद्ध सत्त्वगूण से युक्त पुरुष संशय रहित, and light the ज्ञानवान और सच्चा त्यागी होता है। अगर
  • 18.11 क्योंकि शरीर धारी किसी भी मनुष्य के द्वारा संपूर्णता से कमाँ का त्याग करना संभव नहीं है, इसीलिए जो कर्मफल का त्यागी है वही (सच्चा) त्यागी है - ऐसा कहा (माना) जाता है।
    • 18.12 कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों को तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ - ऐसा तीन प्रकार का फल (नतीजा) मरने के पश्चात् अवश्य मिलता है, किन्तु कर्म फल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों का फल किसी काल में भी नहीं होता (क्योंकि उनके द्वारा किया गया कर्म वास्तव में कर्म नहीं है)।

कृष्ण कहते हैं कि नित्य कर्म तो पूरे अनुशासन एवं नियम के साथ किए जाने चाहिए। इनको न करने से हम तमस में पड़ जाते हैं तथा अज्ञान और आलस्य हम पर हावी होने लगता है। नित्य कर्म भी व्यक्ति-व्यक्ति के अलग-अलग होते हैं। किसी गृहस्थ के नित्य कर्म किसी विद्यार्थी या भिक्षु

समपुण का तकनाक

18.13. 14 महाबाहो! संपूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पांच हेतु कर्म का अंत करने के लिए उपाय बताने वाले सांख्य में कहे गए हैं – तू उनको मुझमें भलीभांति जान। कार्यों की सिद्धि में अधिष्ठान और कर्त्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के कारण एवं नाना प्रकार को अलग-अलग चेष्टाएं और वैसे ही पांचवां हेतु दैव (पूर्व कृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम दैव है) कहा गया है। मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकल अथवा विपरीत, 18.15 कुछ भी करता है. उसके पांच कारण हैं। परंतु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होने को कारण कर्मों के होने में केवल शुद्ध रूप आत्मा को ही कर्त्ता समझता 18.16 है, वह मलिन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता।

इन श्लोकों में कृष्ण समर्पण की सही तकनीक या तरीका बतलाते हैं। सांख्य दर्शन से पांच हेतुओं को मिलाते हैं जो हमारी किसी भी गतिविधि के लिए जिम्मेदार होते हैं। ये हैं – शरीर-मन तंत्र, इस तंत्र का संचालन (यानी उस व्यक्ति स्वत्त्व), इंद्रियां, विभिन्न प्रयासों को प्रकट करने वाली गतिविधियों और अंत में चरम सत्तवान, ईश्वर! हमारी सारी अच्छी या बुरी, गलत या सही गतिविधियां इन पांच हेतुओं को कारण ही होती हैं, लेकिन यदि वह जीव स्वयं को 'कर्त्ता' मानता है तो इसकी उसको शरीर व मन को जानकारी नहीं होती। कृष्ण यहां उस व्यक्ति या जीव को, जो अपनी और ईश्वर की सत्ता का स्वयं को निमित्त या कर्त्ता समझता है, 'आत्मा' के नाम से संबोधित करते हैं जो इन गतिविधियों को नहीं देखता या वाकिफ नहीं होता। कृष्ण जीव में विद्यमान ईश्वर के अंश एवं कॉस्मिक ऊर्जा में फर्क मानते हैं। वे आत्मा और परमात्मा (या ब्रह्म), मानव और देव, नर और नारायण तथा स्व-अस्तित्व और पराशक्ति में भिन्नता समझते हैं।

कृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति जब सात्त्विक भाव में शांत और जागरूक रहता है तो बाहरी विश्व का हाल उस पर कोई असर नहीं डाल पाता। उसे कोई परवाह नहीं होती कि उसकी तारीफ हो रही है या भर्त्सना और वह अपना काम करता रहता है। संन्यास का यही असली भाव है - सात्त्विक रूप से ऐसा तभी हो पाता है जबकि व्यक्ति किसी फल की कामना न करता हो।

यह स्वाभाविक ही है कि मानव बिना काम किए निश्चल नहीं रह सकता। कुछ-न-कुछ तो वह करेगा ही - यदि शारीरिक रूप से नहीं तो मानसिक रूप से कुछ करने में व्यस्त रहेगा। सोने पर भी वह सपना देखता रहता है। यदि हम आंखें बंद कर लें तो हमारे अंदर का टीवी आरंभ हो जाता है। हम चाहे अपनी आंख, कान इत्यादि बंद कर किसी एकांत कमरे में दुबके पड़े रहें, दिमाग में कुछ-न-कुछ द्वंद-फंद तो आरंभ रहता ही है।

जब ऐसी हालत हो तो सिर्फ एकमात्र तरकीब से मानव स्वयं को शांत रख सकता है - मनसा-वाचा-कर्मणा अपनी किसी गतिविधि के फल की कोई कामना न करे। ऐसा हममें से सभी कर सकते हैं। कृष्ण कहते हैं कि जिसे अपने कर्म-फल की कामना न हो, वही असली संन्यासी है। उसी ने इस विश्व का परित्याग कर दिया है।

जब कोई कर्म पूरा हो जाए और इसका फल भी मिल जाए, लेकिन यदि उस कर्म और उसके फल के प्रति कोई आसक्ति रहती है तो फिर एक नई कामना पैदा होने लगती है। इसे ही मैं 'कर्म' कहता हूं। 'कर्म' यानी अपूर्ण कामनाएं। जब तक हमारी 'कर्त्ता' के रूप में कर्म में आसक्ति रहेगी तो फिर उसके बदले में सुखद या दुःखद फलों की इच्छा भी उभरती रहेगी और हम इस 'कर्म' और 'संसार' के विषय चक्र में बंधते रहेंगे। हम अपनी सहज गुण मानसिकता के अनुसार उनके अच्छे, बुरे या मिश्रित फलों को कामना करते रहेंगे: अर्थात् उस 'वासना' के अनुसार जो मृत्यु को पश्चात भी हमारे साथ रही है।

यह समझ लें कि वहां 'कोई भी ऊपर नहीं है जो हमारे कर्मों का हिसाब रखता है। यह काम तो हमारी आत्मा करती रहती है जिससे हम कभी बच नहीं सकते। जब हम मरते हैं और शरीर खत्म होता है, तब हमारी यही आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है। यह आत्मा हमारे पिछले जन्म की 'मानसिकता' जागृत रखती है जो 'वासना' है। इस नियम से कोई भी बच नहीं सकता। 'संस्कार' इन्ही पिछले जन्म से लाई इच्छाओं का समेकित रूप होता है जो इस 'संसार-चक्र' में हमें डालती रहती है और हम पुन: जन्म-मृत्यु को चक्र में चलते रहते हैं।

लेकिन जब हमारे पास कोई अतृप्त इच्छाएं - कर्म, संस्कार और वासना - नहीं बचतीं तो हम 'कर्त्तापन' की अपनी आसक्ति से मुक्ति पा जाते हैं और फिर तो कर्म एवं उसके फल के मात्र साक्षी रह जाते हैं। ऐसा ही व्यक्ति संसार-चक्र को भंग करता है।

कृष्ण समापन करते हुए कहते हैं कि दार्शनिक चर्चाएं इन पांच हेतुओं को ही सारी गतिविधियों का संचालक मानती हैं, जिनका अंतिम महा-नियंत्रक ईश्वर या दिव्य-सत्ता होती है। अपने शरीर-तंत्र आत्मा को घमंड में भूले हुए तथा इंद्रिय-बोध की भ्रांति में डूबे हुए हम सारी शक्ति का नियंत्रण स्वयं को सुन को मानते हैं, जो सब कुछ चलाती है। जब तक हमारी यह भ्रांत धारणा रहेगी हम अज्ञान में ही उलझे रहेंगे।

हम अपने को चाहे कुछ भी समझें - स्वतंत्र सत्ता या शरीर-मन-आत्मा तंत्र, यह समझ कई आयामों में संपूर्णता का द्योतक होता है। इसके बावजूद हम यही समझते हैं कि 'हम' ही संपूर्णता के लिए जिम्मेदार हैं और यहीं से समस्या का आगाज़ हो जाता है। जैसा हम पहले कह चुके हैं समर्पण के तीन स्तर होते हैं - बौद्धिक स्तर, भावनात्मक स्तर और अस्तित्व का सार।

बौद्धिक सार पर समर्पण आसान है क्योंकि यह लगातार हमें त्रास देता रहता है। जब भी हम किसी ज़्यादा बुद्धिमान और स्पष्ट समझ रखने वाले से मिलते हैं तो उसके सामने समर्पण करते हुए हमें देर नहीं लगती। ज्यादातर हम इसी बौद्धिकता से मुक्ति पाना चाहते हैं। जैसे ही कोई ऐसा मिला जिसके सामने हम इससे मुक्ति पाएं, हम उसको अपनी बुद्धिमत्ता देकर चैन से बैठ जाते हैं।

दूसरा नंबर है भावनात्मक समर्पण का। यह तब घटित होता है जब किसी ध्यानावस्था अनुभव या समझ के अंतर्गत आप अपने गुरु से गहन भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं। गुरु की भावना यानी वह रास्ते जो वह तुम्हें दिखाता है और जीवन-यापन के वे तरीके जो वह चाहता है तुम अपनाओ। भावनात्मक स्तर पर गुरु आपकी प्रथम प्रार्थमिकता पर रहता है।

इसके पश्चात् आता है इंद्रियों के स्तर पर समर्पण जो एक गहराई भरा समर्पण होता है। इंद्रियों का समर्पण मतलब आप वही सुनोगे जो गुरु कहता है और कुछ नहीं। साधारणतया जब आप मुझको सुनते हो तो आपके दिमाग में लगी एक 'छलनी' उसको अलग करती जाती है, जिससे आपका मतैक्य नहीं होता। मतलब आप वही सुनते हो जो आप सुनना चाहते हो, लेकिन जब बौद्धिक और भावनात्मक समर्पण हो जाता है तो आप अपनी यह गलत धारणा त्यागने को उद्यत हो जाते हैं और इंद्रियों को अवरोध हटा लेते हैं।

एक बार एक शिष्य ने गुरु से पूछा - "मैं क्या समर्पण करूं?"

गुरु ने पूछा - "तुम यह कैसे पता लगाओगे कि क्या तुम अपने बारे में जानते हो?''

शिष्य ने कहा - ''मैं स्वयं को अपनी इंद्रियों के माध्यम से जानता हूं। ''

गरु ने फिर पूछा – ''इंद्रियों को हिसाब से तुम क्या सोचते हो कि तुम हो ? !!

शिष्य ने कहा – "जहां तक मैं समझा हूं मैं शरीर और मन हूं।"

पर उसके गुरु का ज़वाब था - "तुम ईश्वर हो, सिर्फ मन या शरीर ही नहीं हो।'' गुरु ने आगे कहा – "जब तुम अपनी इंद्रियों का भी समर्पण कर दोगे तब तम्हारी समझ में वह सत्य आएगा जो मैं कह रहा हूं। जैसे ही तुमने मुझ पर भरोसा कर अपनी इंद्रियों का समर्पण किया कि तुम ईश्वर का अनुभव करने लगोगे। तब तुम्हारी समझ में आएगा कि 'तत् त्वम् असि' (तुम वही हो, यानी कि ईश्वर हो) का असली अर्थ क्या है।'' मैं यहां बार-बार यह कहता रहता हूं कि मैं यहां यह सिद्ध करने नहीं आया हूं कि मैं ईश्वर हूं, बल्कि यह कि तुम ईश्वर हो।

स्वामी या गुरु का दावा होता है उस विचार पर, जो कहता है तुम अनन्त हो। वह तुम्हें तुम्हारे अंतर के विभिन्न आयामों को उद्घाटित करता है जो तुमने कभी न स्वयं खोजे हैं, न उनका अनुभव किया है। वह दिखाता है कि ऐसा करना यदि उसके लिए संभव है तो तुम्हारे लिए भी संभव है, पर जब तक तुम अपनी इंद्रियों पर विश्वास करते हो, तुम यही समझते हो कि तुम मात्र शरीर और मन ही हो।

जब तुम अपनी इंद्रियों से अधिक अपने गुरु पर भरोसा करते हो और समझते हो कि गुरु के शब्द सत्य हैं, न कि तुम्हारा इंद्रिय बोध - तब सत्य तुम पर प्रकट होता है। जब गुरु कहता है कि तुम ईश्वर हो तो यह सत्य अचानक तुम भी समझने लगते हो। तुम्हारी समझ में आता है कि तुम केवल मन-शरीर तंत्र नहीं, जो तुम्हारी इंद्रियां तुम्हें बताती हैं।

अब दो आवाज़ें एक साथ दो अलग-अलग स्तरों से उठने लगती हैं। एक ओर तुम्हारी इंद्रियों की आवाज़ है जो कहती है कि तुम शरीर-मन ही हो। दूसरी ओर तुम्हारे गुरु कहते हैं कि तुम ईश्वर हो। जब तक तुम इंद्रियों की सुनते रहोगे, तुम्हें गुरु की आवाज सुनाई ही नहीं पड़ेगी। जब तुम इंद्रिय बोध से हटकर गुरु की ओर आते हो, तुम उनकी आवाज़ सुनते हो और अनुभव करते हो कि तुम ईश्वर हो; दिव्य हो।

अंतिम समर्पण

आंतरिक विश्व में, आपका अंतिम और प्रथम औज़ार संपूर्ण समर्पण ही है। तभी आपका सत्य से साक्षात्कार संभव है। आप कृष्ण चेतना की अनुभूति सिर्फ बौद्धिक एवं भावनात्मक समर्पण से नहीं वरन् बौद्धिकता और भाव बोध के मल अर्थात इंद्रियों के समर्पण से ही कर सकते हैं। ये इंद्रियां ही तो हैं जो मसाला या आंकड़े मन-बुद्धि को प्रदान करती हैं। जब आप इनका समर्पण कर देते हो तो वह आंकड़े इत्यादि का मल भी समर्पित हो जाता है।

आपको अपने बारे में सारी सुचना इंद्रियों से ही तो मिलती है। आप अपना सम्मान इसलिए ही करते हैं क्योंकि इंद्रियों ने दूसरों को इंद्रिय-बोध द्वारा इसकी ताईद की है। यदि कोई कहता है - "आप सुंदर हो।" तो यह टिप्पणी आपकी 'बही' में दर्ज हो जाती है। जब कोई कहता है आप गूंगे हो तो दूसरी टिप्पणी दर्ज हो जाती है।

फिर आखिर में आप सारी टिप्पणियों का आकलन करते हो कि किसने आपके बारे में क्या कहा। आप देखते हैं (मान लीजिए) कि 72 प्रतिशत लोगों ने कहा कि आप बुद्धिमान हैं, 20 प्रतिशत कहते हैं कि आप एक ठस दिमाग वाले हैं और बाकी कुछ नहीं कहते तो आप विश्लेषण करते हैं कि यदि 72 प्रतिशत आपको बुद्धिमान मानते हैं तो सब लोग तो मूर्ख नहीं हो सकते। इसलिए आप अवश्य ही बुद्धिमान हैं। इस प्रकार आपका अपने बारे में निष्कर्ष प्राय: दूसरों की आपके बारे में राय पर निर्भर रहता है।

आप लगातार लोगों के पास जाते रहते हैं उनकी अपने बारे में राय लेने को लिए। परिणामस्वरूप आपकी अपनी राय में भी आपको इंद्रियों के द्वारा प्राप्त जानकारी का बहुत हाथ होता है।

कृष्ण कहते हैं अर्जून से कि तू अपनी इंद्रियों का भी समर्पण कर दे। जब आप इंद्रियों का समर्पण करते हो तो आपकी अपने बारे में जानकारी का मूल स्रोत और आपकी पहचान का उत्स जो शरीर-मन के साथ जुड़ा रहता है, वह भी नहीं रहता। जब तक इंद्रियों पर भरोसा करते रहेंगे आप स्वयं को शरीर-मन ही मानेंगे, पर जब अपने गुरु या स्वामी पर भरोसा करेंगे - इंद्रियो की तुलना में - तब आपकी समझ में आएगा कि आप वाकई एक दिव्य सत्ता या ईश्वर हैं।

अब यह आपके चुनाव पर निर्भर है। यदि इंद्रियों की बात मानेंगे तो गुरु की बात समझ में नहीं आएगी और गुरु की बात मानेंगे तो इंद्रियों को जानकारी झूठी लगेगी तो यह आपके निर्णय पर ही आधारित है।

कृष्ण कहते हैं कि जब आप तीनों स्तरों पर आत्म-समर्पण कर देते हैं तब आपको एक चरम अनुभव प्राप्त होता है। मैं आपको बताता हूं - यह समर्पण ही प्रबोधन है। उसी क्षण आप सत्य का अनुभव करते हैं।

प्राय: हम शब्दों से खिलवाड़ करते हैं। लोग मुझसे कहते रहते हैं कि इन्होंने कृष्ण, वेंकटेश्वर या शिव को अपना जीवन समर्पित कर दिया है और फिर कहते हैं कि उनकी एक ही इच्छा है - प्रसन्न रहने की। यदि वाकई इन्होंने समर्पण कर दिया है तो काफ़ी है। फिर उनकी कोई चाह कैसे शेष रह सकती है? लेकिन यदि मन में शक-ओ-शूबा है तो समर्पण नहीं हुआ है,

क्योंकि समर्पण के बाद तो 'आप' रहते ही नहीं, गायब हो जाते हैं। समर्पण में खोना कुछ नहीं है, पाना-ही-पाना है। समर्पण में कुछ देना थोड़े ही होता है। अपना सब कुछ अपने पास ही रखो, बस उसको रखने की चाह अंदर मत पैठने दो। अपना आकलन अपनी धन-संपदा के आधार पर मत करो। जो कुछ तुम अपनी कीमत समझते हो उससे बहुत ज्यादा हो। जब आपको यह भान होगा तो आप बैंक-बैलेंस, संबंधों, व्यवहारों या अपने नाम और ख़्याति के फ्रेम में अपने को नहीं जकड़ोगे। तब समझो कि समर्पण हो गया। मैं तो चाहता हूं कि आप अपने बारे में इन तुच्छ विचारों को समर्पण कर दो – इससे

जीवन के इस महासागर की सतह पर कुछ बुलबुले उठते हैं। एक मुक्ति पा लो। बुलबुला सोचता है कि उसकी अपनी अलग हैसियत है जो काफी देर तक चलेगी, पर वह तो कुछ क्षणों में ही विलीन हो जाती है। वह सोचता है कि उसका बैंक बैलेंस है जो रेत के एक कण को समान है, दूसरा उसकी धन-संपदा का द्योतक है इत्यादि। इनकी सुरक्षा को लिए वह एक बाड़ लगाता है, पर वह बुलबुला यह खेल कितनी देर तक खेल सकता है – सिर्फ़ कुछ सैकेंड्स ही न? जब तक वह अपना खेल पूरा करे वह पुन: सागर में विलीन हो जाता है। इन तीनों स्थितियों में वह बुलबुला समुद्र का हिस्सा रहता है – जब वह

बना, जब वह रहा और जब वह गायब हुआ। जब वह समुद्र से अलग अपने अस्तित्व का दावा करता है, अपनी अलग हैसियत समझता है और सोचता है कि वह एक अलग हस्ती है – तब भी रहता वह समुद्र का ही हिस्सा है जिसमें वह है जिसमें वह हैं।

शीघ्र ही विलीन भी हो जाता है। इसी प्रकार कुछ क्षणों के लिए हम भी सोचते हैं कि हमारी एक अलग

हस्ती है इस वैश्विक चेतना में। इसी दौरान आप लोगों से अपने संबंध बनाते हैं, मित्र बनाते हैं और समझते हैं कि हम सुरक्षित हो गए। आप अपना साज़-ओ-सामान जोड़ते हैं अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने को। इन चीज़ों से हम अपने बारे में अपनी राय कायम करते हैं। आप भी इसी बुलबुले की भांति बर्ताव करते हैं न?

समर्पण का अनुभव करना

अचानक सब कुछ गायब हो जाता है। खेल शुरू होने के पूर्व (या) जब खेल जारी था और जब खेल ख़त्म हुआ - आप समझें या न समझें, जानें य न जानें, अनुभव करें या न करें - आप सदा समुद्र को अंश ही रहे हैं। आप ईश्वर हैं, परमात्मा से एकात्म हैं। बाहरी

जब मैं समर्पण की बात करता हूं तो मेरा अभिप्राय होता है इस सत्य को समझो कि आप समुद्र हो। जब आप पैदा हुए तो आपने समझा कि आप एक अलग हस्ती हैं, पर जैसे ही आप प्रबुद्ध हुए कि आपने जाना कि आप तो सदा से ही समुद्र थे। इस अंतिम सत्य का साक्षात्कार करना हो समर्पण है। अपने बारे में सारे छोटे-छोटे तुच्छ विचारों का समर्पण कर असलियत में जागृत हों, नहीं तो आप समर्पण नहीं इस शब्द 'समर्पण' के साथ मात्र खिलवाड कर रहे हैं।

हम स्वयं को परिभाषित करते हुए काफ़ी फलो-फूले शब्द प्रयुक्त करते हैं। हम यह समझ नहीं पाते कि हम वर्णनातीत हैं। एक दिन एक शिष्य ने मेरे सामने अपने बारे में काफी अतिश्योक्तिपूर्ण शब्दों का प्रयोग किया। जब वह चला गया तो मैंने अपने शिष्य से कहा कि यह हीन भावना से ग्रसित प्रतीत होता है। मैंने कहा कि अपने को ईश्वर न समझना, अपने को कम कर आंकना ही है; हीन भाव से ग्रसित होना ही है।

कुछ मछलियां धारा के साथ तैरती हैं और कुछ धारा के विरुद्ध, पर वे चाहे धारा के साथ जाएं या विपरीत, हैं तो वह सदा जल में ही। (इसी प्रकार) आप परम तत्त्व (ईश्वर) के साथ रहें या विरोध करें, आप हैं तो उसी में लीन। आप स्वयं को दैवी समझें या न समझें, आप हैं तो दिव्य। इसमें कोई विकल्प नहीं है। आपके पास सिर्फ़ एक ही रास्ता है - या इस बात को महसूस कर आनंद उठाएं या लगातार संघर्ष करते हुए कष्ट पाएं - बस। आप अपने चारों ओर चाहे कितनी भी बाड़ लगा लें, कितने भी बुलबुले इकट्ठे कर लें, पर क्या आप लहर को आने से रोक सकेंगे? आप कुछ भी कर लें यह सारा नाटक कुछ सैकेंड्स का ही होता है।

अगली समस्या है कि क्या करें यदि समर्पण नहीं कर सकते।

कुछ लोग मुझसे पूछते हैं - "स्वामी जी! समर्पण तो मुझसे नहीं होता, मैं क्या कर सकता हूं?'' आप चिंता न करें क्योंकि आपके पास समर्पण के लिए कुछ नहीं है। यह समझ कि मेरे पास समर्पण के लिए कुछ नहीं है, आपका समर्पण पूर्ण कर देती है। शांत रहें। आप समर्पण करें या न करें परमात्मा सब

ख्याल रखेगा। स्वत: जीवन चलता रहेगा और आप चैन से रहेंगे। यह चैन ही

समर्पण का प्रतीक है। जीवन के प्रवाह में स्वयं को चैन से बहने दें। इस सत्य को जागरूक रहें कि आप शरीर और मन से बहुत ज़्यादा हैं – जैसा आपकी इंद्रियों ने समझाया होगा। आपके समाज ने भी बताया होगा कि आप 'कुछ' हैं। अब इस सत्य को जागरुकता से ग्रहण करें कि आप जो सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा हैं, महान हैं। समर्पण आप में एक नई चेतना विकसित करेगा – आप एक नए 'जीव' बनकर उभरेंगे।

प्राचीन शास्त्रों के अनुसार तीन स्तरों का जन्म होता है और तीन प्रकार की कोख़ से होता है। प्रथम है भू-गर्भ यह स्त्री की कोख़ है जो बच्चे को पैदा करती है। इसका संबंध सीधा मूलाधार चक्र से होता है, जो सातों चक्र में सबसे नीचा होता है। चक्र अर्थात् मानव शरीर में स्थित ऊर्जा केंद्र! दूसरा है हृत गर्भ यानी हृदय का गर्भ, जो उसके कलाकारों में दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए एक गायक या चित्रकार सबसे पहले अपनी धुन या चित्र का आभास अपने हृदय से प्राप्त करता है और तभी उसे बाहर अभिव्यक्त कर पाता है।

स्त्री की पूर्णता शिशु-प्रसव से होती है, जब वह 'मां' बन जाती है। इसी प्रकार एक कलाकार-चित्रकार, गायक-वादक, कवि या मूर्तिकार - तभी अभिभूत करने वाली पूर्णता पाते हैं जब अपनी कृति का 'प्रसव' कर देते हैं।

कवि को लिए तो कोख उसका दिल ही है, हृत-गर्भ। वह बाद श्रीमान् की अंतिम है 'ज्ञान गर्भ' – यह 'सहस्रार चक्र' या उच्चतम ऊर्जा केंद्र में रहता है – सिर को ठीक ऊपर। 'ज्ञान गर्भ' में सारे आध्यात्मिक विचार मस्तिष्क में सोचे जाते हैं और वहीं उन पर काम होता है। अचानक एक क्षण ऐसा आता

है जब आपके एक नवरूप को आप जन्म देते हैं - एक प्रबुद्ध जीव को। जब आप समर्पण की यह अवधारणा ग्रहण करते हैं और इस पर काम

शुरू करते हैं तो आप जागृत होकर स्वयं को एक प्रबुद्ध जीव को रूप में सुजित करते हैं। जब तक आप स्वयं को एक बुलबुला समझते हैं, आप असुरक्षित रहते हैं, इस बार की में स्वयं को एक बुलबुला समझते हैं, आप असुरक्षित रहते हैं, हैं। जिजीविषा और परिग्रह की चाह आपको त्रास देती रहती है, पर जैसे ही आपकी समझ में आया कि आप स्वयं सागर हैं – इसी से हैं और इसी में हैं और इसी में विलीन हो जाएंगे और कभी मरेंगे नहीं, आप सुरक्षा पाते हैं क्योंकि

स्वयं को सागर होने की अनुभूति आपको बताती है कि अब कुछ पाना आप स्वयं सागर हैं। नहीं क्योंकि सब कुछ तो आपका ही है। इससे आपकी परिग्रह की चाह स्वत:

श्रीमदुभगवत गीता

खत्म हो जाती है। मैं यह नहीं कह रहा कि आप अपनी वसुधा लुटा दो। जो ज आपको पास है उसे अपने पास ही रखें, पर उसको आत्मसात् न होने दें – उसके स्वामित्व भाव को स्वयं को बांधने न दें। अपने अंदर यह भरोसा रखें कि आफूं पास जो कुछ भी है उससे आप कहीं ज्यादा महान हैं।

सात वर्ष की आयू तक आपको खिलौनों में बहुत दिलचस्पी रही होगी। बे आपके लिए महत्वपूर्ण होंगे, पर आज भी क्या वे महत्वपूर्ण हैं? अब आपने न उनको त्यागा है न उनसे कोई मोह बाकी रहा है, वे हैं बस! आप उनसे परे आ गए हैं - उनके प्रभाव से।

'राग' का अर्थ ही आसक्ति होता है और 'अराग' का अर्थ है वितुष्णा तथा विराग (या वैराग्य) का अर्थ है राग-अराग से परे होना। आप जब बड़े हुए तो आपको खिलौनों को प्रति वैराग्य उत्पन्न हो गया। इसी प्रकार जब आप स्वयं को सम्द्र समझेंगे (बुलबुला नहीं) तो आपको मन में अपने पूर्व संग्रहों को प्रति एक वैराग्य भाव उत्पन्न होगा। आपको वे रेत के कण को भांति तुच्छ लगेंगे। आप उनसे परे पहुंच चुके होंगे।

अब जिजीविषा भी अपनी प्रासंगिकता खो चुकी होगी। आपकी वसुधार कहीं गायब नहीं हुई - वह तो वहीं है - पर आप उनको 'त्यक्त' भाव से भोगते हैं - शायद पहले से ज्यादा शिद्दत से भी। रूटी में मन करता बन

जब आपको लगे कि कोई चीज आपसे कभी भी छिन जाएगी तो आप उसकी परवाह करने लगते हैं। जब आपको महसूस हो कि आप भी एक समुद्र हैं और वह भी तो आप उसकी ज्यादा कद्र करने लगते हैं। यह अनुभूति आपको शरीर, मन और चेतना के स्तर पर काफ़ी बदल देती है। चेतना का यह महती े परिवर्तन आपको आपका एक नया स्वरूप प्रदान करता है।

कृष्ण तो समर्पण को इन तीन स्तरों से और भी ज्यादा गहरे में जाते हैं। वे अर्जुन को एक चरम अनुभव की झलक स्वयं दिखाते हैं। यह अनुभव कृष्ण अर्जून को 'विश्वरूप' दर्शन द्वारा प्रदान कर चुक हैं। इसके बावजूद् अर्जुन स्वयं को अपने भय को कारण इस महती अनुभव में स्थापित नहीं क कर पाता।

प्रथम अनुभव आप अपने भय के कारण प्राप्त नहीं कर पाते, लेकिन अब अर्जुन अधिक व्यस्क हो चुका है और स्वयं को इस अनुभव में स्थापित करने के योग्य भी। कृष्ण अर्जून को यह अनुभव पुन: प्रदान करते हैं जो उसके साथ सदा रहने वाला है। अगले श्लोकों में कृष्ण अर्जुन को प्रबोधन का अनुभव प्रदान करते हैं। ।

एक लघु कथा

एक व्यक्ति ने एक ज़ेन मास्टर से पूछा कि वह बुद्ध कैसे बने? उस जेन मस्टर ने उसके एक ज़ोरदार चांटा मारा। उसी क्षण वह व्यक्ति प्रबुद्ध हो गया। प्रकाश का कार्या मार्ग। उसी क्षण वह व्यक्ति प्रबुद्ध हो गया।

उसने स्वयं में 'बुद्धत्व' की अनुभूति की। चांटा मारने से यह मालूम हुआ कि बहु पहले से ही उस स्थिति में था। उसे नींद से जगाने की जरूरत थी। उन्हें से ही उस सिर्दे में जगाने की जरूरत थी। कृष्ण अर्जून को ऐसी ही लंबी नींद से जागृत कर रहे हैं, जिसे 'संसार सागर की सुषुप्ति' कह सकते हैं या अचेतना और तमस की नींद, कृष्ण उसे ज़ोर से हिलाते हैं, उसे अपना चरम अनुभव प्रदान कर और अर्जुन समर्पण को चरम अनुभव में, स्वयं, को स्थापित, कर, लेता, है। जन्म कर

कर रहा था। एक दिन वह अपने स्वामी को कक्ष की सफ़ाई कर रहा था तो है अचानक उससे स्वामी का प्रिय चाय का प्याला टूट गया। वह स्वामी को यह बात बताना भी चाहता था, पर डर था कि स्वामी उसे दंडित करेंगे। वह अपने स्वामी के पास गया और कहा – ''स्वामी जी! क्या यह

सल्य नहीं है जो जन्म लेगा वह कभी-न-कभी मरेगा भी जरूर?''

स्वामी ने कहा – "हां! सच है।'' – उस लड़के ने उस कप के टूटे हिस्से दिखाए और बोला – ''तो आपके

प्रिय कप को मरने का समय आ गया था।'' कृष्ण के वक्तव्य को अपने अर्थ न दें। वे सीधे-सीधे यह कह रहे हैं कि

स्वयं को अहम् से मुक्त करो। जिसने यह समझ लिया है कि वह समग्र का अंग है वह यदि किसी को मारता भी है तो वह मारना नहीं है। कृष्ण कहते हैं कि स्वयं में निहित सत्य का अनुभव करो। सही अर्थ ग्रहण करो; स्वयं को अहम् र से मुक्त करो। वह यह नहीं कह रहे कि जाओ और सबको मारने लगो (क्योंकि

तुम्हारा मारना, मारना नहीं माना जाएगा)। कृष्ण इस अतिशयता पूर्ण उदाहरण, मारने का प्रयोग अर्जून को समझाने

के लिए कर रहे हैं। जब किसी में जिजीविषा की ज़रूरत नहीं रहती तो उसकी हर करनी अनासक्त और निष्काम (बिना बदले की भावना के) रहती है। जब कोई व्यक्ति इस अवस्था में आ जाता है तो वह परमात्मा से सीधा जुड़ जाता है। फिर तो उस व्यक्ति का कुछ भी नष्ट करना उसी प्रकार है जैसे प्रकृति म किसी को नष्ट कर रही है। यह विभिन्न आवृत्तियों को अनुसार एवं विभिन्न समझ के अनुसार होता रहता है जैसा पहले स्पष्ट किया जा चुका है। कृष्ण का यह वक्तव्य अर्जुन को समझाने के उद्देश्य से दिया गया है कि यह अर्जुन का कर्त्तव्य है कि वह वीरता से युद्ध करे, न कि रणभूमि से भागता है

फिरे।

मार एक नितांत वक्तव्य

18.17 जिस पुरुष के अंत:करण में 'मैं कर्त्ता हूं' - ऐसा भाव नहीं है का विभा तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों (आकर्षणों) में लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन लोकों में (किसी को) मारकर भी वास्तव में का प्रभाव में न तो मारता है, न ही पाप से बंधता है।

यह काफ़ी ख़तरनाक वक्तव्य है। सिवाय कृष्ण के और कोई स्वामी ऐसा साहसिक वक्तव्य नहीं दे सकता है। बेशक, जो जागरुकता के चरम स्तर तक पहुंच जाता है वह ऐसा मारने का काम तो कर ही नहीं सकता। जब तक हमारे अंदर 'मैं' या 'मेरे' का भाव रहता है, तभी हम किसी पर आक्रमण करते हैं या 'मारना' चाहते हैं। जब हम संपूर्ण समर्पण कर समग्र के साथ जुड़ जाते हैं तो फिर कौन किसको मार सकता है - सभी एक ही होते हैं।

    • हम दूसरों को मारने की तभी सोचते हैं जब हम स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं। यूद्ध करने के लिए हमें कोई खास साहस तो नहीं चाहिए। इसमें तो कायरता से भी काम चल जाता है। वस्तुत: साहसी व्यक्ति कभी किसी को नहीं मारता, वह तो अहिंसा में पूरी तरह विश्वास करने वाला होता है। यही कारण है कि कृष्ण यह साहसी वक्तव्य देते हैं - जो अहम् में लिप्त नहीं है वह यदि किसी को मारता भी है तो वह मारना नहीं होता।

यहां कृष्ण इसी पर जोर दे रहे हैं - तुम स्वयं को अहम् से दूर करो। वे अर्जून से यह नहीं कहते कि मारो। असल में समस्या तब उत्पन्न होती है जब लोग शब्दों की अपनी तरह से व्याख्या करने लगते हैं। हर एक की समझ अलग-अलग होती है।

एक लघु कथा

एक जेन मठ में एक छोटा लड़का था जो भिक्षु बनने का प्रशिक्षण प्राप्त श्रीमद्भगवत गीता

18.26 - जो कर्त्ता आसक्ति से रहित, अहंकार को वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कर्म को सिद्ध न होने

में हर्ष-शोकादि विकारों से परे है, वह सात्त्विक कर्त्ता कहा जाता है। 14:

  • जो कर्त्ता आसक्ति से युक्त, कर्मों के फल को चाहने वाला 18.27 - और लोभी है तथा जो दूसरों को कष्ट देने को स्वभाव वाला, अशुद्धाचारी एवं हर्ष-शोक से लिप्त रहता है, वह राजसिक कर्त्ता कहा गया है। 18.28 जो विक्षेप युक्त चित्त वाला, अशिक्षित, घमंडी, धूर्त और दूसरे की आजीविका का नाश करने वाला, शोर करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री है, वह तामसिक कर्त्ता कहा गया है।

इन श्लोकों में कृष्ण मनुष्य की प्रकृति समझाते हैं। कृष्ण पहले ही कह चुके हैं कि असली 'कर्त्ता' 'नर' (मनुष्य) नहीं वरन् 'नारायण' (ईश्वर) हैं। फिर भी मनुष्य निमित्त तो होता है – यानी वे माध्यम जिसकी हम बात कर रहे हैं। हमारे अंदर जो कमज़ोरियां हैं वह हमारी प्रकृति में निहित रहती हैं। यह वे 'गुण' है जो हमारे स्वभाद को बताते हैं या परिभाषित करते हैं। यही गुण हैं जो हम पर मनसा-वाचा-कर्मणा (मन-वाणी-कर्म) प्रभाव डालते हैं तथा हमारे मन-वचन-कर्म को नियंत्रित करते हैं, लेकिन किसी का जन्म से मृत्यु तक एक ही गुण नहीं रहता।

'गुण' तीन प्रकार के होते हैं - सत्त्व, रज, तम। सत्त्व गुण - शांत, शुभ व प्राय: आध्यात्मिक मन:स्थिति वाले मनुष्यों का होता है। 'राजस' गुण आक्रामक, वासनात्मक एवं क्रियाशील मनुष्यों का होता है। यह प्रमुखत: राजाओं, योद्धाओं एवं व्यापारियों का होता है। तमस आलसियों, अज्ञानियों एवं निष्क्रिय व्यक्तियों का गुण होता है। तमस ही वह निष्क्रियशील तत्त्व है जो कई बार हम स्वयं में भी महसूस करते हैं। यह उनका प्रमुख गुण है जो खाने और सोने को लिए ही जीते हैं।

कृष्ण विस्तार से इन गुणों को व्याख्या इसलिए करते हैं जिससे हम समझ सकें कि हमारे अंदर कैसे यह कार्य करते हैं और कब-कब किसका प्रभाव रहता है। जगतुगुरु कृष्ण को इन शब्दों को यदि हम समझ सकें तो हमें ज़ात हो जाएगा कि हम कैसे कोई काम करते हैं या कोई प्रतिक्रिया देते हैं। इस समझ के साथ हम दूसरे स्तर और बेहतर गुण की ओर जाने का प्रयास कर सकते हैं।

श्रीमदुभगवत गीता

कम के घटक

  • 'ज्ञाता', 'ज्ञान' और 'ज्ञेय' ये तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा 18.18 हैं तथा 'कर्त्ता', 'करण' और 'क्रिया' – ये तीन प्रकार का कर्म संग्रह है। 18.19
    • इन सबमें ज्ञान और कर्म तथा कर्त्ता के भी गुणों के भेद गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में, तीन-तीन प्रकार के कहे गए हैं – उनको तू भली प्रकार मुझसे सुन।
  • 18.20 जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्म भाव को विभाग रहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू 'सारिवक' जान।
  • और जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य संपूर्ण भूतों में भिन्न-भिन 18.21 प्रकार को नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस समझ।
  • और जो ज्ञान शरीर में ही संपूर्ण एक कार्यक्रम के जैसा 18.22 आसक्त है, तथा जो बिना युक्ति वाला सात्त्विक, अर्थ से रहित और तुच्छ है - वह तामस कहा गया है।
  • जो कर्म शास्त्र विधि से नियत किया गया और कर्त्तापन के अभिमान से रहित, फल को कामना न करने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष से किया गया हो, वह कर्म सात्त्विक कहा जाता है। देवा कि
  • 18.24 जो कर्म बहुत परिश्रम वाला होता है और भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कार्य राजस कहा गया है।
  • 18.25 जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को विचार न कर, केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।

जब हम कोई वस्तु पाना चाहते हैं या किसी उपक्रम को पूरा करना चाहते हैं तो हम सब राजस गृण, से प्रभावित रहते हैं, लेकिन यदि आक्रामक रूप से . बिना लालच या भय के, क्रोध इत्यादि से निरासक्त होकर काम कर सकते हैं तो हम सात्त्विक गुण के प्रभाव में काम करते हैं, यद्यपि सतही रूप से हम राजम गण से प्रभावित लग सकते हैं। | 1-

कृष्ण के अनुसार सांत्त्विक व्यक्ति वह होता है वे समग्र को, सामुहिक चेतना को, संपूर्णता को हिस्सों में देख सकता है। वह जानता है कि वह अकेल नहीं है, एक कटा हुआ द्वीप नहीं है, वरन् इस ब्रह्मांड में सभी से अटूट रूप से जुड़ा है। वह कॉस्मिक ऊर्जा के जुड़ाव को भलीभांति समझता है।

सारिवक व्यक्ति कभी आत्म-केंद्रित नहीं होता। वह जानता है कि उसकी जिजीविषा का भाव या 'मैं' और 'मेरे' का भाव निर्र्थक है। उसके सारे कर्म नि:स्वार्थ और निष्काम भाव से होते हैं; वह न तो प्रक्रिया से आसक्त होता है न उसके फल से; उसे न सफलता की परवाह होती है, न असफलता की। उसके किसी कर्म में 'मैं' और 'मेरे' का भाव होता ही नहीं है।

सारिवक अवस्था में पहुंचना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह सच है कि * हमेशा आप उस अवस्था में नहीं रह पाएं, पर एक बार वहां पहुंचकर जो मुक्ति की अनुभूति होगी वह बार-बार आपको प्रेरित करेगी कि इसी अवस्था में पहुंची सारिवक अवस्था में विगत-आगत एक भ्रम मात्र लगते हैं। उनका कोई अस्‍तित्‍व ही नहीं होता। विगत तो गया - कभी न वापस लौटने को। तो चिंता क्या? भविष्य या आगत तो एक छलावा-सा है। आपको पास तो कार्यशील होने के लिए केवल वर्तमान ही है, क्योंकि वर्तमान क्षण ही भविष्य का निर्धारक होता है। यदि आप वर्तमान क्षण पर केंद्रित रहे तो आपकी जागरुकता कई गुणा बढ़ जाती है और आप अपेक्षाओं एवं आसक्ति से भी त्राण पाते हैं। आप वास्तविकता के प्रति अपना प्रतिसाद देते हैं तब आप सत्त्व गुण में रहते हैं।

आप राजस गुण के प्रभाव में होते हैं जब आप 'मेरे' और 'तेरे' में भेद करते हैं। वास्तव में भेद तो कोई है ही नहीं। यह तो आपका अहम् भाव, मन और संस्कार हैं जो यह भेद उत्पन्न करते हैं स्वयं और दूसरों में, पर राजस व्यक्ति सदा फल की प्राप्ति को लालायित रहता है। वह स्वार्थी, आक्रामक एवं अधीर रहता है। भविष्य उसके अहम् को आहत करता है।

एक राजसिक व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता। आप सभी में राजस का प्रभाव है। आधुनिक युग में इसी का बोलबाला होता है। चाहे कोई धनी हो या निर्धन, बुद्धिमान हो या मूर्ख, पढ़ा-लिखा हो या निरक्षर, हर कोई दूसरे व्यक्ति, से अपनी तुलना करता रहता है और वह सब कुछ चाहता है जो दूसरे के पास 370

है। जब तक आपकी कामनाएं आपका जीवन संचालित करती रहेंगी और आप जो हैं, उससे संतुष्ट नहीं होंगे, आप राजस में ही रहेंगे।

राजस आपका क्षरण करता है। यह आपकी आत्मा का भक्षण करता है। इसके भय और लालच की कोई सीमा नहीं होती। राजस के यही संचालक तत्त्व हैं। राजस यानी वह पाने का निरंतर प्रयास करना जो आपके पास नहीं है, जो प्राप्त है उससे संतुष्ट न रहना और अपने आपसे, अपने वर्तमान से सदा असंतुष्ट रहना। आप या तो सदा आगत में रहते हैं - इन कल्पनाओं में कि आप आगे क्या हो जाएंगे और क्या-क्या पा लेंगे या सदा विगत में कि कैसे आप तब और अच्छा काम कर सकते थे। राजस का मतलब है कपोल कल्पनाओं को जगत में विचरण करना।

तमस में तो व्यक्ति सतत् भ्रम में रहता है। अपने पुराने विश्वासों और स्थितियों में पड़े रहना, बिना उनकी सही-गलत होने की प्रमाणिकता सिद्ध किए या उनकी उपादेयता को परखे 'लकीर के फकीर' रहना। धर्म के कट्टर अनुयायी एवं लुटेरों के गिरोह इसी तमस में सदा पड़े रहते हैं। वस्तुत: उनमें कोई फ़र्क नहीं सिर्फ उनके लक्ष्य फर्क होते हैं, रास्ता नहीं। दोनों ही कट्टर, दकियानूस, हिंसक एवं नितांत स्वार्थी होते हैं। उनके लिए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आपराधिक रास्ता भी चुनना संभव है। वे किसी भी निम्न स्तर तक उतर सकते हैं।

वैसे तमस का असली अर्थ सिर्फ़ निष्क्रियता, आलस्य या टालमटूली का भाव नहीं। ये सब तो होते ही हैं, पर इसमें बिना सोचे-समझे काम करना- बिना अपनी भूमिका समझे, भी शामिल है। ये पूरा परिदूश्य समझे बिना ही उस क्षेत्र में घुस पड़ते हैं। इनका अहम् इतना विशाल होता है कि ये स्वयं को ही सब कुछ - समग्र समझ लेते हैं कि सिवाय उनके किसी और का कोई महत्व नहीं होता। हिटलर, जिसने लाखों व्यक्तियों को इसलिए मार दिया कि उन्हें वह निम्न कोटि का समझता था, बहुत गहरे तमस में जकडा था। तमस तो पशु-वृत्ति की भी पराकाष्ठा है जो प्रकृति को नियमों का भी उल्लंघन करता रहता है; यद्यपि सिर्फ मनुष्य ही तामसिक हो सकते हैं। पशु तो तमस में हो ही नहीं सकता जो प्रकृति की नैसर्गिक बुद्धिमत्ता द्वारा अपना मार्ग निर्देशन प्राप्त करता रहता है।

श्रीमद्भगवत गीता

श्रीमद्भगवत गीता

जीवन वस्तुत: एक लक्ष्यहीन मार्ग है। यदि लक्ष्य निर्धारित हुआ तो हम जल्दबाजी करने लगते हैं, अधीर हो जाते हैं। भविष्य एक दबाव देने वाला तत्त्व हो जाता है, उदाहरण को लिए मान लें कि हम न्यूयार्क से वाशिंगटन जाना है। जैसे ही वाशिंगटन हमारा लक्ष्य हुआ तो अगला सवाल हमारे मन में कौंधेगा – "वहां हम कब तक पहुंचेंगे?'' और इसी ख़याल में उलझे हम रास्ते का आनंद नहीं ले पाएंगे। फिर यात्रा एक सिरदर्द हो जाती है - हमें व्याकुलता रहती है कि कब यह खत्म हो और हम लक्ष्य तक पहुंचें।

जीवन में कोई लक्ष्य निर्धारित न करें। हर यात्रा का पूर्ण आनंद लें। जिनसे रास्ते में आपकी मुलाकात हो, जो अनुभव हो, जो वस्तुएं दिखें या जो आप प्राप्त करें, उनका आनंद लें बिना किसी लालच के। तब हर यात्रा इतनी आनंददायक

लगने लगेगी कि जहां भी आप पहुंचेंगे वह सही लक्ष्य ही होगा। जो लोग जीवन को साथ उद्देश्य बांध लेते हैं, वे अमूमन कष्ट पाते हैं। वे दार्शनिक जिनको कोई और काम नहीं है, जीवन के विभिन्न पर झूठे उद्देश्य गढ़ते रहते हैं। जीवन को वैसे ही भोगो जैसे आप इसको प्राप्त करते हैं। तब ही इसका हर लम्हा हम भोग पाएंगे; जी पाएंगे। तब हम ईश्वर की तरह सदा वर्तमान में रहते हैं।

'पुरुषार्थ' जीवन को चार अर्थ (मानी) प्रदान करता है। 'धर्म' यानी सही एवं शुभ व्यवहार, नेकी का रास्ता। बुद्ध ने इसी को मध्य

मार्ग के रूप में प्रचारित किया था।

'अर्थ' यानी वह साज-ओ-सामान जो हम यात्रा के दौरान प्राप्त कर लेते हैं - यानी उन सांसारिक जरूरतों की पूर्ति जो जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक हैं। 'काम' यानी इंद्रियों का तुष्टीकरण; वह आनंद जो हम रास्ते में इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त करते हैं। इसकी आवश्यकता यदि महसूस हो तो विचलित होने की ज़रूरत नहीं है, पर इनमें इतना न डूब जाएं कि यात्रा ही रुक जाए और आनंद में रुकावट आने लगे।

मोक्ष अर्थात् मुक्ति। यही जीवन का चरम अर्थ है। इसमें शामिल है अपेक्षाओं, कामनाओं, लालच और भय तथा इच्छाओं की आसक्ति से मुक्ति। यह समझ कि कर्म फल की इच्छा से मुक्ति और निरासक्त भाव से जीवन-यापन करना, आनंद का स्रोत होता है।

यहां कृष्ण जीवन को सार्थक और सही रूप से जीने का सार बताते हैं। वे कहते हैं कि सत्त्व गुण हमें वह अवस्था प्रदान करता है जब हम सही-गलत की पहचान स्पष्टता से कर सकते हैं और जो कुछ भी हम अपने शरीर, मन एवं इंद्रियों के माध्यम से करते हैं, वह एक प्रयास होता है सारी कामनाओं की आसक्ति से मुक्ति पाने का जिससे हम समझ सकें कि हम दिव्य हैं, ईश्वर के ही एक रूप हैं।

जीवन का अर्थ

18.29 धनंजय! अब ते बुद्धि और घुति का भी गुण के अनुसार तीन प्रकार का भेद संपूर्णता से, विभागपूर्वक मेरे द्वारा कहा हुआ सुन।

  • 18.30 हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग को, कर्तव्य और अकर्त्तव्य को, भय और अभय तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ (रूप से) जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।
  • 18.31 पार्थ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म तथा कर्तव्य और अकर्त्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
  • 18.32 और पार्थ! जो तमो गुणों से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' - ऐसा मान लेती है और इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।
  • 18.33 पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति से मनुष्य ध्यान-योग द्वारा मन. प्राण और इंद्रियों को क्रियाओं को धारण करता है, वह सात्त्विकी है।
  • 18.34 और पार्थ! फल की इच्छा वाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कर्मों को धारण किए रहता है, वह धारण शक्ति राजसी है।
  • 18.35 पार्थ! दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य जिस धारण शक्ति द्वारा निद्रा, भय, चिंता और विषाद तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता, वह धारण शक्ति तामसी है।

कृष्ण अब पुरुषार्थ का उल्लेख करते हैं जिसको जीवन का अर्थ भी कह सकते हैं। चार पुरुषार्थ हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनको सादा भाषा में सही कार्य, धन-संपत्ति, कामनाओं की पूर्ति एवं मुक्ति कहा जा सकता है। जीवन के ये चार अर्थ हैं यानी वह जिसकी पूर्ति के लिए सब मानव प्रयत्न करते हैं। मैं इनको जीवन का उद्देश्य नहीं कह सकता, क्योंकि जीवन का कोई उद्देश्य नहीं होता, क्योंकि एक बार जीवन का यदि उद्देश्य निश्चित किया तो वह लक्ष्य बन जाता है तथा आसक्ति एवं अपेक्षा का दौर शुरू हो जाता है।

कि म्हाइंद्रियों द्वारा फैलाई भ्रांति

  • 18.36, 37 हे भरतश्रेष्ठ! अब सुख के तीन प्रकार मुझसे सुन। जिस सुख में साधक पुरुष भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से सुख करता हुआ दु:खों के अंत को प्राप्त हो जाता है - ऐसा सुख प्रारंभ में विष तुल्य, किन्तु परिणाम में अमृत के समान प्रतीत होता है, वह परमात्मा विषयक बुद्धि को प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक सुख कहा गया है।
  • 18.38 और जो सुख, विषय और इंद्रिय के संयोग से उत्पन्न होता है, वह यद्यपि भोगकाल में अमृत जैसा किन्तु परिणाम में विष के समान भासता है, वह सुख राजस कहा गया है।
  • 18.39 तथा जो सुख भोगकाल में और परिणाम में भी आत्मा को मोहने वाला है-वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न हुआ सुख, तामस कहा गया है।
  • 18.40 पृथ्वी या आकाश में अथवा देवताओं तथा इनके सिवाय कहीं ऐसा कोई तत्त्व नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो।

इससे पहले भी कृष्ण ने इन तीनों गुणों का बुद्धि पर प्रभाव पर चर्चा की थी जो फिर हमारे कर्म को विधि को प्रभावित करता है। अब वे बताते हैं कि कैसे अपने प्रतिसाद को परिणामस्वरूप प्रदान करते हैं (अर्थात् कैसे अपने इन कर्मों के परिणाम पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं)।

कृष्ण कहते हैं कि सत्त्व गुण के प्रभाव में हमारे आध्यात्मिक अभ्यास प्रारंभ में विष के समान तीखे और कष्टकारक प्रतीत होते हैं, पर अंत में जीवन-प्रदायक अमृत के समान अपना प्रभाव देते हैं। इंद्रिय सुख वाला राजस गुण शुरू में तो अमृत-सा लगता है, पर अंत में विष-सा कष्टकारी लगता है। कृष्ण कहते हैं कि तामस सुख में तो मनुष्य निद्रा, आलस्य एवं भ्रम में डूबा रहता है। हर मानव इनमें से किसी-न-किसी अवस्था में रहता ही है। सिर्फ मानव ही नहीं, ज्यादा विकसित समझे जाने वाले देवता भी इन्हीं में से किसी अवस्था में रहते हैं।

कितनी सुंदरता से कृष्ण बताते हैं कि हम कैसे अपनी इंद्रियों द्वारा भ्रांति में पडते हैं। आध्यात्मिक अभ्यास शुरू करना आसान नहीं है। वैदिक परंपरा में तो बच्चे गुरुकल पाठशालाओं में बचपन से ही एक आध्यात्मिक वातावरण में पलते-बढते हैं। प्रारंभ में ही उन्हें सिखाया जाता था कि कैसे वे अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखें तथा आत्म-ज्ञान (या ईश्वरीय ज्ञान) प्राप्त करते रहें। अपने गुरुओं के आचरण से शिक्षा लेकर उनकी समझ में आ जाता था कि इंद्रिय सुख बोध से भी ज्यादा आनंददायक कोई अनुभव हो सकता है। इससे उन्हें साहस मिलता रहता था। आज के युग में इस प्रकार की शिक्षा पद्धति अव्यावहारिक मानी जाती है।

आक्रमणकारी मुगलों और उपनिवेशवादी अंग्रेजों ने उस वैदिक संस्कृति खासतौर से गुरुकल परंपरा को - ध्वस्त कर दिया था। यह कोई अचानक नहीं हुआ, वरन पूरी सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत किया गया था। आज हमारे पास कई पढ़े-लिखे माननीय तो हैं पर वे सुशिक्षित नहीं हैं। उन्हें वैदिक संस्कृति की शानदार परंपरा का कोई ज्ञान नहीं है वे सारे कर्मकांडों को निरर्थक मानते हैं। हम भूल चुके हैं कि कैसे इन कर्मकांडों को आध्यात्मिकता से जोड़ा जाता है। यदि सार्थकता से ये कर्मकांड किए जाएं तो वे आध्यात्मिकता का आधार स्थापित करते हैं।

अब तो हम सभी राजस श्रेणी में ही रहते हैं तथा शरीर-सुख का स्रोत इंद्रिय तुष्टिकरण से मानते हैं। तामस में तो हमें यह भी याद नहीं रहता कि हम गहरे अज्ञान में पड़े हैं। इंद्रिय तो वास्तव में बाहर को विश्व को खुलने वाली हमारी खिड़कियां हैं। हमें तो यही सिखाया गया है कि दु:ख से दूर भागो और सुख के पीछे भागते रहो। शारीरिक सुख मानसिक आनंद देता है, जिससे हमें भावनात्मक संतृष्टि प्राप्त होती है। एक बार वह मानसिक सुख मिल जाए तो हम उसकी चरखी को बार-बार घुमाकर वही सुख प्राप्त करना चाहते हैं। हमारा विगत हमारे आगत का संचालक हो जाता है।

यदि आप जागरुकता को साथ जीवन जिएं तो आप आसक्ति की भ्रांतियों में नहीं पड़ेंगे और अपने कर्म फल की भी अपेक्षा नहीं रखेंगे।

एक लघु कथा

एक तीन साल के बच्चे ने अपनी गर्भवती बुआ से पूछा - "आपका पेट इतना बड़ा क्यों है?''

बुआ ने कहा – "मेरे बच्चा होने वाला है, न!"

बच्चा आश्चर्य में पड़ गया, उसने फिर पूछा – "क्या वह अच्छा बच्चा है?"

उसने कहा – "हां-हां! वाकई में एक अच्छा बच्चा।"

बच्चे ने सदमे भरी आवाज़ में पूछा - ''तो आपने इसे खा क्यों लिया था?''

वास्तविक जीवन में प्राय: हम गलत निष्कर्ष पर 'कूद' जाते हैं जब हम इंद्रियों के गुलाम होते हैं। हम एक के बाद एक के सुख-दु:ख का अनुभव करते रहते हैं। कोई भी स्थिति हो वह एक भ्रांति ही रहती है। कृष्ण तामसिक व्यक्ति के बारे में बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से बताते हैं। वे ऐसे व्यक्ति की अवस्था के वर्णन में शब्द 'विष' का प्रयोग नहीं करते। तामसिक व्यक्ति तो एक नशेड़ी जैसा होता है। वे कहते हैं कि एक राजसिक व्यक्ति तो कम-से-कम शुरुआत में तो आनंद भोगता है चाहे बाद में कष्ट भोगे, पर तामसिक व्यक्ति तो मजा ले ही नहीं पाता। वह तो बिना समझे कि वह कष्ट पा रहा है, कष्ट ही पाता रहता है। इसीलिए उसे अपने कष्टों को दूसरे को देने में कोई संकोच नहीं होता। इस तरह वे अज्ञानी जो बाद में नेता बनते हैं, अपना काम करते रहते हैं।

व्यवहार चाहे संपूर्ण न हो

18.41 इसलिए हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों को भी कर्म, स्वभाव से उत्पन्न हुए गुणों को आधार पर ही विभाजित किया गया है।

18.42 अंत:करण निग्रह करना; इंद्रियों का दमन करना; धर्म पालन के लिए कष्ट सहना; बाहर-भीतर शुद्ध रहना; दूसरों को अपराधों को क्षमा करना; मन, इंद्रिय और शरीर को स्वच्छ रखना; शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना; वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा को तत्त्व का अनुभव करना – ये सब ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।

18.43 शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध से न भागना, दान देना और स्वाभिमान – ये सब क्षत्रियों को स्वाभाविक कर्म हैं।

18.44 खेती, गौ पालन और क्रय-विक्रय में सत्य व्यवहार - ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों को सेवा करना, शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।

18.45 अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवन प्राप्ति रूप सिद्धि को प्राप्त होता है। किस प्रकार अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

18.46 जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

18.47 अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से अपना गुण रहित धर्म भी श्रेष्ठ है; क्योंकि स्वभाव से नियत किए गए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।

18.48 (अतएव हे कुंती पुत्र!) अर्जुन! दोषयुक्त होने पर भी अपने सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धुएं से अग्नि को भांति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से ढके हुए हैं।

कृष्ण कहते हैं - "श्रेयान्स्वधर्मों विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् " अर्थात असंपूर्णता से किया गया अपना सहज कर्म, दूसरे के संपूर्णता से किए गए कर्म से बेहतर है। वैसे यह संभव है कि एक व्यक्ति दूसरे का काम ज्यादा अच्छी तरह कर दे। विद्वान होने के कारण ब्राह्मण, वैश्य को लिए जरूरी गुणा-भाग ज़्यादा दक्षता से कर सकता है - पर वह न तो दिल से, न दिमाग से व्यापारी बनने के योग्य होता है।

गुरुकुल पद्धति में गुरु के साथ बच्चे को भी अपना व्यवसाय प्राप्त करने को छूट थी। बच्चा अपनी रुचि के अनुसार निर्णय लेने को स्वतंत्र था।

समय के साथ इस चुनाव का वर्गीकरण और प्रशिक्षण की सुविधा में बिगाड़ आ गया। जो ब्राह्मण थे वे चाहते थे कि उनकी संतानें ब्राह्मण ही रहें ... | यह वर्ण व्यवस्था जिसमें प्रारंभ में शिक्षक-प्रशिक्षण चुनने की सुविधा रुचि के अनुसार थी, सामाजिक प्रार्थमिकताओं के कारण जन्म आधारित हो गई।

हम इस वर्ण व्यवस्था की भर्त्सना करें, उससे पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि इस प्रकार का वर्गीकरण हर समाज में था। वैदिक भारत में यह वर्गीकरण बुद्धिमत्ता और सहज जन्मजात प्रतिभा के अनुसार होता था। आज के समाज में यह धन-संपत्ति और सत्ता के अनुसार होने लगा है। कौन-सा बेहतर है?

यदि ब्राह्मण वर्ग न होता तो रुढियों से प्राप्त हमारा ज्ञान असुरक्षित हो जाता और हज़ारों साल पहले ही गायब हो चुका होता। जो लोग इस व्यवस्था की भर्त्सना करते हैं वे धन और सत्ता के कारण ऐसा करते हैं, किसी स्वार्थी कारण की वज़ह से नहीं करते। वे कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं सुझाते, जिससे हम अपने पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रख सकें।

मैं तो ब्राह्मण नहीं हूं। मेरे पास कई ब्राह्मण आकर यह बता चुके हैं कि उनके ब्राह्मण कहे जाने से उन्हें कितनी असुविधा और कष्ट होता है। वे पढ़े-लिखे लोग हैं। मैंने उनसे कहा - "अपनी संस्कृति और परंपराओं पर उन्हें गर्व होना चाहिए। यदि ब्राह्मण न होते तो बहूत पहले ही हमारी वैदिक परंपरा मर चुकी होती।"

यह प्रशंसा उन ब्राह्मणों को लिए है जो अपनी विद्वत्ता को प्रति पूरी तरह से ईमानदार रहे हैं। जो धन-सुविधा को लोभ में पड़कर भ्रष्ट हो चुके हैं, उन्हें ब्राह्मण कहलाने का भी कोई अधिकार नहीं है।

यही वह स्थिति है जिसमें वर्ण व्यवस्था असफल हो जाती है। बजाए एक वैज्ञानिक एवं कुशल पद्धति के यह बिगड़कर सत्ता को दलाली के तंत्र में तब्दील हो गई है। हमें इसे ठीक करना है। जो अपनी परंपरा के लिए सच्चे और ईमानदार हैं, सम्मान नहीं पाते। सिर्फ वे जो अपनी विद्वत्ता का दुरुपयोग कर क्षत्रिय और वैश्य हो गए हैं, धन, सुविधा, सत्ता और सम्मान पाने लगे हैं। हमारे समाज एवं इसके सामाजिक ढांचे के साथ यह समस्या है कि यह कुछ खास लोगों तक सीमित हो गया है जबकि अच्छा समाज सबको साथ लेकर चलता है। आज पश्चिम में और भारत में भी कई जगहों पर हाल यह है कि यदि हमारे पास धन या सत्ता है, तभी हमारा सम्मान होता है। क्या कोई इस व्यवस्था को विरुद्ध विद्रोह करता है? नहीं। हम कैसे किसी समाज को उन्नत और प्रगतिशील मान सकते हैं, जिसकी सम्मान की एक मात्र, कसौटी धनाद्य होना, हो। इस तर्क के अनुसार यदि मैं सिवाय भारत के यदि कहीं और पैदा हुआ होता तो मेरी भर्त्सना ही होती। लगभग एक दशक तक तो मैं बेघर रहा था। नौ साल तक बिना पैसे के मैं भारत-भर में इधर-उधर घूमता रहा, लेकिन लोगों ने मेरा स्वागत किया तथा मुझे सवारी, भोजन एवं आवास की सुविधाएं भी प्रदान कीं। पश्चिम में होता तो मैं या तो जेल में डाल दिया जाता या किसी शरण्य-स्थल में अपने दिन काट रहा होता। अमेरिका में यदि कोई बेघर व्यक्ति आपकी कार को समीप आता है तो आपकी सहज प्रतिक्रिया होती है अपनी खिडकियां और दरवाजे बंद कर लें। वहां लोग इनसे भय खाते हैं, पर भारत में क्या किसी भिखारी से कोई डरता है? कोई भिखारी भी सामने आकर खड़ा हो सकता है। क्यों? यहां पर सर्व-स्वीकृति का भाव है। पश्चिम में लोग कहते हैं कि यह स्वीकृति कमज़ोरी की निशानी है, हिंसा नहीं। सामाजिक कदरें कितनी विचित्र हो गई हैं? आप सिर्फ़ उसी का सम्मान करते हैं जिससे आप डरते हैं?

जब तक हमारे विचारों में मूलभूत परिवर्तन नहीं आएगा हम विकसित नहीं हो सकते। अब यह नौबत आ गई है कि ऋणात्मक गुण ही सम्मान के हक़दार माने जाने लगे हैं, लेकिन हिंसा और आक्रामकता कभी भी विजयी नहीं हो सकते। करुणा और स्वीकृति ही सर्वथा विजयी रहेंगी।

कृष्ण जो पूछते हैं, उससे कहीं ज़्यादा प्रश्न और उठा देते हैं, क्योंकि कोई सुनता तो है नहीं, पर भगवान का हमारे प्रति करुणा भाव उन्हें बार-बार अपने उत्तर देने को प्रेरित करता है जिससे अर्जुन पूरी बात समझ सके। जब तक हम प्रश्न – 'क्यों?' करते रहेंगे, हमें कभी स्पष्ट उत्तर नहीं मिल सकता। खासतौर पर परमात्मा को संबंध में तो प्रश्न 'क्यों?' की कोई प्रासंगिकता ही नहीं होती। जैसा मैं पहले स्पष्ट कर चुका हूं, चूंकि हमारी और परमात्मा की संप्रेषण आवृत्ति में फ़र्क होता है, यदि हमें समझाया भी जाएगा तब भी सत्य की समझ हम ग्रहण नहीं कर पाएंगे। आध्यात्मिकता एक आंतरिक विज्ञान का नाम है - इसको बाहरी विज्ञान नहीं कह सकते, और यह भी हमारा सौभाग्य ही है। बाहरी विज्ञान में हम 'क्यों-क्यों' पूछते रहें - और जब उत्तर न मिले तो हम वहीं अटक जाते हैं। फिर हम अधकचरी थ्योरियां और सिद्धांत बनाते हैं जो किसी को आश्वस्त नहीं कर पाते। आध्यात्मिकता का सरोकार 'क्यों?' से तो होता ही नहीं है। इसका मूल प्रश्न होता है – 'कैसें?' 'क्यों' तर्क की उपज होती है, जबकि 'कैसे' वास्तविकता को ओर इशारा करता है। जहां शास्त्र 'क्यों' का उत्तर देते हैं, 'सूत्र' 'कैसे' का जवाब देते हैं। कभी-कभी जगत गुरु (कृष्ण) 'शास्त्र' चर्चा के मध्य एकाध 'सूत्र' भी बता देते हैं जिससे अर्जुन सत्य को ग्रहण करके शांत रह सके। वे कहते हैं – ''दिमाग को संतुलित और इंद्रियों को नियंत्रण में रखो।'' क्या आप ऐसा भरे-चौराहे पर कर सकते हैं? नहीं न। इसलिए वे कहते हैं कि एकांत में जाकर स्वयं को सबसे काट लें। कम खाओ जिससे कोई व्यवधान न पड़े। ध्यान करो और इंद्रियों का बाहरी विश्व से संबंध ही काट दो। वस्तुत: यह ध्यान लगाने के स्पष्ट निर्देश हैं। जो संभावित व्यवधान हैं उनसे स्वयं को दूर कर दो। यदि आप फोन का इंतज़ार कर रहे हैं या किसी मेहमान की प्रतीक्षा में हैं तो ध्यान करना बेमानी है। इसके लिए तो एक समय निश्चित करें जब आप बिल्कुल अकेले हों और कोई व्यवधान उपस्थित न हो सके।

इंद्रिय जन्य व्यवधानों को कम करने के और भी आसान तरीके हैं। सिर्फ़ आंख बंद कर लेना काफी नहीं है। आपकी आंखें बंद होकर भी गतिमान रहेंगी और आपके अंदर का टेलीविज़न चालू रहेगा। आपको मानसिक नियंत्रण से आंखों को भी निश्चल करना पड़ेगा। समझें कि आंखें पत्थर की हो गई हैं फिर अपनी जीभ को ऊपर के तालू तक ले जाएं और मोड़कर रखें, क्योंकि यदि जीभ गतिमान रहेगी तो कुछ बोलने की इच्छा रहेगी और मानसिक चित्र देखना मुश्किल हो जाएगा। ये तरीके – आंखों को स्थिर रखना और जीभ को निश्‍चल

में प्रबोधन के लिए निर्देश

18.49 सर्वत्र आसक्ति रहित बुद्धि वाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंत:करण वाला पुरुष सांख्य (संन्यास) योग द्वारा भी नैष्कर्म्य सिद्धि (क्रिया रहित शुद्ध सच्चिदानंद परमात्मा को प्राप्ति रूप परम सिद्धि) को प्राप्त होता है।

18.50 हे कुंती पूत्र! अंत:करण की शुद्धि रूप सिद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य किस प्रकार से (सच्चिदानंद) ब्रह्म को प्राप्त होता है जो ज्ञान योग की परानिष्ठा है - उसको तू मुझसे संक्षेप में जान।

18.51, 52, 53 विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हल्का, सान्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग कर एकांत और शुद्ध देश (स्थान) का सेवन करने वाला, जीते हुए मन, वाणी, शरीर वाला और दृढ़ वैराग्य को भली प्रकार प्राप्त हुआ पुरुष सात्त्विक धारणा से अंत:करण को वश में करके और राग-द्वेषों को नष्ट करके तथा अहंकार, बल, घमंड, काम-क्रोध और परिग्रह का त्याग करको निरंतर ध्यान योग में परायण रहने वाला, ममता रहित और शांति युक्त पुरुष (सच्चिदानंद) ब्रह्म में अभिन्न भाव से स्थित होने का पात्र होता है।

ये श्लोक वह परम विधि का अंतिम सूत्र प्रदान करते हैं जिसके द्वारा ईश्वर (परमात्मा) के दर्शन हो सकते हैं या अंतिम सत्य प्राप्त हो सकता है। कृष्ण बताते हैं कि कैसे परम सत्य प्राप्त किया जा सकता है।

अर्जन के मन में प्रश्न भरे थे - वही शायद आप सब लोगों का भी हाल होगा। प्रश्नों का उत्स अज्ञान में होता है विवेक-बुद्धि में नहीं। ये जितनों का

कर देना, आपके मन को बहुत कुछ स्थिरता देंगे। इंद्रियों के कारण इसकी चंचलता पर अंकुश लग जाएगा। इस निर्म प्राम के हा

ध्यान सदा खाली पेट ही करना चाहिए। पेट भरा हो तो नींद आने लगनी है, ध्यान लग नहीं पाता। आदर्श तो यही है कि एक निश्चित जगह पर हो नियमित रूप से ध्यान करना चाहिए जिससे ध्यान द्वारा प्राप्त ऊर्जा सुरक्षित रहनी है। यह कुछ शारीरिक आवश्यकताएं होती हैं। आगे कृष्ण वही कहते हैं जो अब तक कहते आए हैं। उसी पर पुन: ज़ोर देते हैं। कांग्र

मान के अपने व्यक्तित्व को भूल जाओं', वे कहते हैं - "अपने अहम् भाव को त्याग दो तथा अपने 'मैं' और 'मेरे' के भावों से आसक्ति को भी। उन भावनाओं को बिसरा दो जो तुम्हें जिजीविषा एवं परिग्रह की ओर प्रेरित करती हैं। तब तम मुक्त महसूस करोगे और परबह्म से साक्षात्कार को लिए तैयार भी।''

वह (सच्चिदानंद) ब्रह्म में एकीभाव से स्थित प्रसन्न मन वाला योग, न तो (किसी के लिए) शोक करता है और न किसी को आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव रखने वाला योगी मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है। उस पराभक्ति द्वारा वह मुझ (परमात्मा) को - मैं जो भी हूं

और जितना भी हूं, ठीक वैसा ही - तत्त्वत: जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझे तत्त्वत: जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।

मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को- सदा करता हुआ मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परम पद को प्राप्त हो जाता है। 18.56 सब कर्मों को मन से तू मूझमें अर्पण करके तथा समत्व ब्विद्ध रूप योग को अवलम्बन बनाकर मेरे परायण तथा मुझमें 18.57 निरंतर चित्त (लगाने) वाला हो। इस प्रकार तू मुझमें निरंतर चित्त (लगाने) वाला होकर मेरी कृपा से (जन्म-मृत्यु आदि) सब संकटों से अनायास ही तर 18.58

जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा (अर्थात् तू मेरा कहा न मानेगा) तो नष्ट हो जाएगा।

कृष्ण अब बताते हैं कि कैसे उनको भक्ति प्राप्त की जाए और कैसे वह अपने भक्त की रक्षा करते हैं। अनासक्ति का भाव उत्पन्न कर समस्त जीवों के प्रति समभाव रखकर बिना सफलता या असफलता की परवाह किए जो व्यक्ति ईश्वर में स्वयं को लीन कर देता है, वह उनका अनन्य भक्त हो जाता है। एक बार यह समझ आ जाए तो वह मनुष्य कृष्ण चेतना में लीन हो जाता है। कृष्ण चेतना में लीन वह मनुष्य यदि सांसारिक गतिविधियां भी करता रहे तब भी कृष्ण की करुणा उसकी अपनी कृपा द्वारा रक्षा करती रहती है।

श्रीमद्भगवत गीता

18.54

18.55

हाल ही में मैंने यह अवधारणा अपने कुछ भक्तों को सामने रखी थी। जब हम अपनी इस सहज वृत्ति को विराम दे देते हैं जो लगातार हमारी रक्षा में लगी रहती है तो इस अंतराल में घटनाओं को घटित होने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। कृष्ण कहते हैं कि यदि हम सांसारिक गतिविधियों में लगे भी रहें, उनके भक्त होने के नाते, हम उनके संरक्षण में रहेंगे और शाश्वत चेतना को भी महसूस करेंगे। यहां क शब्द 'रक्षा' सही नहीं है, क्योंकि कृष्ण बाहरी और आंतरिक दोनों विश्वों से हमारे संपूर्ण बचाव की बात कर रहे हैं। वस्तुत: जो मनुष्य संपूर्ण समर्पण कर देता है तो 'वह' (ईश्वर) से सर्वोत्तम अनुभव प्राप्त करता है। हम जब अपने आपको 'बाहरी कर देते हैं तो 'वह' (ईश्वर) हमारे अंदर पहुंच जाता है।

एक लघ कथा पर निकी बाद

एक दिन विष्णू अपनी शेषशैय्या पर आराम फरमा रहे थे और उनकी पत्नी लक्ष्मी जी. उनकी 'पाद-सेवा' (पैर दबाना) कर रही थीं। उस लोक में शायद पत्नियां वाकई सेवा करती थीं। अचानक विष्णू ने अपने वाहन 'गरुड़' को बुलाया। वह आया कुछ कदम चला, फिर रुककर वापिस आ गया। लक्ष्मी जी को आश्चर्य हुआ। "ये क्या?" उन्होंने विष्णू से पूछा। विष्णु ने बताया कि उन्होंने एक आदमी को देखा जो उनके एक ध्यान-मगन भक्त पर पत्थर मार रहा था। गरुड़ तुरंत आगे चला भक्त की रक्षा करने के लिए, पर तभी देखा कि भक्त ने आंखें खोल ली हैं और एक पत्थर उठाकर अपनी सुरक्षा करने को तैयार है। जब विष्णु ने देखा कि भक्त अपनी रक्षा स्वयं कर सकता है तो उन्होंने गरुड़ को रोक दिया।

इसी प्रकार जब आप अपनी धन-संपत्ति की स्वयं सुरक्षा करते हैं तो ईश्वर नहीं करता, वह पीछे हट जाता है। सुरक्षा का मतलब यह नहीं कि आप अपना घर बंदकर बैठ जाएं। इसका मतलब है कि आप अपनी जिजीविषा को त्याग दें। यही जीते रहने की अनवरत चाह है जो आपको हर क्षण मारती रहती है। जब हम इस भाव को त्याग देते हैं तो यह कृष्ण की जिम्मेदारी हो जाती है। बौद्धिक रूप से आपको यह बात समझ में नहीं आएगी। आप सोचेंगे - "हजारों साल पहले किसी का किया हुआ यह वादा आज भी मेरी सुरक्षा कैसे कर सकता है?'' आप समझते हैं कि अस्तित्ववान या जीते रहने के लिए जिजीविषा होना अपरिहार्य है, पर आप इस जिजीविषा को व्यर्थता समझ सकते हैं जब आप संपूर्ण समर्पण कर दें तभी आपको स्वत: समझ में आएगा कि आप बगैर जिजीविषा और परिग्रह के भी जीवित रह सकते हैं। समर्पण के साथ एक अंतराल बनता है जिसमें घटनाओं या संयोग को ऐसी शक्ति मिलती है कि वह

घटित होने लगते हैं। तब स्वत: ही कृष्ण की ऊर्जा आपकी सुरक्षा में तैनात हो

जाती है। लेकिन आप स्वयं को यदि इतने अक्लमंद समझते हैं कि अपने मन के अनुसार अपना रास्ता चुन सकते हैं तब आप परेशानियों को न्यौता देते हैं। कृष्ण कहते हैं कि यदि अपने मन की और इंद्रियों की सुनेंगे तो आप नष्ट हो जाएंगे, लेकिन यदि उनकी सुनेंगे तो बचे ही नहीं रहेंगे, वरन प्रसन्न भी रहेंगे।

समर्पण को समझें

दो स्थितियां समझ लें - एक अपने को सुनें और दूसरे अपने मन को न सुनें। पहली बात अपने मन की बात सुनने से संबंधित है तो दूसरी उसके न सुनने से। कई लोगों के लिए किसी अन्य मानव को स्वयं से बेहतर समझना एक

मुद्दा हो सकता है। सुनने की बात अलग, यहां तो उसके सामने संपूर्ण समर्पण की बात है। वे समझते हैं कि किसी के सामने साष्टांग होना एक असभ्य क्रिया है और स्वयं का अपमान करने के समकक्ष है।

जब मैं किसी को चंगा करता हूं तो मैं ठीक हुए भाग को छूकर देखता हूं - यथा यदि पैर ठीक हुआ है तो मैं उस व्यक्ति को पांवों का स्पर्श करता हूं। किसी ने मुझसे पूछा – "आप किसी का चरण स्पर्श कैसे कर सकते हैं? आप अपने आपको इतना नीचे क्यों गिराते हैं?''

मैंने कहा – ''जब मैं किसी को पांव छूता हूं तो मैं उन्हें अपने स्तर तक उठाता हूं। जब आप लोग मेरे पांवों पर गिरते हैं तो अपने अंहम् का समर्पण करते हैं।''

जब आप किसी को पांवों पर पड़ते हैं तो उसको अपने अहम् का समर्पण करते हैं। यह आपको लिए अच्छा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप किसके सामने समर्पण करते हैं - मानव के या किसी पत्थर के। पर समर्पण से आपका अहम् विगलित होता है जो आपका आध्यात्मिक रूप से उत्थान करता है। यही संपूर्ण सत्य है। आपको किसी प्रबुद्ध स्वामी के सामने ही समर्पण करने की कोई ज़रूरत नहीं है, आप किसी के सामने भी ऐसा कर सकते हैं, ज्यादा खोज़बीन की दरकार नहीं है अर्थात् महत्व है झूकने का, समर्पण करने का।

किसी ने मुझसे पूछा - "समर्पण से आपका मतलब क्या है?" समर्पण

तब होता है जब आप किसी ऐसे व्यक्ति को पा लें जिसको आप बिना किसी शर्त प्रेम कर सकते हैं। तब कोई समस्या नहीं होती, क्योंकि जाहिर है आपको उस व्यक्ति से असीम प्रेम होगा। आपकी पहचान उस व्यक्ति के व्यक्तित्व में विलीन हो जाती है।

श्रीमद्भगवत गीता

मैं उन्हें बताता हूं – "किसी ऐसे व्यक्ति की कल्पना करो जिसके साथ आप रहना चाहो, जब आपसे ईश्वर ने कह दिया है कि यह पृथ्वी नष्ट होने वाली है। सिर्फ आप और वह व्यक्ति ही बचेगा दुनियाभर में। आप अपने ऐसे प्रिय का चुनाव कर सकते हैं। वह कौन होगा? यह वही होगा जिसको आप पूर्णत: समर्पित हो सकते हैं।

वैदिक मंत्र प्राय: शब्द 'नम:' को साथ ही समाप्त होते हैं। 'नम:' का अर्थ क्या होता है? इसका अर्थ है - "मैं आपको नमन करता हूं (समर्पण करता हूं)।'' हर बार जब आप कोई वैदिक प्रार्थना करते हैं तो आप कहते हैं – "'हे ईश्वर! मैं आपको नमन (समर्पण) करता हूं।'' क्या कोई ऐसी अन्य पूजा-पद्धति है जो अहम् का इतना समूल नाश करती हो?

अत: यदि आप किसी गुरु या इष्टदेव के सामने इसलिए समर्पण नही करते कि वे मनुष्य हैं या पत्थर को हैं तो आप क्या समझते हैं आप स्वयं स्वामी हो जाएंगे, सबसे स्वतंत्र और मुक्त। किसी-न-किसी के सामने तो आपको करना हो पड़ता है - धन, सत्ता या वासना को कार्यूग। कभी-न-कभी तो यह होता ही है। लोग किसी व्यक्ति को पीछे तब ही भ्रागते हैं जब उसके पास ऐसा कुछ होता है जो उनके पास नहीं है और वे उसे पाना चाहते हैं।

क्या इसके मुकाबले किसा के सामने महती बुद्धिमत्ता के कारण समर्पण करना ज्यादा अक्लमंदी का काम नहीं है? अरे वह आदमी ज्यादा जागरुक है, समझदार है और आपको जागरण के पथ पर अग्रसर कर सकता है।

हम किसी और व्यक्ति के सामने समर्पण क्यों नहीं करना चाहते? क्या इसलिए कि हमारे मन और इंद्रियों ने हम पर कब्ज़ा कर रखा है; क्योंकि हम अपनी वह पहचान खो देंगे जो हमारे मन और इंद्रियों ने हमको दी है? हमारा े मन हमसे यूद्ध करता है क्योंकि वह अपनी निष्ठा अपने अहम् भाव को बज़ाय किसी व्यक्ति को देने के खिलाफ है।

यह समझें कि आप अपनी इंद्रियों को गुलाम हैं, उनके स्वामी नहीं। आप अपनी नियति के भी स्वामी नहीं हैं। आपके सारे दु:खों और कष्टों का उत्स उसी भ्राति में है कि आप स्वयं को अपने मुकद्दर का मालिक समझते हैं। यदि आप इस भ्रांति को दूर कर सकेंगे तो आपको स्वयं किसी विकल्प की तलाश होगी।

तब आपको समझ में आएगा कि यह महानतम स्वामी क्या कह रहा है "यदि तुम मुझको सुनोगे तो मैं तुम्हारी सुरक्षा सुनिश्चित करूंगा चाहे कुछ भी हो। यदि नहीं सुनोगे और अपने मन को ही सुनते रहोगे तो तुम नष्ट हो जाओगे।''

見て、る事を聴きていた。 出会を経営した道には

कजो देशन किसी मान

यदि तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं यूद्ध 18.59 नहीं करूंगा' तो यह तेरा निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे बलातू (जबरदस्ती) युद्ध में लगा देगा। और कौन्तेय! जिस कर्म को तू मोह को वशीभूत होकर नहीं 18.60 करना चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बंधा हुआ परवश होकर करेगा। अर्जुन! शरीर रूपी यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को, 18.61 अंतर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उन कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ (घुमाता हुआ) सब प्राणियों को हृदय में स्थित रहता है। इसलिए हे भारत! सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो। उस परमात्मा की कृपा से ही परम शांति को और सनातन परमधाम को तू प्राप्त होगा।

कृष्ण पहले अर्जून को एक अंतिम चेतावनी देते हैं - "अर्जुन! तू चाहे या न चाहे, युद्ध तो तुझे करना ही पडेगा।'' आपकी (व्यक्ति की) व्यवहार ब्रद्धि से संचालित अहम् भाव आपसे कहता है कि आपको लड़ना नहीं चाहिए, पर आपको अपने सतही ज्ञान के कारण, आप इस भ्रम में रहते हैं कि दोस्तों, रिश्तेदारों और शिक्षकों से यूद्ध करना ठीक नहीं है (यह अर्जुन को दुविधा है), पर आप अपनी सहज प्रकृति भूल जाते हैं। आपका अनुकूलन बतौर क्षत्रिय योद्धा के ऐसा है कि आपको लड़ना ही पड़ेगा। आप ईश्वर को हाथों की कठपुतली हैं। आप लड़ेंगे।''

इससे ज्यादा स्पष्ट चेतावनीं नहीं हो सकती। प्रकृति का नियम आपको अपनी अपूर्ण इच्छाएं पूर्ण करने के लिए बाध्य करेगा। हमारी पूर्व अनुकूलन को स्थिति इन इच्छाओं को उत्पन्न करती रहती है। चाहे वे इच्छाएं आपके अचेतन

मस्तिष्क में रहें और हमारी सीधी पहुंच उन तक न भी हो, पर वे ही हमारा कमी निर्धारित करती हैं। चाहे हम ऐसा न देख सकें, पर हमारे गुरु तो देख लेते हैं। इसीलिए कृष्ण यह साहसिक वक्तव्य देते हैं।

कृष्ण तब अपना तरीका बदलते हैं और अर्जुन को अपना अनुभव बताने लगते हैं। वे स्वयं से एक शाश्वत चेतना का निःसरण कर अर्जून को प्रबोधन का अनुभव प्रदान करने लगते हैं।

कुछ देर को विश्राम करें और अपने मन में चलने वाले विचारों को द्वंद्र को विराम दे दें। अपने आंतरिक अवकाश में उठने वाले विचारों को भी रोक दें जिससे आप उस चेतना की पूरी झलक देख लें। यह पूरी संभावना है कि आपको भी वही अनुभव प्राप्त हो जो कृष्ण को कृपा से अर्जून ने प्राप्त किया था।

वस्तुत: पूरी 'गीता' में कृष्ण यही कहते रहे हैं - "मुझको सब कुछ समर्पित कर दे।''

वह 'मैं' और 'मेरे' का प्रयोग कर यह स्पष्ट करते हैं कि वे इस समय 'दिव्यता' (ईश्वर) को प्रतिनिधि हैं, पर अब वह इस प्रयोग को बदलकर अचानक कहते हैं 'उसको, (एक तीसरे व्यक्ति या ईश्वर को) आत्म-समर्पण कर दे। पहली बार उन्होंने दिव्य-सत्ता (ईश्वर) को तृतीय पुरुष के रूप में संबोधित किया है। इसका अर्थ है कि वे अब शरीर सीमा से अधिक विस्तृत हो चुके हैं। अब वे परब्रह्म को रूप में बोलते हैं। वे एक शाश्वत चेतना की तरह अपनी बात इसलिए कहते हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि उनका शिष्य (अर्जुन) भी उसी अवस्था में आ जाए। उसको भी वैसा ही अनुभव हो, जैसा उन्हें हो रहा है। इसीलिए उन्होंने अपनी अवस्था विस्तृत की थी। अब उन्होंने अपनी चेतना, 'विस्तृत कर ली है और 'ऊर्जा-दर्शन' देने वाले हैं। वे अब अर्जुन पर अपनी ऊर्जा बरसाने को तैयार हैं।

मझको समुपण कर दे छ

इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तझसे 18.63 कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त (गहरे) ज्ञान पर भलीभांति विचार कर फिर जैसा मैं चाहता हूं वैसा ही कर।

संपूर्ण गोपनीय रहस्यों में भी अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त 18.64 वचनों को तू फिर सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है इससे मैं परम हितकारक वचन तुझसे कहुंगा।

तू मुझमें मन (स्थित करने) वाला हो; मेरा भक्त बन जा। मेरा 18.65 पुजन करने वाला बन और मूझे प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है। संपूर्ण कर्त्तव्य कर्मों को मुझमें (समर्पित) कर तू केवल एक 18.66 मुझ (सर्वशक्तिमान, सर्वाधार) परमेश्वर की ही शरण आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दुंगा। शोक मत कर।

कितने शक्तिशाली शब्द हैं। सिर्फ ईश्वर ही इस प्रकार संपूर्ण सत्तावान की तरह बोल सकता है।

अब कृष्ण चरम सीख देने पर आते हैं। यह उनके सारी शिक्षा-ज्ञान एवं पाठ का सार है तथा 'भगवत् गीता' का निचोड़ है। वे अर्जुन को इस श्लोक से प्रजागृत कर उसे कृष्ण चेतना या प्रबोधन में स्थापित करते हैं।

वे कहते हैं - "सब कुछ तू छोड़ दे - जिसे तू धर्म, नियम-कानू-समझता है अपने आंतरिक और बाह्य जीवन-यापन को। इन सबको त्याग दे। सब कुछ छोड़कर तू मुझको संपूर्ण रूप से समर्पित हो जा। मैं तेरा उद्धार कर

दूंगा - तू भय न कर।'' कृष्ण उसे अभयदान देते हुए आश्वस्त करते हैं।

इस श्लोक के माध्यम से कृष्ण अर्जुन को प्रेरित करते हैं कि सब कुछ छोड़छाड़ दे। वे उसे मुक्त करना चाहते हैं। वे उसे सागर की चेतना प्रदान करते हैं (कहते हैं कि बूंद की चेतना त्याग दे)। वे अर्जुन को स्थायी रूप से चरम

अनुभव प्रदान करते हैं। अब अर्जुन, अर्जुन नहीं वरन् कृष्ण ही हो गया है। उसने कृष्ण चेतना प्राप्त कर ली है। अब तो सिर्फ कृष्ण ही कृष्ण है हर ओर, और कोई नहीं है। अर्जून और कृष्ण एक होकर गायब हो गए हैं। सिर्फ वहां बचा है एक ऊर्जा का पुंज, एक विश्व-चेतना।

'सारे धर्म, आचरण के नियम इत्यादि को भूलकर तू मेरे पास आ जा। मैं तेरा उद्धार कर दुंगा।' कथन है कृष्ण का।

इन शब्दों को कभी गलत रूप से नहीं समझना चाहिए, न प्रयुक्त करना चाहिए और न उद्धत ही करना चाहिए। यदि आप ऐसा करते हैं तो इससे ज्यादा बुरा आप कुछ नहीं कर सकते; ईश्वर को कतई परवाह नहीं होती कि कौन भला है या बुरा; संत है या पापी। हर एक को पूर्ण अधिकार है ईश्वर को प्राप्त करने का। यह सत्य है। बेशक जब आप ईश्वर को निकट पहुंचते हो तो ऊर्ज आपमें बदलाव लाती है। आध्यात्मिकता प्रबुद्ध जनों का वह सुजन है जो इस ईश्वरीय ऊर्जा में संपूर्ण जागरुकता के साथ रहते हैं। कृष्ण, शिव, बुद्ध, महादेव और जीजस प्रबुद्ध स्वामी थे। यह तो उनके अनुयायियों ने अपनी समझ के अनुसार उनके वचनों को अच्छी या बुरी व्याख्या प्रसारित की थी, जिसके कारण विभिन्न धर्म-पंथ अस्तित्व में आए। गुरु या स्वामी का तो काम होता है शिष्य को सही पथ पर डाल देना। चाहे कृष्ण पुरे अधिकार के साथ यह घोषणा करते हैं कि सारे धर्म-नियम कानून को छोड़कर मेरी शरण में आ जा - पूर्ण जागरुकता के साथ। यदि आप भी इन श्लोकों का मर्म समझकर उसके अनुसार ही आचरण करेंगे तो आप भी मुक्त हो जाएंगे। यह कृष्ण का वादा है सभी से। आइए! अब कुछ देर परब्रह्म कृष्ण की प्रार्थना करें - वही वैश्वक चेतना के रूप कृष्ण की जिन्होंने अर्जून पर अपनी कृपा से प्रबोधन बरसाया और उसे चरम सत्य की झलक दिखाएं। कुछ क्षण उनका ध्यान करें। यह न समझें कि वह अब उपलब्ध नहीं हैं। वे हर एक को हर समय उपलब्ध रहते हैं। वह शरीर के रूप में न हो, पर ऊर्जा के रूप में तो वह सर्वत्र हैं - हर समय उपलब्ध हैं।

मैं कहीं नहीं जाऊंगा

18.67 तुझे यह (गीता रूप रहस्यमय) उपदेश किसी काल में भी न े तो तप रहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति रहित से और न सुनने की इच्छा न रखने वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषद्दुष्टि रखता है (अर्थात् जो मुझमें दोष देखता है) उससे भी नहीं कहना चाहिए। 18.68 - जो पुरुष मुझमें परम प्रेम भाव रखकर इस (रहस्ययुक्त गीता शास्त्र) को मेरे भक्तों से कहेगा वह मुझको ही प्राप्त होगा - इसमें कोई संदेह नहीं है। 18.69 मेरा उससे बढ़कर प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई नहीं है; तथा मेरा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर प्रिय कोई दूसरा नहीं है। भविष्य में होगा भी नहीं। 18.70 - तथा जो पूरुष हम दोनों के इस धर्ममय संवाद रूप (गीता शास्त्र) को पढ़ेगा उसके द्वारा मैं ज्ञान यज्ञ से पूजित होऊंगा। 18.71 तथा जो पुरुष श्रद्धा (एवं दोष) रहित दृष्टि से इस (गीता शास्त्र) का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम करने वालों को श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा। 18.72 हे पार्थ! क्या मेरे द्वारा कहे गए इस उपदेश को तुने एकाग्र चित्त से श्रवण किया है? और धनंजय! क्या तेरा अज्ञान जनित मोह नष्ट हो गया?

कृष्ण द्वारा कहे गए ये शब्द सिर्फ अर्जून को ही नहीं वरन् समस्त मानव जाति को लिए संबोधित हैं। वे कहते हैं कि हमें इनको पढ़ना, सुनना और समझना चाहिए - यह संवाद जो कृष्ण और अर्जुन या 'नारायण' और 'नर' को बीच कायम हुआ है। इसके अलावा और कुछ भी पढ़ने-पढ़ाने या समझने-समझने के योग्य नहीं और कुछ भी ज़रूरी नहीं है, क्योंकि जो कुछ भी हमें चाहिए वह सब इसी गीता शास्त्र में उपलब्ध है।

वे कहते हैं कि जो मेरे लिए गहरी श्रद्धा रखे वही इसको पढे। 'मैंने यहां बता दिया है कि क्या सबके लिए बेहद लाभकारी ज्ञान है। यह बेहद गहरा रहस्य है और बताता है कि कैसे जीवन-यापन किया जाए तथा मुझ तक पहुंचा जाए। वह जो सब कुछ त्यागकर; अपने मन को निर्विचार कर इसको समझता है और मुझ पर ध्यान केंद्रित रखता है, वह निःसंकोच मुझ तक पहुंचेगा।

यह कृष्ण का वादा है (हम सबसे)।

उन्होंने अपनी करुणा को वशीभूत होकर समस्त जगत पर अपनी कुपा बरसाई है। अर्जुन पर अपनी कुपा बरसाई और उसे अपने में ही लीन कर लिया, क्योंकि वह भी कृष्ण हो गया। यही चेतना समस्त विश्व के लिए भी उपलब्ध है। वे घोषणा करते हैं कि यह पवित्र संवाद जो कोई भी पढ़े, सुने या समझेगा, वह उनकी शाश्वत चेतना से एकाकार हो जाएगा। हम आग में कुछ भी डालें वह तुरंत गायब हो जाता है। इसी तरह जब हम गीता के अध्ययन में स्वयं को समर्पित करते हैं, हम वैसे तो कतई नहीं रह सकते जैसे थे। हम उन्हीं (कृष्ण चेतना) के रूप हो जाएंगे, क्योंकि सिर्फ वही रहते हैं, वही परम अस्तित्ववान हैं।

पहले कृष्ण ने ('गीता' में ही) घोषणा की थी कि जब अच्छाई और बुराई का संतुलन बिगड़ेगा तब वह बार-बार इस संसार में आते रहेंगे (संभवामि युगे-युगे) और उसे सही करते रहेंगे। वही एक जगत स्वामी हैं जिनमें इतना साहस है यह कहने का – "कि मैं ही अंतिम गुरु (या अवतार) नहीं हूं। यह नहीं कि मेरे बाद कोई और आएगा ही नहीं।'' कृष्ण बेशक वासुदेव के रूप में मोर-मुकुट लगाए तथा बांसुरी लिए तो प्रकट नहीं होंगे। यह गलती हम अपनी नासमझी में अकसर करते हैं। वस्तुत: उनकी ऊर्जा तो बाद में बार-बार प्रबुद्ध स्वामियों को रूप में प्रकट होती रहेगी। वे इस तरह बार-बार अच्छाई और बुराई का सही संतुलन बिठाने के लिए इस संसार में आते रहेंगे और कुटिलता का नाश करते रहेंगे।

यह आखि़री बार है जब कृष्ण इस भगवत् गीता में बोलते हैं। वे पूछते हैं - "अर्जुन! तूने मुझको पूरी एकाग्रता के साथ तो सुना है न। क्या तेरा भ्रम दूर हो गया?''

अर्थात् अंतिम अवसर तक वह शिक्षक का रूप निभाते रहते हैं। वे अपने शिष्य के लिए करुणा-पूरित हैं उनका सरोकार अर्जुन एवं समग्र मानवता से ही है। वे पूछते हैं - ''तूने सब कुछ समझ तो लिया? क्या कुछ और समझना चाहता है?''

महान स्वामी की यही महान उदारता है। उनके मन में सिवाय अपने शिष्यों के कल्याण के और कोई चिंता रहती ही नहीं है। इसीलिए तो वे यहां आते हैं. नहीं तो पृथ्वी ग्रह पर आकर वे क्यों अपना समय बर्बाद करें। वे तो अपनी आनंदपूर्ण ऊर्जा में बिना किसी व्यवधान को अपने लोक में रहते होते। उन्हें क्या जरूरत थी इस मृत्युलोक में आने की?

मेरे शिष्युगण जानते हैं कि मैं सिर्फ तब ही दु:ख महसूस करता हूं जब मेरा कोई शिष्य मुझे छोड़कर जाता है। मुझे दु:ख इसका होता है कि वह (शिष्य) एक महान अवसर खो रहा है। उसकी आत्मा उसको मेरे पास उद्धार के लिए लेकर आई थी। यदि शरीर-मन तंत्र सहयोग न करे तो आत्मा को तब तक निरंतर संघर्ष करना पड़ता है, जब तक मुक्त होने का अवसर न मिल जाए। हर जन्म चक्र में आत्मा को कष्ट भोगना पड़ता है और उसे अफसोस ही रहता है कि उसे अंतिम कदम उठाने का फिर अवसर नहीं मिल पाया, लेकिन जिसने मेरे आश्रम द्वार को अंदर प्रवेश कर लिया, वह मुझे छोड़कर नहीं जा सकता। यदि कुछ जाते भी हैं तो मैं उनका साथ नहीं छोड़ता। मैं उनके साथ हमेशा रहता हूं। उनकी बद्धिमत्ता का वह क्षण, जब वे मेरे पास आए, मेरे लिए काफ़ी है, उनकी लगातार परवाह करने के लिए।

वे जो समझ चुके हैं उस निराकार रूप को जो मेरे अंदर निवास करता है, जानते हैं कि मैं अब उनका अटूट अंग हूं। वे कहीं भी रहें, मैं उनके साथ ही रहंगा।

यही कृष्ण का वादा है – "मुझे सुनो, समझो और मेरे पास आओ। तब तुम मेरे ही अंश बन जाओगे।''

लकों को माध्यम से बताते रहे हैं। अपने रूप की बलि दो और रूपरहित निराकार हो जाओ।

संजय अब वापिस दृश्य-पटल पर आता है। अर्जून तो अब 'गायब' है और रूण बेहद रोमांचित, दोनों ही अब बोलना नहीं चाहते। संजय ने तब बोलना शूरू किया था जब अर्जुन अवसाद ग्रसित थे। तब कृष्ण को कुछ कहना ही नहीं धा फिर जब कृष्ण ने अर्जुन को प्रथम अनुभव दिलवाया तो कृष्ण उच्च बेबनता स्तर पर थे और अर्जुन बेहद उन्मादित थे। उस समय संजय इसलिए बेलने आया क्योंकि इन दोनों में से कोई बोलने की स्थिति में ही नहीं था। अब संजय पुन: आ गया है। अब यहां संजय धृतराष्ट्र से बोल रहा है, क्योंकि अर्जुन और कृष्ण अब दुश्य-पटल पर हैं ही नहीं। संजय कहता है – ''हे राजन! मुझे बार-बार इस महान (आध्यात्मिक) संवाद का स्मरण हो रहा है जो अर्जुन और कृष्ण के बीच में हुआ था। इसको याद कर मुझे रोमांच हो रहा है। मैं अतिशय हर्षित हूं, क्षण-क्षण रोमांचित हो रहा हूं।'' संजय कहता है – "व्यास जी को कृपा से मुझे दिव्य-दृष्टि मिली और मैं यह अति गोपनीय संवाद सुन पाया – सीधे रहस्य को अधिष्ठाता श्रीकृष्ण से।" श्री व्यास ही महाभारत के रचियता थे जिसकी यह 'गीता' एक अंश है। संजय कहता है कि जहां योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं वहीं सारी वसुधा, विजय, श्री, विभूति और अचल नीति रहती है - यह मेरा मत है।'' इस प्रकार वह इस गीता का समापन अपने आशीर्वचनों से करता है।

जब भी कभी हम पढ़ेंगे-सुनेंगे या गीता का पाठ दूसरों को सिखाएंगे, अर्जुन और कृष्ण तो वहां सदा उपस्थित रहेंगे – अपने निराकार रूपों में। वे दोनों यहां भी इन पूरे अठारह दिन रहे हैं।

आप सब सौभाग्यशाली हैं कि आपकों दो महान आत्माओं को मध्य चला यह गोपनीय रहस्यपूर्ण संवाद सुनने का अवसर मिला। यह गुरु व शिष्य को मध्य का महान संवाद है। ईश्वर आपको आपको क्षेत्र में धन-स्वास्थ्य-संघनता दिलवाए। आप यहां से कृष्ण चेतना को साथ जाएं और आप सदा 'नित्यानंद' में रहें – शाश्वत आनंद में निर्माग्न। इस प्रकार भगवत् गीता उपनिषद का अठारहवां अध्याय 'मोक्ष-संन्यास योग' संपन्न हुआ, जिसमें कृष्ण और अर्जुन के मध्य संवाद के रूप में परब्रह्म परमात्मा पर चर्चा की गई थी।

कृष्ण (सर्वत्र ) उपस्थित हैं

18.73 अर्जुन बोले - " अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति (समझ) प्राप्त कर ली है। अब मैं संशय रहित होकर स्थित हूं - अत: आपकी आज्ञा का पालन करूंगा।

  • 18.74 संजय बोले "इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन को इस रहस्य युक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना।
  • 18.75 श्री व्यास जी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस गोपनीय योग को (अर्जुन के प्रति) कहते हुए स्वयं योगेशवर कृष्ण को प्रत्यक्ष मान सुना है।

18.76 राजन! श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्य युक्त, कल्याणकारक और अदुभुत संवाद को पुन :- पुन: स्मरण कर मैं बारंबार हर्षित हो रहा हूं।

  • 18.77 राजन! श्री हरि के उस अत्यंत विलक्षण रूप का बार-बार स्मरण कर मुझे अत्यंत आश्चर्य होता है और मैं लगातार हर्षित हो रहा हूं। 18.78 राजन! जहां योगेश्वर कृष्ण भगवान हैं और जहां धनुर्धर पार्थ हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है - ऐसा मेरा मत है।

इन अंतिम श्लोकों में अर्जून और संजय ही बोलते हैं। अर्जुन अपने स्वामी (कृष्ण) को सामने नतमस्तक होकर कहता है - "मेरे सारे शक़ और संदेह समाप्त हो गए हैं। मेरी समझ में सब आ गया है और मैं तैयार हूं। आप जो कहेंगे मैं करूंगा - (मैं लड़ुंगा भी)।

शेष सब तो सभी को ज्ञात है। कृष्ण के मार्गदर्शन में अर्जुन ने कौरवों का संहार किया। सारे कौरव, महान गुरुजन और कितने ही योद्धा मारे गए। यह भी ज्ञात है कि कालांतर में पांडव भी काल-कवलित हुए और महान गुरु कृष्ण भी। उन्होंने अपनी मानवी लीला का संवरण किया। जब तक कोई किसी रूप में आएगा वह रूप तो त्यागना ही पड़ेगा, पर ऊर्जा अविनाशी है और सदा रहती है। यही सब कृष्ण इन अध्यायों में अपने

च।। ् भूतानाम्बन्धरं चरमेव सुक्ष्मत्वात्तदविज्ञेय दूरस्थं चान्ति के च तत्।।15॥ बहरिन्त्रश्च अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तू च तज्जेयं ग्रसिष्ण् प्रभविष्ण् च ॥१६॥ तुज्योतिस्तमस् ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञाननम्यं हृदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥१७॥ इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्त समासतः। मद्भूक्त प्रकृतिं पुरुषं चैव विकारांश्च गुणांश्चैव विद्ध प्रकृतिसम्भवान्।।1911 कार्यकरणकर्तृत्वे । अस्य हेतुः पुरुषः सुखदःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्चते॥20॥ पुरुष: प्रकृतिस्थो हि हि भुंकत प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं उपद्रष्टाऽनुम्ता च च भर्ता भर्ता भोक्त महेश्वरः महेश्वरः । परमारत्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः परः ।।२२।। य एवं वेत्ति पुरुषं विद्युकृति प्रकृति च गुणे: सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ।।2311 ध्यानेनात्मनि कार वर्ष्यन्ति के विद्युक्ति के चिद्यात्मानमात्मना। विविधि के साथ प्रश्यन्ति के विद्यात्मानमात्मात्मनाः भारतमान्मान् । अन्ये सांख्येन योगेन योगेन में कर्मयोगेण चापरे॥24॥ अन्ये व विवमजानन्तः । अत्र श्रुत्वान्येभ्य न उपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।२२५।। यावत्संजायते क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि कि विद्यालय भारतर्षभ॥26॥ सम्बद्धाः सर्वेषु अवधितुषु भूतेषु भूतेषु भवतिष्ठन्तं श्री परमेश्वरम्। विष विनश्यतस्वविनश्यन्तं यः प्रश्यति स पश्यति स पश्यति॥27॥ सम्बद्धि पश्यन् हिं सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।12811 प्रकृत्यैव व च च कर्मणि का क्रियमाणानि व सर्वशः। यः प्रश्यति तथात्मानमकतारं से प्रश्यति॥29॥ यदा दिना जनसम्बद्धाः स्टब्स् सर्वे भूतपृथं भवमेकस्थमनुपर्श्यति। तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।13011 अनादित्वा त्रिंग णान्वात्वात्पर मात्मा यमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।३१।। यथा सर्वगतं सर्वगतं सोक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो देहे देहे तथात्मा नोपलिप्यते।13211 यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकभियं रविः। क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्सनं प्रकाशयति भारत।13311 भूतप्रकृतिमोक्षं च च ये विद्यान्ति ते परम्।13411

श्रीभगवानाउवाच!

शरीरं कौन्तेय डदं क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राह्युः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥१॥ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोज्ञनि यत्तज्ज्ञानं मतं मिम - 112 11 तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतयश्च यत्। स च यो यत्प्रभवश्च तत्समासेन में शण् 11311 ऋषिभिर्वहृधा गीतं छन्दोभिर्विविधे: पुथक। हेतुमभ्दिविंनिश्चिचतै: ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव = 11411 महाभूतान्यहंकारी बद्धिरव्यक्तमेव च। इंद्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचरा: 11511 इच्छा द्वेष: सूखं दु:खं संघसातश्चेतना धूति:। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ।1611 अमानित्वमद म्भित्वमहिंसा क्षान्तिराजविम् आचार्यापासन शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रह:11711 वैराग्यमनहकार एव डन्द्रयार्थेष च। जन्मम् त्यु जराव्यधिद् :खादो बान् दर्श म् ।।811 असक्तिरनभिष्यंगः नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्ठानिष्ठानिषु 11911 मयि यानन्ययोगिन शक्तरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि 1110 II अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञान यदतो ऽन्यथा। 11 || जेय | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ञात्वाऽमुतमश्नुत। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तत्रासदुच्यते।।1211 पाणिपाद तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमखम्। सबत: श्रृतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥13॥ सर्वत: सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। सर्वन्द्रद्यगणाभासं असक्तं सर्वभूच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥१३॥

Part 5: Bhagavad Gita demystified - Vol 3 Chapters 13-18_Hindi_part_5.md

श्रीभगवानउवाच! | | | | परं भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानम्नमम्। यज्ज्ञात्वा मुनय: सर्वे परां सिब्द्धिमितो गता:11711 इदं ज्ञानमुपश्रित्य मम साधर्म्यमागता:। सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।।21। मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भ दध्याम्यहम्। सम्भव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।३॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति या:। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।411 सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा: । निबध्नन्ति महाबाहो देहै देहिनमव्ययम् 11511 तत्र सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ 11611 रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम्। तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् 11711 तस्मस्त्वज्ञानजं विब्द्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तत्रिबध्नाति भारत।।8।। सत्त्वं सुखे संजयति रज: कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तम: प्रमादे संजयत्युत॥१॥ रजस्तमश्वाभिभूय सत्त्वं भवति भवति भारत। रज: सत्त्वं तमश्वैव तम: सत्त्वं रजस्तथा॥10॥ सर्वद्वारेषु देहे इस्मिन्प्रकाश उपजाश उपजायते। ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥11॥ लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भारतर्षभ॥112॥ अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।11311 यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। तदोत्तमविदां लोकानमलान्य्रपितद्यते ।।14।। रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिष् जायते। तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥14॥ कर्मण: सुकृतस्याहु: सारिवकं निर्मलं फलम्। रजसस्तु फलं दु:खमज्ञानं तमस: फलम्॥१6॥, सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहो तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥17॥ ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा: । जघन्यगुणवत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा:111811

चतुर्वशोऽध्यायः।

नान्यं गुणेश्यः कर्तारं यदा द्वष्टानुपश्यति। गणेभ्यूश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽविगच्छति॥११॥

जन्मम् त्यू जराद् :खै विर्म् क्तो ऽमू तमश्नु ते ।।2011

अर्जून उवाच। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते।12511 मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।12711

कैलिंगेस्त्रीन् गुणानेतानतीतो भवति प्रभोति प्रभो।

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।

न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि कांक्षति।।२२॥

उदासीनवदासीनो क्षेत्र गुण्यौर्यों में न न को विचाल्यते।

गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेंगते।12311

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्द्रात्मसंस्त्रति: ||2411

कथं चैतांस्त्रीनगुणानतिवर्तते।।2111

स्वस्थः समलोष्टाश्मकांचनः।

गुणानेतानतीत्य का व्रीन्देही होन्देही हो । म

किमाचारः

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यस्तुल्यो अप्रैल-जून

समद्रःखस्खः

देहसमुद्धभवान्।

मित्रारिपक्षयो: ।

। Horner

CT 911 271 -। विश्लाप्ताः ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं शाखमश्वत्थं प्राहरव्ययम्। छंदांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।।।। ऊर्ध्वमूलोऽवाकुशाख एषोऽश्वत्थः एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेव शुक्रं शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतम्च्यते।। अध्यश्चौध्वे प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवाला:। अधश्च मूलान्स् नुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥२॥ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसंगशस्त्रेण दृढ़ेन छित्त्वा।।३॥ ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्ति प्रसृता पुराणी।।4।। निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा:। द्वन्द्वेविमुक्ताः सुखद्:खसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।।ऽ।। न तद्भासयते सूर्यो न शंशाकोन पावकः। यदत्वा न निवर्तन्ते तब्द्धाम परमं ममा ममा।611 सनातन:। ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: कर्षति।।7 ।। प्रकृतिस्थानि मन:षष्ठानीन्द्रियाणि

श्रीरं यदवाण्नोति यच्चाप्युल्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं ध्राणमेव च। अधिष्ठाय विमुढ़ा नानुपर्श्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: 111011 योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्। यतन्तोऽप्यकृतात्मानो यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥१२॥ गामाविश्य व च च च भूतानि धारयाम्यहमोजसा। पृष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३॥ अहं वैश्वानरों भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित:। प्राणापानसमायुक्तः प्रचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥14॥ सर्वस्य चाहं ह्रादे सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिज्ञानमपोहनं च। वेदैश्च सर्वेरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥15॥ द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥16॥ उत्तमः यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वर:II17II यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥18॥ यो मामेवमसम्मूढ़ो को जानाति जानाति पुरुषोत्तमम्। स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत।11911 इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघा। एतद्बुद्ध्वा बुन्द्धिमानस्यात् कृत्कृत्यश्च भारत।।2011

श्रीभगवानूवाच।

अभय सत्त्वसंशुब्धिज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥१॥ सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशनम। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं हीरचापलम् 112 11 क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता। तज: सम्पदं सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।३॥ भवन्ति दम्भो दर्पोऽतिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च। चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥4॥ अज्ञान दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुच: सम्पदं सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥५॥

द्वौ भूतसर्गों लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु।1611 प्रवृत्ति च निवृत्ति च जना न विद्रासुरा:। न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७॥ जगदाहरूनीश्वरम्। असत्यमप्रतिष्ठं ति अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।1811 एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पब्ध्वयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता:11911 काममान्श्रित्य मोहाद् गृहीत्वाऽसद् ग्राहान्प्रवर्तन्ते ऽशुचिव्रता: II10II चिन्तामपरिमेयां व च च च प्रलयान्तामुपाश्रिता:। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता: निश्चिता: ||11|| आशापाशशशतैर्वद्धाः कामक्रोधपरायणाः। कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान्॥12॥ । इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।11311 असौ - मया हतः शर्त्रुहनिष्ये चापरानपि। ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥14॥ आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: 111511 अनेकचित्तविभ्रान्ता । विवादी मोहजालसमावृता:। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतनित नरकेऽशुचौ॥16॥ । आत्मसम्भाविताः स्तब्छा स्तब्छा धनमानमदान्विता:। यजने नामयज्ञैस्ते नामयज्ञैस्ते विधिपूर्वकम्॥१७॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता:। मामात्मपरदेहेषु विवर्षः प्रद्धिषन्तोऽभ्यसूयकाः।।।18॥ तानहं द्विषतः क्रिूरान्संसारेषु नराव्सारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्त्रमश्भानासुरीष्वेव व योनिष्ठ्या1911 आसुरीं योनिमापन्ना मूढ़ा जन्मनि जन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्।12011 त्रिविधं नरकस्येदं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:। काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्व्रयं त्यजेत।12111 एतैविमुक्त: कौन्तेय कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर:। आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम्।12211 यः शास्त्रविधिमुत्सुज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाण्नोति न सुखं न परां गतिम्।12311 तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्याव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥24॥

" सप्तदशोऽध्याय:

सम्मान क्याच अर्जून उवाच। ये शास्त्रविधिमत्सज्य यजन्ते श्रद्धयान्विता:। तेषां निष्ठा त का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तम: 11111 1184-7 अस्तानम् श्रीभगवानूवाच। विभाव त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सारिवकी राजसी चैव तामसी चेति तां शुण्।।211 सत्त्वानरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धा मयोऽयं पुरुषो यो यच्छन्द्धः स एव स:11311 यजन्ते सारिवका देवान्यक्षरक्षांसि राजसा:I प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना:11411 अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहंकारसंयुक्ता: कामरागबलान्विता:115॥ कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्धयासरनिश्चयान्॥6॥ आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रिय:। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शुण्॥७॥ आयु : सत्त्व बलारो ग्यस खाप्रीति विवर्ध ना : । रस्या: स्निग्धा: स्थिरा हृद्या आहारा: साक्त्विकप्रिया: 11811 कट वम्लल वणात्यू ष्णाती क्षण रू क्षविद्याहिन : । आहारा राजसस्येष्ठा द:खशोकामयप्रदा: 11911 यातयामं गतरसं पूति पूर्ति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१०॥ अफलाकांक्षिमिर्यज्ञो विधिदृष्टो य व इज्यते। यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स साक्तिक:111111 , अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यता । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२॥ विधिहीनमसुष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥13॥ देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शास्त्रमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च च शरीर तप उच्यते।11411 अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते। 1511 मुनः प्रसाद: सौम्यत्वं मौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्त्वो मानसम्ब्यते॥16॥ श्रद्धया परया तप्तं तपस्त तपस्तत्रिविधं नरें:। अफलाकांक्षिभिर्युक्तै: सारिवकं परिचक्षते।1711 सत्कारमानपुजार्थ तपो दम्भेन चैव चैव यत्।

क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्युवम्।1811

् यत्पीडया व क्रियते क्रियते व तपः। मुढुग्राहेणात्मनो ् परस्योत्सादनार्थ दातव्यमिति यत्तु, प्रत्युपकारार्थ, फलमुद्दिश्य वा वा पून:। दोयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।12111 अदेशकाले अपूर्वानमपात्रेभ्यश्च तत्त्तामसमुदाहृद्दम्।।2211 उँ० तत्सदिति निर्देशो ब्राह्मणस्त्रविध: स्मृत:। असत्कृतमवज्ञातं ब्राह्मणास्तेन वेदाशच यज्ञाश्च विहिता: पुरा।12311 तस्मादोमित्युदाहृत्यु तदित्यनभिसन्धाय फलं फलं यज्ञतपः व्यज्ञतपः क्रियाः। दानक्रियाश्च विविधा: क्रियन्ते मोक्षकांक्षिभि:112511 सद्भावे साधुभावे च च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छबद: पार्थ यूज्यते।।2611 यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सदिति चोच्यते। कर्म चैव तदर्श्यीयं सदित्येवाभिधीयते॥27॥ अश्रद्धया हुंतं दत्तं

अष्टादशोऽध्यायः। अष्टादशोऽध्यायः। भारत

MODING STREND THE प्रतात दिनी हे विवाही अर्जुनउवाचा संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पुथ्क्वेनशिनिष्दन ।।।।। काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विद् :। सर्वकर्म फलत्यागं प्राहृ स्त्यागं विचक्षणा: 11211 त्याज्यं दोषवदित्येवेद कर्म प्राहृर्मनीषिण: । ्यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे 11311 निश्चयं शुण् मे तत्र त्यागे भरतस्यत्यागे भरतसन्त्सम् । ( त्यागे ही पुरूषव्याध्य त्रिविध: सम्प्रकीर्तित: 11411 । यज्ञदानतपः । कर्मण्डेन निर्त्याज्यं कार्यमेव दतत् । यूजो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥५॥ । एतन्यापि तु कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतम्तम्तमम् 11611 नाः नियतस्य वृतुः संन्यासः कर्मणो नो प्रार्थे नो प्रार्थाते । अमोहात्तस्य परित्यागस्तामयः परित्यागस्तामयः परिकीर्तितः द् : खमित्ये व - यत्कर्म - कायक्ले शाभायात्त्यजे त् । स कृत्वा राजसं त्याग नैव त्यागफलं लभेत् 11811 कार्य मित्येव यत्कर्म नियतं क्रियते क्रियते ऽर्जु न । 1979 THE MINITATION BE MILET IT INT

संग त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सारिवको मत: 11911 न द्वेष्ट्यवुद्रशालं कर्म वृद्युग्ले नानुष्ठन्त्रसंशयः ।।१००॥ न हि देहभूता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्त कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥११॥ अनिष्टमिष्ट मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्यं न त् संन्यासिनां क्वचित् ॥१२॥ पंचैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धते सर्वकर्मणाम्।।13॥ अधिष्ठानं तथा कर्ता करणां च पथग्विधम्। विधिवाश्च पुथक चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्॥14॥ शरीरवाड मनो भिर्य त्कर्म प्रारभाते नर: ! न्याय्यं वा विपरीतं वा पंचैते तस्य हेतव: 111511 तत्रैव सति कर्तारमात्मानं वेनवलं त् यः। पश्यत्यकतब्बित्वान्न स पश्यति दर्मति: 111611 यस्य नाहंकतो भावो ब्रव्द्धियस्य न लिप्यते। हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥17॥ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। करणां कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसंग्रह: 111811 ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिवैध गणभेदत ! प्रोत्यते गुणसंख्याने यथावच्छण् तान्यपि॥११९॥ सर्व भातेष ये नै क भावमव्ययमीक्षाते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सारिवकम्॥20॥ पुथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्युथम्विधान्। वैत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥21॥ यत्त कृत्स्नवदे कस्मिन् कार्ये सक्तमहै तुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमदाहृद्धतम् 112211 नियतं संगर हितमरागद्वे बत: क्रतम्। अफलप्रेष्ठमना कर्म यत्तत्सारिवकम् च्यते 1123 11 यत्त् काम्प्सना कर्म साहं कारेणा वा पन: ! क्रियते बहुलायासं मद्रायसम् दाहृतम् 112411 अनुबन्धां क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादरभ्यते कर्म यत्त्वामसम् च्यते 112511 म् क्त सं गो 5 नह वादी धू त्यू त्साह समन्वत : । सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सारिवक उच्यते।12611 रागी कर्म फलप्रे प्सूलु ब्धो हिंसात्मको ऽशूचि: । हर्षश्रोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित: 1127 11 अयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शाठो नैष्कृतिकोऽलस:। विषादी दीर्घसूत्री च तार्क तामस उच्यते।12811 बद्धे भेंद धूतै रचैव गणतस्त्रिविधं शुण। प्रो च्मानमशोणेण प्र पुथक्वेन धानंजय।129 !। प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।

बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धि सा पार्थ सान्त्विकी।13011 य या धर्ममधार्म च कार्य चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी।13111 अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसाव ता। सर्वार्थान्वपरीतांश्च बुद्धि सा पार्थ तामसी।13211 धात्या यया धारयते मन:प्रोणोन्द्रिय क्रिया: । योगेनाव्यभिचारिण्या धुति: सा पार्थ सान्त्विकी।13311 यया त् धर्म कामार्था न्धू त्या धारयते ऽर्ज न। प्रसंगेन फलाकांक्षी धुति: सा पार्थ राजसी।13411 यया स्वप्नं भयं शोक विषादं मदमेव च। न विमुंचति दर्मेधा धुति: सा पार्थ तामसी।13511 सख्य त्विदानीं त्रिविधं शुण मे भरतर्ष भा। अभ्यासाद्रमते यत्र द्रःखान्तं च निगच्छति।।३६॥ यत्तदग्रे विष्णमिव परिणामे ऽम तो पमम। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबन्धिद्धप्रसादजम्।13711 विषये निद्द यसंयो गाद्य लदग् 5म तो पमम । परिणामे विषमिव तत्सखं राजसं स्मतम् 113811 यदग्रे चान बन्धो च सख्यं मोहनमात्मन: I निद्रालस्यपूरमादोल्थं तत्तामसम् दाहृतम् 113911 न तदस्ति पश्चिव्यां वा दिवि देवेष वा पन: । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं येदभि: स्यात्त्रिभिर्गणै:114011 ब्राह्मणक्षश्रियोवशां श्रद्राणां च परंतप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैग्णै:114111 शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिराजैवमेव च। जानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।14211 शौर्य तेजो धृतिदांक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥143॥ क षिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचार्यात्मकं कर्म शुद्रास्यापि स्वभावजम्।14411 स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:। स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विदन्ति तच्छूण 114511 यतः प्रवृत्तिभू तानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमध्यच्य सिद्धिं विन्दति मानव: 114611 श्रेयान्स्वाधर्मों विगूण: परधर्मा त्स्वन् ष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कर्वन्नाजोति किल्विषम्॥४७॥ सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत। सर्वारम्भा हि दोषेण धुमेणाग्निरिवावता: 114811 असक्तब दि सर्वत्र जितात्मा विगतस्प है। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगचित्रति।।4911 सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।15011 बुद्धया विशुद्धया युक्तो धूत्यात्मानं नियम्य च।

शब्दादीन्विषयास्त्यक्त्वा रागद्रेषो व्यदस्य च।1511! विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस: ! ध्यानयोगपरी नित्यं वैराग्यं समपाश्रित: 115211 अहंकार बलं दर्प काम क्रोधां परिग्रहम्। विम्न्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभयाय कल्पते।15311 ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति। समः सर्वेष् भूतेषु मद्भकितं लभते पराम।15411 भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् 115511 सर्वकर्माण्यपि सदा वनवाणो मद्र्यपाश्रय:। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् 115611 चे तसा सर्व कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पर : । ब्रद्धियोगम्पाश्रित्य मच्चित: सततं भव।15711 मच्चित्त: सर्वदर् गणि मत्पू सादार्तारिष्यसि। अथ चेन्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनक्ष्यस्मि॥५८॥ यदहं कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्वां नियोक्ष्यति॥59॥ स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा। कर्तं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्।।6011 ई श्वर: सर्व भातानां हृहे शो ऽर्ज न तिष्ठ ति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।6111 तमेव शरणां गच्छ सर्व भावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।16211 इति ते ज्ञानमाख्यातं गह्यादग्रह्मतरं मया। विस्मृश्यैतदशेषण यथेच्छसि तथा वनरु। 6311 सर्व गृह्यतमं भूय: श्राण मे परमं वच: 1 इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् 116411 मन्मना भव मद भक्तो मद्याजी मां नमस्वरू। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।16511 सर्वधार्मान्परित्यन्य मामेकं शरणां व्रज। अहं त्वा सर्वपाप्येभ्यो मोक्षविष्यामि मा शच:116611 इदं ते नातपस्कार नाभक्ताय कदाचन। न चाश्श्रृषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसयति॥67॥ य इदं परमं गर्ह्यं मद भक्ते ष्वभिखास्यति। भाक्तिं मयि परां कत्वा मामेवैष्यत्यसंशय: 116811 न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भूवि॥69॥ अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो: । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति: 117011 श्रद्धावाननस्य्यञ्च शृण यादपि यो नर ! सोऽपि मक्त: शभाँल्लोकान्प्राजपात्पण्यकर्मणाम्।।7111 क च्चिदेत च्छतं पार्थ त्वैकाग्रेण चेतसा।

कच्चिद् ज्ञानसम्मोह : प्रनष्टस्ते धानंजय 117211 अर्जन उवाच।

नष्टो मोह: स्मृतिलंबध त्वत्प्रसादान्मयाच्यत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।17311 संजय उवाच।

इत्यहं वासदे वस्य पार्थस्य च महात्मन: । संवादमिममश्रौ घमद् भतं रोमहर्षणम् 117411 ्या सप्र सादा च्छ त वा ने तद ग ह्यमह परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्।17511 राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवाद मिम भद् तम् केशवार्जूनयो: प्रण्यं हृष्यामि च महर्मह:117611 तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद् भूतं हरे:। विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः पनः।।7711 यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थों धनर्धर:। तत्र श्रीविजयो भूतिर्धू वा नीतिर्म तिर्म म।17811 गंगाधार्-प्रूत्र, पूना-वासी, महाराष्ट्र विप्र वेदिक तिलक बाल बुध ते विधीयमान। 'गीतारहस्य' किया श्रीश को समर्पित यह, वार काल योग भूमि शक में सूयोग जान। ॥ ॐ तत्सद ब्रह्मार्यणमस्त् ॥ ॥ ॥ ॥ शान्ति: पुष्टिस्तुष्टिश्चास्त् ॥

परमहस नित्यानंद जी

भारत के दुर्लभ सजीव अवतार, परमहंस नित्यानंद हमारी सहस्त्रा की एक महानतम आध्यात्मिक शक्ति बनकर उभरे हैं। हर वर्ष विश्व भर में 2 करोड लोगों के साथ अपनी शक्ति बांटते हुए कार्यरत नित्यानंद जी समस्त मानवता को एक बड़ी देन : महाचेतना, प्रदान करने को लिए प्रयत्नशील हैं।

विश्व की सबसे पुरानी व प्रसिद्ध, mind-body-spirit, magazine 'Watkins' ने स्वामीजी को दुनिया के सौ सबसे आध्यात्मिक व प्रबल हस्तियों में नामित किया है। प्रतिदिन सुबह, स्वामीजी के सत्संग, 150 देशों में हजारों लोग इंटरनेट द्वारा देखकर लाभ उठाते हैं। एक आध्यात्मिक मेधा और प्रवुद्ध अन्तेदृष्टि से संपन्न जो प्रबंधन से ध्यान तक सारी प्रक्रियाओं, सम्बन्धों से धर्म और सफलता से संन्यास का मर्म समझते हैं। THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी हमें व्यवहारिक ज्ञान से समृद्ध कर ध्यान के वे सूक्ष्म गूर बताते हैं जो हमारे अन्दर एक स्थायी परिवर्तन ला सकते हैं। इसके अलावा लोगों को उन्होंने मात्र अपने एक स्पर्श से स्वस्थ किया है जिनमें शामिल है अवसाद से लेकर केंसर ग्रस्त रोगी भी । आज THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी 'यू ट्यूब' पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाले आध्यात्मिक गुरु तथा 27 भाषाओं में प्रकाशित 300 से अधिक अंतराष्ट्रीय पुस्तकों को 'बेस्ट सेलिंग' लेखक भी हैं।

अभी हाल ही में उन पर धर्म और कानून की आड़ में एक झूठा मामला चलाकर कारावास में भी भेजा गया था जिससे वह और ज्यादा शक्तिवान एवम् सटीक बनकर उभरे हैं और उनका विश्व को योग एवम् ध्यान का आलोक प्रदान करना बदस्तूर व निर्बाध रूप से जारी है। पूर्व के प्राचीन रहस्यदायी ज्ञान में निकाली गई इन मणियों द्वारा वह लाखों का अज्ञान जनित अंधकार दूर करने में संलग्न है। प्रांजलता, प्रमाणिकता को साथ श्री THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी की सदय अंतर्रव्य जन मानस के संघर्षों एवम् अपेक्षाओं का आलोकन कर उन्हें ऐसी प्रासांगिक शिक्षा प्रदान करती है जो देश-काल एवम् मन के बन्धनों से परे रहती है।

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM मिशन : समग्र विश्व एक नई चेतना में प्रवेश कर रहा है जिसमें भोगकामी और आध्यात्मिक जीवन के भेद, बाहय वृद्धि और अंतरवृद्धि को फर्क

श्रीमद्भगवत गीता

तेजी से मिटते जा रहे हैं। इस नए युग का मानव एक ऐसा समरसतापर्ण विश्व बनाने को उद्यत है जिसमें भोग-योग और प्राचीन ज्ञान व आधनिक वैज्ञानिक समझ एक दूसरे के पूरक होकर एक ऐसे समुद्ध और संतष्टिदायक जीवन का सुजन कर रहे हैं जहां सब कुछ एकात्मक प्रतीत होता है।

इसी क्रांतिकारी सत्य को वैश्विक समाज तक उपलब्ध कराना THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM मिशन का उद्देश्य है । THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM मिशन का विश्वव्यापी आंदोलन है जो जीव मात्र में सत्य की जागरुकता भरने को कटिबद्ध है। यह नस्ल, लिंग भेद या राष्ट्रीयता की सीमाओं से परे जाकर समष्टि को चेतन करता है। आधुनिक जीवन के संदर्भ में प्राचीन वैदिक ज्ञान की पुनर्व्याख्या कर यह मिशन व्यष्टि को समर्ष्टि में बदलने के शक्तिवान परिवर्तन के लिए अवसर उपलब्ध कराने को निंरतर कार्यरत है।

कार्यक्रम एवं कार्यशाला : THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM ध्यान पीठ वैश्विक स्तर पर विशिष्टध्यान के कार्यक्रम उपलब्ध कराता है, जिससे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्तर पर लोगों को लाभ पहुंचे। इनमें से कुछ नीचे दिए गए हैं :

आंतरिक जागरुकता पैदा करना : यह 21 दिनों का एक गहन एवम् अनूठा प्रोग्राम है जिसका उददेश्य है व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में अपनी पूरी संभावनाओं की तलाश करने को तैयार करना । इसकी कुछ विशेषताएं हैं:

  • योगिक शरीर तैयार करने हेतु नित्य योग।
  • · शरीर को शुद्ध और मस्तिष्क एवं आत्मा को पूरी तरह ऊर्जान्वित करने के लिए विविध ध्यान तकनीक का यथोचित समिश्रण (पूर्व जन्म में प्रवेश करने की विधि)।
  • · शक्तवान ऊर्जा-दर्शन।
  • बोधक कैम्पफायर सत्र।
  • · क्रण्डली जागरण के गहन सत्र जिसमें प्रतिभागियों के शरीर उत्तोलन की भी अनुभति होती है।

वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि यह कार्यक्रम माईटी केन्द्रिपल सेल एनर्जी (कोशिका की अन्तर्निहित शक्ति) बढ़ा देता है जिससे व्यक्ति कई प्रकार के स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त करता है - यथा रक्त शर्करा एवम् रक्त चाप का नियंत्रण, भार संतुलन और अनिद्रा जैसी कई व्याधियों में राहत पाना डत्यादि।

एनवैल्थ : परमहंस THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी का यह एक अनूठा साप्ताहिक कार्यक्रम है जिसमें वे धन सम्पदा सर्जन के छिपे वैदिक रहस्य उजागर करते हैं - यथा धन को आकर्षित एवम् सही रूप में प्रबन्धित करने को लिए सही आंतरिक अवकाश पैदा करना, त्रूटिहीन और पूरे दायित्वपूर्ण निर्णय लेना, सहज रूप से सफलता पाने के तरीके और गूर सीखना।

The Supreme Pontiff Of Hinduism Bhagawan Sri Nithyananda Paramashivam मिशन की विशेषताएं

  • · मेडीटेशन एण्ड डी-एडिक्शन कैम्पस वर्ल्डवाइड : आज तक लोगों को लाभान्वित कर चुके हैं।
  • · नित्या स्पिरीचुअल हीलिंग : एक ब्रहमाण्डीय ऊर्जा चंगा करने का तंत्र जो से अधिक निष्णात् शिक्षकों द्वारा प्रदान कर शरीर और मन को दुरुस्त करता है।
  • अन्न-दान ( मुफ्त भोजन कार्यक्रम ) : आगन्तुकों, भक्तों और शिष्यों को लिए हर हफ्ते भोज्य पदार्थों का मुफ्त वितरण आश्रम के अन मॉदिरों में किया जाता है जिससे उनका स्वास्थ्य अच्छा रहे।
  • दि THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM ऑर्ट एंड इट्स ट्रेनिंग : यह प्रशिक्षण आध्यात्मिक साधना के इच्छूक संन्यासियों, ब्रहमचारियों एवम् ब्रहमचारिणियों को दिया जाता है। इसके दौरान इन्हें योग, ध्यान, गहन आध्यात्मिक अभ्यासों, संस्कृत, वैदिक उच्चारण, एवम् जीवन में योग्यता पाने की कलाओं का कड़ी तपस्या द्वारा ज्ञान दिया जाता है। फिर ये ही लोग 100 प्रतिशत स्वयंसेवी रूप में विश्व भर को THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM ध्यान पीठमू चलाते हैं और मिशन की सारी गतिविधियां नियंत्रित करते हैं।
  • नित्य योग : पंतजलि ऋषि की मूल शिक्षा पर आधारित एक क्रांतिकारी योग-शिक्षा का कार्यक्रम जो 15 देशों में संचालित किया जाता है।
  • THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM वैदिक टेम्पल्स : 33 से अधिक वैदिक मंदिर और आध्यात्मिक शोध अकादिमयां जो सारे विश्व में फैली हई हैं।
  • मेडीटेशन प्रोग्राम्स इन प्रिजन : कारागारों एवम् बाल सुधार गुहों में संचालित यह कार्यक्रम बन्दियों में अतिवादी व्यवहार में सुधार लाता है जिससे उनके जीवन में एक अदुभुत और आश्चर्यजनक परिवर्तन आता है।
  • · मेडिकल कैम्प्स : एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद, एक्यूपंक्वर, नेत्र परीक्षा व नेत्रों की शल्य-क्रिया, कृत्रिम अंग-दान के कैम्प, स्त्री-चिकित्सा इत्यादि को लिए ये मुफ्त इलाज को शिविर हैं।
  • · ग्रामीण क्षेत्रों में बाल-सहायता : ग्रामीण इलाकों में स्कूल की इमारतें, बच्चों को यूनिफार्म बनवाना, पढ़ाई की सामग्री मुफ्त प्रदान करना इत्यादि।
  • · THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM विद्यालय : ऐसी शिक्षा द्वारा छात्रों को प्रबुद्ध करना जिसमें प्राचीन वैदिक तंत्र और आधुनिक प्रौद्योगिकी का ज्ञान समाहित हो तथा बिना किसी दबाव, भय या मां-बाप की जोर जबरदस्ती के बच्चों को फूलों को तरह वृद्धि सुनिश्चित करना।
  • कारपोरेट मेडीटेशन प्रोग्राम्स : विश्व भर की बड़ी-बड़ी कारपोरेट फर्मों तथा माइक्रोसॉफ्ट, एटी एण्ड टी, क्लालकोम्म, जेपी मोरगन,

श्रीमद्भगवत गीता

पेटोबाज, पेप्सी, ओरेक्ल, अमेरिकन एसोशिएशन ऑफ फिजीशियन ऑफ हिन्दू ओरिजिन (ए ए पी आई) को लिए डिजाइंड और संचालित इन प्रोग्राम का इन्ट्यूटिव मैनेजमेंट (अन्तप्रज्ञात्मक प्रबन्धन), नेतृत्व की दक्षता और समूह के रूप में कार्य प्रशिक्षण पर रहता है।

  • · THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM इन्स्टीद्युट ऑफ टीचर्स ट्रेनिंग : से अधिक शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाता है : टॉन्सफारमेशनल मेडीटेशन प्रोग्राम्स, क्वांटम मेमोरी प्रोग्राम्स, नित्या-योग, हेल्थ एण्ड हीलिंग प्रोग्राम्स एवम स्प्रिचअल प्रोग्राम्स सदुश कार्यक्रमों को दूसरों को सिखाने के लिए।
  • · मीडिया : राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय अखबारों तथा पत्रिकाओं में छपने वाले लेखादि निकाले जाते हैं जो THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी से प्राप्त क्रांतिकारी परिवर्तन पाने के संदेशों से भरे-परे रहते हैं।
  • · THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM पब्लिशर्स : इन हाउस में घंटों से ज्यादा अवधि के परमहंस THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM के प्राक्थकनों को लिपिबद्ध करना, संपादन के बाद प्रकाशन कर, उन्हें पुस्तक, डी वी वी या सीडी के जरिए पुस्तक भंडारों में उपलब्ध करने का काम चलता रहता है।
  • · लाइफ बिल्ल गैलेरियाज : विश्व व्यापी स्टोरों और मोबाइल शॉपीं में THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी के 23 भाषाओं में लिपिबद्ध पुस्तकों एवं THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM कीर्तनों को उपलब्ध कराना।
  • · THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM मेडीटेशन एण्ड हीलिंग सेन्टर्स : विश्वभर में व्याप्त, ध्यान एवं रोग-हर तकनीक का मफ्त ज्ञान देने वाले केंद्र।
  • · THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM संगीत अकादमी : संगीत, नत्य एवं अन्य कला-विधियों को युवाओं तथा व्यस्कों को सजीव रूप से इन्टरनेट के माध्यम से सिखाता है।
  • · यू द्यूब पर मुफ़्त डिस्कोसेज : 1500 से अधिक मुफ्त प्रवचन पर उपलब्ध, जो स्वामी जी के ज्ञान से भरपूर रहते हैं। ये आसानी से उपलब्ध हैं और दर्शकों को बेहद प्रिय भी हैं।
  • · सपोर्ट दू साइन्सटिस्ट्स एण्ड रिसर्च: विज्ञान और अध्यात्मक के मध्य लगातार एक पूल बनाने में संलग्न जिसमें आध्यात्मिक ऊर्जा द्वारा हीलिंग पर विशेष ध्यान रहता है।
  • · THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM इन्टरनेशनल यूथ फाउण्डेशन ( एन आई वाई एफ ) : एक प्रेरक युवाओं का चुना हुआ समुदाय जो निरंतर शांति एवम् उद्दबोधन के आदर्शवाद से प्रेरित एक गतिशील समाज बनाने में संलग्न रहता है।

श्रीमदुभगवत गीता

  • · वीमैन्स एम्पॉवरमेंट ( डब्लू ई ): महिला सशक्तिकरण हेतू जुडी कर्मव महिलाओं का एक गतिशील समूह जो महिलाओं को प्रवृद्ध करने समाज की हर स्तर - शारीरिक, मानसिक एवम् आध्यात्मिक स्तर पर सेवा करने को तत्पर रहता है।
  • · नित्य धीर सेवा सेना : आत्म-रूपांतरण के माध्यम से 'आनंद सेवकों' का यह स्वयंसेवी दल मानवता की सेवा में निरंतर दत्त चित्त है यदि कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो पूरी तत्परता से राहत के काम में जुट जाता है।